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Santa Biblia


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Santa Biblia

Biblia Hebraica Stuttgartensia 

Novum Testamentum Græce

Traducción Contextual al Español

Biblia Textual

Sociedad Bíblica Iberoamericana


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ÍNDICE GENERAL

Abreviaturas usadas en esta obra  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .

vi

Prólogo (que todo lector debe considerar)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .

vii

ANTIGUO PACTO

Génesis (Gn .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1 

Eclesiastés (Ec .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .680

Éxodo (Éx .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .58 

Cantar de los Cantares (Cnt .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .690

Levítico (Lv .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 104 

Isaías (Is .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .697

Números (Nm .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 138 

Jeremías (Jer .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .764

Deuteronomio (Dt .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 185 

Lamentaciones (Lm .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .831

Josué (Jos .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 225 

Ezequiel (Ez .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .841

Jueces (Jue .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 252 

Daniel (Dn .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .895

Rut (Rt .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 280 

Oseas (Os .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .911

1 Samuel (1 S .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 284 

Joel (Jl .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .922

2 Samuel (2 S .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 319 

Amós (Am .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .927

1 Reyes (1 R .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 349 

Abdías (Abd .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .935

2 Reyes (2 R .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 382 

Jonás (Jon .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .937

1 Crónicas (1 Cr .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 415 

Miqueas (Mi .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .940

2 Crónicas (2 Cr .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 445 

Nahúm (Nah .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .946

Esdras (Esd .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 484 

Habacuc (Hab .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .949

Nehemías (Neh .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 496 

Sofonías (Sof .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .952

Ester (Est .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 512 

Hageo (Hag .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .955

Job (Job)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 521 

Zacarías (Zac .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .957

Salmos (Sal .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 556 

Malaquías (Mal .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .967

Proverbios (Pr .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 651

NUEVO PACTO

según Mateo (Mt .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 973 

a Timoteo 1 (1 Ti .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1223

según Marcos (Mr .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1014 

a Timoteo 2 (2 Ti .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1228

según Lucas (Lc .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1039 

a Tito (Tit .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1232

según Juan (Jn .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1082 

a Filemón (Flm .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1234

Hechos (Hch .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1112 

a los Hebreos (He .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1235

a los Romanos (Ro .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1152 

Jacobo (Jac .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1248

a los Corintios 1 (1 Co .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1169 

Pedro 1 (1 P .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1253

a los Corintios 2 (2 Co .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1185 

Pedro 2 (2 P .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1258

a los Gálatas (Gá .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1196 

Juan 1 (1 Jn .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1261

a los Efesios (Ef .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1202 

Juan 2 (2 Jn .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1266

a los Filipenses (Fil .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1208 

Juan 3 (3 Jn .)   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1267

a los Colosenses (Col .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1213 

Judas (Jud .) .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1268

a los Tesalonicenses 1 (1 Ts .)   .  .  .  .  .  .  .  . 1217 

Apocalipsis (Ap .)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1270

a los Tesalonicenses 2 (2 Ts .)   .  .  .  .  .  .  .  . 1221

Notas sobre pasajes especiales .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1289

Las enmiendas de los Soferim .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1292

Consejo Consultivo  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1335

Tabla de pesos y medidas .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1336

Alfabetos hebreo y griego .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . 1337


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ABREVIATURAS

w

Antiguo Pacto  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . AP/AT

w

Arameo  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . arm

w

Biblia Textual   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . BT

w

Capítulo (s)  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . c .

w

Códice Alejandrino  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . A

w

Códice Beza  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  D

w

Códice Efraimi Rescriptus  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .C

w

Códice Sinaítico  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . a

w

Códice Vaticano  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .B

w

Griego   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .gr .

w

Hebreo/Hebraísmo .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .heb .

w

Literal/Literalmente   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .Lit .

w

  Manuscritos .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . Mm ./mss .

w

  Manuscritos fidedignos .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . MÛ

w

  Manuscritos inferiores   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . MÜ

w

  Nuevo Pacto .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . NP

w

  Notas en Pasajes Especiales   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .§

w

  Nuevo Testamento Griego  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .NTG

w

  Otra traducción posible .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . N

w

  Papiro   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . P

w

  Pasaje o pasajes paralelos  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . par .

w

  Pasajes espúreos  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . [[ ]]

w

  Por ejemplo  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . p .ej .

w

  Probablemente .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .prob .

w

  Versión Griega del AP .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . LXX

w

  Significa, igual a  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .=

w

  Subsiguientes  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . ss .

w

  Suple elipsis del original .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . .

w

  Texto Masorético  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .TM

w

  Textus Receptus .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . TR

w

  Véase, compare, registrado en  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .→

w

  Versículo .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . v .

w

  Versículos .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . vv .

w

  Versión Reina Valera   .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .VRV

w

  Versión Siríaca  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  . Sir .

w

  Vulgata Latina .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .  .VUL


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vii

PRÓLOGO

(que todo lector debe considerar)

La BIBLIA es más que un tesoro histórico o un clásico literario para ser preserva-

do, admirado o aplaudido. Es algo más que un conjunto de documentos sobre cuya 

base puedan exaltarse talentos de hombres doctos. La BIBLIA es la más grande de 

todas las obras del Creador. Revela su mente, expresa su voluntad y manifiesta su po-

der mediante palabras que, entre otros muchos propósitos, tienen poder para quitar 
la muerte y sacar a luz la vida y la inmortalidad
 de quien lee con fe.

No suponga entonces el lector que tiene en sus manos un libro que el hombre 

hubiera podido escribir de haber querido. Su maravillosa unidad y continuidad, y 

sus predicciones cumplidas, evidencian el carácter trascendente y sobrenatural de la 

Obra. Sepa, por otra parte, que tampoco es un libro que el hombre hubiera querido 

escribir de haber podido, porque consistentemente habla en su contra y sin acepción 

de personas, testifica contra él, exhibiendo sus rebeliones, perversiones y fracasos.

Si con nuestra mente adulta, en cambio, creemos vivir en un planeta visitado por 

Dios hecho carne, entonces, las palabras que Él dice revisten una importancia tal, 

que al considerar el Precioso Texto, será imposible abstraernos de que el Libro nos 

confronta con asuntos que exceden los límites de nuestra habitación temporal.

Ante esta realidad, no quien pretenda, sino quien humildemente aspire a tradu-

cir al Autor Exacto, tiene que admitir ipso facto las limitaciones y la futilidad que 

representa el depender de humanas disciplinas, y reconocer que, así como ante el 

DIOS  TODOPODEROSO  no  es  posible  acercarse  con  vanas  repeticiones,  tampoco 

ante su PALABRA es posible hacerlo con la locuacidad de un espíritu liberal, como si 

se tratara con prolegómenos y comentarios propios de diccionarios o enciclopedias. 

No; ante el Libro, uno se ha de acercar con espíritu contrito, corazón hecho alheña 

y postrada actitud; con fe sencilla y pies descalzos, limpios del mundanal lodo de las 

filosofías humanas, pues en este caso particular, no es el lector quien juzga al Libro, 

sino el Libro al lector.

Las Bases Textuales de la Biblia. La composición que hoy conocemos como La 

Biblia está conformada por 66 libros (39 del AP y 27 del NP) cuyo número fue reco-

nocido por la Iglesia Primitiva para conformar el así llamado canon de la Escritura. 

Desde Job, su libro más antiguo (1900 a.C.), hasta el Apocalipsis (90 d.C.) los libros se 

escribieron en hebreo (con algunas palabras arameas) y griego koiné en un lapso de 

casi dos milenios. Fueron realizados en tres continentes: Asia (Menor), África y Eu-

ropa, por no menos de 40 autores de distintos rangos sociales, oficios y profesiones, 

cuya mayoría no se conoció entre sí, aunque hablaron sobre temas de extraordinaria 

similitud, principalmente acerca de las cosas por venir. Cuando toda esta diversidad 

de personalidades, tiempo y espacio coinciden de manera tan exacta en el cumpli-

miento de sus aseveraciones, las cualidades que resaltan del Libro son su maravillosa 

unidad, autoridad y trascendencia.

Ahora bien, el lector ha de estar advertido que antes de traducir las palabras, frases 

y  oraciones  de  la  Escritura,  el  intérprete  ha  de  interesarse  por  un  problema  pre-

cedente: ¿Cuál es el texto original del pasaje? Que tal pregunta debe ser hecha ¡y 


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viii

contestada! obedece a dos circunstancias: a) ningún manuscrito original de la Biblia 

existe hoy, y b) las copias existentes difieren una de otra. Al ser escritos en el frágil 

papiro, los originales pronto se destruyeron o extraviaron, y las copias manuscritas 

que existen exhiben múltiples diferencias. En el caso del Nuevo Pacto, los aproxi-

madamente 5300 manuscritos existentes, presentan entre sí no menos de 250.000 

variantes, que se acumularon durante los 14 siglos que duró el proceso de copiado 

manuscrito. Sin embargo, tanto en el caso del Antiguo Pacto como del Nuevo Pacto, 

los cambios introducidos, aunque numerosos y del interés más profundo, están muy 

lejos de afectar la estructura doctrinal de la Obra. Por otra parte, gracias a los ha-

llazgos de la Arqueología Bíblica, juntamente con los esfuerzos de la Crítica Textual, 

se logró, desde mediados del siglo XIX hasta finales del siglo XX, la restauración de 

arquetipos muy cercanos a los Autógrafos.

Transmisión y Alteración Textual. La historia de los principales hechos que for-

jaron la alteración en manuscritos bíblicos puede resumirse así: En los primeros días 

de la Iglesia Cristiana, luego que una Epístola era enviada, o después que un Evan-

gelio era escrito, se elaboraban copias a fin de extender su influencia y beneficios a 

otras congregaciones. Era, por tanto, inevitable que tales copias contuvieran un rela-

tivo número de diferencias en palabras con respecto a su original. La mayor parte de 

estas divergencias surgieron por causas accidentales, tales como confundir una letra 

o palabra con otra parecida. Si dos líneas paralelas de un manuscrito comenzaban o 

terminaban con el mismo grupo de letras, o si dos palabras similares se encontraban 

juntas en la misma línea, era fácil para el ojo del copista saltar del primer grupo de 

letras al segundo, y asimismo omitir una porción del texto. Inversamente, el escriba 

podría regresar del segundo al primer grupo de letras y, sin querer, copiar una o más 

palabras dos veces. Asimismo, letras que se pronunciaban de igual manera, podían 

llegar a ser confundidas por los escribas oyentes. Tales errores eran casi inevitables 

dondequiera que se copiaban a mano largos pasajes, habiendo más posibilidades de 

que ocurrieran si el escriba tenía vista u oído defectuoso, si era interrumpido en su 

labor, o si por causa de fatiga estaba menos atento. Otras divergencias surgieron de 
intentos deliberados por suavizar formas gramaticales toscas, o por tratar de elimi-

nar partes que son real o aparentemente oscuras en el significado del texto. Algunas 

veces, un copista sustituía o añadía lo que le parecía ser una palabra o forma más 

apropiada, quizá derivada de un pasaje paralelo. De esta manera, durante los prime-

ros años que siguieron a la conformación del Canon del NP, surgieron centenares 

—si no millares— de las llamadas variantes textuales.

Tipos de Texto. Igualmente, durante los primeros años de expansión de la Iglesia 

Cristiana, se desarrollaron los llamados textos locales. A las nuevas congregaciones 

establecidas en grandes ciudades, tales como Alejandría, Antioquía, Constantinopla, 

Cartago o Roma, se les proveían copias de las Escrituras en el estilo que era corriente 

en esa región. Al hacer copias adicionales, el número de lecturas especiales e inter-

pretaciones eran conservadas y hasta cierto punto aumentadas, de tal manera que un 

tipo de texto peculiar a su región llegó a crecer y establecerse. El tipo de texto Alejan-
drino
, siendo el más antiguo, es usualmente considerado como el mejor y más fiel en 

la preservación del original. Sus características son la brevedad y la austeridad. Hasta 

muy recientemente, los dos principales testigos del tipo de texto Alejandrino eran 

el códice Vaticano y el códice Sinaítico, manuscritos en pergamino de mediados del 

siglo IV. Sin embargo, con la aparición de importantes papiros a mediados del siglo 


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ix

XX, ha sido posible inferir que el tipo de texto Alejandrino retrocede hasta principios 

del segundo siglo (125 d.C.). Otros tipos de texto son el Occidental, el Cesariense y 

el Bizantino. Este último es el más reciente de los tipos distintivos de texto del Nue-

vo Pacto. Lo caracteriza su esfuerzo por aparecer completo y explicativo. Los cons-

tructores de este tipo de texto intentaron, sin duda, pulir cualquier forma ruda del 

lenguaje, combinar dos o más lecturas discrepantes en una sola lectura expandida, 

y armonizar pasajes paralelos divergentes. Durante el período transcurrido entre el 

siglo VI hasta la invención de la imprenta en el siglo XV, el tipo de texto Bizantino fue 

el de mayor circulación, el más aceptado, y el reconocido como el texto autorizado 

por la Iglesia de Roma.

El Textus Receptus. Paradójicamente, el tipo de texto Bizantino fue también el 

que  sirvió  de  base  para  las  traducciones  Protestantes  del  Nuevo  Pacto.  Esta  base 

textual  griega  fue  editada  e  impresa  en  1517  por  el  famoso  humanista  Desiderio 

Erasmo de Rotterdam. Sus subsecuentes ediciones fueron ampliamente difundidas, 

y fue aceptado como el texto normativo para la Iglesia Protestante, el cual llegó a ser 

reconocido por el nombre latino de Textus Receptus. La obra de Erasmo sirvió como 

base textual de traducción a la mayoría de los idiomas vernáculos de Europa. Fue 

editada cinco veces, y más de treinta ediciones fueron realizadas sin autorización en 

Venecia, Estrasburgo, Basilea, París y otros lugares de Europa. Subsecuentes edito-

res, a pesar de haber realizado un número considerable de alteraciones arbitrarias, 

reprodujeron vez tras vez esta adulterada forma de base textual griega, asegurándole 

una preeminencia tal, que hasta principios del siglo XX, llegó a aceptarse como texto 
normativo
 del Nuevo Pacto. Tan supersticiosa e inapropiada ha sido su inmerecida 

reverencia, que los intentos por criticarlo o enmendarlo son todavía considerados 

como un sacrilegio, todo esto a pesar de que su base textual es esencialmente un ma-

nojo (¡seis!) de manuscritos tardíos (¡siglo XII!) escogidos al azar y, por lo menos en 

una docena de pasajes, su lectura no está respaldada por ningún manuscrito griego 

conocido hasta el presente. Aun así, este Textus Receptus ha resistido durante casi 

500 años (y aún resiste) en ser desplazado a favor de la verdadera Base Textual Griega, 

y hoy, encubierto bajo su nuevo nombre de Texto Mayoritario, trata de retomar su 

primacía, y sigue obstaculizando el camino de todo esfuerzo por restaurar la genuina 

Palabra de Dios.

Restauración  Textual. Durante los siglos XVII y XVIII los eruditos recaudaron 

información de muchos manuscritos griegos, pero con la excepción de dos o tres 

editores que tímidamente se atrevieron a corregir algunos de los más vocingleros 

errores del Textus Receptus, esta degradada forma de texto continuó siendo reimpre-

sa edición tras edición. No fue sino hasta la primera parte del siglo XIX, cuando a los 

eruditos bíblicos se les reconoció haberse apartado totalmente del Textus Receptus 

para demostrar, por comparación de manuscritos, cómo éstos se podían retrotraer 

hasta sus arquetipos perdidos e inferir así su condición y paginación.

Un profundo movimiento en pro de la restauración del Texto Sagrado dio comien-

zo en la primera mitad del siglo XIX, y mediante los esfuerzos de destacados críticos 

textuales, que por razones de oportunidad es imposible mencionar ahora, se extendió 

hasta nuestro tiempo. A partir de entonces se presentan ediciones de la Biblia en sus 

idiomas originales y se evalúan al mismo tiempo los grandes descubrimientos de la 

arqueología bíblica, en los cuales aparecieron documentos manuscritos mucho más 

antiguos de aquellos que conforman el tipo de texto Bizantino. Gracias a ello, ha 


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x

sido posible editar el Texto Sagrado con palabras que se acercan hoy más que nunca 

a las del Original. Estas bases textuales de la Biblia vienen siendo plasmadas en las 

ediciones críticas de la Biblia Hebraica Stuttgartensia (Antiguo Pacto) y del Novum 
Testamentum  Græce
  (Nuevo  Pacto)  sobre  cuyo  texto  se  basa  principalmente  esta 

obra. Pero aun así, no obstante la excelencia, erudición y noble propósito que guía 

a estas Ediciones, es importante destacar que el creciente número de sus revisiones 

denota un necesario proceso de perfeccionamiento que obviamente el Original no 

necesitaría.

Una Versión Perfectible. La inspiración verbal y plenaria de la Escritura recayó 

exclusivamente sobre los Autógrafos Sagrados, su infalibilidad se limita por tanto al 

Texto Original, y nunca benefició al copiado manuscrito, aunque este fuera en los 

idiomas originales de la Biblia. Si esto es así, mucho menos entonces puede bene-

ficiar a las traducciones que de ellas se derivan, y así, la sola consideración de una 
versión perfecta es imposible. Nuestro intenso (y extenso) contacto con las labores 

de traducción, nos ha demostrado durante los 30 años que la obra nos ha durado 

entre las manos, que es más el resultado de transpiración que el de inspiración. Las 

Versiones, por excelentes que pretendan ser, no constituyen más que un esfuerzo 

humano, personal o colegiado, por presentar en idioma vernáculo la infalible Palabra 

de Dios. Ante esta realidad, surge la propuesta feliz de una versión perfectible, que 

siguiendo los pasos humildes de la Crítica Textual, acepta las limitaciones impuestas 

por  las  circunstancias,  y  mediante  sus  ediciones  críticas  manifiesta  su  aspiración 

hacia una versión perfecta.

Traducción Contextual. El esfuerzo por realizar una versión bajo la disciplina de 

traducción contextual procura presentar al lector una versión comprensible de lo 

que sin duda es la obra literaria más compleja del Universo. La exposición detallada 

de los postulados de la traducción Contextual son extensos y no es posible citarlos 

aquí. El lector puede referirse en cada caso a las notas a pie de página o a la sección de 

Pasajes Especiales §148. No obstante, resumimos ahora el concepto diciendo que:

Por traducción contextual se define inicialmente una disciplina que (a) enmar-

cada en las reglas que controlan la gramática general del lenguaje, pero (b) sin 

perjuicio de la coordinación y subordinación gramatical registradas en el Texto 

Sagrado, (c) trasmita toda la intención, fuerza y lucidez del Original, (d) defienda 

su brevedad y simplicidad, (e) preservando su pureza y (f) respetando sus asime-

trías, asperezas gramaticales y redundancias, (g) valore la riqueza de estilo litera-

rio lograda a través del tiempo, y los beneficios que de allí se derivan al retardar los 

cambios que corrompen el lenguaje; y finalmente (h) refleje de manera consisten-

te las conclusiones que por la sana exégesis y trazo contextual (cercano o remoto), 

surgen de la analogía y armonía espiritual latentes en toda la Escritura.

Sociedad Bíblica Iberoamericana


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Antiguo Pacto


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1

En  un  principio°  creó  ’Elohim°  los 

cielos y la tierra.

2

 Pero la tierra llegó a estar desolada° y 

vacía,  y  había  tinieblas  sobre  la  faz  del 

abismo,  y  el  Espíritu  de  Dios  se  cernía° 

sobre la faz de las aguas.

3

 Entonces  dijo  ’Elohim:  Haya  luz.°  Y 

hubo luz.

4

 Y  vio  ’Elohim  que  la  luz  era  buena,  y 

’Elohim hizo separación° entre la luz y la 

oscuridad.

5

 Y llamó ’Elohim a la luz día y a la oscu-

ridad llamó noche. Y fue la tarde y fue la 

mañana: Día uno.°

6

 Y dijo ’Elohim: Haya expansión en me-

dio de las aguas y separe las aguas de las 

aguas.

7

 E hizo ’Elohim la expansión, y estable-

ció separación entre las aguas que estaban 

debajo de la expansión y las aguas que es-

taban encima de la expansión. Y fue así.

8

 Y llamó ’Elohim a la expansión cielos.° Y 

fue la tarde y fue la mañana: Día segundo.

9

 Y  dijo  ’Elohim:  Reúnanse  las  aguas  de 

debajo  de  los  cielos  en  un  solo  lugar,  y 

muéstrese lo seco. Y fue así.°

10

 Y a lo seco llamó ’Elohim tierra, y a la 

reunión de las aguas llamó mares. Y vio 

’Elohim que estaba bien.

11

 Entonces dijo ’Elohim: Produzca la tie-

rra vegetación: hierba que haga germinar 

semilla, árbol frutal que dé fruto sobre la 

tierra según su especie, cuya semilla esté 

en él. Y fue así.

12

 Y la tierra hizo brotar vegetación: hier-

ba  que  hace  germinar  semilla  según  su 

especie, y árbol que da fruto, cuya semilla 

está en él, según su especie. Y vio ’Elohim 

que estaba bien.

13

 Y fue la tarde y fue la mañana: Día ter-

cero.

14

 Y dijo ’Elohim: Haya lumbreras en la 

expansión  de  los  cielos  para  diferenciar 

entre el día y la noche, y sirvan para se-

ñales, y para las estaciones,° y para días 

y años,

15

 y sean por luminarias en la expansión 

de los cielos para alumbrar sobre la tierra. 

Y fue así.

16

 E  hizo  ’Elohim  las  dos  grandes  lum-

breras:  la  lumbrera  mayor  para  regir  el 

día,  y  la  lumbrera  menor  para  regir  la 

noche.

17

 Y puso ’Elohim las estrellas en la ex-

pansión de los cielos para alumbrar sobre 

la tierra,

18

 y para regir durante el día y la noche, 

y para separar la luz de la oscuridad. Y vio 

’Elohim que estaba bien.

19

 Y  fue  la  tarde  y  fue  la  mañana:  Día 

cuarto.

20

 Entonces  dijo  ’Elohim:  Bullan°  las 

aguas seres° vivientes y ave que vuele so-

bre la tierra en la expansión de los cielos.

21

 Y creó ’Elohim los grandes monstruos 

marinos°  y  todo  ser  vivo  que  repta,  que 

poblaron  las  aguas,  según  su  especie, 

y toda ave alada según su especie. Y vio 

’Elohim que estaba bien.

1.1 principio 

→ § 33.  1.1 ’Elohim → § 2.  1.2 desolada → § 34.  1.2 cernía → § 35.  1.3 →2 Co.4.6.  1.4 separación idéntico a 

→Nm.16.9.  1.5 Comp. número cardinal →1.5 con Mt.28.1 nota.  1.8 →2 P.3.5.  1.9 LXX omite Y fue así.  1.14 Heb = moadim

También se aplica a tiempos específicos divinos 

→Lv.23.2.  1.20 Bullan. Es decir, produzcan abundantemente.  1.20 seres. Heb. 

nefesh = persona, alma, mente, vida

1.21 Heb. taninim = monstruos marinos. Se refiere a dinosaurios y otras especies, tanto 

marinas como terrestres. Aparece solo una vez en el TM.

La creación


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Génesis 1:22

2

22

 Y ’Elohim los bendijo diciendo: Fruc-

tificad y multiplicaos, llenad las aguas en 

los mares y multiplíquese el ave en la tie-

rra.

23

 Y  fue  la  tarde  y  fue  la  mañana:  Día 

quinto.

24

 Entonces  dijo  ’Elohim:  Produzca  la 

tierra  seres  vivientes  según  su  especie: 

ganado, reptiles y bestias de la tierra, se-

gún su especie. Y fue así.

25

 E hizo ’Elohim las bestias de la tierra 

según  su  especie,  y  el  ganado  según  su 

especie, y todo reptil del suelo según su 

especie. Y vio ’Elohim que estaba bien.

El hombre

26

 Entonces  dijo  ’Elohim:  Hagamos  al 

hombre°  a  nuestra  imagen,°  conforme 

a nuestra semejanza, y ejerzan° dominio 

sobre los peces del mar, sobre las aves de 

los cielos, sobre el ganado, sobre toda la 

tierra, y sobre todo reptil que repta sobre 

la tierra.

27

 Y  creó  ’Elohim  al  hombre  a  su  ima-

gen, a imagen de ’Elohim lo creó, macho 

y hembra los creó.°

28

 Luego ’Elohim los bendijo;° y les dijo° 

’Elohim:  Fructificad  y  multiplicaos,  lle-

nad la tierra y sojuzgadla, dominad sobre 

los peces del mar y las aves de los cielos 

y sobre todo ser vivo que se mueve sobre 

la tierra.

29

 Y  dijo  ’Elohim:  He  aquí  os  he  dado 

toda hierba que produce semilla que está 

sobre la faz de toda la tierra, y todo árbol 

en el que hay fruto y que produce semilla, 

os será de alimento.

30

 Y a toda bestia de la tierra, y a toda ave 

de los cielos, y a todo lo que repta sobre la 

tierra, en los cuales hay vida, toda hierba 

verde les será por alimento. Y fue así.

31

 Y vio ’Elohim todo lo que había hecho, 

y he aquí estaba muy bien. Y fue la tarde y 

fue la mañana: El° día sexto.

2

Así fueron acabados los cielos y la tie-

rra y todo su ejército.°

2

 Y en el día séptimo ’Elohim acabó su la-

bor que había hecho, y en el día séptimo 

cesó° de toda su labor que había hecho.°

3

 Y  bendijo  ’Elohim  el  día  séptimo  y  lo 

santificó,° porque en él cesó ’Elohim de 

toda su obra que había creado al actuar.

4

 Tales son los orígenes de los cielos y la 

tierra cuando fueron creados.

El hombre en Edén 

La Varona

El día en que YHVH° ’Elohim hizo tierra 

y cielos°

5

 no había aún ninguna planta del campo, 

ni había brotado aún en la tierra ninguna 

hierba del campo, porque YHVH ’Elohim 

no había hecho llover sobre la tierra, ni 

había hombre para que labrara el suelo,

6

 sino que subía de la tierra un vapor que 

regaba la superficie del suelo.°

7

 Entonces  YHVH  ’Elohim  modeló  al 

hombre de la tierra roja, e insufló en sus 

narices aliento de vida. Y el hombre llegó 

a ser alma viviente.°

8

 Y  plantó  YHVH  ’Elohim  un  huerto  en 

Edén,  al  oriente,  y  puso  allí  al  hombre 

que había formado.

9

 YHVH ’Elohim hizo brotar de la tierra 

todo  árbol  agradable  a  la  vista  y  bueno 

para comida. Y en medio del huerto esta-

ba el árbol de la vida,° y el árbol del cono-

cimiento del bien y del mal.

10

 Y del Edén salía un río que regaba el 

huerto  y  desde  allí  se  dividía  en  cuatro 

cauces.

11

 El nombre del primero era Pisón. Éste 

es  el  que  rodea  toda  la  tierra  de  Havila, 

donde se halla el oro.

12

 Y el oro de aquella tierra es bueno. Allí 

hay bedelio y piedra ónice.

13

 El nombre del segundo río era Guijón. 

Éste es el que rodea toda la tierra de Cus.

1.26 hombre (heb. adam). Aquí no es nombre propio sino sustantivo. Por tratarse del primer ser humano, la palabra adam tam-

bién se puede aplicar en el sentido de humanidad

1.26 

→1 Co.11.7.  1.26 hombre… ejerzan. Nótese el singular y el plural. 

1.27 

→Mt.19.4; Mr.10.6.  1.27-28 →Gn.5.1-2.  1.28 dijo. Dios bendice y le dice al hombre, en contraste con los animales 

→v. 22 que los bendice diciendo. A diferencia de éstos, Dios establece una relación personal con el hombre, conversa con él 

→3.9, 35.9-10 y lo conoce por nombre →Mt.16.18.  1.31 Nótese el artículo.  2.1 ejército. El vocablo heb. tsaba se aplica tanto 

a elementos físicos (astros, soldados) como a espirituales (ángeles). 

2.2 cesó (heb. shabbat = descansar, cesar). No solo se 

refiere al descanso físico sino también indica la cesación de una obra. De shabbat procede la palabra sábado

2.2 

→He.4.4,10. 

2.2-3 

→Ex.20.11.  2.4 YHVH → § 3.  2.4 cielos. Nótese el cambio en el orden: los cielos y la tierra… tierra y cielos.  2.6 Es decir, 

aún no se había iniciado el ciclo de condensación y precipitación. 

2.7 

→1 Co.15.45.  2.9 →Ap.2.7;22.2,14.


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Génesis 3:13

3

14

 El nombre del tercer río era Jidequel,° 

que fluye al oriente de Asiria. Y el cuarto 

río era el Éufrates.°

15

 Tomó, pues, YHVH ’Elohim al hombre 

y lo puso en el huerto de Edén para que lo 

cultivara y lo guardara.

16

 Y  ordenó  YHVH  ’Elohim  al  hombre, 

diciendo: De todo árbol del huerto come 

libremente,°

17

 pero  del  árbol  del  conocimiento  del 

bien y del mal, no comerás de él, porque 

el día que comas de él, ciertamente° mo-

rirás.

18

 Dijo YHVH ’Elohim: No es bueno que 

el hombre esté solo. Le haré ayuda seme-

jante a él.

19

 Porque YHVH ’Elohim había formado 

de la tierra toda bestia del campo y toda 

ave  de  los  cielos,  y  los  había  llevado  al 

hombre  para  que  viera  cómo  los  habría 

de llamar, y así como el hombre llamó a 

cada ser viviente, ése es su nombre;

20

 y el hombre puso nombres a todos los 

animales, a las aves de los cielos y a toda 

bestia del campo, mas para el hombre no 

se halló una ayuda semejante a él.

21

 Entonces YHVH ’Elohim hizo caer al 

hombre  en  un  profundo  adormecimien-

to, y se durmió. Luego tomó una de sus 

costillas y cerró la carne en su lugar.

22

 Y de la costilla que YHVH ’Elohim ha-

bía tomado del hombre hizo° una mujer, 

y la llevó al hombre.

23

 Y el hombre exclamó: ¡En verdad ésta 

es hueso de mis huesos y carne de mi car-

ne! Por esto será llamada Varona,° porque 

del varón fue tomada.

24

 Por eso abandonará el hombre a su pa-

dre y a su madre, y se unirá a su mujer y 

serán una sola carne.°

25

 Y el hombre y su mujer estaban ambos 

desnudos, y no se avergonzaban.

La caída

3

Pero  la  serpiente°  era  astuta,  más 

que toda bestia del campo que YHVH 

’Elohim  había  hecho.  Y  dijo  a  la  mujer: 

¿Conque ’Elohim ha dicho: No comáis de 

ningún árbol del huerto?

2

 Y dijo la mujer a la serpiente: Del fru-

to de los árboles del huerto podemos co-

mer,°

3

 pero  del  fruto  del  árbol  que  está  en 

medio del huerto, ha dicho ’Elohim: No 

comáis de él ni lo toquéis,° para que no 

muráis.°

4

 Entonces  dijo  la  serpiente  a  la  mujer: 

Ciertamente no moriréis,

5

 sino que sabe ’Elohim que el día que co-

máis de él, se os abrirán los ojos y seréis 

semejantes  a  ’Elohim,°  conocedores  del 

bien y del mal.

6

 Así, vio la mujer que el árbol era bue-

no para comer,° y que era agradable a los 

ojos, y que era el árbol deseado para al-

canzar conocimiento. Y tomó de su fruto 

y comió, y dio también a su marido, que 

estaba con ella, y él comió.

7

 Entonces se les abrieron los ojos a am-

bos  y  se  dieron  cuenta  de  que  estaban 

desnudos, y cosieron follaje° de higuera, 

y se hicieron ceñidores° para sí mismos.

8

 Y  oyeron  el  sonido  de  YHVH  ’Elohim 

paseando por el huerto a la brisa del día, 

y se escondió el hombre y su mujer de la 

presencia de YHVH ’Elohim entre los ár-

boles del huerto.

9

 Pero YHVH ’Elohim llamó al hombre, y 

le dijo: ¿Dónde estás?

10

 Y  contestó:°  He  oído  tu  sonido  en  el 

huerto  y  he  tenido  miedo  porque  estoy 

desnudo; y me he escondido.

11

 Y dijo: ¿Quién te ha indicado que estás 

desnudo? ¿Acaso has comido del árbol del 

cual te ordené que no comieras?

12

 Y dijo el hombre: La mujer que pusiste 

conmigo, ella me ha dado del árbol y he 

comido.

13

 Y dijo YHVH ’Elohim a la mujer: ¿Qué 

es  esto  que  has  hecho?  Y  respondió  la 

mujer: La serpiente me engañó,° y he co-

mido.

2.14 Jidequel. Esto es, el río Tigris.  2.14 Éufrates. Heb. Perat.  2.16 libremente. Lit. comiendo comerás. Está indicando énfasis. 

2.17 ciertamente. Lit. muriendo morirás. Indica énfasis.  2.22 hizo. Heb. banah = edificó, construyó.  2.23 Varona. Heb. ‘ish­

shah,  femenino  de  ‘ish  =  varón

2.24 

→Mt.19.5;  Mr.10.7-8;  1  Co.6.16;  Ef.5.31.  3.1  →Ap.12.9;  20.2.  3.2  comer.  Nótese 

la omisión 

→2.16.  3.3 toquéis. Nótese la adición →2.16.  3.3 muráis. Nótese la alteración →2.17.  3.5 En reminiscencia a 

→Is.14.14.  3.6 comer. Lit. comida.  3.7 LXX y Tárgum registran el plural hojas.  3.7 ceñidores. Heb. jagorot = cintos, delanta­

les

3.10 contestó. Lit. dijo.  3.13 Heb. nasha = dar falsas esperanzas

→2 Co.11.3.


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Génesis 3:14

4

14

 Entonces dijo YHVH ’Elohim a la ser-

piente:

Por cuanto has hecho esto,

¡Maldita tú entre todos los animales y 

entre todas las bestias del campo!

Sobre tu vientre andarás,

Y polvo comerás todos los días de 

tu vida.

15

    Y pondré enemistad entre ti y la 

mujer,

Y entre tu descendiente y su 

descendiente.

Él° te aplastará la cabeza cuando tú 

hieras su calcañar.

16

 A la mujer dijo:

Multiplicaré en gran manera tus 

dolores y tus preñeces,

Con dolor parirás los hijos,

Y tendrás deseo de tu marido, pero 

él te dominará.

17

 Y al hombre dijo:

Por cuanto has atendido a la voz de 

tu mujer,

Y has comido del árbol del cual te 

ordené, diciendo: No comas de él,

¡Maldita sea la tierra° por causa 

tuya!

Con fatiga comerás de ella todos los 

días de tu vida,

18

    Espino y abrojo te brotará° y

Comerás hierba del campo.

19

    Con el sudor de tu rostro comerás 

pan hasta que retornes a la tierra,

Porque de ella fuiste tomado,

Pues polvo eres° y al polvo volverás.

20

 Y  el  hombre  llamó  el  nombre  de  su 

mujer  Eva,°  por  cuanto  ella  llegó  a  ser 

madre de todo viviente.

21

 Entonces YHVH ’Elohim hizo túnicas de 

pieles para Adam y su mujer, y los vistió.

22

 Y dijo YHVH ’Elohim: Ciertamente el 

hombre ha llegado a ser como uno de no-

sotros, conocedor del bien y el mal. Y aho-

ra, no sea que extienda su mano y tome 

también  del  árbol  de  la  vida,°  y  coma  y 

viva para siempre.

23

 Y YHVH ’Elohim lo expulsó del huer-

to de Edén para que trabajara la tierra de 

donde había sido tomado.

24

 Así  pues,  expulsó  al  hombre  y  situó 

querubines  al  oriente  del  huerto  del 

Edén, con la espada flameante que se re-

vuelve para guardar el camino del árbol 

de la vida.

Caín y Abel

4

Conoció°  Adam°  a  su  mujer  Eva,  y 

concibió y dio a luz a Caín,° y dijo: He 

adquirido° un varón de parte de YHVH.

2

 Y volvió a dar a luz, a su hermano Abel. 

Y Abel fue pastor de ovejas, mientras que 

Caín era labrador de la tierra.

3

 Y con el transcurso del tiempo,° sucedió 

que  Caín  llevó  a  YHVH  una  ofrenda  del 

fruto de la tierra.

4

 También  Abel  llevó  de  los  primerizos° 

de su rebaño y de la grosura° de ellos. Y 

YHVH consideró a Abel y a su ofrenda,°

5

 pero no consideró a Caín ni a su ofren-

da. Esto enfureció a Caín en gran manera, 

y decayó° su semblante.

6

 Entonces  YHVH  dijo  a  Caín:  ¿Por  qué 

te enfurece esto, y por qué ha decaído° tu 

semblante?

7

 Si  obras  bien,  ¿no  serás  enaltecido? 

Pero si no obras bien, el pecado acecha a 

la puerta, y su concupiscencia va contra 

ti, pero tú has de dominarla.

8

 Y Caín trataba° a su hermano Abel, pero 

sucedió  que  cuando  estaban  ellos  en  el 

campo, Caín se levantó contra su herma-

no Abel y lo asesinó.°

9

 Entonces YHVH dijo a Caín: ¿Dónde está 

tu hermano Abel? Y él respondió: No sé. 

¿Acaso soy yo guardián de mi hermano?

10

 Pero Él dijo: ¿Qué has hecho? ¡La voz 

de la sangre° de tu hermano clama° a mí 

desde la tierra!

3.15 Él. En heb. el vocablo zera’ = descendencia, simiente, es masculino. Por ello, el pronombre que aparece después de la 

pausa en su descendencia, es también masculino (hu’ = él). Así, la referencia no es a la mujer, sino al descendiente de ésta. 

3.17 tierra. Lit. suelo.  3.17-18 

→He.6.8.  3.19 eres. Lit. .  3.20 Eva. Heb. javah, similar a jay = viviente.  3.22 →Ap.22.14. 

4.1 conoció. Heb. yada’. Eufemismo (relaciones sexuales) 

→1 R.1.4.  4.1 Adam. En adelante, ‘adam se utilizará como nombre 

propio. 

4.1 Caín = adquisición.  4.1 adquirido. Heb. qanah = comprar, conseguir.  4.3 tiempo. Lit. al fin de los días.  4.4 prime­

rizos. Esto es, corderos para el sacrificio

4.4 grosura. Esto es, para la combustión.  4.4 

→He.11.4.  4.5 decayó. Heb. nafal. Fig. 

demudarse, entristecerse 

→Neh.6.16.  4.6 decaído →4.5.  4.8 trataba. Lit. hablaba. LXX añade: y dijo a su hermano: Vayamos 

al  campo

4.8 

→Mt.23.35;  Lc.11.51;  1  Jn.3.12.  4.10  sangre.  Lit.  sangres. Aquí  y  en  el  v.  11  el  plural  denota  intensidad

4.10 clama. Lit. claman.


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Génesis 5:14

5

11

 Y ahora, ¡maldito seas tú desde esa tie-

rra, la cual ensanchó su boca para recibir 

de tu mano la sangre de tu hermano!

12

 Cuando trabajes la tierra no te incre-

mentará su fuerza. Errante y fugitivo se-

rás en la tierra.

13

 Y dijo Caín a YHVH: ¡Grande es mi ini-

quidad para soportarla!

14

 Si me expulsas hoy de sobre la faz de la 

tierra, de tu presencia estaré oculto, seré 

errante  y  fugitivo  en  la  tierra  y  sucede-

rá que cualquiera que me encuentre, me 

matará.

15

 Entonces  YHVH  le  dijo:  Ciertamente 

cualquiera  que  mate  a  Caín,  siete  veces 

será castigado. Y puso YHVH a Caín una 

señal a fin de que no lo hiriera cualquiera 

que lo encontrara.

16

 Y salió Caín de la presencia de YHVH y 

se estableció en el país de Nod,° al oriente 

de Edén.

17

 Y conoció° Caín a su mujer, y conci-

bió, y dio a luz a Enoc. Y cuando estaba 

edificando  una  ciudad,  llamó  el  nombre 

de la ciudad como el nombre de su hijo 

Enoc.

18

 A Enoc le nació Irad, e Irad engendró 

a Mehujael, y Mehujael engendró a Metu-

sael, y Metusael engendró a Lamec.

19

 Y tomó Lamec para sí dos mujeres: el 

nombre de la primera era Ada, y el nom-

bre de la segunda, Zila.

20

 Y Ada dio a luz a Jabal, quien fue an-

tepasado de los que habitan en tiendas y 

crían ganado.

21

 Y el nombre de su hermano era Jubal, 

quien fue antepasado de todos los que to-

can arpa y flauta.

22

 También  Zila  dio  a  luz  a  Tubal  Caín, 

forjador de toda herramienta de bronce y 

de hierro. Y la hermana de Tubal Caín fue 

Naama.

23

 Y Lamec dijo a sus mujeres:

Ada y Zila: ¡Escuchad mi voz!

Mujeres de Lamec,

Prestad oído a mi dicho:

Que a un hombre maté por mi 

herida,

Y a un muchacho por mi contusión.

24

    Si siete veces es vengado Caín,

Setenta veces siete lo será Lamec.

Set

25

 Conoció° Adam otra vez a su mujer, y 

ella  dio  a  luz  un  hijo,  y  llamó  su  nom-

bre  Set,  porque  pensó:°  ’Elohim  me  ha 

concedido° otro descendiente en lugar de 

Abel, a quien asesinó Caín.

26

 Y a Set también le nació un hijo, y lla-

mó su nombre Enós. Entonces se empezó 

a invocar el nombre de YHVH.

Descendencia de Adam

5

Este es el libro de las generaciones de 

Adam. El día en que ’Elohim creó al 

hombre, lo hizo a imagen de ’Elohim.

2

 Macho y hembra los creó,° y los bendi-

jo.° Y el día que fueron creados llamó el 

nombre de ellos Adam.°

3

 Y había vivido Adam ciento treinta años 

cuando engendró a su semejanza, confor-

me a su imagen,° y llamó su nombre Set.

4

 Y después de engendrar a Set, los días 

de Adam fueron ochocientos años, y en-

gendró hijos e hijas.

5

 Y fueron todos los días que vivió Adam 

novecientos treinta años, y murió.

6

 Había vivido Set ciento cinco años cuan-

do engendró a Enós.

7

 Y vivió Set después de engendrar a Enós 

ochocientos siete años, y engendró hijos 

e hijas.

8

 Y fueron todos los días de Set novecien-

tos doce años, y murió.

9

 Había vivido Enós noventa años cuando 

engendró a Cainán.

10

 Después de engendrar a Cainán, vivió 

Enós ochocientos quince años, y engen-

dró hijos e hijas.

11

 Y fueron todos los días de Enós nove-

cientos cinco años, y murió.

12

 Había  vivido  Cainán  setenta  años 

cuando engendró a Mahalaleel.°

13

 Y después de engendrar a Mahalaleel, 

vivió Cainán ochocientos cuarenta años, 

y engendró hijos e hijas.

14

 Y fueron todos los días de Cainán no-

vecientos diez años, y murió.

4.16 Nod. Heb. nad = errante. Lugar desconocido.  4.17 

→4.1.  4.25 →4.1.  4.25 .pensó.  4.25 concedido. Heb. shat = con­

ceder

5.2 

→Mt.19.4; Mr.10.6.  5.1-2 →Gn.1.27-28.  5.2 ‘adam = ser humano, humanidad (sentido colectivo).  5.3 imagen

Nótese el orden inverso 

→1.26.  5.12 Esto es, el que alaba a Dios.


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Génesis 5:15

6

15

 Había vivido Mahalaleel sesenta y cin-

co años cuando engendró a Jared.

16

 Y después de engendrar a Jared, vivió 

Mahalaleel  ochocientos  treinta  años,  y 

engendró hijos e hijas.

17

 Y  fueron  todos  los  días  de  Mahalaleel 

ochocientos noventa y cinco años, y murió.

18

 Había vivido Jared ciento sesenta y dos 

años cuando engendró a Enoc.

19

 Y después de engendrar a Enoc, vivió 

Jared ochocientos años, y engendró hijos 

e hijas.

20

 Y fueron todos los días de Jared nove-

cientos sesenta y dos años, y murió.

21

 Había vivido Enoc sesenta y cinco años 

cuando engendró a Matusalén.

22

 Y anduvo Enoc con Ha-’Elohim° tres-

cientos años después de haber engendra-

do a Matusalén, y engendró hijos e hijas.

23

 Y fueron todos los días de Enoc tres-

cientos sesenta y cinco años.

24

 Y Enoc anduvo con° Ha-’Elohim, y des-

apareció,° porque lo arrebató ’Elohim.°

25

 Había vivido Matusalén ciento ochenta 

y siete años cuando engendró a Lamec.

26

 Y  después  de  engendrar  a  Lamec,  vi-

vió Matusalén setecientos ochenta y dos 

años, y engendró hijos e hijas.

27

 Y fueron todos los días de Matusalén no-

vecientos sesenta y nueve años, y murió.

28

 Había  vivido  Lamec  ciento  ochenta  y 

dos años cuando engendró un hijo.

29

 Y  llamó  su  nombre  Noé,°  diciendo: 

Éste nos aliviará de nuestras obras y de la 

fatiga de nuestras manos, de la tierra que 

maldijo YHVH.

30

 Y  después  de  engendrar  a  Noé,  vivió 

Lamec quinientos noventa y cinco años, 

y engendró hijos e hijas.

31

 Y fueron todos los días de Lamec sete-

cientos setenta y siete años, y murió.

32

 Era  Noé  de  quinientos  años  cuando 

engendró Noé a Sem, a Cam y a Jafet.

Corrupción de la humanidad

6

Aconteció  que  cuando  la  humanidad 

comenzó a multiplicarse sobre la faz 

de la tierra, y les nacieron hijas,

2

 los  hijos  de  Dios°  vieron  que  las  hijas 

del  hombre  eran  hermosas,°  y  tomaron 

para sí mujeres de entre todas las que ha-

bían escogido.

3

 Entonces  dijo  YHVH:  Mi  Espíritu  no 

permanecerá° para siempre con el hom-

bre,  pues  ciertamente  él  es  carne,  y  sus 

días serán ciento veinte años.

4

 En aquellos días (y también después) los 

nefileos°  estaban  en  la  tierra,  pues  toda 

vez que los hijos de Dios se llegaban a las 

hijas de los humanos, les engendraban hi-

jos. Estos eran los poderosos que desde la 

antigüedad fueron varones de renombre.

5

 Vio  entonces  YHVH  que  la  maldad  del 

hombre  se  había  multiplicado  en  la  tie-

rra, y que toda forma de pensamiento de 

su  corazón  era  solamente  el  mal  conti-

nuamente.

6

 Y YHVH sintió pesar de haber hecho al 

ser humano en la tierra, y se entristeció 

en su corazón.

7

 Y dijo YHVH: Borraré de sobre la faz de 

la tierra a los seres que he creado, desde 

el humano hasta la bestia, el reptil y las 

aves de los cielos, pues me pesa haberlos 

hecho.

8

 Pero  Noé  halló  gracia  ante  los  ojos  de 

YHVH.°

Descendencia de Noé 

El arca

9

 Estos son los descendientes de Noé: Noé, 

varón justo,° fue sin defecto° en sus gene-

raciones. Noé caminaba con Ha-’Elohim.°

10

 Y engendró Noé tres hijos: Sem, Cam 

y Jafet.

11

 Y se corrompió la tierra en presencia de 

’Elohim, y se llenó la tierra de violencia.

12

 Y vio ’Elohim la tierra, y he aquí estaba 

corrompida, porque toda carne había co-

rrompido su camino sobre la tierra.

13

 Y  dijo  ’Elohim  a  Noé:  El  fin  de  toda 

carne viene ante mí. Por cuanto la tierra 

se ha llenado de violencia a causa de ellos, 

he aquí los destruyo con la tierra.

5.22 Primero de los 365 registros de Ha-’Elohim 

→ § 2.  5.24 → § 153.  5.24 desapareció. Heb. ‘eynenu = no está él. LXX: y no 

fue hallado

5.24 

→He.11.5; Jud.14.  5.29 Noé. Heb. noaj, del verbo nuaj = descansar.  6.2 hijos de Dios →2 P.2.4-5; Jd. 6-7. 

6.2 eran hermosas. Lit. estaban buenas.  6.3 no permanecerá. Nno contenderá.  6.4 nefileos. Heb. nefilim, del verbo nafal = caer, 

tiranizar, o bien del sustantivo néfel = abortivo 

→Sal.58.8b. Se aplica a progenie de gran estatura →Nm.13.33.  6.5-8 →Mt.24.37; 

Lc.17.26. 

6.9 

→2 P.2.5.  6.9 sin defecto. Heb. tamim. En la mayoría de sus aplicaciones, tamim expresa perfección física o gené­

tica, bien sea del humano o del animal 

→Ex.12.5. Junto con otros pasajes, se infiere que ni Noé ni su ascendencia o descendencia 

tuvieron participación en los acontecimientos de Gn.6.1-5. 

6.9 Quinto registro de Ha-’Elohim 

→ 5.22,24; → § 2. § 153.


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Génesis 7:19

7

14

 Hazte un arca de madera de ciprés, y 

harás compartimentos al arca, y la calafa-

tearás con brea por dentro y por fuera.

15

 Y esto es lo que le harás: Trescientos 

codos° será la longitud del arca, cincuen-

ta  codos  su  anchura,  y  treinta  codos  su 

altura.

16

 Harás  una  claraboya°  al  arca  y  la  re-

matarás  a  un  codo  por  arriba,  pondrás 

una puerta en un lado del arca, y le harás 

planta baja, segunda y tercera.

17

 Y he aquí que Yo, sí, Yo hago caer un 

diluvio de aguas sobre la tierra para des-

truir  toda  carne  en  que  hay  aliento  de 

vida bajo los cielos. Todo lo que hay en la 

tierra perecerá.

18

 Pero  estableceré  mi  pacto  contigo,  y 

entrarás en el arca, tú y tus hijos, tu mu-

jer y las mujeres de tus hijos contigo.

19

 También  harás  entrar  en  el  arca  dos 

de cada ser viviente, de toda carne, para 

que  sobrevivan  contigo.  Serán  macho  y 

hembra.

20

 De  las  aves,  según  su  especie.  De  las 

bestias, según su especie. Y de todo reptil 

del suelo, según su especie. Dos de cada 

especie° irán a ti para que sobrevivan.

21

 Y  tú,  toma  para  ti  de  todo  alimento 

comestible y almacénalo contigo, pues te 

será de sustento para ti y para ellos.

22

 E hizo Noé conforme a todo lo que le 

había ordenado ’Elohim, así hizo.°

El diluvio

7

Y  dijo  YHVH  a  Noé:  Entra  tú  y  toda 

tu casa en el arca, porque a ti he visto 

justo ante mi presencia entre esta gene-

ración.

2

 De todo animal limpio tomarás contigo 

siete pares, macho y su hembra, pero del 

animal que no es limpio tomarás dos: el 

macho y su hembra.

3

 También  de  las  aves  del  cielo,  de  siete 

en siete, macho y hembra, para preservar 

la descendencia sobre la faz de toda la tie-

rra.

4

 Porque dentro de siete días Yo haré llo-

ver sobre la tierra durante cuarenta días 

y cuarenta noches, y borraré todo lo que 

existe, lo que he hecho de sobre la faz de 

la tierra.

5

 E  hizo  Noé  conforme  a  todo  lo  que 

YHVH le había ordenado.

6

 Era Noé de seiscientos años cuando el 

diluvio de aguas vino sobre la tierra.

7

 Y  ante  las  aguas  del  diluvio  Noé  entró 

en el arca,° y con él sus hijos, su mujer, y 

las mujeres de sus hijos.

8

 Del animal limpio, y del animal que no 

es limpio, y de las aves, y de todo lo que 

repta sobre el suelo,

9

 de  dos  en  dos  llegaron  a  Noé,  al  arca, 

macho y hembra, conforme ’Elohim ha-

bía ordenado a Noé.

10

 Y sucedió que a los siete días, las aguas 

del diluvio estaban sobre la tierra.

11

 En el año seiscientos de la vida de Noé, 

en  el  segundo  mes,  el  día  diecisiete  del 

mes, ese mismo día reventaron todas las 

fuentes del gran abismo, y las compuertas 

de los cielos fueron abiertas,°

12

 y fue la lluvia sobre la tierra cuarenta 

días y cuarenta noches.

13

 En ese mismo día entró Noé en el arca, 

con  Sem,  Cam  y  Jafet,  hijos  de  Noé,  la 

mujer de Noé, y las tres mujeres de sus 

hijos con ellos.

14

 Ellos, y toda bestia salvaje según su es-

pecie, y todo animal según su especie, y 

todo reptil que repta sobre la tierra según 

su especie, y toda ave según su especie, y 

todo pájaro, todo alado.

15

 Y llegaron a Noé, al arca, de dos en dos, 

de toda carne en que había aliento de vida.

16

 Y los que llegaron, macho y hembra de 

toda carne, entraron tal como lo había or-

denado ’Elohim. Y YHVH cerró por él.°

17

 Y fue el diluvio sobre la tierra duran-

te  cuarenta  días.°  Las  aguas  crecieron  y 

levantaron  el  arca,  y  ésta  se  elevó  sobre 

la tierra.

18

 Las aguas fueron arreciando y crecie-

ron  mucho  sobre  la  tierra,  y  flotaba  el 

arca sobre la superficie de las aguas.

19

 Y las aguas crecieron muy por encima° 

de  la  tierra,  de  modo  que  quedaron  cu-

biertas todas las altas montañas que están 

debajo de todos los cielos.

6.15 Codo: unos 45 cm. 17,5 pulgadas  6.16 claraboya. Heb. tsohar = tragaluz, ventana en el techo; de allí deriva el término me­

diodía

6.20 .especie.  6.22 

→He.11.7.  7.7 →Mt.24.38-39; Lc.17.27.  7.11 →2 P.3.6.  7.16 él. Esto es, Noé.  7.17 cuarenta 

días. LXX: y cuarenta noches

7.19 por encima. Lit. mucho mucho.


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Génesis 7:20

8

20

 Quince codos más arriba crecieron las 

aguas, y las montañas quedaron cubiertas.

21

 Y  pereció  toda  carne  que  se  movía 

sobre la tierra, tanto ave como animal y 

fiera, y de todo bicho que pulula sobre la 

tierra, y todos los hombres.

22

 Todo lo que respiraba espíritu de vida 

con sus narices, todo lo que estaba en lo 

seco, murió.

23

 Y borró todo lo que existía sobre la faz 

de la tierra, desde el hombre hasta la bes-

tia, el reptil y el ave de los cielos, fueron 

borrados de la tierra, y en el arca quedó 

solamente Noé y los que estaban con él.

24

 Y prevalecieron las aguas sobre la tie-

rra ciento cincuenta días.

Cesa el diluvio

8

Entonces  ’Elohim  se  acordó  de  Noé 

y de todo ser vivo, y de todos los ani-

males  que  estaban  con  él  en  el  arca.  Y 

’Elohim hizo pasar un viento sobre la tie-

rra, y las aguas decrecieron.

2

 Y las fuentes del abismo y las compuer-

tas de los cielos fueron cerradas, y la llu-

via fue detenida desde los cielos.

3

 Entonces las aguas fueron retrocedien-

do de sobre la tierra, yendo y viniendo, y 

al cabo de ciento cincuenta días las aguas 

disminuyeron.

4

 Y  en  el  mes  séptimo,°  el  día  diecisiete 

del mes, el arca se posó sobre las monta-

ñas de Ararat,°

5

 y  las  aguas  fueron  menguando  paula-

tinamente hasta el décimo mes.° El pri-

mer día del décimo mes se dejaron ver las 

cumbres de las montañas.

6

 Y ocurrió al cabo de cuarenta días que 

Noé abrió la ventana que había hecho en 

el arca,

7

 y envió al cuervo,° el cual estuvo yen-

do y regresando hasta que se secaron las 

aguas de sobre la tierra.

8

 Luego envió a la paloma, para ver si ha-

bían menguado las aguas de sobre la faz 

de la tierra.

9

 Pero la paloma no halló lugar de repo-

so,°  y  volvió  a  él,  al  arca,  porque  había 

agua sobre la faz de toda la tierra. Enton-

ces él extendió su mano, la tomó y la me-

tió consigo en el arca.

10

 Esperó ansiosamente° aún otros siete 

días, y volvió a enviar la paloma desde el 

arca.

11

 Y la paloma volvió a él a la hora de la 

tarde, y he aquí, una hoja de olivo fresca 

en su pico. Así entendió Noé que las aguas 

habían menguado de sobre la tierra.

12

 Esperó  ansiosamente  aún  otros  siete 

días, y envió la paloma, la cual no volvió 

más a él.

13

 Y aconteció que en el año seiscientos 

uno,° el primer día del primer mes,° las 

aguas  comenzaron  a  drenar  de  sobre  la 

tierra. Entonces hizo apartar Noé la cu-

bierta° del arca y, mirando, he aquí que la 

superficie del suelo estaba drenando.

14

 Y en el mes segundo, a los veintisiete 

días del mes, la tierra quedó seca.

15

 Entonces ’Elohim habló a Noé diciendo:

16

 Sal del arca, tú y tu mujer, tus hijos y 

las mujeres de tus hijos contigo.

17

 Saca  contigo  a  todo  animal,  de  toda 

especie° de ave, de bestia, y de todo reptil 

que repta, y vayan por la tierra, y fructifi-

quen y multiplíquense sobre la tierra.

18

 Y salió Noé y sus hijos y su mujer, y las 

mujeres de sus hijos con él.

19

 Salieron  del  arca  todo  animal,  todo 

reptil y toda ave, y todo lo que se mueve 

sobre la tierra, según sus familias.

20

 Y construyó Noé un altar a YHVH, y 

tomó  de  todo  animal  limpio  y  de  toda 

ave  limpia,  y  ofreció  holocaustos  sobre 

el altar.

21

 Y percibió YHVH el aroma aplacador,° 

y  dijo  YHVH  en  su  corazón:  No  volveré 

más  a  maldecir  la  tierra  por  causa  del 

hombre,  porque  la  inclinación  del  cora-

zón del hombre es mala desde su juven-

tud. No volveré, por tanto, a cortar a todo 

ser viviente como acabo de hacerlo.

22

 Durante todos los días de la tierra, no 

cesarán la siembra y la cosecha, el frío y 

el calor, el verano y el invierno, y el día y 

la noche.

8.4 mes séptimo. Esto es, a partir del comienzo del diluvio.  8.4 Ararat. Situadas en Armenia. También conocidas como Urartu

8.5 décimo mes. Esto es, a partir del comienzo del diluvio.  8.7 cuervo. LXX añade para ver si las aguas habían mermado

8.9 reposo. Lit. reposo para la planta de su pie.  8.10 ansiosamente 

→Miq.1.12.  8.13 uno. LXX añade de la vida de Noé

8.13 primer mes. Esto es, Marzo-Abril.  8.13 la cubierta. Es decir, la claraboya 

→6.16.  8.17 especie. Heb. basar = carne

8.21 aplacador. Heb. nijoaj = tranquilizador, apaciguador.


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Génesis 9:29

9

Pacto con Noé

9

Y bendijo ’Elohim a Noé y a sus hijos, 

y les dijo: Fructificad y multiplicaos, y 

llenad la tierra.°

2

 Y el temor y pavor de vosotros sea sobre 

todo animal de la tierra y sobre toda ave 

de los cielos, y en todo lo que se mueve 

sobre  el  suelo  y  en  todos  los  peces  del 

mar. En vuestra mano son entregados.

3

 Todo lo que se mueve y vive os servirá 

de alimento. Lo mismo que la hierba ver-

de, os lo he dado todo.

4

 Sólo que no comeréis carne con su vida° 

que es su sangre,°

5

 pues  ciertamente  demandaré  vuestra 

sangre así como vuestras vidas, la deman-

daré de mano° de todo ser vivo, y de mano 

del hombre, de mano de cualquier herma-

no° suyo, demandaré la vida del hombre.

6

 El que derrame sangre de hombre,° por los 

hombres su sangre será derramada, porque 

a imagen de ’Elohim hizo ’El° al hombre.°

7

 Y vosotros, sed fructíferos y aumentad 

en  número,°  reproducíos  en  la  tierra,  y 

multiplicaos en ella.

8

 Y habló ’Elohim a Noé, y a sus hijos que 

estaban con él, diciendo:

9

 He aquí, Yo mismo establezco mi pacto 

con vosotros y con vuestra descendencia 

después de vosotros,

10

 y con todo ser vivo que está con voso-

tros: con el ave, con el ganado y con todo 

animal  terrestre  que  está  con  vosotros, 

todos los que salieron del arca, todos los 

animales de la tierra.

11

 Estableceré, pues, mi pacto con voso-

tros: No será aniquilada ya más ninguna 

carne por las aguas del diluvio, ni habrá 

ya diluvio para destruir la tierra.

12

 Y dijo ’Elohim: Esta es la señal del pac-

to que os doy entre Yo y vosotros, y entre 

todo  ser  viviente  que  está  con  vosotros, 

por generaciones perpetuas:

13

 He puesto mi arco en la nube, y será 

por señal del pacto entre Yo y la tierra.

14

 Pues  sucederá  que  cuando  Yo  cubra 

con nube la tierra, entonces aparecerá el 

arco en la nube,

15

 y me acordaré de mi pacto entre Yo y 

vosotros y entre todo ser viviente de toda 

carne,  y  no  habrá  más  aguas  de  diluvio 

para destruir a todo ser vivo.

16

 Estará,  pues,  el  arco  en  la  nube,  y  lo 

miraré para recordar el pacto eterno en-

tre  ’Elohim  y  entre  todo  ser  viviente  de 

toda carne que está sobre la tierra.

17

 Luego  dijo  ’Elohim  a  Noé:  Esta  es  la 

señal del pacto que he establecido entre 

Yo y toda carne que hay sobre la tierra.

Cam

18

 Los hijos de Noé que salieron del arca 

fueron Sem, Cam y Jafet (y Cam es el pa-

dre de Canaán).

19

 Estos  tres  son  los  hijos  de  Noé,  y  de 

éstos se pobló toda la tierra.

20

 Y  Noé  comenzó  a  ser  un  labrador,  y 

plantó una viña,

21

 y  bebió  del  vino,  y  se  embriagó,  y  se 

desnudó dentro de su tienda.

22

 Y Cam, padre de Canaán, vio la desnu-

dez de su padre y lo declaró afuera a sus 

dos hermanos.

23

 Entonces  Sem  y  Jafet  tomaron  el 

manto, y se lo pusieron ambos sobre sus 

hombros, y andando hacia atrás, cubrie-

ron la desnudez de su padre. Sus rostros 

estaban vueltos hacia atrás, y no vieron la 

desnudez de su padre.°

24

 Al  despertar  de  su  embriaguez,°  Noé 

supo  lo  que  le  había  hecho  su  hijo  me-

nor,

25

 y dijo:

¡Maldito sea Canaán!

Siervo de siervos será a sus 

hermanos.

26

 Luego dijo:

Bendito sea YHVH, Dios de Sem,°

Y sea Canaán su siervo.

27

    Ensanche° ’Elohim a Jafet,

Y habite en las tiendas de Sem,

Y sea Canaán su siervo.

28

 Y  vivió  Noé  después  del  diluvio  tres-

cientos cincuenta años.

29

 Y  fueron  todos  los  días  de  Noé  nove-

cientos cincuenta años, y murió.

9.1 

→Gn.1.28.  9.4 vida. De nefesh = alma, hálito.  9.4 →Lv.7.26-27; 17.10-14; 19.26; Dt.12.16,23; 15.23.  9.5 mano. Heb. 

miyad = procedencia. Equivale a matar por mano de

9.5 hermano. Esto es, de mano de su prójimo.  9.6 

→Ex.20.13.  9.6 ’El. 

Esto es, ’Elohim 

→ § 2.  9.6 →Gn.1.26.  9.7 →Gn.1.28.  9.23 su padre →Lv.18.7.  9.24 su embriaguez. Lit. su vino.  9.26 Heb. 

Elohey Shem = Dios de Sem

9.27 Ensanche. Heb. Yaft. Combinación fonética con Yefet.


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Génesis 10:1

10

Descendencia de Sem, 

Cam y Jafet

10

Estos  son  los  descendientes  de 

Sem, Cam y Jafet, hijos de Noé, a 

quienes les nacieron hijos después del di-

luvio.

2

 Los hijos de Jafet: Gomer, Magog, Ma-

dai, Javán, Tubal, Mesec y Tiras.

3

 Y los hijos de Gomer: Askenaz, Rifat y 

Togarma.

4

 Y los hijos de Javán: Elisha y Tarsis, Ki-

tim y Dodanim.

5

 De estos se esparcieron los pueblos de 

las  costas,  cada  uno  en  sus  territorios, 

según su lengua, por sus familias en sus 

naciones.

6

 Y los hijos de Cam: Cus, Mizraim,° Fut° 

y Canaán.

7

 Y los hijos de Cus: Seba, Havila, Sabta, 

Raama  y  Sabteca.  Y  los  hijos  de  Raama: 

Seba y Dedán.

8

 Cus  también  engendró  a  Nimrod,°  el 

cual comenzó a ser poderoso en la tierra.

9

 Él  fue  intrépido  cazador  enfrentado°  a 

YHVH.  Por  esto  se  dice:  Como  Nimrod, 

intrépido cazador enfrentado a YHVH.

10

 El  principio  de  su  reino  fue  Babel, 

Erec, Acad y Calne, en tierra de Sinar,

11

 de  aquella  tierra,  siendo  fortalecido,° 

salió y edificó Nínive, Rehoboth-Ir, Cala

12

 y Resen, entre Nínive y Cala, la cual es 

la gran ciudad.

13

 Mizraim  engendró  a  Ludim,  a  Ana-

mim, a Lehabim, a Naftuhim,

14

 a Patrusim, a Casluhim, de donde sa-

lieron los filisteos, y a Caftorim.°

15

 Y Canaán engendró a Sidón, su primo-

génito, y a Het,

16

 y  al  jebuseo,  al  amorreo  y  al  gerge-

seo,

17

 y al heveo, y al araceo, y al sineo,

18

 y al arvadeo, y al zemareo y al hema-

teo. Después, se dispersaron las familias 

de los cananeos.

19

 Y la frontera del cananeo iba desde Si-

dón en dirección a Gerar, hasta Gaza, y en 

dirección de Sodoma, Gomorra, Adma y 

Zeboim, hasta Lasa.

20

 Estos son los hijos de Cam por sus fa-

milias y sus lenguas, sus territorios y sus 

naciones.

21

 También  tuvo  descendencia  Sem,  pa-

dre de todos los hijos de Heber,° y herma-

no mayor de Jafet.

22

 Los  hijos  de  Sem  fueron  Elam,  Asur, 

Arfaxad, Lud y Aram.

23

 Los hijos de Aram fueron Uz, Hul, Ge-

ter y Mas.

24

 Arfaxad engendró a Sala, y Sala engen-

dró a Heber.

25

 A Heber le nacieron dos hijos: El nom-

bre del primero fue Peleg, porque en sus 

días se dividió° la tierra, y el nombre de 

su hermano fue Joctán.

26

 Y Joctán engendró a Almodad, y a Se-

lef, y a Hazar-mavet, y a Jera,

27

 y a Adoram, y a Uzal, y a Dicla,

28

 y a Obal, y a Abimael, y a Seba,

29

 y a Ofir, y a Havila y a Jobab. Todos és-

tos fueron hijos de Joctán.

30

 Y fue su morada desde Mesa en direc-

ción a Sefar, en la montaña oriental.

31

 Estos son los hijos de Sem, por sus fa-

milias, por sus lenguas, en sus tierras por 

sus naciones.

32

 Tales son por sus descendencias en sus 

naciones las familias de los hijos de Noé. 

De éstas fueron diseminadas las naciones 

por la tierra después del diluvio.

Babilonia

11

Entonces toda la tierra era de una 

sola lengua y de unas mismas pa-

labras.

2

 Y  en  su  emigración  hacia°  el  oriente, 

encontraron  una  llanura  en  la  tierra  de 

Sinar° y se establecieron allí.

3

 Entonces  dijo  cada  cual  a  su  prójimo: 

¡Venid! Fabriquemos ladrillos y cozámos-

los al fuego. Y el ladrillo les fue por piedra 

y el asfalto por argamasa.

4

 Y dijeron: ¡Venid! Construyámonos una 

ciudad  y  una  torre  con  una  representa-

ción° de los cielos. Y hagámonos un nom-

bre, no sea que seamos esparcidos por la 

faz de toda la tierra.

10.6 Mizraim = Egipto.  10.6 Fut = Libia.  10.8 Nimrod, de marad = rebelarse. Significa nos rebelaremos. De éste surgió la 

posterior rebelión de Babilonia. 

10.9 enfrentado. Heb. lifne YHVH = delante de YHVH. Pero aquí el significado es: frente a YHVH

en sentido de oposición. 

10.11 siendo fortalecido 

→ § 36.  10.14 A excepción de Mizraim, todos los nombres de los vv. 13 y 

14 pueden traducirse por gentilicios. 

10.21 Heber. Nombre del cual parece derivar el gentilicio hebreo.  10.25 se dividió. Heb. 

peleg = división, del verbo palag = dividir

11.2 hacia. Heb. miquedem. No debe traducirse desde oriente.  11.2 Sinar. Esto es, 

Babel (Babilonia) 

→Zac.5.11; Ap.17.1-18.24.  11.4 Lit. cabeza. Se trata de un zigurat para observar las estrellas.


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Génesis 12:3

11

5

 Pero  YHVH  descendió  para  ver  la  ciu-

dad y la torre que edificaban los hijos del 

hombre.

6

 Y dijo YHVH: He aquí que son un pue-

blo, y todos ellos tienen la misma lengua, 

y  este  es  sólo  el  principio  de  su  obra,  y 

nada  les  hará  desistir  de  lo  que  traman 

hacer.

7

 ¡Vamos!,  descendamos  ya  y  confunda-

mos allí su lengua para que nadie entien-

da el lenguaje de su compañero.

8

 Y los dispersó YHVH de allí por toda la 

superficie  de  la  tierra,  y  desistieron  de 

construir la ciudad.

9

 Por eso llamó su nombre Babel, porque 

allí confundió° YHVH la lengua de toda 

la tierra, y desde allí los esparció YHVH 

por la superficie de toda la tierra.

Descendencia de Sem

10

 Estos son los descendientes de Sem: 

Era  Sem  de  cien  años  cuando  engen-

dró a Arfaxad, dos años después del di-

luvio.

11

 Y  vivió  Sem  después  de  engendrar  a 

Arfaxad quinientos años, y engendró hi-

jos e hijas.

12

 Había  vivido  Arfaxad  treinta  y  cinco 

años cuando engendró a Sala.

13

 Y vivió Arfaxad cuatrocientos tres años 

después de haber engendrado a Sala, y en-

gendró hijos e hijas.

14

 Había vivido Sala treinta años cuando 

engendró a Heber.

15

 Y  vivió  Sala  después  de  engendrar  a 

Heber cuatrocientos tres años, y engen-

dró hijos e hijas.

16

 Había  vivido  Heber  treinta  y  cuatro 

años cuando engendró a Peleg.

17

 Y  vivió  Heber  después  de  engendrar 

a Peleg cuatrocientos treinta años, y en-

gendró hijos e hijas.

18

 Había vivido Peleg treinta años cuan-

do engendró a Reú.

19

 Y  vivió  Peleg  doscientos  nueve  años 

después de engendrar a Reú, y engendró 

hijos e hijas.

20

 Había  vivido  Reú  treinta  y  dos  años 

cuando engendró a Serug.

21

 Y  vivió  Reú  después  de  engendrar  a 

Serug doscientos siete años, y engendró 

hijos e hijas.

22

 Había vivido Serug treinta años cuan-

do engendró a Nacor.

23

 Y después de engendrar a Nacor, vivió 

Serug doscientos años, y engendró hijos 

e hijas.

24

 Había  vivido  Nacor  veintinueve  años 

cuando engendró a Taré.

25

 Y vivió Nacor después de engendrar a 

Taré ciento diecinueve años, y engendró 

hijos e hijas.

26

 Y había vivido Taré setenta años cuan-

do engendró a Abram, a Nacor y a Harán.

Descendencia de Taré

27

 Estos  son  los  descendientes  de  Taré: 

Taré engendró a Abram, a Nacor y a Ha-

rán, y Harán engendró a Lot.

28

 Pero Harán murió antes que su padre 

Taré en la tierra de su nacimiento, en Ur° 

de los caldeos.

29

 Y Abram y Nacor tomaron para sí mu-

jeres.  El  nombre  de  la  mujer  de  Abram 

era  Saray,  y  el  nombre  de  la  mujer  de 

Nacor era Milca, hija de Harán, padre de 

Milca y de Isca.

30

 Y Saray era estéril, no tenía hijos.

31

 Y tomó Taré a Abram su hijo, a Lot su 

nieto, hijo de Harán, y a Saray su nuera, 

mujer de su hijo Abram, y salieron de Ur 

de los caldeos para ir al país de Canaán. 

Pero  llegaron  hasta  Harán  y  habitaron 

allí.

32

 Y  fueron  los  días  de  Taré  doscientos 

cinco años, y murió Taré en Harán.

Llamamiento de Abram

12

Ahora  bien,  YHVH  había  dicho  a 

Abram: Vete de tu tierra, de tu pa-

rentela y de la casa de tu padre, a la tierra 

que te mostraré.°

2

 Y  haré  de  ti  una  nación  grande,  y  te 

bendeciré y engrandeceré° tu nombre, y 

serás bendición.

3

 Bendeciré a los que te bendigan, y mal-

deciré  al  que  te  maldiga,  y  en  ti  serán 

benditas todas las familias de la tierra.°

11.9 Aliteración entre Babel y balal = confundir.  11.28 LXX omite Ur.  12.1 

→Hch.7.2-3; He.11.8.  12.2 bendeciré y engran­

deceré. La estructura (Pi’el) de estos verbos expresa continuidad, acompañada por un deseo de que la acción pueda ser vista 

por terceros

12.3 

→Gá.3.8.


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Génesis 12:4

12

4

 Se  fue  entonces  Abram  como  YHVH 

le había hablado, y Lot fue con él. Y era 

Abram de setenta y cinco años cuando sa-

lió de Harán.

5

 Y tomó Abram a Saray su mujer, y a Lot, 

hijo  de  su  hermano,  y  todos  los  bienes 

que había acumulado y las personas que 

habían conseguido en Harán. Y salieron 

para ir a la tierra de Canaán, y en tierra 

de Canaán entraron.

6

 Y  atravesó  Abram  aquella  tierra  hasta 

el  lugar  de  Siquem,  hasta  el  encinar  de 

Moré  (y  el  cananeo  estaba  entonces  en 

aquella tierra).

7

 Y apareció YHVH a Abram, y dijo: A tu 

descendencia daré esta tierra.° Entonces 

edificó allí un altar a YHVH, que se le ha-

bía aparecido.

8

 Y de allí se desplazó hacia la montaña, al 

oriente de Bet-’El, y plantó su tienda, te-

niendo Bet-’El al occidente y Hai al orien-

te. Luego edificó allí un altar a YHVH e 

invocó el nombre de YHVH.

Abram en Egipto

9

 Después partió Abram andando progre-

sivamente hacia el Neguev.

10

 Pero  hubo  hambre  en  el  país,  y 

Abram descendió a Egipto para peregri-

nar  allá,  pues  la  hambruna  era  severa 

en el país.

11

 Y  sucedió  que  cuando  se  acercaba 

para  entrar  a  Egipto,  le  dijo  a  su  espo-

sa  Saray:  Mira,  eres  mujer  de  hermosa 

apariencia,

12

 y sucederá que cuando te vean los egip-

cios, dirán: Esta es su mujer. Entonces me 

matarán a mí, y a ti te dejarán vivir.

13

 Te  ruego,  di  que  eres  mi  hermana,° 

para que me traten bien por causa tuya, y 

así, por tu favor, salve mi vida.

14

 Y sucedió que llegando Abram a Egip-

to,  los  egipcios  vieron  que  la  mujer  era 

hermosa en gran manera.

15

 Y la vieron los ministros de Faraón, y 

la  alabaron  ante  Faraón,  y  la  mujer  fue 

llevada a casa de Faraón.

16

 Y a Abram le fue bien por causa de ella. 

Y  tuvo  rebaño,  vacada  y  asnos,  también 

siervos y siervas, asnas y camellos.

17

 Pero por el asunto de Saray, mujer de 

Abram, YHVH afligió a Faraón y su casa 

con grandes plagas.

18

 Entonces Faraón llamó a Abram y le dijo: 

¿Qué es esto que me has hecho? ¿Por qué 

no me declaraste que ella era tu mujer?

19

 ¿Por qué dijiste: Es mi hermana? Pues 

yo la tomé para mí por mujer, y ahora he 

aquí que es tu mujer. ¡Tómala y vete!

20

 Y  Faraón  dio  órdenes  a  los  hombres 

respecto a él, y lo despidieron con su mu-

jer y todo lo que poseía.

Abram y Lot

13

Subió,  pues,  Abram  desde  Egipto 

hacia  el  Neguev,  él  y  su  mujer  y 

todo lo que poseía, y Lot con él.

2

 Y  Abram  era  muy  rico  en  ganado,  en 

plata y en oro.

3

 Y en sus travesías anduvo desde el Ne-

guev hasta Bet-’El, al lugar donde al co-

mienzo  había  plantado  su  tienda,  entre 

Bet-’El y Hai,

4

 al  lugar  del  altar  que  había  hecho  allí 

por  primera  vez.  Y  allí  Abram  invocó  el 

nombre de YHVH.

5

 También Lot, que iba con Abram, tenía 

rebaños, vacadas y tiendas.

6

 Pero aquella° tierra no daba abasto para 

que ellos habitaran juntos, porque su po-

sesión era mucha y ya no podían habitar 

juntos.

7

 Y  hubo  disputa  entre  los  pastores  del 

ganado de Abram y los pastores del gana-

do de Lot. (En aquel tiempo el cananeo y 

el ferezeo habitaban en el país).

8

 Y  dijo  Abram  a  Lot:  Te  ruego  que  no 

haya contienda entre yo y tú, ni entre mis 

pastores y tus pastores, pues somos her-

manos.

9

 ¿Acaso no está toda esta tierra delante 

de ti? Te ruego que te separes de mí. Si 

vas a la izquierda, yo iré a la derecha, y si 

a la derecha, yo iré a la izquierda.

10

 Y alzó Lot sus ojos y vio toda la llanu-

ra del Jordán, la cual toda ella era de re-

gadío,  como  el  huerto  de  YHVH,°  como 

la tierra de Egipto en dirección a Zoar,° 

antes que YHVH destruyera a Sodoma y 

Gomorra.

12.7 

→Hch.7.5; Gá.3.16.  12.13 →Gn.20.2; 26.7.  13.6 aquella. Lit. la.  13.10 →Gn.2.10.  13.10 Zoar. Situada al SE del Mar 

Muerto.


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Génesis 14:17

13

11

 Y Lot escogió para sí toda la llanura del 

Jordán. Partió luego Lot hacia el oriente, 

y se separaron el uno del otro.

12

 Abram  habitó  en  tierra  de  Canaán,  y 

Lot se asentó en las ciudades de la llanura, 

y fue plantando su tienda hasta Sodoma.

13

 Pero la gente° de Sodoma era mala y 

pecadora en gran manera contra YHVH.

14

 Y  después  que  Lot  se  separara  de  su 

lado, YHVH dijo a Abram: Alza ahora tus 

ojos y mira del lugar donde estás hacia el 

norte y hacia el Neguev, y hacia el oriente 

y hacia el mar,°

15

 porque toda la tierra que tú ves te la 

daré a ti y a tu descendencia para siem-

pre.°

16

 Haré a tu descendencia como el polvo 

de la tierra: si se puede contar el polvo de 

la tierra, tu descendencia podrá ser con-

tada.

17

 Levántate, recorre esta tierra a lo largo 

y a lo ancho, pues a ti te la daré.

18

 Entonces  Abram  alzó  su  tienda,  se 

fue y habitó en el encinar de Mamre, que 

está en Hebrón. Y allí edificó un altar a 

YHVH.

Rescate de Lot

14

Ahora bien, siendo Amrafel rey de 

Sinar,  Arioc  rey  de  Elasar,  Que-

dorlaomer rey de Elam, y Tidal rey de los 

Goyim,

2

 hicieron guerra a Bera, rey de Sodoma, 

a Birsa, rey de Gomorra, a Sinab, rey de 

Adma, a Semeber, rey de Zeboim, y al rey 

de Bela (la cual es Zoar).

3

 Todos estos se unieron en el valle de Si-

dim, que es el Mar de la Sal.°

4

 Doce años habían servido a Quedorlao-

mer, pero en el año decimotercero se re-

belaron.

5

 En el año decimocuarto vino Quedor-

laomer  y  los  reyes  que  estaban  con  él, 

y  derrotaron  a  los  refaítas°  en  Astarot- 

Carnaim,  a  los  zuzitas  en  Ham,  a  los 

emitas en Save-Quiriataim,

6

 y  a  los  hurritas  en  los  montes  de  Seir 

hasta El-Parán, que está junto al desierto.

7

 Luego se volvieron y fueron a En-Mispat 

(o  Cades),  y  arrasaron  todo  el  territorio 

del  amalecita  y  también  el  del  amorreo, 

que habita en Hazezón-Tamar.

8

 Entonces salieron: el rey de Sodoma, el 

rey de Gomorra, el rey de Adma, el rey de 

Zeboim y el rey de Bela (la cual es Zoar), y 

prepararon batalla contra ellos en el valle 

de Sidim,

9

 esto  es,  contra  Quedorlaomer,  rey  de 

Elam,  Tidal,  rey  de  los  Goyim,  Amrafel, 

rey de Sinar, y Arioc, rey de Elasar, cuatro 

reyes contra cinco.

10

 El valle de Sidim estaba lleno de po-

zos° de asfalto, y al huir el rey de Sodo-

ma y el de Gomorra, cayeron en ellos, y 

los que quedaron huyeron hacia la mon-

taña.

11

 Entonces  tomaron°  todos  los  bienes 

de Sodoma y Gomorra, y todo su susten-

to, y se fueron.

12

 Y tomaron a Lot, sobrino de Abram, y 

sus bienes, y se fueron, pues él habitaba 

en Sodoma.

13

 Pero  un  fugitivo  fue  e  informó  a 

Abram, el hebreo,° pues él moraba en el 

encinar de Mamre; el amorreo, hermano 

de Escol y hermano de Aner habían hecho 

un pacto con Abram.

14

 Cuando  oyó  Abram  que  su  parien-

te° había sido hecho cautivo, movilizó a 

trescientos dieciocho de sus partidarios,° 

nacidos en su casa, y los persiguió hasta 

Dan.

15

 Y él y sus criados se desplegaron con-

tra ellos de noche, y los hirió y los per-

siguió  hasta  Hoba,  al  lado  izquierdo  de 

Damasco.

16

 Y recuperó todos los bienes, y también 

a su pariente Lot y sus bienes, así como a 

las mujeres y al pueblo.

Melquisedec

17

 Después  que  regresó,  tras  derrotar  a 

Quedorlaomer y a los reyes que estaban 

con  él,  el  rey  de  Sodoma  salió  a  su  en-

cuentro en el valle de Savé, que es el valle 

del Rey.

13.13 gente. Heb. ‘ish = hombre, pero también indica ambos géneros.  13.14 mar. Es decir, hacia los cuatro puntos cardinales

13.15 

→Hch.7.5.  14.3 Esto es, el Mar Muerto.  14.5 Casta de gigantes →Dt.2.20.  14.10 Lit. pozos, pozos.  14.11 Se sobre-

entiende los vencedores, es decir, los reyes del v. 9. 

14.13 Primer registro del gentilicio. Otros lo asocian con Heber 

→10.21. 

14.14 pariente. Heb. ‘ajiv = su hermano. Pero admite otros grados de parentesco (en este caso sobrino).  14.14 partidarios. O: habi­

tuados a las armas. Así se designaba en Canaán a los siervos fieles adiestrados para defender los derechos y bienes de su señor.


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Génesis 14:18

14

18

 Pero Melquisedec,° Rey de Salem, sacer-

dote del Dios Altísimo,° sacó pan y vino,

19

 y  lo  bendijo  diciendo:  ¡Bendito  sea 

Abram por el Dios Altísimo, poseedor de 

cielos y tierra,

20

 y  bendito  sea  el  Dios  Altísimo,  quien 

entregó a tus adversarios en tu mano! Y 

le° entregó el diezmo de todo.

21

 Entonces  el  rey  de  Sodoma  dijo  a 

Abram: Dame las personas y toma para ti 

los bienes.

22

 Pero Abram respondió al rey de Sodo-

ma: He alzado mi mano° a YHVH el Dios 

Altísimo, poseedor de cielos y tierra,

23

 que de todo lo que es tuyo no tomaré 

ni un hilo ni una correa de sandalia, para 

que no digas: yo enriquecí a Abram,

24

 con  la  sola  excepción  de  lo  que  han 

comido los jóvenes, y la porción de Aner, 

Escol y Mamre, los hombres que vinieron 

conmigo. Sólo ellos tomarán su parte.

La promesa

15

Después  de  estas  cosas,  fue  la  pa-

labra de YHVH a Abram en visión, 

diciendo: No temas Abram, Yo mismo soy 

tu escudo y gran galardón.

2

 Y respondió Abram: Señor YHVH, ¿qué 

me has de dar?, pues yo continúo sin des-

cendencia, y el heredero de mi casa será 

ese damasceno Eliécer.

3

 E insistió Abram: Mira, no me has dado 

descendiente, y de seguro es un criado de 

mi casa quien me va a heredar.

4

 Pero,  he  aquí  la  palabra  de  YHVH  a 

él,  diciendo:  No  te  heredará  éste,  sino 

que  te  heredará  uno  que  saldrá  de  tus 

entrañas.

5

 Y  lo  sacó  fuera,  y  le  dijo:  Contempla 

ahora  los  cielos,  y  cuenta  las  estrellas, 

si puedes contarlas. Y le dijo: Así será tu 

descendencia.°

6

 Y  creyó  a  YHVH,  y  le  fue  contado  por 

justicia.°

7

 Entonces le dijo: Yo soy YHVH, que te 

saqué de Ur de los caldeos para darte en 

posesión esta tierra.

8

 Y él dijo: Mi Señor YHVH, ¿en qué sabré 

que la he de poseer?

9

 Y le dijo: Toma para mí una becerra de 

tres años, una cabra de tres años, un car-

nero de tres años, una tórtola y un palo-

mino.

10

 Y tomó para Él todos éstos, y los partió 

por la mitad, y puso cada mitad enfrente 

de la otra, pero no partió las aves.°

11

 Y descendían los buitres sobre los ca-

dáveres, pero Abram los ahuyentaba.

12

 Y  estaba  por  ponerse  el  sol,  cuando 

un  profundo  sopor  sobrevino  a  Abram, 

y  he  aquí  que  el  terror  de  una  intensa 

oscuridad cayó sobre él.

13

 Y dijo a Abram: Sabe por cierto que tu 

simiente será forastera en una tierra no 

suya (y allí será esclavizada y será oprimi-

da) cuatrocientos años.°

14

 Pero también a la nación que han de 

servir  la  juzgaré  Yo,  y  después  saldrán 

con gran riqueza.°

15

 Y tú te reunirás con tus padres en paz, 

y serás sepultado en buena vejez.

16

 Y los de la cuarta generación regresa-

rán aquí, porque aún no ha llegado hasta 

aquí la iniquidad del amorreo.

17

 Y  sucedió  que  cuando  se  puso  el  sol, 

sobrevino una densa oscuridad, y apare-

ció una fogata humeante, y una antorcha 

de  fuego  que  pasaba  por  entre  aquellos 

trozos.

18

 En  aquel  día  hizo  YHVH  pacto  con 

Abram, diciendo: A tu descendencia daré 

esta tierra,° desde el río de Egipto hasta el 

río grande, el río Éufrates,

19

 tierra  del  quenita,  del  cenezeo,  del 

cadmoneo,

20

 del heteo, del ferezeo, del refaíta,

21

 del amorreo, del cananeo, del gergeseo 

y del jebuseo.

14.18-20 

→He.7.1-10.  14.18 Heb.= ’Elyón.  14.20 Es decir, Abram. No se especifica quien entrega el diezmo; no obstante, es 

claro que, en reciprocidad a la bendición de Melquisedec, el otro (es decir, Abram), le entregó el diezmo de todo. La expresión 

vayitten­lo = y le entregó, no puede tener otro sujeto que Abram 

→He.7.1-2.  14.22 He alzado mi mano. Señal de lealtad, fideli-

dad y compromiso. 

15.5 

→Ro.4.18; He.11.12.  15.6 →Ro.4.3; Gá.3.6. Argumento para la defensa de la doctrina de la justifica-

ción por la fe. Justicia significa rectitud, de modo que Dios considera recta (justa, sin culpa) a la persona que cree, aun antes de 

hacer obras. 

15.10 Lit. ave.  15.13 Los 400 años mencionados aquí (y citados por Esteban 

→Hch.7.6 nota) no concuerdan con 

los 430 años de exilio mencionados en Ex.12.40-41 (y citados por Pablo 

→Gá.3.17 nota). En primer lugar, es muy prob. que los 

cuatrocientos años incluyan el tiempo de la peregrinación en Canaán. En segundo término, una forma de reconciliar la diferencia 

de treinta años, consiste en considerar la primera como figura en perspectiva, mientras que la segunda es, en retrospectiva, el 

resultado de la experiencia histórica. 

→Ex.1.1-14.  15.14 →Ex.12.40-41; Hch.7.7.  15.18 →Hch.7.5.


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Génesis 17:10

15

Agar e Ismael

16

Y  Saray,  mujer  de  Abram,  no  le 

daba hijos, pero ella tenía una sier-

va egipcia cuyo nombre era Agar.

2

 Y dijo Saray a Abram: Mira ahora, YHVH 

me ha impedido tener hijos, te ruego que 

te llegues a mi sierva, quizás los obtenga 

de ella.° Y oyó Abram la voz de Saray.

3

 Y al cabo de diez años de habitar Abram 

en  la  tierra  de  Canaán,  Saray,  mujer  de 

Abram, tomó a Agar la egipcia, su sierva, 

y la dio por mujer a su marido Abram,

4

 y él se llegó a Agar y concibió. Sin em-

bargo,  cuando  vio  que  había  concebido, 

miraba con desprecio a su señora.

5

 Entonces dijo Saray a Abram: ¡Mi afren-

ta sea sobre ti! Yo misma puse a mi sierva 

a tu disposición,° y al ver que está encinta 

me mira con desprecio. Juzgue YHVH en-

tre yo y tú.

6

 Y dijo Abram a Saray: He aquí, tu sier-

va está en tus manos. Haz con ella lo que 

bien te parezca.° Entonces Saray la afli-

gió, y ella huyó de su presencia.

7

 Pero  el  ángel  de  YHVH  la  halló  junto 

a  un  manantial  de  aguas  en  el  desierto 

(junto al manantial que está en el camino 

de Shur),

8

 y le dijo: Agar, sierva de Saray, ¿de dón-

de  vienes  y  a  dónde  vas?  Y  ella  respon-

dió:  Huyo  de  la  presencia  de  mi  señora 

Saray.

9

 Entonces  le  dijo  el  ángel  de  YHVH: 

Vuelve  a  tu  señora  y  humíllate  bajo  sus 

manos.

10

 Y le dijo el ángel de YHVH: Multipli-

caré en gran manera tu descendencia, y 

debido a su multitud, no se podrá contar.

11

 También le dijo el ángel de YHVH: He 

aquí estás encinta y darás a luz un hijo, 

y  llamarás  su  nombre  Ismael,°  porque 

YHVH ha escuchado tu aflicción.

12

 Y él será un hombre como el asno sal-

vaje.  Su  mano  estará  contra  todos,  y  la 

mano de todos contra él, y vivirá enfren-

tado° a todos sus hermanos.

13

 Y llamó el nombre de YHVH (quien ha-

blaba con ella): Ata-’El-Roí,° porque dijo: 

¿No he visto aquí yo también las espaldas 

de Aquél que me ve?°

14

 Por eso llamó al pozo: Beer-Lajay-Roí.° 

He aquí está entre Cades y Bered.

15

 Y  Agar  dio  a  luz  un  hijo  a  Abram,  y 

Abram  llamó  Ismael  al  hijo  que  Agar  le 

había dado a luz.

16

 Y  era  Abram  de  ochenta  y  seis  años 

cuando Agar le dio a luz a Ismael.

La señal del pacto 

Promesa acerca de Isaac

17

Era  Abram  de  noventa  y  nueve 

años cuando YHVH se le apareció 

a  Abram,  y  le  dijo:  Yo  soy  ’El-Shadday,° 

anda delante de mí, y sé perfecto,

2

 y estableceré mi pacto entre Yo y tú, y te 

multiplicaré en gran manera.

3

 Entonces  Abram  se  echó  de  bruces,  y 

’Elohim le habló diciendo:

4

 En cuanto a mí, este es mi pacto contigo: 

Serás padre de una multitud de pueblos.

5

 Y no se llamará más tu nombre Abram,° 

sino tu nombre será Abraham,° porque te 

he constituido padre de una multitud de 

pueblos.°

6

 Te haré fecundo en gran manera, haré 

naciones de ti, y de ti saldrán reyes.

7

 Yo  establezco  mi  pacto  entre  Yo  y  tú, 

y  tu  descendencia  después  de  ti  en  sus 

generaciones como alianza eterna,° para 

ser el Dios tuyo y el de tu descendencia 

después de ti.

8

 Y te daré a ti, y a tu descendencia des-

pués de ti la tierra de tus peregrinaciones, 

toda  la  tierra  de  Canaán,  por  posesión 

perpetua,° y seré su Dios.

9

 Dijo  además  ’Elohim  a  Abraham:  Y  tú 

guardarás mi pacto, tú y tu descendencia 

después de ti, en sus generaciones.

10

 Este es mi pacto que guardaréis entre 

Yo y vosotros y tu descendencia después 

de ti: Que todo varón entre vosotros sea 

circuncidado.°

16.2 Heb. ‘ibaneh mimmenah = sea edificada por ella.  16.5 Lit. en tu seno.  16.6 Lit. lo bien ante tus ojos.  16.11 Esto es, 

Dios oye

16.12 Heb. ‘al­peney = frente a, en presencia de.  16.13 Ata­’El­Roí. Esta frase puede tener dos significados: 1) Si la 

palabra Roí se considera como sustantivo: Tú eres un Dios de apariencia o aparición 

→1 S.16.12 y 2) Si se toma como verbo: 

Tú eres el Dios que me ve

16.13 N¿No he visto después de haber visto? 

→El sentido es que, después de ver a Dios, ella 

pudo seguir viendo, es decir, viviendo, y expresa la idea de que no es posible ver a Dios y seguir viviendo. 

16.14 NPozo del 

que ve y vive

17.1 Heb. ’El­Shadday 

→ § 5.  17.5 Abram. Esto es, padre excelso.  17.5 Abraham. Esto es, padre de multitud

17.5 

→Ro.4.17.  17.7 →Lc.1.55.  17.8 →Hch.7.5.  7.10 →Hch.7.8.


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Génesis 17:11

16

11

 Circuncidaréis la carne de vuestro pre-

pucio, y será por señal del pacto entre Yo 

y vosotros.

12

 De edad de ocho días será circuncida-

do todo varón entre vosotros por vuestras 

generaciones, el nacido en casa, o el com-

prado  con  dinero  a  cualquier  extranjero 

que no sea de tu descendencia.

13

 Ciertamente  será  circuncidado  el  na-

cido en tu casa y el comprado con tu di-

nero, y mi pacto estará en vuestro cuerpo 

por pacto eterno.

14

 Pero  el  varón  incircunciso,  que  no 

haya circuncidado la carne de su prepu-

cio, tal persona será cortada de su pueblo, 

ha traspasado mi pacto.

15

 Dijo  también  ’Elohim  a  Abraham:  A 

tu mujer Saray no la llamarás Saray, sino 

que su nombre será Sara,°

16

 y  la  bendeciré  y  también  te  daré  un 

hijo por medio de ella. Sí, la bendeciré y 

haré de ella naciones, y reyes de pueblos 

procederán de ella.°

17

 Y cayó Abraham sobre su rostro, pero 

se rió y dijo en su corazón: ¿A un hombre 

de cien años le habrá de nacer un hijo? Y 

Sara, ¿dará a luz con noventa años?

18

 Y  Abraham  dijo  a  ’Elohim:  ¡Ojalá  Is-

mael viva delante de ti!

19

 Pero  dijo  ’Elohim:  De  cierto  Sara  tu 

mujer te dará a luz un hijo, y tú llamarás 

su nombre Isaac, y estableceré mi pacto 

con él por pacto perpetuo para su descen-

dencia después de él.

20

 En  cuanto  a  Ismael,  te  he  oído:  He 

aquí  lo  bendeciré,  lo  haré  fecundo  y  lo 

multiplicaré en gran manera, engendra-

rá doce príncipes y haré de él una gran 

nación.

21

 Pero mi pacto lo confirmaré con Isaac, 

que te parirá Sara, por este tiempo, el año 

próximo.

22

 Cuando terminó de hablarle, ’Elohim 

ascendió por encima de Abraham.

23

 Entonces, en ese mismo día, Abraham 

tomó a Ismael su hijo, y a todos los naci-

dos en su casa, y a todos los comprados 

con su dinero, a todo varón entre las gen-

tes  de  la  casa  de  Abraham,  y  circuncidó 

la  carne  de  su  prepucio,  como  le  había 

dicho ’Elohim.

24

 Era Abraham de noventa y nueve años 

cuando circuncidó la carne de su prepu-

cio,

25

 y  su  hijo  Ismael  era  de  trece  años 

cuando  fue  circuncidada  la  carne  de  su 

prepucio.

26

 Aquel mismo día Abraham se circunci-

dó. También su hijo Ismael

27

 y todos los hombres de su casa, naci-

dos en casa o comprados con dinero a un 

extranjero, fueron circuncidados con él.

La Teofanía

18

Después se le apareció YHVH en el 

encinar de Mamre estando él sen-

tado a la puerta de la tienda en el más in-

tenso calor del día.

2

 Y alzando sus ojos, miró, y he aquí tres 

varones  erguidos  frente  a  él.  En  cuanto 

los  vio,  corrió  a  su  encuentro  desde  la 

puerta de su tienda y se postró a tierra,

3

 y exclamó: Señor mío, si he hallado gra-

cia ante tus ojos, te ruego que no pases de 

largo junto a tu siervo.

4

 Tráigase  ya  un  poco  de  agua,  y  lavad 

vuestros pies y recostaos bajo el árbol,

5

 mientras tomo un trozo de pan para que 

sustentéis vuestro corazón. Luego segui-

réis adelante, pues por eso habéis pasado 

junto a vuestro siervo. Contestaron: Haz 

como has dicho.

6

 Abraham  se  apresuró  a  entrar  en  la 

tienda de Sara, y dijo: ¡Toma pronto tres 

medidas de flor de harina, amásalas y haz 

tortas!

7

 En  seguida,  corriendo  hacia  la  vacada, 

Abraham tomó un becerro tierno y bue-

no, y se lo dio al mozo, y éste se apresuró 

a aderezarlo.

8

 Juntamente  con  el  becerro  que  había 

aderezado, tomó también cuajada y leche 

y lo presentó ante ellos, y mientras él se 

mantenía en pie junto a ellos debajo del 

árbol, ellos comían.

9

 Después le dijeron: ¿dónde está tu mujer 

Sara? Y él dijo: He aquí, está en la tienda.

10

 Y dijo:° Volveré a ti sin falta según el 

tiempo de la vida, y he aquí que tu mujer 

Sara tendrá un hijo.° Y Sara escuchaba a 

la entrada de la tienda, pues estaba detrás 

de él.

17.15 Esto es, princesa.  17.16 LXX: de él.  18.10 Esto es, YHVH.  18.10 

→Ro.9.9.


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Génesis 19:3

17

11

 Y Abraham y Sara eran ancianos, en-

trados en días, y a Sara le había cesado la 

costumbre de las mujeres.

12

 Y se rió Sara en sus adentros, diciendo: 

¿Después de mi menopausia he de tener 

placer, siendo mi señor° anciano?

13

 Entonces dijo YHVH a Abraham: ¿Por 

qué  se  ha  reído  Sara  así,  diciendo:  ¿Es 

cierto que daré a luz cuando ya soy vieja?

14

 ¿Acaso hay algo imposible para YHVH?° 

En el momento señalado volveré a ti, se-

gún  el  tiempo  de  la  vida,  y  Sara  tendrá 

un hijo.

15

 Pero  Sara  negó  diciendo:  No  me  he 

reído (pues tuvo miedo). Pero Él dijo: No, 

realmente te has reído.

16

 Y  levantándose  de  allí  aquellos  varo-

nes,  dirigieron  la  mirada°  a  Sodoma,  y 

Abraham fue con ellos para despedirlos.

17

 Y YHVH se dijo: ¿Encubriré a Abraham 

lo que voy a hacer?

18

 Porque  ciertamente  Abraham  llegará 

a ser una nación grande y fuerte, y en él 

serán  benditas  todas  las  naciones  de  la 

tierra.

19

 Porque lo he escogido para que instru-

ya a sus hijos y a su casa y a sus suceso-

res a mantenerse en el camino de YHVH 

practicando justicia y derecho, para que 

cumpla YHVH sobre Abraham todo cuan-

to ha predicho acerca de él.

20

 Entonces  dijo  YHVH:  Por  cuanto  el 

clamor  contra  Sodoma  y  Gomorra  es 

grande, y se ha agravado en extremo su 

pecado,

21

 descenderé  ahora  y  veré  si  en  todo° 

han  obrado  según  el  clamor  que  llega 

hasta mí, y si no, lo sabré.

22

 Entonces los varones se volvieron y se 

encaminaron hacia Sodoma, pero YHVH 

se quedó aún con Abraham.°

23

 Entonces, acercándose, Abraham dijo: 

¿Destruirás al justo con el malvado?

24

 Quizá haya cincuenta justos en medio 

de la ciudad. ¿Arrasarás, acaso, y no per-

donarás al lugar, por amor a los cincuenta 

justos que estén en medio de ella?

25

 ¡Lejos de ti hacer cosa tal! ¿Que hagas 

morir  al  justo  con  el  malvado,  y  que  el 

justo sea como el malvado? ¡Lejos de ti! 

¿Acaso  el  Juez  de  toda  la  tierra  no  hará 

justicia?

26

 Y dijo YHVH: Si hallo en Sodoma cin-

cuenta justos en la ciudad, entonces per-

donaré a todo el lugar por causa de ellos.

27

 Y respondió Abraham, y dijo: En ver-

dad, aunque soy polvo y ceniza, ahora que 

me he atrevido a hablar a mi Señor,

28

 quizá falten cinco de los cincuenta jus-

tos. ¿Destruirás acaso por cinco a toda la 

ciudad? Y dijo: No la destruiré si hallo allí 

cuarenta y cinco.

29

 Volvió a hablarle una vez más, y dijo: 

Quizá se encuentren allí cuarenta. Y res-

pondió: No lo haré por causa de los cua-

renta.

30

 Entonces  dijo:  No  se  enoje  ahora  mi 

Señor,  y  podré  hablar:  Quizá  se  hallen 

allí treinta. Y dijo: No actuaré si hallo allí 

treinta.

31

 Y dijo: En verdad te ruego, al atrever-

me a hablar a mi Señor, quizá se hallen 

allí veinte. Y dijo: No destruiré por causa 

de los veinte.

32

 Entonces  dijo:  Te  ruego,  no  se  enar-

dezca mi Señor, y hablaré sólo esta vez: 

Quizá se hallen allí diez. Y respondió: No 

la destruiré por causa de los diez.

33

 Y  cuando  YHVH  acabó  de  hablar  a 

Abraham, se fue, y Abraham regresó a su 

lugar.

Destrucción de Sodoma y Gomorra

19

Entre  tanto  los  dos  ángeles  llega-

ron  a  Sodoma  al  atardecer,  y  Lot 

estaba  sentado  en  la  puerta  de  Sodoma. 

Cuando Lot los vio, se levantó a recibirlos 

y postrándose con su rostro a tierra,

2

 dijo: Mirad señores míos, os ruego que 

os desviéis a casa de vuestro siervo, per-

noctéis  y  lavéis  vuestros  pies.  De  ma-

drugada  os  levantaréis  y  podréis  seguir 

vuestro  camino.  Mas  ellos  contestaron: 

No, pasaremos la noche en la plaza.

3

 Pero  como  les  rogara  con  insistencia, 

fueron  con  él.  Entraron  en  su  casa  y  él 

les preparó un banquete, coció panes sin 

levadura, y comieron.

18.12 

→1 P.3.6.  18.14 →Lc.1.37.  18.16 mirada. Heb. shaqaf. Observar desde una posición más alta.  18.21 Es decir, en el 

sentido de colmar la medida, tal como indica el pecado que llega hasta la misma presencia de Dios. 

18.22 1ª enmienda de los 

Soferim 

→ § 6 - § 7.


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Génesis 19:4

18

4

 Aún no se habían acostado, cuando los 

hombres de la ciudad, los sodomitas,° ro-

dearon la casa: jóvenes y ancianos, toda la 

población, hasta el último.

5

 Y gritando a Lot, le dijeron: ¿Dónde es-

tán los varones que han venido a ti esta 

noche?  ¡Sácalos  para  que  los  conozca-

mos!°

6

 Entonces Lot, saliendo a ellos a la en-

trada, cerró la puerta tras de sí,

7

 y  exclamó:  ¡Por  favor,  hermanos  míos, 

no hagáis este mal!

8

 Mirad, os ruego, tengo dos hijas que no 

han conocido varón, voy a sacarlas a vo-

sotros ahora y haced con ellas como bien 

os  parezca,  pero  no  hagáis  nada  a  estos 

varones° que han venido a cobijarse bajo 

mi techo.

9

 Pero  respondieron:  ¡Quítate  de  ahí! 

Y  añadieron:  Es  el  único  que  ha  venido 

como  forastero,  ¿y  pretende  erigirse  en 

juez?  ¡Ahora  te  trataremos  peor  que  a 

ellos! Y arremetiendo violentamente con-

tra Lot, intentaban forzar la puerta.

10

 Pero aquellos varones extendieron sus 

manos y metieron a Lot junto a ellos en la 

casa y cerraron la puerta,

11

 al tiempo que a los hombres que esta-

ban en la entrada de la casa, del menor al 

mayor, los hirieron con ceguera, de modo 

que eran incapaces de hallar la entrada.

12

 Y  dijeron  los  varones°  a  Lot:  ¿Quién 

más tienes aquí? Saca del lugar a tus yer-

nos,° y a tus hijos e hijas, y a cualquiera 

que tengas en la ciudad,

13

 porque nosotros vamos a destruir este 

lugar, ya que el clamor que subió delante 

de YHVH es grande, y YHVH nos envió a 

destruirlo.

14

 Entonces salió Lot y habló a sus yer-

nos, los que habían de tomar a sus hijas, 

y les dijo: ¡Levantaos! ¡Salid de este lugar, 

porque  YHVH  va  a  destruir  esta  ciudad! 

Pero a sus yernos les pareció que bromea-

ba.

15

 Al despuntar el alba, los ángeles apre-

miaban a Lot, diciendo: ¡Levántate, toma 

a tu mujer y a tus dos hijas presentes para 

que no seas barrido° por el pecado de la 

ciudad!

16

 Pero como él no se decidía, los varones 

lo agarraron y lo sacaron de la mano a él, 

a su mujer y a sus dos hijas, gracias a la 

misericordia de YHVH hacia él, y lo hicie-

ron estar fuera de la ciudad.°

17

 Cuando los hubieron sacado fuera, se 

le dijo:° ¡Huye por tu vida! No mires tras 

de  ti,  ni  te  detengas  en  toda  la  llanura 

hasta la montaña. ¡Huye o serás barrido!

18

 Lot le dijo: ¡Por favor, no, señor mío!

19

 Mira,  te  ruego,  tu  siervo  ha  hallado 

gracia ante tus ojos, y has engrandecido 

la misericordia que hiciste conmigo pre-

servando mi vida, pero no puedo escapar 

hasta la montaña, pues el mal me alcan-

zará, y moriré.

20

 He aquí, te ruego, esa aldea está cerca 

para  huir  allá  y  es  pequeña,°  ¿no  es  in-

significante? Permíteme que huya allá y 

conserve mi vida.

21

 Y le respondió: He aquí, también sobre 

esto he aceptado tu ruego.° No derrum-

baré la ciudad de la cual has hablado.

22

 ¡Apresúrate! Escapa hacia allá, pues no 

podré hacer cosa alguna hasta que llegues 

allá. Por eso llamó Zoar° el nombre de la 

ciudad.

23

 Salía el sol sobre aquella tierra cuando 

Lot entraba en Zoar.

24

 Entonces YHVH hizo llover desde los 

cielos sobre Sodoma y Gomorra azufre y 

fuego de parte de YHVH,

25

 y  derrumbó  estas  ciudades°  y  toda 

aquella llanura, con todos los habitantes 

de las ciudades y las plantas del suelo.

26

 Y la mujer de aquél° miró hacia atrás, 

y se convirtió en pilar de sal.

27

 Abraham,  madrugando,  se  dirigió  de 

mañana  al  lugar  donde  había  estado  en 

presencia de YHVH,

28

 y  oteando  hacia  el  lado  de  Sodoma  y 

Gomorra y hacia toda la región de la lla-

nura, he aquí vio que subía de la tierra un 

humo, como la humareda de un horno.

19.4 Lit. hombres de Sodoma.  19.5 Heb. vened’ah ‘otam. Esto es, en sentido de relación sexual.  19.8 El TM presenta cierta di-

ficultad de lectura. NVarones de Dios

19.12 varones. Pentateuco Samaritano: los ángeles.  19.12 Heb. Jatán = yerno. Aparece 

en singular, sin art. ni posesivo. 

19.15 Heb. tissafé. También serás arrastrado cf. v. 17.  19.16 

→2 P.2.7.  19.17 LXX: dijeron

19.20  Adjetivo  del  que  procede  el  nombre  de  la  ciudad  Zoar,  al  SE  del  Mar  Muerto.  19.21  Lit.  he  alzado  tu  rostro

19.22 Heb. Tso’ar, de la raíz mitse’ar = pequeña 

→v. 20.  19.24-25 →Mt.10.15; 11.23-24; Lc.10.12; 17.29; 2 P.2.6; Jud.7. 

19.26 

→Lc.17.32.


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Génesis 20:15

19

29

 Así, cuando ’Elohim destruyó las ciu-

dades de la llanura, ’Elohim se acordó de 

Abraham, por eso sacó a Lot de en medio 

del  derrumbamiento  de  las  ciudades  en 

que Lot se había establecido.

Descendencia de Lot

30

 Luego  Lot  subió  desde  Zoar  y  habitó 

en la montaña° con sus dos hijas, pues te-

mía permanecer en Zoar. Habitó, pues, en 

una caverna junto con sus dos hijas.

31

 Y  dijo  la  primogénita  a  la  más  joven: 

Nuestro padre es anciano, y no hay en esta 

tierra ni un varón que se llegue a nosotras 

según la costumbre de toda la tierra.

32

 ¡Ven!  hagamos  beber  vino  a  nuestro 

padre, y acostémonos con él. Así preser-

varemos descendencia de nuestro padre.

33

 E hicieron beber vino a su padre aquella 

noche, y entró la primogénita y se acostó 

con su padre, pero él no supo cuándo ella 

se acostó ni cuándo se levantó.

34

 Y sucedió al día siguiente que la primo-

génita dijo a la más joven: Mira, anoche 

me acosté con mi padre. Hagámosle be-

ber vino también esta noche y ve, acués-

tate  con  él  y  preservemos  descendencia 

de nuestro padre.

35

 Y también hicieron beber vino a su padre 

aquella noche, y se levantó la más joven y se 

acostó con él, sin embargo él no supo cuán-

do ella se acostó, ni cuándo se levantó.

36

 Y las dos hijas de Lot concibieron de 

su padre.

37

 La primogénita dio a luz un hijo, y lla-

mó su nombre Moab, el cual es padre de 

los moabitas° hasta hoy.

38

 También la más joven dio a luz un hijo, 

y llamó su nombre Ben-ammí, el cual es 

padre de los hijos de Amón hasta hoy.

Abraham y Sara en Gerar

20

Desde  allí  Abraham  viajó  hacia  la 

tierra  del  Neguev,  acampó  entre 

Cades y Shur, y habitó como forastero en 

Gerar.

2

 Y  decía  Abraham  respecto  a  Sara,  su 

mujer: Es mi hermana.° Así que Abime-

lec, rey de Gerar, mandó a tomar a Sara.

3

 Pero ’Elohim vino a Abimelec en un sue-

ño  aquella  noche,  y  le  dijo:  He  aquí,  eres 

hombre muerto a causa de la mujer que to-

maste, pues ella está casada y tiene marido.

4

 Pero  Abimelec,  que  no  se  había  llega-

do a ella, dijo entonces: Señor, ¿matarás 

también a gente inocente?

5

 ¿no me dijo él: ella es mi hermana, y ella 

también dijo: es mi hermano? Con inte-

gridad de corazón y limpieza de manos he 

hecho esto.

6

 Y ’Elohim le dijo en el sueño: También 

Yo sé que con integridad de tu corazón has 

hecho esto, y Yo también te retuve de pecar 

contra mí, por eso no te permití tocarla.

7

 Devuelve ahora a la mujer de ese hom-

bre, porque es profeta, y él orará por ti, y 

vivirás. Pero si no la devuelves, sabe que 

de cierto morirás, tú y todos los tuyos.

8

 Abimelec entonces se levantó temprano 

por  la  mañana,  y  llamando  a  todos  sus 

siervos, les habló todas estas cosas en pri-

vado,°  y  aquellos  hombres  sintieron  un 

gran temor.

9

 Luego Abimelec llamó a Abraham, y le 

dijo: ¿Qué nos has hecho? ¿En qué he pe-

cado contra ti, que has traído contra mí y 

contra mi reino tan gran pecado? ¡Hiciste 

conmigo cosas que no se deben hacer!

10

 Dijo  además°  Abimelec  a  Abraham: 

¿Qué te indujo° a hacer cosa semejante?

11

 Respondió° Abraham: Porque me dije: 

Ciertamente no hay temor de Dios en este 

lugar, y me matarán por el asunto de mi 

mujer.

12

 Aunque, en efecto, ella es mi hermana, 

hija de mi padre, pero no hija de mi ma-

dre, y así vino a ser mi mujer.

13

 Y sucedió que cuando ’Elohim me hizo 

salir errante de casa de mi padre, yo le dije 

a ella: De tu parte me harás este favor:° 

A todo lugar que lleguemos, allí dirás de 

mí: él es mi hermano.

14

 Entonces Abimelec tomó un rebaño y 

una vacada, siervos y siervas, y se lo dio a 

Abraham, y le devolvió a Sara su mujer.

15

 Luego  dijo  Abimelec:  Mira,  mi  tierra 

está delante de ti, establécete donde bien 

te parezca.

19.30 Altiplano al E del Mar Muerto, habitado posteriormente por amonitas y moabitas.  19.37 Lit. Moab.  20.2 

→Gn.12.13; 

26.7. 

20.8 Lit. a oídos de ellos.  20.10 .además.  20.10 Lit. ¿qué mirabas… ?  20.11 Lit. dijo.  20.13 Lit. esta será tu miseri­

cordia que harás conmigo.


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Génesis 20:16

20

16

 Y dijo a Sara: Fíjate, doy a tu hermano 

mil piezas de plata. Mira, esto será para ti 

como un velo para los ojos° ante todos los 

que están contigo. Así ante todos quedas 

vindicada.

17

 Y  Abraham  oró  a  ’Elohim,  y  ’Elohim 

sanó a Abimelec, y a su mujer y a sus sier-

vas, las cuales tuvieron hijos,

18

 pues YHVH había cerrado por comple-

to toda matriz de la casa de Abimelec por 

el asunto de Sara, mujer de Abraham.

Nacimiento de Isaac

21

Visitó YHVH a Sara, como había di-

cho, e hizo YHVH con Sara según 

había hablado.

2

 Sara, pues, concibió,° y para el tiempo 

señalado  que  ’Elohim  le  había  hablado, 

dio a luz un hijo a Abraham en su vejez.

3

 Y  Abraham  llamó  por  nombre  al  hijo 

que le había nacido, el cual Sara le había 

parido, Isaac.

4

 Y cuando tenía ocho días, Abraham cir-

cuncidó a su hijo Isaac,° como ’Elohim le 

había ordenado.

5

 Y era Abraham de cien años cuando le 

nació su hijo Isaac.

6

 Entonces dijo Sara: ’Elohim me ha hecho 

reír. Todo el que lo oiga, reirá conmigo.°

7

 Y  añadió:  ¿Quién  le  hubiera  dicho  a 

Abraham  que  Sara  amamantaría  hijos?, 

pues le he dado a luz un hijo en su vejez.

8

 Y creció el niño, y fue destetado. Enton-

ces hizo Abraham un gran banquete el día 

en que Isaac fue destetado.

Expulsión de Agar

9

 Pero Sara vio que el hijo que Abraham ha-

bía tenido de Agar la egipcia, se burlaba.°

10

 Por eso le dijo a Abraham: Expulsa a 

esa esclava y a su hijo, porque no hereda-

rá el hijo de esa esclava con mi hijo, con 

Isaac.°

11

 Pero el asunto pareció muy grave ante 

los  ojos  de  Abraham  por  cuanto  era  su 

hijo.

12

 Entonces  dijo  ’Elohim  a  Abraham: 

No  parezca  grave  ante  tus  ojos  lo  del 

muchacho y tu sierva. Escucha la voz de 

Sara  en  todo  lo  que  te  dice,  porque  en 

Isaac te será llamada descendencia,°

13

 aunque  también  del  hijo  de  la  sierva 

haré una nación, pues él es descendiente 

tuyo.

14

 Abraham entonces se levantó tempra-

no en la mañana, tomó pan y un odre con 

agua  y  lo  dio  a  Agar,  poniendo  sobre  su 

espalda también al niño y la despidió. Y 

ella se fue, y anduvo errante por el desier-

to de Beer-seba.°

15

 Y cuando se acabó el agua del odre, en-

tonces puso al muchacho bajo uno de los 

arbustos.

16

 Luego fue y se sentó enfrente, a distan-

cia como de un tiro de arco, pues se dijo: 

Así no veré cuando el muchacho muera. 

Se sentó enfrente y alzó su voz y lloró.°

17

 Pero  ’Elohim  oyó  la  voz  del  mucha-

cho, y el ángel de Dios llamó a Agar desde 

los cielos, y le dijo: ¿Qué tienes, Agar? No 

temas, porque ’Elohim ha oído la voz del 

muchacho en donde está.

18

 ¡Levántate!  Alza  al  muchacho  y  sos-

tenlo con tu mano, porque haré de él una 

gran nación.

19

 Y  ’Elohim  le  abrió  los  ojos  y  vio  un 

pozo de agua. Y fue, llenó el odre de agua 

y dio a beber al muchacho.

20

 Y estuvo ’Elohim con el muchacho, el 

cual creció y habitó en el desierto y fue 

tirador de arco.

21

 Y habitó en el desierto de Parán, y su 

madre tomó para él una mujer de la tierra 

de Egipto.

Pacto de Abraham con Abimelec

22

 Sucedió  en  aquel  tiempo  que  Abime-

lec° y Ficol, capitán de su ejército, se diri-

gieron a Abraham diciendo: ’Elohim está 

contigo en todo lo que tú haces.

23

 Ahora, pues, júrame aquí por ’Elohim, 

que  no  me  engañarás,  ni  a  mí,  ni  a  mi 

hijo,  ni  a  mi  posteridad.  Conforme  a  la 

misericordia que he obrado contigo, haz 

conmigo y con la tierra en que estás como 

forastero.

20.16 Heb. kesut ‘eynayim = velo de ojos. Expresión tipológica que en el campo jurídico conlleva la idea de que nadie se 

atreve ría  a  pensar  mal  de  ella,  y  su  honor  quedaría  a  salvo

21.2 

→He.11.11.  21.4  →Gn.17.12;  Hch.7.8.  21.6  Es  decir, 

Dios me ha hecho regocijar. Todo el que lo oiga se regocijará conmigo

21.9 Heb. metzajeq. Es decir, ridiculizaba a Isaac. La 

estructura verbal indica intensidad de una acción acompañada del deseo de hacerla notoria ante otros. 

21.10 

→Gá.4.29-30. 

21.12 

→Ro.9.7; He11.18.  21.14 Al S de Canaán.  21.16 Esto es, Agar.  21.22 →Gn.26.26.


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Génesis 22:17

21

24

 Y dijo Abraham: Yo lo juro.

25

 Pero Abraham se quejó ante Abimelec 

por causa de un pozo de agua del cual se 

habían  apoderado  los  siervos  de  Abime-

lec.

26

 Y dijo Abimelec: No sé quién pudo ha-

ber hecho tal cosa, y además, ni tú me ha-

bías informado ni yo lo había oído hasta 

hoy.

27

 Entonces tomó Abraham un rebaño y 

una vacada y se las dio a Abimelec, y am-

bos concertaron un pacto.

28

 Separó Abraham siete corderas del re-

baño,

29

 y dijo Abimelec a Abraham: ¿Qué son 

estas siete corderas que has puesto apar-

te?

30

 Y dijo: Que tomarás de mi mano estas 

siete corderas a fin de que me seas testigo 

de que cavé este pozo.

31

 Por  tanto  se  llamó  aquel  lugar  Beer-

seba,° pues ambos se juramentaron allí.

32

 Pactaron, pues, en Beer-seba, y levan-

tándose  Abimelec  y  Ficol,  capitán  de  su 

ejército,  regresaron  a  tierra  de  los  filis-

teos.

33

 Y  plantó  un  tamarisco  en  Beerseba, 

e  invocó  allí  el  nombre  de  YHVH  ’El-

Olam.°

34

 Y Abraham habitó como forastero mu-

chos días en tierra de los filisteos.

El sacrificio

22

Aconteció  después  de  estas  cosas 

que  ’Elohim  probó  a  Abraham,  y 

le  dijo:  ¡Abraham!  Él  respondió:  Heme 

aquí.

2

 Y dijo: Toma ahora a tu hijo, tu único, a 

Isaac, a quien amas, y ve a tierra de Mo-

riah,°  y  tú  mismo  sacrifícalo  allí  en  ho-

locausto sobre uno de los montes que Yo 

te diré.

3

 Y Abraham se levantó temprano por la 

mañana, enalbardó su asno y tomó con-

sigo a dos de sus mozos y a su hijo Isaac. 

Luego cortó troncos para el holocausto, 

se levantó, y se fue al lugar que le había 

dicho ’Elohim.

4

 Al  tercer  día  Abraham  alzó  sus  ojos,  y 

divisó el lugar desde lejos.

5

 Y dijo Abraham a sus mozos: Permane-

ced aquí con el asno, que yo y el mucha-

cho iremos hasta allí y nos postraremos.° 

Después regresaremos con vosotros.

6

 Tomó entonces Abraham los troncos del 

holocausto y los cargó sobre su hijo Isaac, 

luego tomó en su mano el fuego y el cu-

chillo. Y ambos iban juntos.

7

 E Isaac habló a su padre Abraham, di-

ciendo: Padre mío. Y él respondió: Heme 

aquí, hijo mío. Y le dijo: Mira, está el fue-

go y los troncos, pero ¿dónde está el cor-

dero para el holocausto?

8

 Dijo  Abraham:  ’Elohim  se  proveerá  el 

cordero  para  el  holocausto,  hijo  mío.  Y 

ambos iban juntos.

9

 Cuando  llegaron  al  lugar  que  ’Elohim 

le había dicho, Abraham construyó allí el 

altar y preparó los troncos. Luego ató° a 

su hijo Isaac, y lo puso sobre el altar,° en-

cima de los troncos.

10

 Y extendió Abraham su mano, y tomó 

el cuchillo para degollar a su hijo.

11

 Pero el ángel de YHVH lo llamó desde 

los cielos, y le dijo: ¡Abraham! ¡Abraham! 

Y él dijo: ¡Heme aquí!

12

 No  extiendas  tu  mano  contra  el  mu-

chacho ni le hagas nada, le dijo, pues ya 

conozco que eres temeroso de Dios, por 

cuanto no me rehusaste a tu hijo, tu úni-

co.

13

 Entonces alzó Abraham los ojos, y he 

aquí, vio un carnero detrás, trabado por 

los cuernos en el zarzal. Y Abraham fue 

y tomó el carnero, y lo sacrificó en holo-

causto en lugar de su hijo.°

14

 Y llamó Abraham a aquel lugar YHVH 

Yireh. Por eso se dice hoy: En el monte 

donde YHVH será visto.°

15

 Y el ángel de YHVH llamó a Abraham 

por segunda vez desde los cielos,

16

 y dijo: Por mí mismo he jurado, orácu-

lo° de YHVH: Por cuanto has hecho esto, 

y no has rehusado a tu hijo, tu único,

17

 ciertamente  te  bendeciré,  y  multipli-

caré°  inmensamente  tu  descendencia, 

21.31 Heb. Beer-sheba = Pozo de siete o Pozo del juramento.  21.33 ’El­Olam 

→ § 5.  22.2 Lugar del templo de Salomón en el 

Monte Sión 

→2 Cr.3.1.  22.5 nos postraremos. Es decir, adoraremos.  22.9 Heb. aqad = ató. Palabra registrada por única vez en 

el TM. 

22.9 

→Jac.2.21.  22.13 →He.11.17-19.  22.14 El TM (aquí corregido) registra la voz pasiva, y juega con dos formas del 

mismo verbo: YHVH provee… o: en el monte de YHVH será visto (con el significado de aparecerse, mostrarse). LXX, VUL y Siríaca 

registran la voz activa YHVH verá

22.16 

→Gá.3.8.  22.16-17 →He.6.13-14.


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Génesis 22:18

22

como las estrellas de los cielos y como la 

arena que hay en la orilla del mar,° y tu 

descendencia  poseerá  la  puerta°  de  sus 

enemigos,

18

 y en tu simiente serán benditas todas 

las naciones de la tierra,° por cuanto has 

obedecido a mi voz.

19

 Y regresó Abraham a sus mozos. Luego 

se levantaron y fueron juntos hacia Beer-

seba. Y habitó Abraham en Beer-seba.

Familia de Nacor

20

 Después  de  estas  cosas,  ocurrió  que 

se informó a Abraham, diciendo: He aquí 

que también Milca ha dado hijos a Nacor 

tu hermano:

21

 a Uz su primogénito, a Buz hermano 

de éste, a Kemuel, padre de Aram,

22

 y a Quesed, a Hazo, a Pildas, a Jidlaf y 

a Betuel.

23

 Y  Betuel  engendró  a  Rebeca.  Estos 

ocho dio a luz Milca a Nacor, hermano de 

Abraham.

24

 Y su concubina, cuyo nombre era Reú-

ma, también dio a luz a Tebah, a Gaham, 

a Tahas y a Maaca.

Muerte de Sara 

La cueva de la Makpelah

23

Y vivió Sara ciento veintisiete años. 

Tantos fueron los años de la vida de 

Sara.

2

 Y  murió  Sara  en  Quiriat-Arba,  que  es 

Hebrón,  en  tierra  de  Canaán,  y  acudió 

Abraham para hacer duelo por Sara y llo-

rar por ella.

3

 Y  se  levantó  Abraham  de  junto  a  su 

difunta,  y  habló  a  los  hijos  de  Het,  di-

ciendo:

4

 Forastero y extranjero soy yo entre vo-

sotros,°  dadme  propiedad  de  sepultura 

entre vosotros,° y sepultaré a mi difunta 

lejos de mi presencia.

5

 Y los hijos de Het respondieron a Abra-

ham, diciéndole:

6

 Óyenos,  señor  mío,  tú  eres  en  medio 

de nosotros un príncipe de ’Elohim. Se-

pulta a tu difunta en lo más escogido de 

nuestros sepulcros. Ninguno de nosotros 

te negará su sepulcro para sepultar a tu 

difunta.

7

 Pero  Abraham  se  levantó  y  se  postró 

ante el pueblo de aquella tierra, ante los 

hijos de Het,

8

 y les habló, diciendo: Si tenéis voluntad 

de  que  yo  sepulte  a  mi  difunta  lejos  de 

mi presencia, oídme e interceded por mí 

ante Efrón, hijo de Zoar,

9

 para que me dé la cueva de la Makpelah° 

que  tiene  al  final  de  su  campo,  que  por 

plata cabal° me la dé como propiedad de 

sepultura entre vosotros.

10

 Y Efrón habitaba en medio de los hi-

jos de Het. Y respondió Efrón el heteo a 

Abraham, a oídos de los hijos de Het, y de 

todos los que entraban por la puerta de su 

ciudad, diciendo:

11

 No, señor mío, ¡óyeme! Te doy el cam-

po, y la cueva que está en ella, te la doy 

en  presencia  de  los  hijos  de  mi  pueblo. 

Sepulta a tu difunta.

12

 Pero Abraham se postró ante el pueblo 

de aquella tierra,

13

 y  habló  a  Efrón  ante  el  pueblo  de 

aquella  tierra,  diciendo:  ¡Ojalá  que  tan 

sólo  me  escuches!  Te  doy  el  valor  del 

campo,  acéptamelo,  y  sepultaré  mi  di-

funta allí.

14

 Y Efrón respondió a Abraham, dicién-

dole:

15

 Señor mío, óyeme: ¿Qué es entre tú y 

yo una parcela de cuatrocientos siclos de 

plata? Entierra, pues, a tu difunta.

16

 Y atendió Abraham a Efrón. Y le pesó 

Abraham a Efrón la plata que había dicho 

a oídos de los hijos de Het, cuatrocientos 

siclos de plata corriente entre los merca-

deres.

17

 Y se estableció el campo de Efrón, que 

está en la Makpelah delante de Mamre. El 

campo, y la cueva que estaba en él, y toda 

la arboleda que está alrededor del campo 

en todo su límite,

18

 quedaron  en  posesión  de  Abraham,  a 

la vista de los hijos de Het y de todos los 

que entraban por la puerta de su ciudad.

19

 Después  de  esto,  sepultó  Abraham  a 

Sara su mujer en la cueva del campo de 

22.17 

→He.11.12.  22.17 Esto es, las ciudades.  22.18 →Hch.3.25.  23.4 →He.11.9-13.  23.4 →Hch.7.16.  23.9 Lugar de 

sepultura de los patriarcas identificado con Haram-el Jalil en Hebrón 

→Gn.25.9, 35.29, 49.31 y 50.13.  23.9 Es decir, por 

monedas de plata de valor genuino.


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Génesis 24:25

23

la Makpelah, frente a Mamre, que es He-

brón, en tierra de Canaán.

20

 Y el campo, y la cueva que estaba en él, 

fue escogido como posesión de Abraham, 

como propiedad de sepultura, procedente 

de los hijos de Het.

El siervo y Rebeca

24

Era Abraham anciano, entrado en 

días,  y  YHVH  había  bendecido  a 

Abraham en todo.

2

 Y dijo Abraham a su siervo, el más an-

tiguo de su casa, el cual gobernaba todo 

lo que tenía: Pon ahora tu mano bajo mi 

muslo,

3

 y  te  haré  jurar  por  YHVH,  Dios  de  los 

cielos y Dios de la tierra, que no tomarás 

para mi hijo mujer de las hijas de los ca-

naneos, en medio de los cuales yo habito,

4

 sino que irás a mi tierra y a mi parentela 

y tomarás mujer para mi hijo Isaac.

5

 Y el siervo le dijo: Quizá esa mujer no 

consienta en venir tras de mí a esta tierra. 

¿He de hacer volver a tu hijo a la tierra de 

donde saliste?

6

 Entonces Abraham le dijo: Guárdate de 

no hacer volver a mi hijo allá.

7

 YHVH, Dios de los cielos, que me tomó 

de la casa de mi padre y de la tierra de mi 

parentela, y me habló y me juró diciendo: 

A tu descendencia daré esta tierra, Él mis-

mo enviará su ángel delante de ti y de allá 

tomarás mujer para mi hijo.

8

 Y si la mujer no consiente en venir tras 

de  ti,  entonces  quedarás  desligado°  de 

éste, mi juramento, pero no hagas volver 

a mi hijo allá.

9

 Entonces  el  siervo  puso  su  mano  bajo 

el muslo de su señor Abraham y le juró 

sobre este asunto.

10

 Y tomó el siervo diez camellos de en-

tre los camellos de su señor, y partió con 

todo  lo  bueno  de  su  señor  en  su  mano. 

Se levantó, pues, y se fue a Aram Nahara-

yim,° a la ciudad de Nacor.

11

 Y  en  las  afueras  de  la  ciudad,  hizo 

arrodillar los camellos junto a un pozo de 

agua, al tiempo del atardecer, al momen-

to en que salen las aguadoras,

12

 y dijo: ¡YHVH, Dios de mi señor Abra-

ham,  haz  que  hoy  me  suceda,  te  ruego, 

haz misericordia a mi señor Abraham!

13

 He  aquí,  yo  estoy  junto  a  una  fuente 

de agua, y las hijas de los habitantes de la 

ciudad salen a sacar agua.

14

 Sea, pues, que la joven a quien yo diga: 

Inclina tu cántaro, te ruego, y beberé, y 

ella  responda:  Bebe,  y  también  abrevaré 

tus  camellos,  ésa  sea  la  que  designaste 

para tu siervo Isaac, y por ella sabré que 

has hecho misericordia con mi señor.

15

 Y  aconteció  que  antes  que  él  acabara 

de hablar, he aquí Rebeca, la cual le había 

nacido a Betuel, hijo de Milca, mujer de 

Nacor, hermano de Abraham, iba llegan-

do con su cántaro al hombro.

16

 Y la muchacha era de apariencia muy 

hermosa,  virgen,  a  la  que  ningún  varón 

había conocido. Y descendiendo a la fuen-

te, llenó su cántaro y subió.

17

 Entonces el siervo corrió a su encuen-

tro, y le dijo: Te ruego que me des a beber 

un poco de agua de tu cántaro.

18

 Ella dijo: Bebe, señor mío. Y se apre-

suró a bajar el cántaro sobre su mano y le 

dio de beber.

19

 Cuando  acabó  de  darle  de  beber,  dijo 

entonces: También sacaré para tus came-

llos hasta que acaben de beber.

20

 Y se apresuró y vació su cántaro en el 

abrevadero, y corrió otra vez al pozo para 

sacar agua y sacó para todos sus camellos.

21

 El hombre, fijando la vista° en ella, ca-

llaba, para saber si YHVH había prospera-

do o no su camino.

22

 Y  aconteció  que  cuando  los  camellos 

acabaron  de  beber,  tomó  el  hombre  un 

arete  de  oro  que  pesaba  medio  siclo,°  y 

dos brazaletes de oro que pesaban diez,

23

 y  le  preguntó:  ¿De  quién  eres  hija? 

Dime te ruego: ¿Hay lugar en casa de tu 

padre para que nosotros pasemos la no-

che?

24

 Y ella le dijo: Yo soy hija de Betuel, el 

hijo de Milca que dio a luz a Nacor.

25

 Y añadió: También hay en nuestra casa 

paja,  también  mucho  forraje,  también° 

lugar para pasar la noche.

24.8 Lit. serás inocente.  24.10 Región situada en la alta Mesopotamia, entre el Tigris y el Éufrates.  24.21 Heb. mishta´eh = 

contemplar quedándose maravillado

24.22 O: bega, antigua moneda israelí de unos 5,7 gr.  24.25 Primero de los doce casos 

donde la palabra también se registra tres veces en un mismo v. 

→Gn.32.19, 43.8, Ex.4.10, 12.32, Jue.8.22, 1 S.28.6, 1 Cr.11.2, 

Ecl.9.6, Is.48.8, Jer.12.6 y 23.11.


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Génesis 24:26

24

26

 Entonces el hombre hizo reverencia y 

se postró ante YHVH,

27

 y dijo: Bendito sea YHVH, Dios de mi 

señor  Abraham,  que  no  apartó  su  mise-

ricordia  y  su  fidelidad  hacia  mi  señor,  y 

puesto yo en camino, me condujo YHVH 

a casa de los hermanos de mi señor.

28

 Entonces la muchacha echó a correr y 

refirió estas cosas en casa de su madre.

29

 Tenía  Rebeca  un  hermano  llamado 

Labán,° el cual corrió hacia el que estaba 

fuera, junto a la fuente;

30

 y cuando Labán vio el arete y los bra-

zaletes en las muñecas de su hermana, y 

oyó las palabras de su hermana Rebeca di-

ciendo: Así me habló este hombre; corrió 

a éste, quien, por cierto, permanecía con 

los camellos junto a la fuente,

31

 y le dijo: Entra, bendito de YHVH, ¿por 

qué te quedas afuera?, pues yo he prepa-

rado la casa y lugar para los camellos.

32

 Entonces el hombre entró en la casa, 

y él le desató los camellos, y les dio paja 

y  forraje  a  los  camellos.  También  le  dio 

agua para lavar sus pies, y los pies de los 

hombres que estaban con él.

33

 Y  fue  preparado  ante  él  para  comer, 

pero dijo: No comeré hasta que haya ex-

presado mis palabras. Y dijo: ¡Habla!

34

 Dijo, pues: Yo soy siervo de Abraham,

35

 y  YHVH  ha  bendecido  mucho  a  mi 

señor,  y  se  ha  engrandecido,  pues  le  ha 

dado ovejas y vacadas, plata y oro, siervos 

y siervas, y camellos y asnos.

36

 Y Sara, mujer de mi señor, dio a luz en 

su vejez un hijo a mi señor, quien le ha 

dado todo lo que posee.

37

 Ahora bien, mi señor me ha juramen-

tado, diciendo: No tomarás para mi hijo 

mujer  de  las  hijas  del  cananeo,  en  cuya 

tierra yo habito,

38

 sino que irás a casa de mi padre y a mi 

familia, y tomarás mujer para mi hijo.

39

 Y yo dije a mi señor: Quizá la mujer no 

quiera seguirme.

40

 Y me contestó: YHVH, en cuya presen-

cia he andado, enviará a su ángel contigo 

y  prosperará  tu  camino,  y  podrás  tomar 

mujer para mi hijo de entre mi familia y 

de la casa de mi padre.

41

 Entonces,  cuando  hayas  llegado  a 

mi  familia,  quedarás  desligado°  de  mi 

imprecación.  Así  que,  si  no  quieren 

dártela, habrás quedado libre de mi im-

precación.

42

 Así, pues, llegué hoy a la fuente y dije: 

YHVH, Dios de mi señor Abraham, si está 

en ti, te ruego que hagas prosperar mi ca-

mino por el cual yo ando.

43

 Heme aquí de pie junto a la fuente del 

agua. Sea, pues, que la doncella que salga 

a sacar agua, a quien yo le diga: Te ruego 

que me des a beber un poco de agua de 

tu cántaro,

44

 y me conteste: Bebe tú mismo, y tam-

bién  sacaré  para  tus  camellos,  sea  ésta 

la mujer que YHVH ha destinado para el 

hijo de mi señor.

45

 Y antes que yo acabara de hablar en mi 

corazón, he aquí Rebeca salía con su cán-

taro al hombro descendiendo a la fuente. 

Cuando  sacó  agua,  entonces  le  dije:  Te 

ruego que me des de beber.

46

 Y se apresuró y bajó su cántaro sobre 

sí, y respondió: Bebe, y también abrevaré 

tus camellos. Y bebí, y ella abrevó los ca-

mellos.

47

 Y le pregunté diciendo: ¿De quién eres 

hija? Y respondió: Soy hija de Betuel, el 

hijo de Nacor que le dio a luz Milca. En-

tonces  le  puse  el  arete  en  la  nariz  y  los 

brazaletes en sus manos.

48

 E  hice  reverencia  y  me  postré  ante 

YHVH,  y  bendije  a  YHVH,  Dios  de  mi 

señor Abraham, que me había conduci-

do por camino recto a fin de tomar a la 

hija° del hermano de mi señor para su 

hijo.

49

 Ahora, pues, si está en vosotros que ha-

gáis misericordia y verdad con mi señor, 

declarádmelo, y si no, declarádmelo, y me 

encaminaré a derecha o a izquierda.

50

 Y  respondiendo  Labán  y  Betuel,  dije-

ron: De parte de YHVH ha salido el asun-

to. No podemos decirte ni mal ni bien.

51

 Ahí está Rebeca delante de ti, tómala y 

vete, y sea la mujer del hijo de tu señor, 

como lo tiene ordenado YHVH.

52

 Cuando el siervo de Abraham oyó sus 

palabras, se postró en tierra ante YHVH.

24.29 Esto es, blanco.  24.41 Lit. serás inocente.  24.48 Aquí Rebeca es llamada hija, aunque era la nieta de Nacor, el hermano 

de Abraham.


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Génesis 25:16

25

53

 Después sacó el siervo alhajas de plata 

y objetos de oro, y vestidos, y se los dio a 

Rebeca. También dio valiosos regalos a su 

hermano y a su madre.

54

 Después comieron y bebieron, él y los 

que lo acompañaban, y pasaron la noche. 

Levantándose de mañana, dijo: Enviadme 

a mi señor.

55

 A lo cual dijo el hermano de ella y su 

madre: Permanezca la doncella con noso-

tros algunos días, a lo menos diez, y des-

pués se irá.

56

 Pero él les dijo: No me retraséis, pues 

YHVH  ha  hecho  prosperar  mi  camino. 

Enviadme y podré ir a mi señor.

57

 Y dijeron ellos: Llamemos a la donce-

lla y preguntémosle de su propia boca.

58

 Llamaron a Rebeca y le dijeron: ¿Irás 

tú  con  este  hombre?  Ella  respondió: 

Iré.

59

 Entonces  despidieron  a  su  hermana 

Rebeca, a su nodriza, y al siervo de Abra-

ham y a sus hombres.

60

 Y  bendijeron  a  Rebeca  y  le  dijeron: 

¡Hermana nuestra, sé madre° de miles de 

millares, y que tus descendientes posean 

la puerta de sus enemigos!

61

 Y se levantó Rebeca con sus doncellas, 

montaron sobre los camellos y siguieron 

al  hombre.  Y  el  siervo  tomó  a  Rebeca  y 

se fue.

62

 Mientras  tanto,°  Isaac  regresaba  de 

una ida al pozo de Lajai-Roi,° pues él ha-

bitaba en la región del Neguev.

63

 E Isaac había salido a meditar al cam-

po, al atardecer. Y alzando sus ojos, miró 

y he aquí unos camellos que venían.

64

 Rebeca alzó sus ojos, vio a Isaac, y de-

jándose caer de lo alto del camello,

65

 dijo al siervo: ¿Quién es ese varón que 

viene por el campo a nuestro encuentro? 

El siervo dijo: Es mi señor. Entonces ella 

tomó el velo y se cubrió.

66

 Y  el  siervo  le  contó  a  Isaac  todas  las 

cosas que había hecho.

67

 E Isaac la introdujo en la tienda de su 

madre Sara y tomó a Rebeca por mujer, y 

la amó. E Isaac fue consolado después de 

lo de su madre.

Hijos de Abraham y Cetura 

Muerte de Abraham

25

Abraham  volvió  a  tomar  una  mu-

jer, cuyo nombre era Cetura,

2

 la cual le dio a luz a Zimram, a Jocsán, a 

Medán, a Madián, a Isbac y a Súa.

3

 Y Jocsán engendró a Seba y a Dedán. Hi-

jos de Dedán fueron los asuritas, letusitas 

y leumitas,

4

 y los hijos de Madián fueron Efa, Efer, 

Hanoc, Abida y Elda. Todos estos fueron 

descendientes de Cetura.

5

 Pero Abraham dio todo cuanto tenía a 

Isaac.

6

 Y a los hijos de las concubinas que Abra-

ham había tenido, les dio regalos, y mien-

tras vivía, los envió al oriente, lejos de su 

hijo Isaac, a la tierra oriental.°

7

 Y los días de los años que vivió Abraham 

fueron ciento setenta y cinco años.

8

 Expiró, pues, Abraham, y murió en bue-

na  vejez,  anciano  y  satisfecho.  Y  fue  re-

unido a su pueblo.

9

 Y sus hijos Isaac e Ismael lo sepultaron 

en la cueva de la Makpelah, en el campo 

de Efrón hijo de Zoar el heteo, que estaba 

enfrente de Mamre,

10

 el campo que Abraham había compra-

do a los hijos de Het.° Allí fue sepultado 

Abraham junto a Sara su mujer.

11

 Sucedió  después  de  la  muerte  de 

Abraham,  que  ’Elohim  bendijo  a  Isaac 

su hijo. E Isaac habitó junto al pozo de 

Lajai-Roi.

Descendencia de Ismael

12

 Estos son los descendientes de Ismael, 

hijo  de  Abraham,  que  Agar  la  egipcia, 

sierva de Sara, le dio a luz a Abraham.

13

 Estos,  pues,  son  los  nombres  de  los 

hijos de Ismael nombrados según su na-

cimiento: el primogénito de Ismael, Ne-

baiot, después, Cedar, Adbeel, Mibsam,

14

 Misma, Duma, Massa,

15

 Hadar, Tema, Jetur, Nafis y Cedema.

16

 Estos  son  los  hijos  de  Ismael  y  estos 

son sus nombres, por sus poblados y por 

sus  campamentos:  doce  príncipes  según 

sus naciones.

24.60 .madre.  24.62 La relación entre el verbo heb. vayelej = y se fue y el verbo heb. ba = venía, (final v. 61 y principio v. 62) 

denota la sincronización de ambas acciones. De allí la traducción mientras tanto

24.62 Esto es, el Viviente que me ve.  25.6 

Prob. hacia Damasco, al NE de Israel. 

25.10 

→Gn.23.3-16.


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Génesis 25:17

26

17

 Los  años  de  la  vida  de  Ismael  fueron 

ciento treinta y siete años, y expiró Ismael 

y murió, y fue reunido a su pueblo.

18

 Y  se  había  establecido°  desde  Havila 

hasta  Shur,  que  está  enfrente  de  Egipto 

en dirección a Asiria. Y habitó° enfrenta-

do° a todos sus hermanos.

Jacob y Esaú

19

 Estos  son  los  descendientes  de  Isaac, 

hijo  de  Abraham.  Abraham  engendró  a 

Isaac.

20

 Y  era  Isaac  de  cuarenta  años  cuando 

tomó por mujer a Rebeca, hija de Betuel, 

el  arameo,  de  Padan-aram,  hermana  de 

Labán, el arameo.

21

 Y suplicó Isaac ante YHVH por su mu-

jer,  que  era  estéril.  Y  YHVH  atendió  el 

ruego, y concibió Rebeca su mujer.

22

 Pero  como  los  hijos  luchaban  dentro 

de  ella,  dijo:  Si  es  así,  ¿para  qué  quiero 

vivir? Y fue a consultar a YHVH.

23

 Y le dijo YHVH:

Dos naciones hay en tu vientre,

Y dos pueblos están siendo divididos 

aun desde tus entrañas.

Un pueblo será más fuerte que el 

otro pueblo,

Y el mayor servirá al menor.°

24

 Cuando se cumplieron sus días para dar 

a luz, he aquí había gemelos en su vientre.

25

 Y  salió  el  primero,  pelirrojo,  todo  él 

velludo como una pelliza, y llamaron su 

nombre Esaú.

26

 Después  salió  su  hermano  con  su 

mano asida al talón de Esaú, y llamó su 

nombre Jacob. Y era Isaac de sesenta años 

cuando los engendró.

27

 Y los muchachos crecieron. Y Esaú lle-

gó a ser hombre diestro en la caza, hombre 

del campo, mientras que Jacob era hombre 

tranquilo, que habitaba en tiendas.

28

 Y prefería Isaac a Esaú porque la caza 

de éste era deleitosa a su boca, pero Rebe-

ca amaba a Jacob.

La primogenitura

29

 Y  llegando  Esaú  cansado  del  campo, 

vio que Jacob cocinaba un guiso.

30

 Entonces dijo Esaú a Jacob: Te ruego, 

déjame engullir de eso rojo,° porque estoy 

desfallecido. (Por eso le llaman Edom°).

31

 Respondió Jacob: Véndeme hoy tu pri-

mogenitura.

32

 Entonces  dijo  Esaú:  Igual  me  voy  a 

morir. ¿De qué me sirve la primogenitu-

ra?

33

 Y dijo Jacob: ¡Júramelo hoy! Y le juró, 

y vendió su primogenitura° a Jacob.

34

 Entonces  Jacob  dio  a  Esaú  pan  con 

potaje de lentejas, y él comió y bebió, se 

levantó y se fue. Así despreció Esaú la pri-

mogenitura.

Isaac en Gerar

26

Hubo  hambre  en  aquella  tierra 

(distinta  de  aquella  primera  ham-

bruna  en  los  días  de  Abraham),  e  Isaac 

fue a Gerar, donde Abimelec era rey de los 

filisteos.

2

 Y se le apareció YHVH, y le dijo: No bajes 

a Egipto, mora en la tierra que Yo te diré.

3

 Habita como forastero en esta tierra, y 

estaré  contigo,  y  te  bendeciré,  porque  a 

ti y a tu simiente daré todas estas tierras, 

y confirmaré el juramento que juré a tu 

padre Abraham.

4

 Multiplicaré  tu  descendencia  como  las 

estrellas  de  los  cielos,  daré  a  tu  descen-

dencia todas estas tierras, y todas las na-

ciones  de  la  tierra  serán  benditas  en  tu 

simiente,°

5

 por cuanto Abraham oyó mi voz y guar-

dó mi precepto, mis mandamientos, mis 

estatutos y mis leyes.

6

 Habitó, pues, Isaac en Gerar.

7

 Y los hombres del lugar le preguntaron 

acerca de su mujer, y él dijo: Ella es mi 

hermana,° pues temió decir: Es mi mujer 

(no fueran a matarle los hombres del lu-

gar a causa de Rebeca, ya que era ella de 

hermosa apariencia).

8

 Pasado  allí  bastante  tiempo,  Abimelec, 

rey  de  los  filisteos,  mirando  por  la  ven-

tana  vio  a  Isaac,  y  he  aquí  acariciaba°  a 

Rebeca, su mujer.

9

 Y  llamando  Abimelec  a  Isaac,  le  dijo: 

Mira, ciertamente ella es tu mujer. ¿Cómo 

25.18 Lit. y se establecieron.  25.18 Esto es, ocupar un lugar, instalarse 

→Jue.7.12.  25.18 →16.12.  25.23 →Ro.9.12.  25.30 Es 

decir,  del  potaje  rojo.  Aquí,  y  en  los  subsiguientes  pasajes,  es  de  destacar  el  uso  chabacano  que  Esaú  exhibe  del  idio-

ma  hebreo. 

25.30  El  nombre  Edom  deriva  de  la  palabra  ‘adom  =  rojo.  25.33 

→Hch.12.16.  26.3-4  →Gn.22.16-18. 

26.7 

→Gn.12.13; 20.2.  26.8 Lit. jugueteaba.


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Génesis 27: 1

27

pues, dijiste: Es mi hermana? E Isaac le 

respondió: Porque me dije: No sea que yo 

muera por su causa.

10

 Y Abimelec dijo: ¿Por qué nos has hecho 

esto? ¡Cuán fácilmente alguno del pueblo 

hubiera podido acostarse con tu mujer, y 

así habrías traído culpa sobre nosotros!

11

 Por  lo  cual  mandó  Abimelec  a  todo 

su pueblo, diciendo: El que toque a este 

hombre  o  a  su  mujer,  ciertamente  será 

muerto.

Los pozos de Isaac

12

 Sembró Isaac en aquella tierra, y aquel 

mismo año cosechó ciento por uno, por-

que YHVH lo bendijo.

13

 Y aquel varón se engrandeció, y conti-

nuó engrandeciéndose hasta hacerse muy 

poderoso.

14

 Y  tuvo  rebaño  de  ovejas,  hato  de  ga-

nado  y  gran  servidumbre,  tanto  que  los 

filisteos le tuvieron envidia,

15

 de  modo  que  todos  los  pozos  que 

habían  cavado  los  criados  en  días  de  su 

padre  Abraham,  los  cegaron  los  filisteos 

llenándolos de tierra.

16

 Y  dijo  Abimelec  a  Isaac:  Apártate  de 

nosotros porque te has hecho mucho más 

poderoso que nosotros.

17

 E  Isaac  se  fue  de  allí  y  acampó  en  la 

vaguada de Gerar, y habitó allí.

18

 Luego Isaac volvió a abrir los pozos de 

agua que habían cavado en los días de su 

padre Abraham, y que los filisteos habían 

cegado después de la muerte de Abraham, 

y los llamó con los mismos nombres que 

les había puesto su padre.

19

 Y  los  siervos  de  Isaac  cavaron  en  la 

vaguada,  y  encontraron  allí  un  pozo  de 

aguas vivas.

20

 Pero los pastores de Gerar riñeron con 

los pastores de Isaac, diciendo: El agua es 

nuestra. Por eso llamó el nombre del pozo 

Eseq,° porque habían altercado por él.

21

 Y abrieron otro pozo, y también riñe-

ron por él, y llamó su nombre Sitna.°

22

 Se apartó entonces de allí y abrió otro 

pozo,  y  por  éste  no  riñeron.  Y  lo  llamó 

Rehobot° diciendo: YHVH nos ha hecho 

ensanchar, y fructificaremos en la tierra.

23

 De allí subió a Beer-seba,

24

 y aquella noche se le apareció YHVH, y 

dijo: Yo soy el Dios de tu padre Abraham, 

no  temas,  que  estoy  contigo.  Te  bende-

ciré,  y  multiplicaré  tu  descendencia  por 

amor de mi siervo Abraham.

25

 Entonces  edificó  allí  un  altar  e  invo-

có  el  nombre  de  YHVH,  y  plantó  allí  su 

tienda. Y los siervos de Isaac cavaron allí 

un pozo.

26

 Abimelec° fue a él desde Gerar, con su 

allegado  Ahuzat,  y  Ficol,  capitán  de  su 

ejército.

27

 Isaac les dijo: ¿Por qué venís a mí, si 

me habéis aborrecido y echado de entre 

vosotros?

28

 Le  respondieron:  Ciertamente  hemos 

visto  que  YHVH  está  contigo,  y  hemos 

pensado interponer un juramento solem-

ne entre nosotros, entre tú y nosotros, y 

concertaremos un pacto contigo

29

 de  que  no  nos  harás  daño,  así  como 

nosotros  no  te  hemos  tocado,  y  sólo  te 

hemos hecho bien y despedido en paz. Tú 

eres ahora el bendito de YHVH.

30

 Entonces él les ofreció un banquete, y 

comieron y bebieron.

31

 Por la mañana se levantaron temprano 

y se juramentaron el uno al otro, y despi-

diéndolos  Isaac,  partieron  de  su  lado  en 

paz.

32

 Aquel mismo día sucedió que vinieron 

los  siervos  de  Isaac  trayéndole  noticias 

del pozo que habían cavado, y le dijeron: 

¡Hemos encontrado agua!

33

 Y lo llamó Seba,° por lo cual el nombre 

de aquella ciudad es Beerseba hasta este 

día.

34

 Era  Esaú  de  cuarenta  años  cuando 

tomó  por  mujer  a  Judit,  hija  del  heteo 

Beeri, y a Bosemat, hija del heteo Elón.

35

 Y fueron causa de mucha amargura a 

Isaac y Rebeca.

La bendición de Isaac

27

Aconteció  que  envejeció  Isaac,  y 

sus ojos se debilitaron hasta no ver. 

Entonces llamó a Esaú su hijo mayor, y 

le  dijo:  Hijo  mío.  Y  él  respondió:  Heme 

aquí.

26.20 Heb. aseq = altercar o reñir.  26.21 Esto es, rivalidad.  26.22 Esto es, anchos.  26.26 

→Gn.21.22.  26.33 De la raíz shaba 

= jurarBeer­seba = Pozo del Juramento.


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Génesis 27:2

28

2

 Le dijo: He aquí ahora soy viejo, no sé el 

día de mi muerte,

3

 toma pues, ahora tus aparejos, tu arco 

y  aljaba,  sal  al  campo  y  cázame  alguna 

presa,°

4

 y  prepárame  manjares  como  a  mí  me 

gustan y tráemelos para que coma, a fin de 

que mi alma te bendiga antes que muera.

5

 Pero Rebeca estaba escuchando lo que 

Isaac decía a su hijo Esaú. Y cuando Esaú 

fue  al  campo  a  cazar  la  presa  que  había 

de traer,

6

 Rebeca habló a su hijo Jacob, diciendo: 

He aquí he oído a tu padre que decía a tu 

hermano Esaú:

7

 Tráeme una presa y prepárame manja-

res para que coma y te bendiga delante de 

YHVH antes que muera.

8

 Ahora pues, hijo mío, obedece mi voz en 

lo que te ordeno:

9

 Ve ahora al rebaño, y tráeme de allí dos 

cabritos de buenas cabras, para preparar 

con ellas manjares para tu padre, como a 

él le gusta,

10

 y tú lo llevarás a tu padre para que coma, 

y así te bendecirá antes de su muerte.

11

 Pero  Jacob  dijo  a  su  madre  Rebeca: 

Mira, mi hermano Esaú es un hombre ve-

lludo, y yo lampiño.

12

 Quizá  me  palpe  mi  padre  y  quedaré 

ante sus ojos como tramposo, y traeré so-

bre mí maldición y no bendición.

13

 Pero su madre le respondió: Hijo mío, 

tu maldición caiga sobre mí. Sólo obede-

ce mi voz, así que ve y tráemelos.

14

 Entonces él fue, tomó y llevó a su ma-

dre, y su madre los guisó como le gusta-

ban a su padre.

15

 Luego  tomó  Rebeca  los  vestidos  de 

Esaú  su  hijo  mayor,  los  más  deseables,° 

que tenía consigo en la casa, y vistió a Ja-

cob su hijo menor.

16

 Y con las pieles de los cabritos de las 

cabras, le cubrió sus manos y la parte lisa 

de su cuello.

17

 Luego puso en manos de su hijo Jacob 

los manjares que había preparado con el 

pan.

18

 Y él fue a su padre y dijo: Padre mío. Él 

respondió:  Heme  aquí,  ¿quién  eres,  hijo 

mío?

19

 Y dijo Jacob a su padre: Yo soy Esaú 

tu primogénito. He hecho como me ha-

blaste.  Levántate  te  ruego.  Siéntate  y 

come de mi caza, para que me bendiga 

tu alma.

20

 Entonces  dijo  Isaac  a  su  hijo:  ¡Qué 

pronto la has hallado, hijo mío! Y él con-

testó: Porque YHVH tu Dios me la puso 

al alcance.

21

 Pero dijo Isaac a Jacob: Acércate ahora 

para que te palpe hijo mío, si acaso eres 

tú mi hijo Esaú, o no.

22

 Se acercó Jacob a su padre Isaac, y él 

lo palpó y dijo: La voz es la voz de Jacob, 

pero las manos, las manos de Esaú.

23

 Y no lo reconoció, porque sus manos 

eran velludas como las de Esaú, y se dis-

puso a bendecirlo.

24

 Y  preguntó:  ¿Eres  tú  mi  hijo  Esaú? 

Contestó: Lo soy.

25

 Entonces dijo: Hijo mío, acércame la 

caza, para que coma y mi alma te bendi-

ga. Y él se la acercó, y comió, luego le sir-

vió vino y bebió.

26

 Entonces le dijo su padre Isaac: Acér-

cate y bésame hijo mío.

27

 Y él se acercó y lo besó, y al oler Isaac 

el aroma de sus vestidos, lo bendijo° di-

ciendo:

He aquí, el aroma de mi hijo,

Como el aroma del campo que ha 

bendecido YHVH.

28

    ’Elohim pues, te dé del rocío del 

cielo,

Y de las fertilidades de la tierra,

Y abundancia de grano y mosto.

29

    Pueblos te sirvan,

Y naciones se postren ante ti.

Sé señor de tus hermanos,

E inclínense ante ti los hijos de tu 

madre.

Malditos los que te maldigan,

Y benditos los que te bendigan.°

30

 Apenas  terminó  Isaac  de  bendecir  a 

Jacob, y no bien había salido Jacob de la 

presencia de su padre Isaac, su hermano 

Esaú llegó de su cacería.

31

 También él había preparado manjares 

y los traía a su padre. Y dijo a su padre: 

¡Levántese mi padre y coma de la caza de 

su hijo para que me bendiga tu alma!

27.3 Lit. caza.  27.15 Es decir, los vestidos que Jacob deseaba.  27.27-29 

→He.11.20.  27.29 →Gn.12.3.


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Génesis 28:9

29

32

 Y su padre Isaac le dijo: ¿Quién eres? Y 

él respondió: Yo soy tu hijo, tu primogé-

nito Esaú.

33

 Entonces se estremeció Isaac con gran 

estremecimiento,  y  exclamó:  ¿Quién, 

pues, es el que vino aquí, que cazó y me 

trajo de comer, y comí de todo antes de 

que tú vinieras? ¡Yo lo bendije, y será ben-

dito!

34

 Cuando Esaú oyó las palabras de su pa-

dre, dio un grito atroz, lleno de amargura, 

y pidió a su padre: ¡Bendíceme también a 

mí, padre mío!

35

 Pero él dijo: Vino tu hermano con as-

tucia y tomó tu bendición.

36

 Y dijo: Bien llamaron su nombre Jacob, 

pues  ya  me  ha  suplantado  dos  veces,  se 

alzó con mi primogenitura,° y mira, aho-

ra ha tomado mi bendición. Y añadió: ¿No 

has reservado una bendición para mí?

37

 E Isaac respondió y dijo a Esaú: He aquí 

lo he puesto por señor tuyo, y le he dado 

por siervos a todos sus hermanos. De trigo 

y de vino lo he provisto, entonces, ¿qué po-

dré hacer por ti ahora, hijo mío?

38

 Y dijo Esaú a su padre: Padre mío, ¿no 

tienes ni una sola bendición? ¡Bendíceme 

también a mí padre mío! Y Esaú alzó su 

voz y lloró.°

39

 E Isaac su padre respondió y le dijo:°

He aquí, sin la grosura de la tierra,

Y sin el rocío de los cielos de arriba 

será tu morada.

40

    Por tu espada vivirás,

Y a tu hermano servirás.

Pero sucederá que cuando te 

fortalezcas,

Sacudirás su yugo de tu cerviz.°

Huida de Jacob

41

 Y aborreció Esaú a Jacob por la bendi-

ción con que lo había bendecido su padre, 

y dijo Esaú en su corazón: Se acercan los 

días del luto de mi padre, entonces podré 

matar a Jacob mi hermano.

42

 Cuando  le  anunciaron  a  Rebeca  las 

palabras de Esaú su hijo mayor, envió a 

llamar  a  Jacob  su  hijo  menor,  y  le  dijo: 

Mira, tu hermano Esaú se consuela con la 

idea de matarte.°

43

 Ahora pues, hijo mío, obedece mi voz. 

Levántate y huye a Harán, adonde Labán, 

mi hermano,

44

 y mora con él algunos días hasta que 

se calme la furia de tu hermano,

45

 hasta que se aplaque la ira de tu her-

mano contra ti y olvide lo que le hiciste. 

Entonces te enviaré a traer de allá. ¿Por 

qué he de ser privada de vosotros dos en 

un solo día?

46

 Y  dijo  Rebeca  a  Isaac:  Estoy  hastiada 

de mi vida por causa de las hijas de Het. 

Si Jacob llega a tomar mujer de entre las 

hijas de Het, como éstas, de las hijas de 

esta tierra, ¿de qué me servirá ya la vida?

Bet-’El 

Mesopotamia

28

Así  pues  Isaac  llamó  a  Jacob  y  lo 

bendijo,  y  le  ordenó  diciendo:  No 

tomarás mujer de las hijas de Canaán.

2

 Levántate,  ve  a  Padan-aram,  a  casa  de 

Betuel, padre de tu madre y toma allí mu-

jer de las hijas de Labán, hermano de tu 

madre.

3

 ’El-Shadday te bendiga, te haga fructi-

ficar  y  te  multiplique  hasta  llegar  a  ser 

multitud de pueblos,

4

 y te dé la bendición de Abraham,° a ti 

y  a  tu  descendencia  contigo,  para  hacer 

que tomes posesión de la tierra de tus pe-

regrinaciones,° la cual ’Elohim ha dado a 

Abraham.

5

 Así envió Isaac a Jacob, el cual fue a Pa-

dan-aram, adonde Labán, hijo de Betuel, 

el arameo, hermano de Rebeca, madre de 

Jacob y Esaú.

6

 Y  vio  Esaú  que  Isaac  había  bendecido 

a Jacob y lo había enviado a Padan-aram 

para tomar de allí mujer para sí, y que, 

al bendecirlo, le había ordenado que no 

tomara  mujer  de  entre  las  hijas  de  Ca-

naán,

7

 y que Jacob al obedecer a su padre y a su 

madre, se había dirigido a Padan-aram,

8

 Esaú comprendió° entonces que las hi-

jas de Canaán eran desagradables a ojos 

de su padre Isaac,

9

 y fue Esaú a Ismael, y además de las que 

tenía, tomó para sí por mujer a Mahalat, 

27.36 

→Gn.25.29-34.  27.38  →He.12.17.  27.39-40  →He.11.20.  27.40  →2  R.8.20;  2  Cr.21.8.  27.42  Nse  vengará  de  ti 

matándote. LXX: amenaza con matarte

28.4 

→Gn.17.4-8.  28.4 Es decir, en donde estás peregrinando.  28.8 Lit. vio.


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Génesis 28:10

30

hija de Ismael, hijo de Abraham y herma-

na de Nebayot.

10

 Jacob, pues, salió de Beer-seba y se di-

rigió a Harán,

11

 y  llegado  a  cierto  lugar,  pasó  allí  la 

noche  porque  ya  el  sol  se  había  puesto. 

Tomó una piedra del lugar y la puso por 

su cabecera y se tendió en aquel sitio.

12

 Y tuvo un sueño: He aquí una escalera 

apoyada en la tierra, cuya parte superior 

alcanzaba los cielos. He aquí los ángeles 

de Dios subían y bajaban por ella.°

13

 Y  he  aquí  YHVH  estaba  en  pie  sobre 

ella y dijo: Yo soy YHVH, Dios de tu padre 

Abraham y Dios de Isaac. La tierra sobre 

la que estás tendido te la daré a ti y a tu 

descendencia.°

14

 Y tu descendencia será como el polvo 

de la tierra, y te extenderás hacia el mar, 

al oriente, al norte y hacia Neguev. Y en ti 

y en tu descendencia serán benditas todas 

las familias de la tierra.°

15

 He aquí Yo estoy contigo y te guardaré 

dondequiera que vayas, y volveré a traerte 

a esta tierra, pues no te dejaré hasta que 

haya hecho lo que te he prometido.

16

 Despertó  Jacob  de  su  sueño  y  dijo: 

Ciertamente  YHVH  está  en  este  lugar  y 

yo no lo sabía.

17

 Y  asustado,  añadió:  ¡Cuán  terrible  es 

este lugar! ¡Esto no es sino Casa de Dios y 

Puerta de los cielos!

18

 Jacob  madrugó  por  la  mañana  y  to-

mando la piedra que había puesto por su 

cabecera, la erigió como una estela,° y de-

rramó aceite sobre su cúspide.

19

 Y llamó el nombre de aquel lugar Bet-

’El,° sin embargo, al principio, el nombre 

de la ciudad era Luz.

20

 Y Jacob hizo un voto solemne dicien-

do:  Si  ’Elohim  estuviera  conmigo  y  me 

protegiera  en  este  camino  que  ando,  y 

me diera pan para comer y vestido para 

vestir,

21

 y yo volviera en paz a casa de mi padre, 

y YHVH llegara a ser° mi Dios,

22

 entonces  esta  piedra  que  he  puesto 

como estela será Casa de Dios, y de todo 

lo que me des, de seguro apartaré el diez-

mo para ti.

Jacob en casa de Labán

29

Jacob entonces prosiguió con pres-

teza° su viaje, y fue a tierra de los 

hijos de Oriente.

2

 Y miró, y en campo abierto vio un pozo 

y tres rebaños de ovejas sesteando junto 

a él, porque de aquel pozo solían abrevar 

a los rebaños, y una gran piedra tapaba la 

boca del pozo.

3

 Allí se juntaban todos los rebaños, y ro-

dando la piedra de sobre la boca del pozo, 

abrevaban a las ovejas, tras de lo cual de-

volvían la piedra a su lugar, sobre la boca 

del pozo.

4

 Y Jacob les dijo: Hermanos, ¿de dónde 

sois? Y respondieron: Somos de Harán.

5

 Les preguntó: ¿Conocéis a Labán, hijo° 

de Nacor? Contestaron: Lo conocemos.

6

 Y les dijo: ¿Está en paz? Y ellos dijeron: 

En paz, y he aquí su hija Raquel viene con 

el rebaño.

7

 Él dijo: Mirad, todavía es pleno día. Aún 

no es tiempo de recoger el ganado, abre-

vad a las ovejas y dejadlas pastar.

8

 Pero  ellos  dijeron:  No  podemos  hasta 

que se reúnan todos los rebaños. Enton-

ces rodamos la piedra de sobre la boca del 

pozo y abrevamos las ovejas.

9

 Estaba él aún hablando con ellos, cuan-

do llegó Raquel con el rebaño de su padre, 

pues ella era la pastora.

10

 Y sucedió que cuando Jacob vio a Ra-

quel hija de Labán, hermano de su madre, 

y al rebaño de Labán, hermano de su ma-

dre,  Jacob  se  acercó  y  rodó  la  piedra  de 

sobre la boca del pozo y abrevó el ganado 

de Labán, el hermano de su madre.

11

 Después Jacob besó a Raquel, y alzó su 

voz y lloró.

12

 Y Jacob le declaró a Raquel que él era 

hermano° de su padre e hijo de Rebeca. Y 

ella corrió y lo declaró a su padre.

13

 Aconteció  que  cuando  Labán  oyó  la 

noticia acerca de Jacob, el hijo de su her-

mana, corrió a su encuentro, lo abrazó y 

28.12 

→Jn.1.51.  28.13 →Gn.13.14-15.  28.14 →Gn.12.3; 22.18.  28.18 Massebah, monumento conmemorativo, general-

mente realizado con una piedra sin labrar. 

28.19 Esto es, Casa de Dios.  28.21 La subordinación gramatical exige que esta frase 

sea considerada como la última de la prótasis (v.20) quedando la apódosis relegada exclusivamente al v. 22. 

29.1 Lit. levantó 

los pies

29.5 Aunque nieto, aquí Labán es llamado hijo de Nacor 

→24.29, 47.  29.12 La palabra hermano se usa aquí en el 

sentido amplio de pariente (Labán era tío de Jacob).


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Génesis 30:8

31

lo besó efusivamente, y lo llevó a su casa. 

Y él contó a Labán todas estas cosas.

14

 Y  Labán  le  dijo:  ¡Ciertamente  hueso 

mío y carne mía eres! Y habitó con él los 

días de un mes.

Lea y Raquel

15

 Entonces Labán dijo a Jacob: ¿Es que 

por ser mi pariente, me has de servir de 

balde? Indícame cuál será tu salario.

16

 Y Labán tenía dos hijas: el nombre de 

la mayor era Lea, y el nombre de la me-

nor, Raquel.

17

 Y  los  ojos  de  Lea  eran  alicaídos,°  en 

tanto que Raquel era de hermosa aparien-

cia y bello semblante.

18

 Y  Jacob  se  había  enamorado  de  Ra-

quel,  de  modo  que  dijo:  Te  serviré  siete 

años por Raquel, tu hija menor.

19

 Y respondió Labán: Mejor que te la dé 

a ti que dársela a otro hombre. Quédate 

conmigo.

20

 Así sirvió Jacob por Raquel siete años 

y  le  parecieron  como  unos  días,  porque 

la amaba.

21

 Y dijo Jacob a Labán: Dame mi mujer, 

porque mi plazo se ha cumplido y deseo 

llegarme a ella.

22

 Entonces reunió Labán a todos los va-

rones de aquel lugar e hizo banquete.

23

 Pero sucedió que al anochecer tomó a su 

hija Lea y se la trajo,° y él se llegó a ella.

24

 (Y Labán había entregado su sierva Zil-

pa a su hija Lea como criada.)

25

 Y llegada la mañana, ¡he aquí era Lea! 

Y  él  dijo  a  Labán:  ¿Qué  es  esto  que  has 

hecho conmigo? ¿No te serví por Raquel? 

¿Por qué me has engañado?

26

 Y Labán dijo: No se hace así en nues-

tro lugar, de dar la más joven antes que la 

primogénita.

27

 Completa  la  semana  de  ésta  y  se  te 

dará también la otra, por la labor que ha-

rás para mí otros siete años.

28

 Y Jacob hizo así, y completó la semana 

de  aquélla.  Y  le  dio  por  mujer  a  su  hija 

Raquel.

29

 Y a su hija Raquel dio Labán su sierva 

Bilha, como criada suya.

30

 Así se llegó también a Raquel, y amó 

más  a  Raquel  que  a  Lea,  y  le  sirvió  aún 

otros siete años.

31

 Viendo YHVH que Lea era menospre-

ciada, abrió su matriz, en tanto que Ra-

quel era estéril.

32

 Y  concibió  Lea  y  dio  a  luz  un  hijo,  y 

llamó  su  nombre  Rubén,°  pues  dijo:  Ha 

visto YHVH mi aflicción, y ahora me ama-

rá mi marido.

33

 Y  concibió  de  nuevo,  y  dio  a  luz  un 

hijo y dijo: Ha oído YHVH que era menos-

preciada, y me ha dado también a éste. Y 

llamó su nombre Simeón.°

34

 Y concibió otra vez, y dio a luz un hijo 

y dijo: Esta vez mi marido se sentirá liga-

do a mí, pues le he dado a luz tres hijos, 

por tanto, llamó su nombre Leví.°

35

 Y concibió una vez más, dio a luz un 

hijo y dijo: Esta vez alabaré a YHVH. Por 

tanto  llamó  su  nombre  Judá,°  y  dejó  de 

concebir.

Prosperidad de Jacob

30

Viendo Raquel que no daba hijos a 

Jacob, tuvo celos Raquel de su her-

mana y decía a Jacob: ¡Dame hijos o me 

muero!

2

 Entonces  se  encendió  la  ira  de  Jacob 

contra Raquel, y dijo: ¿Acaso estoy yo en 

lugar  de  ’Elohim  que  te  impide  el  fruto 

del vientre?

3

 Y  ella  dijo:  Aquí  está  mi  sierva  Bilha, 

llégate a ella, y que dé a luz sobre mis ro-

dillas, así también yo seré edificada° por 

ella.

4

 Y le entregó a su sierva Bilha por mujer, 

y Jacob se llegó a ella,

5

 y  Bilha  concibió  y  dio  a  luz  un  hijo  a 

Jacob.

6

 Entonces  dijo  Raquel:  ’Elohim  me  ha 

juzgado,° y también ha oído mi voz y me 

ha dado un hijo. Por tanto, llamó su nom-

bre Dan.°

7

 Y  Bilha,  sierva  de  Raquel,  concibió  otra 

vez y dio a luz un segundo hijo para Jacob.

8

 Y dijo Raquel: Con luchas de Dios° he 

luchado con mi hermana, y he vencido. Y 

llamó su nombre Neftalí.°

29.17 Heb. rakot = débiles, enfermizos.  29.23 Se sobreentiende, a Jacob.  29.32 Esto es, vean a un hijo.  29.33 Esto es, oído.

29.34 Esto es, ligado.  29.35 Esto es, alabanza.  30.3 Es decir, tendré hijos.  30.6 Es decir, me ha hecho justicia.  30.6 Esto es, 

Él juzgó

30.8 Dios. Es decir, con luchas sobrehumanas.  30.8 Esto es, lucha o contienda.


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Génesis 30:9

32

9

 Viendo  Lea  que  había  cesado  de  dar  a 

luz, tomó a su sierva Zilpa, y se la dio a 

Jacob por mujer.

10

 Y Zilpa, sierva de Lea, dio a luz un hijo 

para Jacob.

11

 Entonces dijo Lea: ¡Vino la ventura! Y 

llamó su nombre Gad.°

12

 Y Zilpa, sierva de Lea, dio a luz un se-

gundo hijo para Jacob.

13

 Y dijo Lea: Por mi dicha me felicitarán 

las hijas.° Y llamó su nombre Aser.°

14

 Durante la siega del trigo, fue Rubén 

y halló mandrágoras° en el campo, y las 

llevó a su madre Lea. Y dijo Raquel a Lea: 

Te ruego que me des de las mandrágoras 

de tu hijo.

15

 Y  ella  le  dijo:  ¿Te  parece  poco  haber-

me quitado a mi marido, que me quieres 

quitar las mandrágoras de mi hijo? Res-

pondió Raquel: Pues bien, que se acueste 

contigo esta noche por las mandrágoras 

de tu hijo.

16

 Y cuando Jacob volvía del campo por la 

tarde, Lea le salió al encuentro, diciendo: 

Llégate a mí, porque te he alquilado for-

malmente  por  unas  mandrágoras  de  mi 

hijo. Y se acostó con ella aquella noche.

17

 Y ’Elohim oyó a Lea, la cual concibió y 

dio a luz un quinto hijo para Jacob.

18

 Y dijo Lea: ’Elohim me ha dado mi re-

compensa, por cuanto di mi sierva a mi 

marido.  Por  eso  llamó  su  nombre  Isa-

car.°

19

 Concibió Lea otra vez, y dio a luz un 

sexto hijo para Jacob.

20

 Y  dijo  Lea:  ’Elohim  me  ha  dotado  de 

buena dote. Porque le he dado a luz seis 

hijos, esta vez mi marido habitará conmi-

go, y llamó su nombre Zabulón.°

21

 Después dio a luz una hija, y llamó su 

nombre Dina.°

22

 Y se acordó ’Elohim de Raquel, y la oyó 

’Elohim, y abrió su matriz.

23

 Y concibió, y dio a luz un hijo, y dijo: 

’Elohim ha quitado mi afrenta,

24

 y  llamó  su  nombre  José,°  diciendo: 

Añádame YHVH otro hijo.

25

 Y aconteció que cuando Raquel hubo 

dado  a  luz  a  José,  Jacob  dijo  a  Labán: 

Despídeme, para que pueda irme a mi lu-

gar y a mi tierra.

26

 Dame mis mujeres y mis hijos por los 

cuales te he servido, y me marcharé, pues 

tú bien sabes cuál es el servicio con que 

te he servido.

27

 Pero Labán le respondió: Si he halla-

do gracia a tus ojos… He percibido que 

YHVH me ha bendecido por tu causa.

28

 Y añadió: Señálame tu salario, y te lo 

daré.

29

 Pero él dijo: Tú mismo sabes lo que te 

he servido, y cómo ha estado tu ganado 

conmigo,

30

 pues poco tenías antes de mi llegada, 

y  ha  aumentado  mucho,  y  YHVH  te  ha 

bendecido  con  mi  presencia.°  Así  que, 

¿cuándo  podré  trabajar  también  por  mi 

propia casa?

31

 Y  él  dijo:  ¿Qué  te  daré?  Y  dijo  Jacob: 

No  me  des  nada,  volveré  a  apacentar  tu 

rebaño si haces por mí esta cosa:

32

 Hoy pasaré por todo tu rebaño, sepa-

rando toda oveja manchada y moteada, es 

decir, toda oveja oscura entre los corde-

ros, y la manchada o la moteada entre las 

cabras. De éstas será mi salario.

33

 Así  mañana,  cuando  vayas  a  compro-

bar mi salario, mi honradez° responderá 

por  mí:  Todo  lo  que  no  sea  moteado  ni 

manchado  entre  las  cabras,  o  de  color 

oscuro entre los corderos, se considerará 

hurtado por mí.

34

 Y  dijo  Labán:  ¡Convenido!  ¡Ojalá  sea 

conforme a tu dicho!

35

 Sin embargo, en aquel mismo día se-

paró°  los  machos  cabríos  manchados  y 

moteados, y todas las cabras manchadas y 

moteadas, y toda aquella que tenía algo de 

blanco y todos los de color oscuro entre 

los corderos, y los entregó en manos de 

sus hijos.

36

 Además interpuso tres días de camino 

entre  sí  y  Jacob.  Y  Jacob  quedó  apacen-

tando el resto del rebaño de Labán.

37

 Entonces  Jacob  tomó  una  vara  verde 

de álamo, de avellano y de castaño, y des-

cortezó en ella unas mondaduras blancas, 

descubriendo así lo blanco de las varas.

30.11 Esto es, buena ventura.  30.13 Es decir, las mujeres.  30.13 Esto es, dichoso.  30.14 Heb. doda’im, muy similar a dodim = 

amores 

→Pr.7.18, Cnt.1.2.  30.18 Esto es, recompensa.  30.20 Esto es, habitación, morada.  30.21 Esto es, juicio.  30.24 Esto 

es, Él añade

30.30 Heb. leragli = por mi pie.  30.33 Lit. justicia.  30.35 Esto es, Labán.


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Génesis 31:22

33

38

 Y colocó las varas que había descorte-

zado en los abrevaderos, delante del reba-

ño, en los canales de agua donde bebían 

las ovejas, las cuales se apareaban° cuan-

do iban a beber.

39

 Así el rebaño se encelaba delante de las 

varas  y  parían  borregos  listados,  motea-

dos y manchados.

40

 Entonces separaba Jacob los corderos, 

y dirigía la vista de los rebaños hacia lo 

listado y hacia todo lo que era oscuro en 

el rebaño de Labán. Así él colocó su ma-

nada aparte sin mezclarlo con el rebaño 

de Labán.

41

 Y sucedía que cuantas veces las robustas 

se calentaban, Jacob ponía las varas en los 

abrevaderos delante de las ovejas, para ha-

cer que quedaran preñadas ante las varas.

42

 En cambio, cuando llegaban las débi-

les, no las ponía. Así, las más débiles eran 

para Labán, y las más fuertes para Jacob.

43

 Y el hombre se enriqueció muchísimo 

y logró poseer numerosos rebaños, sier-

vas y siervos, y camellos y asnos.

El regreso a Canaán

31

Pero oía las palabras de los hijos de 

Labán, diciendo: Jacob ha tomado 

todo lo de nuestro padre, y toda esta ri-

queza la ha hecho con lo que era de nues-

tro padre.

2

 Y observaba Jacob el semblante de La-

bán, y veía que no era para con él como 

en días anteriores.°

3

 Entonces YHVH dijo a Jacob: Vuélvete a 

la tierra de tus padres y a tu parentela, y 

Yo estaré contigo.

4

 Entonces Jacob envió a llamar a Raquel 

y a Lea al campo, donde tenía su rebaño,

5

 y les dijo: Estoy observando que el sem-

blante de vuestro padre para conmigo no 

es como en días anteriores, pero el Dios 

de mi padre ha estado conmigo.

6

 Vosotras  sabéis  también  que  con  toda 

mi fuerza he servido a vuestro padre,

7

 pero vuestro padre me ha engañado, y 

ha  cambiado  mi  salario  diez  veces;  sin 

embargo, ’Elohim no le permitió que me 

hiciera mal.

8

 Si él decía así: Los moteados serán tu sala-

rio, entonces todas las ovejas parían motea-

dos, y si decía: Los listados serán tu salario, 

entonces todas las ovejas parían listados.

9

 Así ha despojado ’Elohim del ganado a 

vuestro padre, y me lo ha dado a mí.

10

 Y sucedió que en el tiempo en que las 

ovejas se apareaban, alcé mis ojos y vi en 

el  sueño,  y  por  cierto,  los  machos  que 

montaban a las ovejas eran listados, mo-

teados y manchados.

11

 Y el ángel de Dios me dijo en el sueño: 

Jacob. Y yo dije: Heme aquí.

12

 Y Él dijo: Alza ahora tus ojos y verás 

que  todos  los  machos  que  montan  a  las 

ovejas son listados, moteados y mancha-

dos, porque Yo veo todo lo que Labán te 

está haciendo.

13

 Yo soy el Dios° de Bet-’El, donde ungis-

te la estela y donde me hiciste un voto.° 

Levántate ahora, sal de esta tierra y vuél-

vete a la tierra de tu nacimiento.

14

 Y respondiendo Raquel y Lea, le dije-

ron: ¿Acaso tenemos parte o herencia en 

la casa de nuestro padre?

15

 ¿No  nos  consideraba  ya  como  extra-

ñas, pues nos vendió y se ha consumido 

también nuestro dinero?

16

 Porque  toda  la  riqueza  que  ’Elohim 

despojó a nuestro padre, es nuestra y de 

nuestros  hijos.  Ahora  pues,  haz  todo  lo 

que ’Elohim te ha dicho.

17

 Entonces se levantó Jacob y montó a 

sus hijos y a sus mujeres en los camellos,

18

 y  condujo  todo  su  ganado  y  toda  su 

ganancia que había acumulado: el ganado 

que le pertenecía, que había adquirido en 

Padan-aram,  para  llegar  donde  Isaac  su 

padre, a tierra de Canaán.

19

 Mientras tanto, Labán había ido a tras-

quilar sus ovejas, y Raquel hurtó los tera-

fines° de su padre.

20

 Y Jacob defraudó° el corazón de Labán 

el arameo al no avisarle que se iba.

21

 Y huyó él con todo lo que tenía, y le-

vantándose, vadeó el Río° y se dirigió ha-

cia el monte de Galaad.

22

 Al tercer día le fue declarado a Labán 

que Jacob había huido.

30.38 Heb. yejamenah = se recalentaban Nse ponían en celo.  31.2 Heb. kitmol shilshom = como ayer y anteayer.  31.13 LXX: 

el Dios que se te apareció en Bet­’El

31.13 

→Gn.28.18-22.  31.19 Esto es, ídolos caseros, fetiches →Zac.10.2.  31.20 Lit. robó

31.21 Esto es, el Éufrates.


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Génesis 31:23

34

23

 Entonces,  tomando  a  sus  parientes° 

consigo, lo persiguió camino de siete días 

y lo alcanzó en el monte de Galaad.

24

 Pero en el sueño de la noche, ’Elohim 

llegó a Labán el arameo y le dijo: ¡Guárda-

te de hablar con Jacob bien ni mal!

25

 Alcanzó, pues Labán a Jacob, y éste ha-

bía ya plantado sus tiendas en el monte, 

y Labán acampó con sus parientes en el 

mismo monte de Galaad.

26

 Y dijo Labán a Jacob: ¿Qué hiciste para 

defraudar  mi  corazón  y  conducir  a  mis 

hijas como cautivas a espada?

27

 ¿Por qué te escondiste para huir y me 

defraudaste, y no me avisaste para despe-

dirte con festejos y cantares, con tamboril 

y cítara?

28

 Ni siquiera me has dejado besar a mis 

nietos y a mis hijas. ¡Has actuado de ma-

nera insensata!

29

 Hay  poder  en  mi  mano  para  haceros 

mal, pero el Dios de vuestro padre me ha-

bló anoche diciendo: Guárdate de hablar 

con Jacob bien ni mal.

30

 Y ahora, si decidiste irte por lo mucho 

que anhelas la casa de tu padre, ¿por qué 

robaste mis dioses?

31

 Respondió Jacob, y dijo a Labán: Por-

que tuve miedo, pues pensé que me quita-

rías por fuerza tus hijas de mi lado.

32

 Pero aquél con quien halles tus dioses, 

¡que no viva! Delante de nuestros herma-

nos examina qué tengo de lo tuyo, y tó-

malo contigo. (Porque Jacob no sabía que 

Raquel los había hurtado.)

33

 Entró por tanto Labán en la tienda de 

Jacob, y en la tienda de Lea, y en la tien-

da de las dos siervas, pero no los halló. Y 

saliendo  de  la  tienda  de  Lea  entró  en  la 

tienda de Raquel,

34

 pero Raquel ya había tomado los ído-

los y los había metido debajo de la albarda 

del  camello,  y  se  había  sentado  encima 

de ellos. Labán pues rebuscó por toda la 

tienda, pero no los halló.

35

 Entonces ella dijo a su padre: No se en-

ciendan de enojo los ojos de mi señor por 

no  poderme  levantar  ante  ti,  pues  estoy 

en el período de las mujeres. Y él buscó, 

pero no halló los ídolos.

36

 Entonces  se  encolerizó  Jacob  y  re-

criminó  a  Labán.  Tomó,  pues,  Jacob  la 

palabra y dijo a Labán: ¿Cuál es mi trans-

gresión  o  cuál  mi  pecado  para  que  me 

persigas con tal ardor?

37

 Porque  has  rebuscado  todos  mis  en-

seres,  ¿qué  hallaste  de  todos  los  objetos 

de tu casa? Ponlo aquí delante de mis pa-

rientes  y  tus  parientes,  y  juzguen  entre 

nosotros dos.

38

 En estos veinte años he estado contigo, 

tus ovejas y tus cabras nunca abortaron, 

ni yo comí carneros de tu rebaño.

39

 Lo desgarrado por fiera no te lo traía, 

yo pagaba el daño. Lo hurtado, tanto de 

día como de noche, me lo cobrabas.

40

 De día me consumía el calor, y de noche 

la helada, y el sueño huía de mis ojos.

41

 Así estuve veinte años en tu casa: ca-

torce años te serví por tus dos hijas, y seis 

años  por  tu  ganado,  y  has  cambiado  mi 

salario diez veces.

42

 Si el Dios de mi padre, el Dios de Abra-

ham y el Temor de Isaac° no hubiera estado 

conmigo,  de  cierto  me  despedirías  ahora 

vacío. ’Elohim ha visto mi aflicción y la fa-

tiga de mis manos, y te reprendió anoche.

43

 Entonces  respondió  Labán  y  dijo  a 

Jacob: Las hijas son mías, los hijos° son 

míos, las ovejas son mías, y todo lo que 

tú ves es mío. Así pues, ¿qué puedo hacer 

hoy a estas hijas mías, o a los hijos que 

ellas han dado a luz?

44

 Ven pues, concertemos ahora un pacto 

tú y yo,° y sea por testigo entre tú y yo.

45

 Entonces Jacob tomó una piedra y la 

erigió como estela.

46

 Y dijo Jacob a sus parientes: Recoged 

piedras.  Y  tomaron  piedras  e  hicieron 

un montón, y comieron allí sobre aquel 

montón.

47

 Y  Labán  lo  llamó  Yegar-sajadutah,°  y 

Jacob lo llamó Galaad.°

48

 Entonces Labán dijo: Este montón es 

testigo hoy entre tú y yo. Por tanto, fue 

llamado su nombre Galaad

31.23 Lit. hermanos.  31.42 El Temor de Isaac. Es obvio que esta expresión está unida a el Dios de Abraham y ambas se refieren 

al mismo Ser. El uso de este título aquí (y en el v. 53) sugiere la profunda impresión que había causado en Jacob la dedicación 

con la cual Isaac practicaba su fe. 

31.43 Esto es, nietos.  31.44 LXX: no hay nadie con nosotros, Dios es testigo entre tú y yo

→v.50.  31.47 Esto es, majano del testimonio en arameo.  31.47 Esto es, majano del testimonio en hebreo.


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Génesis 32:20

35

49

 y  Mizpa,°  por  cuanto  dijo:  Atalaye 

YHVH  entre  tú  y  yo  cuando  nos  aparte-

mos el uno del otro.

50

 Si  maltratas  a  mis  hijas,  o  si  tomas 

otras mujeres además de mis hijas, mira, 

’Elohim es testigo entre tú y yo, nadie hay 

con nosotros.

51

 Y  dijo  Labán  a  Jacob:  He  aquí  este 

montón, y fíjate, la estela que he erigido 

entre tú y yo.

52

 Sea testigo este montón y sea testigo 

la estela, de que no pasaré de este montón 

hacia ti, ni tú pasarás de este montón ni 

de esta estela hacia mí para mal.

53

 ¡Los dioses de Abraham y los dioses de 

Nacor, dioses de sus padres,° juzguen en-

tre nosotros! Pero Jacob juró por el Temor 

de Isaac su padre.°

54

 Y ofreció Jacob un sacrificio en el monte, 

y llamó a sus parientes a comer pan. Así pues 

comieron pan, y pernoctaron en el monte.

55

 Por la mañana madrugó Labán, y besó 

a  sus  hijos°  y  a  sus  hijas,  y  los  bendijo; 

luego se puso en camino, y regresó Labán 

a su lugar.

Los dos campamentos 

La lucha con el ángel

32

También Jacob prosiguió su cami-

no, y unos ángeles de ’Elohim sa-

lieron a su encuentro.

2

 Y cuando los vio, dijo Jacob: Este es el 

campamento de ’Elohim, y llamó el nom-

bre de aquel lugar Majanáyim.°

3

 Y envió Jacob mensajeros delante de sí 

a su hermano Esaú, a la tierra de Seír, al 

campo de Edom,

4

 y  les  ordenó,  diciendo:  Así  diréis  a  mi 

señor Esaú: Así dice tu siervo Jacob: He 

habitado como forastero con Labán dete-

niéndome hasta ahora.

5

 Y tengo bueyes, asnos y ovejas, siervos 

y siervas, y envío a declararlo a mi señor 

para hallar gracia ante tus ojos.

6

 Y los mensajeros volvieron a Jacob di-

ciendo:  Fuimos  a  tu  hermano  Esaú,  y 

también él viene a tu encuentro con cua-

trocientos hombres.

7

 Y se angustió Jacob y tuvo gran temor; 

y dividió en dos campamentos el pueblo 

que tenía consigo, y las ovejas, las vacas 

y los camellos,

8

 pues  se  dijo:  Si  viene  Esaú  contra  un 

campamento  y  lo  ataca,  el  otro  campa-

mento escapará.

9

 Y dijo Jacob: ¡Oh Dios de mi padre Abra-

ham y Dios de mi padre Isaac! ¡Oh YHVH!, 

que me dijiste: Vuélvete a tu tierra y a tu 

parentela y Yo te haré bien.

10

 Soy indigno de tus misericordias y de 

toda la fidelidad que has hecho a tu sier-

vo, pues con mi cayado vadeé este Jordán 

y  ahora  estoy  convertido  en  dos  campa-

mentos.

11

 Líbrame, te ruego, de la mano de mi 

hermano, de la mano de Esaú, pues yo le 

temo, no sea que venga y me hiera tanto 

a la madre como a los hijos.

12

 Pero  Tú  mismo  dijiste:  De  cierto  te 

haré bien y pondré tu descendencia como 

la arena del mar,° que por ser tanta no se 

puede contar.

13

 Y pernoctó allí aquella noche, y de lo 

que  le  vino  a  mano  tomó  un  presente 

para su hermano Esaú:

14

 doscientas cabras y veinte machos ca-

bríos, doscientas ovejas y veinte carneros,

15

 treinta  camellas  que  amamantaban, 

con sus crías, cuarenta novillas y diez no-

villos, veinte asnas y diez pollinos.

16

 Y los entregó en mano de sus siervos, 

cada  manada  por  separado.  Y  dijo  a  sus 

siervos: Pasad delante de mí y dejad espa-

cio entre manada y manada.

17

 Y le ordenó al primero diciendo: Cuan-

do  mi  hermano  Esaú  te  encuentre  y  te 

pregunte  diciendo:  ¿De  quién  eres,  y  a 

dónde vas, y para quién es esto que llevas 

delante de ti?,

18

 entonces  dirás:  Es  un  presente  de  tu 

siervo Jacob, enviado para mi señor, para 

Esaú. Y por cierto, él también viene tras 

nosotros.

19

 Y ordenó también al segundo, también 

al tercero, también a todos los que iban 

tras aquellas manadas, diciendo: La mis-

ma cosa le diréis a Esaú cuando lo encon-

tréis.

20

 Y además le diréis: He aquí tu siervo 

Jacob viene tras nosotros, pues pensaba: 

31.49 Esto es, torre del atalaya.  31.53 La mención parece referirse a los dioses que servía la familia de Abraham en Mesopota-

mia. 

→Gn.31.30,35; Jos.24.2.  31.53 →31.42.  31.55 Esto es, nietos.  32.2 Esto es, dos campamentos.  32.12 →Gn.22.17.


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Génesis 32:21

36

Apaciguaré  su  ira  con  el  presente  que 

va  delante  de  mí,  luego  veré  su  rostro, 

y… ¡quizá levante mi rostro!°

21

 Pasó, pues, el presente delante de él, y 

aquella noche pernoctó en el campamen-

to.

22

 Y  aquella  misma  noche  se  levantó, 

y tomando a sus dos mujeres, a sus dos 

siervas,  y  a  sus  once  hijos,  atravesó  el 

vado de Jaboc.°

23

 Los  tomó,  pues,  y  los  hizo  pasar  el 

arroyo, luego hizo pasar todo lo que te-

nía.

24

 Y Jacob° se quedó solo, y un varón es-

tuvo luchando con él hasta rayar el alba.

25

 Pero  viendo°  que  no  podía  con  él,  le 

atacó el encaje de su muslo, y se le desco-

yuntó el muslo a Jacob mientras luchaba 

con él.

26

 Entonces  dijo:°  Déjame,  que  raya  el 

alba. Y él dijo: No te dejaré, si no me ben-

dices.

27

 Y le dijo: ¿Cuál es tu nombre? Y él res-

pondió: Jacob.

28

 Y  dijo:  Ya  no  se  dirá  tu  nombre  Ja-

cob,° sino Israel, porque has luchado con 

’Elohim y con los hombres, y has venci-

do.

29

 Entonces  Jacob  le  preguntó,  y  dijo: 

Te ruego que me declares tu nombre. Y 

él respondió: ¿Por qué preguntas por mi 

Nombre? Y lo bendijo allí.

30

 Y llamó Jacob el nombre de aquel lu-

gar  Peni-’El,°  porque  dijo:  Vi  a  ’Elohim 

cara a cara, y aun así fue librada mi vida.

31

 Y  cuando  hubo  pasado  Peni-’El,  salió 

el sol, y cojeaba por causa de su muslo.

32

 Por eso hasta hoy los hijos de Israel no 

comen  del  tendón  de  la  cadera  que  está 

sobre la coyuntura del muslo, porque Él 

tocó la coyuntura del muslo de Jacob en 

el tendón de la cadera.

Encuentro de Jacob y Esaú

33

Jacob alzó la vista, y al ver que Esaú 

se acercaba con sus cuatrocientos 

hombres,  repartió  sus  hijos  entre  Lea  y 

Raquel y las dos siervas.

2

 Puso delante a las siervas con sus hijos, 

detrás a Lea con los suyos, y últimos a Ra-

quel con José.

3

 Pero él pasó adelante de ellos y se postró 

a tierra siete veces, hasta acercarse a su 

hermano.

4

 Y corrió Esaú a su encuentro y lo abra-

zó,  se  echó  sobre  su  cuello  y  lo  besó,  y 

lloraron.

5

 Cuando alzó sus ojos y vio a las mujeres 

y a los niños, él preguntó: ¿Qué son éstos 

tuyos? Y él respondió: Son los niños que 

’Elohim ha regalado a tu siervo.

6

 Entonces  se  acercaron  las  siervas  con 

sus hijos, y se postraron.

7

 Igualmente se acercó Lea con sus hijos 

y se postraron, y finalmente se acercaron 

José con Raquel, y se postraron.°

8

 Y  preguntó:°  ¿Qué  significa  toda  esta 

caravana  que  he  ido  encontrando?  Y  él 

respondió: Hallar gracia ante los ojos de 

mi señor.

9

 Y dijo Esaú: Yo tengo abundancia, her-

mano mío, sea para ti lo que es tuyo.

10

 Pero Jacob dijo: ¡No, por favor! Si he 

hallado ahora gracia delante de tus ojos, 

toma  el  presente  de  mi  mano,  pues  he 

visto tu rostro benévolo, y es como ver el 

rostro de ’Elohim.

11

 Acepta, te ruego, mi presente° que fue 

traído para ti, pues ’Elohim me ha favore-

cido, porque tengo de todo. Y le rogó con 

insistencia, y él lo aceptó.

12

 Luego  dijo:  Partamos  y  marchemos, 

yo iré delante de ti.

13

 Pero le dijo: Mi señor sabe que los ni-

ños son delicados y que tengo ovejas y va-

cas que están criando, y si las fatigan, en 

un día podría morir todo el rebaño.

14

 Pase ahora mi señor delante de su sier-

vo, y yo me iré con lentitud, al paso del 

ganado que va delante de mí y al paso de 

los niños, hasta que llegue a mi señor en 

Seír.

15

 Y dijo Esaú: Dejaré ahora contigo par-

te de la gente que viene conmigo. Pero él 

respondió: ¿Esto para qué? Halle gracia a 

ojos de mi señor.°

32.20 Heb. ‘er’eh panav… yisa’ panay = quizás me perdone cuando lo vea.  32.22 Jaboc. Aquí y en el v. 24, se presenta una 

paranomasia entre Yaboc, Yacob y ye’abeq (él luchó). Esta figura tiene el propósito de unir con un sonido similar palabras de 

distinto significado, procurando llamar la atención al oído para lograr una lectura detenida a causa de la importancia del pasaje. 

32.24 Jacob. Ver nota anterior.  32.25 Esto es, el Varón.  32.26 Es decir, el Varón.  32.28 

→Gn.35.10.  32.30 Esto es, Rostro de 

Dios

33.7 Implica una acción enfática.  33.8 Es decir, Esaú.  33.11 Lit. bendición.  33.15 Es decir, no te molestes.


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Génesis 34:24

37

16

 En aquel día, Esaú regresó por su ca-

mino a Seír,

17

 y Jacob partió hacia Sucot, y edificó una 

casa para sí, e hizo cobertizos para su ga-

nado, por eso llamó aquel lugar Sucot.°

18

 Cuando  volvió  de  Padan-aram,  Jacob 

llegó en paz° a la ciudad de Siquem, que 

está  en  la  tierra  de  Canaán,  y  acampó 

frente a la ciudad.

19

 Y allí donde había plantado su tienda, 

compró la parcela del campo° de mano de 

los hijos de Hamor, padre de Siquem, por 

cien monedas.°

20

 Después erigió allí un altar, y lo llamó 

’El-’Elohey-Israel.°

Rapto de Dina 

La venganza

34

Dina, la hija que Lea había dado a 

luz a Jacob, salió a ver a las hijas de 

aquella tierra.

2

 Y la vio Siquem,° hijo de Hamor,° el he-

veo, príncipe de aquella tierra, y la tomó, 

se acostó con ella, y la humilló.

3

 Pero su alma se apegó a Dina, la hija de 

Jacob,  y  se  enamoró  de  la  muchacha,  y 

habló al corazón de la muchacha.

4

 Y habló Siquem a su padre Hamor dicien-

do: Tómame a esta jovencita por mujer.

5

 Y oyó Jacob que él había contaminado a 

su hija Dina, pero como sus hijos estaban 

con su ganado en el campo, Jacob guardó 

silencio hasta la llegada de ellos.

6

 Entonces Hamor, padre de Siquem, sa-

lió a Jacob para tratar con él.

7

 Cuando  los  hijos  de  Jacob  regresaron 

del campo y lo oyeron, aquellos varones 

se indignaron y se enardecieron en gran 

manera, porque había hecho vileza a Is-

rael acostándose con la hija de Jacob, cosa 

que no se debía hacer.

8

 Pero Hamor habló con ellos, diciendo: El 

alma de mi hijo Siquem se ha apegado a 

vuestra hija, os ruego se la deis por mujer.

9

 Emparentad con nosotros, dadnos vues-

tras hijas y tomad nuestras hijas para vo-

sotros.

10

 Habitad con nosotros, y la tierra estará 

delante de vosotros, morad y negociad en 

ella, y adquirid posesión en ella.

11

 Y dijo Siquem al padre de ella y a sus 

hermanos: Halle yo gracia ante vuestros 

ojos, y daré lo que me digáis.

12

 Aumentad a cargo mío mucha dote y 

regalos,  que  yo  daré  cuanto  me  digáis, 

pero dadme la muchacha por mujer.

13

 Los  hijos  de  Jacob  respondieron  con 

doblez  a  Siquem  y  a  Hamor  su  padre, 

pues había violado° a su hermana Dina.

14

 Les dijeron: No podemos hacer esto de 

dar  nuestra  hermana  a  un  hombre  que 

tenga  prepucio,  porque  es  afrenta  para 

nosotros.

15

 Sólo  con  esto  os  consentiremos:  que 

lleguéis  a  ser  como  nosotros,  circunci-

dando entre vosotros a todo varón.

16

 Entonces os daremos nuestras hijas y 

tomaremos  las  vuestras,  y  habitaremos 

con vosotros y llegaremos a ser un pue-

blo.

17

 Pero si no aceptáis ser circuncidados, 

entonces tomaremos nuestra hija, y nos 

iremos.

18

 Y las palabras de ellos parecieron bue-

nas ante los ojos de Hamor y ante los ojos 

de Siquem, hijo de Hamor.

19

 Y  no  demoró  el  muchacho  en  hacer 

aquello, porque se deleitaba con la hija de 

Jacob, y él era el más distinguido de toda 

la casa de su padre.

20

 Y  fueron  Hamor  y  Siquem  su  hijo  a 

la puerta de su ciudad, y hablaron a los 

hombres de su ciudad, diciendo:

21

 Estas  gentes  son  pacíficas  con  noso-

tros, habitarán en la tierra y traficarán en 

ella, pues mirad, la tierra es bastante an-

cha para ellos. Tomaremos sus hijas por 

mujeres, y les daremos nuestras hijas.

22

 Pero sólo con esto consentirán en ha-

bitar  con  nosotros  para  ser  un  pueblo: 

que todo varón nuestro sea circuncidado, 

así como ellos están circuncidados.

23

 ¿Acaso  no  llegarán  a  ser  nuestros  su 

ganado, y su hacienda y todos sus anima-

les? Sólo convengamos con ellos, y habi-

tarán con nosotros.

24

 Y todos los que salían a la puerta de su 

ciudad obedecieron a Hamor y a su hijo 

Siquem,  y  fue  circuncidado  todo  varón, 

cuantos salían a la puerta de su ciudad.

33.17 Heb. sucot = cabañas.  33.18 

→28.21.  33.19 →Jos.24.32; Jn.4.5.  33.19 Heb. quesita. Prob. moneda con valor de diez 

siclos. 

33.20 Esto es, Dios, el Dios de Israel.  34.2 Esto es, hombro.  34.2 Esto es, asno.  34.13 Lit. contaminado.


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Génesis 34:25

38

25

 Y aconteció al tercer día, cuando ellos 

estaban  más°  adoloridos,  que  dos  de  los 

hijos de Jacob, Simeón y Leví, hermanos 

de Dina, tomando cada uno su cuchillo,° 

llegaron contra la ciudad confiada y ase-

sinaron a todos los hombres.

26

 Y  asesinaron  a  filo  de  cuchillo  a  Ha-

mor y a Siquem su hijo, y sacaron a Dina 

de la casa de Siquem, y salieron.

27

 Los  hijos  de  Jacob  pasaron  sobre  los 

muertos  y  saquearon  la  ciudad,  porque 

habían violado a su hermana.

28

 Y tomaron sus ovejas, sus vacas y sus 

asnos, lo que había en la ciudad y lo que 

había en el campo,

29

 y toda su hacienda, y se llevaron cauti-

vas a todas sus criaturas y sus mujeres, y 

saquearon todo lo que había en la casa.

30

 Entonces dijo Jacob a Simeón y a Leví: 

Me  habéis  turbado  haciéndome  apestoso 

ante los moradores de esta tierra: el cana-

neo y el ferezeo. Yo tengo escaso número de 

hombres, y se juntarán contra mí, me ataca-

rán, y yo y mi casa seremos exterminados.

31

 Pero dijeron ellos: ¿Había él de tratar a 

nuestra hermana como a una ramera?

Jacob en Bet-’El 

Muerte de Raquel e Isaac

35

Dijo  ’Elohim  a  Jacob:  Levántate, 

sube a Bet-’El y habita allí. Y haz allí 

un altar al Dios° que se te apareció cuando 

huías delante de Esaú tu hermano.°

2

 Entonces dijo Jacob a su casa y a todos 

los que estaban con él: Quitad los dioses 

extraños  que  hay  entre  vosotros,  purifi-

caos y mudad vuestras ropas.

3

 Levantémonos  y  subamos  a  Bet-’El,  y 

haré allí un altar al Dios que me respon-

dió en el día de mi angustia, y ha estado 

conmigo en el camino que he andado.

4

 Le dieron, pues, a Jacob todos los dio-

ses extraños que tenían en su mano, y los 

zarcillos° que tenían en sus orejas, y Ja-

cob los enterró bajo la encina° que había 

junto a Siquem.°

5

 Luego  partieron,  y  un  terror  so-

brenatural  sobrecogió  a  las  ciudades 

circunvecinas,  por  lo  cual  no  persiguie-

ron a los hijos de Jacob.

6

 Y llegó Jacob a Luz, que es Bet-’El, en 

tierra de Canaán, él y todo el pueblo que 

estaba con él.

7

 Y edificó allí un altar, y llamó el lugar 

’El-Bet-’El,° porque allí se le había reve-

lado ’Elohim cuando huía delante de su 

hermano.

8

 Entonces murió Débora, nodriza de Re-

beca, y fue sepultada en la parte baja de 

Bet-’El, debajo de la encina, y él la llamó 

Alón-bacut.°

9

 Y ’Elohim se apareció otra vez a Jacob 

después  que  había  regresado  de  Padan-

aram y lo bendijo,

10

 y le dijo ’Elohim: Tu nombre es Jacob. 

No se llamará más tu nombre Jacob,° sino 

Israel será tu nombre. Y llamó su nombre 

Israel.

11

 Después  le  dijo  ’Elohim:  Yo  soy  ’El-

Shadday:  Fructifica  y  multiplícate.  Una 

nación  y  una  congregación  de  naciones 

procederá de ti, y reyes saldrán de tus lo-

mos.

12

 La tierra que di a Abraham y a Isaac, te 

la doy a ti; también a tu simiente después 

daré la tierra.°

13

 Y  ascendió  ’Elohim  de  su  lado,  en  el 

lugar donde había hablado con él.

14

 Y  erigió  Jacob  una  estela  en  el  lugar 

donde había hablado con él, una estela de 

piedra, y derramó sobre ella una libación, 

y vertió aceite sobre ella.

15

 Y Jacob llamó Bet-’El el nombre del lu-

gar donde ’Elohim había hablado con él.°

16

 Partieron  de  Bet-’El,  y  faltando  aún 

como media legua° de tierra para llegar 

a  Efrata,  le  llegó  a  Raquel°  el  trance  de 

parir, pero su parto venía difícil.

17

 Y aconteció que en la dificultad de su 

parto,  la  partera  le  dijo:  No  temas,  que 

también tendrás este hijo.

18

 Y ocurrió que al salírsele el alma (pues 

estaba muriendo), llamó su nombre Be-

noni,° pero su padre lo llamó Benjamín.°

19

 Así murió Raquel, y fue sepultada en el 

camino de Efrata, (la cual es Bet-léhem).

34.25  .más.  34.25  Cuchillo.  Instrumento  corto  de  pedernal  de  doble  filo  utilizado  para  circuncidar 

→49.5.  35.1  Lit.  ’El

35.1 

→Gn.28.11-17.  35.4 Estatuillas y zarcillos que eran amuletos de divinidades.  35.4 La encina era considerado un árbol de 

culto, un árbol sagrado 

→Gn.12.6.  35.4 LXX: y los destruyó hasta este mismo día.  35.7 Esto es, el Dios de Bet­’El.  35.8 Esto 

es, encina del llanto

35.10 

→Gn.32.28.  35.11-12 →Gn.17.4-8.  35.14-15 →Gn.28.18-19.  35.16 Heb. kibrah. Medida de 

longitud (10,5 km aprox.). 

35.16 

→Jer.31.15.  35.18 Esto es, hijo de mi tristeza.  35.18 Esto es, hijo de la diestra.


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Génesis 36:21

39

20

 Y erigió Jacob una estela sobre su se-

pultura. Ésta es la estela de la tumba de 

Raquel hasta hoy.

21

 Y partió Israel, y plantó su tienda más 

allá de la torre de Éder.°

22

 Mientras  Israel  habitaba  en  aquella 

tierra, aconteció que Rubén fue y se acos-

tó con Bilha, la concubina de su padre, e 

Israel se enteró.

23

 Ahora bien, los hijos de Jacob fueron 

doce. Hijos de Lea: Rubén el primogénito 

de Jacob, y Simeón, y Leví, y Judá, e Isa-

car y Zabulón.

24

 Hijos de Raquel: José y Benjamín.

25

 Hijos de Bilha, sierva de Raquel: Dan 

y Neftalí.

26

 E hijos de Zilpa, sierva de Lea: Gad y 

Aser. Estos fueron los hijos de Jacob que 

le nacieron en Padan-aram.

27

 Y fue Jacob a su padre Isaac, en Mam-

re, ciudad de Arba, que es Hebrón, preci-

samente  donde  Abraham  e  Isaac  habían 

peregrinado.°

28

 Y fueron los días de Isaac ciento ochen-

ta años.

29

 Y expiró Isaac y murió, y fue unido a 

su pueblo, anciano y lleno de días, y lo se-

pultaron sus hijos Esaú y Jacob.

Descendencia de Esaú

36

Estos  son  los  descendientes  de 

Esaú: él es Edom.

2

 Esaú había tomado sus mujeres° de en-

tre las hijas de Canaán: a Ada, hija de Elón 

heteo, y a Oholibama, hija de Aná, hijo de 

Zibeón heveo,

3

 y a Bosemat, hija de Ismael, hermana de 

Nebayot.°

4

 Y Ada dio a luz a Elifaz para Esaú, y Bo-

semat dio a luz a Reuel.

5

 Y  Oholibama  le  dio  a  luz  a  Jeús,  a 

Jaalam y a Coré. Estos son los hijos de 

Esaú que le nacieron en la tierra de Ca-

naán.

6

 Y tomó Esaú a sus mujeres, a sus hijos 

e hijas, y a todas las personas de su casa, 

sus rebaños y todos sus animales, y to-

dos los bienes que había adquirido en la 

tierra de Canaán, y se fue a otra° tierra a 

causa de Jacob su hermano,

7

 porque  los  bienes  de  ellos  eran  dema-

siados para habitar juntos, y la tierra de 

su peregrinación no los podía sostener a 

causa de sus ganados.

8

 Así que Esaú habitó en el monte de Seír. 

Esaú es Edom.

9

 Y  estos  son  los  descendientes  de  Esaú, 

padre de los idumeos, en el monte de Seír.

10

 Estos son los nombres de los hijos de 

Esaú: Elifaz, hijo de Ada, mujer de Esaú, 

Reuel, hijo de Bosemat, mujer de Esaú.

11

 Y  los  hijos  de  Elifaz  fueron  Temán, 

Omar, Zefo, Gatam y Cenaz.

12

 Y  Timná  llegó  a  ser  concubina  de 

Elifaz,  hijo  de  Esaú,  la  cual  le  dio  a  luz 

a  Amalec.  Tales  fueron  los  hijos  de  Ada, 

mujer de Esaú.

13

 Y estos son los hijos de Reuel: Nahat y 

Zera, Sama y Miza. Tales fueron los hijos 

de Bosemat, mujer de Esaú.

14

 Y  estos  fueron  los  hijos  de  Oholiba-

ma, mujer de Esaú, hija de Aná, hijo de 

Zibeón. Ella le dio a luz a Jeús, Jaalam y 

a Coré.

15

 Estos  fueron  los  jeques  de  los  hijos 

de Esaú. Hijos de Elifaz, primogénito de 

Esaú:  jeque  Temán,  jeque  Omar,  jeque 

Zefo, jeque Cenaz,

16

 jeque Coré, jeque Gatam y jeque Ama-

lec. Estos son los jeques provenientes de 

Elifaz, en la tierra de Edom. Estos fueron 

los hijos de Ada.

17

 Y  estos  son  los  hijos  de  Reuel,  hijo 

de  Esaú:  jeque  Nahat,  jeque  Zera,  jeque 

Sama, y jeque Miza. Tales son los jeques 

provenientes de Reuel, en tierra de Edom. 

Estos fueron los hijos de Bosemat, mujer 

de Esaú.

18

 Y estos son los hijos de Oholibama, mu-

jer de Esaú: jeque Jeús, jeque Jaalam y je-

que Coré. Estos son los jeques procedentes 

de Oholibama, mujer de Esaú, hija de Aná.

19

 Tales  fueron  los  hijos  de  Esaú.  Él  es 

Edom, y tales fueron sus jeques.

20

 Estos son los hijos de Seír el hurrita, 

moradores  de  aquella  tierra:  Lotán,  So-

bal, Zibeón y Aná,

21

 Disón,  Ezer  y  Disán.  Tales  fueron  los 

jeques de los hurritas,° hijos de Seír, en la 

tierra de Edom.

35.21 Esto es, Torre del rebaño, la cual se encontraba cerca de Sión.  35.27 

→Gn.13.18.  36.2 →Gn.26.34.  36.3 →Gn.28.9.

36.6 .otra.  36.21 Posibles descendientes del poderoso pueblo hurrita que existió en el milenio II a.C., en la zona de Oriente.


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Génesis 36:22

40

22

 Los hijos de Lotán fueron: Hori y He-

mam, y Timná fue hermana de Lotán.

23

 Y estos son los hijos de Sobal: Alván, 

Manahat, Ebal, Sefo y Onam.

24

 Y estos son los hijos de Zibeón: Aja, y 

Aná (Este Aná es el que halló aguas ter-

males  en  el  desierto  cuando  apacentaba 

los asnos de su padre Zibeón).

25

 Y estos son los hijos de Aná: Disón y 

Oholibama, hija de Aná.

26

 Y estos son los hijos de Disón: Hem-

dán, Esbán, e Itrán y Querán.

27

 Estos son los hijos de Ezer: Bilhán, y 

Zaaván y Acán.

28

 Estos son los hijos de Disán: Huz y Arán.

29

 Estos son los jeques de los hurritas: je-

que Lotán, jeque Sobal, jeque Zibeón, je-

que Aná,

30

 jeque Disón, jeque Ezer, jeque Disán. 

Estos  fueron  los  jeques  de  los  hurritas 

por sus clanes en la tierra de Seír.

31

 Y  antes  que  un  rey  reinara  sobre  los 

hijos de Israel, estos fueron los reyes que 

reinaron en la tierra de Edom:

32

 Bela, hijo de Beor, reinó en Edom, y el 

nombre de su ciudad fue Dinaba.

33

 Murió Bela y reinó en su lugar Jobab 

hijo de Zera, de Bosra.

34

 Y murió Jobab y reinó en su lugar Hu-

sam, de la tierra de Temán.

35

 Murió Husam y reinó en su lugar Adad 

hijo de Badad, el que derrotó a Madián en 

el campo de Moab, y el nombre de su ciu-

dad, Avit.

36

 Y  murió  Adad  y  reinó  en  su  lugar 

Samla, de Masreca.

37

 Murió Samla y reinó en su lugar Saúl, 

de Rehobot del Río.°

38

 Y murió Saúl y reinó en su lugar Baal-

hanán, hijo de Acbor.

39

 Murió Baal-hanán hijo de Acbor, y rei-

nó en su lugar Adar, su ciudad se llamaba 

Pau y su mujer Mehetabel, hija de Matred, 

hija de Mezahav.

40

 Estos son los nombres de los jeques de 

Esaú por sus familias, localidades y nom-

bres: jeque Timná, jeque Alva, jeque Jetet,

41

 jeque Oholibama, jeque Ela, jeque Pi-

nón,

42

 jeque  Cenaz,  jeque  Temán,  jeque 

Mibzar,

43

 jeque Magdiel, jeque Hiram. Tales fue-

ron los jeques de Edom, conforme a sus 

moradas en la tierra de su posesión. Él es 

Esaú padre de Edom.

José y sus hermanos

37

Y habitó Jacob en la tierra de Ca-

naán, la tierra de las peregrinacio-

nes de su padre.

2

 Esta es la historia de la familia de Jacob: 

José  era  de  diecisiete  años  y  apacentaba 

las  ovejas  con  sus  hermanos.  El  joven 

estaba con los hijos de Bilha y de Zilpa, 

mujeres de su padre, y José informaba a 

su padre la mala fama de ellos.

3

 E Israel amaba a José más que a todos 

sus hijos, porque era el hijo de su vejez, 

y le había hecho una túnica con rayas de 

colores.°

4

 Sus  hermanos,  al  ver  que  su  padre  lo 

prefería entre todos ellos,° lo aborrecían 

y no le podían hablar pacíficamente.

5

 Y soñó José un sueño y lo declaró a sus 

hermanos, con lo cual aumentaron más 

su odio contra él,

6

 pues él les había dicho: Oíd ahora este 

sueño que he soñado:

7

 He  aquí,  estábamos  atando  gavillas  en 

medio del campo, y he aquí, mi gavilla se 

levantaba y además estaba erguida, y he 

ahí, vuestras gavillas estaban alrededor y 

se postraron ante mi gavilla.

8

 Y le dijeron sus hermanos: ¿Acaso preten-

des reinar sobre nosotros, o te enseñorea-

rás tú de nosotros? Y lo odiaron aun más a 

causa de sus sueños y de sus palabras.

9

 Y soñó aun otro sueño, y lo refirió a sus 

hermanos, y dijo: Mirad, he soñado otro 

sueño, y he aquí el sol, la luna y once es-

trellas se postraban ante mí.

10

 Y lo refirió a su padre y a sus herma-

nos, pero su padre lo reprendió, y le dijo: 

¿Qué  sueño  es  este  que  soñaste?  ¿Acaso 

yo, tu madre y tus hermanos llegaremos 

a postrarnos en tierra ante ti?

11

 Y  sus  hermanos  le  tenían  envidia,° 

pero su padre meditaba° en el asunto.

José vendido por sus hermanos

12

 Y  cuando  sus  hermanos  apacentaban 

el rebaño de su padre en Siquem,

36.37 Es decir, el Éufrates.  37.3 Pieza de vestir extraordinaria.  37.4 Lit. sus hermanos.  37.11 

→Hch.7.9.  37.11 Lit. guardaba.


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Génesis 38:4

41

13

 dijo  Israel  a  José:  ¿No  están  tus  her-

manos  pastoreando  en  Siquem?  Ven,  te 

enviaré a ellos. Y él dijo: Heme aquí.

14

 Y  él  le  dijo:  Ve  ahora,  mira  cómo  es-

tán  tus  hermanos  y  cómo  se  encuentra 

el  rebaño,  y  tráeme  un  informe.  Así  lo 

envió desde el valle de Hebrón, y llegó a 

Siquem.

15

 Y  un  hombre  lo  halló  deambulando 

por  el  campo,  y  el  hombre  le  preguntó, 

diciendo: ¿Qué buscas?

16

 Y dijo: Estoy buscando a mis hermanos, 

te ruego me digas dónde pastorean ellos.

17

 Respondió  el  hombre:  Partieron  de 

aquí, pues los oí decir: Vamos a Dotán. Y 

José fue tras sus hermanos y los halló en 

Dotán.

18

 Cuando  lo  vieron  de  lejos,  antes  que 

se acercara a ellos, se confabularon para 

darle muerte.

19

 Y se decían entre sí: ¡Aquí viene el se-

ñor de los sueños!°

20

 Ahora pues, vamos, matémoslo y arro-

jémoslo en una de las cisternas, y digamos 

que una mala bestia lo devoró. Veremos 

entonces qué serán sus sueños.

21

 Pero  cuando  Rubén  lo  oyó,  intentán-

dolo librar de mano de ellos, dijo: ¡No le 

quitemos la vida!

22

 Y añadió Rubén: No derraméis sangre. 

Arrojadlo en esta cisterna que está en el 

desierto, pero no extendáis la mano con-

tra  él.  Esto  dijo  a  fin  de  librarlo  de  sus 

manos para hacerlo volver a su padre.

23

 Y  cuando  José  llegó  a  sus  hermanos, 

sucedió que despojaron a José de su túni-

ca, la túnica de rayas de colores que lle-

vaba puesta,

24

 y lo tomaron, y lo arrojaron en la cis-

terna.  Pero  la  cisterna  estaba  vacía,  no 

había en ella agua.

25

 Luego se sentaron a comer pan, y al-

zando  sus  ojos  vieron  una  caravana  de 

ismaelitas que venía de Galaad,° llevando 

en sus camellos especias, bálsamo y mirra 

para hacerlos bajar a Egipto.

26

 Entonces  Judá  dijo  a  sus  hermanos: 

¿Qué  provecho  hay  en  que  matemos  a 

nuestro hermano y ocultemos su sangre?

27

 Vendámoslo  a  los  ismaelitas  y  no  sea 

nuestra mano contra él, pues es nuestro 

hermano, nuestra carne. Y sus hermanos 

obedecieron.

28

 Y cuando pasaron los mercaderes ma-

dianitas, sacaron a José de la cisterna, lo 

subieron  y  lo  vendieron  a  los  ismaelitas 

por  veinte  piezas  de  plata.  Y  llevaron  a 

José a Egipto.°

29

 Cuando Rubén volvió a la cisterna, he 

aquí  que  José  no  estaba  en  la  cisterna. 

Entonces rasgó sus vestidos,°

30

 y se volvió a sus hermanos, y dijo: ¡El 

muchacho  no  está!  ¿Y  ahora  que  voy  a 

hacer?

31

 Entonces tomaron la túnica de José, y 

degollando un chivo de las cabras, empa-

paron la túnica con la sangre.

32

 Luego enviaron  la túnica de  rayas  de 

colores y la hicieron llegar a su padre, y 

dijeron:  Hemos  hallado  esto,  reconoce 

pues, y ve si es la túnica de tu hijo o no.

33

 Él la reconoció, y exclamó: ¡Es la túnica 

de mi hijo! Alguna mala bestia lo habrá de-

vorado. ¡Sin duda José fue despedazado!

34

 Entonces Jacob rasgó sus ropas, puso 

tela de saco en sus lomos e hizo duelo por 

su hijo durante muchos días.

35

 Y se levantaron todos sus hijos e hijas 

a consolarlo, pero él rehusó ser consolado 

y  dijo:  ¡Descenderé  enlutado  junto  a  mi 

hijo hasta el Seol! Y su padre lloraba por 

él.

36

 Mientras  tanto,  los  madianitas  lo  ha-

bían vendido en Egipto a Potifar, eunuco° 

de Faraón, jefe de los guardias.

Judá y Tamar

38

Había ya acontecido en este tiem-

po,  que  separándose  Judá  de  sus 

hermanos, se relacionó° con un adulami-

ta° cuyo nombre era Hira.

2

 Y Judá vio allí a la hija de un hombre 

cananeo, cuyo nombre era Súa, y la tomó, 

y se llegó a ella,

3

 y concibió, y dio a luz un hijo. Y él llamó 

su nombre Er.

4

 Y concibió otra vez, y dio a luz un hijo, 

y llamó su nombre Onán.

37.19 La frase enfatiza un tono de burla.  37.25 Región al Oriente del Jordán.  37.28 

→Hch.7.9.  37.29 Esto es, en señal de 

gran dolor

37.36 En este caso, un eunuco (hombre de confianza) casado.  38.1 Lit. Se inclinó.  38.1 Adulam era una población 

25 km. al SO de Jerusalem.


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Génesis 38:5

42

5

 Y  volvió  de  nuevo  a  dar  a  luz  un  hijo, 

y  llamó  su  nombre  Sela.  Y  él  estaba  en 

Kezib cuando lo dio a luz.

6

 Entonces Judá tomó mujer para Er su 

primogénito, cuyo nombre era Tamar.

7

 Pero  Er,  el  primogénito  de  Judá,  era 

perverso ante los ojos de YHVH, y YHVH 

hizo que muriera.

8

 Y Judá dijo a Onán: Llégate a la mujer 

de tu hermano, despósate con ella° y le-

vanta descendencia a tu hermano.

9

 Pero Onán, sabiendo que la descenden-

cia no sería suya, sucedía que cuando se 

llegaba a la mujer de su hermano, vertía 

en tierra, a fin de no dar descendencia a 

su hermano.

10

 Y  lo  que  hacía  pareció  malo  ante  los 

ojos de YHVH, y también a él lo hizo mo-

rir.

11

 Entonces dijo Judá a su nuera Tamar: 

Vive como viuda en casa de tu padre, has-

ta que crezca mi hijo Sela. Pues temía que 

muriera también él como sus hermanos. 

Así que Tamar fue y permaneció en casa 

de su padre.

12

 Pasaron muchos días, y murió la hija 

de Súa, mujer de Judá. Terminado el luto, 

Judá subió con su asociado, Hira, el adu-

lamita, a Timná, donde estaban los tras-

quiladores de sus ovejas.

13

 Y  fue  dado  aviso  a  Tamar,  diciendo: 

Mira, tu suegro sube a Timná a trasquilar 

sus ovejas.

14

 Entonces  ella,  viendo  que  Sela  había 

crecido y no había sido dada a él por mu-

jer, se quitó las ropas de su viudez, se cu-

brió  con  un  velo,  y,  disfrazada,  se  sentó 

en la puerta de Enáyim, que está junto al 

camino de Timná.

15

 Cuando Judá la vio, la consideró rame-

ra,° pues ella tenía cubierto su rostro.

16

 Y se desvió del camino hacia ella, y le 

dijo: Vamos ahora, y me llegaré a ti (pues 

no sabía que era su nuera). Y dijo: ¿Qué 

me darás para que te llegues a mí?

17

 Y él dijo: Yo mismo te enviaré un ca-

brito de las cabras del rebaño. Y ella dijo: 

¿Me  das  alguna  prenda  hasta  que  lo  en-

víes?

18

 Él dijo: ¿Cuál prenda te he de dar? Y ella 

respondió:  Tu  sello,°  tu  cordón  y  la  vara 

que tienes en tu mano. Entonces él se los 

dio, y se llegó a ella, y ella concibió de él.

19

 Luego se levantó y se fue. Se quitó el 

velo de encima de ella y vistió las ropas de 

su viudez.

20

 Y  envió  Judá  el  cabrito  de  las  cabras 

por medio de su amigo el adulamita, para 

tomar  la  prenda  de  mano  de  la  mujer, 

pero no la halló.

21

 Y preguntó a los varones del lugar de 

ella, diciendo: ¿Dónde está la prostituta° 

de Enáyim, que estaba junto al camino? 

Y ellos le dijeron: Ninguna prostituta ha 

estado por aquí.

22

 Entonces regresó a Judá, y le dijo: No 

la he encontrado. Además, unos varones 

del lugar dijeron: Ninguna prostituta ha 

estado por aquí.

23

 Y  Judá  dijo:  Que  se  quede  con  ellas 

para que no seamos menospreciados. Ya 

ves que envié este cabrito y tú mismo no 

la encontraste.

24

 Y sucedió como a los tres meses, que se 

le dio aviso a Judá, diciendo: Tu nuera Ta-

mar se ha hecho ramera, y además, hasta 

ha quedado encinta por su prostitución. Y 

Judá dijo: ¡Sacadla y que sea quemada!

25

 Pero mientras era sacada, envió a decir 

a su suegro: ¡Del varón a quien pertene-

cen estas cosas estoy embarazada! Y dijo: 

Reconoced ahora, ¿de quién es este sello, 

el cordón y la vara?

26

 Entonces Judá los reconoció, y dijo: Es 

más  justa  que  yo,  porque  no  le  di  a  mi 

hijo Sela. Pero nunca más la conoció.°

27

 Y  sucedió  que  en  el  tiempo  de  dar  a 

luz, he aquí había mellizos en su vientre.

28

 Y al dar a luz salió una mano, y la par-

tera tomó y ató a su mano un hilo de gra-

na, diciendo: Éste salió primero.

29

 Pero cuando él retiró su mano, he aquí 

salió  su  hermano.  Y  ella  dijo:  ¡Qué  bre-

cha has abierto! Por tanto fue llamado su 

nombre Fares.°

30

 Y  después  salió  su  hermano,  el  que 

tenía en su mano el hilo de grana, y fue 

llamado su nombre Zara.°

38.8 

→Dt.25.5.  38.15 Heb. zonah. Mujer que tiene por oficio las relaciones sexuales.  38.18 Cilindro que se colgaba al cuello 

y que representaba la marca personal del individuo. 

38.21 Heb. quedeshah. Mujer que practicaba la prostitución idolátrica. 

38.26 Conocer en sentido sexual.  38.29 Esto es, brecha.  38.30 Esto es, brillante.


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Génesis 40:4

43

José en Egipto 

Potifar

39

A José, entonces, se le había hecho 

bajar a Egipto, y Potifar, eunuco de 

Faraón, jefe de los guardias, varón egip-

cio, lo había comprado de mano de los is-

maelitas que lo hicieron descender allá.

2

 Pero YHVH estaba con José,° y llegó a 

ser varón próspero y estaba en la casa de 

su señor el egipcio.

3

 Y  su  señor  observó  que  YHVH  estaba 

con él, porque todo cuanto hacía, YHVH 

lo hacía prosperar en su mano.

4

 Y  José  halló  gracia  ante  sus  ojos,  y  le 

servía. Y él lo puso a cargo de su casa, y 

entregó en su mano todo lo que tenía.

5

 Y sucedió que, desde que lo puso a car-

go de su casa y de todo lo que tenía, YHVH 

bendijo la casa del egipcio a causa de José, y 

la bendición de YHVH estaba sobre todo lo 

que tenía, así en la casa como en el campo.

6

 Y todo lo que tenía lo dejó en mano de 

José,  y  con  él  allí  no  se  preocupaba  de 

nada,  excepto  del  pan  que  él  comía.°  Y 

José era de agradable presencia y de varo-

nil semblante.

7

 Después de estas cosas, aconteció que la 

mujer de su señor puso sus ojos en José, 

y le dijo: ¡Acuéstate conmigo!

8

 Pero él rehusó, y dijo a la mujer de su 

señor:  Ciertamente  mi  señor  no  se  pre-

ocupa de lo que hay en la casa, y ha pues-

to en mi mano todo lo que tiene.

9

 No  me  priva  de  cosa  alguna,  sino  sólo 

de ti, por cuanto tú eres su mujer, ¿cómo 

pues haré este mal tan grande, y pecaré 

contra ’Elohim?

10

 Y  sucedió  que,  aunque  ella  instaba  a 

José día a día, él no la escuchaba para ya-

cer a su lado y cohabitar con ella.

11

 Pero aconteció cierto día, que cuando 

él entraba en la casa para hacer su oficio, 

y no habiendo allí nadie de los de la casa,

12

 ella lo asió por su vestidura y le dijo: 

¡Acuéstate conmigo!, pero él, dejando su 

vestidura  en  mano  de  ella,  huyó  y  salió 

afuera.

13

 Cuando ella vio que él había abando-

nado  su  vestidura  en  su  mano  y  había 

huido hacia afuera,

14

 llamó  a  los  varones  de  su  casa  y  les 

habló  diciendo:  Mirad,  nos  trajo  a  un 

hombre  hebreo  para  que  se  burlara  de 

nosotros.  Vino  para  acostarse  conmigo, 

pero grité a gran voz.

15

 Y sucedió que, cuando él oyó que al-

zaba  mi  voz  y  gritaba,  huyendo  dejó  su 

vestidura junto a mí, y salió afuera.

16

 Ella retuvo entonces su vestidura has-

ta que su amo llegó a su casa,

17

 y le habló conforme a estas mismas pa-

labras, diciendo: El esclavo hebreo que nos 

trajiste vino a mí para divertirse conmigo,

18

 y sucedió que cuando alcé mi voz y gri-

té, él dejó su vestidura junto a mí y huyó 

afuera.

19

 Ocurrió entonces que al oír su amo las 

palabras que su mujer le había hablado, 

diciendo: Así me ha tratado tu esclavo, se 

encendió su furor.

20

 Tomó su amo a José y lo echó en la cár-

cel  donde  estaban  encerrados  los  presos 

del rey. Así fue a parar a la cárcel.

21

 Pero YHVH estaba con José,° y le ex-

tendió su misericordia y le concedió gra-

cia ante los ojos del jefe de la cárcel.

22

 Y el jefe de la cárcel entregó en mano 

de José a todos los presos que estaban en 

la cárcel. Todo lo que hacían allí, él lo di-

rigía.°

23

 El  jefe  de  la  cárcel  no  supervisaba° 

nada  que  estuviera  en  su  mano,  porque 

YHVH estaba con él, y lo que él empren-

día, YHVH lo hacía prosperar.

En la cárcel 

Sueños del copero y del panadero

40

Después  de  estas  cosas,  sucedió 

que  el  copero  del  rey  de  Egipto  y 

su panadero pecaron contra su señor, el 

rey de Egipto.

2

 Y se encolerizó° Faraón contra sus dos 

oficiales, contra el principal de los coperos 

y contra el principal de los panaderos,

3

 y los puso bajo custodia en la casa del 

jefe  de  los  guardias,  en  la  cárcel,  lugar 

donde estaba preso José.

4

 Y el jefe de los guardias se los encargó 

a José, y éste les servía, y estuvieron unos 

días bajo custodia.

39.2 

→Hch.7.9.  39.6 →43.32.  39.21 →Hch.7.9.  39.22 Lit. hacía.  39.23 Lit. veía.  40.2 Heb. qatsaf = airarse hasta echar 

espuma (por la boca).


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Génesis 40:5

44

5

 Y el copero y el panadero del rey de Egipto, 

estando presos en la cárcel, soñaron ambos 

un sueño, cada uno su sueño en una mis-

ma noche, cada uno su sueño con peculiar 

sentido.

6

 Y José fue a ellos por la mañana, y ob-

servó que estaban perturbados.

7

 Preguntó  pues  a  aquellos  oficiales  de 

Faraón  que  estaban  con  él  en  la  prisión 

de la casa de su señor, diciendo: ¿Por qué 

causa están hoy tristes vuestros semblan-

tes?

8

 Y  le  dijeron:  Hemos  soñado  un  sueño 

y  no  hay  quien  lo  interprete.  Entonces 

les  dijo  José:  ¿Acaso  no  corresponden  a 

’Elohim las interpretaciones? Contádme-

los, os ruego.

9

 Entonces  el  principal  de  los  coperos 

contó  su  sueño  a  José,  y  le  dijo:  En  mi 

sueño, he aquí una vid estaba ante mí,

10

 y en la vid había tres sarmientos, y pa-

recía que le salían brotes, florecía, y sus 

racimos de uvas maduraban.

11

 Y  estaba  la  copa  de  Faraón  en  mi 

mano, tomé las uvas y las exprimí en la 

copa de Faraón, y puse la copa en mano 

de Faraón.

12

 Y  José  le  dijo:  Esta  es  su  interpreta-

ción: Los tres sarmientos son tres días.

13

 Dentro  de  tres  días  Faraón  alzará  tu 

cabeza°  y  te  hará  volver  a  tu  puesto,  y 

pondrás  la  copa  de  Faraón  en  su  mano, 

como de costumbre, cuando eras su co-

pero.

14

 Por causa de esto, cuando te vaya bien, 

acuérdate de mí. Te ruego que tengas mi-

sericordia de mí y hagas mención de mí a 

Faraón y me saques de esta casa,

15

 porque de cierto fui secuestrado de la 

tierra de los hebreos, y aquí tampoco he 

hecho  nada  para  que  me  pusieran  en  el 

calabozo.°

16

 Entonces, viendo el principal de los pa-

naderos que había interpretado para bien, 

dijo a José: También yo soñé que veía tres 

canastillos de pan sobre mi cabeza,

17

 y  en  el  canastillo  más  alto  había  de 

todos  los  manjares  de  Faraón,  obra  de 

panadero, y las aves se los comían del ca-

nastillo que estaba sobre mi cabeza.

18

 Respondió José, y dijo: Esta es su in-

terpretación: Los tres canastillos son tres 

días.

19

 Dentro  de  tres  días  Faraón  alzará  tu 

cabeza y te hará colgar de un árbol, y las 

aves comerán tu carne.

20

 Sucedió, pues, al tercer día, el día del 

cumpleaños de Faraón, que él hizo ban-

quete a todos sus siervos, y en medio de 

sus siervos alzó la cabeza del principal de 

los coperos y la cabeza del principal de los 

panaderos.

21

 Y restableció en su oficio al principal 

de  los  coperos,  y  éste  puso  la  copa  en 

mano de Faraón,

22

 pero colgó al principal de los panade-

ros, tal como les había interpretado José.

23

 Sin  embargo,  el  principal  de  los  co-

peros  no  se  acordó  de  José,  sino  que  lo 

olvidó.

Los sueños de Faraón 

José ante Faraón

41

Al final de dos años exactos,° suce-

dió que Faraón soñaba. Y he aquí 

estaba en pie junto al Nilo,

2

 y del Nilo subían siete vacas gordas y de 

hermoso aspecto,° que apacentaban en el 

juncal.

3

 Tras ellas, subían del Nilo otras siete va-

cas de mal aspecto y enjutas de carne, y se 

paraban junto a aquellas vacas a la orilla 

del Nilo.

4

 Y las vacas de mal aspecto y enjutas de 

carne devoraban a las siete vacas gordas y 

de hermoso aspecto. Y despertó Faraón,

5

 y se volvió a dormir, y soñó por segunda 

vez, y he aquí siete espigas gordas y bue-

nas crecían de un mismo tallo.

6

 Sin embargo, he ahí otras siete espigas 

menudas y resecas por el viento oriental 

brotaban después de ellas.

7

 Y las siete espigas menudas devoraban a 

las siete espigas llenas y gordas. Y Faraón 

despertó. Había sido un sueño.

8

 Y sucedió que por la mañana, conturba-

do su espíritu, envió a llamar a todos los 

magos de Egipto y a todos sus sabios, y 

Faraón les contó su sueño. Pero no había 

quien los interpretara a Faraón.

40.13 Nótese el doble sentido que este hebraísmo expresa al compararlo con el v. 19: alzará tu cabeza y te hará volver, con: 

alzará tu cabeza y te hará colgar… 

40.15 Lit. en el pozo.  41.1 Lit. días.  41.2 Lit. sanas de carne.


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Génesis 41:38

45

9

 Entonces el principal de los coperos ha-

bló a Faraón, diciendo: Hoy me acuerdo 

de mis pecados:

10

 Cuando  Faraón  se  enfureció  contra 

sus  siervos,  y  me  puso  bajo  custodia  en 

la casa del jefe de los guardias, a mí y al 

principal de los panaderos.

11

 En una misma noche él y yo tuvimos 

un sueño.° Cada uno soñó° un sueño con 

un sentido peculiar.

12

 Y estaba allí con nosotros un joven he-

breo, esclavo del jefe de los guardias, y se 

lo contamos, y él nos interpretó nuestros 

sueños.  A  cada  uno  interpretó  según  su 

sueño.

13

 Y aconteció que tal como nos lo había 

interpretado, así fue. A mí me restableció° 

en mi puesto, pero al otro lo colgó.

14

 Entonces Faraón envió a llamar a José, 

y haciéndolo sacar aprisa del calabozo, se 

afeitó, mudó sus vestidos y acudió a Fa-

raón.

15

 Y  dijo  Faraón  a  José:  He  soñado  un 

sueño, y no hay quien lo interprete, pero 

he oído decir de ti que oyes un sueño y lo 

puedes interpretar.

16

 José respondió a Faraón, diciendo: No 

es  mérito  mío,  es  ’Elohim  quien  dará  a 

Faraón respuesta satisfactoria.

17

 Entonces habló Faraón a José: En mi 

sueño, he aquí yo estaba en pie a la orilla 

del Nilo,

18

 y  he  ahí,  del  Nilo  subían  siete  vacas 

gordas y de hermoso aspecto que apacen-

taban entre el junco.

19

 Pero, he ahí, tras ellas subían otras sie-

te vacas de mal aspecto y enjutas de car-

ne, como no había visto en toda la tierra 

de Egipto.

20

 Y las vacas flacas y malas devoraron a 

las siete primeras vacas gordas,

21

 y éstas entraban en sus entrañas, pero 

no se notaba que hubieran entrado en sus 

entrañas,  porque  su  apariencia  era  tan 

mala como al inicio. Luego, desperté.

22

 Después vi en mi sueño que siete espi-

gas llenas y buenas brotaban de un mis-

mo tallo.

23

 Pero,  he  ahí,  siete  espigas  marchitas, 

menudas y resecas por el viento oriental 

crecían después de ellas,

24

 y las espigas menudas devoraban a las 

siete espigas buenas. Lo he referido a los 

magos, pero no hay quien me lo interpre-

te.

25

 Entonces José dijo a Faraón: Los sue-

ños de Faraón son uno solo. ’Elohim ha 

anunciado  a  Faraón  lo  que  está  por  ha-

cer.

26

 Las siete vacas buenas son siete años, y 

las espigas buenas son siete años. El sue-

ño es uno solo.

27

 También las siete vacas flacas y de mal 

aspecto  que  subían  tras  ellas  son  siete 

años, y las siete espigas menudas y rese-

cas por el viento oriental significan siete 

años de hambruna.

28

 Es  el  asunto  que  antes  indiqué  a  Fa-

raón:  ’Elohim  ha  mostrado  a  Faraón  lo 

que va a hacer.

29

 He  aquí  vienen  siete  años  de  gran 

abundancia en toda la tierra de Egipto.

30

 Después  de  ellos,  se  levantarán  siete 

años de hambruna, y toda la abundancia 

en la tierra de Egipto será olvidada, y la 

hambruna consumirá el país,

31

 de modo que se olvidará la abundancia 

en  el  país  a  causa  de  aquella  hambruna 

que le seguirá, porque será muy severa.

32

 En  cuanto  a  la  repetición  del  sueño 

a Faraón dos veces, es porque el asunto 

está determinado por ’Elohim, y ’Elohim 

se apresura a ejecutarlo.

33

 Y ahora, provea Faraón un hombre in-

teligente y sabio, y póngalo sobre la tierra 

de Egipto.

34

 Actúe  Faraón,  y  designe  superinten-

dentes sobre el país, y quinte la tierra de 

Egipto en los siete años de abundancia,

35

 para que ellos recojan toda la provisión 

de estos buenos años que vienen, y alma-

cenen el grano bajo la mano° de Faraón y 

lo guarden en las ciudades para sustento.

36

 Y el alimento será reserva para el país, 

para los siete años de hambruna que ha-

brá en la tierra de Egipto, y el país no será 

consumido por la hambruna.

37

 Pareció bien la propuesta a ojos de Fa-

raón y a ojos de todos sus siervos.

38

 Y dijo Faraón a sus siervos: ¿Acaso ha-

llaremos  un  varón  como  éste,  en  quien 

esté el espíritu de ’Elohim?

41.11 Lit. soñamos un sueño.  41.11 Lit. soñamos.  41.13 Esto es, Faraón.  41.35 Es decir, bajo la autoridad.


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Génesis 41:39

46

39

 Y dijo Faraón a José: ’Elohim te ha he-

cho saber todo esto, no hay entendido ni 

sabio como tú.

40

 Tú  mismo  estarás  sobre  mi  casa,°  y 

por tu palabra se someterá todo mi pue-

blo. Sólo por el trono yo seré más grande 

que tú.

41

 Y Faraón dijo a José: He aquí, te pongo 

sobre toda la tierra de Egipto.

42

 Y se quitó Faraón el anillo° de su mano 

y lo puso en la mano de José, y lo vistió 

con  ropas  de  lino  finísimo  y  le  puso  un 

collar de oro en su cuello.

43

 Y lo hizo subir en su segundo carro y 

pregonaron delante de él: ¡Arrodillaos!° Y 

lo puso a cargo de toda la tierra de Egip-

to.

44

 Y Faraón dijo a José: Yo soy el Faraón, 

pero sin tu permiso nadie levantará mano 

ni pie en toda la tierra de Egipto.

45

 Y  llamó  Faraón  el  nombre  de  José, 

Zofnat-Panea,° y le dio por mujer a Ase-

nat,  hija  de  Potifera,  sacerdote  de  On. 

Entonces  José  salió  a  recorrer  toda  la 

tierra de Egipto.

46

 Era José de treinta años° cuando com-

pareció ante Faraón, rey de Egipto. Luego 

José se retiró de la presencia de Faraón, y 

recorrió toda la tierra de Egipto.

47

 Y en los siete años de abundancia, la 

tierra produjo a montones.

48

 Y  reunió  todo  el  alimento  que  hubo 

de  los  siete  años  en  la  tierra  de  Egipto. 

Luego puso el alimento en las ciudades, y 

depositó en ellas la producción del campo 

circundante a cada ciudad.

49

 José también almacenó grano como la 

arena  del  mar,  mucho  en  extremo,  hasta 

que dejó de contarlo, pues era sin número.

50

 Y antes que viniera el año de la ham-

bruna,  le  nacieron  a  José  dos  hijos,  los 

cuales le dio a luz Asenat, hija de Potifera, 

sacerdote de On.

51

 Y llamó José el nombre del primogé-

nito  Manasés,°  porque  dijo:  ’Elohim  me 

hizo olvidar todo mi sufrimiento y toda la 

casa de mi padre.

52

 Y llamó el nombre del segundo Efraín,° 

porque dijo: ’Elohim me ha hecho fructí-

fero en la tierra de mi aflicción.

53

 Y se acabaron los siete años de abun-

dancia que hubo en la tierra de Egipto.

54

 Y comenzaron los siete años de ham-

bruna,°  como  José  había  dicho.  Y  hubo 

hambruna  en  todos  los  países,  pero  en 

toda la tierra de Egipto había pan.

55

 Y  cuando  tuvo  hambre  toda  la  tierra 

de Egipto, el pueblo clamó a Faraón por 

pan. Y dijo Faraón a todo Egipto: Id a José 

y haced lo que él os diga.°

56

 Y la hambruna estaba por toda la ex-

tensión del país. Entonces José abrió todo 

lo que había en ellos,° y vendió a los egip-

cios,  pues  la  hambruna  arreciaba  en  la 

tierra de Egipto.

57

 También  de  toda  la  tierra  llegaban  a 

Egipto para comprar grano a José, porque 

la hambruna arreciaba en toda la tierra.

El primer viaje

42

Jacob,  viendo  que  había  grano  en 

Egipto, dijo a sus hijos: ¿Por qué os 

estáis mirando unos a otros?°

2

 Y dijo: Mirad, he oído que hay grano en 

Egipto.  Bajad  allá  y  compradnos  grano 

para que podamos vivir y no muramos.°

3

 Bajaron, pues, diez de los hermanos de 

José a comprar el grano de Egipto,

4

 porque Jacob no envió a Benjamín, her-

mano  de  José,  con  sus  hermanos,  pues 

dijo: No sea que le ocurra alguna desgra-

cia.

5

 Así que los hijos de Israel fueron a com-

prar  grano  entre  los  que  iban,  pues  la 

hambruna estaba en la tierra de Canaán.

6

 Y  José  era  el  gobernante  del  país  que 

vendía  grano  a  todo  pueblo  de  aquella 

tierra.  Llegaron  entonces  los  hermanos 

de José, y se postraron ante él rostro en 

tierra.°

41.40 

→Hch.7.10.  41.42 Sello real que permite actuar con plenos poderes.  41.43 La palabra hebrea ‘abrej = doblad la rodilla

es la transliteración de una frase egipcia (del verbo egipcio berej = alabar o rendir homenaje). Por lo tanto, ‘abrej sería una 

traducción fiel del vocablo egipcio i’a berej = ¡Alabad! o ¡Rendid homenaje! 

41.45 Aunque el nombre dado a José por Faraón 

ha sido reconocido desde hace mucho tiempo como egipcio, sin embargo su significado era incierto hasta que fue descubierto 

en una inscripción de la última parte del período Bubastis (siglo IX AC) escrita en egipcio:  Dye­pa­netyer­iuj­ank = el dios 

habla para que él viva

41.46 Treinta años. José pasó trece años en servidumbre 

→37.2.  41.51 Esto es, el que hace olvidar

41.52 Esto es, fructífero.  41.54 

→Hch.7.11.  41.55 →Jn.2.5.  41.56 Es decir, los graneros. LXX: todos los graneros.  42.1 LXX: 

¿Por qué sois indolentes?

  42.2 

→Hch.7.12.  42.6 →37.7.


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Génesis 42:35

47

7

 José vio a sus hermanos y los reconoció, 

pero fingió ser un extraño para ellos. Y ha-

blándoles duramente, les dijo: ¿De dónde 

habéis venido? Ellos respondieron: De la 

tierra de Canaán, a comprar alimento.

8

 Y José reconoció a sus hermanos, pero 

ellos no lo reconocieron.

9

 Y  acordándose  José  de  los  sueños  que 

había  soñado  acerca  de  ellos,°  les  dijo: 

¡Espías sois! ¡Para ver lo desprotegido del 

país habéis venido!°

10

 Pero  ellos  le  dijeron:  No,  señor  mío, 

sino que tus siervos vinieron a comprar 

alimento.

11

 Todos nosotros somos hijos de un mis-

mo  varón.  Somos  honrados,  tus  siervos 

no son espías.

12

 Pero él les dijo: ¡No! Habéis venido a 

ver lo desprotegido del país.

13

 Ellos entonces respondieron: Tus sier-

vos  somos  doce  hermanos,  hijos  de  un 

varón  de  la  tierra  de  Canaán,  y  he  aquí 

el menor está hoy con nuestro padre, y el 

otro ha desaparecido.

14

 Pero José les dijo: Es lo que yo os digo: 

¡Sois espías!

15

 En esto seréis probados: Vive Faraón, 

que no saldréis de esto sino cuando venga 

aquí vuestro hermano menor.

16

 Enviad  a  uno  de  vosotros  para  que 

traiga a vuestro hermano. Mientras, que-

dad detenidos y sean comprobadas vues-

tras palabras, si hay verdad en vosotros, 

y si no, ¡por la vida de Faraón, que sois 

espías!

17

 Y  los  puso  juntos  bajo  custodia  por 

tres días.

18

 Pero al tercer día les dijo José: Haced 

esto y viviréis. Yo temo a ’Elohim.

19

 Si sois honrados, uno de vuestros her-

manos quedará encarcelado mientras los 

demás  vais  y  lleváis  el  grano  a  vuestras 

familias hambrientas.

20

 Pero  me  traeréis  a  vuestro  hermano 

menor, y vuestras palabras serán verifica-

das, y no moriréis. E hicieron así.

21

 Y  cada  cual  decía  a  su  hermano:  De 

cierto  somos  culpables  por  nuestro  her-

mano, pues vimos la angustia de su alma 

cuando nos rogaba, y no lo escuchamos, 

por eso ha venido sobre nosotros esta an-

gustia.

22

 Entonces  Rubén  les  respondió  di-

ciendo: ¿Acaso no os hablé diciendo: No 

pequéis  contra  el  muchacho?°  Pero  no 

escuchasteis,  y  ahora,  ciertamente,  su 

sangre nos es demandada.

23

 (Y  ellos  no  sabían  que  José  entendía, 

porque había un traductor entre ellos.)

24

 Entonces él se apartó, y lloró. Después 

volvió a ellos y les habló, y tomando de en-

tre ellos a Simeón, lo ató ante sus ojos.

25

 José ordenó entonces que llenaran sus 

sacos  de  grano  y  devolvieran  la  plata  de 

cada uno de ellos a su saco, y les dieran 

provisiones para el camino. Y así se hizo 

con ellos.

26

 Y ellos cargaron su grano sobre sus as-

nos y se fueron de allí.

27

 Pero en el mesón, al abrir uno su saco 

para dar forraje a su asno, he aquí vio que 

su plata estaba en la boca de su costal.

28

 Y dijo a sus hermanos: ¡Mi plata ha sido 

devuelta, y mirad, incluso está en mi costal! 

Entonces el corazón les falló° y temblaron, 

y cada uno decía a su hermano: ¿Qué está 

haciendo ’Elohim con nosotros?

29

 Llegados a su padre Jacob en tierra de 

Canaán, le refirieron todas las cosas que 

les habían sucedido, diciendo:

30

 Aquel hombre, el señor de aquella tie-

rra,  nos  habló  cosas  duras,  y  nos  trató° 

como a espías de aquel país.

31

 Pero le dijimos: Nosotros somos hon-

rados, no somos espías.

32

 Éramos  doce  hermanos,  hijos  de 

nuestro padre, uno ha desaparecido, y el 

pequeño  está  hoy  con  nuestro  padre  en 

tierra de Canaán.

33

 Y aquel hombre, el señor de aquella tie-

rra, nos dijo: En esto sabré que vosotros 

sois  honrados.  Dejad  a  uno  de  vuestros 

hermanos  conmigo,  y  tomad  para  vues-

tras familias hambrientas, y marchaos.

34

 Luego  traedme  a  vuestro  hermano 

menor, y así sabré que no sois espías, que 

sois  honrados.  Os  devolveré  a  vuestro 

hermano, y podréis negociar en el país.

35

 Y  sucedió  que  al  vaciar  ellos  sus  sa-

cos, he aquí la bolsa de plata de cada uno 

42.9 

→Gn.37.5-10.  42.9 Parte NO de la frontera más expuesta a ataques.  42.22 →Gn.37.21-22.4.  42.28 Es decir, se sobre­

saltaron

42.30 LXX: puso en prisión 

→40.3.


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Génesis 42:36

48

estaba en su saco. Y al ver ellos y su padre 

las bolsas de plata, tuvieron temor.

36

 Y  su  padre  Jacob  les  dijo:  Me  habéis 

privado  de  hijos:  José  no  está,  Simeón 

tampoco  está,  y  queréis  tomar  a  Benja-

mín. ¡Todo está contra mí!

37

 Pero Rubén habló a su padre, diciendo: 

Haz que mueran mis dos hijos si no te lo 

traigo. Entrégalo en mi mano, que yo te 

lo devolveré.

38

 Pero  él  respondió:  Mi  hijo  no  baja-

rá  con  vosotros,  pues  su  hermano  está 

muerto  y  ha  quedado  él  solo.  Si  alguna 

desgracia le llegara a acontecer en el ca-

mino  por  donde  vais,  haréis  descender 

mis canas con dolor al Seol.

El segundo viaje

43

Pero  la  hambruna  era  grave  en 

aquella tierra.

2

 Y ocurrió que, cuando acabaron de co-

mer el grano que habían traído de Egipto, 

su padre les dijo: Volved y compradnos un 

poco de alimento.

3

 Y  Judá  le  respondió,  diciendo:  Aquel 

hombre nos advirtió seriamente, dicien-

do: No veréis mi rostro a menos que vues-

tro hermano venga con vosotros.

4

 Si  envías  a  nuestro  hermano  con  no-

sotros, bajaremos y te compraremos ali-

mento,

5

 pero si no lo envías, no bajaremos, por-

que aquel hombre nos dijo: No veréis mi 

rostro,  a  menos  que  vuestro  hermano 

esté con vosotros.

6

 Y dijo Israel: ¿Por qué me hicisteis tanto 

mal declarando a ese hombre que teníais 

otro hermano?

7

 Y ellos dijeron: Aquel hombre nos pre-

guntó expresamente acerca de nosotros 

y  de  nuestra  parentela,  diciendo:  ¿Vive 

aún vuestro padre? ¿Tenéis otro herma-

no?  Y  le  declaramos  conforme  a  estas 

preguntas.  ¿Acaso  sabíamos  nosotros 

que él diría: Haced bajar a vuestro her-

mano?

8

 Judá dijo a Israel su padre: Envía al mu-

chacho conmigo, así nos levantaremos e 

iremos para que vivamos y no muramos 

también nosotros, también tú, y también 

nuestros pequeños.

9

 Yo salgo fiador por él, a mí mismo me 

pedirás cuentas de él. Si no te lo devuelvo 

y te lo pongo delante, seré culpable ante 

ti todos los días.

10

 Si no nos hubiéramos demorado, cier-

tamente ya habríamos vuelto dos veces.

11

 Respondió su padre Israel: Si tiene que 

ser así, hacedlo. Tomad de lo mejor de la 

tierra  en  vuestras  bolsas  y  llevad  obse-

quios a aquel hombre, un poco de bálsa-

mo, y un poco de miel, especias y mirra, 

nueces y almendras.

12

 Tomad en vuestras manos el doble de 

la plata, y llevad en vuestra mano la plata 

devuelta en las bocas de vuestros costales, 

pues quizá fue un error.

13

 Tomad a vuestro hermano, levantaos y 

volved ante aquel hombre.

14

 Y  que  ’El-Shadday°  os  conceda  gran 

misericordia  ante  aquel  hombre,  y  os 

suelte a vuestro otro hermano, y a Ben-

jamín. Y si he de quedar privado de hijos, 

¡privado de hijos quede!

15

 Los  hombres  entonces,  tomando  los 

obsequios, el doble de plata en su mano, 

y a Benjamín, se levantaron y bajaron a 

Egipto para presentarse ante José.

16

 Cuando José vio con ellos a Benjamín, 

dijo al que estaba a cargo de su casa: Haz 

entrar a esos varones en la casa, degüella 

un animal y prepáralo, porque estos varo-

nes comerán conmigo a mediodía.

17

 El  hombre  hizo  como  José  había  di-

cho, y los hizo entrar en casa de José.

18

 Los  hombres  tuvieron  temor  cuando 

se vieron conducidos a casa de José, pues 

decían: Por el asunto de la plata que fue 

devuelta en nuestros costales la vez pri-

mera  somos  traídos  acá,  para  atacarnos 

y abalanzarse sobre nosotros y tomarnos 

como esclavos a nosotros y a nuestros as-

nos.

19

 Entonces se acercaron al hombre que 

estaba a cargo de la casa de José, y le ha-

blaron a la puerta de la casa,

20

 y  dijeron:  ¡Ay,  señor  mío!°  Nosotros 

ciertamente bajamos al comienzo a com-

prar alimento,

21

 pero  sucedió  que  cuando  llegamos  a 

la  posada  y  abrimos  nuestros  costales, 

he aquí la plata de cada uno estaba en la 

43.14 El Todosuficiente.  43.20 El TM registra el singular indicando que uno habló por todos.


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Génesis 44:11

49

boca de su costal, nuestra plata en su jus-

to peso. Por eso la hemos vuelto traer en 

nuestras manos.

22

 Y hemos tomado otra plata en nuestras 

manos para comprar alimento, no sabe-

mos quién puso nuestra plata en nuestros 

costales.

23

 Y él respondió: Paz a vosotros, no te-

máis.  Vuestro  Dios  y  el  Dios  de  vuestro 

padre os dio un tesoro escondido en vues-

tros costales, vuestra plata llegó a mí. Y 

les sacó a Simeón.

24

 Entonces  el  hombre  hizo  entrar  a 

aquellos varones en casa de José, y les dio 

agua y lavaron sus pies, y dio forraje a sus 

asnos.

25

 Y ellos prepararon el presente para la 

llegada de José al mediodía, pues oyeron 

que allí habrían de comer los alimentos.

26

 Cuando  José  llegó  a  la  casa,  ellos  le 

presentaron dentro de la casa los regalos 

que tenían en sus manos, y se postraron 

a tierra ante él.

27

 Entonces les preguntó cómo estaban, 

y dijo: ¿Está bien vuestro padre, el ancia-

no del cual hablasteis? ¿Vive aún?

28

 Y ellos dijeron: Tu siervo, nuestro pa-

dre, está bien, aún vive.° E hicieron reve-

rencia y se postraron.

29

 Y él alzó sus ojos y vio a su hermano 

Benjamín,  hijo  de  su  madre,  y  dijo:  ¿Es 

éste  vuestro  hermano  menor,  de  quien 

me  dijisteis?  Y  añadió:  ’Elohim  te  haga 

misericordia, hijo mío.

30

 Y José se apresuró a salir,° porque sus 

entrañas  estaban  conmovidas  por  causa 

de  su  hermano,  y  buscó  dónde  llorar,  y 

entró en la recámara, y allí lloró.

31

 Después se lavó el rostro y salió, y re-

frenándose, ordenó: ¡Poned alimentos!

32

 Pero lo pusieron separadamente, para 

ellos aparte, y por separado para los egip-

cios que comían con él, pues los egipcios 

no  podían  comer  alimentos  con  los  he-

breos,  porque  era  abominación  para  los 

egipcios.

33

 Y ellos se sentaron ante él, el primo-

génito  conforme  a  su  primogenitura,  y 

el  menor  conforme  a  su  menor  edad.  Y 

aquellos varones estaban atónitos, mirán-

dose el uno al otro.

34

 Luego él tomó porciones de delante de 

sí para ellos, pero la porción de Benjamín 

era cinco veces mayor que las porciones 

de todos ellos. Y bebieron, y se embriaga-

ron con él.

La copa de José

44

Luego  él  ordenó  al  que  estaba  a 

cargo  de  su  casa,  diciendo:  Llena 

de comida los costales de estos hombres, 

tanto como puedan llevar, y coloca la pla-

ta de cada uno en la boca de su costal.

2

 Y  coloca  mi  copa,  la  copa  de  plata,  en 

la boca del costal del menor, con la plata 

de su grano. E hizo conforme a la palabra 

que había hablado José.

3

 Cuando rayó el alba, fueron despedidos 

aquellos varones, ellos y sus asnos.

4

 Salieron ellos de la ciudad, y no se ha-

bían  alejado,  cuando  José  dijo  al  que 

estaba  a  cargo  de  su  casa:  Levántate  y 

persigue a esos hombres, y cuando los al-

cances, diles: ¿Por qué habéis pagado mal 

por bien?

5

 ¿No° es ésta en la cual bebe mi señor, y 

con lo que suele adivinar?° Habéis obrado 

mal en lo que hicisteis.

6

 Así,  los  alcanzó  y  les  habló  estas  pala-

bras.

7

 Y ellos le dijeron: ¿Por qué habla mi se-

ñor tales cosas? ¡Lejos sea de tus siervos 

hacer cosa semejante!

8

 He  aquí,  la  plata  que  hallamos  en  la 

boca de nuestros costales, te la volvimos 

a traer desde la tierra de Canaán, ¿cómo, 

pues, hurtaríamos de la casa de tu señor 

plata u oro?

9

 Aquel de tus siervos en quien sea halla-

da, que muera, y nosotros también sere-

mos esclavos de mi señor.

10

 Y él dijo: Sea ahora conforme a vues-

tras palabras, aquél en quien se halle lle-

gará  a  ser  mi  esclavo,  y  vosotros  seréis 

inocentes.

11

 Y  se  apresuraron,  y  bajando  cada 

uno  su  costal  a  tierra,  cada  cual  abrió 

su costal.

43.28 LXX añade: y dijo: Bendito sea aquel hombre por Dios.  43.30 .a salir.  44.5 LXX comienza el v. 5 con: ¿Por qué me habéis 

robado la copa de plata 

→(Este fragmento no está registrado en el TM).  44.5 Métodos adivinatorios en los que se empleaba una 

copa, bien por medio de líquidos, o con la caída de piedras preciosas en su interior.


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Génesis 44:12

50

12

 Él,  pues,  comenzó  a  registrar  por  el 

mayor y terminó con el menor, y la copa 

fue hallada en el costal de Benjamín.

13

 Entonces ellos se rasgaron las vestidu-

ras, y cada uno cargó su asno y regresa-

ron a la ciudad.

14

 Y llegaron Judá y sus hermanos a casa 

de José, y él estaba aún allí, y cayeron a 

tierra ante él.

15

 Y José les dijo: ¿Qué acción es esta que 

habéis hecho? ¿No sabéis que un hombre 

como yo es capaz de adivinar?

16

 Entonces  dijo  Judá:  ¿Qué  diremos  a 

mi señor? ¿Qué hablaremos? ¿Cómo nos 

justificaremos? ’Elohim ha descubierto la 

iniquidad de tus siervos. He aquí, somos 

esclavos de mi señor, nosotros, y también 

aquél en cuya mano fue hallada la copa.

17

 Pero él dijo: Lejos de mí el hacer esto, 

el  hombre  en  cuya  mano  fue  hallada  la 

copa,  él  será  mi  esclavo.  Vosotros  subid 

en paz a vuestro padre.

18

 Entonces  Judá  se  acercó  a  él,  y  dijo: 

¡Ay,  señor  mío!  Te  ruego  que  hable  tu 

siervo  una  palabra  a  oídos  de  mi  señor, 

y no se encienda tu ira contra tu siervo, 

porque tú eres como el mismo Faraón.

19

 Mi señor ha preguntado a sus siervos, 

diciendo: ¿Tenéis padre o hermano?

20

 Y nosotros dijimos a mi señor: Tene-

mos  un  padre  anciano,  y  un  muchacho 

pequeño que le nació en su vejez, pues su 

hermano murió, sólo él quedó de su ma-

dre, y su padre lo ama.

21

 Y  dijiste  a  tus  siervos:  Hacedlo  bajar 

para que lo vea.

22

 Entonces nosotros dijimos a mi señor: 

El  muchacho  no  puede  abandonar  a  su 

padre, porque si lo abandonara, su padre 

moriría.

23

 Y dijiste a tus siervos: Si vuestro her-

mano menor no baja con vosotros, no ve-

réis más mi rostro.

24

 Y  aconteció  que  cuando  subimos 

adonde mi padre, tu siervo, le referimos 

las palabras de mi señor.

25

 Y nuestro padre dijo: Volved a comprar 

para nosotros un poco de alimento.

26

 Pero  nosotros  dijimos:  No  podemos 

bajar. Si nuestro hermano menor va con 

nosotros, bajaremos, porque no podremos 

ver el rostro de aquel hombre si no está 

con nosotros nuestro hermano menor.

27

 Entonces tu siervo, mi padre, nos dijo: 

Vosotros mismos sabéis que mi mujer me 

dio a luz dos.

28

 El uno salió de mi lado, y dije: Cierta-

mente fue despedazado. Y hasta ahora no 

lo he vuelto a ver.

29

 Y si tomáis también a éste de mi pre-

sencia  y  le  sucede  alguna  desgracia,  ha-

réis  descender  mis  canas  con  maldad  al 

Seol.

30

 Y ahora, cuando llegue a tu siervo, mi 

padre, y el muchacho no esté con noso-

tros, como su alma está ligada al alma de 

él,

31

 sucederá  que  cuando  vea  que  el  mu-

chacho no está, morirá, y tus siervos ha-

brán  hecho  descender  con  dolor  al  Seol 

las canas de tu siervo, nuestro padre.

32

 Porque yo, tu siervo, he quedado como 

fiador  del  muchacho  ante  mi  padre,  di-

ciendo:  Si  no  te  lo  traigo,  sea  pecador 

ante mi padre todos los días.

33

 Y ahora, te ruego que tu siervo quede 

en lugar del joven por esclavo de mi se-

ñor, y el joven suba con sus hermanos.

34

 Porque ¿cómo subiré yo hasta mi pa-

dre si el joven no está conmigo? ¡No vea el 

mal que le sobrevendrá a mi padre!

José se descubre a sus hermanos

45

José  ya  no  podía  contenerse  ante 

todos los que estaban a su lado, y 

exclamó: ¡Sacad a todo varón de mi pre-

sencia! Y no quedó nadie con él cuando 

José se dio a conocer a sus hermanos.°

2

 Entonces alzó su voz en llanto, y lo oye-

ron  los  egipcios  y  lo  oyó  la  casa  de  Fa-

raón.

3

 Y dijo José a sus hermanos: ¡Yo soy José! 

¿Vive aún mi padre? Y sus hermanos no 

pudieron  responderle,  porque  estaban 

turbados por su presencia.

4

 Entonces  dijo  José  a  sus  hermanos: 

¡Acercaos a mí, os ruego! Y ellos se acer-

caron, y él dijo: Yo soy vuestro hermano 

José, a quien vendisteis para Egipto.

5

 Ahora  pues,  no  os  entristezcáis  ni  os 

enojéis con vosotros mismos° por haber-

me  vendido  acá,  pues  para  preservar  la 

45.1 

→Hch.7.13.  45.5 Lit. no os enojéis ante vuestros ojos.


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Génesis 46:5

51

vida  me  envió  ’Elohim  delante  de  voso-

tros.

6

 Porque ya ha habido dos años de ham-

bruna en medio de esta tierra, y aún que-

dan cinco años en que no habrá siembra 

ni siega.

7

 Por eso ’Elohim me envió delante de vo-

sotros para preservaros un remanente en 

esta tierra y para daros vida por medio de 

una gran liberación.

8

 Así que, no me enviasteis vosotros acá, 

sino  ’Elohim.  Y  Él  me  ha  puesto  como 

un padre para Faraón y señor de toda su 

casa  y  gobernador  en  toda  la  tierra  de 

Egipto.

9

 Daos  prisa,  subid  hasta  mi  padre,  y 

decidle: Así dice tu hijo José: ’Elohim me 

ha puesto por señor de todo Egipto, des-

ciende a mí, no te detengas,

10

 y  habitarás  en  la  tierra  de  Gosén,°  y 

estarás cerca de mí, tú y tus hijos, y los 

hijos de tus hijos, tus rebaños y tus vaca-

das y todo lo que tienes.

11

 Y allí te sustentaré, pues aún quedan 

cinco años de hambruna, para que no cai-

gas en la miseria tú y tu casa, y todo lo 

que tienes.°

12

 Y por cierto, vuestros ojos pueden ver, 

y los ojos de mi hermano Benjamín, que 

es mi boca la que os habla.

13

 Declararéis a mi padre todo mi esplen-

dor en Egipto y todo lo que habéis visto. 

Así que, ¡daos prisa, y haced que mi padre 

descienda acá!

14

 Entonces se echó al cuello de su her-

mano Benjamín, y lloró, y Benjamín lloró 

en su cuello.

15

 Y besó a todos sus hermanos, y lloró 

sobre ellos. Después sus hermanos habla-

ron con él.

16

 Y la voz fue oída en la casa de Faraón, 

diciendo: Los hermanos de José han veni-

do. Y agradó a ojos de Faraón y a ojos de 

sus siervos.

17

 Y dijo Faraón a José: Di a tus herma-

nos: Haced esto: Cargad vuestras bestias, 

e id, entrad a la tierra de Canaán.

18

 Luego tomad a vuestro padre y a vues-

tras familias, y venid a mí, y yo os daré lo 

bueno de la tierra de Egipto, y comeréis 

de la abundancia del país.

19

 Mándales también: Tomad carros de la 

tierra de Egipto para vuestros pequeños y 

vuestras mujeres, y tomad a vuestro pa-

dre, y venid.

20

 Y no os preocupéis por vuestros ense-

res, porque lo mejor de toda la tierra de 

Egipto es vuestro.

21

 Así  lo  hicieron  los  hijos  de  Israel,  y 

José  les  dio  carros  conforme  a  la  orden 

de Faraón, y les dio provisión para el ca-

mino.

22

 A todos ellos les dio mudas de vestidos, 

y a Benjamín le dio trescientas piezas de 

plata y cinco mudas de vestidos.

23

 Y a su padre envió esto: diez asnos car-

gados de lo mejor de Egipto, y diez asnas 

cargadas de grano, pan y víveres para el 

viaje de su padre.

24

 Y despidió a sus hermanos, y se fueron. 

Y les dijo: No discutáis° por el camino.

25

 Subieron de Egipto, y llegaron a la tie-

rra de Canaán, a su padre Jacob,

26

 y  le  anunciaron,  diciendo:  ¡José  aún 

vive, y gobierna en toda la tierra de Egip-

to! Pero su corazón desmayó, pues no les 

creía.

27

 Mas ellos le dijeron todas las palabras 

que José les había hablado, y al ver los ca-

rros que José había enviado para llevarlo, 

el espíritu de su padre Jacob revivió.

28

 Entonces  dijo  Israel:  ¡Basta!  ¡Mi  hijo 

José aún vive! Iré y lo veré antes de morir.

Israel en Egipto

46

E Israel partió con todo lo que te-

nía, y fue a Beer-seba, y ofreció sa-

crificios al Dios de su padre Isaac.

2

 Y habló ’Elohim a Israel en visiones de 

noche, y le dijo: ¡Jacob! ¡Jacob! Y él dijo: 

Heme aquí.

3

 Entonces le dijo: Yo soy ’Elohim, el Dios 

de tu padre. No temas bajar a Egipto, por-

que allí te convertiré en una gran nación.

4

 Yo descenderé contigo a Egipto, y cier-

tamente  Yo  también  te  haré  subir,  y  la 

mano de José cerrará tus ojos.

5

 Y  se  levantó  Jacob  de  Beer-seba,  y  los 

hijos de Israel hicieron subir a su padre 

Jacob, a sus pequeños y a sus mujeres en 

los carros que Faraón había enviado para 

que lo llevaran.

45.10 Tierra muy fértil situada en el Delta del Nilo.  45.9-11 

→Hch.7.14.  45.24 Heb. râgaz. Nriñáis.


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Génesis 46:6

52

6

 Y tomaron sus ganados, y las pertenen-

cias que habían adquirido en la tierra de 

Canaán,  y  se  fueron  a  Egipto,°  Jacob,  y 

toda su descendencia con él,

7

 sus  hijos  y  nietos,  sus  hijas  y  nietas. 

Y  llevó  consigo  toda  su  descendencia  a 

Egipto.

8

 Estos  son  los  nombres  de  los  hijos  de 

Israel que entraron en Egipto: Jacob y sus 

hijos: Rubén, el primogénito de Jacob.

9

 Y  los  hijos  de  Rubén:  Hanoc,  Falú, 

Hezrón y Carmi.

10

 Y los hijos de Simeón: Jemuel, Jamín, 

Ohad, Jaquín, Zohar y Saúl, hijo de la ca-

nanea.

11

 Y los hijos de Leví: Gersón, Coat y Me-

rari.

12

 Y  los  hijos  de  Judá:  Er,  Onán  y  Sela, 

Fares  y  Zara,  aunque  Er  y  Onán  habían 

muerto en tierra de Canaán. Y los hijos de 

Fares fueron Hezrón y Hamul.

13

 Los  hijos  de  Isacar:  Tola,  Fúa,  Iob  y 

Simrón.

14

 Y los hijos de Zabulón: Sered, Elón y 

Jahleel.

15

 Estos fueron los hijos de Lea, los que 

ella le dio a luz a Jacob en Padan-aram, 

además de su hija Dina. El total de perso-

nas de sus hijos e hijas fue treinta y tres.

16

 Y los hijos de Gad: Zifión, Hagui, Suni, 

Ezbón, Heri, Arodi y Areli.

17

 Y los hijos de Aser: Jimna, Isúa, Isúi y 

Beria y Sera, hermana de ellos. Los hijos 

de Beria: Heber y Malquiel.

18

 Estos fueron los hijos de Zilpa, la que 

Labán dio a su hija Lea, y le dio a luz éstos 

a Jacob: dieciséis personas.

19

 Hijos de Raquel, mujer de Jacob: José 

y Benjamín.

20

 Y a José, en la tierra de Egipto, le na-

cieron Manasés y Efraín, los cuales le dio 

a  luz  Asenat,  hija  de  Potifera,  sacerdote 

de On.°

21

 Y  los  hijos  de  Benjamín  fueron  Bela, 

Bequer,  Asbel,  Gera,  Naamán,  Ehi,  Ros, 

Mupim, Hupim y Ard.

22

 Estos  fueron  los  hijos  de  Raquel  que 

nacieron a Jacob: catorce personas en to-

tal.

23

 Y los hijos° de Dan: Husim.

24

 Y  los  hijos  de  Neftalí:  Jahzeel,  Guni, 

Jezer y Silem.

25

 Estos fueron los hijos de Bilha, la que 

dio Labán a Raquel su hija, y ella dio a luz 

éstos a Jacob: siete personas en total.

26

 Todas las personas que fueron con Ja-

cob a Egipto, procedentes de sus lomos, 

sin contar las mujeres de los hijos de Ja-

cob, todas las personas fueron sesenta y 

seis.

27

 Y los hijos de José, que le nacieron en 

Egipto, dos personas. Todas las personas 

de la casa de Jacob que entraron en Egip-

to fueron setenta.°

28

 Envió por delante a Judá a casa de José, 

para  que  preparara  el  camino  a  Gosén. 

Cuando entraron en la tierra de Gosén,

29

 José  mando  a  uncir  su  carro  y  subió 

a  Gosén  a  recibir  a  su  padre  Israel.  Se 

presentó a él, y echándose a su cuello lo 

abrazó y lloró largamente.

30

 Entonces Israel dijo a José: Ahora pue-

do morir, después de haberte visto en per-

sona y vivo.

31

 José dijo a sus hermanos y a la casa de 

su padre: Subiré para anunciar a Faraón 

y decirle: Mis hermanos y  la  casa  de  mi 

padre, que estaban en la tierra de Canaán, 

han venido a mí.

32

 Son pastores de ovejas, que cuidan del 

ganado, y han traído sus rebaños, sus va-

cadas y todas sus posesiones.

33

 Cuando Faraón os llame y diga: ¿Cuál 

es vuestro oficio?

34

 vosotros responderéis: Tus siervos son 

pastores  desde  su  juventud  hasta  ahora, 

lo mismo nosotros que nuestros padres. 

Así  podréis  vivir  en  la  tierra  de  Gosén, 

porque todo pastor de ovejas es abomina-

ción para los egipcios.

Los israelitas en Gosén 

Últimos años de la hambruna

47

Fue, pues, José y anunció a Faraón, 

y le dijo: Mi padre y mis hermanos, 

sus  rebaños  y  vacadas,  con  todo  lo  que 

tienen, han venido de la tierra de Canaán, 

y he aquí están en la tierra de Gosén.

2

 Y de entre sus hermanos tomó a cinco 

de ellos, y los presentó ante Faraón.

46.6 

→Hch.7.15.  46.20 →Gn.41.50-52.  46.23 Notar que la forma plural hijos, hijas se usa como una frase fija →v. 15. 

46.27 

→Hch.7.14.


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Génesis 47:25

53

3

 Entonces Faraón dijo a sus hermanos: 

¿Cuál es vuestro oficio? Y respondieron a 

Faraón: Tus siervos son pastores de ovejas, 

tanto nosotros como nuestros padres.

4

 También dijeron a Faraón: Hemos veni-

do para habitar en esta tierra, pues la ham-

bruna aprieta en la tierra de Canaán y no 

hay pasto para las ovejas de tus siervos. Por 

tanto,  te  rogamos  que  permitas  que  tus 

siervos habiten en tierra de Gosén.

5

 Entonces Faraón habló a José, diciendo: 

Tu padre y tus hermanos han venido a ti.

6

 La  tierra  de  Egipto  está  delante  de  ti. 

En lo mejor de esa tierra haz habitar a tu 

padre y a tus hermanos. Que habiten en 

tierra de Gosén, y si juzgas que hay entre 

ellos hombres valerosos, ponlos por ma-

yorales de mi ganado.

7

 Luego José tomó a su padre Jacob y lo 

puso delante de Faraón, y Jacob bendijo 

a Faraón.°

8

 Entonces Faraón dijo a Jacob: ¿Cuántos 

son los días de los años de tu vida?°

9

 Jacob  respondió  a  Faraón:  Los  días  de 

los años de mis peregrinaciones son cien-

to  treinta  años.  Pocos  y  malos  han  sido 

los días de los años de mi vida, y no han 

llegado a los días de los años de la vida de 

mis padres en los días de sus peregrina-

ciones.

10

 Y Jacob bendijo a Faraón, y salió de la 

presencia de Faraón.

11

 Y José hizo habitar a su padre y a sus 

hermanos dándoles posesión en la tierra 

de Egipto, en lo mejor de la tierra, en la 

tierra de Rameses, como Faraón había or-

denado.

12

 Y abastecía José a su padre, a sus her-

manos y a toda la casa de su padre, inclui-

dos los pequeños,

13

 aunque no había alimento° en todo el 

país, y la hambruna era muy grave, y la 

tierra de Egipto y la de Canaán desfalle-

cían a causa de la hambruna.

14

 Así pues, José recogió toda la plata que 

se halló en la tierra de Egipto y en la tie-

rra de Canaán, por el grano que le com-

praban, e ingresó José la plata en la casa 

de Faraón.

15

 Cuando se hubo acabado la plata de la 

tierra de Egipto y de la tierra de Canaán, 

todo Egipto acudió a José, diciendo: Da-

nos pan. ¿Por qué hemos de morir en pre-

sencia tuya? pues la plata se ha acabado.

16

 Entonces  dijo  José:  Si  se  ha  acabado 

la plata, entregad vuestro ganado, y yo os 

daré por vuestro ganado.

17

 Y llevaron sus ganados a José. Enton-

ces José les dio pan por los caballos, por 

el ganado del rebaño, por el ganado de la 

vacada, y por los asnos. Y durante aquel 

año les suministró alimento a cambio de 

todos sus ganados.

18

 Finalizado  aquel  año,  acudieron  a  él 

el  segundo  año,  y  le  dijeron:  No  oculta-

mos  a  nuestro  señor  que,  puesto  que  la 

plata se ha acabado, y también el ganado 

es de nuestro señor, nada queda delante 

de  nuestro  señor  sino  nuestro  cuerpo  y 

nuestro suelo.

19

 ¿Por  qué  hemos  de  morir  ante  tus 

ojos, tanto nosotros como nuestra tierra? 

Cómpranos a nosotros y a nuestra tierra 

por pan, y nosotros y nuestro suelo sere-

mos esclavos de Faraón, pero danos semi-

lla para que podamos vivir y no muramos, 

y la tierra no sea asolada.

20

 Y José compró para Faraón toda la tie-

rra de Egipto, porque todos los egipcios 

vendían  sus  campos,  pues  la  hambruna 

arreciaba  sobre  ellos.  Así  el  país  llegó  a 

ser de Faraón,

21

 e hizo trasladar° al pueblo a las ciuda-

des, de un extremo al otro de Egipto.

22

 Solamente dejó de comprar la tierra de 

los sacerdotes, porque había un estatuto 

de Faraón para los sacerdotes, y ellos co-

mían la ración que Faraón les daba. Por 

eso no tuvieron que vender sus campos.

23

 José dijo al pueblo: He aquí, hoy os he 

comprado  a  vosotros  con  vuestra  tierra 

para Faraón. Ahí tenéis semilla para sem-

brar la tierra.

24

 Cuando  llegue  la  cosecha  daréis  la 

quinta  parte  a  Faraón,  y  las  cuatro  par-

tes serán vuestras para sembrar el campo, 

para alimento vuestro, para los que están 

en vuestras casas y para alimento de vues-

tros pequeños.

25

 Respondieron:  ¡Nos  has  dado  la  vida! 

Hallemos gracia a ojos de nuestro señor, 

y seamos siervos de Faraón.

47.7 

→He.7.7.  47.8 Es decir, ¿cuántos años tienes?  47.13 Lit. pan.  47.21 LXX: los sometió como esclavos.


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Génesis 47:26

54

26

 Y José lo estableció por estatuto sobre 

la tierra de Egipto hasta este día: Faraón 

recibe la quinta parte. Sólo la tierra de los 

sacerdotes no llegó a ser de Faraón.

27

 E Israel habitó en el país de Egipto, en 

tierra de Gosén, y tomaron posesión en ella, 

y fructificaron y se multiplicaron en gran 

manera.

28

 Y vivió Jacob en la tierra de Egipto die-

cisiete  años,  pues  fueron  los  días  de  Ja-

cob, los años de su vida, ciento cuarenta 

y siete años.

29

 Cuando se acercaba para Israel la hora 

de morir, llamó a su hijo José, y le dijo: Si 

he hallado gracia en tus ojos, pon ahora 

tu mano bajo mi muslo, y harás conmigo 

misericordia  y  verdad.  Te  ruego  que  no 

me entierres en Egipto.

30

 Que cuando descanse con mis padres, 

me lleves de Egipto y me entierres en el 

sepulcro de ellos. Y respondió: Yo haré se-

gún tu palabra.

31

 Y él dijo: Júramelo. Y le juró. Entonces 

Israel se postró a la cabecera de la cama.

Efraín y Manasés

48

Después de estos sucesos, se le avi-

só a José: Mira, tu padre está grave. 

Entonces él tomó consigo a sus dos hijos, 

Manasés y Efraín.

2

 Le informaron a Jacob diciendo: He aquí 

tu hijo José viene a ti. E Israel se esforzó, 

y se sentó en la cama.

3

 Y dijo Jacob a José: ’El-Shadday se me 

apareció en Luz,° en la tierra de Canaán, 

y me bendijo,

4

 y  me  dijo:  He  aquí  Yo  te  haré  fructifi-

car,  te  multiplicaré,  te  pondré  por  con-

gregación de pueblos y a tu descendencia 

después de ti daré esta tierra por posesión 

perpetua.°

5

 Pues  bien,  los  dos  hijos  que  te  nacie-

ron en la tierra de Egipto antes de venir 

yo a vivir contigo en Egipto, serán míos. 

Efraín  y  Manasés,  serán  para  mí  como 

Rubén y Simeón.

6

 En cambio, la descendencia que habrás 

engendrado después de ellos, serán tuyos, 

y en nombre de sus hermanos recibirán 

su heredad.

7

 En cuanto a mí, cuando venía de Padam, 

se  me  murió  Raquel  en  la  tierra  de  Ca-

naán, en el camino, como a media legua 

para  entrar  en  Efrata,°  y  la  sepulté  allí, 

camino de Efrata (es decir, Bet-léhem).

8

 Y viendo Israel a los hijos de José, pre-

guntó: ¿Quiénes son?

9

 Y  José  respondió  a  su  padre:  Son  mis 

hijos, que ’Elohim me dio aquí. Le dijo: 

Acércamelos para que los bendiga.

10

 Y los ojos de Israel estaban pesados a cau-

sa de la vejez, y casi no podía ver. Así pues, 

los hizo acercarse y los besó y los abrazó.

11

 Y dijo Israel a José: No contaba con ver 

tu rostro, y fíjate, ’Elohim me ha hecho 

ver también tu descendencia.

12

 Entonces José se los retiró de las rodi-

llas, y se postró con su rostro a tierra.

13

 Después tomó José a ambos, a Efraín 

con la diestra lo puso a la izquierda de Is-

rael, y a Manasés con su izquierda lo puso 

a la derecha de Israel, y se los acercó.

14

 Israel  extendió  su  diestra  y  la  puso 

sobre la cabeza de Efraín, el menor, y su 

izquierda  sobre  la  cabeza  de  Manasés, 

cruzando adrede los brazos, aunque Ma-

nasés era el primogénito.°

15

 Y bendijo a José, diciendo:

’Elohim en cuya presencia 

anduvieron mis padres Abraham 

e Isaac,

’Elohim que me ha pastoreado 

desde que existo hasta este día,

16

    El ángel que me liberta de todo mal, 

bendiga a estos jóvenes.

Sea perpetuado en ellos mi nombre,

Y el nombre de mis padres Abraham 

Isaac,

Y aumenten hasta ser una multitud 

en medio de la tierra.

17

 Pero José, viendo que su padre había co-

locado la diestra sobre la cabeza de Efraín, 

le desagradó, y asió la mano de su padre 

para cambiarla de la cabeza de Efraín a la 

cabeza de Manasés,

18

 mientras decía a su padre: Así no, pa-

dre  mío,  porque  éste  es  el  primogénito, 

pon tu diestra sobre su cabeza.

19

 Pero  su  padre  rehusó,  y  dijo:  Lo  sé, 

hijo mío, lo sé. También él llegará a ser 

48.3 

→Gn.28.19.  48.4 →Gn.28.13-14.  48.7 →Gn.35.16-19.  48.14 Era costumbre colocar la diestra sobre el primogénito, sin 

embargo el menor es bendecido de tal modo que su tribu llegaría a ser la más numerosa y poderosa junto con la de Judá.


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Génesis 49:23

55

un  pueblo,  y  también  será  grande.  Sin 

embargo,  su  hermano  menor  será  más 

grande que él, y su descendencia llegará 

a ser una multitud de naciones.

20

 Y aquel día los bendijo,° diciendo: Por 

ti  bendecirá  Israel,  diciendo:  ’Elohim  te 

haga como a Efraín y como a Manasés. Y 

colocó a Efraín delante de Manasés.

21

 Y dijo Israel a José: He aquí yo estoy 

por morir, pero ’Elohim estará con voso-

tros, y os hará volver a la tierra de vues-

tros padres.

22

 Y yo te entrego una porción mejor que 

a tus hermanos, la cual tomé de mano del 

amorreo con mi puñal y mi arco.

Profecía de Jacob para sus hijos

49

Y  llamó  Jacob  a  sus  hijos,  y  dijo: 

Reuníos, y os anunciaré lo que os 

acontecerá en los días postreros.

2

    Juntaos y escuchad, hijos de Jacob,

Oíd a vuestro padre Israel:

3

    Rubén, tú eres mi primogénito,

Mi fuerza y primicia de mi vigor,

Principal en dignidad,

Principal en poderío,

4

    Incontrolable como las aguas,

No serás el principal,

Pues subiste al lecho de tu padre y lo 

profanaste:

¡Mi tálamo escaló!

5

    Simeón y Leví son hermanos,

Sus armas° son instrumentos de 

injusticia.

6

    En su consejo no entre mi alma,

Ni mi espíritu se junte a su 

asamblea,

Pues en su furia asesinaron varones,

Y en su temeridad desjarretaron 

bueyes.

7

    Maldita sea su cólera, que fue fiera,

Y su furor, que fue cruel,

Los dividiré entre Jacob,

Y haré que se dispersen en Israel.°

8

    A ti Judá, te alabarán tus hermanos,

Tu mano, en la cerviz de tus 

enemigos,

Se postrarán ante ti los hijos de tu 

padre.

9

    Cachorro de león es Judá,

De la presa subiste, hijo mío,

Se agazapa y acecha cual león y cual 

leona,

¿Quién hará que se levante?°

10

    No será quitado el cetro de Judá,

Ni el legislador de entre sus pies,

Hasta que llegue Siloh,°

Y sea suya la obediencia de los 

pueblos.

11

    Ata a la vid su pollino,

Y a la cepa el hijo de su asna.

Lava en el vino su vestido,

Y en sangre de uvas su manto.

12

    Sus ojos están turbios por el vino,

Y sus dientes blancos por la leche.

13

    Zabulón morará a la orilla de los 

mares,°

Él será puerto de navíos,

Y su extremo hasta Sidón.

14

    Isacar, asno robusto, echado entre 

dos apriscos,°

15

    Vio que el descanso era bueno,

Y la tierra placentera.

Inclinó su hombro para cargar,

Y llegó a servir en tributo.

16

    Dan juzgará a su pueblo,

Como una de las tribus de Israel.

17

    Sea Dan serpiente junto al camino,

Víbora junto al sendero,

Que muerde los talones del caballo,

Y su jinete cae hacia atrás.

18

    ¡Por tu salvación espero, oh YHVH!

19

    Gad, salteadores lo asaltarán,

Mas él asaltará al final.

20

    El pan de Aser es sustancioso,°

Y él dará deleites al rey.

21

    Neftalí es cierva suelta,

Que está dando hermosísimas crías.

22

    Retoño fructífero es José,

Retoño fructífero junto a la fuente,

Cuyos vástagos trepan sobre el 

muro.

23

    Lo amargaron, lo asaetearon y lo 

aborrecieron los arqueros,

48.20 

→Hch.11.21.  49.5 Heb. Mejerot. Prob. cuchillos cortos de doble filo para circuncidar →Gn.34.25.  49.7 Simeón fue 

pronto absorbido por Judá, y Leví no tuvo territorio propio. 

49.9 

→Nm.24.9.  49.10 El vocablo Siloh tiene un significado incierto. 

Algunas versiones lo traducen por tributo, otras por un nombre propio aplicado al Mesías. También se ha propuesto la grafía 

shelo = que es suyo. LXX traduce: las cosas reservadas para él. 

49.13 Esta tribu se habría de asentar en la costa, al S de Fenicia. 

49.14 LXX: Isacar ha deseado lo que es bueno… descansa entre las heredades.  49.20 Asentado en zonas muy fértiles, entre 

el Carmelo y Tiro.


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Génesis 49:24

56

24

    Mas su arco permaneció en firme,

Y fueron fortalecidos los brazos de 

sus manos,

Por las manos del Fuerte de Jacob,

De allí el Pastor, la Piedra 

de Israel,

25

    Por el Dios de tu padre, quien te 

ayudará,

Por ’El-Shadday, que te bendecirá

Con bendiciones de los 

cielos arriba,

Con bendiciones de las 

profundidades abajo,

Con bendiciones de los pechos y de 

la matriz.

26

    Las bendiciones de tu padre

Han sobrepasado las bendiciones de 

mis antepasados

Hasta el límite extremo de los 

collados eternos.

Sean ellas para la cabeza de José,

Y para la coronilla del consagrado 

entre sus hermanos.

27

    Benjamín, lobo depredador,

En la mañana devorará la presa,

Y por la tarde repartirá despojos.

28

 Todas estas son las doce tribus de Is-

rael, y esto es lo que les predijo su padre, 

bendiciéndoles a cada uno según la ben-

dición que le correspondía.

Muerte de Jacob

29

 Luego les dio instrucciones y les dijo: 

Yo voy a ser reunido a mi pueblo, sepul-

tadme  con  mis  padres  en  la  cueva  que 

está en el campo de Efrón el heteo,

30

 en  la  cueva  que  está  en  el  campo  de 

la Makpelah, frente a Mamre, en la tierra 

de Canaán, la cual compró Abraham con 

el campo de Efrón heteo, como propiedad 

para sepultura.°

31

 Allí sepultaron a Abraham° y a su mu-

jer  Sara,  allí  sepultaron  a  Isaac°  y  a  su 

mujer Rebeca, y allí sepulté yo a Lea.

32

 La compra del campo y de la cueva que 

hay en él, proviene de los hijos de Het.

33

 Cuando  Jacob  concluyó  de  dar  ins-

trucciones  a  sus  hijos,  encogió  sus  pies 

en la cama, y expiró.° Y fue reunido a su 

pueblo.°

Exequias de Jacob 

Últimos días de José

50

Entonces se echó José sobre el ros-

tro de su padre, lloró sobre él, y lo 

besó.

2

 Luego José dio órdenes a los médicos a 

su servicio para que embalsamaran a su 

padre. Y los médicos embalsamaron a Is-

rael,

3

 empleando  en  ello  cuarenta  días,  pues 

tales son los días que se emplean en los 

embalsamamientos. Después los egipcios 

lo lloraron durante setenta días.

4

 Pasados los días del duelo, José habló a 

la casa de Faraón, diciendo: Si he hallado 

gracia a vuestros ojos, os ruego que ha-

bléis a oídos de Faraón, diciendo:

5

 Mi  padre  me  juramentó,  diciendo:  He 

aquí  voy  a  morir.  Me  sepultarás°  en  el 

sepulcro que yo preparé para mí mismo 

en la tierra de Canaán. Ahora pues, per-

míteme que suba a sepultar a mi padre, 

y volveré.

6

 Faraón dijo: Sube y sepulta a tu padre, 

como él te hizo jurar.

7

 Entonces subió José a sepultar a su pa-

dre, y con él subieron todos los siervos de 

Faraón,  los  ancianos  de  su  casa  y  todos 

los ancianos de la tierra de Egipto,

8

 así  como  toda  la  familia  de  José,  sus 

hermanos y la casa de su padre. Solamen-

te dejaron en la tierra de Gosén a sus pe-

queños, sus rebaños y sus vacadas.

9

 También subieron con él carros y jine-

tes, resultando el cortejo en extremo ho-

norable.

10

 Cuando llegaron a Goren-Atad,° que está 

al otro lado del Jordán, prorrumpieron en 

una muy grande y solemne lamentación, y 

él hizo duelo por su padre siete días.

11

 Los  habitantes  de  aquella  tierra,  los 

cananeos, vieron entonces el duelo en la 

era de Atad, y dijeron: Duelo honorable de 

los egipcios es éste. Por tanto, llamaron 

su nombre Abel-mizraim,° el cual está al 

otro lado del Jordán.

12

 E  hicieron  sus  hijos  tal  como  les  or-

denó,

13

 porque lo llevaron sus hijos a la tierra 

de  Canaán,  y  lo  sepultaron  en  la  cueva 

49.30 

→Gn.23.3-20.  49.31 →Gn.25.9-10.  49.31 →Gn.35.29.  49.33 →Hch.7.15.  49.33 Lit. pueblos.  50.5 →Gn.47.29-31. 

50.10 Esto es, la era de la esquina.  50.11 Esto es, duelo de egipcios.


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Génesis 50:26

57

del  campo  de  la  Makpelah,  campo  que 

Abraham había comprado a Efrón heteo, 

para propiedad de sepultura, enfrente de 

Mamre.°

14

 Después  de  sepultar  a  su  padre,  José 

volvió a Egipto juntamente con sus her-

manos, y todos los que habían subido con 

él a sepultar a su padre.

15

 Cuando los hermanos de José vieron 

que  su  padre  había  muerto,  dijeron: 

Quizá José nos guarde rencor, y cierta-

mente nos devolverá todo el mal que le 

hicimos.

16

 Entonces mandaron a decir a José: Tu 

padre dio órdenes antes de su muerte di-

ciendo:

17

 Así diréis a José: Te ruego que perdo-

nes la transgresión de tus hermanos y su 

pecado, pues te pagaron con mal. Y aho-

ra, te rogamos que perdones la transgre-

sión de los siervos del Dios de tu padre. Y 

mientras hablaban con él, José lloraba.

18

 Entonces  sus  hermanos  fueron  y  se 

postraron ante él,° y dijeron: ¡Henos aquí 

por esclavos tuyos!

19

 Pero  José  les  dijo:  No  temáis,  pues 

¿acaso estoy yo en lugar de ’Elohim?

20

 Aunque vosotros pensasteis mal contra 

mí, ’Elohim lo encaminó para bien, para 

hacer como en el presente, para mante-

ner vivo a un pueblo numeroso.

21

 Así pues, no temáis, yo os sustentaré a 

vosotros y a vuestros pequeños. Luego los 

consoló y les habló al corazón.

22

 Habitó José en Egipto, él y la casa de 

su padre. Y vivió José ciento diez años.

23

 Y José vio a los hijos de Efraín hasta la 

tercera generación. También los hijos de 

Maquir° hijo de Manasés nacieron sobre 

las rodillas° de José.

Última voluntad de José

24

 Después, dijo José a sus hermanos: Yo 

voy a morir, pero ’Elohim ciertamente os 

visitará,° y os hará subir de esta tierra a 

la tierra que juró dar a Abraham, a Isaac, 

y a Jacob.

25

 Entonces José hizo jurar a los hijos de 

Israel,  diciendo:  ’Elohim  ciertamente  os 

visitará,° entonces haréis subir mis hue-

sos de aquí.°

26

 Y murió José a la edad de ciento diez 

años, y lo embalsamaron, y fue puesto en 

el ataúd en Egipto.

50.13 

→Hch.7.16.  50.18 →37.10.  50.23 Constituye la mitad de la tribu de Manasés, la cual habitó al Oriente del Jordán. 

50.23 Es decir, fueron adoptados por José.  50.24-25 Es decir, determinará vuestro destino.  50.25 

→Ex.13.19; Jos.24.32; 

He.11.22.


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1

Estos son los nombres de los hijos de 

Israel que entraron en Egipto; con Ja-

cob entraron, cada uno con su familia:

2 Rubén, Simón, Leví y Judá,

3 Isacar, Zabulón y Benjamín,

4 Dan y Neftalí, Gad y Aser.

5 Todas las personas descendientes° de Ja-

cob, fueron setenta almas,° pues José ya 

estaba en Egipto.

6 Y murió José, y todos sus hermanos, y 

toda aquella generación.

7 Pero los hijos de Israel fueron fecundos 

y se multiplicaron,° y fueron aumentados 

y  fortalecidos  en  extremo,  y  se  llenó  de 

ellos la tierra.

8 Entonces se levantó en Egipto otro rey, 

que no conocía a José,°

9 y dijo a su pueblo: Ciertamente el pue-

blo de los hijos de Israel es más numeroso 

y fuerte que nosotros.

10 Vamos,  procedamos  con  astucia°  con-

tra él, no sea que se multiplique, y suceda 

que cuando sobrevenga una guerra, se una 

también con los que nos aborrecen, y luche 

contra nosotros y se vaya de esta tierra.

11 Entonces les impusieron capataces de 

trabajos forzados para que los abrumaran 

con sus cargas. Así se edificaron para Fa-

raón  las  ciudades  almacenes  de  Pitón  y 

Rameses.°

12 Pero cuanto más los oprimían, más se 

multiplicaban y esparcían, hasta que lle-

garon  a  sentir  aversión  por  los  hijos  de 

Israel.

13 Los egipcios esclavizaron a los hijos de 

Israel con tiranía,

14 y amargaron su vida con duro trabajo 

de arcilla y adobes, con toda clase de labo-

res del campo y en toda suerte de trabajos 

que  tuvieron  que  servir  por  causa  de  la 

opresión.

15 Entonces el rey de Egipto habló a las 

parteras hebreas, una de las cuales se lla-

maba  Sifra,°  y  el  nombre  de  la  segunda 

era Puá,°

16 y dijo: Cuando asistáis al parto a las he-

breas,  observad  los  asientos.°  Si  es  hijo, 

hacedlo morir, y si es hija, que viva.

17 Pero  las  parteras  tuvieron  temor  de 

’Elohim, y no hicieron conforme a lo que 

el rey de Egipto les había ordenado, sino 

que dejaron vivir a los niños.

18 Por lo cual el rey egipcio hizo llamar 

a las parteras, y les dijo: ¿Por qué habéis 

hecho esto, y dejáis vivir a los niños?

19 Y  las  parteras  respondieron  a  Faraón: 

Porque las mujeres hebreas no son como 

las mujeres egipcias, pues son vivaces y dan 

a luz antes que la partera llegue a ellas.

20 Y  ’Elohim  favoreció  a  las  parteras,  y 

el pueblo se multiplicó y se fortaleció en 

gran manera.

21 Y  por  haber  temido  las  parteras  a 

’Elohim,  Él  les°  concedió  muchos  des-

cendientes.

22 Sin  embargo,  Faraón  ordenó  a  todo 

su pueblo, diciendo: Echad al Nilo a todo 

hijo que nazca,° pero a toda hija dejadla 

con vida.°

Esclavitud y genocidio

1.5  Lit.  que  salieron  del  muslo.  1.5 

→Dt.10.22.  1.7  →Hch.7.17.  1.8  Probablemente  se  trate  de  una  dinastía  diferente. 

→Hch.7.18.  1.10 →Hch.7.19.  1.11 LXX registra y On, la cual es Heliópolis.  1.15 Heb. Cifra = ser hermoso.  1.15 Heb. Pu´ah 

= resplandecer

1.16 Lit. las dos piedras. Es decir, los asientos del parto. LXX traduce: y estén a punto de dar a luz.  1.21 Esto 

es, al pueblo de Israel. 

1.22 LXX registra: de los hebreos.  1.22 

→Hch.7.19.


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Éxodo 2:25

59

Moisés 

Huida a Madián

2

Un varón del linaje de Leví fue y tomó 

por mujer a una hija de Leví.°

2 La mujer concibió y dio a luz un hijo, 

y  viendo  que  era  hermoso,°  lo  escondió 

tres meses.°

3 Pero no pudiendo ocultarlo más tiem-

po,  tomó  una  cesta°  de  juncos,  la  cala-

fateó  con  asfalto  y  brea,  colocó  al  niño 

en ella, y la puso en el juncal, a la orilla 

del Nilo.

4 Y su hermana° se había situado a lo le-

jos, para saber qué se haría con él.

5 Entonces la hija de Faraón bajó a bañar-

se  al  Nilo,  y  mientras  sus  doncellas  an-

daban  junto  al  Nilo,  ella  vio  la  cesta  en 

medio del juncal y  envió  a su esclava,  y 

ella la recogió.

6 Cuando  la  abrió  vio  al  niño,  y  he  aquí 

era un niñito que lloraba; y tuvo compa-

sión de él, y exclamó: ¡Éste es uno de los 

niños de los hebreos!

7 Entonces  dijo  su  hermana  a  la  hija  de 

Faraón: ¿Quieres que llame a una nodriza 

de las hebreas para que te amamante este 

niño?

8 Y la hija de Faraón le respondió: Ve. En-

tonces la muchacha fue y llamó a la ma-

dre del niño.

9 La hija de Faraón le dijo: Llévate° a este 

niño, amamántamelo y yo te daré tu sa-

lario. Y la mujer tomó al niño y lo ama-

mantó.

10 Y el niño creció, y ella lo llevó a la hija 

de Faraón y llegó a ser su hijo,° y llamó 

su nombre Moisés,° y dijo: En verdad lo 

he sacado de las aguas.

11 Sucedió en aquellos días que, siendo ya 

mayor, Moisés salió a sus hermanos y ob-

servó su servidumbre.° Vio también a un 

egipcio que azotaba a un hebreo de entre 

sus hermanos.

12 Y él miró a uno y otro lado, y, viendo 

que no había nadie, mató al egipcio y lo 

escondió en la arena.

13 Al día siguiente salió, y he aquí dos he-

breos estaban riñendo, y dijo al agresor: 

¿Por qué golpeas a tu prójimo?

14 Y  él  respondió:  ¿Quién  te  ha  puesto 

como  príncipe  y  juez  sobre  nosotros? 

¿Piensas  acaso  asesinarme  como  asesi-

naste  al  egipcio?°  Entonces  Moisés  tuvo 

temor, y dijo: ¡Ciertamente el asunto ha 

sido descubierto!

15 Y  Faraón  oyó  este  asunto  y  procuró 

matar  a  Moisés,  pero  Moisés  huyó  de  la 

presencia de Faraón y habitó en tierra de 

Madián.°

16 Sentado allí junto a un pozo, vinie-

ron las siete hijas que tenía el sacerdo-

te  de  Madián  a  sacar  agua  y  llenar  los 

pilones  para  abrevar  el  rebaño  de  su 

padre.

17 Pero llegaron los pastores y las echa-

ron. Entonces Moisés se levantó en su de-

fensa y abrevó el rebaño de ellas.

18 Cuando ellas volvieron a Reuel su pa-

dre, éste les dijo: ¿Por qué habéis venido 

tan pronto hoy?

19 Y  ellas  dijeron:  Un  varón  egipcio  nos 

libró de mano de los pastores, y también 

diligentemente nos sacó el agua y abrevó 

el rebaño.

20 Y dijo a sus hijas: ¿Y dónde está? ¿Por 

qué habéis abandonado a ese varón? Lla-

madlo para que coma de nuestro pan.

21 Y Moisés aceptó habitar con aquel va-

rón, y dio a Moisés su hija Séfora.

22 Ella le dio a luz un hijo, y él llamó su 

nombre  Gersón,°  pues  dijo:  he  venido  a 

ser forastero en tierra extraña.

23 Después de muchos días, sucedió que 

el rey de Egipto murió, y los hijos de Is-

rael  gemían  a  causa  de  la  esclavitud,  y 

clamaron. Y por causa de la esclavitud, su 

clamor subió delante de ’Elohim.

24 Y  oyó  ’Elohim  su  gemido,  y  recordó° 

’Elohim su pacto con Abraham, con Isaac 

y con Jacob.

25 Y miró ’Elohim a los hijos de Israel, y 

’Elohim los reconoció.°

2.1 Se refiere a Amram y a Jocabed.  2.2 Lit. bueno.  2.2 

→Hch.7.20; He.11.23.  2.3 Ncesta de papiro. Significa también arca

Esta palabra también designa el arca de Noé 

→Gn.6.14 y el Arca de la Alianza.  2.4 Esto es, la hermana del niño.  2.9 Nhaz 

andar, guía. LXX: guárdame a este niño

2.10 

→Hch.7.21.  2.10 Mose = sacado. El nombre Moisés puede relacionarse con 

nombres egipcios como Tut-moses, Ra-meses

2.11 

→He.11.24.  2.11-14 →Hch.7.23-28.  2.15 Situado entre la Península 

del Sinay y Arabia, cuyos habitantes eran descendientes de Abraham. 

→Gn.25.2. →Hch.7.29; He.11.27.  2.22 Esto es, foraste-

ro

2.24 

→Gn.15.13-14.  2.25 Es decir, los tuvo por suyos y les mostró afecto


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Éxodo 3:1

60

Llamamiento y misión de Moisés

3

Apacentaba  Moisés  el  rebaño  de  su 

suegro  Jetro,  sacerdote  de  Madián,  y 

condujo el rebaño al extremo del desierto 

y llegó a Horeb,° monte de ’Elohim.

2 Entonces el ángel de YHVH se le apare-

ció en una llama de fuego en medio de la 

zarza.° Y él miró, y vio que la zarza ardía 

en  el  fuego,  pero  la  zarza  no  se  consu-

mía.

3 Y dijo Moisés: Me desviaré para observar 

esta gran aparición de por qué no se con-

sume la zarza.

4 Vio  YHVH  que  se  desviaba  para  obser-

var,  y  ’Elohim  lo  llamó  de  en  medio  de 

la zarza, y le dijo: ¡Moisés! ¡Moisés! Y él 

respondió: ¡Heme aquí!

5 Entonces dijo: No te acerques aquí, qui-

ta las sandalias de tus pies, porque el lu-

gar donde estás es suelo santo.°

6 Y  añadió:  Yo  soy  el  Dios  de  tu  padre, 

Dios  de  Abraham,  Dios  de  Isaac  y  Dios 

de Jacob. Entonces Moisés ocultó su ros-

tro, porque tuvo temor de contemplar a 

’Elohim.

7 Luego dijo YHVH: Ciertamente he vis-

to la aflicción de mi pueblo que está en 

Egipto,  y  he  escuchado  su  clamor  por 

causa  de  sus  opresores,  porque  conozco 

sus padecimientos.

8 Descenderé, pues, para librarlo de mano 

de los egipcios y para hacerlo subir de ese 

país a una tierra buena y ancha, a una tie-

rra  que  fluye  leche  y  miel,°  al  lugar  del 

cananeo, del heteo, del amorreo, del fere-

zeo, del heveo y del jebuseo.

9 Y ahora, he aquí el clamor de los hijos 

de Israel ha llegado hasta mí, y también 

he visto la opresión con que los egipcios 

los oprimen.

10 Ahora, pues, ¡anda! Te envío a Faraón: 

¡saca de Egipto a mi pueblo, los hijos de 

Israel!

11 Respondió  Moisés  a  ’Elohim:  ¿Quién 

soy yo para que vaya a Faraón, y saque de 

Egipto a los hijos de Israel?

12 Él  dijo:  Porque  Yo  estaré  contigo,  y 

ésta  será  la  señal  de  que  te  he  enviado: 

cuando hayas sacado de Egipto al pueblo, 

serviréis a ’Elohim sobre este monte.

13 Dijo  Moisés  a  ’Elohim:  Cuando  vaya 

a  los  hijos  de  Israel,  y  les  diga:  El  Dios 

de vuestros padres° me ha enviado a vo-

sotros, y me digan: ¿Cuál es su nombre? 

¿Qué les diré?

14 Respondió  ’Elohim  a  Moisés:  Y

o

  S

oY

 

el

 

que

 S

oY

.° Y añadió: Así dirás a los hi-

jos  de  Israel:  Y

o

  S

oY

°  me  ha  enviado  a 

vosotros.

15 Dijo además ’Elohim a Moisés: Así di-

rás a los hijos de Israel: YHVH, el Dios de 

vuestros  padres,  Dios  de  Abraham,  Dios 

de Isaac y Dios de Jacob, me ha enviado 

a vosotros. Éste es mi Nombre para siem-

pre jamás, y éste es mi memorial de gene-

ración en generación.

16 Ve,  reúne  a  los  ancianos  de  Israel,  y 

diles: YHVH, Dios de vuestros padres, el 

Dios de Abraham, de Isaac, y de Jacob, se 

me  apareció,  diciendo:  En  verdad  os  he 

visitado  y  he  visto  lo  que  se  os  hace  en 

Egipto.

17 Y he dicho: Os haré subir de la aflicción 

de Egipto a la tierra del cananeo, del heteo, 

del amorreo, del ferezeo, del heveo y del je-

buseo, a una tierra que fluye leche y miel.

18 Y ellos atenderán a tu voz. Luego en-

trarás tú, y los ancianos de Israel ante el 

rey de Egipto, y le diréis: YHVH, Dios de 

los  hebreos,  se  nos  ha  aparecido.  Ahora 

pues,  permite  que  hagamos  camino  de 

tres  jornadas  por  el  desierto,  y  ofrezca-

mos sacrificios para YHVH nuestro Dios.

19 Sin embargo, Yo sé que el rey de Egip-

to no os dejará partir, sino forzado° por 

mano poderosa.

20 Extenderé  entonces  mi  mano,  y  haré 

que  Egipto  sea  golpeado  con  todos  mis 

prodigios que haré en medio de él, y des-

pués de esto, os dejará ir.

21 Además  haré  que  este  pueblo  halle 

gracia ante los ojos de los egipcios, y su-

cederá que cuando partiereis, no os iréis 

vacíos,

22 sino que cada mujer pedirá a su vecina 

y al huésped de su casa objetos de plata, 

3.1 También llamado Sinay, lugar de revelación de Dios.  3.2-10 

→Hch.7.30-34.  3.5 Es decir, lugar donde está la presencia 

de Dios

3.8 Tierra que fluye leche y miel. Nombre simbólico de la tierra prometida a los hijos de Israel.  3.13 

→Ex.6.2-3. 

3.14 Heb. ehyeh asher ehyeh = Seré el que Seré

→Ap.1.4,8.  3.14 Heb. ehyeh. Mismo caso, ver nota anterior →Jn.18.5-6. 

3.19 .forzado.


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Éxodo 4:25

61

objetos de oro y vestidos, y los pondréis 

sobre vuestros hijos e hijas, y así despoja-

réis a los egipcios.°

Misión de Moisés 

El regreso a Egipto

4

Pero Moisés respondió, y dijo: ¿Y qué 

si  no  me  creen,  ni  atienden  mi  voz, 

sino que dicen: YHVH no se te ha apare-

cido?

2 Entonces YHVH le dijo: ¿Qué es eso que 

tienes  en  tu  mano?  Y  él  respondió:  Una 

vara.

3 Él le dijo: Arrójala al suelo. Y él la arrojó 

a la tierra, y se convirtió en una serpiente, 

y al verla Moisés huyó.

4 Pero  YHVH  dijo  a  Moisés:  Extiende  tu 

mano y atrápala por su cola. Él alargando 

su mano, la sujetó, y se tornó vara en su 

palma.

5 Esto  es  para  que  crean  que  YHVH,  el 

Dios  de  tus  padres,  Dios  de  Abraham, 

Dios de Isaac y Dios de Jacob se te ha apa-

recido.

6 Y  otra  vez  le  dijo  YHVH:  Mete  ahora 

tu mano en tu seno. Y él metió su mano 

en su seno, y cuando la sacó, he aquí su 

mano estaba leprosa como la nieve.

7 Y  dijo:  Vuelve  a  meter  tu  mano  en  tu 

seno.  Y  él  volvió  su  mano  a  su  seno,  y 

cuando la sacó de su seno, he aquí volvió 

a ser como su carne.

8 Y  sucederá  que  si  no  te  creen,  ni  obe-

decen la advertencia de la primera señal, 

creerán la advertencia de la última señal.

9 Y  si  tampoco  creen  a  estas  dos  seña-

les, ni obedecen tu advertencia, tomarás 

entonces  de  las  aguas  del  Nilo  y  las  de-

rramarás  sobre  lo  seco,  y  las  aguas  que 

saques del Nilo se convertirán en sangre 

sobre el suelo seco.

10 Dijo entonces Moisés a YHVH: ¡Te rue-

go, Adonay! No soy hombre elocuente ni 

ayer ni anteayer, ni desde que hablaste a 

tu siervo, pues soy torpe de boca y torpe 

de lengua.

11 Pero YHVH le respondió: ¿Y quién ha 

dado  boca  al  hombre?  ¿O  quién  hizo  al 

mudo y al sordo, al vidente y al ciego? ¿No 

soy Yo YHVH?

12 Ahora pues, ve, y Yo estaré con tu boca, 

y te instruiré acerca de lo que hablarás.

13 Pero él respondió: ¡Te ruego, Adonay! 

Envía, te ruego, por medio del que debas 

enviar.

14 Entonces la ira de YHVH se encendió 

contra Moisés, y dijo: ¿No es Aarón el le-

vita tu hermano? Yo sé que ciertamente 

él hablará, y también he aquí, él sale a tu 

encuentro. Cuando él te vea, se alegrará 

en su corazón.

15 Hablarás pues con él, y pondrás las pa-

labras en su boca, y Yo estaré con tu boca 

y con su boca, y os enseñaré lo que debáis 

hacer.

16 Él hablará por ti al pueblo, y te servirá 

de vocero, y tú le serás por Dios.

17 Toma en tu mano esta vara, con la cual 

harás las señales.

18 Entonces fue Moisés y volvió a su sue-

gro Jetro, y le dijo: Me marcharé ahora y 

volveré con mis hermanos que están en 

Egipto, y veré si aún viven. Y Jetro dijo a 

Moisés: Ve en paz.

19 YHVH había dicho a Moisés en Madián: 

Ve, vuelve a Egipto, porque han muerto 

todos los que buscaban tu vida.

20 Tomó,  pues,  Moisés  a  su  mujer  y  sus 

hijos, los hizo montar sobre el asno, y re-

gresó a la tierra de Egipto. Y tomó Moisés 

la vara de Dios en su mano,

21 pues  YHVH  había  dicho  a  Moisés: 

Cuando vuelvas a Egipto considera todos 

los prodigios que he puesto en tu mano, y 

los harás en presencia de Faraón, aunque 

Yo  mismo  endureceré  su  corazón,  y  no 

dejará ir al pueblo.

22 Y dirás a Faraón: Así ha dicho YHVH: 

Israel es mi hijo, mi primogénito,

23 y  te  digo:  Deja  ir  a  mi  hijo  para  que 

me sirva; pero tú rehusarás dejarlo ir. He 

aquí Yo voy a matar a tu hijo, tu primo-

génito.°

24 Y  ocurrió  por  el  camino,  en  una  po-

sada, que YHVH° le salió al encuentro y 

procuró hacerlo morir.

25 Pero Séfora, tomando un pedernal afi-

lado, cortó el prepucio de su hijo, y tirán-

dolo a los pies de él, dijo: ¡Realmente me 

eres esposo de sangre!

3.21.22 

→Ex.12.35-36.  4.23 Estas palabras se dirigen tanto a Faraón como a Moisés. →Ex.12.29.  4.24 LXX: el ángel del 

Señor.


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Éxodo 4:26

62

26 Entonces  se  apartó°  de  él,  mientras 

ella decía: Esposo de sangre eres, por la 

circuncisión.

27 Y YHVH había dicho a Aarón: Ve al de-

sierto al encuentro de Moisés. Y él fue y lo 

encontró en el monte de Dios, y lo besó.

28 Y Moisés declaró a Aarón todas las pa-

labras con que YHVH lo había enviado, y 

todas las señales que le había ordenado.

29 Fueron Moisés y Aarón y reunieron a 

todos los ancianos de los hijos de Israel.

30 Luego  habló  Aarón  todas  las  palabras 

que YHVH había hablado a Moisés, e hizo 

las señales ante los ojos del pueblo.

31 El pueblo creyó, y al oír que YHVH se 

ocupaba de los hijos de Israel, y había vis-

to  su  aflicción,  hicieron  reverencia  y  se 

postraron.

Ante Faraón 

El primer requerimiento

5

Después Moisés y Aarón llegaron ante 

Faraón,  y  le  dijeron:  Así  dice  YHVH, 

Dios  de  Israel:  Deja  ir  a  mi  pueblo  para 

que me haga celebración en el desierto.

2 Pero  Faraón  respondió:  ¿Quién  es 

YHVH, para que yo obedezca su voz y deje 

ir a Israel? ¡No conozco a YHVH, y tampo-

co he de soltar a Israel!

3 Ellos dijeron: El Dios de los hebreos nos 

ha  salido  al  encuentro,  permite,  pues, 

que marchemos camino de tres jornadas 

por el desierto, y ofrezcamos sacrificio a 

YHVH nuestro Dios, no sea que nos ata-

que con pestilencia o espada.

4 El rey de Egipto les dijo: Moisés y Aarón: 

¿Por qué distraéis al pueblo de sus faenas? 

¡Volved a vuestras tareas!

5 Dijo  también  Faraón:  Mirad,  el  pueblo 

de este país ahora es numeroso, y vosotros 

los estáis haciendo cesar de sus tareas.

6 Y aquel mismo día Faraón ordenó a los 

supervisores° del pueblo° y a sus capora-

les,° diciendo:

7 No continuéis dando paja al pueblo para 

fabricar adobes como en días atrás. ¡Que 

ellos vayan y recojan la paja por sí mis-

mos!

8 Y  les  exigiréis  la  misma  cantidad  de 

adobes que hacían en días atrás, y no la 

rebajaréis, porque son perezosos, por eso 

claman diciendo: Deseamos ir a hacer sa-

crificios para nuestro Dios.

9 ¡Agrávese la labor a esa gente y que se 

ocupen en ella, y no atiendan a palabras 

mentirosas!

10 Saliendo  entonces  los  supervisores  y 

los caporales del pueblo, hablaron al pue-

blo, y les dijeron: Así ha dicho Faraón: ¡Ya 

no os doy más paja!

11 Id vosotros, recoged vosotros mismos 

paja donde la encontréis, aunque nada se 

disminuirá de vuestro trabajo.

12 Así  el  pueblo  se  esparció  por  toda  la 

tierra de Egipto para recoger rastrojo que 

sirviera de paja.

13 Entre tanto los supervisores los apre-

miaban,  diciendo:  Acabad  vuestras  fae-

nas,  cada  jornada  el  cupo  del  día,  como 

cuando había paja.

14 También los caporales de los hijos de 

Israel,  que  los  supervisores  de  Faraón 

habían puesto sobre ellos, eran azotados, 

diciéndoseles: ¿Por qué no habéis cumpli-

do ni ayer ni hoy vuestra cuota de adobe 

como antes?

15 Entonces  los  caporales  de  los  hijos  de 

Israel llegaron y se quejaron ante Faraón, 

diciendo: ¿Por qué tratas así a tus siervos?

16 No  se  da  paja  a  tus  siervos,  pero  nos 

dicen: ¡Haced adobes! He aquí tus siervos 

son azotados, como si tu pueblo° fuera el 

culpable.°

17 Pero él respondió: Sois perezosos, muy 

perezosos,  y  por  eso  vosotros  decís:  Va-

mos a ofrecer sacrificio para YHVH.

18 Id ahora y trabajad. No se os dará paja, 

y habéis de entregar la cuota de adobes.

19 Y los caporales de los hijos de Israel se 

vieron  en  apuros  al  decírseles:  ¡Nada  de 

vuestros  adobes  se  reducirá:  la  tarea  de 

cada jornada en su día!

20 Al  salir  de  la  presencia  de  Faraón,  se 

encontraron con Moisés y Aarón, que los 

aguardaban,

21 y  les  dijeron:  Que  YHVH  os  mire  y 

juzgue, pues habéis hecho heder nuestro 

aliento a ojos de Faraón y de sus servido-

res,° poniéndoles en su mano una espada 

para que se nos mate.

4.26 Esto es, YHVH.  5.6 supervisores. Estos son egipcios.  5.6 pueblo. Esto es, Israel.  5.6 Estos son israelitas.  5.16 Esto es, 

Israel

5.16 Npero tu pueblo es el culpable.  5.21 La incongruencia entre heder y ojos enfatiza el aborrecimiento. 


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Éxodo 6:27

63

22 Entonces  Moisés  se  volvió  a  YHVH,  y 

dijo:  Señor  mío,  ¿por  qué  afliges  a  este 

pueblo? ¿Para qué me enviaste?

23 Porque desde que fui a Faraón para ha-

blar  en  tu  Nombre,  él  ha  afligido  a  este 

pueblo, y ciertamente Tú no has librado a 

tu pueblo en modo alguno.

La respuesta divina

6

Dijo  YHVH  a  Moisés:  Ahora  verás  lo 

que Yo haré a Faraón, porque constre-

ñido por una mano fuerte los dejará ir, y 

en virtud de una mano fuerte los expulsa-

ra de su tierra.

2 Y habló ’Elohim a Moisés, y le dijo: Yo 

soy YHVH.

3 Yo me aparecí a Abraham, a Isaac y a Ja-

cob como ’El-Shadday,° pero con mi nom-

bre YHVH no me di a conocer a ellos.°

4 También  establecí  mi  pacto  con  ellos 

para darles la tierra de Canaán, tierra de 

sus peregrinaciones en la cual vivieron.

5 Y ahora Yo he escuchado el gemido de 

los hijos de Israel, a quienes los egipcios 

hacen servir, y he recordado mi pacto.

6 Por tanto, di a los hijos de Israel: Yo soy 

YHVH, y os sacaré de debajo de las cargas 

de los egipcios, y os libraré de su esclavi-

tud, y os redimiré con brazo extendido y 

con grandes juicios.

7 Os  tomaré  para  mí  por  pueblo  y  seré 

para vosotros por Dios; y sabréis que Yo 

soy  YHVH  vuestro  Dios,  que  os  sacó  de 

debajo de las cargas de los egipcios.

8 Y os llevaré a la tierra por la cual alcé 

mi mano que la daría a Abraham, a Isaac 

y  a  Jacob,  y  os  la  daré  en  posesión.  Yo, 

YHVH.

9 Así  habló  Moisés  a  los  hijos  de  Israel, 

pero a causa de la impaciencia de espíri-

tu y la dura esclavitud, no escucharon a 

Moisés.

10 Entonces  YHVH  habló  a  Moisés,  di-

ciendo:

11 Entra, habla a Faraón rey de Egipto que 

deje ir de su tierra a los hijos de Israel.

12 Y  habló  Moisés  delante  de  YHVH,  di-

ciendo: He ahí, los hijos de Israel no me 

escuchan,  ¿cómo  me  escuchará  Faraón 

siendo yo incircunciso de labios?

13 Entonces  YHVH  habló  a  Moisés  y  a 

Aarón y les dio instrucciones para los hi-

jos de Israel y para Faraón rey de Egipto, 

a  fin  de  sacar  a  los  hijos  de  Israel  de  la 

tierra de Egipto.

Las familias de Rubén, Simeón y Leví

14 Estos son las cabezas de las casas pater-

nas: Los hijos de Rubén, el primogénito 

de Israel: Hanoc y Falú, Hezrón y Carmi. 

Estas son las familias de Rubén.

15 Los hijos de Simeón: Jemuel, Jamín, 

Ohad,  Jaquín,  Zoar  y  Saúl,  hijo  de  una 

cananea.  Estas  son  las  familias  de  Si-

meón.

16 Estos son los nombres de los hijos de 

Leví por sus linajes: Gersón, Coat y Me-

rari, y los años de la vida de Leví fueron 

ciento treinta y siete años.

17 Los hijos de Gersón: Libní y Simeí, por 

sus familias.

18 Y los hijos de Coat: Amram, e Izar, He-

brón y Uziel. Y los años de la vida de Coat 

fueron ciento treinta y tres años.

19 Y  los  hijos  de  Merari:  Mahli  y  Musi. 

Estas son las familias de Leví según sus 

generaciones.°

20 Y  Amram  tomó  por  mujer  a  su  tía 

Jocabed, la cual le dio a luz a Aarón y a 

Moisés. Y los años de la vida de Amram 

fueron ciento treinta y siete años.

21 Y los hijos de Izar: Cora, Nefeg y Zicri.

22 Y los hijos de Uziel: Misael, Elzafán y 

Sitri.

23 Y  Aarón  tomó  por  mujer  a  Elizabet, 

hija de Aminadab, hermana de Naasón, la 

cual le dio a luz a Nadab, a Abiú, a Eleazar 

y a Itamar.

24 Y los hijos de Coré: Asir, Elcana y Abia-

saf: estas son las familias de los coreítas.

25 Y Eleazar ben Aarón, tomó para sí una 

mujer de las hijas de Futiel, la cual le dio 

a luz a Finees. Y estos son las cabezas pa-

ternas de los levitas según sus familias.

26 Fue  a  Aarón  y  Moisés  a  quienes  dijo 

YHVH: ¡Sacad a los hijos de Israel de la 

tierra de Egipto según sus escuadrones!

27 Ellos son los que hablaron a Faraón rey 

de Egipto para sacar de Egipto a los hijos 

de Israel. Estos fueron Moisés y Aarón.

6.2-3 

→Ex.3.13-15.  6.3 Es decir, no se dio a conocer en la manifestación de poder del nombre YHVH, como estaba por hacerlo 

con Israel en virtud de los prodigios que iba realizar en Egipto. 

6.16-19 

→1 Cr.6.16-19.


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Éxodo 6:28

64

28 Ahora bien, el día en que habló YHVH 

a Moisés en la tierra de Egipto,

29 sucedió que YHVH se dirigió a Moisés, 

diciendo:  Yo  soy  YHVH.  Habla  a  Faraón 

rey de Egipto todo lo que te hablo.

30 Pero  Moisés  respondió  ante  YHVH: 

He  aquí,  yo  soy  incircunciso  de  labios, 

¿cómo, pues, me escuchará Faraón?

Confirmación del llamamiento 

Comienzo de las plagas

7

Entonces  dijo  YHVH  a  Moisés:  He 

aquí, te he puesto como ’Elohim ante 

Faraón, y tu hermano Aarón será tu pro-

feta.

2 Tú  hablarás  cuanto  Yo  te  ordene,  y  tu 

hermano  Aarón  hablará  a  Faraón  para 

que deje salir de su tierra a los hijos de 

Israel.

3 Sin embargo, Yo endureceré el corazón 

de Faraón, y aunque multiplique mis se-

ñales y mis prodigios en la tierra de Egip-

to,°

4 Faraón no os escuchará. Yo pondré mi 

mano en Egipto, y con grandes juicios sa-

caré de la tierra de Egipto a mis escuadro-

nes, mi pueblo, los hijos de Israel.

5 Y sabrán los egipcios que Yo soy YHVH, 

cuando extienda mi mano contra Egipto, 

y saque a los hijos de Israel de en medio 

de ellos.

6 Y Moisés y Aarón hicieron como YHVH 

les había ordenado. Así hicieron.

7 Tenía  Moisés  ochenta  años  y  Aarón 

ochenta  y  tres  años  cuando  hablaron  a 

Faraón.

8 Y  YHVH  había  hablado  a  Moisés  y  a 

Aarón, diciendo:

9 Cuando  Faraón  os  hable  diciendo:  Ha-

ced  vuestro  prodigio,  entonces  dirás  a 

Aarón: Toma tu vara y échala delante de 

Faraón. Se convertirá en serpiente.

10 Llegaron,  pues,  Moisés  y  Aarón  ante 

Faraón e hicieron como había ordenado 

YHVH, y echó Aarón su vara ante el rostro 

de Faraón y de sus siervos, y se convirtió 

en serpiente.

11 Pero Faraón llamó a su vez a los sabios 

y a los encantadores, y los magos de Egip-

to también hicieron lo mismo con sus en-

cantamientos,

12 pues  echaron  cada  uno  su  vara  y  se 

convirtieron en serpientes. Sin embargo, 

la vara de Aarón devoró las varas de ellos.

13 Y  tal  como  había  hablado  YHVH,  el 

corazón de Faraón se endureció y no los 

escuchó.

14 Entonces dijo YHVH a Moisés: el cora-

zón de Faraón se ha vanagloriado de no 

dejar libre al pueblo.

15 Ve por la mañana a Faraón cuando salga 

hacia las aguas, y hazte encontradizo con 

él a la orilla del Nilo, llevando en tu mano 

la vara que se convirtió en serpiente,

16 y  dile:  YHVH,  el  Dios  de  los  hebreos, 

me ha enviado a ti para decir: Deja par-

tir a mi pueblo para que me sirvan en el 

desierto. He aquí no has obedecido hasta 

ahora.

17 Ahora  dice  YHVH:  En  esto  conocerás 

que Yo soy YHVH: He aquí golpearé con la 

vara que tengo en la mano sobre las aguas 

que están en el Nilo, y se convertirán en 

sangre,°

18 y los peces que están en el río morirán, 

y el río hederá, y los egipcios tendrán re-

pugnancia de beber las aguas del Nilo.

19 Y  YHVH  dijo  a  Moisés:  Di  a  Aarón: 

Toma tu vara, y extiende tu mano contra 

las  aguas  de  Egipto,  contra  sus  arroyos, 

contra sus ríos, contra sus canales, contra 

sus estanques y contra todos sus depósi-

tos  de  aguas,  para  que  se  conviertan  en 

sangre, y tanto en las vasijas de madera 

como en las de piedra,° haya sangre por 

toda la tierra de Egipto.

20 Y  Moisés  y  Aarón  hicieron  así,  como 

YHVH había ordenado. Y él alzó y golpeó 

con  la  vara  las  aguas  que  estaban  en  el 

Nilo ante ojos de Faraón y ante los ojos de 

sus siervos. Y todas las aguas que estaban 

en el Nilo se convirtieron en sangre.

21 Y murieron los peces que había en el 

Nilo, y el río hedió y los egipcios no pu-

dieron beber el agua del Nilo. Y hubo san-

gre por toda la tierra de Egipto.

22 Pero  los  magos  de  Egipto  hicieron  lo 

mismo  con  sus  encantamientos,  y  tal 

como YHVH había predicho, el corazón de 

Faraón se endureció, y no los escuchó.

23 Regresó Faraón y fue a su casa, y tam-

poco prestó atención° a eso.

7.3 

→Hch.7.36.  7.17 →Ap.16.4.  7.19 Lit. tanto en madera como en piedra.  7.23 Lit. puso su corazón


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Éxodo 8:24

65

24 Y todos los egipcios tuvieron que exca-

var en los alrededores del Nilo para beber 

agua,  porque  no  podían  beber  del  agua 

del Nilo.

25 Siete días transcurrieron después que 

YHVH golpeara el Nilo.

Segunda, tercera y cuarta plaga

8

Dijo entonces YHVH a Moisés: Entra a 

la presencia de Faraón y dile: Así dice 

YHVH: Deja partir a mi pueblo para que 

me sirvan,

2 y si te niegas a dejarlo ir, he aquí Yo pla-

garé con ranas todo tu territorio.

3 El Nilo bullirá con ranas, las cuales su-

birán y penetrarán en tu palacio, en tu al-

coba y sobre tu propio lecho, así como en 

las casas de tus siervos y entre tu pueblo, 

en tus hornos y en tus artesas.

4 Y  las  ranas  subirán  sobre  ti,  sobre  tu 

pueblo y sobre todos tus siervos.

5 Después YHVH dijo a Moisés: Di a Aarón: 

Extiende  tu  mano  con  tu  vara  sobre  los 

arroyos, sobre los canales y sobre los es-

tanques, y haz que suban las ranas sobre 

la tierra de Egipto.

6 Y  Aarón  extendió  su  mano  sobre  las 

aguas  de  Egipto,  y  subieron  las  ranas,  y 

cubrieron la tierra de Egipto.

7 Y los magos hicieron así con sus encan-

tamientos, haciendo subir las ranas sobre 

la tierra de Egipto.

8 Faraón  entonces  llamó  a  Moisés  y  a 

Aarón,  y  les  dijo:  suplicad  a  YHVH  que 

aparte las ranas de mí y de mi pueblo, y 

dejaré ir al pueblo para que ofrezca sacri-

ficio a YHVH.

9 Y Moisés dijo a Faraón: Dígnate señalar-

me para cuándo he de suplicar por ti, por 

tus siervos y por tu pueblo, para que las 

ranas se quiten de ti y de tus casas, y sean 

dejadas sólo en el Nilo.

10 Y él dijo: Mañana. Y Moisés respondió: 

Sea conforme a tu palabra, para que sepas 

que no hay como YHVH nuestro Dios.

11 Se  retirarán,  pues,  las  ranas  de  ti,  de 

tus casas, de tus siervos y de tu pueblo; 

sólo serán dejadas en el Nilo.

12 Y Moisés y Aarón salieron de estar con 

Faraón,  y  clamó  Moisés  a  YHVH  por  el 

asunto de las ranas que Él había puesto 

sobre Faraón.

13 E hizo YHVH conforme a la súplica de 

Moisés, y murieron las ranas de las casas, 

de los patios y de los campos,

14 y las amontonaron en grandes monto-

nes, y el país hedía.

15 Pero cuando Faraón vio que había un 

alivio, endureció su corazón, y no los es-

cuchó, tal como YHVH había hablado.

16 Entonces  YHVH  dijo  a  Moisés:  Di  a 

Aarón: Extiende tu vara y golpea el polvo 

de la tierra, y haya piojos en toda la tierra 

de Egipto.

17 Y ellos lo hicieron así, y extendió Aarón 

su mano con su vara, y golpeó el polvo de 

la tierra, volviéndose piojos en los hom-

bres y las bestias. ¡Todo el polvo de la tie-

rra se convirtió en piojos en todo el país 

de Egipto!

18 Y los magos intentaron sacar los piojos 

con sus encantamientos, pero no pudie-

ron. Hubo piojos sobre los hombres y so-

bre las bestias.

19 Entonces dijeron los magos a Faraón: 

¡Esto es el dedo de Dios! Pero el corazón 

de Faraón se endureció, y no los escuchó, 

tal como YHVH había hablado.

20 Después dijo YHVH a Moisés: Madruga 

por la mañana y preséntate ante Faraón. 

He aquí que saldrá hacia el agua y le di-

rás: Así dice YHVH: Deja partir a mi pue-

blo para que me sirva.

21 Porque si no dejas partir a mi pueblo, 

he aquí enviaré una plaga de moscas con-

tra ti, contra tus siervos, contra tu pueblo 

y contra tus casas, de suerte que las casas 

de los egipcios se llenarán de moscas jun-

to con el suelo que pisan.

22 Sin embargo, en aquel día exceptuaré 

la tierra de Gosén,° en la cual habita mi 

pueblo, a fin de que no haya moscas en 

ella, para que sepas que Yo, YHVH, estoy 

en medio de esta tierra.

23 Y Yo haré distinción° entre mi pueblo 

y tu pueblo. Para mañana será este pro-

digio.

24 Y así hizo YHVH. Y un molesto enjam-

bre de moscas entró en casa de Faraón y 

en las casas de sus siervos. Y en todo el 

8.22 Región al E del delta del Nilo, donde se asentaron los israelitas en tiempos de José por sus cualidades para la agricultura 

y la ganadería. 

8.23 Lit. redención


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Éxodo 8:25

66

país de Egipto la tierra se corrompió por 

causa de las moscas.

25 Faraón  entonces  llamó  a  Moisés  y  a 

Aarón,  y  les  dijo:  Id,  haced  sacrificio  a 

vuestro Dios en el país.

26 Pero Moisés respondió: No es correcto 

hacerlo  así,  porque  sacrificaríamos  para 

YHVH nuestro Dios lo que es abominación 

para los egipcios. Si sacrificamos lo que es 

una abominación para los egipcios delante 

de sus ojos, ¿no nos apedrearían?°

27 Iremos  camino  de  tres  jornadas  por 

el desierto y haremos sacrificio a YHVH 

nuestro Dios, conforme Él nos diga.

28 Respondió  Faraón:  Os  dejaré  partir 

para  ofrecer  sacrificio  a  YHVH  vuestro 

Dios en el desierto, sólo que al partir no 

os alejéis demasiado. ¡Suplicad por mí!

29 Dijo Moisés: En cuanto salga de estar 

contigo suplicaré a YHVH, y las moscas se 

apartarán mañana de Faraón, de sus sier-

vos y de su pueblo, con tal que Faraón no 

siga engañándome impidiendo al pueblo 

que parta a ofrecer sacrificios a YHVH.

30 Salió,  pues,  Moisés  de  estar  con  Fa-

raón, y suplicó a YHVH.

31 Y YHVH hizo conforme a la palabra de 

Moisés,  y  apartó  las  moscas  de  Faraón, 

sus siervos y su pueblo. No quedó ni una.

32 Sin embargo Faraón endureció su co-

razón también esta vez, y no dejó partir 

al pueblo.

Quinta, sexta y séptima plaga

9

Dijo  YHVH  a  Moisés:  Ve  a  Faraón  y 

dile: Así dice YHVH, el Dios de los he-

breos: Deja ir a mi pueblo, para que me 

sirvan,

2 porque si tú rehúsas dejarlos ir y conti-

núas reteniéndolos,

3 he  aquí  la  mano  de  YHVH  estará  con 

una  peste  gravísima  sobre  tus  ganados 

que están en el campo, sobre los caballos, 

los asnos, los camellos, la vacada y el ga-

nado lanar.

4 Pero YHVH hará separación entre los ga-

nados de Israel y los de Egipto, y no morirá 

nada de todo lo de los hijos de Israel.

5 Y  YHVH  fijó  plazo,  diciendo:  Mañana 

hará YHVH esta cosa en el país.

6 En  efecto,  al  día  siguiente  YHVH 

cumplió  esta  palabra,  pereciendo  todo 

el  ganado  de  Egipto,  mientras  que  del 

ganado de los hijos de Israel no murió 

ni uno.

7 Y envió Faraón, y he aquí que del gana-

do de los hijos de Israel no había perecido 

ni uno. Aun así, el corazón de Faraón se 

endureció y no dejó partir al pueblo.

8 Entonces YHVH dijo a Moisés y a Aarón: 

Tomad unos puñados de ceniza de horno, 

y espárzala Moisés hacia los cielos en pre-

sencia de Faraón,

9 y se convertirá en polvo sobre toda la tie-

rra de Egipto, el cual producirá forúncu-

los que reventarán en úlceras en hombres 

y bestias por toda la tierra de Egipto.

10 Entonces tomaron la ceniza del horno 

y se presentaron ante Faraón, y Moisés la 

esparció  hacia  los  cielos,  y  se  formaron 

forúnculos° que reventaron en ulceras en 

los hombres y en las bestias.

11 Y los magos no pudieron permanecer 

en presencia de Moisés a causa de las úl-

ceras, pues había úlceras en los magos y 

en todos los egipcios.

12 Pero  YHVH  endureció  el  corazón  de 

Faraón  y  no  los  escuchó,  según  YHVH 

había predicho a Moisés.

13 YHVH dijo entonces a Moisés: Madruga 

de mañana y preséntate a Faraón y dile: 

Así  dice  YHVH,  el  Dios  de  los  hebreos: 

Deja ir a mi pueblo para que me sirva,

14 pues esta vez Yo enviaré todas mis pla-

gas sobre tu corazón, sobre tus siervos y 

sobre tu pueblo, a fin de que sepas que no 

hay otro como Yo en toda la tierra.

15 Porque  ahora,  si  Yo  hubiera  lanzado 

mi mano para azotarte con pestilencia a 

ti y a tu pueblo, ya habrías sido extermi-

nado de la tierra.

16 Mas  para  esto  te  he  sostenido,  para 

mostrar en ti mi poder, y para proclamar 

mi Nombre por toda la tierra.°

17 ¿Todavía te yergues como una barrera 

contra mi pueblo para no dejarlos partir?

18 He  aquí  que  Yo,  mañana  a  esta  hora 

haré llover una granizada tan recia cual 

nunca hubo en Egipto desde el día en que 

se fundó hasta ahora.

8.26 Se ponen de manifiesto las diferencias cúlticas de ambos pueblos. Los animales aptos para el sacrificio israelita eran 

considerados sagrados para los egipcios. 

9.10 

→Ap.16.2.  9.16 →Ro.9.17. 


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Éxodo 10:7

67

19 Envía  y  asegura  tu  ganado  y  todo  lo 

que tienes en el campo, porque toda per-

sona o animal que se halle en el campo y 

no sea recogido en casa, caerá el granizo 

y morirán.

20 El que de entre los siervos de Faraón 

tuvo temor de la palabra de YHVH, hizo 

que sus siervos y su ganado huyeran a las 

casas.

21 Pero el que no puso en su corazón la 

palabra de YHVH, dejó a sus siervos y sus 

ganados en el campo.

22 Luego YHVH dijo a Moisés: Extiende tu 

mano a los cielos, y caiga granizo en toda 

la tierra de Egipto, sobre las personas, y 

sobre los animales y sobre toda planta del 

campo en la tierra de Egipto.

23 Extendió,  pues,  Moisés  su  vara  a  los 

cielos y YHVH dio truenos y granizo, y el 

fuego  se  extendió  por  la  tierra,  y  YHVH 

hizo  llover  granizo  sobre  la  tierra  de 

Egipto.

24 Hubo así granizo y fuego° que relam-

pagueaba en medio del granizo, tan fuer-

te como nunca hubo en toda la tierra de 

Egipto desde que había llegado a ser na-

ción.

25 Y aquel granizo golpeó toda la tierra de 

Egipto,  todo  lo  que  estaba  en  el  campo, 

desde los hombres hasta las bestias, y des-

trozó el granizo toda la hierba del campo 

y desgajó todos los árboles del campo.

26 Sólo en la tierra de Gosén, donde esta-

ban los hijos de Israel, no hubo granizo.

27 Entonces Faraón envió a llamar a Moi-

sés y a Aarón, y les dijo: He pecado esta 

vez. YHVH es el Justo, y yo y mi pueblo 

los malvados.

28 Suplicad a YHVH que no haya voces° 

de  Dios  ni  granizo.  Entonces  os  dejaré 

partir y no seguiréis retenidos.

29 Díjole Moisés: Cuando salga de la ciu-

dad extenderé mis manos a YHVH, y los 

truenos cesarán y no habrá más granizo, 

para que sepas que la tierra es de YHVH,

30 aunque  yo  sé  que  ni  tú  ni  tus  sier-

vos  teméis  aún  a  la  presencia  de  YHVH 

’Elohim.

31 Así pues el lino y la cebada fueron des-

truidos, porque la cebada estaba ya espi-

gada y el lino en caña.

32 Pero  el  trigo  y  el  centeno  no  fueron 

destruidos por ser tardíos.

33 Luego salió Moisés de junto a Faraón, 

fuera de la ciudad y extendió sus palmas 

hacia  YHVH,  y  cesaron  los  truenos  y  el 

granizo, y la lluvia no se derramó más so-

bre la tierra.

34 Pero cuando Faraón vio que la lluvia, 

el granizo y los truenos habían cesado, si-

guió pecando y se obstinó en su corazón, 

tanto él como sus siervos.

35 Se endureció, pues, el corazón de Fa-

raón  y  no  dejó  ir  a  los  hijos  de  Israel, 

como YHVH había predicho por medio de 

Moisés.

Octava y novena plaga

10

YHVH dijo a Moisés: Ve a Faraón, 

pues Yo he hecho endurecer su co-

razón y el corazón de sus siervos, para dar 

en medio de ellos estas señales mías.

2 Para que cuentes a oídos de tus hijos 

y de los hijos de tus hijos lo que Yo eje-

cuté en Egipto, y mis señales que puse 

entre  ellos,  para  que  sepáis  que  Yo  soy 

YHVH.

3 Moisés y Aarón se presentaron ante Fa-

raón, y le dijeron: Así dice YHVH, el Dios 

de los hebreos: ¿Hasta cuándo rehusarás 

humillarte en mi presencia y dejar partir 

a mi pueblo para que me sirva?

4 Porque si tú aún rehúsas dejar ir a mi 

pueblo, he aquí mañana traigo la langosta 

contra tu territorio.

5 Cubrirá  la  superficie  de  la  tierra,  de 

modo que nadie pueda ver la tierra, y se 

comerá lo sobrante, lo que os ha quedado 

del granizo y se comerá todo árbol que os 

brota en el campo,

6 y se llenarán tus casas, las casas de todos 

tus siervos y las casas de todos los egip-

cios,  como  nunca  lo  vieron  tus  padres 

ni  los  padres  de  tus  padres  desde  el  día 

en que se establecieron en la tierra hasta 

este día. Y volviéndose, salió de la presen-

cia de Faraón.

7 Los  siervos  de  Faraón  dijeron:  ¿Hasta 

cuándo nos ha de ser éste por lazo? Deja 

que  esta  gente  vaya  y  sirva  a  YHVH  su 

Dios. ¿No acabas de entender que Egipto 

se está destruyendo?

9.24 

→Ap.8.7; 16.21.  9.28 Es decir, truenos muy sonoros.


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Éxodo 10:8

68

8 Entonces  hicieron  volver  a  Moisés  y 

Aarón  ante  Faraón,  el  cual  les  dijo:  An-

dad, servid a YHVH vuestro Dios indican-

do quiénes tienen que ir.

9 Moisés respondió: Nos iremos con nues-

tros jóvenes y con nuestros ancianos, con 

hijos  e  hijas.  Nos  iremos  con  nuestras 

ovejas  y  vacadas,  porque  tenemos  una 

festividad para YHVH.

10 Y él les respondió: ¡Así YHVH esté con 

vosotros, no os dejaré partir con vuestros 

pequeños! ¡Ved cómo vuestras malas in-

tenciones están a la vista!

11 ¡No será así! Id ahora vosotros, los va-

rones,  y  servid  a  YHVH,  pues  esto  es  lo 

que buscáis. Y los echaron de la presencia 

de Faraón.

12 YHVH dijo a Moisés: Extiende tu mano 

sobre la tierra de Egipto con la langosta, 

para que suba y vaya contra la tierra de 

Egipto y consuma toda planta de la tierra, 

todo lo que dejó el granizo.

13 Y extendió Moisés su vara sobre la tierra 

de Egipto, y todo aquel día y toda aquella 

noche  YHVH  trajo  un  viento  del  oriente 

sobre el país, y al llegar la mañana, el vien-

to oriental había traído la langosta.

14 Y subió la langosta sobre toda la tierra 

de Egipto, y se posó en todo el territorio 

de  Egipto  de  manera  gravísima.  Nunca 

antes hubo tal plaga de langosta, ni la ha-

bría después.

15 Cubrió la superficie de todo el país y la 

tierra se oscureció.° Consumió toda plan-

ta del país y todo el fruto de los árboles 

que había dejado el granizo, y no quedó 

nada verde en los árboles ni en las plantas 

del campo en toda la tierra de Egipto.

16 Entonces Faraón se apresuró a llamar 

a Moisés y a Aarón, y dijo: He pecado con-

tra YHVH vuestro Dios y contra vosotros.

17 Por eso, ahora te ruego que perdones 

mi pecado, sólo esta vez, y que supliquéis 

a YHVH vuestro Dios, que al menos quite 

de mí esta plaga.

18 Él pues salió de la presencia de Faraón, 

y suplicó a YHVH.

19 Y YHVH cambió por un viento del mar 

muy fuerte y se llevó la langosta y la arro-

jó en el Mar Rojo. No quedó ni una lan-

gosta en todo el territorio de Egipto.

20 Pero  YHVH  endureció  el  corazón  de 

Faraón, y no dejó partir a los hijos de Is-

rael.

21 Luego  dijo  YHVH  a  Moisés:  Extiende 

tu  mano  hacia  los  cielos,  para  que  haya 

oscuridad° sobre la tierra de Egipto, una 

oscuridad tal que se palpe.

22 Y Moisés extendió su mano a los cielos, 

y  hubo  una  densa  oscuridad  por  toda  la 

tierra de Egipto durante tres días.

23 No se veían el uno al otro, ni nadie se 

levantó de su lugar en tres días. Pero para 

todos los hijos de Israel hubo luz en sus 

asentamientos.

24 Entonces  llamó  Faraón  a  Moisés,  y 

dijo: Id, servid a YHVH, y vayan también 

vuestros  pequeños  con  vosotros.  Sola-

mente queden vuestras ovejas y vuestras 

vacadas.

25 Pero  Moisés  respondió:  Entonces  tú 

nos darás víctimas para sacrificar y ofre-

cer holocaustos a YHVH nuestro Dios.

26 ¡También  nuestro  ganado  irá  con  no-

sotros!  No  quedará  ni  una  pezuña,  por-

que de él tomaremos para servir a YHVH 

nuestro  Dios,  pues  hasta  que  lleguemos 

allí, no sabremos con qué hemos de servir 

a YHVH.

27 Pero  YHVH  endureció  el  corazón  de 

Faraón, y no consintió en dejarlos partir.

28 Y Faraón le dijo: ¡Retírate de mí! ¡Guár-

date de no volver a ver mi rostro, porque 

el día que veas mi rostro, morirás!

29 Y Moisés respondió: Bien has dicho; no 

volveré a ver tu rostro.

Anuncio de la última plaga

11

(Pues  YHVH  había  dicho  a  Moisés: 

Aún traeré una plaga más sobre Fa-

raón  y  sobre  Egipto.  Después  de  esto  os 

dejará ir de aquí, y cuando os deje ir, cierta-

mente os echará de aquí definitivamente.

2 Habla ahora a oídos del pueblo para que 

cada varón pida a su vecino° y cada mujer 

a su vecina utensilios de plata y utensilios 

de oro.

3 Porque YHVH había dado gracia al pue-

blo ante los ojos de los egipcios, y el mis-

mo Moisés era muy estimado en la tierra 

de Egipto ante los ojos de los siervos de 

Faraón, y ante los ojos del pueblo.)

10.14-15 

→Ap.9.2-3.  10.21 →Ap.16.10.  11.2 No se refiere a un vecindario, sino a una región vecina


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Éxodo 12:17

69

4 Y añadió Moisés: Así dice YHVH: Como 

a la media noche, Yo saldré por en medio 

de Egipto,

5 y morirá todo primogénito en la tierra 

de  Egipto,  desde  el  primogénito  de  Fa-

raón que se sienta en su trono, hasta el 

primogénito de la esclava tras las piedras 

de molino, y todo primogénito de los ani-

males.

6 Y habrá un gran clamor por toda la tie-

rra de Egipto, como nunca hubo ni habrá 

jamás.

7 Pero  contra  cualquiera  de  los  hijos  de 

Israel,  desde  el  hombre  hasta  la  bestia, 

ni un perro moverá° su lengua, para que 

sepáis  que  YHVH  hace  distinción  entre 

Egipto e Israel.

8 Entonces bajarán a mí todos estos sier-

vos tuyos, y se postrarán ante mí, diciendo: 

Sal tú y todo el pueblo que sigue tus pasos. 

Después de esto, partiré. Y con ardor de ira 

se retiró de la presencia de Faraón.

9 YHVH había dicho a Moisés: Faraón no 

os escuchará, a fin de que mis maravillas 

se multipliquen en la tierra de Egipto.

10 Y Moisés y Aarón hicieron todos aque-

llos prodigios ante Faraón. Pero YHVH ha-

bía endurecido el corazón de Faraón y no 

dejaba salir de su país a los hijos de Israel.

La Pascua 

Muerte de los primogénitos

12

Habló YHVH a Moisés y a Aarón en 

la tierra de Egipto, diciendo:

2 Este mes es para vosotros principio de 

meses. Sea éste para vosotros el primero° 

de los meses del año.

3 Hablad a toda la congregación de Israel, 

diciendo:  El  día  diez  de  este  mes  tome 

cada uno un cordero, según sus familias 

paternas, un cordero por hogar.

4 Y si la familia° es pequeña para un cor-

dero,° entonces él y su vecino más cerca-

no a su casa tomen uno según el número 

de las personas. Dividiréis el cordero se-

gún lo que coma cada uno.

5 Vuestro cordero será sin defecto, macho 

de un año. Lo tomaréis de las ovejas o de 

las cabras,

6 y lo tendréis encerrado hasta el día ca-

torce de este mes, y toda la asamblea de 

la congregación de Israel lo inmolará al 

atardecer.

7 Luego  tomarán  de  la  sangre  y  la  pon-

drán sobre las dos jambas° y el dintel de 

las casas en que lo coman.

8 Y aquella noche comerán la carne asada 

al fuego con panes sin levadura; con hier-

bas amargas lo comerán.

9 No comáis de él nada crudo ni hervido 

en agua, sino asado al fuego, tanto su ca-

beza como sus patas y sus entrañas.

10 No dejaréis nada de él para la mañana 

siguiente,° y lo que sobre de él en la ma-

ñana siguiente, lo quemaréis en el fuego.

11 Y así habréis de comerlo: ceñidos vues-

tros lomos, vuestras sandalias en vuestros 

pies, y vuestro cayado en vuestra mano, 

y  lo  comeréis  apresuradamente:  él  es  la 

Pascua° de YHVH.

12 Y durante esa noche Yo pasaré por la 

tierra de Egipto y heriré a todo primogéni-

to en la tierra de Egipto, desde el hombre 

hasta la bestia, y ejecutaré juicios contra 

todos los dioses de Egipto. Yo, YHVH.

13 La sangre os será por señal en las casas 

donde estéis, pues veré la sangre y os pa-

saré por alto, y no habrá en vosotros plaga 

para destruir cuando Yo azote la tierra de 

Egipto.

14 Ése os será día memorable, y lo cele-

braréis como una fiesta solemne a YHVH 

por  vuestras  generaciones.  Por  estatuto 

perpetuo lo celebraréis.

15 Siete días comeréis panes sin levadura. 

Desde el primer día haréis desaparecer la 

levadura de vuestras casas, porque cual-

quiera  que  coma  pan  leudado,  desde  el 

primer día hasta el séptimo, esa persona 

será cortada de Israel.

16 Y  el  primer  día  habrá  santa  convoca-

ción, también en el séptimo día tendréis 

santa convocación. Ninguna obra se hará 

en ellos, excepto lo que cada uno haya de 

comer. Sólo eso podréis hacer.

17 Guardaréis,  pues,  la  fiesta  de  los  ázi-

mos,°  porque  en  ese  mismo  día  habré 

sacado vuestros escuadrones de la tierra 

11.7 Lit. afilará. 

→Jos.10.21.  12.2 Esto es, Abib (actualmente Nisán que corresponde a Marzo-Abril).  12.4 Lit. casa.  12.4 Es de-

cir, para comerse un cordero

12.7 Esto es, cualquiera de las dos piezas verticales que forman el marco de una puerta.  12.10 LXX 

registra: y no quebraréis ningún hueso suyo 

→12.26.  12.11 →Lv.23.5; Nm.9.1-5; 28.16; Dt.16.1-2.  12.17 LXX: y guardaréis 

este mandamiento

→Ex.23.15; 34.18; Lv.23.6-8; Nm.28.17-25; Dt.16.3-8. 


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Éxodo 12:18

70

de Egipto. Guardaréis ese día por estatuto 

perpetuo en vuestras generaciones.

18 En  el  primero,  en  el  día  catorce  del 

mes,  por  la  tarde,  comeréis  cenceñas° 

hasta el veintiuno del mes por la tarde.

19 Durante  siete  días  no  se  hallará  leva-

dura  en  vuestras  casas,  porque  todo  el 

que  coma  cualquier  cosa  leudada,  tanto 

extranjero como natural del país, esa per-

sona será cortada de la congregación de 

Israel.

20 No  comeréis  nada  leudado.  En  todas 

vuestras viviendas comeréis panes sin le-

vadura.

21 Luego  Moisés  convocó  a  todos  los 

ancianos  de  Israel,  y  les  dijo:  Escoged  y 

tomad  para  vosotros  un  cordero  según 

vuestras familias, y degollad la Pascua.

22 Tomaréis  un  manojo  de  hisopo  y  lo 

empaparéis en la sangre que habrá en el 

lebrillo, y untaréis el dintel y las dos jam-

bas con la sangre que está en el lebrillo. 

En  cuanto  a  vosotros,  no  saldréis  de  la 

puerta de vuestra casa hasta la mañana.

23 Así  cuando  pase  YHVH  para  herir  a 

los  egipcios,  verá  la  sangre  en  el  dintel 

y sobre ambas jambas y pasará YHVH de 

aquella puerta, y no dejará que el destruc-

tor entre para plagar vuestras casas.°

24 Guardaréis esta palabra como estatuto 

para ti y para tus hijos por siempre.

25 Y cuando entréis en la tierra que YHVH 

os  dará,  como  ha  hablado,  observaréis 

este servicio.

26 Y cuando os pregunten vuestros hijos: 

¿Qué significa este servicio para vosotros?

27 Vosotros  responderéis:  Sacrificio  de 

Pascua  es  para  YHVH,  el  cual  pasó  por 

alto  las  casas  de  los  hijos  de  Israel  en 

Egipto cuando mandó una plaga sobre los 

egipcios, y libró nuestras casas. Entonces 

el pueblo, inclinándose, se prosternó.

28 Fueron  pues  los  hijos  de  Israel  e  hi-

cieron tal como YHVH había ordenado a 

Moisés y a Aarón. Así lo hicieron.

29 Y aconteció que a medianoche YHVH 

hirió  a  todo  primogénito°  en  la  tierra 

de  Egipto,  desde  el  primogénito  de  Fa-

raón que se sentaba en su trono, hasta el 

primogénito del cautivo que estaba en la 

cárcel, y todo primogénito del ganado.

30 Y por la noche se levantó Faraón con 

todos  sus  siervos  y  todos  los  egipcios,  y 

hubo en Egipto un gran clamor, pues no 

hubo casa donde no hubiera un muerto.

31 E  hizo  llamar  a  Moisés  y  a  Aarón  de 

noche, y dijo: ¡Levantaos! Salid de en me-

dio de mi pueblo, tanto vosotros como los 

hijos de Israel. Marchaos, servid a YHVH 

según vuestra palabra.

32 Tomad vuestras ovejas y vuestras vaca-

das, como habéis hablado, y marchaos, y 

bendecidme también a mí.

33 Y  Egipto  presionaba  al  pueblo  para 

expulsarlo rápidamente del país, pues de-

cían: ¡Todos nosotros moriremos!

34 Entonces el pueblo cargó su masa so-

bre  sus  hombros  antes  que  leudara,  en-

volviendo sus artesas en sus mantas.

35 Y los hijos de Israel hicieron conforme 

la palabra de Moisés, y pidieron a los egip-

cios utensilios de plata, utensilios de oro 

y vestidos.

36 Y YHVH dio gracia al pueblo ante los 

egipcios, los cuales les dieron lo que pi-

dieron. Así despojaron a los egipcios.°

El Éxodo

37 Partieron, pues, los hijos de Israel de 

Rameses°  para  Sucot,  unos  seiscientos 

mil hombres de a pie, sin contar los pe-

queños.

38 También subió con ellos una gran mul-

titud, así como ovejas y vacadas, un gana-

do muy abundante.

39 Y  de  la  masa  que  habían  sacado  de 

Egipto, cocieron tortas sin levadura, pues 

no había leudado, por cuanto habían sido 

echados de Egipto y no pudieron demo-

rarse ni tampoco habían preparado provi-

sión para sí mismos.

40 La estancia de los hijos de Israel, que 

habitaron en Egipto, fue de cuatrocientos 

treinta años.°

41 Y  transcurridos  cuatrocientos  treinta 

años, en aquel mismo día° todos los es-

cuadrones de YHVH salieron de la tierra 

de Egipto.

12.18 Esto es, cosas sin leudar.  12.23 

→He.11.28.  12.29 →Ex.4.22-23.  12.35-36 →Ex.3.21-22.  12.37 →11.4.  12.40 Los 

430 años incluyen tanto la residencia en Egipto como el peregrinaje en Canaán 

→Gn.15.13 y nota; Gá.3.17.  12.41 Prob. se 

refiere al 14 de Abib (Nisán). 


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Éxodo 13:17

71

42 Noche  de  vigilias  es  para  YHVH,  por 

haberlos  sacado  de  la  tierra  de  Egipto. 

Ésta es noche de YHVH para ser guardada 

por todos los hijos de Israel por sus gene-

raciones.

43 Después dijo YHVH a Moisés y a Aarón: 

Este es el estatuto de la Pascua: Ningún 

hijo de extraño comerá de ella,°

44 sin  embargo,  todo  esclavo  comprado 

con dinero, lo circuncidarás, y podrá co-

mer de ella.

45 Ni el extranjero ni el asalariado podrá 

comer de ella.

46 Se comerá en la misma casa. No saca-

rás nada de la carne fuera de casa, ni que-

braréis hueso suyo.°

47 Toda  la  congregación  de  Israel  así  lo 

hará.

48 Y si algún extranjero reside contigo y 

celebra  la  Pascua  a  YHVH,  circuncídale 

todo  varón,  y  entonces  se  acercará  para 

celebrarla, puesto que será como el nati-

vo de la tierra, pero ninguna persona in-

circuncisa podrá comer de ella.

49 La misma ley será para el nativo y para 

el forastero que reside entre vosotros.

50 Así  hicieron  todos  los  hijos  de  Israel: 

como YHVH había ordenado a Moisés y a 

Aarón, así hicieron.

51 Y  aquel  mismo  día  YHVH  sacó  a  los 

hijos de Israel por sus escuadrones de la 

tierra de Egipto.

Los primogénitos 

El Éxodo

13

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2 Conságrame  todo  primogénito: 

Todo  el  que  abre  matriz  entre  los  hijos 

de Israel, así de los hombres como de los 

animales, mío es.°

3 Y  Moisés  dijo  al  pueblo:  Recordad  este 

día, en el que habéis salido de Egipto, de 

casa  de  servidumbre,  pues  YHVH  os  ha 

sacado de aquí con mano fuerte. Por tan-

to, no se comerá nada leudado.

4 Vosotros salís hoy, en el mes de Abib,

5 y sucederá que cuando YHVH te intro-

duzca en la tierra del cananeo, del heteo, 

del  amorreo,  del  heveo  y  del  jebuseo, 

tierra que destila leche y miel, la cual juró 

a tus padres que te daría, celebraréis este 

ritual en este mes.

6 Siete días comerás pan sin levadura, y el 

séptimo día será celebración para YHVH.

7 Cosas sin levadura se comerán los siete 

días, y ninguna cosa leudada se verá con-

tigo. Ciertamente no se verá levadura en 

todo tu territorio.

8 Y aquel día se lo explicarás a tu hijo, di-

ciendo:  Es  con  motivo  de  lo  que  YHVH 

hizo por mí cuando salí de Egipto.

9 Y te será por señal en tu mano y por re-

cordatorio entre tus ojos, para que la Ley 

de YHVH esté en tu boca, por cuanto por 

mano fuerte te sacó YHVH de Egipto.

10 Así pues, de año en año, cumplirás este 

estatuto en su tiempo señalado.

11 Y sucederá que cuando YHVH te intro-

duzca  en  la  tierra  del  cananeo,  como  te 

juró a ti y a tus padres, y te la haya en-

tregado,

12 harás que todo lo que abra la matriz° 

sea dedicado a YHVH, y de todo primerizo 

de la cría de tus animales, los machos se-

rán para YHVH,

13 excepto todo primerizo de asno, el cual 

sustituirás con un cordero, y si no lo sus-

tituyes, lo desnucarás. También redimirás 

a todo primogénito de varón entre tus hi-

jos,

14 pues sucederá que cuando mañana tu 

hijo te pregunte, diciendo: ¿Qué es esto? 

le  responderás:  Con  mano  fuerte  YHVH 

nos sacó de Egipto, de casa de esclavos,

15 y sucedió que obstinándose Faraón en 

no  dejarnos  partir,  YHVH  mató  a  todo 

primogénito en la tierra de Egipto, desde 

el  primogénito  del  hombre  hasta  el  pri-

mogénito del animal. Por eso yo sacrifico 

en honor de YHVH todos los machos que 

abren la matriz y así redimo todo primo-

génito de mis hijos.°

16 Te será, pues, por señal sobre tu mano, 

y  por  filacterias°  entre  tus  ojos,  porque 

con mano fuerte nos sacó YHVH de Egip-

to.

17 Y sucedió que cuando Faraón dejó par-

tir al pueblo, ’Elohim no los condujo por 

12.43 Lit. él.  12.46 

→Nm.9.12; Sal.34.20; Jn.19.36.  13.2 →Lc.2.23.  13.12 →Lc.2.23.  13.15 El sacrificio del primogénito 

(propio de las religiones paganas) se sustituye por la entrega de un animal. 

13.16 Heb. totafot. Correas que sostienen una muy 

pequeña caja dividida en cuatro partes en las que hay cuatro pasajes bíblicos 

→Ex.13.1-10; Ex.13.16; Dt.6.4-9; Dt.11.1-21. 


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Éxodo 13:18

72

el camino de la tierra de los filisteos, aun-

que estaba próximo, porque dijo ’Elohim: 

No sea que el pueblo se arrepienta cuando 

vea guerra y se vuelva a Egipto.

18 Así pues, ’Elohim desvió al pueblo por 

el camino del desierto hacia el Mar Rojo,° 

y los hijos de Israel subieron pertrecha-

dos° de la tierra Egipto.

19 Moisés  tomó  consigo  los  huesos  de 

José, pues éste había hecho jurar solem-

nemente  a  los  hijos  de  Israel,  diciendo: 

De  cierto  ’Elohim  os  visitará  y  llevaréis 

mis huesos de aquí con vosotros.°

20 Luego partieron de Sucot y acamparon 

en Etam, al extremo del desierto.

21 Y YHVH marchaba delante de ellos: de 

día, en una columna de nube, para guiar-

los por el camino, y de noche en una co-

lumna  de  fuego,  para  alumbrarles,  a  fin 

de que caminaran de día y de noche.

22 Nunca se apartó de delante del pueblo 

la columna de nube de día, ni la columna 

de fuego durante la noche.

El Mar Rojo

14

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2 Habla  a  los  hijos  de  Israel  que 

se vuelvan y acampen delante de Pi-ha-

hirot, entre Migdol y el mar, delante de 

Baal-zefón; frente a él acamparéis junto 

al mar.

3 Y Faraón dirá de los hijos de Israel: Ellos 

están extraviados por el país, el desierto 

los encerró.

4 Yo  endureceré  el  corazón  de  Faraón  y 

los perseguirá. Entonces seré glorificado 

por medio de Faraón y de todo su ejército, 

y sabrán los egipcios que Yo soy YHVH. Y 

ellos hicieron así.

5 Y fue anunciado al rey de Egipto que el 

pueblo  había  huido.  Y  fue  trastocado  el 

corazón de Faraón y el de sus siervos con-

tra el pueblo, y dijeron: ¿Qué es esto que 

hemos hecho? ¿Por qué hemos dejado ir a 

Israel de nuestra servidumbre?

6 Entonces  aparejó  su  carro,  y  tomando 

consigo a su pueblo,

7 tomó  seiscientos  carros  escogidos,  y 

todos los carros de Egipto con capitanes 

sobre todos ellos.

8 Y endureció YHVH el corazón de Faraón 

rey de Egipto, quien persiguió a los hijos 

de Israel, pero los hijos de Israel habían 

salido con mano exaltada.

9 Los  egipcios  los  persiguieron  con  to-

dos los caballos y carros de Faraón, con 

sus jinetes y su ejército, y los alcanzaron 

mientras acampaban junto al mar, al lado 

de Pi-hahirot, frente a Baal-zefón.

10 Estaba ya cerca Faraón cuando los hi-

jos de Israel alzaron sus ojos, ¡y he aquí 

los  egipcios  venían  en  su  persecución! 

Entonces los hijos de Israel temieron en 

gran manera y clamaron a YHVH.

11 Y dijeron a Moisés: ¿Por no haber se-

pulcros en Egipto nos tomaste para morir 

en el desierto? ¿Qué es esto que nos has 

hecho al sacarnos de Egipto?

12 ¿No es esta la advertencia que te hici-

mos en Egipto, diciendo: Renuncia a no-

sotros para que sirvamos a los egipcios? 

Pues mejor es para nosotros servir a los 

egipcios, que morir en el desierto.

13 Pero  Moisés  respondió  al  pueblo:  ¡No 

temáis!  ¡Estad  firmes  y  ved  la  salvación 

de YHVH que Él hace hoy por vosotros, 

porque los egipcios que visteis hoy, no los 

volveréis a ver nunca más!

14 YHVH luchará por vosotros, y vosotros 

quedaos quietos.

15 Entonces  YHVH  dijo  a  Moisés:  ¿Por 

qué clamas a mí? ¡Di a los hijos de Israel 

que se pongan en marcha!

16 Y tú, ¡alza tu vara, extiende la mano 

sobre el mar y divídelo, y entren los hi-

jos  de  Israel  en  medio  del  mar  por  lo 

seco!

17 Y Yo, por mi parte, endureceré el cora-

zón de los egipcios para que entren tras 

ellos,  y  seré  glorificado  en  Faraón  y  en 

todo  su  ejército,  en  su  carro,°  y  en  sus 

jinetes.

18 Y cuando sea glorificado en Faraón, y 

en sus carros y en sus jinetes, los egipcios 

sabrán que Yo soy YHVH.

19 Entonces  el  ángel  de  Dios,  que  mar-

chaba delante del campamento de Israel, 

se puso detrás de ellos, y la columna de 

nube se movió de delante de ellos y se co-

locó en su retaguardia,

13.18 Esto es, Mar de las Cañas.  13.18 Heb. hamushim. Término que prob. significa agrupados militarmente. LXX: y la quinta 

generación de los hijos de Israel subió de la tierra de Egipto

13.19 

→Gn.50.25; Jos.24.32.  14.17 Esto es, el carro de Faraón


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Éxodo 15:11

73

20 e  iba  entre  el  campamento  de  Egipto 

y el campamento de Israel. Y era nube y 

tinieblas, pero iluminaba la noche; y no 

se acercó uno al otro en toda la noche.

21 Y  Moisés  extendió  su  mano  hacia  el 

mar, y YHVH hizo que el mar se retirara 

por medio de un recio viento oriental toda 

la noche, y las aguas fueron divididas, y el 

mar llegó a ser un sequedal.

22 Entonces  los  hijos  de  Israel  entraron 

por el medio del mar,° sobre lo seco, y las 

aguas les fueron como muro a su derecha 

y a su izquierda.

23 Los egipcios reanudaron la persecución, 

y toda la caballería de Faraón, sus carros 

y sus jinetes entraron tras ellos en medio 

del mar.

24 Pero en la vigilia del alba, aconteció que 

YHVH miró desde la columna de fuego y des-

de la nube al campamento de los egipcios, y 

perturbó el campamento de los egipcios,

25 torciendo  las  ruedas  de  sus  carros,  de 

modo  que  los  conducían  con  dificultad, 

por lo que los egipcios dijeron: ¡Huyamos 

de  delante  de  Israel,  porque  YHVH  pelea 

por ellos contra los egipcios!

26 Entonces YHVH dijo a Moisés: ¡Extien-

de tu mano sobre el mar, y vuélvanse las 

aguas sobre los egipcios, sobre sus carros 

y sobre sus jinetes!

27 Y  Moisés  extendió  su  mano  sobre  el 

mar, y al amanecer el mar se volvió a su 

impetuosidad, y los egipcios, al huir, cho-

caban contra él. Así trastornó YHVH a los 

egipcios en medio del mar.

28 Las  aguas  retornaron  y  cubrieron  los 

carros,  los  jinetes  y  todo  el  ejército  de 

Faraón que había entrado tras ellos en el 

mar. No quedó ni uno de ellos.

29 Sin embargo, los hijos de Israel andu-

vieron por lo seco en medio del mar, y las 

aguas les fueron por muro a su derecha y 

a su izquierda.

30 Así  salvó  YHVH  aquel  día  a  Israel  de 

mano  de  los  egipcios,  e  Israel  vio  a  los 

egipcios muertos a la orilla del mar.

31 E  Israel  vio  el  gran  poder  que  YHVH 

había  ejercido  contra  los  egipcios.  Y  el 

pueblo  temió  a  YHVH,  y  creyeron  en 

YHVH y en Moisés su siervo.

Cántico de Moisés 

Rumbo a Elim

15

Entonces Moisés y los hijos de Is-

rael prorrumpieron en un cántico° 

a YHVH, y hablaron diciendo:

¡Cantaré a YHVH,

Porque ciertamente ha triunfado,

Al caballo y su jinete arrojó al mar!

2    YH° es mi fortaleza y mi cántico,

Y me ha sido por salvación.°

¡Éste es mi Dios!, y lo alabaré,

¡Dios de mi padre!, y lo exaltaré.

3    ¡YHVH es Varón de guerra!

¡YHVH es su nombre!

4    Arrojó al mar los carros de Faraón y 

su ejército,

Sus oficiales escogidos

Fueron hundidos en el Mar Rojo.

5    Los abismos los cubrirán,

Como piedra descendieron

A las profundidades.

6    Tu diestra, ¡oh YHVH!

Es majestuosa en poder,

Tu diestra, ¡oh YHVH!

Aniquila al enemigo.

7    Con la grandeza de tu majestad,

Derribas tus oponentes,

Enviaste tu furor,

Los tragó como a hojarasca.

8    Con el viento de tus narices,

Se amontonaron las aguas,

Fluyeron erguidas como dique,

Los abismos se cuajaron,

En el corazón del mar.

9    El enemigo dijo:

Perseguiré, apresaré,

Repartiré despojos,

Mi alma se saciará de ellos,

Desenvainaré mi espada,

Los destruirá mi mano.

10    Pero soplaste con tu viento,

Y los cubrió el mar,

Se hundieron como el plomo

En las aguas impetuosas.

11    ¿Quién como Tú entre los dioses, oh 

YHVH?

¿Quién como Tú?

Majestuoso en la santidad,

Temible en las alabanzas,°

Hacedor de prodigios.

14.22 

→He.11.29.  15.1 →Ap.15.3.  15.2 Apócope de YHVH.  15.2 →Sal.118.14; Is.12.2.  15.11 Es decir, en hechos dignos 

de alabanza


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Éxodo 15:12

74

12    Extendiste tu diestra,

Los tragó la tierra.

13    En tu misericordia condujiste

Al pueblo° que redimiste,

Lo has guiado con tu fortaleza,

Hacia la morada de tu santidad.

14    Los pueblos oyeron, y temblaron,

Pánico sobrecogió a los habitantes 

de Filistea,

15    Y se turbaron los caudillos 

de Edom,

A los fuertes de Moab los asaltó el 

temblor,

Y todos los moradores de Canaán se 

desmayaron.

16    Caiga sobre ellos terror y espanto,

Por la grandeza de tu brazo.

Enmudezcan como la piedra,

Hasta que haya pasado tu pueblo, 

¡oh YHVH!

Hasta que haya pasado este pueblo°

Que Tú adquiriste.

17    Tú los traerás y los plantarás

En el monte de tu heredad,

El sitio firme, ¡oh YHVH!

Que hiciste para tu morada,

El Santuario, ¡oh YHVH!

Que establecieron tus manos.

18    ¡YHVH reinará eternamente y para 

siempre!

19 Porque cuando la caballería de Faraón, 

con sus carros y sus jinetes, entraron en 

el medio del mar, YHVH volcó sobre ellos 

las aguas marinas, mientras los hijos de 

Israel habían andado en lo seco en medio 

del mar.

20 Entonces Miriam, la profetisa, herma-

na de Aarón, tomó el pandero en su mano, 

y todas las mujeres salieron tras ella con 

panderos y con danzas.

21 Y Miriam les respondía:

¡Cantad a YHVH,

Porque se ha magnificado 

grandemente,

Al caballo y su jinete arrojó al mar!

Las aguas de Mara

22 Y  Moisés  hizo  que  Israel  partiera  del 

Mar Rojo. Y salieron al desierto de Shur, y 

anduvieron tres días por el desierto, y no 

hallaron agua.

23 Y  llegaron  a  Mara,  pero  no  pudieron 

beber  las  aguas  de  Mara  porque  eran 

amargas. Por eso llamó su nombre Mara.

24 Y  murmuró  el  pueblo  contra  Moisés, 

diciendo: ¿Qué beberemos?

25 Entonces  él  clamó  a  YHVH,  y  YHVH 

le  mostró  un  árbol,  el  cual  echó  en  las 

aguas,  y  las  aguas  se  endulzaron.  Allí  le 

puso° estatuto y decreto, y allí lo probó,°

26 y dijo: Si oyes diligentemente la voz de 

YHVH tu Dios, y haces lo recto ante sus 

ojos, y prestas oído a sus mandamientos, 

y  guardas  todos  sus  estatutos,  ninguna 

dolencia  de  las  que  puse  sobre  Egipto 

pondré sobre ti, porque Yo soy YHVH tu 

Sanador.

27 Y  llegaron  a  Elim,  y  había  allí  doce 

fuentes  de  agua  y  setenta  palmeras.  Y 

acamparon allí junto a las aguas.

Las codornices y el maná

16

A los quince días del segundo mes 

después que salieron de la tierra de 

Egipto, toda la congregación de los hijos 

de Israel partió de Elim y llegó al desierto 

de Sin, que está entre Elim y Sinay.

2 Entonces  murmuró  toda  la  congrega-

ción de los hijos de Israel contra Moisés 

y contra Aarón en el desierto.

3 Y  les  decían  los  hijos  de  Israel:  ¡Ojalá 

hubiéramos muerto por mano de YHVH 

en  la  tierra  de  Egipto,  cuando  nos  sen-

tábamos junto a la olla de carne, cuando 

comíamos  pan  a  saciedad!  ¡Nos  habéis 

sacado a este desierto para matar de ham-

bre a toda esta multitud!

4 Y YHVH dijo a Moisés: He aquí Yo hago 

llover para vosotros pan de los cielos,° y 

saldrá el pueblo y recogerá la ración dia-

ria cada día, a fin de que Yo lo pruebe, si 

anda en mi Ley, o no.

5 Pero en el sexto día, sucederá que cuan-

do preparen lo que han de traer, será el 

doble de lo que recogen cada día.

6 Dijeron pues Moisés y Aarón a todos los 

hijos de Israel: En la tarde conoceréis que 

YHVH os sacó de la tierra de Egipto,

15.13 Heb. ´am-zu = este pueblo. Esta frase está registrada tres veces en el TM 

→Ex.15.13, 16; Is.43.21 y es notable el desa-

rrollo doctrinal de su contexto: redimir, comprar y formar

15.16 

→15.13.  15.25 Esto es, al pueblo.  15.25 También esto es, al 

pueblo 

→v.24.  16.4 →Jn.6.31.


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Éxodo 16:32

75

7 y  por  la  mañana  veréis  la  gloria  de 

YHVH, porque Él ha oído vuestras mur-

muraciones contra YHVH, pues nosotros, 

¿qué somos, para que murmuréis contra 

nosotros?

8 Y dijo Moisés: Cuando YHVH os dé por 

la tarde carne para comer, y por la maña-

na pan hasta saciaros, será porque YHVH 

habrá oído vuestras murmuraciones que 

habéis  murmurado  contra  Él,  porque 

nosotros, ¿qué somos? Vuestras murmu-

raciones  no  son  contra  nosotros,  sino 

contra YHVH.

9 Y dijo Moisés a Aarón: Di a toda la con-

gregación de los hijos de Israel: Acercaos 

ante  la  presencia  de  YHVH,  pues  Él  ha 

oído vuestras murmuraciones.

10 Y sucedió que mientras hablaba Aarón 

a toda la congregación de los hijos de Is-

rael, miraron hacia el desierto, y ¡he aquí 

la gloria de YHVH estaba en la nube!

11 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

12 Yo he oído las murmuraciones de los 

hijos de Israel. Háblales, diciendo: Al atar-

decer comeréis carne, y por la mañana os 

hartaréis de pan. Entonces sabréis que Yo 

soy YHVH, vuestro Dios.

13 Y ocurrió que por la tarde subió la co-

dorniz y cubrió el campamento, y por la 

mañana había una capa de rocío alrede-

dor del campamento.

14 Evaporada  la  capa  de  rocío,  he  aquí 

sobre la superficie del desierto había una 

cosa delgada a modo de escamas, delgada 

como la escarcha° sobre la tierra.

15 Cuando la vieron los hijos de Israel, se 

dijeron unos a otros: ¿Qué es esto?,° pues 

no  sabían  qué  era  eso.  Entonces  Moisés 

les dijo: Esto es el pan que YHVH os da 

para comer.

16 Esta es la palabra que YHVH ha orde-

nado: Recoged de él cada uno lo que ha de 

comer: Conforme al número de vuestras 

personas, tomaréis cada uno para los de 

su tienda, un homer por cabeza.

17 Y los hijos de Israel lo hicieron así, y 

recogieron unos más, otros menos.

18 Y lo medían por homer, y no sobraba al 

que tenía mucho, ni faltaba al que había 

recogido poco.° Cada uno recogió confor-

me a lo que había de comer.

19 Y  Moisés  les  dijo:  Ninguno  deje  nada 

de él para la mañana.

20 Pero no obedecieron a Moisés, sino que 

algunos dejaron de él hasta la mañana, y 

crió gusanos y hedió, y Moisés se enfure-

ció contra ellos.

21 Así  pues,  lo  recogían  de  mañana  en 

mañana, cada uno según lo que había de 

comer, y cuando el sol calentaba, se de-

rretía.

22 Y sucedió que en el sexto día recogieron 

pan doble, dos homeres para cada uno, y 

todos los principales de la congregación 

acudieron a Moisés, y se lo declararon.

El Shabbat°

23 Y él les dijo: Esto es lo que YHVH ha 

explicado:  Mañana  es  shabbat,  shabbat 

santo para YHVH.° Lo que habéis de hor-

near, hornead, y lo que habéis de cocinar, 

cocinad, y todo lo que sobre, depositadlo 

para conservarlo hasta la mañana.

24 Y  lo  depositaron  hasta  la  mañana, 

como Moisés había ordenado, y no hedió 

ni hubo en él gusano.

25 Y  Moisés  dijo:  Comedlo  hoy,  porque 

hoy es shabbat para YHVH. Hoy no lo ha-

llaréis en el campo.

26 Seis días lo recogeréis, pero en el sépti-

mo día, el shabbat, no lo habrá en él.

27 Sin  embargo,  aconteció  que  algunos 

del  pueblo  salieron  a  recoger  en  el  día 

séptimo, y no encontraron.

28 Por lo que YHVH dijo a Moisés: ¿Hasta 

cuándo  rehusaréis  guardar  mis  manda-

mientos y mis leyes?

29 Mirad que YHVH os dio el shabbat, por 

tanto en el sexto día os da pan para dos 

días. Que cada uno se quede en su sitio, y 

nadie salga de su lugar en el séptimo día.

30 Y reposó el pueblo el séptimo día.

31 Y  la  casa  de  Israel  llamó  su  nombre 

‘maná’;  y  era  como  granos  de  culantro, 

blanco,  y  su  sabor  era  como  de  hojuela 

con miel.°

32 Moisés  dijo:  Esto  es  lo  que  YHVH  ha 

ordenado:  Llenad  un  homer  de  él,  para 

16.14 Aquí el maná se describe como escarcha, pero en 

→16.31 y Nm.11.7 como semilla de culantro.  16.15 Heb. man-

hu’.  Locución  de  significado  incierto.  LXX: ¿Qué  es  esto? 

16.18 

→2 Co.8.15.  Tít. Shabbat → § 150.  16.23 →Ex.20.8-11. 

16.31 

→Nm.11.7-8.


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Éxodo 16:33

76

conservarlo  por  vuestras  generaciones, 

para que vean el pan que os hice comer 

en el desierto, cuando os saqué de la tie-

rra de Egipto.

33 Y dijo Moisés a Aarón: Toma una vasija 

y pon en ella un homer lleno de maná°, y 

ponlo delante de YHVH, a fin de conser-

varlo por vuestras generaciones.

34 Y Aarón lo puso delante del Testimonio 

para guardarlo, como YHVH lo había or-

denado a Moisés.

35 Así  comieron  los  hijos  de  Israel  maná 

cuarenta  años,  hasta  que  entraron  en  la 

tierra habitada. Comieron maná hasta que 

llegaron al límite de la tierra de Canaán.°

36 Y un homer es la décima parte del efa.

La roca de Horeb 

Victoria sobre Amalec

17

Toda  la  congregación  de  los  hijos 

de Israel partió del desierto de Sin, 

por  sus  jornadas,  conforme  al  manda-

miento  de  YHVH,  y  acamparon  en  Refi-

dim, y no había agua para que el pueblo 

bebiera.

2 Y  disputó  el  pueblo  con  Moisés,  y  di-

jeron:  Danos  agua  para  que  bebamos.  Y 

Moisés les dijo: ¿Por qué disputáis conmi-

go? ¿Por qué tentáis a YHVH?

3 Así pues el pueblo tuvo allí sed por falta 

de agua y murmuró contra Moisés, y dijo: 

¿Para qué nos hiciste subir de Egipto para 

matarnos  de  sed  a  nosotros,  a  nuestros 

hijos y a nuestros ganados?

4 Y clamó Moisés a YHVH, diciendo: ¿Qué 

haré con este pueblo? Un poco más y me 

apedrean.

5 Y  YHVH  dijo  a  Moisés:  Pasa  al  frente 

del  pueblo  y  toma  contigo  de  entre  los 

ancianos de Israel, y toma también en tu 

mano la vara con la que golpeaste el Nilo, 

y anda.

6 He  aquí  Yo  estoy  delante  ti,  allí  en  la 

peña de Horeb, y golpearás la roca, y sal-

drán aguas de ella, así beberá el pueblo. 

Y  Moisés  lo  hizo  así  ante  la  vista  de  los 

ancianos de Israel.

7 Y llamó el nombre de aquel lugar Masah° 

y Meriba,° por el altercado de los hijos de 

Israel; porque tentaron a YHVH, diciendo: 

¿Está YHVH entre nosotros o no?°

8 Entonces  vino  Amalec  y  luchó  contra 

Israel en Refidim.

9 Y Moisés dijo a Josué: Escógenos varo-

nes y sal a luchar contra Amalec. Mañana 

yo me pondré en la cumbre de la colina, y 

la vara de Dios estará en mi mano.

10 E hizo Josué como Moisés le había di-

cho para combatir contra Amalec. Y Moi-

sés, Aarón y Hur subieron a la cumbre de 

la colina.

11 Y sucedió que mientras Moisés tenía 

en  alto  sus  brazos,°  vencía  Israel,  pero 

cuando  él  bajaba  sus  brazos,  vencía 

Amalec.

12 Y  como  los  brazos  de  Moisés  se  en-

tumecieran,  tomaron  una  piedra,  se  la 

pusieron debajo, y se sentó sobre ella. Y 

Aarón y Hur le sostenían los brazos, uno 

por  un  lado  y  el  otro  por  otro.  Así  tuvo 

firmeza° en sus brazos hasta que se puso 

el sol.

13 Y Josué deshizo° a Amalec y a su pue-

blo a filo de espada.

14 Dijo  YHVH  a  Moisés:  Escribe  esto 

como  recordatorio  en  un  rollo,  y  ponlo 

en conocimiento de Josué: Yo borraré del 

todo la memoria de Amalec de debajo de 

los cielos.°

15 Y  Moisés  edificó  un  altar,  y  llamó  su 

nombre YHVH Nissi,°

16 porque dijo: Por cuanto una mano fue 

alzada al trono de YH, YHVH tendrá gue-

rra  contra  Amalec  de  generación  en  ge-

neración.

Visita de Jetro

18

Y Jetro, sacerdote de Madián, sue-

gro  de  Moisés,  oyó  todo  lo  que 

’Elohim había hecho por Moisés y por su 

pueblo Israel, y cómo YHVH había sacado 

a Israel de Egipto.

2 Y  Jetro,  suegro  de  Moisés,  tomó  a  Sé-

fora, mujer de Moisés (después de haber 

sido enviada a su padre°),

3 y a sus dos hijos.° El nombre de uno de 

ellos era Gersón, porque había dicho: Fo-

rastero he sido en tierra ajena,°

16.33 

→He.9.4.  16.35  →Jos.5.12.  17.7  Esto  es,  prueba.  17.7  Esto  es,  riña.  17.7  →Nm.20.2-13.  17.11  Lit.  mano

17.12 Heb. ´emunah. También significa fe.  17.13 Lit. debilitó.  17.14 

→Dt.25.17-19; 1 S.15.2-9.  17.15 Esto es, mi estandarte

LXX: mi refugio

18.2 .a su padre.  18.3 

→Hch.7.29.  18.3 →Ex.2.21-22.


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Éxodo 19:3

77

4 y el nombre del otro era Eliezer, porque 

dijo: el Dios de mis padres es mi ayuda, y 

me libró de la espada de Faraón.

5 Y Jetro, suegro de Moisés, llegó con los 

hijos y la mujer de éste, a Moisés, en el 

desierto, donde había acampado junto al 

monte de Dios,

6 y dijo a Moisés: Yo, tu suegro Jetro, ven-

go a ti con tu mujer y sus dos hijos con 

ella.

7 Entonces Moisés salió a recibir a su sue-

gro, se postró, y lo besó, y se preguntaron 

el uno al otro por su salud, y entraron en 

la tienda.

8 Relató entonces Moisés a su suegro todo 

lo  que  YHVH  había  hecho  a  Faraón  y  a 

los egipcios por amor de Israel, todas las 

adversidades que les habían sobrevenido 

en el camino, y cómo YHVH los había li-

brado.

9 Y se regocijó Jetro de todo el bien que 

YHVH había hecho a Israel, que lo había 

librado de mano de los egipcios.

10 Y  Jetro  exclamó:  ¡Bendito  sea  YHVH, 

que os libró de mano de los egipcios y de 

mano de Faraón! ¡Él ha librado al pueblo 

de mano de Egipto!

11 Ahora sé que YHVH es mayor que todos 

los dioses, pues en aquello en que se enso-

berbecieron, Él prevaleció° contra ellos.

12 Entonces Jetro suegro de Moisés tomó 

holocaustos y sacrificios para ’Elohim. Y 

llegó Aarón con todos los ancianos de Is-

rael a comer pan con el suegro de Moisés 

delante de ’Elohim.

13 Y sucedió al día siguiente que Moisés 

se sentó a juzgar al pueblo, porque el pue-

blo se presentaba delante de Moisés desde 

la mañana hasta la tarde.

14 Y  viendo  el  suegro  de  Moisés  todo  lo 

que él hacía para el pueblo, dijo: ¿Qué es 

esto que haces con el pueblo? ¿Por qué te 

sientas tú solo, y todo el pueblo se presen-

ta ante ti desde la mañana hasta la tarde?

15 Y  respondió  Moisés  a  su  suegro:  Por-

que el pueblo viene a mí para consultar 

a ’Elohim.

16 Cuando tiene un asunto, viene a mí, y 

yo juzgo entre un hombre y su prójimo, 

y les doy a conocer los estatutos de Dios 

y sus leyes.

17 Entonces  el suegro de Moisés  le  dijo: 

No es bueno lo que tú haces.

18 Desfallecerás no solo tú, sino este pue-

blo que está contigo, porque el asunto es 

demasiado pesado para ti. No podrás ha-

cerlo tú solo.

19 Oye  ahora  mi  voz,  te  aconsejaré,  y 

’Elohim  sea  contigo.  Representa°  tú  al 

pueblo ante ’Elohim, y lleva tú los asun-

tos ante ’Elohim.

20 Y amonéstalos con los estatutos y las 

leyes, y hazles saber el camino en que de-

ben andar y la obra que deben hacer.

21 Pero, escoge° tú mismo entre todo el 

pueblo a hombres de valor, temerosos de 

Dios, hombres veraces, aborrecedores del 

lucro, y ponlos por jefes de miles, jefes de 

cientos, jefes de cincuenta y jefes de diez.

22 Y juzguen así al pueblo en todo tiem-

po. Y sucederá que todo asunto grave lo 

traerán a ti, pero todo asunto sencillo lo 

juzgarán ellos. Aligera así la carga sobre 

ti, y que la compartan contigo.

23 Si haces tal cosa, y ’Elohim así te lo or-

dena, entonces podrás estar firme, y todo 

este pueblo también podrá ir en paz a su 

lugar.

24 Y obedeció Moisés a la voz de su sue-

gro, e hizo todo lo que le dijo.

25 Y escogió Moisés hombres de valor de 

todo Israel y los puso por cabezas sobre el 

pueblo, por jefes de miles, jefes de cien-

tos, jefes de cincuenta, y jefes de decena,

26 para juzgar al pueblo en todo tiempo. 

Ellos juzgaban todo asunto sencillo y el 

asunto difícil lo llevaban a Moisés.

27 Y despidió Moisés a su suegro, y éste se 

fue a su tierra.

Israel en Sinay

19

Al tercer mes de la salida de los hi-

jos de Israel de la tierra de Egipto, 

en ese mismo día, llegaron al desierto de 

Sinay.

2 Habían  partido  de  Refidim,  y  llegaron 

al  desierto  de  Sinay  y  acamparon  en  el 

desierto.  Allí,  frente  al  monte,  acampó 

Israel.

3 Pero  Moisés  había  subido  delante  de 

’Elohim,  pues  YHVH  lo  había  llamado 

desde  el  monte,  diciendo:  Así  dirás  a  la 

18.11 .prevaleció.  18.19 Lit. sé tú para el pueblo ante ’Elohim.  18.21 Lit. examina


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Éxodo 19:4

78

casa de Jacob y anunciarás a los hijos de 

Israel:

4 Vosotros  mismos  visteis  lo  que  hice  a 

los egipcios, y cómo os levanté sobre alas 

de águilas y os he traído a mí.

5 Ahora pues, si de veras escucháis mi voz 

y guardáis mi pacto, entonces vosotros se-

réis objeto de mi predilección° entre todos 

los pueblos, porque mía es toda la tierra,

6 y vosotros me seréis un reino de sacer-

dotes° y una nación santa.° Estas son las 

palabras que hablarás a los hijos de Israel.

7 Entonces  Moisés  llamó  a  los  ancianos 

del pueblo y expuso en presencia de ellos 

todas  estas  palabras  que  YHVH  le  había 

ordenado.

8 Y  todo  el  pueblo  respondió  a  una,  y 

dijeron:  Haremos  todo  lo  que  YHVH  ha 

hablado. Y Moisés refirió las palabras del 

pueblo a YHVH.

9 Y YHVH dijo a Moisés: He aquí Yo vengo 

a ti en el espesor de la nube, para que el 

pueblo  oiga  cuando  Yo  hable  contigo,  y 

también crean en ti siempre. Y Moisés de-

claró a YHVH las palabras del pueblo.

10 Entonces  YHVH  dijo  a  Moisés:  Ve  al 

pueblo y santifícalos hoy y mañana, y la-

ven sus vestidos.

11 Así estén preparados para el tercer día, 

porque al tercer día YHVH descenderá so-

bre el monte Sinay ante los ojos de todo 

el pueblo.

12 Y marcarás límite en derredor del pue-

blo, diciendo: Guardaos vosotros de subir 

al  monte  o  de  tocar  sus  estribaciones; 

cualquiera  que  toque  el  monte,  cierta-

mente será muerto.

13 No  lo  tocará  mano  alguna,  pues  cier-

tamente será apedreado o asaeteado. Sea 

animal o sea hombre, no vivirá.° Cuando 

resuene  prolongadamente  la  corneta,° 

ellos subirán al monte.

14 Entonces Moisés bajó desde el monte 

hacia  el  pueblo,  y  santificó  al  pueblo,  y 

ellos lavaron sus vestidos.

15 Luego dijo al pueblo: Estad preparados 

para el tercer día; no os acerquéis a mujer.

16 Al tercer día, siendo de mañana, aconte-

ció que hubo truenos y relámpagos° y una 

nube muy espesa sobre el monte y un fuer-

te sonido del shofar;° y todo el pueblo que 

estaba en el campamento se estremeció.

17 Y Moisés sacó al pueblo del campamen-

to al encuentro con Dios, y se ubicaron en 

la parte baja del monte.

18 Todo el monte Sinay humeaba, porque 

YHVH  había  descendido  sobre  él  en  el 

fuego,° y su humo subía como el humo de 

un horno, y todo el monte se estremecía 

en gran manera,

19 y el sonido del shofar se hacía cada vez 

más fuerte, y Moisés hablaba, y ’Elohim le 

respondía con el trueno.

20 YHVH  descendió  sobre  el  monte  Si-

nay, sobre la cumbre del monte. Y llamó 

YHVH a Moisés a la cumbre del monte, y 

Moisés subió.

21 Luego  dijo  YHVH  a  Moisés:  Baja,  ad-

vierte al pueblo, no sea que irrumpan ha-

cia YHVH para observar y caigan muchos 

de ellos.

22 Y santifíquense también los sacerdotes 

que se acercan a YHVH, para que YHVH 

no haga estrago entre ellos.

23 Y Moisés dijo a YHVH: El pueblo no po-

drá subir al monte Sinay porque Tú nos 

has advertido diciendo: Delimita el monte 

y santifícalo.

24 Y  YHVH  le  dijo:  Anda,  baja.  Luego 

subirás tú y Aarón contigo, pero que los 

sacerdotes y el pueblo no irrumpan para 

subir ante YHVH, no sea que haga estrago 

en ellos.

25 Y  bajó  Moisés  al  pueblo  y  habló  con 

ellos.

El Decálogo

20

Y  habló  ’Elohim  todas  estas  pala-

bras, diciendo:

2 Yo soy YHVH tu Dios, que te saqué de la 

tierra de Egipto, de la casa de esclavos.

3 No tendrás otros dioses delante de mí.

4 No te harás estatua, ni imagen semejan-

te de lo que esté arriba en los cielos, ni 

abajo en la tierra, ni en las aguas debajo 

de la tierra.

5 No  te  postrarás  ante  ellos  ni  los  servi-

rás,° porque Yo soy YHVH tu Dios, Dios 

19.5 

→Mal.3.17; Dt.4.20; 7.6; 14.2; 26.18; Tit.2.14.  19.6 →Ap.1.6; 5.10.  19.6 →1 P.2.9.  19.13 →He.12.18-20.  19.13 Heb. 

yobel. Corneta hecha con el cuerno de un carnero. A diferencia del shofar que produce un sonido grave, el yobel da un sonido agu-

do. 

19.16 

→Ap.4.5.  19.16 Instrumento similar al de una trompa, hecha también con cuerno de carnero.  19.18 →Dt.4.11-12. 

20.5 

→Ex.34.17; Lv.19.4; 26.1; Dt.4.15-18; 27.15. 


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Éxodo 21:6

79

Celoso,° que visita la iniquidad de padres 

sobre hijos hasta la tercera y cuarta gene-

ración de los que lo aborrecen,

6 pero hace misericordia a millares de los 

que lo aman y guardan sus mandamien-

tos.°

7 No tomarás el nombre de YHVH tu Dios 

en vano,° porque YHVH no tendrá por ino-

cente al que tome su nombre en vano.

8 Acuérdate del día del shabbat° para san-

tificarlo.°

9 Seis días trabajarás y harás toda tu la-

bor,

10 pero  el  séptimo  día  es  shabbat°  para 

YHVH  tu  Dios.  No  harás  labor  alguna,° 

tú, ni tu hijo, ni tu hija, ni tu siervo, ni tu 

criada, ni tu animal, ni tu extranjero que 

está dentro de tus ciudades.

11 Porque en seis días hizo YHVH los cie-

los y la tierra, el mar y todas las cosas que 

hay en ellos, y reposó en el séptimo día. 

Por tanto YHVH ha bendecido el día del 

shabbat y lo ha santificado.°

12 Honra a tu padre y a tu madre,° para 

que tus días se alarguen en la tierra que 

YHVH tu Dios te da.°

13 No asesinarás.°

14 No adulterarás.°

15 No robarás.°

16 No declararás° testimonio falso contra 

tu prójimo.°

17 No  codiciarás°  la  casa  de  tu  prójimo, 

no codiciarás la mujer de tu prójimo, ni 

su siervo, ni su criada, ni su buey, ni su 

asno, ni cosa alguna de tu prójimo.

Reacción del pueblo

18 Y todo el pueblo contemplaba los true-

nos y los relámpagos, y el sonido del sho-

far, y el monte que humeaba. Y viéndolo 

el pueblo, se estremecieron y se mantu-

vieron lejos.

19 Y dijeron a Moisés: Habla tú con noso-

tros y escucharemos, pero que no hable 

’Elohim con nosotros, no sea que mura-

mos.°

20 Y  dijo  Moisés  al  pueblo:  No  temáis, 

pues para probaros ha venido ’Elohim, a 

fin de que el temor a Él esté ante voso-

tros, de modo que no pequéis.

21 Y el pueblo se mantuvo en pie a lo le-

jos mientras Moisés se acercaba a la densa 

nube, allí donde estaba ’Elohim.

Leyes acerca del altar

22 Y YHVH dijo a Moisés: Así dirás a los 

hijos  de  Israel:  Vosotros  mismos  habéis 

visto que os he hablado desde los cielos.

23 No haréis de mí dioses de plata ni os 

fabricaréis dioses de oro.

24 Para mí, harás un altar de tierra y sa-

crificarás  sobre  él  tus  holocaustos  y  tus 

ofrendas  de  paz,  tu  rebaño  y  tu  ganado. 

En todo lugar donde Yo haga recordar mi 

Nombre, vendré a ti y te bendeciré.

25 Y  si  me  haces  altar  de  piedras,  no  lo 

construirás  con  piedra  labrada,°  pues  si 

alzas sobre él tu cincel, lo profanarás.

26 Y no subirás por gradas a mi altar, para 

que tu desnudez no se descubra sobre él.

Código del pacto

21

Y  estos  son  los  decretos  que  les 

promulgarás:

2 Cuando compres un siervo hebreo, ser-

virá seis años, pero al séptimo saldrá libre 

gratuitamente.

3 Si entró solo, saldrá solo. Si tenía mujer, 

entonces su mujer saldrá con él.

4 Pero si su señor le dio mujer, y ella le 

dio a luz hijos o hijas, la mujer y sus hijos 

serán de su señor; él saldrá solo.

5 Mas si el siervo dijera insistentemente: 

Yo amo a mi  señor,  a  mi  mujer  y a mis 

hijos. No saldré libre.

6 Entonces  su  señor  lo  acercará  ante 

’Elohim° y lo hará llegar a la puerta o a la 

jamba de la puerta, y su señor le perforará 

20.5  Heb.  ‘El-caná.  20.6 

→Ex.34.6-7;  Nm.14.18;  Dt.7.9-10.  20.7  →Lv.19.12.  20.8  shabbat  → § 150.  20.8  →Ex.16.23-

30;  31.12-14. 

20.10  Esto  es,  cesación,  cesar,  dejar  de  hacer.  20.10 

→Ex.23.12;  31.15;  34.21;  35.2;  Lv.23.3.  20.11 

→Gn.2.1-3;  Ex.31.17.  20.12  →Dt.27.16;  Mt.15.4;  19.19;  Mr.7.10;  10.19;  Lc.18.20;  Ef.6.2.  20.12  →Ef.6.3.  20.13  Heb. 

ratsaj 

→ § 152.  →Gn.9.6;  Lv.24.17;  Mt.5.21;  19.18;  Mr.10.19;  Lc.18.20;  Ro.13.9;  Jac.2.11.  20.14  →Lv.20.10;  Mt.5.27; 

19.18; Mr.10.19; Lc.18.20; Ro.13.9; Jac.2.11. 

20.15 La traducción no hurtarás califica dentro de la actual terminología legal 

una forma de delito leve. La traducción adecuada es no robarás por cuanto incluye toda forma y grado de apropiación ile-

gal incluido el rapto. 

→Lv.19.11; Mt.19.18; Mr.10.19; Lc.18.20; Ro.13.9.  20.16 Término que implica la contestación de una 

demanda  judicial

20.16 

→Ex.23.1;  Mt.19.18;  Mr.10.19;  Lc.18.20;  Ro.13.9.  20.17  →Ro.7.7;  13.9.  20.19  →He.12.18-19. 

20.25 

→Dt.27.5-7; Jos.8.31.  21.6 LXX: tribunal de Dios. Otras versiones traducen jueces.


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Éxodo 21:7

80

la oreja con un punzón, y él le servirá para 

siempre.°

7 Cuando un hombre venda a su hija por 

sierva, no saldrá ella como suelen salir los 

siervos.

8 Si no agradara a su señor (al que había 

sido  destinada),  dejará  que  la  rescaten, 

y no tendrá derecho a venderla a pueblo 

extranjero  por  haber  sido  desleal  con 

ella.

9 Y si la destina para su hijo, hará con ella 

según el decreto para las hijas.

10 Si toma otra para sí,° no disminuirá su 

alimento, ni su vestido, ni su deber con-

yugal.

11 Y si no hace ninguna de estas tres co-

sas con ella, entonces ella saldrá gratuita-

mente, sin dinero.

12 Quien hiera a un hombre y éste muera, 

será muerto irremisiblemente.°

13 Pero  si  no  estaba  al  acecho,  sino  que 

’Elohim permitió que cayera en su mano, 

entonces  Yo  te  señalaré  lugar  donde  él 

pueda escapar.°

14 Sin embargo, si un hombre se enfure-

ce contra su prójimo y lo mata con ale-

vosía, hasta° de mi propio altar lo podrás 

aprehender para que muera.°

15 Quien golpee a su padre o a su madre 

será muerto irremisiblemente.

16 Quien secuestre a una persona, ya sea 

que  la  venda  o  sea  hallada  en  su  poder, 

será muerto irremisiblemente.°

17 Quien maldiga a su padre o a su madre 

será muerto irremisiblemente.°

18 Si unos hombres riñen, y uno hiere a 

su prójimo con piedra o con el puño, pero 

no muere sino que cae en cama,

19 si se levanta, y puede entrar y salir sin° 

su  bastón,  el  que  lo  hirió  será  absuelto. 

Sólo  pagará  por  su  tiempo  de  reposo,  y 

hará que lo curen completamente.

20 Cuando alguno hiera a su siervo o a su 

sierva con la vara, y muera bajo su mano, 

ciertamente será vengado,°

21 pero si sobrevive un día o dos, no será 

vengado, porque él es propiedad suya.

22 Si unos hombres riñen, y hieren a una 

mujer encinta, y sus hijos salen° sin ha-

ber más° daño, ciertamente serán multa-

dos  según  lo  que  el  marido  de  la  mujer 

imponga  sobre  ellos  y  les  sea  impuesto 

por los jueces.

23 Pero si se produce una desgracia, en-

tonces darás vida por vida,°

24 ojo por ojo, diente por diente,° mano 

por mano, pie por pie,

25 quemadura por quemadura, herida por 

herida, contusión por contusión.

26 Cuando alguien hiera el ojo de su sier-

vo o el ojo de su sierva, y lo inutilice, lo 

dejará en libertad por causa de su ojo.

27 Y si le saca un diente a su siervo o a su 

sierva con un golpe, lo dejará en libertad 

por causa de su diente.

28 Cuando un toro acornee a un hombre o 

a una mujer y muera, ciertamente el toro 

será apedreado y no se comerá su carne, y 

el dueño del toro será absuelto.

29 Pero si el toro era acorneador desde 

tiempo  atrás,  y  a  su  dueño  se  le  había 

advertido,  pero  no  lo  había  encerrado, 

y  mata  hombre  o  mujer,  el  toro  será 

apedreado  y  también  será  muerto  su 

dueño.

30 Pero si se le impone rescate, entonces 

dará  por  el  rescate  de  su  vida  cuanto  le 

sea impuesto.

31 Si  acornea  a  un  muchacho  o  a  una 

muchacha, se hará con él conforme a este 

decreto.

32 Si el toro acornea a un siervo o a una 

sierva,  dará°  a  su  amo  treinta  siclos  de 

plata, y el toro será apedreado.

33 Cuando alguno destape un pozo o ex-

cave  una  cisterna  y  no  la  cubra,  y  caiga 

allí un toro o un asno,

34 el  dueño  de  la  cisterna  indemniza-

rá.  Devolverá  el  dinero  a  su  dueño,  y  lo 

muerto será suyo.

35 Y si el toro de alguno hiere al toro de 

su  prójimo  y  muere,  entonces  venderán 

el  toro  vivo  y  partirán  el  dinero,  y  tam-

bién partirán el buey muerto.

21.6 

→Lv.25.39-46.  21.10 Es decir, si (el sujeto del v. 8) toma otra mujer por esposa.  21.12 →Lv.24.17.  21.13 →Nm.35.10-

34;  Dt.19.1-13;  Jos.20.1-9. 

21.14  .hasta.  21.14  Indirectamente,  aquí  se  reconoce  el  derecho  de  asilo  sagrado  (junto  al 

altar) para el homicida involuntario. 

→1 R.1.51.  21.16 →Dt.24.7.  21.17 →Lv.20.9; Mt.15.4; Mr.7.10.  21.19 Ncon su bas-

tón

21.20 Es decir, el agresor será castigado.  21.22 Es decir, si ella aborta.  21.22 .más.  21.23 Se describe a partir de 

aquí la Ley del Talión, la cual establecía pautas que evitaran la injusticia en la retribución. 

21.24 

→Lv.24.19-20; Dt.19.21; 

Mt.5.38. 

21.32 Esto es, el dueño del toro


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Éxodo 22:28

81

36 Pero si era notorio que el toro era acor-

neador desde tiempo atrás, y su dueño no 

lo había encerrado, pagará toro por toro, 

y el buey muerto será suyo.

Sobre la propiedad y otros delitos

22

Cuando  un  hombre  robe  un  buey 

o  un  cordero,  y  lo  degüelle  o  lo 

venda,  por  aquel  buey  pagará  cinco  del 

ganado,  y  por  aquel  cordero,  cuatro  del 

rebaño.°

2 Si un ladrón, sorprendido en el asalto,° 

es herido y muere, nadie será culpable,°

3 pero si ya ha salido el sol, será delito de 

sangre.° Ciertamente el ladrón° indemni-

zará, y si nada tiene, entonces será vendi-

do por su robo.

4 Si lo que hurtó fuera hallado vivo en su 

poder, sea buey, asno u oveja, con el doble 

hará restitución.

5 Cuando  alguno  destroce  un  campo  o 

una  viña  por  haber  soltado  su  bestia  a 

pastar  en  campo  ajeno,  hará  restitución 

con lo mejor de su campo o lo mejor de 

su viña.

6 Cuando un fuego se propague a los zar-

zales  y  consuma  la  parva,  o  las  gavillas, 

o el campo, el que encendió el fuego sin 

falta hará restitución.

7 Cuando un hombre dé a su prójimo pla-

ta u objetos a guardar, y sean hurtadas de 

la casa de aquel hombre, si se halla al la-

drón, restituirá el doble.

8 Pero si el ladrón no es hallado, enton-

ces el dueño de la casa se acercará ante 

’Elohim jurando° si ha metido mano en 

los bienes de su prójimo, o no.

9 En todo asunto de transgresión, sea de 

buey, de asno, de oveja, de vestido, o cual-

quier pérdida, en la que se diga: ¡Esto es 

así!,  el  asunto  de  ambos  se  llevará  ante 

’Elohim, y aquel a quien ’Elohim declare 

culpable, pagará el doble a su prójimo.

10 Cuando un hombre dé a su prójimo un 

asno,  toro,  u  oveja,  o  cualquier  animal 

para ser guardado, y muera, o sea despe-

dazado o llevado sin que nadie vea,

11 se  interpondrá  juramento  de  YHVH 

entre ambos, de que su mano no se exten-

dió a los bienes de su prójimo, y su dueño 

lo aceptará, y el otro no pagará.

12 Pero si hubiera sido robado de junto a 

él, indemnizará a su dueño,

13 pero si fue despedazado, le llevará evi-

dencia y no pagará lo despedazado.

14 Cuando un hombre pida a su prójimo 

un animal, y sea herido o muerto en au-

sencia de su dueño, ciertamente pagará.

15 Si el dueño está presente, no pagará, si 

era alquilado, entrará en su alquiler.

16 Si  un  varón  seduce  a  una  virgen  que 

no está comprometida, y se acuesta con 

ella, ciertamente deberá dotarla por mu-

jer para sí mismo.

17 Pero  si  su  padre  rehúsa  terminante-

mente dársela, él pesará el dinero confor-

me a la dote de las vírgenes.°

18 A la hechicera° no dejaras vivir.

19 Todo el que se ayunte con animal, será 

muerto irremisiblemente.°

20 El  que  ofrezca  sacrificio  a  cualquier 

dios que no sea YHVH, será destruido por 

completo.°

21 No maltratarás ni oprimirás al extran-

jero, porque extranjeros fuisteis vosotros 

en la tierra de Egipto.

22 No afligiréis a la viuda o al huérfano.°

23 Si en verdad los afliges, y elevan a mí 

su clamor, ciertamente Yo escucharé° su 

clamor,

24 y se encenderá mi ira, y os haré morir a 

espada, y vuestras mujeres quedarán viu-

das y vuestros hijos huérfanos.

25 Si prestas dinero a mi pueblo, al pobre 

que está contigo, no serás usurero con él 

ni le impondrás interés.°

26 Si tomas en prenda el manto de tu pró-

jimo, se lo devolverás a la puesta del sol,

27 pues el manto para su piel es su único 

cobertor,  ¿en  qué  se  ha  de  acostar?  Y  si 

clama a mí, sucederá que Yo escucharé, 

porque soy misericordioso.°

28 No injuriarás a los jueces, ni maldeci-

rás al príncipe de tu pueblo.°

22.1 El TM registra este versículo en 21.37.  22.2 Es decir, en delito flagrante.  22.2 Lit. no hay para él sangres. Es decir, no 

hay cargos para quien haya matado al delincuente

22.3 Esto es, para el que mató al ladrón a plena luz.  22.3 .el ladrón

22.8  .jurando.  22.17 

→Dt.22.28-29.  22.18  →Dt.18.10-11.  22.19  →Lv.18.23;  20.15-16;  Dt.27.21.  22.20  →Dt.17.2-7. 

22.22 

→Ex.23.9; Lv.19.33-34; Dt.24.17-18; 27.19.  22.23 En heb. los verbos afliges… clama… escucharé, expresan énfa-

sis. 

22.25 

→Lv.25.35-38; Dt.15.7-11; 23.19-20.  22.27 →Dt.24.10-13.  22.28 →Hch.23.5. 


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Éxodo 22:29

82

29 De tu cosecha y de tu vendimia no re-

tardes la ofrenda.° Me darás al primogéni-

to de tus hijos.

30 Así harás con el de tu buey y con el de 

tu oveja. Siete días estará con su madre, y 

al octavo día me lo darás.

31 Y me seréis hombres santos, y no co-

meréis carne despedazada° en el campo; a 

los perros la echaréis.

Leyes varias 

Las fiestas solemnes

23

No  levantarás  falso  rumor,°  ni  te 

pondrás  de  acuerdo  con  el  impío 

para ser testigo falso.

2 No seguirás a la mayoría para hacer mal, 

ni testificarás sobre contienda alguna, in-

clinándote a la mayoría para pervertir la 

justicia;

3 y  tampoco  favorecerás°  al  pobre  en  su 

pleito.°

4 Si  encuentras  al  buey  o  al  asno  de  tu 

enemigo extraviado, ciertamente lo harás 

regresar a él.

5 Cuando veas al asno del que te aborrece 

yaciendo bajo su carga, ¿te abstendrás de 

ayudarlo? De cierto lo ayudarás.°

6 No pervertirás el derecho de tu gente° 

pobre en su causa.

7 Te  alejarás  de  acusaciones  falsas,  y  no 

matarás al inocente ni al justo, porque Yo 

no justificaré al culpable.

8 No  aceptarás  presente,  porque  el  pre-

sente ciega al de vista clara y pervierte las 

palabras de los justos.°

9 No  oprimirás  al  extranjero,  pues  voso-

tros mismos conocéis la vida del extranje-

ro, porque extranjeros fuisteis en la tierra 

de Egipto.°

10 Seis años sembrarás tu tierra, y reco-

gerás su cosecha,

11 pero el séptimo la dejarás descansar sin 

cultivar,° y comerán los necesitados de tu 

pueblo, y de lo sobrante de ellos coma la 

bestia del campo. Así harás con tu viña y 

con tu olivar.°

12 Seis días harás tu trabajo, y en el sép-

timo  día  cesarás,°  para  que  descanse  tu 

buey y tu asno, y cobre aliento el hijo de 

tu sierva y el extranjero.

13 Guardaos en todo lo que os he dicho. 

No  invocaréis  ni  se  oirán  en  tu  boca  el 

nombre de dioses extraños.°

14 Tres peregrinaciones al año celebraréis 

para mí.°

15 Observarás  la  celebración  de  los  Ázi-

mos.°  Siete  días  comerás  panes  sin  le-

vadura,  como  te  ordené,  en  el  tiempo 

señalado,  el  mes  de  Abib,  porque  en  él 

saliste  de  Egipto.  No  os  presentéis  ante 

mí vacíos.°

16 También observarás° la fiesta solemne 

de la Siega de los primeros frutos de tus 

labores,°  de  aquello  que  hubieres  sem-

brado en el campo, y la fiesta solemne de 

la Cosecha al final del año, cuando hayas 

cosechado el producto de tus labores del 

campo.°

17 Tres  veces  al  año  todos  tus  varones 

comparecerán  ante  la  presencia  del  Se-

ñor YHVH.

18 No degollarás ni derramarás la sangre 

de mi sacrificio sobre cosa leudada, ni la 

grasa de mi fiesta solemne quedará hasta 

la mañana.

19 Las primicias de los primeros frutos de 

tu tierra llevarás  a la Casa de  YHVH, tu 

Dios.° No cocerás el cabrito en la leche de 

su madre.°

20 He aquí, Yo envío mi ángel delante de 

ti para que te guarde en el camino, y te 

introduzca en el lugar que he preparado.

21 Guárdate en su presencia y obedece su 

voz. No te rebeles en su contra, pues no 

cargará con vuestra transgresión, porque 

mi Nombre está en sus entrañas.

22 Si escuchas atentamente su voz y haces 

todo  lo  que  te  hablo,°  tendré  enemistad 

22.29 .la ofrenda.  22.31 

→Lv.17.15.  23.1 →Ex.20.16; Lv.19.11-12, Dt.24.10-13.  23.3 Es decir, defenderlo a ultranza, por 

el solo hecho de ser pobre

23.3 

→Lv.19.15.  23.5 Esto es, al dueño del asno. →Dt.22.1-4.  23.6 .gente.  23.8 →Lv.19.15; 

Dt.16.19. 

23.9 

→Ex.22.21;  Lv.19.33-34;  Dt.24.17-18;  27.19.  23.11  Lit.  la  abandonarás.  23.11  →Lv.25.1-7.  23.12 

→Ex.20.9-11; 31.15; 34.21; 35.2; Lv.23.3; Dt.5.13-14.  23.13 La simple mención de dioses extraños implica su invocación 

y juramentación. 

→Nm.32.38, Sal.16.4, Os.2.17, Zac.13.2.  23.14 Se debían observar tres fiestas solemnes relacionadas con 

la peregrinación al Santuario: la Fiesta de los Ázimos en primavera, la Fiesta de la Siega en verano, y la Fiesta de la Cose-

cha en otoño. 

23.15 Heb. matsot = nada que contenga levadura

→Ex.12.14-20; Lv.23.6-8; Nm.28.17-25.  23.15 Es decir, 

con  las  manos  vacías

23.16  .observarás.  23.16 

→Lv.23.15-21;  Nm.28.26-31.  23.16  →Lv.23.39-43.  23.19  →Dt.26.2. 

23.19 

→Dt.14.21.  23.22 Nótese el cambio a primera persona. 


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Éxodo 24:15

83

con tus enemigos y tendré aversión hacia 

tus adversarios,

23 porque mi ángel irá delante de ti y te 

conducirá hacia el amorreo, al heteo, al 

ferezeo, al cananeo, al heveo y al jebuseo, 

y los exterminaré.

24 No te postrarás ante sus dioses, ni les 

rendirás culto, ni harás según sus obras, 

sino  que  los  destruirás  por  completo  y 

destrozarás enteramente sus estelas.°

25 Serviréis  a  YHVH  vuestro  Dios,  y  Él 

bendecirá tu pan y tu agua, y apartaré la 

enfermedad de en medio de ti.

26 No habrá en tu tierra mujer que abor-

te, ni estéril, y haré que el número de tus 

días sea completado.

27 Enviaré mi terror delante de ti y tras-

tornaré a todo pueblo donde tú entres, y 

te daré la cerviz de todos tus enemigos.°

28 Delante de ti enviaré la avispa° que ex-

pulsará de tu presencia al heveo, al cana-

neo y al heteo.

29 No  los  echaré  de  tu  presencia  en  un 

solo año para que la tierra no quede de-

solada y no se multipliquen contra ti las 

bestias del campo.

30 Poco a poco los iré echando de tu pre-

sencia, hasta que fructifiques y heredes la 

tierra.

31 Y estableceré tu frontera desde el Mar 

Rojo hasta el Mar de los Filisteos,° y desde 

el desierto hasta el Río,° porque entregaré 

en vuestras manos a los moradores de la 

tierra y tú los expulsarás de tu presencia.

32 No concertarás pacto con ellos ni con 

sus dioses.

33 No habitarán en tu tierra, no sea que 

te  hagan  pecar  contra  mí  cuando  sirvas 

a sus dioses, lo cual ciertamente te será 

por trampa.

La sangre del pacto

24

Después  dijo  a  Moisés:  Sube  a 

YHVH  tú,  con  Aarón,  Nadab  y 

Abiú,°  y  con  setenta  de  los  ancianos  de 

Israel, y os postraréis a lo lejos.

2 Sólo  Moisés  se  acercará  a  YHVH,  pero 

ellos no se acercarán, ni el pueblo subirá 

con él.

3 Y Moisés regresó y contó al pueblo todas 

las palabras de YHVH y todos los decretos. 

Y todo el pueblo respondió a una voz, y 

dijeron: Cumpliremos todas las palabras 

que YHVH ha hablado.

4 Y escribió Moisés todas las palabras de 

YHVH, y levantándose temprano de ma-

ñana, construyó al pie del monte un altar 

y doce estelas, conforme a las doce tribus 

de Israel.

5 Y envió a los jóvenes de los hijos de Is-

rael, los cuales ofrecieron holocaustos e 

hicieron sacrificios de becerros: ofrendas 

de paz a YHVH.

6 Y Moisés tomó la mitad de la sangre y 

la puso en tazones, y la otra mitad de la 

sangre la derramó sobre el altar.

7 Luego tomó el rollo del pacto y lo pro-

clamó  a  oídos  del  pueblo.  Ellos  dijeron: 

Cumpliremos  y  obedeceremos  todo  lo 

que YHVH habló.

8 Entonces  Moisés  tomó  la  sangre  y  la 

roció sobre el pueblo, diciendo: ¡He aquí 

la  sangre  del  pacto°  que  YHVH  ha  con-

certado  con  vosotros  sobre  todas  estas 

palabras!°

9 Y subió Moisés con Aarón, Nadab y Abiú, 

y con setenta de los ancianos de Israel,

10 y vieron al Dios de Israel: Bajo sus pies 

había como una hechura de piedra de zafiro, 

semejante en pureza a los mismos cielos.

11 Y no extendió su mano contra los dis-

tinguidos  de  los  hijos  de  Israel  que  pu-

dieron  contemplar  a  ’Elohim,  y  después 

comieron y bebieron.°

12 Y  YHVH  dijo  a  Moisés:  Sube  al  mon-

te, ante mi presencia, y permanece allí, y 

te daré las tablas de piedra con la Ley y 

el mandamiento que he escrito para ins-

truirles.

13 Y  se  levantó  Moisés,  y  también  Josué 

su  servidor,  y  subió  Moisés  al  monte  de 

Dios.

14 Y él había dicho a los ancianos: Que-

daos aquí hasta que volvamos a vosotros. 

Mirad,  Aarón  y  Hur  están  con  vosotros, 

quien tenga asuntos, acérquese a ellos.

15 Entonces Moisés subió al monte, y la 

nube cubrió el monte.

23.24 Heb. massebot. Monumentos conmemorativos o destinados a la adoración ancestral entre las tribus nómadas, realizados 

en piedra, generalmente sin labrar. 

23.27 Heb. = poner en fuga al enemigo.  23.28 Nel pánico

→Jos.2.9.  23.31 Esto es, el 

Mar Mediterráneo

23.31 Es decir, el Éufrates.  24.1 Dos de los cuatro hijos de Aarón. 

→6.23.  24.8 →Mt.26.28; Mr.14.24; 

Lc.22.20; 1 Co.11.25; He.10.29. 

24.8 

→He.9.19-20.  24.11 Forma típica de sellar un pacto →Ge.26.26-31.


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Éxodo 24:16

84

16 Y  la  gloria  de  YHVH  reposó  sobre  el 

monte Sinay, y la nube lo cubrió por seis 

días. Al séptimo día llamó a Moisés de en 

medio de la nube.

17 Pero la apariencia de la gloria de YHVH 

en la cumbre del monte era como fuego 

consumidor ante los ojos de los hijos de 

Israel.

18 Y  Moisés  entró  en  medio  de  la  nube 

y  subió  al  monte.  Y  estuvo  Moisés  en 

el  monte  cuarenta  días  y  cuarenta  no-

ches.°

El Arca, la mesa de los panes, el 

candelabro

25

Y YHVH habló a Moisés, diciendo:

2 Di a los hijos de Israel que reco-

jan una ofrenda para mí. De todo varón 

generoso  de  corazón  recogeréis  una 

ofrenda para mí.

3 Y  esta  es  la  ofrenda  que  recogeréis  de 

ellos: Oro, y plata, y bronce,

4 azul, púrpura, carmesí, lino fino, y pelo 

de cabras.

5 También  pieles  de  carnero  teñidas  de 

rojo, pieles de tejones, troncos de acacia,

6 aceite para el alumbrado, especias para 

el aceite de la unción y para el incienso 

aromático,

7 piedras  de  ónice  y  piedras  de  engaste 

para el efod° y para el pectoral.°

8 Y harán un Santuario para mí, y habita-

ré en medio de ellos.

9 Conforme a todo lo que Yo te muestro, 

al modelo del Tabernáculo y al modelo de 

todos sus utensilios, así lo haréis.

Mobiliario del Tabernáculo

10 Harán,  pues,  un  arca  de  madera  de 

acacia:  su  longitud  será  de  dos  codos  y 

medio, su anchura de codo y medio, y su 

altura de codo y medio.

11 Y  la  recubrirás  de  oro  puro.  La  recu-

brirás por dentro y por fuera, y harás una 

moldura de oro alrededor de ella.

12 Y fundirás para ella cuatro argollas de 

oro que pondrás en sus cuatro esquinas: 

dos argollas a un lado de ella y dos argo-

llas al otro lado.

13 También  harás  unas  varas  de  madera 

de acacia y las recubrirás de oro,

14 y meterás las varas por las argollas, a los 

lados del Arca, para cargar el Arca con ellas.

15 Las  varas  estarán  en  las  argollas  del 

Arca, no se quitarán de ella,

16 y pondrás en el Arca el testimonio que 

te daré.

17 Y harás un propiciatorio° de oro puro: 

su longitud, de dos codos y medio, y su 

anchura, de codo y medio.

18 Y en los dos extremos del propiciatorio 

harás  dos  querubines  de  oro,  labrados  a 

cincel los harás.

19 Haz un querubín a un extremo, y un 

querubín al otro extremo. Del propiciato-

rio mismo° haréis surgir los querubines 

sobre sus dos extremos.

20 Los querubines estarán con las alas des-

plegadas  hacia  arriba,  cubriendo  con  sus 

alas el propiciatorio, sus rostros uno frente 

al otro, y los rostros de los querubines es-

tarán vueltos hacia el propiciatorio.

21 Pondrás  el  propiciatorio  encima  del 

Arca, y dentro del Arca pondrás el testi-

monio que te daré.

22 Y allí me reuniré contigo, entre los dos 

querubines  que  están  sobre  el  Arca  del 

Testimonio, y por encima del propiciato-

rio  hablaré  contigo  todo  lo  que  haya  de 

ordenarte para los hijos de Israel.

23 También harás una mesa de madera de 

acacia: su longitud será de dos codos, y su 

anchura de un codo, y su altura de codo 

y medio.

24 La  recubrirás  de  oro  puro,  y  le  harás 

una moldura de oro alrededor.

25 Le harás alrededor un reborde de oro 

de  un  palmo,  y  al  reborde  le  harás  una 

moldura de oro en derredor.

26 Luego le harás cuatro argollas de oro, 

y pondrás las argollas en las cuatro esqui-

nas que corresponden a sus cuatro patas.

27 Las argollas estarán cerca del reborde, 

para meter las varas con las cuales se ha 

de cargar la mesa.

28 Y harás las varas de madera de acacia, y 

las recubrirás de oro, y la mesa será trans-

portada con ellas.

24.18 

→Dt.9.9.  25.7 Túnica de lino.  25.7 Bolsa que llevaba el sacerdote sobre el efod contentiva del Urim y el Tumim.  25.17 

Heb. kaporet. LXX: gr. ilasterion. Se refiere al lugar en que se declaraba el perdón de los pecados. 

25.19 Es decir, de una misma 

pieza con el propiciatorio.


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Éxodo 26:16

85

29 Harás sus platos, sus cucharones, sus 

jarros y sus tazones, con los cuales se ha-

rán las libaciones. Los harás de oro puro.

30 Y ante mí pondrás el pan de la proposi-

ción sobre la mesa perpetuamente°.

31 Harás  además  un  candelabro  de  oro 

puro: El candelabro se hará labrado a mar-

tillo, también su pie, su fuste, sus cálices, 

sus bulbos, y sus flores, serán de él.°

32 De  sus  lados  saldrán  seis  brazos:  tres 

brazos  del  candelabro  de  uno  de  sus  la-

dos, y tres brazos del candelabro del otro 

lado.

33 Tres  cálices  hechos  como  almendras° 

en un brazo, un bulbo y una flor, y tres 

cálices hechos como almendras en el otro 

brazo, un bulbo y una flor. Así en los seis 

brazos que salen del candelabro.

34 En el candelabro habrá cuatro cálices 

hechos como almendras, con sus bulbos 

y sus flores.

35 Y  habrá  un  bulbo  debajo  de  cada  par 

de brazos, de una sola pieza con él, y otro 

bulbo  debajo  del  otro  par  de  brazos,  de 

una sola pieza con él, y otro bulbo debajo 

del otro par de brazos, de una sola pieza 

con él, según los seis brazos que salen del 

candelabro.

36 Sus bulbos y sus brazos serán parte de 

él mismo, todo ello de una sola pieza de 

oro puro labrada a cincel.

37 Harás  también  sus  siete  lámparas,  y 

colocarán estas lámparas para que alum-

bren adelante.

38 Sus despabiladeras y sus platillos serán 

de oro puro.

39 De un talento° de oro puro será hecho, 

con todos estos utensilios.

40 Mira y haz conforme al modelo de ellos 

que te fue mostrado en el monte.°

El Tabernáculo

26

Harás al Tabernáculo diez cortinas 

de  lino  torcido  y  azul,  púrpura  y 

carmesí. Las harás con querubines, obra 

de hábil diseñador.

2 La  longitud  de  cada  cortina  será  de 

veintiocho codos y su anchura de cuatro 

codos, una misma medida para todas las 

cortinas.

3 Cinco  cortinas  estarán  unidas  una  a 

otra, y las otras cinco cortinas unidas una 

a otra.

4 Harás presillas de tejido azul en la orilla 

de cada cortina, al final de la serie, y lo 

mismo harás en la orilla de la última cor-

tina en la segunda serie.

5 Harás cincuenta presillas en la primera 

cortina, y cincuenta presillas en el borde 

de la cortina que está en la segunda serie. 

Las  presillas  estarán  contrapuestas  unas 

a otras.

6 Harás  cincuenta  corchetes  de  oro,  y 

unirás las cortinas la una con la otra por 

medio de los corchetes, y el Tabernáculo 

será uno.

7 También harás cortinas de pelo de cabra 

a  modo  de  tienda  sobre  el  Tabernáculo: 

Once cortinas harás.

8 La longitud de cada cortina, treinta codos, 

y la anchura de cada cortina, cuatro codos. 

Una sola medida para las once cortinas.

9 Unirás  aparte  cinco  cortinas,  y  sepa-

radamente otras seis cortinas, y la sexta 

cortina doblarás en la parte frontal de la 

Tienda.

10 Harás  cincuenta  presillas  en  la  orilla 

de la cortina, en la última de la serie, y 

cincuenta  presillas  en  la  orilla  de  la  se-

gunda cortina en la segunda serie.

11 También  harás  cincuenta  corchetes  de 

bronce, y meterás los corchetes por las pre-

sillas y unirás la Tienda, y será una sola.

12 El sobrante de las cortinas de la Tien-

da, la mitad sobrante de la cortina, colga-

rá por la parte posterior del Tabernáculo.

13 El codo sobrante de una parte y el codo 

de la otra, que sobra en la longitud de las 

cortinas de la Tienda, colgará a los lados 

del  Tabernáculo,  a  uno  y  otro  lado  para 

cubrirlo.

14 Harás también a la Tienda un cobertor 

de pieles de carneros teñidas de rojo, y por 

encima un cobertor de pieles de tejones.

15 Asimismo,  construirás  para  el  Taber-

náculo tablones de madera de acacia er-

guidos.

16 La longitud de cada tablón será de diez 

codos, y de  codo  y  medio la anchura de 

cada tablón.

25.30 

→Lv.24.5-8.  25.31 Es decir, de una sola pieza con el candelabro.  25.33 Es decir, flor de almendro.  25.39 Medida que 

puede variar entre 34 y 61 kg. 

25.40 

→Hch.7.44; He.8.5. 


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Éxodo 26:17

86

17 Cada tablón tendrá dos espigas acopla-

das la una con la otra. De igual manera ha-

rás con todos los tablones del Tabernáculo.

18 Harás pues así los tablones para el Ta-

bernáculo: veinte tablones al lado del me-

diodía, al sur.

19 Y harás cuarenta basas de plata debajo 

de  los  veinte  tablones:  dos  basas  debajo 

de cada tablón para sus dos espigas, y dos 

basas debajo del otro tablón para sus dos 

espigas.

20 Al  otro  lado  del  Tabernáculo,  para  el 

lado del norte, veinte tablones,

21 y sus cuarenta basas de plata: dos basas 

debajo  de  un  tablón,  y  dos  basas  debajo 

del otro tablón.

22 Para el lado posterior del Tabernáculo, 

al occidente, harás seis tablones.

23 Harás además dos tablones para las es-

quinas posteriores del Tabernáculo.

24 Estarán  encastrados  desde  abajo,  per-

fectamente unidos hasta arriba, hasta la 

argolla. Así se hará con ambas, son para 

las dos esquinas.

25 Serán ocho tablones, con sus basas de 

plata, dieciseis basas: dos basas debajo de 

un tablón, y dos basas debajo del otro ta-

blón.

26 Harás también cinco barras de madera 

de acacia para los tablones de un lado del 

Tabernáculo,

27 y  cinco  barras  para  los  tablones  del 

otro lado del Tabernáculo, y cinco barras 

para  el  lado  posterior  del  Tabernáculo, 

hacia el occidente.

28 Y  la  barra  del  medio  atravesará°  los 

tablones por el centro, de un extremo al 

otro extremo.

29 Recubrirás de oro los tablones. Harás 

sus  argollas  de  oro  para  meter  por  ellas 

las barras y recubrirás de oro las barras.

30 Harás erigir el Tabernáculo conforme al 

modelo que te fue mostrado en el monte.

31 Harás también un velo de azul, púrpu-

ra, carmesí y lino torcido. Se hará de obra 

primorosa, con querubines.

32 Lo pondrás sobre cuatro columnas de 

acacia recubiertas de oro, y sus ganchos 

de oro, sobre cuatro basas de plata.

33 Y pondrás el velo bajo los corchetes, y 

allí,  detrás  del  velo,  meterás  el  Arca  del 

Testimonio, y el velo os hará separación 

entre el lugar santo y el lugar santísimo.

34 Colocarás el propiciatorio sobre el Arca 

del Testimonio, en el lugar santísimo.

35 Y fuera del velo pondrás la mesa, y el 

candelabro  frente  a  la  mesa,  al  costado 

sur del Tabernáculo, y la mesa la situarás 

al lado norte.

36 Para la entrada de la Tienda harás una 

cortina de azul, púrpura, carmesí, y lino 

torcido, obra de recamador.

37 Y para la cortina harás cinco columnas 

de  acacia,  las  cuales  recubrirás  de  oro. 

Sus ganchos serán de oro, y fundirás para 

ellas cinco basas de bronce.

El altar y el atrio

27

El altar lo harás de madera de aca-

cia,  de  cinco  codos  de  largo  y  de 

cinco codos de ancho. El altar será cua-

drado, y su altura de tres codos.

2 Harás  sus  cuernos°  en  sus  cuatro  es-

quinas. Los cuernos serán de una misma 

pieza y lo recubrirás de bronce.

3 Harás asimismo sus vasijas para recibir 

su ceniza,° y sus paletas, y sus tazones, y 

sus garfios y sus braseros. Todos sus uten-

silios los harás de bronce.

4 Le harás un enrejado de bronce, a modo 

de rejilla, y sobre el enrejado, en sus cuatro 

esquinas, harás cuatro argollas de bronce.

5 Lo colocarás abajo, dentro del cerco del 

altar, y llegará hasta la mitad del altar.

6 Harás varas para el altar, varas de made-

ra de acacia, y las recubrirás de bronce.

7 Sus varas se meterán por las argollas, y 

cuando  sea  transportado,  las  varas  esta-

rán a ambos lados del altar.

8 Lo harás de tablas, hueco, conforme se 

te mostró en el monte, así lo harán.

9 Luego  harás  el  atrio  del  Tabernáculo. 

Por  el  lado  meridional,  hacia  el  sur,  el 

atrio  tendrá  cortinas  de  lino  torcido,  de 

cien codos de largo por cada lado.

10 Sus veinte columnas y sus veinte basas 

serán de bronce, pero los ganchos de las 

columnas y sus molduras, de plata.

26.28 Lit. y uno hará que la barra del medio atraviese.  27.2 Elemento muy sagrado del altar, donde se depositaba la primera 

sangre del sacrificio. 

→Lv.4.7-18.  27.3 Lit. ceniza grasienta.


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Éxodo 28:17

87

11 También en el lado norte habrá a lo lar-

go cortinas de cien codos de longitud, y 

sus columnas serán veinte, con sus veinte 

basas de bronce, pero los ganchos de las 

columnas y sus molduras, serán de plata.

12 A lo ancho del atrio, por el extremo del 

occidente,  habrá  cortinas  de  cincuenta 

codos. Sus columnas serán diez, con sus 

diez basas.

13 El ancho del atrio por el lado del orien-

te, hacia el este, será de cincuenta codos.

14 Las  cortinas  para  un  lado  serán  de 

quince  codos.  Sus  columnas  serán  tres, 

con sus tres basas.

15 Y al otro lado, cortinas de quince codos. 

Sus tres columnas, con sus tres basas.

16 Por la entrada del atrio habrá una cu-

bierta de veinte codos, de azul, púrpura, 

carmesí  y  lino  torcido,  de  obra  de  reca-

mador.  Sus  columnas  serán  cuatro,  con 

sus cuatro basas.

17 Todas  las  columnas  del  atrio  en  de-

rredor tendrán abrazaderas de plata, sus 

ganchos de plata, y sus basas de bronce.

18 La longitud del atrio será de cien co-

dos, la anchura cincuenta por un lado y 

cincuenta por el otro, y la altura de cinco 

codos. Sus cortinas de lino torcido y sus 

basas de bronce.

19 Todos los utensilios del Tabernáculo 

para todo su servicio, todas sus estacas 

y  todas  las  estacas  del  atrio  serán  de 

bronce.

20 Y  tú  mismo  ordenarás  a  los  hijos  de 

Israel  que  te  traigan  aceite  puro  de  oli-

vas machacadas para el alumbrado, para 

hacer que la lámpara arda continuamente 

en la Tienda de Reunión afuera del velo 

que está delante del Testimonio.

21 Desde la tarde hasta la mañana Aarón 

y sus hijos la mantendrán en presencia 

de YHVH. Será estatuto perpetuo de par-

te de los hijos de Israel por sus genera-

ciones.

Las vestiduras sacerdotales

28

De  entre  los  hijos  de  Israel  harás 

que se presente delante de ti Aarón 

tu hermano, y sus hijos con él, para que 

Aarón,  y  Nadab,  Abiú,  Eleazar  e  Itamar, 

hijos de Aarón, sean mis sacerdotes.

2 Harás  vestiduras  sagradas  para  tu  her-

mano Aarón, para honra y esplendor.

3 Y tú mismo hablarás a todos los sabios 

de  corazón,  a  quienes  he  llenado  de  es-

píritu  de  sabiduría,  para  que  hagan  las 

vestiduras de Aarón, a fin de consagrarlo 

para que me sirva en el sacerdocio.

4 Y  éstas  son  las  vestiduras  que  harán: 

el pectoral, el efod, el manto y la túnica 

bordada,  el  turbante  y  el  cinturón.  Ha-

rán vestiduras sagradas para tu hermano 

Aarón y para sus hijos, para que me sirvan 

en el sacerdocio.

5 Utilizarán para ello el oro, el azul, la púr-

pura, el carmesí y el torzal de lino fino,

6 y como obra de artifice harán el efod de 

oro,  azul,  púrpura,  carmesí  y  torzal  de 

lino fino.

7 Tendrá dos hombreras unidas a sus dos 

extremos que se entrelazarán,

8 y la banda del efod que está por encima 

será de su misma labor, del mismo mate-

rial: de oro, azul, púrpura, carmesí y tor-

zal de lino fino.

9 Luego  tomarás  dos  piedras  de  ónice,  y 

grabarás en ellas los nombres de los hijos 

de Israel:

10 Seis  de  sus  nombres  en  una  piedra  y 

los otros seis nombres en la otra piedra, 

conforme al nacimiento de ellos.

11 Como obra de escultor, con grabaduras 

de sello, grabarás las dos piedras con los 

nombres de los hijos de Israel. Les harás 

alrededor engastes de oro,

12 y  pondrás  aquellas  dos  piedras  sobre 

las hombreras del efod, como piedras en 

memoria para los hijos de Israel. Y Aarón 

llevará sus nombres sobre sus dos hom-

bros  como  memorial  en  presencia  de 

YHVH.

13 Harás engastes de oro,

14 y  dos  cadenas  de  oro  puro.  Las  harás 

como cordones trenzados, obra de tren-

zado, y pondrás las cadenas trenzadas en 

los engastes.

15 Harás asimismo el pectoral del juicio, 

obra de artífice. Como la obra del efod lo 

harás:  de  oro,  azul,  púrpura,  carmesí  y 

torzal de lino fino lo fabricarás.

16 Será cuadrado, doble, de un palmo su 

longitud y de un palmo su anchura,

17 y lo engarzarás en engastes de pedre-

ría, cuatro hileras de piedras: una hilera 

con un rubí, un topacio, y una esmeralda. 

Es la primera hilera.


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Éxodo 28:18

88

18 La  segunda  hilera:  una  turquesa,  un 

zafiro, y un diamante.

19 La tercera hilera: un jacinto, un ágata 

y una amatista.

20 Y la cuarta hilera: un berilo, un ónice 

y un jaspe. Estarán montadas en engastes 

de oro.

21 Y estas piedras serán según los nombres 

de los hijos de Israel, doce según sus nom-

bres, grabadas como un sello, cada una con 

su nombre. Serán para las doce tribus.

22 Para el pectoral harás unas cadenetas de 

oro puro, trenzadas a modo de cordón.

23 Formarás en el pectoral dos anillos de 

oro, y sujetarás los dos anillos a los dos 

extremos del pectoral.

24 Luego  meterás  los  dos  trenzados  de 

oro en los dos anillos, en los dos extremos 

del pectoral,

25 y los otros dos cabos de los dos cordo-

nes los pondrás sobre las dos monturas, 

sujetándolos a las hombreras del efod por 

la parte delantera.

26 Harás dos anillos de oro y los pondrás 

en los dos extremos del pectoral, sobre el 

borde que está al otro lado del efod, por 

dentro.

27 Harás  dos  anillos  de  oro  y  los  fijarás 

por debajo a las dos hombreras del efod, 

en  la  parte  delantera,  junto  a  su  unión 

por encima del cinto del efod.

28 Y por sus anillos, atarán el pectoral a 

los anillos del efod con un cordón azul, de 

modo que esté sobre el cinto del efod, y el 

efod no se moverá del pectoral.

29 Y cuando entre en el Santuario, Aarón 

llevará los nombres de los hijos de Israel 

en el pectoral del juicio sobre su corazón, 

para  memoria  delante  de  YHVH  conti-

nuamente.

30 Y  en  el  pectoral  del  juicio  pondrás  el 

Urim y Tumim,° para que estén sobre el 

corazón  de  Aarón  cuando  entre  delante 

de  YHVH.  Aarón  llevará  continuamente 

el juicio de los hijos de Israel sobre su co-

razón delante de YHVH.

31 El  manto  del  efod  lo  harás  todo  de 

azul.

32 La  abertura  para  su  cabeza  estará  en 

el medio, con una orla alrededor de obra 

de tejedor, como el cuello de un coselete, 

para que no se rompa.

33 En sus orillas harás granadas de azul, 

púrpura y carmesí, alrededor en todo su 

borde,  y  entre  ellas  campanillas  de  oro 

alrededor.

34 Una campanilla de oro y una granada, 

una campanilla de oro y una granada, por 

las orillas del manto todo en torno.

35 Estará sobre Aarón cuando ministre, y 

así se oirá su sonido cuando él entre en el 

Santuario en presencia de YHVH, y cuan-

do salga, para que no muera.

36 Harás además una plancha de oro puro, 

y grabarás en ella como se graba un sello: 

Santidad para YHVH,

37 la cual colocarás con un cordón de azul 

sobre el turbante. Estará en el frontal del 

turbante,

38 y  estará  sobre  la  frente  de  Aarón,  y 

Aarón  será  portador  de  la  culpa  respec-

to  de  las  cosas  sagradas  que  los  hijos 

de  Israel  consagren  en  todas  sus  santas 

ofrendas,  y  estará  continuamente  sobre 

su frente para hacerlos aceptos delante de 

YHVH.

39 Y tejerás la túnica de lino, y harás un 

turbante de lino. Harás también un cinto, 

obra de recamador.

40 Y harás túnicas para los hijos de Aarón, 

y les harás cintos, y les harás tiaras para 

honra y esplendor.

41 Y con ellos vestirás a tu hermano Aarón 

y a sus hijos con él, y los ungirás, llenarás 

sus manos° y los consagrarás para que me 

sean sacerdotes.

42 Les harás también unos zaragüelles de 

lino para cubrir la carne desnuda. Serán 

desde la cintura hasta los muslos,

43 y estarán sobre Aarón y sobre sus hi-

jos cuando entren en la Tienda de Reu-

nión, o cuando se acerquen al altar para 

ministrar  en  el  Santuario,  para  que  no 

lleven culpa y mueran. Es estatuto per-

petuo  para  él,  y  para  su  descendencia 

después de él.

28.30 Estos es, luces y perfecciones. Aunque no es posible conocer su función exacta, es prob. que mediante estas dos piedras 

Dios daba a conocer su voluntad. Tal vez una luz en torno al Urim era señal de la aprobación divina en cuanto a los asuntos 

que se le presentaban, y una sombra sobre el Tumim era señal de su desaprobación, pero de esto no hay evidencia alguna. 

→1 S.23.9-12. →Nm.27.21; Esd.2.63; Neh.7.65.  28.41 Señal de investidura. Colocación en sus manos de la porción que 

habían de ofrecer, a modo de consagración 

→29.9.


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Éxodo 29:25

89

Consagración de Aarón y sus hijos

29

Esto es lo que les harás para con-

sagrarlos, para que me sean sacer-

dotes: Toma un becerro de la vacada y dos 

carneros sin defecto,

2 panes  sin  levadura,  tortas  sin  levadura 

amasadas con aceite, y hojaldres sin leva-

dura untados con aceite. Los harás de flor 

de harina de trigo,

3 y los pondrás en un canastillo, y en el 

canastillo los ofrecerás juntamente con el 

becerro y los dos carneros.

4 Harás que Aarón y sus hijos se acerquen 

a la entrada de la Tienda de Reunión, y los 

lavarás con agua.°

5 Tomarás las vestiduras y vestirás a Aarón 

con la túnica y el manto del efod, el efod 

y el pectoral, y lo ceñirás con el cinto del 

efod.

6 Pondrás  el  turbante  sobre  su  cabeza  y 

sobre el turbante pondrás la diadema sa-

grada.

7 Luego tomarás el aceite de la unción y 

lo  derramarás  sobre  su  cabeza,  y  lo  un-

girás.

8 Después harás que sus hijos se acerquen 

y les vestirás las túnicas,

9 y les ceñirás el cinto a Aarón y a sus hijos, 

y les atarás las tiaras, y tendrán el sacerdo-

cio por estatuto perpetuo. Así llenarás° la 

mano de Aarón y la mano de sus hijos.

10 Después  harás  acercar  el  becerro  de-

lante  de  la  Tienda  de  Reunión,  y  Aarón 

y sus hijos apoyarán sus manos sobre la 

cabeza del becerro.

11 Luego degollarás el becerro en presen-

cia de YHVH a la entrada de la Tienda de 

Reunión,

12 y tomarás de la sangre del becerro, y la 

aplicarás sobre los cuernos del altar con 

tu dedo, y derramarás todo el resto de la 

sangre al pie del altar.

13 Tomarás también toda la grasa que cu-

bre  las  entrañas,  el  redaño  del  hígado  y 

los dos riñones con la grasa que los en-

vuelve y lo dejarás consumir en el altar.

14 Pero la carne del becerro con su pelle-

jo y su estiércol consumirás a fuego fuera 

del campamento. Es ofrenda por el peca-

do.

15 Asimismo tomarás el primer carnero, 

y Aarón y sus hijos apoyarán sus manos 

sobre la cabeza del carnero,

16 y  degollarás  el  carnero,  y  tomarás  su 

sangre, y rociarás en torno al altar.

17 Después  descuartizarás  el  carnero  en 

trozos, lavarás sus intestinos y sus patas, 

y los pondrás sobre sus trozos y sobre su 

cabeza,

18 y  quemarás  todo  el  carnero  sobre  el 

altar. Es el holocausto a YHVH, olor que 

apacigua, ofrenda ígnea para YHVH.°

19 Tomarás luego el otro carnero, y Aarón 

y sus hijos apoyarán sus manos sobre la 

cabeza del carnero.

20 Luego  degollarás  el  carnero,  tomarás 

de su sangre y la pondrás en el lóbulo de 

la oreja derecha de Aarón, y en el lóbulo 

de las orejas de sus hijos, en el pulgar de 

sus manos derechas y en el pulgar de sus 

pies derechos,° y esparcirás la sangre al-

rededor del altar.

21 Tomarás de la sangre que hay sobre el 

altar y del aceite de la unción, y lo espar-

cirás sobre Aarón y sobre sus vestiduras, 

sobre sus hijos y sobre las vestimentas de 

éstos.  Y  él  será  consagrado,  y  sus  vesti-

duras, y sus hijos, y las vestiduras de sus 

hijos con él.

22 Tomarás  luego  la  grasa,  y  la  cola  del 

carnero,  la  grasa  que  cubre  sus  intesti-

nos y el recubrimiento del hígado, los dos 

riñones y la grasa que hay sobre ellos, y 

la pierna derecha, pues es un carnero de 

consagraciones,

23 con una hogaza de pan y una torta de 

pan con aceite, y un hojaldre del canasti-

llo de los ázimos que está en la presencia 

de YHVH.

24 Y lo pondrás todo en manos de Aarón y 

en manos de sus hijos, y lo mecerás como 

una ofrenda mecida° delante de YHVH.

25 Seguidamente  lo  tomarás  de  sus  ma-

nos y lo quemarás en el altar sobre el ho-

locausto, en olor que apacigua, delante de 

YHVH. Es ofrenda ígnea a YHVH.

29.4 Ablución o baño ritual.  29.9 Es decir, consagrarás. La consagración solía hacerse poniendo en la mano del sacerdo-

te la muestra de su ministerio. Aquí se usan ciertas porciones de las ofrendas para este propósito 

→v.24.  29.18 →Ef.5.2; 

Fil.4.18. 

29.20 Simbología: se coloca en la oreja para escuchar, en la mano, para actuar, y en el pie para andar conforme a 

la Palabra de Dios. 

29.24 Heb. tenufah. Balanceo horizontal simbolizando (prob.) que todo lo contenido en los cuatro puntos 

cardinales pertenece a Dios. 


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Éxodo 29:26

90

26 Tomarás  el  pecho  del  carnero  de  la 

investidura  de  Aarón  y  lo  mecerás.  Es 

ofrenda mecida delante de YHVH, y será 

tu porción.

27 Y  consagrarás  el  pecho  de  la  ofrenda 

mecida y la espaldilla de la ofrenda, lo que 

fue mecido y lo que fue alzado° del car-

nero de la investidura, de lo que es para 

Aarón y de lo que es para sus hijos,

28 y será para Aarón y para sus hijos por 

estatuto perpetuo de parte de los hijos de 

Israel, pues es ofrenda, y será una ofrenda 

de parte de los hijos de Israel, de sus sa-

crificios de paz, su ofrenda a YHVH.

29 Las  vestiduras  sagradas  que  son  de 

Aarón, serán para sus hijos después de él, 

para  ser  ungidos  con  ellas  y  para  llenar 

con ellas su mano.°

30 Por  siete  días  las  vestirá  el  sacerdo-

te que sea su sucesor de entre sus hijos, 

cuando  entre  en  la  Tienda  de  Reunión 

para ministrar en el Santuario.

31 Y tomarás el carnero de la investidura 

y cocerás su carne en un lugar santo.

32 Y  Aarón  y  sus  hijos  comerán  la  carne 

del carnero y el pan que está en el canasti-

llo en la entrada de la Tienda de Reunión.

33 Comerán aquellas cosas con las cuales 

se hizo expiación, para llenar sus manos y 

consagrarlos, pero el extraño no comerá, 

porque son sagradas.

34 Y si sobra de la carne o del pan de la 

investidura  hasta  la  mañana,  quemarás 

en el fuego lo que sobre. No se comerá, 

porque está consagrado.

35 Así  pues  harás  a  Aarón  y  a  sus  hijos, 

conforme a todas las cosas que Yo te he 

ordenado. Durante siete días llenarás su 

mano.

36 Y  sacrificarás  diariamente  el  becerro 

de la expiación por el pecado, y purifica-

rás el altar al hacer expiación sobre él, y 

lo ungirás para consagrarlo.

37 Harás  expiación  por  el  altar  durante 

siete días y lo santificarás, y será un altar 

santísimo. Todo lo que toque al altar será 

santificado.

38 Esto es lo que ofrecerás sobre el altar: 

dos  corderos  añales,  cada  día  continua-

mente.

39 Ofrecerás un cordero por la mañana, y 

el otro cordero lo ofrecerás antes del cre-

púsculo.

40 Con  el  primer  cordero  ofrecerás  una 

décima parte de un efa de flor de harina, 

amasada  con  la  cuarta  parte  de  un  hin 

de aceite machacado,° y para libación la 

cuarta parte de un hin de vino.

41 El  segundo  cordero  lo  ofrecerás  an-

tes del crepúsculo. Lo harás conforme a 

la ofrenda de la mañana y conforme a su 

libación,  ofrenda  ígnea  a  YHVH  en  olor 

que apacigua.

42 Éste  será  el  holocausto  perpetuo  du-

rante vuestras generaciones, el cual será 

ofrecido a la entrada de la Tienda de Reu-

nión,  en  presencia  de  YHVH,  donde  me 

reuniré con vosotros, para hablar contigo 

allí.

43 Y allí me reuniré con los hijos de Israel, 

y el lugar será santificado con mi gloria.

44 Por lo cual santificaré el Tabernáculo 

de Reunión y el altar, también a Aarón y 

a sus hijos santificaré, para que me sean 

sacerdotes.

45 Y habitaré en medio de los hijos de Is-

rael, y seré su Dios.

46 Y ellos conocerán que Yo soy YHVH, su 

Dios, que los saqué de la tierra de Egipto 

para habitar en medio de ellos. Yo, YHVH 

su Dios.

Prescripciones del servicio

30

Harás asimismo un altar para que-

mar incienso. Lo harás de madera 

de acacia.

2 Su longitud será de un codo, su anchura 

de un codo y su altura de dos codos. Será 

cuadrado y sus cuernos formarán parte de 

él.

3 Lo recubrirás de oro puro, así su super-

ficie como sus costados en derredor y sus 

cuernos, y le harás alrededor una moldu-

ra de oro.

4 Además le harás dos argollas de oro de-

bajo de su moldura en sus dos extremos, 

en ambos costados suyos, para meter las 

varas con que será llevado.

5 Harás las varas de madera de acacia y las 

recubrirás de oro.

29.27 Heb. terumah, parte del sacerdote, que como ofrenda se elevaba, simbolizando (prob.) que la tierra y el cielo también le 

pertenecen. 

29.29 

→29.9.  29.40 Es decir, aceitunas machacadas.


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Éxodo 30:34

91

6 Y  lo  pondrás  delante  del  velo  que  está 

junto al Arca del Testimonio, delante del 

propiciatorio  que  está  sobre  el  Testimo-

nio, donde me reuniré contigo.

7 Aarón quemará incienso aromático so-

bre él cada mañana. Lo quemará cuando 

prepare las lámparas.

8 Y  al  encender  Aarón  las  lámparas  a  la 

caída de la tarde, lo quemará: Es incienso 

perpetuo  delante  de  YHVH  por  vuestras 

generaciones.

9 No ofreceréis sobre él incienso extraño, 

ni holocausto, ni ofrenda vegetal, ni tam-

poco derramaréis libación sobre él,

10 pues sobre sus cuernos hará Aarón ex-

piación una vez al año con la sangre de 

la ofrenda de la expiación por el pecado. 

Una vez al año hará expiación sobre él por 

vuestras  generaciones.  Será  santísimo 

para YHVH.

11 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

12 Cuando formes el censo de los hijos de 

Israel, de aquellos que han de ser empa-

dronados,  entonces  cada  uno  pagará  el 

rescate de su alma a YHVH al ser empa-

dronados,  para  que  no  haya  plaga  entre 

ellos al censarlos.°

13 Esto  es  lo  que  ha  de  dar  todo  el  que 

pase por el empadronamiento: medio si-

clo° según el siclo del Santuario (el siclo 

es  de  veinte  geras).  Medio  siclo  será  la 

ofrenda para YHVH.

14 Todo  el  que  pase  por  el  empadrona-

miento, de más de veinte años, pagará la 

ofrenda a YHVH.

15 El rico no aumentará, ni el pobre dis-

minuirá  del  medio  siclo  al  entregar  la 

ofrenda a YHVH, para hacer expiación por 

vuestras almas.

16 Y tomarás de los hijos de Israel el dine-

ro de las expiaciones, y lo emplearás para 

el servicio de la Tienda de Reunión, y será 

para  los  hijos  de  Israel  como  memorial 

delante  de  YHVH  para  hacer  expiación 

por vuestras almas.

17 Y YHVH habló a Moisés, diciendo:

18 Harás  una  fuente  de  bronce  con  su 

base  de  bronce,°  para  lavarse,  y  la  pon-

drás entre la Tienda de Reunión y el altar; 

luego colocarás agua en ella,

19 y Aarón y sus hijos se lavarán en ella 

sus manos y sus pies.

20 Cuando  entren  en  la  Tienda  de  Reu-

nión o cuando se acerquen al altar para 

ministrar, para ofrecer a YHVH la ofrenda 

ígnea, se lavarán con agua y no morirán.

21 Se  lavarán  pues  las  manos  y  los  pies 

para que no mueran, y lo tendrán por es-

tatuto perpetuo, él y su descendencia por 

sus generaciones.

El aceite de la unción y el incienso

22 Luego  YHVH  habló  a  Moisés,  dicien-

do:

23 Toma también de las especias más ex-

celentes: quinientos de mirra en grano, la 

mitad de canela aromática, esto es, dos-

cientos  cincuenta,  y  de  caña  aromática 

doscientos cincuenta,

24 de casia, quinientos, según el siclo del 

Santuario, y de aceite de oliva, un hin.

25 Y harás con ello el aceite para la un-

ción  santa,  perfume  fragante,  obra  de 

perfumista,  y  será  el  aceite  de  la  santa 

unción.

26 Con él ungirás la Tienda de Reunión y 

el Arca del Testimonio,

27 la mesa y todos sus utensilios, el can-

delabro y todos sus utensilios, el altar del 

incienso,

28 el  altar  del  holocausto  y  todos  sus 

utensilios y la fuente con su base.

29 Así los santificarás y serán cosas san-

tísimas.  Todo  lo  que  las  toque  quedará 

santificado.

30 Y  ungirás  a  Aarón  y  a  sus  hijos  y  los 

santificarás  para  que  sean  mis  sacerdo-

tes.

31 Y  a  los  hijos  de  Israel  les  mandarás, 

diciendo: Éste será mi aceite de la santa 

unción por vuestras generaciones.

32 No  se  derramará  sobre  carne  de  per-

sona, ni haréis otro semejante a él en su 

composición. Santo es, y santo será para 

vosotros.

33 Cualquiera que componga una mezcla 

como ella, o que la aplique sobre un ex-

traño, será cortado de su pueblo.

34 Dijo  también  YHVH  a  Moisés:  Toma 

para ti especias: benjuí, uña aromática y 

30.12 

→2 S.24.1-25.  30.13 →Ex.38.25-26; Mt.17.24.  30.18 →Ex.38.8.


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Éxodo 30:35

92

gálbano, especias e incienso puro, en par-

tes iguales.

35 Y harás de ello el incienso aromático, 

elaboración  de  perfumista,  salado,  puro, 

santo.

36 Y  molerás  parte  de  él  muy  fino,  y  lo 

pondrás  delante  del  Testimonio  en  la 

Tienda  de  Reunión,  donde  me  reuniré 

contigo. Os será cosa santísima.

37 En cuanto al incienso que harás, de su 

composición nada haréis similar para vo-

sotros. Será para ti cosa santa reservada 

a YHVH.

38 Cualquiera que haga otro como él para 

recrearse con su olor, será cortado de su 

pueblo.°

Los artífices del Santuario

31

Habló YHVH a Moisés diciendo:

2 He aquí Yo he llamado por nom-

bre a Bezaleel° ben Uri, hijo de Hur, de la 

tribu de Judá.

3 Lo  he  llenado  del  Espíritu  de  Dios  en 

cuanto a sabiduría, inteligencia y ciencia, 

para toda clase de obra artística,

4 para idear diseños, para labrar oro, plata 

y bronce,

5 para grabar piedras de engaste, y entallar 

madera, para realizar toda clase de oficio.

6 Y Yo, he aquí, he puesto junto a él a Oho-

liab° ben Ahisamac, de la tribu de Dan, y 

en el corazón de todo hábil artesano° he 

puesto inteligencia, para que ellos hagan 

todo lo que te he ordenado:

7 La Tienda de Reunión, el Arca del Tes-

timonio,  el  propiciatorio  que  está  sobre 

ella y todos los utensilios de la Tienda;

8 la  mesa  y  sus  utensilios,  el  candelabro 

puro con todos sus utensilios, el altar del 

incienso;

9 el  altar  del  holocausto,  con  todos  sus 

utensilios, la fuente y su base,

10 las vestiduras de tejido, las vestiduras sa-

gradas para el sacerdote Aarón y las vestidu-

ras de sus hijos para ejercer el sacerdocio,

11 el aceite de la unción y el incienso aro-

mático para el lugar santo. Lo harán con-

forme a todo lo que te he ordenado.

12 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

13 Y tú, habla a los hijos de Israel, dicien-

do: De cierto guardaréis mis días de repo-

so,° porque es señal entre Yo y vosotros 

por  vuestras  generaciones,  para  que  se-

páis que Yo soy YHVH, quien os santifica.

14 Guardaréis el shabbat, porque es santo 

para  vosotros.  El  que  lo  profane  cierta-

mente  morirá,  porque  todo  el  que  haga 

en él obra alguna, esa persona será corta-

da de en medio de su pueblo.

15 Seis días se trabajará, pero el día sép-

timo  será  shabbat  solemne,°  santo  para 

YHVH;  todo  el  que  trabaje  en  el  día  del 

shabbat, de cierto morirá.°

16 Los  hijos  de  Israel  guardarán  pues  el 

shabbat,  celebrando  el  shabbat°  en  sus 

generaciones por pacto perpetuo.

17 Es  una  señal  entre  Yo  y  los  hijos  de 

Israel  para  siempre,  porque  en  seis  días 

hizo YHVH los cielos y la tierra, mas en el 

séptimo día cesó y reposó.

18 Y cuando acabó de hablar con él en el 

monte Sinay, dio a Moisés las dos tablas 

del testimonio, las tablas de piedra escri-

tas por el dedo de Dios.

El becerro de oro

32

Pero como el pueblo vio que Moi-

sés tardaba en bajar del monte, se 

reunió el pueblo alrededor de Aarón, y le 

dijeron:  ¡Levántate,  haznos  dioses  que 

vayan  delante  de  nosotros!  Porque  este 

Moisés, el varón que nos sacó de la tierra 

de Egipto, no sabemos qué le haya acon-

tecido.°

2 Entonces Aarón les dijo: Arrancad° los 

zarcillos de oro de las orejas de vuestras 

mujeres, de vuestros hijos y de vuestras 

hijas, y traédmelos.

3 Se quitó pues todo el pueblo los zarci-

llos de oro que tenían en sus orejas y los 

llevaron a Aarón.

4 Él los tomó de sus manos e hizo un be-

cerro de fundición° y acabó de modelarlo 

con un buril. Entonces ellos exclamaron: 

¡Éstos son tus dioses, oh Israel, que te hi-

cieron subir de la tierra de Egipto!

30.38 

→Ex.37.29.  31.2  Esto  es,  en  la  sombra  de  Dios.  31.6  Esto  es,  la  tienda  del  padre.  31.6  Lit.  sabio  de  corazón

31.13  Heb.  shabbatot.  31.15  Lit.  shabbat  shabbatot.  Forma  enfática,  a  modo  de  superlativo,  shabbat  de  los  shabbats,  es 

decir, shabbat muy solemne

31.15 

→Ex.20.8-11; 23.12; 34.21; 35.2; Lv.23.3; Dt.5.12-14.  31.16 Lit. para hacer el sábado

32.1 

→Hch.7.40.  32.2 Heb. paraq = quitarse algo violentamente.  32.4 →Hch.7.41. 


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Éxodo 32:29

93

5 Viendo esto Aarón, edificó un altar de-

lante  de  él;°  e  hizo  pregonar  Aarón  di-

ciendo:  ¡Mañana  será  fiesta  solemne  a 

YHVH!

6 Por lo cual al día siguiente madrugaron 

y ofrecieron holocaustos y trajeron ofren-

das de paz. Después el pueblo se sentó a 

comer y a beber, y se levantaron para di-

vertirse.°

7 Entonces  YHVH  dijo  a  Moisés:  Anda, 

desciende, porque tu pueblo, que sacaste 

de la tierra de Egipto, se ha corrompido.

8 Pronto se han apartado del camino que 

Yo les ordené. Se han hecho un becerro 

de fundición, se han postrado ante él y le 

han ofrecido sacrificios. Han dicho: Estos 

son tus dioses, oh Israel, que te sacaron 

de la tierra de Egipto.

9 Dijo además YHVH a Moisés: Yo he ob-

servado a este pueblo, y he aquí es pueblo 

de dura cerviz.°

10 Deja ahora que se encienda mi ira con-

tra ellos, y los consumiré, y haré de ti una 

nación grande.

11 Pero  Moisés  suplicó  en  presencia  de 

YHVH su Dios, y dijo: Oh YHVH, ¿por qué 

se ha de encender tu ira contra tu pueblo, 

al cual sacaste de la tierra de Egipto con 

gran poder y con mano fuerte?

12 ¿Por qué han de hablar los egipcios, di-

ciendo: Para mal los sacó, para matarlos 

entre los montes y para destruirlos de la 

faz de la tierra? ¡Vuélvete del ardor de tu 

ira y desiste del mal contra tu pueblo!

13 Acuérdate de Abraham, y de Isaac y de 

Israel, tus siervos, a los cuales les juraste 

por ti mismo y a quienes dijiste: Multipli-

caré vuestra descendencia como las estre-

llas de los cielos,° y toda esta tierra que os 

tengo prometida la daré a vuestra descen-

dencia y la heredarán para siempre.°

14 Y desistió YHVH del mal que dijo que 

había de hacer a su pueblo.°

15 Y  Moisés  se  volvió  y  descendió  del 

monte llevando en su mano las dos tablas 

del testimonio, tablas escritas por ambos 

lados, escritas por un lado y por el otro.

16 Y las tablas eran obra de Dios, y la es-

critura era escritura de Dios grabada so-

bre las tablas.

17 Y cuando Josué oyó la voz del pueblo 

en su clamor, dijo a Moisés: ¡Voz de gue-

rra en el campamento!

18 Pero él dijo: No es voz de gritos de vic-

toria, ni voz de clamor de derrota. Estoy 

oyendo como voces de cantos.°

19 Y  aconteció  que  cuando  se  acercó  al 

campamento,  observó  el  becerro  y  las 

danzas,  y  se  encendió  la  ira  de  Moisés, 

y  arrojando  las  tablas  de  sus  manos,  las 

rompió al pie del monte.

20 Luego tomó el becerro que habían he-

cho  y  lo  quemó  en  el  fuego,  y  lo  molió 

hasta  reducirlo  a  polvo,  el  cual  esparció 

sobre la superficie de las aguas, y lo hizo 

beber a los hijos de Israel.

21 Y dijo Moisés a Aarón: ¿Qué te ha he-

cho este pueblo, que has traído sobre él 

tan gran pecado?

22 Aarón respondió: No se encienda la ira 

de  mi  señor.  Tú  mismo  conoces  a  este 

pueblo, que es propenso al mal.

23 Ellos pues me dijeron: Haznos dioses 

que vayan delante de nosotros, pues este 

Moisés, el varón que nos hizo subir de la 

tierra de Egipto, no sabemos qué le haya 

acontecido.

24 Y les dije: El que tenga oro, que se lo 

arranque. Y me lo dieron, lo eché al fue-

go, y salió este becerro.

25 Y vio Moisés que el pueblo estaba des-

enfrenado,  porque  Aarón  les  había  dado 

rienda suelta, para que llegaran a ser ver-

güenza en medio de sus enemigos.

26 Y puesto en pie Moisés a la puerta del 

campamento,  exclamó:  ¡El  que  esté  por 

YHVH, conmigo! Y se unieron a él todos 

los hijos de Leví.

27 Él  entonces  les  dijo:  Así  dice  YHVH, 

Dios de Israel: Ponga cada cual su espada 

sobre el muslo. Pasad, recorred de puer-

ta en puerta el campamento, y cada uno 

mate  a  su  propio  hermano,  y  cada  uno 

a su propio compañero, y cada uno a su 

propio pariente.

28 Y los hijos de Leví hicieron conforme 

al dicho de Moisés, y cayeron del pueblo 

aquel día como tres mil hombres.

29 Porque Moisés les había dicho: Llenad 

hoy  vuestra  mano  para  YHVH,  aunque 

32.5  Esto  es,  del  becerro.  32.6 

→1  Co.10.7.  32.9  Es  decir,  rebelde.  32.13  →Gn.22.16-17.  32.13  →Gn.17.18. 

32.14 

→Nm.14.13-19.  32.18 Prob. se refiere a cantos de embriaguez.


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Éxodo 32:30

94

cada uno actúe contra su hijo y contra su 

hermano, para que Él os otorgue hoy su 

bendición.

30 Y ocurrió que al día siguiente dijo Moi-

sés al pueblo: Vosotros pecasteis con gran 

pecado, pero ahora subiré a YHVH, tal vez 

pueda hacer expiación por vuestro pecado.

31 Y  Moisés  volvió  a  YHVH  y  dijo:  ¡Oh, 

este pueblo ha cometido un gran pecado, 

y ha hecho para sí dioses de oro!

32 Pero  ahora,  perdona  su  pecado… Si 

no,  ¡bórrame  ahora  de  tu  libro  que  has 

escrito!°

33 Pero YHVH dijo a Moisés: Al que haya 

pecado  contra  mí,  a  éste  borraré  de  mi 

libro.

34 Y ahora ve, conduce este pueblo adon-

de te he dicho. He aquí mi ángel irá de-

lante de ti, y en el día de mi reprensión, 

castigaré sobre ellos su pecado.

35 Y en efecto hirió YHVH al pueblo por 

lo que habían hecho con el becerro que 

Aarón hizo.

Dios promete su presencia

33

Habló YHVH a Moisés: Ve, sube de 

aquí, tú y el pueblo que hiciste su-

bir  de  la  tierra  de  Egipto,  a  la  tierra  de 

la cual juré a Abraham,° Isaac° y Jacob,° 

diciendo: La daré a tu descendencia.

2 Y enviaré delante de ti mi ángel, y ex-

pulsaré al cananeo, al amorreo, al heteo, 

al ferezeo, al heveo y al jebuseo,

3 a una tierra que fluye leche y miel, por-

que no subiré en medio de ti, no sea que 

te  consuma  en  el  camino,  pues  eres  un 

pueblo de dura cerviz.°

4 Cuando el pueblo oyó esta mala noticia, 

prorrumpió en llanto y ninguno se vistió 

sus atavíos.

5 Porque YHVH había dicho a Moisés que 

dijera a los hijos de Israel: Vosotros sois 

pueblo de dura cerviz. Si por un momen-

to me presentara en medio de ti, te con-

sumiría. Ahora pues, quita tus atavíos de 

sobre  ti,  para  que  Yo  sepa  lo  que  he  de 

hacer contigo.

6 Por lo cual los hijos de Israel se despo-

jaron de sus atavíos del monte Horeb en 

adelante.

7 Y tomaba° Moisés la Tienda y la levanta-

ba lejos, fuera del campamento; y la llamó 

Tienda de Reunión. Y todo el que buscaba 

a YHVH, salía a la Tienda de Reunión que 

estaba fuera del campamento.

8 Y sucedía que, cuando salía Moisés a la 

Tienda, todo el pueblo se levantaba, y cada 

cual estaba en pie a la entrada de su pro-

pia tienda, y observaban° a Moisés hasta 

que él entraba en la Tienda.

9 Y ocurría que cuando Moisés entraba en 

la Tienda, la columna de nube descendía 

y permanecía en la entrada de la Tienda 

mientras Él hablaba con Moisés.

10 Y  todo  el  pueblo  veía  la  columna  de 

nube detenida en la entrada de la Tienda, y 

todo el pueblo se levantaba y se postraba, 

cada uno a la entrada de su propia tienda.

11 Y  YHVH  hablaba  con  Moisés  cara  a 

cara, como un hombre suele hablar con 

su  amigo.  Luego  volvía  al  campamento, 

pero  el  joven  Josué  ben  Nun  nunca  se 

apartaba de en medio de la Tienda.

12 Entonces  Moisés  respondió  a  YHVH: 

He aquí Tú me dices: Lleva a este pueblo; 

pero no me has hecho saber a quién en-

viarás conmigo, aunque dijiste: Te conoz-

co  por  nombre,  y  también:  Has  hallado 

gracia ante mis ojos.

13 Ahora,  si  he  hallado  gracia  ante  tus 

ojos, te ruego que me hagas conocer tu 

camino, para que te conozca y halle gra-

cia ante tus ojos. Y considera que esta na-

ción es tu pueblo.

14 Y  Él  dijo:  ¿Mi  presencia  habrá  de  ir 

contigo y darte reposo?

15 Y le dijo: Si tu presencia no ha de ir, no 

nos hagas subir de aquí.

16 Pues  ¿en  qué  podrá  ahora  conocerse 

que yo y tu pueblo hemos hallado gracia 

ante tus ojos? ¿No es acaso en que Tú va-

yas con nosotros para que yo y tu pueblo 

seamos distinguidos de todos los pueblos 

que hay sobre la faz de la tierra?

17 Y YHVH dijo a Moisés: También cum-

pliré  esta  palabra  que  has  hablado,  por 

cuanto has hallado gracia ante mis ojos, 

y Yo te he conocido por nombre.

18 Entonces él dijo: ¡Te ruego que me per-

mitas ver tu gloria!

32.32 

→Ap.3.5.  33.1 →Gn.12.7.  33.1 →Gn.26.3.  33.1 →Gn.28.13.  33.3 →32.9.  33.7 Esto es, en cada etapa.  33.8 Es 

decir, lo miraban con expectación.


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Éxodo 34:19

95

19 Y  le  respondió:  Yo  mismo  haré  pasar 

toda  mi  bondad  delante  de  ti,  y  procla-

maré delante de ti el nombre° de YHVH. 

Tendré  misericordia  del  que  tendré  mi-

sericordia y me compadeceré del que me 

compadeceré.°

20 Dijo también: No podrás ver mi rostro, 

pues no me verá el hombre y vivirá.

21 Y añadió YHVH: He aquí un lugar jun-

to a mí, donde tú estarás en pie sobre la 

roca,

22 y sucederá que cuando pase mi gloria, 

te pondré en la hendidura de la roca y te 

cubriré  con  la  palma  de  mi  mano  hasta 

que haya pasado.

23 Después apartaré la palma de mi mano, 

y verás mis espaldas, pero mi rostro no se 

dejará ver.

El Decálogo ritual

34

Luego dijo YHVH a Moisés: Lábrate 

dos tablas de piedra como las pri-

meras, y escribiré sobre las tablas las pa-

labras que había sobre las primeras tablas 

que rompiste.

2 Prepárate,  pues,  por  la  mañana,  y  al 

amanecer  sube  al  monte  de  Sinay,  y  te 

presentarás ante mí, allí en la cumbre del 

monte.

3 No  subirá  nadie  contigo,  ni  se  verá 

hombre alguno en todo el monte, ni ove-

jas  ni  bueyes  pasten  enfrente  de  aquel 

monte.

4 Y él labró dos tablas de piedra como las 

primeras, y madrugando por la mañana, 

subió al monte Sinay, como le había orde-

nado YHVH, llevando en su mano las dos 

tablas de piedra.

5 Y YHVH descendió en la nube, y estuvo 

allí con él, e invocó el nombre de YHVH.

6 Pasó pues YHVH por delante de él, pro-

clamando:  ¡YHVH,  YHVH,  Dios  miseri-

cordioso  y  clemente,  lento  para  la  ira  y 

grande en misericordia y verdad,

7 que  guarda  la  misericordia  a  millares, 

que  carga  con  la  iniquidad,  la  transgre-

sión  y  el  pecado,  pero  de  ningún  modo 

justifica al culpable; que visita la maldad 

de los padres sobre los hijos, y sobre los 

hijos de los hijos, hasta la tercera y cuarta 

generación!°

8 Entonces  Moisés  se  apresuró,  e  incli-

nándose a tierra se postró,

9 diciendo:  Si  ahora  he  hallado  gracia 

ante tus ojos, oh Señor mío, te ruego mi 

Señor que, aunque somos pueblo de dura 

cerviz, vayas en medio de nosotros, per-

dones nuestra iniquidad y nuestro pecado 

y nos tomes por posesión tuya.

10 Y Él respondió: He aquí, Yo renuevo el 

pacto: Ante todo tu pueblo haré maravi-

llas  cuales  nunca  se  han  hecho  en  toda 

la tierra ni en ninguna nación. Y todo el 

pueblo en medio del cual tú estás, verá la 

obra de YHVH, porque terrible es lo que 

Yo voy a hacer contigo.

11 Observa  lo  que  Yo  te  ordeno  hoy.  He 

aquí expulso delante de ti al amorreo, al 

cananeo, al heteo, al ferezeo, al heveo y 

al jebuseo.

12 Guárdate  de  no  establecer  pacto  con 

los moradores de la tierra a donde vas a 

entrar, para que no sean ellos un lazo en 

medio de ti;

13 antes bien, derribaréis sus altares, que-

braréis sus estelas y talaréis sus Aseras;°

14 porque  no  te  postrarás  ante  ningún 

otro  dios,  pues  YHVH,  cuyo  nombre  es 

Celoso, Dios celoso es.

15 No sea que hagas alianza con el habi-

tante  del  país,  y  cuando  se  prostituyan 

tras sus dioses y sacrifiquen a sus dioses, 

te inviten y comas de su sacrificio.

16 Y tomes de sus hijas para tus hijos, y 

cuando sus hijas se prostituyan tras sus 

dioses, hagan que tus hijos se prostituyan 

tras los dioses de ellas.

17 No harás para ti dioses de fundición.°

18 Guardarás la fiesta solemne de los Ázi-

mos.° Como te ordené, siete días comerás 

ázimos en el tiempo señalado en el mes 

de Abib, porque en el mes de Abib saliste 

de Egipto.

19 Todo lo que abre matriz es mío,° y todo 

primerizo de tu ganado parido macho, sea 

buey o carnero.

33.19 LXX: y proclamaré por mi nombre…  33.19 

→Ro.9.15.  34.7 .generación. →Ex.20.5-6; Nm.14.18; Dt.5.9-10; 7.9-10. 

34.13 Heb. ‘asherim. Personificación femenina de la diosa Astarté, símbolo idolátrico de fecundidad de la naturaleza, que los 

cananeos adoraban en árboles frondosos, plantados en la tierra delante de los altares del Baal. Es prob. que el árbol sagrado 

de los asirios también haya sido una ‘asherah

→Dt.16.21.  34.17 →Ex.20.4; Lv.19.4; Dt.5.8; 27.15.  34.18 →Ex.12.14-20; 

Lv.23.6-8; Nm.28.16-25. 

34.19 

→Ex.13.2. 


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Éxodo 34:20

96

20 Pero todo primerizo de asno lo sustitui-

rás con un cordero, y si no lo sustituyes, 

lo  desnucarás.  Redimirás  todo  primogé-

nito° de tus hijos y ninguno se presentará 

ante mí con las manos vacías.

21 Seis días trabajarás, pero en el séptimo 

día  reposarás.°  Aun°  en  la  arada  y  en  la 

siega reposarás.

22 Celebrarás para ti la fiesta de las Sema-

nas, la de las Primicias de la siega del tri-

go,° y la fiesta de la Cosecha al terminar 

el año.°

23 Tres veces al año comparecerá todo va-

rón  tuyo  en  presencia  del  Señor  YHVH, 

Dios de Israel,

24 porque expulsaré a naciones de delante 

de ti y ensancharé tu frontera, y nadie co-

diciará tu tierra cuando subas para com-

parecer  delante  de  YHVH  tu  Dios,  tres 

veces al año.

25 No degollarás ni derramarás la sangre 

de  mi  víctima  del  sacrificio  sobre  nada 

leudado,  ni  guardarás  hasta  la  mañana 

siguiente la víctima de la fiesta solemne 

de la Pascua.°

26 La primicia de los primeros frutos de 

tu  tierra  llevarás  a  la  Casa  de  YHVH  tu 

Dios. No cocerás el cabrito en la leche de 

su madre.

27 Dijo YHVH a Moisés: Escribe estas pa-

labras, pues conforme a estas palabras he 

concertado pacto contigo y con Israel.

28 Y  él  estuvo  allí  con  YHVH  cuarenta 

días y cuarenta noches sin comer pan ni 

beber agua, y escribió sobre las tablas las 

palabras del pacto: las Diez Palabras.°

29 Y  aconteció  que  cuando  Moisés  des-

cendía del monte Sinay con las dos tablas 

del testimonio (las que estaban en mano 

de Moisés al bajar del monte), no advirtió 

Moisés que la tez de su rostro resplande-

cía por haber hablado con Él.

30 Y  Aarón  y  todos  los  hijos  de  Israel 

miraron a Moisés, y he aquí la tez de su 

rostro resplandecía, por lo cual tuvieron 

temor de acercarse a él.

31 Pero Moisés los llamó, y Aarón y todos 

los principales de la congregación se vol-

vieron a él, y Moisés habló con ellos.

32 Después de esto se acercaron todos los hi-

jos de Israel, y les ordenó todo lo que YHVH 

había hablado con él en el monte Sinay.

33 Y cuando Moisés acabó de hablar con 

ellos, se puso un velo sobre su rostro,

34 sin  embargo,  cuando  Moisés  entraba 

en presencia de YHVH para hablar con Él, 

se quitaba el velo hasta que volvía a salir. 

Y al salir, hablaba con los hijos de Israel lo 

que le había sido ordenado.

35 Y los hijos de Israel miraban el rostro 

de Moisés, que la tez de su rostro resplan-

decía, entonces Moisés se volvía a poner 

el velo sobre su rostro, hasta que entraba 

a hablar con Él.

Ofrenda para el Tabernáculo

35

Y convocó Moisés a toda la congre-

gación de los hijos de Israel, y les 

dijo: Estas son las cosas que YHVH ha or-

denado para que se hagan:

2 Seis días se trabajará, pero el día sépti-

mo será para vosotros santo, shabbat so-

lemne para YHVH; todo el que haga en él 

alguna obra, ha de morir.

3 No  encenderéis  fuego  en  ninguna  de 

vuestras moradas el día del shabbat.

4 Y habló Moisés a toda la congregación 

de los hijos de Israel, diciendo: Esto es lo 

que YHVH ha ordenado, diciendo:

5 Recoged de entre vosotros una ofrenda 

para YHVH. Todo aquel de corazón gene-

roso  llevará  la  ofrenda  para  YHVH:  oro, 

plata y bronce,

6 azul, púrpura y carmesí, lino fino y pelo 

de cabras,

7 pieles rojas de carneros, pieles de tejo-

nes y madera de acacia,

8 aceite para el alumbrado, especias aro-

máticas para el aceite de la unción y para 

el incienso aromático,

9 y piedras de ónice y piedras de engaste 

para el efod y para el pectoral.

10 Y  de  entre  vosotros,  todo  hábil  arte-

sano  vendrá  y  hará  todas  las  cosas  que 

YHVH ha ordenado:

11 El Tabernáculo, su Tienda y su cober-

tor,  sus  corchetes,  sus  tablones,  sus  ba-

rras, sus columnas y sus basas,

34.20 

→Ex.13.13.  34.21  →Ex.20.9-10;  23.12;  31.15;  35.2;  Lv.23.3;  Dt.5.13-14.  34.21  .aun.  34.22  →Lv.23.15-21; 

Nm.28.26-31. 

34.22 

→Lv.23.39-43.  34.25 →Ex.12.10.  34.26 →Dt.26.2.  34.26 →Dt.14.21.  34.28 Esto es, los Diez Man-

damientos

34.35 

→2 Co.3.7-16.  35.2 →Ex.20.8-11; 23.12; 31.15; 34.21; Lv.23.3; Dt.5.12-14. 


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Éxodo 36:3

97

12 el Arca y sus varas, el propiciatorio y el 

velo de la cortina,

13 la mesa, sus varas, todos sus utensilios, 

y el pan de la proposición,

14 el  candelabro  de  la  iluminación,  sus 

utensilios, sus lamparillas, y el aceite para 

la iluminación,

15 el altar del incienso y sus varas, el acei-

te de la unción y el incienso aromático, 

la cortina de la puerta para la entrada del 

Tabernáculo,

16 el  altar  del  holocausto  y  su  rejilla  de 

bronce, sus varas, y todos sus utensilios, 

la fuente con su base,

17 las cortinas del atrio con sus columnas 

y sus bases, y la cortina de la entrada del 

atrio,

18 las estacas del Tabernáculo, las estacas 

del atrio y sus cuerdas,

19 las vestiduras ornamentadas para mi-

nistrar  en  el  Santuario,  las  vestiduras 

sagradas  para  el  sacerdote  Aarón,  y  las 

vestiduras de sus hijos para servir como 

sacerdotes.

20 Entonces toda la congregación de los hi-

jos de Israel salió de la presencia de Moisés.

21 Y  todo  aquel  a  quien  su  corazón  im-

pulsaba,  y  todo  aquel  a  quien  movía  su 

espíritu, iba llevando la ofrenda a YHVH 

para  la  obra  de  la  Tienda  de  Reunión,  y 

para todo su servicio, y para las vestiduras 

santas.

22 Acudieron pues los hombres y las mu-

jeres,  todos  los  de  corazón  generoso,  y 

llevaron  aretes,°  zarcillos,  sortijas  y  co-

llares,  toda  clase  de  joyas  de  oro,  tam-

bién todo aquel que hubiera mecido una 

ofrenda mecida de oro para YHVH.

23 Y todo hombre que poseía azul, púrpu-

ra o carmesí, o lino fino, o pelo de cabras, 

o pieles rojas de carneros, o pieles de te-

jones, lo traía.

24 Todo aquel que alzaba una ofrenda de 

plata  o  de  bronce,  aportaba  al  donativo 

para YHVH. Y todo el que poseía madera 

de acacia para cualquier obra del servicio, 

la traía.

25 Además,  toda  mujer  con  habilidad, 

hilaba con sus manos y llevaba hilado el 

azul, el púrpura, el carmesí, y el torzal de 

lino fino.

26 Todas las mujeres cuyo corazón las ha-

bía  impulsado  con  sabiduría,  tejieron  el 

pelo de cabra.

27 Los  magnates  aportaron  piedras  de 

ónice,  piedras  de  engaste  para  el  efod  y 

para el pectoral,

28 especias  y  aceite  para  la  iluminación, 

para  el  aceite  de  la  unción  y  para  el  in-

cienso de las especias.

29 Todo  hombre  y  mujer  de  los  hijos  de 

Israel, cuyo corazón los impulsaba a con-

tribuir  en  toda  la  obra  que  YHVH  había 

ordenado hacer por medio de Moisés, lle-

varon ofrenda voluntaria a YHVH.

30 Y dijo Moisés a los hijos de Israel: Mi-

rad, YHVH ha llamado por nombre a Be-

zaleel ben Uri, hijo de Hur, de la tribu de 

Judá,

31 y lo ha llenado del Espíritu de Dios en 

sabiduría, inteligencia y ciencia y en toda 

suerte de obra

32 para  proyectar  diseños,  para  labrar  el 

oro, la plata y el bronce,

33 y  en  talla  de  piedras  para  engastes,  y 

para  entallar  maderas,  para  trabajar  en 

toda labor ingeniosa.

34 También  ha  dotado  su  corazón  para 

enseñar, tanto él como Oholiab ben Ahi-

samac, de la tribu de Dan,

35 a los cuales ha colmado el corazón de 

talento  para  que  hagan  toda  obra  de  ar-

tesanía y de diseño, de bordado en azul y 

en púrpura, en carmesí y en torzal de lino 

fino, y de tejedor y hábil diseñador para 

toda clase de obra primorosa.

Construcción del Tabernáculo

36

Así pues, Bezaleel y Oholiab, y todo 

aquel  artesano  hábil,  a  quienes 

YHVH  había  dotado  de  habilidad  e  inte-

ligencia para saber hacer toda obra para 

el servicio del Santuario, hicieron según 

todo lo que YHVH había ordenado.

2 Y Moisés llamó a Bezaleel, a Oholiab y 

a  todo  artesano  hábil,  en  cuyo  corazón 

YHVH  había  puesto  sabiduría,  a  todo 

aquel cuyo corazón le impulsaba a acer-

carse a la obra para hacerla,

3 y  en  presencia  de  Moisés  recogieron 

toda la ofrenda que los hijos de Israel ha-

bían llevado para la obra del servicio del 

35.22 Esto es, aretes para la nariz.


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Éxodo 36:4

98

Santuario, a fin de realizarla. Y siguieron 

llevando  la  ofrenda  voluntaria  mañana 

tras mañana.

4 Tanto así, que todos los peritos que ha-

cían toda la obra del Santuario, dejando 

cada uno la obra que hacía,

5 fueron  a  Moisés,  y  dijeron:  El  pueblo 

trae  mucho  más  de  lo  que  es  necesario 

para el servicio de la obra que YHVH ha 

ordenado que se haga.

6 Entonces  Moisés  dio  orden,  y  prego-

naron por el campamento, diciendo: ¡Ni 

hombre  ni  mujer  prepare  más  material 

para las ofrendas del Santuario! Y así se 

impidió al pueblo ofrecer más,

7 pues había material suficiente para ha-

cer toda la obra, y aún sobraba.

8 Todos los hábiles artesanos entre los que 

hacían  la  obra,  hicieron  el  Tabernáculo. 

De  diez  cortinas  de  torzal  de  lino  fino, 

azul,  púrpura  y  carmesí.  Las  hizo°  con 

querubines, como obra de hábil artífice.

9 La longitud de cada cortina era de vein-

tiocho codos, y la anchura de cuatro co-

dos. Todas las cortinas tenían una misma 

medida.

10 Y unió las cinco cortinas una a otra, y 

las otras cinco cortinas unió una a otra.

11 E hizo unas presillas de azul en la ori-

lla de una cortina, la del extremo, en la 

juntura.  Así  hizo  en  la  orilla  de  la  otra 

cortina, la del otro extremo, en la juntura 

de la segunda.

12 Hizo cincuenta presillas en una cortina, 

e hizo cincuenta presillas en la cortina que 

está en la juntura de la segunda. Las presi-

llas se correspondían unas con otras.

13 Hizo  también  cincuenta  corchetes  de 

oro, y con los corchetes enlazó las corti-

nas una a la otra, y el Tabernáculo llegó 

a ser uno.

14 Hizo asimismo cortinas de pelo de ca-

bra  para  formar  una  tienda  sobre  el  Ta-

bernáculo, hizo once cortinas.

15 La  longitud  de  cada  cortina  era  de 

treinta codos, y la anchura de cuatro co-

dos. Las once cortinas tenían una misma 

medida.

16 Y unió las cinco cortinas por una parte 

y seis cortinas por otra parte.

17 E hizo cincuenta presillas en la orilla 

de la última cortina, en la juntura, y otras 

cincuenta presillas en la orilla de la otra 

cortina, en la segunda juntura.

18 Luego  hizo  cincuenta  corchetes  de 

bronce para unir la Tienda, de modo que 

fuera una.

19 Y para la Tienda, hizo una cubierta de 

pieles de carneros enrojecidas, y una cu-

bierta de pieles de tejones por encima.

20 Hizo además los tablones de madera de 

acacia erguidos para el Tabernáculo.

21 La longitud de cada tablón era de diez 

codos, y la anchura, de codo y medio.

22 Cada tablón tenía dos espigas para ser 

unidas la una con la otra. Esto hizo con 

todos los tablones del Tabernáculo.

23 Así  hizo  los  tablones  para  el  Taber-

náculo:  veinte  tablones  al  sur,  hacia  el 

mediodía.

24 E hizo cuarenta basas de plata debajo de 

los veinte tablones: dos basas debajo de un 

tablón para sus dos espigas, y dos basas de-

bajo del otro tablón para sus dos espigas.

25 Y para el segundo lado del Tabernácu-

lo, el lado norte, hizo veinte tablones

26 con cuarenta basas de plata: dos basas 

debajo  de  un  tablón,  y  dos  basas  debajo 

del otro tablón.

27 Y para el lado posterior del Tabernácu-

lo, al occidente, hizo seis tablones.

28 Y para las esquinas del Tabernáculo en 

los dos extremos hizo dos tablones,

29 los cuales eran dobles por abajo, traba-

dos hacia arriba hasta la primera argolla. 

Así hizo el uno y el otro para las dos es-

quinas.

30 Eran, pues, ocho tablones, y sus basas 

de  plata,  dieciséis:  dos  basas  debajo  de 

cada tablón.

31 Hizo también barras de madera de aca-

cia: cinco para los tablones de uno de los 

lados del Tabernáculo,

32 y  cinco  barras  para  los  tablones  del 

otro lado del Tabernáculo, y cinco barras 

para los tablones del lado del Tabernáculo 

en la parte posterior, hacia occidente.

33 E hizo que la barra de en medio pasara 

por el centro interior de los tablones, de 

un extremo al otro.

36.8 El sujeto antecedente es plural, pero a partir de aquí hasta el fin del capítulo es singular. Según 37.1, el sujeto es Bezaleel.


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Éxodo 37:26

99

34 Y  cubrió  de  oro  los  tablones,  e  hizo 

sus argollas de oro, por donde habían de 

pasar las barras, y cubrió de oro los tra-

vesaños.

35 E  hizo  la  cortina  de  azul,  púrpura  y 

carmesí, y torzal de lino fino. La hizo con 

querubines, como obra de hábil artífice.

36 Y  para  ella  hizo  cuatro  columnas  de 

acacia, y las recubrió de oro, con sus gan-

chos  de  oro,  y  fundió  para  ellas  cuatro 

basas de plata.

37 E hizo una cortina de azul, y púrpura 

y  carmesí,  y  torzal  de  lino  fino,  obra  de 

recamador, para la puerta de la Tienda.

38 También  sus  cinco  columnas  con  sus 

ganchos,  y  cubrió  de  oro  sus  ganchos  y 

sus molduras, pero sus cinco basas eran 

de bronce.

Mobiliario del Tabernáculo

37

Bezaleel  hizo  también  el  Arca  de 

madera  de  acacia:  de  dos  codos  y 

medio  su  longitud,  un  codo  y  medio  su 

anchura, y un codo y medio su altura.

2 La revistió de oro puro por dentro y por 

fuera, y le hizo alrededor una moldura de 

oro.

3 Fundió sobre ella cuatro argollas de oro 

para sus cuatro esquinas, dos argollas en 

un lado y dos argollas en el otro lado.

4 Hizo también unas varas de madera de 

acacia, las revistió de oro,

5 e introdujo las varas por las argollas en 

los lados del Arca, para llevar el Arca.

6 Hizo  asimismo  el  propiciatorio  de  oro 

puro, dos codos y medio su longitud, y un 

codo y medio su anchura.

7 Hizo también dos querubines de oro, los 

hizo labrados a martillo a los dos extre-

mos del propiciatorio.

8 Un  querubín  a  un  extremo  y  el  otro 

querubín al otro extremo, haciendo que 

los querubines arrancaran del propiciato-

rio, a sus dos extremos.

9 Y los querubines extendían sus alas en 

alto,  y  cubrían  con  sus  alas  el  propicia-

torio vueltos sus rostros el uno hacia el 

otro; y los rostros de los querubines esta-

ban hacia el propiciatorio.

10 También construyó la mesa de madera 

de  acacia:  de  dos  codos  era  su  longitud, 

un codo su anchura, y un codo y medio 

su altura.

11 La revistió de oro puro, le hizo alrede-

dor una moldura de oro

12 y  le  hizo  alrededor  un  reborde  de  un 

palmo,  y  en  torno  a  su  reborde  le  hizo 

una moldura de oro.

13 Fundió para ella cuatro argollas de oro 

y ajustó las argollas en las cuatro esqui-

nas de sus cuatro patas.

14 Las argollas estaban junto al reborde, 

como sujetadoras de las varas para trans-

portar la mesa.

15 Hizo  asimismo  las  varas  para  trans-

portar la mesa de madera de acacia, y las 

revistió de oro.

16 También hizo de oro puro los utensi-

lios  que  debían  estar  sobre  la  mesa:  sus 

fuentes,  sus  bandejas,  sus  tazones  y  sus 

copas, con las cuales se habrían de derra-

mar las libaciones.

17 Fabricó asimismo el candelabro de oro 

puro, labrado a martillo hizo el candela-

bro. Su base y su fuste, al igual que sus 

cálices,  sus  corolas  y  sus  flores  eran  de 

una sola pieza.

18 De  sus  lados  salían  seis  brazos:  tres 

brazos de un lado del candelabro y otros 

tres brazos del otro lado del candelabro.

19 En  un  brazo  había  tres  copas  como 

flor de almendro, un cáliz y una flor, y en 

el otro brazo, tres copas como flor de al-

mendro, un cáliz y una flor. Así en los seis 

brazos que salían del candelabro.

20 Y en el candelabro había cuatro copas 

como flor de almendro, con sus cálices y 

sus flores.

21 Un  cáliz  debajo  de  los  dos  brazos  del 

mismo, otro cáliz debajo de los otros dos 

brazos, y otro cáliz bajo los otros dos bra-

zos, para los seis brazos que salían de él.

22 Sus cálices y sus brazos eran de lo mis-

mo. Todo él estaba labrado a martillo en 

una sola pieza de oro puro.

23 De oro puro hizo también sus siete lám-

paras, sus despabiladeras y sus platillos.

24 Lo  hizo  con  un  talento  de  oro  puro, 

con todos sus utensilios.

25 Hizo  también  el  altar  del  incienso,  de 

madera de acacia: un codo su longitud y 

un codo su anchura, cuadrado, y dos codos 

su altura; y sus cuernos eran parte de él.

26 Y lo revistió de oro puro, su tapa, sus 

paredes  en  derredor  y  sus  cuernos  y  le 

hizo una moldura de oro alrededor.


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Éxodo 37:27

100

27 A sus dos lados hizo dos argollas de oro 

debajo  de  su  moldura  en  sus  dos  esqui-

nas,  como  sujetadores  de  las  varas  para 

transportarlo.

28 Hizo las varas de madera de acacia y las 

revistió de oro.

29 Hizo  asimismo  el  aceite  sagrado  de 

la unción, y el incienso aromático puro, 

obra de perfumista.

El altar del holocausto

38

Hizo el altar del holocausto de ma-

dera de acacia: De cinco codos su 

longitud,  cinco  codos  su  anchura,  cua-

drado, y tres codos su altura.

2 Y le hizo sus cuernos en sus cuatro es-

quinas; sus cuernos eran parte de él, y lo 

cubrió de bronce.

3 Hizo también todos los utensilios del al-

tar: los calderos, las paletas, los asperso-

rios, los garfios y los braseros. Todos sus 

utensilios los hizo de bronce.

4 Hizo además para el altar un enrejado de 

bronce, en forma de red, que puso debajo 

de su borde hasta la mitad del mismo.

5 Fundió  cuatro  argollas  para  las  cuatro 

esquinas  del  enrejado  de  bronce,  como 

sujetadores para las varas,

6 e hizo las varas de madera de acacia y las 

revistió de bronce.

7 Luego introdujo las varas por las argo-

llas en los lados del altar, para transpor-

tarlo con ellas. Lo hizo hueco, de tablas.

8 E hizo la fuente de bronce y su soporte 

de bronce con los espejos de las mujeres 

que  velaban  a  la  puerta  de  la  Tienda  de 

Reunión.

9 También  hizo  el  atrio.  Por  el  lado  sur, 

hacia  el  mediodía,  las  cortinas  de  torzal 

de lino fino del atrio eran de cien codos.

10 Sus veinte columnas y sus veinte basas 

eran  de  bronce,  pero  los  ganchos  de  las 

columnas y sus varas conexivas, de plata.

11 Por el lado norte también eran de cien 

codos,  sus  veinte  columnas  y  sus  veinte 

basas  eran  de  bronce,  pero  los  ganchos 

de las columnas y sus varas conexivas, de 

plata.

12 Por  el  lado  del  occidente  las  cortinas 

eran de cincuenta codos, con sus diez co-

lumnas y sus diez basas, y los ganchos de 

las columnas y sus varas conexivas eran 

de plata.

13 Y del lado del oriente, hacia el levante, 

eran de cincuenta codos.

14 Las cortinas de un lado de la entrada 

eran de quince codos, con sus tres colum-

nas y sus tres basas.

15 Al otro lado de la entrada, a una par-

te y a otra del atrio, las cortinas eran de 

quince  codos,  con  sus  tres  columnas,  y 

sus tres basas.

16 Todas  las  cortinas  alrededor  del  atrio 

eran de torzal de lino fino.

17 Las  basas  de  las  columnas  eran  de 

bronce, pero los ganchos de las columnas 

y sus varas conexivas, de plata, y también 

de plata el revestimiento de sus capiteles. 

Las varas conexivas de todas las columnas 

del atrio eran de plata.

18 La  cortina  de  la  entrada  del  atrio  era 

obra de recamador, de azul, púrpura, car-

mesí y torzal de lino fino: la longitud era 

de  veinte  codos,  y  la  altura,  correspon-

diente  a  la  anchura,  de  cinco  codos,  se-

gún las cortinas del atrio.

19 Sus  columnas  eran  cuatro  y  sus  ba-

sas cuatro, de bronce, pero sus ganchos 

eran  de  plata;  y  el  revestimiento  de  sus 

capiteles  y  sus  varas  conexivas  también 

de plata.

20 Todas las estacas para el Tabernáculo y 

para el atrio alrededor eran de bronce.

21 Este es el inventario para el Tabernácu-

lo, el Tabernáculo del pacto, que fue regis-

trado conforme al mandato de Moisés por 

mano de Itamar, hijo del sacerdote Aarón, 

para el servicio de los levitas.

22 Y Bezaleel ben Uri, hijo de Hur, de la 

tribu de Judá, hizo todo lo que YHVH ha-

bía ordenado a Moisés.

23 Y con él estaba Oholiab ben Ahisamac, 

de la tribu de Dan, artífice y diseñador, y 

recamador  en  azul,  púrpura,  carmesí  y 

torzal de lino fino.

24 Todo el oro empleado para la obra, en 

toda  la  obra  del  Santuario,  el  oro  de  la 

ofrenda mecida, fue de veintinueve talen-

tos  y  setecientos  treinta  siclos,  según  el 

siclo del Santuario.

25 Y la plata de los censados de la congre-

gación ascendió a cien talentos, y mil se-

tecientos setenta y cinco siclos, según el 

siclo del Santuario.

26 Un  becá  por  cabeza,  medio  siclo,  se-

gún  el  siclo  del  Santuario  por  cada  uno 


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Éxodo 39:21

101

incluido entre los empadronados, mayo-

res de veinte años, que fueron seiscientos 

tres mil quinientos cincuenta.

27 Se  emplearon  cien  talentos  de  plata 

para fundir las basas del Santuario y las 

basas de la cortina. Para cien basas cien 

talentos, a talento por basa.

28 Y con los mil setecientos setenta y cin-

co siclos hizo los ganchos de las columnas, 

cubrió sus capiteles y les hizo molduras.

29 El bronce de la ofrenda mecida ascen-

dió  a  setenta  talentos  y  dos  mil  cuatro-

cientos siclos.

30 Con él hizo las basas de la puerta de la 

Tienda  de  Reunión,  el  altar  de  bronce  y 

su rejilla de bronce, y todos los utensilios 

del altar,

31 así como las basas del atrio que lo ro-

deaba,  las  basas  de  la  entrada  del  atrio, 

todas las estacas del Tabernáculo, y todas 

las estacas del atrio que lo rodeaba.

Las vestiduras sacerdotales

39

Del hilo de azul, púrpura y carme-

sí, hicieron° las vestiduras de tejido 

para ministrar en el Santuario e hicieron 

las vestiduras sagradas para Aarón, como 

YHVH había ordenado a Moisés.

2 Hizo también el efod de oro y de azul, 

púrpura, carmesí y torzal de lino fino.

3 Laminaron  hojas  de  oro,  las  cortaron 

en filamentos para tejerlos entre el azul, 

la púrpura, el carmesí y el torzal de lino 

fino, en obra primorosa,

4 y le hicieron también hombreras unidas 

en sus dos extremos.

5 La banda tejida que el efod llevaba enci-

ma era del mismo material y de la misma 

hechura:  de  oro,  azul,  púrpura,  carmesí 

y  torzal  de  lino  fino,  como  YHVH  había 

ordenado a Moisés.

6 Luego  prepararon  las  piedras  de  ónice 

engastadas con filigrana de oro, grabadas 

con grabado de un sello según los nom-

bres de los hijos de Israel,

7 y las colocó en las hombreras del efod, 

como piedras recordatorias de los hijos de 

Israel,  como  YHVH  lo  había  ordenado  a 

Moisés.

39.1  En  ocasiones,  los  verbos  a  continuación  aparecen  en  plural  y  otros  en  singular.  39.10  Se  trata  de  piedras  precio-

sas  o  semi  preciosas  de  difícil  identificación.  Las  distintas  versiones  no  siempre  coinciden  en  su  traducción  castellana. 

39.20 .otros

8 Hizo también el pectoral de obra primo-

rosa, como la obra del efod, de oro, azul, 

púrpura, carmesí y torzal de lino fino.

9 Era  cuadrado.  Hicieron  doble  el  pec-

toral: su longitud era de un palmo, y su 

anchura de un palmo cuando estaba do-

blado.

10 Y  engastaron  en  él  cuatro  hileras  de 

piedras.° La primera hilera tenía un rubí, 

un topacio y un azabache. Esta es la pri-

mera hilera.

11 La  segunda  hilera  tenía  una  esmeral-

da, un zafiro y un diamante.

12 La  tercera  hilera  tenía  un  ópalo,  un 

ágata y una amatista.

13 Y la cuarta hilera, un topacio, un óni-

ce y un jaspe, engastadas con filigrana de 

oro en sus encajes.

14 Las piedras correspondían a los nom-

bres de los hijos de Israel: doce según sus 

nombres; cada una de ellas grabada como 

un sello, con su nombre según las doce 

tribus.

15 Para  el  pectoral  hicieron  cadenillas 

trenzadas  como  cordón,  obra  de  oro 

puro.

16 Asimismo hicieron dos engastes de fi-

ligrana de oro, dos anillos áureos, y fija-

ron los dos anillos a los dos extremos del 

pectoral,

17 pasando  los  dos  cordones  de  oro  por 

los dos anillos, en los extremos del pec-

toral.

18 Sujetaron los dos cabos de los dos cor-

dones en los dos engastes, los cuales fija-

ron sobre las hombreras del efod, en su 

parte delantera.

19 Hicieron además dos anillos de oro, y 

los pusieron en los dos extremos del pec-

toral, en el interior del efod.

20 Luego  hicieron  otros°  dos  anillos  de 

oro y los fijaron en las dos hombreras del 

efod, por la parte delantera inferior, junto 

al empalme, encima del cinto del efod.

21 Ataron el pectoral por sus anillos a los 

anillos  del  efod  con  un  cordón  de  azul, 

para que estuviera sobre el cinto del efod, 

y el pectoral no se separara del efod, tal 

como YHVH había ordenado a Moisés.


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Éxodo 39:22

102

22 Hizo también el manto del efod, obra 

de tejedor, todo de azul.

23 Y  la  abertura  del  manto  estaba  en  su 

centro, como abertura de malla, con una 

orla alrededor de su abertura para que no 

se desgarrara.

24 Y en las orillas del manto hicieron gra-

nadas de azul, y púrpura, y carmesí y tor-

zal de lino fino.

25 Hicieron  también  campanillas  de  oro 

puro,  y  colocaron  las  campanillas  entre 

las  granadas,  alrededor  de  la  orilla  del 

manto, entre las granadas:

26 Una  campanilla  y  una  granada,  una 

campanilla  y  una  granada  alrededor,  en 

las orillas del manto para ministrar, como 

YHVH había ordenado a Moisés.

27 Igualmente,  hicieron  las  túnicas  de 

lino  fino,  obra  de  tejedor,  para  Aarón  y 

para sus hijos.

28 El turbante de lino fino, los adornos de 

las tiaras de lino fino, y las prendas inte-

riores de torzal de lino fino.

29 También el cinto, de torzal de lino fino, 

azul, púrpura y carmesí, obra de recama-

dor.  Tal  como  YHVH  había  ordenado  a 

Moisés.

30 Hicieron  asimismo  la  lámina  de  la 

diadema sagrada, de oro puro, y a modo 

de grabado de sello, inscribieron en ella: 

C

onSagrado

 

a

 YHVH.

31 Luego colocaron sobre ella un cordón de 

azul, para sujetarla por arriba al turbante, 

tal como YHVH había ordenado a Moisés.

32 Así fue acabada toda la obra del Taber-

náculo de la Tienda de Reunión. Y los hi-

jos de Israel hicieron según todo lo que 

YHVH  había  ordenado  a  Moisés.  Así  lo 

hicieron.

33 Entonces  llevaron  a  Moisés  el  Taber-

náculo, la Tienda y todos sus utensilios, 

sus ganchos, sus tablones, sus travesaños, 

sus columnas y sus basas,

34 el cobertor de pieles rojas de carneros, 

y el cobertor de pieles de tejones, y el velo 

a modo de cortina,

35 el Arca del Testimonio, y sus varas, el 

propiciatorio,

36 la mesa y todos sus utensilios, el pan 

de la proposición,

37 el  candelabro  puro,  sus  lámparas  (las 

lámparas en hilera) y todos sus utensilios, 

y el aceite para el alumbrado,

38 el altar de oro, y el aceite de la unción, 

el incienso aromático, la cortina para la 

entrada de la Tienda,

39 el  altar  de  bronce  con  su  rejilla  de 

bronce, sus varas y todos sus utensilios, 

la fuente y su basa,

40 las cortinas del atrio, sus columnas y 

sus  basas,  la  cortina  para  la  entrada  del 

atrio,  sus  cuerdas  y  sus  estacas,  y  todos 

los utensilios del servicio del Tabernáculo 

de la Tienda de Reunión,

41 las vestiduras tejidas para ministrar en 

el Santuario, las vestiduras sagradas para 

el sacerdote Aarón, y las vestiduras de sus 

hijos para ejercer el sacerdocio.

42 Según todo lo que YHVH había orde-

nado  a  Moisés,  así  hicieron  los  hijos  de 

Israel todo el trabajo.

43 Y vio Moisés toda la obra, y he aquí la 

habían hecho tal como YHVH había orde-

nado. Así la hicieron. Y Moisés los bendijo.

El Tabernáculo es erigido

40

Entonces  habló  YHVH  a  Moisés, 

diciendo:

2 En el primer día del mes, en el mes pri-

mero, harás levantar el Tabernáculo de la 

Tienda de Reunión.

3 Pondrás  allí  el  Arca  del  Testimonio,  y 

cubrirás el Arca con el velo.

4 Introducirás  la  mesa,  arreglarás  sus 

utensilios y traerás el candelabro y harás 

encender sus lámparas.

5 Luego  pondrás  el  altar  de  oro  para  el 

incienso frente al Arca del Testimonio, y 

colocarás  la  cortina  a  la  entrada  del  Ta-

bernáculo.

6 Pondrás el altar del holocausto delante 

de la entrada del Tabernáculo de la Tienda 

de Reunión.

7 Colocarás  la  fuente  entre  la  Tienda  de 

Reunión y el altar, y echarás agua en ella.

8 Y alrededor erigirás el atrio, y colgarás 

la cortina de la entrada del atrio.

9 Y tomarás el aceite de la unción y un-

girás el Tabernáculo y todo lo que hay en 

él,  después  lo  santificarás  con  todos  sus 

utensilios, y será sagrado.

10 Ungirás también el altar del holocaus-

to con todos sus utensilios, y santificarás 

el altar, y el altar será santísimo.

11 Asimismo ungirás la fuente y su base, 

y la santificarás.


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Éxodo 40:38

103

12 En seguida harás que Aarón y sus hijos 

se acerquen a la entrada de la Tienda de 

Reunión, y los lavarás con agua.

13 Vestirás  a  Aarón  las  vestiduras  sagra-

das, lo ungirás, y lo consagrarás, para que 

sea mi sacerdote.

14 Acercarás a sus hijos y les harás poner 

las túnicas,

15 y los ungirás como ungiste a su padre, 

y serán mis sacerdotes, porque su unción 

les  servirá  por  sacerdocio  perpetuo  para 

sus generaciones.

16 Y Moisés hizo conforme a todo lo que 

YHVH le había ordenado. Así lo hizo.

17 Aconteció pues que en el mes primero 

del  segundo  año,  al  primero  del  mes,  el 

Tabernáculo fue erigido.

18 Y Moisés hizo levantar el Tabernáculo 

y asentó sus bases, y colocó sus tablones, 

y metió sus barras, e hizo levantar sus co-

lumnas.

19 Luego extendió la Tienda sobre el Ta-

bernáculo, y puso el cobertor de la Tienda 

encima del mismo, tal como YHVH había 

ordenado a Moisés.

20 Después  tomó  y  puso  el  Testimonio 

dentro del Arca, y colocó las varas en el 

Arca, y puso el propiciatorio encima del 

Arca.

21 Hizo  introducir  el  Arca  en  el  Taber-

náculo, y colgó el velo de separación. De 

este modo hizo ocultar el Arca del Testi-

monio, tal como YHVH había ordenado a 

Moisés.

22 Luego  puso  la  mesa  en  la  Tienda  de 

Reunión,  al  lado  norte  del  Tabernáculo, 

fuera del velo,

23 y colocó en orden sobre ella el arreglo 

de los panes delante de YHVH, tal como 

YHVH había ordenado a Moisés.

24 Luego colocó el candelabro en la Tien-

da  de  Reunión,  enfrente  de  la  mesa,  al 

lado sur del Tabernáculo,

25 e  hizo  encender  las  lámparas  delante 

de YHVH, tal como YHVH había ordenado 

a Moisés.

26 Puso también el altar de oro dentro de 

la Tienda de Reunión, hacia el interior del 

velo,

27 e hizo quemar sobre él incienso aromáti-

co, como YHVH había ordenado a Moisés.

28 Luego colocó la cortina para la entrada 

del Tabernáculo,

29 y  el  altar  del  holocausto  lo  puso  a  la 

entrada del Tabernáculo de la Tienda de 

Reunión,  e  hizo  ofrecer  sobre  él  holo-

causto  y  ofrenda,  como  YHVH  había  or-

denado a Moisés.

30 Después puso la fuente entre la Tienda 

de Reunión y el altar, y puso allí agua para 

lavarse.

31 Y Moisés y Aarón y sus hijos se lavaban 

en ella sus manos y sus pies.

32 Siempre que entraban en la Tienda de 

Reunión y al acercarse al altar, se lavaban, 

tal como YHVH había ordenado a Moisés.

33 Finalmente, hizo erigir el atrio en de-

rredor  del  Tabernáculo  y  del  altar,  y  co-

locó la cortina a la entrada del atrio. Así 

acabó Moisés la obra.

34 Entonces la nube cubrió la Tienda de 

Reunión, y la gloria de YHVH llenó el Ta-

bernáculo.

35 Y Moisés no podía entrar en la Tienda 

de Reunión porque la nube se había insta-

lado sobre ella, y la gloria de YHVH había 

llenado el Tabernáculo.

36 Y cuando se alzaba la nube desde el Ta-

bernáculo,  los  hijos  de  Israel  partían  en 

todos sus trayectos,

37 pero si la nube no se alzaba, no partían 

hasta el día en que se levantaba,

38 porque  la  nube  de  YHVH  permanecía 

de  día  sobre  el  Tabernáculo,  y  de  noche 

había fuego en él, a la vista de toda la casa 

de Israel, en todas sus jornadas.°

40.38 Es decir, en su peregrinar por el desierto

→13.21-22. 


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1

Y llamando YHVH a Moisés, le habló 

desde la Tienda de Reunión, diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel y diles: Cuan-

do alguno° de vosotros traiga una ofren-

da° a YHVH, ofreceréis vuestra víctima de 

animales del ganado o del rebaño.

3

 Si su ofrenda es un holocausto del ga-

nado, ofrecerá un macho sin defecto. Lo 

traerá a la entrada de la Tienda de Reu-

nión,  para  que  sea  acepto  en  favor  suyo 

ante YHVH.

4

 Apoyará su mano sobre la cabeza de la 

víctima, y le será acepta para hacer expia-

ción por él.

5

 Luego deberá° degollar el becerro ante 

YHVH, y los hijos de Aarón, los sacerdo-

tes, ofrecerán la sangre y rociarán la san-

gre  alrededor  sobre  el  altar  situado  a  la 

entrada de la Tienda de Reunión.

6

 Después desollará° la víctima y la parti-

rá en trozos,

7

 y los hijos de Aarón, los sacerdotes, ha-

rán  fuego  sobre  el  altar  y  acomodarán 

leña sobre el fuego.

8

 Seguidamente,  los  mismos  hijos  de 

Aarón, los sacerdotes, dispondrán los tro-

zos, la cabeza y la grasa sobre la leña que 

está encima del fuego del altar,

9

 y después de lavar en agua sus entrañas 

y sus patas, el sacerdote lo dejará consu-

mir todo sobre el altar. Es un holocausto, 

un sacrificio ígneo de olor que apacigua 

a YHVH.

10

 Pero  si  su  ofrenda  es  del  rebaño,  de 

corderos  o  de  cabras  para  holocausto, 

ofrecerá un macho sin defecto.

11

 Lo  degollará  delante  de  YHVH  sobre 

el flanco del altar, al norte, y los hijos de 

Aarón, los sacerdotes, rociarán la sangre 

de aquél sobre el altar, en derredor.

12

 Después  lo  cortará  en  trozos,  los 

cuales, con su cabeza y su grasa, el sa-

cerdote dispondrá encima de la leña co-

locada  sobre  el  fuego  que  hay  encima 

del altar.

13

 Se lavarán en el agua las entrañas y las 

patas, y el sacerdote lo ofrecerá todo de-

jándolo consumir sobre el altar. Él° es un 

holocausto,  sacrificio  ígneo  de  olor  que 

apacigua a YHVH.

14

 Y  si  su  ofrenda  a  YHVH  consiste  en 

un  holocausto  de  ave,  presentará  como 

ofrenda suya unas tórtolas o pichones.°

15

 El  sacerdote  la  acercará  al  altar,  y  de 

una  uñada°  le  cortará  la  cabeza,  la  cual 

dejará  consumir  sobre  el  altar.  Después 

exprimirá  su  sangre  sobre  la  pared  del 

altar,

16

 le quitará el buche y el plumaje, y lo 

arrojará a un lado del altar, al oriente, en 

el lugar de la ceniza.

17

 Hendirá  luego  la  avecilla  por  entre 

sus alas, pero no la dividirá, y el sacerdo-

te dejará que se consuma sobre el altar, 

encima de la leña, sobre el fuego. Es un 

holocausto,  sacrificio  ígneo  de  olor  que 

apacigua a YHVH.

Los holocaustos

1.2 Lit. adam. Nótese que los destinatarios aquí (así como en la mayor parte del AP) son los ciudadanos del Pueblo de Israel 

juntamente con los sacerdotes. Es el oferente y no el sacerdote el responsable de llevar su víctima expiatoria, imponer sus ma-

nos sobre ella confesando sus pecados, degollarla, desollarla y, seccionarla. 

1.2 Heb. yaqriv qorván = víctima, ofrenda. Ambas 

palabras derivan de la raíz qarav = aproximarse

1.5 Esto es, el oferente.  1.6 Esto es, el oferente.  1.13 Nótese la inserción 

del pronombre a diferencia de la ofrenda del becerro. 

→v. 9.  1.14 Lit. hijos.  1.15 Heb. malaq. Es decir: rasgarle el pescuezo 

degollarla con la uña.


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Levítico 3:10

105

La ofrenda vegetal

2

Cuando alguno presente una ofrenda 

vegetal°  a  YHVH,  su  ofrenda  será  de 

flor de harina; verterá aceite sobre ella, y 

le pondrá incienso encima.

2

 Luego la presentará a los hijos de Aarón, 

los  sacerdotes,  de  allí  tomará  un  puñado 

lleno de la flor de harina de su ofrenda y de 

su aceite, con todo su incienso, y ensegui-

da el sacerdote dejará consumir esto como 

su° memorial sobre el altar. Es sacrificio 

ígneo de olor que apacigua a YHVH.

3

 Lo  restante  de  la  ofrenda  vegetal  será 

para Aarón y sus hijos. Cosa santísima de 

los sacrificios ígneos en honor de YHVH.

4

 Cuando presentes ofrenda vegetal de lo 

cocido en horno, será de flor de harina, en 

tortas sin levadura amasadas con aceite, o 

galletas sin levadura untadas con aceite.

5

 Si  tu  presente  es  una  ofrenda  vegetal 

hecha  en  sartén,  será  de  flor  de  harina 

amasada con aceite, sin levadura.

6

 La partirás en pedazos y derramarás so-

bre ella aceite. Es ofrenda vegetal.

7

 Si  tu  presente  es  una  ofrenda  vegetal 

hecha en cazuela, será de flor de harina 

con aceite.

8

 Y  llevarás  a  YHVH  la  ofrenda  vegetal 

que  hayas  preparado  de  esas  cosas,  y  se 

la  presentarás  al  sacerdote  para  que  la 

aproxime al altar.

9

 El  sacerdote  tomará  de  la  ofrenda  la 

porción como memorial, y la dejará con-

sumir sobre el altar como sacrificio ígneo 

de olor que apacigua a YHVH.

10

 Lo restante de la ofrenda vegetal será 

para Aarón y sus hijos. Es cosa santísima 

de los sacrificios ígneos a YHVH.

11

 Ninguna ofrenda vegetal que ofrezcáis 

ante YHVH será preparada con levadura, 

porque no haréis consumir ninguna cosa 

hecha  con  levadura  ni  con  miel,  como 

ofrenda ígnea a YHVH.

12

 Podréis presentarlas ante YHVH como 

ofrenda de primicias, pero no ascenderán 

sobre el altar como olor que apacigua.

13

 Sazonarás con sal todo presente de tu 

ofrenda vegetal, y nunca dejarás que la sal 

del pacto de tu Dios falte de tu ofrenda. 

En toda ofrenda tuya presentarás sal.

14

 Y si presentas ante YHVH ofrenda de 

primicias,  tostarás  al  fuego  las  espigas 

tiernas, y presentarás el grano desmenu-

zado como ofrenda de tus primicias.

15

 Verterás aceite sobre ella y pondrás in-

cienso sobre ella. Es ofrenda vegetal.

16

 Y el sacerdote dejará consumir como 

memorial de ella parte de su grano des-

menuzado y de su aceite, con todo su in-

cienso. Es ofrenda ígnea a YHVH.

Ofrendas de paz

3

Si su ofrenda es un sacrificio de paz, si 

ofrece de la vacada, sea macho o hem-

bra, lo presentará sin defecto ante YHVH.

2

 Apoyará su mano sobre la cabeza de su 

víctima  y  la  degollará  a  la  entrada  de  la 

Tienda de Reunión. Los sacerdotes, hijos 

de Aarón, rociarán la sangre en derredor 

sobre el altar.

3

 Del  sacrificio  de  las  ofrendas  de  paz, 

presentará una ofrenda ígnea ante YHVH 

con la grasa que cubre los intestinos, toda 

la grasa que hay sobre las entrañas,

4

 los dos riñones, la grasa que hay sobre 

ellos y sobre los lomos, y la grasa del hí-

gado, que quitará con los riñones.

5

 Los  hijos  de  Aarón  dejarán  consumir 

esto  en  el  altar,  encima  del  holocausto, 

sobre la leña, sobre el fuego. Es ofrenda 

ígnea de olor que apacigua a YHVH.

6

 Si su ofrenda para el sacrificio de ofren-

das de paz a YHVH es del rebaño, lo pre-

sentará sin defecto, sea macho o hembra.

7

 Si  presenta  un  cordero  por  su  ofren-

da,  entonces  lo  hará  acercar  delante  de 

YHVH,

8

 y apoyando su mano sobre la cabeza de su 

ofrenda, lo degollará delante de la Tienda 

de Reunión. Luego, los hijos de Aarón ro-

ciarán su sangre en derredor sobre el altar.

9

 Y  del  sacrificio  de  las  ofrendas  de  paz, 

presentará  como  ofrenda  ígnea  ante 

YHVH  la  grasa  y  la  cola  entera,  cortada 

desde el espinazo, así como la grasa que 

cubre los intestinos, toda la grasa que hay 

sobre las entrañas,

10

 los dos riñones, la grasa que hay sobre 

ellos y sobre los lomos y la grasa del híga-

do, que quitará con los riñones.

2.1 Heb. Minjah. Ofrenda de carácter vegetal, generalmente de cereal, aceite, harina, y se diferencia del holocausto por no 

producirse la muerte de una víctima. 

2.2 Esto es, en memoria del oferente.


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Levítico 3:11

106

11

 Y el sacerdote lo dejará consumir so-

bre el altar como alimento de ofrenda íg-

nea a YHVH.

12

 Y  si  su  ofrenda  es  una  cabra,  la  hará 

acercar ante YHVH,

13

 y apoyando su mano sobre la cabeza, 

la degollará delante de la Tienda de Reu-

nión. Después los hijos de Aarón rociarán 

su sangre en derredor sobre el altar,

14

 y de ella, presentará su ofrenda ígnea 

ante YHVH: la grasa que cubre las entra-

ñas y toda la grasa que hay sobre las en-

trañas,

15

 los  dos  riñones  con  la  grasa  que  hay 

sobre ellos y sobre los lomos, y la grasa 

del hígado, que quitará con los riñones.

16

 Luego,  el  sacerdote  los  dejará  consu-

mir sobre el altar. Es un alimento de sa-

crificio ígneo de olor que apacigua. Toda 

la grasa pertenece a YHVH.

17

 Es estatuto perpetuo por vuestras ge-

neraciones en todos vuestros asentamien-

tos: no comeréis grasa ni sangre.

Sacrificios por el pecado de ignorancia

4

Y YHVH habló a Moisés diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel y diles: Si 

alguno peca por ignorancia contra cual-

quiera  de  los  mandamientos  de  YHVH 

sobre cosas que no se han de hacer, e in-

fringe alguno de ellos,

3

 o si es el sacerdote ungido quien ha pe-

cado en perjucio del pueblo, por el pecado 

cometido  ofrecerá  a  YHVH  como  expia-

ción un novillo sin defecto.

4

 Conducirá el novillo a la entrada de la 

Tienda  de  Reunión,  delante  de  YHVH,  y 

apoyando  su  mano  sobre  la  cabeza  del 

novillo,  degollará  el  novillo  delante  de 

YHVH.

5

 Luego el sacerdote ungido tomará de la 

sangre del novillo y la llevará a la Tienda 

de Reunión,

6

 y  mojando  el  sacerdote  su  dedo  en  la 

sangre, hará con la sangre aspersión siete 

veces  ante  YHVH  hacia  el  velo  del  San-

tuario.

7

 El  sacerdote  pondrá  parte  de  aquella 

sangre sobre los cuernos del altar del in-

cienso aromático delante de YHVH, en la 

Tienda de Reunión, y derramará el resto 

de  la  sangre  del  novillo  al  pie  del  altar 

del holocausto, situado a la entrada de la 

Tienda de Reunión.

8

 Después quitará toda la grasa del novi-

llo de la expiación, la grasa que cubre las 

entrañas,  y  toda  la  grasa  que  está  sobre 

las entrañas,

9

 los dos riñones, la grasa que hay sobre 

ellos y sobre los lomos, y la grasa del hí-

gado, que quitará con los riñones

10

 de la manera que se quita del novillo 

del sacrificio de las ofrendas de paz. Lue-

go, el sacerdote los dejará consumir sobre 

el altar del holocausto.

11

 Pero la piel del novillo, y toda su carne, 

con su cabeza, sus patas, sus entrañas, y 

su estiércol,

12

 es decir, todo el novillo, lo hará sacar 

fuera del campamento, a un lugar limpio, 

al vertedero de la ceniza, y lo quemará so-

bre leños con fuego. En el vertedero de la 

ceniza será quemado.

13

 Si por ignorancia toda la asamblea de 

Israel  peca,  y  el  asunto  está  oculto  ante 

la  congregación,  pero  ha  transgredido 

alguno  de  los  mandamientos  de  YHVH 

respecto a cosas que no se deben hacer, 

resultando así culpables,

14

 cuando sea manifiesto el pecado con el 

cual pecaron, entonces los de la congre-

gación presentarán un novillo en ofrenda 

por el pecado, y lo conducirán delante de 

la Tienda de Reunión.

15

 Seguidamente los ancianos de la asam-

blea  apoyarán  sus  manos  sobre  la  cabeza 

del novillo, en presencia de YHVH, y uno° 

degollará el novillo en presencia de YHVH.

16

 Luego el sacerdote ungido llevará una 

parte de la sangre del novillo a la Tienda 

de Reunión,

17

 y mojando su dedo en la sangre, el sa-

cerdote  hará  aspersión  siete  veces  ante 

YHVH hacia el velo.

18

 Pondrá luego parte de la sangre en los 

cuernos del altar, en presencia de YHVH, 

en la Tienda de Reunión, y derramará el 

resto de la sangre al pie del altar del holo-

causto, situado en la entrada de la Tienda 

de Reunión.

19

 Después quitará de él toda su grasa, y 

la dejará consumir sobre el altar.

4.15 Esto es, uno de los ancianos.


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Levítico 5:5

107

20

 Hará con el novillo así como hizo con 

el  novillo  de  expiación.  Lo  mismo  hará 

con  él.  El  sacerdote  hará  expiación  por 

ellos, y ellos serán perdonados.

21

 Luego  se  sacará  el  novillo  fuera  del 

campamento y se quemará como quemó 

el primer novillo. Es un sacrificio expia-

torio por la congregación.

22

 Cuando un jefe peque por ignorancia, 

obrando contra cualquiera de los manda-

mientos de YHVH su Dios sobre lo que no 

se debe hacer, resultando así culpable,

23

 tan  pronto  como  se  le  dé  a  conocer 

el pecado que cometió, presentará como 

ofrenda suya un macho cabrío sin defec-

to,

24

 y  apoyando  su  mano  sobre  la  cabeza 

del  macho  cabrío,  lo  degollará  en  el  lu-

gar  donde  se  degüella  el  holocausto,  en 

presencia de YHVH; es ofrenda por el pe-

cado.

25

 Entonces  el  sacerdote  tomará  con  su 

dedo de la sangre de la víctima por el peca-

do y la pondrá en los cuernos del altar del 

holocausto.  Luego  derramará  el  resto  de 

su sangre al pie del altar del holocausto.

26

 Dejará consumir sobre el altar toda su 

grasa, así como quemó la grasa del sacri-

ficio de las ofrendas de paz. De esta mane-

ra el sacerdote ofrecerá expiación por el 

pecado de aquél, y le será perdonado.

27

 Y si una persona del pueblo de la tie-

rra° peca por ignorancia, haciendo lo que 

no  se  debe  hacer  contra  alguno  de  los 

mandamientos  de  YHVH,  resultando  así 

culpable,

28

 tan pronto como se le haga reconocer 

el pecado que cometió, presentará como 

ofrenda  suya  una  hembra  de  las  cabras, 

una cabra perfecta, por el pecado que co-

metió.

29

 Y  apoyando  su  mano  sobre  la  cabeza 

de  la  víctima  por  el  pecado,  degollará  a 

la  víctima  por  el  pecado  en  el  lugar  del 

holocausto.

30

 Entonces  el  sacerdote  tomará  de  la 

sangre  de  ella  con  su  dedo,  y  la  pondrá 

en  los  cuernos  del  altar  del  holocausto, 

y derramará el resto de su sangre al pie 

del altar.

31

 Después le quitará toda la grasa, como 

se remueve la grasa de las ofrendas de paz, 

y el sacerdote la dejará consumir sobre el 

altar como olor que apacigua a YHVH. El 

sacerdote hará expiación a favor de él, y le 

será perdonado.°

32

 Y si trae un cordero como su víctima 

por  el  pecado,  aproximará  una  hembra 

sin defecto,

33

 y apoyando su mano sobre la cabeza de 

la víctima por el pecado, la degollará en 

sacrificio por el pecado en el lugar donde 

se degüella el holocausto.

34

 Después  el  sacerdote  tomará  con  su 

dedo de la sangre de la víctima expiatoria 

y  la  pondrá  en  los  cuernos  del  altar  del 

holocausto,  y  derramará  el  resto  de  su 

sangre al pie del altar.

35

 Luego quitará toda su grasa tal como 

fue  quitada  la  grasa  del  cordero  del  sa-

crificio  de  las  ofrendas  de  paz,  y  el  sa-

cerdote la dejará consumir sobre el altar 

como sacrificio ígneo a YHVH. El sacer-

dote  ofrecerá  así  expiación  por  tal  per-

sona,  por  el  pecado  cometido,  y  le  será 

perdonado.

Sacrificios por diversos pecados

5

Si alguien es llamado a testificar por 

ser  testigo  de  algo  que  vio  o  supo,  y 

no lo denuncia, comete pecado y cargará 

con la culpa.

2

 Si alguien toca cualquier cosa impura, 

ya sea el cadáver de una fiera inmunda, o 

el cadáver de ganado inmundo, o el cadá-

ver de un reptil inmundo, aunque no lo 

sepa, será impuro y culpable.

3

 O si toca alguna impureza humana, de 

cualquier impureza con que se contami-

ne, sin darse cuenta y después llega a sa-

berlo, será culpable.

4

 Si alguien jura a la ligera con sus labios, 

para  mal  o  para  bien,  en  cualquier  cosa 

que el hombre acostumbra a proferir ju-

ramento, y no se da cuenta, pero luego se 

percata  y  resulta  culpable  de  cualquiera 

de estas cosas,

5

 sucederá que, si es culpable en alguna 

de estas cosas, tendrá que confesar aque-

llo en que ha pecado,

4.27 persona del pueblo de la tierra. Este término incluye al judío común, al sacerdote y a los levitas, hombre o mujer, incluso a 

esclavos no judíos. 

4.31 

→Nm.15.27-28. 


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Levítico 5:6

108

6

 y para expiación por su pecado cometi-

do presentará ante YHVH una hembra del 

rebaño, sea oveja o cabra, como sacrificio 

por el pecado, y el sacerdote le hará expia-

ción por su pecado.

7

 Pero  si  no  dispone  lo  suficiente  para 

ofrecer  un  cordero,  entonces  presentará 

por su culpa con la cual pecó, dos tórtolas 

o  dos  palominos  para  YHVH:  uno  como 

víctima por el pecado, y otro para holo-

causto,

8

 y  los  llevará  al  sacerdote.  Éste  presen-

tará primero al que es víctima por el pe-

cado,  y  de  una  uñada°  le  hará  un  corte 

en  la  cabeza  desde  el  cuello,  pero  no  la 

separará.

9

 Salpicará parte de la sangre de la vícti-

ma por el pecado sobre la pared del altar, 

y exprimirá el resto de la sangre al pie del 

altar. Es ofrenda por el pecado.

10

 Con el segundo hará holocausto con-

forme al decreto, y el sacerdote hará ex-

piación a favor de él, por su pecado con el 

cual pecó, y le será perdonado.

11

 Y si no dispone lo suficiente para dos 

tórtolas  o  dos  palominos,  entonces,  el 

que pecó, presentará por ofrenda suya la 

décima parte de un efa de flor de harina 

por  expiación.  No  le  echará  aceite  ni  le 

pondrá incienso, porque es ofrenda por el 

pecado.

12

 La presentará, pues, al sacerdote, y el 

sacerdote  llenará  de  ella  su  puño,  como 

memorial, y la dejará consumir en el al-

tar sobre las ofrendas ígneas a YHVH. Es 

ofrenda por el pecado.

13

 El sacerdote hará expiación a favor de 

él por su pecado con el cual pecó en algu-

na de estas cosas, y le será perdonado. El 

resto será para el sacerdote, como en el 

caso de la ofrenda vegetal.

14

 Además, YHVH habló a Moisés dicien-

do:

15

 Si  una  persona  comete  prevaricación 

y peca por ignorancia, destruyendo cosas 

consagradas  a  YHVH,  presentará  como 

sacrificio suyo de reparación a YHVH un 

carnero sin defecto procedente del reba-

ño, según tu valoración en siclos de plata, 

conforme al siclo del Santuario, como sa-

crificio por el delito.

16

 Restituirá además lo que haya dañado 

de las cosas consagradas y añadirá sobre 

ello un quinto, lo cual dará al sacerdote. 

El sacerdote hará expiación a favor de él 

mediante el carnero del sacrificio por el 

pecado, y le será perdonado.

17

 Si  alguno  peca  e  infringe  cualquiera 

de los mandamientos de YHVH respecto 

a cosas que no se deben hacer, aunque no 

se de cuenta, se hará responsable y pagará 

su falta.

18

 Del rebaño llevará un carnero sin de-

fecto,  según  tu  estimación,  como  sacri-

ficio por el delito. El sacerdote hará por 

él expiación por la falta que cometió sin 

darse cuenta, y será perdonado.

19

 Es  un  sacrificio  por  la  culpa.  Cierta-

mente resultó culpable ante YHVH.°

El holocausto diario

6

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Si una persona peca y comete preva-

ricación contra YHVH, ya sea engañando 

a su prójimo en cuanto a depósito o pren-

da  confiada  en  su  mano,  o  por  hurto,  o 

por extorsión a su prójimo,

3

 o  por  hallar  algo  perdido  y  negarlo,  y 

por cualquiera de estas cosas que puede 

hacer el hombre, jura falsamente pecan-

do con ellas,

4

 cuando  haya  así  pecado  y  resulte  ser 

culpable, devolverá lo que robó o defrau-

dó, o el depósito que se le encomendó, o 

la cosa perdida que halló,

5

 o todo aquello en lo que haya jurado fal-

samente. Lo devolverá pues por entero, el 

día de la ofrenda por su culpa, añadien-

do a ello su quinto, que le dará a aquel a 

quien pertenece.

6

 Y  como  ofrenda  por  su  culpa  ante 

YHVH, llevará del rebaño al sacerdote un 

carnero sin defecto, según tu estimación, 

como ofrenda por la culpa,

7

 y el sacerdote hará expiación por él de-

lante de YHVH, y le será perdonada cual-

quier cosa que haya hecho por la cual sea 

culpable.°

8

 Y habló YHVH a Moisés para decirle:

9

 Ordena  a  Aarón  y  a  sus  hijos,  y  diles: 

Ésta es la ley del holocausto: El holocaus-

to permanecerá ardiendo sobre el fuego, 

5.8 Esto es, el sacerdote 

→1.15.  5.19 En el TM el c.5 continúa hasta 6.7.  6.1-7 →Nm.5.5-8. 


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Levítico 7:4

109

encima  del  altar,  toda  la  noche  hasta  la 

mañana, y el fuego del altar ha de mante-

nerse ardiendo en él.

10

 Luego  el  sacerdote  se  revestirá  de  su 

túnica de lino y vestirá sobre su carne los 

zaragüelles de lino. A continuación reco-

gerá de sobre el altar la ceniza del holo-

causto que el fuego habrá reducido, y la 

depositará al costado del altar.

11

 Después  se  quitará  sus  vestiduras,  y 

revestido  de  otras  vestiduras,  sacará  la 

ceniza fuera del campamento a un lugar 

puro.

12

 En tanto, el fuego de sobre el altar ar-

derá  en  él  sin  extinguirse.  El  sacerdote 

quemará leños en él cada mañana, y aco-

modará  encima  el  holocausto,  dejando 

consumir en él las grasas de las ofrendas 

de paz.

13

 Un fuego continuo arderá sobre el al-

tar sin extinguirse.

14

 La ley de la ofrenda vegetal será ésta: 

Los hijos de Aarón la deberán ofrecer ante 

YHVH, frente al altar.

15

 Se  retirará  de  ella  un  puñado  de  flor 

de  harina  de  la  ofrenda  vegetal,  con  su 

aceite  y  todo  el  incienso  que  está  sobre 

la  ofrenda  vegetal,  y  lo  dejará  consumir 

sobre el altar como su° memorial en olor 

que apacigua a YHVH.

16

 El resto lo comerán Aarón y sus hijos. 

Se comerá en forma de ázimos en lugar 

santo. En el atrio de la Tienda de Reunión 

lo comerán.

17

 No  se  horneará  con  levadura.  Es  su 

porción que les doy de mis sacrificios íg-

neos, cosa muy sagrada como ofrenda por 

el pecado y ofrenda por la culpa.

18

 Todo varón entre los hijos de Aarón la 

podrá  comer.  Es  estatuto  perpetuo  por 

vuestras  generaciones  respecto  a  los  sa-

crificios ígneos a YHVH. Todo lo que to-

que en ellas quedará consagrado.

19

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

20

 Esta  será  la  ofrenda  que  Aarón  y  sus 

hijos  presentarán  a  YHVH  el  día  de  su 

respectiva unción: la décima parte de un 

efa de flor de harina como ofrenda vege-

tal continua,° la mitad por la mañana y la 

mitad por la tarde.

21

 En sartén será desleída en aceite, y la 

llevarás bien frita, en pedazos, tal como 

la  ofrenda  vegetal  cocida  al  horno,  y 

la  ofrecerás  como  olor  que  apacigua  a 

YHVH.

22

 Y  el  sacerdote  que  de  entre  sus  hijos 

haya sido ungido para sucederlo, habrá de 

ofrecerla. Esto es un estatuto perpetuo de 

YHVH. Será quemada totalmente.

23

 Así, toda ofrenda vegetal del sacerdote 

no se comerá sino que será enteramente 

quemada.

24

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

25

 Habla a Aarón y a sus hijos, y diles: Esta 

es la ley del sacrificio por el pecado: En el 

lugar donde se inmola el holocausto, será 

degollada la víctima por el pecado, en pre-

sencia de YHVH. Es cosa santísima.

26

 El  sacerdote  que  haga  la  ofrenda  por 

el pecado la comerá. En lugar sagrado la 

comerá, dentro del atrio de la Tienda de 

Reunión.

27

 Todo lo que toque en su carne quedará 

consagrado. Si la sangre salpica sobre una 

vestidura, lavarás lo que fue salpicado en 

un lugar santo.

28

 La  vasija  de  barro  en  que  sea  cocida 

será quebrada, y si se cuece en vasija de 

cobre, ésta será fregada y enjuagada con 

agua.

29

 Todo varón de entre los sacerdotes po-

drá comer de ella. Es cosa santísima.

30

 Pero  no  se  comerá  ninguna  ofrenda 

por el pecado cuya sangre haya sido lle-

vada  a  la  Tienda  de  Reunión  para  hacer 

expiación  en  el  Santuario.  En  el  fuego 

será quemada.

Otras instrucciones sobre los sacrificios

7

Esta es la ley de la ofrenda por la cul-

pa. Es cosa santísima:

2

 En  el  lugar  donde  se  inmola  el  holo-

causto, degollarán la víctima por la culpa, 

y  él°  rociará  su  sangre  sobre  el  altar  en 

derredor.

3

 Luego  ofrecerá  toda  su  grasa:  la  cola 

gorda, la grasa que cubre los intestinos,

4

 los dos riñones y la grasa que hay sobre 

ellos  en  los  ijares,  sacando  juntamente 

con los riñones la grasa del hígado.

6.15  Esto  es,  del  oferente.  6.20  Heb.  minjat  tamiz.  Puede  indicar  simplemente  una  continuidad  periódica.  7.2  Esto  es,  el 

oferente


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Levítico 7:5

110

5

 Luego,  el  sacerdote  lo  dejará  consu-

mir sobre el altar como ofrenda ígnea a 

YHVH. Es ofrenda por la culpa.

6

 Todo  varón  de  entre  los  sacerdotes  la 

comerá. Se comerá en un lugar santo, es 

cosa santísima.

7

 La  ofrenda  por  el  pecado  es  como  la 

ofrenda  por  la  culpa,  tienen  una  misma 

ley:  será  de  aquel  sacerdote  que  haga  la 

expiación con ella.

8

 El sacerdote que presente el holocausto 

de  alguno,  tendrá  para  sí  mismo,  como 

sacerdote, la piel del holocausto que pre-

sentó.

9

 Toda  ofrenda  vegetal  que  se  cocine  en 

horno,  y  todo  lo  cocinado  en  cazuela  o 

en sartén, será del sacerdote que lo haya 

presentado.

10

 Pero toda ofrenda vegetal amasada con 

aceite, o seca, será para todos los hijos de 

Aarón, cada uno igual a su hermano.

11

 Esta es la ley del sacrificio de paz que 

se presentará a YHVH:

12

 Si lo presenta en acción de gracias, en-

tonces,  junto  con  el  sacrificio  de  acción 

de gracias, presentará tortas sin levadura 

amasadas  con  aceite,  hojaldres  sin  leva-

dura untados con aceite, y tortas fritas de 

flor de harina amasadas con aceite.

13

 Además del sacrificio de sus ofrendas 

de paz en acción de gracias, presentará su 

ofrenda con tortas de pan leudado.

14

 De ello, presentará una parte de cada 

víctima como ofrenda a YHVH, y será del 

sacerdote que haya rociado la sangre de 

los sacrificios de paz.

15

 La carne del sacrificio de sus ofrendas 

de paz en acción de gracias, se comerá el 

día  de  su  ofrecimiento.  No  dejará  nada 

para la mañana siguiente.

16

 Pero  si  el  sacrificio  de  su  víctima  es 

por un voto u ofrenda voluntaria, se co-

merá el día que presente su sacrificio y su 

sobrante podrá comerse al día siguiente.

17

 Mas la carne del sacrificio sobrante del 

tercer día, se quemará en el fuego,

18

 pues si la carne del sacrificio de paz se 

come al tercer día, ciertamente no le será 

aceptado  ni  tenido  en  cuenta.  Será  cosa 

abominable, y la persona que coma de él 

cargará con su pecado.

19

 La carne que toque alguna cosa impu-

ra no se comerá, será consumida con fue-

go. En cuanto a la otra° carne, todo el que 

esté limpio puede comer dicha° carne.

20

 Pero la persona que, estando impura, 

coma carne del sacrificio de paz que per-

tenece a YHVH, aquella persona será cor-

tada de su pueblo.

21

 Si alguno toca cosa impura, de impu-

reza  de  hombre  o  de  animal  inmundo, 

o de cualquier abominación inmunda, y 

luego come la carne del sacrificio de paz 

que  pertenece  a  YHVH,  tal  persona  será 

cortada de su pueblo.

22

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

23

 Habla a los hijos de Israel, y diles: No 

comeréis sebo de novillo, ni de cordero, 

ni de cabra.

24

 La grasa de animal muerto o la grasa 

de animal despedazado podrán servir para 

cualquier uso, pero ciertamente no la co-

meréis.

25

 Porque cualquiera que coma la grasa 

del  animal  del  cual  se  ofrece  sacrificio 

ígneo a YHVH, esa persona que la coma 

será cortada de su pueblo.

26

 No comeréis ninguna sangre, ni de ave 

ni de bestia, en ninguno de vuestros asen-

tamientos.

27

 Cualquier  persona  que  coma  sangre 

alguna,  esa  persona  será  cortada  de  su 

pueblo.°

28

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

29

 Habla a los hijos de Israel, y diles: El 

que  presente  el  sacrificio  de  paz  ante 

YHVH, conducirá su víctima a YHVH del 

sacrificio de sus ofrendas de paz.

30

 Sus  propias  manos  acercarán  las 

ofrendas ígneas ante YHVH. Presentará la 

grasa  y  el  pecho,  el  pecho  para  mecerlo 

como ofrenda mecida ante YHVH.

31

 El sacerdote dejará consumir la grasa 

en el altar, pero el pecho será para Aarón 

y sus hijos.

32

 De  vuestras  ofrendas  de  paz  también 

daréis la espaldilla derecha, como ofrenda 

mecida al sacerdote.

33

 Aquel de entre los hijos de Aarón que 

presente la sangre de las ofrendas de paz 

y  la  grasa,  recibirá  la  espaldilla  derecha 

como porción.

7.19 .otra.  7.19 .dicha.  7.26-27 

→Gn.9.4; Lv.17.10-14; 19.26; Dt.12.16,23; 15.23. 


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Levítico 8:22

111

34

 Porque Yo he tomado de los hijos de Is-

rael, de sus sacrificios pacíficos, el pecho 

que  se  mece  y  la  espaldilla  que  se  alza° 

y  los  he  concedido  al  sacerdote  Aarón  y 

a  sus  hijos  por  estatuto  perpetuo  de  los 

hijos de Israel.

35

 Tal  es  la  porción  de  Aarón  y  la  por-

ción de sus hijos, de las ofrendas ígneas 

a YHVH, desde el día en que los presentó 

para servir como sacerdotes de YHVH.

36

 Es lo que YHVH ordenó que se les diera 

por  estatuto  perpetuo  en  sus  generacio-

nes, desde el día en que fueron ungidos 

por los hijos de Israel.

37

 Tal es la ley del holocausto, de la ofren-

da vegetal, de la ofrenda por el pecado, de 

la ofrenda por la culpa, de las consagracio-

nes y del sacrificio de las ofrendas de paz,

38

 que YHVH ordenó a Moisés en el mon-

te Sinay, el día en que mandó° a los hijos 

de Israel que hicieran acercar sus ofren-

das ante YHVH en el desierto de Sinay.

Consagración sacerdotal

8

Luego habló YHVH a Moisés, dicien-

do:

2

 Toma a Aarón y con él a sus hijos, así 

como  las  vestiduras,  el  aceite  de  la  un-

ción,  el  novillo  de  la  expiación,  los  dos 

carneros y el canastillo de los ázimos,

3

 y congrega a toda la asamblea a la entra-

da de la Tienda de Reunión.

4

 E hizo Moisés tal como YHVH le había 

ordenado. Y la asamblea fue congregada a 

la entrada de la Tienda de Reunión.

5

 Dijo Moisés a la asamblea: Esta es la pa-

labra que YHVH ha ordenado hacer.

6

 Entonces Moisés hizo que Aarón y sus 

hijos se acercaran y los lavó con agua.

7

 Luego  puso  sobre  él  la  túnica,  lo  ciñó 

con  el  cinto,  lo  vistió  con  el  manto,  le 

puso el efod y lo ciñó con el cinto tejido 

del efod, envolviéndolo en él.

8

 Le puso encima el pectoral, y en el pec-

toral colocó el Urim° y el Tumim.°

9

 Luego le puso el turbante sobre la cabe-

za, y encima del turbante, en su frontal, 

fijó  la  placa  de  oro,  la  diadema  sagrada, 

tal como YHVH había ordenado a Moisés.

10

 En seguida tomó Moisés el aceite de la 

unción y ungió el Tabernáculo y todo lo 

que había en él, y los santificó.

11

 Roció con él siete veces el altar, y un-

gió el altar y todos sus utensilios así como 

la fuente y su base, para santificarlos.

12

 Luego  derramó  parte  del  aceite  de  la 

unción sobre la cabeza de Aarón y lo un-

gió para consagrarlo.

13

 Tras  esto,  Moisés  mandó  acercarse  a 

los hijos de Aarón, y los hizo vestir con 

túnicas, los ciñó con los cintos y les anu-

dó las tiaras, tal como YHVH había orde-

nado a Moisés.

14

 Hizo aproximar entonces el novillo de 

la ofrenda por el pecado, y Aarón y sus hi-

jos  apoyaron  sus  manos  sobre  la  cabeza 

del novillo de la ofrenda por el pecado,

15

 y uno° lo degolló; luego Moisés° tomó 

la sangre y la puso con su dedo sobre los 

cuernos del altar en derredor, purificando 

así de pecado el altar. Luego derramó la 

sangre restante° al pie del altar y lo con-

sagró para hacer expiación sobre él.

16

 Después tomó toda la grasa que había 

en los intestinos, la grasa del hígado y los 

dos riñones con su grasa y lo dejó consu-

mir sobre el altar.

17

 Pero el novillo con su piel, su carne y 

su  estiércol  lo  quemó  a  fuego  fuera  del 

campamento, tal como YHVH había orde-

nado a Moisés.

18

 Luego hizo acercar el carnero del ho-

locausto, y Aarón y sus hijos apoyaron sus 

manos sobre la cabeza del carnero,

19

 y uno lo degolló; luego Moisés° roció 

la sangre sobre el altar en derredor

20

 y  después  que  el  carnero  fue  cortado 

en trozos, Moisés hizo quemar la cabeza, 

los trozos y la grasa.

21

 Lavó en el agua las entrañas y las patas 

y enseguida Moisés hizo consumir todo el 

carnero sobre el altar. Fue un holocausto de 

olor que apacigua, sacrificio ígneo a YHVH, 

tal como YHVH había ordenado a Moisés.

22

 Seguidamente  hizo  aproximar  el  se-

gundo  carnero,  el  carnero  de  la  consa-

gración, y Aarón y sus hijos apoyaron sus 

manos sobre la cabeza del carnero,

7.34 

→Ex.29.24,27 Nota.  7.38 Esto es, Moisés.  8.8 Esto es, Luces.  8.8 Esto es, Perfecciones.  8.15 Esto es, uno de los sujetos 

del v. anterior. 

8.15 La traducción Moisés lo degolló es incorrecta. El que deguella es el mismo que impone sus manos sobre la 

cabeza del novillo 

→4.15 o el antecesor inmediato →8.14,18,22.  8.15 .restante.  8.19 →Nota 8.15.


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Levítico 8:23

112

23

 y uno lo degolló; luego Moisés° tomó 

la sangre y la puso en el lóbulo de la oreja 

derecha de Aarón, en el dedo pulgar de su 

mano derecha y en el dedo pulgar de su 

pie derecho.°

24

 Luego mandó a aproximarse a los hijos 

de Aarón, y Moisés aplicó de la sangre so-

bre el lóbulo de la oreja derecha de ellos, 

en el pulgar de la mano derecha de ellos 

y en el pulgar del pie derecho de ellos. La 

sangre  restante  la  roció  Moisés  sobre  el 

altar en derredor.

25

 Después tomó las partes grasas: la cola 

gorda, toda la grasa que hay sobre el in-

testino, la grasa del hígado, los dos riño-

nes con su grasa y la espaldilla derecha.

26

 Del canastillo de los ázimos que estaba 

ante YHVH, tomó una torta ázima, una tor-

ta de pan de aceite, y un hojaldre, los cuales 

colocó con la grasa y la espaldilla derecha.

27

 Lo puso todo sobre las palmas de Aarón 

y sobre las palmas de sus hijos, y lo meció 

como  ofrenda  mecida°  en  presencia  de 

YHVH.

28

 Luego Moisés lo tomó de las palmas de 

ellos y lo hizo quemar en el altar sobre el 

holocausto. Fue un sacrificio de investi-

dura de olor que apacigua, ofrenda ígnea 

a YHVH.

29

 Después  tomó  Moisés  el  pecho  y  lo 

meció  como  ofrenda  mecida  en  presen-

cia de YHVH. Es la porción de Moisés del 

carnero de la investidura, tal como YHVH 

había ordenado a Moisés.

30

 Luego  tomó  Moisés  del  aceite  de  la 

unción y de la sangre que había sobre el 

altar  y  los  roció  sobre  Aarón,  sobre  sus 

vestiduras, sobre sus hijos y sobre las ves-

tiduras de sus hijos. Así consagró a Aarón 

y sus vestiduras, y con él a sus hijos y las 

vestiduras de sus hijos.

31

 Dijo entonces Moisés a Aarón y a sus 

hijos:  Coced  la  carne  a  la  entrada  de  la 

Tienda de Reunión y comedla allí con el 

pan que hay en el canastillo de las ofren-

das de investidura, según ordené, dicien-

do: Aarón y sus hijos la comerán.

32

 Y lo que sobre de la carne y del pan lo 

quemaréis al fuego.

33

 Durante  siete  días  no  saldréis  por  la 

entrada de la Tienda de Reunión hasta el 

día en que se cumplan los días de vuestra 

investidura, pues se os investirá durante 

siete días,

34

 tal  como  se  ha  hecho  hoy.  Así  ha  or-

denado YHVH hacerlo para ofrecer expia-

ción por vosotros.

35

 En la entrada de la Tienda de Reunión 

permaneceréis día y noche por siete días, 

vigilando la ordenanza de YHVH para que 

no muráis, pues así me fue ordenado.

36

 Y  Aarón  y  sus  hijos  hicieron  todas 

las cosas que había ordenado YHVH por 

mano de Moisés.

Inauguración del ministerio sacerdotal

9

Llegado el día octavo, Moisés llamó a 

Aarón y a sus hijos, y a los ancianos 

de Israel,

2

 y dijo a Aarón: Toma un becerro en sa-

crificio  por  el  pecado  y  un  carnero  para 

holocausto, sin defecto, y hazlos aproxi-

mar ante YHVH.

3

 Y hablarás a los hijos de Israel, diciendo: 

Tomad, de entre las cabras, un macho ca-

brío para el sacrificio por el pecado, y un 

becerro y un cordero añales y sin defecto 

para el holocausto,

4

 y un novillo y un carnero para las ofren-

das de paz que inmolar ante YHVH, así una 

ofrenda  vegetal  amasada  con  aceite,  por-

que hoy YHVH se aparecerá a vosotros.

5

 Llevaron al frente de la Tienda de Reu-

nión lo que Moisés había ordenado, y toda 

la  asamblea  se  acercó,  y  permaneció  en 

pie ante la presencia de YHVH.

6

 Y  Moisés  dijo:  Esta  es  la  palabra  que 

YHVH ha ordenado que hagáis para que 

la gloria de YHVH se os aparezca.

7

 Luego Moisés dijo a Aarón: Acércate al 

altar, y prepara tu ofrenda por el pecado 

y tu holocausto, y haz expiación por ti y 

por el pueblo, y haz luego la ofrenda del 

pueblo, y ofrece expiación por él, tal como 

ordenó YHVH.

8

 Entonces Aarón se acercó al altar y de-

golló el becerro de la ofrenda por el peca-

do correspondiente a él mismo.

9

 Los hijos de Aarón le acercaron la san-

gre, y mojando su dedo en la sangre, tocó 

los cuernos del altar, y el resto de la san-

gre la derramó al pie del altar.

8.23 

→Nota 8.15.  8.23 →Ex.29.20.  8.27 →Ex.29.24.


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Levítico 10:12

113

10

 Después hizo quemar sobre el altar la 

grasa, los riñones y la grasa del hígado de 

la ofrenda por el pecado, tal como YHVH 

había ordenado a Moisés,

11

 pero la carne y la piel los quemó a fue-

go fuera del campamento.

12

 Seguidamente degolló el holocausto, y 

los hijos de Aarón le acercaron la sangre, 

la cual salpicó en derredor sobre el altar.

13

 Después  le  acercaron  el  holocausto, 

trozo por trozo con la cabeza, y los hizo 

quemar sobre el altar.

14

 Lavó también las entrañas y las patas 

y  los  hizo  quemar  con  el  holocausto  en 

el altar.

15

 Luego hizo acercar la ofrenda del pue-

blo, y tomando el macho cabrío del sacri-

ficio por el pecado del pueblo, lo degolló y, 

como el primero, lo ofreció por el pecado.

16

 Después ofreció el holocausto, e hizo 

según la ordenanza.

17

 Presentó asimismo la ofrenda vegetal, 

y llenando su mano, la hizo quemar so-

bre el altar, además del holocausto de la 

mañana.

18

 Después degolló el novillo y el carnero 

como sacrificio de ofrendas de paz por el 

pueblo.° Y los hijos de Aarón le acercaron 

la sangre, que él roció sobre el altar, en 

derredor.

19

 Y las grasas del novillo y del carnero: 

la cola gorda, la grasa que cubre las vísce-

ras, y los riñones, y la grasa del hígado,

20

 las pusieron con las grasas de los pe-

chos, e hizo consumir las grasas sobre el 

altar.

21

 Pero los pechos y la espaldilla derecha 

los  meció  Aarón  como  ofrenda  mecida 

ante la presencia de YHVH, tal como Moi-

sés había ordenado.

22

 Después  alzó  Aarón  sus  manos  hacia 

el  pueblo  y  los  bendijo,°  y  descendió  de 

sacrificar la ofrenda por el pecado, por el 

holocausto, y por las ofrendas de paz.

23

 Y Moisés entró con Aarón en la Tienda 

de  Reunión.  Cuando  salieron  y  bendije-

ron al pueblo, la gloria de YHVH apareció 

ante todo el pueblo.

24

 Y de la presencia de YHVH salió fuego 

y consumió el holocausto y la grasa que 

estaba sobre el altar. Al ver esto, todo el 

pueblo gritó de gozo y se postraron sobre 

sus rostros.

Pecado y castigo de Nadab y Abiú

10

Nadab  y  Abiú  hijos  de  Aarón,  to-

maron  cada  uno  su  incensario,  y 

después de poner en ellos fuego y echar 

incienso sobre él, ofrecieron en presencia 

de YHVH fuego extraño° que Él nunca les 

mandó.

2

 Y de la presencia de YHVH salió un fue-

go que los consumió y murieron en pre-

sencia de YHVH.°

3

 Entonces  dijo  Moisés  a  Aarón:  Esto  es 

lo  que  habló  YHVH,  diciendo:  Entre  los 

que se acercan a mí seré santificado, y en 

presencia de todo el pueblo seré reveren-

ciado. Y Aarón guardó silencio.

4

 Y llamó Moisés a Misael y a Elzafán, hijos 

de Uziel, tío de Aarón, y les dijo: Acercaos 

y  sacad  a  vuestros  hermanos  de  delante 

del Santuario, fuera del campamento.

5

 Y  ellos  se  acercaron  y  los  sacaron  con 

sus túnicas fuera del campamento, como 

Moisés había hablado.

6

 Entonces Moisés dijo a Aarón y a sus hi-

jos Eleazar e Itamar: No desgreñéis vues-

tras cabezas ni rasguéis vuestros vestidos, 

así no moriréis ni se irritará° contra toda 

la asamblea. Pero que vuestros hermanos, 

toda la casa de Israel, llore por el incendio 

que YHVH encendió.

7

 Y no saldréis por la entrada de la Tien-

da  de  Reunión  para  que  no  muráis,  por 

cuanto  el  aceite  de  la  unción  de  YHVH 

está sobre vosotros. Y ellos hicieron con-

forme a la palabra de Moisés.

8

 Habló YHVH a Aarón, diciendo:

9

 Cuando entréis en la Tienda de Reunión, 

tú, y tus hijos contigo, no beberéis vino ni 

licor fuerte, para que no muráis. Es esta-

tuto perpetuo por vuestras generaciones,

10

 para poder distinguir entre lo santo y lo 

profano, y entre lo inmundo y lo limpio,

11

 y para enseñar a los hijos de Israel to-

dos los estatutos que YHVH les ha habla-

do por medio de Moisés.

12

 Entonces Moisés dijo a Aarón y a sus hi-

jos que habían quedado, Eleazar e Itamar: 

9.18 

→Lv. 3.1-11  9.22 →Nm.6.22-26.  10.1 Heb. zarah, de la raíz zur que además significa desviarse, apartarse.  10.2 Por el 

contexto 

→vv. 8, 9 y 10, prob. Nadab y Abiú cometieron este acto de desobediencia en estado de ebriedad.  10.6 Esto es, YHVH.


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Levítico 10:13

114

Tomad la ofrenda vegetal sobrante de las 

ofrendas ígneas a YHVH y comedla sin le-

vadura junto al altar. Es cosa santísima.

13

 La comeréis en un lugar santo, porque 

es tu estatuto y el estatuto de tus hijos de 

las ofrendas ígneas a YHVH, pues así me 

ha sido ordenado.°

14

 Y el pecho que es mecido y la espaldi-

lla que es alzada los comeréis en un lugar 

limpio, tú y tus hijos e hijas contigo, pues 

es tu estatuto y el estatuto de tus hijos, 

adjudicados de los sacrificios de las ofren-

das de paz de los hijos de Israel.

15

 Con las ofrendas de las grasas que se 

han de quemar, llevarán la espaldilla que 

será  alzada  y  el  pecho  que  será  mecido 

como  ofrenda  mecida  en  presencia  de 

YHVH. Y será para ti y para tus hijos un 

estatuto perpetuo, como YHVH lo ha or-

denado.°

16

 Moisés  buscó  con  empeño  el  macho 

cabrío de la ofrenda por  el  pecado,  y he 

aquí ya había sido quemado. Entonces es-

talló en ira contra Eleazar e Itamar (los 

hijos que le quedaban a Aarón), diciendo:

17

 ¿Por qué no comisteis la ofrenda por el 

pecado en lugar sagrado?° Es cosa santí-

sima, y os ha sido dada para cargar con la 

iniquidad de la asamblea, para hacer ex-

piación por ellos delante de YHVH.

18

 He  aquí,  su  sangre  no  ha  sido  traída 

aún  al  interior  del  Santuario,  por  tanto 

vosotros debisteis haberla° comido en el 

lugar santo, según os mandé.

19

 Entonces  Aarón  respondió  a  Moisés: 

Si el día que han presentado su ofrenda 

por el pecado y su holocausto delante de 

YHVH me ha sucedido esto, ¿hubiera sido 

acepto a YHVH si hubiera comido hoy la 

víctima expiatoria?

20

 Y Moisés quedó satisfecho con la res-

puesta.

Animales inmundos y animales puros

11

Habló  YHVH  a  Moisés  y  a  Aarón, 

diciéndoles:

2

 Hablad a los hijos de Israel y decidles: 

Estos son los animales que podéis comer 

de entre los animales que hay sobre la tie-

rra:

3

 Comeréis cualquiera que entre los ani-

males  tenga  pezuña  hendida  y  sea  ru-

miante.

4

 Sin embargo, de los que rumian o tienen 

pezuña hendida, no comeréis éstos: el ca-

mello, porque rumia, pero no tiene pezuña 

hendida, será inmundo para vosotros.

5

 El conejo, porque rumia, pero no tiene 

pezuña  hendida,  será  inmundo  para  vo-

sotros.

6

 Y la liebre, porque rumia, pero no tiene 

pezuña  hendida,  será  impura  para  voso-

tros.

7

 También el cerdo, aunque tiene pezuña 

y  es  de  pezuña  hendida,  no  rumia,  será 

inmundo para vosotros.

8

 De su carne no comeréis ni tocaréis sus 

cadáveres. Son inmundos para vosotros.

9

 De todos los que están en las aguas, és-

tos podéis comer: todo lo que haya en los 

mares y en los ríos con aletas y escamas, 

eso comeréis.

10

 Pero todo lo que hay en los mares y en 

los ríos que no tenga aletas ni escamas, 

sea reptil o cualquier animal acuático, os 

serán abominación.°

11

 Serán abominación para vosotros. De 

su carne no comeréis y de sus cadáveres 

tendréis repulsión.

12

 Todo lo que hay en las aguas y no ten-

ga aletas y escamas os será abominación.

13

 En  cuanto  a  las  aves,  tendréis  repul-

sión de las siguientes, que no se comerán 

y serán abominación: el águila, el buitre 

quebrantahuesos, el zopilote,°

14

 el gallinazo, el milano, según su espe-

cie,

15

 todo cuervo, según su especie,

16

 el  avestruz,  la  lechuza,  la  gaviota,  el 

gavilán, según su especie,

17

 el búho, el cormorán y el ibis,°

18

 el cisne, el pelícano, el buitre,

19

 la cigüeña, la garza, según su especie, 

la abubilla y el murciélago.

20

 Será  abominación  para  vosotros  todo 

insecto alado que ande a cuatro patas.

10.12-13 

→Lv.6.14-18.  10.14-15 →Lv.7.30-34.  10.17 →Lv.6.24-26.  10.18 Esto es, la ofrenda, la víctima.  11.10 Heb. she-

quets = repugnante, asqueroso

11.13 Especie de buitre de menor tamaño y de color negro.  11.17 Ave que vive principalmente 

de moluscos fluviales. Los antiguos egipcios creían que se alimentaba de los reptiles que infestan el país después de las inun-

daciones periódicas del Nilo, y por ello la veneraban. 


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Levítico 11:47

115

21

 Sin embargo, de entre los insectos ala-

dos que anden sobre cuatro patas, podréis 

comer el que además de sus patas delan-

teras, tenga patas traseras para saltar con 

ellas sobre la tierra.

22

 De  ellos  podréis  comer:  la  langosta, 

según  su  especie,  el  grillo,  según  su  es-

pecie, la chicharra, según su especie y el 

saltamontes, según su especie.

23

 Pero todo insecto alado que tenga cua-

tro patas, es abominación para vosotros,

24

 y  por  éstos  llegaréis  a  ser  impuros. 

Cualquiera que toque sus cadáveres, será 

impuro hasta la tarde.

25

 Y  cualquiera  que  lleve  cualquier  par-

te de sus cadáveres, lavará sus vestidos y 

será impuro hasta la tarde.

26

 Tendréis por inmundo todo animal de 

pezuña que no tenga pezuña hendida ni 

rumie,  y  todo  el  que  los  toque  será  im-

puro.

27

 De todos los animales que andan con 

cuatro patas, tendréis por inmundo todo 

el que ande sobre sus garras. Cualquiera 

que toque sus cuerpos muertos será im-

puro hasta la tarde.

28

 Y el que recoja sus cadáveres se lavará 

los vestidos, y será impuro hasta la tarde. 

Serán impuros para vosotros.

29

 Y  entre  el  pulular  de  los  que  bullen 

sobre la tierra tendréis por inmundos és-

tos: el topo, el ratón y la tortuga, según 

su especie,

30

 el erizo, el lagarto, el caracol, la babo-

sa, y el camaleón.

31

 Éstos son inmundos para vosotros en-

tre todos los que pululan. Cualquiera que 

los toque cuando estén muertos, será im-

puro hasta la tarde.

32

 También  será  inmundo  todo  aquello 

sobre lo cual caiga uno de éstos después 

de  muerto,  sea  un  objeto  de  madera,  o 

ropa, o piel, o saco, o cualquier utensilio 

usado para cualquier actividad, se meterá 

en  agua  y  será  inmundo  hasta  la  tarde, 

después será puro.

33

 Y si alguno de ellos cae dentro de cual-

quier vasija de barro, todo lo que esté en 

ella será inmundo, y la quebraréis.

34

 Cualquier alimento que se coma sobre 

el cual haya caído agua de tal vasija, será 

inmundo, y todo líquido que se beba en 

tal vasija, será impuro.

35

 Será  impura  cualquier  cosa  sobre  la 

cual caiga uno de sus cadáveres. Horno y 

fogones serán destruidos, son inmundos 

y serán inmundos para vosotros.

36

 Serán  puras  las  fuentes,  cisternas  y 

depósitos de agua, pero lo que toque un 

cadáver será inmundo.

37

 Y  si  cualquier  parte  de  sus  cadáveres 

cae sobre cualquier semilla para siembra 

que se ha de sembrar, será limpia.

38

 Pero si se ha echado agua en la semi-

lla, y uno de sus cadáveres cae sobre ella, 

os será impura.

39

 Si muere cualquier animal del cual po-

déis comer, el que toque su cadáver será 

impuro hasta la tarde.

40

 El que coma de su cadáver lavará sus 

vestidos, y será impuro hasta la tarde, y el 

que recoja el cadáver lavará sus vestidos, 

y será impuro hasta la tarde.

41

 Tampoco se comerá de los que bullen 

sobre la tierra. Es abominación.

42

 De todo reptil que se arrastra sobre la 

tierra: cualquiera que se mueva sobre su 

vientre, y cualquiera que ande en cuatro 

patas,  o  cualquiera  que  tenga  muchos 

pies, no comeréis, porque son abomina-

ción.

43

 No hagáis abominables vuestras almas 

por  cualquier  animal  que  se  arrastra  ni 

os contaminéis con ellos, para que no lle-

guéis a ser impuros,

44

 porque Yo soy YHVH vuestro Dios. Vo-

sotros, por tanto, os santificaréis y seréis 

santos, porque Yo soy santo,° así que no 

os  contaminaréis  con  ningún  reptil  que 

se arrastra sobre la tierra,

45

 porque Yo soy YHVH, que os hice su-

bir de la tierra de Egipto para ser vuestro 

Dios. Sed, por tanto, santos porque Yo soy 

santo.

46

 Esta es la ley de los animales y de las 

aves, y de todo ser viviente que se mueve 

en las aguas, y de todo animal que bulle 

sobre la tierra,

47

 para hacer separación entre lo impuro 

y lo limpio, y entre los seres vivos que se 

pueden comer y los seres vivos que no se 

pueden comer.

11.44 

→Lv.19.2; 1 P.1.16.


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Levítico 12:1

116

La purificación después del parto

12

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel dicien-

do:  Cuando  una  mujer  dé  a  luz  y  tenga 

varón, quedará impura por siete días; será 

impura como en los días de su menstrua-

ción.

3

 Y al octavo día será circuncidada la car-

ne del prepucio de su hijo.°

4

 Y  ella  permanecerá  treinta  y  tres  días 

en la purificación de su sangre, no toca-

rá nada que sea santo, ni irá al Santuario 

hasta que se cumplan los días de su puri-

ficación.

5

 Pero si da a luz una hembra, entonces 

estará impura dos semanas, como en su 

menstruación,  y  permanecerá  sesenta  y 

seis días purificándose de su sangre.

6

 Cuando se cumplan los días de su purifi-

cación, por hijo o por hija, llevará un cor-

dero añal para el holocausto y un pichón 

de  paloma  o  una  tórtola  como  ofrenda 

por el pecado a la entrada de la Tienda de 

Reunión, al sacerdote,

7

 el  cual  lo  presentará  delante  de  YHVH 

haciendo expiación por ella y purificándola 

del flujo de su sangre. Esta es la ley sobre 

la que da a luz un varón o una hembra.

8

 Y si su mano no tiene lo suficiente para 

un cordero, tomará entonces dos tórtolas 

o dos palominos,° uno para holocausto y 

otro para ofrenda por el pecado, y el sa-

cerdote hará expiación por ella, y quedará 

limpia.

Ley sobre la lepra

13

Habló  YHVH  a  Moisés  y  a  Aarón, 

diciendo:

2

 Cuando un hombre tenga en la piel de 

su carne hinchazón, o erupción, o man-

cha blanca, y se convierta en llaga de le-

pra en la piel de su carne, será llevado al 

sacerdote Aarón, o a uno de sus hijos los 

sacerdotes.

3

 Y el sacerdote examinará la llaga en la 

piel de la carne: si el vello que hay en la 

llaga se ha vuelto blanco, y la llaga apare-

ce más hundida que la piel de su carne, es 

llaga de lepra. El sacerdote lo reconocerá 

y lo declarará inmundo.

4

 Mas  si  en  la  piel  de  su  carne  hay  una 

mancha blanca, pero no parece más hun-

dida que la piel, ni su vello se ha vuelto 

blanco,  el  sacerdote  hará  que  el  llagado 

sea recluido durante siete días.

5

 Al séptimo día el sacerdote lo examina-

rá, y he aquí, si ante sus ojos la llaga ha 

permanecido estacionaria, sin extenderse 

la llaga en la piel, el sacerdote lo volverá a 

hacer recluir por otros siete días.

6

 Al séptimo día el sacerdote lo examinará 

de nuevo, y si, he aquí, la llaga se ha os-

curecido° y no se ha esparcido en la piel, 

el  sacerdote  lo  declarará  limpio:  es  una 

erupción. Lavará entonces sus vestidos y 

quedará limpio.

7

 Pero si indudablemente la erupción se 

ha esparcido en la piel, después de mos-

trársela al sacerdote para su purificación, 

entonces  comparecerá  por  segunda  vez 

ante el sacerdote.

8

 El sacerdote le hará un examen, y si la 

erupción se ha esparcido en la piel, el sa-

cerdote lo declarará inmundo: es lepra.

9

 Cuando haya llaga de lepra en un hom-

bre, será llevado al sacerdote,

10

 y  el  sacerdote  lo  examinará,  y  si,  he 

aquí, hay hinchazón blanca en la piel, y 

el vello se ha vuelto blanco y se descubre 

la carne viva,

11

 es lepra crónica en la piel de su carne. 

El sacerdote lo declarará inmundo. No lo 

hará recluir, puesto que está inmundo.

12

 Pero  si  la  lepra  brota  mucho  y  cubre 

toda la piel del infectado, desde su cabeza 

hasta sus pies, a plena vista del sacerdote,

13

 entonces el sacerdote observará, y si la 

lepra ha cubierto toda su carne, declarará 

limpio  al  llagado;  toda  ella  se  ha  vuelto 

blanca, y él es limpio;

14

 pero el día que se muestre en él carne 

viva, entonces será impuro.

15

 El sacerdote examinará la carne viva, y 

lo declarará impuro. La carne viva es im-

pura, es lepra.

16

 Pero si la carne viva llegara a cambiar, 

y  se  torna  blanca,  entonces  irá  al  sacer-

dote,

17

 y  el  sacerdote  lo  examinará,  y  si  la 

llaga  se  ha  tornado  blanca,  entonces  el 

12.3 .su hijo

→Gn.17.12.  12.8 →Lc.2.24.  13.6 Lit. debilitado.


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Levítico 13:44

117

sacerdote declarará puro al llagado: está 

limpio.

18

 Cuando un cuerpo tenga una úlcera en 

su piel que se ha sanado,

19

 pero surge en el lugar de la úlcera una 

hinchazón blanca o una mancha lustrosa 

blanca rojiza, entonces será presentada al 

sacerdote.

20

 El sacerdote la examinará, y he aquí, si 

parece más hundida que la piel y el vello 

se ha vuelto blanco, entonces el sacerdote 

lo declarará impuro: es llaga de lepra que 

ha brotado en la úlcera.

21

 Pero  si  el  sacerdote  la  examina,  y  he 

aquí, no hay en ella vello blanco ni está 

más hundida que la piel, y ha perdido co-

lor, entonces el sacerdote lo hará recluir 

siete días,

22

 y  si  se  esparce  mucho  en  la  piel,  el 

sacerdote  lo  declarará  impuro:  es  infec-

ción.

23

 Pero si la mancha lustrosa se mantie-

ne  fija  y  no  se  esparce,  es  cicatriz  de  la 

úlcera, y el sacerdote lo declarará limpio.

24

 O si la carne tiene en su piel una que-

madura de fuego, y en lo vivo de la que-

madura  tiene  una  mancha  blanquecina, 

rojiza, o blanca,

25

 el  sacerdote  la  examinará,  y  si  el  ve-

llo que hay en la mancha lustrosa se ha 

vuelto blanco, y parece estar más hundida 

que la piel, es lepra que ha brotado en la 

quemadura. El sacerdote lo declarará im-

puro: es llaga de lepra.

26

 Pero  si  el  sacerdote  la  observa,  y  he 

aquí no aparece vello blanco en la man-

cha lustrosa, ni está más hundida que la 

piel sino que ha palidecido, el sacerdote 

lo hará recluir siete días.

27

 Al séptimo día el sacerdote lo examina-

rá. Si se ha esparcido considerablemente 

por la piel, el sacerdote lo declarará impu-

ro: es llaga de lepra.

28

 Pero  si  la  mancha  lustrosa  se  queda 

fija, no se ha esparcido por la piel, y ha 

perdido  color,  es  hinchazón  de  la  que-

madura. El sacerdote lo declarará limpio 

porque es la costra de la quemadura.

29

 Cuando un hombre o una mujer tenga 

una llaga en la cabeza o en la barbilla,

30

 el  sacerdote  examinará  la  llaga,  y  si 

parece más hundida que la piel y el vello 

de ella es amarillento y delgado, entonces 

el sacerdote lo declarará impuro. Es tiña: 

una lepra de la cabeza o de la barbilla.

31

 Pero si el sacerdote examina la infec-

ción de la tiña, y he aquí, no parece más 

hundida que la piel, y no hay en ella vello 

negro, el sacerdote hará recluir al infecta-

do de la tiña siete días.

32

 Al séptimo día el sacerdote examinará 

la infección, y si he aquí la tiña no se ha 

esparcido, ni hay en ella pelo amarillen-

to, ni la tiña parece más profunda que la 

piel,

33

 se afeitará (pero no se afeitará la tiña), 

y el sacerdote hará recluir al tiñoso siete 

días más.

34

 Al séptimo día el sacerdote examinará 

la tiña, y si, he aquí, la tiña no se ha espar-

cido por la piel, ni parece más hundida que 

la piel, entonces el sacerdote lo declarará 

limpio. Lavará sus vestidos y será limpio.

35

 Pero si, después de su purificación, cier-

tamente la tiña se ha extendido en la piel,

36

 entonces el sacerdote lo examinará, y 

si  he  aquí,  la  tiña  se  ha  extendido  en  la 

piel, el sacerdote no tendrá que buscar el 

pelo amarillento: es impuro.

37

 Pero si a su parecer la tiña está deteni-

da y ha crecido en ella vello negro, la tiña 

está sanada. Está limpio, y el sacerdote lo 

declarará limpio.

38

 Cuando un hombre o una mujer tenga 

en la piel de su carne manchas lustrosas, 

manchas lustrosas blanquecinas,

39

 el  sacerdote  lo  examinará;  y  si  en  la 

piel de su carne hay manchas blancuzcas 

algo oscuras, es un herpes que brotó en la 

piel: él está limpio.

40

 Cuando a un varón se le cae el pelo de 

su cabeza, calvo es, pero limpio.

41

 Asimismo, si se le cae por delante de su 

cabeza, calvo es de la frente, pero limpio.

42

 Pero si en la calva de la coronilla, o en 

la calva de la frente hay una llaga blanca 

rojiza,  es  lepra  que  está  brotando  en  su 

coronilla o en su frente calva.

43

 Entonces  el  sacerdote  lo  examinará, 

y si la hinchazón de la llaga blanca roji-

za de su coronilla o de su frente calva es 

como el aspecto de la lepra en la piel de 

la carne,

44

 él es un hombre leproso, está impuro. 

El sacerdote lo declarará impuro: tiene la 

llaga en su cabeza.


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Levítico 13:45

118

45

 Los  vestidos  del  leproso  que  tenga  la 

llaga estarán rasgados y su cabeza desgre-

ñada. Se tapará hasta el bigote y pregona-

rá: ¡Impuro! ¡Impuro!

46

 Permanecerá  impuro  todo  el  tiempo 

que tenga la llaga. Siendo impuro, mora-

rá solo. Su morada estará fuera del cam-

pamento.

47

 Cuando haya infección de lepra en la 

ropa, sea ropa de lana o ropa de lino,

48

 en tejido o en punto, sea de lino o de 

lana, en cuero o en cualquier objeto he-

cho de cuero,

49

 y la mancha se muestra verdosa o roji-

za, sea en vestido, o en cuero, o en tejido, 

o en punto, o en cualquier objeto hecho 

de cuero, es infección de lepra, y se ha de 

mostrar al sacerdote.

50

 El  sacerdote  observará  la  infección 

y  hará  aislar  lo  infectado  durante  siete 

días.

51

 Al séptimo día observará la infección, 

y  si  la  infección  se  ha  esparcido  por  el 

vestido, o por el tejido, o por el punto, o 

por el cuero, cualquiera que sea el uso del 

cuero, la infección es una lepra maligna. 

Es impuro.

52

 Y quemará el vestido o el tejido, o el 

punto de lana o de lino, o cualquier ob-

jeto  de  cuero  infectado,  porque  es  lepra 

maligna. Se quemará al fuego.

53

 Pero  si  el  sacerdote  lo  examina  y  he 

aquí la infección no se ha extendido en el 

vestido, o el tejido, o el punto, o en cual-

quier objeto de cuero,

54

 el sacerdote ordenará que laven lo que 

tiene  la  infección,  y  lo  hará  aislar  siete 

días más.

55

 Después  que  el  objeto  infectado  haya 

sido lavado, el sacerdote lo examinará, y 

si he aquí la mancha no ha cambiado ante 

sus ojos, aunque no se haya extendido, es 

impuro.  Ya  sea  que  esté  corroído  por  el 

derecho o por el revés, lo quemarás en el 

fuego.

56

 Pero  si  el  sacerdote  lo  examina,  y  he 

aquí la mancha se ha debilitado después 

de ser lavada, la cortará del vestido, o del 

cuero, o del tejido, o del punto.

57

 Pero  si  reaparece  en  el  vestido  o  en 

el  tejido,  o  en  el  punto,  o  en  cualquier 

objeto de cuero, se está esparciendo. Que-

marás al fuego aquello en lo cual está la 

infección.

58

 El vestido, o tejido, o el punto, o cual-

quier objeto de cuero que hayas lavado y 

la  mancha  haya  sido  removida  de  ellos, 

entonces será lavado por segunda vez, y 

quedará limpio.

59

 Esta es la ley acerca de la mancha de 

la lepra en un vestido de lana, o de lino, 

bien sea en tejido o trama, o en cualquier 

objeto de cuero, para declararlo limpio o 

para declararlo impuro.

Purificación del leproso

14

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Esta será la ley para el leproso el 

día de su purificación: Será traído al sa-

cerdote.

3

 El sacerdote saldrá fuera del campamen-

to, y si al examinarlo el sacerdote, he aquí 

la llaga de lepra del leproso ha sido sanada,

4

 el sacerdote ordenará que se tomen dos 

avecillas vivas limpias y madera de cedro, 

púrpura e hisopo para el que se purifica.

5

 Luego el sacerdote ordenará que se de-

güelle la primera avecilla en una vasija de 

barro sobre aguas vivas.°

6

 Tomará  la  avecilla  viva,  con  el  palo  de 

cedro, la púrpura y el hisopo, y los sumer-

girá con la avecilla viva en la sangre de la 

avecilla degollada, sobre las aguas vivas,

7

 y rociará siete veces sobre el que se pu-

rifica  de  la  lepra  y  lo  declarará  limpio. 

Luego dejará ir a la avecilla viva sobre la 

faz del campo.

8

 El  que  se  purifica  lavará  sus  vestidos, 

rasurará  todo  su  cabello,  se  bañará  con 

agua, y quedará limpio. Después entrará 

en  el  campamento,  pero  permanecerá 

fuera de su tienda siete días.

9

 Al séptimo día rasurará todo su cabello: 

de su cabeza, de su barba y de sus cejas, es 

decir, rasurará todo su cabello, lavará sus 

vestidos, y bañará su cuerpo con agua, y 

quedará limpio.

10

 Al octavo día tomará dos corderos sin 

defecto y una cordera perfecta de un año, 

tres  décimas  de  flor  de  harina  amasada 

con  aceite  para  la  ofrenda  vegetal  y  un 

log° de aceite.

14.5 Esto es, aguas corrientes.  14.10 Medida de capacidad de un poco más de un cuarto de litro. 


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Levítico 14:33

119

11

 Y  el  sacerdote  que  purifica  hará  po-

ner en pie ante la presencia de YHVH al 

hombre que es purificado, junto con es-

tas  cosas,  en  la  entrada  de  la  Tienda  de 

Reunión.

12

 Luego el sacerdote tomará uno de los 

corderos,  y  lo  presentará  como  ofrenda 

por  la  culpa,  con  el  log  de  aceite,  y  los 

mecerá como ofrenda mecida ante la pre-

sencia de YHVH.

13

 Enseguida degollará° el cordero en el 

lugar donde se degüella el sacrificio por 

el pecado y el holocausto, en el lugar del 

Santuario, pues la ofrenda por el pecado, 

al igual que la ofrenda por la culpa, perte-

nece al sacerdote. Es cosa santísima.

14

 El sacerdote tomará de la sangre de la 

ofrenda por la culpa, y untará el lóbulo de 

la oreja derecha del que ha sido purifica-

do, y el pulgar de su mano derecha, y el 

pulgar de su pie derecho.

15

 El sacerdote tomará del log de aceite y 

lo verterá sobre su propia palma izquier-

da.

16

 Luego el sacerdote mojará su dedo de-

recho en el aceite que tiene en su palma 

izquierda,  y  con  su  dedo  hará  aspersión 

de aceite siete veces delante de YHVH.

17

 Del resto del aceite que está en su pal-

ma, el sacerdote untará una parte sobre 

el  lóbulo  de  la  oreja  derecha  del  que  se 

purifica, el pulgar de su mano derecha y 

el pulgar de su pie derecho, por encima 

de la sangre de la ofrenda por la culpa.

18

 El resto del aceite que está en la palma 

del sacerdote lo pondrá en la cabeza del 

que se purifica, y el sacerdote hará expia-

ción a favor de él en presencia de YHVH.

19

 Luego el sacerdote preparará la ofren-

da por el pecado y hará expiación por el 

que  se  purifica  de  su  impureza,  el  cual 

después degollará el holocausto.

20

 Y el sacerdote hará subir el holocausto 

y la ofrenda vegetal sobre el altar. Así el 

sacerdote hará expiación por él, y quedará 

limpio.

21

 Pero si es pobre, y su mano no alcanza 

a tanto, entonces tomará un cordero para 

ser  mecido  como  ofrenda  por  la  culpa, 

para hacer expiación a favor de él, y una 

décima de efa de flor de harina, amasada 

con aceite, como ofrenda vegetal, y un log 

de aceite.

22

 También dos tórtolas o dos palominos, 

según  alcance  su  mano.  Uno  será  para 

expiación  por  el  pecado  y  otro  para  ho-

locausto.

23

 Al  octavo  día  los  hará  llevar  al  sacer-

dote para su purificación a la entrada de 

la  Tienda  de  Reunión,  en  presencia  de 

YHVH.

24

 Y el sacerdote tomará el cordero de la 

ofrenda  por  la  culpa,  y  el  log  de  aceite, 

y  los  mecerá  el  sacerdote  como  ofrenda 

mecida en presencia de YHVH.

25

 Después  degollará°  el  cordero  del  sa-

crificio por la culpa, y el sacerdote tomará 

de la sangre de la expiación y untará en el 

lóbulo de la oreja derecha del que ha sido 

purificado, y en el pulgar de su mano de-

recha y en el pulgar de su pie derecho.

26

 Y el sacerdote echará del aceite sobre 

su propia palma izquierda,

27

 y  con  su  dedo  derecho  el  sacerdote 

hará aspersión del aceite que tiene en su 

palma izquierda siete veces ante YHVH.

28

 Luego  el  sacerdote  aplicará  parte  del 

aceite que tiene en su palma sobre el ló-

bulo de la oreja derecha del que ha sido 

purificado,  sobre  el  pulgar  de  su  mano 

derecha y sobre el pulgar de su pie dere-

cho,  encima  del  lugar  donde  se  puso  la 

sangre de la ofrenda por la culpa.

29

 Y el resto del aceite que está sobre la 

palma  del  sacerdote,  lo  pondrá  sobre  la 

cabeza  del  que  ha  sido  purificado,  para 

hacer expiación a favor de él en presencia 

de YHVH.

30

 Asimismo  ofrecerá  la  primera  de  las 

tórtolas o de los palominos, de lo que al-

cance su mano.

31

 La primera víctima, según alcance su 

mano, en ofrenda por el pecado, y la otra 

como  holocausto,  junto  con  la  ofrenda 

vegetal.  Y  el  sacerdote  hará  expiación  a 

favor del que ha sido purificado, en pre-

sencia de YHVH.

32

 Esta es la ley para el que haya tenido 

llaga de lepra y que su mano no alcance a 

tanto para su purificación.

33

 YHVH  habló  a  Moisés  y  a  Aarón,  di-

ciendo:

14.13 Esto es, el que es purificado.  14.25 Esto es, el oferente


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Levítico 14:34

120

34

 Cuando entréis en la tierra de Canaán, 

la cual Yo os doy en propiedad, y Yo pon-

ga una llaga de lepra en alguna casa de la 

tierra de vuestra propiedad,

35

 aquel de quien es la casa irá a dar avi-

so al sacerdote, diciendo: Algo como una 

plaga hay en mi casa.

36

 Entonces  el  sacerdote  ordenará  des-

ocupar la casa antes de que entre a mirar 

la infección, para que no sea contamina-

do todo lo que esté en la casa; después el 

sacerdote entrará a examinarla.

37

 Observará la mancha, y si, he aquí, hay 

infección en las paredes de la casa, man-

chas verdosas o rojizas que parezcan más 

hundidas que la pared,

38

 el  sacerdote  saldrá  a  la  puerta  de  la 

casa y hará cerrar la casa por siete días.

39

 Al séptimo día, el sacerdote volverá y 

observará, y he aquí, si la infección se ha 

extendido por las paredes de la casa,

40

 el sacerdote ordenará que arranquen las 

piedras que tengan la infección, y las echa-

rán fuera de la ciudad en un lugar impuro.

41

 Después  hará  raspar  la  casa  por  den-

tro en su alrededor, y el polvo que raspen 

lo echarán fuera de la ciudad en un lugar 

impuro.

42

 Luego tomarán otras piedras y las pon-

drán en lugar de las piedras quitadas, y se 

tomará otra mezcla para revocar la casa.

43

 Pero  si,  después  de  haber  arrancado 

las piedras y raspado y revocado la casa, la 

infección irrumpe otra vez en la casa,

44

 el sacerdote observará, y he aquí, si la 

mancha se ha extendido por la casa, hay 

lepra maligna en la casa: está impura.

45

 Inmediatamente derribará la casa con 

sus piedras, sus maderos y todo el polvo 

de la casa, y lo sacará fuera de la ciudad a 

un lugar impuro.

46

 El que entre en la casa durante los días 

en que estuvo cerrada, será impuro hasta 

la tarde.

47

 Y  el  que  se  acueste  en  aquella  casa, 

lavará  sus  vestidos,  y  el  que  coma  en  la 

casa, lavará sus vestidos.

48

 Pero si el sacerdote entra y observa, y 

he  aquí,  en  verdad  la  infección  no  se  ha 

extendido por la casa después que fue re-

cubierta,  el  sacerdote  declarará  limpia  la 

casa, pues la infección ha desaparecido.°

49

 Para  purificar  la  casa,  tomará°  dos 

avecillas, y madera de cedro, escarlata e 

hisopo,

50

 y degollará una de las avecillas en una 

vasija de barro, sobre aguas vivas.

51

 Tomará la madera de cedro, el hisopo 

y la escarlata, junto con la avecilla viva, y 

los sumergirá en la sangre de la avecilla 

muerta y en las aguas vivas, y rociará la 

casa siete veces.

52

 Así purificará la casa con la sangre de 

la avecilla, y con las aguas vivas y con la 

avecilla viva, con la madera de cedro, con 

el hisopo y la escarlata.

53

 Luego dejará ir la avecilla viva fuera de 

la ciudad sobre la faz del campo. Así hará 

expiación por la casa, y será limpia.

54

 Esta es la ley acerca de cualquier infec-

ción de lepra y de tiña,

55

 de la lepra del vestido y de la casa,

56

 acerca de la hinchazón, de la costra y 

las manchas blancas lustrosas,

57

 para instruir cuándo es impuro y cuán-

do es limpio. Esta es la ley sobre la lepra.

Impurezas sexuales

15

Habló YHVH a Moisés y a Aarón, y 

les dijo:

2

 Hablad a los hijos de Israel y decidles: 

Cualquier  varón,  cuando  emita  flujo  se-

minal° de su miembro viril, será impuro 

a causa de su flujo.

3

 Ésta será la norma sobre la impureza del 

varón° por su flujo, sea que su miembro 

emita su flujo o que esté obstruido por su 

flujo, él tendrá su impureza.

4

 Cualquier lecho en que se acueste quien 

padezca  gonorrea,  será  impuro,  y  todo 

aquello  sobre  lo  cual  se  siente,  impuro 

quedará.

5

 Cualquiera  que  toque  su  lecho,  habrá 

de lavar sus vestidos, se bañará en agua y 

será impuro hasta la tarde.

6

 Cualquiera que se siente sobre cualquier 

objeto en que se haya sentado el que pa-

dece gonorrea, deberá lavar sus vestidos, 

se bañará en agua y permanecerá impuro 

hasta la tarde.

14.48 Lit. fue sanada.  14.49 Esto es, el dueño de casa.  15.2 Esto es, secreción mucosa de la uretra producida por enfermeda-

des venéreas, tal como gonorrea

→v.7.  15.3 .varón.


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Levítico 15:31

121

7

 Asimismo,  cualquiera  que  toque  el 

cuerpo del que padece gonorrea,° lavará 

sus vestidos, se bañará en agua y quedará 

impuro hasta la tarde.

8

 Y si el que tiene gonorrea escupe sobre 

el  que  está  limpio,  entonces  éste  lavará 

sus vestidos, se bañará en agua y quedará 

impuro hasta la tarde.

9

 Cualquier montura sobre la que cabal-

gue el que tiene gonorrea, será impura.

10

 Y cualquiera que toque cualquier cosa 

que haya estado debajo de él, será impu-

ro hasta la tarde, y el que la transporte, 

lavará  sus  vestidos,  se  bañará  en  agua  y 

quedará impuro hasta la tarde.

11

 Todo aquel a quien toque el que tiene 

gonorrea  sin  haberse  lavado  las  manos 

en  agua,  habrá  de  lavar  sus  vestidos,  se 

bañará  en  agua  y  quedará  impuro  hasta 

la tarde.

12

 La vasija de barro que toque quien pa-

dece gonorrea, será quebrada, pero todo 

utensilio  de  madera  se  enjuagará  con 

agua.

13

 Cuando  el  que  padece  gonorrea  haya 

sido limpiado de su flujo, él mismo conta-

rá siete días desde su purificación, lavará 

sus vestidos y bañará su cuerpo en aguas 

corrientes, y quedará limpio.

14

 Al octavo día tomará dos tórtolas o dos 

palominos, y comparecerá ante YHVH, a 

la entrada de la Tienda de Reunión, y los 

entregará al sacerdote.

15

 El sacerdote los ofrecerá, el uno como 

ofrenda por el pecado y el otro como ho-

locausto. Así el sacerdote hará expiación 

por él delante de YHVH a causa de su flu-

jo.

16

 El  varón  que  tenga  espermatorrea,° 

lavará en agua todo su cuerpo° y perma-

necerá impuro hasta la tarde.

17

 Cualquier vestido o cuero sobre el cual 

haya  caído  semen,  se  lavará  con  agua  y 

será impuro hasta la tarde.

18

 Si un varón se acuesta con una mujer 

y hay efusión seminal, ambos se lavarán 

con agua y serán impuros hasta la tarde.

19

 Cuando una mujer tenga flujo de san-

gre, que sea el flujo regular de su cuerpo, 

permanecerá  siete  días  en  su  impureza 

legal, y cualquiera que la toque será im-

puro hasta la tarde.

20

 Todo aquello sobre que se acueste du-

rante  su  impureza,  será  impuro,  y  todo 

aquello  encima  de  lo  cual  se  siente  im-

puro será.

21

 Cualquiera que toque el lecho de ella, 

lavará  sus  vestidos,  se  bañará  en  agua  y 

quedará impuro hasta la tarde.

22

 Asimismo todo el que toque cualquier 

objeto sobre el cual ella se haya sentado, 

deberá  lavar  sus  vestidos,  se  bañará  en 

agua y quedará impuro hasta la tarde.

23

 Y si hubiere alguna cosa encima del le-

cho o encima del objeto sobre el cual ella 

se  haya  sentado,  al  tocarlo  uno  quedará 

impuro hasta la tarde.

24

 Si un hombre yace con ella aun así, y 

su menstruo se vierte sobre él, será impu-

ro por siete días, y toda cama sobre la que 

él se acueste será impura.

25

 Y si una mujer padece flujo de sangre 

por  muchos  días,  sin  ser  tiempo  de  su 

menstruo, o cuando tenga flujo pasado su 

período, todos los días de ese flujo impu-

ro permanecerá impura como en los días 

de su menstruación.

26

 Todo lecho en que se acueste durante 

todos los días de su flujo, le será como el 

lecho de su menstruación, y todo aquello 

sobre lo cual se siente, será impuro como 

en la impureza de su menstruación.

27

 Y  cualquiera  que  toque  estas  cosas 

quedará  impuro,  tendrá  que  lavar  sus 

vestidos y bañarse en agua, y quedará im-

puro hasta la tarde.

28

 Y cuando quede libre de su flujo, en-

tonces  contará  para  sí  siete  días,  y  des-

pués será limpia.

29

 Al octavo día tomará consigo dos tór-

tolas  o  dos  palominos,  y  los  llevará  al 

sacerdote,  a  la  entrada  de  la  Tienda  de 

Reunión.

30

 El  sacerdote  preparará  el  uno  como 

ofrenda por el pecado y el otro como ho-

locausto. Así el sacerdote hará expiación 

por ella delante de YHVH a causa del flujo 

de su impureza.

31

 Y así, pues, mantendréis separados de 

sus impurezas a los hijos de Israel, para 

15.7 LXX gonoruos, de donde procede la palabra gonorrea. Se trata, pues, de una secreción infecciosa altamente contagiosa. 

15.16 Esto es, derrame involuntario del semen separado del acto sexual.  15.16 Lit. carne.


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Levítico 15:32

122

que  no  mueran  por  sus  impurezas,  al 

contaminar mi Tabernáculo, que está en 

medio de ellos.

32

 Tal es la ley tanto para el que padece 

gonorrea, como para el que tiene esper-

matorrea que lo haga impuro;

33

 para  la  impura  en  su  período  mens-

trual, para quien padece flujo, sea varón 

o hembra, y para el hombre que cohabita 

con mujer impura.

El día de la expiación

16

Después  de  la  muerte  de  los  dos 

hijos  de  Aarón,  cuando  se  acerca-

ron delante de YHVH y murieron, YHVH 

habló a Moisés.

2

 Y dijo YHVH a Moisés: habla a tu her-

mano Aarón que no en todo tiempo entre 

en el Santuario detrás del velo,° delante 

del  propiciatorio  que  está  sobre  el  Arca, 

no sea que muera, porque Yo me muestro 

en la nube sobre el propiciatorio.

3

 Con esto entrará Aarón en el Santuario: 

con un becerro para la ofrenda por el pe-

cado y un carnero por holocausto.°

4

 Vestirá una túnica sagrada de lino y cu-

brirá  su  cuerpo  con  zaragüelles  de  lino. 

Estará ceñido con un cinto de lino y usará 

un turbante de lino (estas son vestiduras 

santas), bañará su cuerpo en agua y des-

pués se vestirá con ellas.

5

 Tomará dos machos cabríos de la con-

gregación  de  los  hijos  de  Israel  para  la 

ofrenda por el pecado y un carnero para 

el holocausto.

6

 Y  haciendo  acercar  el  novillo  como 

ofrenda por el pecado, Aarón hará expia-

ción por sí mismo y por su casa.

7

 Después tomará los dos machos cabríos 

y  hará  que  estén  delante  de  YHVH,  a  la 

entrada de la Tienda de Reunión.

8

 Y  Aarón  echará  suertes  sobre  los  dos 

machos cabríos: una suerte por YHVH y 

la otra suerte por Azazel.°

9

 Luego  Aarón  acercará  el  macho  ca-

brío  sobre  el  cual  haya  caído  la  suerte 

por YHVH y lo ofrecerá en ofrenda por 

el pecado.

10

 Pero  el  macho  cabrío  sobre  el  cual 

haya caído la suerte por Azazel, será pre-

sentado vivo ante YHVH para hacer expia-

ción sobre él, a fin de enviarlo al desierto 

como Azazel.

11

 Entonces  Aarón  conducirá  el  novillo 

para la expiación, y degollando el novillo 

como ofrenda por el pecado, hará expia-

ción por sí mismo y por su casa.

12

 Después tomará el incensario lleno de 

brasas de fuego de sobre el altar delante 

de YHVH, y llenando sus puños de incien-

so aromático molido lo meterá detrás del 

velo.

13

 Pondrá  el  incienso  sobre  el  fuego  en 

presencia de YHVH para que el humo del 

incienso  cubra  el  propiciatorio  que  está 

sobre el Testimonio, para que no muera.

14

 Enseguida tomará de la sangre del no-

villo y hará aspersión con su dedo sobre 

el  propiciatorio,  hacia  el  oriente,  y  con 

aquella sangre hará aspersión siete veces 

con su dedo delante del propiciatorio.

15

 Después degollará el macho cabrío de la 

ofrenda por el pecado que corresponde al 

pueblo, y meterá su sangre detrás del velo,° 

y hará con su sangre como hizo con la san-

gre del novillo, haciendo aspersión sobre el 

propiciatorio y delante del propiciatorio.

16

 Así hará expiación por el Santuario, a 

causa de las impurezas de los hijos de Is-

rael y de sus transgresiones, por todos sus 

pecados. Y así hará también por la Tienda 

de Reunión, que habita con ellos en me-

dio de su impureza.

17

 Nadie podrá permanecer en la Tienda 

de Reunión desde que él entre en el San-

tuario para hacer expiación hasta que sal-

ga y haya hecho expiación por sí mismo, 

por  su  casa,  y  por  toda  la  congregación 

de Israel.

18

 Luego  saldrá  hacia  el  altar  que  está 

ante YHVH y hará expiación por él.° To-

mará parte de la sangre del novillo y de la 

sangre del macho cabrío y la aplicará so-

bre los cuernos del altar, todo alrededor.

19

 Luego rociará sobre éste siete veces de 

la sangre con su dedo, y así lo purificará y 

16.2 

→He.6.19.  16.3 →He.9.7.  16.8 La mayoría de las versiones dejan sin traducir la palabra hebrea ‘azazel, porque no hay 

unanimidad de criterios en cuanto al significado de esta palabra. Casi todos están de acuerdo en que el significado de la raíz de 

esa palabra es el que quita, más específicamente el que quita algo por una serie de actos. Otros sugieren que la palabra es una 

combinación de ‘ez = cabra, y ‘azal = irse, partir

16.15 

→He.9.12.  16.18 Es decir, por el altar


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Levítico 17:7

123

lo santificará de las impurezas de los hijos 

de Israel.

20

 Cuando haya acabado de hacer expia-

ción por el Santuario, la Tienda de Reu-

nión y el altar, hará aproximar el macho 

cabrío vivo.

21

 Aarón apoyará sus dos manos sobre la 

cabeza del macho cabrío vivo y confesará 

sobre él todas las iniquidades de los hijos 

de Israel, así como todas sus transgresio-

nes  y  todos  sus  pecados;  los  depositará 

sobre la cabeza del macho cabrío y lo en-

viará al desierto por mano de un hombre 

destinado al efecto.

22

 El macho cabrío cargará sobre sí todas 

las  iniquidades  de  ellos  hacia  una  tierra 

solitaria, y se le dejará ir en el desierto.

23

 Después  entrará  Aarón  en  la  Tienda 

de Reunión y se quitará las vestiduras de 

lino que se había puesto para entrar en el 

Santuario, y las dejará allí.°

24

 Bañará su cuerpo en agua en un lugar 

santo  y  se  vestirá  sus  vestidos.  Saldrá  y 

ofrecerá su holocausto y el holocausto del 

pueblo, haciendo expiación por sí mismo 

y por el pueblo,

25

 y dejará consumir sobre el altar la gra-

sa de la ofrenda por el pecado.

26

 Respecto  a  quien  condujo  el  macho 

cabrío como Azazel, lavará sus vestidos y 

bañará su cuerpo en el agua, tras lo cual 

podrá entrar en el campamento.

27

 Y el novillo de la ofrenda por el pecado 

y el macho cabrío de la ofrenda por el pe-

cado, cuya sangre se haya introducido para 

hacer expiación en el Santuario, serán sa-

cados fuera del campamento° y quemados 

al fuego: su cuero, su carne y su estiércol.

28

 Quien los queme lavará sus vestidos y 

bañará su cuerpo en el agua, tras lo cual 

podrá entrar en el campamento.

29

 Esto os será por estatuto perpetuo: En 

el séptimo mes, en el décimo día del mes, 

humillaréis  vuestras  almas  y  no  haréis 

ninguna  obra,  así  el  nativo  como  el  ex-

tranjero que peregrina entre vosotros.

30

 Porque  ese  día  se  hará  expiación  por 

vosotros para limpiaros, y quedaréis lim-

pios de todos vuestros pecados delante de 

YHVH.

31

 Será para vosotros shabbat solemne y 

humillaréis  vuestras  almas.  Es  estatuto 

perpetuo.

32

 El  sacerdote  que  haya  sido  ungido  y 

consagrado para ser sacerdote en lugar de 

su padre, hará la expiación. Se vestirá las 

vestiduras  de  lino  blanco,  las  vestiduras 

más santas.

33

 Hará expiación por el Santuario; hará 

expiación por la Tienda de Reunión y por 

el altar, y hará expiación por los sacerdo-

tes y por todo el pueblo de la congrega-

ción.

34

 Esto  tendréis  por  estatuto  perpetuo: 

Que se haga expiación una vez al año por 

los  hijos  de  Israel,  a  causa  de  todos  sus 

pecados. Y él hizo como YHVH había or-

denado a Moisés.°

Ordenanzas acerca 

de la sangre

17

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Habla a Aarón, a sus hijos y a to-

dos los hijos de Israel, y les dirás: Esta es 

la palabra que YHVH ha ordenado dicien-

do:

3

 Cualquier  hombre  de  la  casa  de  Israel 

que degüelle en sacrificio° un novillo, un 

cordero  o  una  cabra  dentro  del  campa-

mento, o que lo inmole fuera del campa-

mento,

4

 y que no lo lleve a la entrada de la Tienda 

de Reunión para que la víctima sea pre-

sentada ante YHVH delante de la Tienda 

de YHVH, al tal hombre le será imputada 

la sangre. Ha derramado sangre, y el tal 

hombre será cortado de en medio de su 

pueblo.

5

 Los  hijos  de  Israel,  pues,  llevarán  las 

víctimas que sacrificaban en el campo y 

las harán acercar a la entrada de la Tienda 

de  Reunión,  ante  YHVH,  al  sacerdote,  y 

allí las sacrificarán como sacrificios de las 

ofrendas de paz a YHVH.

6

 El sacerdote rociará la sangre sobre el 

altar de YHVH, a la entrada de la Tienda 

de Reunión, y dejará consumir la grasa en 

olor que apacigua a YHVH.

7

 Y  nunca  más  sacrificarán  sus  sacrifi-

cios  a  los  demonios,°  tras  los  cuales  se 

16.23 

→Ez.44.19.  16.27 →He.13.11.  16.29-34 →Lv.23.26-32; Nm.29.7-11.  17.3 .en sacrificio.  17.7 Heb. se’irim. Algu-

nos lo traducen por sátiros, figura relacionada con la lascivia de la mitología grecorromana.


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Levítico 17:8

124

prostituyen. Esto será un estatuto perpe-

tuo por sus generaciones.

8

 Y les dirás: Cualquier hombre de la casa 

de Israel, o del extranjero que peregrina 

en medio de ellos, que haga subir holo-

causto o sacrificio,

9

 y  no  lo  haga  llevar  a  la  entrada  de  la 

Tienda de Reunión para ofrecerlo a YHVH, 

ese hombre será cortado de en medio de 

su pueblo.

10

 Yo  me  enfrentaré  contra  aquella  per-

sona que coma cualquier clase de sangre, 

sea de la casa de Israel, o del extranjero 

que  peregrina  entre  ellos.  A  la  persona 

que coma sangre, la cortaré de en medio 

de su pueblo.°

11

 Porque  la  vida  de  la  carne  está  en  la 

sangre, y Yo os la he dado para hacer ex-

piación sobre el altar por vuestras almas, 

porque es la sangre, en razón de la vida, la 

que hace expiación.°

12

 Por tanto, he dicho a los hijos de Is-

rael:  Ninguna  persona  entre  vosotros 

comerá sangre, tampoco ningún extran-

jero que peregrina entre vosotros comerá 

sangre.

13

 Cualquier  hombre  de  los  hijos  de  Is-

rael, o de los extranjeros que peregrinan 

entre  ellos,  que  cace  animal  o  ave  que 

pueda comerse, derramará su sangre y la 

cubrirá con tierra,

14

 porque el alma de toda carne, su vida, 

está en su sangre. Por tanto, he dicho a 

los hijos de Israel: No comeréis la sangre 

de ninguna carne, porque la vida de toda 

carne es su sangre. Todo el que la coma 

será cortado.

15

 Y  cualquier  persona,  sea  nativo  o  ex-

tranjero,  que  coma  animal  mortecino  o 

despedazado por fiera, lavará sus vestidos 

y se bañará en agua, y será impura hasta 

la tarde: entonces quedará limpia.

16

 Pero si no lava sus vestidos ni baña su 

cuerpo, cargará con su iniquidad.

Relaciones sexuales prohibidas

18

YHVH habló a Moisés diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel y diles: 

Yo soy YHVH vuestro Dios.

3

 No  haréis  como  hacen  en  la  tierra  de 

Egipto  en  la  cual  morasteis,  ni  haréis 

como hacen en la tierra de Canaán adon-

de Yo os estoy conduciendo. No seguiréis 

sus costumbres.

4

 Cumpliréis  mis  decretos  y  observaréis 

mis estatutos para andar en ellos. Yo soy 

YHVH vuestro Dios.

5

 Observaréis mis estatutos y mis decre-

tos, pues el hombre que los haga, vivirá° 

por ellos. Yo, YHVH.

6

 Ningún  varón  se  acercará  a  parienta 

próxima para descubrir su desnudez. Yo, 

YHVH.

7

 No descubrirás la desnudez de tu padre 

ni la desnudez de tu madre. Es tu madre, 

no descubrirás su desnudez.

8

 No descubrirás la desnudez de la mujer 

de tu padre. Es la desnudez de tu padre.°

9

 La desnudez de tu hermana, hija de tu 

padre o hija de tu madre, nacida en casa 

o nacida fuera: su desnudez no descubri-

rás.°

10

 La desnudez de la hija de tu hijo o de la 

hija de tu hija: su desnudez no descubri-

rás, porque su desnudez es la tuya.

11

 La desnudez de la hija de la mujer de 

tu  padre,  engendrada  por  tu  padre:  su 

desnudez no descubrirás. Es tu hermana.

12

 No descubrirás la desnudez de la her-

mana de tu padre. Es parienta próxima de 

tu padre.

13

 No descubrirás la desnudez de la her-

mana  de  tu  madre,  porque  es  parienta 

próxima de tu madre.

14

 No descubrirás la desnudez del herma-

no de tu padre. No te allegarás a su mujer, 

pues ella es tu tía.°

15

 No descubrirás la desnudez de tu nue-

ra: es mujer de tu hijo, no descubrirás su 

desnudez.°

16

 No descubrirás la desnudez de la mu-

jer de tu hermano: es la desnudez de tu 

hermano.°

17

 No  descubrirás  la  desnudez  de  una 

mujer y de su hija, ni tomarás la hija de 

su hijo, ni la hija de su hija para descubrir 

su desnudez, porque son parientas próxi-

mas. Es depravación.°

17.10 

→Gn.9.4;  Lv.7.26-27;  19.26;  Dt.12.16,23;  15.23.  17.11  →He.9.22.  18.5  →Neh.9.29;  Ez.18.9;  20.11-13;  Lc.10.28; 

Ro.11.5; Gá.3.12. 

18.8 

→Lv.20.11; Dt.22.30; 27.20.  18.9 →Lv.20.17; Dt.27.22.  18.12-14 →Lv.20.19-20.  18.15 →Lv.20.12. 

18.16 

→Lv.20.21.  18.17 →Lv.20.14; Dt.27.23. 


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Levítico 19:16

125

18

 No tomarás a la hermana de tu mujer, 

haciéndola su rival, descubriendo su des-

nudez  además  de  la  de  aquélla,  durante 

su vida.

19

 Tampoco  te  acercarás  a  una  mujer 

para  descubrir  su  desnudez  durante  su 

impureza menstrual.°

20

 No  tendrás  acto  carnal°  con  la  mu-

jer  de  tu  prójimo,  contaminándote  con 

ella.°

21

 Tampoco  darás  de  tu  simiente  para 

hacerlo pasar° a Moloc. No profanarás el 

nombre de tu Dios.° Yo, YHVH.

22

 No te acostarás con varón como si fue-

ra mujer. Es abominación.°

23

 No  te  ayuntarás  con  ningún  animal, 

contaminándote con él, ni mujer alguna 

se pondrá ante animal para ayuntarse con 

él. Es perversión.°

24

 No os contaminaréis con nada de todo 

esto, porque con todo esto se han conta-

minado  las  naciones  que  Yo  expulso  de 

delante de vosotros.

25

 Porque  esa  tierra  se  corrompió,  por 

tanto he castigado su maldad sobre ella y 

esa tierra va a vomitar a sus moradores.

26

 Vosotros  en  cambio  observaréis  mis 

estatutos y mis decretos, y no haréis nin-

guna de todas estas abominaciones, ni el 

nativo, ni el extranjero que peregrina en-

tre vosotros

27

 (porque los hombres de aquella tierra 

que fueron antes de vosotros, cometieron 

todas estas abominaciones y la tierra fue 

contaminada)

28

 no sea que la tierra os vomite por ha-

berla  contaminado,  como  vomitó  a  la 

gente que fue antes de vosotros.

29

 Cualquiera  que  haga  alguna  de  todas 

estas abominaciones, las personas que las 

hagan,  serán  cortadas  de  entre  su  pue-

blo.

30

 Por tanto guardaréis mi ordenanza no 

practicando  ninguna  de  las  costumbres 

abominables que se practicaron antes de 

vosotros, para que no os contaminéis con 

ellas. Yo, YHVH vuestro Dios.

Santidad en todo

19

Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Habla  a  toda  la  asamblea  de  los 

hijos de Israel, y diles: Sed santos, porque 

Yo, YHVH vuestro Dios, soy santo.°

3

 Cada uno temerá a su madre y a su pa-

dre,°  y  guardaréis°  mis  días  de  reposo.° 

Yo, YHVH vuestro Dios.

4

 No os volváis a los ídolos.° No os haréis dio-

ses de fundición.° Yo, YHVH vuestro Dios.

5

 Cuando ofrezcáis sacrificio de ofrendas 

de paz a YHVH, ofrecedlo de tal manera 

que seáis aceptos.

6

 Se comerá el día que lo sacrifiquéis o al 

día  siguiente,  pero  lo  que  quede  para  el 

tercer día será quemado al fuego.

7

 Si se come al tercer día, será cosa abo-

minable. No será acepto.

8

 Quien lo coma, cargará con su iniquidad 

por haber profanado lo santo de YHVH y esa 

persona será cortada de entre su pueblo.

9

 Al segar la cosecha de vuestra tierra, no 

segarás hasta el último rincón de tu cam-

po ni rebuscarás las espigas de tu siega.

10

 Tampoco rebuscarás tu viña, ni reco-

gerás  los  frutos  caídos  de  tu  viña,  sino 

que los dejarás para el pobre y para el ex-

tranjero.° Yo, YHVH vuestro Dios.

11

 No robaréis,° ni mentiréis,° ni os en-

gañaréis unos a otros.

12

 No juraréis por mi Nombre en falso,° 

profanando así el nombre de tu Dios. Yo, 

YHVH.

13

 No  harás  extorsión  a  tu  prójimo  ni 

lo expoliarás. El salario del jornalero no 

pernoctará en tu poder hasta la mañana 

siguiente.°

14

 No maldecirás al sordo, ni ante un cie-

go colocarás tropiezo,° sino que tendrás 

temor de tu Dios. Yo, YHVH.

15

 No harás injusticia en el juicio: ni al-

zarás el rostro del menesteroso° ni favo-

recerás al grande. Con rectitud juzgarás 

a tu prójimo.°

16

 No andarás difamando en medio de tu 

pueblo, ni harás nada contra la vida° de tu 

prójimo. Yo, YHVH.

18.19 

→Lv.20.18.  18.20 Lit. no darás tu simiente de copulación.  18.20 →Lv.20.10.  18.21 Es decir, por fuego. Moloc, dios de 

los cananeos al cual se le ofrecían niños en holocausto. 

18.21 

→Lv.20.1-5.  18.22 →Lv.20.13.  18.23 →Ex.22.19; Lv.20.15-16. 

19.2 

→Lv.11.44-45;  1  P.1.16.  19.3  →Ex.20.12;  Dt.5.16.  19.3  →Ex.20.8;  Dt.5.12.  19.3  Heb.  shabbatot.  19.4  →Lv.26.1. 

19.4 

→Ex.20.4;  34.17;  Dt.5.8;  27.15.  19.9-10  →Lv.23.22;  Dt.24.19-22.  19.11  →Ex.20.15;  Dt.5.19.  19.11  →Ex.20.16; 

Dt.5.20. 

19.12 

→Ex.20.7; Dt.5.11; Mt.5.33.  19.13 →Dt.24.14-15.  19.14 →Dt.27.18.  19.15 Heb. dar la razón a alguien por 

el mero hecho de ser pobre

19.15 

→Ex.23.6-8; Dt.16-19.  19.16 Lit. no te levantarás contra la sangre.


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Levítico 19:17

126

17

 No aborrecerás en tu corazón a tu her-

mano. Reprenderás firmemente a tu pró-

jimo, para que no incurras en pecado por 

su causa.

18

 No  te  vengarás,  ni  guardarás  rencor 

contra  los  hijos  de  tu  pueblo,  sino  que 

amarás a tu prójimo como a ti mismo.° 

Yo, YHVH.

19

 Guardaréis  mis  estatutos.  No  harás 

ayuntar  a  tu  bestia  en  dos  especies  ni 

sembrarás  tu  campo  con  dos  semillas, 

tampoco te pondrás vestido con dos cla-

ses de tejido.°

20

 Si  un  hombre  yace  con  una  mujer,  y 

hay emisión de semen, y ella es una sier-

va comprometida con alguno, mas no ha 

sido realmente rescatada ni se le ha dado 

libertad, se hará una investigación, pero 

no serán muertos, por cuanto ella no es 

libre.

21

 El hombre presentará su ofrenda por 

la culpa a YHVH a la entrada de la Tien-

da de Reunión: un carnero como ofrenda 

por la culpa.

22

 Y  el  sacerdote  hará  expiación  por  él 

delante  de  YHVH  con  el  carnero  de  la 

ofrenda por la culpa, por el pecado con el 

que pecó, y el pecado que haya cometido 

le será perdonado.

23

 Cuando entréis en la tierra y plantéis 

toda clase de árboles frutales, considera-

réis  como  incircunciso  su  primer  fruto. 

Por  tres  años  os  será  incircunciso  y  su 

fruto no se comerá.

24

 Al cuarto año todo su fruto será consa-

grado con alabanzas a YHVH,

25

 y al quinto año podréis comer su fruto. 

Así os aumentará su cosecha. Yo, YHVH 

vuestro Dios.

26

 Nada con sangre comeréis.° No practi-

caréis adivinación ni astrología.°

27

 No  tonsuraréis  vuestra  coronilla,  ni 

dañaréis la punta de tu barba.

28

 No haréis sajaduras en vuestra carne a 

causa de un muerto, ni os haréis marcas 

de tatuaje en vosotros.° Yo, YHVH.

29

 No profanarás a tu hija haciendo que se 

prostituya,° no sea que la tierra se prosti-

tuya, y la tierra se llene de perversión.

30

 Observaréis mis días de reposo,° y ten-

dréis  temor  reverente  de  mi  Santuario. 

Yo, YHVH.°

31

 No os volváis a los que evocan espíritu 

de muertos, ni a los adivinos,° ni los bus-

quéis para ser contaminados por ellos. Yo, 

YHVH, vuestro Dios.

32

 En presencia de las canas te pondrás en 

pie, honrarás la presencia de un anciano, 

y de tu Dios tendrás temor. Yo, YHVH.

33

 Cuando algún extranjero habite conti-

go en vuestra tierra, no lo oprimiréis.

34

 Como a uno nacido entre vosotros os 

será  el  extranjero  que  resida  con  voso-

tros. Lo amarás como a ti mismo, porque 

extranjeros fuisteis en la tierra de Egip-

to.° Yo, YHVH vuestro Dios.

35

 No haréis injusticia en el juicio, ni en 

la medida de longitud, ni en la de peso, ni 

en la de capacidad.

36

 Tendréis balanzas justas, pesas justas, 

efa justo e hin justo.° Yo, YHVH vuestro 

Dios, que os saqué de la tierra de Egipto.

37

 Guardaréis, pues, todos mis estatutos 

y  todos  mis  decretos  y  los  pondréis  por 

obra. Yo, YHVH.

Contra actos inmorales

20

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 También dirás a los hijos de Israel: 

Cualquier varón de los hijos de Israel, o del 

extranjero que reside en Israel, que entre-

gue a alguien de su descendencia a Moloc, 

será  muerto  irremisiblemente.  El  pueblo 

de esta tierra lo lapidará con piedras.

3

 Y Yo pondré mi rostro contra ese varón 

y lo cortaré de en medio de su pueblo, por 

cuanto entregó de su descendencia a Mo-

loc, contaminando mi Santuario y profa-

nando mi santo Nombre.

4

 Y  si  el  pueblo  de  esta  tierra  de  alguna 

manera  cierra  sus  ojos  para  no  ver  al 

hombre  que  haya  entregado  su  descen-

diente a Moloc, y no lo hace morir,

5

 entonces Yo pondré mi rostro contra ese 

varón, y contra su familia, y lo cortaré de 

en medio de su pueblo, junto con todos 

los que fornicaron tras él, prostituyéndo-

se en pos de Moloc.

19.18 

→Mt.5.43; 19.19; 22.39; Mr.12.31; Lc.10.27; Ro.13.9; Gá.5.14; Jac.2.8.  19.19 →Dt.22.9-11.  19.26 →Gn.9.4; Lv.7.26-

27;  17.10-14;  Dt.12.16,23;  15.23. 

19.26 

→Dt.18.10.  19.27-28  →Lv.21.5;  Dt.14.1.  19.29  →Dt.23.17.  19.30  Heb.  shabba-

tot

19.30 

→Lv.26.2.  19.31 →Dt.18.11.  19.33-34 →Ex.22.21; Dt.24.17-18; 27.19.  19.35-36 →Dt.25.13-16.


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Levítico 21:1

127

6

 La persona que acuda a los que evocan 

espíritu de muertos y adivinos para pros-

tituirse  con  ellos,  Yo  pondré  mi  rostro 

contra esa persona, y la cortaré de en me-

dio de su pueblo.

7

 Santificaos,  sed  santos,  porque  Yo  soy 

YHVH vuestro Dios.

8

 Guardaréis mis estatutos y los pondréis 

por obra. Yo soy YHVH, que os santifico.

9

 Cualquier hombre que maldiga a su pa-

dre o a su madre, será muerto irremisi-

blemente.° Ha maldecido a su padre o a 

su madre. En él recae su propia sangre.°

10

 Si un hombre adultera con la mujer de 

otro, si adultera con la mujer de su próji-

mo, el adúltero y la adúltera serán muer-

tos irremisiblemente.°

11

 El que se acueste con la mujer de su pa-

dre, la desnudez de su padre ha descubierto. 

Ambos serán muertos irremisiblemente, y 

su propia sangre recaerá sobre ellos.°

12

 Y si alguien se acuesta con su nuera, 

ambos  serán  muertos  irremisiblemente. 

Cometieron una perversidad, y su propia 

sangre recaerá sobre ellos.°

13

 Si  un  hombre  se  acuesta  con  varón 

como se acuesta con mujer, cometen una 

abominación. Ambos serán muertos irre-

misiblemente, y su propia sangre recaerá 

sobre ellos.°

14

 El  que  tome  a  una  mujer  y  a  la  ma-

dre de ella, comete un acto perverso. Él y 

ellas serán quemados con fuego para que 

no haya perversión entre vosotros.°

15

 El varón que tenga eyaculación semi-

nal con un animal será muerto irremisi-

blemente, y el animal será muerto.

16

 Y si una mujer se allega a algún animal 

para ayuntarse con él, matarás a la mujer 

y  al  animal.  Serán  muertos  irremisible-

mente y su sangre estará sobre ellos.°

17

 Si un varón toma a su hermana, hija 

de  su  padre  o  hija  de  su  madre,  viendo 

la desnudez de ella, y ella ve la desnudez 

de él, es cosa execrable. Por tanto, serán 

cortados en presencia de los hijos de su 

pueblo, porque ha descubierto la desnu-

dez de su hermana y cargará con su ini-

quidad.°

18

 El que se acueste con mujer menstruo-

sa y descubra su desnudez, ha descubierto 

su fuente, y ella ha descubierto la fuente 

de su sangre. Ambos serán cortados de en 

medio de su pueblo.°

19

 No descubrirás la desnudez de la her-

mana de tu madre, ni de la hermana de tu 

padre, porque es desnudez de una parien-

ta. Cargarán con su iniquidad.

20

 El hombre que se acueste con su tía, 

ha  descubierto  la  desnudez  de  su  tío. 

Cargarán  con  su  pecado  y  morirán  sin 

hijos.°

21

 El  hombre  que  tome  la  mujer  de  su 

hermano comete una impureza. Ha des-

cubierto  la  desnudez  de  su  hermano  y 

quedarán sin hijos.°

22

 Observaréis  todos  mis  estatutos  y  to-

dos mis decretos, y los pondréis por obra, 

y así no os vomitará la tierra en la cual Yo 

os introduzco para habitar en ella.

23

 No seguiréis las costumbres de las na-

ciones que Yo arrojo de delante de voso-

tros, porque ellos han hecho tales cosas y 

fueron detestables para mí.

24

 Pero a vosotros os he dicho: Vosotros 

poseeréis la tierra de ellos, y Yo os la daré 

para que la poseáis, tierra que fluye leche 

y miel. ¡Yo soy YHVH vuestro Dios, que os 

he apartado de entre los pueblos!

25

 Vosotros  haréis  diferencia  entre  ani-

mal limpio e impuro, y entre ave impura 

y limpia, y no seréis detestables con vues-

tras almas, con el animal, ni con el ave, 

ni con lo que se arrastra por la tierra, los 

cuales os hice apartar como impuros.

26

 Me seréis santos porque Yo, YHVH, soy 

santo, y os he apartado de entre los pue-

blos para que seáis míos.

27

 El hombre o la mujer que evoque espí-

ritu de muertos, o sea adivino, ha de morir 

irremisiblemente.  Los  lapidarán  con  pie-

dras y su propia sangre recaerá sobre ellos.

Santidad de los sacerdotes

21

Dijo  YHVH  a  Moisés:  Habla  a  los 

sacerdotes  hijos  de  Aarón,  y  diles: 

Nadie entre vosotros ha de hacerse impuro 

con el cadáver de uno de sus parientes,

20.9 

→Ex.21.17; Mt.15.4; Mr.7.10.  20.9 Es decir, su culpa recaerá sobre él mismo.  20.10 →Ex.20.14; Lv.18.20; Dt.5.18. 

20.11 

→Lv.18.8; Dt.22.30; 27.20.  20.12 →Lv.18.15.  20.13 →Lv.18.22.  20.14 →Lv.18.17; Dt.27.23.  20.15-16 →Ex.22.19; 

Lv.18.23; Dt.27.21. 

20.17 

→Lv.18.9; Dt.27.22.  20.18 →Lv.18.19.  20.19-20 →Lv.18.12-14.  20.21 →Lv.18.16.


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Levítico 21:2

128

2

 excepto  por  pariente  cercano  a  él:  su 

madre, su padre, su hijo, su hermano,

3

 o su hermana virgen, cercana a él, que 

no haya tenido marido, por la cual podrá 

hacerse impuro.

4

 No se contaminará profanándose, pues 

es dirigente en medio de su pueblo.

5

 No hará tonsura en su cabeza, ni rasu-

rará el borde de su barba, ni se harán sa-

jaduras en su cuerpo.°

6

 Santos serán para su Dios, y no profa-

narán el nombre de su Dios, porque ellos 

son los que presentan las ofrendas ígneas 

a YHVH, el pan de su Dios. Por esto han 

de ser santos.

7

 No tomarán mujer ramera o deshonra-

da,  no  tomarán  mujer  repudiada  por  su 

marido, porque es° santo a su Dios.

8

 Por tanto lo santificarás, pues él presen-

ta el pan de tu Dios. Te será santo porque 

Yo soy santo. YHVH, vuestro santificador.

9

 Si la hija de un varón sacerdote se des-

honra prostituyéndose, ella ha deshonra-

do a su padre; con fuego será quemada.

10

 El que entre sus hermanos sea sumo 

sacerdote,  sobre  cuya  cabeza  haya  sido 

derramado el aceite de la unción, y haya 

consagrado su mano para ponerse las ves-

tiduras, no desgreñará su cabeza, ni ras-

gará sus vestidos.°

11

 No  entrará  donde  haya  cadáver  algu-

no, no se contaminará ni por su padre ni 

por su madre.

12

 No saldrá del Santuario ni profanará el 

Santuario de su Dios, porque la diadema 

del aceite de la unción de su Dios está so-

bre él. Yo, YHVH.

13

 Tomará mujer en la virginidad de ella;

14

 no tomará viuda, ni divorciada, ni des-

honrada, ni ramera, sino que tomará por 

mujer a una virgen de su pueblo,

15

 a fin de no contaminar su descenden-

cia  entre  su  pueblo,  porque  Yo,  YHVH, 

soy el que lo santifica.

16

 Habló además YHVH a Moisés, dicien-

do:

17

 Habla  a  Aarón.  Dile:  Ninguno  de 

tus  descendientes  en  sus  sucesivas 

generaciones,  que  tenga  en  sí  algún  de-

fecto° se ha de acercar para ofrecer el pan 

de su Dios.

18

 Porque  ningún  varón  que  tenga  en 

sí algún defecto se acercará, sea ciego, o 

cojo, o mutilado, o deformado,

19

 o  que  tenga  quebradura  de  pie,  o  de 

mano,

20

 o jorobado, o enano, o con ojos defec-

tuosos, o sarnoso, o tiñoso, o con testícu-

lo dañado.

21

 Ningún  varón  de  la  descendencia  del 

sacerdote Aarón, que tenga defecto en sí, 

se podrá acercar para ofrecer las ofrendas 

ígneas de YHVH. Hay defecto en él; no se 

acercará para ofrecer el pan de su Dios.

22

 Podrá comer el pan de su Dios proce-

dente de las cosas santísimas y de las san-

tas,°

23

 pero no podrá traspasar el velo ni acer-

carse al altar, pues tiene defecto en sí. No 

profanará mis Santuarios porque Yo soy 

YHVH, que los santifico.

24

 Así habló Moisés a Aarón, a sus hijos, y 

a todos los hijos de Israel.

Santidad de las ofrendas

22

YHVH habló a Moisés diciendo:

2

 Habla a Aarón y a sus hijos que se 

abstengan°  de  las  ofrendas  sagradas  que 

los hijos de Israel me dedican, para que no 

profanen mi santo Nombre. Yo, YHVH.

3

 Diles:  Durante  vuestras  generaciones, 

cualquier  descendiente  vuestro  que,  es-

tando  impuro,  se  acerque  a  las  cosas 

santas  que  los  hijos  de  Israel  consagran 

a  YHVH,  tal  persona  será  cortada  de  mi 

presencia. Yo, YHVH.

4

 Cualquier varón de la descendencia de 

Aarón  que  sea  leproso  o  padezca  gono-

rrea, no comerá de las cosas santas hasta 

que  esté  limpio.  Asimismo  el  que  toque 

cualquier cosa impura, o el varón que pa-

dezca espermatorrea,

5

 o  el  que  toque  cualquier  reptil  que  lo 

contamine, o una persona por la cual lle-

gue a ser impuro debido a cualquier im-

pureza suya.

21.5 

→Lv.19.27-28; Dt.14.1.  21.7 Esto es, el sacerdote. El TM está en singular, aunque se refiere a los sacerdotes en general. 

En este pasaje se alternan las formas singular y plural para referirse al mismo colectivo. 

21.10 Esto es, en señal de due-

lo

21.17 Es decir, defecto físico, lesión, mutilación.  21.22 Prob. se refiera a las ofrendas por el pecado y las ofrendas de paz 

respectivamente. 

22.2 Esto es, cuando estén impuros

→v.3. 


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Levítico 23:2

129

6

 La  persona  que  lo  toque  será  impura 

hasta la tarde, y no comerá de las cosas 

santas hasta que haya bañado su cuerpo 

en agua.

7

 Al ponerse el sol, será limpio, y después 

podrá comer las cosas santas, porque es 

su alimento.

8

 No comerá nada mortecino ni despeda-

zado por fiera, porque será contaminado 

con ellos. Yo, YHVH.

9

 Guardarán,  pues,  mi  precepto,  no  sea 

que lleven pecado con ese motivo y mue-

ran por haberlo profanado. ¡Yo soy YHVH, 

que los santifico!

10

 Ningún extraño° comerá de lo santo. 

Ni el huésped del sacerdote ni el jornalero 

podrán comer de lo santo.

11

 Pero si el sacerdote compra una perso-

na con su dinero, ésta comerá de ello, y el 

nacido en su casa comerá de su pan.

12

 Cuando  la  hija  de  un  sacerdote  sea 

para  un  varón  extraño,  no  podrá  comer 

de la ofrenda de las cosas santas.

13

 Pero si la hija de un sacerdote llega a 

ser viuda o divorciada, y no tiene descen-

dencia, y vuelve a la casa de su padre como 

en su juventud, podrá comer del pan de su 

padre, pero ningún extraño comerá de él,

14

 y  el  que  inadvertidamente  coma  una 

cosa  sagrada,  restituirá  la  cosa  sagrada 

al sacerdote añadiendo a ella una quinta 

parte.

15

 No profanarán,° pues, las cosas santas 

que los hijos de Israel hacen elevar ante 

YHVH,

16

 haciendo  que  ellos  carguen  con  la 

culpabilidad cuando coman de sus cosas 

consagradas, porque Yo soy YHVH, el que 

los santifica.

17

 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

18

 Habla a Aarón y a sus hijos, y a todos 

los hijos de Israel y diles: Cualquier hom-

bre de la casa de Israel o de los forasteros 

en Israel que presente su ofrenda, ya sea 

de sus ofrendas votivas o de sus ofrendas 

voluntarias,  las  cuales  presenta  a  YHVH 

como holocausto,

19

 a  fin  de  que  sea  acepto  por  vosotros, 

deberá ofrecer un macho sin defecto de la 

vacada, o de los corderos, o de las cabras.

20

 No aproximaréis nada que tenga en él 

defecto pues no os será acepto.

21

 Y cuando alguien haga acercar un sa-

crificio  de  paz  ante  YHVH  para  cumplir 

un voto u ofrenda voluntaria, sea del ga-

nado o del rebaño, tendrá que ser sin de-

fecto para ser aceptado. No habrá defecto 

en él.

22

 Lo ciego, o lisiado, o verrugoso, o sar-

noso,  o  roñoso:  Éstos  no  haréis  acercar 

ante  YHVH  como  ofrenda  ígnea,  ni  los 

pondréis sobre el altar de YHVH.°

23

 Podrás presentar un novillo o un carne-

ro deforme o imperfecto como ofrenda vo-

luntaria, pero no será aceptada como voto.

24

 No ofreceréis a YHVH animal con tes-

tículos  aplastados,  magullados,  arranca-

dos o cortados. No haréis eso en vuestra 

tierra.

25

 Ni  aun  por  mano  de  extranjeros  per-

mitiréis  que  esos  animales  sean  aproxi-

mados como pan de vuestro Dios, porque 

son deformes y tienen defecto. No os se-

rán aceptados.

26

 Luego  habló  YHVH  a  Moisés,  dicien-

do:

27

 Cuando nazca un ternero, oveja, o ca-

brito,  estará  debajo  su  madre  siete  días, 

pero  desde  el  octavo  día  en  adelante 

será apto como víctima, ofrenda ígnea a 

YHVH,

28

 pero ya sea vaca u oveja, no la podréis 

degollar con su cría el mismo día.

29

 Cuando hagáis sacrificio de acción de 

gracias a YHVH, lo sacrificaréis de tal ma-

nera que os sea aceptable.

30

 Se comerá el mismo día, no dejaréis de 

él para la mañana. Yo, YHVH.

31

 Observaréis  mis  mandamientos  y  los 

cumpliréis. Yo, YHVH.

32

 No profanaréis mi santo Nombre, y así 

seré santificado° en medio de los hijos de 

Israel. Yo soy YHVH, que os santifica,

33

 el  que  os  sacó  de  la  tierra  de  Egipto 

para ser vuestro Dios. ¡Yo soy YHVH!

Las fiestas solemnes

23

Habló YHVH a Moisés diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel y diles: 

Estas  son  las  fiestas  solemnes  de  YHVH 

22.10 Es decir, que no es de los sacerdotes.  22.15 Esto es, los sacerdotes.  22.22 

→Dt.17.1.  22.32 Que debe considerarse 

como lo que es: Santo


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Levítico 23:3

130

en las cuales proclamaréis santas convo-

caciones. Estos son mis tiempos señala-

dos:

3

 Seis  días  se  trabajará,  pero  el  séptimo 

día será shabbat de reposo solemne, santa 

convocación. No haréis ningún trabajo.° 

Es shabbat para YHVH en todos vuestros 

asentamientos.

4

 Estas son las fiestas solemnes señaladas 

de  YHVH,  las  santas  convocaciones  que 

proclamaréis en sus tiempos señalados:

5

 En  el  primer  mes,  al  atardecer  del  día 

catorce del mes, Pascua es de YHVH.°

6

 Y el día quince de ese mes es la fiesta so-

lemne de los panes sin levadura para YHVH. 

Siete días comeréis pan sin levadura.

7

 El  primer  día  tendréis  santa  convoca-

ción  y  no  haréis  ningún  trabajo  de  ser-

vidumbre.

8

 Durante  siete  días  haréis  acercar  ante 

YHVH ofrenda ígnea. El séptimo día ha-

brá  una  santa  convocación.  No  haréis 

ningún trabajo de servidumbre.°

9

 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

10

 Habla  a  los  hijos  de  Israel  y  diles: 

Cuando  hayáis  entrado  en  la  tierra  que 

Yo os doy, y seguéis su mies, llevaréis al 

sacerdote una gavilla por primicia de los 

primeros frutos de vuestra cosecha.

11

 Él  mecerá  la  gavilla  en  presencia  de 

YHVH para que seáis aceptos. El sacerdo-

te la mecerá el día siguiente del shabbat.

12

 Y el día que mezáis la gavilla, ofrece-

réis un cordero añal sin defecto, en holo-

causto a YHVH.

13

 La ofrenda vegetal será de dos décimas 

de  flor  de  harina  mezclada  con  aceite, 

como  ofrenda  ígnea  para  YHVH  en  olor 

que  apacigua,  y  su  libación  será  de  un 

cuarto de hin de vino.

14

 No comeréis pan, ni grano tostado, ni es-

piga fresca hasta este mismo día, hasta que 

hayáis  hecho  llevar  la  ofrenda  de  vuestro 

Dios. Estatuto perpetuo por vuestras gene-

raciones en todos vuestros asentamientos.

15

 Desde el día siguiente al shabbat, des-

de el día en que hayáis hecho llevar la ga-

villa de la ofrenda mecida, contaréis siete 

semanas completas.

16

 Hasta el día siguiente al séptimo sha-

bbat  contaréis  cincuenta  días,  entonces 

haréis acercar el nuevo grano° a YHVH.

17

 Desde vuestros asentamientos llevaréis 

dos panes de dos décimas de flor de hari-

na horneados con levadura, como ofrenda 

mecida, como primicias a YHVH.

18

 Y con el pan haréis acercar siete cor-

deros sin defecto de un año, un becerro 

de la vacada y dos carneros. Serán holo-

causto a YHVH, con su ofrenda vegetal y 

sus libaciones. Ofrenda ígnea de olor que 

apacigua a YHVH.

19

 También prepararéis un macho cabrío 

como  ofrenda  por  el  pecado  y  dos  cor-

deros añales en sacrificio de ofrendas de 

paz.

20

 Y  el  sacerdote  los  balanceará  como 

ofrenda  mecida  en  presencia  de  YHVH 

juntamente con el pan de las primicias y 

los dos corderos. Serán cosa consagrada a 

YHVH para el sacerdote.

21

 Ese mismo día convocaréis una santa 

convocación  y  no  haréis  ningún  trabajo 

de servidumbre. Estatuto perpetuo en to-

dos vuestros asentamientos por vuestras 

generaciones.°

22

 Cuando seguéis la mies de vuestra tie-

rra, no acabarás de segar el rincón de tu 

campo, ni espigarás tu tierra ya segada; la 

dejarás para el pobre y para el extranjero. 

Yo, YHVH vuestro Dios.°

23

 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

24

 Habla a los hijos de Israel y diles: En 

el mes séptimo,° el primero del mes será 

para  vosotros  de  solemne  reposo:  una 

conmemoración  al  son  de  trompetas  y 

una santa convocación.

25

 No haréis ningún trabajo de servidum-

bre,  y  haréis  acercar  ofrenda  ígnea  ante 

YHVH.

26

 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

27

 Ciertamente el día décimo de ese mes 

séptimo será el día de la Expiación.° Ten-

dréis una santa convocación y humillaréis 

vuestras almas, y haréis acercar ofrenda 

ígnea ante YHVH.

28

 Ningún  trabajo  haréis  en  ese  mismo 

día, porque es un día de expiaciones, para 

23.3 

→Ex.20.8-10;  23.12;  31.15;  34.21;  35.2;  Dt.5.12-14.  23.5  →Ex.12.1-13;  Dt.16.1-2.  23.6-8  →Ex.12.14-20;  23.15; 

Dt.16.3-8. 

23.16 Lit. ofrenda vegetal.  23.15-21 

→Ex.23.16; 34.22; Dt.16.9-12.  23.22 →Lv.19.9-10; Dt.24.19-22.  23.24 Esto 

es, Tishri

23.27-32 

→Lv.16.29-34. 


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Levítico 24:9

131

hacer expiación por vosotros en presencia 

de YHVH, vuestro Dios.

29

 Toda  alma  que  no  se  humille  en  ese 

mismo día, será cortada de su pueblo.

30

 Y toda persona que haga cualquier tra-

bajo  en  ese  día,  la  exterminaré  de  entre 

su pueblo.

31

 No  haréis  trabajo  alguno.  Estatuto 

perpetuo  por  vuestras  generaciones  en 

todos vuestros asentamientos.

32

 Sábado de reposo solemne os será. Hu-

millaréis vuestras almas el noveno día del 

mes, reposando en vuestro shabbat desde 

la tarde hasta la otra tarde.

33

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

34

 Habla a los hijos de Israel, y diles: El 

día quince de ese mes séptimo es la fiesta 

solemne de las Cabañas° para YHVH du-

rante siete días.

35

 El  primer  día  habrá  santa  convoca-

ción. No haréis ningún trabajo de servi-

dumbre.

36

 Siete días presentaréis ofrendas ígneas 

ante YHVH. En el octavo día tendréis san-

ta  convocación,  y  presentaréis  ofrenda 

ígnea  ante  YHVH:  es  reunión  solemne, 

ninguna obra de servidumbre haréis.

37

 Estas  son  las  fiestas  solemnes  de 

YHVH, las santas convocaciones que lla-

maréis para presentar ofrenda ígnea ante 

YHVH, holocausto y ofrenda vegetal, sa-

crificio y libaciones, cada día lo que al día 

corresponda.

38

 Ello  además  de  los  días  de  reposo  de 

YHVH,  además  de  vuestros  dones,  ade-

más de todos vuestros votos y además de 

todas  vuestras  ofrendas  voluntarias  que 

daréis a YHVH.

39

 Ciertamente el día quince de este mes 

séptimo, cuando hayáis recogido el fruto 

de la tierra, celebraréis una fiesta solem-

ne a YHVH durante siete días.° El primer 

día habrá un reposo solemne, y el octavo 

día también habrá un reposo solemne.

40

 El  primer  día  tomaréis  para  vosotros 

fruto  de  árbol  selecto,  ramas  de  palme-

ras,  ramas  de  árboles  frondosos  y  sau-

ces  del  arroyo,°  y  durante  siete  días  os 

regocijaréis en presencia de YHVH vues-

tro Dios.

41

 Celebraréis esta fiesta solemne a YHVH 

anualmente  durante  siete  días.  Estatuto 

perpetuo  por  vuestras  generaciones  que 

celebraréis en el mes séptimo.

42

 Siete  días  moraréis  en  tabernáculos. 

Todo  natural  de  Israel  morará  en  taber-

náculos,

43

 para que vuestras generaciones venide-

ras sepan que en tabernáculos Yo hice mo-

rar a los hijos de Israel cuando los saqué de 

la tierra de Egipto. Yo, YHVH vuestro Dios.

44

 Así  promulgó  Moisés  a  los  hijos  de 

Israel  las  fiestas  solemnes  señaladas  de 

YHVH.

El cuidado del templo

24

YHVH habló a Moisés diciendo:

2

 Ordena  a  los  hijos  de  Israel  que 

te proporcionen aceite puro de olivas ma-

chacadas  para  el  alumbrado,  para  hacer 

arder la lámpara continuamente.

3

 Aarón la dispondrá en la Tienda de Reu-

nión,  al  exterior  del  velo  del  Testimonio, 

para que esté de continuo delante de YHVH, 

desde  la  tarde  hasta  la  mañana.  Estatuto 

perpetuo por vuestras generaciones.

4

 Sobre el candelabro de oro puro dispon-

drá las lámparas delante de YHVH conti-

nuamente.

5

 Y tomarás flor de harina y cocerás con 

ella doce tortas, cada torta será de dos dé-

cimas.°

6

 Las colocarás sobre la mesa de oro puro 

en dos hileras, seis en cada hilera, en pre-

sencia de YHVH.°

7

 Y  sobre  cada  hilera  pondrás  incienso 

puro, y será para el pan como memorial. 

Será ofrenda ígnea ante YHVH.

8

 De  shabbat  en  shabbat  lo  dispondrá 

delante  de  YHVH  continuamente,  de 

parte de los hijos de Israel como pacto 

perpetuo.

9

 Y será para Aarón y sus hijos,° los cua-

les lo comerán en lugar sagrado, porque 

es cosa santísima para él, de las ofrendas 

ígneas a YHVH, por estatuto perpetuo.

23.34-36 Heb. sukot. También enrramadas 

→Dt.16.13-15.  23.39-43 →Ex.23.16; 34.22.  23.40 La tradición rabínica establece 

cuatro clases de ramas en representación de la vegetación de aquella tierra: un fruto cítrico, una rama de palmera, tres ramas 

de mirto y dos ramas de sauce. Por eso a esta fiesta solemne también se la llama de las cuatro especies

24.5 Es decir: dos 

décimas de un efa. 

24.6 

→Ex.25.30.  24.9 →Mt.12.4; Mr.2.26; Lc.6.4. 


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Levítico 24:10

132

10

 Surgió  una  vez  entre  los  israelitas  un 

hijo de madre israelita y padre egipcio, y se 

originó una pelea en el campamento entre 

el hijo de la israelita y un varón de Israel.

11

 Y el hijo de la mujer israelita blasfemó 

el Nombre y prorrumpió en maldiciones; 

y fue llevado a Moisés. (El nombre de la 

madre de aquél era Selomit, hija de Dibrí, 

de la tribu de Dan).

12

 E  hicieron  ponerlo  en  custodia  has-

ta  que  les  fuera  declarado  por  boca  de 

YHVH.°

13

 Y YHVH habló a Moisés, diciendo:

14

 Haz salir al maldiciente fuera del cam-

pamento,  y  cuantos  lo  han  oído  impon-

gan sus manos sobre la cabeza de este y 

lapídelo toda la asamblea.

15

 Y hablarás a los hijos de Israel dicien-

do:  Cualquier  hombre  que  maldiga  a  su 

Dios, cargará su pecado,

16

 y el que blasfeme el nombre de YHVH 

será  muerto  irremisiblemente.  Sin  falta 

toda la asamblea lo apedreará. Sea extran-

jero o nativo, al blasfemar el Nombre será 

muerto.

17

 El hombre que hiera de muerte a otro 

hombre será muerto irremisiblemente.°

18

 El que mate algún animal lo restituirá: 

animal por animal.

19

 El que cause lesión a su prójimo, se-

gún hizo, así le será hecho:

20

 fractura por fractura, ojo por ojo, dien-

te por diente,° según la lesión que cause a 

otro, así se le hará.

21

 De manera que el que mate un animal, 

lo pagará, pero el que mate a un hombre, 

será muerto.

22

 Un mismo juicio habrá para vosotros, 

tanto para el extranjero como para el na-

tivo,° porque Yo soy YHVH vuestro Dios.

23

 Entonces  Moisés  habló  a  los  hijos 

de  Israel,  y  sacando  ellos  al  maldicien-

te  fuera  del  campamento,  lo  lapidaron 

con piedras. Y los hijos de Israel hicie-

ron según lo que YHVH había ordenado 

a Moisés.

Reposo de la tierra y el jubileo

25

Habló YHVH a Moisés en el monte 

Sinay diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel, y diles: Cuan-

do  entréis  en  la  tierra  que  Yo  os  doy,  la 

tierra guardará reposo para YHVH.

3

 Seis  años  cultivarás  tu  campo,  y  seis 

años podarás tu viña y recogerás su co-

secha,

4

 pero el séptimo año será shabbat de so-

lemne  reposo  para  la  tierra,  un  shabbat 

para  YHVH.  No  cultivarás  tu  campo,  ni 

podarás tu viña.

5

 No  segarás  lo  que  nazca  espontánea-

mente  después  de  tu  cosecha,  no  reco-

gerás las uvas de tus sarmientos. Año de 

reposo solemne será para la tierra.

6

 Y el fruto° del reposo de la tierra os será 

para alimento, a ti, a tu siervo, a tu sierva, 

a tu jornalero y al extranjero que habite 

contigo,

7

 para tus animales y las bestias que es-

tén en tu tierra, todo su fruto será para 

comer.°

8

 Y contarás para ti siete semanas de años: 

siete veces siete años, de manera que los 

días de las siete semanas de años te ven-

gan a ser cuarenta y nueve años.

9

 Y en el décimo día del mes séptimo ha-

rás resonar el shofar. En el día de la Ex-

piación haréis resonar el shofar por toda 

vuestra tierra.

10

 Santificaréis pues el año quincuagési-

mo, y proclamaréis en la tierra libertad a 

todos  sus  habitantes.  Será  jubileo°  para 

vosotros y cada uno volverá a su propie-

dad,  cada  uno  de  vosotros  volverá  a  su 

familia.

11

 El  año  quincuagésimo  será  para  vo-

sotros jubileo. No sembraréis ni segaréis 

lo que brote espontáneo, ni vendimiaréis 

sus viñedos sin cultivar,

12

 porque  es  jubileo  sagrado  para  voso-

tros. Del campo comeréis su fruto.

13

 En este año de jubileo cada uno de vo-

sotros volverá a su propiedad.

14

 Si  vendéis  algo  a  vuestro  prójimo  o 

compráis algo de mano de vuestro próji-

mo, no os engañéis mutuamente.

15

 Conforme al número de años después 

del jubileo, comprarás de tu prójimo, y él 

te venderá conforme al número de años 

de las cosechas.

24.12 Esto es, mientras indagaban la voluntad de Dios.  24.17 

→Ex.21.12.  24.20 →Ex.21.23-25; Mt.5.38.  24.22 →Nm.15.16. 

25.6 .fruto.  25.7 

→Ex.23.10-11.  25.10 Heb. yobel. Carnero; corneta-instrumento musical de viento; jubileo


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Levítico 25:43

133

16

 Según  aumenten  los  años,  multipli-

carás su precio, y según disminuyan los 

años, disminuirás su precio, porque él te 

está vendiendo según el número de cose-

chas.

17

 Ninguno oprima a su prójimo. Teme-

rás a tu Dios, porque Yo soy YHVH vues-

tro Dios.

18

 Cumpliréis mis estatutos, observaréis 

mis decretos y los haréis, para que habi-

téis seguros en la tierra.

19

 Y  la  tierra  dará  su  fruto,  y  comeréis 

hasta la saciedad, y habitaréis en ella con 

seguridad.

20

 Y si decís: ¿Qué comeremos el séptimo 

año, puesto que ni hemos de sembrar, ni 

hemos de recoger nuestras cosechas?

21

 Entonces sabed que en el sexto año Yo 

ordenaré mi bendición sobre vosotros, y 

la cosecha producirá para tres años.

22

 Y  sembraréis  en  el  octavo  año,  pero 

seguiréis  comiendo  de  la  cosecha  añeja 

hasta el año noveno, hasta que llegue la 

cosecha  del  octavo°  seguiréis  comiendo 

de lo añejo.

23

 La  tierra,  pues,  no  podrá  venderse  a 

perpetuidad, porque mía es la tierra, y vo-

sotros sois extranjeros y peregrinos para 

conmigo.

24

 Por tanto, en toda la tierra de vuestra 

posesión concederéis redención a° la tie-

rra.

25

 Si tu hermano empobrece, y vende una 

parte  de  su  propiedad,  vendrá  su  reden-

tor, su pariente más cercano, y rescatará 

lo que haya vendido su hermano.

26

 Y si un hombre no tiene redentor, pero 

prospera, y su mano alcanza para su res-

cate,

27

 calculará  los  años  desde  su  venta,  y 

pagará  lo  que  falta  a  la  persona  a  quien 

vendió, y volverá a su propiedad.

28

 Pero  si  su  mano  no  halla  para  recu-

perarlo, lo vendido quedará en mano del 

comprador hasta el año del jubileo, y en 

el jubileo quedará libre y volverá a su pro-

piedad.

29

 Si un hombre vende una casa de habi-

tación en una ciudad amurallada, su de-

recho de rescate durará hasta cumplirse 

el año de su venta, y podrá redimirla en el 

término de un año.

30

 Pero si no es rescatada antes de cum-

plirse un año entero, la casa que esté en la 

ciudad amurallada quedará a perpetuidad 

para el comprador y sus generaciones. No 

quedará libre en el jubileo.

31

 Pero las casas de las aldeas que no tie-

nen  muralla  alrededor,  serán  considera-

das como una parcela de tierra. Tendrán 

derecho a rescate y quedarán libres en el 

jubileo.

32

 En cuanto a las ciudades de los levitas, 

las casas en las ciudades de su propiedad 

tendrán  derecho  permanente  de  reden-

ción para los levitas.

33

 Así  que,  quien  compre  de  los  levitas, 

liberará en el jubileo la casa vendida en la 

ciudad que pertenece a los levitas, porque 

las casas de las ciudades de los levitas son 

propiedad suya entre los hijos de Israel.

34

 Pero el campo de pasto de sus ciuda-

des no se venderá, porque es propiedad de 

ellos para siempre.

35

 Si tu hermano empobrece y se halla en 

penuria a tu lado, tú lo sostendrás, aun-

que  sea  extranjero  y  forastero,  para  que 

pueda restablecerse junto a ti.°

36

 No  tomarás  de  él  usura  ni  ganancia, 

teniendo temor de tu Dios, para que pue-

da restablecerse tu hermano junto a ti.

37

 No  le  darás  tu  dinero  con  usura,°  ni 

con ganancia le darás tu alimento.

38

 Yo soy YHVH vuestro Dios, que os sa-

qué  de  la  tierra  de  Egipto  para  daros  la 

tierra de Canaán y para ser vuestro Dios.

39

 Si  un  hermano  tuyo  llega  a  ser  tan 

pobre junto a ti que se vende a ti, no lo 

someterás a trabajo de esclavo.°

40

 Como jornalero, como residente esta-

rá  contigo,  y  hasta  el  año  del  jubileo  te 

servirá.

41

 Entonces saldrá de estar contigo, él y 

sus hijos, y volverá a su familia y a la pro-

piedad de sus padres.

42

 Porque ellos son siervos míos, a quie-

nes  Yo  saqué  de  la  tierra  de  Egipto.  No 

serán vendidos a manera de esclavos,

43

 ni te enseñorearás de ellos con aspere-

za. Tendrás temor de tu Dios.

25.22 .octavo.  25.24 Heb. gue’ulah = redención.  25.35 

→Dt.15.7-8.  25.37 →Ex.22.25; Dt.23.19-20.  25.39-46 →Ex.21.2-6; 

Dt.15.12-18.


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Levítico 25:44

134

44

 Los  esclavos  y  las  siervas  que  tengas 

provendrán de las naciones paganas que 

os rodean. De ellas podréis adquirir escla-

vos y siervas.

45

 También de los hijos de los transeúntes 

que moran en medio de vosotros, de estos 

podréis adquirirlos, y de sus familias que 

hay entre vosotros, los que de ellos hayan 

nacido en vuestra tierra. De los tales será 

vuestra posesión,

46

 y  los  dejaréis  en  herencia  a  vuestros 

hijos después de vosotros como posesión 

hereditaria.  Pero  en  cuanto  a  vuestros 

hermanos, los hijos de Israel, no os ense-

ñorearéis uno sobre otro con aspereza.

47

 Y cuando la mano del extranjero o del 

transeúnte que mora en medio de ti alcan-

ce riqueza, y tu hermano que está con él 

empobrezca y se venda al extranjero o al 

transeúnte que mora contigo, o a los des-

cendientes de la familia de un extranjero,

48

 después de vendido le quedará el dere-

cho de redención: uno de sus hermanos 

deberá redimirlo,

49

 o su tío o un hijo de su tío debe res-

catarlo,  o  algún  pariente  cercano  de  su 

familia debe rescatarlo, o si prospera, él 

mismo podrá redimirse.

50

 Entonces hará el cálculo con aquel que 

lo compró, desde el año en que se vendió 

a él hasta el año del jubileo, y su precio 

de venta será según el número de años, 

conforme a los días de un jornalero.

51

 Si  aún  le  quedan  muchos  años,  con-

forme a ellos devolverá del dinero de su 

compra para su rescate,

52

 pero si le quedan pocos años hasta el 

año  del  jubileo,  así  los  calculará  con  él, 

y  devolverá  su  rescate  conforme  a  esos 

años.

53

 Como  quien  está  a  jornal  de  año  en 

año, así estará con él. No permitirás que 

éste se enseñoree de él con aspereza de-

lante de tus ojos.

54

 Y si no llegara a ser rescatado de algu-

na de esas maneras, saldrá libre en el año 

del jubileo, él, y sus hijos con él,

55

 porque los hijos de Israel son siervos 

para  mí,  siervos  míos  son,  a  los  cuales 

saqué  de  la  tierra  de  Egipto.  Yo,  YHVH 

vuestro Dios.

Obediencia y desobediencia

26

No haréis para vosotros ídolos,° ni 

imágenes  de  talla,°  ni  os  erigiréis 

estatua, ni pondréis en vuestra tierra pie-

dras  labradas  para  postraros  ante  ellas, 

porque Yo soy YHVH vuestro Dios.

2

 Guardaréis  mis  días  de  reposo°  y  ten-

dréis  temor  reverente  de  mi  Santuario. 

Yo, YHVH.

3

 Si  andáis  en  mis  estatutos  y  guardáis 

mis  mandamientos  para  ponerlos  por 

obra,

4

 entonces Yo daré vuestras lluvias en su 

época y la tierra rendirá su cosecha y el 

árbol del campo dará su fruto.

5

 La  trilla  alcanzará  hasta  la  vendimia,  y 

la vendimia alcanzará hasta la siembra, y 

comeréis vuestro pan hasta saciaros° y ha-

bitaréis con seguridad en vuestra tierra.

6

 Porque Yo estableceré la paz en vuestra 

tierra y os acostaréis sin que nadie os es-

pante. Haré también desaparecer de vues-

tra tierra las bestias feroces y la espada no 

pasará por vuestro país.

7

 Perseguiréis  a  vuestros  enemigos,  los 

cuales caerán a cuchillo delante de voso-

tros.

8

 Entonces, cinco de vosotros pondrán en 

fuga a cien, y cien de vosotros perseguirán 

a diez mil, y vuestros enemigos caerán a 

filo de espada delante de vosotros.

9

 Volveré  mi  rostro  hacia  vosotros,  y  os 

haré  fecundos  y  os  haré  multiplicar,  y 

confirmaré mi pacto con vosotros.

10

 Comeréis de lo muy añejo, y pondréis 

fuera lo añejo para guardar lo nuevo.

11

 Pondré  mi  Tabernáculo  en  medio  de 

vosotros, y mi alma no os abominará,

12

 y andaré en medio de vosotros, y seré 

a vosotros por ’Elohim, y vosotros me se-

réis por pueblo.°

13

 Yo, YHVH vuestro Dios, que os saqué 

de la tierra de Egipto para no ser esclavos 

de ellos. Yo rompí las coyundas de vues-

tro yugo y os he hecho andar erguidos.

14

 Pero si no queréis escucharme, ni po-

ner por obra todos estos mandamientos,

15

 y  rechazáis  mis  estatutos,  y  vuestra 

alma detesta mis ordenanzas para no po-

ner  por  obra  todos  mis  mandamientos, 

traspasando vosotros así mi pacto,

26.1 

→Lv.19.4.  26.1 →Ex.20.4; Dt.5.8; 16.21-22; 27.15.  26.2 Heb. shabbatot.  26.3-5 →Dt.11.13-15.  26.12 →2 Co.6.16. 


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Levítico 26:40

135

16

 Yo también haré esto con vosotros: Os 

impondré como castigo el terror súbito: 

tisis  y  fiebre  que  consuman  los  ojos  y 

hagan languidecer el alma. En vano sem-

braréis  vuestra  semilla,  porque  vuestros 

enemigos la comerán.

17

 Pondré  mi  rostro  contra  vosotros  y 

seréis  derrotados  delante  de  vuestros 

enemigos, y quienes os aborrecen se en-

señorearán de vosotros, y huiréis sin que 

haya quien os persiga.

18

 Y si aun con estas cosas no me obede-

céis, continuaré castigándoos siete veces 

más por vuestros pecados.

19

 Quebrantaré  la  soberbia  de  vuestro 

poderío,  y  tornaré  vuestros  cielos  como 

hierro y vuestra tierra como bronce.

20

 Vuestras  fuerzas  se  consumirán  en 

vano, vuestro suelo no dará su producto, 

y el árbol de la tierra no dará su fruto.

21

 Y  si  andáis  conmigo  en  oposición,  y 

no me queréis escuchar, entonces añadi-

ré sobre vosotros siete veces más plagas, 

conforme a vuestros pecados.

22

 Enviaré  contra  vosotros  a  la  fiera  del 

campo, que os arrebatará los hijos y des-

truirá vuestros animales, y os reducirá en 

número, de modo que vuestros caminos 

queden desolados.

23

 Y si aun con estas cosas no os enmen-

dáis ante mí, sino que continuáis andan-

do conmigo en oposición,

24

 entonces  Yo  también  procederé  contra 

vosotros en oposición, y Yo mismo os gol-

pearé siete veces más por vuestros pecados.

25

 Traeré sobre vosotros la espada venga-

dora en vindicación de mi pacto, y cuando 

os refugiéis en vuestras ciudades, enviaré 

pestilencia entre vosotros, y seréis entre-

gados en mano del enemigo.

26

 Cuando  Yo  os  quebrante  la  vara°  del 

pan, diez mujeres cocerán vuestro pan en 

un solo horno, y os devolverán vuestro pan 

por peso, y comeréis, pero no os saciaréis.

27

 Y  si  aun  con  esto  no  me  obedecéis, 

sino que seguís procediendo con hostili-

dad hacia mí,

28

 también Yo procederé contra vosotros 

con ira hostil, y Yo mismo os castigaré aún 

siete veces más por vuestros pecados,

29

 hasta que lleguéis a comer la carne de 

vuestros propios hijos, y la carne de vues-

tras propias hijas comeréis.

30

 Demoleré  vuestros  lugares  altos,  de-

rribaré  vuestras  imágenes  solares,°  y 

amontonaré vuestros cadáveres sobre los 

cadáveres de vuestros ídolos, y mi alma os 

abominará.

31

 Pondré  vuestras  ciudades  en  ruina, 

destruiré  vuestros  santuarios  y  no  oleré 

más el aroma aplacador de vuestros sacri-

ficios.

32

 Yo mismo asolaré el país, de modo que 

queden de ello asombrados vuestros ene-

migos que en él se establezcan.

33

 Y a vosotros os esparciré entre las na-

ciones, y haré desenvainar la espada tras 

vosotros, y vuestra tierra será devastada, y 

vuestras ciudades desoladas.

34

 Entonces  gozará  la  tierra  sus  días  de 

reposo  durante  todos  los  días  que  esté 

asolada,  mientras  vosotros  estéis  habi-

tando en la tierra de vuestros enemigos. 

Entonces  la  tierra  descansará  y  gozará 

sus días de reposo.

35

 Todo  el  tiempo  de  su  desolación  des-

cansará, lo que no descansó en vuestros 

días de reposo cuando habitasteis en ella.

36

 Y en cuanto a los que queden de voso-

tros,  infundiré  tal  cobardía  en  sus  cora-

zones en las tierras de sus enemigos, que 

el  sonido  de  una  hoja  que  se  mueva  los 

perseguirá, y huirán como se huye de la 

espada, y caerán sin que nadie los persi-

ga.

37

 Cada cual tropezará con su hermano, 

como huyendo ante la espada, sin que na-

die los persiga, y no podréis oponer resis-

tencia delante de vuestros enemigos.

38

 Y pereceréis en medio de las naciones, 

y la tierra de vuestros enemigos os con-

sumirá.

39

 Y  los  que  queden  de  vosotros,  desfa-

llecerán en su iniquidad en las tierras de 

vuestros enemigos, y también a causa de 

las iniquidades de sus antepasados se con-

sumirán juntamente con ellos.

40

 Pero ellos confesarán sus iniquidades, 

y  las  iniquidades  de  sus  padres,  y  la  re-

beldía con que se rebelaron contra mí. Y 

26.26 Vara donde se colgaban los panes redondos con un agujero central. Se colocaba a cierta altura en posición horizontal para 

resguardar el pan de los roedores. 

26.30 Naltares de incienso.


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Levítico 26:41

136

confesarán° también que por cuanto an-

duvieron en oposición conmigo,

41

 Yo también tuve que andar en oposi-

ción con ellos, y llevarlos a la tierra de sus 

enemigos. Entonces se humillará su co-

razón incircunciso y entonces aceptarán 

el castigo de su iniquidad.

42

 Entonces  Yo  también  recordaré  mi 

pacto con Jacob,° y también mi pacto con 

Isaac,° y también con Abraham° recorda-

ré mi pacto, y me acordaré de la tierra.

43

 Porque  la  tierra  habrá  quedado  des-

ocupada de ellos, y habrá gozado sus días 

de reposo mientras estaba en desolación 

sin ellos, y ellos habrán aceptado el casti-

go de su iniquidad, por haber rechazado 

mis ordenanzas y su alma aborrecido mis 

estatutos.

44

 Pero  ni  aun  por  todo  esto,  estando 

ellos en tierra de sus enemigos, los des-

echaré ni los aborreceré para destruirlos 

anulando  mi  pacto  con  ellos,  porque  Yo 

soy YHVH su Dios.

45

 Antes bien, me acordaré de ellos a cau-

sa del pacto con sus primeros antepasa-

dos, a quienes saqué de la tierra de Egipto 

ante los ojos de las naciones, para ser a 

ellos por ’Elohim. Yo, YHVH.

46

 Estos fueron los estatutos, los decretos 

y las leyes que YHVH puso entre Él y los 

hijos de Israel por mano de Moisés en el 

monte Sinay.

Ley para el rescate

27

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel y diles: 

Cuando  alguno  haga  un  voto  especial  a 

YHVH, con motivo del rescate de perso-

nas, lo valorarás así:

3

 Al hombre entre veinte y sesenta años 

lo valorarás en cincuenta siclos de plata, 

según el siclo del Santuario.

4

 Si  es  mujer,  la  valorarás  en  treinta  si-

clos.

5

 De  cinco  a  veinte  años,  tu  valoración 

para el varón será de veinte siclos, y para 

la mujer, de diez siclos.

6

 Y si es de un mes hasta cinco años, tu 

valoración  será  de  cinco  siclos  de  plata 

para el varón, y para la mujer de tres si-

clos de plata.

7

 Y si es de sesenta años o más, tu valora-

ción por el varón será de quince siclos, y 

por la mujer, de diez siclos.

8

 Pero si resulta él demasiado pobre para 

tu  valoración,  entonces  comparecerá 

ante el sacerdote, y el sacerdote lo valora-

rá según los recursos de quien formuló el 

voto. Así lo tasará el sacerdote.

9

 Si  es  ganado  apto  para  la  ofrenda  a 

YHVH,  todo  lo  que  de  él  se  dé  a  YHVH 

será sagrado.

10

 No  será  cambiado  ni  sustituido  uno 

bueno por uno malo ni uno malo por uno 

bueno. Si se sustituye un animal por otro, 

éste y el sustituido serán sagrados.

11

 Si se trata de un animal impuro, de la 

clase que no se debe presentar como víc-

tima ante YHVH, entonces el animal será 

puesto delante del sacerdote,

12

 y el sacerdote lo valorará, sea bueno o 

sea malo; conforme a la valoración del sa-

cerdote, así será.

13

 Y si uno quiere rescatarlo, añadirá un 

quinto a su valoración.

14

 Cuando alguno haga consagrar su casa 

dedicándola a YHVH, el sacerdote la valo-

rará, en bien como en mal. Según la valo-

re el sacerdote, así quedará.

15

 Y  si  el  que  la  hizo  consagrar  quiere 

rescatar  su  casa,  añadirá  un  quinto  del 

dinero de su valoración, y será suya.

16

 Cuando alguno haga consagrar a YHVH 

una parte del campo de su propiedad, tu 

valoración  será  conforme  a  su  siembra. 

Un omer de semilla de cebada se valorará 

en cincuenta siclos de plata.

17

 Si  hace  consagrar  su  campo  desde  el 

año del jubileo, tu valoración se manten-

drá,

18

 pero si hace consagrar su campo des-

pués del jubileo, entonces el sacerdote le 

calculará  el  dinero  según  los  años  que 

queden hasta el año del jubileo, y se reba-

jará de tu valoración.

19

 Y  si  el  que  hizo  consagrar  el  campo 

quiere rescatar el campo, añadirá a tu va-

loración un quinto del dinero de su valo-

ración, y será suyo.

20

 Pero si no desea rescatar el campo, o 

el campo se vende a otra persona, ya no lo 

podrá rescatar.

26.40 .confesarán.  26.42 

→Gn.28.13-14.  26.42 →Gn.26.3-4.  26.42 →Gn.17.7-8.


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Levítico 27:34

137

21

 Cuando  ese  campo  quede  libre  en  el 

jubileo,  será  sagrado  para  YHVH,  como 

campo del anatema, y pasará a ser propie-

dad del sacerdote.

22

 Y si alguien hace consagrar para YHVH 

un campo comprado, que no es un campo 

de propiedad por herencia,

23

 el  sacerdote  calculará  el  importe  de 

tu valoración hasta el año del jubileo y te 

dará tu valoración en ese mismo día. Es 

apartado para YHVH.

24

 En el año del jubileo, el campo retor-

nará a aquél de quien se compró, al que 

tiene la propiedad de la tierra.

25

 Y  toda  valoración  será  conforme  al 

siclo  del  Santuario;  veinte  geras  son  un 

siclo.

26

 Sin embargo, el primerizo de la vaca-

da, que por su primogenitura pertenece a 

YHVH, sea becerro o cordero, nadie pue-

de hacerlo consagrar. Es de YHVH.

27

 Pero si está entre los animales impu-

ros, entonces será rescatado según tu va-

loración, y añadirá sobre ella una quinta 

parte. Y si no es rescatado, se venderá se-

gún tu valoración.

28

 No  obstante,  ninguna  cosa  dedicada 

que cualquiera haya separado para YHVH 

de  su  propiedad  podrá  venderse  o  redi-

mirse,  sea  hombre  o  animal  o  campos 

de su posesión. Todo lo consagrado° será 

cosa santísima para YHVH.

29

 Ninguna persona bajo anatema podrá 

ser  rescatada.  Será  muerta  irremisible-

mente.

30

 Todo  el  diezmo  de  la  tierra,  así  de  la 

simiente del suelo como del fruto de los 

árboles, ya es de YHVH. Ya está consagra-

do a YHVH.

31

 Si  alguien  quiere  rescatar  algo  de  su 

diezmo, le añadirá su quinto.

32

 Asimismo respecto de todo el diezmo 

del ganado o del rebaño: de todo lo que 

pasa bajo el cayado, será un diezmo con-

sagrado a YHVH.

33

 No se ha de mirar si es bueno o malo, 

no se cambiará, y si de manera alguna se 

cambia, tanto él como su trueque serán 

santos. No podrán redimirse.°

34

 Estos  son  los  mandamientos  que 

YHVH ordenó a Moisés para los hijos de 

Israel en el monte Sinay.

27.28 

→Nm.18.14.  27.30-33 →Nm.18.21; Dt.14.22-29. 


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1

En  el  día  primero  del  mes  segundo, 

en el segundo año de su éxodo de la 

tierra de Egipto, estando en el desierto de 

Sinay, habló YHVH a Moisés en la Tienda 

de Reunión, diciendo:

2

 Levantad censo° de toda la asamblea de 

los hijos de Israel por sus familias, por sus 

casas paternas, contando los nombres de 

todos los varones, cabeza por cabeza,

3

 de veinte años arriba, todo el que pueda 

entrar°  al  ejército  en  Israel.  Tú  y  Aarón 

los alistaréis por sus ejércitos,

4

 y un varón de cada tribu, cada uno ca­

beza de su respectiva casa paterna, estará 

con vosotros.

5

 Estos  son  los  nombres  de  los  varones 

que  se  presentarán  con  vosotros:  De  la 

tribu de Rubén: Elisur° ben Sedeur.

6

 De Simeón: Selumiel ben Zurisadai.°

7

 De Judá: Naasón ben Aminadab.

8

 De Isacar: Natanael ben Suar.

9

 De Zabulón: Eliab ben Helón.

10

 De los hijos de José: de Efraín, Elisa­

ma ben Amiud, de Manasés: Gamaliel ben 

Pedasur.

11

 De Benjamín: Abidán ben Gedeoni.

12

 De Dan: Ahiezer ben Amisadai.

13

 De Aser: Pagiel ben Ocrán.

14

 De Gad: Eliasaf ben Dehuel.

15

 De Neftalí: Ahira ben Enán.

16

 Estos  fueron  los  designados  de  entre 

la asamblea, jerarcas de las tribus de sus 

padres y cabezas de los millares de Israel.

17

 Tomaron° pues Moisés y Aarón a estos 

varones que fueron designados por nom­

bres,

18

 e  hicieron  congregar  a  toda  la  asam­

blea el día primero del mes segundo, y se 

registraron por sus familias, por su casa 

paterna, según el número de los nombres, 

de veinte años arriba, cabeza por cabeza.

19

 Conforme  YHVH  había  ordenado  a 

Moisés,  así  los  alistó  en  el  desierto  de 

Sinay.

20

 En  cuanto  a  los  hijos  de  Rubén,  pri­

mogénito de Israel, hecha su genealogía 

según  sus  familias,  sus  casas  paternas, 

enumerando  nominalmente  cabeza  por 

cabeza, todos los varones de veinte años 

arriba, todos los aptos para el ejército,

21

 los alistados de la tribu de Rubén fue­

ron cuarenta y seis mil quinientos.

22

 De los hijos de Simeón, hecha su ge­

nealogía  según  sus  familias,  sus  casas 

paternas,  enumerando  nominalmente, 

cabeza  por  cabeza,  todos  los  varones  de 

veinte años arriba, todos los aptos para el 

ejército,

23

 los alistados de la tribu de Simeón fue­

ron cincuenta y nueve mil trescientos.

24

 De los hijos de Gad, hecha su genealo­

gía según sus familias, sus casas paternas, 

enumerando  nominalmente,  de  veinte 

años arriba, todos los aptos para el ejér­

cito,

25

 los  alistados  de  la  tribu  de  Gad  fueron 

cuarenta y cinco mil seiscientos cincuenta.

26

 De los hijos de Judá, hecha su genealo­

gía según sus familias, sus casas paternas, 

enumerando  nominalmente,  de  veinte 

años arriba, todos los aptos para el ejér­

cito,

27

 los alistados de la tribu de Judá fueron 

setenta y cuatro mil seiscientos.

28

 De  los  hijos  de  Isacar,  hecha  su  ge­

nealogía  según  sus  familias,  sus  casas 

paternas, enumerando nominalmente, de 

veinte años arriba, todos los aptos para el 

ejército,

El primer censo

1.2-46 

→Nm.26.1-51.  1.3 Lit. salir.  1.5 Esto es, mi Dios es roca.  1.6 Esto es, mi roca es el Todopoderoso.  1.17 lit. tomó


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Números 2:3

139

29

 los alistados de la tribu de Isacar fueron 

cincuenta y cuatro mil cuatrocientos.

30

 De los hijos de Zabulón, hecha su ge­

nealogía según sus familias, sus casas pa­

ternas,  enumerando  nominalmente,  de 

veinte años arriba, todos los aptos para el 

ejército,

31

 los alistados de la tribu de Zabulón fue­

ron cincuenta y siete mil cuatrocientos.

32

 De  los  hijos  de  José:  por  los  hijos  de 

Efraín,  hecha  su  genealogía  según  sus 

familias, sus casas paternas, enumerando 

nominalmente, de veinte años arriba, to­

dos los aptos para el ejército,

33

 los alistados de la tribu de Efraín fue­

ron cuarenta mil quinientos.

34

 De  los  hijos  de  Manasés,  hecha  su 

genealogía según sus familias, sus casas 

paternas, enumerando nominalmente, de 

veinte años arriba, todos los aptos para el 

ejército,

35

 los  alistados  de  la  tribu  de  Manasés 

fueron treinta y dos mil doscientos.

36

 De  los  hijos  de  Benjamín,  hecha  su 

genealogía según sus familias, sus casas 

paternas, enumerando nominalmente, de 

veinte años arriba, todos los aptos para el 

ejército,

37

 los  alistados  de  la  tribu  de  Benjamín 

fueron treinta y cinco mil cuatrocientos.

38

 De los hijos de Dan, hecha su genealogía 

según sus familias, sus casas paternas, enu­

merando  nominalmente,  de  veinte  años 

arriba, todos los aptos para el ejército,

39

 los alistados de la tribu de Dan fueron 

sesenta y dos mil setecientos.

40

 De los hijos de Aser, hecha su genea­

logía  según  sus  familias,  sus  casas  pa­

ternas,  enumerando  nominalmente,  de 

veinte años arriba, todos los aptos para el 

ejército,

41

 los alistados de la tribu de Aser fueron 

cuarenta y un mil quinientos.

42

 Los hijos de Neftalí, hecha su genealogía 

según sus familias, sus casas paternas, enu­

merando  nominalmente,  de  veinte  años 

arriba, todos los aptos para el ejército,

43

 los alistados de la tribu de Neftalí fue­

ron cincuenta y tres mil cuatrocientos.

44

 Tales fueron los alistados que registra­

ron Moisés y Aarón, juntamente con los 

doce jerarcas de Israel, uno por cada casa 

paterna.

45

 Todos los alistados de los hijos de Is­

rael por sus casas paternas, de veinte años 

arriba, todos los que en Israel podían salir 

a la guerra,

46

 resultaron°  seiscientos  tres  mil  qui­

nientos cincuenta.

47

 Pero los levitas no fueron alistados en 

medio de ellos a causa de la tribu de sus 

padres,

48

 pues YHVH había hablado a Moisés di­

ciendo:

49

 Ciertamente no alistarás a la tribu de 

Leví ni los censarás en medio de los hijos 

de Israel.

50

 Tú  pues  encarga  a  los  levitas  respec­

to al Tabernáculo del Testimonio, acerca 

de todos sus utensilios, y todo lo que le 

pertenece. Ellos cargarán el Tabernáculo 

y todos sus utensilios y ministrarán en él, 

y acamparán alrededor del Tabernáculo.

51

 Cuando el Tabernáculo haya de poner­

se en marcha, los levitas lo desmontarán, 

y cuando el Tabernáculo acampe, los levi­

tas lo armarán, y el extraño que se acer­

que será muerto.

52

 Los hijos de Israel acamparán cada uno 

en su campamento junto a su estandarte, 

por sus ejércitos.

53

 Pero los levitas acamparán en torno al 

Tabernáculo del Testimonio para que no 

venga la ira sobre la asamblea de los hijos 

de Israel. Los levitas cuidarán de guardar 

el Tabernáculo del Testimonio.

54

 Y  los  hijos  de  Israel  hicieron  todo  lo 

que YHVH había ordenado a Moisés. Así 

hicieron.

Disposiciones para acampar y partir

2

Habló  YHVH  a  Moisés  y  a  Aarón,  di­

ciendo:

2

 Los hijos de Israel acamparán cada uno 

junto a su propio estandarte bajo las in­

signias de sus casas paternas. Dando fren­

te a la Tienda de Reunión, acamparán en 

su derredor.

3

 Al oriente, hacia donde se levanta el sol, 

acamparán  los  del  campamento  de  Judá 

por sus ejércitos, siendo el adalid de los 

hijos de Judá, Naasón ben Aminadab.

1.46 Lit. sus alistados.


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Números 2:4

140

4

 Su  ejército,  según  sus  alistados,  es  de 

setenta y cuatro mil seiscientos.

5

 Junto a él acamparán los de la tribu de 

Isacar, siendo el adalid de los hijos de Isa­

car, Natanael ben Suar.

6

 Su  ejército,  según  sus  alistados,  es  de 

cincuenta y cuatro mil cuatrocientos.

7

 Y la tribu de Zabulón, siendo el adalid 

de los hijos de Zabulón, Eliab ben Helón.

8

 Su  ejército,  según  sus  alistados  es  de 

cincuenta y siete mil cuatrocientos.

9

 El  total  de  alistados  del  campamento 

de  Judá  es  de  ciento  ochenta  y  seis  mil 

cuatrocientos  según  sus  ejércitos.  Éstos 

marcharán a la cabeza.

10

 Al sur estará el estandarte del campa­

mento de Rubén, por sus ejércitos, siendo 

el adalid de los hijos de Rubén, Elisur ben 

Sedeur.

11

 Su ejército, según sus alistados, es de 

cuarenta y seis mil quinientos.

12

 Junto a él acamparán los de la tribu de 

Simeón,  siendo  el  adalid  de  los  hijos  de 

Simeón, Selumiel ben Zurisadai.

13

 Su ejército, según sus alistados, es de 

cincuenta y nueve mil trescientos.

14

 Y la tribu de Gad, siendo el adalid de 

los hijos de Gad, Eliasaf ben Reuel.

15

 Su  ejército,  según  sus  alistados,  es 

de cuarenta y cinco mil seiscientos cin­

cuenta.

16

 El  total  de  alistados  del  campamento 

de Rubén, es de ciento cincuenta y un mil 

cuatrocientos cincuenta según sus ejérci­

tos. Ellos marcharán de segundos.

17

 Luego marchará la Tienda de Reunión 

y  el  campamento  de  los  levitas  en  me­

dio de los otros campamentos. Tal como 

acampan, así saldrán, cada uno en su po­

sición, estandarte por estandarte.

18

 El  estandarte  del  campamento  de 

Efraín,  por  sus  ejércitos,  estará  al  oc­

cidente,  siendo  el  adalid  de  los  hijos  de 

Efraín, Elisama ben Amiud.

19

 Su ejército, según sus alistados, es de 

cuarenta mil quinientos.

20

 Junto a él, la tribu de Manasés, siendo 

el adalid de los hijos de Manasés, Gama­

liel ben Pedasur.

21

 Su ejército, según sus alistados, es de 

treinta y dos mil doscientos.

22

 Luego la tribu de Benjamín, siendo el 

adalid  de  los  hijos  de  Benjamín,  Abidán 

ben Gedeoni.

23

 Su ejército, según sus alistados, es de 

treinta y cinco mil cuatrocientos.

24

 El total de alistados del campamento de 

Efraín es de ciento ocho mil cien según sus 

ejércitos. Ellos marcharán de terceros.

25

 El estandarte del campamento de Dan 

estará  al  norte  por  sus  ejércitos,  siendo 

el adalid de los hijos de Dan, Ahiezer ben 

Amisadai.

26

 Su ejército, según sus alistados, es de 

sesenta y dos mil setecientos.

27

 Junto a él acamparán los de la tribu de 

Aser, siendo el adalid de los hijos de Aser, 

Pagiel ben Ocrán.

28

 Su ejército, según sus alistados, es de 

cuarenta y un mil quinientos.

29

 Y la tribu de Neftalí, siendo el adalid de 

los hijos de Neftalí, Ahira ben Enán.

30

 Su ejército, según sus alistados, es de 

cincuenta y tres mil cuatrocientos.

31

 El  total  de  alistados  del  campamento 

de Dan es de ciento cincuenta y siete mil 

seiscientos. Ellos marcharán a retaguar­

dia, según sus estandartes.

32

 Tales fueron los alistados de los hijos 

de  Israel  por  sus  casas  paternas.  Todos 

los alistados de los campamentos, por sus 

ejércitos, fueron seiscientos tres mil qui­

nientos cincuenta.

33

 Pero  los  levitas  no  fueron  alistados 

entre los hijos de Israel, tal como YHVH 

había ordenado a Moisés.

34

 Y los hijos de Israel hicieron conforme 

a todo lo que YHVH había ordenado a Moi­

sés. Así acamparon según sus estandartes y 

así emprendieron la marcha, cada uno con­

forme a su familia, según su casa paterna.

Institución y funciones de los levitas

3

Estos son los descendientes de Aarón° 

y Moisés, el día que YHVH habló con 

Moisés en el monte Sinay:

2

 Estos pues son los nombres de los hijos 

de  Aarón:  Nadab,  el  primogénito,  Abiú, 

Eleazar e Itamar.

3

 Estos  son  los  nombres  de  los  hijos  de 

Aarón, los sacerdotes ungidos, cuyas ma­

nos él consagró para ejercer el sacerdocio.

3.1 

→Nm.26.60.


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Números 3:35

141

4

 Pero Nadab y Abiú murieron delante de 

YHVH° cuando aproximaron fuego extra­

ño en presencia de YHVH en el desierto 

de  Sinay,  y  no  tuvieron  hijos.  Y  Eleazar 

e Itamar ejercieron el sacerdocio en pre­

sencia de su padre Aarón.

5

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

6

 Haz que se presente la tribu de Leví y 

ponla ante el sacerdote Aarón para que lo 

asistan.

7

 Cumplirán el servicio para él y para toda 

la  asamblea  ante  la  Tienda  de  Reunión 

para  ocuparse  en  el  servicio  del  Taber­

náculo.

8

 Y  cuidarán  todos  los  utensilios  de  la 

Tienda  de  Reunión,  y  la  observancia  de 

los hijos de Israel para servir en la labor 

del Tabernáculo.

9

 Harás  pues  donación  de  los  levitas  a 

Aarón y a sus hijos. Ellos le son entera­

mente  cedidos  de  entre  los  hijos  de  Is­

rael.

10

 Pero encargarás a Aarón y a sus hijos 

que  sólo  ellos  se  ocupen  en  su  sacerdo­

cio, pues el extraño que se acerque será 

muerto.

11

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

12

 En cuanto a mí, he aquí he tomado a 

los levitas de entre los hijos de Israel en 

lugar de todo primogénito que abre ma­

triz entre los hijos de Israel.°

13

 Los  levitas  me  pertenecen,  porque 

mío es todo primogénito. El día en que 

herí a todo primogénito en la tierra de 

Egipto,  consagré  para  mí  a  todos  los 

primogénitos  de  Israel,  así  de  hom­

bres como de animales.° ¡Míos son! Yo, 

YHVH.

14

 Habló YHVH a Moisés en el desierto de 

Sinay, diciendo:

15

 Cuenta a los hijos de Leví por sus ca­

sas paternas, por sus familias. Contarás a 

todo varón de un mes arriba.

16

 Los contó pues Moisés conforme al di­

cho de YHVH, tal como le fue ordenado.

17

 Y éstos fueron los hijos de Leví por sus 

nombres: Gersón, Coat, y Merari.

18

 Y los nombres de los hijos de Gersón, 

por sus familias: Libni y Simei.

19

 Los  hijos  de  Coat,  por  sus  familias: 

Amram, Izhar, Hebrón y Uziel.

20

 Y los hijos de Merari, por sus familias: 

Mahli y Musi. Estas son las familias de los 

levitas, según sus casas paternas.

21

 De Gersón: la familia de Libni y la de 

Simei; tales son las familias gersonitas.

22

 Y  los  censados,  según  el  número  de 

todo varón de un mes arriba, fueron siete 

mil quinientos.

23

 Las familias de Gersón acamparon de­

trás del Tabernáculo, al occidente.

24

 El adalid de la casa paterna de los ger­

sonitas era Eliasaf ben Lael.

25

 La custodia de los hijos de Gersón en 

la Tienda de Reunión comprendía el Ta­

bernáculo,  la  Tienda  con  su  cubierta,  la 

cortina  de  entrada  de  la  Tienda  de  Reu­

nión,

26

 las cortinas del atrio, la cortina de la 

entrada de este, que está alrededor del Ta­

bernáculo y del altar, y las cuerdas para 

todo su servicio.

27

 A Coat pertenece la familia de Amram, 

la familia de Izhar, la familia de Hebrón y 

la familia de Uziel. Tales son las familias 

de los coatitas.

28

 Según el número de todo varón de un 

mes  arriba,  eran  ocho  mil  seiscientos, 

que tenían la custodia del Santuario.

29

 Las familias de los hijos de Coat acam­

paban  al  costado  meridional  del  Taber­

náculo,

30

 siendo el adalid de la casa paterna de 

las familias de Coat, Elisafán ben Uziel.

31

 Al  cuidado  de  ellos  estaba  el  Arca,  la 

mesa, el candelabro, los altares, los uten­

silios  del  Santuario  con  los  que  minis­

tran, y el velo con todo su servicio.

32

 El principal de los jerarcas de los levi­

tas era Eleazar, hijo del sacerdote Aarón, 

encargado  de  los  guardas  que  custodia­

ban el Santuario.

33

 De Merari era la familia de los mahali­

tas y la familia de los musitas. Tales eran 

las estirpes de Merari.

34

 Sus  empadronados,  según  el  número 

de todo varón de un mes para arriba fue­

ron seis mil doscientos.

35

 El adalid de la casa paterna de las fa­

milias  de  Merari  era  Zuriel  ben  Abihail. 

Acampaban  al  costado  norte  del  Taber­

náculo.

3.4 

→Lv.10.1-2; Nm.26.61.  3.12 →Ex.13.11-16, 32.26; Dt.33.8.  3.13 →Ex.13.2.


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Números 3:36

142

36

 A cargo de los hijos de Merari estaban 

los tablones del Tabernáculo, sus travesa­

ños,  sus  columnas,  sus  basas,  todos  sus 

utensilios y todo lo concerniente a su ser­

vicio,

37

 así como las columnas que rodean el 

atrio,  sus  basas,  sus  estacas  y  sus  cuer­

das.

38

 Al oriente, frente al Santuario y delan­

te de la Tienda de Reunión, hacia el este, 

acamparán  Moisés,  y  Aarón  y  sus  hijos, 

quienes harán la guardia del Santuario en 

nombre de los hijos de Israel. El extraño 

que se acerque será muerto.

39

 Todos  los  empadronados  de  los  levitas 

que por orden de YHVH contaron Moisés 

y Aarón, por sus familias, todos los varones 

de un mes arriba, fueron veintidós mil.

40

 YHVH dijo a Moisés: Cuenta todo pri­

mogénito varón de los hijos de Israel de 

un  mes  arriba,  y  forma  el  censo  de  sus 

nombres.

41

 Y tomarás para mí los levitas, Yo, YHVH, 

en lugar de todos los primogénitos de los 

hijos de Israel, y también los animales de 

los levitas en lugar de todo primerizo de 

los animales de los hijos de Israel.

42

 Y  tal  como  YHVH  le  había  ordenado, 

Moisés  contó  todos  los  primogénitos  de 

los hijos de Israel.

43

 Y todo primogénito varón, por la cuen­

ta de los nombres, de un mes para arriba, 

según  sus  empadronados,  fueron  veinti­

dós mil doscientos setenta y tres.

44

 Luego  YHVH  habló  a  Moisés,  dicien­

do:

45

 Toma  a  los  levitas  en  lugar  de  todo 

primogénito  de  los  hijos  de  Israel  y  los 

animales  de  los  levitas  en  lugar  de  los 

animales  de  aquellos,  y  los  levitas  serán 

míos. Yo, YHVH.

46

 Para rescate de los doscientos setenta 

y tres en que los primogénitos de los hijos 

de Israel exceden a los levitas,

47

 tomarás cinco siclos por cabeza. Lo to­

marás conforme al siclo del Santuario, de 

veinte geras por siclo,

48

 y darás a Aarón y a sus hijos el dine­

ro del rescate del número que excede de 

ellos.

49

 Tomó pues Moisés el dinero del resca­

te, de los que excedían a los redimidos por 

los levitas,

50

 y recibió en dinero de los primogéni­

tos de los hijos de Israel, mil trescientos 

sesenta y cinco siclos, conforme al siclo 

del Santuario.

51

 Y Moisés entregó el dinero de los re­

dimidos a Aarón y a sus hijos, conforme 

al dicho de YHVH, tal como YHVH había 

ordenado a Moisés.

Segundo censo de los levitas

4

Habló  YHVH  a  Moisés  y  a  Aarón,  di­

ciendo:

2

 Levanta un censo de los hijos de Coat en­

tre los hijos de Leví, según sus familias y 

sus casas paternas.

3

 De edad de treinta años en adelante, hasta 

cincuenta años, todo el que entra en la mi­

licia° para servir en la Tienda de Reunión.

4

 El servicio de los hijos de Coat en la Tien­

da de Reunión será éste: las cosas más sa­

gradas.

5

 Cuando el campamento se traslade, en­

trará  Aarón  y  sus  hijos  y  descolgarán  el 

velo  de  separación,  con  que  cubrirán  el 

Arca del Testimonio.

6

 Sobre  ella  pondrán  la  cubierta  de  piel 

de tejón, y extendiendo encima un paño 

todo de azul, le colocarán sus varas.

7

 También  sobre  la  mesa  de  proposición 

extenderán  un  paño  de  azul,  y  pondrán 

sobre  ella  las  fuentes,  las  cazoletas,  las 

tazas y las copas de libación; el pan per­

petuo° quedará encima.

8

 Sobre estas cosas extenderán luego un 

paño  de  escarlata  y  lo  taparán  con  una 

cubierta  de  piel  de  tejón,  y  le  colocarán 

sus varas.

9

 Después tomarán un paño de azul y cu­

brirán el candelabro del alumbrado y sus 

lámparas, sus despabiladeras, sus platillos 

y todos los recipientes del aceite con los 

que se le da servicio.

10

 Y lo envolverán con todos sus utensi­

lios en una cubierta de piel de tejón, po­

niéndolo sobre las parihuelas.

11

 Extenderán asimismo sobre el altar de 

oro un paño de azul, lo cubrirán con una 

4.3 Esto es, la milicia sagrada. Los levitas no podían formar parte del ejército de Israel, pero eran tratados como soldados en el 

servicio del Tabernáculo. 

4.7 Lit. pan de siempre. Se refiere a la ofrenda permanente representada por los panes de la mesa. 


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Números 4:35

143

cubierta  de  piel  de  tejón,  y  le  colocarán 

sus varas.

12

 Y  tomarán  todos  los  utensilios  del 

servicio  con  los  cuales  ministran  en  el 

Santuario  y  los  envolverán  en  un  paño 

de  azul,  cubriéndolos  con  una  cubierta 

de piel de tejón, y los pondrán sobre unas 

parihuelas.

13

 Después quitarán la ceniza del altar, y 

extenderán sobre él un paño de púrpura,

14

 y  pondrán  sobre  él  todos  sus  utensi­

lios  con  los  cuales  ministran:  braseros, 

garfios,  paletas  y  tazones,  todos  los  ins­

trumentos del altar, y extenderán sobre él 

una cubierta de piel de tejón, y le coloca­

rán sus varas.

15

 Cuando  Aarón  y  sus  hijos  hayan  ter­

minado  de  cubrir  los  objetos  sagrados 

con todos los utensilios del Santuario, al 

moverse  el  campamento,  entonces  ven­

drán los hijos de Coat para transportar­

los,  pero  no  tocarán  el  Santuario,  pues 

morirían. Estas son las cosas de la Tienda 

de  Reunión  que  transportarán  los  hijos 

de Coat.

16

 Y  Eleazar,  hijo  del  sacerdote  Aarón, 

estará encargado del aceite del alumbra­

do,  del  incienso  aromático,  de  la  ofren­

da vegetal permanente y del aceite de la 

unción. Estará encargado de todo el Ta­

bernáculo y de todo lo que hay en él, del 

Santuario y sus utensilios.

17

 Y habló YHVH a Moisés y a Aarón, di­

ciendo:

18

 No permitáis que la tribu de las fami­

lias de los coatitas sea exterminada de en­

tre los levitas.

19

 Esto habéis de hacer con ellos para que 

vivan y no mueran cuando se acerquen a 

los objetos° santísimos: Aarón y sus hijos 

entrarán y asignarán a cada uno su servi­

cio y su transporte,

20

 pero no entrarán, ni por un momento, 

para mirar los objetos sagrados, para que 

no mueran.

21

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

22

 Haz  también  el  censo  de  los  hijos  de 

Gersón  por  sus  casas  paternas,  por  sus 

familias.

23

 Los alistarás de treinta años en adelan­

te, hasta cincuenta, todos ellos entrarán 

en la milicia para hacer el servicio de la 

Tienda de Reunión.

24

 Éste  será  el  trabajo  de  las  familias  de 

Gersón, respecto al servicio y al transporte:

25

 Transportarán  las  cortinas  del  Taber­

náculo y la Tienda de Reunión, su cubier­

ta y la cubierta de tejón que está encima 

de él, y la cortina de la entrada de la Tien­

da de Reunión.

26

 También las cortinas del atrio, la cor­

tina  de  la  entrada  del  atrio  que  está  al­

rededor  del  Tabernáculo  y  del  altar,  sus 

cuerdas, todos los utensilios de su servi­

cio y todo lo que se debe hacer con ellos. 

Así servirán.

27

 Todo el trabajo de los hijos de Gersón, 

en todos sus cargos y en todo su servicio, 

será según el dicho de Aarón y sus hijos, 

y les asignaréis la custodia de toda su car­

ga.

28

 Tal es el servicio de las familias gerso­

nitas en la Tienda de Reunión. Sus debe­

res  estarán  en  mano  de  Itamar,  hijo  del 

sacerdote Aarón.

29

 Contarás también a los hijos de Merari, 

por sus familias, por sus casas paternas.

30

 Los alistarás desde los treinta hasta los 

cincuenta años de edad, todos ellos entra­

rán en la milicia para hacer el servicio de 

la Tienda de Reunión.

31

 El  deber  de  su  carga  en  todo  su  ser­

vicio en la Tienda de Reunión será el si­

guiente: los tablones del Tabernáculo, sus 

travesaños, sus columnas y sus basas,

32

 las  columnas  del  atrio  que  lo  rodea, 

sus basas, sus estacas y sus cuerdas, todos 

sus utensilios y todo su servicio. Y asigna­

réis por nombre todos los utensilios que 

deben transportar.

33

 Tal es el servicio de las familias mera­

ritas  en  todo  su  trabajo  en  la  Tienda  de 

Reunión, por mano de Itamar, hijo del sa­

cerdote Aarón.

34

 Así  pues  Moisés,  Aarón  y  los  jerarcas 

de  la  asamblea,  pasaron  lista  a  los  hijos 

de Coat por sus familias y por sus casas 

paternas,

35

 desde  los  treinta  años  hasta  los  cin­

cuenta años de edad, todo el que entraba 

en la milicia para servir en la Tienda de 

Reunión.

4.19 .objetos


background image

Números 4:36

144

36

 Y los contados por sus familias fueron 

dos mil setecientos cincuenta.

37

 Estos  fueron  los  contados  de  las  fa­

milias  de  Coat,  todos  los  que  sirven  en 

la  Tienda  de  Reunión,  a  los  cuales  cen­

só Moisés y Aarón conforme al dicho de 

YHVH, por medio de Moisés.

38

 Y los contados de los hijos de Gersón, 

por  sus  familias,  y  por  sus  casas  pater­

nas,

39

 desde la edad de treinta años en ade­

lante hasta los cincuenta, todo el que en­

traba en la milicia para servir en la Tienda 

de Reunión,

40

 los contados por sus familias, por sus 

casas paternas, fueron dos mil seiscientos 

treinta.

41

 Estos fueron los contados de las fami­

lias  de  los  hijos  de  Gersón,  todo  el  que 

sirve en la Tienda de Reunión, los cuales 

Moisés y Aarón contaron conforme al di­

cho de YHVH.

42

 Y  los  contados  de  las  familias  de  los 

hijos de Merari, por sus familias, por sus 

casas paternas,

43

 desde la edad de treinta años en ade­

lante hasta los cincuenta, todo el que en­

traba en la milicia para servir en la Tienda 

de Reunión,

44

 los  contados  por  sus  familias,  fueron 

tres mil doscientos.

45

 Tales fueron los contados de las fami­

lias de los hijos de Merari, que contaron 

Moisés  y  Aarón,  conforme  al  dicho  de 

YHVH por medio de Moisés.

46

 Todos los levitas enumerados a los que 

Moisés y Aarón y los jerarcas de Israel pa­

saron lista por sus familias y por sus casas 

paternas,

47

 de  treinta  años  en  adelante  hasta  los 

cincuenta,  todo  el  que  entraba  para  ha­

cer la obra del servicio y la obra de llevar 

cargas, en lo relativo a la Tienda de Reu­

nión,

48

 fueron  ocho  mil  quinientos  ochenta 

empadronados.

49

 Así, conforme al dicho de YHVH, fue­

ron  contados  por  mano  de  Moisés,  cada 

uno según su obra y según su cargo. Fue­

ron contados tal como YHVH había orde­

nado a Moisés.

Acerca de los impuros, de la restitución 

y de los celos

5

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Ordena a los hijos de Israel que des­

pidan del campamento a todo leproso, a 

todo afectado de gonorrea,° y a cualquier 

contaminado por cuerpo muerto.

3

 Expulsad tanto al varón como a la mu­

jer. Los expulsaréis fuera del campamento 

para que no se contamine el campamento 

en medio del cual Yo habito.

4

 Y los hijos de Israel hicieron así. Los ex­

pulsaron fuera del campamento tal como 

YHVH había hablado a Moisés. Así hicie­

ron los hijos de Israel.

5

 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

6

 Habla a los hijos de Israel: Cualquier hom­

bre o mujer que cometa cualquier pecado 

en perjuicio del prójimo, prevaricando así 

contra YHVH, tal persona será culpable.

7

 Confesará  pues  el  pecado  cometido,  y 

restituirá el objeto del delito en su pleno 

valor, añadiendo a ello un quinto, y lo en­

tregará al perjudicado.

8

 Y si la persona no tiene pariente a quien 

se le restituya el daño, el objeto del delito 

será  para  YHVH,  para  el  sacerdote,  ade­

más del carnero de las expiaciones, con el 

cual hará expiación por el culpable.°

9

 Toda  ofrenda  alzada  de  todas  las  cosas 

consagradas  que  los  hijos  de  Israel  pre­

senten al sacerdote, será suya,

10

 y  lo  santificado  por  cualquiera  será 

suyo,  asimismo  lo  que  cualquiera  dé  al 

sacerdote, será suyo.

11

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

12

 Habla a los hijos de Israel, y les dirás: 

Cuando la mujer de alguno se desvíe y le 

sea infiel,

13

 y otro hombre tenga relaciones sexua­

les con ella, y esto esté encubierto al co­

nocimiento de su marido (porque cuando 

se amancilló no hubo testigo contra ella, 

ni fue sorprendida en el acto),°

14

 y le sobrevenga° espíritu de celos, de 

modo que recele de su mujer, habiéndose 

ella mancillado realmente, o le sobreven­

ga espíritu de celos y recele de su mujer, 

sin haberse ella mancillado,

15

 entonces aquel hombre llevará su mu­

jer ante el sacerdote, y llevará su ofrenda 

5.2 Heb. zab. LXX gonorrue.  5.5-8 

→Lv.6.1-7.  5.13 .en el acto.  5.14 Esto es, al marido


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Números 6:7

145

por ella: una décima de un efa de harina 

de cebada, pero no derramará sobre ella 

aceite ni pondrá sobre ella incienso, por­

que  es  ofrenda  vegetal  de  celos,  ofrenda 

conmemorativa que renueva la memoria 

del pecado.

16

 Entonces  el  sacerdote  hará  que  se° 

acerque y se mantenga en pie delante de 

YHVH.

17

 Luego el sacerdote tomará agua con­

sagrada en una vasija de barro, y del polvo 

que hay en el suelo del Tabernáculo, to­

mará el sacerdote y lo echará en el agua.

18

 El sacerdote hará pues que la mujer 

se  mantenga  en  pie  delante  de  YHVH, 

soltará el cabello de la mujer° y pondrá 

en sus palmas la ofrenda vegetal de re­

cordación,  que  es  la  ofrenda  vegetal  de 

celos, en tanto que en la mano del sacer­

dote estarán las aguas amargas que traen 

maldición.

19

 Entonces el sacerdote la conjurará° y 

dirá a la mujer: Si no ha yacido contigo 

varón, y no te has descarriado de tu ma­

rido  con  mancilla,  sé  inocente  de  estas 

aguas amargas que acarrean maldición.

20

 Pero si te has descarriado de tu marido 

y te has mancillado, y alguno ha tenido su 

copulación contigo, aparte de tu marido,

21

 (el  sacerdote  conjurará  a  la  mujer 

con juramento de maldición) dirá el sa­

cerdote a la mujer: ¡YHVH te entregue a 

execración y a maldición en medio de tu 

pueblo, y haga YHVH que tu muslo caiga 

y tu vientre se hinche!

22

 ¡Penetren  estas  aguas  portadoras  de 

maldición en tus entrañas, haciendo hin­

char tu vientre y decayendo tu muslo! Y 

la mujer dirá: ¡Amén, amén!

23

 Entonces  el  sacerdote  escribirá  estas 

maldiciones en un rollo, las borrará con 

las aguas amargas,

24

 y  dará  a  beber  a  la  mujer  las  aguas 

amargas  portadoras  de  maldición,  y  las 

aguas  de  maldición  penetrarán  en  ella 

haciéndose amargas.

25

 Después el sacerdote tomará de mano 

de la mujer la ofrenda de los celos, y me­

cerá la ofrenda en presencia de YHVH, y 

la aproximará ante el altar.

26

 Y el sacerdote tomará una pizca de la 

ofrenda,  en  memoria  de  ella,  la  dejará 

consumir sobre el altar, tras lo cual dará 

a beber las aguas a la mujer.

27

 Cuando le haya hecho beber las aguas, 

ocurrirá  que  si  ella  se  ha  mancillado  y 

ha  sido  infiel  a  su  marido,  las  aguas  de 

maldición  penetrarán  en  ella  haciéndo­

se amargas, y su vientre se hinchará y se 

caerá su muslo, y la mujer llegará a ser 

por maldición en medio de su pueblo.

28

 Pero si la mujer no se ha mancillado y es 

pura, quedará ilesa y tendrá descendencia.

29

 Tal es la ley de los celos, tocante a una 

mujer que se ha descarriado de su marido 

y se ha mancillado,

30

 o cuando sobre un hombre sobreven­

ga espíritu de celos, y recele a su mujer: 

Hará que la mujer esté en pie en presen­

cia  de  YHVH,  y  el  sacerdote  le  aplicará 

toda esta ley.

31

 Y  aquel  varón  será  inocente  de  ini­

quidad,  pero  la  mujer  cargará  con  su 

iniquidad.

Nazareos

6

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel, y les di­

rás: Cuando algún hombre o mujer haga 

voto especial de nazareo para dedicarse a 

YHVH,

3

 se abstendrá de vino y de licor. No bebe­

rá vinagres de vino ni de licor, no beberá 

ningún licor de uvas ni comerá uvas fres­

cas o secas.

4

 No comerá nada de cuanto proviene de la 

cepa  vinícola,  desde  las  semillas  hasta  los 

pámpanos, en todos los días de su nazarea­

to.

5

 No pasará navaja sobre su cabeza duran­

te los días del voto de su nazareato, hasta 

que se cumplan los días por los que se con­

sagró a YHVH. Será santo, dejando crecer 

libremente el cabello de su cabeza.

6

 No estará junto a cuerpo muerto duran­

te los días de su consagración a YHVH.

7

 No  se  contaminará  por  su  padre  o  su 

madre,  ni  por  su  hermano  o  hermana 

cuando mueran, porque la consagración 

a su Dios está sobre su cabeza.°

5.16 Esto es, a la mujer.  5.18 Esto es, símbolo de vergüenza 

→Lv.10.6.  5.19 Es decir, hará que jure.  6.7 Esto es, su cabellera

símbolo y señal de su separación para Dios. 

→Jue.16.16-17. 


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Números 6:8

146

8

 Todos los días de su nazareato, será san­

to a YHVH.

9

 Y si alguno muere repentinamente jun­

to a él, de modo que se contamine la ca­

beza de su nazareato, rasurará su cabeza 

el día de su purificación. El día séptimo 

la rasurará.

10

 Al octavo día llevará dos tórtolas o dos 

palominos al sacerdote, a la entrada de la 

Tienda de Reunión,

11

 y el sacerdote presentará uno en ofren­

da por el pecado y el otro en holocausto. 

Y hará expiación a favor de él por lo que 

pecó en relación con el cuerpo muerto, y 

volverá a consagrar su cabeza aquel día.

12

 Y consagrará a YHVH los días de su na­

zareato,  y  llevará  un  cordero  añal  como 

ofrenda por la culpa, y los primeros días 

se anularán, por cuanto contaminó su na­

zareato.

13

 Esta es la ley para el nazareo: El día en 

que se cumpla el tiempo de su nazareato, 

será llevado a la entrada de la Tienda de 

Reunión,

14

 y  aproximará  su  víctima  ante  YHVH: 

un cordero sin defecto de un año en holo­

causto, una cordera sin defecto de un año 

para el sacrificio por el pecado, y un car­

nero sin defecto para las ofrendas de paz.

15

 También un canastillo de panes sin le­

vadura, tortas de flor de harina amasadas 

con aceite, y galletas sin levadura untadas 

con aceite, con su ofrenda vegetal y sus 

libaciones.

16

 Y el sacerdote lo hará acercar en pre­

sencia de YHVH, y realizará su sacrificio 

por el pecado y su holocausto.

17

 Ofrecerá° el carnero en sacrificio por 

ofrendas de paz a YHVH con el canastillo 

de los panes sin levadura, y el sacerdote 

ofrecerá su ofrenda vegetal y sus libacio­

nes.

18

 Entonces el nazareo rapará su cabeza 

de  nazareo  a  la  entrada  de  la  Tienda  de 

Reunión, y tomando los cabellos de su ca­

beza  de  nazareo,  los  pondrá  en  el  fuego 

que hay debajo del sacrificio de las ofren­

das de paz.

19

 Después tomará el sacerdote la espal­

dilla  cocida  del  carnero,  y  del  canastillo 

una  torta  sin  levadura  y  una  galleta  sin 

levadura, y las pondrá en las palmas del 

nazareo,  después  que  se  haya  rapado  el 

cabello de su nazareato.

20

 Luego  el  sacerdote  los  mecerá  como 

ofrenda mecida en presencia de YHVH. Es 

cosa santa para el sacerdote, además del pe­

cho mecido y la espaldilla de la ofrenda al­

zada; después el nazareo podrá beber vino.

21

 Tal es la ley del nazareo que hace voto 

de  ofrenda  suya  a  YHVH  con  motivo  de 

su  nazareato,  además  de  aquello  que  le 

permita su mano. Según el voto que haya 

hecho,  así  hará  conforme  a  la  ley  de  su 

nazareato.°

La bendición sacerdotal

22

 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

23

 Habla a Aarón y a sus hijos, diciendo: 

Así  bendeciréis  a  los  hijos  de  Israel.  Di­

les:

24

 YHVH te bendiga y te guarde,

25

 YHVH haga resplandecer su rostro so­

bre ti, y tenga de ti misericordia.

26

 YHVH alce sobre ti su rostro, y ponga 

en ti paz.

27

 Así pondrán mi Nombre sobre los hijos 

de Israel, y Yo los bendeciré.

Consagraciones y ofrendas

7

Aconteció  que  el  día  en  que  Moisés 

terminó  de  hacer  levantar  el  Taber­

náculo, de ungirlo y santificarlo con todos 

sus utensilios, y de ungir y de consagrar 

el altar con todos sus utensilios,

2

 que los jerarcas de Israel, cabezas de sus 

casas paternas, presentaron sus ofrendas. 

Ellos  eran  los  jerarcas  de  las  tribus  que 

habían presidido el censo.

3

 Hicieron  llevar  pues  sus  víctimas  ante 

YHVH: seis carretas cubiertas y doce bue­

yes:  una  carreta  por  cada  dos  jerarcas  y 

un buey por cada uno, y los hicieron acer­

car delante del Tabernáculo.

4

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

5

 Acéptaselos,  y  serán  para  la  obra  de  la 

Tienda de Reunión, y los darás a los levi­

tas, a cada uno conforme a su servicio.

6

 Entonces Moisés tomó las carretas y los 

bueyes y los entregó a los levitas.

7

 A los hijos de Gersón dio dos carretas y 

cuatro bueyes, conforme a su servicio.

6.17 Esto es, el nazareo.  6.21 

→Hch.21.23-24. 


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Números 7:39

147

8

 A los hijos de Merari dio cuatro carre­

tas y ocho bueyes, conforme a su servicio, 

bajo la dirección de Itamar, hijo del sacer­

dote Aarón.

9

 Pero a los hijos de Coat no les dio nada, 

porque  tenían  a  su  cargo  el  servicio  del 

Santuario,  que  habían  de  transportar  a 

hombros.

10

 Los jerarcas presentaron también sus 

ofrendas° durante la dedicación del altar, 

el día en que éste fue ungido, acercando 

ellos mismos° sus víctimas ante el altar,

11

 pues YHVH había dicho a Moisés: Pre­

senten  ellos  mismos  sus  víctimas,  un  je­

rarca cada día, para la dedicación del altar.

12

 En  el  día  primero  presentó  su  ofren­

da Naasón ben Aminadab, de la tribu de 

Judá.

13

 Su ofrenda consistió en una fuente de 

plata  de  ciento  treinta  siclos  de  peso,  y 

un tazón de plata de setenta siclos, según 

el  siclo  del  Santuario,  ambos  llenos  de 

flor de harina amasada con aceite para la 

ofrenda vegetal.

14

 Un  recipiente°  de  oro  de  diez  siclos, 

lleno de incienso.

15

 Un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

16

 y un macho cabrío para la expiación.

17

 Para el sacrificio de las ofrendas de paz, 

dos bueyes, cinco carneros, cinco machos 

cabríos y cinco corderos añales. Tal fue la 

ofrenda de Naasón ben Aminadab.

18

 En el día segundo, presentó su ofrenda 

Natanael ben Suar, jerarca de Isacar.

19

 Como ofrenda suya presentó una fuen­

te de plata de ciento treinta siclos de peso, 

un tazón de plata de setenta siclos, según 

el  siclo  del  Santuario,  ambos  llenos  de 

flor de harina amasada con aceite para la 

ofrenda vegetal.

20

 Un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso.

21

 Un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

22

 y un macho cabrío para la ofrenda por 

el pecado.

23

 Para el sacrificio de las ofrendas de paz, 

dos bueyes, cinco carneros, cinco machos 

cabríos y cinco corderos añales. Tal fue la 

ofrenda de Natanael ben Suar.

24

 En el día tercero correspondió a Eliab 

ben Helón, jerarca de los hijos de Zabu­

lón.

25

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento  treinta  siclos  de  peso  y  un  tazón 

de plata de setenta siclos, según el siclo 

del Santuario, ambos llenos de flor de ha­

rina  amasada  con  aceite  para  la  ofrenda 

vegetal.

26

 Un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso.

27

 Un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

28

 y un macho cabrío para la ofrenda por 

el pecado.

29

 Para el sacrificio de las ofrendas de paz, 

dos bueyes, cinco carneros, cinco machos 

cabríos y cinco corderos añales. Tal fue la 

ofrenda de Eliab ben Helón.

30

 En  el  día  cuarto  correspondió  a  Eli­

sur  ben  Sedeur,  jerarca  de  los  hijos  de 

Rubén.

31

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento treinta siclos de peso, un tazón de 

plata de setenta siclos, según el siclo del 

Santuario, ambos llenos de flor de harina 

amasada con aceite para la ofrenda vege­

tal,

32

 un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso,

33

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

34

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

35

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz,  dos  bueyes,  cinco  carneros,  cinco 

machos cabríos y cinco corderos añales. 

Tal fue la ofrenda de Elisur ben Sedeur.

36

 En el día quinto correspondió al jerar­

ca de los hijos de Simeón, Selumiel ben 

Zurisadai.

37

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento treinta siclos de peso, un tazón de 

plata de setenta siclos, según el siclo del 

Santuario, ambos llenos de flor de harina 

amasada con aceite para la ofrenda vege­

tal,

38

 un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso,

39

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

7.10 .sus ofrendas.  7.10 Es decir, los jerarcas.  7.14 Lit. cuchara o cucharón.


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Números 7:40

148

40

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

41

 y para el sacrificio de las ofrendas de paz, 

dos bueyes, cinco carneros, cinco machos 

cabríos y cinco corderos añales. Tal fue la 

ofrenda de Selumiel ben Zurisadai.

42

 En el día sexto correspondió a Eliasaf 

ben Dehuel, jerarca de los hijos de Gad.

43

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento treinta siclos de peso, un tazón de 

plata de setenta siclos, según el siclo del 

Santuario, ambos llenos de flor de hari­

na  amasada  con  aceite  para  la  ofrenda 

vegetal,

44

 un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso,

45

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

46

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

47

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz,  dos  bueyes,  cinco  carneros,  cinco 

machos cabríos y cinco corderos añales. 

Tal fue la ofrenda de Eliasaf ben Dehuel.

48

 En el día séptimo correspondió a Eli­

sama ben Amiud, jerarca de los hijos de 

Efraín.

49

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento  treinta  siclos  de  peso,  un  tazón  de 

plata  de  setenta  siclos,  según  el  siclo  del 

Santuario, ambos llenos de flor de harina 

amasada con aceite para la ofrenda vegetal,

50

 un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso,

51

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

52

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

53

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz,  dos  bueyes,  cinco  carneros,  cinco 

machos cabríos y cinco corderos añales. 

Tal fue la ofrenda de Elisama ben Amiud.

54

 En el día octavo correspondió a Gama­

liel  ben  Pedasur,  jerarca  de  los  hijos  de 

Manasés.

55

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento treinta siclos de peso, un tazón de 

plata de setenta siclos, según el siclo del 

Santuario, ambos llenos de flor de hari­

na  amasada  con  aceite  para  la  ofrenda 

vegetal,

56

 un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso,

57

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

58

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

59

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz,  dos  bueyes,  cinco  carneros,  cinco 

machos cabríos y cinco corderos añales. 

Tal fue la ofrenda de Gamaliel ben Peda­

sur.

60

 En el día noveno correspondió a Abi­

dán ben Gedeoni, jerarca de los hijos de 

Benjamín.

61

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento treinta siclos de peso, un tazón de 

plata de setenta siclos, según el siclo del 

Santuario, ambos llenos de flor de hari­

na  amasada  con  aceite  para  la  ofrenda 

vegetal,

62

 un recipiente de oro de diez siclos, lle­

no de incienso,

63

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

64

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

65

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz, dos bueyes, cinco carneros, cinco ma­

chos cabríos y cinco corderos añales. Tal 

fue la ofrenda de Abidán ben Gedeoni.

66

 En el día décimo correspondió a Ahie­

zer ben Amisadai, jerarca de los hijos de 

Dan.

67

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento treinta siclos de peso, un tazón de 

plata de setenta siclos, según el siclo del 

Santuario, ambos llenos de flor de hari­

na  amasada  con  aceite  para  la  ofrenda 

vegetal,

68

 un recipiente de oro de diez siclos, lle­

na de incienso,

69

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

70

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

71

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz,  dos  bueyes,  cinco  carneros,  cinco 

machos cabríos y cinco corderos añales. 

Tal fue la ofrenda de Ahiezer ben Amisa­

dai.

72

 En  el  día  undécimo  correspondió  a 

Pagiel ben Ocrán, jerarca de los hijos de 

Aser.

73

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento  treinta  siclos  de  peso,  un  tazón  de 


background image

Números 8:11

149

plata  de  setenta  siclos,  según  el  siclo  del 

Santuario, ambos llenos de flor de harina 

amasada con aceite para la ofrenda vegetal,

74

 un recipiente de oro de diez siclos, lle-

no de incienso,

75

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

76

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

77

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz,  dos  bueyes,  cinco  carneros,  cinco 

machos cabríos y cinco corderos añales. 

Tal fue la ofrenda de Pagiel ben Ocrán.

78

 En  el  día  duodécimo  correspondió  a 

Ahira  ben  Enán,  jerarca  de  los  hijos  de 

Neftalí.

79

 Su ofrenda fue: una fuente de plata de 

ciento  treinta  siclos  de  peso,  un  tazón  de 

plata  de  setenta  siclos,  según  el  siclo  del 

Santuario, ambos llenos de flor de harina 

amasada con aceite para la ofrenda vegetal,

80

 un recipiente de oro de diez siclos, lle-

no de incienso,

81

 un  becerro,  un  carnero,  un  cordero 

añal para el holocausto,

82

 un  macho  cabrío  para  la  ofrenda  por 

el pecado,

83

 y para el sacrificio de las ofrendas de 

paz,  dos  bueyes,  cinco  carneros,  cinco 

machos cabríos y cinco corderos añales. 

Tal fue la ofrenda de Ahira ben Enán.

84

 Tal fue la dedicación del altar el día en 

que fue ungido por los jerarcas de Israel: 

doce  fuentes  de  plata,  doce  tazones  de 

plata y doce recipientes de oro.

85

 Cada  fuente  era  de  ciento  treinta  si-

clos, cada tazón de setenta. El total de la 

plata  de  estos  utensilios  fue  de  dos  mil 

cuatrocientos  siclos,  según  el  siclo  del 

Santuario.

86

 Los doce recipientes de oro llenos de 

incienso eran de diez siclos cada recipien-

te, según el siclo del Santuario. El total 

del  oro  de  los  recipientes  fue  de  ciento 

veinte siclos.

87

 El total de las reses para el holocausto 

fueron  doce  los  becerros,  doce  los  car-

neros,  doce  los  corderos  añales,  con  su 

ofrenda  vegetal,  y  doce  los  machos  ca-

bríos, para la ofrenda por el pecado.

88

 Y el total de reses para el sacrificio de las 

paces fueron veinticuatro bueyes, sesenta 

los carneros, sesenta los machos cabríos, y 

sesenta los corderos añales. Tal fue la dedi-

cación del altar después de ser ungido.

89

 Y cuando entraba Moisés en la Tienda 

de Reunión para hablar con ’Elohim, oía la 

voz que le hablaba de encima del propicia-

torio que estaba sobre el Arca del Testimo-

nio, entre los querubines, y le hablaba.

El candelabro 

Consagración de los levitas

8

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Habla a Aarón, y dile: Cuando hagas 

montar  las  lámparas,  las  siete  lámparas 

deberán alumbrar hacia la parte delante-

ra del candelabro.

3

 Y así lo hizo Aarón. Hacia la parte delan-

tera del candelabro hizo montar las lám-

paras, tal como YHVH había ordenado a 

Moisés.

4

 Y ésta era la hechura del candelabro: de 

oro  macizo,  incluido  su  base  hasta  sus 

flores,  labrado  a  cincel.  Según  la  visión 

que YHVH había mostrado a Moisés, así 

hizo el candelabro.°

5

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

6

 Toma a los levitas de entre los hijos de 

Israel y purifícalos.

7

 Para purificarlos harás con ellos así: Ro-

ciarás sobre ellos el agua de la expiación, 

y ellos harán pasar la navaja por todo su 

cuerpo, lavarán sus vestidos, y así se pu-

rificarán.

8

 Luego tomarán un novillo con su ofren-

da vegetal de flor de harina amasada con 

aceite, y tú tomarás otro novillo para la 

ofrenda por el pecado.

9

 Después aproximarás a los levitas delan-

te de la Tienda de Reunión, y harás que se 

congregue toda la asamblea de los hijos 

de Israel.

10

 Y  harás  que  los  levitas  se  aproximen 

delante de YHVH, y los hijos de Israel im-

pondrán sus manos sobre los levitas.

11

 Aarón presentará° entonces a los levi-

tas delante de YHVH como ofrenda meci-

da de los hijos de Israel, para que cumplan 

el servicio de YHVH.

8.1-4 

→Ex.25.31-40; 37.17-24.  8.11 Lit. balanceará


background image

Números 8:12

150

12

 Luego los levitas apoyarán sus manos 

sobre la cabeza de los novillos, y ofrecerás 

uno como ofrenda por el pecado, y otro 

como holocausto a YHVH, para hacer ex­

piación a favor de los levitas.

13

 Después mantendrás en pie a los levi­

tas ante Aarón y sus hijos, para presentar­

los como ofrenda mecida a YHVH.

14

 Así separarás a los levitas de entre los 

hijos  de  Israel,  y  los  levitas  serán  para 

mí.

15

 Después de esto, cuando los hayas pu­

rificado  y  presentado  como  ofrenda  me­

cida, los levitas entrarán para cumplir el 

servicio de la Tienda de Reunión.

16

 Porque  los  levitas  están  enteramente 

dedicados a mí de entre los hijos de Israel. 

Yo los he tomado para mí en sustitución 

de  todo  el  que  abre  matriz,  es  decir,  de 

todo  primogénito  entre  los  hijos  de  Is­

rael.°

17

 Porque mío es todo primogénito de los 

hijos de Israel, tanto de hombre como de 

animal, y desde el día en que herí a todo 

primogénito  en  la  tierra  de  Egipto  los 

hice santificar para mí.°

18

 Pero he tomado a los levitas en susti­

tución  de  todos  los  primogénitos  entre 

los hijos de Israel.

19

 Y de entre los hijos de Israel he entre­

gado a los levitas° como dones para Aarón 

y sus hijos, para que sirvan en la obra de 

los  hijos  de  Israel  en  la  Tienda  de  Reu­

nión, y hagan expiación a favor de los hi­

jos de Israel, así no les sobrevendrá plaga 

a los hijos de Israel cuando se acerquen al 

Santuario.

20

 Entonces  Moisés,  Aarón  y  toda  la 

asamblea de los hijos de Israel, hicieron° 

con  los  levitas  conforme  a  todo  lo  que 

YHVH había ordenado a Moisés acerca de 

los levitas. Así hicieron con ellos los hijos 

de Israel.

21

 Y los levitas se purificaron a sí mismos 

de pecado y lavaron sus vestidos. Y Aarón 

los  presentó  como  ofrenda  mecida  ante 

YHVH, e hizo Aarón expiación a favor de 

ellos para purificarlos.

22

 Después  de  esto,  los  levitas  entra­

ron a oficiar su servicio en la Tienda de 

Reunión ante Aarón y sus hijos. Tal como 

YHVH había ordenado a Moisés acerca de 

los levitas, así hicieron con ellos.

23

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

24

 Esto  es  lo  concerniente  a  los  levitas: 

De  edad  de  veinticinco  años  arriba,  en­

trará°  a  prestar  servicio  en  la  Tienda  de 

Reunión,

25

 y  a  los  cincuenta  años  se  retirará  de 

prestar servicio en la obra, y nunca más 

servirá.

26

 Sin embargo, podrá ministrar con sus 

hermanos en la Tienda de Reunión, para 

hacer guardia, mas no podrá servir en la 

obra. Así harás con los levitas en cuanto a 

sus guardias.

La Pascua en Sinay – La columna de nube

9

En el año segundo de su salida de la 

tierra  de  Egipto,  en  el  mes  primero, 

habló YHVH a Moisés en el desierto de Si­

nay, diciendo:

2

 Los hijos de Israel prepararán la Pascua 

en su tiempo señalado:

3

 El decimocuarto día de este mes, entre 

las dos tardes, la prepararéis a su tiempo. 

Conforme a todos sus estatutos y confor­

me  a  todas  sus  ordenanzas  la  habéis  de 

preparar.

4

 Entonces  mandó  Moisés  a  los  hijos  de 

Israel a preparar la Pascua,

5

 y en el mes primero, el día decimocuar­

to  del  mes,  al  atardecer,  prepararon  la 

Pascua en el desierto de Sinay. Tal como 

YHVH  ordenó  a  Moisés,  así  hicieron  los 

hijos de Israel.°

6

 Hubo,  sin  embargo,  algunos  varones 

que se habían hecho impuros por causa de 

una persona muerta, y no habían podido 

preparar la Pascua aquel día; y acercándo­

se ante Moisés y Aarón en aquel día,

7

 le  dijeron  aquellos  hombres:  Aunque° 

nosotros estemos impuros a causa de una 

persona muerta, ¿por qué se nos impide 

presentar una víctima ante YHVH en su 

tiempo señalado, con los demás hijos de 

Israel?

8

 Y Moisés les respondió: Aguardad hasta 

que oiga lo que YHVH ordena acerca de 

vosotros.

8.16 

→Ex.32.26-29.  8.17 →Ex.13.2.  8.19 LXX: Presentados como ofrenda.  8.20 Lit. hizo.  8.24 Heb. litsbó-tsaba´ forma em-

pleada para cumplir con el servicio militar obligatorio. 

9.1-5 

→Ex.12.1-13.  9.7 .aunque.


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Números 10:10

151

9

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

10

 Habla  a  los  hijos  de  Israel,  diciendo: 

Cualquier hombre de vosotros o de vues­

tros  descendientes  que  esté  impuro  por 

causa de una persona muerta, o que esté 

lejos de viaje, podrá preparar Pascua para 

YHVH.

11

 La preparará en el mes segundo, el de­

cimocuarto día del mes por la tarde, y la 

comerán con panes sin levadura y hierbas 

amargas.

12

 No dejarán nada de él° para la mañana 

siguiente, ni le quebrarán hueso alguno.° 

La prepararán conforme a todo el estatu­

to de la Pascua.

13

 Pero el hombre que esté limpio, y no 

esté de viaje, si deja de preparar la Pascua, 

tal persona será cortada de su pueblo, y 

por cuanto no presentó en su tiempo se­

ñalado la víctima para YHVH, ese hombre 

cargará con su pecado.

14

 Y si un extranjero habita con vosotros 

y desea preparar la Pascua para YHVH, la 

hará conforme al estatuto de la Pascua y 

conforme a su decreto. Un solo estatuto 

habrá para vosotros, tanto para el extran­

jero como para el nativo del país.

15

 El día en que el Tabernáculo fue erigi­

do, la nube cubrió el Tabernáculo por en­

cima de la Tienda del Testimonio, y desde 

la tarde hasta la mañana hubo sobre el Ta­

bernáculo como una apariencia de fuego.

16

 Así sucedía continuamente, la nube lo 

cubría de día° y una apariencia de fuego 

de noche.

17

 Cada  vez  que  la  nube  era  alzada  de 

sobre  el  Tabernáculo,  los  hijos  de  Israel 

partían, y en el lugar donde la nube se de­

tenía, allí los hijos de Israel acampaban.

18

 Al mandato de YHVH los hijos de Israel 

partían, y al mandato de YHVH acampa­

ban. Mientras la nube permanecía sobre 

el  Tabernáculo,  ellos  permanecían  en  el 

campamento.

19

 Cuando  la  nube  continuaba  sobre  el 

Tabernáculo muchos días, los hijos de Is­

rael guardaban la observancia de YHVH, 

y no partían.

20

 Otras veces la nube permanecía sobre 

el Tabernáculo cierto número de días. Al 

mandato de YHVH acampaban, y al man­

dato de YHVH partían.

21

 A veces la nube permanecía sólo de la 

tarde  hasta  la  mañana,  y  alzada  la  nube 

por la mañana, ellos partían. O bien que­

daba un día y una noche, pero en cuanto 

era alzada la nube, ellos partían.

22

 Bien  fueran  dos  días,  un  mes  o  un 

año, mientras la nube se demoraba sobre 

el Tabernáculo reposándose sobre él, los 

hijos  de  Israel  permanecían  acampados 

y no marchaban, pero en cuanto ella era 

alzada, ellos partían.

23

 Por orden de YHVH acampaban, y por 

orden  de  YHVH  partían,  guardando  lo 

dispuesto  por  YHVH,  según  el  mandato 

de YHVH transmitido por Moisés.

Las trompetas

10

YHVH habló a Moisés, diciendo:

2

 Hazte dos trompetas de plata. Las 

harás labradas a cincel, y te servirán para 

convocar a la asamblea y dar la señal de 

mover los campamentos.

3

 Cuando toquen las dos, toda la congre­

gación se reunirá delante de ti en la en­

trada de la Tienda de Reunión.

4

 Si tocan una sola, concurrirán junto a 

ti los jerarcas, los jefes de millares de Is­

rael.

5

 Cuando toquéis alarma,° se pondrán en 

marcha los campamentos que acampan al 

oriente,

6

 y  cuando  toquéis  alarma  por  segunda 

vez, entonces partirán los campamentos 

que acampan al sur. Para ponerse en mar­

cha se tocará con alarma,

7

 pero para reunir la congregación, toca­

réis sin alarma.

8

 Los  hijos  de  Aarón,  los  sacerdotes,  to­

carán las trompetas, las cuales serán para 

vosotros  estatuto  perpetuo  en  vuestras 

generaciones.

9

 Cuando  entréis  en  guerra,  en  vuestro 

país, contra el enemigo que os ataca, to­

caréis las trompetas con alarma, y se os 

recordará ante YHVH vuestro Dios, y se­

réis salvos de vuestros enemigos.

10

 Asimismo en vuestros días de alegría, 

en vuestras fiestas solemnes señaladas y 

9.12 de él. Esto es, de la Pascua. En hebreo es masculino.  9.12 hueso alguno 

→Ex.12.10 nota. También →Ex.12.46; Sal.34.20; 

Jn.19.36. 

9.16 .de día.  10.5 Es decir, con estrépito.


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Números 10:11

152

en los principios de vuestros meses, toca­

réis las trompetas durante vuestros holo­

caustos y sacrificios de vuestras ofrendas 

de paz, y os serán por memorial delante 

de  vuestro  Dios.  ¡Yo  soy  YHVH  vuestro 

Dios!

11

 En  el  año  segundo,  el  segundo  mes, 

el veinte del mes, aconteció que la nube 

se elevó de sobre el Tabernáculo del Tes­

timonio,

12

 y los hijos de Israel partieron por sus 

jornadas desde el desierto de Sinay, has­

ta que la nube se posó en el desierto de 

Parán.°

13

 Así partieron la primera vez, conforme 

al  dicho  de  YHVH  transmitido  por  Moi­

sés.

14

 El  estandarte  del  campamento  de  los 

hijos  de  Judá  partió  primero,  según  sus 

ejércitos, y al frente de su hueste iba Naa­

són ben Aminadab.

15

 Al frente del ejército de la tribu de los 

hijos de Isacar, iba Natanael ben Suar,

16

 y al frente del ejército de la tribu de los 

hijos de Zabulón, iba Eliab ben Helón.

17

 Entonces  el  Tabernáculo  fue  desar­

mado, y los hijos de Gersón y los hijos de 

Merari  se  pusieron  en  marcha  cargando 

el Tabernáculo.

18

 Luego  partió  el  estandarte  del  campa­

mento de Rubén, según sus ejércitos, y al 

frente de su hueste iba Elisur ben Sedeur.

19

 Al frente del ejército de la tribu de los 

hijos de Simeón, iba Selumiel ben Zuri­

sadai,

20

 y al frente del ejército de la tribu de los 

hijos de Gad, iba Eliasaf ben Dehuel.

21

 Entonces  partieron  los  coatitas  por­

tando  los  objetos  sagrados,  y  antes  de 

su  llegada,  ya  el  Tabernáculo  había  sido 

montado.

22

 Después partió el estandarte del cam­

pamento  de  los  hijos  de  Efraín,  por  sus 

ejércitos, y al frente de su hueste iba Eli­

sama ben Amiud.

23

 Al frente del ejército de la tribu de los hi­

jos de Manasés iba Gamaliel ben Pedasur,

24

 y al frente del ejército de la tribu de los 

hijos de Benjamín, Abidán ben Gedeoni.

25

 A  la  retaguardia  de  todos  los  campa­

mentos,  partió  el  estandarte  del  cam­

pamento de los hijos de Dan, según sus 

ejércitos,  y  al  frente  de  su  hueste  iba 

Ahiezer ben Amisadai.

26

 Al frente del ejército de la tribu de los 

hijos de Aser iba Pagiel ben Ocrán,

27

 y capitaneando el ejército formado por 

la tribu de los hijos de Neftalí iba Ahira 

ben Enán.

28

 Tal fue el orden de los desplazamientos 

de los hijos de Israel, según sus ejércitos, 

cuando partían.

29

 Para  ese  entonces  Moisés  dijo  a  Ho­

bab,  hijo  de  Rehuel°  madianita,  suegro 

de  Moisés:  Estamos  de  partida  hacia  el 

lugar  del  que  YHVH  ha  dicho  que  nos 

daría. Ven con nosotros y te trataremos 

bien, porque YHVH ha prometido el bien 

a Israel.

30

 Pero él le dijo: No iré, sino que a mi 

tierra y a mi parentela he de irme.°

31

 Sin embargo él insistió: Te ruego que 

no nos abandones, pues para eso conoces 

los  sitios  donde  debemos  acampar  en  el 

desierto, y nos servirás de guía.

32

 Si  vienes  con  nosotros,  el  bien  que 

YHVH nos haga, nosotros te lo haremos 

a ti.

33

 Partieron pues del monte de YHVH en 

viaje de tres jornadas, y durante los tres 

días de camino, el Arca del Pacto de YHVH 

marchaba delante de ellos para buscarles 

lugar de descanso.

34

 Y desde que partieron del campamento, 

la nube de YHVH iba sobre ellos de día.

35

 Y sucedía que al partir el Arca, Moisés 

exclamaba:

¡Levántate, oh YHVH!

¡Sean dispersados tus enemigos,

Y huyan de ti los que te aborrecen!°

36

 Y cuando ella reposaba, decía:

¡Vuélvete, oh YHVH,

A los millares de los millares de 

Israel!°

Descontento del pueblo

11

Pero  aconteció  que  el  pueblo  co­

menzó a murmurar amargamente 

10.12 Este lugar estaba limitado al E por el golfo de Akaba, al O por el golfo de Suez y al S por las montañas del Sinay. Era la 

morada de Ismael 

→Gn.21.21.  10.29 Esto es, Jetro.  10.30 →Ex.18.27.  10.35 →Sal.68.1.  10.36 Los escribas masoretas 

consideraron que los versículos 34 y 36, aunque inspirados, antiguamente no iban en este lugar. 


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Números 11:25

153

a oídos de YHVH. Y YHVH lo oyó y se en-

cendió su ira, de manera que el fuego de 

YHVH ardió contra ellos, y consumió un 

extremo del campamento.

2

 Entonces el pueblo clamó a Moisés, y Moi-

sés oró a YHVH, y el fuego se extinguió.

3

 Y  llamó  el  nombre  de  aquel  lugar  Ta-

birá,° porque el fuego de YHVH se había 

encendido contra ellos.

4

 Y la chusma° que iba en medio de ellos 

sintió  otra  vez  un  gran  deseo,  y  los  hi-

jos de Israel también lloraron, y dijeron: 

¡Quién nos diera a comer carne!

5

 ¡Cómo nos acordamos del pescado que 

en Egipto comíamos de balde, de los pe-

pinos, de los melones, de los puerros, de 

las cebollas y los ajos!

6

 Pero ahora nuestra alma se reseca, pues 

nada ven nuestros ojos sino este maná.

7

 Y el maná era como semilla del culan-

tro, y su aspecto como el aspecto del be-

delio.°

8

 El pueblo se dispersaba para recogerlo 

y lo molían en molinos o lo machacaban 

en morteros, y lo cocinaban en ollas o ha-

cían bollos con él, y su sabor era como el 

sabor del bollo de aceite.°

9

 Por la noche, cuando el rocío descendía 

sobre el campamento, el maná descendía 

con él.°

10

 Y oyó Moisés al pueblo, cómo familias 

enteras lloraban, cada cual a la entrada de 

su tienda. Y la ira de YHVH se encendió 

grandemente, y también fue desagradable 

ante los ojos de Moisés.

11

 Entonces  dijo  Moisés  a  YHVH:  ¿Por 

qué  maltratas  a  tu  siervo?  ¿Por  qué  no 

he hallado gracia ante tus ojos, para que 

hayas echado la carga de todo este pueblo 

sobre mí?

12

 ¿Acaso concebí yo a todo este pueblo o 

lo engendré, para que me digas: Cárgalo 

en  tu  pecho,  como  una  nodriza  lleva  al 

que mama, a la tierra que prometiste con 

juramento a sus padres?

13

 ¿De  dónde  tengo  yo  carne  para  todo 

este pueblo? pues lloran ante mí, dicien-

do: ¡Danos carne que comer!

14

 No puedo yo solo soportar todo este pue-

blo,° pues es demasiado pesado para mí.

15

 Si  así  has  de  tratarme,  mátame  del 

todo si he hallado gracia ante tus ojos, te 

ruego, para que no vea yo más tu° mal.

16

 Y YHVH dijo a Moisés: Reúneme a se-

tenta  varones  de  los  ancianos  de  Israel, 

que tú conozcas como ancianos del pue-

blo, y a sus oficiales, y llévalos a la entrada 

de la Tienda de Reunión, y que permanez-

can allí contigo.

17

 Y Yo descenderé y hablaré allí contigo, 

y tomaré del Espíritu que está sobre ti y 

lo pondré sobre ellos, para que soporten 

contigo la carga del pueblo y no la lleves 

tú solo.

18

 Y dirás al pueblo: Santificaos para ma-

ñana,  pues  comeréis  carne,  ya  que  ha-

béis  llorado  a  oídos  de  YHVH,  diciendo: 

¡Quién nos diera a comer carne!, pues nos 

iba mejor en Egipto. YHVH, pues, os dará 

carne, y comeréis.

19

 No comeréis sólo un día, ni dos días, ni 

cinco días, ni diez días, ni veinte días,

20

 sino hasta un mes entero, hasta que os 

salga por las narices y os provoque náu-

seas,  por  cuanto  despreciasteis  a  YHVH, 

que  está  en  medio  vosotros,  y  llorasteis 

delante de Él diciendo: ¿Por qué salimos 

de Egipto?

21

 Moisés respondió: Seiscientos mil de a 

pie es el pueblo en medio del cual estoy, 

y Tú dices: Les daré carne, y comerán un 

mes entero.

22

 Si se degollara todo el rebaño y el ga-

nado,  ¿alcanzaría  para  ellos?  Si  se  reco-

gieran para ellos todos los peces del mar 

¿les sería suficiente?

23

 Y YHVH respondió a Moisés: ¿Acaso se 

ha acortado la mano de YHVH? ¡Ahora ve-

rás si se te cumple o no mi palabra!

24

 Moisés salió entonces y habló al pue-

blo las palabras de YHVH. Luego reunió 

a los setenta varones de los ancianos del 

pueblo y los hizo estar alrededor del Ta-

bernáculo.

25

 YHVH descendió en la nube y le habló. 

Luego tomó del Espíritu que había sobre 

11.3 Esto es: ardor.  11.4 Esto es, los egipcios que habían salido con Israel.  11.7 Mineral que, junto con el oro y el ónice, se 

encontraba en la tierra de Havila, Gn.2.11,12 similar al color del maná cuando le daba el sol del desierto. En Gn.2.12 LXX registra 

ánthrax, una piedra preciosa color rojo oscuro. 

11.7-8 

→Ex.16.31.  11.9 →Ex.16.13-15.  11.14 Esto es, no al pueblo, sino a su 

carga 

→v.17.  11.15 2ª enmienda de los Soferim → § 6 y § 8.


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Números 11:26

154

él y lo puso sobre los setenta ancianos, y 

en cuanto el Espíritu descansó sobre ellos 

profetizaron,  pero  después  no  continua­

ron.°

26

 Habían quedado en el campamento dos 

varones, uno de nombre Eldad y el segun­

do de nombre Medad. El Espíritu reposó 

también sobre ellos, pues figuraban entre 

los inscritos, y aunque no habían ido a la 

Tienda, profetizaron en el campamento.

27

 Y un joven corrió y dio aviso a Moisés, 

y dijo: Eldad y Medad están profetizando 

en el campamento.

28

 Entonces  Josué  ben  Nun,  uno  de  los 

jóvenes  oficiales  de  Moisés,  respondió  y 

dijo: Moisés, señor mío, ¡detenlos!

29

 Pero Moisés le dijo: ¿Tienes celos por 

causa mía? ¡Quien diera que todo el pue­

blo de YHVH fuera profeta, y que YHVH 

pusiera su Espíritu sobre ellos!

30

 Y  Moisés  volvió  al  campamento,  él  y 

los ancianos de Israel.

31

 Entonces llegó un viento de YHVH que 

trajo codornices desde el mar, y las arro­

jó sobre el campamento, como un día de 

camino por una parte y un día de camino 

por la otra, a casi dos codos de altura so­

bre la superficie de la tierra.°

32

 Y  el  pueblo  estuvo  levantado  todo 

aquel día, toda aquella noche y todo el día 

siguiente recogiendo codornices. Los que 

menos, recogieron diez hómeres, y las es­

parcieron alrededor del campamento.

33

 Pero mientras la carne aún estaba en­

tre sus dientes, antes que la masticaran, 

la ira de YHVH se encendió contra el pue­

blo, y YHVH golpeó al pueblo con un azo­

te muy grande.

34

 Y alguien llamó el nombre de aquel lu­

gar Kibrot­hatava,° porque allí sepultaron 

a un pueblo con deseos desordenados.

35

 Y  de  Kibrot­hatava  el  pueblo  partió 

para Haserot, y permaneció en Haserot.

La lepra de Miriam

12

Murmuró°  Miriam  con  Aarón 

contra Moisés a causa de la mujer 

cusita° que había tomado, pues él había 

tomado una mujer cusita.

2

 Dijeron:  ¿Acaso  solamente  a  través  de 

Moisés habla YHVH? ¿No ha hablado tam­

bién por nosotros? Y YHVH lo oyó.

3

 (Y aquel varón Moisés era muy manso, 

más que todos los hombres que había so­

bre la faz de la tierra.)

4

 Y  de  improviso  YHVH  dijo  a  Moisés,  a 

Aarón y a Miriam: Salid vosotros tres a la 

Tienda de Reunión. Y los tres salieron.

5

 Y descendiendo YHVH en la columna de 

nube, se situó a la entrada de la Tienda, 

y llamó a Aarón y a Miriam. Y ambos sa­

lieron.

6

 Y Él les dijo: Oíd ahora mis palabras: Si 

hay entre vosotros un profeta, Yo, YHVH, 

en  visión  a  él  me  revelo  y  en  sueños  le 

hablo.

7

 No ocurre así con mi siervo Moisés, que 

es fiel en toda mi casa.°

8

 Boca a boca hablo con él, en visión, pero 

sin enigmas, y él contempla la apariencia° 

de YHVH. ¿Por qué no tuvisteis temor de 

hablar contra mi siervo, contra Moisés?

9

 Y  la  ira  de  YHVH  se  encendió  contra 

ellos, y se fue.

10

 Y la nube se apartó de la Tienda, y he 

aquí Miriam estaba leprosa como la nieve. 

Entonces Aarón volvió a ver a Miriam, ¡y 

he aquí estaba leprosa!

11

 Y dijo Aarón a Moisés: ¡Ah! señor mío, 

te  ruego,  no  pongas  sobre  nosotros  un 

pecado por el cual hemos sido insensatos 

y en el cual pecamos.

12

 No sea ella, te ruego, como el nacido° 

muerto,  que  al  salir  del  vientre  de  su° 

madre, tiene ya consumida la mitad de su 

carne.

13

 Entonces  Moisés  clamó  a  YHVH,  di­

ciendo:  ¡Te  ruego,  oh  Dios,  sánala  aho­

ra!°

14

 Pero YHVH dijo a Moisés: Si su padre 

la hubiera apenas escupido en la cara, ¿no 

estaría ella en oprobio por siete días? Sea 

excluida del campamento por siete días,° 

y después será readmitida.

11.25 La coordinación gramatical del TM aclara que en estos ancianos se manifestaba el Espíritu de Dios sólo cuando era 

necesario 

→24.2.  11.31 Aprox. 20 km. por cada lado del campamento y casi un metro de altura.  11.34 Es decir: Sepulcros 

del anhelo

12.1 Lit. habló. El verbo hebreo está en femenino singular, lo que señala a Miriam como instigadora: Ella habló

12.1 Heb. cushit, del país de Cush = Etiopía. La LXX traduce etíope cara tostada. Se trata de una mujer de raza negra.  12.7 

→He.3.2. 

12.8 Heb. temunah = forma, figura, aspecto. LXX doxa = gloria.  12.12 .nacido.  12.12 3ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 

y § 9. 

12.13 N¡No, por favor, sánala ahora!  12.14 

→Nm.5.2-3. 


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Números 13:32

155

15

 Y Miriam fue excluida del campamento 

siete días, y el pueblo no partió adelante 

hasta que Miriam fue readmitida.

16

 Después el pueblo partió de Haserot, y 

acamparon en el desierto de Parán.

Los exploradores

13

Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Envía hombres que exploren para 

ti la tierra de Canaán, la cual doy a los hi­

jos de Israel. Enviaréis un varón por cada 

tribu de sus padres, cada cual jerarca en­

tre ellos.

3

 Entonces Moisés los envió desde el de­

sierto de Parán, según el dicho de YHVH. 

Y todos aquellos varones eran jefes entre 

los hijos de Israel.

4

 Y estos eran sus nombres: De la tribu de 

Rubén, Samúa ben Zacur.

5

 De la tribu de Simeón: Safat ben Horí.

6

 De la tribu de Judá: Caleb ben Jefone.

7

 De la tribu de Isacar: Igal ben José.

8

 De la tribu de Efraín: Oseas ben Nun.

9

 De  la  tribu  de  Benjamín:  Palti  ben 

Rafú.

10

 De  la  tribu  de  Zabulón:  Gadiel  ben 

Susi.

11

 De la tribu de José (de la tribu de Ma­

nasés): Gadi ben Susi.

12

 De la tribu de Dan: Amiel ben Gemali.

13

 De la tribu de Aser: Setur ben Micael.

14

 De la tribu de Neftalí: Nahbi ben Vapsi.

15

 De la tribu de Gad: Geuel ben Maqui.

16

 Estos son los nombres de los varones 

que Moisés envió a explorar la tierra. Y a 

Oseas ben Nun, Moisés le puso por nom­

bre Josué.

17

 Los envió pues Moisés a reconocer la 

tierra de Canaán, y les dijo: Subid ahí por 

el Neguev y remontad luego la montaña.

18

 Observaréis  la  tierra,  cómo  es,  y  al 

pueblo que la habita, si es fuerte o débil, 

si escaso o numeroso.

19

 Cómo es el suelo en que él habita, si es 

bueno o malo, y cómo son las ciudades en 

las cuales mora, si abiertas o fortificadas,

20

 y  cómo  es  el  terreno,  si  fértil  o  esté­

ril, si hay en él árboles o no. Esforzaos, y 

reco ged del fruto de la tierra. El tiempo 

era la sazón de las primeras uvas.

21

 Subieron  pues  y  exploraron  la  tierra 

desde el desierto de Zin hasta Rehob, a la 

entrada de Hamat.

22

 Y  remontaron  el  Neguev  y  llegaron 

hasta  Hebrón,  donde  estaban  Ahimán, 

Sesai  y  Talmai,  hijos  de  Anac°  (Hebrón 

había sido edificada siete años antes que 

Zoán, en Egipto).

23

 Y llegaron hasta el valle de Escol, y allí 

cortaron un sarmiento con un racimo de 

uvas,  el  cual  cargaron  en  un  palo  entre 

dos, trayendo también algunas granadas 

y algunos higos.

24

 Y llamaron aquel lugar Najal­escol° a 

causa del racimo que cortaron de allí los 

hijos de Israel.

25

 Y  regresaron  de  explorar  la  tierra  al 

cabo de cuarenta días.

26

 Emprendieron, pues, viaje y llegaron a 

donde  estaban  Moisés  y  Aarón  y  toda  la 

comunidad de los hijos de Israel, en el de­

sierto de Parán, en Cades, y dieron cuenta 

a ellos y a toda la asamblea, y les mostra­

ron el fruto del país.

27

 Y le contaron diciendo: Hemos llega­

do  hasta  el  país  al  cual  nos  enviaste,  y 

realmente es una tierra que fluye leche y 

miel. ¡Ved aquí sus frutos!

28

 Pero, el pueblo que habita en esa tierra 

es fuerte, y las ciudades están fortificadas 

y son muy grandes. Además, hemos visto 

allí a los descendientes de Anac.

29

 Los amalecitas habitan en la tierra del 

Neguev, y el heteo, el jebuseo y el amo­

rreo habitan en la serranía, y el cananeo 

habita a lo largo del Mar Grande y en la 

ribera del Jordán.°

30

 Entonces  Caleb  trató  de  apaciguar  al 

pueblo  en  presencia  de  Moisés,  y  dijo: 

¡Subamos ya y conquistémosla, pues cier­

tamente podremos con ella!

31

 Pero los hombres que habían subido con 

él, dijeron: No podremos subir contra aquel 

pueblo, porque es más fuerte que nosotros.

32

 Y difamaron ante los hijos de Israel la 

tierra que habían explorado, diciendo: El 

país que fuimos a explorar es un país que 

devora a sus habitantes, y todo el pueblo 

que vimos en medio de él son hombres de 

inmensa estatura.

13.22 Lit. los hijos del collar. Prob. los habitantes cerca de Hebrón eran altos y de cuello largo 

→Dt.1.28; 9.2.  13.24 Es decir, 

Valle del Racimo

13.29 Prob. sea inserción de un editor posterior.


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Números 13:33

156

33

 También vimos allí a los nefileos,° des-

cendientes  de  Anac,  raza  de  gigantes,  y 

nos  pareció  que  éramos  como  langostas 

ante sus ojos.

Rebelión del pueblo

14

Entonces toda la asamblea levantó 

la voz y clamó, y el pueblo estuvo 

llorando aquella noche.

2

 Y todos los hijos de Israel murmuraron 

contra Moisés y Aarón, y toda la asamblea 

les dijo: ¡Ojalá hubiéramos muerto en la 

tierra  de  Egipto!,  ¡Ojalá  muriéramos  en 

este desierto!

3

 ¿Para qué nos trae YHVH a esta tierra, 

para caer a espada, y que nuestras muje-

res y nuestros pequeños sirvan de presa? 

¿No nos sería mejor volvernos a Egipto?

4

 Y cada cual decía a su hermano: ¡Ponga-

mos un caudillo y regresemos a Egipto!

5

 Entonces Moisés y Aarón cayeron sobre 

sus rostros en presencia de toda la asam-

blea  de  la  congregación  de  los  hijos  de 

Israel.

6

 Y  Josué  ben  Nun,  y  Caleb  ben  Jefone, 

que eran de los que habían explorado la 

tierra, rasgaron sus vestidos,

7

 y  hablaron  a  toda  la  asamblea  de  los 

hijos  de  Israel,  diciendo:  La  tierra  por 

donde  pasamos  para  explorarla  es  tierra 

extremadamente buena.

8

 Si YHVH se agrada de nosotros, Él nos 

introducirá en esa tierra, y nos la entrega-

rá. Es una tierra que fluye leche y miel.

9

 Pero  no  os  rebeléis  contra  YHVH°  ni 

temáis a la gente del país, porque serán 

como  nuestro  pan.°  Su  defensa  se  ha 

apartado de ellos, y YHVH está con noso-

tros. ¡No les tengáis temor!

10

 Pero  la  asamblea  entera  hablaba  de 

lapidarlos.  Entonces  la  gloria  de  YHVH 

se apareció en la Tienda de Reunión ante 

todos los hijos de Israel,

11

 y YHVH dijo a Moisés: ¿Hasta cuándo 

me despreciará este pueblo? ¿Hasta cuán-

do se negará a creer en mí, con todos los 

prodigios que he obrado en su seno?

12

 Lo heriré con pestilencia y lo deshere-

daré, y haré de ti° una nación más grande 

y más fuerte que él.

13

 Pero Moisés dijo a YHVH: Se enterarán 

los egipcios, pues de en medio de ellos Tú 

sacaste a este pueblo con tu fuerza,

14

 y  se  lo  dirán  a  los  habitantes  de  esta 

tierra,  pues  ellos  han  oído  que  Tú,  oh 

YHVH, estás en medio de este pueblo, que 

Tú, oh YHVH, te dejas ver cara a cara, que 

tu  nube  está  sobre  ellos,  y  que  Tú  mar-

chas delante en columna de nube de día y 

en columna de fuego de noche.

15

 Si  haces  morir,  pues,  a  este  pueblo 

como un solo hombre, las gentes que han 

oído tu fama hablarán, diciendo:

16

 Porque  no  pudo  YHVH  introducir  a 

este pueblo en la tierra que les había pro-

metido con juramento, los ha matado en 

el desierto.

17

 Ahora pues, ¡engrandézcase, te ruego, 

el poder de mi Señor!, tal como hablaste, 

diciendo:

18

 YHVH,  lento  para  la  ira  y  grande  en 

misericordia, que carga con la iniquidad 

y  la  transgresión,  pero  de  ningún  modo 

tiene por inocente al culpable° y visita la 

iniquidad  de  los  padres  sobre  los  hijos, 

sobre terceros y cuartos.°

19

 Perdona, te ruego, la iniquidad de este 

pueblo  según  la  grandeza  de  tu  miseri-

cordia,  conforme  has  cargado  con  este 

pueblo desde Egipto hasta aquí.°

20

 Y YHVH dijo: Lo perdono conforme a 

tu palabra.

21

 No obstante, tan cierto como Yo vivo, y 

la gloria de YHVH llena toda la tierra,

22

 que todos los hombres que vieron mi 

gloria y mis señales que hice en Egipto y 

en el desierto, y aun así me provocaron ya 

diez veces y no oyen mi voz,

23

 no verán la tierra sobre la cual juré a 

sus padres. Todos los que me desprecia-

ron, no la verán.°

24

 Pero  a  mi  siervo  Caleb,  por  cuanto 

hubo otro espíritu en él y fue íntegro con-

migo,  lo  introduciré  en  la  tierra  donde 

13.33 Prob. no sean los mismos personajes de Gn.6.4 sino de otra etnia de estatura anormal.  14.9 

→He.3.16.  14.9 Me-

táfora referente al maná, que siendo tan duro había que molerlo o machacarlo 

→11.8, era tan peculiar que se derretía con 

el sol 

→Ex.16.21. Así se derretirían los enemigos de Israel. →Jos.2.11.  14.12 LXX añade y de la casa de tu padre.  14.18 

.

al  culpable

14.18  Es  decir,  tercera  y  cuarta  generación

→Ex.20.5-6;  34.6-7;  Dt.5.9-10;  7.9-10.  14.13-19  →Ex.32.11-14. 

14.21-23 

→He.3.18.


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Números 15:4

157

entró, y su descendencia tomará posesión 

de ella,°

25

 aunque el amalecita y el cananeo habi­

ten en el valle.° Regresad mañana y mar­

chad  al  desierto  por  el  camino  del  Mar 

Rojo.

26

 Y habló YHVH a Moisés y a Aarón, di­

ciendo:

27

 ¿Hasta cuándo he de soportar° a esta 

congregación  perversa  que  murmura 

contra  mí?  He  oído  las  murmuraciones 

de los hijos de Israel con que murmuran 

contra mí.

28

 Diles:  Vivo  Yo,  dice  YHVH,  que  tal 

como habéis hablado a mis oídos, así haré 

Yo con vosotros.

29

 Vuestros  cuerpos°  caerán  en  este  de­

sierto,  y  todos  vuestros  censados,  según 

todos  los  que  habéis  contado  de  veinte 

años arriba, que habéis murmurado con­

tra mí,

30

 no entraréis en la tierra por la cual alcé 

mi  mano  para  jurar  que  os  haría  morar 

en ella, excepto Caleb ben Jefone y Josué 

ben Nun.

31

 Pero vuestros pequeños, que dijisteis: 

¡Llegarán a ser presa! Yo los introduciré, 

y conocerán la tierra que vosotros habéis 

despreciado.

32

 En cuanto a vosotros, vuestros cadáve­

res yacerán en este desierto,

33

 y  vuestros  hijos  deambularán  en  el 

desierto cuarenta años,° y ellos cargarán 

con  vuestras  fornicaciones,°  hasta  que 

vuestros cadáveres sean deshechos en el 

desierto.

34

 Por el número de los días, de los cua­

renta  días  en  que  explorasteis  la  tierra, 

cargaréis  con  vuestras  iniquidades  cua­

renta años, un año por cada día, y cono­

ceréis mi disgusto.

35

 Yo, YHVH, he hablado. ¿Acaso no he de 

hacer esto a toda esta congregación per­

versa que se confabuló contra mí? En este 

desierto se consumirán, y allí morirán.

36

 Y los hombres que Moisés había envia­

do a explorar la tierra y que, vueltos, ha­

bían hecho murmurar contra él a toda la 

congregación, al difamar aquella tierra,

37

 aquellos  hombres,  pues,  que  habían 

difamado la tierra perversamente, murie­

ron a causa de una plaga en presencia de 

YHVH.

38

 Sólo  Josué  ben  Nun  y  Caleb  ben  Je­

fone  quedaron  con  vida  de  entre  aque­

llos hombres que habían ido a explorar 

la tierra.

39

 Cuando Moisés refirió esas palabras a 

todos los hijos de Israel, el pueblo se afli­

gió en gran manera.

40

 Y  levantándose  temprano  por  la  ma­

ñana,  subieron  a  la  cumbre  del  monte, 

diciendo:  Aquí  estamos,  subiremos  al 

lugar  que  ha  dicho  YHVH,  pues  hemos 

pecado.

41

 Pero Moisés dijo: ¿Por qué pretendéis 

traspasar  el  dicho  de  YHVH?  Esto  no 

prosperará.

42

 No  subáis,  porque  YHVH  no  está  en 

medio de vosotros, así no seréis derrota­

dos delante de vuestros enemigos.

43

 Porque el amalecita y el cananeo están 

esperando° allí contra vosotros, y caeréis a 

espada, por cuanto os volvisteis de seguir a 

YHVH. YHVH no estará con vosotros.

44

 Sin embargo, se empecinaron en subir 

a la cumbre del monte, aunque ni el Arca 

del Pacto de YHVH ni Moisés se movieron 

de en medio del campamento.

45

 Entonces descendieron los amalecitas 

y  los  cananeos  que  habitaban  en  aquel 

monte, y los derrotaron, y los persiguie­

ron hasta Horma.

Instrucciones diversas

15

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel, y di­

les: Cuando hayáis entrado en la tierra de 

vuestra morada que Yo os doy,

3

 y de la vacada o del rebaño hagáis ofren­

da ígnea a YHVH, holocausto o sacrificio 

por  expresar  voto,  o  por  voluntad,  o  en 

vuestras fiestas solemnes por hacer olor 

que apacigua a YHVH,

4

 el que aproxime su ofrenda ante YHVH 

llevará como ofrenda vegetal una décima 

de un efa de flor de harina, amasada con 

la cuarta parte de un hin de aceite.

14.24 

→Jos.14.9-12.  14.25 NY el amalecita y el cananeo habitaban en el valle.  14.27 .he de soportar.  14.29 →He.3.17. 

14.33 

→Hch.7.36.  14.33 Esto es, en sentido espiritual, invalidando el pacto y sirviendo a dioses ajenos.  14.43 .esperando


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Números 15:5

158

5

 Tú prepararás vino para la libación, un 

cuarto de hin con el holocausto o para el 

sacrificio, por cada cordero.

6

 Por un carnero, en cambio, prepararás 

como ofrenda vegetal dos décimas de flor 

de harina, amasada con un tercio de un 

hin de aceite,

7

 y del vino para la libación, un tercio de 

hin, que ofrecerás como olor que apaci-

gua a YHVH.

8

 Pero  si  deseas  sacrificar  un  novillo  en 

holocausto  o  sacrificio,  en  cumplimien-

to  de  un  voto,  o  como  ofrenda  de  paz  a 

YHVH,

9

 se  ofrecerá  además  del  novillo,  una 

ofrenda  vegetal  de  tres  décimas  de  flor 

de  harina,  amasada  con  medio  hin  de 

aceite.

10

 Y para la libación ofrecerás° medio hin 

de  vino,  en  sacrificio  ígneo  de  olor  que 

apacigua a YHVH.

11

 Así se hará con cada buey, o carnero, o 

cría de ovejas o de cabras.

12

 Conforme al número que ofrezcáis, así 

haréis según la cantidad de ellos.

13

 Todos los nativos harán estas cosas así, 

para  ofrecer  el  sacrificio  ígneo  en  olor 

que apacigua a YHVH.

14

 Y  cuando  un  extranjero  resida  entre 

vosotros, o alguien viva en medio de voso-

tros  en  vuestras  sucesivas  generaciones, 

y desee hacer un sacrificio ígneo en olor 

que  apacigua  a  YHVH,  lo  hará  tal  como 

vosotros lo hacéis.

15

 Un  mismo  estatuto  tendréis  para  vo-

sotros, los de la congregación, como para 

el  extranjero  que  habita  con  vosotros. 

Habrá  un  estatuto  perpetuo  delante  de 

YHVH  por  vuestras  generaciones,  tanto 

para vosotros como para el extranjero.

16

 Una sola ley y un solo decreto tendréis 

para vosotros y para el extranjero que ha-

bita con vosotros.°

17

 Habló YHVH a Moisés, diciendo:

18

 Habla  a  los  hijos  de  Israel,  y  diles: 

Cuando entréis en la tierra a la cual Yo os 

estoy llevando,

19

 será que cuando comáis el alimento de 

la tierra, haréis elevar una ofrenda alzada 

ante YHVH.

20

 De lo primero de vuestras artesas, ha-

réis elevar una torta en ofrenda alzada, y la 

haréis elevar como la ofrenda de la era.°

21

 Así que, de las primicias de lo que ama-

séis, ofreceréis ofrenda alzada ante YHVH 

por vuestras generaciones.

22

 Si  erráis  y  no  cumplís  todos  estos 

mandamientos  que  YHVH  ha  hablado  a 

Moisés,

23

 todos  los  que  YHVH  os  ha  ordenado 

por mano de Moisés, desde el día en que 

YHVH dio orden, y en adelante por vues-

tras generaciones,

24

 sucederá que, si se hace por error, con 

desconocimiento° de la asamblea, toda la 

asamblea ofrecerá un novillo como holo-

causto en olor que apacigua a YHVH, con 

su ofrenda vegetal y su libación, confor-

me al decreto, juntamente con un macho 

cabrío en ofrenda por el pecado.

25

 Y  el  sacerdote  hará  expiación  a  favor 

de toda la congregación de los hijos de Is-

rael, y les será perdonado, pues fue error, 

y han hecho llevar su ofrenda: un sacrifi-

cio ígneo a YHVH, y una ofrenda delante 

YHVH por su pecado, por su error.

26

 Y le será perdonado a toda la congre-

gación de los hijos de Israel y al extranje-

ro que reside entre vosotros, por cuanto 

fue error de todo el pueblo.

27

 Y  si  una  sola  persona  peca  por  error, 

ofrecerá una cabra de un año en ofrenda 

por el pecado,

28

 y  el  sacerdote  hará  expiación  a  favor 

de la persona que haya pecado por error 

cuando yerre ante YHVH. Y al hacer ex-

piación a su favor, le será perdonado.°

29

 Una sola ley tendréis para el que yerre, 

tanto para el nativo entre los hijos de Is-

rael  como  para  el  extranjero  que  habita 

entre vosotros.

30

 Mas la persona que actúe con mano al-

zada,° sea nativo o extranjero, ante YHVH 

ha  blasfemado.  Tal  persona  será  cortada 

de en medio de su pueblo,

31

 por  cuanto  ha  menospreciado  la  pa-

labra de YHVH y ha traspasado su man-

damiento.  Tal  persona  será  cortada  sin 

remedio  y  su  iniquidad  recaerá  sobre 

ella.

15.10  Lit.  harás  acercar.  15.16 

→Lv.24.22.  15.20  Esto  es,  lugar  donde  se  trilla  el  grano.  15.24  Lit.  (lejos)  de  los  ojos

15.27-28 

→Lv.4.27-31.  15.30 Es decir, con arrogancia


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Números 16:17

159

32

 Mientras los hijos de Israel estaban en 

el  desierto,  sorprendieron  a  un  hombre 

que recogía leña en día de shabbat.

33

 Los  que  lo  sorprendieron  recogiendo 

leña lo presentaron ante Moisés y Aarón 

y toda la asamblea,

34

 y lo pusieron bajo custodia porque aún 

no se había declarado lo que había de ha­

cerse con él.

35

 Entonces  YHVH  dijo  a  Moisés:  Ese 

hombre ha de ser muerto irremisiblemen­

te. ¡Lapídelo con piedras toda la asamblea 

fuera del campamento!

36

 Entonces la asamblea lo sacó fuera del 

campamento y lo lapidaron con piedras, 

y murió, tal como YHVH había ordenado 

a Moisés.

37

 Después YHVH habló a Moisés, dicien­

do:

38

 Habla a los hijos de Israel y diles que 

se hagan flecos en los bordes de sus vesti­

dos,° por sus generaciones, y que en cada 

fleco de los bordes pongan un cordón de 

azul.

39

 Tales flecos os servirán para que, cuan­

do los veáis, os acordéis de todos los man­

damientos de YHVH y los cumpláis, y no 

sigáis el impulso de vuestro corazón ni de 

vuestros ojos, tras el cual os prostituís,

40

 a fin de que recordéis y cumpláis todos 

mis mandamientos, y estéis consagrados 

a vuestro Dios.

41

 Yo, YHVH vuestro Dios, que os saqué 

de  la  tierra  de  Egipto  para  ser  el  Dios 

vuestro. ¡Yo soy YHVH vuestro Dios!

La rebelión de Coré

16

Coré ben Itsar, hijo de Coat, hijo de 

Leví, captó a Datán y a Abirán, hi­

jos de Eliab, y a On ben Pelet, de los hijos 

de Rubén,

2

 y  se  rebelaron  contra  Moisés  con  dos­

cientos cincuenta hombres de los hijos de 

Israel,  jerarcas  de  la  comunidad,  miem­

bros del consejo, varones de renombre.

3

 Se  rebelaron  contra  Moisés  y  Aarón  y 

les dijeron: ¡Ya basta de vosotros! Porque 

todos los de esta asamblea son santos, y 

YHVH  también  está  en  medio  de  ellos. 

¿Por qué pues os enaltecéis sobre la con­

gregación de YHVH?

4

 Y lo oyó Moisés, y cayó sobre su rostro,

5

 y habló a Coré y a todo su séquito, di­

ciendo: Mañana YHVH hará saber quién 

le pertenece: al consagrado lo hará acer­

carse; al escogido lo aproximará a Él.

6

 Haced  esto:  Tomaos  los  incensarios 

Coré y todo tu séquito,

7

 y mañana, poned en ellos fuego y echad 

incienso en presencia de YHVH. Y suce­

derá que el hombre a quien YHVH escoja, 

ese será el santo. ¡Esto os será suficiente, 

oh hijos de Leví!

8

 Moisés dijo además a Coré: Oíd ahora, 

hijos de Leví:

9

 ¿Es  poco  para  vosotros  que  el  Dios  de 

Israel os haya separado de la asamblea de 

Israel  para  aproximaros  a  Él  para  servir 

en  la  obra  del  Tabernáculo  de  YHVH,  y 

manteneros al frente de la asamblea para 

ministrarles?

10

 A ti te hizo acercar, y contigo a todos 

tus hermanos, los hijos de Leví, pero aho­

ra pretendéis también el sacerdocio.

11

 Tú pues, y todo tu séquito: Es contra 

YHVH  que  os  habéis  confabulado,  pues, 

¿qué es Aarón para que murmuréis con­

tra él?

12

 Entonces Moisés envió a llamar a Da­

tán y Abirán, hijos de Eliab, pero ellos di­

jeron: No subiremos.

13

 ¿Es  poco  que  nos  hayas  hecho  subir 

de una tierra que fluye leche y miel para 

hacernos morir en el desierto, y que ade­

más pretendas dominar sobre nosotros de 

manera absoluta?

14

 Tampoco nos has introducido a la tierra 

que fluye leche y miel, ni nos has dado en 

heredad campos y vides, ¿pretendes arran­

car los ojos de esta gente? ¡No iremos!

15

 Entonces Moisés se enardeció en gran 

manera,  y  dijo  a  YHVH:  No  aceptes  su 

ofrenda. Yo no he tomado de ellos ni un 

asno, y a ninguno de ellos he hecho mal.

16

 Después dijo Moisés a Coré: Tú y todo 

tu séquito presentaos mañana delante de 

YHVH. Tú, ellos, y Aarón,

17

 y tome cada uno su incensario y pon­

ga  incienso  en  ellos,  y  acercaos  delante 

YHVH, cada uno con su incensario. Dos­

cientos cincuenta incensarios, tú y Aarón, 

cada uno con su incensario.

15.38 

→Dt.22.12.


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Números 16:18

160

18

 Entonces  cada  uno  tomó  su  incensa-

rio, y pusieron en ellos fuego y echaron 

incienso,  y  se  mantuvieron  a  la  entrada 

de  la  Tienda  de  Reunión  con  Moisés  y 

Aarón.

19

 Y  Coré  había  hecho  reunir  contra 

ellos a toda la asamblea a la entrada de la 

Tienda de Reunión. Entonces la gloria de 

YHVH se mostró a toda la asamblea.

20

 Y habló YHVH a Moisés y a Aarón, di-

ciendo:

21

 Separaos  de  en  medio  de  esta  asam-

blea, y los consumiré en un instante.

22

 Pero  ellos  cayeron  sobre  sus  rostros, 

y dijeron: ¡Dios, Dios del espíritu de toda 

carne!  ¿No  es  un  solo  hombre  el  que 

pecó? ¿Por qué te enojarás contra toda la 

congregación?

23

 Entonces  YHVH  habló  a  Moisés,  di-

ciendo:

24

 Habla  a  la  asamblea,  diciendo:  Subid 

alrededor  de  la  tienda  de  Coré,  Datán  y 

Abirán.

25

 Y Moisés se levantó y fue a Datán y Abi-

rán, y los ancianos de Israel fueron tras él.

26

 Y habló a la asamblea, diciendo: ¡Apar-

taos  ahora  de  las  tiendas  de  estos  hom-

bres  malvados,  y  no  toquéis  nada  suyo, 

para que no seáis barridos° con todos sus 

pecados!

27

 Entonces  se  apartaron  de  los  alrede-

dores de las tiendas de Coré, de Datán y 

de  Abirán.  Pero  Datán  y  Abirán  salieron 

erguidos a la entrada de sus tiendas, con 

sus mujeres, sus hijos y sus pequeños.

28

 Y dijo Moisés: En esto conoceréis que 

YHVH  me  envió  para  hacer  todas  estas 

obras, y que no son de mi corazón:

29

 Si  éstos  llegan  a  morir  como  muere 

cualquier hombre, y si son sentenciados 

como se sentencia a cualquier hombre,° 

entonces YHVH no me ha enviado.

30

 Pero si YHVH crea algo extraño,° y la 

tierra abre su boca y se los traga con to-

das sus cosas, y descienden vivos al Seol,° 

entonces  conoceréis  que  estos  hombres 

despreciaron a YHVH.

31

 Y aconteció que al terminar de hablar 

todas estas palabras, el suelo que estaba 

debajo ellos fue partido,

32

 y la tierra abrió su boca, y se los tragó 

a ellos y a sus familias, y a todo hombre 

que estaba de parte de Coré, y a todas sus 

pertenencias.

33

 Y ellos, con todo lo que poseían, des-

cendieron  vivos  al  Seol,  y  los  cubrió  la 

tierra, y desaparecieron de en medio de la 

congregación.

34

 Y  todos  los  israelitas  que  estaban  al-

rededor de ellos huyeron ante sus gritos, 

pues decían: ¡No sea que la tierra nos tra-

gue a nosotros!

35

 Y salió fuego de YHVH que consumió 

a los doscientos cincuenta hombres que 

ofrecían el incienso.°

36

 Entonces  YHVH  habló  a  Moisés,  di-

ciendo:

37

 Di a Eleazar, hijo del sacerdote Aarón, 

que recoja los incensarios de entre el in-

cendio,  porque  están  consagrados,  y  es-

parce allí las brasas.

38

 Con los incensarios de los que pecaron 

contra sus almas, harán planchas marti-

lladas  para  recubrir  el  altar,  por  cuanto 

los acercaron ante YHVH y están consa-

grados. Serán, pues, por señal a los hijos 

de Israel.

39

 Entonces  el  sacerdote  Eleazar  tomó 

los incensarios de bronce con los cuales 

se habían acercado los que habían sido in-

cinerados, y los laminaron para recubrir 

el altar

40

 como recuerdo para los hijos de Israel 

de que ningún extraño, que no fuera de la 

descendencia de Aarón, podía ofrecer in-

cienso ante YHVH, y no llegara a ser como 

Coré y como su séquito, conforme YHVH 

había hablado por medio de Moisés.

41

 Al día siguiente, sin embargo, toda la 

asamblea de los hijos de Israel murmuró 

contra  Moisés  y  Aarón,  diciendo:  ¡Voso-

tros  estáis  haciendo  morir  al  pueblo  de 

YHVH!

42

 Y  aconteció  que  al  congregarse  la 

asamblea contra Moisés y Aarón, se vol-

vieron hacia la Tienda de Reunión, y he 

aquí la nube la había cubierto, y la gloria 

de YHVH se mostró.

43

 Entonces Moisés y Aarón se dirigieron 

hacia el frente de la Tienda de Reunión,

16.26 

→Gn.19.15.  16.29 Es decir, que mueran de muerte natural.  16.30 Es decir, hace algo novedoso.  16.30 LXX: hades = el 

mundo de los muertos

16.35 El TM concluye aquí el c. 16. 


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Números 18:6

161

44

 y habló YHVH a Moisés, diciendo:

45

 ¡Apartaos  de  en  medio  de  esta  asam­

blea y los consumiré en un instante! Pero 

ellos cayeron sobre sus rostros,

46

 y dijo Moisés a Aarón: ¡Toma el incen­

sario  y  ponle  fuego  del  altar  y  encima 

ponle incienso! ¡Apresúrate y ve hacia la 

congregación  y  haz  expiación  por  ellos, 

porque la ira ha salido de la presencia de 

YHVH y la plaga ha comenzado!

47

 Entonces,  tal  como  Moisés  había  ha­

blado, Aarón tomó el incensario y corrió 

hacia el centro de la asamblea, y ¡he aquí 

la plaga había comenzado entre el pueblo! 

Pero él puso el incienso e hizo expiación a 

favor del pueblo,

48

 y al colocarse entre los muertos y los 

vivos, la plaga fue detenida.

49

 Sin  embargo,  los  que  murieron  en 

aquella plaga fueron catorce mil setecien­

tos, sin contar los muertos por el asunto 

de Coré.

50

 Y  Aarón  volvió  adonde  Moisés,  a  la 

puerta de la Tienda de Reunión, pues la 

plaga había sido detenida.

La vara de Aarón

17

Entonces  YHVH  habló  a  Moisés, 

diciendo:

2

 Habla  a  los  hijos  de  Israel,  y  toma  de 

ellos una vara por cada casa paterna: doce 

varas  de  todos  sus  jefes  conforme  a  sus 

casas paternas, y escribirás el nombre de 

cada uno en su vara.

3

 Y en la vara de Leví escribirás el nombre 

de Aarón, pues cada cabeza de su casa pa­

terna tendrá una vara.

4

 Luego las pondrás en la Tienda de Reu­

nión,  delante  del  Testimonio,  donde  Yo 

me encuentro con vosotros,

5

 y sucederá que la vara del varón que Yo 

escoja, florecerá, y así haré quitar de so­

bre mí las murmuraciones con que los hi­

jos de Israel murmuran contra vosotros.

6

 Entonces  Moisés  habló  a  los  hijos  de 

Israel,  y  todos  sus  jefes  le  dieron  varas. 

Cada jefe una vara por cada casa paterna, 

en total doce varas (y la vara de Aarón es­

taba entre las varas de ellos).

7

 Y Moisés depositó las varas en presencia 

de YHVH en la Tienda del Testimonio.

8

 Al  día  siguiente,  aconteció  que  Moisés 

fue a la Tienda del Testimonio, y he aquí 

que la vara de Aarón, de la casa de Leví, 

había reverdecido y echado flores, y había 

arrojado  renuevos  y  producido  almen­

dras.

9

 Entonces Moisés sacó de la presencia de 

YHVH todas las varas ante todos los hijos 

de Israel, y ellos lo vieron y tomaron cada 

uno su vara.

10

 Y YHVH dijo a Moisés: Vuelve a depo­

sitar  la  vara  de  Aarón  delante  del  Testi­

monio° para que se guarde por señal a los 

hijos  rebeldes,  para  que  hagas  cesar  sus 

murmuraciones contra mí, y no mueran.

11

 Y  Moisés  hizo  tal  como  le  ordenó 

YHVH. Así lo hizo.

12

 Entonces los hijos de Israel clamaron 

a Moisés, diciendo: ¡He aquí perecemos! 

¡Estamos perdidos! ¡Todos nosotros esta­

mos perdidos!

13

 ¡Cualquiera  que  se  acerca  al  Taber­

náculo  de  YHVH  muere!  ¿Acabaremos 

pereciendo todos?

Funciones y derechos de los levitas

18

Entonces YHVH dijo a Aarón: Tú y 

tus hijos, y tu casa paterna contigo, 

cargaréis con las ofensas° contra el San­

tuario. Y tú y tus hijos contigo cargaréis 

con  las  ofensas  contra  vuestro  sacerdo­

cio.

2

 También  haz  que  se  acerquen  tus  her­

manos de la tribu de Leví, la tribu de tu 

padre, para que se junten contigo y te sir­

van mientras que tú y tus hijos ministrais 

ante la Tienda del Testimonio.

3

 Ellos acatarán tu orden y la obligación 

de todo el Tabernáculo, pero no se acer­

carán  a  los  utensilios  santos  ni  al  altar, 

para  que  no  mueran,  tanto  ellos  como 

vosotros.

4

 Ellos te acompañarán y tendrán el cui­

dado de la Tienda de Reunión en todo el 

servicio del Tabernáculo. Ningún extraño 

se ha de acercar a vosotros.

5

 Vosotros  seréis  responsables  del  San­

tuario y del cuidado del altar, para que no 

haya más ira contra los hijos de Israel.

6

 He aquí, Yo he tomado a vuestros her­

manos los levitas, de en medio de los hijos 

17.8-10 

→He.9.4.  18.1 Lit. iniquidad


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Números 18:7

162

de Israel, y los he dado como un don para 

vosotros, dedicados a YHVH para oficiar 

el servicio de la Tienda de Reunión.

7

 Por lo tanto, tú y tus hijos contigo aten­

deréis  a  vuestro  sacerdocio  en  todo  lo 

concerniente al altar y a lo que está den­

tro del velo. Os doy en don el servicio de 

vuestro sacerdocio, pero el extraño que se 

acerque será muerto.

8

 Y habló YHVH a Aarón: He aquí, Yo te he 

dado la custodia de mis ofrendas alzadas. 

Todas las cosas que los hijos de Israel con­

sagran te las he dado a ti y a tus hijos en 

virtud de la unción, por estatuto perpetuo.

9

 De las cosas santísimas preservadas del 

fuego, esto será tuyo: Todas sus víctimas 

que me han de presentar, toda ofrenda ve­

getal suya, toda expiación por su pecado 

y toda expiación por su culpa, serán cosa 

santísima para ti y para tus hijos.

10

 Las comerás en lugar santísimo. Todo 

varón comerá de ellas, y será cosa santa 

para ti.

11

 Esto también será tuyo: la primera por­

ción° de su ofrenda alzada, y toda ofrenda 

mecida de los hijos de Israel. Te la doy a ti, 

a tus hijos y a tus hijas contigo, por esta­

tuto perpetuo. Todo el que esté limpio en 

tu casa podrá comer de ella.

12

 Todo  lo  selecto  del  aceite,  del  mosto 

y del trigo, las primicias que ofrecerán a 

YHVH, te las doy a ti.

13

 Las primicias de todas las cosas de su 

tierra,  las  cuales  traerán  a  YHVH,  serán 

tuyas. Todo el que esté limpio en tu casa 

podrá comer de ellas.

14

 Todo lo consagrado mediante voto° en 

Israel será tuyo.

15

 Todo lo que abra matriz de toda carne 

que presenten a YHVH, tanto de hombres 

como de animales, será tuyo. Sin embar­

go, redimirás sin falta el primogénito del 

hombre, y también redimirás el primeri­

zo del animal impuro.

16

 De un mes efectuarás su rescate, según 

tu valoración, por precio de cinco siclos 

de plata, conforme al siclo del Santuario, 

que es de veinte geras.

17

 Pero  no  redimirás  el  primerizo  de 

la  vaca  ni  el  primerizo  de  la  oveja  ni  el 

primerizo de la cabra, pues son sagrados. 

Rociarás su sangre sobre el altar, y dejarás 

consumir su grasa como sacrificio ígneo 

en olor que apacigua a YHVH.

18

 Y su carne será para ti, lo mismo que el 

pecho de la ofrenda mecida y la espaldilla 

derecha. Será tuya.

19

 Todas las ofrendas alzadas de las cosas 

santas que los hijos de Israel presenten a 

YHVH, te las doy a ti, a tus hijos y a tus 

hijas  contigo,  por  estatuto  perpetuo.  Es 

pacto de sal, perpetuo delante de YHVH, 

para ti y para tu descendencia contigo.

20

 Y YHVH dijo a Aarón: En tierra de ellos 

no heredarás, ni tendrás porción en me­

dio de ellos. Yo soy tu porción y tu here­

dad en medio de los hijos de Israel.

21

 He aquí, Yo he dado a los hijos de Leví 

todos  los  diezmos°  en  Israel,  como  he­

redad, a cambio del servicio que llevan a 

cabo en la Tienda de Reunión.

22

 Porque los hijos de Israel no se acerca­

rán más a la Tienda de Reunión, para que 

no carguen pecado por el cual mueran.

23

 Sólo el levita ejercerá el servicio de la 

Tienda de Reunión, y ellos cargarán con 

la iniquidad del pueblo.° Será estatuto 

perpetuo  por  vuestras  generaciones,  y 

entre los hijos de Israel no tendrán he­

redad.

24

 Porque el diezmo que los hijos de Is­

rael ofrecen ante YHVH como ofrenda al­

zada, lo he dado a los levitas por heredad, 

por lo cual les he dicho: No tendrán here­

dad en medio de los hijos de Israel.

Los diezmos y el diezmo de los diezmos

25

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

26

 Hablarás  así  a  los  levitas,  y  les  dirás: 

Cuando toméis de los hijos de Israel los 

diezmos  que  os  he  dado  de  ellos  como 

vuestra  heredad,  vosotros  presentaréis 

como  ofrenda  alzada  a  YHVH  el  diezmo 

de los diezmos.

27

 Y vuestras ofrendas alzadas se os con­

tarán como si fuera grano de la era y como 

producto del lagar.

28

 Así también vosotros presentaréis una 

ofrenda alzada a YHVH de todos los diez­

mos  que  recibáis  de  los  hijos  de  Israel, 

18.11 Heb. terumah. LXX traduce por aparjé. Se refiere a la porción del sacrificio reservada para Dios antes de disponer del resto 

de la ofrenda. 

18.14 

→Lv.27.28.  18.21 →Lv.27.30-33; Dt.14.22-29.  18.23 .del pueblo


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Números 19:20

163

y de ellos daréis la porción reservada de 

YHVH al sacerdote Aarón.

29

 De todos vuestros dones haréis elevar 

toda ofrenda alzada a YHVH, de toda su 

grasa, la parte consagrada de ellas.

30

 Y  les  dirás:  Cuando  hagáis  elevar  de 

ella  su  grasa,  será  contado  a  los  levitas 

como producto de la era, y como produc­

to del lagar.

31

 Y lo comeréis en cualquier lugar, vo­

sotros y vuestra familia, pues es vuestra 

remuneración  por  vuestro  oficio  en  la 

Tienda de Reunión.

32

 Y así, cuando hayáis presentado lo me­

jor de ello como ofrenda alzada, no carga­

réis por ello pecado. Así no profanaréis las 

cosas consagradas por los hijos de Israel, 

y no moriréis.

La ternera alazana y la purificación

19

Habló  YHVH  a  Moisés  y  a  Aarón, 

diciendo:

2

 Este es el precepto de la Ley que YHVH 

ha  ordenado,  diciendo:  Di  a  los  hijos  de 

Israel  que  te  traigan  una  ternera  alaza­

na,° perfecta, en la cual no haya defecto, 

sobre la cual no se haya puesto yugo.

3

 Y se la daréis al sacerdote Eleazar, quien 

la  hará  sacar  fuera  del  campamento,  y 

uno la degollará ante su presencia.

4

 Luego el sacerdote Eleazar tomará de su 

sangre con su dedo, y con esa sangre sal­

picará siete veces hacia la parte delantera 

de la Tienda de Reunión.

5

 Después  uno  quemará  la  ternera  ante 

sus ojos. Se quemará la piel, la carne, la 

sangre y el estiércol,

6

 y el sacerdote tomará un palo de cedro, 

un hisopo y escarlata, y los echará en me­

dio de la hoguera de la ternera.

7

 El  sacerdote  lavará  sus  vestiduras  con 

agua, bañará su cuerpo en agua y después 

entrará en el campamento, pero el sacer­

dote será impuro hasta la tarde.

8

 Asimismo  el  que  la  quemó  lavará  sus 

vestiduras  con  agua,  bañará  en  agua  su 

cuerpo, y será impuro hasta la tarde.

9

 Luego, un hombre limpio recogerá las 

cenizas  de  la  ternera  y  las  pondrá  fuera 

del campamento, en un lugar limpio. Y la 

asamblea de los hijos de Israel las guar­

dará  para  el  agua  para  la  impureza.°  Es 

ofrenda por el pecado.°

10

 Y el que haya recogido las cenizas de 

la  ternera  lavará  sus  vestidos  y  quedará 

impuro hasta el atardecer. Esto será por 

estatuto perpetuo a los hijos de Israel y al 

extranjero que peregrina entre ellos.

11

 El que toque el cadáver de una perso­

na, será impuro siete días.

12

 Al tercer día se purificará con esa agua, 

y al séptimo día será limpio, pero si al ter­

cer  día  no  se  purifica,  no  será  limpio  al 

séptimo día.

13

 Cualquiera que toque el cadáver de una 

persona,  y  no  se  purifique,  contamina  el 

Tabernáculo de YHVH. Tal persona será ex­

tirpada de Israel, por cuanto el agua para 

la impureza no fue rociada sobre él. Será 

impuro y su impureza estará sobre él.

14

 Esta es la ley para cuando un hombre 

muera en una tienda: Todo el que entre 

en la tienda y todo lo que esté en ella, será 

impuro siete días.

15

 Y  toda  vasija  abierta  que  no  tenga  la 

tapa bien ajustada, será impura.

16

 Y cualquiera que toque en el campo un 

muerto por espada o cualquier muerto u 

osamenta  o  sepulcro,  será  impuro  siete 

días.

17

 Para  ese  impuro  se  tomará  ceniza  de 

la ternera quemada en la expiación, y se 

echará en ella aguas vivas en una vasija.

18

 Luego, un hombre limpio tomará una 

rama de hisopo y la mojará en el agua, y 

rociará la tienda, todos los utensilios y las 

personas  que  estén  allí  junto  con  aquel 

que haya tocado la osamenta o el cadáver 

o el sepulcro.

19

 Al tercero y al séptimo día, el que está 

limpio  rociará  al  impuro,  y  cuando  lo 

haya purificado al séptimo día, lavará sus 

vestidos y se bañará en agua, y en la tarde 

quedará limpio.

20

 Pero  el  que  esté  impuro  y  no  se  pu­

rifique,  esa  persona  será  extirpada  de 

en medio de la congregación, por cuan­

to  contaminó  el  Santuario  de  YHVH.  El 

agua para la impureza no se roció sobre 

él, por tanto es impuro.

19.2 Simbología: el color rojo representa la sangre como instrumento de purificación.  19.9 Es decir, para purificar la impure-

za

19.9 

→He.9.13. 


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Números 19:21

164

21

 Llegará  a  ser  estatuto  perpetuo  para 

ellos.  El  que  haya  rociado  el  agua  para 

la impureza lavará sus vestidos, y el que 

haya tocado el agua para la impureza será 

impuro hasta la tarde.

22

 Y todo lo que el impuro haya tocado, 

será  impuro,  y  la  persona  que  lo  toque 

será impura hasta el atardecer.

La peña de Meriba – Muerte de Aarón

20

Los  hijos  de  Israel,  toda  la  asam­

blea, llegaron al desierto de Zin en 

el mes primero, y el pueblo permaneció 

en Cades. Allí murió Miriam, y allí fue se­

pultada.

2

 Y  porque  no  había  agua  para  la  con­

gregación,  se  juntaron  contra  Moisés  y 

Aarón.

3

 Y  el  pueblo  contendió  con  Moisés,  y 

hablaron diciendo: ¡Ojalá hubiéramos pe­

recido cuando nuestros hermanos murie­

ron delante de YHVH!

4

 ¿Por  qué,  pues,  trajisteis  la  congrega­

ción  de  YHVH  a  este  desierto,  para  que 

nosotros  y  nuestro  ganado  muramos 

aquí?

5

 ¿Y por qué nos hicisteis subir de Egipto 

para traernos a este lugar miserable? No 

es lugar de sementeras, ni de higueras, ni 

de viñas, ni de granadas, ni siquiera hay 

agua para beber.

6

 Entonces fueron° Moisés y Aarón de de­

lante de la congregación a la entrada de 

la Tienda de Reunión, y cayeron sobre sus 

rostros, y la gloria de YHVH se mostró a 

ellos.

7

 Entonces YHVH habló a Moisés, dicien­

do:

8

 Toma la vara y congrega a la asamblea, 

tú y tu hermano Aarón, y hablaréis a la 

peña ante los ojos de ellos. Y ella dará sus 

aguas, y les sacarás agua de la peña y darás 

de beber a la asamblea y a sus ganados.

9

 Entonces Moisés tomó la vara de delan­

te de YHVH, como le había ordenado.

10

 Y Moisés y Aarón hicieron congregar a 

la asamblea frente a la peña, y él les dijo: 

Oíd ahora, rebeldes: ¿os sacaremos agua 

de esta peña?

11

 Entonces Moisés alzó su mano y golpeó 

la peña con su vara dos veces, y salieron 

muchas aguas, y bebieron, la asamblea y 

su ganado.

12

 Pero  YHVH  dijo  a  Moisés  y  a  Aarón: 

Por  cuanto  no  creísteis  en  mí  para  san­

tificarme a vista de los hijos de Israel, no 

introduciréis  a  esta  congregación  en  la 

tierra que les he dado.

13

 Estas  son  las  aguas  de  Meriba,°  don­

de  los  hijos  de  Israel  contendieron  con 

YHVH, y Él manifestó su santidad entre 

ellos.°

14

 Envió  Moisés  embajadores  al  rey  de 

Edom desde Cades, diciendo: Así dice tu 

hermano Israel: Tú has conocido todo el 

sufrimiento que nos ha sobrevenido,

15

 cómo nuestros padres bajaron a Egip­

to, cómo estuvimos en Egipto largo tiem­

po, y cómo los egipcios nos maltrataron a 

nosotros y a nuestros padres.

16

 Pero  cuando  clamamos  a  YHVH,  oyó 

nuestra voz y envió su ángel y nos sacó de 

Egipto.  Ahora,  mira,  estamos  en  Cades, 

ciudad que se encuentra en el extremo de 

tu territorio.

17

 Te  rogamos  que  nos  dejes  pasar  por 

tu  tierra.  No  pasaremos  por  labrados  ni 

viñedos,  ni  beberemos  agua  de  ningún 

pozo. Iremos por el camino real, sin apar­

tarnos ni a derecha ni a izquierda, hasta 

que hayamos pasado tu territorio.

18

 Pero  Edom  le  respondió:  No  pasarás 

por aquí, de otro modo, saldré contra ti 

armado.

19

 Respondieron  los  hijos  de  Israel:  Tan 

sólo marcharemos por el camino real, y si 

nosotros y nuestros ganados bebemos de 

tus aguas, daremos el precio de ellas. Sólo 

se trata de pasar a pie.

20

 Pero él dijo: No pasarás. Y Edom salió 

a enfrentarlo con mucho pueblo y mano 

fuerte.

21

 Así Edom se negó a dejar pasar a Israel 

por su territorio, e Israel se apartó de él.

22

 Y los hijos de Israel, toda aquella asam­

blea, partieron de Cades, y fueron hacia el 

monte Hor.

23

 Y habló YHVH a Moisés y Aarón en el 

monte Hor, en los confines de la tierra de 

Edom, diciendo:

24

 Aarón será reunido a su pueblo, pues 

no entrará en la tierra que Yo he dado a 

20.6 Lit. fue.  20.13 Esto es: rencilla, altercado.  20.2-13 

→Ex.17.1-7.


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Números 21:22

165

los hijos de Israel, por cuanto fuisteis re­

beldes a mi dicho en las aguas de Meriba.

25

 Toma  a  Aarón  y  a  su  hijo  Eleazar,  y 

haz los subir al monte Hor.

26

 Quítale a Aarón sus vestiduras, y con 

ellas  harás  vestir  a  Eleazar  su  hijo,  y 

Aarón será reunido, y morirá allí.

27

 Y Moisés hizo tal como YHVH le había 

ordenado, y subieron al monte Hor ante 

los ojos de toda la asamblea.

28

 Entonces  Moisés  despojó  a  Aarón  de 

sus  vestiduras  y  con  ellas  hizo  vestir  a 

Eleazar su hijo. Y Aarón murió allí, en la 

cumbre del monte.° Luego Moisés y Elea­

zar descendieron del monte.

29

 Y al ver toda la asamblea que Aarón ha­

bía fallecido, toda la casa de Israel le hizo 

duelo por treinta días.

La Serpiente de Bronce

21

Cuando el cananeo, el rey de Arad, 

que  habitaba  en  el  Neguev,  oyó 

que Israel° iba por el camino de Atarim,° 

combatió  contra  Israel,  y  tomó  cautivos 

de entre ellos.

2

 Entonces  Israel  hizo  voto  a  YHVH,  y 

dijo: Si en verdad entregas a este pueblo 

en  mi  mano,  yo  destruiré  por  completo 

sus ciudades.

3

 Y  YHVH  escuchó  la  voz  de  Israel,  y  le 

entregó al cananeo, destinándolos al ex­

terminio, a ellos y a sus ciudades. Y llamó 

el nombre de aquel lugar Horma.°

4

 Y partieron del monte Hor por el cami­

no del Mar Rojo, para rodear la tierra de 

Edom.°  Pero  en  el  camino  el  ánimo  del 

pueblo se impacientó.

5

 Entonces  el  pueblo  habló  contra 

’Elohim  y  contra  Moisés:  ¿Por  qué  nos 

habéis sacado de Egipto para morir en el 

desierto? Pues no hay alimento ni agua, 

y  nuestra  alma  detesta  este  pan,  bueno 

para nada.°

6

 Entonces  YHVH  envió  entre  el  pueblo 

serpientes ardientes que mordían al pue­

blo, y murió mucha gente de Israel.

7

 Y el pueblo fue a Moisés, y dijeron: He­

mos pecado, por cuanto hablamos contra 

YHVH y contra ti. ¡Ora a YHVH que quite 

de nosotros las serpientes! Y Moisés oró 

por el pueblo.

8

 Y  YHVH  dijo  a  Moisés:  Hazte  una  ser­

piente ardiente y ponla en lo alto de un 

asta,  y  sucederá  que  cualquiera  que  sea 

mordido y mire a ella, vivirá.

9

 Y Moisés hizo una serpiente de bronce y 

la puso sobre el asta,° y sucedía que cuan­

do una serpiente mordía a un hombre, y 

éste dirigía su mirada hacia la serpiente 

de bronce, vivía.

10

 Y partieron los hijos de Israel, y acam­

paron en Obot.

11

 Y marcharon de Obot, y acamparon en 

Ie­Abarim, en el desierto que está frente a 

Moab, hacia el nacimiento del sol.

12

 Y partieron de allí, y acamparon en el 

valle de Zared.

13

 Desde  allí  marcharon,  y  acamparon 

al  otro  lado  del  Arnón,  que  está  en  el 

desierto,  y  que  sale  del  territorio  de  los 

amorreos, porque el Arnón es frontera de 

Moab, entre Moab y el amorreo.

14

 por eso se dice en el rollo° de las Bata­

llas de YHVH:

A Vaheb, en Sufá,

Y a los arroyos de Arnón,

15

    Y a la corriente de los arroyos

Que va a parar en Ar,

Y descansa en la frontera de Moab.

16

 Y desde allí a Beer. Este es el pozo don­

de YHVH dijo a Moisés: Reúne al pueblo, 

y les daré agua.

17

 Entonces cantó Israel este cántico:

¡Brota, oh pozo! ¡A él cantad!

18

    Pozo cavado por jerarcas,

Explorado por los nobles del pueblo,

Con su cetro, con sus cayados.

Y del desierto a Matana.

19

    Y de Matana a Nahaliel, y de Nahaliel 

a Bamot,

20

 Y de Bamot al valle que está en el 

campo de Moab, a la cumbre del 

Pisga, que mira hacia el desierto.

21

 Entonces  Israel  envió  mensajeros  a 

Sehón, rey de los amorreos, diciendo:

22

 Pasaré por tu tierra, no nos desviare­

mos hacia el campo ni hacia las viñas, no 

beberemos las aguas de los pozos. Iremos 

20.28 

→Nm.33.38; Dt.10.6.  21.1 →Nm.33.40.  21.1 Atarim, prob. un topónimo. NExploradores.  21.3 Heb. hrm = dedicación, 

consagración, destino

21.4 

→Dt.2.1.  21.5 Heb. qloquel = bueno para nada. Esta palabra sólo aparece aquí en todo el AP. 

21.9 

→Jn.3.14. 21.14 Lit. libro


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Números 21:23

166

por el camino real hasta que pasemos tu 

territorio.

23

 Pero  Sehón  no  permitió  que  Israel 

pasara por su territorio, sino que Sehón 

juntó a todo su pueblo, y salió a enfren­

tarse a Israel en el desierto, y fue a Jahaza 

y combatió contra Israel.

24

 Pero Israel lo hirió a filo de espada y 

tomó  su  tierra  desde  el  Arnón  hasta  Ja­

boc, hasta los amonitas, pues la frontera 

de los amonitas estaba fortificada.

25

 E  Israel  tomó  todas  estas  ciudades,  y 

habitó Israel en todas las ciudades de los 

amorreos, en Hesbón, y en todas sus al­

deas,

26

 porque  Hesbón  era  la  ciudad  de  Se­

hón,  rey  de  los  amorreos,  el  cual  había 

guerreado contra el rey anterior de Moab, 

y tomado de su mano toda su tierra hasta 

el Arnón.

27

 Por tanto, dicen los proverbistas:

Venid a Hesbón,

Edifíquese y repárese la ciudad de 

Sehón.

28

    Porque salió fuego de Hesbón,

Y una llama de la plaza fuerte de 

Sehón,

Que consumió a Ar de Moab,

A los señores de las alturas del Arnón.

29

    ¡Ay de ti, Moab!

Eres destruido, oh pueblo de 

Quemos.

El cual entregó sus hijos a la fuga

Y sus hijas al cautiverio

A Sehón, rey amorreo.

30

    Pero nosotros los hemos arrojado,

Hesbón está destruido hasta Dibón,

Y también desolamos hasta Nofa,

Que está junto a Medeba.

31

 Así Israel llegó a habitar en la tierra de 

los amorreos.

32

 Después envió Moisés a espiar a Jazer, 

y sitiaron sus aldeas, y desposeyeron a los 

amorreos que estaban allí.

33

 Y volvieron, y subieron por el camino 

de Basán, y salió contra ellos Og, rey de 

Basán, él y todo su pueblo a presentar ba­

talla en Edrei.

34

 Pero YHVH dijo a Moisés: No le tengas 

temor, porque en tu mano lo he entregado, 

a él y a todo su pueblo y su tierra. Harás 

con él como hiciste con Sehón, rey de los 

amorreos, que habitaba en Hesbón.

35

 Y lo hirieron a él, a sus hijos y a todo 

su pueblo, sin que le quedara un sobrevi­

viente, y conquistaron su tierra.

Balac y Balaam

22

Partieron los hijos de Israel y acam­

paron  en  las  llanuras  de  Moab,  a 

este lado del Jordán, frente a Jericó.

2

 Y Balac hijo de Zippor, vio todo lo que 

Israel había hecho a los amorreos.

3

 Y Moab tuvo gran temor delante del pue­

blo, porque era muy numeroso. Y se ate­

rrorizó Moab a causa de los hijos de Israel.

4

 Entonces  dijo  Moab  a  los  ancianos  de 

Madián:  Ahora,  como  el  buey  lame  la 

hierba  del  campo,  esta  multitud  lamerá 

todos nuestros contornos. En aquel tiem­

po Balac hijo de Zippor, era rey de Moab.

5

 Y  envió  mensajeros  a  Balaam  hijo  de 

Beor, en Petor, que está junto al río, en la 

tierra de los hijos de su pueblo° para que 

lo llamaran, diciendo: Un pueblo que ha 

salido de Egipto cubre la superficie de la 

tierra y ya está frente a mí.

6

 Ven  ahora,  te  ruego,  y  maldíceme  a 

este pueblo porque es demasiado podero­

so para mí. Quizá yo pueda herirlo, y lo 

echaremos de la tierra, porque yo sé que 

a quien tú bendigas, será bendito, y al que 

tú maldigas, será maldito.

7

 Fueron,  pues,  los  ancianos  de  Moab  y 

los ancianos de Madián con la paga para 

el adivino en sus manos,° y llegaron a Ba­

laam, y le hablaron las palabras de Balac.

8

 Y  él  les  dijo:  Alojaos  aquí  esta  noche, 

y yo os comunicaré la palabra conforme 

YHVH me hable. Así los jerarcas de Moab 

se quedaron con Balaam.

9

 Y vino ’Elohim a Balaam, y le dijo: ¿Qué 

varones son estos que están contigo?

10

 Y Balaam dijo a ’Elohim: Balac hijo de 

Zippor, rey de Moab, ha enviado por mí, 

diciendo:

11

 He aquí, el pueblo que salió de Egipto 

cubre la faz de la tierra. Ven pues ahora, y 

maldícemelo. Quizá pueda yo luchar con­

tra él y echarlo.

22.5 NLos hijos de Amón.  22.7 Lit. adivinaciones en sus manos


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Números 22:38

167

12

 Entonces  ’Elohim  dijo  a  Balaam:  No 

irás  con  ellos  ni  maldecirás  al  pueblo, 

porque él es bendito.

13

 Balaam se levantó de mañana y dijo a 

los  jerarcas  de  Balac:  Volveos  a  vuestra 

tierra, porque YHVH se niega a dejarme 

ir con vosotros.

14

 Y  los  jerarcas  de  Moab  se  levantaron 

y fueron a Balac y le dijeron: Balaam se 

negó a venir con nosotros.

15

 Pero  Balac  continuó  enviando  emi­

sarios más numerosos y honorables que 

aquellos otros,

16

 los cuales fueron a Balaam, y le dije­

ron: Así dice Balac hijo de Zippor: Te rue­

go que no te niegues a venir a mí,

17

 porque  ciertamente  te  honraré  en 

gran manera y haré todo lo que me di­

gas.  Ven  pues  ahora,  maldíceme  a  este 

pueblo.

18

 Balaam respondió y dijo a los siervos 

de Balac: Aunque Balac me diera su casa 

llena de plata y oro, no puedo traspasar el 

dicho de YHVH mi Dios para hacer cosa 

pequeña ni grande.

19

 Os  ruego  ahora  que  os  quedéis  aquí 

esta  noche,  y  sabré  qué  continuará  ha­

blando conmigo YHVH.

20

 Y vino ’Elohim a Balaam de noche y 

le dijo: Si los hombres han venido para 

llamarte, levántate y ve con ellos, pero 

le dirás solo la palabra que Yo hable con­

tigo.

21

 Así Balaam se levantó por la mañana, 

enalbardó su asna, y fue con los jerarcas 

de Moab.

22

 Pero mientras él iba, la ira de Dios se 

encendió, y el ángel de YHVH se colocó 

en el camino para oponerse a él. Y él iba 

montado en su asna, y sus dos siervos con 

él,

23

 cuando el asna vio al ángel de YHVH 

colocado en el camino con su espada des­

envainada en su mano, el asna se desvió 

del camino y se fue por el campo. Enton­

ces Balaam azotó al asna para hacerla vol­

ver al camino.

24

 Pero el ángel de YHVH estaba en pie en 

un sendero entre las viñas, el cual tenía 

una cerca a un lado y otra cerca al otro 

lado.

25

 Al  ver  al  ángel  de  YHVH,  el  asna  se 

pegó contra la cerca apretando el pie de 

Balaam contra la cerca, y él volvió a azo­

tarla.

26

 Entonces el ángel de YHVH pasó más 

allá,  y  se  puso  en  pie  en  una  angostura 

donde no había camino para desviarse ni 

a derecha ni a izquierda.

27

 Al  ver  al  ángel  de  YHVH,  el  asna  se 

echó debajo de Balaam, y Balaam se enojó 

y azotó al asna con la vara.

28

 Entonces  YHVH  le  abrió  la  boca  al 

asna, la cual dijo a Balaam: ¿Qué te he he­

cho, que me has azotado ya tres veces?

29

 Y Balaam respondió al asna: Porque 

me  has  maltratado:  ¡Si  tuviera  una  es­

pada en mi mano, ahora mismo te ma­

taría!

30

 Y el asna dijo a Balaam: ¿No soy yo tu 

asna, en la que has cabalgado toda tu vida 

hasta hoy? ¿Acostumbro hacerte esto? Y 

él respondió: No.

31

 Entonces  YHVH  abrió  los  ojos  a  Ba­

laam,  y  vio  al  ángel  de  YHVH  de  pie  en 

el camino con su espada desenvainada en 

la mano. Y Balaam hizo reverencia, y se 

postró sobre su rostro.

32

 Y el ángel de YHVH le dijo: ¿Por qué 

has  azotado  a  tu  asna  estas  tres  veces? 

He aquí Yo he salido para oponerme a ti, 

porque tu camino es perverso delante de 

mí.

33

 Y el asna me ha visto y se ha aparta­

do de delante de mí estas tres veces, y si 

no se hubiera apartado de mí, Yo te ha­

bría matado a ti, y a ella la habría dejado 

viva.

34

 Entonces  Balaam  dijo  al  ángel  de 

YHVH:  He  pecado,  porque  no  sabía  que 

Tú te colocabas en el camino para salir a 

mi encuentro. Pero ahora, si es malo de­

lante de tus ojos, me volveré.

35

 El  ángel  de  YHVH  dijo  a  Balaam:  Ve 

con los varones, pero sólo hablarás la pa­

labra que Yo te hable. Y Balaam se fue con 

los jefes de Balac.

36

 Oyendo Balac que Balaam venía, salió 

a su encuentro a la ciudad de Moab que 

está  junto  al  término  del  Arnón,  límite 

del territorio.

37

 Y Balac dijo a Balaam: ¿No envié a lla­

marte? ¿Por qué no venías a mí? ¿Acaso 

no soy capaz de honrarte?

38

 Balaam respondió a Balac: ¡He aquí, ya 

he venido a ti! Pero… ¿podré hablar algo? 


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Números 22:39

168

La palabra que ’Elohim ponga en mi boca, 

esa tendré que hablar.

39

 Y Balaam fue con Balac, y llegaron a 

Queriat­hutsot.°

40

 Y Balac sacrificó bueyes y ovejas que dio 

a Balaam y a los jefes que estaban con él.

41

 Y aconteció que por la mañana Balac 

tomó a Balaam, y lo hizo subir a Bamot­

Baal,° y desde allí contempló el extremo 

del pueblo.

Primeras profecías de Balaam

23

Y Balaam dijo a Balac: Constrúye­

me aquí siete altares, y prepárame 

aquí siete toros y siete carneros.

2

 Y Balac hizo como Balaam le habló. Y 

Balac  y  Balaam  ofrecieron  un  toro  y  un 

carnero en cada altar.

3

 Entonces  Balaam  dijo  a  Balac:  colóca­

te junto a tu holocausto mientras yo voy. 

Quizá YHVH me venga al encuentro. La 

palabra que me muestre, te la declararé. 

Y se fue a un monte descubierto.

4

 Y salió ’Elohim al encuentro de Balaam, 

y éste le dijo: Siete altares he preparado y 

en cada altar he sacrificado un toro y un 

carnero.

5

 Y YHVH puso palabra en la boca de Ba­

laam, y le dijo: Vuelve a Balac, y le habla­

rás así…

6

 Y volvió a él, y he aquí él estaba en pie 

junto a su holocausto, él y todos los jerar­

cas de Moab.

7

 Y profirió su proverbio, y dijo:

De Aram me trajo Balac,

Desde los montes del oriente el rey 

de Moab:

¡Ven, maldíceme a Jacob!

¡Ven, execra a Israel!

8

    ¿Cómo podré maldecir a quien Dios 

no ha maldecido?

¿Cómo podré execrar a quien YHVH 

no ha execrado?

9

    En verdad, desde la cumbre de las 

peñas lo contemplo,

Desde los collados lo diviso:

Ve ahí un pueblo que mora aparte,

Y entre las naciones no será contado.

10

    ¿Quién contará la multitud de Jacob,

Y enumerará la cuarta parte de 

Israel?

¡Muera yo con la muerte de los 

rectos,

Y sea mi futuro como el suyo!

11

 Entonces  Balac  dijo  a  Balaam:  ¿Qué 

me has hecho? ¡Para maldecir a mis ene­

migos te hice venir, y he aquí los bendi­

ces!

12

 Y él respondió, y dijo: ¿Lo que YHVH 

pone en mi boca no lo he de proferir?

13

 Dijo Balac: Te ruego que vengas con­

migo a otro lugar desde donde puedas di­

visar sólo un extremo de él, y no lo verás 

completo. ¡Maldícemelo desde allí!

14

 Lo llevó pues, al puesto de los vigías, 

a la cumbre del Pisga, y construyó° siete 

altares y ofreció un toro y un carnero so­

bre cada altar.

15

 Luego  dijo  a  Balac:  Quédate  en  pie 

aquí junto a tu holocausto mientras salgo 

allí al encuentro.

16

 Entonces YHVH salió al encuentro de 

Balaam, y poniendo palabra en su boca, le 

dijo: Vuelve a Balac y le dirás así y así.

17

 Y fue a él, y he aquí éste se mantenía 

en pie junto a su holocausto, acompaña­

do por los jefes de Moab. Y Balac le pre­

guntó: ¿Qué ha dicho YHVH?

18

 Entonces  él  profirió  su  proverbio,  y 

dijo:

¡Levántate Balac, y oye!

¡Presta oído a mis palabras, hijo de 

Zippor!

19

    Dios no es hombre, para que mienta,

Ni hijo de hombre para que se 

arrepienta.

Él dijo, ¿y no hará?

Habló, ¿y no lo cumplirá?

20

    He aquí, he recibido orden de 

bendecir,

Ha bendecido, y yo no puedo 

revocarlo.

21

    No ha visto iniquidad en Jacob,

Ni ha notado maldad en Israel,

YHVH su Dios está con él,

Resuena aclamación de júbilo como 

por un rey.

22

    Dios lo sacó de Egipto,

Es para él como los cuernos del 

búfalo.

23

    No hay hechizo contra Jacob, 

Ni conjuro contra Israel.

22.39 Esto es, ciudad de calles.  22.41 NLos lugares altos de Baal.  23.14 Esto es, Balaam


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Números 24:16

169

A su tiempo se dirá de Jacob y de 

Israel:

¡Mirad° lo que ha hecho Dios!

24

    He aquí un pueblo que se yergue 

cual leona,

Y se alza como un león:

No se echará hasta que haya 

devorado presa,

Y haya bebido la sangre de sus 

víctimas.

25

 Entonces Balac dijo a Balaam: ¡Ya que 

no puedes maldecirlo, tampoco lo bendi­

gas!

26

 Pero Balaam respondió y dijo a Balac: 

¿No te lo anuncié diciendo: Todo lo que 

YHVH diga, eso debo hacer?

27

 Entonces Balac dijo a Balaam: ¡Ven te 

ruego, te llevaré a otro lugar! ¡Quizá plaz­

ca a los ojos de Dios que me los maldigas 

desde allí!

28

 Y Balac condujo a Balaam a la cumbre 

del Peor, dando cara al desierto.

29

 Y dijo Balaam a Balac: Edifícame aquí 

siete altares, y prepárame aquí siete toros 

y siete carneros.

30

 Y Balac hizo como Balaam dijo, y ofre­

ció un toro y un carnero en cada altar.

Profecías finales de Balaam

24

Viendo  Balaam  que  era  grato  a 

ojos de YHVH el bendecir a Israel, 

no fue, como las otras veces, en busca de 

agüeros, sino que volvió su rostro hacia 

el desierto.

2

 Y alzando sus ojos, Balaam vio a Israel 

acampado por sus tribus, y el Espíritu de 

Dios fue sobre él.

3

 Y profirió su proverbio, y dijo:

Oráculo de Balaam hijo de Beor,

Oráculo del varón con ojos de clara 

visión.

4

    Oráculo del que oye los dichos de 

Dios,

Que contempla la visión de ’El­

Shadday,

Caído, pero con los ojos abiertos:

5

    ¡Cuán hermosas son tus tiendas, oh 

Jacob!

Tus habitaciones, ¡oh Israel!,

6

    Como valles que se extienden,

Como huertos junto al río,

Como áloes plantados por YHVH,

Como cedros junto a las aguas.

7

    De sus cántaros fluyen aguas,

Y su descendencia, en muchas 

aguas,

Más exaltado que Agag será su rey,

Y enaltecido su reino.

8

    Dios lo ha sacado de Egipto,

Es para él como los cuernos del 

búfalo,

Devora a las naciones enemigas 

suyas,

Quebranta sus huesos,

Y con sus flechas los atraviesa.

9

    Se agazapa, se echa cual león,°

Y como leona, ¿quién lo hará 

despertar?

¡Benditos los que te bendigan,

Y malditos los que te maldigan!°

10

 Entonces  la  ira  de  Balac  se  encendió 

contra  Balaam,  y  batiendo  sus  palmas, 

dijo Balac a Balaam: ¡Para maldecir a mis 

enemigos te llamé, y he aquí, los has ben­

decido con ésta tres veces!

11

 ¡Ahora  pues,  vete  a  tu  lugar!  Había 

prometido colmarte de honores, pero he 

aquí YHVH te ha privado de honor.

12

 Y Balaam respondió a Balac: ¿No había 

yo  hablado  a  los  mensajeros  que  tú  me 

enviaste, diciendo:

13

 Aunque  Balac  me  diera  su  casa  llena 

de plata y oro, no podría traspasar el di­

cho de YHVH haciendo de propio impulso 

cosa  buena  ni  mala.  Lo  que  diga  YHVH 

eso diré?

14

 Y ahora, he aquí, ya me voy a mi pue­

blo,  ven  pues,  que  te  informaré  lo  que 

este pueblo ha de hacer a tu pueblo en los 

días venideros.

15

 Y profirió su proverbio, y dijo:

Oráculo de Balaam hijo de Beor,

Oráculo del varón de ojos de clara 

visión.

16

    Oráculo del que oye los dichos de 

Dios,

Que conoce la ciencia de ’Elyón,°

Y contempla las visiones de 

Shadday.°

Caído, pero con ojos abiertos:

23.23 .Mirad.  24.9 

→Gn.49.9.  24.9 →Gn.12.3.  24.16 Esto es, Dios Altísimo → § 5.  24.16 Esto es, Todopoderoso → § 5. 

LXX pantokratos 

→Job 32.8. 


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Números 24:17

170

17

    Lo veré, pero no ahora,

Lo contemplaré, pero no de cerca.

Surgirá una estrella° de Jacob,

Y de Israel se levantará un cetro.

Que aplastará las sienes de Moab,

Y el cráneo° de todos los hijos de 

Set.

18

    Edom será desposeído,

Se empobrecerá Seír, su enemigo,

Mientras Israel hará proezas,

19

    Y uno nacido de Jacob dominará,

Y aniquilará el remanente de la 

ciudad.

20

 Luego vio a Amalec, y profirió su pro­

verbio, y dijo:

Cabeza de naciones es Amalec,

Pero su final, destrucción perpetua.

21

 Y viendo a los ceneos, profirió su pro­

verbio, y dijo:

Fuerte es tu habitación,

Y pones en la peña tu nido.

22

    Pero el ceneo será consumido,

¿Hasta cuándo Assur te mantendrá 

cautivo?

23

 Aún profirió otro proverbio, y dijo:

¡Ay! ¿Quién vivirá cuando Dios haga 

estas cosas?

24

    Vendrán naves de la costa de Quitim,

Someterán a Assur, y someterán a 

Eber,

Pero también él vendrá a destrucción.

25

 Entonces Balaam se levantó y se fue, y 

regresó a su lugar, y también Balac se fue 

por su camino.

Apostasía en Sitim

25

Moraba  entonces  Israel  en  Sitim, 

y el pueblo comenzó a fornicar y a 

apegarse° a las hijas de Moab,

2

 las cuales invitaban al pueblo a los sa­

crificios de sus dioses. Y el pueblo comió, 

y se postró ante los dioses de ellas.

3

 Así Israel se apegó a Baal Peor, y la ira de 

YHVH se encendió contra Israel.

4

 Y dijo YHVH a Moisés: Prende a todos 

los jueces del pueblo, y hazlos ahorcar de­

lante de YHVH a pleno sol, y el ardor de la 

ira de YHVH se apartará de Israel.

5

 Entonces Moisés dijo a los jueces de Is­

rael:  Que  cada  uno  mate  a  los  hombres 

que se han apegado a Baal Peor.

6

 Y mientras ellos lloraban en la entrada 

de la Tienda de Reunión, he aquí un varón 

de los hijos de Israel venía trayendo una 

madianita a vista de Moisés y de toda la 

asamblea de los hijos de Israel.

7

 Viéndolo  Finees  ben  Eleazar,  hijo  del 

sacerdote Aarón, se levantó de en medio 

de la asamblea, y tomando una lanza en 

su mano,

8

 fue tras el israelita a la tienda y los atra­

vesó a ambos por su vientre, al varón de 

Israel y a la mujer. Y en seguida se detuvo 

la plaga sobre los hijos de Israel.

9

 Pero  en  aquella  mortandad  murieron 

veinticuatro mil.

10

 Entonces  YHVH  habló  a  Moisés,  di­

ciendo:

11

 Finees  ben  Eleazar,  hijo  de  Aarón,  el 

sacerdote, ha desviado mi furor de sobre 

los hijos de Israel, al mostrar su celo por 

mí en medio de ellos, por lo cual Yo no 

he  consumido  en  mi  celo  a  los  hijos  de 

Israel.

12

 Por  tanto  anuncia:  He  aquí  Yo  esta­

blezco un pacto de paz con él,

13

 que constituirá para él y su descenden­

cia después de él, el pacto del sacerdocio 

perpetuo. Recompensa por haberse mos­

trado  celoso  por  su  Dios  y  haber  hecho 

expiación por los hijos de Israel.

14

 Y el nombre del israelita muerto, que 

fue  muerto  con  la  madianita,  era  Zimri 

ben Salu, jefe de una familia de la tribu 

de Simeón.

15

 Y  el  nombre  de  la  madianita  muerta 

era Cozbi, hija de Zur, jefe de una tribu, 

padre de una familia en Madián.

16

 Entonces  YHVH  habló  a  Moisés,  di­

ciendo:

17

 Atacad a los madianitas y destruidlos,

18

 pues ellos son vuestros enemigos por 

los  ardides  con  que  os  engañaron  en  el 

asunto de Peor, y en el asunto de Cozbi, 

hija del jefe de Madián, su hermana, que 

fue muerta el día de la plaga por el asunto 

de Peor.

El segundo censo

26

Después de aquella plaga, sucedió 

que YHVH habló a Moisés y a Elea­

zar, hijo del sacerdote Aarón, diciendo:

24.17 

→Ap.22.16.  24.17 Ndestruir.  25.1 .apegarse. La preposición heb. no es im = con, sino ´el = a.


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Números 26:37

171

2

 Haced el censo° de toda la asamblea de 

los hijos de Israel, de veinte años arriba, 

por sus casas paternas. Todos los de Israel 

aptos para el ejército.

3

 Entonces  Moisés  y  el  sacerdote  Eleazar 

hablaron con ellos en los campos de Moab, 

junto al Jordán, frente a Jericó, mandando:

4

 ¡De  veinte  años  arriba,  como  ordenó 

YHVH a Moisés! Y los hijos de Israel que 

habían salido de la tierra de Egipto fueron:

5

 Rubén, primogénito de Israel: Los hijos 

de Rubén fueron: de Enoc, la familia del 

enoquita, y de Falú, la familia del faluita.

6

 De Hezrón, la familia del hezronita, y de 

Carmi, la familia del carmita.

7

 Tales son las familias del rubenita. Los 

empadronados de ellas fueron cuarenta y 

tres mil setecientos treinta.

8

 Hijos de Falú: Eliab.

9

 Los  hijos  de  Eliab:  Nemuel,  Datán  y 

Abiram. Estos Datán y Abiram fueron los 

jefes de la asamblea que se rebelaron con­

tra Moisés y Aarón con el grupo de Coré, 

cuando se rebelaron contra YHVH.

10

 Entonces la tierra abrió su boca y los 

tragó  juntamente  con  Coré,  mientras  el 

grupo  moría  al  devorar  el  fuego  a  dos­

cientos  cincuenta  varones,  para  que  sir­

vieran de escarmiento.

11

 Pero los hijos de Coré no murieron.

12

 Hijos de Simeón, por sus familias: de 

Nemuel, la familia del nemuelita, de Ja­

mín, la familia del jaminita, y de Jaquín, 

la familia del jaquinita.

13

 De  Zera,  la  familia  del  zeraíta,  y  de 

Saúl, la familia del saulita.

14

 Tales  son  las  familias  del  simeonita: 

veintidós mil doscientos.

15

 Hijos de Gad por sus familias: de Ze­

fón,  la  familia  del  zefonita,  de  Hagui,  la 

familia del haguita, y de Suni, la familia 

del sunita.

16

 De Ozni, la familia del oznita, y de Eri, 

la familia del erita.

17

 De  Arod,  la  familia  del  arodita,  y  de 

Areli, la familia del arelita.

18

 Tales  son  las  familias  de  los  hijos  de 

Gad, según sus empadronados: cuarenta 

mil quinientos.

19

 Hijos  de  Judá:  Er  y  Onán.  Pero  Er  y 

Onán murieron en la tierra de Canaán.

20

 Hijos de Judá por sus familias: de Sela, 

la familia del selvita, de Fares, la familia del 

faresita, y de Zera, la familia del zeraíta.

21

 Y los hijos de Fares: de Hesrón, la fa­

milia del hesronita, y de Hamul, la familia 

del hamulita.

22

 Las familias de Judá, según sus empa­

dronados  fueron  setenta  y  seis  mil  qui­

nientos.

23

 Hijos  de  Isacar,  por  sus  familias:  de 

Tola, la familia del tolaíta, y de Fuá, la fa­

milia del fuanita.

24

 De Jasub, la familia del jasubita, y de 

Simrón, la familia del simronita.

25

 Tales son las familias de Isacar, según 

sus empadronados: sesenta y cuatro mil 

trescientos.

26

 Hijos de Zabulón por sus familias: de 

Sered, la familia del seredita, de Elón, la 

familia del elonitas, y de Jalel, la familia 

del jalelita.

27

 Tales  son  las  familias  del  zabulonita, 

según  sus  empadronados:  sesenta  mil 

quinientos.

28

 Hijos de José por sus familias: Manasés 

y Efraín.

29

 Hijos de Manasés: de Maquir, la familia 

del maquirita. Y Maquir engendró a Ga­

laad. De Galaad, la familia del galaadita.

30

 Estos son los hijos de Galaad: de Jezer, 

la familia del jezerita, y de Helec, la fami­

lia del helequita.

31

 De Asriel, la familia del asrielita, y de 

Siquem, la familia del siquemita.

32

 De Semida, la familia del semidaíta, y 

de Hefer, la familia del heferita.

33

 Y Zelofejad ben Hefer, no tuvo hijos sino 

hijas. Los nombres de las hijas de Zelofejad 

fueron Maala, Noa, Hogla, Milca, y Tirsa.

34

 Tales son las familias de Manasés, y su 

número: cincuenta y dos mil setecientos.

35

 Estos son los hijos de Efraín por sus fa­

milias: de Sutela, la familia del sutelaíta, 

de Bequer, la familia del bequerita, y de 

Tahán, la familia del tahanita.

36

 Y estos son los hijos de Sutela: de He­

rán, la familia del heranita.

37

 Estos  son  las  familias  de  los  hijos  de 

Efraín según sus empadronados: treinta y 

dos mil quinientos. Tales son los hijos de 

José por sus familias.

26.2-51 

→Nm.1.1-46. 


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Números 26:38

172

38

 Hijos de Benjamín por sus familias: de 

Bela, la familia del belaíta, de Asbel, la fa­

milia del asbelita, y de Aquiram, la familia 

del aquiramita.

39

 De Sufam, la familia del sufamita y de 

Hufam, la familia del hufamita.

40

 Los hijos de Bela fueron Ard y Naamán. 

De Ard, la familia del ardita, y de Naamán, 

la familia del naamanita.

41

 Tales son los hijos de Benjamín por sus 

familias. Y su número: cuarenta y cinco 

mil seiscientos.

42

 Estos son los hijos de Dan por sus fami­

lias: de Suham, la familia del suhamita. Ta­

les son las familias de Dan por sus familias:

43

 Todas las familias del suhamita, según 

sus empadronados: sesenta y cuatro mil 

cuatrocientos.

44

 Hijos  de  Aser  por  sus  familias:  de 

Imna,  la  familia  del  imnaíta,  de  Isuí,  la 

familia del isuita, y de Beria, la familia del 

beriaíta.

45

 Hijos de Beria: de Heber, la familia del 

heberita, y de Malquiel, la familia del mal­

quielita.

46

 Y el nombre de la hija de Aser era Sera.

47

 Tales  son  las  familias  de  los  hijos  de 

Aser, según sus empadronados: cincuenta 

y tres mil cuatrocientos.

48

 Hijos  de  Neftalí  por  sus  familias:  de 

Jahzeel,  la  familia  del  jahzeelita,  y  de 

Guni, la familia del gunita.

49

 De Jeser, la familia del jeserita, y de Si­

lem, la familia del silemita.

50

 Tales son las familias de Neftalí según 

sus familias. Y su número: cuarenta y cin­

co mil cuatrocientos.

51

 Los empadronados de los hijos de Is­

rael fueron seiscientos un mil setecientos 

treinta.

52

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

53

 A éstos se repartirá la tierra en here­

dad, según el número de nombres.

54

 A los más numerosos les aumentarás 

su heredad, y a los menos numerosos les 

disminuirás su heredad. A cada uno se le 

dará su heredad conforme a los empadro­

nados.

55

 Sólo por sorteo se repartirá el país, y 

adquirirán la heredad por los nombres de 

las tribus paternas.

56

 Por sorteo se repartirá la heredad en­

tre el grande y el pequeño.°

57

 Y  estos  son  los  empadronados  de  los 

levitas según sus familias: de Gersón, la 

familia del gersonita, de Coat, la familia 

del coatita, de Merari, la familia del me­

rarita.

58

 Estas son las familias de Leví: la fami­

lia del libnita, la familia del hebronita, la 

familia del mahalita, la familia del musi­

ta, la familia del coreíta. Y Coat engendró 

a Amram,

59

 y  la  mujer  de  Amram  se  llamaba  Jo­

cabed, hija de Leví, que le había nacido a 

Leví en Egipto. Ésta dio a luz para Amram 

a Aarón, a Moisés y a Miriam su herma­

na.

60

 Y  a  Aarón  le  nacieron  Nadab,  Abiú, 

Eleazar e Itamar.°

61

 Pero  Nadab  y  Abiú  murieron  cuan­

do  ofrecieron  fuego  extraño  delante  de 

YHVH.°

62

 Y  los  levitas  empadronados  fueron 

veintitrés  mil,  todos  varones  de  un  mes 

arriba. Y no fueron contados con los hijos 

de Israel por cuanto no se les dio hereda­

des entre los hijos de Israel.

63

 Estos son los empadronados por Moi­

sés  y  el  sacerdote  Eleazar,  quienes  em­

padronaron  a  los  hijos  de  Israel  en  los 

campos  de  Moab,  junto  al  Jordán  frente 

a Jericó.

64

 Entre  ellos  no  existía  ya  ninguno  de 

los empadronados por Moisés y el sacer­

dote Aarón, quienes hicieron el censo de 

los hijos de Israel en el desierto de Sinay.

65

 Porque  YHVH  había  dicho  de  ellos: 

Morirán  sin  remisión  en  el  desierto.°  Y 

no quedó ningún varón de ellos, excepto 

Caleb ben Jefone, y Josué ben Nun.

Herencia de las hijas 

Josué sucede a Moisés

27

Se acercaron entonces las hijas de 

Zelofejad  ben  Hefer,  hijo  de  Ga­

laad, hijo de Maquir, hijo de Manasés, de 

las  familias  de  Manasés  ben  José,  cuyos 

nombres eran Maala, Noa, Hogla, Milca y 

Tirsa,

2

 y se presentaron ante Moisés, ante el sa­

cerdote Eleazar, ante los jefes y ante toda 

26.52-56 

→Nm.34.13; Jos.14.1-2.  26.60 →Nm.3.2.  26.61 →Lv.10.1-2; Nm.3.4.  26.65 →Nm.14.26-35.


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Números 28:7

173

la asamblea, en la entrada de la Tienda de 

Reunión, diciendo:

3

 Nuestro  padre  murió  en  el  desierto, 

pero él no estuvo entre la comunidad de 

los  que  se  agitaron  contra  YHVH,  en  el 

grupo  de  Coré,  sino  que  murió  por  su 

propio pecado, y no tuvo hijos.

4

 ¿Por qué el nombre de nuestro padre ha 

de  ser  excluido  de  entre  su  familia,  por 

no haber tenido un hijo? Dadnos derecho 

entre los hermanos de nuestro padre.

5

 Y Moisés presentó su causa delante de 

YHVH,

6

 y YHVH respondió a Moisés, diciendo:

7

 Dicen bien las hijas de Zelofejad. Desde 

luego  les  darás  derecho  de  herencia  en­

tre los hermanos de su padre, y harás que 

la  heredad  de  su  padre  sea  traspasada  a 

ellas.°

8

 Y a los hijos de Israel hablarás así: Cuan­

do alguien muera sin hijos, haréis que la 

heredad sea traspasada a su hija.

9

 Si no tiene hija, daréis su herencia a sus 

hermanos,

10

 y si no tiene hermanos, daréis su he­

rencia a los hermanos de su padre.

11

 Y si su padre no tiene hermanos, daréis 

su herencia al pariente más cercano de su 

familia, el cual la poseerá. Esto será para 

los hijos de Israel un estatuto de derecho, 

tal como YHVH ordenó a Moisés.

12

 Y  dijo  YHVH  a  Moisés:  Sube  a  este 

monte de los Abarim, y contempla la tie­

rra que he dado a los hijos de Israel.

13

 Y  cuando  la  hayas  contemplado,  tú 

también serás reunido a tu pueblo, como 

fue reunido Aarón tu hermano,

14

 por  cuanto  fuisteis  rebeldes  a  mis 

órdenes  en  el  desierto  de  Zin,  en  aque­

lla  contienda  de  la  congregación,  y  no 

me  santificasteis  ante  los  ojos  de  ellos,° 

en el asunto de las aguas. (Estas son las 

aguas de Meriba de Cades, en el desierto 

de Zin).

15

 Entonces  habló  Moisés  a  YHVH,  di­

ciendo:

16

 YHVH,  Dios  de  los  espíritus  de  toda 

carne, ponga un varón sobre la asamblea,

17

 que  salga  delante  de  ellos  y  que  en­

tre  delante  de  ellos,  que  los  saque  y  los 

introduzca, para que la congregación de 

YHVH no sea como ovejas sin pastor.

18

 Y  YHVH  respondió  a  Moisés:  Toma  a 

Josué° ben Nun, varón en el cual hay es­

píritu, e impondrás tu mano sobre él,

19

 y harás que se presente ante el sacer­

dote Eleazar y ante toda la comunidad, y 

le impartirás autoridad delante de ellos.

20

 Lo  investirás  con  tu  autoridad,  para 

que toda la asamblea de los hijos de Israel 

le obedezca.

21

 Y  él  se  presentará  ante  el  sacerdote 

Eleazar, y le consultará mediante el juicio 

de los Urim,° en presencia de YHVH. Por 

orden suya saldrán, y por orden suya en­

trarán, él, y todos los hijos de Israel con 

él. Toda la asamblea.

22

 Y  Moisés  hizo  tal  como  YHVH  le  ha­

bía ordenado. Tomó a Josué y lo presentó 

ante  el  sacerdote  Eleazar,  y  ante  toda  la 

asamblea.

23

 Luego impuso sobre él sus manos y le 

impartió autoridad,° tal como YHVH ha­

bía ordenado por medio de Moisés.

Sacrificios de las fiestas solemnes

28

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Manda a los hijos de Israel y diles: 

Cuidaréis de presentar mi ofrenda, mi ali­

mento para mis ofrendas ígneas, de olor 

que me apacigua, para ofrecérmela en su 

tiempo señalado.

3

 Y  les  dirás:  Este  es  el  sacrificio  ígneo 

que  presentaréis  a  YHVH:  cada  día  dos 

corderos añales sin defecto, para el holo­

causto continuo.

4

 El  primer  cordero  lo  prepararás  en  la 

mañana, y el segundo cordero lo prepara­

rás en la tarde.

5

 La  ofrenda  vegetal  será  de  la  décima 

parte de un efa de flor de harina, amasada 

con un cuarto de hin de aceite de olivas 

machacadas.

6

 Es un holocausto perpetuo, un sacrificio 

ígneo a YHVH que fue hecho en el monte 

Sinay como olor que apacigua.

7

 Su libación de vino será la cuarta parte 

de un hin con cada cordero. En el Santua­

rio derramarás la libación de licor fuerte° 

para YHVH.

27.7 

→Nm.36.2.  27.12-14 →Dt.3.23-27; 32.48-52.  27.18 →Ex.24.13.  27.21 →Ex.28.30;1 S.28.6.  27.23 →Dt.31.23. 

28.7 Prob. vino de alto grado alcohólico.


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Números 28:8

174

8

 El  segundo  cordero  lo  prepararás  por 

la  tarde.  Lo  harás  como  la  ofrenda  de 

la  mañana,  y  como  su  libación.  Es  un 

sacrificio ígneo para YHVH de olor que 

apacigua.

9

 Pero el día del shabbat ofrecerás dos cor­

deros añales sin defecto, y dos décimas de 

flor de harina amasada con aceite, como 

ofrenda vegetal, con su libación.

10

 El  holocausto  de  cada  shabbat  será 

además del holocausto continuo y su li­

bación.°

11

 En el principio de vuestros meses pre­

sentaréis en holocausto a YHVH dos be­

cerros  de  la  vacada,  un  carnero,  y  siete 

corderos añales sin defecto.

12

 Tres décimas de flor de harina amasa­

da con aceite, como ofrenda vegetal con 

cada  becerro,  y  dos  décimas  de  flor  de 

harina amasada con aceite, como ofrenda 

vegetal con el carnero,

13

 y una décima de flor de harina amasa­

da con aceite, como ofrenda vegetal con 

cada cordero. Es holocausto de olor que 

apacigua, sacrificio ígneo para YHVH.

14

 Y sus libaciones de vino son: medio hin 

por cada becerro, un tercio de hin por el 

carnero, y un cuarto de hin por cada cor­

dero. Este es el holocausto de cada mes 

para todos los meses del año.

15

 También  se  ofrecerá  a  YHVH  un  ma­

cho  cabrío  como  ofrenda  por  el  pecado, 

además  del  holocausto  continuo  con  su 

libación.

16

 En el mes primero, el día catorce del 

mes, Pascua es de YHVH.°

17

 Y el día quince de ese mes será la fies­

ta solemne. Durante siete días se comerá 

panes sin levadura.°

18

 El primer día habrá una santa convo­

cación. No haréis ningún trabajo servil.

19

 Y ofreceréis un sacrificio ígneo en ho­

locausto a YHVH de dos becerros de la va­

cada, un carnero y siete corderos añales, 

y os serán perfectos.

20

 Su ofrenda vegetal será de harina ama­

sada con aceite, tres décimas por cada be­

cerro, y dos décimas por el carnero.

21

 Prepararás  una  décima  por  cada  uno 

de los siete corderos,

22

 y un macho cabrío como ofrenda por 

el pecado, para hacer expiación a favor de 

vosotros.

23

 Prepararéis  éstos,  además  del  holo­

causto de la mañana, que es el holocausto 

continuo.

24

 Estas cosas haréis cada uno de los siete 

días, es alimento y sacrificio ígneo de olor 

que apacigua a YHVH. Se preparará además 

del holocausto continuo con su libación.

25

 Y el séptimo día tendréis santa convo­

cación. No haréis ningún trabajo servil.

26

 En  el  día  de  las  primicias,  cuando 

ofrezcáis  una  ofrenda  vegetal  nueva  a 

YHVH en vuestra fiesta solemne de las se­

manas,° tendréis una santa convocación, 

y no haréis ningún trabajo servil.

27

 Haréis  acercar  en  holocausto,  en  olor 

que apacigua a YHVH, dos becerros de la 

vacada, un carnero, siete corderos añales,

28

 y la ofrenda vegetal de ellos, flor de ha­

rina amasada con aceite, tres décimas por 

cada becerro, dos décimas por el carnero,

29

 y sendos décimos por los siete corde­

ros,

30

 además de un macho cabrío para hacer 

expiación por vosotros.

31

 Además  ofreceréis  el  holocausto  con­

tinuo  y  su  ofrenda  vegetal,  lo  ofreceréis 

sin defecto, y será para vosotros así como 

la libación.

Sacrificios de las fiestas solemnes 

de otoño

29

En el séptimo mes, el día primero 

del  mes,  tendréis  santa  convoca­

ción y no haréis ningún trabajo servil. Os 

será día de sonido de trompeta.

2

 Prepararéis  un  holocausto  de  olor  que 

apacigua a YHVH: un becerro de la vaca­

da, un carnero, y siete corderos añales sin 

defecto

3

 con su ofrenda vegetal de flor de harina 

amasada con aceite, tres décimas por cada 

becerro, dos décimas por el carnero,

4

 una  décima  por  cada  uno  de  los  siete 

corderos,

5

 y un macho cabrío como ofrenda por el 

pecado,  para  hacer  expiación  a  favor  de 

vosotros,

28.9-10 

→Mt.12.5.  28.16 →Ex.12.1-13; Dt.16.1-2.  28.17-25 →Ex.12.14-20; 23.15; 34.18; Dt.16.3-8.  28.26-31 →Ex.23.16; 

34.22; Dt.16.9-12.


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Números 29:36

175

6

 además del holocausto de la luna nue­

va y su ofrenda vegetal, y del holocausto 

continuo y su ofrenda vegetal, y sus liba­

ciones, según su decreto, como sacrificio 

ígneo a YHVH de olor que apacigua.

7

 El día décimo de este mes séptimo ten­

dréis una santa convocación y humillaréis 

vuestras almas.° Ningún trabajo haréis.

8

 Ofreceréis en holocausto de olor que apa­

cigua a YHVH un becerro de la vacada, un 

carnero y siete corderos añales sin defecto.

9

 Su ofrenda vegetal será de tres décimas 

de flor de harina amasada con aceite por 

cada becerro, dos décimas por el carnero,

10

 y una décima por cada uno de los siete 

corderos.

11

 Asimismo  un  macho  cabrío  como 

ofrenda por el pecado, además de la ofren­

da  del  pecado  para  las  expiaciones  y  del 

holocausto continuo, de su ofrenda vege­

tal y sus libaciones.

La fiesta solemne de los Tabernáculos

12

 El día quince del mes séptimo tendréis 

una santa convocación. No haréis ningún 

trabajo  servil,  y  celebraréis  la  fiesta  so­

lemne a YHVH durante siete días.°

13

 Ofreceréis como holocausto, sacrificio 

ígneo de olor que apacigua a YHVH, trece 

becerros de la vacada, dos carneros y ca­

torce corderos añales. Serán sin defecto.

14

 Su ofrenda vegetal será de flor de ha­

rina amasada con aceite, tres décimas por 

cada uno de los trece becerros, dos déci­

mas por cada uno de los dos carneros,

15

 y una décima por cada uno de los ca­

torce corderos.

16

 Como  ofrenda  por  el  pecado,  además 

del  holocausto  continuo  con  su  ofrenda 

vegetal  y  su  libación,  aproximaréis°  un 

macho cabrío.

17

 El segundo día, doce becerros de la va­

cada, dos carneros, catorce corderos aña­

les sin defecto,

18

 con su ofrenda vegetal y sus libaciones 

para los becerros, los carneros y los cor­

deros, según el número de ellos, confor­

me al decreto,

19

 y un macho cabrío como ofrenda por 

el  pecado,  además  del  holocausto  conti­

nuo, su ofrenda vegetal y su libación.

20

 El tercer día, once becerros, dos carne­

ros, catorce corderos añales sin defecto,

21

 con su ofrenda vegetal y sus libaciones 

para los becerros, los carneros y los cor­

deros, según el número de ellos, confor­

me al decreto,

22

 y un macho cabrío como ofrenda por el 

pecado, además del holocausto continuo, 

con su ofrenda vegetal y su libación.

23

 El cuarto día, diez becerros, dos carne­

ros, catorce corderos añales, sin defecto,

24

 con su ofrenda vegetal y sus libaciones 

para los becerros, los carneros y los cor­

deros, según el número de ellos, confor­

me al decreto,

25

 y un macho cabrío como ofrenda por 

el  pecado,  además  del  holocausto  conti­

nuo, su ofrenda vegetal y su libación.

26

 El quinto día, nueve becerros, dos car­

neros, catorce corderos añales sin defecto,

27

 con su ofrenda vegetal y sus libaciones 

para los becerros, los carneros y los cor­

deros, según el número de ellos, confor­

me al decreto,

28

 y un macho cabrío como ofrenda por 

el  pecado,  además  del  holocausto  conti­

nuo, su ofrenda vegetal y su libación.

29

 El sexto día, ocho becerros, dos carne­

ros, catorce corderos añales sin defecto,

30

 con su ofrenda vegetal y sus libaciones 

para los becerros, los carneros y los cor­

deros, según el número de ellos, confor­

me al decreto,

31

 y un macho cabrío como ofrenda por 

el  pecado,  además  del  holocausto  conti­

nuo, su ofrenda vegetal y sus libaciones.

32

 El séptimo día, siete becerros, dos car­

neros, catorce corderos añales sin defec­

to,

33

 con su ofrenda vegetal y sus libaciones 

para los becerros, los carneros y los cor­

deros, según el número de ellos, confor­

me al decreto,

34

 y un macho cabrío como ofrenda por el 

pecado, además del holocausto continuo, 

con su ofrenda vegetal y su libación.

35

 El  octavo  día  tendréis  una  asamblea 

solemne.  No  haréis  ningún  trabajo  ser­

vil,

36

 y ofreceréis en holocausto, en sacrifi­

cio ígneo de olor que apacigua a YHVH, 

29.7-11 

→Lv.16.29-34.  29.12-38 →Ex.23.16; 34.22; Dt.16.13-15.  29.16 .aproximaréis.


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Números 29:37

176

un  novillo,  un  carnero,  siete  corderos 

añales sin defecto,

37

 y  su  ofrenda  vegetal  y  sus  libaciones 

con  el  novillo,  con  el  carnero  y  con  los 

corderos, según el número de ellos, con­

forme al decreto,

38

 y un macho cabrío como ofrenda por el 

pecado, además del holocausto continuo, 

con su ofrenda vegetal y su libación.

39

 Estas cosas ofreceréis a YHVH en vues­

tras fiestas solemnes, aparte de vuestros 

votos y de vuestras ofrendas voluntarias, 

con vuestros holocaustos, vuestras ofren­

das vegetales, vuestras libaciones y vues­

tras ofrendas de paz.

40

 Y  Moisés  habló  a  los  hijos  de  Israel 

conforme a todo lo que YHVH había or­

denado a Moisés.°

Ley sobre los votos

30

Habló Moisés a los jefes de las tri­

bus de los hijos de Israel, diciendo: 

Esta es la palabra que YHVH ha ordena­

do:

2

 Cuando un hombre haga voto a YHVH, 

o  jure  imponiéndose  una  promesa,  no 

quebrantará su palabra. Todo lo que salga 

de su boca lo cumplirá.°

3

 Asimismo, si una mujer hace un voto a 

YHVH, y se impone una obligación en su 

juventud estando en casa de su padre,

4

 y su padre escucha su voto y la obliga­

ción que se ha impuesto, y su padre no le 

dice nada, entonces todos los votos de ella 

serán  firmes,  y  toda  promesa  que  se  ha 

impuesto, será firme.

5

 Pero si su padre se lo prohíbe el día en 

que  se  entera,  ninguno  de  sus  votos  o 

promesas  que  se  ha  impuesto  serán  fir­

mes.  YHVH  la  perdonará  por  cuanto  su 

padre se opuso.

6

 Pero  si  es  casada  y  hace  votos,  o  pro­

nuncia con sus labios cosa con que obli­

gue su alma,

7

 y su marido oye, y cuando oye se calla, 

los votos de ella serán firmes, y la obliga­

ción que se impuso será firme.

8

 Pero si el día en que su marido la oye, 

se  lo  prohíbe,  entonces  anulará  el  voto 

bajo  el  cual  ella  está  y  la  declaración 

imprudente  de  sus  labios  con  que  se  ha 

comprometido, y YHVH la perdonará.

9

 Pero el voto de una viuda o una repu­

diada, todo aquello con lo cual se ha com­

prometido, será firme hacia ella.

10

 Sin embargo, si hizo voto cuando es­

taba en casa de su marido, y ha ligado su 

alma con obligación de juramento,

11

 y su marido oyó, y calló ante ello, y no 

se lo prohibió, entonces todos sus votos 

serán  firmes,  y  toda  obligación  con  que 

ligó su alma será firme.

12

 Pero si su marido en verdad los anula el 

día en que los oye, todo lo que salió de sus 

labios en cuanto a sus votos, o en cuanto a 

obligarse a sí misma, será nulo. Su marido 

los ha anulado, y YHVH la perdonará.

13

 Todo voto y todo juramento que obli­

gue a humillarse a sí misma, su marido lo 

confirmará o anulará.

14

 Pero  si  su  marido  de  día  en  día  calla 

ante ello, entonces ha confirmado todos 

sus votos y todas las obligaciones que es­

tán  sobre  ella.  Las  confirma  por  cuanto 

calló ante ello el día que lo oyó.

15

 Y  si  los  anula  después  de  haberlos 

oído, entonces él cargará con la iniquidad 

de ella.

16

 Estos son los estatutos que YHVH or­

denó a Moisés sobre las relaciones entre 

el varón y su mujer, y entre el padre y su 

hija durante la juventud de ésta en casa 

de su padre.

Derrota de los madianitas 

Ley sobre el botín

31

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Toma  venganza  completa  de  los 

hijos de Israel contra los madianitas. Des­

pués serás reunido a tu pueblo.

3

 Entonces  Moisés  habló  al  pueblo,  di­

ciendo:  Armad  a  algunos  hombres  de 

entre  vosotros  para  la  guerra,  y  vayan 

contra Madián para ejecutar la venganza 

de YHVH sobre Madián.

4

 Enviaréis a la guerra mil de cada tribu, 

de todas las tribus de los hijos de Israel.

5

 Así fueron dados de los millares de Is­

rael: mil por cada tribu, doce mil en pie 

de guerra.

29.40 En todas las ediciones hebreas este v. aparece como v. 1 del c. 30.  30.2 

→Dt.23.21-23; Mt.5.33.


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Números 31:34

177

6

 Y Moisés los envió a la guerra: mil por 

cada tribu, y a Finees, hijo del sacerdote 

Eleazar, a la guerra con ellos, con los ob­

jetos sagrados y con las trompetas en su 

mano para la alarma.

7

 Y tal como YHVH había ordenado a Moi­

sés, hicieron guerra contra Madián, y ma­

taron a todos los varones.

8

 Entre  las  víctimas,  mataron  también 

a los reyes de Madián: Evi, y Requem, y 

Zur, y Hur y Reba, cinco reyes de Madián. 

También mataron a espada a Balaam hijo 

de Beor.

9

 Y los hijos de Israel tomaron cautivas a 

las mujeres de los madianitas, a sus pe­

queños, todo su ganado y todos sus reba­

ños, y arrebataron toda su riqueza.

10

 Incendiaron también todas sus ciuda­

des, aldeas y campamentos,

11

 y tomaron todo el despojo, y todo el bo­

tín, tanto de hombres como de animales.

12

 Y llevaron a los cautivos, el botín y el 

despojo a Moisés, al sacerdote Eleazar y a 

la asamblea de los hijos de Israel, al cam­

pamento en las llanuras de Moab que es­

tán junto al Jordán, frente a Jericó.

13

 Entonces Moisés, el sacerdote Eleazar 

y todos los jerarcas de la asamblea, salie­

ron a recibirlos en las afueras del campa­

mento.

14

 Y Moisés estalló en indignación contra 

los oficiales del ejército, los jefes de miles y 

jefes de cientos que volvían de la guerra.

15

 Y les dijo Moisés: ¿Pero habéis dejado 

con vida a todas las hembras?°

16

 ¡Mirad! Ellas son quienes, por consejo 

de Balaam, indujeron a los hijos de Israel 

a apostatar de YHVH en lo tocante a Peor,° 

por lo que hubo plaga en la congregación 

de YHVH.

17

 Ahora, pues, matad a todo varón entre 

los  párvulos,  y  matad  a  toda  mujer  que 

haya conocido varón acostándose con él.

18

 Pero dejad con vida entre las mujeres a 

todas las jóvenes que no hayan conocido 

lecho de varón.

19

 En  cuanto  a  vosotros,  acampad  fuera 

del  campamento  durante  siete  días.  To­

dos los que habéis matado a una persona, 

y  cuantos  habéis  tocado  un  cadáver,  os 

purificaréis en el tercero y el séptimo día, 

así vosotros como vuestros prisioneros.

20

 Purificad  también  todo  vestido,  todo 

objeto de piel, toda obra de pelo de cabra 

y todo utensilio de madera.

21

 Y el sacerdote Eleazar dijo a los hom­

bres del ejército que venían de la guerra: 

Este es el estatuto de la Ley que YHVH ha 

ordenado a Moisés:

22

 Sólo el oro y la plata, el bronce, el hie­

rro, el estaño y el plomo,

23

 todo lo que resiste al fuego, lo haréis 

pasar por fuego, y será puro. Sin embargo 

habrá de ser purificado con las aguas para 

la impureza. Y todo lo que no resista al 

fuego, lo haréis pasar por el agua.

24

 El  día  séptimo  lavaréis  vuestros  ves­

tidos  y  seréis  puros.  Ya  después  podréis 

entrar en el campamento.

25

 También habló YHVH a Moisés, dicien­

do:

26

 Tú, el sacerdote Eleazar, y los jerarcas 

de las casas paternas de la asamblea, haced 

el recuento del botín que se ha capturado, 

tanto de personas como de animales.

27

 Dividirás por mitad el botín entre los 

combatientes  que  han  ido  a  la  guerra  y 

entre toda la asamblea.

28

 Y como tributo de los guerreros sali­

dos a la batalla, apartarás para YHVH un 

alma de cada quinientas, así de hombres 

como del ganado vacuno, de asnos, y de 

ganado menor.

29

 De la mitad de ellos tomarás y lo darás 

al sacerdote Eleazar como ofrenda alzada 

para YHVH.

30

 Y  de  la  mitad  correspondiente  a  los 

hijos de Israel tomarás uno de cada cin­

cuenta, así de hombres como del ganado 

mayor, de los asnos, y del ganado menor, 

de todo animal, y los entregarás a los le­

vitas  encargados  del  servicio  del  Taber­

náculo de YHVH.

31

 Y Moisés y el sacerdote Eleazar hicieron 

tal como YHVH había ordenado a Moisés.

32

 Y fue el botín, el remanente de la presa 

capturada  por  la  gente  de  guerra:  seis­

cientas setenta y cinco mil ovejas,

33

 setenta y dos mil reses vacunas,

34

 y setenta y un mil asnos.

31.15 Heb. nequebáh. El sentido es en extremo despectivo; algo así como: ¿Por qué dejasteis con vida a las que tienen hoyo? 

31.16 

→Nm.25.1-9.


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Números 31:35

178

35

 En cuanto a personas, de mujeres que 

no habían conocido ayuntamiento de va­

rón, el total de almas fue de treinta y dos 

mil.

36

 La mitad o porción de los que habían 

salido a la guerra, fue: trescientas treinta 

y siete mil quinientas ovejas,

37

 y el tributo de ovejas para YHVH fue de 

seiscientas setenta y cinco.

38

 Ganado vacuno: treinta y seis mil, y su 

tributo para YHVH, setenta y dos.

39

 Asnos: treinta mil quinientos, y su tri­

buto para YHVH, sesenta y uno.

40

 Personas:  dieciséis  mil,  y  su  tributo 

para YHVH, treinta y dos almas.

41

 Entonces Moisés entregó el tributo al 

sacerdote Eleazar como ofrenda alzada a 

YHVH, tal como YHVH había ordenado a 

Moisés.

42

 En cuanto a la mitad correspondiente 

a los hijos de Israel, que Moisés había se­

parado de la de los guerreros,

43

 esa mitad de la asamblea fue: trescien­

tas treinta y siete mil quinientas ovejas,

44

 ganado vacuno: treinta y seis mil,

45

 asnos: treinta mil quinientos,

46

 y personas: dieciséis mil.

47

 De  la  mitad  que  correspondía  a  los 

hijos de Israel, Moisés tomó uno de cada 

cincuenta,  así  de  las  personas  como  de 

los  animales,  y  los  entregó  a  los  levitas 

que tenían la custodia del Tabernáculo de 

YHVH, tal como YHVH había ordenado a 

Moisés.

48

 Entonces se acercaron a Moisés los jefes 

de las unidades del ejército, comandantes 

de miles y comandantes de cientos,

49

 y  dijeron  a  Moisés:  Tus  siervos  han 

contado  los  hombres  de  combate  que 

están bajo nuestro mando, y ninguno ha 

faltado de nosotros.

50

 Así,  pues,  presentamos  una  ofrenda 

ante  YHVH,  cada  uno  lo  que  ha  ganado 

en  objetos  de  oro:  brazaletes,  pulseras, 

anillos, pendientes y collares, para hacer 

expiación por nosotros delante de YHVH.

51

 Y  Moisés  y  el  sacerdote  Eleazar  reci­

bieron de ellos el oro, y toda clase de ob­

jetos labrados.

52

 Y el total de oro de la ofrenda alzada 

que los jefes de miles y los jefes de cientos 

hicieron elevar ante YHVH, fue de dieci­

séis mil setecientos cincuenta siclos,

53

 que  los  hombres  del  ejército  habían 

saqueado, cada uno para sí.

54

 Y Moisés y el sacerdote Eleazar toma­

ron  el  oro  de  los  jefes  de  miles  y  de  los 

jefes de cientos, y lo llevaron a la Tienda 

de Reunión como memorial de los hijos 

de Israel delante de YHVH.

Concesión de la Transjordania

32

Los  hijos  de  Rubén  y  los  hijos  de 

Gad poseían numerosos y muy im­

portantes rebaños, y vieron que la tierra 

de Jazer y la tierra de Galaad era un lugar 

apropiado para el ganado.

2

 Y los hijos de Gad y los de Rubén fueron 

y hablaron a Moisés, al sacerdote Eleazar 

y a los jefes de la asamblea, diciendo:

3

 Atarot,  Dibón,  Jazer,  Nimra,  Hesbón, 

Eleale, Sebam, Nebo y Beón,

4

 la tierra que YHVH azotó en presencia 

de la asamblea de Israel, es tierra de gana­

do, y tus siervos tienen ganado.

5

 Por  tanto,  dijeron,  si  hemos  hallado 

gracia ante tus ojos, que se dé esta tierra 

a tus siervos en propiedad. No nos hagas 

pasar el Jordán.

6

 Entonces  Moisés  respondió  a  los  hijos 

de Gad y a los hijos de Rubén: ¿Irán vues­

tros hermanos a la batalla, y vosotros os 

quedaréis aquí?

7

 ¿Por  qué  desanimáis  el  corazón  de  los 

hijos de Israel, para que no pasen a la tie­

rra que YHVH les ha dado?

8

 Así  hicieron  vuestros  padres,  cuando 

los envié desde Cades Barnea a explorar 

el país.

9

 Subieron hasta el valle de Escol, y al ver 

la  tierra,  desanimaron  el  corazón  de  los 

hijos de Israel para que no entraran a la 

tierra que YHVH les había dado.°

10

 Aquel día se encendió la ira de YHVH, 

y juró diciendo:

11

 Los  varones  de  veinte  años  arriba  que 

subieron de Egipto, no verán la tierra por la 

cual he jurado a Abraham, Isaac y Jacob, por 

cuanto no fueron íntegros en pos de mí,

12

 excepto  Caleb  ben  Jefone,  cenezeo,  y 

Josué  ben  Nun,  que  fueron  íntegros  en 

pos de YHVH.

32.8-9 

→Nm.13.17-33. 


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Números 32:40

179

13

 Se encendió entonces la ira de YHVH 

contra  Israel,  y  los  hizo  andar  errantes 

cuarenta años por el desierto, hasta que 

toda aquella generación que había obra­

do mal ante los ojos de YHVH se extin­

guió.°

14

 Y he aquí, vosotros surgís en lugar de 

vuestros padres, ralea de hombres peca­

dores, para aumentar aún más el ardor de 

la ira de YHVH contra Israel.

15

 Si os volvéis de en pos de Él, otra vez 

os volverá a dejar en el desierto, y destrui­

réis a todo este pueblo.

16

 Entonces ellos se le acercaron y dije­

ron:  Construiremos  aquí  corrales  para 

nuestro ganado y ciudades para nuestros 

pequeños.

17

 Pero nosotros nos armaremos e iremos 

con diligencia al frente de los hijos de Is­

rael, hasta que los hayamos introducido 

a  su  lugar.  En  tanto  nuestros  pequeños 

vivirán en ciudades fortificados por causa 

de los habitantes del país.

18

 No volveremos a nuestras casas hasta 

que  los  hijos  de  Israel  posean  cada  uno 

su heredad,

19

 y no tomaremos heredad con ellos al 

otro lado del Jordán ni más allá, porque 

tendremos  ya  nuestra  heredad  en  esta 

parte del Jordán, al oriente.

20

 Moisés les respondió: Si hacéis tal cosa, 

si os preparáis para ir delante de YHVH a 

la batalla,

21

 y  todo  hombre  armado  de  entre  vo­

sotros cruza el Jordán delante de YHVH, 

hasta que haya expulsado a sus enemigos 

de su presencia,

22

 y  la  tierra  haya  quedado  subyugada 

ante YHVH, y os volvéis, entonces queda­

réis absueltos para con YHVH y para con 

Israel, y esta tierra será vuestra propiedad 

delante de YHVH.

23

 Pero si no lo hacéis así, he aquí habréis 

pecado contra YHVH, y sabed que vuestro 

pecado os alcanzará.

24

 Construíos  pues  ciudades  para  vues­

tros  pequeños,  y  rediles  para  vuestros 

rebaños,  y  haced  lo  que  ha  proferido 

vuestra boca.

25

 Entonces los hijos de Gad y los hijos 

de  Rubén  hablaron  a  Moisés,  diciendo: 

Tus siervos harán tal como mi señor ha 

ordenado.

26

 Nuestros pequeños, nuestras mujeres, 

nuestro ganado y todos nuestros animales 

quedarán allí en las ciudades de Galaad.

27

 Pero tus siervos, todos los hombres ar­

mados del ejército, desfilarán ante YHVH 

para la batalla, tal como mi señor está ha­

blando.

28

 Entonces  Moisés  los  encomendó  a 

Eleazar el sacerdote, a Josué ben Nun y 

a los jefes de familia de las tribus de los 

hijos de Israel.

29

 Y Moisés les dijo: Si los hijos de Gad y 

los hijos de Rubén cruzan con vosotros el 

Jordán, armados todos para la guerra, de­

lante de YHVH, y el país es sometido ante 

vosotros, les daréis la tierra de Galaad en 

propiedad,

30

 pero si no pasan armados con vosotros, 

entonces tendrán propiedad en medio de 

vosotros en la tierra de Canaán.

31

 Y los hijos de Gad y los hijos de Rubén 

respondieron,  diciendo:  Haremos  lo  que 

YHVH ha hablado a tus siervos.

32

 Nosotros  pasaremos  armados  delan­

te  de  YHVH  a  la  tierra  de  Canaán,  pero 

la propiedad de nuestra heredad estará a 

este lado del Jordán.°

33

 Y  Moisés  dio  a  los  hijos  de  Gad  y  a 

los hijos de Rubén y a la media tribu de 

Manasés ben José, el reino de Sehón, rey 

amorreo, y el reino de Og, rey de Basán: 

la tierra con sus ciudades, con sus territo­

rios, y las ciudades del país circundante.

34

 Y los hijos de Gad construyeron Dibón, 

Atarot, Aroer,

35

 Atarot­Sofán, Jazer y Jogbeha,

36

 y Bet­Nimra y Bet­Arán, ciudades forti­

ficadas, y también rediles para el rebaño.

37

 Y  los  hijos  de  Rubén  construyeron 

Hesbón, Eleale, Quiriataim,

38

 Nebo y Baal­Meón (cambiadas de nom­

bre), y Sibma. Y llamaron por sus nom­

bres las ciudades que reedificaron.

39

 Fueron  también  los  hijos  de  Maquir 

ben Manasés a Galaad y la capturaron, y 

desposeyeron a los amorreos que estaban 

en ella.

40

 Y Moisés dio Galaad a Maquir ben Ma­

nasés, y habitó en ella.

32.10-13 

→Nm.14.26-35.  32.28-32 →Jos.1.12-15. 


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Números 32:41

180

41

 También  Fair  ben  Manasés  fue  y  se 

apoderó de sus aldeas, y les puso el nom­

bre de Javot­Jair.

42

 Asimismo Noba fue y capturó Quenat 

y sus aldeas, y conforme a su nombre la 

llamó Noba.

Desde Egipto al Jordán

33

Estas  son  las  jornadas  de  los  hi­

jos de Israel cuando salieron de la 

tierra de Egipto por escuadrones, bajo el 

mando° de Moisés y Aarón.

2

 Por mandato de YHVH Moisés escribió 

los puntos de salida según sus jornadas. 

Y estas son sus jornadas conforme a sus 

puntos de partida:

3

 Partieron de Rameses en el mes prime­

ro, el día quince del mes primero, a la ma­

ñana siguiente de la Pascua, salieron los 

hijos  de  Israel  con  mano  poderosa,  a  la 

vista de todos los egipcios,

4

 mientras  los  egipcios  enterraban  a  to­

dos  sus  primogénitos,  a  los  que  YHVH 

había herido de muerte. También YHVH 

había  ejecutado  actos  justicieros  contra 

sus dioses.

5

 Partieron,  pues,  los  hijos  de  Israel  de 

Rameses y acamparon en Sucot.

6

 Partieron  de  Sucot  y  acamparon  en 

Etam, que está al borde del desierto.

7

 Partieron  de  Etam  y  se  volvieron  ha­

cia Pi­hahirot, que está delante de Baal­ 

zefón, y acamparon frente a Migdol.

8

 Partieron  de  Pi­hahirot  y  pasaron  por 

medio del mar hacia el desierto, y andu­

vieron  tres  jornadas  por  el  desierto  de 

Etam, y acamparon en Mara.

9

 Partieron  de  Mara,  y  llegaron  a  Elim, 

donde  había  doce  fuentes  de  agua  y  se­

tenta palmeras, y allí acamparon.

10

 Partieron de Elim y acamparon junto 

al Mar Rojo.

11

 Partieron  del  Mar  Rojo  y  acamparon 

en el desierto de Sin.

12

 Partieron del desierto de Sin y acam­

paron en Dofca.

13

 Partieron  de  Dofca  y  acamparon  en 

Alús.

14

 Partieron de Alús y acamparon en Re­

fidim,  donde  no  había  agua  que  beber 

para el pueblo.

15

 Partieron de Refidim y acamparon en 

el desierto de Sinay.

16

 Luego partieron del desierto de Sinay 

y acamparon en Kibrot­hatava.

17

 Partieron de Kibrot­hatava y acampa­

ron en Haserot.

18

 Partieron de Haserot y acamparon en 

Ritma.

19

 Partieron  de  Ritma  y  acamparon  en 

Rimón­peres.

20

 Partieron  de  Rimón­peres  y  acampa­

ron en Libna.

21

 Partieron  de  Libna  y  acamparon  en 

Rissa.

22

 Partieron  de  Rissa  y  acamparon  en 

Cee lata.

23

 Partieron  de  Ceelata  y  acamparon  en 

el monte Sefer.

24

 Partieron  del  monte  Sefer  y  acampa­

ron en Harada.

25

 Partieron  de  Harada  y  acamparon  en 

Macelot.

26

 Partieron de Macelot y acamparon en 

Tahat.

27

 Partieron  de  Tahat  y  acamparon  en 

Tara.

28

 Partieron de Tara y acamparon en Mitca.

29

 Partieron  de  Mitca  y  acamparon  en 

Hasmona.

30

 Partieron  de  Hasmona  y  acamparon 

en Moserot.

31

 Partieron de Moserot y acamparon en 

Beney­Jaacán.

32

 Partieron de Beney­Jaacán y acampa­

ron en el monte Gidgad.

33

 Partieron del monte Gidgad y acampa­

ron en Jotbata.

34

 Partieron  de  Jotbata  y  acamparon  en 

Abrona.

35

 Partieron  de  Abrona  y  acamparon  en 

Ezión­geber.

36

 Partieron de Ezión­geber y acamparon 

en el desierto de Sin, que es Cades.

37

 Partieron de Cades y acamparon en el 

monte Hor, en la frontera de la tierra de 

Edom.

38

 Y por el dicho de YHVH, el sacerdote 

Aarón subió al monte Hor, y allí murió,° a 

los cuarenta años de la salida de los hijos 

de Israel de la tierra de Egipto, en el mes 

quinto, el día primero del mes.

33.1 Lit. por mano de.  33.38 

→Nm.20.22-28; Dt.10.6. 


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Números 34:13

181

39

 Y  Aarón  tenía  ciento  veintitrés  años 

cuando murió en el monte Hor.

40

 Entonces,  el  rey  de  Arad,  cananeo, 

que habitaba en el Neguev, en la tierra de 

Canaán, oyó de la llegada de los hijos de 

Israel.°

41

 Entonces  partieron  del  monte  Hor  y 

acamparon en Zalmona.

42

 Partieron de Zalmona y acamparon en 

Funón.

43

 Partieron  de  Funón  y  acamparon  en 

Obot.

44

 Partieron de Obot y acamparon en Ije-

abarim, frontera de Moab.

45

 Partieron  de  Ije-abarim  y  acamparon 

en Dibón-Gad.

46

 Partieron de Dibón-Gad y acamparon 

en Almón-diblataim.

47

 Partieron de Almón-diblataim y acam-

paron en los montes del Abarim, delante 

del Nebo.

48

 Partieron  de  los  montes  de  Abarim  y 

acamparon en las llanuras de Moab, junto 

al Jordán, en Jericó.

49

 Finalmente,  acamparon  junto  al  Jor-

dán, desde Bet-jesimot hasta Abel Sitim, 

en las llanuras de Moab.

50

 Habló YHVH a Moisés en las llanuras 

de Moab, junto al Jordán, frente a Jericó, 

diciendo:

51

 Habla  a  los  hijos  de  Israel  y  diles: 

Cuando crucéis el Jordán hacia la tierra 

de Canaán,

52

 expulsaréis de delante de vosotros a to-

dos los moradores del país, y destruiréis 

todas sus esculturas y todas sus imágenes 

de  fundición,  y  destruiréis  todos  sus  lu-

gares altos.

53

 Tomaréis posesión de la tierra, y habi-

taréis en ella, porque Yo os he dado esa 

tierra para que la poseáis.

54

 Y  os  apropiaréis  de  la  tierra  echando 

suertes  entre  vuestras  familias.  Al  gran-

de aumentaréis su posesión, y al pequeño 

disminuiréis su posesión. Aquello que le 

toque en suerte a cada uno, suyo será. To-

maréis posesión según las tribus de vues-

tros padres.

55

 Pero si no expulsáis de delante de vo-

sotros a los habitantes del país, sucederá 

que los que de ellos hayáis dejado vendrán 

a ser como aguijones en vuestros ojos y 

como espinas en vuestros costados, y os 

acosarán en la tierra donde habitéis,

56

 y  resultará  que  os  trataré  a  vosotros 

como había decidido tratarlos a ellos.

Fronteras de la Tierra Prometida

34

Habló YHVH a Moisés, diciendo:

2

 Manda a los hijos de Israel y di-

les:  Cuando  entréis  en  la  tierra  de  Ca-

naán, ésta es la tierra que os ha de caer en 

herencia:  la  tierra  de  Canaán  según  sus 

límites.

3

 El lado sur os será desde el desierto de 

Sin a lo largo de Edom, y tendréis como 

frontera meridional desde el extremo del 

Mar de la Sal,° hacia el oriente.

4

 Este límite os irá rodeando desde el sur 

hasta el collado de Acrabim, y pasará has-

ta Sin, y sus extremos serán desde el sur 

a Cades Barnea, y saldrá a Hasar-adar, y 

cruzará hasta Asmón.

5

 Rodeará la frontera desde Asmón hasta 

el torrente de Egipto, y sus límites serán 

hasta el mar.

6

 El Mar Grande° os será la frontera oc-

cidental, y su costa os será el límite oc-

cidental.

7

 Y esta os será la frontera norte: desde el 

Mar Grande os trazaréis una línea hasta 

el monte Hor.

8

 Trazaréis  una  frontera  desde  el  monte 

Hor hasta la entrada de Hamat, y los ex-

tremos de la frontera estarán en Sedad.

9

 La frontera llegará a Zifón y terminará 

en  Hasar-enán.  Esta  os  será  la  frontera 

norte.

10

 Para  el  límite  al  oriente  os  trazaréis 

una línea desde Hasar-enán hasta Sefam.

11

 El límite bajará desde Sefam hasta Ri-

bla,  al  oriente  de  Ain,  y  el  término  des-

cenderá  y  llegará  a  la  costa  oriental  del 

Mar de Kineret.°

12

 Este límite descenderá por el Jordán y 

terminará en el Mar de la Sal. Esta será 

vuestra  tierra,  según  sus  fronteras  cir-

cundantes.

13

 Moisés,  entonces,  ordenó  a  los  hijos 

de Israel diciendo: Esta es la tierra que os 

33.40 

→Nm.21.1.  34.3 Es decir: el Mar Muerto.  34.6 Es decir: el Mediterráneo.  34.11 Esto es: el Mar de Galilea o lago de 

Genesaret


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Números 34:14

182

repartiréis  por  sorteo,  la  cual  YHVH  or-

denó que se diera a las nueve tribus y a la 

media tribu.°

14

 Pues  la  tribu  de  los  hijos  de  Rubén, 

según sus casas paternas, la tribu de los 

hijos de Gad, según sus casas paternas y 

la media tribu de Manasés, ya tomaron su 

heredad.

15

 Y  las  dos  tribus  y  media  tomaron  su 

heredad a este lado del Jordán, al oriente 

de Jericó, hacia la salida del sol.°

16

 Y habló YHVH a Moisés, diciendo:

17

 Estos son los nombres de los varones 

que os repartirán la tierra: Eleazar el sa-

cerdote, y Josué ben Nun.

18

 Además escogeréis un jefe de cada tri-

bu para repartir la tierra.

19

 He  aquí  los  nombres  de  los  varones: 

De la tribu de Judá, Caleb ben Jefone.

20

 De  la  tribu  de  los  hijos  de  Simeón, 

Samuel ben Amiud.

21

 De  la  tribu  de  Benjamín,  Elidad  ben 

Quislón.

22

 De la tribu de los hijos de Dan, el jefe 

Buqui ben Jogli.

23

 En cuanto a los hijos de José, de la tri-

bu de los hijos de Manasés, el jefe Haniel 

ben Efod.

24

 De  la  tribu  de  los  hijos  de  Efraín,  el 

jefe Quemuel ben Siftán.

25

 De la tribu de los hijos de Zabulón, el 

jefe Elisafán ben Parnac.

26

 De la tribu de los hijos de Isacar, el jefe 

Paltiel ben Azán.

27

 De la tribu de los hijos de Aser, el jefe 

Ahiud ben Selomi.

28

 Y de la tribu de los hijos de Neftalí, el 

jefe Pedael ben Amiud.

29

 Tales  son  los  que  mandó  YHVH  que 

repartieran a los hijos de Israel la tierra 

de Canaán.

Ciudades levíticas y ciudades 

de refugio

35

Habló YHVH a Moisés en las llanu-

ras de Moab, junto al Jordán, frente 

a Jericó, diciendo:

2

 Ordena  a  los  hijos  de  Israel  que  de  su 

herencia  en  propiedad,  den  a  los  levitas 

ciudades en que puedan habitar, y entre-

garéis también a los levitas los pastizales 

de las ciudades en torno a ellas.

3

 Las  ciudades  les  servirán  de  morada  y 

los pastizales serán para su ganado, para 

sus animales domésticos y para todas sus 

bestias.

4

 Los pastizales de las ciudades que daréis 

a los levitas desde el muro de la ciudad ha-

cia fuera, serán de mil codos en derredor.

5

 Mediréis dos mil codos fuera de la ciu-

dad  por  el  límite  oriental,  dos  mil  co-

dos  por  el  límite  sur,  dos  mil  codos  por 

el  límite  occidental  y  dos  mil  codos  por 

la parte norte, quedando la ciudad en el 

centro. Esto será de ellos como pastizales 

para las ciudades.

6

 De las ciudades que habéis de dar a los 

levitas, seis ciudades serán de refugio, las 

cuales  daréis  para  que  se  refugie  allá  el 

homicida, y, además de ellas, daréis cua-

renta y dos ciudades.

7

 Todas las ciudades que daréis a los levi-

tas serán cuarenta y ocho, junto con sus 

pastizales.

8

 Las  ciudades  que  daréis  provendrán  de 

la propiedad de los hijos de Israel. Del que 

tiene  mucho  tomaréis  mucho,  y  del  que 

tiene poco tomaréis poco. Cada uno cederá 

de sus ciudades para los levitas en propor-

ción de la propiedad que haya heredado.°

9

 Luego YHVH habló a Moisés, diciendo:

10

 Habla  a  los  hijos  de  Israel  y  diles: 

Cuando hayáis pasado el Jordán hacia la 

tierra de Canaán,

11

 os escogeréis ciudades que serán para 

vosotros ciudades de asilo,° adonde pueda 

refugiarse el homicida que mate a alguno 

sin intención.

12

 Tales  ciudades  os  servirán  de  refugio 

frente  al  vengador,  y  así  el  homicida  no 

morirá antes de presentarse a juicio ante 

la asamblea.

13

 Así  pues,  de  las  ciudades  que  daréis, 

tendréis seis ciudades de refugio.

14

 Estableceréis tres ciudades a este lado 

del Jordán, y otras tres ciudades en la tie-

rra de Canaán, las cuales serán ciudades 

de refugio.

15

 Estas seis ciudades serán para refugio 

a los hijos de Israel, al extranjero y al que 

34.13 

→Nm.26.52-56.  34.13-15 →Jos.14.1-5.  35.1-8 →Jos.21.1-42.  35.11-28 →Jos.20.1-9.


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Números 36:5

183

resida entre vosotros, para que allá se re­

fugie todo el que mate a otro sin inten­

ción.

16

 Pero si lo golpea con instrumento de 

hierro  y  muere,  es  asesino.  El  asesino 

será muerto irremisiblemente.

17

 Si lo golpea piedra en mano, con que 

pueda matar, y muere, es un asesino. El 

asesino será muerto irremisiblemente.

18

 Si  lo  golpea  con  un  instrumento  de 

madera  en  la  mano,  que  pueda  matar, 

y  muere,  es  un  asesino.  El  asesino  será 

muerto irremisiblemente.

19

 El  vengador  de  la  sangre,  él  mismo 

matará al asesino. En el momento en que 

lo encuentre, lo matará.

20

 Y si por odio lo empuja, o lanza algo 

contra él deliberadamente, y muere,

21

 o si por enemistad lo golpea con el puño 

y muere, el agresor será muerto sin remi­

sión. Es asesino, y el vengador de la sangre 

matará al asesino cuando lo encuentre.

22

 Pero si casualmente, sin enemistad, lo 

empuja o lanza sobre él cualquier objeto 

sin premeditación,

23

 o bien sin verlo hace caer sobre él al­

guna  piedra,  por  la  que  pueda  causar  la 

muerte, y muere, no siendo su enemigo 

ni procurando su mal,

24

 entonces la asamblea juzgará entre el 

que ha herido y el vengador de la sangre 

según estas leyes.

25

 Así la asamblea librará al homicida de la 

mano del vengador de la sangre, y la asam­

blea hará que vuelva a su ciudad de refugio, 

donde  se  había  refugiado,  y  allí  habita­

rá  hasta  la  muerte  del  sumo  sacerdote,  a 

quien se ungió con el aceite del Santuario.

26

 Pero  si  el  homicida  sale  fuera  del  lí­

mite de su ciudad de refugio, a donde se 

había refugiado,

27

 y el vengador de la sangre° lo encuen­

tra fuera del límite de su ciudad de refu­

gio,  y  el  vengador  de  la  sangre  mata  al 

homicida, no será culpable de sangre,

28

 pues aquél debió habitar en su ciudad de 

refugio hasta que hubiera muerto el sumo 

sacerdote.  Sólo  después  de  la  muerte  del 

sumo sacerdote, el homicida podrá regre­

sar a la tierra de su propiedad.

29

 Estas  cosas  os  serán  por  estatuto  de 

juicio  en  vuestras  generaciones  venide­

ras, en todos vuestros asentamientos.

30

 Cualquiera que mate a alguno, por el tes­

timonio de testigos se hará morir al homi­

cida, pero el testimonio de un solo testigo 

no bastará para que una persona muera.°

31

 No  aceptaréis  rescate  por  la  vida  del 

homicida, porque es culpable de muerte. 

Será muerto irremisiblemente.

32

 No aceptaréis rescate del que habién­

dose  asilado  en  su  ciudad  de  refugio, 

vuelve para habitar en su tierra antes de 

la muerte del sacerdote.

33

 No profanaréis la tierra en la cual es­

táis, porque la sangre profana la tierra, y 

la tierra no será expiada de la sangre que 

fue derramada en ella, excepto por la san­

gre del que la derramó.

34

 No contaminarás la tierra donde voso­

tros habitáis, en medio de la cual Yo habi­

to, porque Yo, YHVH, habito en medio de 

los hijos de Israel.

Acerca del matrimonio de las herederas

36

Los jefes de las casas paternas de la 

familia de Galaad, descendiente de 

Maquir ben Manasés, de las familias de los 

hijos de José, se presentaron ante Moisés 

y ante los jefes de las casas paternas de los 

hijos de Israel,

2

 y dijeron: YHVH ordenó a mi señor que 

reparta la tierra por suerte a los hijos de 

Israel. Asimismo a mi señor le fue orde­

nado por YHVH que diera la herencia de 

nuestro hermano Zelofejad a sus hijas.°

3

 Pero si ellas se casaran con uno de otra 

tribu  israelita,  su  heredad  sería  sustraí­

da de la heredad de nuestros padres. Así, 

la heredad de la tribu a la que ellas pasen 

aumentará,  y  la  que  nos  tocó  a  nosotros 

disminuirá.

4

 Y cuando llegue el jubileo para los hi­

jos de Israel, su heredad sería añadida a 

la heredad de la tribu de sus maridos, y 

así su heredad vendría a sustraerse de la 

heredad de la tribu de nuestros padres.

5

 Entonces Moisés ordenó a los hijos de Is­

rael, por mandato de YHVH, diciendo: Di­

cen bien los de la tribu de los hijos de José.

35.27 Heb. goel dam = redentor de sangre. Se refiere al deber del pariente designado como redentor para vengar la sangre 

derramada de su familiar. 

35.30 

→Dt.17.6; 19.15.  36.2 →Nm.27.7. 


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Números 36:6

184

6

 Esto es lo que ha ordenado YHVH res­

pecto a las hijas de Zelofejad, a saber: Cá­

sense con quien ellas quieran, con tal que 

se casen dentro de la familia de la tribu 

de su padre,

7

 para que no ande rodando la herencia 

de  los  hijos  de  Israel  de  tribu  en  tribu, 

sino  que  los  hijos  de  Israel  conserven 

cada  uno  la  heredad  de  la  tribu  de  sus 

padres.

8

 Asimismo toda hija que tenga herencia 

en cualquier tribu de los hijos de Israel, 

debe  casarse  dentro  de  la  familia  de  la 

tribu de su padre, para que los hijos de 

Israel  sigan  poseyendo  cada  uno  la  he­

rencia de sus padres,

9

 y así no pasará la heredad de una tribu 

a otra, sino que las tribus de los hijos de 

Israel conservarán su propia herencia.

10

 Conforme YHVH ordenó a Moisés, así 

hicieron las hijas de Zelofejad.

11

 Y  Maala,  Tirsa,  Hogla,  Milca  y  Noa, 

hijas de Zelofejad, fueron esposas de los 

hijos de sus tíos.

12

 Fueron esposas en la familia de los hi­

jos de Manasés ben José, y la heredad de 

ellas quedó en la tribu de la familia de su 

padre.

13

 Estos son los mandamientos y decretos 

que YHVH ordenó por medio de Moisés a 

los hijos de Israel en las llanuras de Moab, 

junto al Jordán, frente a Jericó.


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1

Éstas son las palabras que habló Moi-

sés a todo Israel al otro lado del Jor-

dán° en el desierto, en el Arabá° frente a 

Suf, entre Parán, Tofel, Labán, Hazerot y 

Di-zahab.°

2

 Once  jornadas  hay  desde  Horeb  por  el 

camino del monte Seir hasta Cades Bar-

nea.

3

 Y sucedió en el año cuarenta, en el mes 

undécimo, el primero del mes, que Moi-

sés habló a los hijos de Israel conforme a 

todo lo que YHVH le había ordenado acer-

ca de ellos,

4

 después de derrotar a Sehón, rey amo-

rreo,°  que  habitaba  en  Hesbón,  y  de 

vencer en Edrei a Og rey de Basán,° que 

habitaba en Astarot.

5

 Allende  el  Jordán°  pues,  en  tierra  de 

Moab, se encargó Moisés de explicar esta 

Ley,° diciendo:

6

 YHVH nuestro Dios nos habló en Horeb 

diciendo: Bastante tiempo habéis perma-

necido en este monte.

7

 Volveos y alzad el campamento, y mar-

chad a la serranía del amorreo, y a todos 

los lugares circunvecinos en el Arabá y en 

la serranía, en el llano, en el Neguev y en 

la rivera del mar, tierra del cananeo, y al 

Líbano, hasta el gran Río, el río Éufrates.

8

 Ved que pongo la tierra delante de voso-

tros, entrad y tomad posesión de la tierra 

que YHVH juró a vuestros padres, a Abra-

ham, a Isaac y a Jacob, que la daría a ellos 

y a su descendencia después de ellos.

9

 En aquel tiempo os hablé, diciendo: No 

podré sosteneros yo solo.

10

 YHVH vuestro Dios os ha multiplica-

do, y he aquí hoy sois como la multitud 

de las estrellas de los cielos.

11

 YHVH, Dios de vuestros padres, os au-

mente mil veces más de lo que sois y os 

bendiga tal como os ha hablado.

12

 Pero,  ¿cómo  podré  soportar  yo  solo 

vuestra molestia, y vuestra carga, y vues-

tra contención?

13

 Dadme  de  vuestra  parte  varones  sa-

bios, entendidos y conocidos de vuestras 

tribus, a quienes yo ponga por caudillos 

vuestros.

14

 Y  me  respondisteis:  Bueno  será  que 

hagamos lo que has dicho.

15

 Tomé pues las cabezas de vuestras tri-

bus: varones sabios y conocidos, y los puse 

por caudillos vuestros, por jefes de miles, 

jefes  de  centenas,  jefes  de  cincuentenas 

y jefes de decenas, y por magistrados de 

vuestras tribus.

16

 Y  a  esos,  vuestros  jueces,  en  aquel 

tiempo  mandé  diciendo:  Escuchad  a 

Remembranza histórica

1.1 Jordán. Heb. ´ever hayarden = al otro lado del Jordán. No hay razón para dudar del papel de Moisés como autor sagrado 

del Deuteronomio. Sin embargo el libro mismo sugiere que se finalizó después de su muerte. La evidencia más fuerte para 

este punto de vista es el registro de 34.1-12, el cual es consustancial con el problema tratado aquí (1.1-5). Esto no ha de 

interpretarse como una adición editorial menor sino más bien como un marco interpretativo para el libro completo. Deute-

ronomio presenta las instrucciones mosaicas a una audiencia que trascendió a su muerte, y sugieren que el libro alcanzó 

su forma final en los días de Josué. 

1.1 Arabá. Esto es, llanura.  1.1 Di-zahab. Aunque la localización de Tofel, Labán y Di-

zahab es desconocida, el significado de estos nombres prob. esté relacionado con ciertos actos de desobediencia de Israel 

durante su peregrinación en el desierto. Esto es: Tofel deriva de la raíz nafal, que significa caerLabán = blanco, en una 

posible alusión al manáDi-zahab = que es de oro, en una posible alusión al becerro de oro 

→Ex.32.4.  1.4 →Nm.21.21-30. 

1.4 

→Nm.21.31-35.  1.5 Jordán. Lit. al otro lado del Jordán. Esta frase se registra 33 veces, principalmente en el libro de 

Josué. 

1.5 Ley. Heb. torah. Se traduce generalmente por ley; sin embargo, su verdadero significado es instrucción, enseñan-

za, de la raíz yarah = dirigir, enseñar 

→Sal.86.11. 


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Deuteronomio 1:17

186

vuestros hermanos, y juzgad con equidad 

entre cada uno y su hermano, o su vecino 

extranjero.

17

 No  hagáis  favoritismo°  en  el  juicio. 

Escucharéis  tanto  al  pequeño  como  al 

grande. No os intimidéis delante de nin-

gún hombre, porque el juicio pertenece a 

’Elohim. La causa que os sea demasiado 

difícil me la traeréis a mí y yo la oiré.

18

 En  aquel  tiempo  os  prescribí  todo  lo 

que debíais hacer.

19

 Partimos pues de Horeb y recorrimos 

todo  aquel  vasto  y  terrible  desierto  que 

visteis, camino de la serranía del amorreo, 

tal como YHVH nuestro Dios nos lo había 

ordenado, y llegamos a Cades Barnea.

20

 Entonces  os  dije:  Habéis  llegado  a  la 

serranía del amorreo, la cual YHVH nues-

tro Dios nos da.

21

 He aquí, YHVH tu Dios ha entregado 

ante ti esta tierra. Sube y toma posesión, 

tal como YHVH el Dios de tus padres te ha 

hablado. No temas ni te acobardes.

22

 Pero  todos  vosotros  os  acercasteis  a 

mí, y dijisteis: Enviemos varones delante 

de nosotros para que exploren la tierra, y 

nos informen acerca del camino por don-

de  hemos  de  subir,  y  de  las  ciudades  en 

que hemos de entrar.

23

 Y me pareció acertado el consejo, por 

lo cual tomé doce varones de entre voso-

tros, un varón por cada tribu,

24

 los  cuales  partieron,  y  subiendo  a  la 

montaña llegaron hasta el arroyo de Es-

col, y exploraron el país.

25

 Tomaron en sus manos del fruto de la 

tierra  y  nos  lo  trajeron,  nos  informaron 

y dijeron: ¡Buena es la tierra que YHVH 

nuestro Dios nos da!

26

 Pero  no  quisisteis  entrar,  antes  os 

rebelasteis  contra  el  mandamiento  de 

YHVH vuestro Dios,°

27

 y murmurasteis en vuestras tiendas, y 

dijisteis: Porque nos aborrece YHVH nos 

sacó de la tierra de Egipto para entregar-

nos en manos del amorreo y destruirnos.

28

 ¿Adónde subiremos? Nuestros herma-

nos nos han hecho desmayar el corazón, 

diciendo:  Este  pueblo  es  más  grande  y 

más  alto  que  nosotros,  las  ciudades  son 

grandes  e  inexpugnables,  amuralladas 

hasta  los  cielos,  y  hemos  visto  también 

allí a los hijos de Anac.°

29

 Entonces os dije: No os amedrentéis ni 

tengáis temor de ellos,

30

 porque YHVH vuestro Dios, que va de-

lante de vosotros, Él peleará por vosotros, 

así como lo hizo por vosotros en Egipto 

ante vuestros mismos ojos,

31

 y  también  en  el  desierto,°  donde  ha-

béis  visto  cómo  YHVH  tu  Dios  te  llevó° 

como un hombre lleva a su propio hijo, 

en todo el camino que anduvisteis hasta 

vuestra llegada a este lugar.

32

 Pero ni aun con esto creísteis en YHVH 

vuestro Dios,°

33

 que iba delante de vosotros por el ca-

mino,  para  buscaros  lugar  donde  acam-

par,  con  fuego  de  noche  y  con  nube  de 

día, para mostraros el camino por donde 

debíais andar.

34

 Entonces YHVH oyó la voz de vuestras 

palabras, y se airó, y juró diciendo:

35

 Ninguno de los hombres de esta per-

versa generación verá la buena tierra que 

juré dar a vuestros padres,°

36

 excepto  Caleb  ben  Jefone,  él  la  verá, 

y a él y a sus hijos daré la tierra que ha 

pisado, por cuanto ha seguido cumplida-

mente a YHVH,

37

 (pues  también  contra  mí  se  había  ai-

rado YHVH por causa vuestra, y me dijo: 

Tampoco tú entrarás allá),

38

 y Josué ben Nun, que está delante de 

ti para servirte, él entrará allá. Anímale, 

porque él hará que Israel la herede.

39

 Y vuestros pequeños, de quienes dijis-

teis que iban a ser una presa, y vuestros 

hijitos  que  hoy  no  conocen  ni  bien  ni 

mal, ellos entrarán allá, porque a ellos la 

daré, y ellos la tomarán en posesión.

40

 Vosotros empero, volveos y emprended 

la marcha hacia el desierto, por el camino 

del Mar Rojo.°

41

 Entonces  respondiéndome,  dijisteis: 

Hemos  pecado  contra  YHVH.  Nosotros 

1.17 Lit. no reconoceréis rostros.  1.26 

→Dt.9.23; He.3.16.  1.28 Heb. ‘anaq significa collar. →Cnt.4.9; Pr.1.9; Jue.8.26. Tra-

dicionalmente se ha considerado a los anaquitas como personas de excepcional altura, o de cuello largo. Siguiendo a la LXX 

algunas  versiones  traducen  gigantes

1.31 

→Hch.13.18.  1.31  Lit.  te  alzó,  te  cargó.  1.32  →He.3.19.  1.34-35  →He.3.18. 

1.40 Heb. mar de Juncos.


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Deuteronomio 2:20

187

ciertamente subiremos y pelearemos, tal 

como YHVH nuestro Dios nos ha ordena-

do. Y os ceñisteis cada uno sus armas de 

guerra, y os aprestasteis para subir teme-

rariamente a la serranía.

42

 Pero YHVH me dijo: Diles: No subáis 

ni  peleéis,  pues  Yo  no  estoy  entre  voso-

tros, no sea que os veáis derrotados ante 

vuestros enemigos.

43

 Y os hablé, pero no escuchasteis, sino 

que  os  rebelasteis  contra  el  dicho  de 

YHVH, y persistiendo con altivez, subis-

teis a la serranía.

44

 Entonces los amorreos que habitaban 

en aquella serranía salieron a vuestro en-

cuentro y os derrotaron en Seir, y como 

suelen  hacer  las  abejas,  os  persiguieron 

hasta Horma.

45

 Después  os  volvisteis  y  llorasteis  de-

lante  de  YHVH,  pero  YHVH  no  escuchó 

vuestra voz, ni os prestó oído.

46

 Así  permanecisteis  en  Cades  muchos 

días, según el número de los días que ha-

bitasteis allí.

2

Después nos volvimos y partimos ha-

cia el desierto por el camino del Mar 

Rojo, como YHVH me había ordenado, y 

por muchos días dimos vuelta a la serra-

nía de Seir.°

2

 Entonces YHVH me habló, diciendo:

3

 Bastantes  vueltas  habéis  dado  ya  alre-

dedor  de  esta  serranía.  Volveos  hacia  el 

norte,

4

 y ordena al pueblo, diciendo: Vais a pa-

sar por el territorio de vuestros hermanos, 

los hijos de Esaú,° que habitan en Seir, y 

os temerán. Tened mucho cuidado,

5

 no  los  provoquéis,  porque  de  su  tierra 

no os daré ni la huella de un pie, porque 

a Esaú he dado por heredad la serranía de 

Seir.

6

 Obtendréis el alimento de parte de ellos 

por plata, y comeréis, y también por plata 

negociaréis con ellos el agua, y beberéis.

7

 Porque YHVH tu Dios te ha bendecido 

en toda obra de tu mano, ha conocido tu 

peregrinar a través de este vasto desierto, 

y hace ya cuarenta años que YHVH tu Dios 

está contigo y no has carecido de nada.

8

 Así  pasamos  de  largo  a  nuestros  her-

manos, los hijos de Esaú, moradores en 

Seir, por el camino del Arabá, desde Elat y 

Ezión-Guever, y nos volvimos y pasamos 

adelante, camino del desierto de Moab.

9

 YHVH me dijo entonces: No hostilicéis 

a  los  Moabitas,°  ni  contendáis  con  ellos 

en guerra, porque no te daré nada de su 

tierra por posesión, pues he dado Ar a los 

hijos de Lot por posesión suya.

10

 (Allí  habitaron  antes  los  emitas,  pue-

blo  grande  y  numeroso,  alto  como  los 

anaceos,

11

 ellos también, como los anaceos, eran 

considerados refaítas,° aunque los moabi-

tas los llamaban emitas,

12

 también  en  Seir  habitaron  antes  los 

horeos, a los cuales los hijos de Esaú des-

poseyeron y destruyeron delante de ellos, 

y se establecieron en su lugar, tal como 

Israel hizo en la tierra que YHVH les dio 

por posesión.)

13

 Ahora  pues  levantaos,  y  pasad  el  to-

rrente de Zered. Y en efecto,° pasamos el 

torrente de Zered.

14

 El tiempo que anduvimos desde Cades 

Barnea hasta que pasamos el torrente de 

Zered  fueron  treinta  y  ocho  años,  hasta 

que toda la generación de los hombres de 

guerra se extinguió en medio del campa-

mento, tal como YHVH les había jurado.°

15

 También la mano de YHVH se dejó sen-

tir en ellos para dispersarlos de en medio 

del campamento hasta su extinción.

16

 Y sucedió que cuando todos los hom-

bres de guerra de entre el pueblo habían 

perecido,

17

 YHVH me habló, diciendo:

18

 Hoy  pasarás  por  Ar  la  frontera  de 

Moab,

19

 y  te  aproximarás  a  los  límites  de  los 

hijos  de  Amón.°  No  los  hostigues  ni  los 

provoques, porque no te daré posesión de 

la tierra de los hijos de Amón, pues la he 

dado a los hijos de Lot por heredad.

20

 (Era también conocida como tierra de 

los refaítas, pues antiguamente habitaron 

en ella los refaítas, a los que los amonitas 

llamaban zamzumitas,

2.1 

→Nm.21.4.  2.4 →Gn.36.8.  2.9 →Gn.19.37.  2.11 Heb. refa’im, puede referirse a sombras o espíritus de los muertos, 

→Is.26.14, Sal.88.11; Pr.21.16, o a una nación de Canaán. También es probable que se trate de individuos de excepcional 

estatura. 

2.13 .en efecto.  2.14 

→Nm.14.28-35.  2.19 →Gn19.38. 


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Deuteronomio 2:21

188

21

 pueblo grande y numeroso, alto como 

los anaceos, que YHVH destruyó delante 

de ellos,° quienes los desposeyeron y ha-

bitaron en su lugar,

22

 tal  como  hizo  con  los  hijos  de  Esaú, 

que  habitan  en  Seir,  cuando  destruyó  a 

los horeos delante de ellos, y ellos los des-

poseyeron y habitaron en su lugar hasta 

este día,

23

 y los caftoreos, salidos de Caftor, destru-

yeron a los aveos que moraban en aldeas 

hasta Gaza, y habitaron en su lugar.)

24

 ¡Disponeos, partid y pasad el torrente 

Arnón! He aquí he entregado en tu mano 

a Sehón, rey de Hesbón, al amorreo y a su 

tierra. ¡Comienza a conquistar, y entra en 

batalla contra él!

25

 Hoy  mismo  comienzo  a  infundir  es-

panto y temor de ti entre los pueblos que 

existen  bajo  todos  los  cielos,  los  cuales, 

cuando tengan noticia de ti, temblarán y 

desfallecerán ante tu presencia.

26

 Entonces  envié  embajadores  desde  el 

desierto de Cademot a Sehón, rey de Hes-

bón, con palabras de paz, diciendo:

27

 Déjame pasar por tu tierra, marcharé 

constantemente  por  el  camino  sin  des-

viarme ni a derecha ni izquierda.

28

 Por plata me venderás alimento y co-

meré, y por plata me darás agua y beberé. 

Solamente déjame pasar,

29

 como han hecho conmigo los hijos de 

Esaú,  que  habitan  en  Seir,  y  los  moabi-

tas que habitan en Ar, hasta que cruce el 

Jordán a la tierra que YHVH nuestro Dios 

nos da.

30

 Pero  Sehón,  rey  de  Hesbón,  no  con-

sintió en dejarnos pasar por allí, porque 

YHVH  tu  Dios  había  endurecido  su  es-

píritu e hizo obstinado su corazón, a fin 

de entregarlo en tu mano, como se ve en 

este día.

31

 Entonces  YHVH  me  dijo:  He  aquí  Yo 

entrego delante de ti a Sehón y su tierra. 

Empieza pues a someterlo, para que he-

redes su tierra.

32

 Y  nos  salió  Sehón  al  encuentro,  él  y 

todo su pueblo, para combatir en Jahaza,

33

 y YHVH nuestro Dios lo entregó delan-

te de nosotros y lo derrotamos, así como a 

sus hijos y a todo su pueblo.

34

 En aquel tiempo capturamos todas sus 

ciudades  y  las  consagramos  al  extermi-

nio: hombres, mujeres y niños. No deja-

mos ningún sobreviviente.

35

 Solamente tomamos por botín los ani-

males y el despojo de las ciudades que ha-

bíamos capturado.

36

 Desde Aroer, que está junto a la orilla 

del torrente Arnón, y la ciudad que está en 

el valle, hasta Galaad, no hubo ciudad que 

fuese inaccesible. Todo lo entregó YHVH 

nuestro Dios delante de nosotros.

37

 Solamente  no  te  acercaste  a  la  tierra 

de  los  hijos  de  Amón,  a  ninguna  parte 

del torrente Jaboc, ni a las ciudades de la 

montaña, ni a nada de lo que YHVH nues-

tro Dios había prohibido.

3

Luego nos volvimos y subimos cami-

no del Basán, y nos salió al encuentro 

Og, rey de Basán, con todo su pueblo para 

combatir en Edrei.

2

 Entonces  YHVH  me  dijo:  No  le  ten-

gas temor, porque lo he entregado en tu 

mano, junto con todo su pueblo y su tie-

rra. Harás con él como hiciste con Sehón, 

el rey amorreo que habitaba en Hesbón.

3

 Y YHVH nuestro Dios entregó también 

en nuestra mano a Og, rey de Basán, con 

todo su pueblo, al cual derrotamos hasta 

no dejarle sobreviviente.

4

 En  aquel  tiempo  conquistamos  todas 

sus  ciudades.  No  hubo  poblado  que  no 

les tomáramos. Fueron sesenta ciudades, 

toda la región de Argob del reino de Og 

en Basán.

5

 Todas  estas  eran  ciudades  fortificadas: 

alta muralla, puertas y barras, sin contar 

otras muchas ciudades sin muro.

6

 Y las dedicamos al exterminio, tal como 

hicimos con Sehón, rey de Hesbón, exter-

minando en toda ciudad a hombres, mu-

jeres y niños,

7

 aunque  tomamos  por  botín  todos  los 

animales y el despojo de las ciudades.

8

 También en aquel tiempo tomamos de 

mano  de  los  dos  reyes  del  amorreo  que 

estaban  de  allende  el  Jordán,°  la  tierra 

desde  el  torrente  Arnón  hasta  el  monte 

Hermón

9

 (al  Hermón  los  sidonios  lo  llaman  Si-

rión, y los amorreos Senir),

2.21 Es decir, delante de los amonitas.  3.8 Lit. al otro lado del Jordán

→1.1 nota, Jos.12.1. 


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Deuteronomio 4:3

189

10

 todas  las  ciudades  de  la  meseta,  todo 

Galaad y todo Basán hasta Salca y Edrei, 

que son ciudades del reino de Og, en Ba-

sán.

11

 Porque  sólo  Og,  rey  de  Basán,  había 

quedado  del  remanente  de  los  refaítas. 

(He  aquí,  su  lecho  era  un  lecho  de  hie-

rro. ¿Acaso no está en Rabá de los hijos 

de Amón? Su longitud es de nueve codos 

y  su  anchura  de  cuatro  codos,  según  el 

codo° corriente).

12

 En aquel tiempo tomamos posesión de 

esta tierra desde Aroer, que está junto al 

torrente Arnón, hasta la mitad de la serra-

nía de Galaad y sus ciudades, que entre-

gué a los rubenitas y a los gaditas.

13

 Pero el resto de Galaad, y todo el Ba-

sán, reino de Og, lo entregué a la media 

tribu de Manasés: toda la región de Argot 

con todo el Basán. (Esta fue llamada tie-

rra de gigantes.

14

 Jair ben Manasés tomó toda la región 

de Argob hasta la frontera con los gesuri-

tas y los maakitas, y apellidó con su nom-

bre:  Havot-Jair°  los  aduares  del  Basán 

hasta el día presente.)

15

 Di pues a Maquir el resto de Galaad,

16

 y a los rubenitas y gaditas les di des-

de  Galaad  hasta  el  torrente  Arnón,  con 

frontera  en  la  mitad  del  torrente,  hasta 

el torrente Jaboc, frontera de los hijos de 

Amón,

17

 así  como  el  Arabá  y  el  Jordán  como 

confín, desde el Kineret° hasta el Mar del 

Arabá, el Mar de la Sal, al pie de las lade-

ras del Pisga, al oriente.

18

 En  aquel  tiempo  os  ordené  diciendo: 

YHVH vuestro Dios os ha dado esta tierra 

para poseerla. Todos los valientes pasaréis 

armados  delante  de  vuestros  hermanos, 

los hijos de Israel.

19

 Solamente vuestras mujeres, vuestros 

pequeños y vuestro ganado (pues sé que 

tenéis  mucho  ganado)  quedarán  en  las 

ciudades que os he dado,

20

 hasta  que  YHVH  conceda  reposo  a 

vuestros hermanos, así como a vosotros, 

de modo que también ellos puedan tomar 

posesión  de  la  tierra  que  YHVH  vuestro 

Dios les da al otro lado del Jordán. Enton-

ces cada uno podrá volverse a la posesión 

que os he dado.°

21

 También en aquel tiempo ordené a Jo-

sué, diciendo: Tus ojos han visto todo lo 

que YHVH vuestro Dios ha hecho a estos 

dos reyes. Así hará YHVH a todos los rei-

nos por donde pasarás tú.

22

 No  los  temáis,  porque  el  mismo 

YHVH,  vuestro  Dios,  es  quien  pelea  por 

vosotros.

23

 Entonces supliqué a YHVH, diciendo:

24

 ¡Oh  Adonay  YHVH!  Tú  has  comenza-

do a mostrar a tu siervo tu grandeza y tu 

fuerte mano, porque ¿qué dios hay en los 

cielos o en la tierra que haga según tus 

obras y según tus proezas?

25

 ¡Déjame pasar, te ruego, para contem-

plar la buena tierra que está al otro lado 

del Jordán, esa hermosa serranía, y el Lí-

bano!

26

 Pero YHVH se mostró disgustado con-

tra  mí  por  causa  de  vosotros,  y  no  me 

escuchó; y me dijo YHVH: ¡Basta, no ha-

blemos más de este asunto!

27

 Sube a la cumbre del Pisga y alza tus 

ojos  hacia  el  mar,  al  norte,  al  sur  y  al 

oriente, y contémplala con tus ojos, por-

que no cruzarás este Jordán.°

28

 Ordena a Josué, fortalécelo y anímalo. 

Él lo cruzará al frente de este pueblo, y él 

les hará heredar la tierra que verás.

29

 Y  permanecimos  en  el  valle,  frente  a 

Bet-peor.

Exhortación a la obediencia

4

Ahora pues, oye Israel los estatutos y 

decretos que os enseño,° a fin de ob-

servarlos, para que viváis y entréis a to-

mar  posesión  de  la  tierra  que  YHVH,  el 

Dios de vuestros padres, os da.

2

 Nada  añadiréis  a  la  palabra  que  yo  os 

mando  ni  de  ella  quitaréis,°  para  que 

guardéis  los  mandamientos  de  YHVH 

vuestro Dios que yo os ordeno.

3

 Vuestros  mismos  ojos  vieron  lo  que 

YHVH  hizo  en  lo  tocante  a  Baal-peor, 

3.11 un codo = 45 cm Es decir: 4 m de largo por 1.8 m aproximadamente.  3.14 Esto es, aduares de Jair.  3.17 Esto es, el 

mar de Galilea

3.18-20 

→Jos.1.12-15.  3.23-27 →Nm.27.12-14; Dt.32.48-52.  4.1 Heb. melamed de la raíz lamad y que 

en este caso significa enseñar. Es la primera vez que aparece este verbo en todo el AP. El sujeto aquí es Moisés, quien está 

interesado en que el pueblo estudie y aprenda la Ley, no solo como rigurosa instrucción sino como una enseñanza práctica. 

4.2 

→Ap.22.18-19. 


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Deuteronomio 4:4

190

cómo  YHVH  tu  Dios  destruyó  ante  ti  a 

todo hombre que había ido tras el Baal de 

Peor.°

4

 En cambio vosotros, que os aferrasteis 

a  YHVH  vuestro  Dios,  estáis  hoy  todos 

vivos.

5

 Mirad: os he enseñado estatutos y decre-

tos, conforme me enseñó YHVH mi Dios, 

para que hagáis así en medio de la tierra 

donde vais a entrar para poseerla.

6

 Observadlos y practicadlos, pues consti-

tuye vuestra sabiduría y vuestro entendi-

miento a la vista de las naciones, las cuales 

tendrán noticia de todos estos estatutos, y 

dirán: ¡En verdad esta gran nación es un 

pueblo sabio y entendido!

7

 Pues  ¿qué  nación  hay  tan  grande  que 

tenga  dioses  tan  cercanos  a  sí,  como  lo 

está YHVH nuestro Dios, siempre que no-

sotros lo invoquemos?

8

 Y ¿qué nación hay tan grande que tenga 

estatutos y decretos tan justos como toda 

esta Ley° que hoy pongo ante vosotros?

9

 Por tanto, guárdate a ti mismo, y guar-

da  mucho  tu  alma.  No  olvides  las  cosas 

que  vieron  tus  ojos,  ni  se  aparten  de  tu 

corazón en todos los días de tu vida. Las 

enseñarás a tus hijos y a los hijos de tus 

hijos.

10

 El día que estuviste delante de YHVH 

tu Dios en Horeb, cuando YHVH me dijo: 

Congrégame al pueblo y haré que oigan 

mis palabras para que aprendan a temer-

me todos los días que vivan sobre esta tie-

rra, y las enseñen a sus hijos,

11

 os acercasteis y permanecisteis al pie 

del  monte,  mientras  el  monte  ardía  en 

fuego  hasta  el  centro  de  los  cielos,  en 

medio de oscuridad, nubes y densas tinie-

blas.

12

 Y YHVH os habló de en medio del fue-

go:°  vosotros  oíais  sonido  de  palabras, 

pero no percibíais figura alguna, sino una 

voz.

13

 Y  Él  mismo  os  anunció  su  pacto,  el 

cual os mandó observar: los Diez Manda-

mientos, que escribió sobre dos tablas de 

piedra.°

14

 En aquel tiempo YHVH me mandó en-

señaros los estatutos y decretos° para que 

los pusierais por obra en la tierra adonde 

vais a pasar para heredarla.

15

 Así,  guardad  diligentemente  vuestras 

almas, ya que ninguna figura visteis el día 

en que YHVH os habló en Horeb en me-

dio del fuego,

16

 no  sea  que  os  corrompáis  y  os  fabri-

quéis  escultura;°  imagen  de  algún  ídolo 

con forma de hombre o de mujer,

17

 o figura de alguna bestia que está en 

la tierra, o figura de algún ave que vuela 

por los cielos,

18

 o figura de algún reptil que repta por 

el suelo, o figura de pez alguno que nade 

en las aguas debajo de la tierra.

19

 No sea que, alzando tus ojos a los cie-

los y viendo el sol, y la luna y las estrellas, 

todo el cortejo de los cielos, te dejes sedu-

cir y te postres ante ellos, y les rindas cul-

to, siendo que YHVH tu Dios los ha dado 

como  porción  suya  a  todos  los  pueblos 

debajo de todos los cielos.

20

 Pero  a  vosotros  YHVH  os  tomó  y  os 

sacó del horno de hierro de Egipto, para 

que  llegarais  a  ser  para  Él  pueblo  de  su 

herencia,° como hoy se ve.°

21

 Pero YHVH se mostró enojado contra 

mí por causa vuestra, y juró que no pasa-

ría el Jordán ni entraría en la buena tierra 

que YHVH tu Dios te da por heredad.°

22

 Así que yo voy a morir en esta tierra, 

no pasaré el Jordán, pero vosotros pasa-

réis y poseeréis esa buena tierra.

23

 Guardaos  de  olvidar  el  pacto  que 

YHVH vuestro Dios pactó con vosotros, y 

de fabricaros escultura, imagen de cuanto 

YHVH tu Dios te ha prohibido.

24

 Porque YHVH tu Dios es fuego consu-

midor,° Él es Dios celoso.

25

 Cuando  hayas  engendrado  hijos,  e 

hijos  de  hijos,  y  hayas  envejecido  en  la 

tierra, si os depraváis y os fabricáis escul-

tura, imagen de cualquier cosa, y hacéis 

lo  malo  ante  los  ojos  de  YHVH  vuestro 

Dios, irritándolo,

26

 hoy yo hago testificar contra vosotros 

a los cielos y a la tierra, de que ineludi-

blemente pereceréis en breve de sobre la 

tierra  adonde  vais,  cruzando  el  Jordán, 

para heredarla. No prolongaréis vuestros 

4.3 

→Nm.25.1-9.  4.8 Heb. torah →1.5.  4.11-12 →Ex.19.16-18; He.12.18-19.  4.13 →Ex.31.18.  4.14 →Ex.21.1.  4.16 →Ex.20.4; 

Lv.26.1; Dt.5.8;27.15. 

4.20 

→Ex.19.5; Dt.7.6; 14.2; 26.18; Tit.2.14; 1 P.2.9.  4.20 .se ve.  4.21 →Nm.20.12.  4.24 →He.12.29.


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Deuteronomio 5:3

191

días  en  ella,  pues  seréis  totalmente  des-

truidos.

27

 YHVH os esparcirá entre los pueblos, y 

quedaréis pocos en número entre las na-

ciones a las cuales os llevará YHVH.

28

 Allí serviréis a dioses hechos por ma-

nos humanas, de palo y de piedra,° que no 

ven, ni oyen, ni comen, ni olfatean.

29

 Y desde allí buscarás a YHVH tu Dios, 

y lo hallarás, si lo buscas con todo tu co-

razón y con toda tu alma.°

30

 Cuando estés en angustia, y todas estas 

cosas te hayan alcanzado en los postreros 

días, entonces te volverás a YHVH tu Dios 

y escucharás su voz,

31

 porque YHVH tu Dios es Dios miseri-

cordioso, no te dejará ni te destruirá, ni 

olvidará  el  pacto  que  les  juró  a  tus  pa-

dres.

32

 Porque,  pregunta  ahora  por  los  días 

pasados que te han precedido, desde el día 

en que ’Elohim creó al hombre sobre la 

tierra desde un extremo al otro extremo 

de los cielos: ¿Acaso ha sucedido alguna 

vez, o se ha oído jamás cosa tan grande 

como ésta?

33

 ¿Ha oído alguna vez un pueblo la voz 

de Dios, hablando de en medio del fuego, 

como tú la oíste, y has sobrevivido?

34

 O ¿ha intentado jamás un dios venir a 

escogerse una nación de entre otras, me-

diante prodigios y señales, con milagros 

y  con  batallas,  con  mano  fuerte  y  brazo 

extendido, y con grandes portentos, como 

todo lo que hizo con vosotros YHVH vues-

tro Dios delante de tus ojos en Egipto?

35

 A ti se te ha mostrado, para que sepas 

que YHVH es ’Elohim, y no hay otro fuera 

de Él.°

36

 Desde  los  cielos  te  ha  hecho  oír  su 

voz  para  instruirte,  y  sobre  la  tierra  te 

ha mostrado su gran fuego, en medio del 

cual has oído sus palabras.

37

 Y porque amó a tus padres y escogió a 

su descendencia después de ellos, Dios te 

sacó  de  Egipto  personalmente  mediante 

su gran poder,

38

 expulsando  delante  de  ti  a  naciones 

más grandes y más poderosas que tú, para 

introducirte y darte en heredad la tierra 

de ellos, como sucede hoy.

39

 Por  tanto,  reconoce  hoy,  y  reflexiona 

en tu corazón que YHVH es ’Elohim arri-

ba en los cielos y abajo en la tierra, y que 

no hay otro.

40

 Guarda  pues  sus  estatutos  y  manda-

mientos que yo te ordeno hoy, para que te 

vaya bien a ti y a tus hijos después de ti, 

y prolongues tus días sobre la tierra que 

YHVH tu Dios te da para siempre.

41

 Entonces Moisés apartó tres ciudades 

al otro lado del Jordán, hacia el nacimien-

to del sol

42

 (para que se refugiara el homicida que 

matara a su prójimo sin intención, y sin 

antes haberlo aborrecido, y huyera a una 

de estas ciudades, y así salvara su vida):

43

 a  Beser  en  el  desierto,  en  la  llanura, 

para  los  rubenitas,  a  Ramot  en  Galaad 

para los gaditas, y a Golán en Basán para 

los de Manasés,°

44

 Esta es la Ley que Moisés expuso ante 

los hijos de Israel.

45

 Estos son los testimonios, estatutos y 

decretos que Moisés promulgó a los hijos 

de Israel a su salida de Egipto,

46

 al otro lado del Jordán, en el valle fron-

tero a Bet-peor, en la tierra de Sehón, rey 

del amorreo, que habitaba en Hesbón, al 

cual Moisés y los hijos de Israel derrota-

ron después de su salida de Egipto,

47

 y cuya tierra sometieron, así como la 

tierra de Og, rey de Basán, dos reyes amo-

rreos que había del otro lado del Jordán, 

hacia el naciente,

48

 desde Aroer, sita a la orilla del torrente 

Arnón, hasta el monte de Sión, que es el 

Hermón,

49

 con toda la llanura de más allá del Jor-

dán, al oriente, hasta el Mar del Arabá, al 

pie de las laderas del Pisga.

Autoridad del Decálogo

5

Convocó  entonces  Moisés  a  todo  Is-

rael, y les dijo: ¡Oye Israel los estatu-

tos y decretos que yo hablo hoy a vuestros 

oídos para que los aprendáis y los pongáis 

por obra!

2

 YHVH nuestro Dios estableció un pacto 

con nosotros en Horeb.

3

 No  fue  con  nuestros  padres  con  quie-

nes YHVH estableció este pacto, sino con 

4.27-28 

→Dt.28.36.  4.29 →Jer.29.13.  4.35 →Mr.12.32.  4.41-43 →Jos.20.8-9. 


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Deuteronomio 5:4

192

nosotros,  nosotros  los  que  hoy  estamos 

aquí, todos vivos.

4

 Cara a cara habló YHVH con vosotros en 

el monte, de en medio del fuego,

5

 (yo  mediaba  en  aquel  tiempo  entre 

vosotros  y  YHVH  para  poneros  delante 

la  palabra  de  YHVH,  porque  temisteis  a 

causa del fuego, y no subisteis al monte) 

y dijo:

6

 Yo soy YHVH tu Dios, que te saqué de 

tierra de Egipto, de la casa de esclavitud.

7

 No tendrás otros dioses delante de mí.

8

 No te harás imagen° ni semejanza algu-

na  de  lo  que  esté  arriba  en  los  cielos,  o 

abajo en la tierra, o en las aguas debajo 

de la tierra.

9

 No te postrarás ante ellas ni les servirás,° 

porque Yo soy YHVH tu Dios, ’Elohim ce-

loso, que visito la iniquidad de los padres 

sobre los hijos hasta terceros y cuartos° 

de los que me aborrecen,

10

 pero  hago  misericordia  hasta  con  la 

milésima° de los que me aman y guardan 

mis mandamientos.°

11

 No  tomarás  el  nombre°  de  YHVH  tu 

Dios en vano,° porque YHVH no dará por 

inocente al que tome su Nombre en vano.

12

 Guardarás°  el  día  del  shabbat°  para 

santificarlo, tal como YHVH tu Dios te ha 

ordenado.°

13

 Seis  días  trabajarás  y  harás  toda  tu 

obra,

14

 pero el séptimo es shabbat consagrado 

a YHVH tu Dios. No harás ninguna labor,° 

ni tú, ni tu hijo, ni tu hija, ni tu siervo, ni 

tu sierva, ni tu buey, ni tu asno, ni nin-

gún  otro  animal  tuyo,  ni  el  extranjero 

que  mora  dentro  de  tus  ciudades,  para 

que pueda descansar tu siervo y tu sierva 

así como tú.

15

 Pues  recordarás  que  fuiste  esclavo 

en tierra de Egipto, y que YHVH tu Dios 

te sacó de allá con mano fuerte y brazo 

extendido, por lo cual YHVH tu Dios te 

manda guardar° el día del shabbat.

16

 Honra  a  tu  padre  y  a  tu  madre,° 

como  YHVH  tu  Dios  te  ordenó,  para 

que se alarguen tus días y para que te 

vaya bien en la tierra que YHVH tu Dios 

te da.°

17

 No asesinarás.°

18

 No adulterarás.°

19

 No robarás.°

20

 No declararás falso testimonio contra 

tu prójimo.°

21

 No codiciarás° la mujer de tu prójimo, 

ni  desearás  la  casa  de  tu  prójimo,  ni  su 

campo,  ni  su  siervo,  ni  su  sierva,  ni  su 

buey, ni su asno, ni cosa alguna que sea 

de tu prójimo.

22

 Estas  palabras  habló  YHVH  con  gran 

voz  a  toda  vuestra  asamblea  en  el  mon-

te,  desde  en  medio  del  fuego,  la  nube  y 

las densas tinieblas, y no añadió más. Las 

escribió sobre dos tablas de piedra y me 

las dio.

23

 Y sucedió que cuando oísteis la voz de 

en medio de la oscuridad y el monte que 

ardía  en  aquel  fuego,  todos  los  jefes  de 

vuestras tribus y ancianos os acercasteis 

a mí,

24

 y  dijisteis:  Mira,  YHVH  nuestro  Dios 

nos ha mostrado su gloria y su grandeza, 

y hemos oído su voz de en medio del fue-

go. Hoy hemos visto que YHVH habla al 

hombre, y éste puede sobrevivir.

25

 Pero, ¿por qué hemos de morir? pues 

este  gran  fuego  nos  devorará.  Si  conti-

nuamos oyendo la voz de YHVH nuestro 

Dios, moriremos.

5.8  Heb.  pesel,  en  singular.  Nombre  genérico  para  designar  ídolos,  estatuas  e  imágenes  para  el  culto  religioso.  5.9 

→Ex.34.17; Lv.19.4; 26.1; Dt.4.15-19; 27.15.  5.9 Es decir, tercera y cuarta generación.  5.10 Esto es, milésima generación

5.10 

→Ex.34.6-7; Nm.14.18; Dt.7.9-10.  5.11 Se usa minúscula porque va acompañado del sujeto.  5.11 →Lv.19.12.  5.12 Lit. 

guardando

5.12 shabbat 

→ § 150.  5.12 →Ex.16.23-30; 31.12-14.  5.13-14 →Ex.23.12; 31.15; 34.21; 35.2; Lv.23.3.  5.15 

Lit.  hacer

5.16 

→Dt.27.16; Mt.15.4; 19.19; Mr.7.10; 10.19; Lc.18.20; Ef.6.2.  5.16 →Ef.6.3.  5.17 Heb. ratsaj. En el heb. 

existen varias palabras para indicar la acción de matar. La que aquí se usa indica cometer homicidio, la muerte de una persona, 

tanto si es por accidente como deliberadamente. Se refiere a causar una muerte humana. Otros verbos similares son: mut = 

dar muerte 

→32.39; Jue.13.23, harag = matar →Ex.2.14; Dt.13.9, shajat = matar degollando →Gn.37.31; Ex.12.21, zabaj = 

matar para un sacrificio

→Dt.12.21; 2 Cr.18.2. Aunque no es posible afirmar que exista una diferencia estricta entre ratsaj y las 

otras formas de expresión, sí es posible afirmar que este verbo indica preferentemente la muerte violenta, a veces con preme-

ditación, crueldad y alevosía 

→1 R.21.19; Os.4.2. También →Gn.9.6; Lv.24.17; Mt.5.21; 19.18; Mr.10.19; Lc.18.20; Ro.13.9; 

Jac.2.11. 

5.18 

→Lv.20.10; Mt.5.27; 19.18; Mr.10.19; Lc.18.20; Ro.13.9; Jac.2.11.  5.19 Heb. ganav. No es posible traducir 

no hurtarás, pues el verbo hurtar significa tomar lo ajeno sin intimidación ni violencia. El término heb. se refiere a cualquier 

forma de robo, aun mediante la fuerza. También 

→Lv.19.11; Mt.19.18; Mr.10.19; Lc.18.20; Ro.13.9.  5.20 →Ex.23.1; Mt.19.18; 

Mr.10.19; Lc.18.20. 

5.21 

→Ro.7.7; 13.9.


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Deuteronomio 6:18

193

26

 Porque ¿quién es el mortal, sea quien 

sea, que ha oído como nosotros la voz del 

Dios vivo hablando de en medio del fue-

go, y ha sobrevivido?

27

 Aproxímate tú, y escucha todo cuanto 

dice YHVH nuestro Dios, y luego tú nos di-

rás todo lo que YHVH nuestro Dios te haya 

hablado, y escucharemos y lo haremos.°

28

 Y YHVH escuchó la voz de vuestras pa-

labras  mientras  me  hablabais,  y  me  dijo 

YHVH: He oído el son de las palabras de 

este pueblo, lo que te han indicado; bien 

han hablado en todo cuanto te han dicho.

29

 ¡Quién diera que tuvieran siempre tal 

corazón,  que  me  temieran  y  observaran 

todos  los  días  mis  mandamientos,  para 

que les fuera bien a ellos y a sus hijos por 

siempre!

30

 Ve, diles: Regresad a vuestras tiendas.

31

 Pero tú permanece aquí conmigo para 

que  te  diga  todo  el  mandamiento,  y  los 

estatutos, y los decretos, los cuales ense-

ñarás  para  que  los  cumplan  en  la  tierra 

que Yo les doy en posesión.

32

 Y  cuidaréis  de  hacer  tal  como  YHVH 

vuestro Dios os ha ordenado. No os apar-

taréis ni a derecha ni a izquierda.

33

 Andaréis por todo el camino que YHVH 

vuestro Dios os ha ordenado, para que vi-

váis y os vaya bien, y prolonguéis los días 

en la tierra que vais a poseer.

El Dios de Israel

6

Estos,  pues,  son  los  mandamientos, 

los estatutos y los decretos que YHVH 

vuestro  Dios  ordenó  que  os  enseñara, 

para que los pongáis por obra en la tierra 

a la cual pasáis para tomarla en posesión.

2

 A fin de que temas a YHVH tu Dios, tú 

con tu hijo, y el hijo de tu hijo, guardando 

todos los días de tu vida todos sus esta-

tutos y mandamientos que yo te ordeno, 

para que tus días sean prolongados.

3

 Oye  pues,  oh  Israel,  y  cuidarás  de  ha-

cerlo,  como  te  habló  YHVH,  el  Dios  de 

tus  padres,  para  que  te  vaya  bien  y  te 

multipliques en gran manera en la tierra 

que mana leche y miel.

4

 Oye, Israel: YHVH nuestro Dios, YHVH, 

uno es.°

5

 Amarás  a  YHVH  tu  Dios  con  todo  tu 

corazón, con toda tu alma, y con toda tu 

fuerza.°

6

 Estas  palabras  que  te  ordeno  hoy,  han 

de permanecer sobre tu corazón,

7

 y las inculcarás° a tus hijos, y hablarás 

de ellas sentado en tu casa, andando por 

el camino, al acostarte y al levantarte.

8

 Las atarás como señal sobre tu mano, y 

estarán como frontales° entre tus ojos.

9

 Y las escribirás en las jambas de tu casa 

y en tus puertas.°

10

 Y sucederá que cuando YHVH tu Dios 

te introduzca en la tierra que juró a tus 

padres, a Abraham,° a Isaac° y Jacob,° que 

te daría, una tierra° con grandes y esplén-

didas ciudades que tú no edificaste,

11

 con casas llenas de todo bien que tú no 

llenaste, con pozos excavados que tú no ca-

vaste, y con viñas y olivares que tú no plan-

taste, y comas y te hartes,

12

 guárdate  de  olvidar  a  YHVH,  que  te 

sacó de tierra de Egipto, de casa de escla-

vitud.

13

 Temerás a YHVH tu Dios, a Él servirás° 

y en su Nombre jurarás.°

14

 No iréis en pos de dioses ajenos, de los 

dioses de los pueblos que os rodean,

15

 porque  YHVH  tu  Dios,  que  habita  en 

medio de ti, es Dios celoso, no sea que el 

furor de YHVH tu Dios se inflame contra ti 

y te destruya de sobre la faz de la tierra.

16

 No  tentaréis  a  YHVH  vuestro  Dios,° 

como lo tentasteis en Masah.°

17

 Guardaréis  diligentemente  los  man-

damientos  de  YHVH  vuestro  Dios,  sus 

testimonios y sus estatutos que te ha or-

denado.

18

 Harás lo recto y lo bueno ante los ojos 

de YHVH, para que te vaya bien, y entres y 

poseas la buena tierra que YHVH prome-

tió con juramento a tus padres,

5.22-27 

→He.12.18-19.  6.4 → § 2 - § 3. →Mr.12.29.  6.5 →Mt.22.37; Mr.12.30; Lc.10.27.  6.7 Heb. shanan, en su forma in-

tensiva: afilar algo, es decir: enseñar incisivamente

6.8 LXX: y serán inamovibles de delante de tus ojos. El TM registra totafot = 

bandas o marcas frontales

6.9 

→Dt.11.18-20.  6.10 →Gn.12.7.  6.10 →Gn.26.3.  6.10 →Gn.28.13.  6.10 .una tierra.  6.13 

→Mt.4.10; Lc.4.8.  6.13 Heb. tishavea´ Esta palabra proviene de la misma raíz (sheva) que el número siete. Es como si el que 

jura, se obligara siete veces a un compromiso del cual es imposible librarse. Este mandamiento muestra que el juramento es 

lícito cuando se hace en el nombre del Señor y por causas plenamente justificadas. Jesús reprendió a los judíos de su tiempo 

por la costumbre de jurar por cualquier cosa y en cualquier ocasión. 

6.16 

→Mt.4.7; Lc.4.12.  6.16 →Ex.17.1-7. 


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Deuteronomio 6:19

194

19

 arrojando a todos tus enemigos de de-

lante de ti, como YHVH ha anunciado.

20

 Cuando  tu  hijo  te  pregunte  el  día  de 

mañana,  diciendo:  ¿Qué  significan°  los 

testimonios,  los  estatutos  y  los  decretos 

que YHVH nuestro Dios os ordenó?

21

 Entonces dirás a tu hijo: Nosotros éra-

mos  esclavos  de  Faraón  en  Egipto,  pero 

YHVH nos sacó de Egipto con mano fuerte.

22

 Y  ante  nuestros  propios  ojos,  YHVH 

dio señales y portentos grandes y funes-

tos en Egipto contra Faraón y contra toda 

su casa,

23

 y nos sacó de allá para traernos y dar-

nos  la  tierra  que  con  juramento  había 

prometido a nuestros padres.

24

 Y  YHVH  nos  ordenó  poner  por  obra 

todos estos estatutos, temiendo a YHVH 

nuestro Dios, para que nos fuera siempre 

bien  y  nos  conserváramos  vivos,  como 

veis en este día.

25

 Entonces  se  nos  contará  como  jus-

ticia,  cuando  procuremos  cumplir  todo 

este  mandamiento  ante  YHVH  nuestro 

Dios, tal como Él nos ordenó.

Exterminio a los cananeos

7

Cuando YHVH tu Dios te haya intro-

ducido en la tierra donde vas a entrar 

para poseerla, y haya expulsado de delante 

de ti a numerosas naciones:° al heteo, al 

gergeseo, al amorreo, al cananeo, al fere-

zeo, al heveo y al jebuseo, siete naciones 

mayores y más fuertes que tú,

2

 y YHVH tu Dios las haya entregado ante 

ti, y las hayas derrotado, ciertamente las 

dedicarás  al  exterminio.  No  concertarás 

pacto con ellas, ni tendrás compasión de 

ellas.

3

 No emparentarás con ellas, no darás tus 

hijos a sus hijas ni tomarás sus hijas para 

tus hijos,

4

 porque  apartaría  a  tu  hijo  de  seguir-

me para servir a dioses ajenos, y la ira de 

YHVH  se  encendería  contra  vosotros,  y 

no tardaría en destruiros.

5

 Esto es lo que haréis con ellos: demo-

leréis sus altares, destruiréis sus estelas, 

talaréis sus aseras° y quemaréis sus imá-

genes en el fuego.°

6

 Porque tú eres un pueblo consagrado a 

YHVH tu Dios. A ti te escogió YHVH tu 

Dios para que seas pueblo de su personal 

propiedad° entre todos los pueblos de la 

tierra.

7

 YHVH puso su amor° en vosotros y os 

escogió, no porque fuerais más numero-

sos que cualquiera de los pueblos, porque 

sois el pueblo más pequeño,

8

 sino que por el puro amor de YHVH a 

vosotros, por mantener el juramento que 

juró a vuestros padres, os sacó YHVH con 

mano  fuerte  y  os  redimió  de  la  casa  de 

esclavitud, del dominio de Faraón, rey de 

Egipto.

9

 Reconoce que YHVH tu Dios es ’Elohim, 

Dios fiel, que guarda el pacto y la misericor-

dia para con los que le aman y guardan sus 

mandamientos hasta mil generaciones,

10

 pero a los que lo aborrecen, les da su 

recompensa en su misma cara para des-

truirlos° sin hacerse esperar: en su misma 

cara da su merecido al que lo aborrece.

11

 Guarda pues el mandamiento, los es-

tatutos y los decretos que hoy te ordeno 

ponerlos por obra.

12

 Porque  sucederá  que  por  haber  oído 

estos  decretos  y  haberlos  guardado  y 

puesto por obra, también YHVH tu Dios 

guardará contigo el pacto y la misericor-

dia que juró a tus padres.

13

 Y  te  amará,  te  bendecirá  y  te  multi-

plicará. Bendecirá también el fruto de tu 

vientre y el fruto de tu tierra, tu grano, 

tu mosto y tu aceite, las crías de tus va-

cadas y el incremento de tu rebaño, en la 

tierra que Él juró a tus padres que había 

de darte.

14

 Bendito serás más que todos los pue-

blos, no habrá estéril ni impotente entre 

los tuyos ni en tu ganado.

15

 YHVH desviará de ti toda enfermedad; 

jamás te enviará aquellas epidemias ma-

lignas como las de Egipto, que tú cono-

ces, sino que las cargará sobre los que te 

aborrecen.

16

 Aniquila a todos los pueblos que YHVH 

tu Dios te entregue. No tengas compasión 

de ellos ni rindas culto a sus dioses, por-

que será un lazo para ti.°

6.20 .significan.  7.1 

→Hch.13.19.  7.5 →Ex.34.13.  7.5 →Dt.12.3.  7.6 →Ex.19.5; Dt.4.20; 14.2; 26.18; Tit.2.14; 1 P.2.9. 

7.7 Heb. jashaq = tomar por mujer 

→Gn.34.8.  7.9-10 →Ex.20.5-6; 34.6-7; Nm.14.18; Dt.5.9-10.  7.12-16 →Dt.11.13-17. 


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Deuteronomio 8:15

195

17

 Si dijeres en tu corazón: Estas nacio-

nes son más numerosas que yo, ¿cómo las 

podré expulsar?

18

 No  las  temas,  recuerda  bien  lo  que 

YHVH  tu  Dios  hizo  a  Faraón  y  a  todo 

Egipto:

19

 Las  pruebas  tremendas  que  vieron 

tus ojos, las señales y los portentos, y la 

mano fuerte y el brazo extendido con que 

te sacó YHVH tu Dios. Así hará YHVH tu 

Dios a todos los pueblos de cuya presen-

cia tengas temor.

20

 YHVH tu Dios enviará el pánico° contra 

ellos, hasta aniquilar a los que hubieren 

quedado ocultándose de tu presencia.

21

 No tiembles ante ellos, porque YHVH 

tu  Dios  está  en  medio  de  ti  como  Dios 

grande y terrible.

22

 YHVH  tu  Dios  irá  expulsando  esos 

pueblos  poco  a  poco.  No  podrás  acabar 

con ellos en seguida, no sea que las fieras 

del campo lleguen a ser demasiado nume-

rosas para ti.

23

 YHVH tu Dios los entregará ante ti, y 

los confundirá con gran confusión, hasta 

que sean destruidos.

24

 Entregará sus reyes en tu mano, y ha-

rás  desaparecer  sus  nombres  debajo  de 

los  cielos.  Nadie  te  podrá  hacer  frente 

hasta que los hayas destruido.

25

 Quemarás  en  fuego  las  esculturas  de 

sus dioses, no codiciarás la plata ni el oro 

que las recubre, ni te lo apropiarás, no sea 

que caigas con ello en una trampa, por-

que es abominación para YHVH tu Dios.

26

 No introduzcas pues la cosa abomina-

ble en tu casa, pues serías anatema como 

ella. Del todo la detestarás, y del todo la 

abominarás, porque es anatema.

Las bendiciones divinas

8

Cuidaréis de cumplir todo el manda-

miento  que  yo  os  ordeno  hoy,  para 

que viváis y os multipliquéis, y entréis a 

poseer la tierra que YHVH prometió con 

juramento a vuestros padres.

2

 Te acordarás de todo el camino por don-

de te ha traído YHVH tu Dios estos cua-

renta años en el desierto, para humillarte 

y probarte, para saber lo que había en tu 

corazón,  si  guardarías  o  no  sus  manda-

mientos.

3

 Por  eso  te  afligió  y  te  dejó  padecer 

hambre,  para  sustentarte  con  el  maná 

que  no  conocías,  ni  tus  padres  habían 

conocido, para hacerte saber que no sólo 

de pan vive el hombre, sino que el hom-

bre vivirá de todo lo que sale de la boca 

de YHVH.°

4

 Tu vestido nunca se envejeció sobre ti, 

ni el pie se te ha hinchado en estos cua-

renta años.

5

 Reconoce pues en tu corazón, que como 

un hombre corrige a su hijo, así te ha co-

rregido YHVH tu Dios,

6

 para que guardes los mandamientos de 

YHVH tu Dios, andando en sus caminos y 

temiéndole a Él.

7

 Porque  YHVH  tu  Dios  te  conduce  a 

una tierra excelente, tierra de arroyos de 

aguas, de fuentes y manantiales, que bro-

tan en la planicie y en la montaña.

8

 Tierra de trigo y de cebada, de vides, de 

higueras y granados, tierra de aceite, de 

olivas y de miel.

9

 Tierra en la cual no comerás el pan con 

escasez  ni  en  ella  te  faltará  nada.  Tierra 

cuyas piedras son hierro, y de cuyos mon-

tes extraerás el cobre.

10

 Y siempre que comas y te sacies ben-

decirás a YHVH tu Dios por la buena tie-

rra que te habrá dado.

11

 Cuídate, no sea que te olvides de YHVH 

tu Dios, y dejes de observar sus manda-

mientos, sus decretos y sus estatutos que 

yo te ordeno hoy.

12

 No sea que cuando hayas comido y es-

tés ya harto, y hayas edificado hermosas 

casas y las habites,

13

 y tus vacadas y tus rebaños incremen-

ten, y la plata y el oro se te multiplique, y 

todo lo que tengas aumente,

14

 tu corazón se enaltezca y te olvides de 

YHVH tu Dios, que te sacó de la tierra de 

Egipto, de la casa de esclavitud,

15

 que te condujo por el vasto y terrible 

desierto,  con  serpientes  abrasadoras°  y 

escorpiones,  y  en  una  región  sedienta  y 

carente de agua, te sacó agua de la roca 

de pedernal,

7.20 Nla avispa 

→Ex.23.28, Jos.24.12.  8.3 →Mt.4.4; Lc.4.4.  8.15 Heb. Saraf = ardiente. Se refiere al efecto del veneno. Este 

vocablo se usa también para referirse a los serafines o ángeles de fuego.


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Deuteronomio 8:16

196

16

 que  en  el  desierto  te  sustentó  con  el 

maná, que tus padres no habían conoci-

do, a fin de afligirte y ponerte a prueba, 

para poder hacerte bien en tu futuro,°

17

 y  digas  en  tu  corazón:  Mi  poder  y  la 

fuerza de mi mano me ha procurado esta 

riqueza.

18

 Antes bien, recordarás a YHVH tu Dios, 

pues Él es quien te da fuerza para hacer 

riqueza, a fin de confirmar el pacto que 

juró a tus padres, como se ve en este día.

19

 Pero  sucederá  que  si  te  olvidas  com-

pletamente  de  YHVH  tu  Dios,  y  andas 

en pos de dioses ajenos, y les sirves, y te 

postras ante ellos, hoy os advierto solem-

nemente° que habréis de perecer irremi-

siblemente.

20

 Así  como  YHVH  va  aniquilando  na-

ciones delante de vosotros, así pereceréis 

vosotros  también,  en  pago  por  no  ha-

ber obedecido a la voz de YHVH vuestro 

Dios.

Infidelidad de Israel

9

¡Oye, Israel! Hoy pasas el Jordán para 

entrar a desposeer naciones más nu-

merosas y fuertes que tú, ciudades gran-

des y amuralladas hasta los cielos,

2

 a un pueblo grande y alto, hijos de los 

anaceos,  de  los  que  tú  conociste  y  oíste 

decir: ¿Quién se enfrentará a los hijos de 

Anac?

3

 Pero hoy sabrás que YHVH tu Dios es el 

que pasa delante de ti: Fuego consumidor, 

Él los destruirá, y Él los someterá delante 

de ti para que tú los puedas desposeer y 

exterminar  en  breve,  tal  como  YHVH  te 

habló.

4

 Cuando  YHVH  tu  Dios  los  eche  de  tu 

presencia, no pienses en tu corazón, di-

ciendo:  Por  mi  justicia  me  introdujo 

YHVH para poseer esta tierra; porque de-

bido a la perversidad de estas naciones es 

que YHVH las expulsa de delante de ti.

5

 No es por tu justicia ni por la rectitud de 

tu corazón que entras a poseer la tierra de 

ellos, sino por la perversidad de estas na-

ciones es que YHVH tu Dios las expulsa de 

delante de ti, a fin de confirmar la palabra 

que YHVH juró a tus padres: a Abraham, 

a Isaac y a Jacob.

6

 Entiende  pues  que  no  por  tu  justicia 

YHVH tu Dios te da esta buena tierra para 

heredarla,  pues  eres  un  pueblo  de  dura 

cerviz.

7

 Recuerda, no olvides° que provocaste a 

ira a YHVH tu Dios en el desierto. Desde 

el día en que saliste de la tierra de Egipto 

hasta que entrasteis en este lugar, habéis 

sido rebeldes para con YHVH.

8

 Aun en Horeb provocasteis a ira a YHVH, 

de manera que se indignó YHVH contra 

vosotros y estuvo a punto de destruiros.

9

 Cuando subí al monte a recibir las tablas 

de piedra, las tablas del pacto que YHVH 

había establecido con vosotros, permane-

cí en el monte cuarenta días y cuarenta 

noches° sin comer pan ni beber agua.

10

 Y YHVH me dio las dos tablas de piedra 

escritas con el dedo de Dios, y sobre ellas 

estaban todas las palabras que YHVH os 

había hablado en el monte, de en medio 

del fuego, el día de la asamblea.

11

 Fue al final de los cuarenta días y cua-

renta  noches  cuando  YHVH  me  dio  las 

dos tablas de piedra, las tablas del pacto.

12

 Y YHVH me dijo: Levántate, baja pron-

to de aquí, porque tu pueblo, el que sacas-

te de Egipto, se ha depravado. Pronto se 

han desviado del camino que les ordené y 

han hecho una imagen de fundición.

13

 Luego  me  habló  YHVH,  diciendo:  He 

visto a este pueblo, y he aquí es pueblo de 

dura cerviz.

14

 ¡Deja que los destruya y borre su nom-

bre de debajo de los cielos, y haré de ti una 

nación más fuerte y numerosa que ellos!

15

 Volví  pues  el  rostro  y  bajé  del  monte 

con las tablas del pacto en mis manos, y 

el monte ardía en llamas.

16

 Miré, y he aquí, habíais pecado contra 

YHVH vuestro Dios: os habíais hecho un 

becerro de fundición. ¡Pronto os apartas-

teis del camino que YHVH os había orde-

nado!

17

 Entonces  agarré  las  dos  tablas  y  las 

arrojé de mis manos, quebrándolas ante 

vuestros ojos.

18

 Luego caí postrado ante YHVH, como 

la  vez  primera,  cuarenta  días  y  cuaren-

ta noches, sin comer pan ni beber agua, 

a  causa  del  gran  pecado  que  habíais 

8.16 

→Os.13.5-6.  8.19 Lit. hoy testifico contra vostros.  9.7 Énfasis notable en la orden: recuerda… no olvides.  9.9 →Ex.24.18.


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Deuteronomio 10:13

197

cometido, haciendo lo que es malo a los 

ojos de YHVH para provocarlo a ira.

19

 Porque me aterroricé° ante la ira y la 

ardiente  indignación  con  que  YHVH  se 

había airado contra vosotros para destrui-

ros. Pero también aquella vez me escuchó 

YHVH.

20

 Asimismo  contra  Aarón  se  había  in-

dignado YHVH en gran manera para des-

truirlo, y también por Aarón oré en aquel 

tiempo.

21

 Luego tomé el objeto de vuestro peca-

do, el becerro que habíais hecho, y lo que-

mé en el fuego. Lo desmenucé moliéndolo 

muy bien, hasta dejarlo fino como polvo, 

y eché su polvo en el arroyo que descen-

día del monte.

22

 También  en  Taberá,°  en  Masah°  y  en 

Kibrot-Hatava°  seguisteis  provocando  a 

ira a YHVH.

23

 Y cuando YHVH os envió desde Cades 

Barnea,° diciendo: Subid y poseed la tie-

rra que os he dado,° os rebelasteis contra 

el dicho de YHVH vuestro Dios,° y no le 

creísteis ni escuchasteis su voz.

24

 ¡Habéis sido rebeldes a YHVH desde el 

día que os conocí!

25

 Caí  postrado,  pues,  ante  YHVH,  los 

cuarenta días y las cuarenta noches. Caí 

postrado porque YHVH dijo que os había 

de destruir.

26

 Y  oré  a  YHVH,  diciendo:  ¡Oh  Adonay 

YHVH!, no destruyas a tu pueblo y tu here-

dad que has rescatado con tu grandeza, y a 

quienes sacaste de Egipto con mano fuerte.

27

 Acuérdate de tus siervos, de Abraham, 

Isaac y Jacob. No mires la dureza de este 

pueblo, ni su perversidad, ni su pecado.

28

 No sea que los de la tierra de donde nos 

sacaste digan: Por cuanto no pudo YHVH 

introducirlos  en  la  tierra  que  les  había 

prometido,  o  porque  los  aborrecía,  los 

sacó para hacerlos morir en el desierto.

29

 Pues ellos son tu pueblo y tu heredad, 

que Tú sacaste con tu gran poder y con tu 

brazo extendido.

Las segundas tablas de la Ley

10

En  aquel  tiempo  me  dijo  YHVH: 

Lábrate dos tablas de piedra, como 

las primeras, y sube a mí al monte, y haz-

te un arca de madera.

2

 Y Yo escribiré sobre esas tablas las pala-

bras que había sobre las primeras tablas 

que quebraste, y las pondrás en el arca.

3

 Entonces  hice  un  arca  de  madera  de 

acacia,  labré  dos  tablas  de  piedra  como 

las primeras, y subí al monte con las dos 

tablas en mi mano.

4

 Él  escribió  sobre  las  tablas,  conforme 

a  la  primera  escritura,  los  Diez  Manda-

mientos que YHVH os había hablado en 

el monte, de en medio del fuego, el día de 

la asamblea. Y YHVH me las entregó.

5

 Luego volví y bajé del monte, y puse las 

tablas en el arca que había hecho. Y allí 

están, como me ordenó YHVH.

6

 (Después  los  hijos  de  Israel  partieron 

desde Beerot-beney-Jaacan hacia Moser, y 

allí murió Aarón,° y allí fue sepultado; y 

Eleazar su hijo fue constituido sumo sa-

cerdote en lugar suyo.

7

 De allí partieron a Gudgod, y de Gudgod 

a Jotbat, tierra de torrentes de aguas.)

8

 En aquel tiempo YHVH separó la tribu 

de Leví° para transportar el Arca del pacto 

de YHVH, a fin de que estuviera en pre-

sencia de YHVH para ministrarle y bende-

cir en su Nombre, hasta este día,

9

 por lo cual Leví no tuvo porción ni he-

rencia  con  sus  hermanos:  YHVH  es  su 

herencia,  como  YHVH  tu  Dios  le  había 

hablado.

10

 En cuanto a mí, permanecí en el mon-

te como los primeros días, cuarenta días 

y  cuarenta  noches,°  y  también  esta  vez 

YHVH  me  escuchó,  y  renunció  YHVH  a 

destruirte,

11

 así  que  me  dijo  YHVH:  ¡Levántate! 

Ponte en marcha delante del pueblo para 

que entren y posean la tierra que juré que 

les daría a sus padres.

12

 Y ahora Israel, ¿qué te pide YHVH tu 

Dios,  sino  que  temas  a  YHVH  tu  Dios, 

que andes en todos sus caminos, y que lo 

ames, y sirvas a YHVH tu Dios con todo tu 

corazón y con toda tu alma,

13

 guardando  los  mandamientos  de 

YHVH  y  sus  estatutos  que  te  prescribo 

hoy para provecho tuyo?

9.19 

→He.12.21.  9.22  →Nm.11.3.  9.22  →Ex.17.7.  9.22  →Nm.11.34.  9.23  →Nm.13.17.  9.23  →Dt.1.21.  9.23  →Nm.13.31; 

Dt.1.26; He.3.16. 

10.6 

→Nm.20.28; 33.38.  10.8 →Nm.3.5-8.  10.10 →Ex.34.28. 


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Deuteronomio 10:14

198

14

 He aquí, de YHVH tu Dios son los cie-

los,  y  los  cielos  de  los  cielos,  la  tierra  y 

cuanto hay en ella.

15

 Solamente  de  tus  padres  se  agradó 

YHVH para amarlos, y escogió a su poste-

ridad después de ellos, a vosotros, de entre 

todos los pueblos, como veis en este día.

16

 Circuncidad,  pues,  el  prepucio  de 

vuestro  corazón,  y  no  endurezcáis  más 

vuestra cerviz,

17

 porque YHVH vuestro Dios es Dios de 

dioses  y  Señor  de  señores,  Dios  grande, 

poderoso y terrible, que no hace favoritis-

mo° ni admite soborno,

18

 que  hace  justicia  al  huérfano  y  a  la 

viuda,  y  ama  al  extranjero,  dándole  pan 

y vestido.

19

 Amaréis pues al extranjero, porque ex-

tranjeros fuisteis vosotros en la tierra de 

Egipto.

20

 Temerás  a  YHVH  tu  Dios,  a  Él  servi-

rás, a Él te aferrarás, y solamente° por su 

Nombre jurarás.

21

 Él es el objeto° de tu alabanza; Él es tu 

Dios, que ha hecho contigo estas grande-

zas y las cosas portentosas que han visto 

tus ojos.

22

 Con setenta personas° tus padres des-

cendieron a Egipto, pero ahora YHVH tu 

Dios  te  ha  hecho  como  las  estrellas  del 

cielo° en multitud.

Beneficios de amar a Dios

11

Amarás  pues  a  YHVH  tu  Dios,  y 

guardarás siempre su precepto, sus 

estatutos, sus decretos y sus mandamien-

tos.

2

 Considerad hoy (porque no es con vues-

tros hijos, que no los han conocido ni los 

han visto) la corrección de YHVH vuestro 

Dios:  su  grandeza,  su  mano  fuerte  y  su 

brazo extendido,

3

 sus  señales  y  sus  hazañas  que  hizo  en 

medio de Egipto, respecto a Faraón, rey 

de Egipto, y a toda su tierra.°

4

 Lo que hizo al ejército de Egipto, a sus 

caballos  y  a  sus  carros,  sobre  los  cuales 

hizo  precipitar  las  aguas  del  Mar  Rojo 

mientras  ellos  os  perseguían,°  y  YHVH 

los destruyó hasta este día.

5

 Lo que hizo con vosotros en el desierto, 

hasta vuestra llegada a este lugar.

6

 Lo que hizo con Datán y Abiram, hijos de 

Eliab ben Rubén: cómo, en medio de todo 

Israel, la tierra abrió su boca y se los tragó 

a ellos y a sus casas,° a sus tiendas y a toda 

la servidumbre que estaba a sus pies.°

7

 Porque  son  vuestros  propios  ojos  los 

que han visto toda la gran obra que hizo 

YHVH.

8

 Guardad pues todo el mandamiento que 

yo os ordeno hoy, para que seáis fuertes, 

y entréis y poseáis la tierra donde vais a 

pasar para conquistarla.

9

 Para  que  prolonguéis  los  días  sobre  la 

tierra  que  YHVH  juró  a  vuestros  padres 

que les daría a ellos y a su simiente, tierra 

que mana leche y miel.

10

 Porque la tierra a la cual entras para 

poseerla, no es como la tierra de Egipto, 

de  donde  salisteis,  donde  sembrabas  tu 

semilla y regabas con tu pie,° como huer-

to de hortaliza.

11

 Sino que la tierra que pasáis a poseer 

es  una  tierra  de  montes  y  planicies  que 

se abreva con las aguas de la lluvia de los 

cielos.

12

 Es una tierra que YHVH tu Dios cuida. 

Los ojos de YHVH tu Dios están siempre 

sobre ella, desde el principio del año has-

ta el final del año.

13

 Y sucederá que, si obedecéis diligente-

mente mis mandamientos que yo os or-

deno hoy, amando a YHVH vuestro Dios, 

y sirviéndole con todo vuestro corazón y 

con toda vuestra alma,

14

 daré° la lluvia de vuestra tierra en su 

época, temprana y tardía, y recogerás tu 

grano, tu mosto y tu aceite.

15

 Daré también hierba en tu campo para 

tu ganado, y comerás, y te hartarás.

16

 ¡Guardaos!,  no  sea  que  vuestro  cora-

zón sea seducido y os apartéis, y sirváis a 

dioses ajenos, y os postréis ante ellos,

10.17 Lit. no alza rostro

→Hch.10.34; Ro.2.11; Gá.2.6; Ef.6.9.  10.20 .solamente.  10.21 .objeto.  10.22 heb. nefesh = alma

Prob. se refiera a que las setenta personas estaban unidas como una sola alma 

→Gn.46.27; Ex.1.5.  10.22 →Gn.15.5; 22.17. 

11.3 

→Ex.7.8-12.13.  11.4  →Ex.14.28.  11.6  Es  decir,  a  los  miembros  de  su  familia.  11.6  Es  decir,  que  le  pertenecía

→Nm.16.31-32.  11.10 Regabas con tu pie. Se refiere a la costumbre en la que el labrador abría o cerraba el cauce de agua al 

bloquear los surcos de riego con el pie. 

11.14 Nótese el cambio en la interlocución. En el v. 13 habla Moisés, desde aquí hasta 

el v. 15, habla Dios. 


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Deuteronomio 12:7

199

17

 porque entonces° la ira de YHVH arde-

rá contra vosotros, y cerrará los cielos y 

no habrá lluvia, y el suelo no dará su fru-

to, y pronto pereceréis en la buena tierra 

que os da YHVH.°

18

 Por tanto, pondréis éstas mis palabras 

sobre  vuestro  corazón  y  sobre  vuestra 

alma, y las ataréis por señal sobre vuestra 

mano, y vendrán a ser como frontales en-

tre vuestros ojos.°

19

 Las  enseñaréis  a  vuestros  hijos,  ha-

blando de ellas, ya sea sentado en tu casa, 

o andando por el camino, al acostarte y al 

levantarte.

20

 Las escribirás en las jambas de tu casa 

y en tus pórticos,°

21

 para  que  vuestros  días  y  los  días  de 

vuestros  hijos  se  multipliquen  sobre  la 

tierra  que  YHVH  juró  a  vuestros  padres 

que les daría, como los días de los cielos 

sobre la tierra.

22

 Porque  si  guardáis  diligentemente 

todo este mandamiento que yo os ordeno 

cumplir,  amando  a  YHVH  vuestro  Dios, 

para andar en todos sus caminos, aferrán-

doos a Él,

23

 YHVH expulsará a todas estas naciones 

de  delante  de  vosotros,  y  desposeeréis  a 

naciones más grandes y más fuertes que 

vosotros.

24

 Todo lugar que pise la planta de vuestro 

pie será vuestro. Desde el desierto y el Lí-

bano, y desde el Río, el río Éufrates, hasta 

el Mar Occidental, será vuestra frontera.

25

 Nadie  podrá  resistir  ante  vosotros.° 

YHVH vuestro Dios pondrá el temor y el 

terror de vosotros sobre la faz de toda la 

tierra que piséis, tal como os habló a vo-

sotros.

26

 Mirad:  Hoy  pongo  ante  vosotros  la 

bendición y la maldición:

27

 La bendición, si escucháis los manda-

mientos de YHVH vuestro Dios que yo os 

ordeno hoy.

28

 Y  la  maldición,  si  no  escucháis  los 

mandamientos de YHVH vuestro Dios, y 

os apartáis del camino que yo os ordeno 

hoy  para  andar  en  pos  de  dioses  ajenos 

que no habéis conocido.

29

 Y  acontecerá  que  cuando  YHVH  tu 

Dios te haya introducido en la tierra a la 

cual  entras  para  poseerla,  pronunciarás 

la bendición sobre el monte Gerizim, y la 

maldición sobre el monte Ebal.°

30

 ¿No están allende el Jordán, al ponien-

te, en la tierra del cananeo que habita en 

el Arabá, frente a Gilgal, junto al encinar 

de Moré?

31

 Porque estáis por pasar el Jordán a fin de 

conquistar la tierra que YHVH vuestro Dios 

os da, y la poseeréis, y habitaréis en ella.

32

 Pondréis cuidado pues en observar to-

dos los estatutos y decretos que yo pongo 

hoy delante de vosotros.

Un solo Santuario

12

Estos son los estatutos y los decre-

tos que cuidaréis de cumplir en la 

tierra  que  YHVH,  Dios  de  tus  padres,  te 

ha dado para que la poseas todos los días 

que viváis sobre la tierra:

2

 Destruiréis  completamente  todos  los 

lugares donde las naciones que vais a des-

poseer sirven a sus dioses: sobre los mon-

tes altos, encima de las colinas y bajo todo 

árbol frondoso.

3

 Derribaréis sus altares y quebraréis sus 

estatuas,  quemaréis  al  fuego  sus  imáge-

nes de Asera y destruiréis las imágenes de 

sus dioses. Así extirparéis su nombre de 

aquel lugar.°

4

 No  habéis  de  servir  a  YHVH  vuestro 

Dios de esa manera,

5

 sino  que  el  lugar  que  YHVH  vuestro 

Dios  escoja  entre  todas  vuestras  tribus 

para poner allí su Nombre para su mora-

da, ése buscaréis, y allá iréis.

6

 Allá  llevaréis  vuestros  holocaustos, 

vuestros sacrificios, vuestros diezmos, la 

ofrenda de vuestra mano, vuestros votos 

y vuestras ofrendas voluntarias, así como 

los  primerizos  de  vuestra  vacada  y  de 

vuestro rebaño.

7

 Allí comeréis delante de YHVH vuestro 

Dios y os regocijaréis, vosotros y vuestras 

familias, por todo lo que adquiera vuestra 

mano, aquello con que YHVH tu Dios te 

haya bendecido.

11.17  . entonces.  11.17 

→Lv.26.3-5;  Dt.7.12-16;  28.1-14.  11.18  Heb.  totafot  →6.8.  11.18-20  →Dt.6.6-9. 

11.24-25 

→Jos.1.3-5.  11.29 El monte Ebal es rocoso y casi no hay en él vegetación. Por el contrario, el monte Gerizim abunda 

en toda clase de plantas y árboles. 

→Dt.27.11-14; Jos.8.33-35.  12.3 →Dt.7.5.


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Deuteronomio 12:8

200

8

 No  habéis  de  hacer  según  todo  lo  que 

nosotros hacemos aquí en el día de hoy, 

cada uno lo que bien le parece,°

9

 pues  hasta  ahora  no  habéis  llegado  al 

descanso  ni  a  la  heredad  que  YHVH  tu 

Dios te da.

10

 Pero cuando hayáis pasado el Jordán, 

y habitéis en la tierra que YHVH vuestro 

Dios os hace heredar, y Él os haya dado 

reposo de todos vuestros enemigos alre-

dedor, y habitéis con seguridad,

11

 entonces será que al lugar que YHVH 

vuestro Dios escoja para hacer habitar en 

él su Nombre, allí llevaréis todo lo que yo 

os ordeno: vuestros holocaustos, vuestros 

sacrificios,  vuestros  diezmos,  la  ofrenda 

de  vuestra  mano  y  todo  lo  escogido  de 

vuestros  votos  que  hayáis  prometido  a 

YHVH.

12

 Entonces  os  regocijaréis  ante  YHVH 

vuestro  Dios,  vosotros,  vuestros  hijos  y 

vuestras hijas, vuestros siervos y vuestras 

siervas  y  el  levita  que  esté  en  vuestras 

ciudades, por cuanto él no tiene parte ni 

heredad con vosotros.

13

 Guárdate de no ofrecer tus holocaus-

tos en cualquier lugar que veas,

14

 sino que en el lugar que YHVH esco-

ja en una de tus tribus, allí ofrecerás tus 

holocaustos y allí harás todo lo que yo te 

ordeno.

15

 No  obstante,  podrás  sacrificar  y  co-

mer  la  carne  en  todas  tus  poblaciones, 

conforme a tu deseo, según la bendición 

que YHVH tu Dios te haya dado. Tanto el 

impuro como el limpio la podrán comer, 

como si fuera de gacela o de ciervo.

16

 Sólo que no comeréis° la sangre. Como 

las aguas la derramaréis sobre la tierra.

17

 Tampoco podrás comer dentro de tus 

ciudades el diezmo de tu grano, o de tu 

vino o de tu aceite, ni las primicias de tu 

vacada, ni de tu rebaño, ni ofrendas voti-

vas que hayas prometido, ni tus ofrendas 

voluntarias,  ni  las  ofrendas  de  tus  ma-

nos,

18

 sino que las comerás delante de YHVH 

tu Dios, en el lugar que YHVH tu Dios haya 

escogido, tú y tu hijo y tu hija, tu siervo y 

tu sierva, y el levita de tus ciudades. Y te 

regocijarás delante de YHVH tu Dios en 

toda la obra de tu mano.

19

 Cuídate de no desamparar al levita en 

todos tus días sobre tu tierra.

20

 Cuando  YHVH  tu  Dios  ensanche  tus 

fronteras como te ha prometido, y digas: 

Voy a comer carne, porque anhelas comer 

carne, entonces podrás comer toda la car-

ne que desees.

21

 Y si el lugar que YHVH tu Dios escoja 

para que habite allí su Nombre está lejos 

de  ti,  entonces  sacrificarás  de  tu  vacada 

y de tu rebaño que YHVH te haya dado, 

como te he ordenado, y dentro de tus ciu-

dades podrás comer según todo el anhelo 

de tu alma.

22

 La comerás lo mismo que se come la 

gacela y el ciervo. Podrán comerla tanto 

el impuro como el limpio.

23

 Solamente que seas firme en no comer 

sangre,° porque la sangre es la vida, y no 

comerás la vida juntamente con la carne;

24

 no la comerás; la derramarás sobre la 

tierra como las aguas.°

25

 No  comerás  de  ella,  para  que  te  vaya 

bien a ti y a tus hijos después de ti, por-

que  habrás  hecho  lo  recto  ante  los  ojos 

de YHVH.

26

 Pero  tus  cosas  consagradas,  que  te 

pertenezcan,  y  tus  ofrendas  votivas,  las 

tomarás  e  irás  al  lugar  que  YHVH  haya 

escogido,

27

 y allí ofrecerás tus holocaustos, la car-

ne y la sangre, sobre el altar de YHVH tu 

Dios.  La  sangre  de  tus  otros  sacrificios 

será derramada sobre el altar de YHVH tu 

Dios, pero podrás comer la carne.

28

 Guarda y obedece todas estas palabras 

que yo te ordeno, para que te vaya bien a 

ti y a tus hijos después de ti para siempre, 

pues  habrás  hecho  lo  bueno  y  lo  recto 

ante los ojos de YHVH tu Dios.

29

 Cuando  YHVH  tu  Dios  haya  cortado 

delante de ti a las naciones adonde tú vas 

para desposeerlas, y las hayas desposeído, 

y habites en su tierra,

30

 aún  después  que  sean  destruidas  de-

lante de ti, cuídate de no caer en lazo al ir 

en pos de ellas, y de no indagar respecto a 

sus dioses, diciendo: ¿Cómo servían estas 

12.8 Lit. lo que es recto ante sus propios ojos.  12.16 

→Gn.9.4; Lv.7.26-27; 17.10-14; 19.26; Dt.15.23.  12.23 →Hch.15.28-29. 

12.23-24 

→Lv.17.10-14.


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Deuteronomio 14:1

201

naciones a sus dioses, para que haga así 

también yo?

31

 No  harás  así  a  YHVH  tu  Dios,  porque 

ellos  hicieron  con  sus  dioses  todo  lo  que 

YHVH aborrece, pues aun a sus hijos y a sus 

hijas queman en el fuego para sus dioses.

32

 Toda la palabra que yo os ordeno cui-

daréis  de  hacerla.  No  añadirás  a  ello,  ni 

quitarás de ello.°

Contra la idolatría

13

Si en medio de ti se levanta profeta 

o  soñador  de  sueños,  y  te  da  una 

señal° o un prodigio,°

2

 aunque se cumpla tal señal o prodigio 

que  él  te  habló  diciendo:  Vayamos  tras 

dioses  ajenos  que  no  conociste,  y  sirvá-

mosles,

3

 no escucharás las palabras de ese profeta o 

de aquel soñador de sueños, porque YHVH 

vuestro Dios os está probando para saber si 

amáis a YHVH vuestro Dios con todo vues-

tro corazón y con toda vuestra alma.

4

 En pos de YHVH vuestro Dios andaréis 

y  a  Él  temeréis.  Guardaréis  sus  manda-

mientos y escucharéis su voz. A Él servi-

réis y a Él seréis fieles.

5

 Y a aquel profeta o soñador de sueños se 

le dará muerte, por cuanto aconsejó apos-

tasía contra YHVH vuestro Dios (el cual 

te sacó de la tierra de Egipto y te rescató 

de casa de servidumbre), para extraviarte 

del camino por el que YHVH tu Dios te ha 

ordenado seguir. Así extirparás el mal de 

en medio de ti.

6

 Si tu hermano, el hijo de tu propia ma-

dre,  o  tu  hijo  o  tu  hija,  o  la  mujer  que 

amas,  o  tu  amigo  entrañable,  te  llega  a 

incitar en secreto diciendo: Vamos y sir-

vamos  a  otros  dioses  (que  no  conociste, 

ni tú ni tus padres),

7

 los de los pueblos que te rodean, cerca-

nos o lejanos de ti, de un extremo de la 

tierra al otro,

8

 no  cederás  ni  lo  escucharás,  ni  tu  ojo 

tendrá compasión de él, ni lo perdonarás 

ni lo encubrirás,

9

 sino  que  ciertamente  lo  matarás.  Tu 

mano será la primera contra él para ha-

cerlo morir, y después la mano de todo el 

pueblo.

10

 A pedradas lo lapidarás hasta la muer-

te, porque él procuró extraviarte de YHVH 

tu Dios, que te sacó de la tierra de Egipto, 

de la casa de servidumbre.

11

 Entonces todo Israel oirá y temerá, y 

nunca se volverá a hacer semejante mal-

dad en medio de ti.

12

 Si en alguna de las ciudades que YHVH 

tu Dios te da para habitar, oyes decir:

13

 En medio de ti han surgido hijos de Be-

lial° que han seducido a los habitantes de 

su  ciudad,  diciendo:  Vamos  y  sirvamos  a 

otros dioses (que vosotros no conocisteis),

14

 inquirirás  e  investigarás,  y  pregunta-

rás con diligencia; y si es verdad el hecho 

que tal abominación fue cometida en me-

dio de ti,

15

 irremisiblemente  herirás  a  los  mora-

dores de esa ciudad a filo de espada, de-

dicándola al exterminio con todo lo que 

haya en ella, y también a su ganado pasa-

rás a filo de espada.

16

 Luego  juntarás  todo  su  despojo  en 

medio de su plaza y quemarás totalmente 

la ciudad con todo su despojo, todo ello 

como ofrenda encendida a YHVH tu Dios, 

y será un montón de ruinas para siempre; 

jamás será reconstruida.

17

 Nada del anatema se pegará a tu mano, 

para que YHVH se vuelva del ardor de su 

ira,  te  conceda  misericordia,  se  compa-

dezca de ti y te multiplique, como juró a 

tus antepasados,

18

 porque  habrás  obedecido  a  la  voz  de 

YHVH tu Dios guardando todos sus man-

damientos  que  yo  te  ordeno  hoy,  para 

hacer lo recto ante los ojos de YHVH tu 

Dios.

Contra las prácticas paganas

14

Hijos  sois  de  YHVH  vuestro  Dios. 

No os sajaréis ni os rasuraréis en-

tre los ojos° por causa de un muerto,°

12.32 TM y LXX sitúan este v. al principio del c. 13. 

→Dt.4.2; Ap.22.18-19.  13.1 Heb. ‘ot = señal, prenda, milagro para confir-

mar un mensaje inspirado y para animar a los que son testigos a realizar la voluntad divina. 

13.1 Heb. mofet = símbolo, portento 

enviado como señal de algún acontecimiento futuro. 

13.13 Heb. beliaal = perverso, destructor aparece 27 veces en el TM casi 

siempre en relación a hombre, mujer o hijo, de modo que la frase beney beliaal = hijos de beliaal significa hombres perversos

LXX traduce parónomos = contrario a la ley. Qumram y el NP usan el término como nombre propio 

→2 Co.6.15.  14.1 Es decir, 

las cejas. Costumbre pagana para expresar luto. 

14.1 

→Lv.19.28; 21.5.


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Deuteronomio 14:2

202

2

 porque eres un pueblo santo para YHVH 

tu Dios, y YHVH te ha escogido para que 

le seas un pueblo especial° entre todos los 

pueblos sobre la faz de la tierra.

3

 No comerás nada abominable.

4

 Estos son los animales que podréis co-

mer: el buey, el cordero y la cabra,

5

 el  ciervo,  la  gacela,  el  corzo,  la  cabra 

montesa, el íbice, el antílope y la gamuza.

6

 Y  de  los  animales  rumiantes  podéis 

comer  todo  animal  de  pezuña  hendida, 

cuya  hendidura  divida  el  casco  en  dos 

pesuños.

7

 De  los  rumiantes,  o  de  los  que  tienen 

pezuña hendida, no comeréis el camello, 

ni la liebre, ni el conejo, porque rumian, 

pero no tienen pezuña hendida. Os serán 

inmundos.

8

 Tampoco el cerdo, porque tiene pezuña 

hendida pero no rumia; os será inmundo. 

De la carne de éstos no comeréis ni toca-

réis sus cuerpos muertos.

9

 De todo lo que hay en el agua comeréis 

esto: todo lo que tiene aleta y escama lo 

comeréis,

10

 pero todo lo que no tenga aleta y esca-

ma, no lo comeréis. Os será inmundo.

11

 Comeréis toda ave limpia.

12

 Y estas son de las que no comeréis: el 

águila, el quebrantahuesos y el azor,

13

 el buitre, el halcón y el milano, según 

su especie,

14

 todo cuervo, según su especie,

15

 el avestruz y la lechuza, la gaviota y el 

gavilán, según su especie,

16

 el búho, el mochuelo y el cisne,

17

 el pelícano, el somormujo y el corve-

jón,

18

 la cigüeña y la garza, según su especie, 

la abubilla y el murciélago.

19

 También todo insecto alado os será in-

mundo, no se comerá.

20

 Comeréis toda ave limpia.

21

 No  comeréis  ninguna  bestia  muerta. 

La  podrás  dar  al  extranjero  que  está  en 

tus ciudades, y él podrá comerla, o vénde-

la al extranjero, porque tú eres un pueblo 

santo para YHVH tu Dios. No cocerás el 

cabrito en la leche de su madre.°

22

 Diezmarás°  fielmente  de  todo  el  pro-

ducto  de  tu  semilla  que  rinda  el  campo 

cada año.

23

 Y  en  el  lugar  que  escoja  para  que 

habite  allí  su  Nombre,  comerás  ante 

YHVH  tu  Dios  el  diezmo  de  tu  grano, 

de tu vino y de tu aceite, y las primicias 

de  tu  vacada  y  de  tu  rebaño,  para  que 

aprendas a temer a YHVH tu Dios todos 

los días.

24

 Pero si el camino es demasiado largo 

para ti, de manera que no puedes llevar-

lo, por estar demasiado lejos de ti el lugar 

que YHVH tu Dios escogió para poner allí 

su Nombre, cuando YHVH tu Dios te haya 

bendecido,

25

 lo  cambiarás  por  dinero,  y  tomando 

el  dinero  en  tu  mano,  irás  al  lugar  que 

YHVH tu Dios haya escogido,

26

 y  emplearás  la  plata  en  todo  lo  que 

desee  tu  alma:  en  bueyes,  en  ovejas,  en 

vino, en licor, y en todo lo que apetezca tu 

alma. Y allí comerás delante de YHVH tu 

Dios, y te regocijarás tú y tu casa.

27

 No  abandonarás  al  levita  que  esté  en 

tus ciudades, pues no posee ni porción ni 

herencia contigo.

28

 Al final de cada tercer año apartarás 

el  diezmo  de  todos  tus  productos  de 

aquel  año,  y  lo  depositarás  en  tus  ciu-

dades,

29

 y  vendrá  el  levita,  que  no  tiene  por-

ción ni herencia contigo, y el extranjero, 

el  huérfano  y  la  viuda  que  estén  en  tus 

ciudades,  y  comerán  y  se  saciarán,  a  fin 

de que YHVH tu Dios te bendiga en toda 

obra que tu mano acometa.

El año de remisión

15

Al fin de cada siete años harás re-

misión.°

2

 Y éste es el modo de la remisión: todo 

acreedor condonará lo que haya prestado 

a su prójimo, no se lo exigirá a su prójimo 

o a su hermano, porque se habrá procla-

mado la remisión de YHVH.

3

 Al  extranjero  se  lo  exigirás,  pero  tu 

mano perdonará todo lo que tu hermano 

tenga tuyo.

14.2 

→Ex.19.5-6; Dt.4.20; 7.6; 26.18; Tit.2.14; 1 P.2.9.  14.21 →Ex.23.19; 34.26.  14.22 →Lv.27.30-30; Nm.18.21.  15.1 Heb. 

shemitah de la raíz shamat = dejar caer, soltar. Esta palabra se usa para describir cómo los eunucos dejaron caer a Jezabel 

→2 R.9.33. En este caso shemitah se refiere a la liberación de deudas, o esclavitud, y al descanso de la tierra. 


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Deuteronomio 16:3

203

4

 Para que no haya en medio tuyo menes-

teroso alguno, porque YHVH te bendecirá 

abundantemente  en  la  tierra  que  YHVH 

tu Dios te da en herencia para que la po-

seas,

5

 con tal que escuches atentamente la voz 

de  YHVH  tu  Dios,  cuidando  de  cumplir 

todo este mandamiento que yo te ordeno 

hoy.

6

 Porque  YHVH  tu  Dios  te  bendecirá 

como te tiene prometido: prestarás a mu-

chas naciones pero tú no tomarás presta-

do; dominarás a muchas naciones pero a 

ti no te dominarán.

7

 Cuando haya en medio de ti menestero-

so de alguno de tus hermanos en alguna 

de tus ciudades, en la tierra que YHVH tu 

Dios te da, no endurecerás tu corazón ni 

cerrarás tu mano a tu hermano pobre,

8

 sino que le abrirás tu mano liberalmen-

te, y le prestarás con generosidad lo sufi-

ciente para la necesidad que tenga.°

9

 Guárdate  que  no  haya  en  tu  corazón 

alguna intención maligna, y te digas: Se 

acerca el año séptimo, año de remisión. Y 

mires con malos ojos a tu hermano pobre 

para no darle, y clame contra ti a YHVH, y 

sea en ti pecado.

10

 Sin falta le darás, y tu corazón no será 

mezquino cuando le des, porque a causa 

de esto, YHVH tu Dios te bendecirá en to-

das tus obras y en todo lo que emprenda 

tu mano.

11

 Porque nunca dejará de haber pobres 

en la tierra.° Por eso yo te ordeno, dicien-

do: Abrirás generosamente tu mano a tu 

hermano: a tu gente° pobre y menestero-

sa de tu tierra.

12

 Si  tu  hermano,  hebreo  o  hebrea,  se 

vende a ti, te servirá por seis años, pero al 

séptimo año lo dejarás ir libre de tu lado.

13

 Y cuando lo dejes ir libre de tu lado, no 

lo enviarás vacío,

14

 sino que lo abastecerás generosamen-

te de tu rebaño, de tu era y tu lagar: Le 

darás  de  aquello  con  que  YHVH  te  haya 

bendecido.

15

 Y recordarás que fuiste esclavo en tie-

rra de Egipto, y que YHVH tu Dios te res-

cató. Por eso te ordeno esto hoy.

16

 Pero si sucede que, por cuanto te ama 

a  ti  y  a  tu  casa,  y  le  va  bien  contigo,  te 

dice: No me iré de tu lado;

17

 entonces  tomarás  el  punzón  y  hora-

darás su oreja contra la puerta, y será tu 

siervo para siempre; lo mismo harás con 

tu sierva.

18

 No te parezca duro dejarlo libre, por-

que por la mitad del jornal de un jornale-

ro te sirvió seis años; y YHVH tu Dios te 

bendecirá en todo lo que hagas.°

19

 Dedicarás  a  YHVH  tu  Dios  todo  pri-

merizo  macho  nacido  de  tu  vacada  y  de 

tu rebaño.° No te sirvas del primerizo de 

tu vacada, ni trasquiles el primerizo de tu 

rebaño.

20

 Te los comerás en presencia de YHVH 

tu Dios, de año en año, tú y tu casa, en el 

lugar que YHVH haya escogido.

21

 Y si hay en él algún defecto, ceguera 

o cojera, o cualquier defecto serio, no lo 

sacrificarás a YHVH tu Dios.

22

 Te  lo  comerás  en  tus  ciudades,  y  po-

drán comer de él tanto el impuro como el 

limpio, como si fuera de gacela o ciervo.

23

 Sólo  que  no  has  de  comer  su  san-

gre;° la derramarás sobre la tierra como 

aguas.

Principales solemnidades

16

Guarda  el  mes  de  Abib°  y  haz  la 

Pascua°  para  YHVH  tu  Dios,  por-

que en el mes de Abib te sacó YHVH tu 

Dios de Egipto, de noche.

2

 Sacrificarás pues la Pascua a YHVH tu 

Dios de tus ovejas y de tu ganado vacuno, 

en el lugar que YHVH haya escogido para 

hacer habitar allí su Nombre.

3

 No comerás con ella nada leudado. Sie-

te  días  comerás  con  ella  panes  ázimos,° 

pan de aflicción, para que recuerdes todos 

los días de tu vida el día que saliste de la 

tierra  de  Egipto,  pues  apresuradamente 

saliste de la tierra de Egipto.

15.7-8 

→Lv.25.35.  15.11  →Mt.26.11;  Mr.14.7;  Jn.12.8.  15.11  .gente.  15.12-18  →Lv.25.39-46.  15.19  →Ex.13.12. 

15.23 

→Gn.9.4; Lv.7.26-27; 17.10-14; 19.26; Dt.12.16,23.  16.1 Abib es el nombre del primer mes del calendario judío que 

corresponde a los meses de marzo-abril. Después del exilio babilónico, su nombre fue cambiado a Nisan. Es un mes pleno, es 

decir de 30 días, a diferencia de los meses defectivos, de 29 días, según la alteración mensual para mantener el calendario lunar. 

16.1 Heb. pesaj, proviene de la raíz pasaj = pasar de lado

→Ex.12.1-20; Lv.23.5-8; Nm.28.16-25.  16.3 Heb. matsot = tortas 

bollos hechos sin levadura. 


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Deuteronomio 16:4

204

4

 Durante siete días no se hallará levadu-

ra en tu casa, en ningún lugar de tu te-

rritorio. De la carne que sacrifiques en el 

atardecer del primer día, no quedará nada 

para la mañana siguiente.

5

 No podrás sacrificar la Pascua en cual-

quiera de las ciudades° que YHVH tu Dios 

te da,

6

 sino que en el lugar que YHVH tu Dios 

escoja para hacer habitar su Nombre, allí 

sacrificarás  la  Pascua,  al  atardecer,  a  la 

puesta del sol, en el tiempo señalado en 

que saliste de Egipto.

7

 Y la asarás y la comerás en el lugar que 

YHVH tu Dios haya escogido. Luego, por 

la mañana, partirás e irás a tu tienda.

8

 Seis  días  comerás  panes  ázimos,  y  el 

séptimo día será asamblea° solemne para 

YHVH tu Dios. Ninguna obra harás.

9

 Contarás siete semanas, comenzando a 

contar  las  siete  semanas  desde  que  em-

piece la hoz en la mies.

10

 Entonces celebrarás la solemnidad de 

las Semanas° en honor de YHVH tu Dios. 

Darás una ofrenda voluntaria de tu mano, 

según te haya bendecido YHVH tu Dios.

11

 Y te regocijarás en presencia de YHVH 

tu Dios, tú y tu hijo y tu hija, tu siervo y 

tu sierva, el levita que esté dentro de tus 

ciudades,  el  extranjero,  el  huérfano  y  la 

viuda que estén en medio de ti, en el lu-

gar que YHVH tu Dios escoja para hacer 

habitar allí su Nombre.

12

 Recuerda  que  fuiste  esclavo  en  Egip-

to; por tanto, guardarás y cumplirás estos 

preceptos.

13

 Cuando hayas hecho la recolección de 

tu era y de tu lagar, celebrarás la solem-

nidad de los Tabernáculos° durante siete 

días.

14

 Y te regocijarás en tus solemnidades, 

tú y tu hijo y tu hija, tu siervo y tu sier-

va, el levita, el extranjero, el huérfano y la 

viuda que estén dentro de tus ciudades.

15

 Siete  días  celebrarás  para  YHVH  tu 

Dios en el lugar que YHVH haya escogido, 

pues YHVH tu Dios te habrá bendecido en 

toda tu cosecha y en toda obra de tus ma-

nos, y estarás verdaderamente alegre.

16

 Cada  año,  todo  varón  tuyo  compare-

cerá tres veces ante YHVH tu Dios, en el 

lugar  que  haya  escogido,  en  la  solemni-

dad  de  los  Ázimos,  en  la  solemnidad  de 

las Semanas, y en la solemnidad de los Ta-

bernáculos. No se presentará con manos° 

vacías delante de YHVH.

17

 Cada uno dará lo que pueda, conforme 

a la bendición que YHVH tu Dios te haya 

dado.

18

 En  todas  las  ciudades  que  YHVH  tu 

Dios te dé para tus tribus, pondrás jueces 

y oficiales, y juzgarán al pueblo con juicio 

recto.

19

 No torcerás el juicio, no tendrás favo-

ritismos° ni recibirás soborno, porque el 

soborno ciega los ojos de los sabios, y per-

vierte las palabras de los justos.°

20

 La  justicia,  sólo  la  justicia  seguirás, 

para que vivas y poseas la tierra que YHVH 

tu Dios te da.

21

 No plantarás para ti Asera,° de ningu-

na clase de árbol junto al altar de YHVH 

tu Dios, que harás para ti,

22

 ni te erigirás estatua:° cosas que YHVH 

tu Dios aborrece.

Apostasía, causas graves y deberes del rey

17

No  sacrificarás  a  YHVH  tu  Dios 

bueyes  o  corderos  mutilados  o 

deformes,  porque  es  abominación  para 

YHVH tu Dios.

2

 Si en alguna de las ciudades que YHVH 

tu Dios te da, se halla en medio de ti algún 

hombre  o  mujer  que  hace  lo  malo  ante 

YHVH tu Dios, quebrantando su pacto,

3

 dando culto a dioses ajenos y postrán-

dose ante ellos,° o ante el sol, o la luna, o 

el ejército de los cielos, y hace lo que Yo 

he prohibido,

4

 y te los denuncian o te enteras, indagarás 

diligentemente, y si resulta cierto que se 

ha cometido abominación tal en Israel,

16.5 Lit. puertas.  16.8 Heb. atséret, del verbo atsar = restringir, encerrar, detener. Las acciones eran exclusivamente con pro-

pósitos religiosos. 

16.10 Heb. shavuot = semanas. Solemnidad que se celebraba el 6 de Siván, cincuenta días después de la 

Pascua. Es, pues, la solemnidad de Pentecostés. Según la tradición judía, Moisés recibió la Ley en esta ocasión. 

→Lv.23.15-21; 

Nm.28.26-31. 

16.13 Heb. Sucot = cabañas, tabernáculos. El 15 de Tishri, se conmemoraban los preparativos para la salida de Egip-

to, la vida en el desierto, y la cosecha. 

→Lv.23.33-36, 39-43; Nm.29.12-38.  16.16 .manos.   16.19 Lit. no reconocerás rostros

16.19 

→Ex.23.6-8; Lv.19.15.  16.21 Se refiere a los postes o pilares dedicados a Asera, diosa cananea de la fecundidad. 

→Ex.34.13.  16.22 →Lv.26.1.  17.3 →Ex.22.20.


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Deuteronomio 18:7

205

5

 sacarás a tus puertas° a ése o ésa, al tal 

hombre o a la tal mujer que cometieron esa 

mala acción, y lapidarás con piedras a ese 

hombre o a esa mujer para que mueran.

6

 Por  declaración  de  dos  o  tres  testigos 

será condenado a muerte el que deba mo-

rir. No podrá ser muerto por boca de sólo 

un testigo.°

7

 La  mano  de  los  testigos  será  primero 

contra él para hacer que muera, y después 

la mano de todo el pueblo. Así extirparás 

el mal en medio de ti.

8

 Si te resulta demasiado difícil juzgar al-

gún asunto en tus ciudades, entre sangre 

y sangre, entre causa y causa, entre lesión 

y lesión, o en asuntos de pleitos, enton-

ces  te  dispondrás  y  subirás  al  lugar  que 

YHVH tu Dios haya escogido.

9

 E irás a los sacerdotes levitas y al juez 

que haya en aquellos días, y consultarás, y 

te indicarán la sentencia del juicio.

10

 Entonces  actuarás  según  la  sentencia 

que te hayan declarado desde aquel lugar 

que YHVH haya escogido, y cuidarás de ha-

cer conforme a cuanto te hayan indicado.

11

 Actuarás según la ley que ellos te ins-

truyan, y según el juicio que te digan. No 

te apartarás ni a derecha ni a izquierda de 

la sentencia que te declaren.

12

 El varón que proceda con soberbia, no 

obedeciendo al sacerdote establecido allí 

para servir a YHVH tu Dios, o al juez, tal 

hombre morirá. Así extirparás el mal en 

medio de Israel.

13

 Y todos los del pueblo oirán y temerán, 

y no procederán más con soberbia.

14

 Cuando entres en la tierra que YHVH 

tu Dios te da, y la tengas en posesión y ha-

bites en ella, y digas: Quiero poner sobre 

mí un rey, como todas las naciones que 

están en mis alrededores,°

15

 solamente podrás poner rey sobre ti a 

aquel  que  YHVH  tu  Dios  haya  escogido. 

Pondrás por rey sobre ti a uno de entre 

tus hermanos. No podrás poner sobre ti a 

un extranjero que no sea hermano tuyo.

16

 Sólo  que  él  no  debe  aumentar  para 

sí  caballos,°  ni  haga  volver  al  pueblo  a 

Egipto para multiplicar caballos, porque 

YHVH  os  ha  dicho:  No  volveréis  nunca 

por ese camino.

17

 No  aumentará  para  sí  mujeres,  para 

que su corazón no se desvíe,° ni acumu-

lará para sí mucha plata y oro.°

18

 Y sucederá que, cuando se siente sobre 

el trono de su reino, escribirá para sí una 

copia de esta Ley en un rollo, en presen-

cia de los sacerdotes levitas.

19

 Y lo tendrá consigo y leerá en él todos 

los días de su vida, a fin de que aprenda a 

temer a YHVH su Dios, guardando todas 

las palabras de esta Ley y de estos estatu-

tos para cumplirlos.

20

 A fin de que su corazón no se eleve so-

bre sus hermanos, y no se aparte del man-

damiento ni a derecha ni a izquierda, para 

que él y sus hijos prolonguen sus días en 

su reino en medio de Israel.

Manutención de los levitas 

Profetas verdaderos y falsos

18

Los  sacerdotes  levitas,  toda  la  tri-

bu de Leví, no tendrán porción ni 

heredad  con  el  resto  de  Israel.  Se  man-

tendrán de las ofrendas ígneas a YHVH y 

comerán de la heredad de Él.

2

 No tendrán herencia entre sus herma-

nos.  YHVH  es  su  herencia,  como  se  lo 

tiene dicho.°

3

 Éste pues será el derecho de los sacer-

dotes de parte del pueblo, de parte de los 

que ofrecen como sacrificio buey o corde-

ro: Se dará al sacerdote la espaldilla, las 

quijadas y el cuajar.

4

 Le darás las primicias de tu grano, de tu 

vino, de tu aceite, y del primer esquileo 

de tus ovejas.

5

 Porque  YHVH  tu  Dios  lo  ha  escogido 

a él y a sus hijos de entre todas tus tri-

bus, para que ministren en el nombre de 

YHVH para siempre.

6

 Cuando un levita salga de alguna de tus 

ciudades, de cualquier parte en Israel don-

de resida, y llegue con todo el deseo de su 

alma al lugar que YHVH haya escogido,

7

 él ministrará en el nombre de YHVH su 

Dios  como  cualquiera  de  sus  hermanos 

levitas que están allí delante de YHVH.

17.5  Esto  es,  las  puertas  de  la  ciudad.  Plaza  en  donde  se  celebraban  los  juicios.  17.6 

→Nm.35.30;  Dt.19.15;  Mt.18.16; 

2 Co.13.1; 1 Ti.5.19; He.10.28. 

17.14 

→1 S.8.5.  17.16 →1 R.10.28; 2 Cr.1.16; 9.28.  17.17 →1 R.11.1-8.  17.17 →1 R.10.27; 

2 Cr.1.17; 9.27. 

18.2 

→Nm.18.20.


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Deuteronomio 18:8

206

8

 Comerán porciones iguales, aparte de la 

venta de sus patrimonios familiares.

9

 Cuando entres en la tierra que YHVH tu 

Dios te da, no aprenderás a hacer las co-

sas abominables de aquellas naciones.

10

 No  sea  hallado  en  ti  nadie  que  haga 

pasar a su hijo o a su hija por el fuego, 

ni quien practique adivinación, ni hechi-

cería,° esto es, que sea sortílego o hechi-

cero,°

11

 ni encantador, ni médium° o mago, ni 

evocador de muertos.

12

 Porque cualquiera que hace estas co-

sas  es  abominable  a  YHVH,  y  por  causa 

de esas abominaciones YHVH tu Dios los 

expulsa de delante de ti.

13

 Perfecto  serás  delante  de  YHVH  tu 

Dios.°

14

 Porque  estas  naciones  que  vas  a  des-

poseer, escuchan a brujos y a hechiceros, 

pero a ti no te ha permitido esto YHVH 

tu Dios.

15

 YHVH tu Dios te levantará un profeta 

como yo de en medio de ti, de entre tus 

hermanos. A él escucharéis.°

16

 Conforme  a  todo  lo  que  pediste  a 

YHVH tu Dios en Horeb el día de la asam-

blea, diciendo: No vuelva yo a escuchar la 

voz de YHVH mi Dios, ni vea yo más este 

gran fuego, para que no muera.

17

 Entonces YHVH me dijo: Bien está lo 

que han hablado.

18

 Profeta  les  levantaré  de  en  medio  de 

sus hermanos, como tú, y pondré mis pa-

labras en su boca, y él les hablará todo lo 

que Yo le ordene.

19

 Y sucederá que cualquiera que no obe-

dezca a mis palabras que él hablará en mi 

Nombre, Yo mismo le pediré cuentas de 

ello.°

20

 Pero  el  profeta  que  tenga  la  presun-

ción de hablar en mi Nombre palabra que 

Yo no le haya mandado decir, o que hable 

en nombre de otros dioses, el tal profeta 

morirá.

21

 Y si preguntas en tu corazón: ¿Cómo 

podremos  conocer  la  palabra  que  no  ha 

hablado YHVH?

22

 Cuando  el  profeta  hable  en  nombre 

de  YHVH,  y  lo  que  dijo  no  suceda  ni  se 

verifique,  es  palabra  que  no  ha  hablado 

YHVH.  Con  presunción  la  habló  el  tal 

profeta, no tengas temor de él.

Ciudades de refugio 

Procedimientos judiciales

19

Cuando  YHVH  tu  Dios  haya  des-

truido  las  naciones  cuya  tierra 

YHVH tu Dios te da, y tú las hayas despla-

zado, y habites en sus ciudades y en sus 

casas,

2

 te  reservarás  tres  ciudades°  en  medio 

de  la  tierra  que  YHVH  tu  Dios  te  da  en 

posesión.

3

 Prepararás  el  camino  de  acceso,  y  di-

vidirás  en  tres  partes  el  territorio  de  tu 

tierra que YHVH tu Dios te hace heredar, 

para que huya allí todo homicida.

4

 Y este será el caso del homicida que se 

refugie allá para salvar la vida: quien mate 

a su prójimo sin intención, y sin que lo 

haya aborrecido anteriormente.

5

 Tal como el que va con su prójimo al bos-

que a cortar leña, y al blandir con su mano 

el hacha para cortar el árbol, el hierro se 

desprende del mango y alcanza a su próji-

mo, y muere. Ése podrá huir a cualquiera 

de esas ciudades para conservar la vida,

6

 no sea que el vengador de la sangre per-

siga al homicida, mientras esté enardeci-

do su corazón, y, por ser largo el camino, 

lo alcance y le quite la vida, no siendo él 

digno  de  muerte  ya  que  no  lo  aborrecía 

anteriormente.

7

 Por tanto yo te ordeno, diciendo: te re-

servarás tres ciudades,

8

 y si YHVH tu Dios ensancha tus fronte-

ras, tal como lo juró a tus padres, y te da 

toda la tierra que habló a tus padres que 

te daría,

9

 si  guardas  todos  estos  mandamientos 

que  yo  te  ordeno  hoy  para  ponerlos  por 

obra, amando a YHVH tu Dios y andando 

en  sus  caminos  todos  los  días,  entonces 

te podrás agregar tres ciudades más sobre 

aquellas tres.

10

 Así  no  se  verterá  sangre  inocente  en 

medio de tu tierra que YHVH tu Dios te 

da en herencia, ni recaerá sobre ti sangre 

alguna.

18.10 

→Lv.19.26.  18.10  →Ex.22.18.  18.11  →Lv.19.31.  18.13  →Mt.5.48.  18.15  →Hch.3.22;  7.37.  18.19  →Hch.3.23. 

19.2 

→Jos.20.1-9.


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Deuteronomio 20:16

207

11

 Pero cuando haya alguno que aborrez-

ca a su prójimo y lo aceche, y levantán-

dose  contra  él  lo  hiera  mortalmente,  de 

modo que muera; y huya a una de aque-

llas ciudades,

12

 en tal caso, los ancianos de su ciudad 

enviarán a prenderlo de allí y lo entregarán 

al vengador de la sangre para que muera.

13

 No se compadecerá tu vista de él. Así 

limpiarás  de  Israel  la  sangre  inocente, 

para que te vaya bien.

14

 No  desplazarás  el  lindero  de  tu  veci-

no,° que fijaron tus antecesores, en la he-

rencia que has de poseer, en la tierra que 

YHVH tu Dios te da en posesión.

15

 En cualquier caso de pecado, culpa o 

delito que se haya cometido, el testimo-

nio de uno solo no bastará contra nadie. 

Sólo  por  la  deposición  de  dos  testigos  o 

tres testigos se podrá fallar una causa.°

16

 Cuando surja contra alguien un testi-

go de cargo para acusarlo de una trans-

gresión,

17

 los  dos  hombres  que  tienen  el  litigio 

se presentarán ante YHVH, delante de los 

sacerdotes y jueces que haya en aquellos 

días.

18

 Los  jueces  indagarán  bien.  Si  resulta 

que aquel testigo es un testigo falso, y que 

ha calumniado a su hermano,

19

 le harás lo que él intentaba hacer a su 

hermano. Así extirparás el mal de en me-

dio de ti,

20

 y los demás, al enterarse, escarmenta-

rán y no volverán a cometer maldad se-

mejante entre los tuyos.

21

 No le tendrás compasión: vida por vida, 

ojo por ojo, diente por diente,° mano por 

mano, pie por pie.

Normas de guerra

20

Cuando  salgas  a  la  guerra  contra 

tus  enemigos,  y  veas  caballos  y 

carros y gente más numerosa que tú, no 

tengas  temor  de  ellos,  porque  YHVH  tu 

Dios está contigo, el mismo que te hizo 

subir de la tierra de Egipto.

2

 Y será que cuando os acerquéis para en-

tablar combate, el sacerdote se adelantará 

para arengar al pueblo,

3

 y les dirá: Oye, oh Israel: Hoy vosotros 

presentáis batalla al enemigo. No desma-

ye vuestro corazón. No temáis, ni os aco-

bardéis, ni tembléis ante ellos,

4

 porque YHVH vuestro Dios avanza a vues-

tro lado, luchando a vuestro favor contra 

vuestros enemigos, para daros la victoria.°

5

 Después los oficiales hablarán al pueblo, 

diciendo: Quien haya edificado una casa y 

no la haya estrenado, que se retire y vuel-

va a su casa, no sea que muera en comba-

te, y la estrene otro.

6

 Quien  haya  plantado  una  viña  y  no  la 

haya  vendimiado  todavía,  que  se  retire 

y vuelva a su casa, no sea que muera en 

combate, y la vendimie otro.

7

 Quien esté comprometido con una mu-

jer, y aún no la ha poseído, que se retire 

y vuelva a su casa, no sea que muera en 

combate, y algún otro la posea.

8

 Y los oficiales volverán a hablar al pue-

blo,  y  dirán:  Quien  tenga  temor  y  esté 

acobardado,  que  se  retire  y  vuelva  a  su 

casa, no sea que contagie su cobardía al 

corazón de sus hermanos.

9

 Y cuando los oficiales hayan terminado 

de arengar al pueblo, designarán a los jefes 

de huestes que encabezarán al pueblo.

10

 Cuando  te  acerques  para  atacar  una 

ciudad, primero proponle la paz.

11

 Y  si  te  responde:  Paz,  y  te  abre  las 

puertas, todos sus habitantes te servirán 

en trabajos forzados.

12

 Pero si no acepta tu propuesta de paz y 

entabla batalla contra ti, entonces le pon-

drás sitio,

13

 y cuando YHVH tu Dios la entregue en 

tu poder, matarás a filo de espada a todos 

sus varones.

14

 Y tomarás para ti las mujeres, los ni-

ños,  el  ganado  y  todo  lo  que  haya  en  la 

ciudad, todo su botín, y te alimentarás del 

botín de tus enemigos, los cuales YHVH 

tu Dios te entregó.

15

 Así harás a todas las ciudades que es-

tén  muy  lejos  de  ti,  que  no  sean  de  las 

ciudades de estas naciones.

16

 Pero de las ciudades de estos pueblos 

que YHVH tu Dios te da por herencia, no 

dejarás con vida a ninguna persona.

19.14 

→Dt.27.17.  19.15 →Nm.35.30; Dt.17.6; Mt.18.16; 2 Cr.13.1; 1 Ti.5.19; He.10.28.  19.21 →Ex.21.23-25; Lv.24.19-20; 

Mt.5.38. 

20.4 Lit. para salvaros.


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Deuteronomio 20:17

208

17

 Dedicarás  al  exterminio  al  heteo,  al 

amorreo, al cananeo, al ferezeo, al heveo 

y  al  jebuseo,  como  YHVH  tu  Dios  te  ha 

mandado,

18

 a  fin  de  que  no  os  enseñen  a  imitar 

todas las abominaciones que cometen en 

honor de sus dioses, y así pequéis contra 

YHVH vuestro Dios.

19

 Si  tienes  que  sitiar  largo  tiempo  una 

ciudad  antes  de  tomarla  por  asalto,  no 

destruyas su arbolado a hachazos, porque 

comes de sus frutos. No los tales, porque 

los  árboles  del  campo  no  son  hombres 

para que los trates como a los sitiados.

20

 Sólo  el  árbol  que  tú  sabes  que  no  es 

un árbol frutal, lo podrás destruir y talar 

para construir con él obras de asedio con-

tra la ciudad que te hace la guerra, hasta 

que la derribes.

Prescripciones varias

21

Si  en  la  tierra  que  YHVH  tu  Dios 

te da para que la poseas, es hallado 

alguien  asesinado,  tendido  en  el  campo, 

sin que se sepa quién lo asesinó,

2

 entonces saldrán tus ancianos y tus jue-

ces y medirán la distancia a las ciudades 

que circundan a la víctima,

3

 y será que la ciudad más próxima al ca-

dáver, los ancianos de esa ciudad, toma-

rán una becerra de la vacada, con la cual 

no se ha trabajado, ni haya llevado yugo,

4

 y los ancianos de aquella ciudad harán 

bajar la becerra a un arroyo de corrientes 

permanentes, donde nunca se haya arado 

ni sembrado, y allí, en el arroyo, desnuca-

rán la becerra.

5

 Entonces  se  acercarán  los  sacerdotes 

hijos de Leví (que YHVH tu Dios escogió 

para que le sirvan y bendigan en nombre 

de YHVH) por cuya decisión se ha de re-

solver todo litigio y toda contusión,

6

 y todos los ancianos de aquella ciudad, 

la  más  cercana  al  cadáver,  lavarán  sus 

manos sobre la becerra desnucada en el 

arroyo,

7

 y declararán, diciendo: Nuestras manos 

no han derramado esta sangre, ni nues-

tros ojos lo han visto.

8

 ¡Haz  expiación,  oh  YHVH,  a  tu  pueblo 

Israel,  al  cual  redimiste,  y  no  imputes 

sangre  inocente  en  medio  de  tu  pueblo 

Israel! Y la sangre les será por expiación.

9

 Así  apartarás  la  sangre  inocente  de  en 

medio de ti, porque habrás hecho lo recto 

ante los ojos de YHVH.

10

 Cuando  salgas  a  la  batalla  contra  tus 

enemigos, y YHVH tu Dios los entregue 

en tu mano, y los tomes en cautiverio,

11

 y entre los cautivos veas alguna mujer 

hermosa, y te prendes de ella, y desees to-

marla por mujer tuya,

12

 la  introducirás  en  el  interior  de  tu 

casa, y ella rapará su cabeza y se cortará 

las uñas.

13

 Luego se quitará el vestido de su cau-

tiverio, y se quedará en tu casa llorando 

a su padre y a su madre durante un mes. 

Después podrás allegarte a ella, y tú serás 

su marido y ella tu mujer.

14

 Pero si no te deleitas con ella, la deja-

rás ir según su propia voluntad. De nin-

gún modo podrás venderla por dinero ni 

oprimirla como esclava después de haber-

la humillado.

15

 Si uno tiene dos mujeres, una muy ama-

da y otra menos, y las dos, la más amada y 

la otra le dan a luz hijos, y el primogénito 

resulta ser hijo de la menos amada,

16

 al repartir la herencia entre los hijos, 

no podrá constituir como primogénito al 

hijo de la amada con preferencia sobre el 

hijo de la menos amada, quien es el pri-

mogénito.°

17

 Tendrá que reconocer al primogénito, 

hijo de la menos amada, dándole el doble 

de todo cuanto posea, pues es la primicia 

de su vigor, y tiene derecho de primoge-

nitura.

18

 Cuando un hombre tenga un hijo ter-

co y rebelde, que no atiende la voz de su 

padre ni la voz de su madre, y lo tratan de 

corregir pero no les obedece,

19

 su padre y su madre lo agarrarán y lo 

sacarán a los ancianos de su ciudad y a la 

puerta de su lugar.

20

 Y  dirán  a  los  ancianos  de  su  ciudad: 

Éste, nuestro hijo, es terco y rebelde. No 

obedece a nuestra voz. Es libertino y bo-

rracho.

21

 Entonces todos los hombres de su ciu-

dad lo lapidarán con piedras y morirá. Así 

21.16 Esto es, el verdadero primogénito.


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Deuteronomio 22:24

209

extirparás el mal de en medio de ti, y todo 

Israel oirá y temerá.

22

 Cuando algún hombre haya incurrido 

en sentencia de muerte, y en efecto haya 

muerto, y lo cuelgas en un árbol,°

23

 su cadáver no pasará la noche en el ár-

bol. Sin falta lo enterrarás el mismo día, 

porque maldito por ’Elohim es el colga-

do,° y no has de contaminar la tierra que 

YHVH tu Dios te da en posesión.

22

Si ves extraviado el buey de tu her-

mano,° o su oveja, no te desenten-

derás de ellos. Sin falta se los llevarás a tu 

hermano.

2

 Y si tu hermano no es vecino tuyo, o no 

lo conoces, los recogerás en tu casa, y es-

tarán contigo hasta que tu hermano los 

busque, y se los devolverás.

3

 Así también harás con su asno, así ha-

rás  con  su  vestido  y  así  harás  con  cual-

quier cosa que tu hermano pierda y tú la 

encuentres.  No  podrás  desentenderte  de 

ellas.

4

 Si ves el asno de tu hermano, o su buey, 

caídos en el camino, no te desentenderás 

de ellos; te esforzarás con él en levantar-

los.°

5

 No habrá sobre la mujer objeto de hom-

bre, ni el hombre vestirá ropa de mujer, 

porque es abominación a YHVH tu Dios 

cualquiera que hace tales cosas.

6

 Si encuentras delante de ti un nido de 

pájaro  con  polluelos  o  huevos,  en  cual-

quier árbol o en el suelo, y la madre está 

echada  sobre  los  polluelos  o  sobre  los 

huevos,  no  tomarás  a  la  madre  con  las 

crías.

7

 Sin falta soltarás a la madre y podrás to-

mar para ti las crías, a fin de que te vaya 

bien y prolongues tus días.

8

 Cuando construyas una casa nueva, ha-

rás  pretil  a  tu  terrado,  no  sea  que  si  al-

guno cae de allí, traigas delito de sangre 

sobre tu casa.

9

 No  sembrarás  tu  viña  con  semilla  de 

dos clases, no sea que se te pierda° todo 

el fruto, así la semilla como el producto 

de tu viña.

10

 No ararás con buey y asno juntamente.

11

 No  vestirás  tela  tejida  con  mezcla  de 

lana y lino.°

12

 Te harás flecos sobre los cuatro bordes 

del manto con que te cubres.°

13

 Si un hombre toma mujer, y después 

de cohabitar la aborrece,

14

 y la difama diciendo: He tomado a esta 

mujer y al allegarme a ella no hallé signos 

de su virginidad,

15

 el padre y la madre de la joven toma-

rán  las  evidencias  de  su  virginidad  y  las 

llevarán a los ancianos a la puerta de la 

ciudad.°

16

 Y  el  padre  de  la  muchacha  declarará 

ante  ellos:°  He  dado  a  este  hombre  mi 

hija como mujer, pero él la aborrece,

17

 y  ahora  la  difama,  diciendo:  No  hallé 

en  tu  hija  signos  de  virginidad.  Pero  he 

aquí  las  pruebas  de  la  virginidad  de  mi 

hija. Y extenderá el camisón ante los an-

cianos de la ciudad.

18

 Entonces los ancianos de la ciudad to-

marán al hombre y lo castigarán

19

 imponiéndole multa de cien ciclos de 

plata, que entregarán al padre de la joven, 

por cuanto esparció mala fama sobre una 

virgen  de  Israel.  Deberá  tenerla  como 

mujer, y no podrá despedirla en todos sus 

días.

20

 Pero si este asunto fuera verdad, que 

no se hallaron signos de virginidad en la 

muchacha,

21

 entonces  la  sacarán  a  la  puerta  de  la 

casa  de  su  padre,  y  los  hombres  de  su 

ciudad la lapidarán con piedras hasta que 

muera,  por  cuanto  hizo  vileza  en  Israel 

fornicando en casa de su padre. Así extir-

parás el mal de en medio de ti.

22

 Si alguno es sorprendido acostado con 

una  mujer  casada  con  marido,  ambos 

morirán. El hombre que se acostó con la 

mujer, y también la mujer. Así extirparás 

el mal de Israel.

23

 Si una joven virgen está comprometi-

da con un hombre, y alguno la encuentra 

en la ciudad y se acuesta con ella,

24

 sacaréis a ambos a la puerta de aquella 

ciudad, y los lapidaréis con piedras. Mori-

rán por esto: la muchacha, porque estando 

21.22  Heb.  ‘ets  =  madero.  21.23 

→Gá.3.13.  22.1  Esto  es,  conciudadano.  22.4  →Ex.23.4-5.  22.9  Heb.  tiqdash,  del 

verbo  qadash  =  santificar,  separar,  poner  aparte,  consagrar,  aunque  también  tiene  el  sentido  de  quedar  decomisado

22.11 

→Lv.19.19.  22.12 →Nm.15.37-41.  22.15 Esto es, el tribunal.  22.16 Lit. los ancianos.


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Deuteronomio 22:25

210

en la ciudad no gritó, y el hombre, porque 

humilló a la mujer de su prójimo. Así ex-

tirparás el mal de en medio de ti.

25

 Pero si el hombre encontrara a la joven 

prometida en el campo, y aquel hombre 

la fuerza acostándose con ella, entonces 

morirá sólo el hombre que se acostó con 

ella.

26

 A  la  joven  no  le  harás  nada.  La  mu-

chacha  no  tiene  pecado  digno  de  muer-

te,  pues  es  como  cuando  un  hombre  se 

levanta contra su prójimo y lo mata. Así 

es este caso,

27

 porque en el campo la halló, y la joven 

prometida dio voces, pero no hubo quien 

la auxiliara.

28

 Si un hombre halla a una joven virgen 

que no está prometida, y agarrándola yace 

con ella, y son descubiertos,

29

 el hombre que se acostó con ella dará 

al padre de la joven cincuenta piezas de 

plata, y ella será su mujer, pues la ha des-

florado.  No  podrá  repudiarla  en  toda  su 

vida.°

30

 Ninguno tomará a la mujer de su pa-

dre.  No  descubrirá  lo°  que  es  de  su  pa-

dre.°

23

No  entrará  en  la  congregación  de 

YHVH el que tenga magullados los 

testículos° o amputado su miembro viril.

2

 No entrará bastardo° en la congregación 

de YHVH. No entrará en la congregación 

de YHVH hasta la décima generación.

3

 No  entrará  amonita  ni  moabita  en  la 

congregación de YHVH.° Ni aun en la dé-

cima  generación  entrarán  en  la  congre-

gación de YHVH,

4

 por cuanto no os salieron a recibir con 

pan y agua al camino, cuando salisteis de 

Egipto,  y  porque  alquilaron  contra  ti  a 

Balaam hijo de Beor, de Petor en Mesopo-

tamia, para maldecirte.°

5

 Pero YHVH tu Dios no quiso oír a Ba-

laam, sino que YHVH tu Dios te convirtió 

la maldición en bendición,° porque YHVH 

tu Dios te ama.

6

 Nunca procurarás su paz ni su bienestar 

en todos tus días.

7

 No  abominarás  al  edomita,  pues  es  tu 

hermano. No abominarás al egipcio, por-

que extranjero fuiste en su tierra.

8

 Los hijos que nazcan de ellos en la ter-

cera generación, podrán entrar en la con-

gregación de YHVH.

9

 Cuando  salgas  a  campaña  contra  tus 

enemigos,  te  guardarás  de  toda  cosa 

mala.

10

 Si alguno de los tuyos queda impuro 

por  lo  que  sucede  de  noche,°  saldrá  del 

campamento y no entrará en él.

11

 Y  será  que  al  atardecer  se  bañará  en 

agua, y una vez que el sol se haya puesto 

podrá regresar al campamento.

12

 Tendrás cierto lugar fuera del campa-

mento, adonde salgas afuera,

13

 y entre tus utensilios tendrás una es-

taca,  y  será  que  antes  de  acuclillarte° 

afuera,  cavarás  con  ella,  y  te  volverás  y 

cubrirás tu excremento.

14

 Porque YHVH tu Dios anda en medio 

de  tu  campamento,  para  librarte  y  en-

tregar a tus enemigos delante de ti. Por 

tanto, tu campamento ha de ser santo, no 

sea que Él vea en ti cosa inmunda, y se 

aparte de ti.

15

 No entregarás a su amo el esclavo que, 

huyendo de él, se refugie contigo.

16

 Contigo morará en medio de ti, en el 

lugar  que  haya  escogido  en  una  de  tus 

ciudades que bien le parezca. No lo opri-

mirás.

17

 No  habrá  prostitutas  sagradas  entre 

las hijas de Israel,° ni prostitutos sagra-

dos° entre los hijos de Israel.

18

 Ni dádivas de prostitutas ni precio de 

perro° llevarás a la Casa de YHVH tu Dios 

por ningún voto, pues ambos son abomi-

nación a YHVH tu Dios.

22.29 

→Ex.22.16-17.  22.30 Lit. ala, borde. Se refiere al borde del manto que usualmente servía de cubierta en la cama. 

La  expresión  descubrir  el  borde  del  manto  significa  tener  relaciones  sexuales  con  la  mujer  de  otro. 

22.30 

→Lv.18.8; 

20.11; Dt.27.20. 

23.1 Lit. herido por aplastamiento. Aunque es prob. que la expresión aluda a personas deformes en gene-

ral, se sigue la traducción tradicional, por cuanto el sentido aquí establece la imposibilidad de engendrar

23.2 Heb. mam-

zer.  Indica  cualquier  clase  de  hijo  ilegítimo,  especialmente  fruto  del  incesto  o  hijo  de  madre  pagana. 

23.3 

→Neh.13.1-2. 

23. 4 

→Nm.22.1-6.  23.5 →Nm.23.7-24.9.  23.10 Esto es, eyaculación involuntaria →Lv.15.16.  23.13 De yashab = sentarse

Se refiere a la posición para defecar. 

23.17 

→Lv.19.29.  23.17 De la raíz qadash = santo, separado, se derivan qadesh y qe-

deshah que se refieren a la prostitución, tanto femenina como masculina, que se realizaba en los templos paganos. 

23.18 Perro

Prob. designa al que ejercía la prostitución masculina. 


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Deuteronomio 24:17

211

19

 No prestarás con interés a tu hermano: 

interés  por  dinero,  interés  por  comida, 

interés por cualquier cosa que produzca 

intereses.

20

 Al extranjero podrás prestar a interés, 

pero a tu hermano no se lo exigirás,° para 

que  te  bendiga  YHVH  tu  Dios  en  toda 

obra de tus manos en la tierra adonde vas 

para tomar posesión de ella.

21

 Cuando hagas algún voto a YHVH tu 

Dios,  no  tardes  en  cumplirlo,°  porque 

ciertamente YHVH tu Dios lo demandará 

de ti, y te será por pecado.

22

 Mas si te abstienes de formular votos, 

esto no será en ti pecado.

23

 Pero lo que salga de tus labios, lo guar-

darás  y  cumplirás,  conforme  prometiste 

a YHVH tu Dios, pagando° la ofrenda vo-

luntaria que prometiste con tu boca.

24

 Cuando  entres  en  la  viña  de  tu  pró-

jimo,  podrás  comer  las  uvas  que  desees 

hasta saciarte, pero no las pondrás en tu 

cesto.

25

 Cuando entres en la mies de tu próji-

mo, podrás arrancar espigas con la mano, 

pero no meterás la hoz en la mies de tu 

prójimo.

24

Cuando  alguno  tome  una  mujer, 

casándose con ella, sucederá que si 

ella no halla favor ante sus ojos, por haber 

él hallado en ella alguna cosa reprocha-

ble,  le  podrá  escribir  carta  de  divorcio,° 

y  poniendo  ésta  en  su  mano,  despedirla 

de su casa.

2

 Y salida de su casa, ella podrá ir y ser de 

otro marido.

3

 Pero si el segundo marido la aborrece y 

le escribe carta de divorcio, la pone en su 

mano y la despide de su casa, o si muere 

este último marido que la tomó por mu-

jer,

4

 al primer marido que la despidió no le 

será  permitido  tomarla  de  nuevo  como 

mujer, después de ser mancillada,° pues 

esto sería abominación delante de YHVH, 

y no harás que se corrompa la tierra que 

YHVH tu Dios te da por heredad.

5

 Cuando  alguno  esté  recién  casado,  no 

entrará al ejército ni se le impondrá cosa 

alguna. Estará libre en su casa por un año, 

para que alegre a la mujer que tomó.

6

 No  tomarás  en  prenda  ninguna  de  las 

dos piedras del molino, ni la de abajo ni 

la  de  arriba,  pues  sería  como  tomar  en 

prenda la vida.°

7

 Si  se  descubre  a  un  hombre  que  haya 

secuestrado  a  una  persona  de  entre  sus 

hermanos, de los hijos de Israel, sea que 

la haya esclavizado o la haya vendido, el 

tal ladrón morirá.° Así extirparás el mal 

de en medio de ti.

8

 En cuanto a la plaga de la lepra, pon 

cuidado  en  guardar  escrupulosamente 

todo  lo  que  os  enseñen  los  sacerdotes 

levitas, y en obrar conforme a ello. Se-

gún  les  he  ordenado,  así  cuidarás  de 

hacer.°

9

 Recuerda  lo  que  YHVH  tu  Dios  hizo  a 

Miriam° en el camino, cuando salisteis de 

Egipto.

10

 Cuando prestes a tu prójimo cualquier 

cosa, no podrás entrar en su casa para to-

mar su prenda.

11

 Te quedarás afuera hasta que el hom-

bre a quien has prestado te saque la pren-

da afuera.

12

 Y si el hombre es pobre, no te acosta-

rás reteniendo aún su prenda.

13

 Sin falta le devolverás la prenda cuan-

do el sol se ponga, para que duerma con 

su ropa y te bendiga, y te será un acto jus-

to delante de YHVH tu Dios.°

14

 No  oprimirás  al  jornalero  pobre  y  al 

menesteroso, ya sea de tus hermanos o de 

los extranjeros en tu tierra, dentro de tus 

ciudades.

15

 En su día le darás su jornal, y el sol no 

ha de ponerse sobre éste sin dárselo, pues 

él es pobre y tiene puesto su corazón en 

ello, no sea que clame contra ti a YHVH, y 

llegue a ser pecado en ti.°

16

 No se dará muerte a los padres por los 

hijos, ni se dará muerte a los hijos por los 

padres. Cada uno será entregado a muer-

te por su propio pecado.°

17

 No torcerás el derecho del extranjero 

o del huérfano, ni tomarás en prenda la 

ropa de la viuda.

23.20 

→Ex.22.25;  Lv.25.36-37;  Dt.15.7-11.  23.21  →Nm.30.1-16;  Mt.5.33.  23.23  .pagando.  24.1  →Mt.5.31;  19.7; 

Mr.10.4. 

24.4 Esto es, por el segundo marido.  24.6 Es decir, la vida del prestatario.  24.7 

→Ex.21.16.  24.8 →Lv.13.1-14.54. 

24.9 

→Nm.12.10.  24.10-13 →Ex.22.26-27.  24.14-15 →Lv.19.13.  24.16 →2 R.14.6; 2 Cr.25.4; Ez.18.20. 


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Deuteronomio 24:18

212

18

 Te  acordarás  de  que  tú  fuiste  esclavo 

en Egipto, y que de allí te rescató YHVH 

tu Dios. Por tanto, yo te ordeno cumplir 

esta palabra.°

19

 Cuando siegues tu mies en tu campo y 

olvides alguna gavilla en el campo, no te 

volverás a recogerla. Será para el extran-

jero, el huérfano y la viuda, a fin de que 

YHVH tu Dios te bendiga en toda obra de 

tus manos.

20

 Cuando varees tus olivos, no los repa-

sarás después. Será para el extranjero, el 

huérfano y la viuda.

21

 Cuando vendimies tu viña no rebusca-

rás detrás de ti. Será para el extranjero, el 

huérfano y la viuda.°

22

 Recuerda  que  fuiste  esclavo  en  tierra 

de Egipto, por tanto, yo te ordeno cum-

plir esta palabra.

25

Cuando haya contienda entre hom-

bres,  se  presentarán  a  juicio  para 

que se les juzgue. Justificarán al justo y 

condenarán al malvado.

2

 Si  el  malvado  merece  ser  azotado,  en-

tonces el juez lo hará echar en tierra y lo 

hará azotar en su presencia, según el nú-

mero de azotes que merezca su maldad.

3

 Cuarenta  azotes  podrá  darle,  no  más. 

No sea que si aumenta mucho los azotes 

por encima de esto, tu hermano se degra-

de ante tus ojos.

4

 No pondrás bozal al buey que trilla.°

5

 Cuando  unos  hermanos  vivan  juntos, 

y  uno  de  ellos  muera  sin  tener  hijos,  la 

mujer del difunto no se casará fuera con 

un hombre extraño. Su cuñado se unirá 

a ella y la tomará por mujer cumpliendo 

con ella el deber de levirato.°

6

 Y será que el primogénito que ella dé a 

luz, sucederá en el nombre de su herma-

no, el difunto, para que no sea borrado de 

Israel su nombre.°

7

 Pero si el hombre no quiere tomar a su 

cuñada,  ésta  subirá  a  la  puerta,  adonde 

los ancianos, y dirá: Mi cuñado se niega 

a perpetuar el nombre de su hermano en 

Israel. No quiere cumplir conmigo el de-

ber de levirato.

8

 Entonces los ancianos de aquella ciudad 

lo llamarán y hablarán con él. Si él se le-

vanta y dice: No deseo tomarla,

9

 entonces su cuñada se acercará a él en 

presencia  de  los  ancianos,  le  quitará  el 

calzado del pie, y lo escupirá en el rostro, 

y contestará diciendo: ¡Así se ha de hacer 

al hombre que no quiere edificar la casa 

de su hermano!

10

 Y se le dará este nombre en Israel: La 

casa del descalzado.°

11

 Si  dos  varones  luchan  entre  sí,  uno 

contra el otro, y la mujer del uno se acer-

ca para librar a su marido de quien lo ata-

ca, y metiendo ella su mano le agarra sus 

genitales,

12

 le cortarás entonces su mano. Tu ojo 

no se compadecerá.

13

 No tendrás en tu bolsa pesas° diferen-

tes, una grande y una pequeña.

14

 No tendrás en tu casa medidas diferen-

tes, una grande y una pequeña.

15

 Tendrás  pesa  exacta  y  justa,  tendrás 

medida exacta y justa, para que tus días 

se prolonguen en la tierra que YHVH tu 

Dios te da.

16

 Porque  todo  el  que  hace  estas  cosas, 

todo el que comete injusticia, es abomi-

nable a YHVH tu Dios.°

17

 Recuerda lo que te hizo Amalec en el 

camino cuando salisteis de Egipto,

18

 cómo te salió al camino y acuchilló a 

los rezagados entre los tuyos, a todos los 

débiles que se atrasaban, estando tú fati-

gado y cansado, y no tuvo ningún temor 

de Dios.

19

 Por  tanto,  cuando  YHVH  tu  Dios  te 

haya dado descanso de todos tus enemi-

gos alrededor, en la tierra que YHVH tu 

Dios te da por heredad para que la poseas, 

borrarás la memoria de Amalec debajo de 

los cielos. No lo olvides.°

Primicias y diezmos

26

Y sucederá que cuando entres en la 

tierra que YHVH tu Dios te da por 

heredad,  la  tomes  en  posesión  y  habites 

en ella,

24.17-18 

→Ex.23.9; Lv.19.33-34; Dt.27.19.  24.19-21 →Lv.19.9-10; 23.22.  25.4 →1 Co.9.9; 1 Ti.5.18.  25.5 Heb. veyib-

mah,  del  verbo  yabam.  Se  refiere  a  la  ley  del  levirato,  u  obligación  de  suscitar  descendencia  al  hermano  difunto,  casán-

dose  con  la  cuñada 

→Gn.38.8.  25.6  →Mt.22.24;  Mr.12.19;  25.10  →Rt.4.7-8.  25.13  Lit.  piedra.  25.16  →Lv.19.35-36. 

25.17-19 

→Ex.17.8-14; 1 S.15.2-9.


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Deuteronomio 27:5

213

2

 tomarás las primicias de todos los fru-

tos del suelo que coseches en la tierra que 

YHVH tu Dios te da, y las pondrás en una 

cesta,  e  irás  al  lugar  que  YHVH  tu  Dios 

haya  escogido  para  hacer  habitar  allí  su 

Nombre.°

3

 Y te presentarás al sacerdote que haya 

en  aquellos  días,  y  le  dirás:  Hoy  declaro 

ante YHVH tu Dios, que he entrado en la 

tierra que YHVH juró a nuestros padres 

que nos daría.

4

 Y  el  sacerdote  tomará  el  cesto  de  tu 

mano  y  lo  mecerá  delante  del  altar  de 

YHVH tu Dios.

5

 Entonces hablarás y dirás en presencia 

de YHVH tu Dios: Un arameo errante fue 

mi padre, el cual con muy pocos hombres 

bajó a Egipto para habitar allí temporal-

mente, y allí llegó a ser un pueblo grande, 

fuerte y numeroso.

6

 Pero los egipcios nos maltrataron y afli-

gieron,  y  pusieron  sobre  nosotros  una 

dura esclavitud.

7

 Entonces  clamamos  a  YHVH,  Dios  de 

nuestros padres, y YHVH oyó nuestra voz 

y vio nuestra aflicción, nuestro trabajo y 

nuestra opresión,

8

 y YHVH nos sacó de Egipto con mano 

fuerte y brazo extendido, con gran terror, 

con señales y portentos,

9

 y  nos  trajo  a  este  lugar  y  nos  dio  esta 

tierra, tierra que mana leche y miel.

10

 Y ahora, he aquí traigo las primicias del 

fruto del suelo que me diste, oh YHVH. Y 

las colocarás delante de YHVH tu Dios, y 

te postrarás delante de YHVH tu Dios.

11

 Y te regocijarás en todo el bien que YHVH 

tu Dios te ha dado a ti y a tu casa, tú, el levi-

ta, y el extranjero que esté en medio de ti.

12

 En  el  tercer  año,  el  año  del  diezmo, 

cuando acabes de diezmar el total de tu 

cosecha, lo darás al levita, al extranjero, 

al huérfano y a la viuda, para que coman 

dentro de tus ciudades y se sacien.°

13

 Y dirás en presencia de YHVH tu Dios: 

He apartado de mi casa lo consagrado, y 

también lo he dado al levita, al extranjero, 

al huérfano y a la viuda, conforme a todo 

tu  mandamiento  que  me  ordenaste.  No 

he transgredido tus mandamientos ni los 

he olvidado.

14

 No he comido de ello durante mi luto, 

ni lo he tomado estando inmundo, ni de 

ello he ofrecido a los muertos. He obede-

cido la voz de YHVH mi Dios. He hecho 

conforme a todo lo que me has mandado.

15

 Contempla  desde  tu  santa  morada, 

desde los cielos, y bendice a tu pueblo Is-

rael y a la tierra que nos has dado, como 

juraste a nuestros padres, tierra que mana 

leche y miel.

16

 YHVH tu Dios, pues, te manda hoy que 

cumplas estos estatutos y decretos. Cui-

darás  de  ponerlos  por  obra  con  todo  tu 

corazón y con toda tu alma.

17

 Hoy has declarado solemnemente que 

YHVH  es  tu  Dios,  y  que  andarás  en  sus 

caminos,  y  guardarás  sus  estatutos,  sus 

mandamientos y sus decretos para obede-

cer su voz.

18

 Y hoy YHVH te ha hecho aseverar que 

has de serle su pueblo especial,° como te 

había prometido, y que obedecerás todos 

sus mandamientos,

19

 a  fin  de  que  Él  te  eleve  sobre  todas 

las naciones que ha hecho, para alaban-

za, renombre y gloria, y seas un pueblo 

santo para YHVH tu Dios, según ha pro-

metido.

Ratificación del pacto

27

Y  Moisés,  con  los  ancianos  de  Is-

rael,  mandó  al  pueblo,  diciendo: 

Guardad  todo  el  mandamiento  que  hoy 

os ordeno.

2

 Y será, oh Israel,° que el día que pases 

el Jordán a la tierra que YHVH tu Dios te 

da, te erigirás unas grandes piedras y las 

revocarás con cal.

3

 Y  escribirás  sobre  ellas  todas  las  pala-

bras de esta Ley, en cuanto hayas pasado 

para entrar en la tierra que YHVH tu Dios 

te  da,  tierra  que  mana  leche  y  miel,  tal 

como YHVH, el Dios de tus padres, te ha 

dicho.

4

 Será  pues  que  cuando  hayáis  cruzado 

el Jordán, erigirás en el monte Ebal estas 

piedras que yo os mando hoy, y las revo-

caréis con cal.

5

 Y edificarás allí un altar a YHVH tu Dios, 

altar de piedras. No alzarás sobre ellas he-

rramienta de hierro.

26.2 

→Ex.23.19.  26.12 →Dt.14.28-29.  26.18 →Ex.19.5; Dt.4.20; 7.6; 14.2; Tit.2.14; 1 P.2.9.  27.2 .oh Israel.


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Deuteronomio 27:6

214

6

 Construirás el altar de YHVH tu Dios° 

de piedras enteras, y ofrecerás sobre él un 

holocausto a YHVH tu Dios.

7

 Allí  sacrificarás  ofrendas  de  paz,  y  co-

merás y te regocijarás delante de YHVH 

tu Dios,

8

 y escribirás claramente sobre las piedras 

todas las palabras de esta Ley.°

9

 Después Moisés, junto con los levitas sa-

cerdotes, habló a todo Israel y dijo: Guar-

da silencio y escucha, oh Israel: Hoy has 

venido a ser pueblo de YHVH tu Dios.

10

 Obedecerás  pues  la  voz  de  YHVH  tu 

Dios,  y  cumplirás  sus  mandamientos  y 

estatutos que yo te ordeno hoy.

11

 También  Moisés  mandó  al  pueblo  en 

aquel día, diciendo:

12

 Cuando hayas pasado el Jordán, éstos 

estarán en el monte Gerizim° para bende-

cir al pueblo: Simeón, Leví, Judá, Isacar, 

José y Benjamín.

13

 Y éstos estarán en el monte Ebal para 

proferir  la  maldición:  Rubén,  Gad,  Aser, 

Zabulón, Dan y Neftalí.

14

 Entonces  los  levitas  tomarán  la  pala-

bra y dirán a los hombres de Israel en voz 

alta:

15

 ¡Maldito  el  hombre  que  haga  ídolo  o 

imagen  de  fundición,°  abominación  a 

YHVH,  obra  de  mano  de  artesano,  y  la 

ponga  en  oculto!  Y  responderá  todo  el 

pueblo y dirá: ¡Amén!

16

 ¡Maldito el que deshonre a su padre o a 

su madre!° Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

17

 ¡Maldito el que desplace el lindero de 

su vecino!° Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

18

 ¡Maldito el que extravíe al ciego en el 

camino!° Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

19

 ¡Maldito  el  que  tuerza  el  derecho  del 

extranjero transeúnte, del huérfano y de 

la viuda!° Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

20

 ¡Maldito el que se acueste con la mujer 

de su padre, descubriendo el manto de su 

padre!° Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

21

 ¡Maldito el que se ayunte con cualquier 

animal!° Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

22

 ¡Maldito el que se acueste con su her-

mana,° hija de su padre o hija de su ma-

dre! Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

23

 ¡Maldito el que se acueste con su sue-

gra!° Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

24

 ¡Maldito el que en lo oculto asesine a 

su prójimo! Y todo el pueblo dirá: ¡Amén!

25

 ¡Maldito  el  que  acepte  soborno  para 

matar  a  un  inocente!  Y  todo  el  pueblo 

dirá: ¡Amén!

26

 ¡Maldito  el  que  no  persevere  en  las 

palabras de esta Ley para cumplirlas!° Y 

todo el pueblo dirá: ¡Amén!

Bendiciones y maldiciones

28

Y sucederá que si oyes atentamen-

te  la  voz  de  YHVH  tu  Dios  para 

obedecer, para guardar todos sus manda-

mientos  que  yo  te  ordeno  hoy,  también 

YHVH tu Dios te levantará sobre todas las 

naciones de la tierra.

2

 Y por haber obedecido la voz de YHVH 

tu Dios, vendrán sobre ti y te alcanzarán 

todas estas bendiciones:

3

 Bendito serás tú en la ciudad, y bendito 

tú en el campo.

4

 Bendito el fruto de tu vientre, y el fruto 

de tu tierra, y el fruto de tus animales, y 

la  cría  de  tus  vacadas,  y  los  corderos  de 

tu rebaño.

5

 Bendita será tu cesta y tu artesa de ama-

sar.°

6

 Bendito serás en tu entrar y bendito se-

rás en tu salir.

7

 YHVH  hará  que  tus  enemigos,  los  que 

se levantan contra ti, sean derrotados de-

lante  de  ti.  Por  un  solo  camino  saldrán 

contra ti, pero por siete caminos huirán 

de delante de ti.

8

 YHVH mandará la bendición a tus gra-

neros y a todo lo que emprenda tu mano, 

y te bendecirá en la tierra que YHVH tu 

Dios te da.

9

 YHVH te confirmará como pueblo santo 

suyo,  tal  como  te  juró,  cuando  guardes 

los mandamientos de YHVH tu Dios y an-

des en sus caminos.

10

 Y todos los pueblos de la tierra verán 

que el nombre de YHVH es invocado so-

bre ti, y tendrán temor de ti.

11

 YHVH  te  hará  abundar  en  bienes,  en 

el fruto de tu vientre, en el fruto de tus 

27.5-6 

→Ex.20.25.  27.8 →Jos.8.30-32.  27.12 →Dt.11.29; Jos.8.33-35.  27.15 →Ex.20.4; 34.17; Lv.19.4; 26.1; Dt.4.15-18; 

5.8. 

27.16 

→Ex.20.12; Dt.5.16.  27.17 →Dt.19.14.  27.18 →Lv.19.14.  27.19 →Ex.22.21; 23.9; Lv.19.33-34; Dt.24.17-18. 

27.20 

→Lv.18.8;  20.11;  Dt.22.30.  27.21  →Ex.22.19;  Lv.18.23;  20.15.  27.22  →Lv.18.9;  20.17.  27.23  →Lv.18.7;  20.14. 

27.26 

→Gá.3.10.  28.5 Prob. se refiere aquí a la semilla (cesta) y al proceso del producto, desde la siembra hasta el amasado. 


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Deuteronomio 28:38

215

animales y en el fruto de tu suelo, en la 

tierra que YHVH juró a tus padres que te 

daría.

12

 YHVH  te  abrirá  su  buen  tesoro  de 

los  cielos  para  dar  lluvia  a  tu  tierra  en 

su tiempo, y para bendecir toda obra de 

tus manos. Prestarás a muchas naciones, 

pero tú no tomarás prestado.

13

 Si  escuchas  los  mandamientos  de 

YHVH  tu  Dios  que  te  mando  hoy  para 

que los guardes y los cumplas, YHVH te 

pondrá por cabeza y no por cola, y estarás 

encima solamente, y no estarás debajo.

14

 No te apartarás, pues, ni a derecha ni a 

izquierda de ninguna de las palabras que 

yo os ordeno hoy, para ir en pos de otros 

dioses y servirlos.°

15

 Pues sucederá que si no obedeces la voz 

de  YHVH  tu  Dios,  cuidando  de  practicar 

todos  sus  mandamientos  y  estatutos  que 

yo te ordeno hoy, vendrán sobre ti y te al-

canzarán todas estas maldiciones:

16

 Maldito  serás  en  la  ciudad  y  maldito 

serás en el campo.

17

 Malditas serán tu cesta y tu artesa de 

amasar.

18

 Maldito será el fruto de tu vientre y el 

fruto de tu suelo, el parto de tu vacada y 

las crías de tu rebaño.

19

 Maldito  serás  en  tu  entrar  y  maldito 

serás en tu salir.

20

 YHVH  enviará  contra  ti  maldición, 

quebranto y consternación en todo cuan-

to pongas la mano para hacer, hasta que 

seas destruido y perezcas rápidamente, a 

causa  de  la  maldad  de  tus  acciones,  por 

las cuales me habrás abandonado.

21

 YHVH  hará  que  se  te  pegue  la  peste, 

hasta que ella te extermine de la tierra a 

la cual entras para poseerla.

22

 YHVH te herirá de tisis, de fiebre, de 

inflamación y gangrena, con sequía, con 

calamidad repentina y con añublo, y éstos 

te perseguirán hasta que perezcas.

23

 Tus  cielos  que  están  sobre  tu  cabeza 

serán de bronce, y de hierro la tierra que 

está debajo de ti.

24

 En lugar de lluvia, YHVH dará a tu tie-

rra polvo y ceniza, los cuales descenderán 

de los cielos sobre ti, hasta que seas des-

truido.

25

 YHVH hará que te postres delante de 

tus enemigos. Por un solo camino saldrás 

contra ellos y por siete caminos huirás de 

ellos, y estarás sujeto a maltrato en todos 

los reinos de la tierra.

26

 Tu  cadáver  servirá  de  comida  a  todas 

las  aves  de  los  cielos  y  a  las  fieras  de  la 

tierra, y no habrá quien las ahuyente.

27

 YHVH te golpeará con la úlcera de Egip-

to, con tumores, con sarna y con erupcio-

nes, de las que no podrás ser curado.

28

 YHVH te golpeará con demencia, con 

ceguera, y con turbación de corazón,

29

 y  como  el  ciego  anda  a  tientas  en  la 

oscuridad,  irás  a  tientas  a  pleno  día,  y 

no prosperarás en tus caminos, más bien 

serás oprimido y robado continuamente, 

sin haber quien te salve.

30

 Te desposarás con una mujer, pero otro 

hombre  se  acostará  con  ella;  edificarás 

casa, pero no habitarás en ella; plantarás 

viña, pero no aprovecharás su fruto.

31

 Tu buey será degollado delante de tus 

ojos, pero no comerás de él; tu asno será 

arrebatado, y no te será devuelto; tu ove-

ja será dada a tus enemigos, y no habrá 

quien te la rescate.

32

 Tus hijos y tus hijas serán entregados a 

otro pueblo, y tus ojos lo verán y desfalle-

cerán por ellos todo el día, pero no habrá 

fuerza en tu mano.°

33

 Un pueblo que no conoces comerá del 

fruto de tu tierra y de todo tu trabajo, y no 

serás sino oprimido y quebrantado todos 

los días,

34

 de  manera  que  enloquecerás  a  causa 

de lo que verán tus ojos.

35

 YHVH te golpeará con pústula malig-

na en las rodillas y en las piernas, desde la 

planta de tu pie hasta tu coronilla, sin que 

puedas ser curado.

36

 YHVH hará que seas llevado, junto al rey 

que hayas puesto sobre ti, a una nación que 

ni tú ni tus padres conocieron, y allí servi-

rás a otros dioses: al palo y a la piedra.

37

 Y  vendrás  a  ser  motivo  de  espanto,  y 

servirás de refrán y de burla a todos los 

pueblos a los cuales te llevará YHVH.

38

 Sacarás mucha semilla al campo, pero 

recogerás poco, porque la langosta la de-

vorará.

28.14 

→Dt.11.13-17.  28.32 Es decir, para hacer nada.


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Deuteronomio 28:39

216

39

 Plantarás  y  cultivarás  viñas,  pero  no 

recogerás, ni beberás vino, porque se las 

comerá el gusano.

40

 Tendrás  olivos  en  todo  tu  territorio, 

pero no te ungirás con el aceite, porque 

tu aceituna se desprenderá.

41

 Engendrarás hijos e hijas, pero no se-

rán para ti, porque irán en cautiverio.

42

 La langosta devorará toda tu arboleda 

y el fruto de tu tierra.

43

 El extranjero que esté en medio de ti 

se elevará cada vez más alto por encima 

tuyo, y tú descenderás cada vez más bajo.

44

 Él te prestará y tú no le podrás prestar, 

él será cabeza y tú serás cola.

45

 Así  vendrán  sobre  ti  todas  estas  mal-

diciones, y te perseguirán y te alcanzarán 

hasta  aniquilarte,  por  cuanto  no  obede-

ciste la voz de YHVH tu Dios para guardar 

sus mandamientos y estatutos que Él te 

prescribió,

46

 y ellas quedarán en ti como señal y pro-

digio, y en tu descendencia, para siempre.

47

 Por cuanto no serviste a YHVH tu Dios 

con alegría y con gozo de corazón, cuan-

do abundaba todo,

48

 servirás  a  tus  enemigos,  que  YHVH 

enviará contra ti, en medio del hambre y 

de la sed, de la desnudez y de la penuria 

total, y pondrá sobre tu cuello un yugo de 

hierro hasta que te aniquile.

49

 Como águila que planea, así YHVH al-

zará contra ti un pueblo venido de lejos, 

del extremo de la tierra, un pueblo cuya 

lengua no entenderás.

50

 Pueblo de rostro feroz, que no respe-

tará al anciano, ni del muchacho tendrá 

compasión.

51

 Y  devorará  el  fruto  de  tu  ganado  y 

el  fruto  de  tu  tierra  hasta  que  seas  des-

truido. No te dejará grano, ni mosto, ni 

aceite,  ni  el  aumento  de  tus  vacadas,  ni 

las crías de tu rebaño, hasta que te haya 

exterminado.

52

 Asediará  en  toda  tu  tierra  todas  tus 

ciudades, hasta que caigan tus muros al-

tos y fortificados en que confiabas. Sí, te 

sitiará en todas tus ciudades y en toda tu 

tierra que YHVH tu Dios te habrá dado.

53

 Y por la angustia con que te oprimirá 

tu enemigo durante el asedio, te llegarás 

a comer el fruto de tu vientre, la carne de 

tus propios hijos e hijas que te habrá dado 

YHVH tu Dios.°

54

 El hombre más delicado en medio de 

ti, el más considerado, mirará con malos 

ojos  a  su  hermano,  y  a  la  mujer  de  sus 

entrañas,  y  al  resto  de  los  hijos  que  le 

queden,

55

 para no dar a ninguno de ellos la carne 

de sus hijos que él esté comiendo, por no 

quedarle nada durante la opresión, y en la 

angustia con que te atormentará tu ene-

migo en todas tus ciudades.

56

 La más refinada y delicada entre ti, la 

planta de cuyo pie desnudo, de tanta de-

licadeza  y  suavidad,  jamás  experimentó 

posarse sobre el suelo, mirará con malos 

ojos al varón de su regazo,° y a su hijo, y 

a su hija,

57

 y a su placenta que sale de entre sus 

piernas, y a sus hijos que dé a luz, pues 

se los comerá° a escondidas, al faltar todo 

en la opresión y en la angustia con que te 

atormentará tu enemigo en tus ciudades.

58

 Si no tienes el cuidado de cumplir to-

das  las  palabras  de  esta  Ley,  escritas  en 

este libro para temer a este nombre glo-

rioso y terrible: YHVH, tu Dios,

59

 entonces  YHVH  hará  asombrosas  tus 

plagas y las plagas de tus descendientes, 

plagas grandes y duraderas, y enfermeda-

des malignas y persistentes.

60

 Volcará  en  ti  todas  las  epidemias  de 

Egipto,  aquellas  que  temiste,  y  se  pega-

rán a ti.

61

 YHVH también hará que sean enviadas 

contra ti todas las enfermedades y azotes 

que no están escritos en el libro de esta 

Ley, hasta que seas destruido.

62

 Y así, habiendo sido como las estrellas 

de los cielos en multitud, resultaréis po-

cos en número, por cuanto no obedeciste 

la voz de YHVH tu Dios.

63

 Y  sucederá  que  así  como  YHVH  se 

regocijaba  en  haceros  bien  y  en  multi-

plicaros,  así  YHVH  se  regocijará  sobre 

vosotros  para  arruinaros  y  destruiros,  y 

seréis arrancados de la tierra a la cual en-

tráis para tomarla en posesión.

64

 Entonces YHVH te dispersará por to-

dos los pueblos, desde un extremo de la 

28.53 

→2 R.6.26-29.  28.56 Lit. al hombre de su pecho. Es decir, al hombre que ama.  28.57 →2 R.6.28-29; Lm.4.10. 


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Deuteronomio 29:20

217

tierra hasta el otro extremo de la tierra, y 

allí servirás a otros dioses que ni tú ni tus 

padres conocieron: al palo y a la piedra.

65

 Tampoco entre aquellas naciones ten-

drás  reposo  ni  habrá  descanso  para  la 

planta de tu pie, pues YHVH te dará allí 

un  corazón  temeroso,  desfallecimiento 

de ojos, y languidez de espíritu.

66

 Y tendrás tu vida como algo que pende 

delante  de  ti,  y  estarás  temeroso  de  no-

che  y  de  día,  y  no  tendrás  seguridad  de 

tu vida.

67

 Por  la  mañana  dirás:  ¡Quién  me  die-

ra que fuera la tarde! Y a la tarde dirás: 

¡Quién me diera que fuera la mañana! por 

el espanto de tu corazón con que estarás 

amedrentado, y por el espectáculo que ve-

rán tus ojos.

68

 YHVH te hará volver a Egipto en na-

ves, por la ruta de la cual yo te dije: Nunca 

más volverás a verla. Y allí os ofreceréis 

en venta como esclavos y esclavas a vues-

tros  enemigos,  pero  no  habrá  quien  os 

compre.

Bondad y justicia de YHVH

29

Estas  son  las  palabras  del  pacto 

que YHVH mandó a Moisés que ce-

lebrara con los hijos de Israel en la tierra 

de Moab, además del pacto que estableció 

con ellos en Horeb.

2

 Moisés,  pues,  convocó  a  todo  Israel,  y 

les dijo: Vosotros habéis visto todo lo que 

YHVH ha hecho ante vuestros ojos en la 

tierra de Egipto, a Faraón y a todos sus 

siervos y a toda su tierra,

3

 las grandes pruebas que vieron tus ojos, 

las señales, y los grandes prodigios.

4

 Pero hasta el día de hoy, YHVH no os ha 

dado corazón para entender, ni ojos para 

ver, ni oídos para oír.

5

 Yo  os  hice  andar  cuarenta  años  por  el 

desierto. Vuestras vestiduras no se os han 

desgastado  sobre  vosotros,  ni  vuestras 

sandalias  se  han  desgastado  en  vuestro 

pie.

6

 No habéis comido pan, ni habéis bebido 

vino ni licor, a fin de que conocierais que 

Yo soy YHVH vuestro Dios.

7

 Cuando llegasteis a este lugar, Sehón rey 

de Hesbón,° y Og rey de Basán,° salieron 

a nuestro encuentro para luchar, y los de-

rrotamos.

8

 Luego tomamos su tierra y la dimos en 

heredad a Rubén, a Gad, y a la media tribu 

de Manasés.°

9

 Guardad, pues, las palabras de este pac-

to y ponedlas por obra, para que os haga 

prosperar en todo lo que hagáis.

10

 Hoy todos vosotros estáis ante la pre-

sencia  de  YHVH  vuestro  Dios:  vuestros 

jefes, vuestras tribus, vuestros ancianos, 

vuestros  oficiales,  todos  los  hombres  de 

Israel,

11

 vuestros  pequeños,  vuestras  mujeres, 

y  el  extranjero  que  está  dentro  de  tus 

campamentos,  desde  el  leñador  hasta  el 

que saca tu agua,

12

 para que entres en el pacto con YHVH 

tu Dios, y en su juramento que YHVH tu 

Dios hace hoy contigo,

13

 para  confirmarte  hoy  como  pueblo 

suyo, y que Él sea tu Dios, tal como te ha 

hablado  y  como  juró  a  tus  padres  Abra-

ham, Isaac y Jacob.

14

 No con vosotros solos hago este pacto 

y este juramento;

15

 ciertamente es con los que están hoy 

aquí con nosotros en presencia de YHVH 

nuestro Dios y también con los que no es-

tán hoy aquí con nosotros.

16

 (Porque vosotros sabéis cómo habitá-

bamos en la tierra de Egipto, y cómo he-

mos pasado por medio de las naciones por 

las cuales habéis pasado,

17

 y habéis visto sus abominaciones y sus 

ídolos de palo y de piedra, de plata y de 

oro, que tienen entre ellos.)

18

 No sea que haya entre vosotros hom-

bre o mujer, familia o tribu, cuyo corazón 

se aparte hoy de YHVH nuestro Dios, para 

ir a servir a los dioses de esas naciones. 

No sea que haya entre vosotros una raíz 

que produzca hiel y ajenjo,°

19

 y suceda que al oír las palabras de esta 

imprecación,  se  congratule  en  su  cora-

zón,  pensando:  Tendré  paz,  aunque  siga 

andando en la obstinación de mi corazón 

(arruinando  así  lo  regado  junto  con  lo 

seco).

20

 YHVH no querrá perdonarlo, sino que 

la ira de YHVH y su celo arderán contra 

29.7 

→Nm.21.21-30.  29.7 →Nm.31-35.  29.8 →Nm.32.33.  29.18 →He.12.15. 


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Deuteronomio 29:21

218

aquel  hombre,  y  todas  las  maldiciones 

escritas  en  este  libro  caerán  sobre  él,  y 

YHVH  borrará  su  nombre  de  debajo  de 

los cielos.

21

 Y YHVH lo apartará para mal de entre 

todas las tribus de Israel, conforme a to-

das las maldiciones del pacto escrito en el 

libro de esta Ley.

22

 De manera que cuando las generacio-

nes venideras de vuestros hijos se levan-

ten después de vosotros, y los extranjeros 

vengan de tierras lejanas, al ver las plagas 

de esa tierra y las enfermedades con que 

la habrá afligido YHVH, exclamarán:

23

 ¡Toda  su  tierra  es  azufre  y  calcinación! 

¡Ni siembra ni germinación, y el pasto no 

crece  en  ella,  como  en  la  destrucción  de 

Sodoma y Gomorra,° de Adma y de Zeboim, 

que YHVH destruyó en su ira y en su furor!

24

 Y  todas  las  naciones  dirán:  ¿Por  qué 

trató así YHVH a esta tierra? ¿Qué signifi-

ca el ardor de esta enorme ira?

25

 Y  se  les  responderá:  Porque  abando-

naron el pacto de YHVH, el Dios de sus 

padres, que Él hizo con ellos cuando los 

sacó de la tierra de Egipto,

26

 y fueron y sirvieron a otros dioses y se 

inclinaron ante ellos, dioses que no cono-

cían, los cuales Él no les había asignado.

27

 Por  eso  la  ira  de  YHVH  ardió  contra 

esta tierra, para traer sobre ella todas las 

maldiciones escritas en este libro,

28

 y  con  ira,  furor  y  gran  indignación, 

YHVH  los  ha  desarraigado  de  su  propia 

tierra  y  los  ha  arrojado  en  tierra  ajena, 

como hoy se ve.

29

 Las cosas secretas pertenecen a YHVH 

nuestro Dios, pero las reveladas son para 

nosotros y para nuestros hijos para siem-

pre, para que cumplamos todas las pala-

bras de esta Ley.

Bendición y restauración

30

Y  sucederá  que  cuando  te  hayan 

sobrevenido  todas  estas  cosas,  la 

bendición  y  la  maldición  que  acabo  de 

poner delante de ti, y tú recapacites en tu 

corazón  en  medio  de  todas  las  naciones 

adonde YHVH tu Dios te haya esparcido,

2

 y te vuelvas a YHVH tu Dios, y obedez-

cas su voz, conforme a todo lo que yo te 

mando hoy, tú y tus hijos, con todo tu co-

razón y con toda tu alma,

3

 entonces YHVH hará volver tu cautive-

rio, y tendrá misericordia de ti, y volverá 

a recogerte de todos los pueblos adonde 

te haya esparcido YHVH tu Dios.

4

 Aun cuando tus desterrados estén en el 

extremo de los cielos, desde allí te recoge-

rá YHVH tu Dios, y desde allí te tomará,

5

 y te devolverá YHVH tu Dios a la tierra 

que poseyeron tus padres, y tú la posee-

rás,  y  Él  te  hará  bien,  y  te  multiplicará 

más que a tus padres.

6

 YHVH tu Dios circuncidará tu corazón 

y el corazón de tu descendencia, para que 

ames a YHVH tu Dios con todo tu corazón 

y con toda tu alma, a fin de que vivas.

7

 Y YHVH tu Dios pondrá todas estas mal-

diciones sobre tus enemigos y sobre tus 

aborrecedores que te hayan perseguido.

8

 Y tú volverás a escuchar la voz de YHVH 

y pondrás por obra todos sus mandamien-

tos que yo te ordeno hoy.

9

 Y YHVH tu Dios te hará abundar en toda 

obra de tu mano, en el fruto de tu vien-

tre,  en  el  fruto  de  tus  animales,  y  en  el 

fruto de tu tierra, para bien tuyo, porque 

YHVH volverá a deleitarse en ti para bien, 

tal como se deleitó en tus padres,

10

 porque  habrás  obedecido  a  la  voz  de 

YHVH tu Dios para guardar sus manda-

mientos y sus estatutos escritos en el li-

bro de esta Ley, porque te habrás vuelto a 

YHVH tu Dios con todo tu corazón y con 

toda tu alma.

11

 Porque  este  mandamiento  que  yo  te 

ordeno hoy no es demasiado difícil para 

ti, ni está lejos.

12

 No está en los cielos, para que digas: 

¿Quién subirá por nosotros a los cielos, y 

nos lo traerá y nos lo hará oír para que lo 

cumplamos?

13

 Ni está al otro lado del mar, para que 

digas: ¿Quién pasará por nosotros el mar, 

y nos lo traerá para que lo oigamos y lo 

cumplamos?

14

 Sino que muy cerca de ti está la pala-

bra, en tu boca y en tu corazón, para que 

la cumplas.°

15

 He  aquí,  hoy  pongo  delante  de  ti  la 

vida y el bien; la muerte y el mal,

29.23 

→Gn.19.24-25.  30.14 →Ro.10.6-10.


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Deuteronomio 31:17

219

16

 por cuanto hoy te mando que ames a 

YHVH tu Dios andando en sus caminos y 

guardando  sus  mandamientos,  estatutos 

y  decretos,  a  fin  de  que  vivas  y  te  mul-

tipliques, para que YHVH tu Dios pueda 

bendecirte en la tierra adonde entras para 

poseerla.

17

 Pero si tu corazón se aparta, de modo 

que no quieras escuchar, y te dejes extra-

viar, de modo que te postres ante dioses 

ajenos y los sirvas,

18

 yo os protesto el día de hoy que cier-

tamente  pereceréis.  No  prolongaréis 

vuestros días sobre la tierra adonde vais, 

pasando  el  Jordán,  para  entrar  en  pose-

sión de ella.

19

 Hoy mismo hago testificar contra vo-

sotros a los cielos y a la tierra, de que os 

he puesto delante la vida y la muerte, la 

bendición y la maldición. Escoge pues la 

vida, para que vivas tú y tu descendencia,

20

 amando a YHVH tu Dios, obedeciendo 

su voz y siéndole fiel. Porque Él es tu vida 

y  prolongación  de  tus  días,  para  habitar 

en la tierra que YHVH juró dar a tus pa-

dres, Abraham,° Isaac° y Jacob.°

Últimas disposiciones de Moisés

31

Fue pues Moisés y habló estas pala-

bras a todo Israel,

2

 y les dijo: Hoy tengo ciento veinte años, 

ya no puedo salir ni entrar más, y YHVH 

me ha dicho: Tú no pasarás este Jordán.°

3

 YHVH  tu  Dios  pasará  delante  de  ti.  Él 

destruirá estas naciones ante tu vista, y tú 

las desposeerás. Josué también° pasará al 

frente de ti, como ha dicho YHVH,

4

 y hará YHVH con ellas como trató a Se-

hón y Og, reyes amorreos, y a su tierra, a 

los cuales exterminó.°

5

 Así los entregará YHVH delante de voso-

tros, para que hagáis con ellos conforme 

a todo este mandato que os he impuesto.

6

 Esforzaos y cobrad ánimo, no temáis ni 

os aterréis delante de ellos, porque YHVH 

tu Dios es el que va contigo. No te dejará 

ni te desamparará.

7

 Enseguida  Moisés  llamó  a  Josué,  y  le 

dijo en presencia de todo Israel: Esfuérza-

te y ten buen ánimo, porque tú entrarás 

con este pueblo a la tierra que YHVH juró 

a sus padres que les daría, y tú se la darás 

en posesión.

8

 YHVH es el que va delante de ti. Él esta-

rá contigo, no te dejará ni te desampara-

rá.° No temas ni desmayes.

9

 Y Moisés escribió esta Ley y la dio a los 

sacerdotes, hijos de Leví, que llevaban el 

Arca del Pacto de YHVH, y a todos los an-

cianos de Israel.

10

 Y  Moisés  les  mandó,  diciendo:  Al  fin 

de cada siete años,° en el tiempo señalado 

del año de remisión, en la fiesta solemne 

de los Tabernáculos,°

11

 cuando  todo  Israel  vaya  a  presentar-

se° ante YHVH tu Dios en el lugar que Él 

haya escogido, leerás esta Ley delante de 

todo Israel a oídos de ellos.

12

 Congregarás al pueblo, hombres, mu-

jeres y niños, y a tu extranjero que está 

en  tus  ciudades,  para  que  escuchen  y 

aprendan, y teman a YHVH vuestro Dios, 

y  guarden  las  palabras  de  esta  Ley  para 

cumplirlas.

13

 Y para que los hijos de ellos que no 

la  conocen,  escuchen  y  aprendan  a  te-

mer a YHVH vuestro Dios, todos los días 

que  viváis  sobre  la  tierra  adonde  vais, 

pasando el Jordán, para tomar posesión 

de ella.

14

 Dijo entonces YHVH a Moisés: He aquí 

se acercan los días en que has de morir. 

Llama a Josué y presentaos en la Tienda 

de Reunión, y lo ordenaré. Fueron pues 

Moisés  y  Josué  y  se  presentaron  en  la 

Tienda de Reunión.

15

 Y  apareció  YHVH  en  la  columna  de 

nube,  sobre  la  Tienda,  y  la  columna  de 

nube se posó sobre la puerta de la Tienda.

16

 Y dijo YHVH a Moisés: He aquí, tú vas 

a dormir con tus padres, y este pueblo se 

levantará y se prostituirá en pos de dioses 

extraños, los de la tierra en medio de la 

cual él está por entrar, y me abandonará, 

y quebrantará el pacto que hice con él.

17

 Por lo cual mi ira arderá contra él en 

aquel  día,  y  los  abandonaré  y  esconderé 

de ellos mi rostro, de manera que serán 

consumidos.  Y  le  sobrevendrán  muchos 

males y angustias, y dirá en aquel día: ¿No 

30.20 

→Gn.12.7.  30.20 →Gn.26.3.  30.20 →Gn.28.13.  31.2 →Nm.20.12.  31.3 .también.  31.4 →Nm.21.21-35. 

31.8 

→Jos.1.5; He.13.5.  31.10 →Dt.15.12.  31.10 Heb. sucot. →16.13-15.  31.11 Lit. mostrarse.


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Deuteronomio 31:18

220

será porque mi Dios no está en medio de 

mí, que me han alcanzado estos males?

18

 Pero ciertamente esconderé mi rostro 

en aquel día por todo el mal que habrá he-

cho, por haberse vuelto a dioses ajenos.

19

 Ahora  pues,  escribid  este  cántico  para 

vosotros, y tú, enséñalo a los hijos de Israel. 

Ponlo en su boca, para que este cántico me 

sea por testigo contra los hijos de Israel.

20

 Porque cuando lo introduzca en la tie-

rra que con juramento prometí a sus pa-

dres, la cual mana leche y miel, y él haya 

comido y se haya hartado y engordado, se 

volverá a otros dioses y los servirá, y me 

tratará  con  desprecio,  y  quebrantará  mi 

pacto.

21

 Sucederá  pues  que  cuando  le  sobre-

vengan  muchos  males  y  angustias,  este 

cántico,  como  quiera  que  no  ha  de  ser 

olvidado de la boca de su posteridad, tes-

tificará  contra  él.  Porque  Yo  conozco  el 

pensamiento que él fragua hoy, aun antes 

de que lo introduzca en la tierra que pro-

metí con juramento.

22

 Y aquel mismo día Moisés escribió este 

cántico, y lo enseñó a los hijos de Israel.

23

 Entonces  ordenó°  a  Josué°  ben  Nun, 

y dijo: ¡Esfuérzate y sé valiente,° porque 

tú introducirás a los hijos de Israel en la 

tierra que les juré, y Yo estaré contigo!

24

 Y  sucedió  que  al  terminar  Moisés  de 

escribir las palabras de esta Ley sobre el 

libro, hasta finalizarlas,

25

 Moisés mandó a los levitas que lleva-

ban el Arca del Pacto de YHVH, diciendo:

26

 Tomad este libro de la Ley y ponedlo 

al lado del Arca del Pacto de YHVH vues-

tro Dios, para que quede allí como testigo 

contra ti.

27

 Porque yo conozco tus rebeliones y tu 

dura cerviz. He aquí, estando yo aún vivo 

con vosotros, habéis sido rebeldes a YHVH, 

¿cuánto más después de mi muerte?

28

 Congregadme a todos los ancianos de 

vuestras tribus y a vuestros oficiales, para 

que  recite  a  sus  oídos  estas  palabras,  y 

haré que los cielos y la tierra testifiquen 

contra ellos.

29

 Porque yo sé que después de mi muer-

te,  os  corromperéis  totalmente  y  os 

apartaréis del camino que os he manda-

do,  y  así  sobrevendrá  el  mal  en  los  días 

venideros, porque habréis hecho lo malo 

ante los ojos de YHVH, provocándolo a ira 

con la obra de vuestras manos.

30

 Entonces Moisés recitó a oídos de toda 

la congregación de Israel, de principio a 

fin, las palabras de este cántico:

Cántico de Moisés

32

¡Prestad oído, cielos, y hablaré! 

Oye, oh tierra, los dichos de mi 

boca.

2

    Gotee como la lluvia mi doctrina,

Y como el rocío destile mi palabra,

Como llovizna sobre la hierba,

Como chubascos sobre la grama,

3

    Porque he de proclamar el nombre 

de YHVH.

¡Atribuid la grandeza a nuestro Dios!

4

    Él es la Roca, cuya obra es perfecta,

Todos sus caminos son justos,

Dios de fidelidad, sin injusticia,

Justo y recto es Él.

5

    La corrupción no es suya,

De sus hijos es la mancha,

¡Generación perversa y torcida!

6

    ¿Así pagáis a YHVH,

Pueblo necio e insensato?

¿No es Él tu Padre que te creó?

¿No te hizo Él y te estableció?

7

    Recuerda los días de antaño,

Considera los años, generación por 

generación,

Pregunta a tu padre, y te declarará,

A tus ancianos, y te lo dirán:

8

    Cuando ’Elyón daba a cada pueblo 

su heredad,

Y distribuía a los hijos del hombre,

Trazando las fronteras de los 

pueblos,

Según el número de los hijos de 

Israel.

9

    Porque la porción de YHVH es su 

pueblo,

Jacob es el cordel° de su heredad.

10

    Lo halló en una tierra desértica,

En el yermo, con aullidos de 

desolación.

Lo envuelve y lo sustenta,

31.23 Esto es, Dios lo estableció como sucesor de Moisés.  31.23 

→Nm.27.23.  31.23 →Jos.1.6.  32.9 Heb. hebel = cuerda, 

cordel. Se refiere al cordel con el que se echaba suerte sobre las parcelas de terreno para fijar las heredades 

→Sal.16.6.


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Deuteronomio 32:32

221

Lo protege como a la niña de sus 

ojos.

11

    Como el águila incita a su nidada,

Revoloteando sobre sus aguiluchos,

Extiende sus alas, lo recoge,

Y lo carga sobre sus plumas remeras.

12

    YHVH solo lo condujo,

Con él no hubo dios extraño.

13

    Lo hizo cabalgar en sus montañas,

Lo alimentó con los frutos de sus 

campos,

Le dio a chupar miel de la peña,

Y el aceite del duro pedernal,

14

    Cuajada de vacas y leche de ovejas,

Grosura de corderos y carneros,

Ganado de Basán y machos cabríos,

La flor de la harina del trigo,

Y bebió la sangre fermentada de la 

uva.

15

    Pero engordó Jesurún° y tiró coces

(Engordaste, te cebaste y te pusiste 

rollizo),

Y abandonó al Dios que lo había 

hecho,

Menospreció la Roca de su salvación.

16

    Lo provocaron a celos con extraños,°

Lo provocaron a ira con 

abominaciones.

17

    Sacrificaron a los demonios, y no a 

Dios,°

A dioses que no habían conocido,

A nuevos, recién llegados,

Que vuestros padres no temieron.

18

    ¡Despreciaste a la Roca que te 

engendró,

Y te olvidaste del Dios que te dio a 

luz!

19

    Lo vio YHVH, y se encendió en ira 

por el menosprecio de sus hijos y 

de sus hijas.

20

    Dijo entonces: Esconderé de ellos 

mi rostro,

Y veré cuál sea su fin,

Porque son generación perversa,

Hijos infieles.

21

    Me movieron a celos con lo que no 

es Dios,

Me provocaron a ira con sus 

vanidades.

Por tanto Yo los moveré a celos° con 

lo que no es pueblo,

Los provocaré a ira con una nación 

insensata.°

22

    El fuego de mi ira está ardiendo,

Y abrasará hasta las profundidades 

del Seol,

Devorará la tierra con sus frutos,

Y quemará los cimientos de los 

montes.

23

    Amontonaré males sobre ellos,

Y contra ellos agotaré mis saetas.

24

    Andarán macilentos por el hambre,

Consumidos por la fiebre,

Y pestilencias malignas,

Les enviaré colmillos de fieras,

Y veneno de las que reptan por el 

polvo.

25

    Por fuera los consumirá la espada,

Y por dentro de las cámaras, el 

espanto,

Al joven y a la doncella,

Al lactante y al encanecido.

26

    Me dije: Los esparciré,

Y haré que su memoria sea borrada 

de entre los hombres,

27

    De no haber temido la jactancia del 

enemigo,

Y la mala interpretación del 

adversario,

Que dirán: Nuestra mano ha 

vencido,

No es YHVH quien lo ha hecho.

28

    Porque son naciones privadas de 

consejo,

Y no hay en ellos entendimiento.

29

    ¡Oh si fueran sabios para discernir 

esto!

Entenderían su propio destino.

30

    ¿Cómo podría uno perseguir a mil,

Y dos hacer huir a diez mil,

Si su Roca no los hubiera vendido,

Si YHVH no los hubiera entregado?

31

    Porque la roca de ellos no es como 

nuestra Roca,

Y nuestros mismos enemigos lo 

atestiguan.

32

    Porque cepa de Sodoma es la vid de 

ellos,

32.15 Esto es, mi cariño. Nombre poético de Israel 

→Is.44.2. Proviene del verbo yashar = ser derecho, ser recto, íntegro

y se aplica como un apelativo cariñoso y cercano dado por Dios a su pueblo escogido. 

32.16 Esto es, con dioses ajenos

32.17 

→1 Co.10.20.  32.21 →1 Co.10.22.  32.21 →Ro.10.19.


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Deuteronomio 32:33

222

Tomada° de los campos de Gomorra,

Sus uvas son uvas venenosas,

Y sus racimos, amargos.

33

    Su vino es ponzoña de monstruos,

Y veneno mortal de áspides.

34

    ¿No tengo esto recogido,

Y sellado en mis tesoros?

35

    Mía es la venganza° y la retribución,

Para el momento en que su pie 

resbale.

Porque el día de su perdición se 

acerca,

Y su suerte se apresura.

36

    Porque YHVH vindicará a su pueblo,

Y tendrá compasión de sus siervos.

Cuando vea que sus manos flaquean,

Y que ya no existe ni esclavo ni 

liberto,

37

    Dirá: ¿Dónde están sus dioses,

La roca en que se refugiaban?

38

    ¿No comían la grosura de sus 

sacrificios,

Y bebían el vino de sus libaciones?

¡Que se levanten y os ayuden,

Y sean para vosotros refugio!

39

    Pero ahora mirad: Yo soy Yo,

Y no hay Dios fuera de mí:

Yo hago morir y Yo hago vivir:

Yo hiero y Yo sano,

Y no hay quien libre de mi mano.

40

    Levanto pues a los cielos mi mano,

Y digo: ¡Yo vivo eternamente!

41

    Cuando afile la hoja centelleante de 

mi espada,

Y mi mano empuñe el juicio,

Tomaré venganza de mis adversarios,

Y daré el pago a los que me 

aborrecen.

42

    Embriagaré de sangre mis saetas,

Y mi espada devorará carne,

Con la sangre de muertos y cautivos,

De cabezas melenudas de caudillos 

enemigos.

43

    Exaltad, naciones, a su pueblo,°

Porque Él vengará la sangre de sus 

siervos,°

Retribuirá la venganza a sus 

adversarios,

Y expiará la sangre manante de su 

pueblo.

44

 Así  fue  que  Moisés,  acompañado  por 

Josué ben Nun, recitó todas las palabras 

de ese cántico a oídos del pueblo.

45

 Y cuando Moisés terminó de recitar to-

das esas palabras a todo Israel,

46

 les dijo: Poned vuestro corazón en to-

das las palabras que testifico contra voso-

tros hoy, y mandad a vuestros hijos que 

pongan por obra todas las palabras de esta 

Ley.

47

 Porque no os es palabra vana. Cierta-

mente es vuestra vida, y por ella prolon-

garéis los días en la tierra adonde vosotros 

vais, pasando el Jordán, para tomar pose-

sión de ella.

48

 Y aquel mismo día YHVH habló a Moi-

sés diciendo:

49

 Sube  a  este  monte  Abarim,°  al  mon-

te  Nebo,  que  está  en  la  tierra  de  Moab, 

frente  a  Jericó,  y  contempla  la  tierra  de 

Canaán que Yo doy a los hijos de Israel en 

posesión.

50

 Y muere en el monte al cual tú subes, 

y sé reunido a tu pueblo, tal como murió 

Aarón tu hermano en el monte Hor, y fue 

reunido a su pueblo.

51

 Por cuanto pecasteis contra mí en me-

dio de los hijos de Israel en las aguas de 

Meriba, en Cades, en el desierto de Zin, al 

no santificarme entre los hijos de Israel.

52

 Verás por tanto la tierra delante de ti, 

pero no entrarás allá, a la tierra que doy a 

los hijos de Israel.°

Bendición de Moisés a los hijos de Israel

33

Esta  es  la  bendición  con  la  cual 

Moisés, varón de Dios, bendijo a los 

hijos de Israel antes de su muerte.

2

 Dijo:

YHVH vino de Sinay,

Y desde Seir les esclareció,

Resplandeció desde el monte Parán,

Avanza° entre diez millares de 

santos,°

Con una Ley de fuego en su diestra 

para ellos.

3

    En verdad Él ha amado a nuestras° 

tribus:

¡Todos sus santos están en tu mano,

Se postran a tus pies,

32.32  .Tomada.  32.35 

→Ro.12.19;  He.10.30.  32.43  →Ro.15.10.  32.43  →Ap.19.2.  32.49  Esto  es,  los  que  cruzan

32.52 

→Nm.27.12-14; Dt.3.23-27.  33.2 Ar-atá = vino, llegó.  33.2 Ndesde Meriba de Cades.  33.3 .nuestras. 


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Deuteronomio 33:23

223

Y reciben tus palabras!

4

    (La Ley prescrita por Moisés,

Es herencia de la congregación de 

Jacob.)

5

    Él ha llegado a ser Rey en Jesurún,

Cuando las cabezas del pueblo 

fueron reunidas,

Juntamente con las tribus de Israel.

6

    Aunque sus varones sean pocos,

¡Viva Rubén y no muera!

7

 De Judá dijo:

¡Oye, oh YHVH, la voz de Judá,

Y hazlo venir ante su pueblo,

Basten para él sus propias manos,

Y sé Tú su auxilio contra sus 

adversarios!

8

 De Leví dijo:

Tu Tumim y tu Urim° sean para tu 

favorecido,

Al cual probaste en Masah,°

Por quien contendiste junto a las 

aguas de Meriba,°

9

    El que dijo de su padre y de su madre:

¡No los conozco!

Y no reconoció a sus hermanos,

E ignoró a sus propios hijos.

Porque guardaron tu dicho,

Y vigilaron sobre tu pacto.

10

    Ellos pues enseñarán tus decretos a 

Jacob,

Y tu Ley a Israel.

Ofrecerán incienso ante tu rostro,°

Y sacrificio perfecto sobre tu altar.

11

    ¡Bendice, oh YHVH, su vigor,

Y acepta la obra de sus manos,

Aplasta los lomos de los que se alzan 

contra él,

Y no se levanten quienes lo aborrecen!

12

 De Benjamín dijo:

Habite el amado de YHVH confiado 

junto a Aquél

Que lo protege todo el día

morando entre sus hombros.°

13

 De José dijo:

Bendita por YHVH sea su tierra,

Con la excelencia del rocío de los 

cielos,

Y con el hondo manantial que yace 

abajo,

14

    Con el raudal de los frutos del sol,

Y con el raudal de la germinación de 

las lunas,

15

    Con las cumbres de los montes 

antiguos,

Con la abundancia de los collados 

eternos,

16

    Y con el raudal de la tierra y su 

plenitud.

En fin, el favor de Aquél que habitó 

en la zarza,

Venga sobre la cabeza de José,

Y sobre la coronilla del consagrado 

entre sus hermanos.

17

    Como primogénito de buey sea su 

gloria,

Dos cuernos de búfalo sean sus 

cuernos,

Y acornee con ellos a las naciones,

Todas a una, hasta los confines de la 

tierra.

¡Tales son las miríadas de Efraín!

¡Tales los millares de Manasés!

18

 De Zabulón dijo:

¡Regocíjate, oh Zabulón, en tus

salidas marítimas,°

Y tú Isacar, en tus tiendas!

19

    Convocarán las tribus a la montaña,

Allí ofrecerán sacrificios de justicia,

Porque mamarán la abundancia de 

los mares,

Y los tesoros que esconden las arenas.

20

 De Gad dijo:

¡Bendito aquel que hizo ensanchar 

a Gad!

Cual leona se agazapó,

Desgarró a una el brazo con la 

mollera.

21

    Proveyó la primicia para sí,

Pues allí le fue guardada la porción 

del Legislador.

Se presentó a los cabezas del pueblo,

Dio cumplimiento a la justicia de 

YHVH,

Y a sus decretos para con Israel.

22

 De Dan dijo:

Dan es cachorro de león,

Que salta desde Basán.

23

 De Neftalí dijo:

¡Oh Neftalí, saciado de favores,

Y colmado de la bendición de YHVH,

33.8 

→Ex.28.30.  33.8 →Ex.17.7.  33.8 →Ex.17.7; Nm.20.13.  33.10 Lit. en su nariz.  33.12 Es decir, lo lleva cargado al hom-

bro

33.18 .marítimas 

→Gn.49.13. 


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Deuteronomio 33:24

224

Posee tú el mar° y su comarca!

24

 Y de Aser dijo:

¡Bendito con hijos sea Aser,

Sea acepto ante sus hermanos,

Y bañe en aceite su pie.

25

    De hierro y de bronce sea tu calzado,

Y tu vigor dure como tus días.

26

    Ninguno hay como el Dios de 

Jesurún,

Que cabalga sobre los cielos en tu 

auxilio,

Y en su majestad sobre las nubes.

27

    Tu refugio es el Dios de los siglos,

Bajo el cual se hallan los brazos 

eternos.

De tu presencia expulsa al enemigo,

Y decreta: ¡Destruye!

28

    Israel acampa en seguridad,

Apartada vive la fuente de Jacob,

En tierra de trigo y de vino,

Bajo sus cielos que destilan rocío.

29

    ¡Bienaventurado tú, oh Israel!

¡Quién como tú, oh pueblo salvado 

por YHVH,

Tu escudo protector,

Y espada de tu grandeza!

Tus enemigos te adularán,

Mientras tú pisoteas sus alturas.

Muerte de Moisés

34

Después Moisés subió de la llanura 

de Moab al monte Nebo, a la cum-

bre del Pisga, que está frente a Jericó, y 

YHVH le hizo ver toda la tierra, desde Ga-

laad hasta Dan,

2

 y todo Neftalí, y la tierra de Efraín y de 

Manasés, y toda la tierra de Judá, hasta el 

Mar Occidental,

3

 y  el  Neguev,  y  la  llanura  del  valle  de 

Jericó (la ciudad de las palmeras), hasta 

Soar.

4

 Y le dijo YHVH: Esta es la tierra de la cual 

juré a Abraham,° a Isaac° y a Jacob,° dicien-

do: A tu simiente la daré. Te he permitido 

verla con tus ojos, pero allá no pasarás.

5

 Y Moisés, siervo de YHVH, murió pues 

allí, en la tierra de Moab, conforme al di-

cho de YHVH.

6

 Y lo sepultó° en el valle, en la tierra de 

Moab,  frente  a  Bet-peor.  Y  no  ha  sabido 

hombre  alguno  el  lugar  de  su  sepulcro 

hasta el día de hoy.

7

 Y  era  Moisés  de  edad  de  ciento  veinte 

años  cuando  murió.  Sus  ojos  nunca  se 

oscurecieron,  ni  se  había  debilitado  su 

vigor.

8

 Y los hijos de Israel lloraron a Moisés en 

los  llanos  de  Moab  durante  treinta  días, 

cumpliendo  así  los  días  del  llanto  como 

duelo por Moisés.

9

 Y Josué ben Nun fue lleno del espíritu 

de sabiduría, pues Moisés había impuesto 

sus manos sobre él; y los hijos de Israel 

le obedecieron e hicieron tal como YHVH 

había ordenado a Moisés.

10

 Pero no se ha levantado aún° otro pro-

feta en Israel semejante a Moisés, a quien 

YHVH trataba cara a cara,°

11

 ya en razón de todas las señales y pro-

digios  que  YHVH  le  envió  a  hacer  en  el 

país  de  Egipto  con  respecto  a  Faraón,  a 

todos sus siervos y a toda su tierra,

12

 ya en razón de toda aquella mano po-

derosa  y  de  todos  aquellos  grandes  por-

tentos  que  hizo  Moisés  en  presencia  de 

todo Israel.

33.23 Esto es, el Mar de Galilea.  34.4 

→Gn.12.7.  34.4 →Gn.26.3.  34.4 →Gn.28.13.  34.6 Es decir, Dios.  34.10 →18.15,18. 

34.10 

→Ex.33.11. 


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1

Después de la muerte de Moisés, siervo 

de YHVH, aconteció que YHVH habló 

a  Josué°  ben  Nun,  ministro°  de  Moisés, 

diciendo:

2

 Moisés mi siervo ha muerto. Ahora pues 

levántate, cruza este Jordán tú y todo este 

pueblo, a la tierra que doy a los hijos de 

Israel.

3

 Como dije a Moisés: todo lugar que pise 

la planta de vuestro pie lo he entregado a 

vosotros.

4

 Desde el desierto y este Líbano hasta el 

gran Río, el río Éufrates, toda la tierra de 

los heteos hasta el mar Grande, hacia la 

puesta del sol, serán vuestros términos.

5

 Nadie te podrá resistir° en todos los días 

de tu vida. Como estuve con Moisés, es-

taré contigo. No te dejaré ni te desampa-

raré.°

6

 Esfuérzate y sé valiente,° porque tú ha-

rás que este pueblo herede la tierra que 

juré a sus padres que les daría.

7

 Solamente esfuérzate y sé muy valien-

te, cuidando de hacer conforme a toda la 

Ley que mi siervo Moisés te ordenó. No te 

apartes de ella ni a diestra ni a siniestra, 

para que tengas buen éxito dondequiera 

que vayas.

8

 No se aparte de tu boca el libro de esta 

Ley. De día y de noche meditarás° en él, 

para que cuides de hacer conforme a todo 

aquello  que  está  en  él  escrito,  porque 

entonces  harás  próspero  tu  camino,  y 

tendrás buen éxito.

9

 ¿No te lo estoy ordenando Yo? ¡Esfuér-

zate pues y sé valiente! No te intimides° 

ni desmayes,° porque YHVH tu Dios está 

contigo dondequiera que vayas.

10

 Enseguida° Josué ordenó a los oficia-

les del pueblo, diciendo:

11

 Pasad  en  medio  del  campamento, 

mandad  al  pueblo,  y  decidle:  Preparaos 

ración, porque dentro de tres días cruza-

réis este Jordán para entrar a conquistar 

la tierra que YHVH vuestro Dios os da en 

posesión.

12

 Josué habló también a los rubenitas, a 

los gaditas y a la media tribu de Manasés, 

diciéndoles:

13

 Acordaos  de  la  palabra  que  Moisés, 

siervo  de  YHVH,  os  ordenó  diciendo: 

YHVH vuestro Dios os ha hecho descan-

sar y os ha dado esta tierra.

14

 Vuestras  mujeres,  vuestros  pequeños 

y vuestros ganados quedarán en la tierra 

que Moisés os ha dado a este lado del Jor-

dán, pero todos vosotros, los hombres de 

valor, pasaréis armados° al frente de vues-

tros hermanos y los ayudaréis,

15

 hasta  tanto  YHVH  conceda  descanso 

a vuestros hermanos como a vosotros, y 

ellos también posean la tierra que YHVH 

vuestro  Dios  les  ha  de  dar;  entonces  os 

volveréis a la tierra de vuestra posesión y 

la poseeréis, la misma que Moisés, siervo 

Promesa divina

1.1 Esto es: Salvación de YHVH.  1.1 Heb. mesharet = ministro. Esto es, servidor voluntario o administrador sobre una casa junto 

con sus bienes

→Gn.39.4 distinto de ´ébed = siervo, es decir, una persona bajo servicio obligatorio, no necesariamente con 

un cargo elevado y, en muchos casos, bajo peso de esclavitud. 

→Ex.5.15-16  1.5 →Dt.11.24-25.  1.5 →Dt.31.6,8; He13.5. 

1.6 

→Dt.31.6,7,23.  1.8 Heb. jagah. Este verbo involucra no sólo la acción del pensamiento sino que, a causa de su intensidad 

→Sal.1.2 el pensamiento se manifiesta en expresiones audibles.  1.9 Nótese que no es el mismo verbo que en 8.1.  1.9 Heb. 

jatat. Esta raíz verbal implica estar consternado o confuso ante una derrota o fracaso

1.10 Aquí la puntuación del hebreo es 

consecutiva e indica una acción inmediata en respuesta al mandato anterior. 

1.14 Heb. jamushim = quintados, en grupos de 

cincuenta


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Josué 1:16

226

de  YHVH,  os  dio  a  este  lado  del  Jordán, 

hacia donde nace el sol.°

16

 Entonces respondieron a Josué, dicien-

do: Haremos todo lo que nos has ordena-

do, e iremos a dondequiera nos envíes.

17

 De la manera que obedecimos a Moisés 

en todo, así te obedeceremos a ti, con tal 

que YHVH tu Dios esté contigo como es-

tuvo con Moisés.

18

 Cualquiera que sea rebelde a tu dicho, 

y no obedezca tus palabras en todo lo que 

le ordenes, que sea muerto, con tal que te 

esfuerces y seas valiente.

Los dos espías

2

Entretanto, Josué ben Nun había en-

viado secretamente desde Sitim a dos 

espías,  diciendo:  Id  y  reconoced  el  país, 

particularmente° a Jericó. Y ellos fueron 

a casa de cierta mujer ramera cuyo nom-

bre era Rahab,° y se acostaron allí.

2

 Pero se le dio aviso al rey de Jericó, di-

ciendo: He ahí unos hombres de los hijos 

de  Israel  han  entrado  durante  la  noche 

para espiar el país.

3

 Entonces el rey de Jericó envió a decir 

a Rahab: ¡Echa fuera a esos hombres que 

llegaron  a  ti  y  han  entrado  en  tu  casa, 

pues han venido a espiar todo el país!

4

 Pero la mujer ya había tomado a los dos 

hombres y los había ocultado. Ella pues 

respondió: Verdad es que los hombres vi-

nieron  a  mí,  pero  yo  no  sabía  de  dónde 

eran,

5

 y al oscurecer, cuando se iba a cerrar la 

puerta  de  la  ciudad,°  los  hombres  salie-

ron. No sé dónde se hayan ido esos hom-

bres. Seguid rápidamente en pos de ellos 

que los alcanzaréis.

6

 Pero ella los había hecho subir al terra-

do, y los había escondido entre unos ma-

nojos de lino que tenía acomodados en el 

terrado.

7

 Así pues, aquellos hombres fueron en pos 

de ellos camino del Jordán, hasta los va-

dos; y tan pronto como los perseguidores 

hubieron salido, se cerraron las puertas.

8

 Y  antes  que  se  acostaran,  ella  subió  al 

terrado y les dijo:

9

 Yo se que YHVH os ha dado la tierra, y 

que el terror vuestro° ha caído sobre no-

sotros,  y  que  todos  los  habitantes  de  la 

tierra desfallecen° ante vosotros.

10

 Porque hemos oído cómo YHVH hizo 

secar las aguas del Mar Rojo° delante de 

vosotros cuando salisteis de Egipto, y lo 

que hicisteis a los dos reyes del amorreo 

allende el Jordán: a Sehón y a Og, a quie-

nes destruisteis° por completo.

11

 Y cuando lo oímos, se nos derritió° el 

corazón, y no ha quedado más aliento en 

hombre alguno por causa de vosotros, por-

que YHVH vuestro Dios, Él solo es ’Elohim 

arriba en los cielos y abajo en la tierra.

12

 Ahora pues, os ruego que me juréis por 

YHVH, que como he hecho misericordia 

con vosotros, así también vosotros haréis 

misericordia con la casa de mi padre, de 

lo cual me daréis una contraseña segura,

13

 y haréis que viva mi padre y mi madre, 

mis hermanos y hermanas, y todo lo suyo, 

librando nuestras almas de la muerte.

14

 A lo cual le dijeron los hombres: Nues-

tra vida responderá por la vuestra, con tal 

que no denunciéis este asunto nuestro; y 

será que cuando YHVH nos entregue esta 

tierra,  mostraremos  contigo  fidelidad  y 

bondad.

15

 Entonces  ella  los  hizo  descender  con 

una cuerda por la ventana (pues su casa 

estaba adosada al muro, y ella vivía en el 

muro),

16

 y les dijo: Marchaos al monte, no sea 

que os alcancen los perseguidores. Os es-

conderéis allí tres días, hasta que hayan 

vuelto los perseguidores, y después segui-

réis vuestro camino.

17

 Y  los  hombres  le  dijeron:  Sin  culpa 

seremos  en  lo  tocante  a  este  juramento 

tuyo° con que nos has juramentado,

18

 a  menos  que  cuando  entremos  en  el 

país, tú ates este cordón de hilo escarlata 

a la ventana por donde nos vas a descol-

gar. Reunirás entonces a tu padre y a tu 

madre, a tus hermanos y a toda la casa de 

tu padre contigo en tu casa,

19

 pues acontecerá que la sangre de todo 

aquel que salga fuera de las puertas de tu 

1.15 

→Nm.32.28-32; Dt.3.18-20; Jos.22.1-6.   2.1 .particularmente.  2.1 →He.11.31; Jac.2.25.  2.5 .de la ciudad.  2.9 Es 

decir, el terror que genera la fama de vuestro nombre

2.9 Lit. se derriten 

→Nm.14.9.  2.10 →Ex.14.21.  2.10 →Nm.21.21-35. 

2.11 

→Nm.14.9.  2.17 Lit. tu juramento. Es decir, el juramento (o compromiso) es de ellos, pero la promesa es para la mujer. 


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Josué 3:16

227

casa, caerá sobre su propia cabeza, y no-

sotros estaremos sin culpa, pero la sangre 

de cualquiera que esté contigo en la casa 

caerá sobre nuestra cabeza, si mano algu-

na lo toca.

20

 Pero si denuncias este asunto nuestro, 

quedaremos desobligados de este juramen-

to tuyo con que nos has juramentado.

21

 A lo cual ella respondió: Sea conforme 

a  vuestras  palabras.  De  esta  manera  los 

despidió y se fueron, y ella ató a la venta-

na el cordón° escarlata.

22

 Ellos  pues  caminaron  y  llegaron  al 

monte,  y  permanecieron  allí  tres  días, 

hasta  que  los  perseguidores  regresaron, 

porque  quienes  los  perseguían  habían 

buscado por todo el camino, pero no los 

habían hallado.

23

 Entonces los dos hombres regresaron, y 

descendiendo del monte, cruzaron al otro 

lado y llegaron adonde Josué ben Nun, y le 

relataron todo lo que les habían ocurrido.

24

 Y dijeron a Josué: ¡Ciertamente YHVH 

ha entregado en nuestra mano toda esta 

tierra, porque todos los habitantes de la 

tierra desmayan° a causa de nosotros!

El paso del Jordán

3

Josué se levantó muy de mañana, y él 

y  todos  los  hijos  de  Israel  partieron 

de Sitim y llegaron hasta el Jordán, y allí 

pernoctaron antes de cruzarlo.

2

 Al cabo de tres días, aconteció que los 

oficiales recorrieron el campamento,

3

 y mandaron al pueblo, diciendo: Cuando 

veáis el Arca del Pacto de YHVH vuestro 

Dios y a los levitas sacerdotes que la car-

gan, vosotros partiréis de vuestro lugar y 

marcharéis en pos de ella,

4

 para  que  sepáis  el  camino  por  donde 

habéis de ir, por cuanto no habéis pasado 

antes por este camino; pero no os acerca-

réis a ella, sino que habrá entre vosotros y 

ella una distancia como de dos mil codos 

medidos.

5

 Y Josué dijo al pueblo: ¡Santificaos, que 

mañana YHVH hará maravillas en medio 

de vosotros!

6

 Josué habló a los sacerdotes, diciendo: 

Cargad el Arca del Pacto y pasad delante 

del  pueblo.  Y  ellos  cargaron  el  Arca  del 

Pacto, y anduvieron delante del pueblo.

7

 Y YHVH dijo a Josué: Desde este día co-

menzaré a engrandecerte ante los ojos de 

todo Israel, para que sepan que como es-

tuve con Moisés, así también estaré con-

tigo.

8

 Tú  mismo  mandarás  a  los  sacerdotes 

que  cargan  el  Arca  del  Pacto,  diciendo: 

Cuando lleguéis al borde de las aguas del 

Jordán,  os  detendréis  en  el  mismo  Jor-

dán.

9

 Y Josué dijo a los hijos de Israel: Acer-

caos acá y escuchad las palabras de YHVH 

vuestro Dios.

10

 Y  dijo  Josué:  En  esto  conoceréis  que 

el Dios vivo está en medio de vosotros. Él 

ciertamente  hará  que  el  cananeo,  el  he-

teo,  el  heveo,  el  ferezeo,  el  gergeseo,  el 

amorreo y el jebuseo sean desposeídos.

11

 He aquí el Arca del Pacto del Señor de 

toda la tierra va a cruzar el Jordán delante 

de vosotros.

12

 Tomad ahora doce hombres de las tri-

bus de Israel, un hombre por cada tribu,

13

 y sucederá que cuando las plantas de 

los  pies  de  los  sacerdotes  que  cargan  el 

Arca  de  YHVH,  Señor  de  toda  la  tierra, 

se  asienten  en  las  aguas  del  Jordán,  las 

aguas del Jordán serán cortadas, porque 

las aguas que vienen de arriba se deten-

drán como en un embalse.

14

 Y aconteció que cuando el pueblo par-

tió de sus tiendas para cruzar el Jordán, 

andando los sacerdotes portadores el Arca 

del Pacto delante del pueblo,

15

 tan  pronto  como  los  portadores  del 

Arca llegaron al Jordán, y los pies de los 

sacerdotes  que  llevaban  el  Arca  se  mo-

jaron  en  la  orilla  de  las  aguas  (pues  el 

Jordán se desborda por todas sus riberas 

todo el tiempo de la siega),

16

 las aguas que venían bajando de arriba 

se detuvieron, y se fueron elevando como 

en un embalse, a gran distancia, junto a 

Adam, la ciudad que está al lado de Sare-

tán; y las que descendían hacia el Mar del 

Arabá,  el  Mar  de  la  Sal,  fueron  cortadas 

completamente. Y el pueblo cruzó frente 

a Jericó.

2.21 Heb. tiqvah. En otros contextos esta palabra significa esperanza 

→Sal.9.18.  2.24 Lit. se derriten →Nm.14.9.


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Josué 3:17

228

17

 Y los sacerdotes que cargaban el Arca 

del  Pacto  de  YHVH  se  pararon  en  lo 

seco, firmes en medio del Jordán, mien-

tras  todo  Israel  cruzaba  en  seco,  hasta 

que la nación entera terminó de cruzar 

el Jordán.

Las doce piedras

4

Cuando todo el pueblo hubo acabado 

de pasar el Jordán, YHVH habló a Jo-

sué, diciendo:

2

 Escoged doce hombres del pueblo, uno 

por cada tribu,

3

 y ordénales, diciendo: Alzad de aquí, de en 

medio del Jordán, del lugar donde se han 

mantenido firmes los pies de los sacerdo-

tes, doce piedras; y traedlas y depositadlas 

en el lugar donde posaréis esta noche.

4

 Entonces Josué llamó a los doce hom-

bres  que  había  establecido  de  entre  los 

hijos de Israel, uno de cada tribu,

5

 y  les  dijo  Josué:  Pasad  ante  el  Arca  de 

YHVH vuestro Dios al medio del Jordán, y 

llevad cada uno una piedra sobre su hom-

bro, según el número de las tribus de los 

hijos de Israel.

6

 Y esto será señal en medio de vosotros, 

para  que  cuando  vuestros  hijos  os  pre-

gunten mañana, diciendo: ¿qué significan 

estas piedras para vosotros?,

7

 les digáis: Las aguas del Jordán fueron 

divididas  delante  del  Arca  del  Pacto  de 

YHVH cuando cruzó el Jordán. Las aguas 

del  Jordán  fueron  cortadas,  y  estas  pie-

dras  serán  por  memorial  a  los  hijos  de 

Israel para siempre.

8

 Y los hijos de Israel hicieron tal como 

Josué  había  ordenado,  y  alzaron  doce 

piedras de en medio del Jordán, tal como 

YHVH había hablado a Josué, conforme al 

número  de  las  tribus  de  los  hijos  de  Is-

rael. Y las hicieron pasar con ellos hasta 

el sitio donde acampaban, y las asentaron 

allí.

9

 Josué también hizo erigir doce piedras 

en  medio  del  Jordán,  en  el  lugar  donde 

habían  estado  los  pies  de  los  sacerdotes 

que cargaban el Arca del Pacto. Y allí es-

tán hasta este día.

10

 Y los sacerdotes que cargaban el Arca 

permanecieron  en  medio  del  Jordán, 

hasta que se cumplió todo lo que YHVH 

había ordenado a Josué que dijera al pue-

blo,  según  todo  lo  que  Moisés  había  or-

denado a Josué. Y el pueblo se apresuró 

a cruzar.

11

 Y sucedió que cuando todo el pueblo 

terminó de cruzar, entonces cruzó el Arca 

de YHVH juntamente con los sacerdotes, 

a vista del pueblo.

12

 También los hijos de Rubén, los hijos 

de Gad y la media tribu de Manasés, cru-

zaron armados° al frente de los hijos de 

Israel, tal como Moisés les había hablado.

13

 Unos  cuarenta  mil  hombres  armados 

para  la  guerra  pasaron  en  presencia  de 

YHVH en formación de batalla a la llanu-

ra de Jericó.

14

 Y aquel día YHVH engrandeció a Josué 

a ojos de todo Israel, y le temieron todos 

los días de su vida, como habían temido 

a Moisés.

15

 Y YHVH habló a Josué, diciendo:

16

 Ordena a los sacerdotes que cargan el 

Arca del Testimonio° que salgan del Jor-

dán.

17

 Y  Josué  ordenó  a  los  sacerdotes,  di-

ciendo: ¡Salid del Jordán!

18

 Y  aconteció  que  cuando  los  sacer-

dotes que cargaban el Arca del Pacto de 

YHVH  salieron  de  en  medio  del  Jordán, 

tan pronto como las plantas de los pies de 

los  sacerdotes  estuvieron  en  lo  seco,  las 

aguas del Jordán se volvieron a su lugar y 

llegaron a sus orillas como antes.

19

 Y  el  día  décimo  del  mes  primero  el 

pueblo salió del Jordán y acampó en Gil-

gal, al extremo oriental de Jericó.

20

 Y Josué hizo erigir en Gilgal las doce 

piedras que habían tomado del Jordán,

21

 y habló a los hijos de Israel, diciendo: 

Cuando  vuestros  hijos  pregunten  a  sus 

padres  el  día  de  mañana,  y  digan:  ¿Qué 

significan estas piedras?

22

 Haréis saber a vuestros hijos, diciendo: 

Israel cruzó sobre lo seco este Jordán,

23

 porque YHVH vuestro Dios hizo secar 

las aguas del Jordán delante de vosotros 

hasta  que  cruzasteis,  así  como  YHVH 

vuestro  Dios  lo  hizo  en  el  Mar  Rojo,  al 

cual secó ante nosotros hasta que lo cru-

zamos,

4.12 

→1.14.  4.16 Heb. ´edut = testimonio. Es decir: Los Diez Mandamientos. →Dt.10.2.


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Josué 6:4

229

24

 para que todos los pueblos de la tierra 

puedan  conocer  que  la  mano  de  YHVH 

es poderosa, a fin de que temáis a YHVH 

vuestro Dios todos los días.

La circuncisión y la Pascua

5

Y sucedió que cuando todos los reyes 

amorreos que estaban al occidente, al 

otro lado del Jordán, y todos los reyes ca-

naneos que estaban frente al mar, oyeron 

cómo YHVH había hecho secar las aguas 

del  Jordán  ante  los  hijos  de  Israel  hasta 

que cruzamos,° desfalleció° su corazón y 

no hubo en ellos más aliento delante de 

los hijos de Israel.

2

 En  aquel  tiempo  YHVH  dijo  a  Josué: 

Hazte  cuchillos  de  pedernal  y  de  nuevo 

vuelve  a  circuncidar  a  los  hijos  de  Is-

rael.°

3

 Y Josué se hizo cuchillos de pedernal y 

circuncidó a los hijos de Israel en Guivat-

haaralot.°

4

 Y la causa por la cual Josué los circunci-

dó fue porque el pueblo salido de Egipto, 

los varones, todos los hombres de guerra, 

habían muerto en el desierto, por el cami-

no, después que salieron de Egipto.

5

 Y aunque todos los del pueblo que ha-

bían salido estaban circuncidados, todos 

los  del  pueblo  que  habían  nacido  en  el 

desierto, por el camino, después de haber 

salido de Egipto, no habían sido circun-

cidados.

6

 Porque  los  hijos  de  Israel  anduvieron 

por el desierto cuarenta años, hasta que 

toda  la  nación,  es  decir,  los  hombres  de 

guerra que habían salido de Egipto, fue-

ron  consumidos  por  no  obedecer  la  voz 

de YHVH, por lo que YHVH les juró que 

no los dejaría ver la tierra que YHVH ha-

bía prometido a sus padres que nos° da-

ría, tierra que fluye leche y miel.°

7

 Pero a los hijos de ellos, que Él había le-

vantado en su lugar, Josué los circuncidó, 

pues  estaban  incircuncisos,  pues  no  los 

habían circuncidado en el camino.

8

 Cuando pues terminaron de circuncidar 

a  toda  la  nación,  permanecieron  en  sus 

lugares  en  el  campamento  hasta  que  se 

recobraron.

9

 Entonces  dijo  YHVH  a  Josué:  Hoy  he 

hecho rodar de sobre vosotros el oprobio 

de Egipto. Y el nombre de aquel lugar se 

llamó Gilgal° hasta este día.

10

 Y a los catorce días del mes, entre las 

dos tardes, los hijos de Israel acamparon 

en  Gilgal,  y  celebraron  la  Pascua°  en  la 

llanura de Jericó.

11

 Y en aquel mismo día, a la mañana si-

guiente de la Pascua, comieron del pro-

ducto  de  la  tierra:  panes  sin  levadura  y 

grano tostado.

12

 Y  después  que  hubieron  comido  del 

producto de la tierra, el maná cesó° en la 

mañana, y ya no hubo más maná para los 

hijos de Israel. Y aquel mismo año comie-

ron del fruto de la tierra de Canaán.

13

 Sucedió que estando Josué cerca de Je-

ricó, levantó sus ojos y he aquí que vio a 

un varón en pie frente a él con su espada 

desenvainada en su mano. Y Josué fue ha-

cia él y le dijo: ¿Eres tú de los nuestros o 

de nuestros adversarios?

14

 Y él dijo: No, Yo soy Príncipe del ejérci-

to de YHVH que he venido ahora. Y Josué 

cayó en tierra sobre su rostro y adoró, y le 

dijo: ¿Qué dice mi Señor a su siervo?

15

 Respondió  el  Príncipe  del  ejército  de 

YHVH a Josué: Quita el calzado de tu pie, 

porque el lugar donde tú estás es santo. Y 

Josué hizo así.

La conquista de Jericó

6

Ahora  bien,  a  causa  de  los  hijos  de 

Israel,°  Jericó  estaba  cerrada  y  bien 

atrancada. Nadie salía y nadie entraba.

2

 Entonces  YHVH  dijo  a  Josué:  He  aquí 

he entregado en tu mano a Jericó con su 

rey y sus hombres valerosos.

3

 Rodearéis  pues  la  ciudad  todos  los  va-

rones  de  guerra,  yendo  alrededor  de  la 

ciudad una vez, y esto harás durante seis 

días.

4

 Y  siete  sacerdotes  cargarán  los  siete 

cuernos°  del  jubileo°  delante  del  Arca. 

Al  séptimo  día  daréis  siete  vueltas  a  la 

5.1 cruzamos. El texto hebreo registraba el plural de primera persona, indicando que el autor del libro participó de esa experiencia. 

Los masoretas corrigieron a tercera persona (cruzaron). 

5.1 Lit. se derritió 

→Nm.14.9.  5.2 Es decir, a la nueva generación de 

israelitas

5.3 Esto es, Colina de los prepucios.  5.6 

→5.1 Nota.  5.6 →Nm.14.28-35.  5.9 Esto es, rueda.  5.10 →Ex.12.1-13. 

5.12 

→Ex.16.35.  6.1 LXX omite a causa de los hijos de Israel.  6.4 lit, shofar. Esto es, corneta hecha del cuerno de un carnero

6.4 Heb. yobelim, solemnidades que comenzaban con el toque del shofar


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Josué 6:5

230

ciudad, y los sacerdotes soplarán el sho-

far.°

5

 Y  sucederá  que  cuando  hagan  resonar 

con  fuerza  el  cuerno  del  carnero,  cuan-

do escuchéis el sonido del shofar, todo el 

pueblo gritará con gran alarido, entonces 

la muralla de la ciudad caerá a plomo y el 

pueblo subirá, cada uno hacia el frente.

6

 Y  Josué  ben  Nun  convocó  a  los  sacer-

dotes, y les dijo: Cargad el Arca del Pacto, 

y que siete sacerdotes lleven los cuernos 

del jubileo delante del Arca de YHVH.

7

 Y dijo al pueblo: Pasad y rodead la ciu-

dad, y el que esté armado pase delante del 

Arca de YHVH.

8

 Y  sucedió  que  cuando  Josué  habló  al 

pueblo,  los  siete  sacerdotes  que  lleva-

ban los siete cuernos del jubileo pasaron 

delante  del  Arca  de  YHVH  y  tocaron  el 

shofar; y el Arca del Pacto de YHVH los 

seguía.

9

 Y  el  que  estaba  armado  iba  delante  de 

los sacerdotes que tocaban el shofar, y la 

retaguardia iba detrás del Arca, andando y 

haciendo resonar el shofar.

10

 Y Josué había dado orden al pueblo, di-

ciendo: No gritaréis, ni haréis oír vuestra 

voz,  ni  saldrá  palabra  alguna  de  vuestra 

boca, hasta el día cuando yo os diga: ¡Gri-

tad! Entonces gritaréis.

11

 E  hizo  que  el  Arca  de  YHVH  rodeara 

la ciudad, yendo en torno de ella una vez, 

y regresaron al campamento y pasaron la 

noche en el campamento.

12

 Y Josué se levantó muy de mañana, y 

los sacerdotes cargaron el Arca de YHVH.

13

 Y los siete sacerdotes que llevaban los 

siete cuernos del jubileo delante del Arca 

de  YHVH,  emprendieron  la  marcha  ha-

ciendo resonar el shofar continuamente. 

El que estaba armado iba a la vanguardia, 

y la retaguardia marchaba en pos del Arca 

de YHVH, mientras los cuernos° resona-

ban continuamente.

14

 Y  el  segundo  día  rodearon  la  ciudad 

una vez, y regresaron al campamento. Así 

hicieron durante seis días.

15

 El  séptimo  día  se  levantaron  al  rayar 

el alba, y rodearon la ciudad de la misma 

manera, siete veces. Sólo en aquel día ro-

dearon la ciudad siete veces.

16

 Y  aconteció  a  la  séptima  vez,  cuando 

los sacerdotes hicieron resonar el shofar, 

que Josué dijo al pueblo: ¡Gritad, porque 

YHVH os ha dado la ciudad!

17

 La ciudad y todo lo que hay en ella será 

consagrada al exterminio como ofrenda a 

YHVH. Sólo Rahab la ramera vivirá, jun-

to con todos los que estén en la casa con 

ella, porque escondió a los emisarios que 

enviamos.

18

 Absteneos escrupulosamente de no to-

car  nada  dedicado  al  exterminio,  no  sea 

que hagáis maldito y perturbéis al cam-

pamento de Israel.

19

 Pero toda la plata, el oro y los objetos 

de bronce y de hierro serán consagrados 

para YHVH, e irán al tesoro de YHVH.

20

 Entonces el pueblo gritó y se hizo re-

sonar el shofar. Y aconteció que cuando el 

pueblo oyó el sonido del shofar, el pueblo 

gritó con gran alarido, y la muralla cayó° 

sobre sí misma. Entonces el pueblo subió 

hacia la ciudad, cada uno de frente, y con-

quistaron la ciudad.

21

 Luego  exterminaron  a  filo  de  espada 

todo  lo  que  había  en  la  ciudad:  hombre 

y mujer, joven y anciano, y hasta los bue-

yes, las ovejas y los asnos.

22

 Entonces Josué dijo a los dos hombres 

que habían explorado la tierra: Entrad en 

casa de la mujer ramera, y haced salir de 

allí a la mujer y a todo lo que sea suyo, 

según le jurasteis.

23

 Y  los  jóvenes  emisarios  entraron  y 

sacaron  a  Rahab,  a  su  padre,  a  su  ma-

dre y a sus hermanos, a todos los suyos. 

Sacaron  también  a  todos  sus  parientes, 

y los ubicaron fuera del campamento de 

Israel.

24

 Y prendieron fuego a la ciudad y todo 

lo que había en ella. Sólo pusieron en el 

tesoro de la Casa de YHVH la plata, el oro 

y los objetos de bronce y de hierro.

25

 Pero Josué preservó la vida a Rahab la 

ramera, y a la casa de su padre y a todos 

los  suyos.  Y  ella  habita  en  medio  de  Is-

rael  hasta  este  día,  por  cuanto  escondió 

a los emisarios que Josué envió a espiar 

Jericó.°

26

 En aquel tiempo Josué les impuso un 

juramento, diciendo: ¡Maldito delante de 

6.4 LXX omite versículo.  6.13 Lit. shofar.  6.20 

→He.11.30.  6.25 →He.11.31.


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Josué 7:19

231

YHVH el hombre que se levante para ree-

dificar esta ciudad de Jericó! ¡Al precio de 

su primogénito eche sus cimientos y al de 

su hijo menor ponga sus portones!°

27

 Y YHVH estaba con Josué, y su fama se 

divulgó por toda la tierra.

El pecado de Acán

7

Pero  los  hijos  de  Israel  fueron  infie-

les° en cuanto a lo del anatema,° por-

que Acán° ben Carmi, hijo de Zabdi, hijo 

de Zera, de la tribu de Judá, se apropió del 

anatema,  por  lo  cual  la  ira  de  YHVH  se 

encendió contra los hijos de Israel.

2

 Y  Josué  había  enviado  hombres  desde 

Jericó hasta Hai,° que estaba junto a Bet-

Avén,°  al  oriente  de  Bet-’El,  y  les  había 

dicho: Subid y espiad la tierra. Y ellos su-

bieron y espiaron a Hai.

3

 Y regresaron a Josué, y le dijeron: Que 

no  suba  todo  el  pueblo,  sino  que  suban 

como dos o tres mil hombres, y tomen a 

Hai.  No  hagas  que  todo  el  pueblo  se  fa-

tigue  marchando  allá,  porque  ellos  son 

pocos.

4

 De manera que del pueblo subieron allí 

como  tres  mil  hombres,  pero  huyeron 

ante los hombres de Hai.

5

 Y  los  hombres  de  Hai  hirieron  a  unos 

treinta  y  seis  hombres,  y  los  persiguie-

ron desde la puerta hasta Sebarim,° y los 

derrotaron en la bajada; y el corazón del 

pueblo se derritió, y se hizo como agua.

6

 Entonces  Josué  rasgó  sus  vestidos,  y 

cayó  sobre  su  rostro  en  tierra  ante  el 

Arca° de YHVH hasta la tarde, él y los an-

cianos de Israel, y se echaron polvo sobre 

sus cabezas.

7

 Y  dijo  Josué:  ¡Ah,  Adonay  YHVH!  ¿Por 

qué hiciste pasar° el Jordán a este pueblo 

para  entregarnos  en  mano  del  amorreo 

para  destruirnos?  ¡Ojalá  nos  hubiéramos 

propuesto habitar al otro lado del Jordán!

8

 ¡Ah, Adonay! ¿Qué puedo decir después 

que  Israel  ha  vuelto  la  espalda  ante  sus 

enemigos?

9

 Pues cuando el cananeo y todos los habi-

tantes de esta tierra lo oigan, nos rodearán 

y cortarán nuestro nombre de la tierra, y 

¿qué harás Tú por tu gran Nombre?

10

 Pero  YHVH  dijo  a  Josué:  ¡Levántate! 

¿Por qué estás así postrado sobre tu ros-

tro?

11

 Israel ha pecado, y también ha traspa-

sado mi pacto que Yo les ordené. Sí, han 

tomado del anatema, y también han roba-

do, y también han mentido, y también lo 

han puesto entre sus enseres.

12

 Por eso los hijos de Israel no pueden 

estar  erguidos  ante  sus  enemigos,  sino 

que vuelven la espalda ante sus enemigos, 

por cuanto llegaron a ser malditos. Si no 

destruís a los malditos de entre vosotros, 

no continuaré estando con vosotros.

13

 Levántate,  santifica  al  pueblo  y  diles: 

Santificaos para mañana, porque así dice 

YHVH el Dios de Israel: ¡Hay un anatema 

en medio de ti, oh Israel! ¡No podrás ha-

cer frente a tus enemigos hasta que qui-

tes de tu seno a los malditos!

14

 Os acercaréis pues mañana por la ma-

ñana  con  arreglo  a  vuestras  tribus,  y  la 

tribu que designe YHVH se acercará por 

familias, y la familia que designe YHVH se 

acercará por casas, y la casa que designe 

YHVH se acercará hombre por hombre.

15

 Y acontecerá que el que sea designado 

con  motivo  del  anatema,  será  quemado 

en la hoguera, él y todo lo que posee, por 

cuanto ha traspasado el pacto de YHVH al 

cometer una vileza en Israel.

16

 Entonces Josué se levantó muy de ma-

ñana, e hizo acercar a Israel por sus tri-

bus: Y fue señalada la tribu de Judá.

17

 E hizo acercar a la tribu de Judá, y fue 

señalada la familia de los de Zera. E hizo 

que se acercara la familia de los de Zera, 

por varones, y fue señalado Zabdi.

18

 E  hizo  que  los  varones  de  su  casa  se 

acercaran, y fue señalado Acán ben Car-

mi, hijo de Zabdi, hijo de Zera, de la tribu 

de Judá.

19

 Entonces Josué dijo a Acán: Hijo mío, 

da gloria ahora a YHVH Dios de Israel, y 

haz confesión, y declárame lo que has he-

cho sin ocultarme nada.

6.26 

→1 R.16.34.  7.1 Heb. vaimalu - maal = fueron infieles (con) infidelidad. El juego de palabras enfatiza la acción.  7.1 Esto 

es, de lo que había sido dedicado al exterminio

7.1 Heb. ajar = turbación 

→Gn.34.30.  7.2 Esto es, ruina.  7.2 Esto es, casa de 

falsedad

7.5 Heb. hashebarim = los quebrantos.  7.6 LXX omite Arca prob. basada en un texto donde el vocablo hebreo ´Arón = 

Arca se remplaza por ´Adón = Señor 

→v.7.  7.7 LXX: ¿Por qué tu siervo ha hecho pasar a este pueblo?, evitando así que Josué 

formule cargos contra Dios.


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Josué 7:20

232

20

 Y  respondió  Acán  a  Josué,  y  dijo:  En 

verdad  he  pecado  contra  YHVH  Dios  de 

Israel, y esto es lo que he hecho:

21

 Entre el botín vi un hermoso manto de 

Sinar, y doscientos siclos de plata y una 

barra de oro de cincuenta siclos de peso; 

los codicié y los tomé, y he aquí están es-

condidos bajo tierra dentro de mi tienda, 

y la plata debajo de ello.

22

 Josué envió emisarios, que fueron co-

rriendo a la tienda y, en efecto, el manto° 

estaba oculto en su tienda, y la plata de-

bajo.

23

 Los recogieron pues de dentro de la tien-

da y los llevaron a Josué y a todos los hijos 

de Israel, y los depositaron ante YHVH.

24

 Y  Josué,  y  todo  Israel  con  él,  tomó  a 

Acán ben Zera, la plata, el manto y la ba-

rra de oro, y a sus hijos, y a sus hijas, y a 

sus bueyes, y a sus asnos, y a sus ovejas, 

y a su tienda y a todo cuanto poseía, y los 

llevaron al valle de Acor.

25

 Y dijo Josué: ¡Cuánto nos has pertur-

bado! ¡Pertúrbete hoy YHVH! Y todos los 

israelitas los apedrearon, y los quemaron 

en la hoguera después de haberlos lapida-

do con piedras.

26

 Y levantaron sobre él un gran montón 

de  piedras,  hasta  hoy.  Y  YHVH  se  tornó 

del ardor de su ira. Por eso aquel lugar se 

llama hasta hoy, valle de Acor.°

La conquista de Hai

8

Dijo YHVH a Josué: ¡No temas ni des-

mayes! Toma contigo a toda la gente 

de guerra, y ve y sube a Hai. He aquí, Yo 

he entregado en tu mano al rey de Hai, y 

su pueblo, y su ciudad, y su tierra.

2

 Y tú harás con Hai y su rey como hiciste 

con  Jericó  y  su  rey,  sólo  que  su  botín  y 

su  ganado  podréis  tomar  para  vosotros. 

Prepara una emboscada contra la ciudad, 

por detrás.

3

 Y Josué se levantó con toda la gente de 

guerra  para  subir  contra  Hai,  y  escogió 

Josué treinta mil hombres fuertes, a los 

cuales envió de noche.

4

 Y les mandó, diciendo: Atended: poned 

emboscada contra la ciudad, detrás de la 

ciudad. No os alejéis mucho de la ciudad, 

y estad todos preparados.

5

 Después  yo  y  todo  el  pueblo  que  está 

conmigo  nos  acercaremos  a  la  ciudad, 

y  cuando  ellos  salgan  contra  nosotros, 

como  hicieron  antes,  huiremos  delante 

de ellos.

6

 Y ellos saldrán tras nosotros, y haremos 

que se aparten de la ciudad, porque dirán: 

¡Huyen de nosotros como la vez primera!

7

 Mientras  huimos  ante  ellos,  vosotros 

saldréis de la emboscada, y conquistaréis 

la ciudad, pues YHVH vuestro Dios la ha 

entregado en vuestra mano.

8

 Y cuando la hayáis ocupado, le prende-

réis fuego. Haréis conforme a la palabra 

de YHVH. Mirad que os lo he mandado.

9

 Entonces Josué los envió, y fueron a la 

emboscada, y se pusieron entre Bet-’El y 

Hai, al occidente de Hai, en tanto que Jo-

sué pasó aquella noche entre el pueblo.

10

 Josué  se  levantó  muy  de  mañana,  y 

pasó revista al pueblo, y juntamente con 

los ancianos de Israel, subió al frente del 

pueblo contra Hai.

11

 Y toda la gente de guerra que lo acom-

pañaba  subió  también  y  se  fueron  acer-

cando  hasta  llegar  frente  a  la  ciudad,  y 

acamparon al lado norte de Hai, valle de 

por medio entre él y Hai.

12

 Entonces  tomó  unos  cinco  mil  hom-

bres, y los emboscó entre Bet-’El y Hai, al 

occidente de la ciudad.

13

 El pueblo pues fue dispuesto así: todo 

el ejército, al norte de la ciudad, la embos-

cada, al occidente de la ciudad, mientras 

Josué avanzaba durante la noche hasta el 

medio del valle.

14

 Cuando  el  rey  de  Hai  vio  esto,°  los 

hombres  de  la  ciudad  se  apresuraron  y 

madrugaron  saliendo  a  la  batalla  contra 

Israel,  él  y  todo  su  pueblo,  en  el  lugar 

designado, frente al Arabá, pero no sabía 

que había una emboscada contra él detrás 

de la ciudad.

15

 Entonces  Josué  y  todo  Israel  simula-

ron que estaban derrotados y huyeron ca-

mino al desierto.

16

 Y todo el pueblo de Hai fue convocado 

para perseguirlos, y persiguieron a Josué 

apartándose así de la ciudad.

17

 Y  no  quedó  hombre  alguno  en  Hai  o 

en Bet-’El que no saliera en pos de Israel, 

7.22 .el manto.  7.26 Esto es. perturbación.  8.14 Es decir, a Josué y parte de sus hombres en medio del valle


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Josué 9:1

233

pero al perseguir a Israel, dejaron la ciu-

dad abierta.

18

 Entonces YHVH dijo a Josué: Extiende 

la  jabalina  que  llevas  en  tu  mano  hacia 

Hai,  porque  la  entregaré  en  tu  mano.  Y 

Josué extendió hacia la ciudad la jabalina 

que tenía en su mano.

19

 Y  tan  pronto  él  hubo  extendido  su 

mano,  los  emboscados  salieron  rápida-

mente  de  su  escondite  y  corriendo,  en-

traron en la ciudad y la capturaron, y se 

apresuraron a prender fuego a la ciudad.

20

 Cuando  los  hombres  de  Hai  miraron 

detrás  de  sí,  he  aquí  la  humareda  de  la 

ciudad  subía  a  los  cielos,  y  no  tuvieron 

posibilidad° de huir ni por un lado ni por 

otro, porque el pueblo que huía al desier-

to se había vuelto contra sus perseguido-

res.

21

 Pues  Josué  y  todo  Israel,  viendo  que 

los  de  la  emboscada  ya  habían  conquis-

tado la ciudad, y  que  la humareda  de la 

ciudad subía, se volvieron y atacaron a los 

hombres de Hai,

22

 en  tanto  que  los  otros  salieron  de  la 

ciudad  a  su  encuentro,  y  así  quedaron 

en  medio  de  Israel,  unos  por  una  parte 

y  otros  por  otra;  y  así  los  atacaron  has-

ta que no quedó ningún sobreviviente ni 

fugitivo.

23

 Pero el rey de Hai fue capturado vivo y 

lo llevaron a Josué.

24

 Y  cuando  Israel  puso  fin  a  la  matan-

za  de  todos  los  habitantes  de  Hai  en  el 

campo  (aun  en  el  desierto  hasta  donde 

los  persiguieron),  y  todos  cayeron  a  filo 

de espada hasta que fueron consumidos, 

sucedió que todo Israel retornó a Hai, y la 

arrasaron a filo de espada.

25

 Y los que cayeron en aquel día, hom-

bres y mujeres, fueron doce mil, todos los 

de Hai.

26

 Porque  Josué  no  retrajo  su  mano, 

con la que sostenía la jabalina, hasta que 

hubo exterminado a todos los habitantes 

de Hai.

27

 Israel tomó como botín para sí sólo los 

animales y el despojo de la ciudad, con-

forme a la palabra que YHVH había orde-

nado a Josué.

28

 Luego Josué incendió a Hai y la redujo 

para siempre a un montón de ruinas, de-

solación que se mantiene hasta hoy.

29

 Y colgó al rey de Hai de un árbol hasta 

el atardecer, pero a la caída del sol, Josué 

dio orden para que hicieran bajar° su ca-

dáver del árbol. Y lo echaron a la entrada 

de la ciudad, e hicieron levantar sobre él 

un gran montón de piedras, que perma-

nece hasta este día.

30

 Entonces  Josué  edificó  un  altar  a 

YHVH Dios de Israel en el monte Ebal,

31

 tal como Moisés, siervo de YHVH, había 

ordenado a los hijos de Israel, según está 

escrito en el libro de la Ley de Moisés: un 

altar de piedra bruta sobre la que ningún 

hombre había alzado herramienta° algu-

na,°  y  ofrecieron  sobre  él  holocaustos  a 

YHVH, y sacrificaron ofrendas de paz.

32

 Y él escribió allí sobre las piedras una 

copia de la Ley de Moisés, la cual había es-

crito en presencia de los hijos de Israel.°

33

 Y todo Israel, y sus ancianos, y oficia-

les, y sus jueces, estaban de pie a ambos 

lados del Arca, ante los sacerdotes levitas 

que cargaban el Arca del Pacto de YHVH. 

Tanto extranjeros como naturales, la mi-

tad estaba frente al monte Gerizim, y la 

otra mitad frente al monte Ebal, tal como 

Moisés siervo de YHVH había ordenado la 

primera vez, para que bendijeran al pue-

blo de Israel.

34

 Después  de  esto,  leyó  todas  las  pala-

bras  de  la  Ley:  la  bendición  y  la  maldi-

ción, conforme a todo lo que está escrito 

en el Libro de la Ley.

35

 No hubo palabra de todo lo que ordenó 

Moisés, que Josué no leyera frente a toda 

la congregación de Israel, tanto a mujeres 

como a pequeños, y al extranjero que an-

daba en medio de ellos.°

Pacto con Gabaón

9

Sucedió  que  cuando  todos  los  reyes 

que estaban al otro lado° del Jordán, 

en la serranía y en la planicie, y en toda la 

costa del Mar Grande frente al Líbano: el 

heteo, el amorreo, el cananeo, el ferezeo, 

el  heveo,  y  el  jebuseo  supieron  lo  acon-

tecido,

8.20  Lit.  y  no  tuvieron  manos  para  huir.  8.29 

→Dt.21.22-23.  8.31  .herramienta.  8.31  →Ex.20.25.  8.32  →Dt.27.2-8. 

8.35 

→Dt.11.29; 27.11-14.  9.1 Es decir, el lado occidental


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Josué 9:2

234

2

 se  reunieron  para  luchar  juntos  contra 

Josué y contra Israel bajo un solo mando.

3

 Sin embargo, cuando los habitantes de 

Gabaón° oyeron lo que Josué había hecho 

a Jericó y a Hai,

4

 ellos,  al  contrario,  procedieron  astuta-

mente  y  fueron  como  embajadores,  po-

niendo costales viejos sobre sus asnos, y 

odres de vino viejos, rotos y remendados,

5

 y sandalias viejas y recosidas en los pies, 

con vestidos viejos sobre sí, y todo el pan 

de su provisión seco y mohoso.

6

 Así  llegaron  al  campamento  en  Gilgal 

ante Josué, y le dijeron a él y a los israeli-

tas: Venimos de una tierra lejana; concer-

tad ahora un pacto con nosotros.

7

 Pero los israelitas respondieron a aque-

llos  heveos:  Quizás  vosotros  habitáis  en 

medio de nosotros, ¿cómo, pues, haremos 

alianza con vosotros?°

8

 Y dijeron a Josué: Somos siervos tuyos. 

Entonces Josué les dijo: ¿Quiénes sois vo-

sotros? ¿De dónde venís?

9

 A  lo  que  ellos  respondieron:  De  una 

tierra  lejana  tus  siervos  han  venido  por 

causa del nombre de YHVH tu Dios, pues 

hemos oído la fama de Él, y todo lo que Él 

hizo en Egipto.

10

 Y todo lo que Él hizo a los dos reyes de 

los amorreos que estaban allende el Jor-

dán: a Sehón rey de Hesbón, y Og rey de 

Basán, que habitaba° en Astarot.°

11

 Por  lo  cual  nuestros  ancianos  y  to-

dos los moradores de nuestra tierra nos 

hablaron,  diciendo:  Tomad  en  vuestras 

manos  provisión  para  el  camino,  e  id  al 

encuentro  de  ellos,  y  decidles:  Nosotros 

somos vuestros siervos, concertad ahora 

un pacto con nosotros.

12

 Este pan estaba caliente cuando lo to-

mamos de nuestras casas como provisión 

para el camino el día que salimos para ve-

nir a vosotros, pero ahora, helo aquí seco 

y mohoso.

13

 Y  estos  odres  de  vino  los  llenamos 

nuevos,  y  helos  aquí  rotos,  y  nuestros 

vestidos y nuestro calzado desgastado por 

lo largo del camino.

14

 Entonces los varones tomaron de sus 

provisiones,  sin  consultar  la  palabra  de 

YHVH.

15

 Y Josué hizo paz con ellos, y concer-

tó un pacto con ellos para dejarlos vivir, 

y los jefes de la comunidad les hicieron 

juramento.

16

 Y  sucedió  que  al  cabo  de  tres  días 

después  de  haber  concertado  el  pacto 

con  ellos,  oyeron  decir  que  eran  sus 

vecinos,  y  que  habitaban  en  medio  de 

ellos.

17

 Entonces  los  hijos  de  Israel  levanta-

ron  el  campamento,  y  al  tercer  día  lle-

garon  a  las  ciudades  de  aquéllos.  Y  sus 

ciudades  eran  Gabaón,  Cafira,  Beerot,  y 

Quiriat-jearim.

18

 Y  los  hijos  de  Israel  no  los  hirieron 

porque los jefes de la comunidad les ha-

bían  hecho  juramento  por  YHVH,  Dios 

de Israel. Y toda la comunidad murmuró 

contra los jefes,

19

 pero  todos  los  jefes  respondieron  a 

toda  la  comunidad:  Hemos  jurado  por 

YHVH, Dios de Israel, por tanto, ahora no 

los podemos tocar.

20

 Esto  haremos  con  ellos  para  dejarlos 

vivir, para que la ira no recaiga sobre no-

sotros a causa del juramento que les hi-

cimos.

21

 Y los jefes dijeron con respecto a ellos: 

Dejadlos vivir. Y fueron leñadores y agua-

dores para toda la comunidad, según les 

habían prometido los jefes.

22

 Josué entonces los llamó y les habló, 

diciendo: ¿Por qué nos habéis engañado, 

diciendo:  Habitamos  muy  lejos  de  voso-

tros, siendo que habitáis en medio de no-

sotros?

23

 Ahora pues, malditos sois, y nunca de-

jará  de  haber  siervos  entre  vosotros,  así 

como leñadores y aguadores para la Casa 

de mi Dios.

24

 Y ellos respondieron a Josué, y dijeron: 

Porque tus siervos fueron informados con 

precisión que YHVH tu Dios había orde-

nado a su siervo Moisés que os diera toda 

esta tierra, y destruyera a todos los habi-

tantes de esta tierra ante vosotros. De ma-

nera que tuvimos temor en gran manera 

por nuestras vidas a causa de vosotros, y 

hemos hecho esto.

25

 Ahora pues, henos en tu mano. Haz con 

nosotros como te parezca bien y justo.

9.3 Ciudad perteneciente a los heveos.  9.7 

→Ex.23.32; 34.12; Dt.7.2.  9.10 .habitaba.  9.10 →Nm.21.21-35.


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Josué 10:21

235

26

 Y él lo hizo así, y los libró de la mano 

de los hijos de Israel, para que no los ma-

taran.

27

 Y aquel día Josué los designó como le-

ñadores y aguadores para la comunidad y 

para el altar de YHVH hasta el día presen-

te, en el lugar que Él habría de escoger.

Victorias sobre los cananeos

10

Sucedió también que cuando Ado-

nisedec, rey de Jerusalem, oyó que 

Josué  había  conquistado  Hai  y  la  había 

dedicado al exterminio, haciendo con Hai 

y su rey como había hecho con Jericó y su 

rey,  y  que  los  habitantes  de  Gabaón  ha-

bían hecho la paz con Israel y estaban ya 

en medio de ellos,

2

 tuvo  gran  temor,  porque  Gabaón  era 

una  gran  ciudad,  como  una  de  las  ciu-

dades reales, mayor que Hai, y todos sus 

hombres eran aguerridos.

3

 Entonces Adonisedec rey de Jerusalem 

envió a decir a Oham rey de Hebrón, a Pi-

ream rey de Jerimot, a Jafía rey de Laquis 

y a Debir rey de Eglón:

4

 Subid a mí y ayudadme, y ataquemos a 

Gabaón, porque ha hecho paz con Josué y 

con los hijos de Israel.

5

 Así pues, los cinco reyes del amorreo, es 

decir, el rey de Jerusalem, el rey de Hebrón, 

el rey de Jerimot, el rey de Laquis y el rey 

de  Eglón,  se  reunieron  y  subieron,  ellos 

con todos sus ejércitos, y acamparon frente 

a Gabaón, e hicieron guerra contra ella.

6

 Entonces los habitantes de Gabaón envia-

ron a decir a Josué, a su campamento de 

Gilgal: No retires tu mano de tus siervos. 

Sube  pronto  a  nosotros,  y  danos  socorro 

y ayúdanos, porque todos los reyes de los 

amorreos que habitan en la serranía se han 

juntado contra nosotros.

7

 Y Josué subió desde Gilgal con todo el pue-

blo de guerra y todos los hombres valientes.

8

 Y YHVH dijo a Josué: No tengas temor de 

ellos porque los he entregado en tu mano, 

y ninguno de ellos se podrá mantener de-

lante de ti.

9

 Josué, pues, subiendo desde Gilgal du-

rante toda la noche, fue contra ellos sú-

bitamente.

10

 Y  YHVH  los  aterrorizó  ante  Israel,  el 

cual  los  hirió  con  gran  estrago  en  Ga-

baón, persiguiéndolos por el camino que 

sube a Bet-horón, y los hirió hasta Azeca 

y Maceda.

11

 Y  sucedió  que  al  ir  huyendo  ellos  de 

delante  de  Israel  por  la  bajada  de  Bet-

horón, YHVH arrojó sobre ellos grandes 

piedras  desde  los  cielos,  hasta  Azeca,  y 

murieron. Y resultaron más los muertos 

por las piedras de granizo, que los que los 

hijos de Israel mataron a espada.

12

 Y el día que YHVH entregó a los amo-

rreos ante los hijos de Israel, Josué habló 

a YHVH y dijo a vista de todo Israel: ¡Sol, 

detente  en  Gabaón,  y  tú,  oh  luna,  en  el 

valle de Ayalón!

13

 Y el sol se detuvo y la luna se paró has-

ta  que  la  gente  se  hubo  vengado  de  sus 

enemigos. ¿No está escrito esto en el Se-

fer Ha-Yashar?° Y el sol se paró en medio 

de los cielos, y no se apresuró a ponerse 

casi un día entero.

14

 Y nunca hubo día semejante, ni antes 

ni después de ése, en que YHVH atendie-

ra a la voz de un hombre, porque YHVH 

guerreaba por Israel.

15

 Y Josué y todo Israel con él volvieron a 

su campamento en Gilgal.

16

 Pero aquellos cinco reyes habían hui-

do y se habían escondido en una cueva en 

Maceda.

17

 Y le fue notificado a Josué diciendo: los 

cinco reyes han sido hallados escondidos 

en una cueva en Maceda.

18

 Y dijo Josué: Haced rodar grandes pie-

dras  a  la  entrada  de  la  cueva  y  colocad 

hombres junto a ella, que los vigilen.

19

 Pero  vosotros  no  os  detengáis,  per-

seguid  a  vuestros  enemigos  y  atacad  su 

retaguardia, y no los dejéis entrar en sus 

ciudades, porque YHVH vuestro Dios los 

ha entregado en vuestra mano.

20

 Y sucedió que cuando Josué y los hijos 

de  Israel  acabaron  de  herirlos  con  gran 

mortandad, hasta acabarlos, los que que-

daron de ellos se metieron en las ciudades 

fortificadas.

21

 Y  todo  el  pueblo  regresó  a  salvo,  a 

Josué,  en  el  campamento  en  Maceda.  Y 

10.13 Esto es, Libro del Recto. Generalmente, sefer es un escrito o documento de una o varias hojas unidas o no, que se pueden 

guardar enrolladas, cosidas o de otra manera. 

→2 S.1.18. 


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Josué 10:22

236

nadie afiló su lengua° contra ninguno de 

los hijos de Israel.

22

 Entonces dijo Josué: Abrid la boca de 

la  cueva,  y  sacadme  de  allí  a  esos  cinco 

reyes.

23

 Y lo hicieron así, y le sacaron de la cue-

va a los cinco reyes: al rey de Jerusalem, 

al rey de Hebrón, al rey de Jerimot, al rey 

de Laquis, y al rey de Eglón.

24

 Y cuando sacaron ante Josué aquellos 

reyes, Josué convocó a todos los varones 

de Israel, y dijo a los oficiales de los gue-

rreros  que  habían  ido  con  él:  Acercaos, 

poned vuestros pies sobre el cuello de es-

tos  reyes.  Entonces  ellos  se  acercaron  y 

les pusieron el pie en el cuello.

25

 Y Josué les dijo: No temáis ni os ate-

moricéis. Sed fuertes y valientes, porque 

así hará YHVH a todos los enemigos con-

tra quienes guerreáis.

26

 Después  de  esto  Josué  los  hirió  y  los 

hizo morir, y los colgó en cinco árboles, 

y quedaron colgados en los árboles hasta 

la tarde.

27

 Y aconteció que cuando el sol se iba a 

poner, Josué mandó que los descolgaran° 

de los árboles, y los echó en la cueva don-

de se habían escondido, y pusieron gran-

des piedras en la boca de la cueva, donde 

están hasta este día.

28

 Aquel día Josué también capturó Mace-

da, y la hirió a filo de espada, y aniquiló a su 

rey y a toda persona que estaba en ella, sin 

dejar sobreviviente. E hizo al rey de Mace-

da como había hecho al rey de Jericó.

29

 Y Josué pasó de Maceda a Libna, y todo 

Israel con él, y guerreó contra Libna.

30

 Y YHVH también la entregó en manos 

de Israel, a ella y a su rey, y la hirió a filo 

de espada con toda persona que había en 

ella, sin quedar sobreviviente; e hizo a su 

rey como había hecho al rey de Jericó.

31

 De  Libna,  Josué  pasó  a  Laquis  junto 

con  todo  Israel,  y  asentó  campamento 

cerca de ella, e hizo guerra contra ella.

32

 Y  YHVH  entregó  Laquis  en  mano  de 

Israel y la conquistó al segundo día, y la 

hirió a filo de espada junto con toda per-

sona que había en ella, como había hecho 

con Libna.

33

 Entonces  Horam  rey  de  Gezer  subió 

para ayudar a Laquis, pero Josué lo hirió 

a él y a su gente, hasta no dejarle ningún 

sobreviviente.

34

 Luego Josué pasó de Laquis a Eglón, y 

todo Israel con él, asentaron campamento 

cerca de ella, e hicieron guerra contra ella.

35

 Y  aquel  mismo  día  la  conquistaron  y 

la hirieron a filo de espada, y aniquiló° a 

toda persona que había en ella, como ha-

bía hecho en Laquis.

36

 Subió entonces Josué de Eglón a He-

brón, y todo Israel con él, y la atacaron.

37

 Y se apoderaron de ella y la pasaron a 

filo de espada, a su rey y a todas sus po-

blaciones, con toda persona que había en 

ella, sin dejar sobreviviente. Como había 

hecho  a  Eglón,  así  la  aniquiló  con  toda 

persona que había en ella.

38

 Luego Josué, con todo Israel, se volvió 

contra Debir, e hizo guerra contra ella.

39

 Se apoderó de ella y de su rey, y de to-

das sus poblaciones, y los hirieron a filo 

de espada y destruyeron toda persona que 

había  en  ella,  sin  quedar  sobreviviente. 

Como había hecho con Hebrón, así hizo 

con Debir y su rey, y con Libna y su rey.

40

 Así  conquistó  Josué  todo  el  país:  la 

serranía,  el  Neguev,  la  llanura  y  las  es-

tribaciones, y a todos sus reyes. No dejó 

sobreviviente.  Exterminó  todo  lo  que 

respiraba, tal como YHVH Dios de Israel 

había ordenado.

41

 Porque  Josué  los  hirió  desde  Cades 

Barnea hasta Gaza, con toda la región de 

Gosén° hasta Gabaón.

42

 De esta manera Josué capturó a todos 

estos reyes y sus tierras de una vez, por-

que YHVH, el Dios de Israel, peleaba por 

Israel.

43

 Y Josué, con todo Israel, se volvió a su 

campamento en Gilgal.

La conquista del norte

11

Cuando  Yabín  rey  de  Hazor  oyó 

esto,  envió  un  mensaje  a  Yobab, 

rey de Madón, al rey de Simrón, al rey de 

Acsaf,

2

 y a los reyes que estaban en el norte, en 

la serranía y en el Arabá, al sur de Kineret, 

10.21 Es decir, nadie se atrevió a amenzar o a protestar 

→Ex.11.7.  10.27 →Dt.21.22-23.  10.35 Aquí y en los vv. 28 y 37 el 

sujeto es Josué. 

10.41 No se ha de confundir con el Gosén de Egipto. 


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Josué 12:2

237

en los llanos, y en las regiones de Dor, al 

occidente;

3

 al cananeo que estaba al oriente y al oc-

cidente, al amorreo, al heteo, al ferezeo, 

al jebuseo de la serranía, y al heveo, al pie 

del Hermón, en tierra de Mizpa.

4

 Y  salieron  éstos,  y  con  ellos  todos  sus 

ejércitos: una gran muchedumbre como 

la arena que hay a la orilla del mar, con 

muchísimos caballos y carros de guerra.

5

 Así  se  reunieron  todos  estos  reyes,  y 

fueron  y  acamparon  juntos  cerca  de  las 

aguas de Merom para guerrear contra Is-

rael.

6

 Entonces  YHVH  dijo  a  Josué:  No  ten-

gas temor de ellos, porque mañana a esta 

hora Yo habré entregado a todos muertos 

delante de Israel. Desjarretarás a sus ca-

ballos y quemarás sus carros al fuego.

7

 Entonces Josué fue contra ellos, y con 

él todo el pueblo de guerra, y cayeron de 

repente  sobre  ellos  junto  a  las  aguas  de 

Merom.

8

 Y YHVH los entregó en mano de Israel, 

el cual los hirió y los persiguió hasta Si-

dón-rabah,  hasta  Misrefot-maim  y  hasta 

el  llano  de  Mizpa  hacia  el  oriente;  y  los 

atacaron hasta no dejarles sobreviviente.

9

 Y Josué hizo con ellos tal como le había 

ordenado YHVH: desjarretó a sus caballos 

y quemó sus carros con fuego.

10

 En  aquel  momento  Josué  se  volvió  y 

conquistó Hazor, y mató a espada a su rey, 

por cuanto Hazor había sido antiguamen-

te la capital de todos aquellos reinos.

11

 Y  mataron  a  filo  de  espada  a  cuantas 

personas había en ella, dedicándola al ex-

terminio, sin que quedara un alma, y le 

prendieron fuego a Hazor.

12

 Y a todas las ciudades de esos reyes, así 

como a todos sus reyes los capturó Josué, 

los pasó a filo de espada, dedicándolos al 

exterminio,  tal  como  Moisés  siervo  de 

YHVH había ordenado.

13

 Sin  embargo,  Israel  no  incendió  nin-

guna de las ciudades que habían quedado 

en pie sobre sus alturas, con la sola excep-

ción de Hazor, que Josué quemó.

14

 Y los hijos de Israel se apoderaron de 

todo el despojo y de los animales de estas 

ciudades, pero mataron a filo de espada a 

todos los hombres hasta destruirlos, sin 

dejar ningún alma con vida.

15

 Tal  como  YHVH  ordenó  a  su  siervo 

Moisés,  así  Moisés  ordenó  a  Josué,  y  así 

lo hizo Josué sin quitar palabra de todo lo 

que YHVH había ordenado a Moisés.

16

 Tomó pues Josué toda aquella tierra: la 

serranía y todo el Neguev, toda la tierra de 

Gosén, la llanura y el Arabá, lo montaño-

so de Israel y su llanura.

17

 Desde el monte Halac, que sube hacia 

Seír, hasta Baal-Gad en el valle del Líbano, 

al pie del monte Hermón, capturó a todos 

sus reyes, y los hirió, y los hizo morir.

18

 Muchos fueron los días que Josué hizo 

guerra contra estos reyes.

19

 Excepto los heveos, que habitaban en 

Gabaón, no hubo ciudad que hiciera paz 

con los hijos de Israel. Todo lo tomaron 

en la guerra.

20

 Porque era de YHVH endurecer el co-

razón  de  ellos  para  que  resistieran  con 

guerra a Israel, a fin de dedicarlos al exter-

minio, sin que hubiera para ellos clemen-

cia  y  llegaran  así  a  ser  desarraigados,  tal 

como YHVH había ordenado a Moisés.°

21

 En aquel tiempo Josué llegó y extermi-

nó a los anaceos de la región montañosa 

de Hebrón, de Debir, de Anab, de toda la 

serranía de Judá, y de toda la serranía de 

Israel. Josué los destruyó completamen-

te, junto con sus ciudades.

22

 Ninguno  de  los  anaceos  quedó  en  la 

tierra de los hijos de Israel. Sólo queda-

ron algunos en Gaza, en Gat y en Asdod.

23

 Josué conquistó toda la tierra, confor-

me a todo lo que YHVH había hablado a 

Moisés. Y Josué la entregó a los israelitas 

por herencia, conforme a los repartimien-

tos de sus tribus. Y la tierra descansó de 

la guerra.

Los reyes derrotados

12

Estos son los reyes de aquella tierra 

que los hijos de Israel derrotaron, 

y cuyo territorio conquistaron allende el 

Jordán, hacia el sol naciente, desde el río 

Arnón hasta el monte Hermón, y todo el 

Arabá hacia el oriente:

2

 Sehón, el rey del amorreo, que habitaba 

en Hesbón y dominaba desde Aroer, que 

11.20 

→Dt.7.16.


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Josué 12:3

238

está al borde del río Arnón, y desde el me-

dio del río, o sea, la mitad de Galaad, has-

ta el arroyo de Jaboc, que es la frontera de 

los hijos de Amón.

3

 Y  desde  la  llanura  hasta  el  Mar  de  Ki-

neret,  por  el  oriente,  y  hasta  el  Mar  del 

Arabá, el Mar de la Sal, por el oriente, en 

dirección  de  Bet-Hayesimot,  y  hacia  el 

sur, hasta el pie de las laderas del Pisga.

4

 Y el territorio de Og rey de Basán, uno 

del resto de los refaítas, que habitaba en 

Astarot y en Edrei,

5

 y  dominaba  en  el  monte  Hermón,  en 

Salca  y  en  todo  Basán  hasta  la  frontera 

del gesurita y del maaquita, y la mitad de 

Galaad hasta el término de Sehón rey de 

Hesbón.°

6

 Estos  fueron  derrotados  por  Moisés, 

siervo  de  YHVH,  y  los  hijos  de  Israel.  Y 

Moisés, siervo de YHVH, entregó aquella 

tierra en posesión a los rubenitas, y a los 

gaditas, y a la media tribu de Manasés.°

7

 Estos son los reyes de la tierra que Jo-

sué y los hijos de Israel derrotaron a este 

lado del Jordán, al occidente, desde Baal-

Gad en el valle del Líbano hasta el monte 

de Halac, que sube a Seír. Josué la dio en 

posesión a las tribus de Israel según sus 

repartimientos:

8

 En la serranía y en la llanura, en el Ara-

bá y en las laderas, en el desierto y en el 

Neguev;  el  heteo,  el  amorreo  y  el  cana-

neo, el ferezeo, el heveo y el jebuseo:

9

   Uno,

el rey de Jericó,

otro,  

 

el rey de Hai

 

 

(junto a Bet-’El),

10

 otro,

 

el rey de Jerusalem,

otro, 

el rey de Hebrón,

11

 otro,

 

el rey de Jarmut,

otro, 

el rey de Laquis,

12

 otro,

el rey de Eglón,

otro, 

el rey de Gezer,

13

 otro,

el rey de Debir,

otro, 

el rey de Geder,

14

 otro,

el rey de Horma,

otro, 

el rey de Arad,

15

 otro,

el rey de Libna,

otro, 

el rey de Adullam,

16

 otro,

el rey de Maceda,

otro, 

el rey de Bet-’El,

17

 otro,

el rey de Tapúa,

otro, 

el rey de Hefer,

18

 otro,

el rey de Afec,

otro, 

el rey del Sarón,

19

 otro,

el rey de Madón,

otro, 

el rey de Hazor,

20

 otro,

el rey de Simrón-Merón,

otro, 

el rey de Acsaf,

21

 otro,

el rey de Taanac,

otro, 

el rey de Meguido,

22

 otro,

el rey de Kedes,

otro, 

el rey de Yocneam 

(del Carmelo),

23

 otro,

el rey de Dor

(de la región de Dor),

otro, 

el rey de Goim (en Gilgal),

24

 otro,

el rey de Tirsa.

Treinta y un reyes en total.°

La tierra por conquistar

13

Cuando Josué era ya anciano, avan-

zado en días, YHVH le dijo: Tú eres 

anciano, avanzado en días, y todavía que-

da muchísima tierra por conquistar.

2

 Esta es la tierra que aún queda: Todos 

los territorios de los filisteos, y todo el del 

gesurita.

3

 Desde Sihor, al oriente de Egipto, hasta 

la región de Ecrón al norte, que se con-

sidera  del  cananeo;  cinco  principados 

de los filisteos: el gazeita, el asdodita, el 

asquelonita, el guitita y el acronita, y los 

heveos.

4

 Al sur, toda la tierra del cananeo, y Mea-

ra,  que  pertenece  a  los  sidonios,  hasta 

Afec, hasta la región del amorreo,

5

 y el territorio del giblita. Todo el Líbano 

hacia donde sale el sol, desde Baal-Gad al 

pie  del  monte  Hermón,  hasta  entrar  en 

Hamat.

6

 A  todos  los  habitantes  de  la  serranía 

desde  el  Líbano  hasta  Misrefot-maim,  a 

todos los sidonios, los expulsaré de delan-

te de los hijos de Israel. Tu solamente haz 

que el país sea repartido por sorteo como 

heredad° a Israel, como te he ordenado.

7

 Reparte pues esta tierra en heredad a las 

nueve tribus y a la media tribu de Manasés.

8

 Con la otra mitad, los rubenitas y los ga-

ditas ya recibieron la herencia que Moisés 

12.5 

→Nm.21.21-35; Dt.2.26-3.11.  12.6 →Nm.32.33; Dt.3.12.  12.24 El listado que antecede se registra así en el Códice de 

Leningrado (TM) 

→Est.9.7 nota. → § 143.  13.6 →Nm.33.54. 


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Josué 14:1

239

les había dado allende el Jordán, al orien-

te,  según  lo  que  les  había  dado  Moisés, 

siervo de YHVH:°

9

 Desde  Aroer,  a  orillas  del  torrente  de 

Arnón, y la ciudad que está en medio del 

valle, y toda la campiña de Medeba, hasta 

Dibón;

10

 todas las ciudades de Sehón rey amo-

rreo, que reinó en Hesbón, hasta los tér-

minos de los hijos de Amón;

11

 Galaad y el territorio de los gesuritas 

y los maaquitas, todo el monte Hermón y 

todo el Basán hasta Salca;

12

 el  reino  entero  de  Og,  en  el  Basán, 

quien  había  reinado  en  Astarot  y  Edrei, 

y era el último sobreviviente de los refaí-

tas, a los cuales Moisés había derrotado y 

desposeído.

13

 Sin  embargo,  los  hijos  de  Israel  no 

llegaron  a  expulsar  a  los  gesuritas  ni  a 

los maaquitas, sino que Gesur y Maacat 

habitan  en  medio  de  Israel  hasta  este 

día.

14

 Sólo a la tribu de Leví no dio heredad. 

Su  posesión  son  los  sacrificios  ígneos  a 

YHVH Dios de Israel, tal como Él le había 

hablado.°

15

 A la tribu de los hijos de Rubén, Moisés 

les dio conforme a sus familias.

16

 Su territorio fue desde Aroer, a orillas 

del torrente Arnón, y la ciudad que está 

en medio del valle, y toda la llanura cer-

cana a Medeba;

17

 Hesbón,  con  todas  las  ciudades  que 

están  en  la  llanura:  Dibón,  Bamot-baal, 

Bet-baal-meón,

18

 Jaaza, Cademot, Mefaat,

19

 Quiriataim,  Sibma,  Zaret-hasahar,  en 

la colina del Valle.

20

 Bet-peor,  las  laderas  del  Pisga  y  Bet-

hayesimot.

21

 Todas  las  ciudades  de  la  llanura,  y  el 

reino entero de Sehón, rey del amorreo, 

que  había  reinado  en  Hesbón,  al  cual 

Moisés había derrotado, así como los je-

fes  de  Madián:  Evi,  Requem,  Sur,  Hur  y 

Reba,  príncipes  de  Sehón  que  moraban 

en aquella tierra.

22

 Entre los que mataron los hijos de Is-

rael, mataron a filo de cuchillo a Balaam, 

el adivino, hijo de Beor.

23

 La frontera de los hijos de Rubén fue 

el Jordán con su ribera. Tal fue la heredad 

de los hijos de Rubén, conforme a sus fa-

milias, sus ciudades y sus aldeas.

24

 Y Moisés había dado su parte a la tribu 

de Gad, a los hijos de Gad, conforme a sus 

familias.

25

 Su  territorio  fue:  Yaazer  y  todas  las 

ciudades de Galaad, la mitad de la tierra 

de los hijos de Amón, hasta Aroer, frente 

a Rabá.

26

 Y desde Hesbón hasta Ramat-mispé y 

Betonim,  y  desde  Mahanaim  hasta  el  lí-

mite de Debir.

27

 Y  en  el  valle:  Bet-aram,  Bet-nimrá, 

Sucot y Safón, resto del reino de Sehón 

rey de Hesbón, siendo el Jordán su fron-

tera hasta el extremo del Mar de Kineret,° 

allende el Jordán, al oriente.

28

 Tal fue la heredad de los hijos de Gad, 

por  sus  familias,  las  ciudades  y  sus  al-

deas.

29

 También dio Moisés heredad a la media 

tribu de Manasés, y la media tribu de los 

hijos de Manasés tuvo posesión conforme 

a sus familias.

30

 Su  territorio  fue  desde  Mahanaim, 

todo el Basán, todo el reino de Og, rey de 

Basán, y todas las aldeas de Jair que están 

en Basán: sesenta poblaciones.

31

 La  mitad  de  Galaad,  Astarot  y  Edrei, 

ciudades  del  reino  de  Og  en  Basán,  fue 

para  los  hijos  de  Maquir  ben  Manasés, 

para la mitad de los hijos de Maquir, se-

gún sus familias.

32

 Esto  es  lo  que  Moisés  hizo  repartir 

como  heredad  en  las  llanuras  de  Moab, 

allende el Jordán, frente a Jericó, al orien-

te.

33

 Pero  a  la  tribu  de  Leví,  Moisés  no  le 

dio herencia alguna, porque YHVH Dios 

de Israel es su herencia, tal como Él les 

prometió.°

Repartición de la tierra

14

Esto, pues, es lo que los hijos de Is-

rael heredaron en tierra de Canaán, 

que les repartieron Eleazar el sacerdote, 

Josué  ben  Nun,  y  las  cabezas  de  las  ca-

sas paternas de las tribus de los hijos de 

Israel.

13.8 

→Nm.32.33; Dt.3.12.  13.14 →Dt.18.1.  13.27 Esto es, el Mar de Galilea.  13.33 →Nm.18.20; Dt.18.2.


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Josué 14:2

240

2

 Tal  como  YHVH  ordenó  por  mano  de 

Moisés, la heredad se dio por sorteo a las 

nueve tribus y a la media tribu.°

3

 Porque Moisés ya había dado heredades 

a las dos tribus y a la otra media tribu en 

la otra parte del Jordán.° A los levitas no 

les dio herencia alguna entre ellos,

4

 por  cuanto  los  hijos  de  José  habían 

constituido dos tribus: Manasés y Efraín, 

y no les dieron porción alguna de la tierra 

a los levitas, sino sólo ciudades donde ha-

bitar, con los pastizales de ellas para sus 

ganados y para sus demás posesiones.

5

 De la manera que YHVH lo había orde-

nado a Moisés, así lo hicieron los hijos de 

Israel, y se repartieron la tierra.

6

 Y los hijos de Judá acudieron a Josué en 

Gilgal, y Caleb ben Jefone, el ceneceo le 

dijo: Tú sabes lo que YHVH dijo a Moisés, 

varón de Dios, respecto a mí y a ti en Ca-

des Barnea.°

7

 Yo tenía cuarenta años cuando Moisés, 

siervo  de  YHVH,  me  envió  desde  Cades 

Barnea a reconocer la tierra. Y le llevé in-

formación conforme a lo que había en mi 

corazón.°

8

 Pero  mis  hermanos,  los  que  habían 

subido  conmigo,  hicieron  desfallecer 

el  corazón  del  pueblo,  aunque  yo  seguí 

cumplidamente a YHVH mi Dios.

9

 En aquel día Moisés juró diciendo: Cier-

tamente la tierra que ha pisado tu pie será 

una herencia para ti y tus hijos para siem-

pre, por cuanto seguiste cumplidamente 

a YHVH mi Dios.

10

 Ahora bien, YHVH me ha hecho vivir, 

como Él dijo, estos cuarenta y cinco años, 

desde que YHVH habló esta palabra a Moi-

sés, cuando Israel andaba por el desierto; 

y ahora, he aquí hoy ya tengo ochenta y 

cinco años.

11

 Todavía  hoy  estoy  tan  fuerte  como  el 

día en que Moisés me envió. Cual era en-

tonces mi fuerza, tal es mi fuerza ahora 

para la guerra, tanto para salir como para 

entrar.

12

 Ahora pues, dame esta región monta-

ñosa,  de  la  cual  habló  YHVH  aquel  día; 

porque tú mismo oíste aquel día que los 

anaceos  estaban  allí,  así  como  ciudades 

grandes y fuertes. Quizás YHVH esté con-

migo  y  yo  pueda  expulsarlos,  tal  como 

YHVH habló.

13

 Entonces  Josué  lo  bendijo,  y  dio  He-

brón por heredad a Caleb ben Jefone.

14

 Por tanto Hebrón llegó a ser la heren-

cia de Caleb ben Jefone cenezeo hasta este 

día, porque había seguido cumplidamen-

te a YHVH Dios de Israel.

15

 Ahora  bien,  el  nombre  de  Hebrón  en 

tiempo  pasado  había  sido  Quiriat-Arba, 

pues  Arba°  había  sido  el  hombre  más 

grande entre los anaceos. Entonces la tie-

rra tuvo reposo de la guerra.

Territorio de Judá

15

La parte que le tocó en suerte a la 

tribu de los hijos de Judá, por sus 

familias,  iba  hacia  la  frontera  de  Edom, 

hacia el desierto de Zin, al sur, como ex-

tremo meridional.

2

 Tenían  su  frontera  sur  en  un  extremo 

del Mar de la Sal,° desde la bahía que mira 

hacia el sur,

3

 y  seguía  por  el  sur  hacia  la  subida  de 

Acrabim,° pasando hasta Zin, y subía por 

el sur de Cades Barnea y pasaba por He-

brón, y subiendo por Adar, volvía a Car-

ca.

4

 De allí pasaba a Asmón y seguía hasta el 

torrente de Egipto, llegando los confines 

hasta el mar. Esta os será la frontera me-

ridional.

5

 La frontera oriental es el Mar de la Sal 

hasta  la  desembocadura  del  Jordán.  La 

frontera septentrional, desde la bahía del 

mar en la desembocadura del Jordán,

6

 y el linde subía a Bet Hogla, y pasaba al 

norte de Bet Arabá y subía hasta la piedra 

de Bohán ben Rubén.

7

 El  linde  subía  entonces  desde  el  valle 

de Acor hasta Debir, y por el norte volvía 

hacia Gilgal, que se encuentra frente a la 

subida de Adumim, situada al lado sur del 

valle. Después la frontera pasaba por las 

aguas de Ein-semes,° y terminaba en En-

roguel.

8

 El confín subía por el valle del hijo de 

Hinom, en el lado sur de donde estaban 

los  jebuseos  (esto  es,  Jerusalem),  y  el 

14.2 

→Nm.26.52-56; 34.13.  14.3 →Nm.32.33; 34.14-15; Dt.3.12-17.  14.6 →Nm.14.30.  14.7 →Nm.13.1-30.  14.15 .Arba

15.2 Esto es, el Mar Muerto.  15.3 Esto es, escorpiones.  15.7 Lit. fuente del sol


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Josué 15:58

241

linde  subía  a  la  cumbre  del  monte  que 

está delante del valle de Hinom hacia el 

occidente, en el extremo del valle de Re-

faim, al norte.

9

 Y se trazó la línea desde la cumbre del 

monte  hasta  la  fuente  de  las  aguas  de 

Neftoa,  y  salía  a  las  ciudades  del  monte 

Efrón,  luego  rodeaba  a  Baala,  la  cual  es 

Quiriat-jearim.

10

 De Baala el límite giraba al occidente 

hasta  el  monte  Seír,  y  pasaba  por  la  la-

dera del monte Yearim, por el norte, que 

es Quesalón, y descendía a Bet-semes, y 

pasaba a Timná.

11

 Después la línea partía hacia la ladera 

de Ecrón, al norte, y giraba hacia Sicrón, 

pasando luego por el monte Baala, y salía 

a Jabneel, llegando los extremos de la lí-

nea al Mar Grande.

12

 La frontera occidental es el Mar Gran-

de. Esta pues, es la frontera alrededor de 

los hijos de Judá, por sus familias.

13

 Pero a Caleb ben Jefone le dio su por-

ción entre los hijos de Judá conforme el 

dicho de YHVH a Josué, la ciudad de Arba, 

padre de Anac, la cual es Hebrón.

14

 Y Caleb expulsó de allí a tres de los hi-

jos de Anac: a Sesai, Aimán y Talmai, des-

cendientes de Anac.°

15

 Y  de  allí  subió  contra  los  habitantes 

de Debir, y el nombre de Debir antes era 

Quiriat-Séfer.

16

 Entonces  Caleb  dijo:  Al  que  ataque  a 

Quiriat-Séfer, y la conquiste, le daré a mi 

hija Acsa por mujer.

17

 Y Otoniel ben Cenaz, hermano de Ca-

leb, la conquistó. Y él le dio por mujer a 

su hija Acsa.

18

 Y aconteció que cuando ya se iba con 

él, lo incitó a que pidiera a su padre un 

campo. Y ella misma se apeó del asno, por 

lo que Caleb le dijo: ¿Qué tienes?

19

 Ella  entonces  respondió:  Concédeme 

una  bendición.  Por  cuanto  me  has  dado 

una tierra de sequedal,° dame también ma-

nantiales de agua. Y él le dio los manantia-

les de arriba y los manantiales de abajo.

20

 Esta es la heredad de la tribu de los hi-

jos de Judá, por sus familias.

21

 Y las ciudades del territorio de la tri-

bu de los hijos de Judá, hacia la frontera 

de  Edom,  al  sur,  eran  Cabseel,  y  Eder  y 

Jagur,

22

 Cina, Dimona, Adada,

23

 Cedes, Hazor, Itnán,

24

 Zif, Telem, Bealot,

25

 Hazor-hadata, Queriot-Hesrón, que es 

Hazor,

26

 Amam, Sema, Molada,

27

 Hazar-gada, Hesmón, Bet-pelet,

28

 Hazar-sual, Beerseba, Bizotia,

29

 Baala, Lim, Esem,

30

 Eltolad, Quesil, Horma,

31

 Siclag, Madmana, Sansana,

32

 Lebaot, Silim, Aín y Rimón: veintinue-

ve ciudades con sus aldeas.

33

 En la llanura: Estaol, Sorea, Asena,

34

 Zanoa, Enganim, Tapúa y Enam,

35

 Jerimut, Adulam, Soco, Azeca,

36

 Saraim,  Aditaim,  Gedera  y  Gede-ro-

taim: catorce ciudades con sus aldeas.

37

 Zenán, Hadasa, Migdal-Gad,

38

 Dileán, Mizpa, Jocteel,

39

 Laquis, Boscat, Eglón,

40

 Cabón, Lahmam, Quitlis,

41

 Gederot, Bet-Dagón, Naama y Maceda: 

dieciséis ciudades con sus aldeas.

42

 Libna, Eter y Asán,

43

 Jifta, Asena y Nezib,

44

 Keila, Aczib y Maresa: nueve ciudades 

con sus aldeas.

45

 Ecrón con sus villas y sus aldeas.

46

 Desde  Ecrón  hasta  el  mar,  todas  las 

que están junto a Asdod, con sus aldeas.

47

 Asdod, sus villas y sus aldeas. Gaza, 

sus  villas  y  sus  aldeas  hasta  el  río  de 

Egipto  y  el  Mar  Grande,  con  su  terri-

torio.

48

 Y en la serranía: Samir, Jatir, Sucot,

49

 Dana, Quiriat-Sana, que es Debir,

50

 Anab, Estemó, Anim,

51

 Gosén,  Holón  y  Gilo:  once  ciudades 

con sus aldeas.

52

 Arab, Duma, Esán,

53

 Janum, Bet-tapúa, Afeca,

54

 Humta, Quiriat-Arba, que es Hebrón, y 

Sior: nueve ciudades con sus aldeas.

55

 Maón, Carmel, Zip, Juta,

56

 Izreel, Jocdeam, Zanoa,

57

 Ha-Caín, Gabaa y Timan: diez ciudades 

con sus aldeas.

58

 Halhul, Bet-sur, Guedor,

15.14 

→Jue.1.20.  15.19 Lit. Neguev


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Josué 15:59

242

59

 Maarat, Bet-anot y Eltecón: seis ciuda-

des con sus aldeas.

60

 Quiriat-baal,  que  es  Quiriat-jearim,  y 

Rabá: dos ciudades con sus aldeas.

61

 En  el  desierto:  Bet-Arabá,  Midín,  Se-

caca,

62

 Nibsán, la Ciudad de la Sal, y En-guedi: 

seis ciudades con sus aldeas.

63

 Pero  los  hijos  de  Judá  no  pudieron 

expulsar a los jebuseos que habitaban en 

Jerusalem. Y así los jebuseos habitan con 

los hijos de Judá en Jerusalem hasta el día 

de hoy.°

Territorio de los hijos de José

16

Tocó en suerte a los hijos de José 

desde el Jordán, frente a Jericó (las 

aguas de Jericó), al oriente, hacia el de-

sierto, subiendo desde Jericó por la serra-

nía hasta Bet-’El.

2

 De Bet-’El seguía a Luz, y pasaba al tér-

mino del arquita en Atarot.

3

 Descendía  luego  hacia  el  oeste,  hasta 

el límite del jafletita, hasta el término de 

Bet-jorón (la de abajo), y hasta Guezer, y 

terminaba en el Mar Grande.

4

 Así  recibieron  su  heredad  los  hijos  de 

José, Manasés y Efraín.

5

 El  territorio  de  los  hijos  de  Efraín  fue 

conforme a sus familias. Por oriente, el lí-

mite de su heredad iba desde Atarot-Adar 

hasta Bet-jorón (la de arriba).

6

 Este límite salía al occidente, y a Micme-

tat al norte, daba vuelta hacia el oriente 

hasta Taanat-Silo, y pasaba por el oriente 

de Janoa.

7

 Desde Janoa descendía a Atarot y a Naa-

rat,  tocaba  en  Jericó  y  terminaba  en  el 

Jordán.

8

 Desde  Tapúa,  el  límite  iba  hacia  occi-

dente al arroyo de Caná y terminaba en el 

Mar Grande. Esta es la heredad de la tribu 

de los hijos de Efraín por sus familias.

9

 Hubo también ciudades que se aparta-

ron para los hijos de Efraín en medio de 

la heredad de los hijos de Manasés, cada 

ciudad con sus aldeas.

10

 Pero no desposeyeron al cananeo que 

habitaba en Guezer,° sino que el cananeo 

permaneció en medio de Efraín hasta este 

día,  aunque  fueron  puestos  bajo  tributo 

servil.

Territorio de Manasés

17

Luego  se  echaron  suertes  para  la 

tribu°  de  Manasés,  por  ser  el  pri-

mogénito  de  José.  Y  Maquir,  el  primo-

génito de Manasés y padre de Galaad, el 

cual era varón de guerra, recibió Galaad 

y Basán.

2

 También hubo para el resto de los hijos 

de Manasés conforme a sus familias: para 

los hijos de Abiezer, para los hijos de He-

lec, para los hijos de Asriel, para los hijos 

de Siquem, para los hijos de Hefer y para 

los hijos de Semida. Tales fueron los hi-

jos varones de Manasés ben José, por sus 

familias.

3

 Pero Zelofejad ben Hefer, hijo de Galaad, 

hijo de Maquir, hijo de Manasés, no tuvo 

hijos, sino hijas, los nombres de las cua-

les son: Maala, Noa, Hogla, Milca, y Tirsa.

4

 Éstas, pues, se presentaron delante del 

sacerdote Eleazar, de Josué ben Nun y de 

los jefes, y dijeron: YHVH ordenó a Moi-

sés que nos diera herencia entre nuestros 

hermanos.  Entonces  él  les  dio  una  he-

redad  entre  los  hermanos°  de  su  padre, 

conforme al dicho de YHVH.

5

 A Manasés le tocaron en suerte diez por-

ciones, además de la tierra de Galaad y de 

Basán, que están allende el Jordán.

6

 Porque aquellas hijas de Manasés obtu-

vieron herencia entre sus hijos, y la tierra 

de  Galaad  quedó  para  los  otros  hijos  de 

Manasés.

7

 Y  el  territorio  de  Manasés  alcanzaba 

desde Aser hasta Micmetat, que está fren-

te a Siquem, y llegaba hasta el sur, hasta 

los habitantes de En-tapúa.

8

 De Manasés llegó a ser el territorio de 

Tapúa,  pero  la  misma  Tapúa,  situada  en 

el territorio de Manasés, fue de los hijos 

de Efraín.

9

 El  límite  descendía  por  el  torrente  de 

Caná, hacia el sur del torrente (estas ciu-

dades de Efraín están entre las ciudades 

de  Manasés),  y  el  límite  de  Manasés  es 

desde  el  norte  del  torrente,  y  sus  extre-

mos llegaban al Mar Grande.

15.63 

→Jue.1.21; 2 S.5.6; 1 Cr.11.4.  16.10 →Jue.1.29.  17.1 Es decir, para la media tribu de Manasés.  17.4 →Nm.27.1-7. 


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Josué 18:12

243

10

 El  mediodía  era  de  Efraín  y  el  norte 

de Manasés, y el mar era el límite. Por el 

norte se encuentra con Aser, y por el este, 

con Isacar.

11

 En  Isacar  y  en  Aser,  Manasés  tenía 

Betseán  y  sus  aldeas,  Ibleam  y  sus  al-

deas, los habitantes de Dor y sus aldeas, 

los habitantes de Endor y sus aldeas, los 

habitantes  de  Taanac  y  sus  aldeas,  y  los 

habitantes de Meguido y sus aldeas, tres 

regiones del Nefet.°

12

 Pero los hijos de Manasés no pudieron 

conquistar aquellas ciudades, por lo cual 

el cananeo persistió en habitar esa tierra.

13

 Pero sucedió que cuando los hijos de 

Israel  se  hicieron  fuertes,  sometieron  a 

los cananeos a tributo laboral, aunque no 

los expulsaron definitivamente.°

14

 Entonces  los  hijos  de  José  hablaron 

a Josué, diciendo: ¿Por qué me has dado 

por heredad una sola porción y una sola 

parte, siendo yo un pueblo tan numero-

so,  puesto  que  YHVH  me  ha  bendecido 

así?

15

 Y  Josué  les  respondió:  Si  tú  eres  un 

pueblo  tan  numeroso,  sube  al  monte,  y 

hazte una tala en la tierra del ferezeo y de 

los refaítas, ya que la serranía de Efraín es 

estrecha para vosotros.

16

 Pero los hijos de José le respondieron: 

No  nos  bastará  esa  región  montañosa. 

Además, todos los cananeos que habitan 

la tierra del valle tienen carros de hierro, 

los que están en Betseán y en sus aldeas, y 

los que están en el valle de Jezreel.

17

 Entonces Josué respondió a la casa de 

José, a Efraín y a Manasés, diciendo: Tú 

eres  un  pueblo  numeroso  y  tienes  gran 

fuerza. No tendrás una sola parte,

18

 sino que la serranía será tuya, aunque 

es bosque, tú lo talarás, y serán tuyos sus 

términos, porque desposeerás al cananeo 

aunque tenga carros de hierro y aunque 

sea fuerte.

La porción de Benjamín

18

Y toda la comunidad de los hijos de 

Israel se congregó en Silo, e hicie-

ron levantar allí la Tienda de Reunión, por 

cuanto la tierra se les había sometido.

2

 Sin  embargo,  entre  los  hijos  de  Israel 

habían quedado siete tribus que no se les 

había repartido su heredad.

3

 Entonces Josué dijo a los hijos de Israel: 

¿Hasta cuando os mostraréis negligentes 

para  entrar  a  poseer  la  tierra  que  os  ha 

dado YHVH, el Dios de vuestros padres?

4

 Designad  tres  varones  de  cada  tribu,  a 

quienes yo envíe, para que se levanten y 

recorran la tierra y la describan conforme 

a sus heredades, y vuelvan a mí.

5

 Luego se la repartirán en siete partes, y 

Judá permanecerá en el territorio del sur, 

y los de la casa de José permanecerán en 

el territorio del norte.

6

 Vosotros, pues, haréis una descripción° 

de la tierra en siete partes, y me la trae-

réis aquí, y echaré por vosotros las suer-

tes° aquí delante de YHVH nuestro Dios,

7

 por  cuanto  los  levitas  no  tienen  por-

ción  entre  vosotros,  pues  su  heredad  es 

el sacerdocio de YHVH. En cuanto a Gad 

y Rubén, y la media tribu de Manasés ya 

han recibido su herencia al otro lado del 

Jordán, al oriente, la cual les dio Moisés, 

siervo de YHVH.

8

 Y aquellos hombres se levantaron y se 

fueron. Y Josué mandó a los que iban a 

describir  la  tierra,  diciéndoles:  Id,  reco-

rred  la  tierra,  describidla  y  volved  a  mí 

para  que  yo  eche  las  suertes  delante  de 

YHVH aquí en Silo.

9

 Fueron pues aquellos hombres y reco-

rrieron la tierra, e hicieron una descrip-

ción  por  ciudades  en  un  documento  de 

siete partes, y volvieron a Josué, al cam-

pamento en Silo.

10

 Entonces  Josué  les  echó  suertes  en 

presencia de YHVH, en Silo. Y allí repar-

tió Josué la tierra a los hijos de Israel se-

gún sus porciones.

11

 Echó la suerte de la tribu de los hijos 

de Benjamín por sus familias, y por sor-

teo le salió el territorio entre los hijos de 

Judá y los hijos de José.

12

 Por  el  norte,  su  línea  partía  desde  el 

Jordán,  pues  subía  por  la  vertiente  de 

Jericó  al  norte,  después  subía  por  la  se-

rranía hacia el occidente y sus extremos 

llegaban al desierto de Bet-Avén.

17.11 Esto es, altura o región montañosa. Prob. topónimo.  17.13 

→Jue.1.27-28.  18.6 Es decir, descripción topográfica o plano 

del terreno

18.6 Las suertes se echaban mediante un cordel con nudos 

→Sal.16.6.


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Josué 18:13

244

13

 Desde allí el límite pasaba a Luz (por 

el  lado  de  Luz,  que  es  Bet-’El)  hacia  el 

sur,  y  descendía  hacia  Atarot-adar  junto 

al monte que está al sur de Bet-jorón de 

Abajo.

14

 Luego el límite giraba y doblaba por el 

oeste hacia el sur de la serranía que está 

delante de Bet-jorón, al sur, y venía a sa-

lir a Quiriat-baal, que es Quiriat-jearim, 

ciudad de los hijos de Judá. Este es el lado 

de occidente.

15

 Y el lado meridional comenzaba desde 

el extremo de Quiriat-jearim, y partiendo 

la línea al occidente, seguía hasta la fuen-

te de las aguas de Neftoa.

16

 Este límite bajaba después al extremo 

de la serranía que está frente al valle del 

hijo de Hinom, en el valle de Refaim, ha-

cia el norte, luego bajaba al valle de Hi-

nom, al lado del jebuseo, al sur, y de allí 

descendía a En-Roguel.

17

 Luego  se  trazó  hacia  el  norte  y  se-

guía a Ein-Shemesh, y de allí seguía a 

Gelilot,  que  está  frente  a  la  subida  de 

Adumim, y bajaba a la piedra de Bohán 

ben Rubén.

18

 Pasaba por la ladera enfrente del Ara-

bá, por el norte, y descendía al Arabá.

19

 Después  pasaba  el  límite  por  el  lado 

de Bet Hogla, hacia el norte, e iba a salir 

a la bahía del norte del Mar de la Sal, al 

extremo sur del Jordán. Este es el límite 

del sur.

20

 Y el Jordán es límite por el oriente. Tal 

es  la  heredad  de  los  hijos  de  Benjamín, 

con el contorno de sus límites, conforme 

a sus familias.

21

 Y las ciudades de la tribu de los hijos 

de Benjamín, por sus familias, fueron: Je-

ricó, Bet-Hogla, Emek-Casis,

22

 Bet-Arabá, Samaraim, Bet-’El,

23

 Avim, Pará, Ofra,

24

 Quefar-haamoni,  Ofni  y  Gaba:  doce 

ciudades con sus aldeas.

25

 Gabaón, Ramá, Beerot,

26

 Mizpa, Quefirá, Moza,

27

 Requem, Yirpeel, Taralá,

28

 Sela,  Elef,  Jebús  (que  es  Jerusalem), 

Gibeat y Quiriat: catorce ciudades con sus 

aldeas.  Tal  es  la  heredad  de  los  hijos  de 

Benjamín conforme a sus familias.

Sorteo de las partes restantes

19

La  segunda  suerte  salió  para  Si-

meón,  a  la  tribu  de  los  hijos  de 

Simeón conforme a sus familias. Y su he-

redad  estaba  en  medio  de  la  heredad  de 

los hijos de Judá.

2

 Y en su heredad tenían Beerseba, Seba, 

Molada,

3

 Hasarsual, Bala, Esem,

4

 Heltolad, Betul, Horma,

5

 Siclag, Bet-marcabot, Hasar-susa,

6

 Bet-lebaot  y  Saruhén:  trece  ciudades 

con sus aldeas.

7

 Y Aín, Rimón, Eter y Asán: cuatro ciu-

dades con sus aldeas.

8

 Y todas las aldeas están en torno a estas 

ciudades hasta Baalat-beer, que es Ramat 

del Neguev. Tal es la heredad de la tribu 

de los hijos de Simeón, según sus fami-

lias.°

9

 De  la  porción  de  los  hijos  de  Judá  se 

tomó la heredad de los hijos de Simeón, 

ya que la parte de los hijos de Judá era ex-

cesiva para ellos. Así los hijos de Simeón 

tuvieron  su  heredad  en  medio  de  la  he-

rencia de aquéllos.

10

 La  tercera  suerte  saltó  para  los  hijos 

de Zabulón, conforme a sus familias, y el 

límite de su heredad llegaba hasta Sarid.

11

 Por  el  oeste,  su  límite  subía  hasta 

Marala y llegaba hasta Dabeset, y de allí 

alcanzaba al torrente que está delante de 

Jocneam.

12

 De Sarid volvía hacia el oriente, hacia 

la salida del sol, por el lindero de Kislot-

Tabor, salía a Daberat y subía a Jafía.

13

 De  allí  pasaba  al  oriente,  hacia  el  le-

vante, a Gitah-jefer, hasta Et-cazín, y se-

guía a Rimón rodeando a Nea.

14

 Después  este  límite  volvía  al  norte, 

hacia Hanatón, y sus salidas van hasta el 

valle de Iftael,

15

 donde  están  Catat,  Najalal,  Simrón, 

Ideala  y  Bet-léhem:  doce  ciudades  con 

sus aldeas.

16

 Tal es la heredad de los hijos de Zabu-

lón por sus familias. Estas ciudades con 

sus aldeas.

17

 La cuarta suerte salió para Isacar, para 

los hijos de Isacar conforme a sus fami-

lias.

19.8 

→1 Cr.4.28-33. 


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Josué 20:3

245

18

 Y su territorio llegó a ser hacia Jezreel, 

Quesulot, Sunem,

19

 Jafaráim, Sihón, Anajarat,

20

 Rabit, Quisión, Ebes,

21

 Remet,  Ein-ganim,  Ein-Hada  y  Bet-

Patses.

22

 El límite llegaba hasta el Tabor y hacia 

Sahasim y Bet-semes, y terminaba en el 

Jordán: dieciséis ciudades con sus aldeas.

23

 Tal es la heredad de la tribu de los hijos 

de  Isacar  conforme  a  sus  familias.  Esas 

ciudades con sus aldeas.

24

 La quinta suerte salió para la tribu de 

los hijos de Aser, por sus familias.

25

 Su  territorio  era  Helcat,  Halí,  Beten, 

Acsaf,

26

 Alamelec,  Amad  y  Miseal,  y  llegaba 

hasta el occidente del Carmelo y a Sijor-

libnat.

27

 Después volvía hacia la salida del sol has-

ta Bet-Dagón y llegaba a Zabulón y al valle 

de Iftael, hacia el norte de Beth-jaémec y a 

Nehiel, y salía por el norte a Cabul,

28

 a Ebrón,° a Rejob, a Hamón y a Caná, 

hasta la Gran Sidón.

29

 Y la línea torcía hacia Ramá y hacia la 

plaza fuerte de Tiro, regresaba hacia Hosa, 

y salía al mar por el territorio de Aczib,

30

 Uma, Afec y Rejob: veintidós ciudades 

con sus aldeas.

31

 Tal es la heredad de la tribu de los hi-

jos de Aser por sus familias. Esas ciudades 

con sus aldeas.

32

 La sexta suerte salió para los hijos de 

Neftalí, para los hijos de Neftalí conforme 

a sus familias.

33

 Su  límite  iba  desde  Jélef,  Alón-Saa-

nanim,  Adami-Néqueb  y  Jabneel,  hasta 

Lacum, y salía al Jordán.

34

 Desde allí el límite torcía hacia el oes-

te  hasta  Aznot-Tabor,  y  pasando  delante 

de allí a Jucoc, tocaba en Zabulón por el 

sur, y por el oeste limitaba con Aser y con 

Judá en el Jordán, hacia la salida del sol.

35

 Y las ciudades fortificadas eran: Sidim, 

Ser, Hamat, Racat, Kineret,

36

 Adama, Ramá, Hazor,

37

 Cedes, Edrei, Ein-hazor,

38

 Irón, Migdalel-jorem, Bet-anat y Bet-se-

mes: diecinueve ciudades con sus aldeas.

39

 Tal es la heredad de la tribu de los hijos 

de Neftalí por sus familias. Esas ciudades 

con sus aldeas.

40

 La séptima suerte salió para la tribu de 

los hijos de Dan por sus familias.

41

 El territorio de su heredad es Zora, Es-

taol, Ir-semes,

42

 Saalabín, Ayalón, Itla,

43

 Elón, Timnata, Ecrón,

44

 Elteque, Gibetón, Baalat,

45

 Jehud, Beney-berac, Gat-rimón,

46

 Mey-hayarcón, y Racón, con el territo-

rio que hay delante de Jope.°

47

 Pero el límite de los hijos de Dan se 

amplió,  pues  subieron  y  atacaron  a  Le-

sem, la conquistaron y la pasaron a filo 

de  espada,  luego  la  ocuparon  y  se  esta-

blecieron  en  ella;  y  a  Lesem  la  llama-

ron Dan, por el nombre de su ancestro 

Dan.°

48

 Tal es la heredad de la tribu de los hi-

jos de Dan conforme a sus familias. Esas 

ciudades con sus aldeas.

49

 Cuando  acabaron  de  distribuir  la  tie-

rra según sus límites, los hijos de Israel 

dieron heredad a Josué ben Nun, en me-

dio de ellos.

50

 Según el dicho de YHVH, le dieron la 

ciudad que él había solicitado: Timnat-se-

ra, en la serranía de Efraín. Y él reedificó 

la ciudad y habitó en ella.

51

 Estas  son  las  heredades  que  el  sacer-

dote  Eleazar  y  Josué  ben  Nun,  y  las  ca-

bezas  de  las  casas  paternas  repartieron 

por sorteo entre las tribus de los hijos de 

Israel en Silo, en presencia de YHVH, a la 

entrada de de la Tienda de Reunión. Así 

acabaron de repartir la tierra.

Ciudades de refugio

20

Después  habló  YHVH  a  Josué,  di-

ciendo:

2

 Habla a los hijos de Israel, y diles: De-

signad  para  vosotros  las  ciudades  de  re-

fugio, de las cuales os hablé por medio de 

Moisés,°

3

 para  que  pueda  huir  allá  el  homicida 

que mate a alguien sin intención, sin pre-

meditación, y os sirvan de refugio contra 

el pariente de sangre.°

19.28 Esto es, Abdón 

→1 Cr.6.59.  19.46 Esto es, Yafo.  19.47 →Jue.18.27-29.  20.2 →Nm.35.6-32; Dt.4.41-43; 19.1-13. 

20.3 Es decir, el familiar que tiene que vengar a su pariente muerto


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Josué 20:4

246

4

 El que huya a alguna de esas ciudades, 

se  presentará  a  la  puerta  de  la  ciudad  y 

hablará sus palabras a oídos de los ancia-

nos de aquella ciudad, y ellos lo acogerán 

en la ciudad y le darán lugar para que ha-

bite con ellos.

5

 Y si el pariente de sangre lo persigue, 

no entregarán en su mano al homicida, 

porque mató a su prójimo sin premedi-

tación,  sin  haberle  aborrecido  en  días 

anteriores.

6

 Y deberá permanecer en aquella ciudad 

hasta  que  comparezca  en  juicio  ante  la 

comunidad, hasta la muerte del que sea 

sumo sacerdote en aquellos días. Enton-

ces el homicida podrá regresar e ir a su 

ciudad y a su casa, a la ciudad de donde 

había huido.

7

 Entonces hicieron apartar a Quedes en 

Galilea, en la serranía de Neftalí, a Siquem 

en la serranía de Efraín, y a Quiriat-Arba 

(que es Hebrón), en la serranía de Judá.

8

 Y de la otra parte del Jordán, al oriente 

de  Jericó,  designaron  a  Beser,  en  el  de-

sierto, en la llanura de la tribu de Rubén, 

a Ramot, en Galaad, de la tribu de Gad, y a 

Golán, en Basán, de la tribu de Manasés.

9

 Estas  fueron  las  ciudades  de  refugio 

señaladas para todos los hijos de Israel y 

para el extranjero que habitara en medio 

de ellos, para que huyera allá todo aquel 

que quitara la vida por error, a fin de que 

no pereciera por mano del vengador de la 

sangre, antes de haber comparecido ante 

la comunidad.

Ciudades para los levitas

21

En aquel tiempo los cabezas de las 

casas  paternas  de  los  levitas  acu-

dieron al sacerdote Eleazar, a Josué ben 

Nun y a los jefes de las tribus de los hijos 

de Israel,

2

 y  en  Silo,  en  tierra  de  Canaán,  les  ha-

blaron diciendo: YHVH ordenó por medio 

de Moisés que se nos dieran ciudades para 

habitar, con sus pastizales para nuestros 

animales.°

3

 Entonces, conforme al dicho de YHVH, 

los  hijos  de  Israel  dieron  de  su  heredad 

a  los  levitas  estas  ciudades  con  sus  pas-

tizales:

4

 La  suerte  salió  para  las  familias  del 

coatita, y a los hijos del sacerdote Aarón 

(de los levitas) obtuvieron por sorteo de 

parte  de  la  tribu  de  Judá,  de  la  tribu  de 

Simeón y de la tribu de Benjamín, trece 

ciudades.

5

 Al resto de los hijos de Coat se les dieron 

por sorteo diez ciudades de las familias de 

la tribu de Efraín, de la tribu de Dan y de 

la media tribu de Manasés.

6

 Los hijos de Gersón obtuvieron por sor-

teo de parte de las familias de la tribu de 

Isacar, de la tribu de Aser, de la tribu de 

Neftalí y de la media tribu de Manasés, en 

el Basán, trece ciudades.

7

 Los hijos de Merari, por sus familias, de 

parte de la tribu de Rubén, de la tribu de 

Gad  y  de  la  tribu  de  Zabulón,  doce  ciu-

dades.

8

 Así, los hijos de Israel dieron por sorteo 

a los levitas estas ciudades con sus pasti-

zales, tal como YHVH había ordenado por 

medio de Moisés.

9

 De la tribu de los hijos de Judá y de la tri-

bu de los hijos de Simeón, les dieron esas 

ciudades que van expresadas por nombre.

10

 El primer sorteo fue para los hijos de 

Aarón, de la familia de Coat, de los hijos 

de Leví,

11

 a los cuales dieron la ciudad de Arba, 

padre de Anac (que es Hebrón), en la se-

rranía de Judá, con los pastizales en sus 

alrededores.

12

 Pero el campo de esta ciudad con sus 

aldeas  los  dieron  a  Caleb  ben  Jefone, 

como propiedad suya.

13

 Y  a  los  hijos  del  sacerdote  Aarón  les 

dieron  una  ciudad  de  refugio  para  los 

homicidas: Hebrón con su pastizal, y ade-

más, Libna con su pastizal,

14

 Yatir con su pastizal, Estemoa con su 

pastizal,

15

 Jolón  con  su  pastizal,  Debir  con  su 

pastizal,

16

 Ain con su pastizal, Yuta con su pas-

tizal, y Bet-semes con su pastizal: nueve 

ciudades de esas dos tribus.

17

 Y de la tribu de Benjamín, Gabaón con 

su pastizal, Gueba con su pastizal,

18

 Anatot con su pastizal, y Almón con su 

pastizal: cuatro ciudades.

21.2 

→Nm.35.1-8.


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Josué 22:4

247

19

 El total de las ciudades de los sacerdo-

tes, hijos de Aarón, fue de trece, con sus 

pastizales.

20

 Los levitas de las familias de los hijos 

de Coat, los que quedaban de los hijos de 

Coat, recibieron por sorteo unas ciudades 

de la tribu de Efraín,

21

 y  en  la  serranía  de  Efraín  les  dieron 

Siquem, como ciudad de refugio para el 

homicida, con su pastizal, Guezer con su 

pastizal,

22

 Kibsaim  con  su  pastizal  y  Bet-jorón 

con su pastizal: cuatro ciudades.

23

 De la tribu de Dan, Eltequé con su pas-

tizal, Gibetón con su pastizal,

24

 Ayalón  con  su  pastizal  y  Gat-rimón 

con su pastizal: cuatro ciudades.

25

 Y de la media tribu de Manasés, Taanac 

con su pastizal y Gat-rimón con su pasti-

zal: dos ciudades.

26

 En total fueron diez las ciudades con 

sus ejidos para el resto de las familias de 

los hijos de Coat.

27

 A los hijos de Gersón (de las familias 

de los levitas), les dieron de la otra me-

dia tribu de Manasés, a Golán, una de las 

ciudades de refugio para el homicida, en 

el Basán, con su pastizal, y a Beestera con 

su pastizal: dos ciudades.

28

 De la tribu de Isacar, Cisón con su pas-

tizal, Daberat con su pastizal,

29

 Jarmut  con  su  pastizal  y  Ein-ganim 

con su pastizal: cuatro ciudades.

30

 De la tribu de Aser, Miseal con su pas-

tizal, Abdón con su pastizal,

31

 Helcat con su pastizal, y Rehob con su 

pastizal: cuatro ciudades.

32

 Y  de  la  tribu  de  Neftalí,  la  ciudad  de 

refugio para el homicida, Cedes, en Ga-

lilea,  con  su  pastizal,  Jamot-dor  con  su 

pastizal,  y  Cartán  con  su  pastizal:  tres 

ciudades.

33

 El total de las ciudades de los gersoni-

tas, por sus familias, fueron trece ciuda-

des con sus ejidos.

34

 Y a las familias de los hijos de Merari, 

los levitas que quedaron, se les dio, de la 

tribu de Zabulón, Jocneam con su pasti-

zal, Carta con su pastizal,

35

 Dimna con su pastizal y Najalal con su 

pastizal: cuatro ciudades.

36

 De  la  tribu  de  Rubén,  Beser  con  su 

pastizal, Jasa con su pastizal,

37

 Cademot con su pastizal y Mefaat con 

su pastizal: cuatro ciudades.

38

 Y de la tribu de Gad, la ciudad de re-

fugio para el homicida, Ramot en Galaad 

con su pastizal, Mahanaim con su pasti-

zal,

39

 Hesbón con su pastizal y Jaser con su 

pastizal: cuatro ciudades.

40

 El  total  de  las  ciudades  que  tocaron 

por suerte a los hijos de Merari, por sus 

familias, las que quedaban de las familias 

de los levitas, fueron doce.

41

 Todas  las  ciudades  de  los  levitas  que 

había en medio de la propiedad de los hi-

jos de Israel fueron cuarenta y ocho ciu-

dades con sus pastizales.

42

 Cada  una  de  estas  ciudades  tenía  sus 

pastizales alrededor de ellas, y así fue en 

todas estas ciudades.

43

 De esta manera dio YHVH a Israel toda 

la  tierra  que  había  jurado  dar  a  sus  pa-

dres. Y ellos tomaron posesión de ella y 

habitaron en ella.

44

 Y YHVH les dio reposo alrededor, con-

forme a todo lo que había prometido con 

juramento a sus padres. Ninguno de todos 

sus enemigos pudo hacerles frente, sino 

que YHVH entregó a todos sus enemigos 

en sus manos.

45

 No  faltó  ni  una  palabra  de  todas  las 

buenas cosas que YHVH había hablado a 

la casa de Israel. Todo se cumplió.

El altar junto al Jordán

22

Entonces Josué llamó a los rubeni-

tas, a los gaditas y a la media tribu 

de Manasés,

2

 y les dijo: Vosotros habéis guardado todo 

lo que Moisés, siervo de YHVH os ordenó, 

y habéis obedecido mi voz en todo lo que 

os he mandado.°

3

 No  habéis  abandonado  a  vuestros  her-

manos  en  estos  muchos  días  hasta  hoy, 

sino que habéis respetado la observancia 

del mandamiento de YHVH vuestro Dios.

4

 Y ahora que YHVH vuestro Dios ha dado 

reposo a vuestros hermanos, tal como les 

habló, tornad vuestras tiendas, y volved a 

la tierra de vuestra propiedad, que Moisés 

22.2 

→Nm.32.20-32; Jos.1.12-15.


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Josué 22:5

248

siervo de YHVH os entregó allende el Jor-

dán.

5

 Solamente tened mucho cuidado de po-

ner por obra el mandamiento y la enseñan-

za° que Moisés siervo de YHVH os intimó: 

amar a YHVH vuestro Dios y andar en todos 

sus caminos, guardar sus mandamientos y 

apegarse a Él, y servirle con todo vuestro 

corazón y con toda vuestra alma.

6

 Y los bendijo Josué, y los despidió, y se 

fueron a sus tiendas.

7

 Y  Moisés  había  dado  a  la  media  tribu 

de Manasés posesión° en Basán, pero a 

la  otra  media  tribu°  Josué  le  dio  here-

dad°  entre  sus  hermanos  hacia  el  oc-

cidente,  allende  el  Jordán.  También  a 

éstos  bendijo  Josué  cuando  los  envió  a 

sus tiendas,

8

 y les habló, diciendo: Volved a vuestras 

tiendas  con  riquezas  abundantes,  con 

mucho  ganado,  con  plata,  con  oro,  con 

bronce, con hierro, y con muchos vesti-

dos. ¡Repartid el despojo de vuestros ene-

migos con vuestros hermanos!

9

 Entonces  los  hijos  de  Rubén,  los  hijos 

de  Gad  y  la  media  tribu  de  Manasés  re-

gresaron,  y  se  fueron  de  entre  los  hijos 

de Israel, de Silo, que está en la tierra de 

Canaán, para ir a la tierra de Galaad, a la 

tierra de su propiedad, la cual habían ad-

quirido,  conforme  al  mandato  de  YHVH 

por medio° de Moisés.

10

 Y  cuando  los  hijos  de  Rubén,  los  hi-

jos  de  Gad  y  la  media  tribu  de  Manasés 

llegaron  a  las  cercanías  del  Jordán,  que 

está en la tierra de Canaán, edificaron un 

altar junto al Jordán, un altar de aparien-

cia grandiosa.

11

 Y los hijos de Israel oyeron decir: He 

aquí los hijos de Rubén, los hijos de Gad 

y la media tribu de Manasés han edificado 

el altar que está enfrente de la tierra de 

Canaán, en las cercanías del Jordán, en el 

lado de los hijos de Israel.

12

 Cuando los hijos de Israel oyeron esto, 

toda la comunidad de los hijos de Israel 

se congregó en Silo, para subir en batalla 

contra ellos.

13

 Y los hijos de Israel enviaron a Finees, 

hijo del sacerdote Eleazar, a los hijos de 

Rubén, a los hijos de Gad y a la media tri-

bu de Manasés, a la tierra de Galaad,

14

 y  con  él  a  diez  jefes,  un  jefe  de  cada 

casa paterna de todas las tribus de Israel, 

cada uno de los cuales era cabeza de su 

casa paterna en la multitud de Israel.

15

 Llegaron pues a los hijos de Rubén, a 

los hijos de Gad y a la media tribu de Ma-

nasés, en tierra de Galaad, y les hablaron, 

diciendo:

16

 Toda  la  comunidad  de  YHVH  dice 

así: ¿Qué traición es ésta con que habéis 

prevaricado  contra  el  Dios  de  Israel,  al 

apartaros hoy de seguir a YHVH, y cons-

truiros un altar para rebelaros hoy contra 

YHVH?°

17

 ¿Acaso fue poca la iniquidad de Peor, 

de  la  que  aún  no  estamos  limpios  hasta 

este día, aunque hubo una mortandad en 

la comunidad de YHVH?°

18

 ¡Y vosotros os apartáis hoy de en pos de 

YHVH! Y sucederá que por haberos rebe-

lado hoy contra YHVH, mañana Él estará 

airado contra toda la comunidad de Israel.

19

 Y  ciertamente,  si  la  tierra  de  vuestra 

propiedad es impura, pasaos a la tierra de 

la  posesión  de  YHVH,  en  la  cual  está  el 

Tabernáculo de YHVH, y tomad posesión 

entre nosotros, pero no os rebeléis con-

tra YHVH ni os rebeléis contra nosotros, 

edificándoos un altar aparte del altar de 

YHVH nuestro Dios.

20

 ¿No cometió Acán ben Zera una preva-

ricación con el anatema, y vino la ira so-

bre toda la comunidad de Israel? Y aquel 

hombre no fue el único que falleció por 

su iniquidad.°

21

 Entonces los hijos de Rubén, los hijos 

de Gad y la media tribu de Manasés res-

pondieron y hablaron a las cabezas de los 

millares de Israel:

22

 YHVH, el Dios de dioses, YHVH el Dios 

de dioses, Él lo sabe, y que lo sepa Israel: 

Si ha sido rebelión o prevaricación contra 

YHVH, no nos salves en este día.

23

 ¿Edificamos acaso un altar para apar-

tarnos de en pos de YHVH, o para sacrifi-

car sobre él holocausto u ofrenda, o para 

hacer  sobre  él  sacrificios  de  paz?  ¡Sea 

YHVH el que pida cuenta!

22.5 Heb. torah = enseñanza, instrucción.  22.7 .una posesión.  22.7 .tribu.  22.7 .heredad.  22.9 Lit. por mano.  22.16 

→Dt.12.6. 

22.17 

→Nm.25.1-9.  22.20 →Jos.7.1-26. 


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Josué 23:9

249

24

 ¿O  lo  hicimos  por  temor,  diciendo: 

Mañana  vuestros  hijos  dirán  a  nuestros 

hijos: ¿Qué tenéis vosotros con YHVH, el 

Dios de Israel?

25

 Pues  YHVH  ha  puesto  el  Jordán  por 

frontera  entre  nosotros  y  vosotros,  oh 

hijos  de  Rubén  e  hijos  de  Gad,  vosotros 

no tenéis parte en YHVH. Y así vuestros 

hijos harían que nuestros hijos dejaran de 

temer a YHVH.

26

 Por  tanto,  dijimos:  Apresurémonos  a 

edificarnos  un  altar,  no  para  holocausto 

ni para sacrificio,

27

 sino como un testimonio entre noso-

tros y vosotros, y entre nuestras genera-

ciones  después  de  nosotros,  para  servir 

en la obra de YHVH, en su presencia, con 

nuestros holocaustos, con nuestros sacri-

ficios, y con nuestras ofrendas de paz; así 

vuestros  hijos  no  dirán  mañana  a  nues-

tros  hijos:  Vosotros  no  tenéis  parte  con 

YHVH.

28

 Nosotros  pues  dijimos:  Entonces,  si 

mañana  nos  dicen  esto  a  nosotros  o  a 

nuestros  descendientes,  responderemos: 

Mirad la réplica del altar de YHVH, el cual 

hicieron nuestros ancestros, no para ho-

locaustos o sacrificios, sino para que fue-

ra testimonio entre nosotros y vosotros.

29

 Nunca  tal  acontezca  que  nos  rebele-

mos contra YHVH, o que nos apartemos 

hoy de seguir a YHVH al edificar un altar 

para holocaustos, para ofrenda o para sa-

crificio, aparte del altar de YHVH nuestro 

Dios que está delante de su Tabernáculo.

30

 Y Finees el sacerdote, y los jefes de la 

comunidad, y las cabezas de los millares 

de Israel que estaban con él, escucharon 

las  palabras  que  hablaron  los  hijos  de 

Rubén, los hijos de Gad y los hijos de Ma-

nasés, y les pareció bien ante sus ojos.

31

 Entonces  Finees,  hijo  del  sacerdote 

Eleazar, dijo a los hijos de Rubén, a los hijos 

de Gad y a los hijos de Manasés: Hoy hemos 

entendido que YHVH está entre nosotros, 

pues no habéis cometido contra YHVH esta 

prevaricación. Así habéis librado a los hijos 

de Israel de la mano de YHVH.

32

 Y Finees, hijo del sacerdote Eleazar, y 

los jefes, volvieron de estar con los hijos 

de Rubén y con los hijos de Gad en la tie-

rra de Galaad, a la tierra de Canaán, a los 

hijos de Israel, y les dieron la respuesta.

33

 Y el asunto pareció bien a ojos de los hi-

jos de Israel, y bendijeron a ’Elohim, y no 

hablaron más de subir contra ellos en gue-

rra para devastar la tierra en que habitaban 

los hijos de Rubén y los hijos de Gad.

34

 Y  los  hijos  de  Rubén  y  los  hijos  de 

Gad° proclamaron respecto al altar: Sea 

testigo  entre  nosotros  de  que  YHVH  es 

Ha-’Elohim.

Exhortación de Josué

23

Después  de  muchos  días,  cuando 

YHVH  había  dado  reposo  a  Israel 

de todos sus enemigos en derredor, y Jo-

sué era anciano, y bien entrado en años,

2

 aconteció  que  Josué  convocó  a  todo 

Israel, a sus ancianos y a sus jefes, a sus 

jueces y a sus oficiales, y les dijo: Yo he 

envejecido y estoy entrado en años.

3

 Vosotros habéis visto todo lo que YHVH 

vuestro  Dios  ha  hecho  a  todas  estas  na-

ciones por causa de vosotros, pues YHVH 

vuestro Dios es el que ha guerreado por 

vosotros.

4

 He aquí os he repartido por suertes esas 

naciones  que  aún  quedan  en  herencia 

para  vuestras  tribus,  desde  el  Jordán,  y 

todos los pueblos que destruí hasta el Mar 

Grande, donde se pone el sol.

5

 YHVH vuestro Dios las expulsará de de-

lante de vosotros, y las desposeerá delante 

de vuestra presencia, y vosotros poseeréis 

sus  tierras,  como  os  ha  hablado  YHVH 

vuestro Dios.

6

 Por tanto esforzaos mucho en guardar y 

hacer todo lo que está escrito en el libro 

de  la  Ley  de  Moisés,  a  fin  de  que  no  os 

apartéis de él ni a diestra ni a siniestra.

7

 No os mezcléis con estas naciones que 

han  quedado  con  vosotros.  No  hagáis 

mención del nombre de sus dioses, ni ju-

réis por ellos, ni los sirváis, ni os postréis 

ante ellos.

8

 Os aferraréis a YHVH vuestro Dios, tal 

como habéis hecho hasta este día,

9

 por cuanto YHVH ha desposeído delante 

de vuestra presencia a naciones grandes y 

22.34 LXX añade: y la media tribu de Manasés.


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Josué 23:10

250

fuertes, y nadie os ha podido hacer frente 

hasta este día.

10

 Un varón de vosotros persigue a mil,° 

porque YHVH vuestro Dios es quien pelea 

por vosotros, tal como Él os habló.°

11

 Guardad pues con diligencia vuestras 

almas,  para  que  améis  a  YHVH  vuestro 

Dios.

12

 Porque  si  de  cualquier  manera  os 

apartáis, y os apegáis al resto de estas na-

ciones que han quedado entre vosotros, y 

si concertáis con ellas matrimonio, mez-

clándoos con ellas, y ellas con vosotros,

13

 sabed  certísimamente  que  YHVH 

vuestro Dios no volverá más a desposeer 

a  estas  naciones  de  delante  de  vosotros, 

sino que os serán por lazo y por trampa, y 

como azotes en vuestros costados y espi-

nas en vuestros ojos, hasta que perezcáis 

en  esta  buena  tierra  que  YHVH  vuestro 

Dios os ha dado.

14

 He  aquí  yo  voy  hoy  por  el  camino  de 

toda la tierra. Reconoced, pues, con todo 

vuestro corazón y con toda vuestra alma, 

que no ha caído ni una palabra de todas las 

buenas  cosas  que  YHVH  vuestro  Dios  ha 

hablado acerca de vosotros. Todas ellas os 

han sido cumplidas sin caer una de ellas.

15

 Pero  sucederá  que  tal  como  se  ha 

cumplido en vosotros toda palabra buena 

que YHVH vuestro Dios os ha hablado, así 

también traerá YHVH sobre vosotros toda 

palabra mala, hasta que os destruya de so-

bre esta buena tierra que YHVH vuestro 

Dios os ha dado.

16

 Si traspasáis el pacto que YHVH vues-

tro Dios os ha ordenado, y vais y servís a 

otros  dioses,  y  os  postráis  delante  ellos, 

entonces  la  ira  de  YHVH  arderá  contra 

vosotros,  y  pronto  pereceréis  de  sobre 

esta buena tierra que os ha dado.

Renovación del pacto

24

Y Josué congregó a todas las tribus 

de  Israel  en  Siquem,  y  convocó  a 

los  ancianos  de  Israel,  a  sus  jefes,  a  sus 

jueces y a sus oficiales; y comparecieron 

ante ’Elohim.

2

 Y Josué dijo a todo el pueblo: Así dice 

YHVH Dios de Israel: Al otro lado del río 

habitaron antiguamente vuestros padres: 

Taré,°  padre  de  Abraham  y  de  Nacor,  y 

ellos servían a otros dioses.

3

 Pero  Yo  tomé  a  vuestro  antepasado 

Abraham de la otra parte del río° e hice 

que  anduviera  por  toda  la  tierra  de  Ca-

naán, y multipliqué su descendencia, y le 

di a Isaac.°

4

 Y a Isaac le di a Jacob y a Esaú.° Y a Esaú le 

di la serranía de Seir para que la poseyera,° 

pero Jacob y sus hijos bajaron a Egipto.°

5

 Luego envié a Moisés y a Aarón, y herí 

con  plagas  a  Egipto,  conforme  a  lo  que 

hice en medio de él,° y después os saqué 

de allí.

6

 Saqué a vuestros ancestros de Egipto, y 

llegasteis al mar, y los egipcios persiguie-

ron a vuestros antepasados con carros y 

con jinetes hasta el Mar Rojo.°

7

 Entonces  clamaron  a  YHVH  y  Él  puso 

oscuridad  entre  vosotros  y  los  egipcios, 

y trajo el mar sobre ellos, y los cubrió, y 

vuestros ojos vieron lo que hice en Egip-

to.°  Y  por  muchos  días  estuvisteis  en  el 

desierto.

8

 Después os introduje en la tierra de los 

amorreos, que habitaban en la otra parte 

del  Jordán,  y  lucharon  contra  vosotros, 

pero  los  entregué  en  vuestras  manos,  y 

poseísteis su tierra, y los destruí de delan-

te de vosotros.°

9

 Luego se levantó Balac hijo de Zipor, rey 

de  los  moabitas,  y  peleó  contra  Israel,  y 

envió a llamar a Balaam hijo de Beor para 

que os maldijera.

10

 Pero  no  quise  escuchar  a  Balaam,  y 

él tuvo que bendeciros,° y os libré de su 

mano.

11

 Luego cruzasteis el Jordán° y llegasteis 

a Jericó, y los hombres de Jericó pelearon 

contra vosotros;° también° el amorreo, el 

ferezeo, el cananeo, el heteo, el gergeseo, 

el heveo y el jebuseo, pero Yo los entregué 

en vuestra mano.

12

 Envié también° delante de vosotros el 

avispón° que echó de delante de vosotros 

23.10

 

→Dt.32.30.  23.10

 

→Dt.3.22.  24.2

 

→Gn.11.27.  24.3

 

→Gn.12.1-9.  24.3

 

→Gn.21.1-3.  24.4

 

→Gn.25.24-26.  24.4

 

→Gn36.8. 

24.4

 

→Gn.46.1-7.  24.5

 

→Ex.3.1-12.42.  24.6

 

Heb.  yam-suf  =  mar  del  junco

24.7

 

→Ex.14.1-31.  24.8  →Nm.21.21-35. 

24.10 

→Nm.22.1-24.25.  24.11  →Jos.3.14-17.  24.11  →Jos.6.1-21.  24.11  .también.  24.12  .también.  24.12  →Ex.23.28; 

Dt.7.20. 


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Josué 24:33

251

a los dos reyes de los amorreos, pero no 

con tu espada, ni con tu arco.

13

 Y os di una tierra por la cual no te fati-

gasteis, y ciudades que no edificasteis, en 

las cuales habitáis, y coméis de viñedos y 

olivares que no plantasteis.°

14

 Ahora pues, temed a YHVH y servidle 

con integridad y en verdad, y apartad los 

dioses a los cuales sirvieron vuestros pa-

dres en la otra parte del río y en Egipto, y 

servid a YHVH.

15

 Y si mal os parece servir a YHVH, es-

cogeos  hoy  a  quién  sirváis:  si  a  los  dio-

ses  a  quienes  sirvieron  vuestros  padres 

cuando estuvieron al otro lado del río, o 

a  los  dioses  del  amorreo  en  cuya  tierra 

habitáis, pero yo y mi casa serviremos a 

YHVH.

16

 Entonces respondió el pueblo, y dijo: 

¡Lejos esté de nosotros abandonar a YHVH 

para servir a otros dioses!

17

 Porque  YHVH  nuestro  Dios  es  el  que 

nos sacó a nosotros y a nuestros padres de 

la tierra de Egipto, de casa de esclavitud, y 

el que ha hecho estas grandes señales ante 

nuestros ojos y nos ha guardado por todo el 

camino en que hemos andado, y entre todos 

los pueblos por los cuales hemos pasado.

18

 Por  cuanto  YHVH  ha  echado  de  de-

lante  de  nosotros  a  todos  los  pueblos,  y 

a los amorreos que habitaban en esta tie-

rra; nosotros pues, también serviremos a 

YHVH, porque Él es nuestro Dios.

19

 Pero Josué objetó al pueblo: No podréis 

servir a YHVH,° porque es un Dios santo, 

un Dios celoso. No cargará con vuestras 

transgresiones y con vuestros pecados.

20

 Cuando  hayáis  abandonado  a  YHVH 

para servir a dioses extraños, Él se volverá 

y os hará el mal y os consumirá, después 

del bien que os ha hecho.

21

 Pero el pueblo dijo a Josué: No, en ver-

dad a YHVH hemos de servir.

22

 Entonces  Josué  respondió  al  pueblo: 

Testigos  sois  vosotros  contra  vosotros 

mismos, de que os habéis elegido a YHVH 

para  servirle.  Ellos  respondieron:  ¡Testi-

gos somos!

23

 ¡Apartad pues los dioses extraños que 

hay entre vosotros, e inclinad vuestro co-

razón hacia YHVH Dios de Israel!

24

 Y  el  pueblo  respondió  a  Josué:  ¡A 

YHVH nuestro Dios serviremos, y su voz 

obedeceremos!

25

 Así pactó Josué alianza con el pueblo 

en aquel día y le estableció estatutos y de-

cretos en Siquem.

26

 Luego  escribió  Josué  estas  palabras 

en el libro de la Ley de Dios, y tomando 

una gran piedra, la erigió allí, debajo de la 

encina que estaba junto al Santuario de 

YHVH.

27

 Y dijo Josué a todo el pueblo: He aquí 

esta piedra será testigo contra nosotros, 

pues  ella  ha  oído  todas  las  palabras  que 

YHVH  nos  ha  dicho.  Será,  pues,  testigo 

contra vosotros para que no reneguéis de 

vuestro Dios.

28

 Luego Josué despidió al pueblo, man-

dando a cada uno a su heredad.

29

 Después  de  estas  cosas,  sucedió  que 

murió  Josué  ben  Nun,  siervo  de  YHVH, 

siendo de ciento diez años.

30

 Y lo sepultaron en el límite de su here-

dad en Timnat-sera,° que está en la serra-

nía de Efraín, al norte del monte Gaas.°

31

 E Israel sirvió a YHVH todos los días 

de Josué, y todos los días de los ancianos 

que sobrevivieron a Josué, y que conocían 

toda la obra que YHVH había hecho por 

Israel.

32

 Y los huesos de José, que los hijos de 

Israel  habían  subido  de  Egipto,°  fueron 

sepultados en Siquem, en la porción del 

campo que Jacob había comprado° de los 

hijos  de  Hamor,  padre  de  Siquem,  por 

cien monedas, y así quedó en posesión de 

los hijos de José.

33

 Eleazar ben Aarón también murió, y lo 

sepultaron en la colina de su hijo Finees, 

que le había sido dada en la serranía de 

Efraín.

24.13 

→Dt.6.10-11.  24.19 Es decir, a no ser que quitéis los ídolos de entre vosotros.  24.30 →Jos.19.49-50.  24.30 La LXX 

añade: Allí pusieron junto a él, en la tumba donde lo enterraron, los cuchillos de silex, con los que él circuncidó a los hijos de 

Israel en Gilgal cuando los sacó de Egipto, como el Señor les había señalado, y allí están hasta este día

24.32 

→Gn.50.24-25; 

Ex.13.19. 

24.32 

→Gn.33.19; Jn.4.5; Hch.7.16. 


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1

Después de la muerte de Josué, aconte-

ció que los hijos de Israel consultaron° a 

YHVH, diciendo: ¿Quién de nosotros subirá 

primero para combatir contra el cananeo?

2

 Y  YHVH  dijo:  Judá  subirá;  he  aquí  Yo 

entrego la tierra en su mano.

3

 Y Judá dijo a su hermano Simeón: Sube 

conmigo a la tierra de mi herencia para 

que  luchemos  contra  el  cananeo,  y  yo 

también iré contigo a la tierra de tu here-

dad. Y Simeón fue con él.

4

 Y  subió  Judá,  y  YHVH  entregó  en  su 

mano al cananeo y al ferezeo, y en Bezec 

hirieron de ellos a diez mil hombres.

5

 Y en Bezec encontraron a Adoni-bezec, 

y lucharon contra él, y derrotaron al ca-

naneo y al ferezeo.

6

 Pero Adoni-bezec huyó, y persiguiéndo-

lo lo prendieron, y le cortaron los pulga-

res de sus manos y de sus pies.

7

 Entonces Adoni-bezec dijo: ¡Setenta re-

yes, a quienes hice cortar los pulgares de 

sus manos y pies, recogían migajas deba-

jo de mi mesa! ¡Como hice yo, así me ha 

hecho ’Elohim! Y lo llevaron a Jerusalem, 

y allí murió.

8

 Pues los hijos de Judá ya habían lucha-

do contra Jerusalem, la habían tomado, y 

pasándola a filo de espada, habían prendi-

do fuego a la ciudad.

9

 Después los hijos de Judá bajaron para 

luchar contra el cananeo que habitaba en 

la serranía, en el Neguev y en la Sefela.°

10

 Judá marchó también contra el cana-

neo que habitaba en Hebrón (el nombre 

de Hebrón había sido Quiriat-Arba), y des-

truyeron a Sesay, a Ahimán y a Talmay.

11

 De allí marchó° contra los habitantes de 

Debir, cuyo nombre era antes Quiriat-sefer.

12

 Entonces  dijo  Caleb:  El  que  ataque  a 

Quiriat-sefer, y la conquiste, le daré a mi 

hija Acsa por mujer.

13

 Y Otoniel ben Cenez, hermano menor 

de Caleb la conquistó, y él le dio a su hija 

Acsa por mujer.

14

 Y  aconteció  que  al  irse,  ella  se  apeó 

del  asno  y  lo  incitó°  para  que  pidiera  a 

su padre un campo. Y Caleb le dijo: ¿Qué 

deseas?

15

 Y  le  respondió:  Dame  una  bendición; 

ya que me has dado tierra de sequedales,° 

dame manantiales de agua. Y Caleb le dio 

los manantiales de arriba y los manantia-

les de abajo.

16

 Entonces  los  hijos  del  ceneo,  suegro 

de  Moisés,  subieron  juntamente  con  los 

hijos de Judá, de la ciudad de las Palmas al 

desierto de Judá, que está al sur de Arad. 

Y así fueron y habitaron con el pueblo.

17

 Luego Judá prosiguió con Simeón su 

hermano, y atacaron al cananeo que ha-

bitaba en Sefat, y la dedicaron al extermi-

nio; y alguno llamó el nombre de aquella 

ciudad Horma.°

18

 Judá  también  conquistó  Gaza  con  su 

territorio,  Ascalón  con  su  territorio,  y 

Ecrón con su territorio.

19

 Y YHVH estaba con Judá, y se posesio-

nó  de  la  serranía,  pero  no  intentó°  des-

poseer a los habitantes del valle, porque 

tenían carros de hierro.

Nuevas conquistas de Israel

1.1 Mismo verbo que utiliza el sacerdote para consultar a Dios mediante Urim yTumim. Es prob. que ante la ausencia de Moisés 

y Josué, ellos mismos consultaran utilizando el mismo procedimiento. 

→Nm.27.21.  1.9 Esto es, la parte llana.  1.11 Esto es, la 

tribu de Judá

1.14 LXX: él persuadió a ella

→Jos.15.18.  1.15 NNeguev.  1.17 →Nm.21.3.  1.19 .intentó


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Jueces 2:7

253

20

 Y  dieron  Hebrón  a  Caleb,  tal  como 

Moisés había hablado, y él expulsó de allí 

a los tres hijos de Anac.°

21

 En cambio, los hijos de Benjamín no 

expulsaron a los jebuseos que habitaban 

en  Jerusalem,  y  así  los  jebuseos  conti-

núan morando en Jerusalem con los ben-

jamitas hasta hoy.°

22

 En cuanto a los de la casa de José, ellos 

también subieron contra Bet-’El, y YHVH 

estuvo con ellos.

23

 Y los de la casa de José hicieron una 

exploración  en  Bet-’El,  ciudad  que  anti-

guamente se llamaba Luz.

24

 Y  los  espías  vieron  a  un  hombre  que 

salía de la ciudad, y le dijeron: Muéstra-

nos ahora la entrada de la ciudad, y hare-

mos contigo misericordia.

25

 Y  él  les  mostró  la  entrada  de  la  ciu-

dad,  y  la  hirieron  a  filo  de  espada,  pero 

dejaron libre a aquel hombre con toda su 

familia.

26

 Y el hombre fue a tierra de los heteos, 

y edificó una ciudad que llamó Luz, que 

es su nombre hasta hoy.

27

 Pero  Manasés  no  desposeyó  a  los  de 

Betseán, ni a los de sus aldeas, ni a los de 

Taanac y a sus aldeas, ni a los habitantes 

de Dor y a sus aldeas, ni a los habitantes 

de Ibleam y a sus aldeas, ni a los habitan-

tes  de  Meguido  y  a  sus  aldeas,  sino  que 

los  cananeos  persistieron  en  habitar  en 

aquella tierra.

28

 Sin  embargo,  cuando  Israel  cobró 

fuerza,  hizo  tributario  al  cananeo,  pero 

no quiso expulsarlo del todo.°

29

 Efraín  tampoco  quiso  expulsar  al  ca-

naneo que habitaba en Guezer, sino que 

el  cananeo  habitó  en  medio  de  ellos  en 

Guezer.°

30

 Tampoco Zabulón quiso expulsar a los 

que  habitaban  en  Quitrón  ni  a  los  que 

habitaban en Naalol, sino que el cananeo 

habitó en medio de ellos, y vino a ser tri-

butario.

31

 Tampoco Aser expulsó a los que habi-

taban en Aco, ni a los que habitaban en 

Sidón,  en  Ahlab,  en  Aczib,  en  Helba,  en 

Afec y en Rehod.

32

 Así que Aser habitó en medio del cana-

neo que habitaba en la tierra, porque no 

quiso expulsarlos.

33

 Neftalí  tampoco  quiso  expulsar  a  los 

que habitaban en Bet-semes,° ni a los que 

habitaban en Bet-anat, sino que habitó en 

medio del cananeo que habitaba en la tie-

rra, aunque los moradores de Bet-semes 

y los moradores de Bet-anat le fueron tri-

butarios.

34

 Y los amorreos estrecharon a los hijos 

de Dan hacia la montaña, y no los dejaron 

bajar al valle.

35

 Y el amorreo persistió en habitar en el 

monte Heres, en Ajalón y en Saalbín, pero 

la mano de la casa de José se agravó sobre 

ellos, y llegaron a ser tributarios.

36

 Y la frontera del amorreo se extendía 

desde la subida de Acrabim,° y desde Sela 

hacia arriba.

Muerte de Josué 

El pacto quebrantado

2

El ángel de YHVH subió entonces de 

Gilgal a Bojim, y dijo: Yo os hice subir 

de Egipto, y os introduje a la tierra que 

tenía jurada a vuestros padres y dije: No 

quebrantaré mi pacto con vosotros.

2

 Pero vosotros hicisteis pacto con los ha-

bitantes  de  esta  tierra,  cuyos  altares  de-

bíais derribar.° No habéis obedecido a mi 

voz. ¿Qué es esto que habéis hecho?

3

 Por lo cual he dicho: No los expulsaré de 

delante de vosotros, sino que os serán es-

pinas° en vuestros costados, y sus dioses 

serán trampa para vosotros.

4

 Y cuando el ángel de YHVH habló estas 

palabras a todos los hijos de Israel, el pue-

blo alzó su voz y lloró.

5

 Y  llamaron  el  nombre  de  aquel  lugar 

Bojim.°  Y  allí  ofrecieron  sacrificios  a 

YHVH.

6

 Cuando  Josué  hubo  despedido  al  pue-

blo, los hijos de Israel se fueron cada cual 

a  su  heredad  para  tomar  posesión  de  la 

tierra.

7

 Y el pueblo sirvió a YHVH todos los días 

de Josué, y todos los días de los ancianos 

que  sobrevivieron  a  Josué,  quien  había 

1.20 

→Jos.15.13-14.  1.21 Es decir, hasta que David la conquistara. →Jos.15.63; 2 S.5.6; 1 Cr.11.4.  1.28 →Jos.17.11-13. 

1.29 

→Jos.16.10.  1.33  Esto  es,  templo  del  sol.  1.36  Esto  es,  escorpiones  o  alacranes.  2.2  →Ex.34.12-13;  Dt.7.2-5. 

2.3 .espinas.  2.5 Esto es, lloradores


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Jueces 2:8

254

visto  todas  las  grandes  obras  de  YHVH, 

que Él había hecho a favor de Israel.

8

 Murió  pues  Josué  ben  Nun,  siervo  de 

YHVH, de edad de ciento diez años,

9

 y lo sepultaron en el territorio de su he-

redad, en Timnat-jeres,° en la serranía de 

Efraín, al norte del monte Gaas.

10

 Y  toda  aquella  generación  también 

fue  reunida  a  sus  padres.  Pero  después 

de  ellos  se  levantó  otra  generación  que 

no conocía° a YHVH, ni las obras que Él 

había hecho por Israel.

11

 Entonces los hijos de Israel hicieron lo 

malo ante los ojos de YHVH, y sirvieron a 

los baales.°

12

 Así  abandonaron  a  YHVH,  el  Dios  de 

sus  padres,  que  los  había  sacado  de  la 

tierra de Egipto, y anduvieron tras otros 

dioses, los dioses de los pueblos que es-

taban en sus alrededores, y se postraron 

ante ellos, y provocaron a ira a YHVH.

13

 Abandonaron  pues  a  YHVH,  y  sirvie-

ron a Baal y a Astarot.°

14

 Por  eso  la  ira  de  YHVH  se  encendió 

contra  Israel,  y  los  entregó  en  manos 

de saqueadores que los despojaron, y los 

entregó  en  manos  de  sus  enemigos  en 

derredor, de manera que ya no pudieron 

hacer frente a sus enemigos.

15

 Por dondequiera que salían, la mano de 

YHVH estaba contra ellos para mal, como 

YHVH había hablado, y como YHVH se lo 

había  jurado,  de  suerte  que  se  veían  en 

grandes aprietos.

16

 Entonces YHVH levantaba jueces que 

los libraban de mano de sus saqueadores.

17

 Pero  ni  aun  a  sus  jueces  escucharon, 

sino  que,  prostituyéndose  tras  otros  dio-

ses, se postraban ante ellos. Muy pronto se 

desviaron  del  camino  en  que  anduvieron 

sus padres para obedecer los mandamien-

tos de YHVH, pero ellos no lo hicieron así.

18

 Y cuando YHVH les levantaba jueces, 

YHVH estaba con el juez y los libraba de 

mano de sus enemigos todos los días de 

aquel  juez,  porque  YHVH  se  conmovía 

de  sus  gemidos  a  causa  de  quienes  los 

maltrataban y oprimían.

19

 Pero sucedía que cuando moría aquel 

juez,  ellos  se  volvían  atrás  y  se  corrom-

pían  más  que  sus  padres,  yendo  en  pos 

de otros dioses para servirles y postrarse 

ante ellos, y no desistían de sus prácticas 

ni de seguir su perverso camino.

20

 Por lo cual la ira de YHVH se encendió 

contra Israel, y dijo: Por cuanto esta na-

ción transgrede mi pacto, el que ordené a 

sus padres, y no obedecen mi voz,

21

 tampoco  Yo  volveré  más  a  desposeer 

de  delante  de  ellos  a  hombre  alguno  de 

aquellas naciones que Josué dejó cuando 

murió,

22

 a  fin  de  probar  por  medio  de  ellas  a 

Israel,  si  guardarían  o  no  el  camino  de 

YHVH para andar en él, como sus padres 

lo guardaron.

23

 Por esto YHVH había dejado a aquellas 

naciones sin desposeerlas de una vez y no 

las había entregado en mano de Josué.

Otoniel, Aod y Samgar

3

Estas son pues las naciones que YHVH 

dejó para probar con ellas a los israeli-

tas que no habían conocido todas las gue-

rras de Canaán

2

 (sólo  para  que  las  generaciones  de  los 

hijos de Israel conocieran la guerra y la 

enseñaran  a  los  que  antes  no  la  habían 

experimentado):

3

 Los cinco jefes° filisteos, todos los cana-

neos, los sidonios, y los heveos, los cuales 

habitaban en la serranía del Líbano, des-

de el monte Baal-hermón hasta el paso de 

Hamat.

4

 Quedaron  pues  para  probar  a  Israel,  a 

fin  de  saber  si  obedecerían  los  manda-

mientos que YHVH había ordenado a sus 

padres por medio de Moisés.

5

 Así, los hijos de Israel habitaron en me-

dio del cananeo, el heteo, el amorreo, el 

ferezeo, el heveo y el jebuseo,

6

 y tomaron sus hijas por mujeres, y en-

tregaron sus propias hijas a los hijos de 

ellos, y sirvieron a sus dioses.

7

 Y  los  hijos  de  Israel  hicieron  lo  malo 

ante los ojos de YHVH, olvidando a YHVH 

2.9 

→Jos.19.49-50.  2.10 Es, decir, no se preocupaba ni se mostraba agradecido.  2.11 Heb. ba’al = esposo, dueño, amo o 

señor. Se refiere a las deidades paganas. 

2.13 Plural de Astarté. Se la conocía como la diosa de la fertilidad o fecundidad. Ya en 

esa época era común el culto madre-hijo, traído de la adoración de Istar y Nimrod en Babilonia. 

3.3 Heb. seranim = príncipes

Palabra utilizada sólo para referirse a dirigentes filisteos. LXX registra sátrapas


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Jueces 3:31

255

su  Dios  y  sirviendo  a  los  Baales  y  a  las 

Aseras.°

8

 Por  tanto  la  ira  de  YHVH  se  encendió 

contra  Israel  y  los  entregó  en  mano  de 

Cusán-Risataim,°  rey  de  Aram-Naha-

raim,°  y  los  hijos  de  Israel  sirvieron  a 

Cusán-Risataim ocho años.

9

 Entonces  los  hijos  de  Israel  clamaron 

a YHVH, y YHVH levantó un libertador° 

para los hijos de Israel: a Otoniel ben Ce-

nez,  hermano  menor  de  Caleb.  Y  los  li-

bertó.

10

 Y el Espíritu de YHVH estuvo sobre él, 

y gobernó a Israel. Y salió a la guerra, y 

YHVH  entregó  en  su  mano  a  Cusán-Ri-

sataim, rey de Aram, y su mano prevale-

ció contra Cusán-Risataim.

11

 Luego la tierra reposó cuarenta años, y 

murió Otoniel ben Cenez;

12

 y los hijos de Israel volvieron a hacer 

lo malo ante los ojos de YHVH, y YHVH 

fortaleció  a  Eglón,  rey  de  Moab,  contra 

Israel, por cuanto habían hecho lo malo 

ante los ojos de YHVH.

13

 Y reunió consigo° a los hijos de Amón 

y de Amalec, y atacó a Israel, y conquista-

ron la ciudad de las Palmeras.

14

 Y los hijos de Israel sirvieron a Eglón, 

rey de Moab, durante dieciocho años.

15

 Pero cuando los hijos de Israel clama-

ron a YHVH, YHVH les levantó un liberta-

dor: Aod ben Gera, benjaminita, hombre 

zurdo, por medio del cual los hijos de Is-

rael  enviaron  un  presente°  a  Eglón,  rey 

de Moab.

16

 Y Aod se había hecho un puñal de do-

ble  filo,  de  un  codo  de  largo,  y  lo  había 

ceñido  debajo  de  sus  vestidos  sobre  el 

muslo derecho.

17

 Le llevó, pues, el presente a Eglón, rey 

de  Moab,  y  Eglón  era  un  hombre  muy 

grueso.

18

 Y aconteció que, cuando hubo termi-

nado de ofrecer el presente, despidió a la 

gente que lo había llevado.

19

 Pero  él  se  volvió  desde  Pesilim°  en 

Gilgal,  y  dijo:  Oh  rey,  tengo  un  asunto 

secreto  para  ti.  Y  él  respondió:  ¡Guarda 

silencio! Y todos los que estaban delante 

de él salieron.

20

 Entonces Aod fue a él estando sentado 

solo en su sala de verano. Y Aod dijo: Ten-

go palabra de Dios para ti. Y él se levantó 

del trono.

21

 Entonces Aod alargó su mano izquier-

da y tomando el puñal de su muslo dere-

cho, se lo hundió en el vientre.

22

 Y la empuñadura entró tras la hoja, y 

la grasa se cerró tras ella, de modo que no 

pudo sacarse el puñal de su vientre, y la 

punta le salió por la horcajadura.

23

 Entonces  Aod  salió  al  corredor,  y  ce-

rró tras sí las puertas de la sala y les pasó 

cerrojo.

24

 Cuando  él  salía,  llegaron  los  siervos, 

pero al ver las puertas de la sala cerradas, 

dijeron:  Sin  duda  él  está  cubriendo  sus 

pies° en la cámara de verano.

25

 Y  esperaron  impacientemente,  has-

ta  quedar  desconcertados,  y  como  él  no 

abría  las  puertas  de  la  sala,  tomaron  la 

llave y abrieron, y ¡he aquí su señor caído 

en tierra, muerto!

26

 Pero  Aod  se  escapó  mientras  ellos  se 

demoraban,  y  pasando  más  allá  de  Pesi-

lim, se puso a salvo en Seirat.

27

 Y aconteció que a su llegada, resonó el 

shofar en la serranía de Efraín, y los hi-

jos de Israel bajaron con él de la serranía, 

yendo él al frente de ellos.

28

 Y les dijo: ¡Seguidme, que YHVH ha en-

tregado a vuestros enemigos, los moabi-

tas, en vuestra mano! Y bajaron en pos de 

él, y tomaron los vados del Jordán hacia 

Moab, y no dejaron pasar a ninguno.

29

 Y en aquel tiempo mataron como diez 

mil  hombres  de  los  moabitas,  todos  ro-

bustos  y  todos  hombres  esforzados.  No 

escapó ninguno.

30

 Así  fue  humillado  Moab  en  aquel  día 

bajo la mano de Israel. Y la tierra reposó 

ochenta años.

31

 Después de éste fue Samgar ben Anat, 

el  cual  hirió  a  seiscientos  hombres  de 

los filisteos con una quijada de buey; y él 

también libró a Israel.

3.7 Heb. asheroth, plural de ‘asherah. Los ídolos de Asera eran troncos de árboles que se levantaban junto a los altares paganos 

a modo de estacas votivas para ser venerados como objetos de culto. LXX registra alsesin = arboledas

3.8 Esto es: Cusán de 

la doble maldad

3.8 Esto es, Siria mesopotámica.  3.9 En su sentido primario el verbo yasha significa ayudar, asistir y también 

salvar

3.13 Esto es, Eglón.  3.15 Heb. minjah. Prob. una ofrenda de alimentos vegetales.  3.19 Prob. se trata de una cantera 

para fabricar ídolos. 

3.24 cubre sus pies. Heb. que refiere la acción de defecar. 


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Jueces 4:1

256

Débora y Barac

4

Pero  después  que  murió  Aod,  los  hi-

jos de Israel volvieron a hacer lo malo 

ante los ojos de YHVH.

2

 Y YHVH los entregó en mano de Yabín, 

rey de Canaán, que reinaba en Hazor, el 

comandante de cuyo ejército era Sísara, 

que moraba en Haroset-goim.

3

 Entonces  los  hijos  de  Israel  clamaron 

a YHVH, porque aquél tenía novecientos 

carros  de  hierro,  y  durante  veinte  años 

había  oprimido  con  crueldad  a  los  hijos 

de Israel.

4

 En aquel tiempo juzgaba en Israel Dé-

bora, una profetisa, mujer de Lapidot.°

5

 Y se sentaba bajo el palmar de Débora, 

entre  Ramá  y  Bet-’El,  en  la  serranía  de 

Efraín, y los hijos de Israel acudían a ella 

para que los juzgara.

6

 Y ella hizo llamar a Barac ben Abinoam, 

desde  Cedes-Neftalí,  y  le  dijo:  ¿No  te  ha 

ordenado YHVH, Dios de Israel, diciendo: 

Anda, avanza hacia monte Tabor, y toma 

contigo diez mil hombres de los hijos de 

Neftalí y de los hijos de Zabulón?

7

 Y Yo atraeré al torrente de Cisón a Sísa-

ra, príncipe del ejército de Yabín, con sus 

carros y con sus multitudes, y lo entrega-

ré en tu mano.

8

 Y Barac le respondió: Si tú vas conmigo, 

entonces iré, pero si no vas conmigo, no 

iré.

9

 Y ella dijo: Ciertamente iré contigo, pero 

no  será  tuya  la  gloria  de  la  jornada  que 

vas a emprender, porque YHVH entregará 

a Sísara en mano de una mujer. Y Débora 

se levantó y fue con Barac a Cedes.

10

 Y Barac convocó a Zabulón y a Neftalí en 

Cedes, y subió con diez mil hombres que 

siguieron sus pasos. Y Débora subió con él.

11

 Es de saber que Heber ceneo, se había 

apartado de los ceneos, descendientes de 

Hobab, cuñado de Moisés, y había ido des-

plegando sus tiendas hasta el encinar de 

Zaanaim, que está junto a Cedes.

12

 Y se le informó a Sísara que Barac ben 

Abinoam, había subido al monte Tabor.

13

 Por  lo  cual  Sísara  reunió  todos  sus 

carros, novecientos carros de hierro, con 

todo  el  pueblo  que  estaba  con  él,  desde 

Haroset-goim hasta el torrente de Cisón.

14

 Entonces dijo Débora a Barac: ¡Levánta-

te, que este es el día en que YHVH ha entre-

gado a Sísara en tu mano! ¿No ha salido ya 

YHVH delante de ti? Y Barac bajó del mon-

te Tabor, y diez mil hombres en pos de él.

15

 Y YHVH destrozó a Sísara, con todos 

sus carros y todo su ejército a filo de es-

pada delante de Barac; y Sísara bajándose 

del carro, huyó a pie.

16

 Pero  Barac  persiguió  los  carros  y  al 

ejército  hasta  Haroset-goim,  y  todo  el 

ejército  de  Sísara  cayó  a  filo  de  espada 

hasta no quedar ni uno.

17

 Sísara,  pues,  había  huido  a  pie  hasta 

la tienda de Jael, mujer de Heber ceneo, 

porque había paz entre Yabín rey de Ha-

zor y la casa de Heber ceneo.

18

 Y  salió  Jael  al  encuentro  de  Sísara,  y 

le dijo: ¡Entra, señor mío, entra aquí, no 

temas! Entonces él entró en la tienda de 

ella, y ella lo cubrió con una manta.

19

 Y él le dijo: Dame, te ruego, un poco 

de agua para beber, pues tengo sed. Ella 

entonces abrió un odre de leche y le dio 

de beber, y lo volvió a cubrir.

20

 Y él le dijo: Quédate en la puerta de la 

tienda, y si alguno viene y te pregunta y 

dice: ¿Hay alguien aquí?, tú le responde-

rás que no.

21

 Pero Jael, mujer de Heber, tomó una 

estaca de la tienda y asiendo un mazo en 

su mano, fue calladamente hacia él, y le 

clavó la estaca en la sien, la cual penetró 

hasta  la  tierra,  pues  él  estaba  cansado  y 

dormía profundamente. Y así murió.

22

 En esto, he aquí Barac que venía persi-

guiendo a Sísara, y Jael salió a recibirlo, y le 

dijo: Ven, te mostraré al hombre que buscas. 

Y él entró donde ella estaba, y he aquí Sísara 

yacía muerto con la estaca en la sien.

23

 Así  humilló  ’Elohim  en  aquel  día  a 

Yabín,  rey  de  Canaán,  ante  los  hijos  de 

Israel.

24

 Y la mano de los hijos de Israel se hizo 

más y más dura contra Yabín, rey de Ca-

naán,  hasta  que  acabaron  de  destruir  a 

Yabín rey de Canaán.

Canto de Débora

5

Aquel día Débora cantó con Barac ben 

Abinoam, diciendo:

4.4 NMujer de antorchas.


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Jueces 5:20

257

2

    ¡Por haber tomado el mando los 

caudillos° en Israel,

Por haberse ofrecido 

voluntariamente el pueblo, 

bendecid a YHVH!

3

    ¡Oíd, oh reyes, nobles escuchad

Que voy a cantar, a cantar a YHVH,

A cantar salmos a YHVH, al Dios de 

Israel!

4

    Cuando saliste de Seír, oh YHVH,

Cuando avanzaste desde el campo de 

Edom,

La tierra se estremeció, los cielos 

destilaron,

Y las nubes gotearon agua.

5

    Temblaron los montes delante de 

YHVH,

Aquel mismo Sinay, ante la 

presencia de YHVH, Dios de 

Israel.°

6

    En tiempo de Samgar ben Anat,

En los días de Jael, cesaron los 

senderos,°

Y los viajeros andaban por sendas 

tortuosas.°

7

    ¡Cesaron los aldeanos,° no los había 

en Israel,

Hasta que te pusiste en pie, Débora,

Te pusiste en pie, oh madre en 

Israel!

8

    Cuando escogían nuevos dioses,

La guerra estaba a las puertas,

¿Se veía escudo y lanza

Entre cuarenta mil en Israel?

9

    ¡Mi corazón está por los capitanes de 

Israel,

Por los voluntarios del pueblo!

¡Bendecid a YHVH!

10

    Vosotros los que cabalgáis asnas 

blancas,°

Los que presidís en juicio,°

Los que vais por el camino,° 

meditad.

11

    Por la voz de los arqueros en los 

abrevaderos,

Donde se celebran los triunfos de 

YHVH,

Los triunfos de sus aldeanos° en 

Israel.

Cuando el pueblo de YHVH acudió a 

las puertas.

12

    ¡Despierta, despierta, Débora!

¡Despierta, despierta, entona un 

cántico!

¡Levántate, Barac!

¡Toma tus cautivos, oh hijo de 

Abinoam!

13

    ¡Oh remanente, somete a los 

poderosos!

¡Oh pueblo de YHVH, sométeme a 

los guerreros!

14

    De Efraín vinieron sus retoños 

contra Amalec,

Siguiéndote Benjamín, con sus 

familias;

De Maquir bajaron los capitanes,

Y de Zabulón los que empuñan el 

bastón de mando.

15

    Los jefes de Isacar fueron con 

Débora,

Y así como Barac, también Isacar,

Fue llevado al valle tras sus pies.

En los clanes de Rubén,

Largas fueron las deliberaciones del 

corazón.

16

    ¿Qué hace sentado entre los apriscos,

Escuchando flautas de pastores?

Largas fueron las deliberaciones del 

corazón en los clanes de Rubén,

17

    Mientras Galaad reposa allende el 

Jordán,

¿Por qué se demora Dan en las 

naves,

Y Aser se sienta a la orilla del mar,

Y en sus puertos se queda tranquilo?

18

    Zabulón, pueblo que expuso su vida 

hasta la muerte,

Como Neftalí en las alturas del 

campo.

19

    Los reyes vinieron y guerrearon,

Guerrearon los reyes de Canaán;

En Taanac, junto a las aguas de 

Meguido;

Pero no tomaron despojos de plata,

20

    Pues desde los cielos pelearon las 

estrellas,

Desde sus órbitas guerrearon contra 

Sísara,

5.2 Heb. pará = soltar el pelo. Prob. se refiere a un ritual de preparación para la batalla.  5.5 

→Ex.19.18.  5.6 Es decir, de-

jaron de ser lugares seguros

5.6 Es decir, tomaban atajos por temor a los asaltos.  5.7 Lit. aldeas.  5.10 Esto es, los nobles

5.10 Esto es, los jueces.  5.10 Esto es, los mercaderes.  5.11 Lit. aldeas.


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Jueces 5:21

258

21

    Y el torrente de Cisón los arrastró,

Torrente antiguo, torrente de Cisón.

Marcha con poder ¡oh alma mía!

22

    Entonces resonaron los cascos de 

caballos,

Por el continuo galopar de sus 

corceles.

23

    ¡Maldecid a Meroz! dice el ángel de 

YHVH,

Maldecid severamente a sus 

moradores,

Porque no vinieron en ayuda de 

YHVH,

En ayuda de YHVH con los 

valientes.

24

    ¡Bendita Jael entre las mujeres,

Mujer de Heber ceneo,

Entre las mujeres de la tienda, 

bendita sea en gran manera!

25

    Pidió agua, y le dio leche;

En tazón de nobles le acercó 

cuajada.

26

    Llevó su mano a la estaca,

Y echó mano al mazo de artesano;

A Sísara golpeó, machacó 

su cabeza,

Le quebró y atravesó su sien.

27

    A los pies de ella se encorvó,

Cayó, quedó tendido;

A sus pies quedó encorvado,

Y donde se encorvó, quedó muerto.

28

    La madre de Sísara se asoma a la 

ventana,

Y clama por entre las celosías:

¿Por qué tarda su carro en venir?

¿Por qué se han detenido las ruedas 

de sus carruajes?

29

    La más sabia de sus damas le 

responde,

Pero ella se repite las palabras:

30

    ¿Ya agarran el botín y lo reparten?

Un útero° o dos por cada guerrero,

Paños de colores para Sísara,

Recamados y bordados para cuellos 

de cautivas. ¡Gran botín!

31

    ¡Así perezcan todos tus enemigos, 

oh YHVH!

¡Los que te aman sean fuertes como 

el brillar del sol en su salir!

Y la tierra reposó cuarenta años.

Gedeón

6

Pero los hijos de Israel volvieron a ha-

cer lo malo ante los ojos de YHVH. Y 

YHVH  los  entregó  en  las  manos  de  Ma-

dián por siete años.

2

 Y la mano de Madián prevaleció contra 

Israel. Y por causa de Madián los hijos de 

Israel  prepararon  las  guaridas  y  cuevas 

que están en los montes, y los lugares for-

tificados.

3

 Porque sucedía que cuando los de Israel 

acababan de sembrar, los madianitas ve-

nían con los amalecitas y con los hijos del 

oriente y subían contra ellos,

4

 y acampaban frente a ellos, y destruían 

el  producto  de  la  tierra  hasta  llegar  a 

Gaza, y no dejaban sustento alguno en Is-

rael, ni cordero, ni buey, ni asno.

5

 Porque  subían  con  sus  ganados  y  sus 

tiendas,  entrando  como  langostas  en 

multitud,  pues  tanto  ellos  como  sus  ca-

mellos eran innumerables, y entraban en 

la tierra para devastarla.

6

 Así  Israel  empobrecía  en  gran  manera 

a causa de Madián. Entonces los hijos de 

Israel clamaron a YHVH.

7

 Y sucedió que cuando los hijos de Israel 

clamaron a YHVH a causa de Madián,

8

 YHVH envió entonces a un varón profeta 

a los hijos de Israel, el cual les dijo: Así dice 

YHVH Dios de Israel: Yo os hice subir de 

Egipto, y os saqué de casa de esclavitud,

9

 y os salvé de la mano de los egipcios, y 

de la mano de todos vuestros opresores, a 

los cuales eché de delante de vosotros, y 

os di su tierra,

10

 y  os  dije:  Yo  soy  YHVH  vuestro  Dios; 

no  temáis  a  los  dioses  del  amorreo  en 

cuya tierra habitáis. Pero no obedecisteis 

a mi voz.

11

 Entonces, el ángel de YHVH vino y se 

sentó bajo la encina que está en Ofra, que 

era de Joás abiezerita. Y su hijo Gedeón° 

estaba  desgranando  espigas  en  el  lagar 

para esconderlo de los madianitas.

12

 Y se le apareció el ángel de YHVH y le 

dijo: ¡YHVH es contigo, varón fuerte y va-

liente!

13

 Pero Gedeón contestó: ¡Ah, señor mío! 

si YHVH está con nosotros, ¿cómo es que 

5.30 Esto es, doncella, en referencia a su estado de madurez sexual.  6.11 Gedeón = talador o cortador, del verbo gada’ = 

cortar, mutilar, talar


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Jueces 6:35

259

nos ha sobrevenido todo esto? ¿Y en dón-

de están todas sus maravillas que nuestros 

padres nos relataron, diciendo: YHVH nos 

hizo subir de Egipto? Pero ahora YHVH 

nos ha desechado y nos ha entregado en 

mano de Madián.

14

 Entonces YHVH se volvió hacia él, y le 

dijo: Ve con tu fuerza, y librarás a Israel 

de la palma de la mano de Madián. ¿Acaso 

no te envío Yo?

15

 Y él le dijo: ¡Ah, señor mío! ¿Con qué 

libraré a Israel? He aquí mi clan es el más 

pobre  de  Manasés,  y  yo  el  menor  en  la 

casa de mi padre.

16

 Pero  YHVH  le  dijo:  Porque  Yo  estaré 

contigo  derrotarás  a  Madián  como  a  un 

solo hombre.

17

 Y él le respondió: Te ruego, si he halla-

do gracia ante tus ojos, dame señal de que 

eres Tú mismo quien hablas conmigo.

18

 No te muevas de aquí, te ruego, hasta 

que  vuelva  a  ti  y  saque  mi  ofrenda,  y  la 

ponga ante tu presencia. Y Él dijo: Yo me 

quedaré hasta que vuelvas.

19

 Entonces Gedeón entró y preparó un 

cabrito  y  un  efa  de  harina  de  panes  sin 

levadura; luego puso la carne en una ca-

nasta y el caldo en una olla, y lo sacó y se 

lo ofreció bajo la encina.

20

 Y el ángel de Dios le dijo: Toma la carne 

y el pan ázimo y ponlos sobre esta peña, y 

vierte el caldo sobre ellos. Y él lo hizo así.

21

 Entonces el ángel de YHVH extendió el 

cayado que tenía en su mano, y la punta 

tocó  la  carne  y  el  pan  ázimo,  y  subió  el 

fuego de la peña, que consumió la carne y 

el ázimo. Y el ángel de YHVH desapareció 

de su vista.

22

 Viendo  Gedeón  que  era  el  ángel  de 

YHVH,  dijo:  ¡Ay  de  mí,  Adonay  YHVH, 

porque he visto al ángel de YHVH cara a 

cara!

23

 Pero  YHVH  le  dijo:  ¡Paz  sea  contigo! 

No temas, no morirás.

24

 Y  Gedeón  construyó  allí°  un  altar  a 

YHVH, y lo llamó YHVH Shalom,° el cual 

permanece hasta el día de hoy en Ofra de 

los abiezeritas.

25

 Pues aconteció en aquella misma no-

che  que  YHVH  le  dijo:  Toma  el  novillo 

que  tiene  tu  padre,  el  novillo  rojo,  todo 

bermejo,° y derriba con él el altar de Baal 

que tiene tu padre, y tala la Asera que está 

a su lado.

26

 Y  construye  debidamente  un  altar  a 

YHVH tu Dios en la parte más alta de esta 

peña. Luego toma el buey rojo, y ofrécelo 

en holocausto con la madera de la Asera 

que habrás cortado.

27

 Tomó  pues  Gedeón  diez  hombres  de 

sus  siervos,  e  hizo  como  le  había  dicho 

YHVH. Pero, por temor a la casa de su pa-

dre y a los hombres de la ciudad, no hizo 

eso de día, sino que lo hizo de noche.

28

 Cuando  los  hombres  de  la  ciudad  se 

levantaron por la mañana, he aquí el al-

tar de Baal estaba demolido y la Asera que 

había junto a él estaba cortada, y el novi-

llo rojo había sido ofrecido en holocausto 

sobre el altar construido.

29

 Y  se  decían  unos  a  otros:  ¿Quién  ha 

hecho  esto?  Y  cuando  indagaron  y  pre-

guntaron, se les dijo: Gedeón ben Joás ha 

hecho esto. Por lo cual los hombres de la 

ciudad dijeron a Joás:

30

 Saca a tu hijo, para que muera; porque 

ha demolido el altar de Baal y ha talado la 

Asera que había junto a él.

31

 Pero Joás respondió a todos los que es-

taban ante él: ¿Pretendéis contender por 

Baal, o queréis ayudarle? Quien pretenda 

contender  por  él,  será  muerto  antes  de 

la  mañana.  Si  es  ’Elohim,  que  contien-

da por sí mismo con el que demolió su 

altar.

32

 Por  esto  fue°  apellidado  en  aquel  día 

Jerobaal, es decir: Contienda con él Baal, 

por cuanto derribó su altar.

33

 Entre tanto, todos los madianitas, los 

amalecitas  y  los  hijos  del  oriente  se  re-

unieron a una, y pasando adelante acam-

paron en el valle de Jezreel.

34

 Entonces el Espíritu de YHVH revistió 

a  Gedeón,  el  cual  resonó  el  shofar,  y  se 

juntaron los abiezeritas en pos de él.

35

 Igualmente envió mensajeros por todo 

Manasés,  y  ellos  también  se  reunieron 

con  él.  Asimismo  envió  mensajeros  por 

Aser,  Zabulón  y  Neftalí,  los  cuales  tam-

bién subieron a su encuentro.

6.24 Esto es, en donde estaba el altar de Baal.  6.24 

→ § 4.  6.25 Ny un segundo toro de siete años. Pero lo reglamentario era 

que las víctimas ofrecidas no pasaran de tres años. 

6.32 Esto es, Gedeón


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Jueces 6:36

260

36

 Dijo  entonces  Gedeón  a  Ha-’Elohim: 

Si has de librar por mi mano a Israel, con-

forme has dicho,

37

 he aquí que voy a poner este vellón de 

lana en el granero. Si cae el rocío sobre el 

vellón mientras todo el suelo queda seco, 

entonces sabré que librarás por mi mano 

a Israel, conforme has dicho.

38

 Y  sucedió  así,  pues  cuando  se  levan-

tó  de  madrugada,  exprimió  el  vellón  y 

sacó de él rocío hasta llenar un tazón de 

agua.

39

 Dijo  entonces  Gedeón  a  Ha-’Elohim: 

No se encienda tu ira contra mí, y hablaré 

sólo una vez más. ¡Ruégote me permitas 

probar sólo esta vez con el vellón! Te rue-

go que quede seco el vellón, en tanto que 

en todo el suelo haya rocío.

40

 Y ’Elohim lo hizo así aquella noche, y 

la sequedad estuvo solamente en el vellón, 

mientras que hubo rocío en toda la tierra.

Derrota de los madianitas

7

Entonces Jerobaal (el cual es Gedeón), 

y todo el pueblo con él, madrugaron y 

acamparon junto a la fuente de Harod. Y 

el campamento de Madián° estaba al nor-

te de ellos, en el valle cercano al collado 

de Moré.

2

 Y  dijo  YHVH  a  Gedeón:  El  pueblo  que 

tienes contigo es muy numeroso para que 

Yo entregue a Madián en su mano, no sea 

que Israel se enaltezca contra mí, y diga: 

Mi mano me ha salvado.

3

 Pregona pues a oídos del pueblo, dicien-

do:  ¡Quien  tema  y  tiemble,  vuélvase,°  y 

retírese  del  monte  de  Galaad!°  Y  de  los 

del  pueblo  se  volvieron  veintidós  mil,  y 

quedaron diez mil.

4

 Entonces dijo YHVH a Gedeón: Aún el 

pueblo  es  mucho.  Haz  que  bajen  a  las 

aguas, y te los probaré allí, y será que de 

quien  Yo  te  diga:  Vaya  éste  contigo,  irá 

contigo; pero del que te diga: No vaya éste 

contigo, no irá.

5

 Hizo  pues  que  el  pueblo  bajara  a  las 

aguas, y dijo YHVH a Gedeón: Todo el que 

lama las aguas con su lengua, como lame 

el  perro,  lo  pondrás  aparte;  asimismo  a 

todo el que se arrodille para beber.

6

 Y el número de los que bebieron a lame-

tones fue de trescientos hombres, pero el 

resto del pueblo se arrodilló para beber el 

agua.

7

 Y  dijo  YHVH  a  Gedeón:  Con  estos  tres-

cientos hombres que han lamido os salvaré 

y  entregaré  a  Madián  en  tus  manos.  Que 

todo el pueblo se vaya, cada uno a su lugar.

8

 Tomó  aquella  gente  sus  pertrechos  en 

sus manos, así como sus shofar, y a todos 

los  demás  hombres  de  Israel  los  envió, 

cada  cual  a  su  tienda,  pero  retuvo  a  los 

trescientos hombres. Y el campamento de 

Madián estaba debajo de él, en el valle.

9

 Y  sucedió  aquella  noche  que  YHVH  le 

dijo: Levántate, baja al campamento, por-

que lo he entregado en tu mano.

10

 Y  si  temes  descender,  baja  al  campa-

mento con tu criado Fura,

11

 y escucha lo que hablan, pues así tus 

manos serán fortalecidas para bajar con-

tra el campamento. Y él bajó con su criado 

Fura hasta un extremo de los quintados° 

que había en el campamento.

12

 Y  Madián  y  Amalec,  con  todos  los 

orientales, estaban esparcidos por el valle 

como multitud de langostas, y sus came-

llos eran incontables como la arena que 

está a la orilla del mar.

13

 Y  he  aquí  cuando  llegó  Gedeón,  un 

hombre estaba relatando a su compañero 

un sueño, y decía: Mira, acabo de soñar un 

sueño: Veía un pan de cebada que rodaba 

hasta el campamento de Madián, y llegó 

hasta la tienda y la golpeó de tal manera 

que cayó. La trastornó de arriba abajo de 

tal modo que la tienda colapsó.

14

 Y su compañero respondió, y dijo: Esto 

no es otra cosa sino la espada de Gedeón 

ben Joás, varón de Israel. Ha-’Elohim ha 

entregado en su mano a Madián y a todo 

el campamento.

15

 Y  sucedió  que  cuando  Gedeón  oyó  el 

relato  del  sueño  con  su  interpretación, 

se  postró,°  y  regresó  al  campamento  de 

Israel,  y  dijo:  Levantaos,  porque  YHVH 

ha entregado en vuestra mano el campa-

mento de Madián.

16

 Y repartió los trescientos hombres en 

tres  escuadrones,  y  puso  un  shofar  en 

7.1 LXX: y de Amalec.  7.3 

→Dt.20.8.  7.3 El TM aquí es dudoso. Galaad queda al oriente del Jordán, lejos del lugar de esta 

batalla. Ny Gedeón los puso a prueba

7.11 Es decir, puestos militares.  7.15 LXX: se postró ante el Señor


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Jueces 8:10

261

mano  de  cada  uno  de  ellos,  y  cántaros 

vacíos  con  antorchas  dentro  de  los  cán-

taros.

17

 Luego  les  dijo:  Miradme,  y  haced  lo 

que hago yo. He aquí cuando llegue al ex-

tremo del campamento, lo que yo haga, 

así haréis vosotros.

18

 Cuando yo, y todos los que están con-

migo, hagamos resonar el shofar, enton-

ces cada uno de vosotros también haréis 

resonar  el  shofar  alrededor  de  todo  el 

campamento,  y  gritaréis:  ¡Por  YHVH  y 

por Gedeón!

19

 Y Gedeón y los cien hombres que es-

taban  con  él  llegaron°  a  las  afueras  del 

campamento,  al  principio  de  la  vigilia 

intermedia, cuando acababan de relevar a 

los centinelas. Y haciendo resonar el sho-

far, quebraron los cántaros que llevaban 

en sus manos.

20

 Entonces,  los  tres  escuadrones  hicie-

ron resonar los shofar, quebraron los cán-

taros, y tomando con su mano izquierda 

las  antorchas  y  con  su  diestra  el  shofar 

para  hacerlo  resonar,  clamaron:  ¡Espada 

de YHVH y de Gedeón!

21

 Y cada hombre se mantuvo firme en su 

lugar alrededor del campamento, y todo 

el  campamento  echó  a  correr  gritando 

mientras huían.

22

 Pues cuando hicieron resonar los tres-

cientos  shofares,  YHVH  hizo  que  la  es-

pada de cada uno se volviera° contra su 

compañero en todo el campamento. Y el 

campamento huyó hasta Bet-sita, en di-

rección de Zerera, hasta el límite de Abel-

mehola, cerca de Tabat.

23

 Y  fueron  convocados  los  israelitas  de 

Neftalí, de Aser y de todo Manasés, y per-

siguieron a Madián.

24

 Luego  Gedeón  envió  mensajeros  por 

toda  la  serranía  de  Efraín,  diciendo: 

¡Bajad  al  encuentro  de  los  madianitas  y 

tomad antes que ellos las aguas hasta Bet-

bara y el Jordán! Y todos los hombres de 

Efraín se reunieron y tomaron las aguas 

hasta Bet-bara y también el Jordán.

25

 Y capturaron a los dos jefes de Madián: 

Oreb°  y  Zeeb.°  Y  a  Oreb  lo  mataron  en 

Tsur-oreb° y a Zeeb lo mataron en Yequeb-

zeeb.° Y persiguieron a Madián, pero las 

cabezas de Oreb y de Zeeb las llevaron a 

Gedeón, al otro lado del Jordán.

Gobierno y muerte de Gedeón

8

Entonces los hombres de Efraín le di-

jeron: ¿Qué cosa es esta que nos has 

hecho, de no llamarnos cuando fuiste a la 

campaña contra Madián? Y lo increparon 

con aspereza.

2

 Pero  él  les  dijo:  ¿Qué  he  hecho  yo  en 

comparación  con  vosotros?  ¿Acaso  no 

son mejores los rebuscos de Efraín que la 

vendimia de Abiezer?

3

 ’Elohim  ha  entregado  en  vuestras  ma-

nos a Oreb y a Zeeb, jefes de Madián, ¿qué 

podía hacer yo en comparación con voso-

tros? Entonces su enojo se aplacó cuando 

dijo esto.

4

 Entretanto Gedeón había llegado al Jor-

dán, y lo había pasado, él y los trescientos 

hombres  que  tenía  consigo,  los  cuales 

estaban  cansados,°  pero  continuaban  la 

persecución.

5

 Y dijo a los hombres de Sucot: Os ruego 

que deis panes a la gente que me sigue, 

porque  están  cansados,  y  estoy  persi-

guiendo  a  Zeba  y  a  Zalmuna,  reyes  de 

Madián.

6

 Pero  los  gobernantes  de  Sucot  le  res-

pondieron: ¿Está ya en tu poder la mano° 

de Zeba y Zalmuna, para que demos pan 

a tu tropa?

7

 A  lo  que  respondió  Gedeón:  Por  esto, 

cuando  YHVH  haya  entregado  en  mi 

mano a Zeba y a Zalmuna, trillaré vuestra 

carne con espinos y abrojos del desierto.

8

 Y subió de allí a Peniel, y les habló de la 

misma manera, y los hombres de Peniel 

le respondieron de la misma manera que 

los hombres de Sucot.

9

 Entonces él habló también a los hom-

bres de Peniel, diciendo: Cuando regrese 

en paz, derribaré esta torre.

10

 Y Zeba y Zalmuna estaban en Carcor, y 

su ejército con ellos, como de quince mil 

hombres,  todos  los  que  habían  quedado 

de todo el campamento de los orientales, 

7.19  Lit.  llegó.  7.22  Lit.  pusiera.  7.25  Esto  es,  cuervo.  7.25  Esto  es,  lobo.  7.25  Esto  es,  peña  del  cuervo

→Is.10.26 

7.25 Esto es, lagar del lobo.  8.4 LXX: y hambrientos.  8.6 heb. kaf = palma de la mano, en referencia a una mano cortada como 

trofeo de guerra.


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Jueces 8:11

262

pues habían caído ciento veinte mil hom-

bres armados de espada.

11

 Así, Gedeón subió por la vía de los que 

habitan en tiendas, al oriente de Noba y 

de Jogbeá, y atacó el campamento, que se 

hallaba desguarnecido.

12

 Y huyeron Zeba y Zalmuna, pero él fue 

en su persecución y capturó a los dos re-

yes de Madián, a Zeba y a Zalmuna, e hizo 

estremecer a todo su ejército.

13

 Y volviendo de la batalla por la cuesta 

de Hares,° Gedeón ben Joás

14

 prendió e interrogó a un joven de los 

de  Sucot,  el  cual  le  dio  por  escrito  los 

nombres de los principales de Sucot y de 

sus ancianos: setenta y siete varones.

15

 Y  llegando  ante  los  hombres°  de  Su-

cot, les dijo: Mirad a Zeba y a Zalmuna, 

acerca de quienes os mofasteis de mí, di-

ciéndome: ¿Está ya en tu poder la mano 

de  Zeba  y  de  Zalmuna,  para  que  demos 

pan a tus hombres cansados?

16

 Y tomó a los ancianos de la ciudad, y 

azotó° con espinos y abrojos del desierto 

a los varones de Sucot.

17

 Asimismo derribó la torre de Peniel, y 

mató a los varones de la ciudad.

18

 Luego preguntó a Zeba y a Zalmuna: 

¿Cómo° eran los hombres que matasteis 

en Tabor? Y ellos respondieron: Como tú, 

así eran ellos, cada uno con apariencia de 

hijos del rey.

19

 Y  él  dijo:  ¡Mis  hermanos!  ¡Los  hijos 

de  mi  misma  madre!  Vive  YHVH,  que 

no  os  mataría  si  no  les  hubierais  dado 

muerte.

20

 Y dijo a Jéter su primogénito: ¡Leván-

tate y mátalos! Pero el joven no desenvai-

nó  su  espada,  pues  tuvo  temor,  porque 

aún era muchacho.

21

 Entonces  dijeron  Zeba  y  Zalmuna: 

¡Levántate tú y arremete contra nosotros, 

pues como es el varón, tal es su valentía! 

Y  Gedeón  se  levantó  y  mató  a  Zeba  y  a 

Zalmuna, y tomó las lunetas que sus ca-

mellos traían al cuello.

22

 Y los hombres de Israel dijeron a Ge-

deón: Gobierna tú, y tu hijo, y el hijo de 

tu hijo sobre nosotros, pues nos has libra-

do de la mano de Madián.

23

 Pero Gedeón respondió: Yo no gober-

naré sobre vosotros, ni mi hijo gobernará 

sobre  vosotros.  YHVH  gobernará  sobre 

vosotros.

24

 Luego  Gedeón  les  dijo:  Os  haré  una 

petición: que cada uno me dé los zarcillos 

de su botín (pues tenían zarcillos de oro, 

porque eran ismaelitas°).

25

 Ellos  dijeron:  Con  gusto  te  los  dare-

mos.  Y  tendieron  el  manto,  y  cada  uno 

echó allí los zarcillos de su botín.

26

 Y  el  peso  de  los  zarcillos  de  oro  que 

él pidió fue mil setecientos siclos de oro, 

aparte de las lunetas, los pendientes y los 

vestidos de púrpura que llevaban los reyes 

de Madián, y aparte de los collares que lle-

vaban sus camellos al cuello.

27

 Y Gedeón hizo con ellos un efod y lo 

colocó en su ciudad, en Ofra, y todo Israel 

se prostituyó allí por aquelloº, y se tornó 

en una trampa para Gedeon y su casa.

28

 Así  fue  humillado  Madián  ante  los 

hijos de Israel, y no volvieron a levantar 

cabeza. Y la tierra tuvo cuarenta años de 

descanso en los días de Gedeón.

29

 Y Jerobaal ben Joás se fue y habitó en 

su propia casa.

30

 Y tuvo Gedeón setenta hijos salidos de 

su muslo, porque tenía muchas mujeres.

31

 Y su concubina, que vivía en Siquem, 

también ella le dio a luz un hijo, y le puso 

por nombre Abimelec.

32

 Y Gedeón ben Joás murió en buena ve-

jez, y fue sepultado en el sepulcro de Joás 

su padre, en Ofra de los abiezeritas.

33

 Pero tan pronto como murió Gedeón, 

sucedió que los hijos de Israel volvieron a 

prostituirse en pos de los baales, e hicie-

ron de Baal-berit° su dios.

34

 Y los hijos de Israel no se acordaron de 

YHVH su Dios, el cual los había librado de 

mano de todos sus enemigos alrededor.

35

 Tampoco  se  mostraron  agradecidos 

con  la  casa  de  Jerobaal  (el  cual  es  Ge-

deón), por todo el bien que él había hecho 

a Israel.

8.13 Heb. heres, texto de difícil lectura. El vocablo heres también significa sol 

→Job 9.7. De allí que Na la subida del sol. Existía, 

no obstante, una población llamada Hares o Heres cerca de Sucot. 

8.15 LXX: los nobles.  8.16 El TM aquí es dudoso, lit. dice: 

dio a conocer a ellos, lo cual es difícil de entender. LXX registra: trilló con ellos a los hombres de la ciudad

→8.7.  8.18 El TM 

y LXX registran: ¿dónde? 

8.24 Es decir, los enemigos que acababan de derrotar.  8.27 Esto es, del efod.  8.33 Esto es, señor 

del pacto.


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Jueces 9:20

263

Abimelec

9

Pues Abimelec ben Jerobaal había ido 

a Siquem, a los parientes° de su ma-

dre, y había hablado con ellos y con toda 

la familia de la casa del padre de su ma-

dre, diciendo:

2

 Os  ruego  que  digáis  a  oídos  de  todos 

los  señores°  de  Siquem:  ¿Es  mejor  para 

vosotros que os gobiernen setenta hom-

bres, todos los hijos de Jerobaal, o que os 

gobierne  un  solo  varón?  Recordad  tam-

bién que yo soy vuestro hueso y vuestra 

carne.

3

 Refirieron pues los hermanos de su ma-

dre todas estas palabras acerca de él en oí-

dos de todos los hombres de Siquem, y el 

corazón de ellos se inclinó tras Abimelec, 

pues decían: Es nuestro hermano.

4

 Y  del  templo  de  Baal-berit  le  dieron 

setenta  siclos  de  plata,  con  los  cuales 

Abimelec  contrató°  hombres  ociosos  y 

vagabundos, que lo siguieron.

5

 Luego fue a casa de su padre, en Ofra, y 

sobre una misma piedra mató a sus her-

manos, los hijos de Jerobaal, que eran se-

tenta varones, salvo Jotam, el hijo menor 

de Jerobaal, porque se escondió.

6

 Entonces  todos  los  vecinos  de  Siquem 

y todos los de Bet-milo,° se reunieron y 

fueron e hicieron que Abimelec goberna-

ra  como  rey,  junto  a  la  encina  del  pilar 

erigido en Siquem.

7

 Cuando se lo declararon a Jotam, fue y 

se puso en la cumbre del monte Gerizim, 

y alzando su voz, clamó y les dijo:

Escuchadme, señores de Siquem,

Para que escuche ’Elohim:

8

    Fueron una vez los árboles a ungir 

sobre ellos rey,

Y dijeron al olivo:

Reina sobre nosotros.

9

    Pero les dijo el olivo:

¿Dejaré mi aceite,° con el cual 

’Elohim

y los hombres son honrados,

Para mecerme por encima de los 

árboles?

10

    Entonces los árboles dijeron a la 

higuera:

¡Ven tú, reina sobre nosotros!

11

    Pero la higuera les dijo:

¿Dejaré mi dulzura y mi buen fruto,

Para mecerme por encima de los 

árboles?

12

    Dijeron luego los árboles a la vid:

¡Ven tú, reina sobre nosotros!

13

    Y la vid les respondió:

¿Dejaré mi mosto,

Que alegra a ’Elohim y a los 

hombres,

Para mecerme por encima de los 

árboles?

14

    Entonces todos los árboles dijeron a 

la zarza:

¡Ven tú, reina sobre nosotros!

15

    Y la zarza dijo a los árboles:

¡Si en verdad queréis ungirme por 

rey sobre vosotros,

venid a refugiaros bajo mi sombra!

De lo contrario, saldrá fuego de 

la zarza

y devorará los cedros del Líbano.°

16

 Ahora  pues,  si  con  verdad  y  rectitud 

habéis  hecho  que  Abimelec  gobernara 

como rey , y si habéis obrado bien con Je-

robaal y con su casa, y si lo habéis tratado 

conforme al mérito de sus manos,

17

 pues mi padre combatió por vosotros, 

y  exponiendo  su  vida°  os  libró  de  mano 

de Madián,

18

 pero hoy vosotros os habéis levantado 

contra la casa de mi padre y habéis ma-

tado a sus hijos, a setenta varones sobre 

una  misma  piedra,  y  habéis  puesto  por 

rey  sobre  los  señores  de  Siquem  a  Abi-

melec, hijo de su esclava, por cuanto es 

vuestro hermano,

19

 si con verdad y rectitud, pues, habéis 

procedido en este día con Jerobaal y con 

su casa, entonces regocijaos en Abimelec 

y regocíjese él también en vosotros.

20

 Pero si no, entonces que de Abimelec 

salga  fuego  y  consuma  a  los  señores  de 

Siquem y a Bet-milo, y que de los señores 

9.1 Lit. Hermanos.  9.2 Heb. baalim, plural de baal. NDignatarios, principales.  9.4 Heb. yiskor = asalarió, alquiló.  9.6 Esto es, 

Casa fuerte

9.9 Lit. grosura.  9.15 Alegoría que prob. combina toda la historia de Israel, representando la higuera la posición 

nacional de Israel, la cual se marchitó y tuvo que ser cortada (Mr.11.12-14); el olivo los privilegios del pacto de Dios con Israel, 

los cuales siguen vigentes (Ro.11); la vid las bendiciones espirituales de Israel (Jn.15); y la zarza el Anticristo, bajo cuya sombra 

vendrá Israel a cobijarse, resultándole un fuego consumidor (Jer.30.7). 

9.17 Lit. arrojó su alma de sí


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Jueces 9:21

264

de Siquem y de Bet-milo salga fuego que 

consuma a Abimelec.

21

 Luego  Jotam  huyó  y  se  puso  a  salvo 

marchando a Beer, donde permaneció por 

temor a su hermano Abimelec.

22

 Y  Abimelec  imperó  sobre  Israel  tres 

años.

23

 Luego  ’Elohim  suscitó  un  espíritu 

maligno entre Abimelec y los señores de 

Siquem, de modo que los señores de Si-

quem traicionaron a Abimelec,

24

 devolviendo  así  la  violencia  hecha  a 

los setenta hijos de Jerobaal, y haciendo 

recaer su sangre sobre Abimelec su her-

mano,  que  los  había  asesinado,  y  sobre 

los  señores  de  Siquem,  quienes  habían 

fortalecido  las  manos  de  aquél  para  que 

asesinara a sus hermanos.

25

 Para esto los vecinos de Siquem colo-

caron en las cumbres de los montes gente 

emboscada, que saqueaba a cuantos pasa-

ban junto a ellos por el camino, de lo cual 

se dio aviso a Abimelec.

26

 Llegó  entonces  Gaal  ben  Ebed,  con 

sus hermanos y pasaron a Siquem, y los 

vecinos de Siquem pusieron su confianza 

en él.

27

 Luego  salieron  al  campo  y  vendimia-

ron  sus  viñas,  pisaron  la  uva  e  hicieron 

fiestas,°  y  entrando  en  el  templo  de  sus 

dioses,  comieron  y  bebieron,  y  maldije-

ron a Abimelec.

28

 Entonces Gaal ben Ebed dijo: ¿Quién 

es Abimelec y quiénes los siquemitas para 

que le sirvamos? ¿No es el hijo de Jero-

baal  y  Zebul  su  lugarteniente?  ¡Servid 

a  los  descendientes  de  Hamor,  padre  de 

Siquem! ¿Por qué le hemos de servir no-

sotros?

29

 ¡Ojalá  este  pueblo  estuviera  en  mi 

mano  para  derrocar  a  Abimelec!  Diría  a 

Abimelec: ¡Refuerza tu ejército y sal!

30

 Y  al  oír  Zebul,  gobernador  de  la  ciu-

dad, las palabras de Gaal ben Ebed, se en-

cendió su ira,

31

 y envió secretamente° emisarios a Abi-

melec, diciendo: He aquí Gaal ben Ebed 

y sus hermanos han venido a Siquem, y 

están sublevando la ciudad contra ti.

32

 Ahora pues, ven de noche con la gente 

que está contigo, y tiende una emboscada 

en el campo.

33

 Por  la  mañana,  al  salir  el  sol,  leván-

tate  pronto  e  irrumpe  contra  la  ciudad; 

cuando  él  y  el  pueblo  que  lo  acompaña 

salgan hacia ti, haz con él según te venga 

a mano.

34

 Abimelec entonces, con toda la gente 

que estaba con él, se levantó de noche y 

tendió una emboscada contra Siquem, en 

cuatro escuadrones.

35

 Entonces salió Gaal ben Ebed y se paró 

a la entrada de la puerta de la ciudad, en 

tanto  que  Abimelec  y  toda  la  gente  que 

estaba con él, salían de la emboscada.

36

 Y viendo Gaal al pueblo, dijo a Zebul: 

¡Mira la gente que baja de las cumbres de 

los montes! Zebul le respondió: ¡La som-

bra de los montes te parecen hombres!

37

 Pero  Gaal  volvió  a  insistir  diciendo: 

¡Ve allí gente que baja del Ombligo de la 

Tierra,  y  un  escuadrón  que  viene  por  el 

camino de Elón-Meonenim.°

38

 Y Zebul le respondió: ¿Dónde está esa 

boca que decía: ¿Quién es Abimelec para 

que le sirvamos? ¿No es este el pueblo que 

despreciaste? ¡Sal pues ahora, y pelea con 

él!

39

 Entonces  Gaal  salió  al  frente  de  los 

siquemitas, y entabló batalla con Abime-

lec.

40

 Pero Abimelec lo persiguió, y muchos 

cayeron muertos cuando huían hacia las 

puertas de la ciudad.

41

 Luego  Abimelec  se  volvió  a  Aruma, 

mientras que Zebul expulsó a Gaal y a sus 

parientes,  impidiéndoles  permanecer  en 

Siquem.

42

 Y aconteció que al día siguiente el pue-

blo salió al campo y se lo comunicaron a 

Abimelec,

43

 quien tomó a su gente y la repartió en 

tres escuadrones, y tendió una embosca-

da en el campo. Cuando vio que el pueblo 

salía de la ciudad, surgió contra ellos para 

atacarlos.

44

 Abimelec y el escuadrón° que iba con 

él se desplegaron y se pararon a la entra-

da de la puerta de la ciudad, mientras los 

otros dos escuadrones se lanzaron contra 

9.27 Esto es, comilonas y borracheras con motivos idolátricos.  9.31 Heb. tormah. Lectura difícil, prob. ´Arumah, lugar donde 

habitaba Abimelec. 

→9.41  9.37 Esto es, encina de los agoreros.  9.44 Lit. escuadrones. LXX: escuadrón.


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Jueces 10:11

265

todos los que estaban en el campo, y los 

derrotaron.

45

 Abimelec  combatió  contra  la  ciudad 

todo aquel día, y la conquistó, y mató a la 

gente que había en ella, arrasó la ciudad y 

la sembró de sal.°

46

 Al oírlo, todos los habitantes de la to-

rre  de  Siquem  se  replegaron  a  la  cripta 

del templo de ’El-Berit.°

47

 Cuando se dio aviso a Abimelec de que 

todos los moradores de la torre de Siquem 

estaban reunidos,

48

 Abimelec subió al monte Salmón con 

toda la gente que lo acompañaba. Luego 

tomó Abimelec el hacha de doble filo en 

su  mano,  cortó  una  rama  del  árbol,  la 

cual alzó sobre su hombro, y dijo al pue-

blo que estaba con él: Lo que me habéis 

visto  hacer,  apresuraos  a  hacerlo  como 

yo.

49

 Y  todo  el  pueblo  cortó  también  su 

rama,  y  cada  uno  siguió  a  Abimelec,  y 

colocándolas contra la fortaleza, prendie-

ron fuego con ellas a la fortaleza, de modo 

que todos los habitantes de la torre de Si-

quem murieron, unos mil entre hombres 

y mujeres.

50

 Después  Abimelec  marchó  a  Tebes, 

puso sitio a Tebes, y la capturó.

51

 Pero en medio de la ciudad había una 

torre fuerte, donde estaban refugiados to-

dos los hombres y mujeres, los habitantes 

todos de la ciudad, los cuales, encerrán-

dose dentro, habían subido a la azotea de 

la torre.

52

 Llegando  Abimelec  a  la  torre,  la  em-

bistió  y  se  acercó  hasta  su  puerta  para 

prenderle fuego.

53

 Entonces, cierta mujer arrojó una pie-

dra encimera de molino sobre la cabeza 

de Abimelec y le partió el cráneo.

54

 Él llamó apresuradamente a su joven 

escudero, y le dijo: Desenvaina tu espada 

y mátame, para que no se diga de mí: ¡Una 

mujer lo mató! Y el muchacho lo traspasó 

y murió.

55

 En  cuanto  los hombres  de Israel vie-

ron que Abimelec había muerto, marcha-

ron cada cual a su lugar.

56

 Así  retribuyó  ’Elohim  a  Abimelec  el 

mal que había hecho contra su padre, al 

asesinar a sus setenta hermanos.

57

 También  toda  la  maldad  de  los  hom-

bres  de  Siquem  la  hizo  volver  ’Elohim 

sobre sus propias cabezas, de manera que 

vino  sobre  ellos  la  maldición  de  Jotam 

ben Jerobaal.

Tola y Jaír

10

Después  de  Abimelec,  se  levantó 

para  librar  a  Israel,  Tola  ben  Púa, 

hijo de Dodo, varón de Isacar, el cual ha-

bitó en Samir, en la serranía de Efraín.

2

 Éste  juzgó  a  Israel  durante  veintitrés 

años, y murió, y fue sepultado en Samir.

3

 Tras él se levantó Jaír galaadita, el cual 

juzgó a Israel veintidós años.

4

 Tuvo  treinta  hijos,  que  cabalgaban  en 

treinta asnos y poseían treinta villas en la 

tierra de Galaad, que hasta hoy se llaman 

Havot-Jaír.°

5

 Y murió Jaír, y fue sepultado en Camón.

6

 Pero los hijos de Israel volvieron a hacer 

lo malo ante los ojos de YHVH y sirvieron 

a los baales y a las Astarot, a los dioses de 

Siria, a los dioses de Sidón, a los dioses de 

Moab, a los dioses de los hijos de Amón y 

a los dioses de los filisteos, y abandonaron 

a YHVH y no le sirvieron.

7

 Y se encendió la ira de YHVH contra Is-

rael, y los vendió en mano de los filisteos, 

y en mano de los hijos de Amón,

8

 quienes a partir de aquel año oprimie-

ron  y  vejaron°  a  los  israelitas  durante 

dieciocho años, a todos los hijos de Israel 

que vivían allende el Jordán, en tierra de 

los amorreos, en Galaad.

9

 Así pues, los hijos de Amón cruzaron el 

Jordán para combatir también contra Judá, 

contra Benjamín y contra la casa de Efraín; 

y esto angustió a Israel en gran manera.

10

 Entonces los hijos de Israel clamaron 

a YHVH, y dijeron: ¡Hemos pecado contra 

ti,  porque  hemos  abandonado  a  nuestro 

Dios para servir a los baales!

11

 Y dijo YHVH a los hijos de Israel: ¿No 

os libré Yo de Egipto, y de los amorreos, y 

de los hijos de Amón, y de los filisteos?

9.45 Simbolismo que expresa el deseo de que la ciudad quede desierta y sin morador para siempre. 

→Dt.29.23.  9.46 Esto 

es, dios del pacto

10.4 Esto es, aduares de Jaír.  10.8 Heb. ra´ats = oprimir, y ratsats = maltratar. Dos verbos fonéticamente 

similares enfatizan una misma acción opresora.


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Jueces 10:12

266

12

 Y cuando los sidonios, y los amalecitas, 

y los maonitas° os oprimieron, y clamas-

teis a mí, ¿no os libré de su mano?

13

 Con  todo  esto  vosotros  me  habéis 

abandonado y habéis servido a otros dio-

ses. Por tanto, no os volveré más a librar.

14

 ¡Id, clamad a los dioses que os habéis 

elegido! ¡Que ellos os salven en el tiempo 

de vuestra angustia!

15

 Entonces los hijos de Israel respondie-

ron a YHVH: ¡Hemos pecado! ¡Haz con no-

sotros según sea bueno ante tus ojos, con 

tal que nos libres, te rogamos, en este día!

16

 Y apartaron los dioses extraños de en 

medio  de  sí  y  sirvieron  a  YHVH,  cuyo 

sentir  se  impacientó  por  la  desdicha  de 

Israel.

17

 Entretanto los hijos de Amón se habían 

reunido  y  habían  acampado  en  Galaad; 

asimismo los hijos de Israel se reunieron, 

y acamparon en Mizpa.

18

 Y  decían  los  principales  del  pueblo  de 

Galaad,  cada  cual  a  su  prójimo:  ¿Quién 

será el hombre que inicie la lucha contra 

los hijos de Amón? Él se convertirá en cau-

dillo de todos los habitantes de Galaad.

Jefté

11

Ahora bien, Jefté° galaadita era un 

guerrero esforzado. Él era hijo de 

una  ramera,  y  Galaad  había  engendrado 

a Jefté.

2

 Pero la mujer de Galaad también le ha-

bía  dado  hijos;  y  cuando  los  hijos  de  la 

mujer fueron grandes, expulsaron a Jefté, 

diciéndole: No tendrás herencia en la casa 

de nuestro padre, porque tú eres hijo de 

otra mujer.

3

 Huyó pues Jefté de la presencia de sus 

hermanos,  y  habitó  en  tierra  de  Tob.  Y 

se agruparon alrededor de Jefté hombres 

ociosos  que  lo  acompañaban  en  sus  co-

rrerías.

4

 Y andando el tiempo, aconteció que los hi-

jos de Amón hicieron guerra contra Israel.

5

 Y cuando los amonitas atacaron a Israel, 

los ancianos de Galaad fueron en busca de 

Jefté en tierra de Tob,

6

 y dijeron a Jefté: ¡Ven y serás nuestro jefe 

y lucharemos contra los hijos de Amón!

7

 Pero  Jefté  contestó  a  los  ancianos  de 

Galaad: ¿No sois vosotros los que me abo-

rrecisteis y me expulsasteis de la casa de 

mi  padre?°  ¿Por  qué  pues  venís  ahora  a 

mí cuando estáis en aprietos?

8

 Entonces  los  ancianos  de  Galaad  dije-

ron  a  Jefté:  Por  esto  precisamente  nos 

tornamos  ahora  a  ti,  para  que  vengas 

con nosotros y luches contra los hijos de 

Amón y nos sirvas por caudillo a todos los 

habitantes de Galaad.

9

 Y Jefté dijo a los ancianos de Galaad: Si 

me hacéis volver para guerrear contra los 

hijos de Amón, y YHVH me los entrega, 

yo seré vuestro caudillo.

10

 Y los ancianos de Galaad dijeron a Jef-

té:  ¡YHVH  sea  testigo  entre  nosotros  de 

que tal como has dicho, así hemos de ha-

cer!

11

 Entonces Jefté partió con los ancianos 

de Galaad y el pueblo lo proclamó como 

su  jefe  y  caudillo.  Y  profirió  Jefté  todas 

sus promesas en presencia de YHVH, en 

Mizpa.

12

 Luego envió Jefté mensajeros al rey de 

los hijos de Amón, diciendo: ¿Qué hay en-

tre tú y yo, para que hayas venido contra 

mí a hacer guerra en mi tierra?

13

 Y contestó el rey de los hijos de Amón 

a los mensajeros de Jefté: Porque cuando 

subía de Egipto, Israel se apoderó de mi 

territorio, desde el Arnón hasta el Jaboc 

y  el  Jordán.  Ahora  pues,  devuélvelo  en 

paz.°

14

 Jefté volvió nuevamente a enviar men-

sajeros al rey de los hijos de Amón,

15

 y le dijo: Así dice Jefté: Nunca se apo-

deró Israel de la tierra de Moab ni de la 

tierra de los hijos de Amón,

16

 porque cuando subió de Egipto, Israel 

anduvo por el desierto hasta el Mar Rojo, 

y llegó a Cades.

17

 E  Israel  envió  mensajeros  al  rey  de 

Edom,  diciendo:  Te  ruego  me  permitas 

pasar por tu tierra. Pero el rey de Edom 

no  consintió.°  Envió  también  al  rey  de 

Moab, y tampoco quiso, de modo que Is-

rael permaneció en Cades.

18

 Después  anduvo  por  el  desierto  y  ro-

deó la tierra de Edom° y la tierra de Moab, 

10.12 LXX: Madián.  11.1 Heb. Iftaj. Esto es: él abrirá.  11.7 LXX añade: y me echasteis de vosotros.  11.13 LXX: Y los mensajeros 

volvieron a Jefté

11.17 

→Nm.20.14-21.  11.18 →Nm.21.4. 


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Jueces 11:40

267

y llegó por el lado oriental de la tierra de 

Moab,  y  acampó  al  otro  lado  del  Arnón. 

Pero  no  entraron  por  el  territorio  de 

Moab,  porque  el  Arnón  era  el  límite  de 

Moab.

19

 Entonces  Israel  envió  mensajeros  a 

Sehón,  rey  del  amorreo,  rey  de  Hesbón, 

para  decirle:  Te  ruego  que  nos  permitas 

pasar por tu tierra hasta mi lugar.

20

 Pero Sehón no se fió de Israel para dar-

le paso por su territorio, sino que reunió 

Sehón a todo su pueblo, y acamparon en 

Jaas, e hizo guerra contra Israel.

21

 Pero  YHVH  Dios  de  Israel  entregó  a 

Sehón y a todo su pueblo en mano de Is-

rael, y los derrotó. E Israel tomó posesión 

de toda la tierra del amorreo que habitaba 

en aquel país.

22

 De suerte que se posesionaron de todo 

el territorio del amorreo, desde el Arnón 

hasta el Jaboc, y desde el desierto hasta el 

Jordán.°

23

 Y  ahora  que  YHVH  Dios  de  Israel  ha 

expulsado a los amorreos de delante de su 

pueblo Israel, ¿pretenderás tú desposeerlo?

24

 ¿Acaso no desposees a quien Quemos, 

tu  dios,  ha  expulsado  a  favor  tuyo?  Así 

nosotros desposeeremos a todo aquel que 

YHVH nuestro Dios haya expulsado de de-

lante de nosotros.

25

 Y ahora, ¿vales tú más que Balac, hijo de 

Sipor, rey de Moab?° ¿Tuvo él alguna dispu-

ta con Israel, o hizo guerra contra ellos?

26

 Mientras  Israel  ha  estado  habitando 

por trescientos años en Hesbón y sus al-

deas, en Aroer y sus aldeas, y en todas las 

ciudades  que  están  a  orillas  del  Arnón, 

¿por qué no las habéis reclamado en ese 

tiempo?

27

 Así  que  yo  no  he  pecado  contra  ti,  y 

tú haces mal conmigo al combatir contra 

mí. ¡YHVH, el Juez, juzgue hoy entre los 

hijos de Israel y los hijos de Amón!

28

 Pero el rey de los amonitas no escuchó 

las palabras que Jefté le había enviado a 

decir.

29

 Entonces  el  Espíritu  de  YHVH  vino 

sobre  Jefté,  el  cual  atravesó  Galaad  y 

Manasés,  pasó  a  Mizpa  de  Galaad,  y  de 

Mizpa  de  Galaad  fue  hacia  los  hijos  de 

Amón.

30

 E hizo Jefté un voto a YHVH, diciendo: 

Si en verdad entregas a los hijos de Amón 

en mi mano,

31

 cualquiera  que  salga  a  mi  encuentro 

por  las  puertas  de  mi  casa  cuando  yo 

vuelva de los hijos de Amón en paz, será 

de YHVH y lo ofreceré en holocausto.°

32

 Así  pues,  Jefté  fue  hacia  los  hijos  de 

Amón para guerrear contra ellos, y YHVH 

los entregó en su mano.

33

 Y les provocó una muy grande derro-

ta desde Aroer hasta llegar a Minit, vein-

te villas, y hasta la vega de las viñas. Así 

fueron humillados los hijos de Amón ante 

los hijos de Israel.

34

 Y Jefté volvió a su casa en Mizpa, ¡y he 

aquí su hija salía a recibirle con panderos 

y  danzas!  Y  ella  era  la  sola,  única  suya. 

Fuera de ella no tenía ni hijo ni hija.

35

 Y aconteció que, al verla, él se rasgó los 

vestidos y dijo: ¡Ay de mí, hija mía! Me has 

abatido  por  completo  y  tú  eres  causa  de 

mi perturbación, porque yo he abierto mi 

boca° a YHVH y no podré retractarme.°

36

 A lo cual respondió: Padre mío, puesto 

que has abierto tu boca a YHVH, haz con-

migo  conforme  profirió  tu  boca,  ya  que 

YHVH te ha vengado de tus enemigos, los 

hijos de Amón.

37

 Le dijo además a su padre: Que se me 

haga  esto:  Déjame  dos  meses  para  que 

vaya  y  deambule  por  los  montes  y  llore 

por mi virginidad junto con mis compa-

ñeras.

38

 Él entonces dijo: Ve. Y la dejó por dos 

meses, y ella fue con sus compañeras, y 

lloró su virginidad por los montes.

39

 Y  sucedió  que  pasados  los  dos  meses 

volvió  a  su  padre,  el  cual  cumplió  con 

ella el voto que había hecho, y ella nunca 

conoció  varón.  Y  se  hizo  costumbre  en 

Israel

40

 que  las  doncellas  de  Israel  fueran  de 

año en año a endechar a la hija de Jefté 

galaadita, cuatro días al año.

11.22 

→Nm.21.21-24.  11.25 →Nm.22.1-6.  11.31 Se trata de un voto doble: 1) será para YHVH 2) lo ofreceré en holocausto 

(en este caso en dedicación). Es difícil suponer que se trata de un sacrificio humano, lo cual estaba estrictamente prohibido por 

la ley mosaica, y para lo cual Dios había previsto rescate 

→Ex.13.15.  11.35 Lit. he abierto mi pico. Hebraísmo que significa 

hablar apresuradamente

11.35 

→Nm.30.2.


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Jueces 12:1

268

Ibzán, Elón y Abdón

12

Entre  tanto  los  varones  de  Efraín 

fueron convocados, y cruzando ha-

cia Safón,° dijeron a Jefté: ¿Por qué fuiste 

a  luchar  contra  los  hijos  de  Amón  y  no 

nos llamaste para ir contigo? ¡Prendere-

mos fuego a tu casa contigo dentro!

2

 Jefté les respondió: Yo y mi pueblo he-

mos  tenido  una  gran  contienda  contra 

los hijos de Amón, y os convoqué, pero no 

me librasteis de su mano.

3

 Viendo pues que no me librabais, arries-

gué  mi  vida°  y  pasé  contra  los  hijos  de 

Amón, y YHVH los entregó en mi mano. 

¿Por qué, pues, subís hoy a hacer guerra 

contra mí?

4

 Entonces Jefté juntó a todos los varones 

de  Galaad  e  hizo  guerra  contra  Efraín. 

Y  los  hombres  de  Galaad  derrotaron  a 

Efraín, porque éstos habían dicho: ¡Fugi-

tivos de Efraín sois vosotros galaaditas, en 

medio de Efraín y en medio de Manasés!

5

 Y Galaad le arrebató a Efraín los vados 

del Jordán; y sucedía que cuando los fu-

gitivos de Efraín decían: Voy a pasar, los 

hombres de Galaad le preguntaban: ¿Eres 

tú efrateo? Y si él respondía: No,

6

 entonces le decían: Di ahora, Shibolet;° 

y él decía Sibolet,° porque no acertaba a 

pronunciarlo correctamente; entonces lo 

sujetaban y lo degollaban junto a los va-

dos del Jordán. Y en aquel entonces caye-

ron cuarenta y dos mil de los de Efraín.

7

 Y juzgó Jefté a Israel seis años, y murió 

Jefté galaadita, y fue sepultado en una° de 

las ciudades de Galaad.

8

 Después de él, juzgó a Israel Ibzán, de 

Bet-léhem.

9

 Y tenía treinta hijos y treinta hijas a las 

cuales envió fuera, y tomó de fuera trein-

ta  muchachas  para  sus  hijos.  Y  juzgó  a 

Israel siete años.

10

 Y murió Ibzán, y fue sepultado en Bet-

léhem.

11

 Después de él juzgó a Israel Elón zabu-

lonita, y juzgó a Israel diez años.

12

 Y murió Elón zabulonita, y fue sepul-

tado en Ajalón, en tierra de Zabulón.

13

 Después de él juzgó a Israel Abdón ben 

Hilel, piratonita.

14

 Éste tuvo cuarenta hijos y treinta nie-

tos, que cabalgaban sobre setenta asnos. 

Y juzgó a Israel ocho años.

15

 Y murió Abdón ben Hilel piratonita, y 

fue sepultado en Piratón, en la tierra de 

Efraín, en la serranía de los amalecitas.

Sansón

13

Pero  los  hijos  de  Israel  volvieron 

a  hacer  lo  malo  ante  los  ojos  de 

YHVH, y YHVH los entregó en poder de 

los filisteos cuarenta años.

2

 Hubo  entonces  un  hombre  de  Sora,  de 

la tribu de Dan, llamado Manoa. Su mujer 

era estéril y no había tenido descendencia.

3

 Pero  el  ángel  de  YHVH  se  apareció  a 

aquella mujer y le dijo: He aquí que eres 

estéril y no has tenido descendencia, pero 

concebirás y darás a luz un hijo.

4

 Ahora pues, no bebas vino ni licor fuer-

te, ni comas cosa inmunda.

5

 porque he aquí concebirás y darás a luz 

un hijo. No pasará navaja sobre su cabe-

za, porque ese niño será nazareo° de Dios 

desde el vientre, y él comenzará a librar a 

Israel de mano de los filisteos.

6

 La mujer fue entonces y habló a su ma-

rido,  diciendo:  Un  varón  de  Dios  vino  a 

mí, y su aspecto era como el aspecto de 

un  ángel  de  Dios,  muy  terrible;  y  no  le 

pregunté de dónde era, ni él me declaró 

su nombre;

7

 sólo me dijo: He aquí, concibe, y darás a 

luz un hijo, y no bebas ahora vino ni licor 

fuerte,  ni  comas  cosa  inmunda,  porque 

este  niño  será  nazareo  de  Dios  desde  el 

vientre hasta el día de su muerte.

8

 Entonces  Manoa  imploró  a  YHVH,  y 

dijo: Ah, Señor mío, te ruego que venga 

de nuevo a nosotros aquel varón de Dios 

que enviaste, y nos instruya qué haremos 

con el niño que ha de nacer.

9

 Y Ha-’Elohim escuchó la voz de Manoa, 

y el ángel de Dios vino otra vez a la mujer, 

estando  ella  sentada  en  el  campo,  pero 

Manoa, su marido, no estaba con ella.

10

 Y la mujer se apresuró y corrió y le in-

formó a su marido, y le dijo: He aquí que 

se me ha aparecido el mismo hombre que 

vino a mí el otro día.

12.1 NHacia el norte.  12.3 Lit. puse mi vida en la palma de mi mano.  12.6 Esto es: espiga o corriente de aguas

→Sal.69.2 

12.6 Diferencia dialectal entre los que vivían al oriente y al occidente del Jordán.  12.7 .una.  13.5 

→Nm.6.1-21.


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Jueces 14:10

269

11

 Y se levantó Manoa y fue tras su mujer, 

y llegando ante aquel varón, le dijo: ¿Eres 

tú el varón que habló a esta mujer? Y Él 

dijo: Yo soy.

12

 Y Manoa dijo: Que se cumpla tu pala-

bra. ¿Cómo será el modo de vida del niño 

y qué se le ha de hacer?

13

 Y  el  ángel  de  YHVH  respondió  a  Ma-

noa:  La  mujer  se  guardará  de  todas  las 

cosas que Yo le dije:

14

 No comerá nada que proceda de la vid, 

ni beberá vino ni licor fuerte, y no come-

rá  cosa  inmunda.  Guardará  todo  lo  que 

le ordené.

15

 Entonces  Manoa  dijo  al  ángel  de 

YHVH: Te ruego, permítenos detenerte y 

preparar para ti un cabrito del rebaño.

16

 El ángel de YHVH respondió a Manoa: 

Aunque me detuvieras no comería de tu 

manjar, pero si preparas holocausto, ofré-

celo a YHVH. Y Manoa no sabía que era el 

ángel de YHVH.

17

 Y dijo Manoa al ángel de YHVH: ¿Cuál 

es  tu  nombre,  para  que  te  honremos 

cuando se cumpla tu palabra?

18

 Y  el  ángel  de  YHVH  respondió  a  Ma-

noa:  ¿Por  qué  preguntas  mi  Nombre  si 

ves que es oculto?

19

 Entonces Manoa tomó un cabrito del 

rebaño, y la ofrenda vegetal, y lo sacrificó 

sobre la peña a YHVH. Y mientras Manoa 

y su mujer lo contemplaban, obró° mara-

villosamente;

20

 porque  sucedió  que  mientras  la  llama 

subía de sobre el altar hacia los cielos, tam-

bién el ángel de YHVH ascendió juntamen-

te con la llama del altar. Al verlo Manoa y su 

mujer, cayeron en tierra sobre sus rostros.

21

 Y  el  ángel  de  YHVH  no  volvió  más  a 

mostrarse a Manoa ni a su mujer. Enton-

ces  Manoa  comprendió  que  era  el  ángel 

de YHVH.

22

 Por lo cual Manoa dijo a su mujer: ¡Sin 

duda  moriremos,  porque  hemos  visto  a 

’Elohim!

23

 Pero su mujer le respondió: Si YHVH 

hubiera  querido  hacernos  morir,  no  ha-

bría tomado de nuestra mano el holocaus-

to  y  la  ofrenda,  ni  nos  habría  mostrado 

estas  cosas,  ni  nos  habría  anunciado  en 

este tiempo cosa semejante.

24

 Y la mujer dio a luz un hijo, y llamó 

su  nombre  Sansón.°  Y  el  niño  creció,  y 

YHVH lo bendijo.

25

 Y el Espíritu de YHVH comenzó a im-

pulsarlo en los campamentos de Dan, en-

tre Sora y Estaol.

Sansón y la filistea

14

Bajó  Sansón  a  Timnat,  y  vio  en 

Timnat a una mujer de las hijas de 

los filisteos.

2

 Y  subió  y  se  lo  declaró  a  su  padre  y  a 

su madre, diciendo: He visto en Timnat a 

una mujer de las hijas de los filisteos. Por 

lo tanto tomádmela por mujer.

3

 Pero  su  padre  y  su  madre  le  dijeron: 

¿No hay mujer entre las hijas de tus her-

manos, ni en todo mi pueblo, para que 

tomes  mujer  de  filisteos  incircuncisos? 

Y Sansón respondió a su padre: ¡Tóma-

mela  por  mujer,  porque  es  agradable  a 

mis ojos!

4

 Pero su padre y su madre no sabían que 

esto  era  designio  de  YHVH,  por  cuanto 

buscaba ocasión contra los filisteos, pues 

en aquel tiempo los filisteos gobernaban 

en Israel.

5

 Sansón pues bajó con su padre y con su 

madre a Timnat, y al llegar a las viñas de 

Timnat, he aquí un leoncillo salió rugien-

do a su encuentro.

6

 Y el Espíritu de YHVH lo invadió,° y lo 

destrozó como quien destroza a un cabri-

to,  sin  tener  nada  en  su  mano.  Pero  no 

contó a su padre ni a su madre lo que ha-

bía hecho.

7

 Bajó pues y habló a aquella mujer, y ella 

agradó mucho a Sansón.

8

 Y  después  de  algunos  días,  volvió  para 

tomarla, y se desvió para ver el esqueleto 

del león, y he aquí, en los restos° del león 

una colmena de abejas con miel.

9

 Y tomando la miel en sus manos, siguió 

caminando  y  comiendo  por  el  camino, 

hasta que alcanzó a su padre y a su ma-

dre, y les dio para que comieran. Pero no 

les  explicó  que  había  tomado  la  miel  de 

los restos del león.

10

 Y  bajó  su  padre  adonde  la  mujer,  y 

Sansón hizo allí un banquete, porque así 

hacían los jóvenes.

13.19 Esto es, el ángel de YHVH.  13.24 Esto es, pequeño sol.  14.6 Lit. prosperó sobre él.  14.8 LXX: en la boca.


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Jueces 14:11

270

11

 Y sucedió que cuando lo vieron, traje-

ron con ellos treinta compañeros,

12

 a los cuales les dijo Sansón: Os propon-

dré ahora un enigma. Si lo averiguáis y en 

verdad me lo declaráis dentro de los siete 

días del banquete, os daré treinta túnicas 

de lino y treinta mudas de vestidos.

13

 Pero  si  no  me  lo  podéis  declarar,  me 

habréis de dar vosotros treinta túnicas de 

lino y treinta mudas de vestidos. Le dije-

ron: ¡Propón tu enigma para que lo escu-

chemos!

14

 Él les dijo: Del devorador salió comida, 

y del fuerte salió dulzura. Y no lograron 

descifrar el enigma durante tres días.

15

 Pero al séptimo día° dijeron a la mu-

jer  de  Sansón:  Seduce  a  tu  marido  para 

sonsacarle la solución del enigma, no sea 

que te quememos a fuego a ti y la casa de 

tu padre. ¿Acaso nos habéis invitado para 

despojarnos?

16

 Y la mujer de Sansón lloraba ante él, 

y le decía: ¡Sólo me odias, y no me amas! 

Has propuesto un enigma a los hijos de 

mi pueblo y no me lo has declarado. Y él 

respondió: He aquí, no se lo he dicho ni 

a mi padre ni a mi madre, ¿y te lo voy a 

declarar a ti?

17

 Y había estado llorando los siete días 

que duró su banquete, y aconteció que al 

séptimo día se lo declaró, porque lo aco-

saba.  Ella  entonces  declaró  el  enigma  a 

los hijos de su pueblo.

18

 Y  al  séptimo  día,  antes  de  ponerse 

el sol, los hombres de la ciudad le dije-

ron: ¿Qué es más dulce que la miel? ¿Y 

qué es más fuerte que el león? Y él les 

contestó: Si no hubierais arado con mi 

novilla,  nunca  habríais  descubierto  mi 

enigma.

19

 Entonces el Espíritu de YHVH lo inva-

dió, de manera que bajó a Ascalón e hirió 

a treinta hombres de ellos, y tomando sus 

despojos, dio las mudas de vestidos a los 

que  habían  declarado  el  enigma.  Luego, 

encendido  en  ira,  subió  a  la  casa  de  su 

padre,

20

 y  la  mujer  de  Sansón  fue  dada  a  un 

compañero suyo que lo había asistido en 

sus bodas.

Victorias de Sansón

15

Pasado algún tiempo, sucedió que 

en  la  época  de  la  siega  del  trigo, 

Sansón visitó a su mujer llevando un ca-

brito del rebaño, y se decía: Me llegaré a 

mi mujer en la alcoba. Pero el padre de 

ésta no le permitió entrar.

2

 Y dijo su padre: En verdad supuse que la 

aborrecías intensamente, por lo que la di 

a tu compañero. ¿Acaso su hermana me-

nor no es más hermosa que ella? Te ruego 

que la tomes en su lugar.

3

 Sansón les respondió: ¡Esta vez no ten-

dré  culpa  ante  los  filisteos  cuando  les 

haga daño!

4

 Y fue Sansón y capturó trescientos cha-

cales,°  y  tomando  teas,  los  ató  cola  con 

cola y puso una tea entre cola y cola.

5

 Después prendió fuego a las teas y sol-

tó  los  chacales  por  entre  los  sembrados 

de los filisteos, quemando las gavillas, la 

mies en pie, e incluso las viñas y los oli-

vares.

6

 Y dijeron los filisteos: ¿Quién hizo esto? 

Y les dijeron: Sansón, yerno del timnateo, 

por cuanto éste tomó a su mujer y la dio a 

su compañero. Y salieron los filisteos y la 

quemaron con fuego, a ella y a su padre.

7

 Y Sansón les dijo: Por haber hecho esto, 

juro que no descansaré hasta que me haya 

vengado de vosotros.

8

 Y sin piedad los hirió con gran mortan-

dad.° Luego bajó y habitó en la hendidu-

ra° de la peña de Etam.

9

 Pero los filisteos subieron y acamparon 

en Judá, y se desplegaron por Lehi.°

10

 Y los varones de Judá les dijeron: ¿Por 

qué habéis subido contra nosotros? Y res-

pondieron: Hemos subido para atrapar a 

Sansón, para hacerle tal como nos hizo.

11

 Entonces tres mil hombres de Judá ba-

jaron de la hendidura de la peña de Etam, 

y dijeron a Sansón: ¿Acaso no sabes que 

los  filisteos  nos  dominan?  ¿Qué  es  esto 

que nos has hecho? Y él les dijo: Les hice 

como ellos me hicieron.

12

 Ellos  le  dijeron:  Hemos  venido  para 

atarte y entregarte en mano de los filis-

teos. Y Sansón les dijo: ¡Juradme que no 

me mataréis vosotros mismos!

14.15  LXX:  Al  cuarto  día.  Concuerda  con  la  última  parte  del  v.  14,  donde  se  intenta  resolver  el  enigma  durante  tres  días. 

15.4 Nzorros.  15.8 Lit. los hirió cadera y muslo.  15.8 Prob. se trata de un acantilado. 

→v. 13  15.9 Esto es, quijada


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Jueces 16:13

271

13

 Y ellos le respondieron, diciendo: No, 

tan solo te ataremos y te entregaremos en 

mano de ellos, pero de seguro no te mata-

remos. Entonces lo ataron con dos sogas 

nuevas y lo hicieron subir de la peña.

14

 Él iba llegando a Lehi cuando los filis-

teos  alzaron  el  grito  corriendo  a  su  en-

cuentro.  Entonces  el  Espíritu  de  YHVH 

lo invadió, y las sogas que estaban en sus 

brazos fueron como lino quemado al fue-

go,  y  sus  ataduras  se  desprendieron  de 

sus manos.

15

 Y  hallando  una  quijada  de  asno  aún 

fresca, extendió su mano, la tomó, y mató 

con ella a mil hombres.

16

 Entonces cantó Sansón:

Con la quijada de un asno,

Montones sobre montones;°

Con la quijada del asno,

He matado mil varones.

17

 Y aconteció que cuando acabó de can-

tar, arrojó la quijada de su mano y llamó a 

aquel lugar Ramat-lehi.°

18

 Luego  tuvo  mucha  sed,  y  clamó  a 

YHVH diciéndole: Tú has dado esta gran 

salvación por mano de tu siervo, ¿y ahora 

acaso moriré de sed, y caeré en mano de 

incircuncisos?

19

 Entonces ’Elohim partió la hendidu-

ra  que  hay  en  Lehi,°  y  de  allí  salieron 

aguas. Y cuando bebió, recobró su alien-

to y revivió; por lo que llamó su nombre 

Ein-hacoré,° la cual permanece en Lehi 

hasta hoy.

20

 Y en los días de los filisteos juzgó a Is-

rael veinte años.

Dalila – Muerte de Sansón

16

Fue Sansón a Gaza y vio allí a una 

ramera, y se llegó a ella.

2

 Y avisaron a los de Gaza, diciendo: ¡San-

són está aquí! Entonces ellos lo rodearon 

y  lo  estuvieron  acechando  toda  aquella 

noche junto a la puerta de la ciudad. Y se 

mantuvieron  callados  toda  la  noche,  di-

ciendo: Esperemos hasta la luz del alba, 

entonces lo mataremos.

3

 Pero Sansón permaneció acostado hasta 

la medianoche, y a la medianoche se le-

vantó, y agarrando las hojas de la puerta 

de la ciudad con sus dos postes, las arran-

có  con  todo  y  barra,°  y  echándoselos  a 

cuestas, subió a la cumbre del monte que 

está enfrente de Hebrón.

4

 Después de esto sucedió que se enamo-

ró de una mujer del valle de Sorec llama-

da Dalila.°

5

 Y los jefes de los filisteos fueron a ella y le 

dijeron: Sedúcelo para ver en qué consiste 

su gran fuerza, y cómo podríamos domi-

narlo, para atarlo y sujetarlo, y cada uno de 

nosotros te dará mil cien piezas de plata.

6

 Y Dalila dijo a Sansón: Te ruego me de-

clares en qué consiste tu gran fuerza, y con 

qué podrías ser atado para doblegarte.

7

 Y Sansón le respondió: Si me atan con 

siete tendones° frescos que aún no estén 

secos, entonces me debilitaré y llegaré a 

ser como cualquier otro hombre.

8

 Y  los  jefes  de  los  filisteos  le  llevaron° 

siete tendones frescos que aún no se ha-

bían secado, y lo ató con ellos.

9

 Y  ella  tenía  hombres  al  acecho  en  un 

aposento interior. Le dijo entonces: ¡San-

són,  los  filisteos  te  acometen!  Pero  él 

rompió los tendones como se rompe un 

hilo de estopa cuando toca el fuego. Y no 

se descubrió lo de su fuerza.

10

 Y  Dalila  dijo  a  Sansón:  Mira,  me  has 

engañado y me has dicho mentiras. Aho-

ra te ruego que me declares cómo se te 

puede atar.

11

 Y  él  le  dijo:  Si  me  atan  fuertemente 

con sogas nuevas, que no hayan sido usa-

das, me debilitaré y seré como cualquier 

hombre.

12

 Y Dalila tomó sogas nuevas y lo ató con 

ellas, y le dijo: ¡Sansón, los filisteos te aco-

meten! (y los hombres permanecían al ace-

cho en el aposento interior). Pero él rompió 

las sogas de sus brazos como un hilo.

13

 Entonces  Dalila  dijo  a  Sansón:  Hasta 

ahora  me  has  engañado  y  me  has  dicho 

mentiras. Declárame con qué puedes ser 

15.16 En heb. hay una gran similitud fonética entre la palabra asno y montón. NCiertamente los he desollado. LXX registra: 

los he destruido completamente

15.17 Esto es, colina de la quijada.  15.19 Lehi significa quijada. NDios partió una muela de 

la quijada

15.19 Esto es, fuente del que clama.  16.3 Es decir, la gran barra transversal que servía de cerrojo a los portones

16.4 Esto es, empobrecida.  16.7 Los tendones del ganado que se contraen al secarse. Aunque el vocablo hebreo yeter también 

puede significar cuerda de un arco

16.8 Lit. subieron.


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Jueces 16:14

272

atado. Él le dijo: Si tejes siete trenzas de 

mi cabeza con los lizos.°

14

 Ella pues las aseguró con la estaca, y 

le dijo: ¡Sansón, los filisteos te acometen! 

Y él, despertando de su sueño, arrancó la 

estaca del telar juntamente con los lizos.

15

 Ella  entonces  le  dijo:  ¿Cómo  sigues 

diciendo: Yo te amo, cuando tu corazón 

no está conmigo? Estas tres veces te has 

burlado de mí y no me has declarado en 

qué consiste tu gran fuerza.

16

 Y sucedió que como ella lo apremiaba 

con sus palabras cada día, acosándolo, su 

alma desfalleció hasta morir.

17

 Por  lo  cual,  descubriéndole  todo  su 

corazón, le dijo: Jamás ha pasado navaja 

por mi cabeza por cuanto he sido nazareo 

de Dios desde el vientre de mi madre. Si 

fuera rapado, entonces se apartará de mí 

mi fuerza y me debilitaré, y vendré a ser 

como un hombre cualquiera.

18

 Y cuando Dalila se dio cuenta de que 

le  había  descubierto  todo  su  corazón, 

envió a llamar a los jefes de los filisteos, 

diciendo: Subid esta vez, porque él me ha 

descubierto  todo  su  corazón.  Y  los  jefes 

de los filisteos subieron a ella, llevando la 

plata en su mano.

19

 Ella entonces lo adormeció sobre sus 

rodillas, y enseguida llamó al hombre que 

le  rapó  las  siete  trenzas  de  su  cabeza,  y 

ella  misma  comenzó  a  dominarlo,  pues 

su fuerza se había retirado de él.

20

 Y ella exclamó: ¡Sansón, los filisteos te 

acometen! Él entonces, despertando de su 

sueño, se dijo: Como otras veces, saldré y 

seré librado. Pero no sabía que YHVH se 

había apartado de él.

21

 Así pues, los filisteos lo prendieron, le 

arrancaron los ojos, y lo hicieron bajar a 

Gaza. Luego lo aherrojaron con dos gri-

lletes de bronce, y tuvo que moler° en la 

casa de los encarcelados.

22

 Sin  embargo,  el  cabello  de  su  cabeza 

comenzó a crecer después de haber sido 

rapado.

23

 Entonces los jefes de los filisteos se re-

unieron para ofrecer un gran sacrificio a 

Dagón su dios, y con gran regocijo afirma-

ron: ¡Nuestro dios ha entregado en nuestra 

mano a Sansón nuestro enemigo!

24

 Y cuando lo vio el pueblo, alabó a su 

dios, porque decían:

¡Nuestro dios ha entregado en 

nuestra mano

A nuestro enemigo,

Al que devastaba nuestro territorio,

Y multiplicaba nuestras víctimas!

25

 Y sucedió que cuando tuvieron alegre 

el corazón, dijeron: Llamad a Sansón para 

que nos divierta. Llamaron pues de la cár-

cel a Sansón, el cual los divertía. Y lo hi-

cieron estar entre las columnas.

26

 Y  dijo  Sansón  al  lazarillo:  Condúce-

me  y  hazme  palpar  los  pilares  en  que 

descansa el templo, y me apoyaré sobre 

ellos.°

27

 Y el templo estaba lleno de hombres y 

mujeres; y todos los jefes de los filisteos 

estaban  allí,  y  sobre  las  azoteas  había 

como tres mil hombres y mujeres, obser-

vando el escarnio de Sansón.

28

 Sansón entonces invocó a YHVH y ex-

clamó:  ¡YHVH  Señor  mío,  te  ruego  que 

te acuerdes de mí! ¡Dame fuerza sólo esta 

vez,  oh  ’Elohim,  para  que  con  una  sola 

venganza me vengue de los filisteos por 

mis dos ojos!

29

 Y palpando Sansón de los dos pilares 

centrales en que descansaba el templo, se 

apoyó en ellos, uno a su derecha, y otro a 

su izquierda.

30

 Y  exclamó  Sansón:  ¡Muera  yo  con 

los filisteos! Y empujando con fuerza, el 

templo cayó sobre los jefes y sobre toda 

la gente que estaba dentro. De modo que 

fueron más los que mató al morir que los 

que había matado en su vida.

31

 Y bajaron sus hermanos con toda la casa 

de su padre, y levantándolo, lo llevaron y lo 

sepultaron entre Sora y Estaol, junto al se-

pulcro de Manoa su padre. Y había juzgado 

a Israel durante veinte años.

Confusión e idolatría

17

Hubo también un hombre de la se-

rranía de Efraín, cuyo nombre era 

Micayehu,°

16.13 LXX: y las clavas con una estaca en la pared, quedaría debilitado y vendría a ser como un hombre cualquiera.  16.21 Es 

decir, el trabajo que comúnmente realizaban las mujeres

→Job 31.10, Is.47.2, Ecl.12.3.  16.26 LXX: y el muchacho hizo así

17.1 Heb. Mi-ca-Yehu = Quién-como-YHVH. Tomando en cuenta que Yehu representa el nombre de Dios, nótese el recorte del 

nombre a partir del v. 5, en relación con los acontecimientos allí descritos. 


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Jueces 18:10

273

2

 quien le dijo a su madre: Los mil cien 

ciclos  de  plata  que  te  fueron  sustraídos, 

acerca de los cuales proferiste maldición 

a mis oídos, he aquí, aquella plata está en 

mi poder. Yo la tomé. Y su madre le dijo: 

¡Bendito seas de YHVH, hijo mío!

3

 Y él devolvió los mil cien ciclos de plata 

a  su  madre,  y  su  madre  dijo:  En  verdad 

consagro por mi mano esta plata a YHVH, 

en favor de mi hijo, para que se haga una 

imagen  esculpida,  y  otra  de  fundición.° 

Ahora, pues, te la devuelvo.

4

 Sin embargo, él devolvió a su madre la 

plata.  Tomando  su  madre  doscientos  ci-

clos  de  plata,  los  entregó  al  fundidor,  el 

cual hizo de ellos una imagen de escultu-

ra y otra de fundición, las cuales queda-

ron en casa de Micayehu.

5

 De  manera  que  este  hombre,  Micah,° 

tuvo un santuario, e hizo un efod y terafi-

nes,° y consagró° a uno de sus hijos para 

que fuera su sacerdote.

6

 En aquellos días no había rey en Israel, 

y cada uno hacía lo que parecía recto ante 

sus ojos.°

7

 Hubo  también  un  joven  de  Bet-léhem 

de Judá, de la familia de Judá, el cual era 

levita, y moraba allí como forastero.

8

 Y este hombre había partido de la ciu-

dad  de  Bet-léhem  de  Judá  para  residir 

como extranjero en donde hallara lugar. 

Y en su andar por la serranía de Efraín, 

llegó hasta la casa de Micah.

9

 Y  le  dijo  Micah:  ¿De  dónde  vienes?  Y 

le respondió: Soy levita de Bet-léhem de 

Judá, y voy a residir donde halle lugar.

10

 Y Micah le dijo: habita conmigo y me 

servirás de padre y sacerdote, y te daré diez 

ciclos de plata por año, un juego de vesti-

dos y tu sustento. Y el levita se quedó.

11

 Y el levita aceptó vivir con aquel hom-

bre,  y  el  joven  llegó  a  ser  para  él  como 

uno de sus hijos.

12

 Y Micah consagró° al levita, y el joven 

le sirvió de sacerdote, y se quedó en casa 

de Micah.

13

 Entonces  Micah  dijo:  ¡Ahora  sé  que 

YHVH me hará bien, viendo que tengo un 

levita por sacerdote!

La conquista de Lais

18

Por  aquellos  días  no  había  rey  en 

Israel,  y  por  el  mismo  tiempo  la 

tribu de Dan buscaba para sí una heredad 

donde  habitar,  porque  hasta  aquel  mo-

mento  no  le  había  caído  heredad°  entre 

las tribus de Israel.

2

 Y los hijos de Dan enviaron desde Zora 

y  Estaol  a  cinco  hombres  de  su  estirpe, 

de los más nobles entre ellos, hombres de 

valor, para explorar y reconocer la tierra, y 

les dijeron: ¡Id y explorad la tierra! Y ellos 

llegaron a la serranía de Efraín, hasta la 

casa de Micah, para pasar allí la noche.

3

 Y cuando se estaban acercando a la casa 

de  Micah,  reconocieron  la  voz  del  joven 

levita, y llegándose allá, le preguntaron: 

¿Quién te trajo aquí? ¿qué haces en este 

lugar? ¿qué tienes aquí?

4

 Y él les respondió: Esto y aquello ha tra-

tado Micah conmigo, y me ha tomado a 

sueldo para que sea su sacerdote.

5

 Le  dijeron  ellos:  Te  rogamos  que  con-

sultes a ’Elohim, para que sepamos si ha 

de ser próspero el camino que llevamos.

6

 Y el sacerdote les respondió: ¡Id en paz! 

En presencia de YHVH está el camino por 

el cual andáis.

7

 Partieron pues los cinco hombres y lle-

garon a Lais, y vieron que la población que 

había en ella vivía con seguridad, a la ma-

nera de los sidonios, tranquilos y confiados, 

porque no había en aquella tierra nadie que 

los perturbara en cosa alguna, ni quien se 

enseñoreara de ellos, y estaban lejos de los 

sidonios y no tenían trato con nadie.

8

 Regresaron  pues  a  sus  hermanos  en 

Zora y Estaol, y sus hermanos les pregun-

taron: ¿Qué traéis?

9

 Ellos dijeron: Levantaos, y marchemos 

contra ellos, que hemos visto la tierra y es 

buena en gran manera, ¿y no haréis nada? 

No seáis perezosos en marchar allá para 

tomar posesión de esa tierra.

10

 Cuando lleguéis, entraréis a un pueblo 

confiado y a una tierra espaciosa. Cierta-

mente, ’Elohim la ha entregado en vues-

tra mano. Es un lugar donde no falta cosa 

alguna que haya en la tierra.

17.3  Heb.  pésel  =  imagen  de  talla,  massejah  =  imagen  de  fundición.  17.5  El TM  registra  Mi-cah  =  Quien-como

→17.1. 

17.5  Esto  es,  ídolos  domésticos.  17.5  Lit.  llenó  la  mano.  Expresión  utilizada  durante  la  consagración  de  los  sacerdotes. 

→Ex.29.9-24.  17.6 →Jue.21.25.  17.12 Lit. llenó la mano. →17.5.  18.1 Es decir, heredad suficiente.


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Jueces 18:11

274

11

 Entonces, de la familia de los danitas, 

de Zora y de Estaol, partieron seiscien-

tos  hombres  equipados  con  armas  de 

guerra.

12

 Y  subieron  y  acamparon  en  Quiriat-

jearim,  en  Judá,  por  lo  que  el  lugar  se 

llama hasta el día de hoy Majaneh-Dan, el 

cual está detrás de Quiriat-jearim.

13

 De allí avanzaron hacia la serranía de 

Efraín, y llegaron a la casa de Micah.

14

 Y aquellos cinco hombres que habían 

ido a reconocer la tierra de Lais, tomaron 

la palabra y dijeron a sus hermanos: ¿Sa-

béis que hay en esas casas efod y terafines, 

y  una  imagen  esculpida  y  una  imagen 

fundida?  Ahora  pues  considerad  lo  que 

habréis de hacer.

15

 Y  se  desviaron  hacia  allá,  y  entrando 

en la casa del joven levita, en casa de Mi-

cah, le saludaron pacíficamente.

16

 Pero  a  la  entrada  del  portón  perma-

necían  los  seiscientos  hombres  de  los 

hijos  de  Dan  ceñidos  con  sus  armas  de 

guerra.

17

 Y los cinco hombres que habían ido a 

reconocer la tierra, subieron y entraron y 

tomaron la imagen esculpida y el efod y 

los terafines y la imagen fundida, mien-

tras el sacerdote permanecía a la entrada 

del  portón  con  los  seiscientos  hombres 

ceñidos con armas de guerra.

18

 Aquellos  pues  entraron  en  la  casa  de 

Micah y tomaron la imagen esculpida y el 

efod, y los terafines y la imagen fundida. 

Entonces el sacerdote les preguntó: ¿Qué 

estáis haciendo?

19

 Y  ellos  le  respondieron:  Calla,  pon  la 

mano sobre tu boca, y ven con nosotros, y 

sé para nosotros padre y sacerdote. ¿Acaso 

es mejor para ti ser sacerdote para la casa 

de un solo hombre, que para una tribu y 

una familia de Israel?

20

 Entonces  el  corazón  del  sacerdote  se 

alegró y tomó el éfod y los terafines y la 

imagen  esculpida,  y  se  fue  en  medio  de 

aquella gente.

21

 Luego  dieron  la  vuelta  y  partieron, 

poniendo a los pequeños, el ganado y el 

bagaje delante de ellos.

22

 Ya se habían alejado de la casa de Mi-

cah, cuando los hombres que estaban en 

las casas vecinas a la casa de Micah fueron 

convocados, y siguieron tras los hijos de 

Dan.

23

 Y gritaron a los hijos de Dan, pero éstos, 

volviendo su rostro, dijeron a Micah: ¿Qué 

te sucede que has convocado gente?

24

 Y él contestó: Habéis tomado mis dio-

ses  que  hice,  y  al  sacerdote,  y  os  habéis 

marchado, ¿y qué es lo que me queda? ¿Y 

todavía me preguntáis qué me sucede?

25

 Pero los hijos de Dan le respondieron: 

Que  tu  voz  no  sea  oída  entre  nosotros, 

no sea que algunos hombres con ánimo 

amargado os acometan, y pierdas tu vida, 

y la vida de los de tu familia.

26

 Los danitas prosiguieron su camino, y 

viendo  Micah  que  eran  más  fuertes  que 

él, se volvió y regresó a su casa.

27

 Ellos por su parte, tomando lo que Mi-

cah había hecho, y al sacerdote que él te-

nía, cayeron sobre Lais, pueblo tranquilo 

y confiado, y los pasaron a filo de espada y 

prendieron fuego a la ciudad.

28

 Y  no  hubo  quien  la  librara,  porque 

estaba  lejos  de  Sidón,  y  no  tenían  trato 

con hombre alguno. Estaba en el valle de 

Bet-rehob. Luego reedificaron la ciudad y 

habitaron en ella.

29

 Y  llamaron  a  la  ciudad  Dan,  por  el 

nombre de su padre e hijo de Israel. Sin 

embargo  el  nombre  de  la  ciudad  había 

sido Lais.

30

 Y los hijos de Dan erigieron para sí la 

imagen de escultura, y Jonatán ben Ger-

són, hijo de Manasés,° él y sus hijos, fue-

ron sacerdotes en la tribu de Dan hasta el 

día del cautiverio del país.

31

 Así,  mantuvieron  erigida  para  sí  la 

imagen esculpida que Micah había hecho, 

todo el tiempo que la Casa de Dios estuvo 

en Silo.

18.30 LXX: Moisés, pero el TM registra Manasés. Gersón fue hijo de Moisés y no de Manasés. 

→Ex.2.22; 18.3. En hebreo, 

sin contar las vocales (las cuales aparecen sólo en manuscritos posteriores), existe la diferencia de una letra entre Manasés 

y Moisés, es decir la letra n. En los manuscritos hebreos de la Biblia, editados por los masoretas, aparece la letra n escrita en 

una forma suspendida sobre la línea, y que con toda probabilidad fue añadida más tarde. Según la Masorah Magna (Mm 3557), 

existen cuatro casos de letras suspendidas en el TM 

→Jue.18.30; Job 38.13,15; Sal.80.14. Los rabinos y eruditos hebreos, 

antiguos y modernos, afirman que esta letra pudo haber sido introducida para que se leyera Manasés evitando así la inferencia 

de que Moisés pudiera haber tenido un nieto que ejerciera el sacerdocio idolátrico en Dan. 


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Jueces 19:22

275

El crimen de los benjamitas

19

En  aquellos  días  en  que  no  había 

rey en Israel, sucedió también que 

cierto varón levita que residía en los con-

fines de la serranía de Efraín, tomó como 

concubina a una mujer de Bet-léhem de 

Judá.

2

 Pero  su  concubina  cometió  adulterio 

contra él y lo abandonó, y se fue a casa de 

su padre, a Bet-léhem de Judá, y estuvo 

allí durante cuatro meses.

3

 Pero su marido se levantó y fue en pos 

de ella para hablarle cariñosamente a fin 

de hacerla volver. Y llevó consigo un cria-

do y una yunta de asnos, y ella lo hizo en-

trar en casa de su padre. Y cuando lo vio 

el padre de la joven, lo recibió gozoso.

4

 Así fue retenido por su suegro, el padre 

de  la  joven,  y  se  quedó  en  su  casa  tres 

días, y comieron y bebieron, y se hospe-

daron allí.

5

 Y  sucedió  que  al  cuarto  día  madruga-

ron muy de mañana, y él se preparó para 

partir, pero el padre de la joven dijo a su 

yerno: Sustenta antes° tu corazón con un 

bocado de pan, y después os marcharéis.

6

 Se  sentaron  pues  y  comieron  los  dos 

juntos y bebieron, y el padre de la joven 

dijo  al  hombre:  Te  ruego,  acepta  pasar 

aquí la noche y deja que se alegre tu co-

razón.

7

 Con  todo,  el  hombre  se  levantó  para 

irse, pero su suegro le insistió, y volvió a 

pernoctar allí.

8

 Al  quinto  día  madrugó  y  se  dispuso  a 

partir, pero el padre de la joven le dijo: Te 

ruego que confortes tu corazón, y esperes 

hasta que el día decline. Y ambos comie-

ron juntos.

9

 Y cuando el hombre se levantó para par-

tir, él y su concubina y su criado, su sue-

gro, el padre de la joven, le dijo: He aquí 

que ya está anocheciendo. Quédate, te lo 

ruego, toda la noche. Mira, el día llega a 

su  fin;  pasa  aquí  la  noche  y  alégrese  tu 

corazón.  Mañana  emprenderéis  tempra-

no vuestro viaje, y te irás a tu tienda.

10

 Pero el hombre no aceptó pasar allí la 

noche, sino que se levantó y poniéndose 

en camino llegó hasta el frente de Jebus 

(la cual es Jerusalem), teniendo consigo 

su yunta de asnos enalbardados y su con-

cubina.

11

 Cuando estuvieron junto a Jebús se iba 

acabando el día, por lo cual el criado dijo 

a  su  amo:  Ven,  te  ruego,  y  desviémonos 

hacia  aquella  ciudad  de  los  jebuseos,  y 

pernoctaremos en ella.

12

 Pero su amo le respondió: No nos des-

viaremos  a  ninguna  ciudad  extraña  que 

no sea de los hijos de Israel, sino que se-

guiremos hasta Gabaa.

13

 Y dijo a su criado: Ven, acerquémonos 

a uno de esos lugares y pasaremos la no-

che en Gabaa o en Ramá.

14

 De tal manera siguieron su camino y 

el sol se les puso cerca de Gabaa, que era 

de Benjamín.

15

 Y entraron para pasar la noche en Ga-

baa y se sentaron en la plaza de la ciudad, 

porque no hubo quien los acogiera en su 

casa para pasar la noche.

16

 Y  he  aquí  que  un  anciano  volvía  al 

anochecer  de  su  faena  en  el  campo.  El 

hombre era de la serranía de Efraín y se 

albergaba  en  Gabaa,  pero  las  gentes  del 

lugar eran benjamitas.

17

 Alzó pues sus ojos, y viendo al viajero 

en la plaza de la ciudad, dijo el anciano: 

¿A dónde vas y de dónde vienes?

18

 Y le contestó: Estamos de paso desde 

Bet-léhem de Judá hacia los confines de 

la serranía de Efraín. De allí soy, y voy a 

Bet-léhem de Judá, y ahora voy a la Casa 

de YHVH,° pero no hay quien me reciba 

en su casa.

19

 Tenemos  paja  y  forraje  para  nuestros 

asnos, así como pan y vino para mí y para 

tu  sierva  y  para  el  criado  que  va  con  tu 

siervo. Nada nos hace falta.

20

 Y aquel hombre anciano dijo: ¡Paz sea 

contigo! Toda tu necesidad estará exclusi-

vamente a mi cargo, sólo que no pases la 

noche en lugar abierto.

21

 Y los trajo a su casa, y dio forraje a sus 

asnos. Luego se lavaron los pies, y comie-

ron y bebieron.

22

 Estaban  alegrando  sus  corazones, 

cuando  he  aquí  unos  hombres  de  aque-

lla  ciudad,  hijos  de  Belial,°  rodeando  la 

casa,  se  agolparon  en  la  puerta  y  habla-

ron al anciano dueño de la casa, diciendo: 

19.5 .antes.  19.18 LXX: y voy a mi casa.  19.22 Lit. hombres hijos de Belial

→Dt.13.13 nota.


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Jueces 19:23

276

¡Tráenos al hombre que entró a tu casa, 

para que lo conozcamos!°

23

 Y el dueño de la casa salió a ellos y les 

dijo: No, hermanos míos, no hagáis esta 

maldad os lo ruego, puesto que este hom-

bre ha entrado en mi casa. No cometáis 

tal infamia.

24

 He aquí mi hija virgen y la concubina 

de él. A éstas os sacaré si os place, y humi-

lladlas haciendo con ellas lo que bien os 

parezca, pero a este hombre no le hagáis 

tal infamia.

25

 Pero  los  hombres  no  quisieron  escu-

charlo,  por  lo  cual,  forzando  el  hombre 

a  su  concubina,  la  hizo  salir  a  ellos,  los 

cuales  la  conocieron  y  abusaron  de  ella 

toda aquella noche hasta la mañana y la 

dejaron al rayar el alba.

26

 Cuando  amanecía,  la  mujer  llegó  y 

cayó en la puerta de la casa de aquel hom-

bre donde estaba su señor, hasta que acla-

ró el día.

27

 Al levantarse su señor por la mañana, 

abrió  las  puertas  de  la  casa  y  salió  para 

proseguir  su  camino,  y  he  aquí  que  su 

concubina estaba tendida a la puerta de la 

casa, con sus manos en el umbral.

28

 Y él le dijo: Levántate y vámonos; pero 

ella  no  respondió.  Entonces  el  varón  se 

levantó y echándola sobre el asno, se fue 

a su lugar.

29

 Cuando entró en su casa tomó un cu-

chillo, y echando mano a su concubina, 

la descuartizó por sus huesos en doce pe-

dazos, y la envió por todo el territorio de 

Israel.

30

 Y todos los que lo vieron, decían: ¡Ja-

más ha sucedido ni se ha visto cosa igual 

desde el día en que los hijos de Israel su-

bieron de la tierra de Egipto hasta el día 

de hoy!° ¡Consideradlo, tomad consejo y 

hablad!

El castigo a Benjamín

20

Entonces todos los hijos de Israel 

salieron, desde Dan hasta Beerseba 

y la tierra de Galaad, y la asamblea se con-

gregó como un solo hombre ante YHVH 

en Mizpa.°

2

 Y  los  jefes  de  todo  el  pueblo,  de  todas 

las  tribus  de  Israel,  tomaron  su  puesto 

en  la  asamblea  del  pueblo  de  Dios,  cua-

trocientos mil hombres de a pie armados 

de espada.

3

 Y los hijos de Benjamín oyeron que los 

hijos de Israel habían subido a Mizpa. Los 

hijos  de  Israel  dijeron:  Decid  cómo  fue 

hecha esa maldad.

4

 Y el levita, el marido de la mujer asesi-

nada, respondió y dijo: Yo llegué a Gabaa 

de Benjamín con mi concubina, para pa-

sar allí la noche,

5

 y los hombres de Gabaa se alzaron con-

tra  mí  y  cercaron  la  casa  de  noche,  con 

intención de matarme, y humillaron a mi 

concubina de tal manera que murió.

6

 Y yo tomé a mi concubina y la corté en 

trozos y la envié por todo el territorio de 

la  heredad  de  Israel,  por  cuanto  habían 

cometido  aquella  maldad  e  infamia  en 

Israel.

7

 He aquí que todos vosotros los hijos de 

Israel estáis presentes. Dad aquí vuestro 

parecer y consejo.

8

 Entonces  todo  el  pueblo  se  levantó 

como un solo hombre, y dijeron: Ningu-

no de nosotros irá a su tienda, ni volverá 

ninguno a su casa.

9

 Esto es lo que ahora haremos en Gabaa: 

Subiremos contra la ciudad por sorteo.

10

 Tomaremos diez hombres de cada cen-

tenar de todas las tribus de Israel, y cien 

de cada mil, y mil de cada diez mil, para 

repartir provisiones al pueblo, para que al 

subir contra Gabaa de Benjamín, le hagan 

conforme a toda la infamia que se come-

tió en Israel.

11

 Así se juntaron contra la ciudad todos 

hombres  de  Israel  unidos  como  un  solo 

hombre.

12

 Y las tribus de Israel enviaron hombres 

por toda la tribu de Benjamín, diciendo: 

¿Qué  maldad  es  esta  que  ha  acontecido 

entre vosotros?

13

 Ahora  pues,  entregad  a  los  hombres, 

aquellos hijos de Belial que están en Ga-

baa, para que les demos muerte y extirpe-

mos esta infamia de Israel. Pero los hijos 

19.22 Es decir, contacto físico

→Gn.19.5-8.  19.30 LXX: Y ordenó a los hombres que había enviado diciendo: así diréis a todo 

hombre de Israel: ¿Acaso ha sido hecho algo como esto desde el día que subieron los hijos de Israel de la tierra de Egipto hasta 

este día? 

20.1 Esto es, Mizpa de Benjamín.


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Jueces 20:36

277

de Benjamín no quisieron escuchar la voz 

de sus hermanos los hijos de Israel.

14

 Mas  bien,  los  hijos  de  Benjamín  sa-

lieron de sus ciudades y se reunieron en 

Gabaa para enfrentar en batalla a los hijos 

de Israel.

15

 Y los hijos de Benjamín que salieron 

de  las  ciudades  sumaban  ese  día  vein-

tiséis  mil  hombres  armados  de  espada, 

además de los habitantes de Gabaa, don-

de  se  enlistaron  setecientos  hombres 

esco gidos.

16

 Toda  esa  gente,  incluyendo  los  sete-

cientos hombres escogidos, eran zurdos.° 

Cada uno podía tirar piedras con la honda 

a un cabello sin errar el tiro.

17

 Y  los  hombres  de  Israel,  aparte  de 

Benjamín, ascendían a cuatrocientos mil 

hombres armados de espada, todos ellos 

hombres de guerra.

18

 Y se levantaron los hijos de Israel, y su-

bieron a Bet-’El y consultaron a ’Elohim, 

diciendo: ¿Quién de nosotros irá primero 

a combatir contra los hijos de Benjamín? 

Y YHVH respondió: Primero Judá.

19

 Por la mañana se levantaron los hijos 

de Israel y acamparon contra Gabaa.

20

 Y los hombres de Israel salieron a pe-

lear  contra  Benjamín,  y  los  hombres  de 

Israel  se  colocaron  en  orden  de  batalla 

contra ellos junto a Gabaa.

21

 Pero los hijos de Benjamín salieron de 

Gabaa y derribaron por tierra en aquel día 

veintidós mil hombres de Israel.

22

 Sin embargo, se rehizo la gente de los 

hombres de Israel, y volvieron a ordenar 

batalla en el lugar donde lo habían hecho 

el primer día.

23

 (Pues los hijos de Israel habían subido 

y llorado delante de YHVH hasta la tarde, 

y  habían  consultado  a  YHVH,  diciendo: 

¿Entablaré de nuevo combate contra los 

hijos de mi hermano Benjamín? Y YHVH 

les había dicho: Subid contra él.)

24

 Así pues, al día siguiente, los hijos de 

Israel marcharon contra los hijos de Ben-

jamín.

25

 Y salió Benjamín de Gabaa contra ellos 

el segundo día y otra vez hizo caer por tie-

rra dieciocho mil hombres de los hijos de 

Israel, todos ellos armados de espada.

26

 Entonces  todos  los  hijos  de  Israel  y 

todo el pueblo subieron y fueron a Bet-’El 

y  lloraron;  y  permanecieron  allí  delante 

de  YHVH  y  ayunaron  aquel  día  hasta  la 

tarde; y sacrificaron holocaustos y ofren-

das de paz delante de YHVH.

27

 Y  consultaron  los  hijos  de  Israel  a 

YHVH (pues el Arca del Pacto de Dios es-

taba allí por aquellos días,

28

 y  Finees  ben  Eleazar,  hijo  de  Aarón, 

ministraba  ante  ella  en  aquel  tiempo), 

diciendo:  ¿Entablaré  de  nuevo  combate 

contra los hijos de mi hermano Benjamín, 

o desistiré? Y dijo YHVH: ¡Subid, porque 

mañana lo entregaré en tu mano!

29

 Entonces Israel tendió emboscadas en 

torno a Gabaa.

30

 Y al tercer día, cuando los hijos de Is-

rael  subieron  contra  los  hijos  de  Benja-

mín,  dispusieron  batalla  frente  a  Gabaa 

como las otras veces.

31

 Y los hijos de Benjamín salieron para 

enfrentarse  al  pueblo,  alejándose  de  la 

ciudad.  Como  las  otras  veces,  comenza-

ron a herir a algunos de ellos por los ca-

minos, uno de los cuales sube a Bet-’El y 

otro a Gabaa. Así mataron en el campo a 

unos treinta hombres de Israel.

32

 Y los hijos de Benjamín decían: ¡Están 

vencidos ante nosotros como antes! Pero 

los hijos de Israel se habían dicho: Huire-

mos para alejarlos de la ciudad hasta los 

caminos.

33

 Entonces todos los de Israel se levan-

taron de su posición y se dispusieron en 

orden de batalla en Baal-Tamar, mientras 

que los emboscados de Israel surgían de 

sus escondites al descampado de Gabaa.

34

 Y  llegaron  frente  a  Gabaa  diez  mil 

hombres escogidos de todo Israel, lo cual 

hizo que la batalla comenzara a arreciar, 

sin saber° que el desastre se les venía en-

cima.

35

 Y aquel día YHVH derrotó a Benjamín 

ante Israel, y los hijos de Israel mataron 

a veinticinco mil cien hombres de Benja-

mín, todos armados de espada.

36

 Los  hijos  de  Benjamín  vieron  enton-

ces  que  estaban  siendo  derrotados;  sin 

embargo  los  hijos  de  Israel  cedieron 

campo a Benjamín, pues confiaban en la 

20.16 NEntre toda esta gente había setecientos hombres escogidos, zurdos.  20.34 Esto es, los benjamitas


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Jueces 20:37

278

emboscada  que  habían  puesto  detrás  de 

Gabaa.

37

 Entonces la gente de la emboscada se 

apresuró  y  acometió  contra  Gabaa,  y  la 

gente de la emboscada se desplegó y pasa-

ron a filo de espada a toda la ciudad.

38

 Y era señal convenida entre los hom-

bres de Israel y los de la emboscada, que 

éstos  harían  subir  una  gran  humareda 

desde la ciudad.

39

 Así, cuando los hombres de Israel vol-

vieron la espalda en el combate, y los de 

Benjamín  comenzaron  a  causar  bajas 

entre  los  hombres  de  los  de  Israel,  ma-

tando a unos treinta hombres, pensaron: 

De seguro están derrotados ante nosotros 

como en el primer combate.

40

 Pero cuando la humareda comenzó a 

subir de la ciudad, los de Benjamín mira-

ron hacia atrás, y he aquí que de la ciudad 

subía el humo a los cielos.

41

 Entonces los hombres de Israel se vol-

vieron, en tanto que los de Benjamín se 

consternaron, pues veían que la catástro-

fe había caído sobre ellos.

42

 Por ello volvieron sus espaldas ante los 

hombres de Israel, y tomaron el camino al 

desierto. Pero la batalla siguió ardorosa tras 

ellos, al tiempo que los que salían de la ciu-

dad eran exterminados en medio de ellos.

43

 Cercaron así a los benjamitas y los per-

siguieron sin tregua hasta frente a Gabaa, 

hacia donde nace el sol.

44

 Y de Benjamín cayeron dieciocho mil 

hombres, todos ellos hombres valientes.

45

 Los demás° se volvieron y huyeron ha-

cia el desierto, hasta la peña de Rimón, y 

de  ellos  fueron  abatidos  en  los  caminos 

otros°  cinco  mil  hombres,  y  siguieron 

persiguiéndolos hasta Gidom, donde ma-

taron a dos mil hombres más.

46

 De  manera  que  los  que  cayeron  de 

Benjamín  aquel  día  fueron  veinticinco 

mil  hombres  armados  de  espada,  todos 

ellos hombres de valor.

47

 Pero seiscientos hombres se volvieron 

y huyeron hacia el desierto, hasta la peña 

de  Rimón,  y  se  quedaron  en  la  peña  de 

Rimón cuatro meses.

48

 Los  de  Israel  se  volvieron  contra  los 

hijos de Benjamín y los mataron a filo de 

espada, tanto hombres como animales, y 

todo lo que fue hallado, y prendieron fue-

go a cuantas ciudades hallaron.

Restauración de la tribu de Benjamín

21

Los hombres de Israel habían jura-

do en Mizpa, diciendo: Ninguno de 

nosotros dará su hija a los de Benjamín 

por mujer.

2

 Y  el  pueblo  llegó  a  Bet-’El,  y  allí  per-

manecieron ante ’Elohim hasta la tarde, 

y alzando la voz prorrumpieron en gran 

llanto.

3

 Y decían: ¿Por qué, oh YHVH, Dios de 

Israel, ha sucedido esto en Israel, que hoy 

se eche de menos una tribu en Israel?

4

 Y aconteció que al día siguiente, el pue-

blo madrugó, y edificaron allí un altar y 

ofrecieron holocaustos y ofrendas de paz.

5

 Entonces  dijeron  los  hijos  de  Israel: 

¿Quién  hay  de  todas  las  tribus  de  Israel 

que no haya subido con la asamblea ante 

YHVH? Porque se había hecho un solem-

ne  juramento  concerniente  al  que  no 

subiera  ante  YHVH  en  Mizpa,  diciendo: 

¡Que muera irremisiblemente!

6

 Y los hijos de Israel se compadecieron 

de su hermano Benjamín, y dijeron: ¡Hoy 

ha sido cortada una tribu de Israel!

7

 ¿Cómo  haremos  en  cuanto  a  mujeres 

para  los  que  quedan,  viendo  que  hemos 

jurado  por  YHVH  que  no  les  daremos  a 

nuestras hijas por mujeres?

8

 Y  dijeron:  ¿Quién  hay  de  entre  todas 

las tribus de Israel que no haya subido a 

YHVH en Mizpa? Y he aquí que ninguno 

de  los  habitantes  de  Jabes  Galaad  había 

venido al campamento, a la asamblea.

9

 E hicieron un recuento de la gente, y no 

se halló a ninguno de Jabes Galaad.

10

 Entonces la asamblea envió allá doce 

mil hombres de entre los más valientes y 

les ordenaron, diciendo: ¡Id y pasad a filo 

de espada a los habitantes de Jabes Galaad 

con las mujeres y niños!

11

 Esto  es  lo  que  haréis:  Exterminaréis 

completamente a todo varón y a toda mu-

jer que haya tenido unión con varón.°

12

 Y entre los habitantes de Jabes Galaad 

hallaron  cuatrocientas  doncellas  que  no 

habían conocido varón por unión carnal, 

20.45 .los demás.  20.45 .otros.  21.11 LXX: Y conservaréis a las vírgenes, y ellos hicieron así


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Jueces 21:25

279

las  cuales  llevaron  al  campamento  en 

Silo, situado en la tierra de Canaán.

13

 Luego la asamblea entera envió emisa-

rios para que parlamentaran con los hijos 

de  Benjamín  que  estaban  en  la  peña  de 

Rimón y les propusieran la paz.

14

 Volvieron pues los de Benjamín, y les 

dieron  las  mujeres  que  habían  conser-

vado vivas de entre las mujeres de Jabes 

Galaad,  pero  no  fueron  suficientes  para 

ellos.

15

 Y  el  pueblo  se  compadeció  de  Benja-

mín, porque YHVH había abierto una bre-

cha en las tribus de Israel.

16

 Dijeron entonces los ancianos de la con-

gregación: ¿Qué haremos en cuanto a mu-

jeres con los que quedan, ya que las muje-

res de Benjamín fueron exterminadas?

17

 Y  agregaron:  Los  supervivientes  sean 

herederos de Benjamín, para que no sea 

borrada una tribu de en medio de Israel.

18

 Pero nosotros no podemos darles mu-

jeres de entre nuestras hijas. (Por cuanto 

los hijos de Israel se habían juramentado, 

diciendo: ¡Maldito quien dé mujer a Ben-

jamín!)

19

 Y dijeron: He aquí, se acerca la fiesta 

anual de YHVH en Silo, al norte de Bet-

’El,  al  oriente  del  camino  que  sube  de 

Bet-’El a Siquem, y al sur de Lebona.

20

 Y dieron orden a los hijos de Benjamín, 

diciendo: Id y preparad una emboscada en 

las viñas.

21

 Estad alerta, y cuando las hijas de Silo 

salgan a danzar en corro, saldréis de las 

viñas y cada uno raptará mujer para sí de 

las hijas de Silo, y luego os iréis a tierra 

de Benjamín.

22

 Y  será  que  cuando  sus  padres  o  sus 

hermanos vengan a pleito ante nosotros, 

les diremos: Hacednos el favor de conce-

dérnoslas, porque no tomamos para cada 

uno de ellos su mujer en la batalla, ni las 

habéis dado a ellos para que ahora seáis 

culpables de pecado.

23

 Y así lo hicieron los hijos de Benjamín, 

llevándose  mujeres  según  el  número  de 

ellos, de entre las danzantes que raptaron. 

Y retornaron a su heredad, y reedificaron 

las ciudades y habitaron en ellas.

24

 También  los  hijos  de  Israel  se  fueron 

de allí, cada uno a su tribu y a su fami-

lia, y salieron cada uno con destino a su 

heredad.

25

 En aquellos días no había rey en Israel. 

Cada uno hacía lo que bien le parecía.°

21.25 

→Jue.17.6. 


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1

Aconteció en los días en que goberna-

ban los jueces, que hubo hambre en el 

país; y un hombre de Bet-léhem° de Judá 

fue a habitar temporalmente en los cam-

pos de Moab, él, con su mujer y sus dos° 

hijos.

2

 Y era el nombre de aquel varón Elime-

lec,°  el  nombre  de  su  mujer,  Noemí,°  y 

el  nombre  de  sus  dos  hijos  Mahlón°  y 

Quelión,° efrateos de Bet-léhem de Judá. 

Llegaron pues a los campos de Moab, y se 

quedaron allí.

3

 Y murió Elimelec, marido de Noemí, y 

fue dejada ella con sus dos hijos,

4

 los  cuales  tomaron  para  sí  mujeres 

moabitas. El nombre de una era Orfa,° y 

el nombre de la otra era Rut.° Y habitaron 

allí como diez años.

5

 Después  murieron  también  los  dos: 

Mah lón y Quelión, y la mujer fue dejada 

sin sus dos hijos y sin su marido.

6

 Entonces ella se levantó con sus nueras 

y regresó de los campos de Moab, porque 

en el campo de Moab oyó que YHVH ha-

bía visitado a su pueblo para darles pan.

7

 Salió pues del lugar donde había estado, 

y con ella sus dos nueras, y se pusieron en 

camino para regresar a la tierra de Judá.

8

 Dijo entonces Noemí a sus dos nueras: 

Andad, volveos cada una a  la  casa  de  su 

madre, ¡haga YHVH con vosotras miseri-

cordia, como la habéis hecho con los di-

funtos y conmigo!

9

 YHVH os conceda que halléis descanso 

cada una en casa de su marido. Luego las 

besó, y ellas alzaron su voz y lloraron.

10

 Y le decían: Nosotras volveremos con-

tigo a tu pueblo.

11

 Pero  Noemí  dijo:  Volveos  hijas  mías, 

¿por qué habéis de ir conmigo? ¿Tengo yo 

aún hijos en mis entrañas para que sean 

vuestros maridos?

12

 Volveos hijas mías, id. Pues he envejeci-

do como para tener marido, y aunque dije-

ra: Tengo esperanza; y esta noche estuviera 

con marido, e incluso diera a luz hijos,

13

 ¿los  esperaríais  hasta  que  crecieran? 

¿Os retraeríais por ellos sin tomar mari-

do? No, hijas mías; tengo sobrada amar-

gura  por  vosotras,  pues  la  mano  misma 

de YHVH se ha desatado contra mí.

14

 Entonces ellas alzaron su voz y llora-

ron otra vez; y Orfa besó a su suegra, pero 

Rut siguió apegada a ella.

15

 Y Noemí dijo: He aquí tu cuñada se ha 

vuelto a su pueblo y a sus dioses, vuélvete 

en pos de tu cuñada.

16

 Respondió  Rut:  No  me  ruegues  que 

te deje y me aparte de ti, porque adonde-

quiera que tú vayas, yo iré, y dondequiera 

que vivas, viviré. Tu pueblo será mi pue-

blo, y tu Dios mi Dios.

17

 Donde tú mueras, yo moriré, y allí seré 

sepultada. Así me haga YHVH, y aun me 

añada, que sólo la muerte hará separación 

entre nosotras dos.

18

 Y viendo que estaba resuelta a irse con 

ella, desistió de decirle más.

19

 Y  caminaron  las  dos  hasta  que  llega-

ron a Bet-léhem; y sucedió que al entrar 

en Bet-léhem, toda la ciudad se alborotó a 

causa de ellas, y las mujeres° decían: ¿No 

es ésta Noemí?

En Moab

1.1 Esto es, casa del pan.  1.1 LXX omite la palabra dos.  1.2 Esto es, mi Dios es rey.  1.2 Esto es, mi placer.  1.2 Esto es, enfer-

mizo

1.2 Esto es, desfallecido.  1.4 Prob. significa cierva, o la que da la espalda.  1.4 Esto es, amiga.  1.19 .las mujeres


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Rut 2:20

281

20

 Y  ella  les  respondía:  No  me  llaméis 

Noemí, sino llamadme Mara,° porque ’El-

Shadday° me ha puesto en gran amargura.

21

 Yo salí llena, pero YHVH me ha hecho 

regresar vacía. ¿Por qué me llamáis Noe-

mí, ya que YHVH ha dado testimonio con-

tra mí, y ’El-Shadday° me ha afligido?

22

 De  esta  suerte  regresó  Noemí,  y  con 

ella su nuera Rut la moabita, cuando vol-

vió de los campos de Moab. Y llegaron a 

Bet-léhem  a  principios  de  la  siega  de  la 

cebada.

La casa del pan

2

Y  tenía  Noemí  un  pariente°  por  par-

te  de  su  marido,  hombre  de  mucha 

riqueza,  de  la  familia  de  Elimelec,  cuyo 

nombre era Booz.°

2

 Y Rut la moabita dijo a Noemí: Te rue-

go que me dejes ir al campo, y rebuscaré° 

espigas  detrás  de  cualquiera  ante  cuyos 

ojos halle gracia. Y ella le respondió: Ve, 

hija mía.

3

 Fue pues, y al llegar, espigó en el campo 

tras  los  segadores.  Y  ocurrió  que  aquella 

parte del campo era precisamente de Booz, 

el cual era de la familia de Elimelec.

4

 Y he aquí Booz llegó de Bet-léhem y dijo 

a los segadores: ¡YHVH sea con vosotros! 

Y ellos respondieron: ¡YHVH te bendiga!

5

 Y Booz dijo a su criado, al que estaba al 

frente de los segadores: ¿De quién es esa 

joven?

6

 Y  el  criado  que  estaba  al  frente  de  los 

segadores  respondió,  diciendo:  Es  la  jo-

ven moabita que volvió con Noemí de los 

campos de Moab.

7

 Y ha dicho: Permíteme que rebusque y 

recoja entre las gavillas, detrás de los se-

gadores. Así pues ha venido, y ahí sigue 

desde  por  la  mañana  hasta  ahora,  salvo 

un momento que reposó en casa.

8

 Entonces Booz dijo a Rut: ¿No oyes hija 

mía? No vayas a espigar a otro campo, ni 

pases tampoco de aquí, sino júntate con 

mis criadas.

9

 Fíjate en el campo que sieguen y sígue-

las; ¿No he mandado yo a los criados que 

no te molesten? Y cuando tengas sed, ve 

a los cántaros y bebe del agua que saquen 

los criados.

10

 Ella entonces cayó sobre su rostro, se 

postró en tierra, y le dijo: ¿Por qué he ha-

llado gracia ante tus ojos para que te fijes 

en mí, siendo yo una extranjera?

11

 Y respondiendo Booz le dijo: He sabido 

en detalle todo lo que has hecho con tu 

suegra después de la muerte de tu mari-

do, y cómo abandonaste a tu padre y a tu 

madre, y la tierra de tu nacimiento, y has 

venido a un pueblo que no conocías.

12

 Recompense  YHVH  tu  obra  y  tengas 

un cumplido galardón de parte de YHVH, 

el Dios de Israel, bajo cuyas alas has veni-

do a refugiarte.

13

 Y ella dijo: ¡Halle yo gracia a tus ojos, se-

ñor mío!, porque en verdad me has conso-

lado, y has hablado al corazón de tu sierva, 

aunque no sea ni como una de tus criadas.

14

 A la hora de comer le dijo Booz: Acér-

cate aquí y come del pan y moja tu bocado 

en el vinagre. Entonces ella se sentó junto 

a los segadores, y él le dio grano tostado, y 

ella comió hasta que se sació, y le sobró.

15

 Luego se levantó a espigar, y Booz or-

denó  a  sus  criados,  diciendo:  Hasta  en 

medio de las gavillas podrá espigar, y no 

la habéis de avergonzar.

16

 Incluso dejaréis caer para ella algo de 

los  manojos  y  lo  abandonaréis  para  que 

ella lo espigue, y no la reprendáis.

17

 Así  espigó  ella  en  el  campo  hasta  el 

atardecer, y desgranó lo que había espiga-

do, y fue como un efa° de cebada.

18

 Se lo cargó y marchó a la ciudad, y su 

suegra vio lo que había espigado. También 

sacó de lo que le había sobrado de la comi-

da después de haberse saciado, y se lo dio.

19

 Entonces su suegra le preguntó: ¿Dón-

de has espigado hoy? ¿Dónde has trabaja-

do? ¡Bendito sea el que se haya fijado en ti! 

Y ella declaró a su suegra con quién había 

trabajado, y añadió: El nombre del varón 

con quien he trabajado hoy es Booz.

20

 Dijo entonces Noemí a su nuera: ¡Ben-

dito  sea  él  por  YHVH!  Pues  nunca  ha 

1.20 Esto es, amargura.  1.20 Esto es, Todopoderoso, Todo suficiente.  1.21 

→ §5.  2.1 Algunos mss. dicen un conocido. El texto 

hebreo escrito (ketib) es diferente del leído (qeré), pero la traducción pariente es la más congruente con el contexto. 

2.1 Heb. 

Boaz. No se sabe con exactitud el significado de este nombre, probablemente se trate de dos palabras Bo-az que significa 

en  él  (hay)  fuerza.  Una  de  las  dos  columnas  del  templo  de  Salomón  llevaba  este  nombre. 

→1 R.7.21.  2.2 →Lv.19.9-10; 

Dt.24.19. 

2.17 Esto es, 37 litros


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Rut 2:21

282

negado su misericordia ni a los vivos ni 

a los muertos. Le dijo además Noemí: Ese 

varón es nuestro pariente; uno de nues-

tros parientes más cercanos.

21

 Entonces Rut la moabita dijo: Además 

me a dicho: Júntate con mis criadas hasta 

que hayan acabado toda mi cosecha.

22

 Y  Noemí  respondió  a  su  nuera  Rut: 

Bueno será, hija mía, que salgas con sus 

criadas  para  que  no  te  maltraten  en  el 

campo de otro.

23

 Así pues, tuvo estrecha compañía con 

las criadas de Booz, y espigó hasta que se 

acabó la siega de la cebada y la siega del 

trigo; pero habitaba con su suegra.

El pariente redentor

3

Entonces le dijo su suegra Noemí: Hija 

mía, ¿no he de buscar reposo para ti, 

donde te vaya bien?

2

 Ahora pues, aquel Booz, con cuyas cria-

das tú has estado, ¿no es pariente nuestro? 

He  aquí  que  avienta  la  era  de  la  cebada 

esta noche.

3

 Lávate pues, y úngete, y ponte tus me-

jores° vestidos, y baja a la era; pero no te 

des a conocer al hombre hasta que haya 

terminado de comer y beber.

4

 Y sucederá que cuando se acueste, te fi-

jarás bien en el sitio donde se acuesta, e 

irás y alzarás la cubierta de sus pies, y te 

acostarás allí, para que él te diga lo que 

has de hacer.

5

 Y  le  respondió:  Todo  cuanto  me  dices, 

yo lo haré.

6

 Bajó pues a la era, e hizo todo lo que su 

suegra le había mandado.

7

 Y cuando Booz hubo comido y bebido, y 

estuvo alegre su corazón, fue a acostarse 

a  un  lado  del  montón.  Entonces  ella  se 

acercó calladamente, y alzando la cubier-

ta de sus pies, se acostó allí.

8

 Y  sucedió  que  a  la  media  noche  aquel 

varón se estremeció, y palpó, ¡y he aquí a 

una mujer acostada a sus pies!

9

 Entonces él dijo: ¿Quién eres tú? Y ella 

respondió: Soy Rut, tu sierva; extiende el 

borde de tu manto° sobre tu sierva, por-

que redentor° mío eres.

10

 Y él dijo: ¡Bendita seas de YHVH, hija 

mía!  Has  hecho  que  tu  postrera  bondad 

sea mayor que la primera, no yendo tras 

los jóvenes, sean pobres o ricos.

11

 Ahora pues, hija mía, no temas; que yo 

haré por ti todo cuanto me dices, porque 

todos  los  responsables°  de  mi  pueblo  sa-

ben° que eres mujer de acendrada virtud.

12

 Pero ahora, aunque es cierto que soy 

redentor tuyo, con todo, hay un pariente 

más cercano que yo.

13

 Pasa esta noche, y cuando sea de día, 

si él quiere redimirte, bien, que te redi-

ma; pero si él no quiere redimirte, ¡vive 

YHVH, yo te redimiré! Acuéstate hasta la 

mañana.

14

 Ella pues se acostó a sus pies hasta por 

la mañana: luego se levantó antes que los 

hombres  pudieran  reconocerse  unos  a 

otros, porque él había dicho: No se sepa 

que vino mujer a la era.

15

 Después le dijo: Trae acá el manto que 

llevas sobre ti, y sujétalo. Y ella lo sujetó, 

en tanto que él medía seis medidas de ce-

bada, y se las puso encima, y ella se fue a 

la ciudad.

16

 Cuando  volvió  a  su  suegra,  ésta  pre-

guntó: ¿Qué sucedió hija mía?° Y ella le 

contó todo lo que aquel varón había he-

cho por ella;

17

 y añadió: Estas seis efas° de cebada me 

ha dado, pues dijo: No regreses a tu sue-

gra con las manos vacías.

18

 Y ésta dijo: Descansa, hija mía, hasta 

que sepas como termina este asunto, por-

que  el  hombre  no  descansará  hasta  que 

concluya hoy mismo el asunto.

Redención de Rut y Noemí

4

Booz subió a la puerta y se sentó allí; 

y  he  aquí  pasaba  aquel  pariente  más 

cercano, del cual Booz había hablado, y le 

dijo: ¡Eh, fulano,° ven acá y siéntate! Y él 

se desvió y se sentó.

2

 Y tomando diez varones de los ancianos 

de la ciudad, dijo: Sentaos aquí. Y se sen-

taron.

3

 Luego  dijo  al  pariente  más  cercano: 

Noemí, que ha vuelto del campo de Moab, 

3.3 .mejores.  3.9 Es decir, recíbeme en matrimonio.  3.9 Heb. go'el. Del verbo ga'al = reclamar, rescatar, redimir. Es alguien 

que rescata o libera a otro. Existía la obligación de que el pariente más cercano tomara en casamiento a la viuda para levantar 

descendencia al fallecido. 

→4.5.  3.11 Lit. toda la puerta. Se refiere al consejo de ancianos que se reunían en la plaza de la 

ciudad. 

3.16 Lit. ¿qué te (ha pasado) hija mía?  3.17 .efas.  4.1 Heb. peloní ‘almoní = Fulano de tal


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Rut 4:22

283

vende la parcela de tierra que era de nues-

tro hermano Elimelec.

4

 Y decidí hacértelo saber, y decirte frente 

a los que están aquí sentados, y frente a 

los  ancianos  de  mi  pueblo,  que  la  com-

pres. Si quieres redimirla, redímela; y si 

no  quieres  redimirla,  decláramelo  para 

que lo sepa, porque no hay nadie para re-

dimirla fuera de ti, y yo después de ti. Y él 

dijo: Yo la redimiré.

5

 Pero  Booz  añadió:  El  día  que  adquie-

ras el campo de mano de Noemí, deberás 

tomar  también  a  Rut  la  moabita,  mujer 

del difunto, para perpetuar el nombre del 

muerto sobre su herencia.

6

 Y el pariente más cercano respondió: En-

tonces  no  podré  redimirla  para  mí,  pues 

destruiría mi heredad. Redime tú usando 

mi derecho,° porque yo no podré redimir.

7

 Desde antiguo había una tradición en Is-

rael tocante a la redención y al intercam-

bio para confirmar cualquier asunto: uno 

se quitaba el calzado y se lo daba al otro, y 

esto servía de testimonio en Israel.

8

 Entonces  el  pariente  más  cercano  dijo 

a Booz: Adquiérela para ti. Y se quitó el 

calzado.

9

 Entonces Booz anunció a los ancianos 

y a todo el pueblo: Vosotros sois testigos 

hoy de que he adquirido de mano de Noe-

mí todo lo que fue de Elimelec, y todo lo 

que fue de Quelión y de Mahlón.

10

 Además he adquirido a Rut la moabita, 

mujer de Mahlón, para que sea mi mujer 

a fin de perpetuar el nombre del difunto 

sobre su heredad, y que el nombre del di-

funto no sea cortado de entre sus herma-

nos ni de la puerta de su lugar. Vosotros 

sois testigos hoy.

11

 Y todos los del pueblo que estaban en 

la  puerta,  juntamente  con  los  ancianos, 

dijeron: ¡Testigos somos! ¡YHVH te con-

ceda que la mujer que va a entrar en tu 

casa  sea  como  Raquel  y  como  Lea,  las 

cuales  edificaron  la  casa  de  Israel,  y  te 

hagas fuerte en Efrata, y tu nombre sea 

famoso en Bet-léhem,

12

 y tu casa venga a ser como la casa de 

Fares, que Tamar le parió a Judá, por la 

descendencia  que  YHVH  te  dará  de  esta 

joven!

13

 Booz  tomó  pues  a  Rut,  y  ella  fue  su 

mujer; y se llegó ella, y YHVH le concedió 

gravidez y dio a luz un hijo.

14

 Y las mujeres decían a Noemí: ¡Bendi-

to sea YHVH que no ha permitido que te 

falte redentor el día de hoy! ¡Sea pues su 

nombre famoso en Israel!

15

 ¡Sea para ti restaurador del alma y sus-

tentador  de  tu  vejez!,  porque  tu  nuera, 

que te ama, le ha dado a luz, y ella te vale 

más que siete hijos.

16

 Y tomando Noemí al niño, lo puso en 

su pecho y fue su nodriza.

17

 Y  las  mujeres  vecinas  le  dieron  un 

nombre  diciendo:  A  Noemí  le  ha  nacido 

un hijo; y lo llamaron Obed.° Éste es pa-

dre de Isaí, padre de David.

18

 Éstas  son  las  generaciones  de  Fares: 

Fares engendró a Hezrón,

19

 Hezrón  engendró  a  Ram,  y  Ram  en-

gendró a Aminadab;

20

 Aminadab engendró a Naasón, y Naa-

són engendró a Salmón;

21

 Salmón engendró a Booz, y Booz en-

gendró a Obed;

22

 Obed engendró a Isaí, e Isaí engendró 

a David.

4.6 Lit. mi redención o mi rescate.  4.17 Esto es, siervo


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1

Hubo un varón de Ramataim-Zofim,° 

efrateo  de  la  serranía  de  Efraín,  lla-

mado Elcana° ben Jeroham, hijo de Eliú, 

hijo de Tohu, hijo de Suf.

2

 Y tenía dos mujeres: el nombre de una 

era Ana,° y el de la otra Penina.° Y Penina 

tenía hijos, pero Ana no tenía hijos.

3

 Y este varón subía todos los años desde 

su ciudad a postrarse y ofrecer sacrificios 

para YHVH Sebaot° en Silo, donde esta-

ban los dos hijos de Elí: Ofni y Finees, sa-

cerdotes de YHVH.

4

 Llegado el día,° Elcana ofrecía su sacri-

ficio y daba porciones° a su mujer Penina, 

a todos sus hijos y a todas sus hijas;

5

 pero  a  Ana  le  daba  una  porción  doble, 

porque  él  amaba  a  Ana  a  pesar  de  que 

YHVH había cerrado su matriz.

6

 Y su rival la provocaba con porfía para 

irritarla, porque YHVH había cerrado su 

matriz.

7

 Y  así  hacía  de  año  en  año,  irritándola 

cuando  subía  a  la  casa  de  YHVH;  y  ella 

lloraba y no comía.

8

 Y su marido Elcana le decía: Ana, ¿por 

qué lloras? ¿Por qué no comes? ¿Por qué 

está afligido tu corazón? ¿Acaso no te soy 

yo mejor que diez hijos?

9

 Un año,° después que hubieron comido y 

bebido, Ana se levantó en Silo, y mientras 

el sacerdote Elí estaba sentado en su sitial 

junto a una jamba de la Casa de YHVH,

10

 ella, con amargura de alma, suplicó a 

YHVH y lloró efusivamente.

11

 E  hizo  un  voto,  diciendo:  YHVH  Se-

baot, si te dignas mirar la aflicción de tu 

sierva, y te acuerdas de mí, y no te olvidas 

de tu sierva, sino que le das a tu sierva un 

hijo varón,° yo lo dedicaré a YHVH todos 

los días de su vida, y jamás pasará navaja 

por su cabeza.°

12

 Y sucedió que mientras ella oraba lar-

gamente  en  presencia  de  YHVH,  Elí  ob-

servaba su boca,

13

 porque Ana hablaba en su corazón, y 

sólo se movían sus labios, pero su voz no 

se escuchaba, por lo que Elí la tuvo por 

ebria.

14

 Entonces  le  dijo  Elí:  ¿Hasta  cuándo 

seguirás en tu borrachera? ¡Aleja de ti tu 

vino!

15

 Pero  Ana  respondió  y  dijo:  No,  señor 

mío; yo soy una mujer de espíritu afligi-

do; no he bebido vino ni licor fuerte, sino 

que  derramo  mi  alma  en  presencia  de 

YHVH.

16

 No tengas a tu sierva por hija de Belial, 

porque de la abundancia de mis congojas 

y aflicciones he hablado hasta ahora.

17

 Elí  entonces  respondió  y  dijo:  Ve  en 

paz, y el Dios de Israel te otorgue la peti-

ción que le has pedido.

18

 Ella  dijo:  ¡Halle  tu  sierva  gracia  ante 

tus ojos! Y la mujer se fue por su camino, 

y comió, y su semblante ya no fue como 

antes.°

19

 Por la mañana madrugaron y se pos-

traron  delante  de  YHVH;  luego  regre-

saron  y  llegaron  a  su  casa  en  Ramá.  Y 

Nacimiento de Samuel

1.1 Esto es, dos lugares altos de los que observan.  1.1 Esto es, Dios ha comprado, adquirido.  1.2 Heb. de la raíz janán = ser 

misericordioso

1.2 Esto es, la de pelo abundante.  1.3 YHVH Sebaot 

→ § 4.  1.4 Se refiere al turno sacerdotal.  1.4 Esto es, de 

la víctima

1.9 .un año.  1.11 Lit. descendencia de hombres.  1.11 Se refiere al voto del nazareo que, entre otras exigencias, 

le impedía cortarse el cabello 

→Nm.6.5.  1.18 .como antes


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1 Samuel 2:13

285

Elcana conoció° a Ana su mujer, y YHVH 

se acordó de ella.

20

 Y sucedió que al cabo de los días, des-

pués de haber concebido Ana, dio a luz un 

hijo, y llamó su nombre Samuel,° dicien-

do: Por cuanto lo pedí a YHVH.

21

 Y otra vez aquel hombre Elcana subió 

con toda su familia a ofrecer a YHVH el 

sacrificio anual, y pagar° su voto.

22

 Pero Ana no subió, pues dijo a su ma-

rido: Esperaré hasta que el niño sea des-

tetado; entonces yo misma lo llevaré para 

que se presente ante YHVH, y permanez-

ca allí para siempre.

23

 Y su marido Elcana le respondió: Haz lo 

que bien te parezca; quédate hasta que lo 

destetes;  solamente  que  YHVH  confirme 

su palabra. Se quedó pues la mujer, y crió 

a su hijo hasta que lo hubo destetado.

24

 Después que lo hubo destetado, lo hizo 

subir consigo, junto con tres becerros, un 

efa de flor de harina y un odre de vino, y 

lo llevó a la Casa de YHVH en Silo, aun-

que el niño era de tierna edad.

25

 Y fue degollado el becerro, y presenta-

ron el niño ante Elí.

26

 Y ella dijo: ¡Oh, señor mío, como que 

vive tu alma, yo soy aquella mujer que es-

tuvo aquí junto a ti rogando a YHVH!

27

 Por este niño rogaba, y YHVH me otor-

gó la petición que le pedí.

28

 Por lo mismo, yo también lo doy pres-

tado  a  YHVH.  Mientras  viva,  él  estará 

prestado  a  YHVH.  Y  allí  se  postró°  ante 

YHVH.

Cántico de Ana 

Los hijos de Elí

2

Y Ana oró, diciendo:

¡Mi corazón se alegra en YHVH!

¡Mi fuerza° se exalta en YHVH!

¡Mi boca se sobrepone a mis 

enemigos,

Por cuanto me regocijo en tu 

salvación!

2

    Nadie hay sagrado como YHVH,

Porque no hay nadie como Tú,

Ni hay Roca como el Dios nuestro.

3

    No multipliquéis palabras altaneras;

Ni salga arrogancia de vuestra boca;

Porque YHVH es Dios de sabiduría,

Y Él sopesa las acciones.

4

    Los arcos de los fuertes son 

quebrados,

Pero los que tambalean son 

fortalecidos.

5

    Los que estaban saciados se venden 

por pan,

Pero los hambrientos dejan de tener 

hambre.

Mientras la estéril da a luz a siete,

La que tiene muchos hijos 

languidece.

6

    YHVH hace morir y también da la 

vida.

Él hace bajar al Seol, y también hace 

subir.

7

    YHVH hace empobrecer y hace 

enriquecer,

Él abate y Él exalta.

8

    Él hace levantar del polvo al pobre,

Y exalta al menesteroso desde el 

muladar,

Para hacerlos sentar con príncipes,

Y heredar un trono de honor,

Porque de YHVH son los pilares de 

la tierra,

Y Él ha puesto el mundo sobre ellos.

9

    Él guarda los pies de sus fieles,

Pero los malos enmudecerán en las 

tinieblas,

Porque por fuerza propia no 

prevalecerá ninguno.

10

    Los adversarios de YHVH se 

aterrorizarán,

Y contra ellos tronará desde los cielos.

YHVH juzgará los confines de la 

tierra,

Dará fortaleza a su Rey,

Y exaltará la fuerza° de su Mesías.°

11

 Después  Elcana  volvió  a  su  casa  en 

Ramá, y el niño se quedó ministrando a 

YHVH en presencia del sacerdote Elí.

12

 Y los hijos de Elí eran hijos de Belial;° 

no tenían conocimiento de YHVH.

13

 Y  la  costumbre  del  sacerdocio  con  el 

pueblo  era  que  cuando  alguien  ofrecía 

un  sacrificio,  el  criado  del  sacerdote°  se 

1.19  Es  decir,  relación  sexual.  1.20  Esto  es,  oído  por  Dios.  1.21  .pagar.  1.28  Esto  es,  Samuel.  2.1  Lit.  mi  cuerno

2.10 Lit. el cuerno.  2.10 Heb. mashiaj 

→Lc.1.46-55.  2.12 Esto es, malvados o hijos de maldad.  2.13 Esto es, cualquiera de 

los dos hijos de Elí


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1 Samuel 2:14

286

acercaba con un garfio de tres dientes en 

su mano mientras se cocía la carne,

14

 y de un golpe lo metía en la cazuela, 

o en la olla, o en el caldero, o en la mar-

mita, y todo lo que el garfio sacaba lo to-

maba el sacerdote para sí. De esta manera 

hacían con todo Israel, con los que iban 

allí a Silo.

15

 Asimismo, antes de quemar la grosu-

ra,  el  criado  del  sacerdote  se  acercaba  y 

decía  al  que  sacrificaba:  Da  al  sacerdote 

carne para asar, porque no tomará de ti 

carne cocida, sino cruda.

16

 Y  si  el  hombre  le  respondía:  Quéme-

se primero la grosura, y después toma lo 

que desee tu alma; le decía: No, sino que 

me la darás ahora mismo; pues si no, la 

tomaré por la fuerza.

17

 Así  el  pecado  de  los  jóvenes  era  muy 

grave  delante  de  YHVH,  porque  tales 

hombres menospreciaban las ofrendas de 

YHVH.

18

 Y Samuel ministraba en presencia de 

YHVH siendo niño, ceñido de un éfod de 

lino.

19

 Además su madre le hacía una peque-

ña  túnica  y  se  la  llevaba  todos  los  años 

cuando subía con su marido a ofrecer el 

sacrificio acostumbrado.

20

 Y Elí bendecía a Elcana y a su mujer, 

diciendo:  YHVH  te  dé  descendencia  de 

esta mujer por el préstamo que ella hizo a 

YHVH. Y se volvían a su lugar.

21

 Y  YHVH  visitó  a  Ana,  y  concibió,  y 

dio a luz tres hijos y dos hijas. Y el joven 

Samuel crecía en presencia de YHVH.

22

 Y  Elí  había  envejecido  mucho,  y  oyó 

todo lo que sus hijos hacían a todo Israel, 

y cómo se acostaban con las mujeres que 

servían a la entrada de la Tienda de Reu-

nión.

23

 Y él les decía: ¿Por qué hacéis tales cosas? 

Pues estoy oyendo hablar de vuestras malas 

acciones por parte de toda esta gente.

24

 No hijos míos, no es bueno el rumor 

que estoy oyendo, porque hacéis pecar al 

pueblo de YHVH.

25

 Si un hombre peca contra otro hom-

bre,  ’Elohim  arbitrará;  pero  si  alguno 

peca  contra  YHVH,  ¿quién  arbitrará  por 

él? Pero ellos no escucharon la voz de su 

padre, pues YHVH había resuelto hacer-

los morir.

26

 Mientras  tanto,  el  joven  Samuel  iba 

creciendo  y  era  aprobado  ante  YHVH  y 

ante los hombres.

27

 Fue entonces un varón de Dios a Elí, 

y le dijo: Así dice YHVH: ¿No me revelé 

claramente a la casa de tu padre, cuan-

do  estaba  en  Egipto  esclavo  en  casa  de 

Faraón?

28

 ¿No lo escogí de entre todas las tribus 

de  Israel  para  que  fuera  mi  sacerdote, 

para que subiera a mi altar a quemar in-

cienso y llevara Éfod en mi presencia; y 

di a la casa de tu padre todas las ofrendas 

encendidas de los hijos de Israel?

29

 ¿Por  qué  pues  despreciáis  mis  sacri-

ficios  y  mis  ofrendas,  que  Yo  ordené  en 

mi Tabernáculo? ¿Y por qué honras a tus 

hijos antes que a mí, para engordaros con 

lo más pingüe de todas las ofrendas de mi 

pueblo Israel?

30

 Por  tanto,  así  dice  YHVH  Dios  de 

Israel:  En  verdad  dije  que  tu  casa  y  la 

casa de tu padre andarían en mi presen-

cia perpetuamente. Pero ahora, así dice 

YHVH: ¡Lejos sea esto de mí! Porque a 

los que me honran Yo los honraré, pero 

los  que  me  menosprecien  serán  afren-

tados.

31

 He aquí vienen días en que cortaré tu 

brazo  y  el  brazo  de  la  casa  de  tu  padre 

para que no quede anciano en tu casa.

32

 Verás  tu  casa  humillada,  mientras  Él 

colma  de  bienes  a  Israel,  y  jamás  habrá 

anciano en tu casa.

33

 Y el varón de los tuyos que Yo no corte 

de mi altar, será para consumir tus ojos 

y entristecer tu alma, y todos los nacidos 

en tu casa morirán en la edad viril.

34

 Y esto te servirá de señal, lo cual ven-

drá sobre tus dos hijos Ofni y Finees: Am-

bos morirán en un mismo día.

35

 Yo  empero  levantaré  para  mí  un  sa-

cerdote  fiel  que  actuará  conforme  a  mi 

corazón y a mi alma, y le edificaré casa 

firme, y él andará todos los días delante 

de mi Ungido.

36

 Y sucederá que todo aquel que haya 

quedado de tu casa, acudirá a postrar-

se ante él por una moneda de plata o 

una torta de pan, y dirá: Te ruego que 

me asignes alguna función sacerdotal 

para  que  pueda  comer  un  bocado  de 

pan.


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1 Samuel 4:4

287

Llamamiento a Samuel

3

El  joven  Samuel  ministraba  a  YHVH 

en presencia de Elí. Y en aquellos días 

la palabra de YHVH era escasa;° no había 

visión° manifiesta.

2

 Por ese tiempo aconteció que estando Elí 

acostado en su aposento, cuando sus ojos 

comenzaban a oscurecerse y no podía ver,

3

 pero aún no se había apagado la lámpa-

ra de Dios, y estando Samuel acostado en 

la Casa de YHVH, en la cual estaba el Arca 

de Dios,

4

 YHVH llamó a Samuel, y él respondió: 

¡Heme aquí!

5

 Enseguida corrió a Elí diciendo: ¡Heme 

aquí, puesto que me has llamado! Respon-

dió: Yo no he llamado; vuelve y acuéstate. 

Y él volvió y se acostó.

6

 Y  YHVH  volvió  a  llamar  otra  vez  a 

Samuel. Y Samuel se levantó y fue a Elí, y 

dijo: ¡Heme aquí, puesto que me has lla-

mado! Y él respondió: Yo no he llamado 

hijo mío, vuelve, acuéstate.

7

 Y Samuel no conocía aún a YHVH, pues 

la  palabra  de  YHVH  todavía  no  le  había 

sido revelada.

8

 Y  volvió  YHVH  a  llamar  a  Samuel  por 

tercera vez. Y él se levantó y fue a Elí, y 

dijo: ¡Heme aquí, puesto que me has lla-

mado!  Elí  entendió  entonces  que  YHVH 

estaba llamando al joven.

9

 Por lo que Elí dijo a Samuel: Ve, acués-

tate, y si te llama, dirás: Habla YHVH, que 

tu siervo oye. Y Samuel fue y se acostó en 

su lugar.

10

 Entonces  YHVH  vino  y  se  presentó, 

y  como  las  otras  veces  llamó:  ¡Samuel, 

Samuel!  Y  Samuel  dijo:  ¡Habla,  que  tu 

siervo oye!

11

 Y  dijo  YHVH  a  Samuel:  He  aquí,  Yo 

haré una cosa en Israel que a todo el que 

la oiga, le retiñirán ambos oídos.

12

 En  ese  día  ejecutaré  contra  Elí  todas 

las cosas que he anunciado respecto a su 

casa, de principio a fin.°

13

 Porque  le  he  hecho  saber  que  voy  a 

castigar  definitivamente  su  casa  por  la 

iniquidad cometida al saber que sus hijos 

maldecían a ’Elohim,° y él no los refrenó.

14

 Por tanto, he jurado a la casa de Elí, 

que  la  iniquidad  de  su  casa  no  será  ex-

piada  jamás,  ni  con  sacrificios  ni  con 

ofrendas.

15

 Y Samuel se acostó hasta la mañana, y 

abrió las puertas de la Casa de YHVH. Pero 

Samuel temía declarar la visión° a Elí.

16

 Entonces  Elí  llamando  a  Samuel,  le 

dijo:  Hijo  mío,  Samuel.  Y  él  respondió: 

Heme aquí.

17

 Y dijo: ¿Qué es lo que te ha dicho? Te 

ruego que no me lo ocultes. Así te haga 

’Elohim y aún te añada, si me ocultas al-

guna  palabra  de  todas  las  que  te  ha  ha-

blado.

18

 Entonces Samuel le declaró todas las 

palabras,  y  no  le  ocultó  nada.  Y  él  dijo: 

YHVH es; haga lo que bien le parezca.

19

 Y  Samuel  creció,  y  YHVH  estaba  con 

él, y no dejó caer a tierra ninguna de sus 

palabras.

20

 Y todo Israel, desde Dan hasta Beerse-

ba, reconoció que Samuel había sido de-

signado como profeta de YHVH.

21

 Y YHVH se volvió a aparecer en Silo, 

porque  YHVH  se  revelaba  a  Samuel  en 

Silo por la palabra de YHVH, y la palabra 

de Samuel era para todo Israel.

Victoria filistea 

Captura del Arca y muerte de Elí

4

Por aquel tiempo Israel salió en pie de 

guerra al encuentro de los filisteos, y 

acamparon  en  Eben-ezer,  y  los  filisteos 

acamparon en Afec.

2

 Y los filisteos se dispusieron para el en-

cuentro  contra  Israel,  y  extendiéndose 

la  batalla,  Israel  fue  derrotado  ante  los 

filisteos, los cuales mataron en el campo 

como cuatro mil hombres de la tropa.

3

 Cuando  el  pueblo  regresó  al  campa-

mento,  los  ancianos  de  Israel  dijeron: 

¿Por  qué  nos  ha  herido  hoy  YHVH  ante 

los filisteos? Traigámonos el Arca del Pac-

to de YHVH desde Silo, para que Él pueda 

estar entre nosotros y salvarnos de mano 

de nuestros enemigos.

4

 Y el pueblo envió a Silo, y trajeron de 

allí  el  Arca  del  Pacto  de  YHVH  Sebaot, 

3.1 Lit. cara, rara. Se refiere a un bien muy preciado.  3.1 Heb. jazón. Esto es, percibir con visión interior.  3.12 Lit. comenzar y 

acabar

3.13 4ª enmienda de los Soferim 

→ § 6, § 10.  3.15 Heb. marah del verbo raah = ver visiblemente.


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1 Samuel 4:5

288

que  habita  entre  los  querubines;  y  esta-

ban allí los dos hijos de Elí, Ofni y Finees, 

con el Arca del Pacto de Dios.

5

 Y cuando el Arca del Pacto de YHVH es-

tuvo en el campamento, todo Israel gritó 

con tan grande júbilo que la tierra se es-

tremeció.

6

 Y  cuando  los  filisteos  oyeron  el  es-

truendo del júbilo, dijeron: ¿Qué es este 

estruendo  de  gran  clamor  en  el  campa-

mento de los hebreos? Y se enteraron que 

el Arca de YHVH había llegado al campa-

mento.

7

 Y los filisteos tuvieron temor, y dijeron: 

¡’Elohim  ha  llegado  al  campamento!  Y 

decían: ¡Ay de nosotros, porque nunca ha 

sucedido antes cosa semejante!

8

 ¡Ay de nosotros! ¿Quién nos librará de la 

mano de este Dios° poderoso? ¡Éste es el 

Dios que golpeó a Egipto con toda plaga 

en el desierto!

9

 ¡Filisteos,  esforzaos  y  sed  hombres!, 

para que no seáis siervos de los hebreos 

como  ellos  lo  fueron  de  vosotros.  ¡Sed 

hombres y combatid!

10

 Y combatieron los filisteos, e Israel fue 

derrotado, y cada hombre huyó a su tienda, 

y hubo una gran matanza, por cuanto caye-

ron de Israel treinta mil hombres de a pie.

11

 Y el Arca de Dios fue tomada, y los dos 

hijos de Elí, Ofni y Finees, fueron muer-

tos.

12

 Y aquel mismo día, cierto hombre de 

Benjamín  corrió  desde  el  campo  de  ba-

talla  hasta  Silo,  rasgados  sus  vestidos  y 

echada tierra sobre su cabeza.

13

 Y  cuando  llegó,  he  aquí  Elí  sentado 

en su sitial, atalayando junto al camino, 

porque su corazón temblaba a causa del 

Arca de Dios. Cuando aquel hombre llegó 

a la ciudad para informar, toda la ciudad 

dio gritos.

14

 Y cuando Elí oyó el estruendo del gri-

terío, dijo: ¿Qué significa todo ese alboro-

to? Y aquel hombre se apresuró, y llegó e 

informó a Elí.

15

 Y Elí tenía ya noventa y ocho años de 

edad, y sus ojos estaban ya fijos, pues no 

podía ver.

16

 Y aquel hombre dijo a Elí: Soy el que 

ha venido de la batalla; hoy escapé de la 

batalla. Y le preguntó: ¿Qué ha sucedido, 

hijo mío?

17

 Y el mensajero respondió diciendo: Is-

rael ha huido delante de los filisteos, y ha 

habido también una gran matanza entre 

el  pueblo,  y  también  tus  dos  hijos,  Ofni 

y Finees, han sido muertos, y el Arca de 

Dios ha sido tomada.

18

 Y  cuando  hizo  mención  del  Arca  de 

Dios, aconteció que cayó de su silla hacia 

atrás, junto a la puerta, y se le quebró la 

cerviz, y murió, porque era hombre viejo 

y  pesado.  Él  había  juzgado  a  Israel  cua-

renta años.

19

 Y  su  nuera,  la  mujer  de  Finees,  que 

estaba  encinta  y  cercana  al  parto,  al  es-

cuchar la noticia de que el Arca de Dios 

había sido tomada, y que su suegro y su 

marido  habían  muerto,  se  agachó,  pues 

los dolores la habían acometido, y dio a 

luz.

20

 Y en el momento de su muerte, las que 

estaban junto a ella decían: No tengas te-

mor, porque has parido un hijo. Pero ella 

no respondió ni prestó atención.

21

 Y  llamó  al  niño  Icabod,°  diciendo: 

¡Traspasada es la gloria de Israel! Porque 

el Arca de Dios había sido capturada, y su 

suegro y su marido habían muerto.

22

 Dijo pues: ¡Llevada en cautiverio es la 

gloria de Israel!, porque el Arca de Dios 

había sido capturada.

El Arca entre los filisteos

5

Los filisteos pues tomaron el Arca de 

Dios y la llevaron de Eben-ezer a As-

dod.

2

 Y tomando los filisteos el Arca de Dios, 

la introdujeron en el templo de Dagón, y 

la colocaron junto a Dagón.

3

 Pero cuando los de Asdod madrugaron 

al día siguiente, ¡he aquí Dagón postrado 

en tierra ante el Arca de YHVH! Y toma-

ron a Dagón y lo volvieron a su sitio.

4

 Al día siguiente volvieron a madrugar y, 

¡he aquí Dagón yacía caído en tierra ante 

el Arca de YHVH! y la cabeza de Dagón y 

4.8 Téngase en cuenta que en heb. la palabra Dios (‘elohim) es plural, y por ello es optativo traducir Dios o dioses. Por otra 

parte, el escribirlo con mayúscula es completamente convencional, toda vez que en hebreo no hay diferencia entre mayúsculas 

y minúsculas 

→ § 2.  4.21 Esto es, sin gloria


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1 Samuel 6:12

289

las palmas de sus manos aparecían corta-

das en el umbral. Sólo le quedaba la parte 

de pez.

5

 Por esta causa, los sacerdotes de Dagón 

y  todos  los  que  entran  en  el  templo  de 

Dagón, no pisan el umbral de Dagón en 

Asdod hasta este día.

6

 Y la mano de YHVH se agravó sobre los 

de Asdod, y los castigó y los hirió con una 

epidemia de hemorroides en Asdod y en 

todos sus alrededores.

7

 Al ver esto, los de Asdod dijeron: El Arca 

del  Dios  de  Israel  no  debe  permanecer 

con nosotros, porque su mano se ha en-

durecido contra nosotros y contra Dagón 

nuestro dios.

8

 Y  convocaron  a  todos  los  príncipes  de 

los filisteos, y dijeron: ¿Qué haremos con 

el Arca del Dios de Israel? Y ellos respon-

dieron: Que el Arca del Dios de Israel sea 

trasladada  a  Gat.  E  hicieron  trasladar  el 

Arca del Dios de Israel.

9

 Pero  sucedió  que  después  que  la  hu-

bieron  trasladado,  la  mano  de  YHVH 

cayó  contra  la  ciudad  causando  gran 

consternación,  y  golpeó  a  los  hombres 

de aquella ciudad desde el pequeño has-

ta el grande, de modo que les brotaron 

hemorroides.

10

 Entonces  enviaron  el  Arca  de  Dios  a 

Ecrón. Y cuando el Arca de Dios llegó a 

Ecrón, los ecronitas dieron voces dicien-

do: ¡Han traído el Arca del Dios de Israel 

para  matarnos  a  nosotros  y  a  nuestro 

pueblo!

11

 Y convocaron a todos los príncipes de los 

filisteos, y dijeron: ¡Sacad de aquí el Arca 

del Dios de Israel y enviadla de vuelta a su 

propio lugar, para que no nos mate a noso-

tros y a nuestro pueblo! Porque había un 

pánico mortal en toda la ciudad, y la mano 

de Dios se había agravado mucho allí.

12

 Y  los  que  no  morían,  eran  afectados 

con hemorroides; y el clamor de la ciudad 

subía a los cielos.

Devolución del Arca

6

El Arca de YHVH había permanecido 

siete  meses  en  el  campo  de  los  filis-

teos,

2

 cuando  los  filisteos  convocaron  a  los 

sacerdotes  y  adivinos  para  preguntarles: 

¿Qué  haremos  con  el  Arca  de  YHVH? 

Hacednos saber de qué manera la hemos 

de enviar a su lugar.

3

 Y  respondieron:  Si  enviáis  el  Arca  del 

Dios de Israel, no se la enviéis vacía, sino 

que  la  devolveréis  a  Él  con  una  ofrenda 

por la culpa, y entonces seréis sanados, y 

se os hará saber por qué su mano no se 

apartó de vosotros.

4

 Y ellos preguntaron: ¿Cuál será la ofren-

da por la culpa que le habremos de devol-

ver?  Y  respondieron:  Cinco  hemorroides 

de  oro  y  cinco  ratones  de  oro,  conforme 

al número de los príncipes de los filisteos, 

por cuanto una misma plaga estuvo sobre 

todos vosotros y sobre vuestros príncipes.

5

 Por tanto, os haréis figuras de vuestras 

hemorroides, y figuras de los ratones que 

infectan vuestra tierra, y daréis gloria al 

Dios de Israel, que quizá aliviará su mano 

de sobre vosotros, y de sobre vuestros dio-

ses, y de sobre vuestra tierra.

6

 ¿Por qué, pues, queréis endurecer vues-

tros  corazones,  como  endurecieron  su 

corazón  los  egipcios  y  Faraón?  ¿Acaso 

cuando  Él  realizó  maravillas  ante  ellos, 

no  dejaron  ir  al  pueblo  de  manera  que 

éste partió?

7

 Ahora  pues,  tomad  y  preparad  un  ca-

rro  nuevo,  y  tomad  dos  vacas  que  estén 

criando, sobre las cuales no se haya pues-

to ningún yugo: uncid las vacas al carro 

y dejad a sus becerros lejos de ellas, en el 

establo.

8

 Después  tomaréis  el  Arca  de  YHVH  y 

la  pondréis  en  el  carro,  y  los  objetos  de 

oro que le devolvéis como ofrenda por la 

culpa, los pondréis en un cofre al lado de 

ella, y la dejaréis que se vaya.

9

 Y observaréis: Si sube por el camino de 

su territorio hacia Bet-semes, Él nos ha 

hecho  este  gran  mal,  pero  si  no,  enton-

ces sabremos que no es su mano la que 

nos ha herido, sino que nos ocurrió por 

accidente.

10

 Y aquellos hombres lo hicieron así: To-

maron dos vacas que estaban criando, las 

uncieron al carro y encerraron sus bece-

rros en el establo.

11

 Luego colocaron el Arca de YHVH en el 

carro, junto con el cofre con los ratones de 

oro y con las figuras de sus hemorroides.

12

 Y  las  vacas  entonces,  tomando  la  vía 

recta por el camino de Bet-semes, seguían 


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1 Samuel 6:13

290

una  misma  senda  andando  y  mugiendo, 

sin apartarse ni a derecha ni a izquierda; 

y los príncipes de los filisteos fueron tras 

ellas hasta el límite de Bet-semes.

13

 Y los de Bet-semes estaban segando el 

trigo en el valle, y alzando sus ojos, divi-

saron el Arca y se regocijaron al verla.

14

 Y el carro llegó al campo de Josué bet-

semita, y se detuvo allí, donde había una 

gran  piedra.  Ellos  entonces  partieron  la 

madera  del  carro,  y  ofrecieron  las  vacas 

en holocausto a YHVH.

15

 Porque  los  levitas  habían  bajado  el 

Arca de YHVH y el cofre que estaba a su 

lado, que tenía dentro los objetos de oro, 

y los habían colocado sobre aquella gran 

piedra. Luego, los hombres de Bet-semes 

hicieron subir holocaustos y sacrificaron 

víctimas a YHVH en aquel día.

16

 Y  cuando  los  cinco  príncipes  de  los 

filisteos vieron esto, regresaron a Ecrón 

aquel mismo día.

17

 Y las hemorroides de oro que los filis-

teos pagaron a YHVH como ofrenda por la 

culpa, son estas: una por Asdod, una por 

Gaza, una por Ascalón, una por Gat y una 

por Ecrón.

18

 Y los ratones de oro eran conforme al 

número de todas las ciudades de los filis-

teos pertenecientes a los cinco príncipes, 

tanto  de  ciudades  fortificadas  como  de 

aldeas sin muro. La gran piedra sobre la 

cual colocaron el Arca de YHVH, perma-

nece° hasta este día en el campo de Josué 

betsemita.

19

 Pero° el Señor castigó a los hombres de 

Bet-semes porque habían mirado dentro 

del Arca de YHVH. De todo el pueblo hizo 

morir° a cincuenta mil° setenta hombres, 

y  el  pueblo  hizo  duelo  porque  YHVH  lo 

había castigado con gran mortandad.

20

 Entonces  los  hombres  de  Bet-semes 

dijeron: ¿Quién podrá permanecer en pie 

delante de YHVH, este Dios tan santo? ¿Y 

a quién subirá° desde nosotros?

21

 Y enviaron mensajeros a los habitantes 

de Quiriat-jearim, diciendo: ¡Los filisteos 

han devuelto el Arca de YHVH! Bajad, y 

hacedla subir con vosotros.

Samuel, juez de Israel

7

Fueron entonces los hombres de Qui-

riat-jearim e hicieron subir el Arca de 

YHVH a la serranía, y la colocaron en casa 

de Abinadab, y consagraron a Eleazar su 

hijo para que guardara el Arca de YHVH.

2

 Y desde el día en que el Arca quedó en 

Quiriat-jearim pasaron muchos días (lle-

garon a ser veinte años), y toda la casa de 

Israel suspiraba por YHVH.

3

 Y habló Samuel a toda la casa de Israel, 

diciendo: Si os volvéis a YHVH con todo 

vuestro  corazón,  quitad  de  en  medio 

vuestro a los dioses extraños y a Astarot, 

y  preparad  vuestro  corazón  para  YHVH. 

Servidle sólo a Él, y Él os librará de mano 

de los filisteos.

4

 Y los hijos de Israel quitaron a los baales 

y a Astarot, y sirvieron sólo a YHVH.

5

 Luego  dijo  Samuel:  Reunid  a  todo  Is-

rael en Mizpa, y yo oraré por vosotros a 

YHVH.

6

 Y se reunieron en Mizpa, y sacaron agua 

y la derramaron delante de YHVH, y ayu-

naron  aquel  día  allí,  y  dijeron:  ¡Hemos 

pecado contra YHVH! Y Samuel juzgó a 

los hijos de Israel en Mizpa.

7

 Cuando los filisteos oyeron que los hijos 

de Israel se habían reunido en Mizpa, los 

príncipes de los filisteos subieron contra 

Israel. Al oír esto, los hijos de Israel tuvie-

ron temor de los filisteos.

8

 Y los hijos de Israel dijeron a Samuel: 

No ceses de clamar por nosotros a YHVH 

nuestro Dios, que nos salve de mano de 

los filisteos.

9

 Y tomó Samuel un corderito lechal y lo 

ofreció entero en holocausto a YHVH. Y 

clamó Samuel a YHVH por Israel, y YHVH 

lo escuchó.

10

 Y aconteció que mientras Samuel hacía 

subir el holocausto, los filisteos se acer-

caron para combatir a Israel; pero YHVH 

tronó aquel día con grande estruendo so-

bre los filisteos y los desbarató, y fueron 

derrotados delante de Israel.

11

 Y los hombres de Israel salieron de Miz-

pa y persiguieron a los filisteos y los fueron 

acuchillando hasta más abajo de Bet-car.

6.18 Es decir, permanece como testigo.  6.19 LXX registra: Pero no se alegraron los hijos de Jeconías entre la gente de Betse-

mes, porque habían mirado en el Arca de YHVH, y mató de entre ellos a setenta hombres

6.19 El verbo hebreo nakah puede 

significar herir, golpear, matar, castigar, etc. 

6.19 .el Señor.  6.19 LXX, Sir. y VUL omiten cincuenta mil.  6.20 Esto es, el Arca.


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1 Samuel 9:1

291

12

 Luego  Samuel  tomó  una  piedra  y  la 

asentó entre Mizpa y Sen, y le puso por 

nombre Eben-ezer,° diciendo: Hasta aquí 

nos ayudó YHVH.

13

 Así  fueron  humillados  los  filisteos,  y 

no volvieron a entrar más en el territorio 

de Israel; y la mano de YHVH estuvo con-

tra los filisteos todos los días de Samuel.

14

 Y  fueron  restituidas  a  Israel  las  ciu-

dades que los filisteos le habían tomado, 

desde  Ecrón  hasta  Gat;  e  Israel  libró  su 

territorio de mano de los filisteos, y tam-

bién hubo paz entre Israel y el amorreo.

15

 Samuel juzgó a Israel todos los días de 

su vida;

16

 y de año en año hacía un recorrido por 

Bet-’El, Gilgal y Mizpa, y juzgaba a Israel 

en todos esos lugares.

17

 Después  regresaba  a  Ramá,  pues  allí 

estaba  su  casa,  y  allí  también  juzgaba  a 

Israel, y allí edificó un altar a YHVH.

Israel pide un rey

8

Aconteció que cuando Samuel enveje-

ció, puso a sus hijos por jueces sobre 

Israel.

2

 El  nombre  de  su  hijo  primogénito  era 

Joel, y el nombre de su segundo, Abías, y 

eran jueces en Beerseba.

3

 Pero sus hijos no anduvieron en los ca-

minos de él, sino que se inclinaron a la 

ganancia deshonesta, y recibieron sobor-

no, y pervirtieron la justicia.

4

 Entonces todos los ancianos de Israel se 

reunieron y fueron a Samuel en Ramá,

5

 y  le  dijeron:  He  aquí,  tú  has  envejeci-

do, y tus hijos no andan en tus caminos; 

ahora pues, constitúyenos un rey que nos 

juzgue, como tienen todas las naciones.

6

 Pero  fue  desagradable  a  los  ojos  de 

Samuel  que  dijeran:  Danos  un  rey  que 

nos juzgue. Y Samuel oró a YHVH.

7

 Y YHVH dijo a Samuel: Oye la voz del pue-

blo en todo lo que te digan, porque no te 

han rechazado a ti, sino que me han recha-

zado a mí, para que no reine sobre ellos.

8

 Conforme a todas las obras que han he-

cho desde el día en que los hice subir de 

Egipto hasta este día, cuando me dejaron 

y  sirvieron  a  otros  dioses,  así  están  ha-

ciendo contigo.

9

 Ahora pues, atiende su voz; pero adviér-

teles solemnemente para que sepan el pro-

ceder del rey que ha de reinar sobre ellos.

10

 Y Samuel refirió todas las palabras de 

YHVH al pueblo que había pedido rey,

11

 diciendo: Este será el proceder del rey 

que  reine  sobre  vosotros:  Tomará  vues-

tros hijos y los pondrá a su servicio para 

sus carros de guerra y su caballería, para 

que corran delante de su carruaje.

12

 Y los designará como capitanes de mi-

llares  y  capitanes  de  cincuentena;  y  para 

arar sus campos, y para recoger su cose-

cha, y para hacer sus armas de guerra, y 

los pertrechos de sus carros de guerra.

13

 Tomará a vuestras hijas para que sean per-

fumistas, y sean cocineras, y sean panaderas.

14

 Y  tomará  vuestros  campos,  y  vuestros 

viñedos, y vuestros mejores olivares, y los 

dará a sus siervos.

15

 Y  diezmará  vuestras  sementeras  y 

vuestras viñas para darlas a sus eunucos y 

a sus servidores.

16

 Y  tomará  vuestros  siervos  y  vuestras 

siervas, y vuestros jóvenes más escogidos, 

y  vuestros  asnos,  y  los  empleará  en  sus 

propias labores.

17

 Diezmará  vuestro  rebaño,  y  vosotros 

mismos le seréis por siervos.

18

 Y  en  aquel  día  clamaréis  a  causa  de 

vuestro  rey  a  quien  os  escogisteis,  pero 

YHVH no os responderá en aquel día.

19

 Pero  el  pueblo  no  quiso  escuchar  la 

voz  de  Samuel,  sino  que  dijeron:  ¡No! 

¡Haya rey sobre nosotros!

20

 Y  seamos  nosotros  también  como 

todas  las  naciones.  Nuestro  rey  nos  go-

bernará, y saldrá al frente de nosotros y 

peleará nuestras batallas.

21

 Después que Samuel escuchó todas las 

palabras del pueblo, las repitió a oídos de 

YHVH.

22

 Y YHVH dijo a Samuel: Escucha la voz 

de ellos, y haz que un rey reine sobre ellos. 

Entonces  dijo  Samuel  a  los  hombres  de 

Israel: Regrese cada uno a su ciudad.

Saúl

9

Había un hombre de Benjamín, hom-

bre  poderoso  y  pudiente,  cuyo  nom-

bre era Cis° ben Abiel, hijo de Zeror ben 

7.12 Heb. Piedra de la ayuda.   9.1 Prob. este nombre proviene de la raíz qosh que significa tender lazo o trampa


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1 Samuel 9:2

292

Becorat, hijo de Afia, también hijo de un 

benjamita.

2

 Y tenía él un hijo que se llamaba Saúl,° 

joven y apuesto, tanto que entre los hijos 

de Israel no había otro mejor que él; de 

los hombros arriba era más alto que cual-

quiera del pueblo.

3

 Y las asnas de Cis, el padre de Saúl, se 

habían perdido, por lo cual dijo Cis a su 

hijo Saúl: Toma ahora contigo a uno de 

los criados, levántate, y ve en busca de las 

asnas.

4

 Entonces  él  pasó  por  la  serranía  de 

Efraín,  y  atravesó  la  comarca  de  Salisa, 

pero  no  las  hallaron.  Pasaron  luego  por 

la tierra de Saalim, y nada. Atravesaron la 

tierra de Benjamín, y tampoco.

5

 Cuando llegaron a la tierra de Suf, Saúl 

dijo al joven que estaba con él: Vamos a 

volvernos, no sea que mi padre se olvide 

de las asnas y comience a preocuparse por 

nosotros.

6

 Pero  él  le  respondió:  Precisamente  en 

esta ciudad hay un varón de Dios, que es 

varón insigne: todas las cosas que él dice 

acontecen sin falta. Vamos pues allá, qui-

zá nos diga el camino por donde hemos 

de ir.

7

 Saúl respondió a su criado: Pero si va-

mos, ¿qué llevaremos al varón? Porque el 

pan de nuestras alforjas se ha acabado. No 

tenemos presente que llevar al varón de 

Dios. ¿Qué tenemos?

8

 Entonces  el  joven  volvió  a  contestar  a 

Saúl, y dijo: He aquí tengo en mi poder 

la cuarta parte de un siclo de plata; se lo 

daré al varón de Dios para que nos indi-

que nuestro camino.

9

 (Antiguamente en Israel cualquiera que 

iba  a  consultar  a  ’Elohim  decía  así:  ¡Va-

mos al vidente! porque al profeta de hoy 

antiguamente se lo llamaba vidente.)

10

 Dijo  entonces  Saúl  a  su  criado:  Bien 

dicho; anda, vamos. Y fueron a la ciudad 

donde estaba el varón de Dios.

11

 Subiendo ellos por la cuesta de la ciu-

dad, hallaron unas jóvenes que salían por 

agua, a las cuales dijeron: ¿Está por aquí 

el vidente?

12

 Y ellas respondieron diciendo: Sí, helo 

allí delante de ti. Ahora apresúrate, pues 

precisamente ha venido a la ciudad por-

que el pueblo tiene hoy un sacrificio en 

el lugar alto.

13

 Al entrar en la ciudad, buscadlo, antes 

que suba al lugar alto a comer, pues el pue-

blo no comerá hasta que él haya llegado, 

por cuanto él es el que bendice el sacrificio, 

y después comen los invitados. Ahora pues, 

subid, porque enseguida lo hallaréis.

14

 Ellos entonces subieron a la ciudad, y 

cuando llegaron al centro de la ciudad, he 

aquí Samuel salía hacia a ellos para subir 

al lugar alto.

15

 Y un día antes que Saúl llegara, YHVH 

le  había  revelado  al  oído  de  Samuel,  di-

ciendo:

16

 Mañana a esta hora te enviaré un va-

rón de la tierra de Benjamín, al cual un-

girás por príncipe sobre mi pueblo Israel. 

Él librará a mi pueblo de mano de los fi-

listeos, porque Yo he visto a mi pueblo, y 

su clamor ha llegado hasta mí.

17

 Cuando  Samuel  vio  a  Saúl,  YHVH  le 

dijo: He aquí el varón de quien te hablé: 

Éste regirá a mi pueblo.

18

 Y Saúl alcanzó a Samuel en medio de 

la puerta, y le dijo: Te ruego que me digas 

dónde está la casa del vidente.

19

 Y Samuel respondió a Saúl, y dijo: Yo 

soy el vidente; sube delante de mí al lugar 

alto, y comed hoy conmigo. Por la maña-

na te despediré y te declararé todo lo que 

hay en tu corazón.

20

 En cuanto a las asnas que se te perdie-

ron  hace  tres  días,  no  tengas  cuidado  de 

ellas,  porque  han  sido  halladas.  Además, 

¿para  quién  es  todo  lo  deseable  de  Israel 

sino para ti y para toda la casa de tu padre?

21

 Entonces  Saúl  respondió  y  dijo:  ¿No 

soy yo benjamita, de una de las tribus más 

pequeñas de Israel? Y mi familia, ¿no es 

la  más  pequeña  de  todas  las  familias  de 

la tribu de Benjamín? ¿Por qué pues me 

hablas conforme a esta palabra?

22

 Entonces  Samuel  asió  a  Saúl  y  a  su 

criado, y los introdujo en la sala, y les dio 

lugar a la cabecera de los convidados, los 

cuales eran unos treinta hombres.

23

 Y Samuel dijo al cocinero: Trae la por-

ción  que  te  di,  de  la  cual  te  dije:  Ponla 

aparte.

9.2 Esto es, pedido, solicitado


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1 Samuel 10:19

293

24

 Entonces el cocinero alzó una espaldi-

lla con lo que estaba sobre ella, y la colo-

có delante de Saúl. Y él° dijo: He aquí lo 

que estaba reservado. Ponlo delante de ti 

y come, pues fue guardada para ti hasta 

el momento señalado, cuando dije: He in-

vitado al pueblo. Y aquel día Saúl comió 

con Samuel.

25

 Y  cuando  bajaron  del  lugar  alto  a  la 

ciudad, habló con Saúl en el terrado.

26

 Y madrugaron, y aconteció que al des-

puntar el alba, Samuel llamó a Saúl en el 

terrado, diciendo: ¡Levántate, y te despe-

diré! Entonces Saúl se levantó, y salieron 

ambos, él y Samuel.

27

 Y  cuando  bajaban  al  extremo  de  la 

ciudad, Samuel le dijo a Saúl: Dile al mu-

chacho  que  pase  delante  de  nosotros  (y 

él pasó delante), pero tú espera un poco, 

para que te haga oír palabra de Dios.

Saúl es ungido rey

10

Y tomó Samuel la redoma de aceite y 

la derramó sobre la cabeza de él, y lo 

besó y le dijo: ¿No es que YHVH te ha ungi-

do para ser príncipe sobre su heredad?

2

 Al alejarte hoy de mí, hallarás dos hom-

bres junto al sepulcro de Raquel, en el lí-

mite de Benjamín, en Selsá, los cuales te 

dirán: Las asnas que habías salido a bus-

car han sido halladas, pero he aquí que tu 

padre ha olvidado el asunto de las asnas 

y está intranquilo por vosotros, diciendo: 

¿Qué haré en cuanto a mi hijo?

3

 Luego  pasarás  más  adelante  y  llegarás 

a  la  encina  de  Tabor,  y  allí  te  saldrán  al 

encuentro  tres  hombres  que  suben  a 

’Elohim en Bet-’El, uno llevando tres ca-

britos, otro llevando tres tortas de pan, y 

otro llevando un odre de vino.

4

 Y ellos te saludarán y te darán dos pa-

nes, que recibirás de sus manos.

5

 Después  de  esto  llegarás  al  collado  de 

Dios donde hay una guarnición de los fi-

listeos: cuando entres en la ciudad, encon-

trarás allí un grupo de profetas que bajan 

del alto, precedidos de salterios, panderos, 

flautas y cítaras, y ellos profetizando.

6

 Entonces  el  Espíritu  de  YHVH  vendrá 

sobre  ti  con  poder,  y  profetizarás  con 

ellos, y serás cambiado en otro hombre.

7

 Cuando  te  sobrevengan  estas  seña-

les, haz lo que te venga a mano, porque 

’Elohim está contigo.

8

 Luego bajarás delante de mí a Gilgal, pues 

yo también bajaré a tu encuentro para ofre-

cer holocaustos y sacrificar ofrendas pacífi-

cas. Espera siete días, hasta que yo vaya a ti 

y te indique lo que has de hacer.

9

 Y  sucedió  que  al  volver  él  las  espaldas 

para alejarse de Samuel, ’Elohim le cam-

bió el corazón; y todas esas señales ocu-

rrieron en aquel mismo día.

10

 Y cuando llegaron al collado, he aquí 

la  compañía  de  profetas  salió  a  su  en-

cuentro, y el Espíritu de Dios se apoderó 

de él, y profetizó entre ellos.

11

 Y  sucedió  que  cuando  todos  los  que 

lo  conocían  anteriormente  vieron  que 

ahora profetizaba con los profetas, los del 

pueblo se decían unos a otros: ¿Qué le ha 

sucedido  al  hijo  de  Cis?  ¿También  Saúl 

entre los profetas?

12

 Y un hombre de allí respondió, y dijo: 

¿Y  quién  es  el  padre  de  ellos?  Por  esta 

causa se tornó en refrán: ¿También Saúl 

entre los profetas?

13

 Cesó de profetizar, y llegando al lugar 

alto,

14

 el tío de Saúl le dijo a él y a su criado: 

¿Adónde fuisteis? Y él respondió: A buscar 

las asnas, y como vimos que no aparecían, 

acudimos ante Samuel.

15

 Y dijo el tío de Saúl: Te ruego que me 

declares lo que os dijo Samuel.

16

 Y Saúl respondió a su tío: Nos dijo clara-

mente que las asnas habían sido halladas. 

(Pero nada dijo en lo concerniente a lo que 

le había dicho Samuel sobre el reinado.)

17

 Entonces  Samuel  convocó  al  pueblo 

delante de YHVH en Mizpa,

18

 y  dijo  a  los  hijos  de  Israel:  Así  dice 

YHVH Dios de Israel: Yo hice subir a Is-

rael de Egipto, y os libré de mano de los 

egipcios,  y  de  mano  de  todos  los  reinos 

que os oprimían.

19

 Pero  hoy  vosotros  habéis  rechazado 

a vuestro Dios, el cual os salva de todas 

vuestras  desgracias  y  angustias,  y  le  ha-

béis dicho: ¡No! ¡Haya rey sobre nosotros! 

Ahora  pues,  presentaos  ante  YHVH  por 

vuestras tribus y por vuestros millares.

9.24 Esto es, Samuel.


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1 Samuel 10:20

294

20

 Y Samuel hizo acercar a todas las tri-

bus de Israel, y fue designada la tribu de 

Benjamín.

21

 Luego hizo acercarse a la tribu de Ben-

jamín por sus familias, y fue designada la 

familia de Matri, y de ella fue designado 

Saúl  ben  Cis;  pero  cuando  lo  buscaron, 

no fue hallado.

22

 Entonces  consultaron  otra  vez  a 

YHVH:  ¿Ha  venido  ya  aquí  ese  varón?  Y 

respondió YHVH: Helo ahí, escondido en-

tre el bagaje.

23

 Y corrieron y lo sacaron de allí; y cuan-

do se presentó en medio del pueblo, se vio 

que  desde  sus  hombros  hacia  arriba  era 

más alto que todo el pueblo.

24

 Y Samuel dijo a todo el pueblo: ¿Ha-

béis  visto  al  que  ha  elegido  YHVH?  En 

todo  el  pueblo  no  hay  como  él.  Enton-

ces el pueblo exclamó con alegría, y dijo: 

¡Viva el rey!

25

 Luego  Samuel  habló  al  pueblo  las 

ordenanzas  del  reino,  y  lo  escribió  en 

el  rollo  que  presentó  a  YHVH.  Después 

Samuel  despidió  a  todo  el  pueblo,  cada 

uno a su casa.

26

 Y Saúl fue también a su casa en Gabaa, 

y con él fueron los hombres de valor, cu-

yos corazones había tocado ’Elohim.

27

 Pero  algunos  hijos  de  Belial  dijeron: 

¿Qué? ¿Éste nos va a salvar? Y lo menos-

preciaron, y no le llevaron presente algu-

no; pero él disimuló.

Derrota de los amonitas

11

Y subió Nahas amonita, y acampó 

contra  Jabes  Galaad.  Y  todos  los 

hombres de Jabes dijeron a Nahas: Pactad 

con nosotros y te serviremos.

2

 Y Nahas amonita les respondió: Con esta 

condición pactaré con vosotros: Que a cada 

uno de vosotros os saque el ojo derecho, y 

ponga esta afrenta sobre todo Israel.

3

 Y los ancianos de Jabes le dijeron: Déja-

nos siete días para que enviemos mensaje-

ros por todo el territorio de Israel, y si no 

hay quien nos libre, nos rendiremos° a ti.

4

 Cuando  los  mensajeros  llegaron  a  Ga-

baa de Saúl, dijeron estas palabras a oídos 

del pueblo, y todo el pueblo alzó su voz 

y lloró.

5

 Y  he  aquí  Saúl  llegaba  del  campo  tras 

los  bueyes,  y  preguntó  Saúl:  ¿Qué  tiene 

el pueblo, que lloran? Y le refirieron las 

palabras de los hombres de Jabes.

6

 Al oír estas palabras, el Espíritu de Dios 

vino poderosamente sobre Saúl, y su ira 

se encendió en gran manera.

7

 Y  tomando  un  par  de  bueyes,  los  cor-

tó  en  pedazos  y  los  repartió  por  todo  el 

territorio de Israel mediante mensajeros, 

diciendo:  Así  será  hecho  con  los  bueyes 

del que no salga tras Saúl y tras Samuel. 

Y el temor de YHVH cayó sobre el pueblo, 

y salieron como un solo hombre.

8

 Y les pasó revista en Bezec: los hijos de 

Israel eran trescientos mil, y los hombres 

de Judá treinta mil.

9

 Y dijeron a los mensajeros que habían 

llegado: Así diréis a los hombres de Jabes 

Galaad: Mañana, al calentar el sol, seréis 

librados. Y los mensajeros fueron y lo in-

formaron a los hombres de Jabes, y ellos 

se alegraron.

10

 Y  los  de  Jabes  dijeron:°  Mañana  sal-

dremos a vosotros, y haréis con nosotros 

todo lo que bien os parezca.

11

 Y  en  la  madrugada  Saúl  dispuso  al 

pueblo en tres escuadrones, y en la vigi-

lia de la mañana entraron en medio del 

campamento  y  atacaron  a  los  amonitas 

hasta el calor del día; y el resto fue dis-

persado  sin  que  quedaran  dos  de  ellos 

juntos.

12

 Entonces  el  pueblo  le  dijo  a  Samuel: 

¿Quién es el que decía: ¿Reinará Saúl so-

bre  nosotros?  ¡Dadnos  a  esos  hombres 

para que les demos muerte!

13

 Pero Saúl respondió: Ningún hombre 

será muerto en este día, porque YHVH ha 

dado hoy victoria en Israel.

14

 Y Samuel dijo al pueblo: Venid, vamos 

a Gilgal y renovemos allí el reino.

15

 Y todo el pueblo fue a Gilgal, e hizo que 

Saúl reinara delante de YHVH en Gilgal. 

Y allí ofrecieron sacrificios de paz delante 

de YHVH; y Saúl y todos los hombres de 

Israel tuvieron allí gran regocijo.

Exhortación de Samuel

12

Entonces  Samuel  dijo  a  todo  Is-

rael: He aquí he escuchado vuestra 

11.3 Lit. saldremos.  11.10 Esto es, a Nahas y a los amonitas


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1 Samuel 12:24

295

voz en todo lo que me habéis dicho, y he 

hecho que un rey reine sobre vosotros.

2

 Y ahora, he aquí vuestro rey marcha al 

frente de vosotros. Yo ya soy anciano y ca-

noso, y he aquí mis hijos ante vosotros, y 

yo  he  andado  delante  de  vosotros  desde 

mi juventud hasta este día.

3

 Heme aquí: testificad contra mí en pre-

sencia de YHVH y en presencia de su un-

gido: ¿De quién he tomado el buey o de 

quién  he  tomado  asno?  ¿A  quién  he  ex-

torsionado,  o  a  quién  he  oprimido?  ¿De 

mano de quién he aceptado presente para 

que mis ojos se cegaran? Y yo restituiré.

4

 Le  respondieron:  No  nos  has  extorsio-

nado ni oprimido, ni has tomado nada de 

mano de hombre.

5

 Y  él  les  dijo:  YHVH  es  testigo  contra 

vosotros,  y  su  ungido  es  testigo  en  este 

día, de que no habéis hallado nada en mi 

mano. Y ellos respondieron: Es testigo.

6

 Y  dijo  Samuel  al  pueblo:  YHVH  es  el 

que designó a Moisés y a Aarón, y el que 

hizo subir a vuestros padres de la tierra 

de Egipto.

7

 Ahora pues, presentaos, y haré un juicio 

en presencia de YHVH sobre todos los ac-

tos justos que YHVH ha hecho con voso-

tros y con vuestros padres:

8

 Cuando  Jacob  llegó  a  Egipto,  vuestros 

padres clamaron a YHVH, y YHVH envió a 

Moisés y a Aarón, quienes sacaron a vues-

tros padres de Egipto, y los establecieron 

en este lugar.

9

 Pero  ellos  se  olvidaron  de  YHVH  su 

Dios, y Él los vendió en mano de Sísara, 

jefe del ejército de Hazor, y en mano de 

los filisteos, y en mano del rey de Moab, 

los cuales tuvieron guerra contra ellos.

10

 Entonces ellos clamaron a YHVH, y di-

jeron: Hemos pecado, pues hemos abando-

nado a YHVH y hemos servido a los baales 

y a Astarot.° ¡Líbranos ahora de la mano de 

nuestros enemigos, y te serviremos!

11

 Y YHVH envió a Jerobaal, a Bedán,° a 

Jefté y a Samuel,° y os libró de mano de 

vuestros enemigos en derredor, y habitas-

teis con seguridad.

12

 Pero cuando visteis que Nahas, rey de 

los  amonitas,  venía  contra  vosotros,  me 

dijisteis: ¡No! ¡Haya un rey que reine so-

bre nosotros! aun cuando YHVH vuestro 

Dios era vuestro rey.

13

 Ahora pues, aquí tenéis al rey que ha-

béis  elegido,  el  cual  habéis  pedido.  ¡He 

aquí, YHVH ha puesto rey sobre vosotros!

14

 Si teméis a YHVH y le servís, y obede-

céis su voz y no sois rebeldes al dicho de 

YHVH, entonces viviréis en pos de YHVH 

vuestro Dios, tanto vosotros como el rey 

que reine sobre vosotros.

15

 Pero si no obedecéis la voz de YHVH y 

sois rebeldes al dicho de YHVH, la mano 

de YHVH estará contra vosotros y contra 

vuestros padres.

16

 También  ahora  mismo  presentaos  y 

ved  este  gran  prodigio°  que  YHVH  hace 

ante vuestros ojos:

17

 ¿No es ahora la cosecha del trigo? In-

vocaré  a  YHVH  y  Él  dará  truenos  y  un 

aguacero  para  que  sepáis  y  veáis  cuán 

grande es vuestra maldad que cometisteis 

ante los ojos de YHVH al pedir para voso-

tros rey.

18

 Entonces Samuel invocó a YHVH, y en 

aquel  mismo  día  YHVH  envió  truenos  y 

un  aguacero;  y  todo  el  pueblo  sintió  un 

gran temor de YHVH y de Samuel.

19

 Y  todo  el  pueblo  dijo  a  Samuel:  Ora 

por  tus  siervos  ante  YHVH  tu  Dios  para 

que  no  muramos,  porque  a  todos  nues-

tros pecados, hemos añadido este mal de 

demandar para nosotros rey.

20

 Y  Samuel  dijo  al  pueblo:  No  temáis; 

vosotros habéis cometido toda esta mal-

dad, sin embargo, no os apartéis de en pos 

de  YHVH,  sino  servid  a  YHVH  con  todo 

vuestro corazón.

21

 No os apartaréis en pos de vanidades° 

que no aprovechan ni libran, porque va-

nidades son.

22

 Porque  YHVH  no  abandonará  a  su 

pueblo,  debido  a  su  gran  Nombre;  pues 

YHVH ha querido haceros pueblo suyo.

23

 Así  que,  lejos  esté  de  mí  que  peque 

contra YHVH cesando de orar por voso-

tros; antes yo os instruiré en el camino de 

la bondad y la rectitud.

24

 Sólo  que  temáis  a  YHVH,  y  le  sirváis 

de verdad con todo vuestro corazón, pues 

12.10  Referencia  a  las  imágenes  de  Astarté,  diosa  de  la  fertilidad.  12.11  Esto  es,  Barac.  12.11  LXX  registra  Sansón

12.16 Lit. palabra.  12.21 Lit. vacío, caos, confusión

→Gn.1.2.


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1 Samuel 12:25

296

considerad cómo se ha engrandecido con 

vosotros.

25

 Pero si perseveráis en hacer el mal, se-

réis barridos, tanto vosotros como vues-

tro rey.

Guerra contra los filisteos 

El pecado de Saúl

13

Cuando  alcanzó  el  reino  Saúl  te-

nía… años, y cuando hubo reinado 

sobre Israel… dos años,°

2

 Saúl escogió para sí tres mil hombres de 

Israel, de los cuales dos mil quedaron con 

Saúl en Micmás y en la serranía de Bet-

’El, y mil con Jonatán en Gabaa de Benja-

mín. Y al resto del pueblo lo despidió cada 

uno a sus tiendas.

3

 Y  Jonatán  atacó  la  guarnición  de  los 

filisteos que estaba en Gabaa, y se ente-

raron los filisteos. Entonces Saúl dio so-

plido al shofar por toda la tierra, diciendo: 

¡Oigan los hebreos!

4

 Y todo Israel oyó decir que Saúl había 

atacado  la  guarnición  de  los  filisteos,  y 

que  también  Israel  se  había  hecho  abo-

minable ante los filisteos. Y el pueblo fue 

convocado en Gilgal para seguir a Saúl.

5

 Y se reunieron los filisteos para guerrear 

contra  Israel:  treinta  mil°  carros  y  seis 

mil jinetes, y gente en multitud como la 

arena que está a la orilla del mar, los cua-

les subieron y acamparon en Micmás, al 

oriente de Bet-aven.

6

 Cuando los hombres de Israel se vieron 

en  peligro  (porque  el  pueblo  estaba  en 

grave  aprieto),  se  ocultaron  en  cuevas, 

en  matorrales,  entre  peñascos,  en  fosas 

y en cisternas.

7

 Y  algunos  de  los  hebreos  cruzaron  el 

Jordán hacia la tierra de Gad y de Galaad, 

pero Saúl estaba aún en Gilgal, y todo el 

pueblo iba tras él temblando.

8

 Y él esperó siete días, conforme al plazo 

que Samuel había fijado, pero Samuel no 

llegaba a Gilgal, y el pueblo desertaba.

9

 Entonces  dijo  Saúl:  Traedme  el  holo-

causto y las ofrendas de paz; y él mismo 

ofreció el holocausto.

10

 Cuando  acababa  de  inmolar  el  holo-

causto, he aquí Samuel que llegaba, y Saúl 

le salió al encuentro para bendecirlo.°

11

 Y  Samuel  le  dijo:  ¿Qué  has  hecho?  Y 

Saúl  respondió:  Ciertamente  vi  que  el 

pueblo desertaba, y que tú no llegabas en 

los días fijados, y que los filisteos estaban 

reunidos en Micmás,

12

 y  me  dije:  Los  filisteos  descenderán 

ahora  contra  mí  en  Gilgal,  y  yo  no  he 

apaciguado a YHVH. Así que me esforcé y 

ofrecí el holocausto.

13

 Y  Samuel  dijo  a  Saúl:  ¡Has  actuado 

neciamente!  No  has  guardado  el  man-

damiento  que  YHVH  tu  Dios  te  ordenó, 

pues ahora YHVH hubiera confirmado tu 

reino sobre Israel para siempre.

14

 Pero ahora tu reinado no será durade-

ro. YHVH ha buscado para sí un hombre 

según  su  corazón,  al  cual  YHVH  ha  de-

signado  como  caudillo  sobre  su  pueblo, 

porque tú no guardaste lo que YHVH te 

ordenó.

15

 Y Samuel se levantó y subió de Gilgal a 

Gabaa de Benjamín. Y Saúl pasó revista a 

la gente que se hallaba con él, como seis-

cientos hombres.

16

 Así pues, Saúl y su hijo Jonatán, y el 

pueblo  que  se  hallaba  con  ellos,  perma-

necían  en  Gabaa  de  Benjamín;  pero  los 

filisteos habían acampado en Micmás;

17

 y del campamento de los filisteos salió 

una avanzada en tres escuadrones: un es-

cuadrón se dirigió por el camino de Ofra 

hacia la tierra de Sual;

18

 el  otro  escuadrón  marchó  hacia  Bet-

jorón, y el tercer escuadrón marchó hacia 

el territorio que mira al valle de Zeboim, 

hacia el desierto.

19

 Ahora bien, en toda la tierra de Israel 

no  se  encontraba  ni  un  herrero,  porque 

los filisteos habían dicho: Que los hebreos 

no se hagan espadas ni lanzas.

20

 Así que todos los de Israel tenían que 

bajar a los filisteos para afilar su reja, su 

azadón, su hacha o su hoz.

21

 Y el precio de la limadura era un pim° 

por  la  reja  del  arado,  así  como  por  la 

13.1 El TM no registra el número de años. Prob. esta frase se refiere a la edad que Saúl tenía cuando empezó su reinado. Lit: 

tenía Saúl un año en su reinado, y dos años reino sobre Israel. Pero el significado es incomprensible, así que otras versiones 

proponen: Saúl tenía treinta años cuando comenzó a reinar, y reinó sobre Israel cuarenta y dos años. Pero, por otra parte, una 

antigua tradición atribuye a Saúl cuarenta años cuando comenzó su reinado. LXX omite este versículo. 

13.5 Sir. registran tres 

mil

13.10 

→Heb.7.7.  13.21 Esto es, dos tercios del siclo


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1 Samuel 14:20

297

azada, o por la horquilla, o por las hachas, 

o por el arreglo de una aguijada.

22

 De tal manera aconteció que el día de 

la batalla no se hallaba ni una espada ni 

una lanza en mano de ninguno de los del 

pueblo que estaban con Saúl y con Jona-

tán, excepto Saúl y su hijo Jonatán, que 

sí las tenían.

23

 Y un destacamento de los filisteos salió 

hacia el paso de Micmás.

Heroísmo de Jonatán 

Temeridad de Saúl

14

Aconteció pues, cierto día, que Jo-

natán ben Saúl dijo a su joven es-

cudero: Ven, pasemos al destacamento de 

los filisteos que está en aquel lado. Pero 

no lo informó a su padre.

2

 Y Saúl estaba en el límite de Gabaa, de-

bajo  del  granado  que  hay  en  Migrón,  y 

el pueblo que estaba con él era como de 

unos seiscientos hombres.

3

 Y  Ahías  ben  Ahitob,  hermano  de  Ica-

bod ben Finees, hijo de Elí, sacerdote de 

YHVH en Silo, llevaba el Éfod; y el pueblo 

no sabía que Jonatán se había ido.

4

 Y  entre  los  desfiladeros  por  donde  Jo-

natán intentaba cruzar hacia el destaca-

mento  de  los  filisteos,  había  un  peñón 

rocoso por un lado y un peñón rocoso del 

otro lado; uno de ellos se llamaba Bosés y 

el otro Sené.

5

 Un peñón se elevaba hacia el norte, fren-

te a Micmás, y el otro hacia el sur frente 

a Gabaa.

6

 Y Jonatán dijo a su joven escudero: Ven, 

pasemos a la guarnición de esos incircun-

cisos.  Quizá  YHVH  actúe  por  nosotros, 

porque para YHVH no hay impedimento 

en salvar con muchos o con pocos.

7

 Y su escudero le dijo: Haz todo lo que 

hay  en  tu  corazón;  pues  he  aquí  estoy 

contigo a tu voluntad.

8

 Y  Jonatán  respondió:  Mira:  llegaremos 

hasta  esos  hombres  y  nos  mostraremos 

ante ellos.

9

 Si nos dicen: ¡Estaos quietos hasta que os 

alcancemos!, entonces nos quedaremos en 

nuestro lugar y no subiremos a ellos.

10

 Pero  si  nos  dicen  así:  ¡Subid  a  noso-

tros!, entonces subiremos, porque YHVH 

los ha entregado en nuestra mano, y eso 

nos será por señal.

11

 Ambos pues se mostraron a la guarni-

ción de los filisteos, y los filisteos dijeron: 

¡Ahí están los hebreos saliendo de las cue-

vas en que estaban escondidos!

12

 Y los hombres del destacamento grita-

ron a Jonatán y a su escudero, y dijeron: 

¡Subid  a  nosotros,  y  os  haremos  saber 

una cosa! Y Jonatán dijo a su paje de ar-

mas: ¡Sube tras de mí porque YHVH los 

ha entregado en mano de Israel!

13

 Y  Jonatán  trepó  con  pies  y  manos,  y 

su escudero tras él. Y los que caían ante 

Jonatán, su escudero los remataba detrás 

de él.

14

 La primera matanza que hicieron Jo-

natán  y  su  escudero  fue  de  unos  veinte 

hombres en el espacio de una media yu-

gada de tierra.

15

 Y cundió el pánico en el campamento, 

en el campo, y entre toda la gente. Aun 

la guarnición y los de la avanzada se lle-

naron de pavor, y el país se estremeció y 

hubo un gran pánico.

16

 Y los atalayas de Saúl observaban desde 

Gabaa de Benjamín, y he aquí la multitud 

se agitaba, e iba de un lado a otro.

17

 Y dijo Saúl al pueblo que estaba con él: 

Pasad revista y mirad quién de los nues-

tros se ha ido. Entonces pasaron revista 

y vieron que faltaban Jonatán y su escu-

dero.

18

 Y  Saúl  dijo  a  Ahías:  Haz  trasladar  el 

Arca° de Dios. (Porque en ese tiempo el 

Arca  de  Dios  estaba  con  los  hijos  de  Is-

rael).

19

 Y mientras Saúl hablaba al sacerdote, 

el alboroto que había en el campamento 

de  los  filisteos  iba  aumentando  en  gran 

manera. Entonces Saúl dijo al sacerdote: 

¡Retira tu mano!°

20

 Y Saúl y todo el pueblo que estaba con 

él se movilizaron y llegaron a la batalla; 

y he aquí que la espada de cada uno° se 

había vuelto contra la de su compañero, y 

la turbación era muy grande.

14.18 LXX y la Versión Latina registran Éfod. Según estas versiones el v. queda: Y Saúl dijo a Ahías: Trae el Éfod, porque en 

aquellos días él llevaba el Éfod ante los hijos de Israel

14.19 Saúl deja inconclusa la consulta de la suerte 

→v.41.  14.20 Esto 

es, de los filisteos


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1 Samuel 14:21

298

21

 Y los hebreos que antes habían estado 

de parte de los filisteos, y habían subido 

con  ellos  al  campamento,  se  volvieron 

para incorporarse a los israelitas que es-

taban con Saúl y Jonatán.

22

 Asimismo  todos  los  israelitas  que  se 

habían escondido en la serranía de Efraín 

oyeron que los filisteos huían, y también 

ellos  se  unieron  para  perseguirlos  en  la 

batalla.

23

 Así YHVH salvó en aquel día a Israel. Y 

la batalla se extendió hasta Bet-aven.

24

 Pero  los  hombres  de  Israel  fueron 

puestos  en  apuros  aquel  día;  pues  Saúl 

había  conjurado  al  pueblo,  diciendo: 

¡Maldito aquel que coma alimento antes 

de anochecer, para que yo tome venganza 

de mis enemigos! Por lo cual ni uno del 

pueblo probó bocado.

25

 Y  todo  el  pueblo  llegó  a  un  bosque 

donde había miel sobre la superficie del 

suelo.

26

 Y  el  pueblo  entró  en  el  bosque,  y  he 

aquí  que  destilaba  miel,  pero  no  hubo 

quien acercara la mano a la boca, pues el 

pueblo temía al juramento.

27

 Pero Jonatán no había oído cuando su 

padre conjuró al pueblo, por lo cual ex-

tendió la punta de una vara que tenía en 

la mano, y la metió en un panal de miel 

y se llevó la mano a la boca, y sus ojos se 

le aclararon.

28

 Entonces uno del pueblo habló, y dijo: 

Tu padre conjuró expresamente al pueblo, 

diciendo: ¡Maldito el que hoy coma pan! Y 

el pueblo desfallecía.

29

 Y respondió Jonatán: Mi padre ha tur-

bado al país. ¡Mirad cómo mis ojos brillan 

por haber probado un poco de esta miel!

30

 ¿Cuánto más si el pueblo hubiera hoy 

comido  libremente  del  despojo  que  ha-

lló de sus enemigos? ¿No hubiera habido 

una matanza mucho mayor entre los fi-

listeos?

31

 Aquel día derrotaron a los filisteos des-

de Micmás hasta Ajalón, pero el pueblo se 

cansó mucho.

32

 Luego el pueblo se arrojó° sobre el des-

pojo, y tomaron ovejas y vacas y becerros, 

y los degollaron en tierra; y el pueblo los 

comió con la sangre.

33

 Y avisaron a Saúl, diciendo: ¡He aquí el 

pueblo peca contra YHVH comiendo con 

la sangre! Y él respondió: Habéis sido in-

fieles; haced rodar hacia aquí una piedra 

grande hoy.

34

 Después  Saúl  añadió:  Dispersaos  en-

tre  el  pueblo,  y  decidles  que  cada  uno 

me  traiga  su  buey,  y  cada  uno  su  oveja, 

y degolladlos aquí, para que comáis y no 

pequéis  contra  YHVH  comiendo  con  la 

sangre.  Y  aquella  noche  todo  el  pueblo 

llevó su buey, cada uno personalmente,° y 

los degollaron allí.

35

 Y  Saúl  erigió  un  altar  a  YHVH,  el 

cual altar fue el primero que él edificó a 

YHVH.

36

 Luego  Saúl  dijo:  Bajemos  de  noche 

contra  los  filisteos,  y  tomemos  de  ellos 

despojos  hasta  el  amanecer,°  y  no  deje-

mos de ellos ni un hombre. Y ellos dije-

ron: Haz todo lo que sea bueno ante tus 

ojos. Pero el sacerdote dijo: Acerquémo-

nos aquí ante Dios.

37

 Y Saúl consultó a ’Elohim: ¿Debo ba-

jar contra los filisteos? ¿Los entregarás en 

mano de Israel? Pero no le dio respuesta 

aquel día.

38

 Entonces  Saúl  dijo:  Acercaos  aquí, 

todos  vosotros  principales  del  pueblo,  y 

averiguad y ved por quien se ha cometido 

este pecado hoy,

39

 pues  ¡vive  YHVH,  Salvador  de  Israel, 

que  aunque  esté  en  mi  hijo  Jonatán,  de 

cierto él morirá! Pero en todo el pueblo 

no hubo quien le contestara.

40

 Dijo luego a todo Israel: Vosotros esta-

réis a un lado, y yo y mi hijo Jonatán esta-

remos a otro lado. Y el pueblo respondió a 

Saúl: Haz lo que bien te parezca.

41

 Y dijo Saúl a YHVH: ¡Oh Dios de Israel, 

da suerte perfecta!° Y Jonatán y Saúl fue-

ron tomados por suertes, mientras que el 

pueblo quedó fuera.

42

 Y Saúl dijo: Echad suertes entre mí y 

mi hijo Jonatán. Y fue tomado Jonatán.

43

 Entonces  Saúl  dijo  a  Jonatán:  Declá-

rame  lo  que  has  hecho.  Y  Jonatán  se  lo 

14.32 El TM registra el verbo hacer, pero hay una anotación para la lectura (Heb. qeré) que indica el verbo arrojarse.  14.34 Lit. 

por su mano

14.36 Lit. luz de la mañana.  14.41 LXX: concede lo evidente. VUL: da un indicio. Algunos traductores leen Tumim 

en lugar de tamim (perfecto). 


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1 Samuel 15:16

299

declaró,  y  dijo:  Ciertamente  gusté  un 

poco de miel con la punta de la vara que 

llevaba en mi mano; ¿y he de morir?

44

 Y Saúl respondió: ¡Así me haga ’Elohim 

y  aún  me  añada,  que  sin  duda  morirás, 

Jonatán!

45

 Pero el pueblo dijo a Saúl: ¿Ha de mo-

rir Jonatán, que ha hecho esta gran libe-

ración  en  Israel?  ¡Que  no  sea  así!  ¡Vive 

YHVH que no caerá a tierra ni un cabello 

de su cabeza, pues con ayuda de ’Elohim 

ha actuado en este día! Así el pueblo libró 

a Jonatán, y éste no murió.

46

 En  seguida  Saúl  dejó  de  perseguir  a 

los filisteos, y los filisteos se fueron a su 

lugar.

47

 Así Saúl asumió el reino sobre Israel, 

y combatió a todos sus enemigos en de-

rredor: contra Moab, contra los hijos de 

Amón, contra Edom, contra los reyes de 

Sobá  y  contra  los  filisteos.  Dondequiera 

que iba, vencía.

48

 Y formó un ejército, y destruyó a Ama-

lec, y libró a Israel de mano de los que lo 

asolaban.

49

 Los hijos de Saúl fueron Jonatán, Isuí 

y Malquisúa; y los nombres de sus dos hi-

jas eran: el nombre de la mayor, Merab, y 

el nombre de la menor, Mical.

50

 El  nombre  de  la  mujer  de  Saúl  era 

Ahinoam, hija de Aimaas. Y el nombre del 

capitán de su ejército era Abner ben Ner, 

tío de Saúl.

51

 Porque Cis, padre de Saúl, y Ner, padre 

de Abner, eran hijos de Abiel.

52

 Y  todos  los  días  de  Saúl  hubo  dura 

guerra contra los filisteos, y cuando Saúl 

veía algún hombre valiente o algún hom-

bre fuerte, lo tomaba para sí.

Desobediencia de Saúl

15

Samuel dijo a Saúl: YHVH me en-

vió a que te ungiera por rey sobre 

su pueblo, sobre Israel. Por tanto escucha 

ahora la voz de las palabras de YHVH.

2

 Así  dice  YHVH  Sebaot:  Me  acuerdo  de 

lo que Amalec hizo a Israel: cómo se in-

terpuso en el camino cuando salieron de 

Egipto.

3

 Ve  ahora  y  ataca  a  Amalec;  consagrad 

al  exterminio  todo  lo  suyo  sin  tenerle 

compasión. Harás morir desde el hombre 

hasta la mujer, desde el niño hasta el lac-

tante, a buey y oveja, camello y asno.

4

 Convocó pues Saúl al pueblo, y le pasó 

revista  en  Telaim:  Doscientos  mil  infan-

tes, y diez mil hombres de Judá.

5

 Y Saúl fue a la ciudad de Amalec, y se 

puso al acecho en el valle.

6

 Y dijo Saúl a los ceneos: Apartaos de en-

tre los amalecitas para que no os destruya 

juntamente con ellos, por cuanto hicisteis 

misericordia con todos los hijos de Israel 

cuando salieron de Egipto. Y el ceneo se 

apartó de en medio de Amalec.

7

 Y Saúl derrotó a los amalecitas desde Ha-

vilá hasta llegar a Shur, frente a Egipto.

8

 Y capturó vivo a Agag, rey de Amalec, y 

exterminó a todo el pueblo a filo de espada.

9

 Pero  Saúl  y  el  pueblo  dejaron  vivo  a 

Agag,  y  no  quisieron  destruir  lo  mejor 

de las ovejas, y de la vacada, y de los ani-

males engordados, y de los carneros, y de 

todo lo bueno; solamente destruyeron lo 

inservible y sin valor.

10

 Entonces  vino  palabra  de  YHVH  a 

Samuel, diciendo:

11

 Me pesa haber designado a Saúl como 

rey,  porque  ha  dejado  de  seguirme,  y 

no  ha  cumplido  mis  mandamientos.  Y 

Samuel se apesadumbró, y clamó a YHVH 

toda aquella noche.

12

 Y madrugó Samuel para ir al encuen-

tro  de  Saúl  por  la  mañana;  y  fue  dado 

aviso  a  Samuel,  diciendo:  Saúl  llegó  al 

Carmelo,  y  he  aquí  se  erigió  un  monu-

mento,  y  después  volviendo,  ha  pasado 

bajando a Gilgal.

13

 Entonces  Samuel  fue  a  Saúl,  y  Saúl 

le  dijo:  ¡Bendito  seas  tú  de  YHVH!°  ¡He 

cumplido el mandato de YHVH!

14

 Pero Samuel le respondió: ¿Entonces qué 

es ese balido de ovejas que hay en mis oídos, 

y el mugido de vacas que estoy oyendo?

15

 Y Saúl dijo: Los han traído de los ama-

lecitas,  porque  el  pueblo  dejó  aparte  lo 

mejor  de  las  ovejas  y  de  las  vacas,  para 

sacrificarlas a YHVH tu Dios; pero hemos 

destruido el resto totalmente.

16

 Samuel respondió a Saúl: Detente, y te 

declararé lo que YHVH me ha dicho ano-

che. Entonces él le respondió: Habla.

15.13 Saúl insiste en bendecir a Samuel. 

→He.7.7.


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1 Samuel 15:17

300

17

 Samuel le dijo: Aunque eras pequeño 

ante tus propios ojos, ¿no eres cabeza de 

las tribus de Israel? Y YHVH te ha ungido 

por rey sobre Israel,

18

 y YHVH te confió una misión, y dijo: 

Ve, y extermina por completo a los peca-

dores, a Amalec, y haz guerra contra ellos 

hasta que los acaben.

19

 ¿Por  qué  entonces  no  escuchaste  la 

voz de YHVH, y te has precipitado sobre 

el botín, y has hecho lo malo ante los ojos 

de YHVH?

20

 Y Saúl respondió a Samuel: Al contra-

rio,  he  obedecido  la  voz  de  YHVH,  y  fui 

por el camino que YHVH me envió, y he 

traído a Agag, rey de Amalec, y he destrui-

do por completo a los amalecitas.

21

 Pero el pueblo ha tomado ovejas y vacas 

del despojo, las primicias del anatema,° para 

sacrificarlas a YHVH tu Dios en Gilgal.

22

 Y  respondió  Samuel:  ¿Se  complace 

YHVH en holocaustos y sacrificios, como 

en  la  obediencia  a  la  voz  de  YHVH?  He 

aquí, el obedecer es mejor que los sacrifi-

cios, y el prestar atención es mejor que la 

grosura de los carneros.

23

 Porque como pecado de adivinación es 

la rebeldía, y como la idolatría y el culto 

de  imágenes  la  obstinación.  Puesto  que 

has  rechazado  la  palabra  de  YHVH,  Él 

también te ha rechazado como rey.

24

 Y Saúl respondió a Samuel: He pecado; 

ciertamente he transgredido el dicho de 

YHVH y tus palabras, porque temí al pue-

blo y obedecí la voz de ellos.

25

 Y ahora te ruego que cargues con mi 

pecado y vuelvas conmigo para que pueda 

postrarme ante YHVH.

26

 Y Samuel dijo a Saúl: No volveré contigo, 

porque has rechazado la palabra de YHVH, y 

YHVH te ha rechazado como rey de Israel.

27

 Entonces,  cuando  Samuel  se  volvía 

para irse, él se aferró del extremo de su 

manto, y éste se rasgó.

28

 Y  Samuel  le  dijo:  ¡YHVH  ha  rasgado 

hoy de ti el reino de Israel, y lo ha dado a 

un prójimo tuyo mejor que tú!

29

 Además,  la  Gloria  de  Israel  no  mien-

te ni se arrepiente, porque no es hombre 

para que se arrepienta.

30

 Y él dijo: He pecado; pero te ruego que 

me honres ahora ante los ancianos de mi 

pueblo y ante Israel, y regreses conmigo 

para que pueda postrarme ante YHVH tu 

Dios.

31

 Volvió, pues, Samuel tras Saúl, y Saúl 

se postró ante YHVH.

32

 Luego  Samuel  dijo:  ¡Traedme  a  Agag 

rey de Amalec! Y aunque Agag iba a él en-

cadenado,° Agag se decía: ¡De seguro ya 

ha pasado la amargura de la muerte!

33

 Pero  Samuel  dijo:  Como  tu  espada 

dejó a mujeres sin hijos, así tu madre es-

tará sin hijo entre las mujeres. Y Samuel 

degolló a Agag en presencia de YHVH en 

Gilgal.

34

 Luego Samuel fue a Ramá, y Saúl su-

bió a su casa en Gabaa de Saúl.

35

 Y Samuel nunca más volvió a ver a Saúl 

hasta el día de su muerte. Pero Samuel la-

mentaba a Saúl, porque a YHVH le pesaba 

haber hecho reinar a Saúl sobre Israel.

David

16

YHVH dijo a Samuel: ¿Hasta cuán-

do lamentarás por Saúl, si Yo lo he 

rechazado  como  rey  de  Israel?  Llena  tu 

cuerno con aceite, y ve, que Yo te enviaré 

a Isaí betlemita, porque de entre sus hijos 

me he provisto rey.

2

 Y  Samuel  dijo:  ¿Cómo  iré?  ¡Si  Saúl  se 

entera me matará! Pero YHVH dijo: Toma 

contigo una becerra de la vacada, y di: He 

venido a sacrificar a YHVH.

3

 E  invitarás  a  Isaí  al  sacrificio,  y  Yo  te 

haré saber lo que has de hacer, y ungirás 

al que Yo te diga.

4

 E hizo Samuel lo que le había hablado 

YHVH. Y llegando a Bet-léhem los ancia-

nos  de  la  ciudad  salieron  temblorosos  a 

su encuentro, y preguntaron: ¿Es pacífica 

tu venida?

5

 Y  él  dijo:  ¡Paz!  He  venido  para  ofrecer 

sacrificio  a  YHVH.  Purificaos  vosotros  y 

venid conmigo al sacrificio. Después pu-

rificó a Isaí con sus hijos y los invitó al 

sacrificio.

6

 Y sucedió que cuando ellos llegaron, vio 

a Eliab, y se dijo: ¡Ciertamente su ungido 

está delante de YHVH!

15.21 Esto es, lo consagrado al exterminio.  15.32 Heb. maadanot = cadenas, ligaduras. Si se sigue fielmente el TM, y se acepta 

la anotación de la masorah y la referencia de Job 38.31, Agag no se acercó a Samuel alegremente sino atado como las mismas 

Pléyades.


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1 Samuel 17:8

301

7

 Pero YHVH dijo a Samuel: No mires su 

aspecto, ni a lo grande de su estatura, por-

que lo he rechazado, porque° Yo no miro 

como mira el hombre, porque el hombre 

mira lo que hay ante sus ojos, pero YHVH 

mira el corazón.

8

 Entonces  Isaí  llamó  a  Abinadab,  y  lo 

hizo pasar delante de Samuel, el cual dijo: 

Tampoco a éste ha elegido YHVH.

9

 Luego Isaí hizo pasar a Samá. Y él dijo: 

Tampoco a éste ha elegido YHVH.

10

 Así hizo pasar Isaí a sus siete hijos de-

lante de Samuel, pero Samuel dijo a Isaí: 

YHVH no ha elegido a éstos.

11

 Y preguntó Samuel a Isaí: ¿Han termi-

nado de pasar° los jóvenes? Y él respondió: 

Queda el menor, y he aquí está pastorean-

do el rebaño. Y dijo Samuel a Isaí: Envía 

por él, porque no nos reclinaremos° hasta 

que él venga aquí.

12

 Envió pues y lo hizo venir; y él era ru-

bio, de ojos vivaces y aspecto gallardo. Y 

dijo  YHVH:  ¡Levántate  y  úngelo,  porque 

éste es!

13

 Samuel  entonces  tomando  el  cuerno 

del aceite, lo ungió en medio de sus her-

manos, y el Espíritu de YHVH se apoderó° 

de  David  desde  aquel  día  en  adelante.  Y 

Samuel se levantó y se fue a Ramá.

14

 Y  el  Espíritu  de  YHVH  se  apartó  de 

Saúl, y un espíritu malo de parte de YHVH 

lo aterrorizaba.

15

 Y  los  siervos  de  Saúl  le  dijeron:  He 

aquí,  un  espíritu  malo  de  parte  de  Dios 

te atormenta.

16

 Ordene nuestro señor a tus siervos que 

están ante ti, que busquen un varón que 

sepa tañer el arpa; y acontecerá que cuan-

do te acometa el mal espíritu de parte de 

Dios,  tañerá  con  su  mano  y  te  pondrás 

bien.

17

 Y  Saúl  respondió  a  sus  siervos:  ¡Bus-

cadme ahora un hombre que sepa tañer 

bien, y traédmelo!

18

 Y uno de los jóvenes respondió, y dijo: 

He aquí, he visto a un hijo de Isaí betlemi-

ta, que sabe tañer, y es poderoso y valiente, 

y hombre de guerra, discreto en el hablar y 

de buen parecer, y YHVH está con él.

19

 Y  Saúl  envió  mensajeros  a  Isaí,  y  le 

dijo: Envíame a tu hijo David, el que está 

con el rebaño.

20

 E Isaí tomó un asno cargado de pan, 

un odre de vino y un cabrito del rebaño, 

y  los  envió  a  Saúl  por  medio  de  su  hijo 

David.

21

 Y David fue a Saúl, y se quedó con él, y 

llegó a estimarlo grandemente, y lo hizo 

su escudero.

22

 Y  Saúl  envió  a  decir  a  Isaí:  Te  ruego 

que David se quede delante de mí, pues ha 

hallado gracia ante mis ojos.

23

 Y cuando el espíritu de parte de Dios 

acometía  a  Saúl,  David  tomaba  el  arpa 

y la tañía con su mano, y Saúl se sentía 

aliviado y mejoraba, y el mal espíritu se 

apartaba de él.

Goliat

17

Los  filisteos  reunieron  sus  tropas 

para  la  guerra,  y  se  concentraron 

en Soco, que pertenece a Judá, y acampa-

ron entre Soco y Azeca, en Efes-damim.

2

 Y  Saúl  y  los  hombres  de  Israel  se  re-

unieron y acamparon en el valle de Ela, y 

dispusieron batalla contra los filisteos.

3

 Los filisteos estaban a un lado sobre una 

colina, y los de Israel al otro lado sobre 

otra colina, y el valle estaba entre ellos.

4

 Y  de  entre  el  campamento  de  los  filis-

teos salió un retador° llamado Goliat, de 

Gat,  cuya  altura  era  de  seis  codos  y  un 

palmo.°

5

 Llevaba un yelmo de bronce en la cabe-

za, e iba vestido con una cota de malla de 

bronce que pesaba cinco mil siclos.°

6

 Sobre sus piernas llevaba grebas de hie-

rro,  y  una  jabalina  de  bronce  entre  sus 

hombros.

7

 El asta de su lanza era como un rodillo 

de tejedores, y la punta de su lanza tenía 

seiscientos siclos° de hierro, y el escudero 

iba delante de él.

8

 Y se paró y gritó a las filas de Israel, di-

ciéndoles: ¿Por qué habéis salido a pone-

ros en orden de batalla? ¿Acaso no soy yo 

filisteo y vosotros siervos de Saúl? ¡Esco-

geos un varón que venga contra mí!

16.7  El TM  omite  la  frase  lo  que  mira  Dios.  LXX:  pues  no  lo  que  mira  el  hombre  es  lo  que  mira  Dios.  16.11  .de  pasar

16.11 Esto es, sentarse a la mesa para comer.  16.13 Heb: Titslaj-el = se apoderó de

→1 S.10.10; Jue.16.6.  17.4 El vocablo 

original (ha-benaim) hace referencia al espacio que hay entre dos ejércitos, y por ende al hombre que salía a retar o desafiar al 

otro ejército. 

17.4 Esto es, 2,92 m.  17.5 Esto es, 57 Kg.  17.7 Esto es, casi 7 Kg


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1 Samuel 17:9

302

9

 Si es capaz de guerrear conmigo y matar-

me, entonces seremos vuestros siervos, pero 

si yo lo venzo y lo mato, entonces vosotros 

seréis nuestros siervos y nos serviréis.

10

 Y añadió el filisteo: ¡Hoy yo afrento al 

ejército de Israel! ¡Dadme un varón que 

luche contra mí!

11

 Cuando Saúl y todos los de Israel oye-

ron las palabras del filisteo, se acobarda-

ron y tuvieron mucho temor.

12

 Ahora bien, David era hijo de un hom-

bre  efrateo  de  Bet-léhem  de  Judá,  cuyo 

nombre era Isaí, el cual tenía ocho hijos. 

En tiempos de Saúl, este hombre era ya 

anciano, de edad muy avanzada.

13

 Y los tres hijos mayores de Isaí habían 

ido con Saúl a la guerra. Los nombres de 

los tres hijos que habían ido a la guerra 

eran: Eliab, el primogénito, Abinadab, el 

segundo, Samma, el tercero,

14

 y David era el menor. Fueron pues los 

tres mayores en pos de Saúl,

15

 pero David se había apartado de Saúl y 

había vuelto a apacentar el rebaño de su 

padre en Bet-léhem.

16

 Y° el filisteo se aproximaba y se plan-

taba allí mañana y tarde, y así lo hizo du-

rante cuarenta días.

17

 E Isaí dijo a su hijo David: Lleva ahora 

a tus hermanos un efa de este grano tos-

tado y estos diez panes y corre, llévaselo a 

tus hermanos en el campamento,

18

 juntamente con estos diez quesos de leche 

para el jefe de mil, y comprueba si tus her-

manos están bien, y toma prenda de ellos,

19

 pues Saúl y ellos, y todos los hombres 

de Israel están luchando contra los filis-

teos en el valle de Ela.

20

 Y madrugó David a la mañana siguien-

te,  y  dejando  el  rebaño  al  cuidado  de  un 

pastor, cargó y partió, tal como Isaí le ha-

bía mandado, y llegó al atrincheramiento 

en momentos en que el ejército estaba sa-

liendo al frente y dando el grito de batalla.

21

 E Israel y los filisteos se habían colo-

cado en orden de batalla ejército contra 

ejército.

22

 Y David dejó su carga junto al guardián 

del bagaje y corrió al frente de batalla, y 

entró a saludar a sus hermanos.

23

 Y  cuando  conversaba  con  ellos,  he 

aquí que el retador llamado Goliat el fi-

listeo, natural de Gat, salió de las filas de 

los filisteos y habló las mismas palabras, 

y David las oyó.

24

 Y todos los hombres de Israel, cuando 

veían a aquel hombre, huían de él aterro-

rizados.

25

 Y los hombres de Israel se decían: ¿Ha-

béis visto a este hombre que sube? Cier-

tamente sube para afrentar a Israel, y será 

que el varón que lo mate, el rey lo enri-

quecerá  con  grandes  riquezas,  y  le  dará 

su hija, y hará la casa de su padre libre de 

tributos en Israel.

26

 Y preguntó David a los varones que es-

taban junto a él, diciendo: ¿Qué se hará 

al varón que mate a ese filisteo y quite la 

afrenta  de  Israel?  Porque  ¿quién  es  este 

filisteo incircunciso para que afrente a los 

escuadrones del Dios viviente?

27

 Y la gente le respondió de aquella ma-

nera,  diciendo:  Así  se  hará  al  varón  que 

lo mate.

28

 Pero Eliab, su hermano mayor, lo oyó 

hablar con aquellos varones, y se encendió 

la ira de Eliab contra David, y dijo: ¿Para 

qué has venido? ¿Con quién dejaste esas 

pocas ovejas en el desierto? ¡Yo conozco 

tu presuntuosidad y la malicia de tu cora-

zón, que has venido para ver la batalla!

29

 David  respondió:  ¿Qué  he  hecho  yo 

ahora? ¿No fue sólo una pregunta?

30

 Y  se  apartó  de  su  lado  hacia  otro,  y 

preguntó  de  igual  manera,  y  la  gente  le 

respondió lo mismo que antes.

31

 Y cuando fueron oídas las palabras di-

chas  por  David,  se  las  refirieron  a  Saúl, 

quien lo hizo llamar.

32

 Y David dijo a Saúl: No desfallezca el co-

razón de ningún hombre por causa de él. 

Tu siervo irá y peleará contra ese filisteo.

33

 Pero  Saúl  respondió  a  David:  No  po-

drás ir contra ese filisteo para pelear con-

tra él, porque tú eres un muchacho, y él 

es hombre de guerra desde su juventud.

34

 Pero David respondió a Saúl: Tu siervo 

es  pastor  de  las  ovejas  de  su  padre,  y  si 

viene  un  león  o  un  oso  y  se  lleva  algún 

cordero del rebaño,

17.16 Este v. debe leerse a continuación del v. 11.


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1 Samuel 18:3

303

35

 salgo tras él, y lo apaleo y se lo quito 

de la boca, y si me ataca, lo agarro por la 

quijada y lo golpeo hasta matarlo.

36

 Sea  león  o  sea  oso,  tu  siervo  los  ha 

matado,  y  este  filisteo  incircunciso  será 

como uno de ellos, porque ha desafiado a 

los escuadrones del Dios viviente.

37

 Y añadió David: YHVH, quien me ha li-

brado de la garra del león y de la garra del 

oso, Él también me librará de la mano de 

este filisteo. Entonces Saúl dijo a David: 

Ve, y YHVH sea contigo.

38

 Y Saúl hizo vestir a David con sus pro-

pias vestiduras, y le puso un yelmo de bron-

ce en su cabeza, y lo armó de una coraza;

39

 y  sobre  la  armadura  le  ciñó  su  pro-

pia  espada.  David  intentó  andar,  porque 

nunca había hecho la prueba. Luego dijo 

David  a  Saúl:  Con  esto  no  puedo  andar, 

porque no estoy entrenado. Y David echó 

de sí aquellas cosas,

40

 y tomando su cayado en la mano, esco-

gió cinco cantos del arroyo, se los echó al 

zurrón, al saco pastoril que traía, y empu-

ñando su honda se acercó al filisteo.

41

 Y  el  filisteo  caminaba  acercándose  a 

David, y su escudero iba delante de él.

42

 Cuando el filisteo miró en derredor y 

vio a David, lo despreció, porque era un 

mozalbete rubio y bien parecido.

43

 Y el filisteo preguntó a David: ¿Soy yo 

acaso un perro para que vengas a mí con 

palos? Y el filisteo maldijo a David invo-

cando a su dios.

44

 Y el filisteo dijo a David: ¡Ven a mí, que 

daré tu carne a las aves de los cielos y a las 

bestias del campo!

45

 Entonces  David  respondió  al  filisteo: 

Tú  vienes  contra  mí  con  espada  y  lan-

za y jabalina, pero yo voy contra ti en el 

nombre de YHVH Sebaot, el Dios de los 

escuadrones de Israel, a quien tú has pro-

vocado.

46

 Hoy YHVH te entregará en mi mano, 

y  yo  te  heriré,  y  te  cortaré  la  cabeza,  y 

entregaré la carroña del campamento de 

los filisteos a las aves de los cielos y a las 

bestias de la tierra, para que toda la tierra 

sepa que hay ’Elohim en Israel,

47

 y  toda  esta  gente  sepa  que  YHVH  no 

salva con la espada y la lanza, por cuanto 

esta batalla es de YHVH, y Él os entregará 

en nuestra mano.

48

 Y sucedió que cuando el filisteo se puso 

en marcha para ir al encuentro de David, 

se apresuró David a correr hacia la línea 

de batalla, al encuentro del filisteo.

49

 Y  metiendo  David  su  mano  en  el  zu-

rrón,  sacó  de  allí  una  piedra  y  la  arrojó 

con la honda, e hirió al filisteo en la fren-

te, y la piedra quedó hincada en su frente, 

y él cayó sobre su rostro en tierra.

50

 Así  David  prevaleció  sobre  el  filisteo 

con la honda y con la piedra, pues hirió al 

filisteo y lo mató, pero no había espada en 

mano de David.

51

 Por lo cual corrió David, y poniéndose 

en pie sobre el filisteo, tomó su espada, la 

sacó de su vaina, y lo mató, y con ella le 

cortó la cabeza. Y los filisteos, viendo que 

su paladín había muerto, huyeron.

52

 Entonces  los  hombres  de  Israel  y  de 

Judá se levantaron, gritaron y persiguie-

ron a los filisteos hasta llegar a Gat y a las 

puertas de Ecrón. Y los caídos de entre los 

filisteos yacían por el camino de Saraim, 

hasta Gat y hasta Ecrón.

53

 Y  los  hijos  de  Israel  se  volvieron  de 

perseguir a los filisteos, y saquearon sus 

campamentos.

54

 Y tomó David la cabeza del filisteo y la 

llevó a Jerusalem, pero las armas de él las 

puso en su propia tienda.

55

 Cuando Saúl vio a David que salía a en-

contrarse con el filisteo, había dicho a Ab-

ner, capitán del ejército: Abner, ¿de quién 

es hijo ese muchacho? Y Abner respondió:

56

 ¡Vive tu alma, oh rey, que no lo sé! Y el 

rey dijo: Averigua tú de quién es hijo ese 

muchacho.

57

 Y al volver David de matar al filisteo, 

Abner lo tomó y lo llevó delante de Saúl, 

con la cabeza del filisteo en su mano.

58

 Y  le  preguntó  Saúl:  Joven,  ¿de  quién 

eres hijo? Y David respondió: Soy hijo de 

tu siervo Isaí de Bet-léhem.

Jonatán, David y Saúl

18

Cuando  acabó  de  hablar  a  Saúl, 

aconteció  que  el  alma  de  Jonatán 

quedó ligada al alma de David, y Jonatán 

lo amó como a su propia alma.

2

 Aquel día Saúl lo retuvo y no lo dejó vol-

ver a casa de su padre.

3

 Y Jonatán concertó un pacto con David 

porque lo amaba como a su propia alma.


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1 Samuel 18:4

304

4

 Y Jonatán se quitó el manto que vestía y 

se lo dio a David con sus ropas militares, 

incluyendo su espada, su arco y su tala-

barte.

5

 Y adondequiera lo enviaba Saúl, David 

salía  y  se  manejaba  con  prudencia,  de 

modo que Saúl lo puso al mando de los 

hombres de guerra, y fue acepto ante los 

ojos de todo el pueblo, e igualmente ante 

los ojos de los siervos de Saúl.

6

 Pero sucedió que cuando ellos regresa-

ron, al volver David de la matanza de los 

filisteos, las mujeres de todas las ciudades 

de Israel salieron cantando y danzando a 

recibir al rey Saúl con cánticos de júbilo, 

panderos e instrumentos musicales.

7

 Y danzando, las mujeres cantaban y de-

cían:

Saúl hirió a sus miles,

Y David a sus diez miles.

8

 Y Saúl se indignó en gran manera, pues 

ese dicho le pareció malo ante sus ojos, y 

dijo: A David le dan diez miles y a mí me 

dan miles. ¡No le falta sino el reino!

9

 Y desde aquel día Saúl no miró con bue-

nos ojos a David.

10

 Al día siguiente, aconteció que un mal 

espíritu  de  parte  de  Dios  se  apoderó  de 

Saúl, quien desvariaba furioso en su casa, 

y  David  tañía  con  su  mano,  como  solía 

hacerlo día a día, y Saúl tenía su lanza en 

su mano.

11

 Y Saúl arrojó la lanza, diciéndose: ¡Cla-

varé a David contra la pared! Pero David 

lo esquivó dos veces.

12

 Y  Saúl  tuvo  temor  de  David,  porque 

YHVH estaba con él, y se había apartado 

de Saúl.

13

 Por tanto Saúl lo apartó de su presen-

cia y lo designó jefe de mil hombres. Y él 

salía y entraba al frente de la tropa.

14

 Y en todos sus caminos David se con-

ducía prudentemente, y YHVH estaba con 

él.

15

 Y al ver Saúl que él procedía con gran 

prudencia, tuvo temor a causa de él.

16

 Pero todo Israel y Judá amaban a Da-

vid, porque él salía y entraba en presencia 

de ellos.

17

 Y  Saúl  dijo  a  David:  He  aquí  Merab, 

mi hija mayor. A ella te la daré por mu-

jer, con tal que me seas un guerrero va-

liente peleando las batallas de YHVH. Por 

cuanto Saúl se decía: Que mi mano no sea 

contra él, sino que la mano de los filisteos 

sea contra él.

18

 Y respondió David a Saúl: ¿Quién soy 

yo,  y  qué  es  mi  vida,  o  la  familia  de  mi 

padre en Israel, para que yo sea yerno del 

rey?

19

 Pero sucedió que llegado el momento 

de entregar a Merab, hija de Saúl, a Da-

vid, ella fue entregada por mujer a Adriel 

meholatita.

20

 Y Mical, hija de Saúl, amaba a David, 

y se lo refirieron a Saúl, y le pareció bien 

el asunto.

21

 Y Saúl se dijo: Se la daré, para que ella 

le sea por lazo, y la mano de los filisteos 

sea contra él. Por lo cual dijo Saúl a David 

por segunda vez: Hoy serás mi yerno.

22

 Y  ordenó  Saúl  a  sus  siervos:  Hablad 

discretamente a David, y decidle: He aquí 

el rey se complace en ti, y todos sus sier-

vos te aman. ¡Hazte pues yerno del rey!

23

 Y  los  siervos  de  Saúl  hablaron  estas 

palabras  a  oídos  de  David.  Y  respondió 

David: ¿Os parece cosa sencilla a vosotros 

hacerse yerno del rey? Yo soy un hombre 

pobre y de baja condición.

24

 Y  le  refirieron  eso  a  Saúl  sus  siervos 

diciéndole: David ha hablado conforme a 

estas palabras.

25

 Y dijo Saúl: Así diréis a David: No desea 

el rey dote alguna, sino cien prepucios de 

filisteos, para ser vengado de los enemi-

gos del rey (pues Saúl deseaba hacer caer 

a David en manos de los filisteos).

26

 Y cuando sus siervos dijeron a David ta-

les palabras, agradó a David ser yerno del 

rey; y antes que el plazo se cumpliera,

27

 se levantó David y partió con sus hom-

bres  y  mató  a  doscientos  varones  de  los 

filisteos. Luego David llevó sus prepucios 

y los entregó todos al rey para poder ser 

yerno del rey; y Saúl le dio por mujer a su 

hija Mical.

28

 Al  ver  esto,  Saúl  comprendió  que 

YHVH estaba con David; y Mical hija de 

Saúl lo amaba.

29

 Y aumentó el temor de Saúl hacia David; 

y Saúl fue hostil a David todos los días.

30

 Y  los  príncipes  de  los  filisteos  conti-

nuaron saliendo a la guerra, y sucedía que 

cada vez que lo hacían, David actuaba en 

las  batallas  mejor  que  cualquiera  de  los 


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1 Samuel 19:23

305

siervos de Saúl, de modo que su nombre 

llegó a cobrar mucha fama.

Saúl atenta contra David

19

Saúl dijo a su hijo Jonatán y a to-

dos sus siervos que dieran muerte 

a David; pero Jonatán ben Saúl amaba a 

David en gran manera.

2

 Y  habló  Jonatán  a  David,  diciendo:  Mi 

padre Saúl procura matarte. Te ruego, ten 

cuidado por la mañana, quédate en un lu-

gar secreto y escóndete.

3

 Y yo saldré y me pondré junto a mi padre 

en el campo donde tú estés, y yo hablaré 

de ti a mi padre, y veré qué responde, y te 

lo haré saber.

4

 Y Jonatán habló bien de David a su pa-

dre Saúl, y le dijo: No peque el rey contra 

su siervo, contra David, pues él no ha pe-

cado contra ti, y ha obrado muy bien para 

contigo,

5

 por cuanto él puso su vida en la palma de 

su mano y mató al filisteo, y YHVH otorgó 

una gran victoria a todo Israel. Tú lo viste 

y te alegraste de ello. ¿Por qué entonces 

quieres pecar contra sangre inocente ma-

tando a David sin causa alguna?

6

 Y escuchó Saúl la voz de Jonatán, y juró 

Saúl: ¡Vive YHVH que no será muerto!

7

 Y Jonatán llamó a David y le contó todas 

esas cosas; y él mismo llevó a David ante 

Saúl, y estuvo delante de él como en días 

anteriores.

8

 Y  estalló  nuevamente  la  guerra,  y  Da-

vid  salió  y  combatió  contra  los  filisteos, 

y los mató con gran matanza, y huyeron 

delante de él.

9

 Pero el espíritu malo de parte de YHVH 

vino otra vez° sobre Saúl estando él sen-

tado en su casa con su lanza en la mano, 

mientras David tañía con la mano.

10

 Y  procuró  Saúl  clavar  con  la  lanza  a 

David en la pared, pero él se escurrió ante 

Saúl, y la lanza se clavó en la pared, en 

tanto que David huía poniéndose a salvo 

aquella noche.

11

 Pero  Saúl  envió  emisarios  a  casa  de 

David para que lo acecharan y lo mataran 

por la mañana, y Mical, la mujer de David 

le advirtió diciendo: Si no salvas tu vida 

esta noche, mañana estarás muerto.

12

 Y  Mical  hizo  que  David  bajara  por  la 

ventana,  y  él  salió  huyendo  y  se  puso  a 

salvo.

13

 Y tomó Mical un ídolo doméstico° y lo 

colocó en el lecho, y le puso en la cabece-

ra un paño de pelo de cabra, y lo cubrió 

con un cobertor.

14

 Y  cuando  Saúl  envió  emisarios  para 

prender a David, ella dijo: Está enfermo.

15

 Por lo cual Saúl volvió a enviar a los emi-

sarios a ver a David, diciendo: ¡Traédmelo 

en su mismo lecho para que lo mate!

16

 Pero  cuando  entraron  los  emisarios, 

¡he  aquí  en  el  lecho  el  ídolo  doméstico 

con el paño de pelo de cabra en la cabe-

cera!

17

 Y dijo Saúl a Mical: ¿Por qué me has 

engañado  así,  dejando  ir  a  mi  enemigo 

para que se escapara? Mical respondió a 

Saúl: Porque él me dijo: ¡Déjame escapar! 

¿Por qué he de matarte?

18

 Así pues, David huyó y se escapó y lle-

gó a donde Samuel en Ramá, y le refirió 

todo cuanto Saúl le había hecho. Luego él 

partió con Samuel y moraron en Nayot.

19

 Y  se  le  anunció  a  Saúl,  diciendo:  He 

aquí David está en Nayot de Ramá.

20

 Envió  entonces  Saúl  emisarios  para 

prender  a  David,  los  cuales  vieron  un 

grupo° de profetas que profetizaban, y a 

Samuel  erguido  entre  ellos  que  los  pre-

sidía. Y el Espíritu de Dios vino sobre los 

emisarios de Saúl, y ellos también profe-

tizaron.

21

 E  informaron  a  Saúl,  y  envió  otros 

emisarios,  y  también  ellos  profetizaron. 

Volvió Saúl a enviar emisarios por tercera 

vez, y también éstos profetizaron.

22

 Entonces  él  mismo  marchó  a  Ramá, 

y llegando a la gran cisterna que está en 

Secú,  preguntó  diciendo:  ¿Dónde  están 

Samuel y David? Y uno dijo: He aquí que 

están en Nayot de Ramá.

23

 Y fue allá, a Nayot de Ramá, y el Espíri-

tu de Dios vino sobre él, y siguió andando 

y profetizando hasta que llegó a Nayot de 

Ramá.

19.9 .otra vez.  19.13 Lit. terafines.  19.20 El TM no utiliza el vocablo qahal (asamblea, grupo, etc.) sino el término laqahat, que 

algunos traducen por ancianos, príncipes, etc. La expresión equivaldría, entonces, a profetas ancianos o profetas principales. Los 

mismos masoretas pusieron su habitual circellus indicando que el término laqahat es anómalo en este lugar. 


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1 Samuel 19:24

306

24

 Se quitó además sus vestiduras y pro-

fetizó de la misma manera en presencia 

de Samuel. Todo aquel día y toda aquella 

noche estuvo echado desnudo.° Por esto 

se  suele  decir:  ¿También  Saúl  entre  los 

profetas?

Amistad de David 

y Jonatán

20

David  huyó  de  Nayot  de  Ramá  y 

llegó  ante  Jonatán  y  le  dijo:  ¿Qué 

he hecho? ¿Cuál es mi delito o mi pecado 

contra tu padre para que atente contra mi 

vida?

2

 Y él le dijo ¡Nada de eso! ¡No morirás! 

He aquí que mi padre no hace cosa gran-

de o pequeña que no me la diga antes. 

¿Por  qué  habría  de  ocultarme  esto  mi 

padre? ¡Es imposible!

3

 David  empero  volvió  a  jurárselo  di-

ciendo:  Sabe  tu  padre  que  he  hallado 

gracia a tus ojos, y habrá dicho: No sepa 

esto  Jonatán,  no  sea  que  se  disguste. 

Pero  tan  cierto  como  que  vive  YHVH 

y  vive  tu  alma,  estoy  a  un  paso  de  la 

muerte.

4

 Jonatán  preguntó  a  David:  ¿Qué  desea 

tu alma, para que lo haga por ti?

5

 Y  David  respondió  a  Jonatán:  He  aquí 

mañana  será  luna  nueva,  en  que  yo  de-

bería sentarme a comer con el rey, pero 

déjame  partir  y  ocultarme  en  el  campo 

hasta la tarde del tercer día.

6

 Si tu padre advierte mi ausencia, dirás: 

David me pidió insistentemente para una 

rápida  escapada  a  Bet-léhem,  su  ciudad, 

porque  toda  la  familia  celebra  allí  el  sa-

crificio anual.

7

 Si él dice: ¡Bien!, tu siervo puede estar 

en paz; pero si se enardece, entiende que 

el mal está decidido de parte suya.

8

 Así  pues,  trata  con  misericordia  a  tu 

siervo, pues has concertado con tu sier-

vo un pacto de YHVH. Y si hay alguna 

iniquidad  en  mí,  mátame  tú  mismo, 

¿por  qué  me  habrás  de  llevar  ante  tu 

padre?

9

 Y Jonatán le dijo: ¡Lejos esté eso de ti! 

Pues de saber yo que mi padre piensa ha-

certe mal, ¿no te lo declararía?

10

 Entonces David dijo a Jonatán: ¿Quién 

me informará si tu padre te responde con 

dureza?

11

 Y  Jonatán  respondió  a  David:  ¡Ven, 

salgamos al campo! Y ambos salieron al 

campo.

12

 Entonces dijo Jonatán a David: ¡Vive° 

YHVH  Dios  de  Israel,  si  mañana  a  estas 

horas  o  pasado  mañana,  cuando  haya 

sondeado a mi padre, si es lo bueno para 

David, no te informo de ello!

13

 ¡Así  haga  YHVH  a  Jonatán  y  aún  le 

añada, si a mi padre le place hacerte mal 

y yo no te lo revele para que puedas partir 

en paz, y YHVH pueda estar contigo como 

ha estado con mi padre!

14

 Y si vivo todavía, nunca dejes de utili-

zar conmigo la misericordia de YHVH; y 

si muero,

15

 no  apartes  jamás  tu  misericordia  de 

mi  casa,  ni  siquiera  cuando  YHVH  haya 

destruido a cada uno de los enemigos de 

David de la faz de la tierra,

16

 y cuando YHVH pida cuenta a los ene-

migos de David. Así Jonatán hizo un pac-

to con la casa de David.

17

 Luego Jonatán volvió a conjurar a Da-

vid por el amor que le tenía, pues lo ama-

ba como a sí mismo.

18

 Y  añadió  Jonatán:  Mañana  es  luna 

nueva, y se te echará de menos porque tu 

asiento estará vacío.

19

 Al  tercer  día  bajarás  y  te  dirigirás  al 

lugar  donde  estuviste  oculto  el  día  del 

suceso,°  y  te  quedarás  junto  a  la  piedra 

de Ezel.°

20

 Yo dispararé tres saetas por aquel lado, 

como ejercitándome al blanco;

21

 tras lo cual enviaré al mozo diciendo: 

¡Ve y busca las saetas! Y si digo al mozo: 

¡He  aquí  las  saetas  más  acá  de  ti,  recó-

gelas!  entonces  ven,  porque  como  que 

vive YHVH, la paz será contigo y nada te 

ocurrirá.

22

 Pero si digo al mozo: ¡Ve ahí las saetas 

más allá de ti! vete, porque YHVH te está 

enviando lejos.

23

 Y en cuanto al asunto que hemos ha-

blado, he aquí que YHVH está entre tú y 

yo para siempre.

19.24 Es decir, mal cubierto o sólo con la ropa interior.  20.12 .Vive. Es decir, sea testigo.  20.19 Posible alusión a 19.2-7, 

cuando se descubrió la intención de Saúl. 

20.19 Npiedra itineraria. Esto es, especie de mojón de señalización en el camino.


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1 Samuel 21:5

307

24

 David  pues  se  escondió  en  el  campo, 

y llegó la luna nueva, y el rey se reclinó 

a comer.

25

 Y como otras veces, el rey estaba recli-

nado en su sitial de junto a la pared, con Jo-

natán enfrente y Abner reclinado al lado de 

Saúl, pero el lugar de David estaba vacío.

26

 Sin  embargo,  aquel  día  Saúl  no  dijo 

nada, porque pensó: Algo le ha sucedido 

y  no  está  limpio;  seguramente  no  se  ha 

purificado.

27

 Pero llegado el día siguiente, el segun-

do día del novilunio, el puesto de David 

continuaba  vacío,  y  dijo  Saúl  a  su  hijo 

Jonatán: ¿Por qué el hijo de Isaí no ha ve-

nido a la comida ni ayer ni hoy?

28

 Y Jonatán respondió a Saúl: David me 

pidió  insistentemente  que  lo  dejara  ir  a 

Bet-léhem,

29

 diciéndome: Te ruego que me dejes ir, 

porque  nuestra  familia  tiene  hoy  un  sa-

crificio en la ciudad, y mi hermano me ha 

mandado estar presente. Por tanto, si he 

hallado gracia en tus ojos, te ruego que 

me dejes ir, para que vea a mis hermanos. 

Por este motivo no ha venido a la mesa 

del rey.

30

 Entonces  se  encendió  la  ira  de  Saúl 

contra  Jonatán,  y  le  dijo:  ¡Hijo  de  una 

perversa rebelde! ¿Acaso no sé yo que pre-

fieres al hijo de Isaí, para tu propia ver-

güenza y para vergüenza de la desnudez 

de tu madre?

31

 Porque mientras el hijo de Isaí viva so-

bre la tierra, no estarás seguro ni tú ni tu 

reino. Por tanto, ¡haz que lo traigan ante 

mi presencia, pues merece morir!

32

 Pero  Jonatán  respondió  a  su  padre 

Saúl,  y  le  dijo:  ¿Por  qué  ha  de  morir? 

¿Qué ha hecho?

33

 Entonces Saúl blandió su lanza contra 

él para herirlo, y Jonatán comprendió que 

su padre estaba resuelto a matar a David.

34

 De tal modo, Jonatán se levantó de la 

mesa airado, y no comió alimento alguno 

el segundo día de la luna nueva, porque 

compadecía a David, y porque su padre lo 

había avergonzado.

35

 Por la mañana Jonatán salió al campo, 

en el tiempo señalado con David, y con él 

iba un jovenzuelo.

36

 Y  dijo  al  mozalbete:  ¡Corre  y  busca 

las saetas que yo arroje! Cuando el mozo 

echó a correr, él disparó la saeta para que 

lo rebasara.

37

 Y cuando el criado llegó al lugar donde 

estaba la saeta que Jonatán había arroja-

do, Jonatán gritó al mozo, diciendo: ¿No 

está la saeta más allá de ti?

38

 Y gritó Jonatán al mozo: ¡Apúrate, no 

te quedes ahí! Y el mozo de Jonatán reco-

gió las saetas, y fue a su amo.

39

 Pero el mozo no sabía nada; solamente 

Jonatán y David conocían el asunto.

40

 Luego  Jonatán  entregó  sus  armas  al 

mozo que estaba con él, y le dijo: Ve y llé-

valas a la ciudad.

41

 Y tan pronto como se fue el mozo, Da-

vid salió de la parte del sur, y cayendo ros-

tro en tierra, se postró tres veces. Luego, 

besándose el uno al otro, lloraron juntos, 

aunque David lloró más.

42

 Y Jonatán dijo a David: Vete en paz, 

pues  nos  hemos  juramentado  en  nom-

bre  de  YHVH,  diciendo:  YHVH  sea  en-

tre  tú  y  yo,  y  entre  mi  descendencia  y 

tu  descendencia  para  siempre.  Y  él  se 

levantó y se fue, y Jonatán regresó a la 

ciudad.°

David en Nob y en Gat

21

Entonces  David  marchó  a  Nob, 

adonde Ahimelec el sacerdote; pero 

Ahimelec recibió a David con sobresalto, 

y le dijo: ¿Por qué vienes solo, sin nadie 

contigo?

2

 Y David respondió al sacerdote Ahime-

lec:  El  rey  me  encomendó  un  asunto,  y 

me  dijo:  Nadie  sepa  del  asunto  a  que  te 

envío y que te he ordenado. Y yo he citado 

a los jóvenes en cierto lugar.

3

 Ahora pues, ¿qué tienes a mano? Dame 

cinco panes, o lo que tengas.

4

 Respondiendo el sacerdote, dijo a David: 

No hay pan común a mano, pero hay pan 

consagrado,  siempre  que  los  jóvenes  se 

hayan abstenido de mujeres.

5

 David respondió al sacerdote, y le dijo: 

En verdad las mujeres han estado lejos de 

nosotros estos tres días.° Cuando salí, los 

cuerpos de los jóvenes se tornaron santos, 

aunque no era más que un viaje común. 

20.42 En el TM la frase y él se levantó… hasta el final del v. pertenece al cap. 21.  21.5 Lit. ayer y anteayer


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1 Samuel 21:6

308

¡Cuánto más hoy cuando habrá pan santo 

en sus cuerpos!

6

 Entonces  el  sacerdote  le  entregó  lo 

consagrado,  pues  allí  no  había  otro  pan 

sino  el  pan  de  proposición,  que  acababa 

de retirar de la presencia de YHVH para 

sustituirlo  por  el  pan  caliente,  tal  como 

era costumbre.

7

 Pero ese día se había detenido allí, de-

lante de YHVH, uno de los siervos de Saúl 

llamado Doeg, edomita, jefe de los pasto-

res de Saúl.

8

 Y David dijo a Ahimelec: ¿No tienes aquí 

a mano una lanza o una espada? pues no 

he tomado en mi mano ni mi espada ni 

mis armas por cuanto la orden del rey era 

apremiante.

9

 Y dijo el sacerdote: La espada de Goliat 

el filisteo, a quien mataste en el valle de 

Ela, está aquí envuelta en un paño detrás 

del éfod. Si quieres tomarla, tómala, por-

que  no  hay  otra  sino  ésa.  Y  dijo  David: 

Ninguna como ella. ¡Dámela!

10

 Y David se levantó y huyó ese día de la 

presencia de Saúl, y llegó adonde Aquís, 

rey de Gat.

11

 Y los siervos de Aquís le dijeron: ¿No 

es  éste  David,  el  rey  de  esta  tierra?  ¿No 

es éste de quien cantaban en las danzas, 

diciendo:

Hirió Saúl a sus miles,

Y David a sus diez miles?

12

 Y David guardó esas palabras en su co-

razón, y tuvo gran temor de Aquís, rey de 

Gat.

13

 Entonces  cambió  su  comportamien-

to  ante  ellos,  y  se  fingió  loco  en  mano 

de ellos, y garabateaba en las hojas de la 

puerta, dejando caer saliva por su barba.

14

 Y dijo Aquís a sus siervos: Aquí estáis 

viendo un hombre demente; ¿por qué me 

lo habéis traído?

15

 ¿Me  faltan  locos  para  que  me  hayáis 

traído a éste que haga de loco en mi pre-

sencia? ¿Éste en mi casa?

Muerte de los sacerdotes

22

David partió de allí y se refugió en 

la  cueva  de  Adulam.  Al  oírlo  sus 

hermanos y toda la casa de su padre, fue-

ron allá a él.

2

 Y  todo  el  que  estaba  oprimido,  y  todo 

el que estaba endeudado, y todos los que 

tenían amargura de alma se unieron a él, 

y él llegó a ser su caudillo, y fueron con él 

como cuatrocientos hombres.

3

 De allí David fue a Mizpa de Moab, y dijo 

al rey de Moab: Te ruego que mi padre y 

mi madre habiten con vosotros, hasta que 

sepa qué hará conmigo ’Elohim.

4

 Los llevó pues ante el rey de Moab, y ha-

bitaron con él todo el tiempo que David 

estuvo en la fortaleza.

5

 Pero el profeta Gad dijo a David: No ha-

bites en la fortaleza. Ve y entra a la tierra 

de Judá. Y David partió y llegó al bosque 

de Haret.

6

 Y  supo  Saúl  que  David  y  los  hombres 

que estaban con él habían sido descubier-

tos. Y Saúl estaba en Gabaa, sentado bajo 

un tamarisco en Ramá, con su lanza en la 

mano, y todos sus siervos estaban en pie 

alrededor de él.

7

 Y dijo Saúl a los siervos que estaban al-

rededor de él: Oíd ahora, hijos de Benja-

mín:  ¿Os  dará  acaso  a  todos  vosotros  el 

hijo  de  Isaí  campos  y  viñedos?  ¿Os  hará 

a  todos  vosotros  capitanes  de  millares  y 

capitanes de centenas,

8

 para que todos vosotros conspiréis con-

tra  mí,  y  nadie  me  avise  cómo  mi  hijo 

hizo alianza con el hijo de Isaí, ni quien 

se compadezca de mí y me dé a conocer 

cómo  mi  hijo  ha  sublevado  a  mi  siervo 

contra mí para que me aceche hasta este 

día?

9

 Entonces  Doeg  el  edomita,  que  estaba 

a cargo de los siervos de Saúl, respondió 

y dijo: Yo vi al hijo de Isaí yendo a Nob, a 

Ahimelec ben Ahitob,

10

 quien consultó por él a YHVH, y le dio 

provisión,  y  también  le  dio  la  espada  de 

Goliat el filisteo.

11

 El  rey  mandó  a  llamar  al  sacerdote 

Ahimelec ben Ahitob, y a toda la casa de 

su  padre,  los  sacerdotes  que  estaban  en 

Nob; y todos fueron al rey.

12

 Y Saúl le dijo: Escucha ahora, hijo de 

Ahitob. Y él dijo: Heme aquí, señor mío.

13

 Y Saúl le dijo: ¿Por qué tú y el hijo de 

Isaí habéis conspirado contra mí, dándole 

pan y una espada, y consultando por él a 

’Elohim para que se levantara contra mí y 

me acechara hasta este día?

14

 Ahimelec respondió al rey, y dijo: Pero 

¿quién entre todos tus siervos es tan fiel 


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1 Samuel 23:15

309

como David, yerno además del rey, capi-

tán de tu guardia, y honrado en tu casa?

15

 ¿Acaso  he  comenzado  hoy  a  consultar 

a ’Elohim por él? ¡Lejos sea eso de mí! No 

impute el rey cosa alguna a su siervo ni a 

toda la casa de mi padre, por cuanto tu sier-

vo nada sabe de este asunto, poco o mucho.

16

 Pero el rey dijo: ¡Sin duda morirás Ahi-

melec, tú y toda la casa de tu padre!

17

 Y  el  rey  dijo  a  los  guardias  que  esta-

ban en torno suyo: ¡Volveos y matad a los 

sacerdotes de YHVH, por cuanto la mano 

de ellos también está con David, porque 

sabiendo que huía, no me lo dijeron! Pero 

los siervos del rey no quisieron extender 

la mano sobre los sacerdotes de YHVH.

18

 Entonces  el  rey  dijo  a  Doeg:  ¡Vuélve-

te  tú  y  arremete  contra  los  sacerdotes! 

Y Doeg el edomita se volvió y arremetió 

contra  los  sacerdotes,  y  mató  en  aquel 

día a ochenta y cinco varones que vestían 

efod de lino.

19

 Y a Nob, ciudad de los sacerdotes, hirió 

a filo de espada, tanto a hombres como a 

mujeres, a niños y a lactantes, y a bueyes, 

y a asnos y a ovejas, a filo de espada.

20

 Pero uno de los hijos de Ahimelec ben 

Ahitob, llamado Abiatar, escapó y huyó en 

pos de David.

21

 Y Abiatar informó a David que Saúl ha-

bía matado a los sacerdotes de YHVH.

22

 Entonces dijo David a Abiatar: Yo sabía 

en aquel día, cuando Doeg el edomita es-

taba allí, que de seguro se lo haría saber 

a Saúl. ¡He ocasionado la muerte de todas 

las personas de la casa de tu padre!

23

 Quédate  conmigo.  No  temas,  porque 

quien busca mi vida busca tu vida, pero 

conmigo estarás seguro.

Victoria en Keila

23

E  informaron  a  David,  diciendo: 

¡He aquí los filisteos atacan a Keila 

y están saqueando los graneros!

2

 Entonces  David  consultó  a  YHVH,  di-

ciendo: ¿Iré y atacaré a estos filisteos? Y 

YHVH dijo a David: Ve, ataca a los filisteos 

y libera a Keila.

3

 Pero los hombres de David le dijeron: Si 

aquí en Judá vivimos con temor, ¡cuánto 

más si vamos a Keila contra los escuadro-

nes de los filisteos!

4

 De  nuevo  David  consultó  a  YHVH,  y 

YHVH  le  respondió,  y  dijo:  Levántate, 

desciende  a  Keila,  pues  entregaré  a  los 

filisteos en tu mano.

5

 Y David y sus hombres fueron a Keila y 

pelearon contra los filisteos, y él se llevó 

sus ganados y les infligió una gran derrota. 

Así liberó David a los habitantes de Keila.

6

 Y cuando Abiatar ben Ahimelec huyó a 

Keila, donde estaba David, se bajó el éfod 

con él.°

7

 Cuando informaron a Saúl que David ha-

bía  ido  a  Keila,  Saúl  dijo:  ¡’Elohim  lo  ha 

desamparado en mi mano, encerrándose al 

entrar en una ciudad de puertas y barras!

8

 Por lo cual Saúl convocó a todo el pue-

blo a la batalla, para bajar a Keila y sitiar 

a David y a sus hombres.

9

 Pero  David  se  enteró  de  que  Saúl  tra-

maba el mal contra él, y dijo al sacerdote 

Abiatar: Trae el éfod.

10

 Y dijo David: ¡YHVH, Dios de Israel!, tu 

siervo  tiene  conocimiento  cierto  de  que 

Saúl procura venir a Keila, para destruir 

la ciudad por mi causa.

11

 ¿Me entregarán los señores de Keila en 

su mano? ¿Bajará Saúl, como ha oído tu 

siervo? ¡Oh YHVH Dios de Israel, te ruego 

que lo declares a tu siervo! Y YHVH dijo: 

Sí, bajará.

12

 Y David preguntó: ¿Me entregarán los 

señores de Keila a mí y a mis hombres en 

mano de Saúl? Y YHVH respondió: Te en-

tregarán.

13

 Entonces David se levantó con su gen-

te (unos seiscientos hombres) y salieron 

de Keila, y fueron a dondequiera que pu-

dieron irse. Y fue dado aviso a Saúl que 

David había escapado de Keila, por lo que 

desistió de salir.

14

 Y  David  permaneció  en  el  desierto, 

en lugares de difícil acceso, en la región 

montañosa del desierto de Zif, entre tanto 

Saúl lo buscaba cada día; pero ’Elohim no 

lo entregó en su mano.

15

 Viendo pues David que Saúl había sali-

do en busca de su vida, David se quedó en 

Hores, en el desierto de Zif.

23.6 Lit. en la mano.


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1 Samuel 23:16

310

16

 Y  se  levantó  Jonatán  ben  Saúl,  y  fue 

adonde estaba David en Hores, y lo recon-

fortó en ’Elohim,

17

 y  le  dijo:  No  temas,  que  la  mano  de 

Saúl mi padre no te hallará. Tú reinarás 

sobre Israel, y yo seré segundo después de 

ti, y aun mi padre Saúl sabe esto.

18

 Y concertaron ambos un pacto en pre-

sencia de YHVH; y David se quedó en Ho-

res, y Jonatán se volvió a su casa.

19

 Entonces subieron los zifeos a decir a 

Saúl en Gabaa: ¿No está David escondido 

en nuestra tierra en las peñas de Hores, en 

el collado de Haquila, al sur de Jesimón?

20

 Ahora pues, conforme a todo el deseo de 

tu alma, oh rey, desciende pronto, y noso-

tros lo entregaremos en la mano del rey.

21

 A  lo  que  respondió  Saúl:  ¡Benditos 

seáis de YHVH, porque os habéis compa-

decido de mí!

22

 Id, os ruego, y averiguad todavía más, y 

ved el lugar donde suele tener su asiento y 

quién lo haya visto allí, pues me han dicho 

que se maneja con muy grande astucia.

23

 Ved pues, e informaos de todos los es-

condites donde se oculta, y volved a traer-

me la certeza. Luego yo iré con vosotros, 

y si él se encuentra en esa tierra, lo bus-

caré con empeño entre todos los millares 

de Judá.

24

 Así pues, se levantaron y marcharon a 

Zif delante de Saúl, pero David y sus hom-

bres ya estaban en el desierto de Maón, en 

el Arabá, al sur de Jesimón.

25

 Luego  partió  Saúl  con  sus  hombres 

para  buscarlo;  de  lo  cual,  avisado  David, 

descendió a la roca, y habitó en el desierto 

de Maón. Cuando Saúl se enteró, persiguió 

a David por el desierto de Maón.

26

 E iba Saúl por un lado del monte, y David 

con sus hombres por el otro lado. Y David 

se fugó con zozobra para escapar de Saúl, 

pues Saúl y sus hombres habían cercado a 

David y a sus hombres para capturarlos.

27

 En esto llegó un mensajero a Saúl, di-

ciendo: ¡Date prisa y ven, porque los filis-

teos irrumpieron en el país!

28

 Por  lo  cual  Saúl  tuvo  que  volverse  y 

dejar de perseguir a David, para ir al en-

cuentro de los filisteos. Por esto se llamó 

a aquel lugar Sela-hamahlecot.°

29

 Entonces David subió de allí y perma-

neció en los refugios de En-gadi.

En la cueva de En-gadi

24

Sucedió que cuando Saúl volvió de 

perseguir  a  los  filisteos,  le  dieron 

aviso diciendo: He aquí, David está en el 

desierto de En-gadi.

2

 Y  tomando  Saúl  a  tres  mil  hombres 

esco gidos de todo Israel, salió en busca de 

David y sus hombres por las peñas de las 

cabras monteses.

3

 Y cuando llegó a unos rediles de ovejas 

en  el  camino,  donde  había  una  cueva, 

Saúl entró en ella para cubrir sus pies,° y 

David y sus hombres estaban sentados en 

la parte más interna de la cueva.

4

 Y los hombres de David le dijeron: ¡Este 

es el día que te dijo YHVH: He aquí entre-

go tu enemigo en tu mano, y harás con 

él como te parezca! Entonces se levantó 

David y cortó cautelosamente la orilla del 

manto de Saúl.

5

 Y después de esto, aconteció que el co-

razón  de  David  le  remordió  por  haber 

cortado la orilla del manto de Saúl.

6

 Y  dijo  a  sus  hombres:  ¡Líbreme  YHVH 

de hacer tal cosa contra mi señor, el un-

gido de YHVH, que yo extienda mi mano 

contra él, pues es el ungido de YHVH!

7

 Y con estas palabras David disuadió a los 

suyos, y no les permitió levantarse contra 

Saúl; de modo que Saúl salió de la cueva 

y siguió por el camino.

8

 Enseguida se levantó también David, y 

saliendo de la cueva dio voces tras Saúl, 

diciendo: ¡Oh rey señor mío! Y mirando 

Saúl tras de sí, David inclinó su rostro a 

tierra y se postró.

9

 En seguida dijo David a Saúl: ¿Por qué 

escuchas palabras de hombres que dicen: 

He aquí, David procura tu mal?

10

 He aquí, en este mismo día están vien-

do tus ojos cómo YHVH te ha puesto en 

mi mano dentro de  la cueva;  y  se habló 

de matarte, pero se tuvo compasión de ti, 

pues dije: ¡No extenderé mi mano contra 

mi señor, porque es el ungido de YHVH!

11

 Y mira, padre mío, mira la orilla de tu 

manto en mi mano, pues al cortar la orilla 

de tu manto, no te he matado. Reconoce 

23.28 Esto es, Peña de las Escapadas.  24.3 Se refiere a hacer las necesidades fisiológicas. 


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1 Samuel 25:14

311

y considera que no hay maldad ni trans-

gresión en mi mano, ni he pecado contra 

ti, aunque tú andas a la caza de mi vida 

para tomarla.

12

 ¡Juzgue  YHVH  entre  tú  y  yo,  y  que 

YHVH me vengue de ti! Pero mi mano no 

será contra ti.

13

 Como  dice  el  proverbio  de  los  anti-

guos: Del malo sale la maldad. Así que mi 

mano no será contra ti.

14

 ¿En pos de quién sale el rey de Israel? 

¿A quién persigue? ¿A un perro muerto? 

¿A una pulga?

15

 Sea YHVH el juez, y juzgue entre tú y yo; 

y defienda mi causa y me libre de tu mano.

16

 Y  cuando  David  hubo  terminado  de 

decir esas palabras a Saúl, aconteció que 

Saúl dijo: ¿Es esta tu voz, hijo mío David? 

Entonces Saúl alzó su voz y lloró.

17

 Y dijo a David: Más justo eres tú que 

yo, porque tú me has pagado con bien, y 

yo te he pagado con mal.

18

 Tú has declarado hoy cómo me has he-

cho un bien, porque YHVH me puso en tu 

mano, y no me has matado.

19

 Porque ¿qué hombre halla a su enemi-

go y lo deja ir indemne? ¡YHVH te galar-

done pues por lo que me has hecho hoy!

20

 Y ahora, he aquí yo sé que de seguro 

has de reinar, y que el reino de Israel será 

estable en tu mano.

21

 Ahora pues, júrame por YHVH que no 

exterminarás mi descendencia después de 

mí, ni borrarás mi nombre de la casa de 

mi padre.

22

 Y David se lo juró a Saúl. Y Saúl se fue 

a su casa, y David y sus hombres subieron 

a los riscos.

Muerte de Samuel 

Nabal y Abigail

25

Murió  Samuel,  y  todo  Israel  se 

reunió para lamentar por él,° y lo 

sepultaron  en  su  casa  en  Ramá.  Enton-

ces David se levantó y bajó al desierto de 

Parán.

2

 Había entonces un hombre en Maón que 

tenía  posesiones  en  el  Carmelo,  y  aquel 

hombre era muy pudiente, pues tenía tres 

mil  ovejas  y  mil  cabras.  Y  esquilaba  sus 

ovejas en el Carmelo.

3

 Aquel  hombre  se  llamaba  Nabal,°  y  el 

nombre  de  su  mujer  era  Abigail.°  Y  la 

mujer era de buen entendimiento y her-

moso aspecto; pero el hombre era grosero 

y dado a las malas acciones. Y era del li-

naje de Caleb.

4

 Estando David en el desierto, supo que 

Nabal esquilaba su rebaño,

5

 y envió David a diez jóvenes; y dijo Da-

vid a los jóvenes: Subid al Carmelo e id a 

Nabal, y saludadlo en mi nombre.

6

 Y le diréis así: ¡Salud! ¡La paz sea con-

tigo! ¡Paz a tu casa, y paz a todo cuanto 

tienes!

7

 He  oído  decir  que  tienes  esquiladores. 

Ahora, tus pastores han estado con noso-

tros, y nunca los maltratamos ni les faltó 

nada en todo el tiempo que han estado en 

el Carmelo.

8

 Pregunta a tus mozos y te lo dirán. Por 

tanto, hallen favor estos jóvenes ante tus 

ojos, porque en buen día hemos venido, 

te ruego que des a tus siervos y a tu hijo 

David lo que halles a mano.

9

 Y cuando llegaron los mozos de David, 

hablaron a Nabal conforme a todas estas 

palabras  en  nombre  de  David,  y  espera-

ron.

10

 Nabal respondió a los siervos de David, 

y  dijo:  ¿Quién  es  David?  ¿Y  quién  es  el 

hijo de Isaí? ¡Hoy en día son muchos los 

siervos que huyen de sus señores!

11

 ¿Tomaré yo ahora mi pan, y mi agua, y 

mi carne que he sacrificado para mis es-

quiladores y los daré a hombres que no sé 

de dónde vienen?

12

 Entonces  los  mozos  de  David  se  vol-

vieron por su camino y regresaron, y lle-

garon  y  le  declararon  conforme  a  todas 

aquellas palabras.

13

 Entonces  David  dijo  a  sus  hombres: 

¡Cíñase cada uno su espada! Y cada hom-

bre ciñó su espada. También David se ciñó 

su espada, y subieron tras él como cuatro-

cientos hombres, y doscientos se ocupa-

ron de los bagajes.

14

 Pero  uno  de  los  muchachos  informó 

a  Abigail,  mujer  de  Nabal,  diciendo:  He 

aquí, David envió mensajeros desde el de-

sierto para saludar a nuestro amo, y él los 

despreció.

25.1 Lit. golpearse el pecho en señal de duelo.  25.3 Esto es, insensato.  25.3 Esto es, padre de gozo.


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1 Samuel 25:15

312

15

 Pero los hombres fueron muy buenos 

con nosotros, y nunca nos perjudicaron, 

ni nada nos faltó cuando estuvimos con 

ellos en los campos.

16

 Como un muro eran en torno a noso-

tros tanto de día como de noche, todo el 

tiempo que estuvimos con ellos apacen-

tando las ovejas.

17

 Ahora  pues  considera  lo  que  has  de 

hacer, porque el mal está decidido contra 

nuestro amo y contra toda su casa, pues 

él es tan hijo de Belial, que nadie le puede 

hablar.

18

 Entonces Abigail se apresuró, y tomó 

doscientos panes, dos odres de vino, cinco 

ovejas  ya  preparadas,  cinco  medidas°  de 

grano tostado, cien racimos de uvas pasas 

y doscientas tortas de higos secos, e hizo 

cargar todo sobre asnos.

19

 Y dijo a sus criados: Id delante de mí. 

He aquí, yo os seguiré luego. Pero no in-

formó a su marido Nabal.

20

 Y  fue  así  que  cabalgando  en  su  asno 

bajó por la parte encubierta de la serra-

nía, y he aquí David y sus hombres se en-

contraron con ella.

21

 Y  David  había  dicho:  Ciertamente  en 

vano he cuidado todo lo que éste tiene en 

el desierto, sin que nada le haya faltado de 

todo cuanto es suyo; y él me ha devuelto 

mal por bien.

22

 ¡Así  haga  ’Elohim  a  los  enemigos  de 

David,  y  aun  más,  si  de  aquí  a  mañana 

dejo de los suyos un sólo meante a la pa-

red!°

23

 Cuando Abigail vio a David, se apresu-

ró a bajar de su asno, cayó sobre su rostro 

ante David, se postró a tierra,

24

 y  echándose  a  sus  pies,  dijo:  ¡Señor 

mío, recaiga sobre mí la iniquidad! ¡Per-

mite que tu sierva hable a tus oídos, y oye 

las palabras de tu sierva!

25

 Te ruego, señor mío, no prestes aten-

ción  a  Nabal,  ese  hijo  de  Belial;  porque 

conforme a su nombre, así es. Nabal es su 

nombre, y la necedad está con él, pero yo, 

tu sierva, no vi a los mozos de mi señor, a 

los que enviaste.

26

 Y ahora señor mío, vive YHVH y vive 

tu alma, puesto que YHVH te ha impedido 

derramar sangre y vengarte por tu propia 

mano, ¡sean como Nabal tus enemigos y 

los que procuran el mal de mi señor!

27

 Y ahora, este presente que tu sierva ha 

traído  a  mi  señor,  sea  dado  a  los  mozos 

que acompañan a mi señor.

28

 Te ruego que perdones la transgresión 

de tu sierva, por cuanto YHVH hará cier-

tamente a mi señor una casa segura, por-

que mi señor pelea las batallas de YHVH, 

y la iniquidad no se hallará en ti en todos° 

tus días.

29

 Y aunque un hombre se haya levantado 

para perseguirte y buscar tu alma, el alma 

de mi señor está bien atada al zurrón de la 

vida junto a YHVH tu Dios, en tanto que 

Él lanzará el alma de tus enemigos como 

por medio de una honda.

30

 Y acontecerá que cuando YHVH haya 

hecho a mi señor todo el bien que te tiene 

dicho, y te haya constituido como sobera-

no de Israel,

31

 esto°  no  causará  pesar  ni  remordi-

miento  a  mi  señor,  ya  por  haber  derra-

mado  sangre  sin  causa,  o  que  mi  señor 

se haya vengado por sí mismo. Y cuando 

YHVH favorezca a mi señor, acuérdate de 

tu sierva.

32

 Entonces dijo David a Abigail: ¡Bendi-

to sea YHVH Dios de Israel, que te envió 

hoy a encontrarme!

33

 ¡Bendito  tu  razonamiento,  y  bendita 

tú,  que  hoy  me  has  impedido  derramar 

sangre y vengarme por mi propia mano!

34

 Porque, ¡vive YHVH Dios de Israel, que 

me ha detenido de hacerte mal a ti, que 

si no te hubieras apresurado a venir a mi 

encuentro, para la luz del alba no le ha-

bría quedado a Nabal ni un meante a la 

pared!

35

 Y David recibió de mano de ella lo que 

le había llevado, y le dijo: ¡Sube a tu casa 

en paz! He aquí he atendido tu voz y acep-

tado tu petición.

36

 Y Abigail volvió a Nabal, y he aquí que 

celebraba un banquete en su casa, como 

el banquete de un rey, y el corazón de Na-

bal estaba alegre, y estaba muy borracho, 

por lo cual ella no le informó ni poco ni 

mucho, hasta que amaneció.

25.18 Heb. se’im, medida de unos 15 litros.  25.22 Heb. hombre de pelo en pecho, macho.  25.28 .todos.  25.31 Esto es, la 

destrucción de la casa de Nabal.


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1 Samuel 26:16

313

37

 Y aconteció que por la mañana, cuan-

do el efecto° del vino había salido de Na-

bal, su mujer le informó estas cosas, y su 

corazón desmayó en él, y se quedó como 

una piedra.

38

 Y pasados como diez días, YHVH hirió 

a Nabal, y este murió.

39

 Cuando  David  oyó  que  Nabal  había 

muerto,  dijo:  ¡Bendito  sea  YHVH,  que 

juzgó la causa de la afrenta que Nabal me 

hizo, y ha preservado del mal a su siervo! 

¡YHVH ha devuelto así la maldad de Nabal 

sobre  su  propia  cabeza!  Y  David  envió  a 

tratar con Abigail para tomarla por mujer.

40

 Y cuando los criados de David fueron a 

Abigail en el Carmelo, le hablaron dicien-

do: David nos ha enviado a ti, para tomar-

te por mujer suya.

41

Y ella se levantó y se postró rostro en 

tierra, y dijo: He aquí tu sierva, para ser 

sierva que lave los pies de los siervos de 

mi señor.

42

 Luego Abigail se levantó rápidamente 

y montó en un asno, y con cinco donce-

llas que la atendían, siguió a los mensaje-

ros de David, y fue su mujer.

43

 David  tomó  también  a  Ahinoam  de 

Jezreel, y las dos fueron mujeres suyas.

44

 Por su parte, Saúl había dado su hija 

Mical,  mujer  de  David,  a  Palti  ben  Lais, 

natural de Galim.

En el campamento de Zif

26

Los  zifeos  llegaron  a  Saúl  en  Ga-

baa,  diciendo:  ¿No  está  David  es-

condido  en  el  collado  de  Haquila  frente 

a Jesimón?

2

 Entonces  se  levantó  Saúl  y  bajó  al  de-

sierto de Zif, llevando consigo a tres mil 

hombres escogidos de Israel, para buscar 

a David en el desierto de Zif.

3

 Y acampó Saúl en el collado de Haqui-

la, el cual está frente a Jesimón, junto al 

camino.  David,  que  vivía  en  el  desierto, 

advirtió que Saúl entraba a perseguirlo en 

el desierto,

4

 y enviando espías, David supo con certe-

za que Saúl se acercaba.

5

 Se levantó pues David y fue al sitio don-

de Saúl había acampado, y observó David 

el lugar donde dormían Saúl y Abner ben 

Ner, jefe de su ejército. Y Saúl estaba dur-

miendo en el centro del campamento, y el 

pueblo acampaba en derredor suyo.

6

 Tomando  entonces  la  palabra,  David 

habló  a  Ahimelec  heteo,  y  a  Abisai,  hijo 

de  Sarvia,  hermano  de  Joab,  diciendo: 

¿Quién bajará conmigo a Saúl en el cam-

pamento?  Y  respondió  Abisai:  Yo  bajaré 

contigo.

7

 Así pues, David y Abisai se acercaron de 

noche a la gente, y he aquí Saúl dormía 

en medio del campamento, con su lanza 

clavada en tierra a su cabecera, y Abner y 

el pueblo estaban acostados alrededor de 

él.

8

 Entonces dijo Abisai a David: ¡’Elohim 

ha  entregado  hoy  a  tu  enemigo  en  tu 

mano! ¡Déjame clavarlo en tierra con su 

propia lanza de un solo golpe, pues no ne-

cesitaré un segundo!

9

 Pero David respondió a Abisai: No lo ma-

tes, porque ¿quién extenderá su mano con-

tra el ungido de YHVH y quedará impune?

10

 Y agregó David: ¡Vive YHVH que YHVH 

mismo tendrá que herirlo, o le vendrá su 

día de morir, o bajará a la batalla y pere-

cerá!

11

 Pero  ¡líbreme  YHVH  de  extender  mi 

mano  contra  el  ungido  de  YHVH!  Toma 

ahora la lanza que está a su cabecera, y la 

vasija del agua, y vámonos de aquí.

12

 Tomó David la lanza y la vasija de agua 

de la cabecera de Saúl, y se fueron; y no 

hubo nadie que lo viera ni se diera cuen-

ta, ni nadie que se despertara. Todos dor-

mían, porque un profundo sueño de parte 

de YHVH había caído sobre ellos.

13

 Y David cruzó al otro lado, y se colocó 

en la cima del monte a lo lejos, con una 

considerable distancia entre ellos.

14

 Entonces  David  gritó  al  pueblo  y  a 

Abner  ben  Ner,  diciendo:  ¿No  respondes 

Abner? Entonces Abner respondió y dijo: 

¿Quién eres tú que gritas al rey?

15

 Y dijo David a Abner: ¿No eres tú un 

valiente? ¿Quién como tú en Israel? ¿Por 

qué entonces no has guardado a tu señor 

el  rey?  Pues  uno  del  pueblo  ha  entrado 

para destruir a tu señor el rey.

16

 No  está  bien  lo  que  has  hecho.  ¡Vive 

YHVH,  que  sois  dignos  de  muerte  pues 

25.37 .efecto.


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1 Samuel 26:17

314

no  habéis  guardado  a  vuestro  señor,  al 

ungido de YHVH! ¡Mira ahora dónde está 

la  lanza  del  rey,  y  la  vasija  de  agua  que 

estaba a su cabecera!

17

 Y  Saúl  reconoció  la  voz  de  David,  y 

dijo:  ¿Acaso  no  es  ésta  tu  voz,  hijo  mío 

David? Y David respondió: ¡Mi voz es, oh 

rey, señor mío!

18

 Y agregó: ¿Por qué mi señor persigue 

así a su siervo? ¿Qué he hecho? ¿Qué mal 

hay en mi mano?

19

 Ahora pues, ruego a mi señor el rey que 

escuche las palabras de su siervo. Si es YHVH 

quien te ha incitado contra mí, respire apla-

cado° el olor de una ofrenda; pero si son los 

hombres, ¡malditos sean ante YHVH!, pues 

me  han  desterrado  hoy,  privándome  de 

participar en la heredad de YHVH, al decir: 

¡Vete a servir a otros dioses!

20

 Ahora pues, no caiga a tierra mi sangre 

lejos de la presencia de YHVH, porque el 

rey de Israel ha salido a perseguir a esta 

pulga solitaria, como quien persigue una 

perdiz por los montes.

21

 Entonces  dijo  Saúl:  ¡He  pecado!  Re-

gresa, hijo mío David, que ya no te haré 

ningún  mal,  puesto  que  hoy  mi  vida  ha 

sido de estima ante tus ojos. He aquí he 

actuado  neciamente,  y  errado  en  gran 

manera.

22

 Y David respondió, y dijo: ¡He aquí la 

lanza del rey! ¡Pase uno de los criados y 

tómela!

23

 YHVH retribuirá a cada uno su justicia y 

su lealtad, pues habiéndote entregado YHVH 

hoy en mi mano, no he querido extender mi 

mano contra el ungido de YHVH.

24

 Y  así  como  tu  vida  ha  sido  hoy  alta-

mente estimada ante mis ojos, así sea mi 

vida altamente estimada ante los ojos de 

YHVH, y me libre de toda aflicción.

25

 Entonces  Saúl  dijo  a  David:  ¡Bendito 

seas tú, hijo mío David! Ciertamente serás 

poderoso  y  prevalecerás.  Y  David  siguió 

por su camino y Saúl se volvió a su lugar.

David entre los filisteos

27

Pero David dijo en su corazón: Al-

gún día voy a perecer por la mano 

de Saúl. Nada me será mejor que escapar 

de inmediato a tierra de los filisteos; así 

Saúl desistirá de buscarme por todo el te-

rritorio de Israel, y escaparé de su mano.

2

 Y  David  se  levantó,  y  con  los  seiscien-

tos hombres que tenía consigo, se pasó a 

Aquís hijo de Maoc, rey de Gat.

3

 Y él y sus hombres habitaron con Aquís 

en  Gat,  cada  uno  con  su  familia.  David 

con sus dos mujeres, Ahinoam, la jezree-

lita y Abigail, la que fue mujer de Nabal, 

el del Carmelo.

4

 Y le informaron a Saúl que David había 

huido a Gat, y no lo buscó más.

5

 Y David dijo a Aquís: Si ahora he hallado 

gracia ante tus ojos, que me den un lu-

gar en una de las poblaciones del campo, 

y habitaré allí. ¿Por qué ha de habitar tu 

siervo contigo en la ciudad real?

6

 Y aquel día Aquís le entregó Siclag. Por 

eso  Siclag  ha  sido  de  los  reyes  de  Judá 

hasta este día.

7

 Y el número de los días que David habi-

tó en la tierra de los filisteos fue un año° 

y cuatro meses.

8

 Y David subía con sus hombres, y des-

pojaban a los gesuritas, a los gercitas y a 

los amalecitas, pues estos habitaban des-

de hacía tiempo en aquella tierra, en di-

rección a Shur, hasta la tierra de Egipto.

9

 Y David atacaba aquella tierra y no deja-

ba vivo hombre ni mujer; y se llevaba las 

ovejas, los bueyes, los asnos, los camellos 

y los bagajes. Luego se volvía y regresaba 

a Aquís.

10

 Y  Aquís  preguntaba:  ¿Dónde  habéis 

tomado el despojo hoy? David respondía: 

Hacia el sur de Judá, o hacia el sur de los 

jerameelitas, o hacia el sur de los ceneos.

11

 Y  David  no  dejaba  con  vida  hombre 

ni mujer que fuera a Gat, pues decía: No 

sea  que  ellos  declaren  contra  nosotros, 

diciendo:  ¡Esto  hizo  David!  Y  esa  fue  su 

costumbre todo el tiempo que habitó en 

tierra de los filisteos.

12

 Aquís cobró confianza en David, pues 

se  decía:  Se  ha  hecho  aborrecible  a  su 

pueblo, a Israel, por lo cual será siempre 

mi siervo.

La adivina de Endor

28

En aquellos días aconteció que los 

filisteos reunieron sus escuadrones 

26.19 .aplacado.  27.7 Lit. días


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1 Samuel 28:22

315

en pie de guerra para combatir contra Is-

rael. Y dijo Aquís a David: ¡Ten bien en-

tendido  que  tú  y  tus  hombres  saldrán 

conmigo a campaña!

2

 Y David dijo a Aquís: Por lo mismo tú sa-

brás de lo que es capaz tu siervo. Y Aquís 

dijo a David: Entonces te haré guarda de 

mi cabeza para siempre.

3

 (Samuel  había  muerto,  y  todos  los  de 

Israel habían estado en duelo por él, y lo 

habían  sepultado  en  Ramá,  su  ciudad;  y 

Saúl había expulsado de aquella tierra a 

los encantadores y adivinos.)

4

 Se reunieron pues los filisteos, y llegán-

dose,  acamparon  en  Sunem.  Asimismo 

Saúl había reunido a todo Israel, los cua-

les acamparon en Gilboa.

5

 Pero  cuando  Saúl  vio  el  campamento 

de los filisteos, tuvo temor, y su corazón 

tembló en gran manera.

6

 Y consultó Saúl a YHVH; pero YHVH no 

le respondió, ni por sueños, ni por Urim,° 

ni por profeta.

7

 Entonces  dijo  Saúl  a  sus  siervos:  Bus-

cadme  una  señora  de  adivinación°  para 

que vaya a ella y consulte por medio de 

ella. Y sus siervos le respondieron: En En-

dor hay una mujer que tiene espíritu de 

adivinación.

8

 Y Saúl se disfrazó y se puso otros vesti-

dos,  y  partió  con  dos  hombres.  Llegaron 

a aquella mujer de noche, y dijo: Te ruego 

que me adivines por el espíritu de adivina-

ción, y me hagas subir a quien yo te diga.

9

 Y la mujer le dijo: He aquí, tú sabes lo 

que Saúl ha hecho, cómo ha exterminado 

de la tierra a nigromantes y adivinos; ¿por 

qué pones tropiezo a mi vida para hacer 

que muera?

10

 Entonces  Saúl  le  juró  por  YHVH,  di-

ciendo: ¡Vive YHVH que ningún castigo te 

vendrá por este asunto!

11

 La mujer entonces preguntó: ¿A quién 

te  haré  subir?  Y  dijo:  Hazme  subir  a 

Samuel.

12

 Y al ver a Samuel, la mujer clamó a gran 

voz; y la mujer habló a Saúl diciendo:

13

 ¿Por  qué  me  has  engañado?  ¡Tú  eres 

Saúl! Y el rey le dijo: No temas. ¿Qué es 

lo que estás viendo? La mujer respondió 

a Saúl: Veo un ser celestial° que sube a la 

tierra.

14

 Y dijo a ella: ¿Cuál es su forma? Y ella 

respondió: Sube un anciano cubierto con 

un  manto.  Saúl  entonces  entendió  que 

era Samuel, e inclinó el rostro a tierra y 

se postró.

15

 Y Samuel dijo a Saúl: ¿Por qué me has 

inquietado haciéndome subir? Y Saúl res-

pondió:  Estoy  muy  angustiado,  pues  los 

filisteos pelean contra mí, y ’Elohim se ha 

apartado de mí, y ya no me responde, ni 

por profeta ni por sueños, por lo cual te 

he llamado para que me hagas saber qué 

debo hacer.

16

 Y Samuel dijo: Si YHVH se ha apartado 

de ti y se ha hecho tu adversario, ¿por qué 

me preguntas a mí?

17

 YHVH ha hecho como habló por medio 

mío: Arrancó YHVH el reino de tu mano y 

se lo ha dado a tu compañero, a David,

18

 por  cuanto  no  obedeciste  la  voz  de 

YHVH, ni cumpliste el furor de su ira so-

bre  Amalec,  por  eso  YHVH  te  ha  hecho 

esto hoy.

19

 Además YHVH entregará a Israel conti-

go en manos de los filisteos, y mañana tú 

y tus hijos estaréis conmigo. Ciertamente 

YHVH entregará también al campamento 

de Israel en manos de los filisteos.

20

 E inmediatamente Saúl cayó en tierra 

cuan largo era, y tuvo gran temor por las 

palabras de Samuel, y no hubo fuerzas en 

él, porque en todo aquel día y aquella no-

che no había comido pan.

21

 Y la mujer se acercó a Saúl, y vio que 

estaba muy agitado y le dijo: He aquí tu 

sierva ha obedecido tu voz, y puse mi vida 

en la palma de mi mano, y obedecí las pa-

labras que tú me hablaste.

22

 Te ruego pues que tú también atiendas 

la voz de tu sierva, y pondré delante de ti 

un trozo de pan para que comas y te for-

talezcas cuando sigas tu camino.

28.6 Lit. lucesUrim y Tumim constituyen un medio de discernir o averiguar la voluntad de Dios mediante la intervención del 

sumo sacerdote. No se sabe en qué consistían exactamente. LXX traduce urim por revelación, y tumim por verdad. Prob. se 

trataba de unas piedras. 

28.7 Se refiere a personas poseídas por un espíritu pitónico para consultar a los muertos.  28.13 Heb. 

’elohim. Este vocablo plural, además de usarse para referirse al Dios de Israel, también se emplea para referirse a seres sobre-

naturales e incluso a altos dignatarios. También podría traducirse por he visto a un dios, o he visto a un ser sobrenatural.


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1 Samuel 28:23

316

23

 Pero él rehusó, y dijo: No comeré. En-

tonces sus siervos y aquella mujer le in-

sistieron, y él atendió la voz de ellos, se 

levantó del suelo y se sentó en la cama.

24

 Y  aquella  mujer  tenía  en  la  casa  un 

ternero cebado, y se apresuró a matarlo. 

Luego tomó harina, la amasó, y coció con 

ella panes sin levadura,

25

 y lo llevó ante Saúl y sus criados, quie-

nes  comieron.  Después  se  levantaron  y 

partieron aquella misma noche.

Desconfianza de los filisteos

29

Los  filisteos  reunieron  todos  sus 

ejércitos en Afec; mientras que los 

israelitas acamparon junto a la fuente que 

está en Jezreel.

2

 Y los príncipes de los filisteos desfilaban 

por  centenas  y  por  miles,  y  David  y  sus 

hombres  marchaban  en  la  retaguardia 

con Aquís.

3

 Entonces  los  príncipes  de  los  filisteos 

dijeron: ¿Qué hacen aquí estos hebreos? 

Y Aquís respondió a los príncipes de los 

filisteos:  ¿No  es  éste  David,  el  siervo  de 

Saúl, rey de Israel, que ha estado conmi-

go estos días o estos años, y nada malo he 

hallado en él desde el día en que se pasó a 

mí hasta hoy?

4

 Pero  los  príncipes  de  los  filisteos  se 

enojaron contra él, y le dijeron los prín-

cipes de los filisteos: Manda de vuelta al 

hombre para que regrese al lugar que le 

asignaste,  y  no  venga  con  nosotros  a  la 

batalla,  no  sea  que  en  la  batalla  se  nos 

vuelva adversario. Pues, ¿con qué podría 

hacerse él aceptable a su señor? ¿No sería 

con las cabezas de estos hombres?

5

 ¿No es este David de quien se cantaba en 

los corros, diciendo:

Saúl hirió sus miles,

Y David a sus diez miles?

6

 Entonces Aquís llamó a David, y le dijo: 

¡Vive YHVH, tú eres recto!, y me ha pare-

cido bien que salgas y entres en el cam-

pamento conmigo, porque ninguna cosa 

mala he hallado en ti desde el día cuando 

viniste a mí hasta hoy; pero ante los ojos 

de los príncipes tú no eres grato.

7

 Vuélvete  pues,  y  vete  en  paz,  para  no 

desagradar a los príncipes de los filisteos.

8

 Y  David  dijo  a  Aquís:  ¿Qué  he  hecho? 

¿Qué has hallado en tu siervo desde el día 

en que estuve contigo hasta hoy, para que 

no vaya y combata contra los enemigos de 

mi señor el rey?

9

 Y Aquís respondió a David, y dijo: Yo sé 

que  tú  eres  bueno  delante  de  mis  ojos, 

como un ángel de Dios; pero los príncipes 

de los filisteos han dicho: No subirá con 

nosotros a la batalla.

10

 Por tanto, levántate mañana temprano 

con los siervos de tu señor que han veni-

do contigo, y tan pronto se hayan levan-

tado y haya claridad, marchaos.

11

 Entonces  David  y  sus  hombres  se  le-

vantaron muy de mañana, para irse y vol-

ver a la tierra de los filisteos; y los filisteos 

marcharon a Jezreel.

Contra los amalecitas

30

Al  tercer  día,  cuando  David  y  sus 

hombres llegaron a Siclag, aconte-

ció que los amalecitas habían hecho una 

incursión  en  el  Néguev  contra  Siclag,  y 

habían asolado y prendido fuego a Siclag.

2

 También  habían  tomado  cautivas  a  las 

mujeres  y  a  todos  los  que  estaban  allí, 

grandes y pequeños. Pero a nadie habían 

matado, sino que se los habían llevado al 

proseguir su camino.

3

 Cuando  David  y  sus  hombres  llegaron 

a  la  ciudad,  he  aquí  estaba  quemada  a 

fuego, y sus mujeres, y sus hijos e hijas 

habían sido llevados cautivos.

4

 Entonces  David  y  la  gente  que  estaba 

con él alzaron su voz y lloraron, hasta que 

no les quedaron más fuerzas para llorar.

5

 También  habían  sido  tomadas  cautivas 

las dos mujeres de David: Ahinoam jezre-

elita y Abigail, mujer de Nabal carmelita.

6

 Y David estaba muy angustiado porque el 

pueblo hablaba de apedrearlo, por cuanto 

todo el pueblo estaba con ánimo amarga-

do, cada uno por sus hijos y por sus hijas. 

Pero David se fortaleció en YHVH su Dios.

7

 Y  dijo  David  al  sacerdote  Abiatar  ben 

Ahimelec:  Te  ruego  que  me  acerques  el 

éfod. Y Abiatar acercó el éfod a David.

8

 Y  David  consultó  a  YHVH,  pregun-

tándole:  ¿Perseguiré  a  esta  banda?  ¿Los 

podré alcanzar? Y Él le respondió: Persí-

guelos porque de seguro la alcanzarás, y 

sin duda los rescatarás.

9

 Así pues, David partió, él y los seiscien-

tos hombres que estaban con él, y llegaron 


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1 Samuel 31:2

317

hasta el torrente Besor, que los rezagados 

no pasaron.

10

 Pero David continuó, él y cuatrocien-

tos hombres, porque doscientos se habían 

detenido pues estaban demasiado cansa-

dos para cruzar el torrente Besor.

11

 Y encontraron por el campo a un egip-

cio, al cual llevaron a David, y le dieron 

pan, y comió, y le hicieron beber agua;

12

 y  le  dieron  un  trozo  de  torta  de  hi-

gos secos y dos racimos de uvas pasas. Y 

cuando él hubo comido le volvió el alien-

to, pues no había comido pan ni bebido 

agua en tres días y tres noches.

13

 Y  David  le  preguntó:  ¿A  quién  perte-

neces? ¿De dónde vienes? Y él respondió: 

Soy un joven de Egipto, siervo de un ama-

lecita, y mi amo me abandonó hace tres 

días, porque enfermé.

14

 Nosotros hicimos una incursión al sur 

de los cereteos, y sobre lo que pertenece 

a Judá, y por el sur de Caleb, y prendimos 

fuego a Siclag.

15

 Y David le dijo: ¿Me conducirás tú has-

ta esa banda? Y él respondió: Júrame por 

’Elohim que no me matarás ni me entre-

garás en mano de mi amo, y yo te condu-

ciré a esa banda.

16

 Así  pues,  lo  condujo.  Y  he  aquí  ellos 

estaban esparcidos por toda aquella tierra 

comiendo y bebiendo y festejando por todo 

el gran despojo que habían tomado de la 

tierra de los filisteos y de la tierra de Judá.

17

 Y David los atacó desde el alba hasta la 

tarde del día siguiente, y no escapó ningu-

no de ellos, excepto cuatrocientos jóvenes 

que montaron en camellos y huyeron.

18

 Y David liberó a todos los que habían 

tomado  los  amalecitas,  asimismo  David 

rescató a sus dos mujeres.

19

 Y no les faltó cosa pequeña ni grande, ni 

hijos ni hijas, ni del despojo de todo lo que 

les habían tomado. David lo recuperó todo.

20

 Además David se apoderó de todos los 

rebaños y las vacadas, los cuales llevaron 

delante del ganado recobrado,° y decían: 

¡Este es el botín de David!

21

 Y  David  llegó  a  los  doscientos  hom-

bres,  que  de  tan  débiles  que  estaban  no 

habían podido seguir a David, a los cua-

les había dejado junto al torrente Besor. 

Ellos salieron a recibir a David y a la gen-

te que lo acompañaba, y cuando David se 

aproximó, los saludó.

22

 Pero todos los hombres perversos e hijos 

de Belial de los que habían ido con David, 

hablaron y dijeron: Puesto que no fueron 

con nosotros, no les daremos del despojo 

recuperado, excepto su mujer y sus hijos a 

cada uno para que se los lleven y se vayan.

23

 Pero David dijo: Hermanos míos, no ha-

gáis eso con lo que nos ha dado YHVH, pues 

nos ha guardado y ha entregado en nuestra 

mano la banda que vino contra nosotros.

24

 ¿Y quién os escuchará en esto? Porque 

la misma parte ha de ser para los que van 

a  la  batalla  que  para  los  que  se  quedan 

con el bagaje. Que participen por igual.

25

 Y  desde  aquel  día  en  adelante  quedó 

establecido así por estatuto y por decreto 

en Israel hasta hoy.

26

 Y  al  llegar  a  Siclag,  David  envió  par-

te del despojo a los ancianos de Judá, sus 

amigos,  diciendo:  He  aquí  un  presente 

para vosotros del despojo de los enemigos 

de YHVH.

27

 También  envió°  a  los  que  estaban  en 

Bet-’El, en Ramot del sur, a los que esta-

ban en Jatir,

28

 a los que estaban en Aroer y en Sifmot, 

a los que estaban en Estemoa;

29

 a los que estaban en Racal, a los que 

estaban en las ciudades de Jerameel, a los 

que estaban en las ciudades del ceneo;

30

 a los que estaban en Horma, a los que 

estaban en Corasán, a los que estaban en 

Atac;

31

 y a los que estaban en Hebrón, y para 

todos los lugares que David había recorri-

do con sus hombres.

Muerte de Saúl

31

Entretanto, los filisteos combatían 

contra Israel, y los israelitas huye-

ron de delante de los filisteos, y cayeron 

muertos en el monte Gilboa.

2

 Y  los  filisteos  siguieron  de  cerca  tras 

Saúl y sus hijos; y mataron los filisteos a 

30.20 .recobrado.  30.27 Hay aquí una gran elipsis. El verbo enviar del v. 26 es de aplicación indispensable en los vs. 27-31 

pues en todo ese pasaje no hay otro verbo. 


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1 Samuel 31:3

318

Jonatán, a Abinadab y a Malquisúa, hijos 

de Saúl.

3

 Y  arreció  la  batalla  contra  Saúl,  y  lo 

alcanzaron  los  hombres  que  tiran  con 

el arco, y fue herido gravemente por los 

arqueros.

4

 Entonces Saúl dijo a su escudero: ¡Saca 

tu espada y traspásame con ella!, no sea 

que vengan estos incircuncisos y me tras-

pasen, y hagan escarnio de mí. Pero su es-

cudero no quiso, pues tenía gran temor. 

Entonces Saúl tomó la espada y se echó 

sobre ella.

5

 Viendo  que  Saúl  moría,  su  escudero 

también  se  echó  sobre  su  propia  espada 

para morir con él.

6

 Aquel día, pues, murió Saúl con tres de 

sus hijos, su escudero, y todos sus hom-

bres juntamente con él.

7

 Y cuando los hombres de Israel que es-

taban a lo largo del valle, al otro lado del 

Jordán,  vieron  que  los  de  Israel  habían 

huido y que Saúl y sus hijos habían muer-

to, abandonaron las ciudades y huyeron. 

Entonces fueron los filisteos y habitaron 

en ellas.

8

 Al día siguiente aconteció que los filis-

teos  fueron  a  despojar  a  los  muertos,  y 

hallaron a Saúl y a sus tres hijos tendidos 

en el monte Gilboa.

9

 Y le cortaron su cabeza y lo despojaron 

de  sus  armas,  y  enviaron  a  proclamar  la 

noticia por toda la tierra de los filisteos, en 

el templo de sus ídolos y entre el pueblo.

10

 Y colgaron sus armas en el templo de 

Astarot,  y  enclavaron  su  cadáver  en  el 

muro de Bet-sán.

11

 Cuando los habitantes de Jabes Galaad 

oyeron lo que los filisteos habían hecho 

a Saúl,

12

 se  levantaron  todos  los  hombres  de 

valor y anduvieron toda aquella noche, y 

bajaron el cadáver de Saúl y los cadáveres 

de sus hijos del muro de Bet-sán, y fueron 

a Jabes y los quemaron allí.

13

 Luego  tomaron  sus  huesos  y  los  se-

pultaron debajo del tamarisco en Jabes, y 

ayunaron siete días.


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1

Aconteció  que  después  de  la  muerte 

de Saúl, habiendo regresado David de 

la derrota° de los amalecitas,° David per-

maneció dos días en Siclag.

2

 Al tercer día sucedió que llegó un hom-

bre  del  campamento  de  Saúl,  con  sus 

vestidos  rotos  y  tierra  sobre  su  cabeza. 

Y  ocurrió  que  cuando  llegó  ante  David, 

cayó en tierra° y se postró.

3

 Y David le dijo: ¿De dónde vienes? Y él le 

respondió: He escapado del campamento 

de Israel.

4

 Y David le preguntó: ¿Qué sucedió? ¡Dí-

melo ahora! Y él dijo: El pueblo huyó de 

la batalla, y muchos del pueblo cayeron y 

murieron, y también Saúl y su hijo Jona-

tán han muerto.

5

 Entonces David dijo al joven que le in-

formaba: ¿Cómo sabes que Saúl y su hijo 

Jonatán han muerto?

6

 El joven que le informaba dijo: Me en-

contraba casualmente en el monte Gilboa 

y he aquí Saúl que estaba apoyado sobre 

su lanza, y he aquí los carros y jinetes lo 

habían alcanzado.

7

 Y él, volviéndose, me vio y me llamó. Y 

dije: Heme aquí.

8

 Y él me preguntó: ¿Quién eres tú? Y le 

respondí: Soy un amalecita.

9

 Entonces me dijo: Ponte junto a mí y má-

tame ya, porque la agonía° se ha apoderado 

de mí, aunque mi vida está todavía en mí.

10

 Así que me puse junto a él y lo rematé, 

porque sabía que no podría vivir después 

de haber caído así, y tomé la corona que te-

nía en su cabeza y el brazalete que tenía en 

su brazo, y los he traído aquí a mi señor.

11

 Entonces  David  asiendo  sus  vestidos, 

los rasgó, y lo mismo hicieron todos los 

hombres que estaban con él.

12

 E  hicieron  duelo  y  lloraron  y  ayuna-

ron hasta la tarde por Saúl y por su hijo 

Jonatán, y por el pueblo de YHVH° y por 

la casa de Israel, porque habían caído por 

la espada.

13

 Luego David preguntó al joven que le 

informaba: ¿De dónde eres tú? Y él dijo: 

Soy hijo de un extranjero, amalecita.

14

 Y le dijo David: ¿Cómo no tuviste te-

mor de extender tu mano para matar al 

ungido de YHVH?

15

 Entonces David llamó a uno de los jó-

venes y dijo: ¡Arremete y cae sobre él! Y él 

lo hirió y murió.

16

 Y  David  le  dijo:  ¡Tu  sangre  sea  sobre 

tu cabeza, pues tu boca atestiguó contra 

ti  cuando  dijiste:  Yo  maté  al  ungido  de 

YHVH!

17

 Entonces David lamentó con esta en-

decha a Saúl y a Jonatán su hijo,

18

 y mandó que enseñaran a los hijos de 

Judá el Arco.° He aquí, está escrito en el 

rollo del Justo:

19

    ¡Ay del esplendor de Israel, herido 

en tus alturas!

¡Cómo han caído los valientes!

20

    No lo proclaméis en Gat, ni lo 

anunciéis en las plazas de 

Ascalón.

Cántico del Arco

1.1 Lit. golpear. Utilizado también en acciones de herir, matar, atacar o vencer.  1.1 Lit. al Amalec. En hebreo es común men-

cionar a un pueblo haciendo referencia a la persona que le dio el nombre. 

1.2 LXX añade sobre su rostro.  1.9 Heb. shavats 

= apoplejía, espasmo, convulsión. Esta palabra aparece sólo una vez en todo el AP. 

1.12 LXX: por el pueblo de Judá (quizá se 

trate de una asimilación con la cláusula siguiente, la casa de Israel). 

1.18 el Arco Prob. título dado a esta elegía en referencia 

al v. 22 Arco de Jonatán


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2 Samuel 1:21

320

Que no se alegren las hijas de los 

filisteos,

Y no lo celebren las hijas de los 

incircuncisos.

21

    ¡Oh montes de Gilboa, ni rocío ni 

lluvia caiga sobre vosotros, ni 

campos de ofrendas!

Porque allí quedó manchado el 

escudo de los valientes;

El escudo de Saúl, no estaba ungido 

con aceite.

22

    Sino con sangre de heridos,

Y grosura de valientes,

¡Arco de Jonatán que jamás 

retrocedió!

¡Espada de Saúl que no volvía vacía!

23

    Saúl y Jonatán: Amados y queridos 

en su vida,

Ni en su muerte fueron separados.

Más ligeros que águilas y más 

fuertes que leones.

24

    ¡Oh hijas de Israel, llorad por Saúl!

Que os vestía de lino fino y adornaba 

de oro vuestros vestidos.

25

    ¡Cómo han caído los valientes en 

medio de la batalla!

¡Jonatán, herido en tus alturas!

26

    ¡Cómo sufro por ti, oh Jonatán, 

hermano mío!

¡Ay, cómo te quería!

Tu amor era para mí más 

maravilloso que amoríos de 

mujeres.

27

    ¡Cómo han caído los valientes, y 

perecido las armas de guerra!°

David en Hebrón

2

Después de esto aconteció que David 

consultó a YHVH, diciendo: ¿Subiré a 

alguna de las ciudades de Judá? Y YHVH 

le dijo: Sube. Y preguntó David: ¿A dónde 

subiré? Y Él respondió: A Hebrón.

2

 David subió allá, y también sus dos mu-

jeres,  Ahinoam  la  jezreelita,  y  Abigail, 

mujer de Nabal carmelita.

3

 También  hizo  subir  David  a  sus  hom-

bres,  los  que  habían  estado  con  él,  cada 

uno con su familia; y habitaron en las ciu-

dades de Hebrón.

4

 Y los hombres de Judá llegaron y ungie-

ron allí a David como rey sobre la casa de 

Judá,  y  le  declararon  a  David,  diciendo: 

Los hombres de Jabes Galaad son los que 

sepultaron a Saúl.

5

 Y David envió mensajeros a los hombres 

de Jabes Galaad, y les dijo: Benditos seáis 

vosotros de YHVH, que hicisteis esta mi-

sericordia con vuestro señor, con Saúl, al 

sepultarlo.

6

 Y ahora YHVH mostrará su bondad con 

vosotros, y también yo he de recompen-

sar esa bondad por haber hecho tal cosa.

7

 Ahora pues, fortalézcanse vuestras ma-

nos  y  sed  valientes,  pues  muerto  Saúl 

vuestro señor, los de la casa de Judá me 

han ungido como rey sobre ellos.

8

 Pero Abner ben Ner, capitán del ejérci-

to de Saúl, tomó a Is-boset ben Saúl, y lo 

condujo a Mahanaim,

9

 y  lo  proclamó  rey  sobre  Galaad,  sobre 

Asurí,° sobre Jezreel, sobre Efraín, sobre 

Benjamín y sobre todo Israel.

10

 De cuarenta años era Is-boset ben Saúl 

cuando comenzó a reinar sobre Israel, y 

reinó dos años. Solamente la casa de Judá 

seguía a David.°

11

 Y el número de días que David fue rey 

en  Hebrón  sobre  la  casa  de  Judá  fue  de 

siete años y seis meses.

12

 Abner  ben  Ner  salió  de  Mahanaim  a 

Gabaón  con  los  siervos  de  Is-boset  ben 

Saúl.

13

 Y Joab hijo de Sarvia y los siervos de 

David salieron y los encontraron junto al 

estanque de Gabaón, y se sentaron, éstos 

a un lado del estanque y aquéllos al otro 

lado.

14

 Y Abner dijo a Joab: ¡Levántense los jó-

venes, y que se desafíen° ante nosotros! Y 

Joab respondió: ¡Que se levanten!

15

 Se levantaron pues y avanzaron en nú-

mero:° doce por Benjamín y por Is-boset 

ben Saúl, y doce de los siervos de David.

16

 Y echando mano cada uno de la cabeza 

de su contrario le hundió la espada en el 

costado,  y  cayeron  juntos,  de  donde  fue 

llamado aquel lugar Helcat-hazurim,° el 

cual está en Gabaón.

1.27 LXX: los objetos deseables.  2.9 Sir: Gesor, VUL Gesuri.  2.10 Lit. estaban detrás de David.  2.14 Lit. jugar, divertirse. Se 

aplica a la acción deportiva y, por extensión, a la competición. 

2.15 Esta expresión resalta el número exacto de contendientes. 

2.16 Esto es, campo del costillar, o de los cuchillos filosos


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2 Samuel 3:10

321

17

 Aquel día la batalla fue muy dura, pero 

Abner y los hombres de Israel fueron de-

rrotados delante de los siervos de David.

18

 Y estaban allí los tres hijos de Sarvia: 

Joab, Abisai y Asael. Y Asael era tan ligero 

de pies como las gacelas del campo.

19

 Y Asael persiguió a Abner, y no se des-

viaba de detrás de Abner ni a derecha ni 

a izquierda.

20

 Abner, volviéndose, le dijo: ¿Eres Asael? 

Y le respondió: Sí, soy yo.

21

 Abner le dijo: Apártate a derecha o a iz-

quierda, echa mano a uno de los jóvenes 

y  toma  su  despojo.  Pero  Asael  no  quiso 

dejar de perseguirlo.

22

 Y  Abner  volvió  a  decir  a  Asael:  ¡Deja 

de  perseguirme!  ¿Por  qué  he  de  herirte 

derribándote  a  tierra?  ¿Cómo  alzaré  mi 

rostro ante Joab tu hermano?

23

 Pero no queriendo él apartarse, Abner 

lo hirió con el regatón de la lanza por la 

quinta  costilla,  y  la  lanza  le  salió  por  la 

espalda; y allí cayó y murió en el mismo 

sitio. Y sucedió que todo el que venía al 

lugar donde Asael había caído y muerto, 

se detenía.

24

 Pero  Joab  y  Abisai  siguieron  tras  Ab-

ner; y cuando se puso el sol ellos llegaron 

al collado de Amma,° que está delante de 

Gía, camino al desierto de Gabaón.

25

 Y  los  hijos  de  Benjamín  se  agruparon 

detrás de Abner formando una sola tropa, y 

se detuvieron en la cumbre de un collado.

26

 Entonces Abner gritó a Joab y dijo: ¿De-

vorará la espada para siempre? ¿Acaso no 

sabes que al final habrá amargura? ¿Hasta 

cuándo te tardarás en decir al pueblo que 

deje de perseguir a sus hermanos?°

27

 Y dijo Joab: Vive Ha-’Elohim que si no 

hubieras hablado, ciertamente el pueblo 

no habría dejado de perseguir a su próji-

mo hasta la mañana.

28

 Y  Joab  hizo  sonar  el  shofar  y  todo  el 

pueblo se detuvo, y no persiguieron más 

a Israel ni continuaron luchando.

29

 Y Abner y sus hombres caminaron por 

el Arabá° toda aquella noche, y cruzando 

el Jordán marcharon por todo el Bitrón y 

llegaron a Mahanaim.

30

 Joab  también  se  volvió  de  perseguir 

a Abner, y cuando pasó revista a todo el 

ejército, de los siervos de David faltaron 

diecinueve hombres y Asael.

31

 Pero  los  siervos  de  David  habían  he-

rido  a  trescientos  sesenta  hombres  de 

Benjamín y de los hombres° de Abner, los 

cuales murieron.

32

 Y llevando a Asael, lo sepultaron en el 

sepulcro de su padre que estaba en Bet-

léhem.  Después  Joab  y  sus  hombres  ca-

minaron toda aquella noche hasta que les 

amaneció en Hebrón.

Asesinato de Abner

3

La  guerra  entre  la  casa  de  Saúl  y  la 

casa de David fue larga, pero David se 

fortalecía, en tanto que la casa de Saúl se 

debilitaba cada vez más.

2

 A  David  le  nacieron  hijos  en  Hebrón: 

Su primogénito fue Amnón, de Ahinoam 

jezreelita,

3

 su segundo Quileab, de Abigail, mujer de 

Nabal el carmelita, el tercero Absalón, hijo 

de Maaca, hija de Talmai rey de Gesur,

4

 el  cuarto  Adonías  hijo  de  Haggit,  el 

quinto Sefatías hijo de Abital,

5

 y el sexto Itream, de Egla, mujer de Da-

vid. Estos le nacieron a David en Hebrón.

6

 Durante el transcurso de la guerra entre 

la casa de Saúl y la casa de David, Abner se 

esforzaba por la casa de Saúl.

7

 Y Saúl había tenido una concubina lla-

mada Rizpa, hija de Aja. Y le dijo° a Abner: 

¿Por qué te has llegado a la concubina de 

mi padre?

8

 Y  Abner  se  irritó  en  gran  manera  por 

las palabras de Is-boset y dijo: ¿Acaso soy 

la  cabeza  de  un  perro  que  pertenece  a 

Judá?° Hasta hoy sigo mostrando favor a 

la casa de Saúl tu padre, a sus hermanos y 

amigos, de manera que no te he entrega-

do en mano de David.° ¿Y ahora me echas 

en cara un asunto de mujeres?

9

 Así haga ’Elohim a Abner y aún le aña-

da,° si lo que YHVH ha jurado a David no 

lo obtengo para él,

10

 traspasando el reino de la casa de Saúl 

y  confirmando  el  trono  de  David  sobre 

2.24 VUL: del collado o del acueducto.  2.26 Lit. que vuelvan de detrás de sus hermanos.  2.29 Esto es, el valle del Jordán

2.31 Lit. y entre los hombres.  3.7 Esto es, Is-boset.  3.8 LXX omite que pertenece a Judá.  3.8 LXX: y no he desertado a la casa 

de David

3.9 Heb. imprecatorio muy usado en los juramentos y en contextos similares. Algo así como caiga sobre mí el peor 

de los castigos


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2 Samuel 3:11

322

Israel y sobre Judá, desde Dan hasta Beer-

seba.

11

 Y él no pudo responder a Abner porque 

le temía.

12

 Entonces  Abner  envió  mensajeros 

a  David  para  decirle  de  parte  suya:  ¿De 

quién es la tierra? Y que también le dije-

ran:  Concerta  pacto  conmigo,  y  he  aquí 

mi  mano  estará  contigo  para  hacer  que 

todo Israel se vuelva a ti.

13

 Y  él  respondió:  Bien,  yo  concertaré 

pacto  contigo,  pero  una  cosa  requeriré 

de ti: No verás mi rostro sin que primero 

traigas a Mical hija de Saúl cuando ven-

gas a verme.

14

 Y  David  envió  mensajeros  a  Is-boset 

ben Saúl, diciendo: Devuélveme mi mu-

jer  Mical,  a  quien  desposé  conmigo  por 

cien prepucios de filisteos.

15

 Entonces Is-boset envió a quitársela a 

aquel hombre, a Paltiel ben Lais.°

16

 Pero su marido salió con ella, camina-

do y llorando detrás de ella hasta Bahu-

rim, donde Abner le dijo: ¡Anda, vuélvete! 

Y él se regresó.

17

 Y Abner se comunicó con los ancianos 

de Israel, diciéndoles: En tiempos pasados 

buscabais a David por rey sobre vosotros.

18

 Ahora, pues, hacedlo así, porque YHVH 

ha hablado de David diciendo: Por mano 

de mi siervo David libraré a mi pueblo Is-

rael  de  mano  del  filisteo,  y  de  mano  de 

todos sus enemigos.

19

 Abner habló también a oídos de Ben-

jamín, y Abner mismo fue a Hebrón para 

decirle a David todo lo que parecía bien 

a los ojos de Israel, y a los ojos de toda la 

casa de Benjamín.

20

 Fue pues Abner a David en Hebrón, y 

con él veinte hombres. Y David hizo un 

banquete para Abner y para los hombres 

que estaban con él.

21

 Y  Abner  dijo  a  David:  ¡Me  levantaré, 

iré y reuniré para mi señor el rey a todo 

Israel!, para que concerten un pacto con-

tigo y tú reines sobre todo lo que desea 

tu alma. Y David despidió a Abner, y él se 

fue en paz.

22

 Y los siervos de David y Joab llegaron 

de  una  incursión  trayendo  consigo  un 

gran botín, pero Abner no estaba con Da-

vid en Hebrón, pues ya lo había despedido 

y él se había ido en paz.

23

 Cuando llegó Joab con todo el ejército 

que estaba con él, dieron aviso a Joab, di-

ciendo: Abner ben Ner ha venido al rey, y 

él lo ha despedido, y se ha ido en paz.

24

 Entonces Joab fue al rey y dijo: ¿Qué 

has hecho? ¡He aquí que Abner vino a ti! 

¿Por qué lo dejaste ir? ¡Ahora se ha ido!

25

 ¡Tú sabes que Abner ben Ner ha veni-

do a engañarte para saber adónde vas y de 

dónde vienes, y saber todo lo que haces!

26

 Y cuando Joab salió de la presencia de 

David, envió mensajeros tras Abner, y lo 

trajeron de vuelta desde Bor Sira, sin que 

David lo supiera.

27

 Y  cuando  Abner  regresó  a  Hebrón, 

Joab  lo  llamó  aparte°  en  medio  de  la 

puerta para hablarle en privado, y allí lo 

hirió por la quinta costilla,° de modo que 

murió, a causa de la sangre de su herma-

no Asael.

28

 Cuando  después  David  lo  supo,  dijo: 

¡Yo  y  mi  reino  somos  inocentes  ante 

YHVH  por  siempre  de  la  copiosa  sangre 

de Abner ben Ner!

29

 ¡Recaiga cual torbellino sobre la cabe-

za de Joab y sobre toda la casa de su pa-

dre!° ¡Que nunca falte de la casa de Joab 

quien  padezca  flujo,  ni  quien  sea  lepro-

so, ni quien se apoye en báculo, ni quien 

muera a espada, ni quien carezca de pan!

30

 Así Joab y Abisai su hermano asesina-

ron a Abner, porque él había dado muerte 

a Asael, hermano de ellos, durante la ba-

talla en Gabaón.

31

 Después David dijo a Joab y a todo el 

pueblo  que  estaba  con  él:  ¡Rasgad  vues-

tros vestidos, ceñíos sacos y haced duelo 

por Abner! Y el propio rey David iba de-

trás del féretro.

32

 Y sepultaron a Abner en Hebrón. Y el 

rey alzó su voz y lloró junto al sepulcro de 

Abner, y lloró también todo el pueblo.

33

 Y  el  rey  pronunció  esta  endecha  por 

Abner:

¿Tenía Abner que morir como muere 

un insensato?

34

    Tus manos no estaban atadas,°

3.15 

→1 S.25.44.  3.27 Lit. se lo apartó.  3.27 Es decir, en el vientre.  3.29 Qumram: casa de Joab.  3.34 Otros mss. añaden 

con cadenas


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2 Samuel 5:3

323

Ni apresados tus pies con grilletes.

Antes, como quien cae delante de los 

hijos de iniquidad, así caíste tú.

Y todo el pueblo° lloraba por él.

35

 Después todo el pueblo fue para con-

vencer a David de que comiera aquel día,° 

pero  David  juró  diciendo:  Así  me  haga 

’Elohim y aun me añada si yo pruebo pan 

o cualquier otra cosa antes de ponerse el 

sol.

36

 Y todo el pueblo supo esto, y lo vio con 

agrado. Todo cuanto hacía el rey parecía 

bien a todo el pueblo.

37

 Así todo el pueblo y todo Israel enten-

dió en aquel día que no provino del rey el 

dar muerte a Abner ben Ner.

38

 Y el rey dijo a sus siervos: ¿No sabéis 

que un príncipe y un gran hombre ha caí-

do hoy en Israel?

39

 Y yo, aunque ungido como rey, he sido 

benévolo, mientras que esa gente, los hi-

jos de Sarvia, han sido más duros que yo. 

¡Que  YHVH  pague  al  malvado  conforme 

a su maldad!

Asesinato de Is-boset

4

Y  cuando  el  hijo  de  Saúl°  supo  que 

Abner  había  muerto  en  Hebrón,  sus 

manos  se  debilitaron  y  todo  Israel  fue 

turbado.

2

 Y el hijo de Saúl tenía dos hombres que 

eran jefes de bandas: uno se llamaba Baa-

na, y el otro se llamaba Recab, hijos de Ri-

món beerotita, de los hijos de Benjamín 

(porque  también  Beerot  es  considerada 

de Benjamín,

3

 pues  los  beerotitas  habían  huido  a  Gi-

taim y moran allí como forasteros hasta 

hoy).

4

 Y Jonatán ben Saúl, tuvo un hijo lisiado 

de  los  pies.  Este  tenía  cinco  años  cuan-

do llegaron las noticias de Jezreel acerca 

de Saúl y Jonatán, y su nodriza lo tomó 

y  huyó,  pero  mientras  huía  apresurada-

mente, él cayó y quedó cojo. Su nombre 

era Mefi-boset.

5

 Los  hijos  de  Rimón  beerotita,  Recab  y 

Baana, fueron y entraron al mediodía en 

casa  de  Is-boset,  mientras  estaba  dur-

miendo la siesta.

6

 Y entrando hasta el interior de la casa 

como para llevar trigo, lo hirieron por la 

quinta costilla, y luego Recab y su herma-

no Baana huyeron.

7

 Cuando  entraron  en  la  casa,  estaba  él 

acostado sobre su lecho en la alcoba y lo 

hirieron y mataron, y luego lo decapita-

ron. Entonces tomaron su cabeza y mar-

charon  por  el  camino  del  Arabá  toda  la 

noche.

8

 Y llevaron a David la cabeza de Is-boset, 

a Hebrón, y dijeron al rey: ¡He aquí la ca-

beza de Is-boset, hijo de tu enemigo Saúl, 

que  atentaba  contra  tu  vida!  ¡YHVH  ha 

dado hoy a mi señor el rey venganza de 

Saúl y de su simiente!

9

 Pero  David  respondió  a  Recab  y  a  su 

hermano Baana, hijos de Rimón beeroti-

ta, diciendo: ¡Vive YHVH que ha redimido 

mi alma de toda adversidad!

10

 Si  a  quien  me  informó  diciendo:  ¡He 

aquí Saúl ha muerto!, lo hice prender y ma-

tar en Siclag en pago por la noticia, aunque 

se creía portador de buenas nuevas,

11

 ¡cuánto  más  a  vosotros,  hombres 

perversos que asesinasteis a un hombre 

justo en su propio lecho y en su misma 

casa! ¿No he de demandar ahora su san-

gre de vuestras manos, y quitaros de la 

tierra?

12

 Y  David  ordenó  a  los  jóvenes,  y  ellos 

los  mataron,  y  les  cortaron  las  manos  y 

los pies y los colgaron sobre el estanque 

en Hebrón. Luego tomaron la cabeza de 

Is-boset° y la enterraron en el sepulcro de 

Abner,° en Hebrón.°

David, rey de Israel

5

Entonces  todas  las  tribus  de  Israel 

fueron ante David en Hebrón, y habla-

ron diciendo: ¡Henos aquí, hueso tuyo y 

carne tuya!

2

 Porque en días anteriores, cuando Saúl 

era rey sobre nosotros, eras tú el que nos 

conducías  en  Israel,  y  YHVH  te  dijo:  Tú 

apacentarás a mi pueblo Israel, y serás el 

caudillo de Israel.

3

 Cuando todos los ancianos de Israel fue-

ron  ante  el  rey  en  Hebrón,  el  rey  David 

concertó  un  pacto  con  ellos  en  Hebrón 

3.34 Qumram omite todo el pueblo.  3.35 Lit. para hacer comer pan al rey durante el día.  4.1 LXX y Qumram añaden Mefi-boset 

antes de el hijo de Saúl

4.12 Qumram registra Mefi-boset.  4.12 LXX añade hijo de Ner.  4.12 LXX omite en Hebrón.


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2 Samuel 5:4

324

delante  de  YHVH;  y  ungieron  a  David 

como rey sobre Israel.

4

 Era David de treinta años cuando comen-

zó a reinar, y reinó durante cuarenta años.

5

 En Hebrón reinó sobre Judá siete años y 

seis meses, y en Jerusalem reinó treinta y 

tres años sobre todo Israel y Judá.

6

 Y marchó el rey con sus hombres a Je-

rusalem contra los jebuseos que habitaban 

en aquella tierra, los cuales habían habla-

do a David diciendo: No podrás entrar acá, 

pues hasta los ciegos y los cojos te recha-

zarían gritando: ¡David no entrará acá!

7

 Pero David capturó la fortaleza de Sión, 

que es la ciudad de David.

8

 Y en aquel día dijo David: Todo el que 

quiera  herir  a  los  jebuseos,  suba  por  el 

acueducto y llegue a los cojos y a los cie-

gos,° a los cuales el alma de David aborre-

ce, por cuanto el ciego y el cojo dijeron: 

¡No entrará en la casa!°

9

 Y David habitó en la fortaleza y la llamó 

ciudad de David. Luego David edificó los 

alrededores,°  desde  el  terraplén°  hacia 

adentro.

10

 Y David se engrandecía cada vez más, 

porque  YHVH,  ’Elohim  Sebaot°  estaba 

con él.

11

 E  Hiram,  rey  de  Tiro,  envió  emba-

jadores  a  David,  con  madera  de  cedro  y 

ebanistas, y canteros para los muros, los 

cuales edificaron la casa de David.

12

 Y David comprendió que YHVH lo ha-

bía  establecido  como  rey  sobre  Israel  y 

que había exaltado su reino por amor a su 

pueblo Israel.

13

 Después  que  vino  de  Hebrón,  David 

tomó concubinas y mujeres de Jerusalem; 

y le nacieron a David más hijos e hijas.

14

 Y estos son los nombres de los que le 

nacieron  en  Jerusalem:  Samúa,  Sobab, 

Natán, Salomón,

15

 Ibhar, Elisúa, Nefeg, Jafía,

16

 Elisama, Eliada y Elifelet.

17

 Y cuando los filisteos oyeron que ha-

bían  ungido  a  David  como  rey  sobre  Is-

rael, todos los filisteos subieron en busca 

de David, y David lo supo, y bajó a la for-

taleza.

18

 Y los filisteos llegaron y se desplegaron 

por el valle de Refaim.

19

 David consultó entonces a YHVH, di-

ciendo: ¿Subiré contra los filisteos? ¿Los 

entregarás en mi mano? Y YHVH respon-

dió  a  David:  Sube,  porque  ciertamente 

entregaré a los filisteos en tu mano.

20

 David  pues  fue  a  Baal-perazim,  y  allí 

los derrotó, y dijo: ¡YHVH me abrió bre-

cha entre mis enemigos como corriente 

impetuosa!  Por  eso  llamó  el  nombre  de 

aquel lugar Baal-perazim.°

21

 Y ellos abandonaron allí sus ídolos,° y 

David y sus hombres se los llevaron.

22

 Después  los  filisteos  subieron  nueva-

mente  y  se  desplegaron  por  el  valle  de 

Refaim.

23

 Y David consultó a YHVH, y Él le dijo: 

No subas, sino rodéalos por detrás, y sal a 

ellos frente a las balsameras.°

24

 Y  cuando  oigas  el  ruido  de  marcha 

en  las  copas  de  las  balsameras,  te  apre-

surarás,  porque  entonces  YHVH  saldrá 

delante de ti para herir al ejército de los 

filisteos.

25

 Y  David  hizo  tal  como  YHVH  le  ha-

bía ordenado, e hirió a los filisteos desde 

Geba hasta llegar a Gezer.

El traslado del Arca

6

Volvió David a reunir a todos los esco-

gidos de Israel: Treinta mil.

2

 Y se levantó David y partió de Baala de 

Judá  con  todo  el  pueblo  que  tenía  con-

sigo,  para  hacer  subir  de  allí  el  Arca  de 

Dios,  la  cual  es  llamada  por  el  Nombre, 

el nombre de YHVH Sebaot, sobre la cual 

están los querubines.

3

 Colocaron  el  Arca  de  Dios  en  un  carro 

nuevo, y se la llevaron de la casa de Abina-

dab que estaba en la colina. Uza y Ahío, hi-

jos de Abinadab, conducían el carro nuevo,

4

 y  lo  sacaron  con  el  Arca  de  Dios  de  la 

casa de Abinadab que estaba en la colina, 

y Ahío iba delante del Arca.

5.8  Los  cojos  y  los  ciegos  son  los  mismos  jebuseos.  Se  les  llama  así  porque  éstos  se  habían  burlado  de  Da-

vid  diciendo  que  incluso  los  cojos  y  los  ciegos  podrían  defender  la  ciudad  de  Jerusalem  ante  el  ataque  del  rey  Da-

vid. En respuesta a esa burla, el rey llama a los defensores de la ciudad cojos y ciegos

5.8 Esto es, la fortaleza de Sión

5.9 Prob. se trate de la extensión del muro de Jerusalem. LXX añade su propia ciudad.  5.9 Heb. Milo = terraplén. Este sustan-

tivo puede ser un nombre geográfico o bien hacer referencia a cierto lugar en las afueras de la ciudad. 

5.10 ’Elohim Sebaot 

→ § 4.  5.20 Esto es, Señor de las brechas.  5.21 LXX registra los dioses de ellos.  5.23 Es decir, árboles de bálsamo.


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2 Samuel 7:6

325

5

 Y David y toda la casa de Israel tocaban 

con  alegría  delante  de  YHVH  toda  clase 

de instrumentos de madera de abeto, con 

arpas, salterios, panderos, flautas y cím-

balos.

6

 Pero cuando llegaron a la era de Nacón, 

Uza alargó su mano al Arca de Dios para 

sostenerla,  porque  los  bueyes  tropeza-

ban.°

7

 Y  la  ira  de  YHVH  se  encendió  contra 

Uza, y Ha-’Elohim lo hirió allí por aque-

lla temeridad, y allí cayó muerto, junto al 

Arca de Dios.

8

 Y  David  se  disgustó  porque  YHVH  ha-

bía quebrantado a Uza, por lo que llamó 

aquel lugar Pérez-uza,° hasta hoy.

9

 Pero  aquel  día  David  tuvo  temor  de 

YHVH, y dijo: ¿Cómo podrá venir a mí el 

Arca de YHVH?

10

 Y David no quiso trasladar el Arca de 

YHVH consigo a la ciudad de David, sino 

que  la  hizo  llevar  a  casa  de  Obed-edom 

geteo.

11

 Y el Arca de YHVH estuvo en casa de 

Obed-edom  geteo  tres  meses,  y  bendijo 

YHVH a Obed-edom y a toda su casa.

12

 Y fue dado aviso al rey David, dicien-

do: YHVH ha bendecido la casa de Obed-

edom y todo lo que tiene a causa del Arca 

de Dios. Entonces David fue e hizo subir 

con alegría el Arca de Dios de la casa de 

Obed-edom a la ciudad de David.

13

 Y fue así que cuando los portadores del 

Arca de YHVH caminaban seis pasos, en-

tonces él sacrificaba un buey y un carnero 

cebado.

14

 Y David danzaba con toda su fuerza de-

lante de YHVH, y David estaba ceñido con 

un éfod de lino.

15

 Así David y toda la casa de Israel hicie-

ron subir el Arca de YHVH° con aclama-

ciones y al sonido del shofar.

16

 Y cuando el Arca de YHVH entró en la 

ciudad de David, aconteció que Mical hija 

de Saúl miró por la ventana, y viendo al 

rey David saltando y danzando delante de 

YHVH, lo despreció en su corazón.

17

 Llevaron, pues, el Arca de YHVH y la 

asentaron en su lugar en medio de la tien-

da que David le había levantado. Entonces 

David hizo elevar holocaustos y ofrendas 

de paz delante de YHVH.

18

 Y cuando David acabó de hacer subir el 

holocausto° y las ofrendas de paz, bendijo 

al pueblo en el nombre de YHVH Sebaot.

19

 Y repartió a todo el pueblo, a toda la 

multitud de Israel, tanto a hombres como 

a mujeres, a cada uno una torta de pan, 

una torta de dátiles y una torta de pasas.° 

Luego todo el pueblo se marchó cada uno 

a su casa.

20

 Pero al regresar David para bendecir su 

casa, Mical hija de Saúl salió al encuentro 

de  David  y  dijo:  ¡Cuán  honrado  ha  que-

dado hoy el rey de Israel, descubriéndose 

hoy  a  ojos  de  las  criadas  de  sus  siervos, 

como se descubre un bufón cualquiera!

21

 Entonces  David  dijo  a  Mical:  Fue  de-

lante de YHVH, quien me escogió por en-

cima de tu padre y de toda su casa para 

constituirme caudillo sobre el pueblo de 

YHVH, sobre Israel. Por tanto danzaré de-

lante de YHVH,

22

 y me humillaré aún más que esta vez, 

y me rebajaré ante mis propios ojos,° pero 

seré honrado delante de las criadas a las 

cuales te referiste.

23

 Y Mical hija de Saúl no tuvo hijos has-

ta el día de su muerte.

El pacto con David

7

Aconteció que cuando ya el rey habi-

taba en su casa, después que YHVH le 

había dado reposo de todos sus enemigos 

en derredor,

2

 el rey dijo al profeta Natán: He aquí, yo 

habito en casa de cedro, pero el Arca de 

Dios está entre cortinas.

3

 Y Natán respondió al rey: ¡Ve, haz todo 

lo que está en tu corazón, porque YHVH 

está contigo!

4

 Pero  aconteció  que  esa  misma  noche 

llegó palabra de YHVH a Natán, diciendo:

5

 Ve  y  di  a  mi  siervo,  a  David:  Así  dice 

YHVH: ¿Tú me edificarás Casa en que Yo 

habite?

6

 Porque no he habitado en casa alguna 

desde el día en que hice subir a los hijos 

de Israel de Egipto hasta hoy, sino que es-

tuve en tienda y en tabernáculo.

6.6 Se sobreentiende, porque iban a volcarla.  6.8 Esto es, la brecha de Uza.  6.15 Algunos mss. hebreos registran el Arca del 

Pacto

6.18 El TM presenta discordancia con el v. anterior.  6.19 Nuna ración y una copa.  6.22 LXX registra ante tus ojos.


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2 Samuel 7:7

326

7

 Doquiera que he estado yendo con todos 

los hijos de Israel ¿acaso he hablado pala-

bra con alguna de las tribus de Israel, a 

quien haya mandado apacentar a mi pue-

blo Israel, para decirles: ¿Por qué no me 

edificáis una Casa de cedro?

8

 Ahora pues, así dirás a mi siervo, a David: 

Así dice YHVH Sebaot: Yo te tomé del redil, 

de  seguir  tras  el  rebaño,  para  que  fueras 

caudillo sobre mi pueblo, sobre Israel,

9

 y he estado contigo en todo cuanto has 

andado, y he cortado de tu presencia a to-

dos tus enemigos, y te haré un gran nom-

bre, como el nombre de los grandes de la 

tierra.

10

 Asimismo he dispuesto un lugar para 

mi  pueblo,  para  Israel;  y  lo  he  plantado 

para que habite en él, y no sea más remo-

vido, ni los hijos de iniquidad continúen 

oprimiéndolo como al principio,

11

 como desde el día en que puse jueces 

sobre mi pueblo Israel, y te daré descanso 

de todos tus enemigos. Además, YHVH te 

hace saber que YHVH te edificará casa.

12

 Cuando  tus  días  sean  cumplidos  y 

duermas con tus padres, entonces levan-

taré  a  tu  descendiente  después  de  ti,  el 

cual saldrá de tus entrañas, y afirmaré su 

reino.

13

 Él edificará casa a mi Nombre y Yo afir-

maré el trono de su reino para siempre.

14

 Yo le seré por padre y él me será por 

hijo.  Cuando  haga  mal  lo  corregiré  con 

vara de hombres y con azotes de hijos de 

hombre.

15

 Pero mi misericordia no se apartará de 

él como la aparté de Saúl, a quien quité 

de delante de ti.

16

 Tu casa y tu reino permanecerán para 

siempre  ante  ti,  y  tu  trono  será  estable 

eternamente.

17

 Conforme a todas estas palabras, y se-

gún  toda  esta  visión,  así  habló  Natán  a 

David.

18

 Entonces  el  rey  David  vino  a  sentar-

se ante YHVH y dijo: ¡Oh Adonay YHVH! 

¿Quién soy yo y qué es mi casa, para que 

me hayas traído hasta aquí?

19

 Y como si esto fuera poco ante tus ojos, 

oh  Adonay  YHVH,  has  hablado  también 

acerca de la casa de tu siervo para un le-

jano  porvenir.  ¡Oh  Adonay  YHVH,  cuán 

grande designio para un hombre!

20

 ¿Y qué más puede decirte David? ¡Oh 

Adonay YHVH, Tú conoces a tu siervo!

21

 Según tu palabra y conforme a tu co-

razón has hecho toda esta grandeza para 

darla a conocer a tu siervo.

22

 Por tanto ¡cuán grande eres, oh Ado-

nay  YHVH!  ¡Nadie  hay  como  Tú,  ni  hay 

otro  ’Elohim  aparte  de  ti,  conforme  a 

todo lo que hemos escuchado con nues-

tros oídos!

23

 ¿Y  qué  otra  nación  hay  en  la  tierra 

como  tu  pueblo  Israel,  al  cual  ’Elohim 

vino a redimir como pueblo suyo, y a po-

nerle nombre, y a hacer por vosotros co-

sas grandes y terribles, expulsando a las 

naciones y a sus dioses ante el pueblo que 

libraste de Egipto?

24

 Y  has  establecido  a  tu  pueblo,  Israel, 

como pueblo tuyo para siempre, y Tú, oh 

YHVH, has llegado a ser su Dios.

25

 Ahora pues, YHVH ’Elohim, confirma 

para siempre la palabra que has hablado 

acerca  de  tu  siervo  y  de  su  casa,  y  haz 

como Tú has dicho.

26

 Que tu Nombre sea engrandecido para 

siempre, y que digan: ¡YHVH Sebaot es el 

Dios de Israel! Y que la casa de tu siervo 

David sea firme delante de ti.

27

 Porque Tú, YHVH Sebaot, Dios de Is-

rael, has despertado el oído de tu siervo, 

diciendo: Yo te edificaré casa. Por eso tu 

siervo  ha  hallado  en  su  corazón  osadía 

para elevar esta oración ante ti.

28

 Ahora pues, Adonay YHVH, Tú mismo 

eres Ha-’Elohim, y tus palabras son ver-

dad, y has hablado a tu siervo este bien.

29

 Dígnate, pues, bendecir la casa° de tu 

siervo, para que esté siempre en tu pre-

sencia, porque Tú, oh Adonay YHVH, has 

hablado, y con tu bendición, la casa de tu 

siervo será bendita para siempre.

Victorias de David

8

Aconteció después de esto que David 

derrotó  a  los  filisteos  y  los  sometió, 

y David tomó la rienda de la capital° de 

mano de los filisteos.

7.29 Referencia a distintos tipos de realidades: Puede denotar un edificio (casa, palacio o un templo, según el contexto), pero también un 

parentesco (en este caso a la familia más cercana). En este capítulo este término tiene ambos significados. 

8.1 Heb. meteg-haamá.


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2 Samuel 9:7

327

2

 También derrotó a Moab, y los midió a 

cordel haciéndolos echarse en tierra: dos 

cordeles para morir, y un cordel para vi-

vir. Y los moabitas fueron siervos de Da-

vid, y pagaron tributo.

3

 Y derrotó David a Hadad-ezer hijo de Re-

hob, rey de Soba, cuando éste fue a restable-

cer su dominio en la región del Éufrates.

4

 David  le  capturó  mil  setecientos  jine-

tes°  y  veinte  mil  hombres  de  infantería, 

y  desjarretó  David  los  caballos°  de  tiro, 

dejando sólo los de cien carros.°

5

 Y cuando los sirios de Damasco fueron 

a ayudar a Hadad-ezer, rey de Soba, Da-

vid mató a veintidós mil hombres de los 

sirios,

6

 e  impuso  David  guarniciones  en  Siria 

de Damasco, y los sirios fueron siervos de 

David, y pagaron tributo. Y a dondequiera 

que iba David, YHVH le daba la victoria.

7

 Y tomó David los escudos de oro que te-

nían los siervos de Hadad-ezer y los llevó 

a Jerusalem.

8

 Y de Beta y de Berotai, ciudades de Ha-

dad-ezer, el rey David recogió gran canti-

dad de bronce.

9

 Cuando Toi rey de Hamat oyó que David 

había vencido a todo el ejército de Hadad-

ezer,

10

 Toi envió a su hijo Joram al rey David 

para saludarlo y felicitarlo por el combate 

y la derrota de Hadad-ezer, pues Toi era 

enemigo de Hadad-ezer.° Y Joram° lleva-

ba en su mano objetos de plata, objetos de 

oro y objetos de bronce,

11

 los cuales el rey David dedicó a YHVH, 

añadiéndolos a la plata y al oro que había 

tomado de todas las naciones sometidas:

12

 De Aram, de Moab, de los amonitas, de 

los  filisteos,  de  Amalec  y  del  despojo  de 

Hadad-ezer hijo de Rehob, rey de Soba.

13

 David también ganó renombre para sí 

cuando  regresó  de  derrotar  a  dieciocho 

mil sirios en el valle de la Sal.

14

 E impuso guarniciones en Edom. Por 

todo Edom instaló guarniciones, y todos 

los  edomitas  fueron  siervos  de  David.  A 

dondequiera iba David, YHVH le daba la 

victoria.

15

 David reinó sobre todo Israel, y prac-

ticaba David el derecho y la justicia con 

todo su pueblo.

16

 Joab, el hijo de Sarvia, estaba al mando 

del  ejército,  y  Josafat  ben  Ahilud,  era  el 

cronista.

17

 Sadoc ben Ahitob y Ahimelec ben Abiatar, 

eran sacerdotes, y Seraías era el escriba.

18

 Benaía ben Joiada estaba a cargo de los 

cereteos y de los peleteos,° y los hijos de 

David eran los príncipes.°

El hijo de Jonatán

9

David  preguntó:  ¿Ha  quedado  alguien 

de la casa de Saúl a quien yo pueda mos-

trarle misericordia por amor a Jonatán?

2

 Y había un siervo de la casa de Saúl de 

nombre Siba, al cual hicieron ir ante Da-

vid,  y  el  rey  le  dijo:  ¿Eres  tú  Siba?  Y  él 

dijo: Tu siervo.

3

 Y el rey preguntó: ¿No queda ni un hom-

bre de la casa de Saúl para que haga con 

él misericordia de Dios? Y Siba respondió 

al rey: Aún queda un hijo de Jonatán, tu-

llido de ambos pies.

4

 Y el rey le dijo: ¿Dónde está? Y Siba dijo 

al rey: Mira, está en Lodebar, en casa de 

Maquir ben Amiel.

5

 Y el rey David envió a traerlo de casa de 

Maquir ben Amiel, en Lodebar.

6

 Y cuando Mefi-boset ben Jonatán, hijo 

de Saúl, llegó ante David, cayó sobre su 

rostro  y  se  postró.  Y  dijo  David:  ¿Mefi-

boset? Y él dijo: He aquí tu siervo.

7

 Entonces David le dijo: No temas, por-

que  ciertamente  haré  contigo  miseri-

cordia por amor a Jonatán tu padre, y te 

devolveré toda la tierra de Saúl tu padre,° 

y comerás siempre a mi mesa.

8.4 LXX registra mil carros y siete mil jinetes.  8.4 .los caballos.  8.4 Lit. dejó de él cien carros. Se entiende que dejó los sufi-

cientes caballos para tener cien carros utilizables. 

8.10 Lit. Toi era hombre de guerras para Hadad-ezer.  8.10 .Joram.  8.18 

Lit. el cereteo y el peleteo. Manera común de referirse a un colectivo de personas. Los cereteos eran un pueblo emparentado de 

alguna manera con los filisteos 

→Ez.25.16; Sof.2.5. Los cereteos y los peleteos que aparecen en este pasaje eran mercenarios 

que servían a David como guardias reales. 

8.18 El TM registra y Benaía, hijo de Joiada, y los cereteos y los peleteos y los hijos 

de David eran sacerdotes. Sin embargo, hay varias razones por las que esta lectura no puede ser correcta: Por una parte, resulta 

impensable que un grupo de mercenarios gentiles como eran los cereteos y los peleteos ejerciera el sacerdocio en Israel; y, por 

otra parte, es evidente, a la luz de 2 S.20.23 y 1 Cr.18.17, que Benaía era jefe de estos grupos. 

9.7 En hebreo, la palabra padre 

no designa únicamente al progenitor de una persona; puede referirse también a otros antepasados de la misma, tanto cercanos 

→Gn.28.13, como lejanos. →1 R.15.11.


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2 Samuel 9:8

328

8

 Y  él  se  postró  y  dijo:  ¿Qué  es  tu  sier-

vo, para que te fijes en un perro muerto 

como yo?

9

 El rey llamó entonces a Siba, siervo de 

Saúl, y le dijo: Todo lo que fue de Saúl y 

de toda su casa se las entrego al hijo de 

tu amo.

10

 Tú,  tus  hijos  y  tus  siervos  le  cultiva-

réis  las  tierras  y  le  entregaréis  para  que 

el hijo de tu amo tenga pan para comer, 

aunque Mefi-boset, el hijo de tu amo, co-

merá siempre pan en mi mesa. Y Siba te-

nía quince hijos y veinte siervos.

11

 Y  Siba  dijo  al  rey:  Conforme  a  todo 

lo que mi señor el rey ha ordenado a su 

siervo, así hará tu siervo. Y Mefi-boset co-

mió en la mesa, como uno de los hijos del 

rey.°

12

 Y Mefi-boset tenía un hijo pequeño lla-

mado  Micaía.  Y  todos  los  que  habitaban 

en  la  casa  de  Siba  eran  siervos  de  Mefi-

boset.

13

 Pero Mefi-boset, que estaba tullido de 

ambos pies, moraba en Jerusalem, porque 

comía siempre a la mesa del rey.

Contra los amonitas

10

Después  de  esto,  aconteció  que 

murió el rey de los amonitas, y en 

lugar suyo reinó su hijo Hanún.

2

 Entonces David dijo: Haré misericordia 

con Hanún, el hijo de Nahas, así como su 

padre hizo misericordia conmigo. Y David 

envió a sus siervos para consolarlo por su 

padre.  Pero  cuando  los  siervos  de  David 

entraron en tierra de los amonitas,

3

 los príncipes de los amonitas dijeron a 

su  señor  Hanún:  ¿Crees  que  David  está 

honrando a tu padre porque te ha enviado 

consoladores? ¿No te ha enviado David a 

sus siervos para reconocer la ciudad, para 

espiarla y conquistarla?

4

 Entonces Hanún tomó a los siervos de 

David, les rasuró la mitad de la barba, les 

cortó sus vestiduras hasta la mitad de las 

nalgas,° y los despidió.

5

 Cuando informaron a David, él envió a 

encontrarlos,  pues  los  hombres  estaban 

muy avergonzados. Y el rey hizo decirles: 

Permaneced  en  Jericó  hasta  que  crezca 

vuestra barba, entonces regresaréis.

6

 Y cuando los amonitas supusieron que 

habían  sido  aborrecidos  por  David,  los 

amonitas mandaron a contratar a los si-

rios de Bet-rehob y a los sirios de Soba, 

veinte mil infantes, y del rey de Maaca mil 

hombres, y de Is-tob doce mil hombres.

7

 Cuando David lo oyó envió a Joab con 

todo el ejército de hombres valientes.

8

 Y los amonitas salieron a presentar ba-

talla a la entrada de la puerta, y los sirios 

de Soba, de Rehob, de Is-tob y de Maaca, 

estaban aparte° en el campo.

9

 Viendo Joab que la batalla se le presentaba 

por el frente y por la retaguardia, escogió 

entre los mejores hombres de Israel y los 

colocó en orden de batalla contra los sirios,

10

 y entregó el resto del pueblo en mano 

de  Abisai  su  hermano.  Y  poniéndolo  en 

orden de batalla contra los amonitas,

11

 dijo: Si los sirios son demasiado fuer-

tes para mí, tú me ayudarás, y si los amo-

nitas son más fuertes que tú, entonces yo 

te ayudaré.

12

 ¡Esfuérzate,  y  mostrémonos  valientes 

por amor a nuestro pueblo y por las ciu-

dades de nuestro Dios, y que YHVH haga 

lo que sea bueno ante sus ojos!

13

 Y  Joab  y  el  pueblo  que  estaba  con  él 

acudió a la batalla contra los sirios, y ellos 

huyeron delante de su presencia.

14

 Y viendo los amonitas que los sirios huían, 

huyeron delante de Abisai, y entraron en la 

ciudad. Luego Joab se volvió de combatir a 

los amonitas, y regresó a Jerusalem.

15

 Pero  cuando  los  sirios  vieron  que  ha-

bían sido derrotados delante de Israel, se 

volvieron a reunir;

16

 y  Hadad-ezer  mandó  traer  a  los  sirios 

que estaban al otro lado del río y fueron a 

Helam, con Sobac, capitán del ejército de 

Hadad-ezer al frente de ellos.

17

 Y ello fue informado a David, que re-

unió a todo Israel, cruzó el Jordán y llegó 

a Helam. Y los sirios se pusieron en orden 

de batalla para enfrentar a David, y lucha-

ron contra él.

18

 Pero los sirios huyeron delante de Is-

rael, y de los sirios, David mató a los de 

setecientos carros, y cuarenta mil jinetes, 

e  hirió  a  Sobac,  capitán  del  ejército  de 

ellos, quien murió allí.

9.11 El sentido de esta lectura es un tanto difícil.  10.4 Lit. hasta sus fundamentos.  10.8 Lit. estaban ellos solos.


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2 Samuel 11:22

329

19

 Y cuando todos los reyes que eran tri-

butarios  de  Hadad-ezer,  vieron  que  ha-

bían sido derrotados ante Israel, hicieron 

la paz con Israel y le sirvieron. Y los sirios 

tuvieron temor de ayudar de nuevo a los 

amonitas.

La de Urías

11

Aconteció  en  la  primavera  del 

año,° al tiempo que los reyes° sue-

len  salir  a  campaña,  que  David  envió  a 

Joab y con él a sus siervos y todo Israel, 

los cuales destruyeron a los amonitas y 

sitiaron a Rabá; pero David permaneció 

en Jerusalem.

2

 Y sucedió que a la hora de la tarde, Da-

vid se levantó de su lecho y se paseaba por 

el terrado de la casa real, y desde el terra-

do vio a una mujer bañándose, y la mujer 

era muy hermosa.

3

 Y David envió a indagar acerca de la mu-

jer, y uno dijo: ¿No es ésta Betsabé hija de 

Eliam, mujer de Urías heteo?

4

 Y envió David mensajeros y la tomó; y 

cuando ella fue a él, él se acostó con ella, 

pues acababa de purificarse de su impure-

za.° Después ella volvió a su casa.

5

 Y la mujer concibió y mandó a informar 

a David, diciendo: He concebido.

6

 Entonces David encargó a Joab: ¡Tráeme 

a Urías heteo! Así que Joab envió a Urías 

a David.

7

 Cuando Urías llegó ante la presencia de 

David,  éste  le  preguntó  por  la  salud  de 

Joab, por la salud de la gente y por el es-

tado de la guerra.

8

 Después dijo David a Urías: Desciende a 

tu  casa  y  lava  tus  pies.  Y  saliendo  Urías 

de la casa real, le fue enviado un presente 

del rey.°

9

 Pero  Urías  durmió  a  la  entrada  de  la 

casa  del  rey  con  todos  los  siervos  de  su 

señor, y no bajó a su casa.

10

 Cuando  se  lo  refirieron  a  David,  di-

ciendo: Urías no bajó a su casa, David pre-

guntó a Urías: ¿Acaso no has venido de un 

viaje? ¿Por qué no bajas a tu casa?

11

 Y Urías respondió a David: El Arca, Is-

rael y Judá permanecen en tiendas, y mi 

señor  Joab  con  los  siervos  de  mi  señor 

acampan a campo abierto.° ¿Y yo he de ir 

a mi casa a comer y a beber y acostarme 

con mi mujer? ¡Por tu vida, y por la vida 

de tu alma, que no haré tal cosa!

12

 Y David dijo a Urías: Quédate aquí hoy 

también,  que  mañana  te  dejaré  ir.  Así 

pues, Urías se quedó en Jerusalem aquel 

día y el siguiente.

13

 Después  David  lo  mandó  a  llamar,  y 

comió  y  bebió  ante  él.  Y  él  hizo  que  se 

embriagara, pero al anochecer fue a acos-

tarse en su cama con los siervos de su se-

ñor, y no bajó a su casa.

14

 Llegada la mañana, David escribió una 

carta a Joab que envió por mano de Urías.

15

 Y en la carta escribió diciendo: Poned 

a Urías al frente, en lo más recio de la ba-

talla, y retiraos de él, para que sea herido 

y muera.

16

 Así  fue  que  cuando  Joab  asediaba  la 

ciudad, asignó a Urías el lugar donde sabía 

que estaban los hombres más valientes.

17

 Y los hombres de la ciudad salieron y 

lucharon contra Joab y cayeron algunos 

del pueblo, de los siervos de David, y Urías 

heteo también murió.

18

 Y Joab hizo comunicar a David todos 

los sucesos de la guerra,

19

 y le encomendó al mensajero, dicien-

do: Cuando termines de contar al rey to-

dos los sucesos de la guerra,

20

 si  sucede  que  sube  la  ira  del  rey  y  te 

pregunta: ¿Por qué os acercasteis tanto a 

la ciudad para luchar? ¿Es que no sabéis 

lo que arrojan desde el muro?

21

 ¿Quién  hirió  a  Abimelec  ben  Jerobo-

set?° ¿No fue una mujer que arrojó desde 

el muro un pedazo de rueda de molino, y 

murió  en  Tebes?  ¿Por  qué  os  acercasteis 

tanto al muro? Entonces tú responderás: 

También tu siervo Urías heteo ha muerto.

22

 El mensajero fue pues, y llegando ante 

David, le declaró todo lo que Joab le había 

encargado.

11.1 Prob. se refiere a la primavera siguiente.  11.1 Época en que, antiguamente, solía realizarse la guerra. Prob. se refiere a 

la salida de los heraldos relacionada con la salida de los reyes con sus respectivos ejércitos a la batalla. En cuanto a la palabra 

mensajero véase 

→2 S.14.17 nota.  11.4 Esto es, ya había realizado el ritual de purificación que hacían las mujeres judías 

después de la menstruación 

→Lv.15.19ss. El verbo hebreo está en participio, indicando que la mujer estaba purificándose 

en ese momento o cuando fue vista por el rey David. 

11.8 Lit. una porción del rey. Es decir, el rey envió tras Urías un regalo, 

seguramente una porción de la comida real. 

11.11 Lit. sobre la faz del campo.  11.21 LXX registra Jerobaal


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2 Samuel 11:23

330

23

 Y el mensajero dijo a David: Los hom-

bres  prevalecieron  contra  nosotros  y  sa-

lieron  hacia  nosotros  al  campo,  pero  los 

acometimos hasta la entrada de la puerta.

24

 Entonces  los  arqueros  tiraron  contra 

tus siervos desde lo alto del muro y mu-

rieron  algunos  de  los  siervos  del  rey,  y 

también tu siervo Urías heteo ha muerto.

25

 Y David dijo al mensajero: Así dirás a 

Joab: Que esto no te desagrade, porque la 

espada devora tanto a uno como a otro. 

Refuerza tu ataque contra la ciudad y des-

trúyela. Y tú, aliéntale.

26

 Al oír la mujer de Urías que su mari-

do Urías había muerto, hizo duelo por su 

señor.

27

 Y  cuando  pasó  el  luto,  David  la  hizo 

traer a su casa, y ella fue su mujer y le dio 

un  hijo.  Pero  lo  que  David  había  hecho 

fue desagradable ante los ojos de YHVH.

Profecía contra David

12

Y  YHVH  envió  a  Natán°  a  David, 

y  entrando  ante  su  presencia,  le 

dijo:° En una ciudad había dos hombres, 

uno rico y uno pobre.

2

 El  rico  tenía  numerosos  rebaños  y  va-

cadas,

3

 pero  el  pobre  no  tenía  más  que  una 

corderita  que  había  comprado,  a  la  cual 

iba criando; y ella crecía juntamente con 

él  y  con  sus  hijos,  comiendo  de  su  pan, 

bebiendo  de  su  vaso  y  durmiendo  en  su 

regazo, y era para él como una hija.

4

 Pero  un  viajero  fue  al  hombre  rico,  y 

éste no quiso tomar de sus rebaños ni de 

sus  vacadas  para  guisarlas  para  el  viaje-

ro que le había llegado, sino que tomó la 

corderita de aquel hombre pobre y la gui-

só para el hombre que había venido a él.

5

 Entonces el furor de David se encendió 

en  gran  manera  contra  aquel  hombre  y 

dijo a Natán: ¡Vive YHVH, que el hombre 

que hizo tal cosa es digno de muerte!

6

 Debe  pagar  cuatro  veces  el  valor  de  la 

corderita, porque hizo tal cosa y no tuvo 

compasión.

7

 Entonces  Natán  dijo  a  David:  ¡Tú  eres 

ese hombre! Así dice YHVH Dios de Israel: 

Yo te ungí como rey sobre Israel y te he 

protegido de la mano de Saúl,

8

 y te he entregado la casa de tu señor, y 

he puesto las mujeres de tu señor en tu 

seno, y te he dado la casa de Israel y de 

Judá; y si esto fuera poco, te habría añadi-

do mucho más.°

9

 ¿Por  qué  has  menospreciado  la  palabra 

de YHVH, haciendo lo malo ante sus ojos? 

Has matado a espada a Urías heteo, has to-

mado a su mujer por mujer tuya, y lo has 

asesinado con la espada de los amonitas.

10

 Por lo cual ahora no se apartará de tu 

casa la espada, por cuanto me has despre-

ciado, y has tomado la mujer de Urías he-

teo para que sea tu mujer.

11

 Así dice YHVH: He aquí Yo hago levan-

tar el mal contra ti desde tu propia casa. 

Tomaré tus mujeres delante de tus ojos y 

las daré a tu prójimo, y él se acostará con 

tus mujeres a vista de todos.°

12

 Por cuanto tú has obrado en secreto, 

Yo haré esto delante de todo Israel y a ple-

no día.°

13

 David dijo a Natán: ¡He pecado contra 

YHVH!  Y  Natán  dijo  a  David:  También 

YHVH ha hecho que tu pecado sea remi-

tido: no morirás.

14

 Pero como con este asunto has blasfe-

mado grandemente de YHVH,° el hijo que 

te ha nacido ciertamente morirá.

15

 Y Natán regresó a su casa. Y YHVH hi-

rió  al  niño  que  la  mujer  de  Urías  había 

dado a luz a David, y se agravó.

16

 Y David rogó a Ha-’Elohim por el niño, 

y ayunó David y se retiró, y pasaba la no-

che acostado en el suelo.

17

 Y los ancianos de su casa se pusieron a 

su lado para levantarlo del suelo, pero él 

no quiso, ni tampoco comió° con ellos.

18

 Al  séptimo  día  aconteció  que  el  niño 

murió, y los siervos de David temían in-

formarle que el niño había muerto, pues 

se decían: He aquí, cuando el niño estaba 

vivo, le hablábamos y no quería oír nues-

tra voz, ¿cuánto más se afligirá si le deci-

mos que el niño ha muerto?

19

 Pero viendo David que sus siervos su-

surraban entre sí, David comprendió que 

12.1 Algunos mss, LXX y Sir. añaden el profeta.  12.1 LXX añade me ha sido anunciado este juicio.  12.8 Lit. tales y tales co-

sas

12.11 Lit. a los ojos de este sol

→16.22  12.12 Lit. delante del sol.  12.14 → § 6 - § 25.  12.17 Lit. comió pan (alimento) 

con ellos. Los masoretas copiaron erróneamente creó pan (verbo bará) en lugar del verbo baráh=comer

→2 S.13.6


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2 Samuel 13:11

331

el niño había muerto, y preguntó David a 

sus siervos: ¿Ha muerto el niño? Y ellos 

respondieron: Ha muerto.

20

 Entonces  David  se  levantó  del  suelo, 

se  lavó,  se  ungió  y  cambió  sus  ropas,  y 

entrando en la Casa de YHVH, se postró. 

Luego fue a su casa, y cuando pidió, le pu-

sieron comida delante y comió.

21

 Y sus siervos le dijeron: ¿Qué es esto 

que  has  hecho?  Mientras  el  niño  vivía, 

ayunabas y llorabas, pero cuando el niño 

murió,  te  has  levantado  y  has  comido 

pan.

22

 Y él dijo: Mientras el niño estaba vivo, 

yo ayunaba y lloraba porque decía: ¿Quién 

sabe si YHVH se compadecerá de mí y el 

niño vivirá?

23

 Pero ahora que ha muerto, ¿para qué 

he de ayunar? ¿Acaso podré hacerle volver 

de nuevo? Yo voy a él, pero él no volverá 

a mí.

24

 Y  David  consoló  a  su  mujer  Betsabé. 

Luego fue a ella y durmió con ella, y dio a 

luz un hijo, y lo llamó Salomón. Y YHVH 

lo amó,

25

 y  envió  por  medio  del  profeta  Natán, 

para  que  lo  llamara  Jedidías,°  por  causa 

de YHVH.

26

 Joab luchaba contra Rabá de los amo-

nitas, y conquistó la ciudad real.°

27

 Y  Joab  envió  mensajeros  a  David,  di-

ciendo: Estoy luchando contra Rabá y he 

cortado las aguas de la ciudad.

28

 Ahora pues, reúne al resto del pueblo, 

acampa contra la ciudad y conquístala, no 

sea que yo tome la ciudad y sea llamada 

con mi nombre.

29

 Así que David reunió a todo el pueblo, 

marchó hacia Rabá y luchó contra ella y 

la conquistó.

30

 Y  tomó  la  corona  de  la  cabeza  de  su 

rey,°  cuyo  peso  era  un  talento  de  oro  y 

tenía  una  piedra  preciosa,  y  fue  puesta 

sobre la cabeza de David. Y él sacó de la 

ciudad muy grande botín.

31

 También  sacó  a  la  gente  que  había 

en ella y la obligó a trabajar con sierras, 

picos de hierro y hachas de hierro, y los 

hizo ir a los hornos de cocer ladrillos. Así 

hizo a todas las ciudades de los amonitas. 

Y David regresó con todo el pueblo a Je-

rusalem.

Amnón y Tamar

13

Absalón  ben  David  tenía  una  her-

mana°  muy  hermosa  llamada 

Tamar.  Y  aconteció  después  de  esto  que 

Amnón ben David se enamoró de ella.

2

 Y tan atormentado estaba Amnón a cau-

sa de su hermana Tamar que se enfermó, 

pues ella era virgen y le parecía a Amnón 

que sería difícil hacerle cosa alguna.

3

 Pero Amnón tenía un amigo cuyo nom-

bre era Jonadab ben Simea, hermano de 

David; y Jonadab era un hombre muy as-

tuto.

4

 Y le dijo: Hijo del rey ¿por qué de día en 

día vas enflaqueciendo así? ¿Acaso no me 

lo  dirás?  Y  Amnón  le  respondió:  Amo  a 

Tamar, hermana de mi hermano Absalón.

5

 Entonces  Jonadab  le  dijo:  Acuéstate 

como que estás enfermo, y cuando tu pa-

dre venga a verte, le dirás: Te ruego que 

hagas  venir  a  mi  hermana  Tamar  para 

que me dé de comer, y prepare algo en mi 

presencia para que yo la vea y ella misma 

me lo sirva.

6

 Amnón se acostó y fingió estar enfermo, 

y cuando el rey fue a verlo, Amnón dijo 

al  rey:  Te  ruego  que  venga  mi  hermana 

Tamar y me fría dos tortas para que yo las 

coma de su mano.

7

 Entonces  David  envió  por  Tamar,  a  la 

casa, diciendo: Ve ahora a casa de tu her-

mano Amnón y prepárale la comida.

8

 Fue, pues, Tamar a casa de su hermano 

Amnón, el cual estaba acostado, y toman-

do ella la masa, amasó e hizo tortas en su 

presencia, y frió las tortas.

9

 Luego  las  sacó  de  la  sartén  delante  de 

él, pero él rehusó comer. Y Amnón orde-

nó: ¡Salid todos de mi presencia! Cuando 

todos salieron de su presencia,

10

 Amnón  dijo  a  Tamar:  Trae  la  comida 

a  la  alcoba  y  dame  tú  misma  de  comer. 

Y Tamar tomó las tortas y las llevó a su 

hermano Amnón a la alcoba.

11

 Pero cuando ella se le acercó para que 

comiera, la sujetó y le dijo: ¡Ven, acuésta-

te conmigo, hermana mía!

12.25 Esto es, amado de YHVH.  12.26 Esto es, sector de la ciudad donde residía el rey.  12.30 Esto es, el rey de los amonitas

13.1 hermana o hermanastra. 


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2 Samuel 13:12

332

12

 Pero  ella  le  respondió:  ¡No,  hermano 

mío! No me humilles, que eso no se hace 

en Israel. ¡No hagas infamia tal!

13

 Pues, ¿dónde iré yo con mi deshonra? Y 

tú mismo quedarías como un villano° en 

Israel. Ahora pues, te ruego que hables al 

rey, quien no se opondrá a que yo sea tuya.

14

 Pero  él  no  quiso  escuchar  su  voz,  y 

siendo más fuerte que ella, la forzó vio-

lentamente y se acostó con ella.

15

 Enseguida  Amnón  sintió  un  terrible 

aborrecimiento  hacia  ella,  un  aborreci-

miento  mayor  que  el  amor  que  le  había 

tenido; y le dijo Amnón: ¡Levántate y vete!

16

 Pero  ella  le  suplicó:  No;  porque  este 

mal de echarme es mayor que el otro que 

me has hecho. Pero él no la quiso oír.

17

 Más bien, llamando al mozo que lo ser-

vía dijo: ¡Échame a ésta fuera de aquí, y 

cierra tras ella la puerta!

18

 (Y  ella  llevaba  una  túnica  de  amplias 

mangas,  pues  las  hijas  del  rey  que  eran 

vírgenes  se  vestían  con  tales  túnicas).  Y 

su sirviente la echó fuera y cerró la puerta 

tras ella.

19

 Entonces Tamar echó ceniza sobre su 

cabeza, rasgó la túnica de amplias man-

gas que llevaba puesta, y se fue gritando 

con las manos sobre la cabeza.

20

 Su hermano Absalón le preguntó: ¿Ha 

estado contigo tu hermano Amnón? Calla 

ahora hermana mía, pues es tu hermano. 

No se angustie tu corazón por este asun-

to. Y Tamar quedó desconsolada en casa 

de su hermano Absalón.

21

 Cuando el rey David se enteró de todas 

estas cosas, se enojó en gran manera.

22

 Y Absalón no habló con Amnón ni mal ni 

bien, pero Absalón aborreció a Amnón por-

que había ultrajado a su hermana Tamar.

23

 Y  aconteció  que  a  los  dos  años  cum-

plidos, Absalón hacía el esquileo en Baal-

hazor, que está junto a Efraín. Y Absalón 

invitó a todos los hijos del rey.

24

 Y Absalón fue al rey y dijo: He aquí que 

tu  siervo  hace  el  esquileo;  te  ruego  que 

venga el rey y sus siervos con tu siervo.

25

 Pero  el  rey  dijo  a  Absalón:  No,  hijo 

mío, no iremos todos para no serte carga 

pesada. Y aunque le insistió, él no quiso 

ir, pero lo bendijo.

26

 Entonces Absalón dijo: Si no, te rue-

go que venga con nosotros mi hermano 

Amnón. Y el rey le dijo: ¿Por qué ha de ir 

contigo?

27

 Y como Absalón le insistía, dejó ir con 

él a Amnón y a todos los hijos del rey.

28

 Y  Absalón  ordenó  a  sus  siervos,  di-

ciendo: Observad cuando el corazón de 

Amnón  esté  alegre  por  causa  del  vino, 

y  yo  os  diga:  ¡Herid  a  Amnón!,  enton-

ces lo mataréis. No temáis ¿Acaso no os 

lo ordeno yo? ¡Esforzaos y sed hijos de 

valor!

29

 Y los siervos de Absalón hicieron a Am-

nón como Absalón había ordenado. Y todos 

los hijos del rey se levantaron, y montando 

cada uno en su mulo, huyeron.

30

 Y sucedió cuando estaban en camino, 

que  llegó  a  David  un  rumor  que  decía: 

¡Absalón ha matado a todos los hijos del 

rey, sin quedar ninguno de ellos!

31

 Entonces  el  rey  se  levantó,  rasgó  sus 

vestidos y se echó en tierra, y todos sus 

criados se pusieron en derredor con sus 

vestidos rasgados.

32

 Pero Jonadab ben Simea, hermano de 

David, tomó la palabra y dijo: No piense 

mi señor que han matado a todos los jó-

venes hijos del rey, pues sólo ha muerto 

Amnón; porque Absalón lo había decidido 

desde  el  día  en  que  Amnón  ultrajó  a  su 

hermana Tamar.

33

 Ahora  pues,  que  mi  señor  el  rey  no 

ponga  en  su  corazón  el  rumor  que  dice 

que  todos  los  hijos  del  rey  han  muerto, 

porque sólo ha muerto Amnón.

34

 Y  Absalón  huyó.  Y  el  joven  centinela 

alzó los ojos y miró, y he aquí que mucha 

gente venía por el camino de rodeo al cos-

tado del monte.

35

 Y Jonadab dijo al rey: ¡He aquí vienen 

los hijos del rey! Como tu siervo ha dicho, 

así ha acontecido.

36

 Y aconteció que acabando él de hablar, 

he aquí llegaron los hijos del rey, y alza-

ron su voz y lloraron. Y también el rey y 

todos sus siervos lloraron con un llanto 

muy grande,

37

 y  él  hizo  duelo  por  su  hijo  todos  los 

días. Y Absalón huyó y fue junto a Talmai 

hijo de Amiud rey de Gesur.

13.13 Esto es, insensato, falto de sentido o necio.


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2 Samuel 14:20

333

38

 Así  huyó  Absalón  y  se  fue  a  Gesur,  y 

estuvo allí tres años.

39

 Y el alma del rey David° ansiaba ver a 

Absalón, pues ya se había consolado por 

la muerte de Amnón.

Regreso de Absalón

14

Y Joab hijo de Sarvia sabía que el 

corazón  del  rey  se  inclinaba  por 

Absalón.

2

 Y Joab envió a Tecoa y tomó de allá una 

mujer astuta, y le dijo: Finge ahora estar 

de luto, y ponte ropas de duelo y no te un-

jas con óleo, de modo que parezcas como 

una mujer que ha estado muchos días ha-

ciendo luto por un muerto.

3

 Y  ve  al  rey  y  háblale  conforme  a  esta 

palabra.  Y  Joab  puso  las  palabras  en  su 

boca.

4

 Y la mujer de Tecoa habló al rey, y ca-

yendo en tierra sobre su rostro, se postró 

y dijo: ¡Ayúdame, oh rey!

5

 Y el rey le dijo: ¿Qué tienes? Y ella dijo: 

En verdad soy una mujer viuda, pues mi 

marido ha muerto.

6

 Tu sierva tenía dos hijos y los dos se pelea-

ron en el campo, y no habiendo quien los 

separara, el uno hirió al otro y lo mató.

7

 Y ahora toda la familia se ha levantado 

contra tu sierva y han dicho: Entrega al 

que mató a su hermano para que lo ma-

temos por la vida de su hermano, a quien 

mató; y destruiremos también al herede-

ro. Así están por apagar el ascua que me 

queda, sin dejar de mi marido nombre, ni 

posteridad sobre la faz de la tierra.°

8

 Y el rey dijo a la mujer: Ve a tu casa, que 

yo daré orden respecto a ti.

9

 La mujer de Tecoa dijo entonces al rey: 

¡Oh  rey  señor  mío,  recaiga  la  iniquidad 

sobre mí y sobre la casa de mi padre, pero 

que el rey y su trono sean libres de cul-

pa!°

10

 Y dijo el rey: Al que hable contra ti, haz-

lo venir a mí y no volverá a tocarte más.

11

 Y  ella  dijo:  Te  ruego,  oh  rey,  que  re-

cuerdes  a  YHVH  tu  Dios,  para  que  el 

vengador  de  la  sangre°  no  aumente  el 

daño ni destruya a mi hijo. Y él dijo: ¡Vive 

YHVH, que ni un cabello de tu hijo caerá 

por tierra!

12

 Y la mujer dijo: Permite, te ruego, que 

tu sierva hable una palabra a mi señor el 

rey. Y él dijo: Habla.

13

 Y dijo la mujer: ¿Por qué pues piensas 

tal cosa contra el pueblo de Dios? Pues al 

decir  esta  palabra  el  rey  es  como  culpa-

ble, ya que el rey no permite regresar a su 

desterrado.

14

 Pues irremisiblemente hemos de mo-

rir, y somos como agua derramada en la 

tierra,  que  no  puede  ser  recogida,  pero 

’Elohim no quita la vida, sino que provee 

medios para que el desterrado no siga ale-

jado de Él.

15

 Y  el  haber  yo  venido  ahora  a  hablar 

esta palabra a mi señor el rey, es porque 

el pueblo me ha atemorizado y tu sierva 

dijo:  Hablaré  ahora  al  rey;  quizá  el  rey 

cumpla la petición de su sierva.

16

 Por cuanto el rey ha de oír, para librar 

a su sierva de la palma° del hombre que 

querría destruirme, a mí y a mi hijo, eli-

minándolos de la heredad de Dios.

17

 También tu sierva se dijo: Que la pala-

bra de mi señor el rey sea para mi consue-

lo, ya que como un ángel° de Dios, así es 

mi señor el rey para discernir entre el bien 

y el mal, pues YHVH tu Dios está contigo.

18

 Y el rey respondió y dijo a la mujer: No 

me  ocultes  ahora  nada  de  lo  que  te  voy 

a preguntar. Y la mujer dijo: Ruego a mi 

señor el rey que hable.

19

 Entonces el rey le preguntó: ¿No anda 

la mano de Joab contigo en todo esto? Y 

la mujer respondió y dijo: ¡Vive tu alma, 

oh mi señor el rey! Nadie se podrá apartar 

a  derecha  ni  a  izquierda  de  todo  lo  que 

mi señor el rey ha hablado. Ciertamente 

fue tu siervo Joab quien me ordenó, y él 

ha puesto todas estas palabras en boca de 

tu sierva.

20

 Tu siervo Joab hizo esto para cambiar 

la apariencia del asunto, pero mi señor es 

13.39 LXX: el espíritu del rey David.  14.7 En la cultura bíblica, morir sin descendencia era algo tan terrible que incluso Dios 

reveló una serie de disposiciones para evitarlo 

→Dt.25.5-10.  14.9 Según Nm.35.31 un homicida debía morir y no podía ser 

perdonado  (a  excepción  de  la  persona  que  había  matado  involuntariamente,  la  cual  podía  buscar  asilo  en las  ciudades  de 

refugio); por eso, la mujer tecoíta asume toda culpa en que pueda incurrir el rey al concederle su petición de salvar a su hijo. 

14.11 Pariente más cercano de una persona asesinada, y quien debe vengar su muerte 

→Nm.35.11-28.  14.16 Esto es, la 

mano

14.17 Lit. mensajero.


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2 Samuel 14:21

334

sabio, conforme a la sabiduría de un án-

gel de Dios, para conocer todo lo que hay 

en la tierra.

21

 Entonces  el  rey  dijo  a  Joab:  He  aquí 

ahora  yo  hago  este  asunto:  ¡Ve  y  trae  al 

joven Absalón!

22

 Y Joab cayó en tierra sobre su rostro, 

se postró y bendijo al rey, y dijo Joab: Tu 

siervo sabe ahora que ha hallado gracia a 

tus ojos, mi señor, oh rey, pues el rey ha 

cumplido la petición de su siervo.

23

 Levantándose, pues, Joab fue a Gesur y 

trajo de vuelta a Absalón a Jerusalem.

24

 Y dijo el rey: ¡Que regrese a su propia 

casa, pero no verá mi rostro! Así que Ab-

salón regresó a su propia casa, pero no vio 

el rostro del rey.

25

 Ahora  bien,  en  todo  Israel  no  había 

hombre tan hermoso como Absalón, ad-

mirable en gran manera. Desde la planta 

de su pie hasta su coronilla no había en él 

defecto alguno.

26

 Él se rapaba la cabeza, y acontecía al 

final  de  cada  año  cuando  solía  raparse, 

porque le molestaba, entonces se rapaba; 

y el cabello de su cabeza pesaba doscien-

tos siclos de peso real.

27

 A Absalón le nacieron tres hijos y una 

hija, cuyo nombre era Tamar, y era mujer 

de hermoso aspecto.

28

 Y Absalón vivió dos años enteros en Je-

rusalem pero no veía el rostro del rey.

29

 Después  Absalón  hizo  llamar  a  Joab 

para enviarlo al rey, pero no quiso ir a él; 

y envió aún una segunda vez, pero tam-

poco quiso ir.

30

 Entonces dijo a sus siervos: Mirad, la par-

cela de Joab está junto a la mía,° allí tiene la 

cebada. ¡Id y prendedle fuego! Y los siervos 

de Absalón prendieron fuego a la parcela.

31

 Entonces Joab se levantó y fue a la casa 

de  Absalón  y  le  preguntó:  ¿Por  qué  tus 

siervos han prendido fuego a mi parcela?

32

 Y Absalón respondió a Joab: He aquí, 

he enviado por ti diciendo: Ven aquí para 

enviarte al rey, diciendo: ¿Por qué vine de 

Gesur? Mejor me hubiera sido quedarme 

allí. Por tanto, vea yo el rostro del rey, y 

si hay en mí iniquidad, ¡que él mismo me 

quite la vida!

33

 Entonces Joab fue al rey y le informó. 

Luego llamó a Absalón, quien fue al rey y 

se postró en tierra sobre su rostro delante 

del rey. Y el rey besó a Absalón.

La conspiración y la rebelión

15

Después de esto, aconteció que Ab-

salón se hizo de carros y caballos, 

y cincuenta hombres que corrían delante 

de él.°

2

 Y  Absalón  se  levantaba  temprano  y  se 

situaba  a  un  lado  del  camino  junto  a  la 

puerta,° y a cualquiera que tenía un plei-

to y acudía ante el rey para juicio, Absalón 

lo llamaba y le decía: ¿De qué ciudad eres? 

Y él decía: Tu siervo es de una de las tri-

bus de Israel.

3

 Entonces Absalón le decía: Mira, tu cau-

sa es buena y justa, pero no tienes quien 

escuche de parte del rey.

4

 Y decía Absalón: ¡Quién me pondría por 

juez en la tierra!, pues cada hombre que 

tuviera  un  pleito  o  una  causa  acudiría 

ante mí y yo le haría justicia.

5

 Y acontecía que cuando alguien se acer-

caba  para  inclinarse  a  él,  él  extendía  su 

mano, lo levantaba y lo besaba.

6

 Así  obraba  Absalón  con  todo  Israel 

cuando  acudían  al  rey  para  juicio;  y  así 

robaba Absalón el corazón de los hombres 

de Israel.

7

 Al cabo de cuatro° años, aconteció que 

Absalón dijo al rey: Te ruego que me per-

mitas  ir  a  cumplir  el  juramento  que  he 

jurado a YHVH en Hebrón.

8

 Porque  cuando  habitaba  en  Gesur,  en 

Aram,  tu  siervo  juró  diciendo:  Si  YHVH 

ciertamente me hace volver a Jerusalem, 

entonces serviré a YHVH.

9

 Y el rey le dijo: Ve en paz. Así que se le-

vantó y se fue a Hebrón.

10

 Pero Absalón envió espías por todas las 

tribus de Israel, diciendo: Al oír el sonido del 

shofar, diréis: ¡Absalón reina en Hebrón!

11

 Y con Absalón habían salido de Jeru-

salem  doscientos  hombres  como  invita-

dos, que en su ingenuidad iban sin saber 

nada.

12

 Y mientras ofrecía los sacrificios, Absa-

lón envió por Ahitofel gilonita, consejero 

14.30 Lit. junto a mi mano.  15.1 Escolta real que acompaña al rey en todos sus viajes, corriendo generalmente junto al carro del 

monarca. 

15.2 Esto es, la entrada de la ciudad. Qumram registra a un lado del camino.  15.7 Otros mss. registran cuarenta


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2 Samuel 15:35

335

de David, de su ciudad de Guilo. Y la cons-

piración llegó a ser fuerte, pues el pueblo 

iba aumentando a favor de Absalón.

13

 Entonces  un  mensajero  fue  a  David, 

diciendo: ¡Los corazones de los hombres 

de Israel se van tras Absalón!

14

 Y  David  dijo  a  todos  sus  siervos  que 

estaban con él en Jerusalem: ¡Levantaos 

y  huyamos,  porque  no  tendremos  esca-

patoria  delante  de  Absalón!  ¡Daos  prisa 

en marchar, no sea que se apresure, nos 

alcance y eche el mal sobre nosotros, ata-

cando la ciudad a filo de espada!

15

 Y los siervos del rey contestaron al rey: 

¡He aquí, tus siervos están listos para todo 

lo que nuestro señor el rey disponga!

16

 Salió entonces el rey con toda su casa 

tras  él.  Pero  el  rey  dejó  a  diez  mujeres 

concubinas para cuidar la casa.

17

 Salió, pues, el rey con todo el pueblo 

tras él, y se detuvieron en Bet-merhak.°

18

 Y todos sus siervos pasaron a su lado: 

Todos los cereteos y todos los peleteos, así 

como todos los geteos,° seiscientos hom-

bres  que  habían  llegado  a  pie  desde  Gat 

pasaron por delante del rey.

19

 Entonces  el  rey  dijo  a  Itai  geteo:  ¿Por 

qué vienes tú también con nosotros? Vuelve 

y quédate con el rey, pues tú eres un extran-

jero, y también un desterrado de tu lugar.

20

 Llegaste ayer, ¿y hoy te haré vagar con 

nosotros mientras voy a donde voy? Vuel-

ve  y  haz  volver  a  tus  hermanos,  y  sean 

contigo la misericordia y la verdad.°

21

 Pero Itai respondió al rey y dijo: ¡Vive 

YHVH  y  vive  mi  señor  el  rey  que  don-

dequiera  esté  mi  señor  el  rey,  sea  para 

muerte  o  para  vida,  ciertamente  allí  es-

tará tu siervo!

22

 Y David respondió a Itai: ¡Anda y pasa 

adelante! E Itai geteo pasó con todos sus 

hombres y con todos los niños que esta-

ban con él.

23

 Y todo el país lloraba a gran voz cuan-

do todo el pueblo estaba cruzando, tam-

bién el rey cruzó el torrente de Cedrón, 

con toda la gente que cruzaba rumbo al 

camino del desierto.

24

 Y  he  aquí,  también  cruzó  Sadoc,  y 

todos los levitas que estaban con él, car-

gando  el  Arca  del  Pacto  de  Dios;  y  ellos 

asentaron el Arca de Dios hasta que todo 

el  pueblo  terminó  de  salir  de  la  ciudad. 

Entonces subió Abiatar.

25

 Luego el rey dijo a Sadoc: Haz volver 

el Arca de Dios a la ciudad. Si he hallado 

gracia ante los ojos de YHVH, Él me hará 

volver, y me permitirá verla a ella y a su 

morada.°

26

 Y si Él dijera: ¡No me complazco en ti!, 

heme  aquí,  que  haga  de  mí  lo  que  bien 

parezca ante sus ojos.

27

 Dijo además el rey al sacerdote Sadoc: 

¿No eres tú el vidente? Vuelve a la ciudad 

en paz, y vuestros dos hijos con vosotros: 

tu hijo Ahimaas, y Jonatán ben Abiatar.

28

 Mirad, yo me detendré en los vados del 

desierto hasta que venga palabra de vues-

tra parte para informarme.

29

 Por lo que Sadoc y Abiatar llevaron el 

Arca de Dios de vuelta a Jerusalem, y se 

quedaron allí.

30

 Y David subió la cuesta de los Olivos;° 

y la subió llorando, y tenía la cabeza cu-

bierta e iba descalzo. Y todo el pueblo que 

estaba con él había cubierto cada uno su 

cabeza y lloraban mientras subían.

31

 Y  uno  habló°  a  David  diciendo:  Ahi-

tofel está entre los que conspiraron con 

Absalón.  Entonces  David  exclamó:  ¡Oh 

YHVH, te ruego que entorpezcas el con-

sejo de Ahitofel!

32

 Y ocurrió que cuando David llegó a la 

cumbre del monte donde solía postrarse 

ante ’Elohim, he aquí Husai arquita le sa-

lió al encuentro con la túnica rasgada y 

tierra sobre su cabeza.

33

 Y David le dijo: Si pasas conmigo serás 

una carga para mí,

34

 pero si vuelves a la ciudad y dices a Ab-

salón: ¡Oh rey!, yo seré tu siervo, pues así 

como fui siervo de tu padre, ahora tam-

bién soy siervo tuyo; entonces frustrarás 

a mi favor el consejo de Ahitofel.

35

 ¿Acaso no estarán allí contigo los sa-

cerdotes Sadoc y Abiatar? Por tanto, toda 

15.17 Prob. se trata de un asentamiento en el valle de Cedrón. Nen la última casa.  15.18 cereteos y peleteos 

→8.18 nota. 

Los geteos eran filisteos de la ciudad de Gat. 

→Jos.13.3.  15.20 LXX registra y el Señor haga contigo misericordia y verdad

15.25 Lit. me hará verla y su morada. Esto es, el Arca y el Tabernáculo.  15.30 Esto es, el Monte de los Olivos.  15.31 LXX, Sir. 

y VUL registran fue dado aviso a David


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2 Samuel 15:36

336

palabra que oigáis en la casa del rey la de-

clararás a los sacerdotes Sadoc y Abiatar.

36

 He aquí están con ellos sus dos hijos: 

Ahimaas,  el  de  Sadoc,  y  Jonatán,  el  de 

Abiatar. Por mano de ellos me haréis lle-

gar todo lo que oigáis.

37

 Así  Husai,  amigo  de  David,  llegó  a  la 

ciudad cuando Absalón entraba en Jeru-

salem.

Siba y Simei

16

Y  cuando  David  hubo  pasado  un 

poco  más  allá  de  la  cumbre,  he 

aquí Siba, siervo de Mefi-boset, venía a su 

encuentro  con  un  par  de  asnos  apareja-

dos con° doscientos panes, cien racimos 

de pasas, cien panes de higos secos y un 

odre de vino.

2

 Y  el  rey  dijo  a  Siba:  ¿Qué  quieres  con 

estas cosas? Y respondió Siba: Los asnos 

son para que monte la familia del rey, el 

pan y los higos secos para que coman los 

jóvenes, y el vino, para que beban los que 

se cansen en el desierto.

3

 Y dijo el rey: ¿Dónde está el hijo de tu 

amo? Y Siba respondió al rey: He aquí se 

ha  quedado  en  Jerusalem  porque  dijo: 

¡Hoy mismo la casa de Israel me devolve-

rá el reino de mi padre!

4

 Entonces el rey dijo a Siba: ¡He aquí que 

todo lo que pertenece a Mefi-boset es tuyo! 

Y Siba dijo: ¡Oh rey señor mío, me postro y 

espero hallar gracia ante tus ojos!

5

 Al llegar el rey David a Bahurim, he aquí 

que de allí venía saliendo un hombre de la 

familia de la casa de Saúl, de nombre Si-

mei ben Gera; y en tanto que salía echaba 

maldiciones.

6

 Y  tiraba  piedras  contra  David  y  contra 

todos los siervos del rey David, mientras 

toda  la  gente  y  todos  los  hombres  vale-

rosos marchaban a su derecha y a su iz-

quierda.

7

 Y en tanto lo maldecía, Simei decía así: 

¡Fuera! ¡Fuera, oh hombre sanguinario y 

hombre de Belial!

8

 YHVH ha hecho volver sobre ti toda la 

sangre derramada de la casa de Saúl, cuyo 

trono has usurpado, y YHVH ha entrega-

do el reino en mano de tu hijo Absalón; y 

¡hete ahí prendido° en tus maldades, por-

que eres un hombre sanguinario!

9

 Entonces Abisai hijo de Sarvia dijo al rey: 

¿Por qué ha de seguir este perro muerto 

maldiciendo a mi señor el rey? ¡Con tu ve-

nia me adelantaré y le quitaré la cabeza!

10

 Pero el rey respondió: ¿Qué tengo yo 

que ver con vosotros, hijos de Sarvia? De-

jad que siga maldiciendo, pues si YHVH le 

ha dicho: ¡Maldice a David! ¿Quién le dirá: 

¿Por qué haces esto?

11

 Y  David  dijo  a  Abisai  y  a  todos  sus 

siervos: He aquí que mi mismo hijo, que 

salió  de  mis  entrañas,  va  buscando  mi 

vida  ¿cuánto  más  ahora  este  benjamita? 

Dejad lo que siga maldiciendo, pues así se 

lo ha dicho YHVH.

12

 Quizá mire YHVH mi aflicción° y me 

devuelva bien a cambio de sus maldicio-

nes este día.

13

 Así pues, David y sus hombres siguie-

ron por el camino mientras Simei seguía 

por la ladera del monte, delante de él, an-

dando y maldiciendo, y arrojando piedras 

delante de él, y esparciendo polvo.

14

 Y el rey y todo el pueblo que estaba con 

él llegaron fatigados, y allí° se reconfor-

taron.

15

 Y Absalón con toda su gente, los hom-

bres de Israel, habían entrado en Jerusa-

lem, y Ahitofel con él.

16

 Y sucedió que cuando Husai arquita, el 

amigo de David, llegó ante Absalón, Husai 

dijo a Absalón: ¡Viva el rey! ¡Viva el rey!

17

 Pero Absalón respondió a Husai: ¿Este 

es  tu  afecto  por  tu  amigo?  ¿Por  qué  no 

acompañaste a tu amigo?

18

 Husai  dijo  entonces  a  Absalón:  No, 

porque  a  quien  haya  escogido  YHVH  y 

este  pueblo,  y  todos  los  hombres  de  Is-

rael, de él seré, y con él me quedaré.

19

 Y en segundo lugar, ¿a quién debería 

yo servir? ¿Acaso no estaré en presencia 

de su hijo? Como he servido delante de tu 

padre, así estaré delante de ti.

20

 Dijo entonces Absalón a Ahitofel: Dad 

vuestro  consejo  sobre  lo  que  hemos  de 

hacer.

21

 Y Ahitofel dijo a Absalón: Llégate° a las 

concubinas que tu padre ha puesto para 

16.1  Lit.  y  sobre  ellos.  16.8  .prendido.  16.12  5ª  enmienda  de  los  Soferim 

→ § 6 - § 11.  16.14  Esto  es,  en  el  Jordán

16.21 Lit. entra. Heb. que se refiere al acto sexual.


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2 Samuel 17:18

337

guardar la casa, así todo Israel sabrá que 

te has hecho aborrecible a tu padre, con 

lo cual se fortalecerán las manos de todos 

los tuyos.

22

 Así,  extendieron  para  Absalón  una 

tienda sobre el terrado, y Absalón se lle-

gó a las concubinas de su padre a ojos de 

todo Israel.°

23

 En  aquellos  días  el  consejo  que  daba 

Ahitofel  era  como  si  uno  consultara  el 

oráculo de Dios. Así era todo lo que acon-

sejaba  Ahitofel,  tanto  para  David  como 

para Absalón.

Los consejeros

17

Entonces  Ahitofel  dijo  a  Absalón: 

Permíteme  ahora  que  escoja  doce 

mil hombres, y me levantaré para perse-

guir a David esta misma noche;

2

 y caeré sobre él cuando esté cansado y 

débil de manos, y lo atemorizaré; de modo 

que huirá toda la gente que lo acompaña; 

y mataré solamente al rey,

3

 porque  él  es  el  hombre  a  quien  tú  es-

tás buscando. Así haré volver a ti a todo 

el  pueblo;  y  cuando  todos  hayan  vuelto, 

todo el pueblo estará en paz.

4

 Y  pareció  acertado  el  consejo  ante  los 

ojos de Absalón y ante los ojos de todos 

los ancianos de Israel.

5

 Pero  Absalón  dijo:  Deseo  que  se  llame 

también a Husai arquita, para que oiga-

mos lo que hay en su boca.

6

 Y Husai fue a Absalón, y Absalón le ha-

bló, diciendo: Conforme a esta palabra ha 

hablado  Ahitofel,  ¿realizaremos  su  pala-

bra? Si no, habla tú.

7

 Entonces Husai dijo a Absalón: Esta vez el 

consejo que ha dado Ahitofel no es bueno.

8

 Y agregó Husai: Tú conoces a tu padre y 

a sus hombres, que son valerosos; y están 

amargados en espíritu cual osa en el cam-

po que le han robado sus cachorros. Tam-

bién tu padre es un hombre aguerrido, y 

no pasará la noche entre el pueblo.

9

 He  aquí  que  ahora  mismo  estará  es-

condido en algún hoyo, o en algún otro 

lugar;°  y  cuando  al  comienzo  caigan 

algunos  de  los  tuyos,  cualquiera  que  lo 

oiga dirá: ¡Se hace estrago entre la gente 

que sigue a Absalón!

10

 Y aun aquel que es valeroso y cuyo espí-

ritu sea como el corazón del león, desfalle-

cerá°  completamente,  porque  todo  Israel 

sabe que tu padre es un hombre aguerrido 

y que los que están con él son valerosos.

11

 Por lo cual yo aconsejo que diligente-

mente sea reunido en derredor tuyo todo 

Israel, desde Dan hasta Beerseba, en gran 

número, como la arena que hay en el mar,° 

y que tú en persona marches en medio de 

ellos.°

12

 De  esta  suerte  iremos  contra  él  en 

algún  lugar,  dondequiera  que  se  halle, 

y  caeremos°  sobre  él  como  el  rocío  cae 

sobre la tierra; y no sobrevivirá nadie; ni 

él ni ninguno de todos los hombres que 

están con él.

13

 Y si se llegara a refugiar dentro de al-

guna  ciudad,  entonces  se  hará  que  todo 

Israel traiga cuerdas a aquella ciudad, y la 

arrastraremos hasta el valle, hasta que no 

se encuentre allí ni una sola piedra.

14

 A  lo  cual  dijeron  Absalón  y  todos  los 

hombres  de  Israel:  El  consejo  de  Husai 

arquita  es  mejor  que  el  consejo  de  Ahi-

tofel (porque YHVH había dispuesto que 

el buen consejo de Ahitofel se frustrara, 

para que YHVH hiciera venir la calamidad 

sobre Absalón).

15

 Y Husai dijo a los sacerdotes Sadoc y 

Abiatar: Ahitofel ha aconsejado así y así a 

Absalón y a los ancianos de Israel; y así y 

así les he aconsejado yo.

16

 Ahora pues enviad rápidamente y avi-

sad a David, diciendo: No pases la noche 

en los vados del desierto sino cruza al otro 

lado sin falta, no sea que el rey y el pueblo 

que está con él sean destruidos.

17

 Jonatán y Ahimaas se habían detenido 

en la fuente de Rogel, y como no podían 

ser vistos entrando a la ciudad, una criada 

fue y les informó; y ellos partieron para 

avisar al rey David.

18

 Pero un joven los vio e informó a Ab-

salón,  así  que  los  dos,  saliendo  deprisa, 

16.22 

→2 S.12.11-12.  17.9 Lit. en uno de los lugares.  17.10 Lit. derretirse, fundirse. Figura que describe la pérdida de ánimo 

o valor. 

17.11 Otros mss. añaden en la orilla del mar.  17.11 Lit. y que tu rostro marche en medio de ellos. La traducción a la 

batalla es muy dudosa, ya que el vocablo hebreo baqrav es, con la mayor posibilidad, una contracción de beqirbam = en medio 

de ellos. Además, qerav nunca es utilizado en los libros de Samuel para batalla, sino miljamah

17.12 .caeremos.


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2 Samuel 17:19

338

llegaron  a  casa  de  un  hombre  en  Bahu-

rim que tenía un pozo en su patio, al cual 

bajaron.

19

 Y tomando la mujer una manta, la ex-

tendió sobre la boca del pozo, y esparció 

sobre ella trigo machacado; y no se supo 

nada del asunto.

20

 Entonces  los  siervos  de  Absalón  fue-

ron a la mujer de la casa y dijeron: ¿Dón-

de están Ahimaas y Jonatán? Y la mujer 

les dijo: Han pasado el vado del río. Y los 

buscaron, pero al no hallarlos, volvieron 

a Jerusalem.

21

 Después  que  se  marcharon,  aconte-

ció que ellos subieron del pozo, y fueron 

y  avisaron  al  rey  David.  Y  dijeron  a  Da-

vid: ¡Levantaos y cruzad rápidamente las 

aguas, porque así y así ha aconsejado Ahi-

tofel contra vosotros!

22

 Se levantó pues David y todo el pueblo 

que estaba con él, y cruzaron el Jordán, y 

ya al amanecer° no quedaba ninguno que 

no hubiera cruzado el Jordán.

23

 Ahitofel entonces, viendo que no se ha-

bía seguido su consejo, enalbardó el asno, y 

subiendo en él, se fue a su casa, a su ciudad; 

y dispuso su familia, y se ahorcó, y murió, y 

fue enterrado en el sepulcro de su padre.

24

 Y  David  llegó  a  Mahanaim  cuando 

Absalón cruzaba el Jordán con todos los 

hombres de Israel.

25

 Y Absalón puso a Amasa sobre el ejér-

cito en lugar de Joab; este Amasa era hijo 

de un hombre llamado Itra, israelita,° el 

cual se había llegado a Abigail hija de Na-

has, hermana de Sarvia, madre de Joab.

26

 E Israel acampó con Absalón en tierra 

de Galaad.

27

 Cuando David llegó a Mahanaim, Sobi, 

hijo  de  Nahas,  de  Rabá,  de  los  hijos  de 

Amón, y Maquir ben Amiel, de Lodebar, y 

Barzilai galaadita, de Rogelim,

28

 llevaron camas, y tazones, y vasijas de ba-

rro, y trigo, y cebada, y harina, y grano° tos-

tado, y habas, y lentejas, y semilla° tostada,

29

 y  miel,  y  leche,  y  ovejas,  y  quesos  de 

vaca, y los presentaron a David y al pueblo 

que estaba con él para que comieran, pues 

pensaron: El pueblo estará en el desierto, 

hambriento, cansado y sediento.

Derrota y muerte de Absalón

18

Entonces  David  pasó  revista  a  la 

gente que tenía consigo, y puso so-

bre ellos jefes de miles y jefes de cientos.

2

 Luego envió David al pueblo: una tercera 

parte al mando de Joab, otra tercera parte 

al mando de Abisai, hijo de Sarvia, herma-

no de Joab, y la otra tercera parte al man-

do de Itai geteo. Y el rey dijo al pueblo: Yo 

mismo también saldré con vosotros.

3

 Pero el pueblo dijo: No saldrás, porque 

si  nosotros  tenemos  que  huir,  no  harán 

caso de nosotros. Aunque la mitad de no-

sotros muera, no harán caso de nosotros; 

pero tú vales hoy como diez mil de noso-

tros. Así que será mejor que nos seas de 

ayuda desde la ciudad.

4

 Y  el  rey  les  respondió:  Haré  lo  que  os 

parezca bien. Y el rey se detuvo junto a la 

entrada, en tanto que el pueblo iba salien-

do por cientos y por miles.

5

 Y  el  rey  dio  orden  a  Joab,  a  Abisai  y  a 

Itai,  diciendo:  Tratad  con  indulgencia  al 

joven Absalón por amor a mí.° Y todo el 

pueblo oyó cuando el rey dio orden a to-

dos los jefes acerca de Absalón.

6

 Así pues, el pueblo salió al encuentro de 

Israel en el campo; y la batalla se libró en 

el bosque de Efraín.

7

 Y allí fue derrotado el pueblo de Israel 

ante los siervos de David; y en aquel día 

se hizo una matanza de veinte mil hom-

bres.

8

 Y la batalla se extendió sobre la faz de 

toda aquella tierra; y el bosque mató más 

gente  en  aquel  día  que  la  que  devoró  la 

espada.

9

 Y Absalón se encontró ante los siervos 

de  David.  Y  Absalón  iba  montado  en  un 

mulo,  y  al  pasar  el  mulo  por  debajo  del 

ramaje  de  un  gran  roble,  se  le  enredó 

fuertemente la cabeza en el roble, y que-

dó suspendido entre los cielos y la tierra, 

y  el  mulo  que  tenía  debajo  de  sí,  siguió 

adelante.

10

 Y lo vio cierto hombre e informó a Joab 

diciendo: ¡He aquí acabo de ver a Absalón 

colgando en un roble!

11

 Y  Joab  dijo  al  hombre  que  le  había 

dado  la  noticia:  Y  viéndolo  tú,  ¿por  qué 

17.22 Lit. a la luz de la mañana.  17.25 LXX registra el ismaelita.  17.28 .grano.  17.28 .semilla   18.5 Lit. tratad benigna-

mente al joven Absalón para mí


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2 Samuel 18:32

339

no  lo  heriste  allí  derribándolo  a  tierra? 

Por mi parte te habría dado diez siclos de 

plata y un tahalí.

12

 Pero el hombre respondió a Joab: Aun-

que se pesaran en mis manos mil siclos 

de plata, yo no extendería mi mano con-

tra el hijo del rey, porque oyéndolo noso-

tros, el rey os dio órdenes a ti, a Abisai y a 

Itai, diciendo: ¡Cuidad que nadie toque al 

joven Absalón!

13

 Y si yo, por cuenta mía, hubiera come-

tido tal villanía, como el rey se entera de 

todo, tú mismo te habrías hecho el des-

entendido.

14

 Respondió Joab: ¡No andaré con con-

templaciones por causa tuya!° Y tomando 

tres dardos° en su mano, fue y los clavó 

en  el  corazón  de  Absalón,  estando  éste 

aún vivo en medio del roble.

15

 Entonces  se  le  pusieron  en  derre-

dor los diez jóvenes escuderos de Joab, 

e  hirieron  a  Absalón  y  lo  acabaron  de 

matar.

16

 En seguida Joab dio soplido al shofar, y 

el pueblo dejó de perseguir a Israel, pues 

Joab detuvo al pueblo.

17

 Luego, tomando a Absalón, lo echaron 

a un gran hoyo en el bosque y colocaron 

sobre  él  un  gran  montón  de  piedras.  Y 

todo Israel huyó, cada uno a sus tiendas.

18

 Durante su vida, Absalón había toma-

do  y  erigido  para  sí  el  monumento  que 

está en el Valle del Rey, porque decía: No 

tengo  ningún  hijo  que  conmemore  mi 

nombre.  Y  llamó  al  monumento  por  su 

nombre; y hasta este día se le llama Pilar 

de Absalón.

19

 Entonces Ahimaas ben Sadoc, dijo: Te 

ruego que me permitas correr y llevar al 

rey la buena noticia de que YHVH lo ha 

librado de la mano de sus enemigos.

20

 Pero Joab le dijo: Hoy no serás hom-

bre de buenas nuevas, sino que otro día 

llevarás  buenas  nuevas.  Hoy  no  llevarás 

buenas nuevas, porque el hijo del rey ha 

muerto.

21

 En seguida dijo Joab al etíope: Ve, di al 

rey lo que has visto. Y el etíope se inclinó 

ante Joab, y corrió.

22

 Pero  Ahimaas  ben  Sadoc,  insistió  de 

nuevo y dijo a Joab: Sea como sea, te rue-

go que me permitas que también yo co-

rra tras el etíope. Y Joab dijo: ¿Para qué 

correrás hijo mío, si no habrá albricias° 

para ti?

23

 Sea  como  sea,  déjame  correr.  Y  él  le 

dijo: ¡Corre! Entonces Ahimaas salió co-

rriendo por el camino de la llanura, y ade-

lantó al etíope.

24

 Y  David  estaba  sentado  entre  las  dos 

puertas;° y el atalaya había subido al te-

rrado de la puerta en el muro, y alzando 

sus ojos miró, y he aquí, un hombre que 

corría solo.

25

 Y  el  atalaya  gritó  e  informó  al  rey.  Y 

el rey dijo: Si viene solo hay buenas nue-

vas en su boca. Y él continuó avanzando 

y acercándose.

26

 Y el atalaya vio a otro hombre corrien-

do; y el atalaya dio voces al portero y dijo: 

He aquí otro° hombre que corre solo. Y el 

rey dijo: Ese también trae buenas nuevas.

27

 Y  el  atalaya  dijo:  Me  parece  que  el 

correr del primero es como el correr de 

Ahimaas ben Sadoc. Y dijo el rey: ¡Ése es 

buen hombre y trae buenas nuevas!

28

 Entonces Ahimaas gritó y dijo al rey: 

¡Paz!, y se postró delante del rey con su 

rostro  en  tierra  diciendo:  ¡Bendito  sea 

YHVH  tu  Dios,  que  ha  entregado  a  los 

hombres que alzaron su mano contra mi 

señor el rey!

29

 Y el rey dijo: ¿Está bien el joven Absa-

lón? A lo que repuso Ahimaas: Vi un tropel 

de gente cuando Joab envió al siervo del 

rey y a tu siervo, pero no supe qué era.

30

 Entonces el rey dijo: Pasa y ponte allí. 

Y él pasó y se quedó allí en pie.

31

 Y he aquí llegó el etíope y dijo: ¡Que las 

buenas  noticias  sean  proclamadas  a  mi 

señor el rey, pues YHVH te libró hoy de la 

mano de todos aquellos que se levantaron 

contra ti!

32

 Y el rey dijo al etíope: ¿Está bien el jo-

ven Absalón? Y el etíope dijo: ¡Como aquel 

joven  sean  los  enemigos  de  mi  señor  el 

rey, y todos los que se levanten contra ti 

para mal!

18.14 Lit. No esperaré delante de ti.  18.14 También significa estaca, aunque en este contexto seguramente se refiere a un 

arma  arrojadiza. 

18.22  Albricias  era  la  recompensa  que  se  daba  al  primero  en  llevar  una  buena  noticia  a  una  autoridad. 

18.24 

→15.2.  18.26 .otro.


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2 Samuel 18:33

340

33

 Y el rey se conmovió profundamente, 

y  subió  al  aposento  superior  que  había 

sobre la puerta, y lloró; y en tanto que se 

iba,  decía  así:  ¡Hijo  mío,  Absalón!  ¡Hijo 

mío, hijo mío, Absalón! ¡Quién me diera 

haber muerto yo en tu lugar, oh Absalón, 

hijo mío, hijo mío!

El retorno a Jerusalem

19

Y avisaron a Joab: ¡He aquí el rey 

está llorando y endechando a causa 

de Absalón!

2

 Y  en  aquel  día  la  victoria  se  convirtió 

en duelo para con todo el pueblo, porque 

el  pueblo  oyó  decir  en  aquel  día:  ¡Cuán 

acongojado está el rey por su hijo!

3

 Aquel día el pueblo° entró calladamen-

te en la ciudad, como entra a hurtadillas 

la  tropa  avergonzada  cuando  huye  de  la 

batalla.

4

 Y el rey había cubierto su rostro y cla-

maba a gran voz: ¡Oh, hijo mío, Absalón! 

¡Oh Absalón, hijo mío, hijo mío!

5

 Entonces  Joab  entró  en  la  casa  donde 

estaba el rey, y le dijo: Hoy has cubierto 

de vergüenza los rostros de todos tus sier-

vos que hoy han salvado tu vida, y la vida 

de tus hijos y de tus hijas, y la vida de tus 

mujeres, y la vida de tus concubinas,

6

 amando  a  los  que  te  aborrecen  y  abo-

rreciendo a los que te aman, porque hoy 

has  demostrado  que  nada  te  importan 

tus príncipes y siervos, pues hoy me has 

hecho ver claramente que si Absalón es-

tuviera  vivo  y  todos  nosotros  muertos, 

entonces estarías contento.

7

 Ahora  pues,  levántate,  sal  y  habla  con 

cariño  a  tus  siervos,  ¡porque  juro  por 

YHVH que si no sales, no quedará ni un 

hombre contigo esta noche! Y esto te será 

peor que toda la desgracia que te ha so-

brevenido desde tu juventud hasta ahora.

8

 Entonces  el  rey  se  levantó  y  se  sentó 

junto  a  la  puerta.°  Y  avisaron  a  todo  el 

pueblo, diciendo: He aquí, el rey está sen-

tado  junto  a  la  puerta;  y  todo  el  pueblo 

compareció ante el rey; pero Israel había 

huido, cada uno a sus tiendas.

9

 Y todo el pueblo estaba en contienda por 

entre todas las tribus de Israel, diciendo: 

El rey nos libró de mano de nuestros ene-

migos, él mismo nos salvó de mano de los 

filisteos, pero ahora ha huido del país por 

causa de Absalón.

10

 Y Absalón, a quien ungimos sobre no-

sotros, ha muerto en la batalla. ¿Por qué, 

pues,  estáis  callados  respecto  de  hacer 

volver al rey?

11

 Por tanto el rey David envió a los sa-

cerdotes  Sadoc  y  Abiatar,  diciendo:  Ha-

blad a los ancianos de Judá diciendo: ¿Por 

qué seréis vosotros los postreros en hacer 

volver al rey a su casa? pues la palabra de 

todo  Israel  está  llegando  al  rey  para  ha-

cerle volver° a su casa.

12

 Sois mis hermanos, mi hueso y mi car-

ne sois; entonces ¿por qué seréis vosotros 

los postreros en hacer volver al rey?

13

 Y  a  Amasa  diréis:  ¿No  eres  tú  hueso 

mío y carne mía? ¡Así me haga Dios y aun 

me añada° si no has de ser jefe del ejército 

delante de mí todos los días, en lugar de 

Joab!

14

 Así  inclinó  el  corazón  de  todos  los 

hombres de Judá como un solo hombre. 

Entonces enviaron a decir al rey: Vuelve 

tú con todos tus siervos.

15

 Y el rey volvió y fue hasta el Jordán. Y 

Judá fue a Gilgal a recibir al rey, a fin de 

hacer que el rey cruzara el Jordán.

16

 Entonces Simei ben Gera, benjamita, 

que  era  de  Bahurim,  se  dio  prisa  y  bajó 

con los hombres de Judá al encuentro del 

rey David;

17

 y  con  él  iban  mil  hombres  de  Benja-

mín.  También  Siba,  siervo  de  la  casa  de 

Saúl, vino con sus quince hijos y sus vein-

te siervos con él, y se apresuraron a cru-

zar el Jordán delante del rey.

18

 Y  cruzaron°  el  vado  para  ayudar  a 

pasar a la familia del rey y para hacer lo 

bueno ante sus ojos. Entonces Simei ben 

Gera, se postró ante el rey cuando éste iba 

a pasar el Jordán,

19

 y  dijo  al  rey:  ¡No  me  impute  mi  se-

ñor  iniquidad  recordando  lo  que  hice 

19.3 Esto es, el ejército.  19.8 

→15.2 nota.  19.11 .para hacerle volver.  19.13 →3.9 nota.  19.18 Construcción compleja en el 

TM: El verbo parece tener por sujeto el vado, pero es evidente, por el sentido y por el contexto, que el sujeto debe ser el conjunto 

de hombres que cruzaron el río para ayudar a la familia real. A favor de esto está VUL, que pone el verbo en plural. LXX registra 

y prestaron ayuda para hacer pasar al otro lado al rey


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2 Samuel 19:42

341

perversamente el día en que mi señor el 

rey  salía  de  Jerusalem,  para  que  el  rey 

haga caso de ello!°

20

 Porque tu siervo sabe que ha pecado; 

por eso, he aquí que he venido hoy, el pri-

mero de toda la casa de José, para bajar al 

encuentro de mi señor el rey.

21

 Pero Abisai, hijo de Sarvia, respondió 

y dijo: ¿No ha de ser muerto Simei, por 

cuanto maldijo al ungido de YHVH?

22

 David  entonces  dijo:  ¿Qué  tengo  yo 

que ver con vosotros, hijos de Sarvia, para 

que os pongáis hoy por adversarios míos? 

¿Acaso ha de morir hombre alguno° hoy 

en Israel? ¿Acaso no acabo de saber que 

hoy mismo soy hecho rey sobre Israel?

23

 Y el rey dijo a Simei: ¡No morirás! Y el 

rey se lo juró.

24

 También Mefi-boset hijo de Saúl,° bajó 

para encontrarse con el rey; y no se había 

curado los pies, ni compuesto la barba,° 

ni había hecho lavar sus vestidos, desde el 

día en que el rey había salido hasta el día 

en que llegó en paz.

25

 Y sucedió que cuando vino con los de 

Jerusalem para recibir al rey, el rey le dijo: 

¿Por qué no fuiste conmigo, Mefi-boset?

26

 Y él respondió: ¡Oh, rey, señor mío! Mi 

siervo me engañó, pues tu siervo se dijo: 

Me enalbardaré un asno y montaré en él 

para ir con el rey, por cuanto tu siervo es 

cojo.

27

 Además, ha calumniado a tu siervo de-

lante  de  mi  señor  el  rey;  pero  mi  señor 

el rey es como un ángel° de Dios, así que 

haz lo que sea bueno ante tus ojos;

28

 porque  aun  cuando  toda  la  casa  de 

mi padre era digna de muerte delante de 

mi señor el rey, pusiste a tu siervo entre 

los  que  comen  a  tu  mesa,  ¿y  qué  dere-

cho tendría yo aún para reclamar más al 

rey?

29

 A lo cual le respondió el rey: ¿Por qué 

insistes en tus asuntos? Ya he dicho que 

tú y Siba os dividáis las tierras.

30

 Y Mefi-boset dijo al rey: Que él las tome 

todas, ya que mi señor el rey ha vuelto en 

paz a su propia casa.

31

 Y  Barzilai  galaadita  había  bajado  de 

Rogelim, y cruzó el Jordán con el rey para 

despedirlo en el Jordán.

32

 Y Barzilai era muy anciano, de ochen-

ta años, y él había dado provisiones al rey 

mientras  estaba  en  Mahanaim,  porque 

era hombre muy poderoso.

33

 Y el rey dijo a Barzilai: Pasa conmigo y 

te sustentaré junto a mí en Jerusalem.

34

 Pero Barzilai dijo al rey: ¿Cuántos son 

los días que me restan de vida para que yo 

suba con el rey a Jerusalem?

35

 Hoy cumplo ochenta años, ¿acaso dis-

cerniré entre lo bueno y lo malo? ¿Puede 

tu  siervo  saborear  lo  que  coma  o  lo  que 

beba? ¿Escucharé aún la voz de cantores y 

cantoras? Entonces, ¿por qué habrá de ser 

tu siervo otra carga para mi señor el rey?

36

 Tu siervo sólo desea cruzar el Jordán 

con el rey. ¿Por qué debe el rey darme re-

compensa tal?

37

 Ruégote  permitas  a  tu  siervo  que  re-

grese,  para  que  pueda  morir  en  mi  ciu-

dad, al lado del sepulcro de mi padre y de 

mi madre. Sin embargo, he aquí que tu 

siervo  Quimam°  pasará  con  mi  señor  el 

rey: haz con él lo que sea bueno ante tus 

ojos.

38

 Entonces  el  rey  dijo:  Quimam  pasará 

conmigo y yo haré por él lo que te parezca 

bien a ti, y cualquier cosa que requieras 

de mí,° eso haré por ti.

39

 Y toda la gente cruzó el Jordán, y pasó 

también el rey. Luego el rey besó a Barzi-

lai y lo bendijo, y él volvió a su lugar.

40

 Y el rey prosiguió a Gilgal, y Quimam 

fue  con  él;  y  todo  el  pueblo  de  Judá,  y 

también  la  mitad  del  pueblo  de  Israel, 

acompañaban al rey.

41

 Y  he  aquí  que  todos  los  hombres  de 

Israel  fueron  al  rey;  y  le  dijeron  al  rey: 

¿Por qué tan a hurtadillas te han tomado 

nuestros hermanos, los hombres de Judá, 

y  han  hecho  cruzar  el  Jordán  al  rey  y  a 

su casa, y a todos los hombres de David 

con él?

42

 Entonces  todos  los  hombres  de  Judá 

respondieron a los hombres de Israel: Por 

19.19 Lit. para que el rey lo guarde en su corazón. Las expresiones guardar en el corazón y poner el corazón en indican la acción 

de preocuparse, dar importancia a algo o tomar en cuenta algo seriamente. 

19.22 LXX registra me seréis como un adversario 

si hoy muere alguien

19.24 LXX registra hijo del hijo de Saúl.  19.24 Lit. no había hecho sus pies ni había hecho su bigote

19.27 

→14.17 nota.  19.37 LXX añade mi hijo.  19.38 Lit. escojas de mí.


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2 Samuel 19:43

342

lo mismo que el rey es pariente° cercano 

a nosotros. Pero ¿por qué os enojáis por 

esto? ¿Acaso hemos comido algo a costa 

del rey, o se nos ha dado algo?

43

 Y respondiendo los hombres de Israel, 

dijeron a los hombres de Judá: ¡Diez par-

tes tenemos en el rey, y más derecho so-

bre  David  que  vosotros!  ¿Por  qué,  pues, 

nos  habéis  menospreciado?  ¿No  dimos 

nuestra palabra° primero para hacer vol-

ver a nuestro rey? Sin embargo, la palabra 

de los hombres de Judá prevaleció sobre 

la palabra de los hombres de Israel.°

Rebelión de Seba

20

Pero estaba allí cierto hombre de Be-

lial, llamado Seba ben Bicri, benja-

mita, quien dio soplido al shofar, y dijo: ¡No 

tenemos  parte  en  David  ni  heredad  en  el 

hijo de Isaí! ¡Israel: cada uno a sus dioses!°

2

 Entonces  todos  los  hombres  de  Israel 

dejaron de seguir a David° y siguieron a 

Seba ben Bicri. Pero los hombres de Judá 

siguieron fielmente a su rey desde el Jor-

dán hasta Jerusalem.

3

 Cuando David llegó a su casa en Jeru-

salem, tomó el rey a las diez concubinas 

que había dejado para cuidar la casa y las 

puso en reclusión, y aunque las sustentó, 

nunca  más  se  llegó  a  ellas;  y  ellas  per-

manecieron  recluidas  hasta  el  día  de  su 

muerte, en viudez perpetua.

4

 Luego dijo el rey a Amasa: Convócame a 

los hombres de Judá dentro de tres días, y 

preséntate aquí.

5

 Y  Amasa  fue  a  convocar  a  Judá,  pero 

tardó más del plazo que le había sido se-

ñalado.

6

 Por lo cual David dijo a Abisai: Seba ben 

Bicri nos hará ahora más daño que Absa-

lón. Toma tú a los siervos de tu señor y ve 

tras él, no sea que halle para sí ciudades 

fortificadas y se nos pierda de vista.

7

 Así salieron tras él los hombres de Joab 

con  los  cereteos,  y  los  peleteos°  y  todos 

los hombres valientes. Y salieron de Jeru-

salem para ir tras Seba ben Bicri.

8

 Y cuando estaban cerca de la gran roca 

que  está  en  Gabaón,  Amasa  les  salió  al 

encuentro. Y Joab vestía su capa larga, y 

sobre ella se había ceñido una espada con 

su  vaina  unida  a  la  cadera,  la  cual  se  le 

cayó mientras avanzaba.

9

 Y preguntó Joab a Amasa: ¿Tienes paz, 

hermano mío? Y Joab tomó a Amasa por 

la barba con su mano derecha para besar-

lo.

10

 Pero Amasa no reparó en la espada que 

estaba en la otra mano de Joab, de modo 

que  lo  hirió  con  ella  en  la  quinta  costi-

lla, derramando sus entrañas por tierra. Y 

no tuvo que repetir la estocada° para que 

muriera.°  Después  Joab  y  su  hermano 

Abisai fueron tras Seba ben Bicri.

11

 Y allí cerca estaba uno de los mozos de 

Joab, que dijo: ¡Quien favorezca a Joab y 

el que esté por David, que siga a Joab!

12

 Y Amasa yacía revolcándose en su san-

gre en medio del camino, y viendo aquel 

hombre  que  todo  el  pueblo  se  detenía, 

apartó  a  Amasa  del  camino  y  lo  llevó  al 

campo, y echó sobre él una túnica, por-

que veía que todo el que pasaba se detenía 

junto a él.

13

 Cuando fue apartado de la senda, todos 

los hombres siguieron tras Joab para per-

seguir a Seba ben Bicri.

14

 Y él pasó por todas las tribus de Israel 

hacia Abel-bet-maaca, y todos los beritas 

se reunieron y también fueron detrás de 

él.

15

 Cuando  ellos  llegaron,  lo  sitiaron  en 

Abel-bet-maaca,  y  levantaron  contra  la 

ciudad un terraplén que se sostenía en el 

muro, y toda la gente que estaba con Joab 

batía el muro para derribarlo.

16

 Entonces  una  mujer  sabia  dio  voces 

desde la ciudad, diciendo: ¡Oíd! ¡Oíd! Os 

ruego  que  digáis  a  Joab:  ¡Acércate  para 

que yo hable contigo!

17

 Así que él se acercó a ella, y la mujer le 

preguntó: ¿Eres tú Joab? Y le respondió: 

Yo soy. Y ella le dijo: Oye las palabras de 

tu sierva. Y él respondió: Escucho.

18

 Entonces ella habló diciendo: Antigua-

mente solían decir: Quien consulte, que 

consulte  en  Abel;  y  así  concluían  cual-

quier asunto.

19.42 .pariente.  19.43 Lit. ¿No tuve mi palabra?  19.43 Es decir, las razones de los hombres de Judá fueron más poderosas 

que las de los hombres de Israel

20.1 6ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 12.  20.2 Lit. se retiraron de detrás de David

20.7 

→8.18 nota.  20.10 .la estocada.  20.10 Lit. no lo repitió y murió.


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2 Samuel 21:14

343

19

 Somos una de las más pacíficas y fieles 

de  Israel,  pero  tú  procuras  destruir  una 

ciudad que es madre° en Israel. ¿Por qué 

quieres devorar la heredad de YHVH?

20

 Y  Joab  respondió  y  dijo:  ¡Lejos,  lejos 

esté de mí que yo devore o destruya!

21

 El asunto no es así, sino que un hom-

bre  de  la  región  montañosa  de  Efraín, 

Seba  ben  Bicri  es  su  nombre,  ha  levan-

tado su mano contra el rey, contra David. 

Entregadlo solamente a él y me iré de la 

ciudad.  Entonces  la  mujer  respondió  a 

Joab: ¡He aquí, su cabeza te será arrojada 

desde el muro!

22

 Después la mujer fue a todo el pueblo 

con su sabiduría; y cortaron la cabeza a 

Seba  ben  Bicri,  y  la  arrojaron  a  Joab.  Y 

éste dio soplido al shofar y se retiraron de 

la ciudad, cada uno a su tienda, y Joab re-

gresó junto al rey en Jerusalem.

23

 Joab estaba sobre todo el ejército de Is-

rael, y Benaía ben Joiada estaba al mando 

de los cereteos y los peleteos.

24

 Adoram estaba a cargo de los tributos, 

y Josafat ben Ahilud era el cronista.

25

 Seva era el escriba, y Sadoc y Abiatar, 

los sacerdotes.

26

 E Ira, el jaireo, era el ministro princi-

pal de David.

Los gabaonitas

21

En los días de David hubo hambre 

por tres años consecutivos, y buscó 

David  el  rostro  de  YHVH;  y  dijo  YHVH: 

Es  a  causa  de  Saúl,  a  causa  de  esa  casa 

sanguinaria que dio muerte a los gabao-

nitas.

2

 Y el rey llamó a los gabaonitas y habló 

con ellos. (Los gabaonitas no eran de los 

hijos de Israel, sino del remanente de los 

amorreos, y los hijos de Israel le habían 

jurado la paz,° pero Saúl había procurado 

matarlos en su celo por los hijos de Israel 

y de Judá.)

3

 Dijo pues David a los gabaonitas: ¿Qué 

puedo  hacer  por  vosotros,  y  con  qué  os 

haré compensación para que bendigáis la 

heredad de YHVH?

4

 Y  los  gabaonitas  le  respondieron:  No 

nos importa la plata ni el oro de Saúl o de 

su casa, ni nos corresponde dar muerte a 

nadie en Israel. Y él dijo: Haré por voso-

tros lo que digáis.

5

 Y  dijeron  al  rey:  Del  hombre  que  nos 

consumió y trató de exterminarnos para 

que no quedáramos dentro del territorio 

de Israel,

6

 se nos entreguen siete varones de entre 

sus  hijos,  y  los  ahorcaremos  delante  de 

YHVH  en  Gabaa  de  Saúl,  el  escogido  de 

YHVH. Y el rey dijo: Los entregaré.

7

 Pero el rey se compadeció de Mefi-boset 

ben Jonatán, hijo de Saúl, a causa del ju-

ramento que David y Jonatán ben Saúl se 

habían hecho en nombre de YHVH.

8

 Y tomó el rey a los dos hijos de Rizpa 

hija de Aja, que había dado a luz a Saúl: 

Armoni y Mefi-boset, y a los cinco hijos de 

Mical hija de Saúl, los cuales había dado a 

luz a Adriel ben Barzilai meolatita.

9

 Y  los  entregó  en  manos  de  los  gabao-

nitas, quienes los ahorcaron en el monte 

delante de YHVH. Y así murieron juntos 

aquellos siete, los cuales fueron muertos 

en  los  primeros  días  de  la  siega,  al  co-

mienzo de la cosecha de la cebada.

10

 Entonces Rizpa hija de Aja tomó una 

tela  de  saco  y  se  la  extendió  sobre  una 

roca, desde el comienzo de la siega hasta 

que cayó sobre ellos agua de los cielos, y 

no dejó que ninguna ave de los cielos se 

posara sobre ellos de día, ni las fieras del 

campo por la noche.

11

 Y  cuando  le  informaron  a  David  lo 

que hacía Rizpa hija de Aja, concubina de 

Saúl,

12

 fue David y tomó los huesos de Saúl y los 

huesos de su hijo Jonatán de los hombres 

de Jabes Galaad, quienes los habían quitado 

furtivamente de la plaza de Bet-san, donde 

los filisteos los habían colgado el día en que 

los filisteos mataron a Saúl en Gilboa,

13

 e hizo subir de allí los huesos de Saúl 

y los huesos de su hijo Jonatán, y reco-

giendo los huesos de los que habían sido 

ahorcados,

14

 los sepultaron con los huesos de Saúl 

y de su hijo Jonatán en tierra de Benja-

mín, en Zela, en el sepulcro de su padre 

Cis, haciéndose todo lo que el rey había 

ordenado. Después de eso, ’Elohim quedó 

aplacado respecto a la tierra.

20.19 Es decir, una ciudad metropolitana.  21.2 

→Jos.9.15. 


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2 Samuel 21:15

344

15

 De nuevo hubo guerra de los filisteos 

contra Israel. Y bajó David con sus sier-

vos, y mientras luchaban contra los filis-

teos, David se cansó.

16

 E Isbi-benob, que era uno de los hijos 

de Rafah,° cuya lanza pesaba trescientos 

siclos de bronce, y estaba ceñido con una 

espada° nueva, se dispuso a matar a Da-

vid.

17

 Pero Abisai hijo de Sarvia lo ayudó, e 

hirió  al  filisteo  y  lo  mató.  Entonces  los 

hombres  de  David  le  juraron  diciendo: 

¡No  saldrás  más  con  nosotros  a  la  bata-

lla, no sea que se apague la antorcha de 

Israel!

18

 Después de esto, sucedió que se volvió 

a levantar guerra en Gob contra los filis-

teos;  y  Sibecai  husatita  mató  a  Saf,  que 

era otro de los hijos de Rafah.

19

 Otra vez hubo guerra en Gob con los 

filisteos, y Elhanán ben Jaare-oregim, de 

Bet-léhem, mató a Goliat° geteo, el asta 

de cuya lanza era como el rodillo de un 

telar.

20

 Y  hubo  guerra  nuevamente  en  Gat, 

donde había un hombre de gran estatura 

que tenía seis dedos en cada mano y seis 

dedos en cada pie, veinticuatro en total. 

También éste era hijo de Rafah.

21

 Y cuando desafió a Israel, lo mató Jo-

natán ben Simea, hermano de David.

22

 Estos  cuatro  eran  hijos  de  Rafah  en 

Gat,  y  cayeron  por  la  mano  de  David,  y 

por la mano de sus siervos.°

Cántico de David

22

Y habló David a YHVH las palabras 

de  este  cántico°  el  día  que  YHVH 

lo libró de la mano de Saúl y de todos sus 

enemigos.

2

 Y dijo:

YHVH es mi Roca y mi fortaleza, y 

mi libertador;

3

    Dios es mi Roca, en Él 

me refugiaré;

Mi escudo, y el cuerno de mi 

salvación,

Mi alto refugio, y mi Salvador.

De la violencia me libraste.

4

    Invocaré a YHVH, quien es digno de 

ser alabado,

Y seré salvo de mis enemigos.

5

    Cuando me cercaban las olas de la 

Muerte,

Y torrentes destructores me 

aterraban,

6

    Y me envolvían los lazos del Seol,

Y me alcanzaban los lazos de la 

Muerte,

7

    En mi angustia invoqué a YHVH,

Sí, invoqué a mi Dios, y oyó mi voz 

desde su morada,

Y mi clamor llegó a sus oídos.

8

    La tierra fue conmovida, y tembló,

Se conmovieron los cimientos de los 

cielos;

Se estremecieron, porque Él se 

indignó.

9

    De su nariz se alzó una humareda,

Y de su boca salió un fuego 

abrasador,

Que lanzó carbones encendidos.

10

    Inclinó los cielos, y descendió,

Con espesas tinieblas debajo de sus 

pies;

11

    Cabalgó sobre un querubín, y voló;

Se cernió sobre las alas del viento,

12

    Envuelto en un cerco de tinieblas,

Oscuridad de aguas, y densos 

nubarrones.

13

    Al fulgor de su presencia se 

encendieron las centellas;

14

    YHVH tronó desde los cielos,

’Elyón° hizo resonar su voz;

15

    Disparó sus saetas, y los dispersó;

Lanzó relámpagos, y los destruyó.

16

    Entonces aparecieron los torrentes 

de las aguas,

Y los cimientos del universo 

quedaron descubiertos,

21.16 Esta palabra puede entenderse de dos maneras: Puede traducirse como gigante o puede ser un nombre propio (en cuyo 

caso no hay que traducirla). A favor de la primera opción es oportuno considerar que este término está precedido por un artículo 

definido, y que la raíz de esta palabra está relacionada con el vocablo refaim, que hace referencia a los gigantes que habitaban 

en Canaán antes de la llegada de los israelitas. A favor de la segunda opción podemos entender este término como un nombre 

propio, porque la palabra gigante en hebreo sólo aparece en plural (éste sería el único caso en que esta palabra aparece en 

singular),  y  que  esta  palabra  únicamente  se  utiliza  aquí  para  hacer  referencia  a  la  ascendencia  paterna  de  los  personajes 

mencionados en estos versículos (y en el paralelo de 1 Cr.20.4-8). 

21.16 .espada.  21.19 Esto es, a Lamí, hermano de Goliat

→1 Cr.20.5.  21.22 Cumplimiento del símbolo de las cinco piedras →1 S.17.40.  22.1 →Sal.18.  22.14 Esto es, el Altísimo


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2 Samuel 22:49

345

A la reprensión de YHVH,

Por el soplo del aliento de su nariz.

17

    Envió desde lo alto y me tomó;

Me sacó de entre las muchas aguas.

18

    Me libró de un poderoso enemigo,

Y de los que me aborrecían, pues 

eran más fuertes que yo.

19

    Me enfrentaron en el día de mi 

quebranto,

Pero YHVH fue mi apoyo,

20

    Y me sacó a lugar espacioso;

Me libró, porque en mí se 

complació.

21

    YHVH recompensó mi rectitud,

Y retribuyó la pureza de mis manos.

22

    Porque guardé los caminos de 

YHVH,

Y no me aparté impíamente de 

mi Dios.

23

    Pues todos sus preceptos estuvieron 

delante de mí,

Y no me aparté de sus estatutos.

24

    Fui recto para con Él,

Y me he guardado de mi maldad;

25

    YHVH recompensó mi rectitud;

Mi pureza en su presencia.

26

    Con el misericordioso te mostrarás 

misericordioso,

Y recto para con el hombre recto.

27

    Limpio te mostrarás para con el 

limpio,

Y con el perverso, sagaz.

28

    Tú salvas al pueblo afligido,

Y humillas los ojos soberbios.

29

    ¡Tú eres mi lámpara, oh YHVH!

¡Oh YHVH, Tú alumbras mis 

tinieblas!

30

    Contigo, aplastaré ejércitos,

Con mi Dios, asaltaré muros.

31

    En cuanto a Dios, perfecto es su 

camino,

Y acrisolada la palabra de YHVH.

Escudo a todos los que en Él esperan.

32

    Porque ¿quién es Dios, sino sólo 

YHVH?

¿Y qué Roca hay fuera de nuestro 

Dios?

33

    Dios es el que me ciñe de vigor,

Y hace perfecto mi camino;

34

    Quien hace mis pies como de ciervas,

Y me hace estar firme en mis alturas;

35

    Quien adiestra mis manos para la 

batalla,

Y mis brazos para tensar el arco de 

bronce.

36

    Me has dado también el escudo de tu 

salvación,

Y tu benignidad me ha 

engrandecido.

37

    Ensanchas mis pasos debajo de mí,

Y mis pies no han resbalado.

38

    Perseguiré a mis enemigos y los 

destruiré,

Y no me volveré atrás hasta 

acabarlos.

39

    Sí, acabaré con ellos y los golpearé, 

de modo que no puedan 

levantarse.

¡Ya han caído bajo mis pies!

40

    Pues Tú me ceñiste de fuerza para la 

batalla,

E hiciste que mis enemigos se 

doblegaran debajo de mí,

41

    También has hecho que mis 

enemigos me vuelvan las 

espaldas,

Para que destruya a los que me 

aborrecen.

42

    Miraron en derredor, y no hubo 

quien salvara;

Aun a YHVH, pero no los oyó.

43

    Los he molido como polvo de la 

tierra;

Pisado y triturado como el lodo de 

las calles.

44

    Tú también me has librado de las 

contiendas de mi pueblo;

Me guardaste para ser cabeza de 

naciones;

Pueblo que yo no conocía me 

servirá.

45

    Hijos de extranjeros se someterán 

a mí;

Al oír de mí, me obedecerán.

46

    Los extranjeros se debilitarán,

Y saldrán temblando de sus 

encierros.

47

    ¡Viva YHVH, y bendita sea mi Roca! 

¡Engrandecido sea el Dios de mi 

salvación!

48

 El Dios que venga mis agravios,

Y sujeta pueblos debajo de mí;

49

    El que me saca de entre los 

enemigos;

Sí, Tú me exaltas por encima de los 

que me resisten,


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2 Samuel 22:50

346

Y me libras del hombre cruel.

50

    Por tanto, oh YHVH, yo te confesaré 

entre las naciones,

Y cantaré alabanzas a tu Nombre

51

    Que salva maravillosamente a su rey,

Y muestra misericordia a su ungido:

¡A David y a su simiente para 

siempre!

Últimas palabras de David

23

Estas son las postreras palabras de 

David:

Oráculo de David ben Isaí,

Oráculo del hombre que fue 

exaltado,

El ungido del Dios de Jacob,

El dulce salmista de Israel:

2

    El Espíritu de YHVH habla por mí,

Y su palabra° está en mi lengua.

3

    Ha dicho el Dios de Israel,

Me ha hablado la Roca de Israel:

El que gobierna a los hombres con 

justicia,

El que gobierna en el temor de Dios,

4

    Es como la luz de la aurora cuando 

sale el sol,

Cual mañana sin nubes tras la lluvia,

Que hace resplandecer la tierna 

hierba de la tierra.

5

    Y aunque mi casa no haya sido así 

para con Dios,

Él ha hecho conmigo un pacto 

eterno,

En todo ordenado y bien seguro,

Que hará prosperar mis anhelos de 

plena salvación.

6

    Pero los perversos, todos ellos,

Serán como espinos,

Que se tiran y nadie recoge,

7

    Ninguno se acerca a ellos,

Sino con el hierro o con el asta de la 

lanza,

Y con fuego que los abrase por 

completo en su lugar.

8

 Estos son los nombres de los valientes 

que tuvo David: Joseb-basebet° tacmoni-

ta, principal entre los tres, que era Adino 

eznita,° quien mató a ochocientos hom-

bres° en una ocasión.

9

 Tras él estaba Eleazar ben Dodo, hijo de 

Ahohi, uno de los tres valientes que esta-

ban con David cuando desafiaron a los fi-

listeos reunidos para la batalla, pese a que 

los hombres de Israel se habían retirado 

de allí.°

10

 Éste  se  levantó  e  hirió  a  los  filisteos 

hasta  que  su  mano  se  cansó  y  se  quedó 

pegada  a  la  espada.  En  aquel  día  YHVH 

dio una gran victoria, y el pueblo volvió 

en pos de él sólo para tomar el botín.

11

 Después de él estaba Sama ben Age, el 

ararita. Los filisteos se habían concentra-

do  en  tropa  donde  había  una  parcela  de 

tierra  sembrada  de  lentejas,  y  el  pueblo 

había huido ante los filisteos.

12

 Pero  él  se  paró  en  medio  de  aquella 

parcela y la defendió y derrotó a los filis-

teos, y YHVH dio una gran victoria.

13

 También, en la época de la siega, hubo 

tres de los treinta principales, que bajaron 

y fueron a David, a la cueva de Adulam, 

cuando una banda° de filisteos acampaba 

en el valle de Refaim.

14

 David  estaba  entonces  en  el  refugio, 

y la guarnición filistea se encontraba en 

Bet-léhem.

15

 Y  David  tuvo  un  deseo  y  exclamó: 

¡Quién me diera a beber del agua del pozo 

de Bet-léhem, que está junto a la puerta!

16

 Y los tres valientes irrumpieron en el 

campamento  filisteo  y  sacaron  agua  del 

pozo, junto a la puerta de Bet-léhem, y se 

la llevaron a David; pero él no quiso be-

berla, sino que la derramó como ofrenda 

a YHVH, diciendo:

17

 ¡Lejos esté de mí, oh YHVH, el hacer 

esto! ¿He de beber yo la sangre de los va-

rones que fueron con riesgo de sus vidas? 

Y no quiso beberla. Tales cosas hicieron 

estos tres valientes.

18

 Y  Abisai,  hermano  de  Joab,  hijo  de 

Sarvia, era el principal de los treinta. Éste 

blandió su lanza contra trescientos, que 

fueron traspasados; y tuvo renombre en-

tre los tres.

19

 Él fue el más renombrado de los trein-

ta, y llegó a ser su jefe, pero no fue inclui-

do entre los tres.

23.2 Heb. milató proviene del vocablo arameo milá.  23.8 Esto es, el que se sienta en el asiento.  23.8 Dos mss. hebreos, 

así como algunos mss. de la LXX, registran él blandió su lanza en lugar de que era Adino eznita (por analogía 

→1 Cr.11.11). 

23.8 Lit. hizo ochocientos muertos.  23.9 

→1 Cr.11.12-14.  23.13 Prob. se refiere a un grupo de familias filisteas aliadas para 

hacer una incursión en territorio israelí. 


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2 Samuel 24:13

347

20

 Después, Benaía ben Joiada, hijo de un 

hombre  valeroso  de  múltiples  proezas, 

natural de Cabseel, mató a ambos hijos de 

Ariel de Moab, y en un día de nieve, bajó y 

mató a un león dentro de un foso.

21

 También mató a un egipcio de enor-

me estatura. El egipcio traía una lanza 

en la mano, y Benaía° fue contra él con 

un  cayado,  y  arrebatando  la  lanza  de 

mano del egipcio, lo mató con su propia 

lanza.

22

 Esto hizo Benaía ben Joiada, y tuvo re-

nombre entre los treinta valientes.

23

 Fue distinguido entre los treinta, pero 

sin llegar a alcanzar a los tres.° David lo 

puso al frente de su guardia personal.°

24

 Asael,  hermano  de  Joab,  fue  de  los 

treinta, así como Elhanán ben Dodo, de 

Bet-léhem;

25

 Sama harodita, Elica harodita;

26

 Heles paltita, Ira ben Iques, tecoíta;

27

 Abiezer anatotita; Mebunai husatita;

28

 Salmón ahohíta; Maharai netofatita;

29

 Heleb  ben  Baana,  netofatita;  Itai  ben 

Ribai, de Gabaa de los hijos de Benjamín;

30

 Benaía  piratonita;  Hidai,  de  Najalé-

Gaas;°

31

 Abi-albón arbatita; Azmavet barhumita;

32

 Eliaba saalbonita; Jonatán, de los hijos 

de Jasén;

33

 Sama ararita; Ahíam ben Sarar, ararita;

34

 Elifelet  ben  Ahasbai,  hijo  de  Maaca; 

Eliam ben Ahitofel, gilonita;

35

 Hezri carmelita; Paarai arbita;

36

 Igal ben Natán, de Soba; Bani gadita;

37

 Selec  amonita;  Naharai  beerotita,  es-

cudero de Joab, hijo de Sarvia;

38

 Ira itrita; Gareb itrita,

39

 y Urías heteo. Treinta y siete por todos.°

Censo del pueblo

24

Volvió a encenderse la ira de YHVH 

contra Israel; e incitó° a David con-

tra ellos para que dijera: Ve, haz un censo 

de Israel y de Judá.

2

 Y el rey dijo a Joab, general del ejército, 

que estaba con él: Recorre todas las tribus 

de Israel, desde Dan hasta Beerseba, y haz 

un censo del pueblo, para que yo sepa el 

número de la gente.

3

 Pero  Joab  dijo  al  rey:  ¡YHVH  tu  Dios 

añada al pueblo cien veces más, y que mi 

señor el rey lo vea! Pero, ¿por qué desea 

esto mi señor el rey?

4

 Pero la palabra del rey prevaleció contra 

Joab y contra los jefes del ejército. Así que 

Joab y los jefes del ejército salieron de la 

presencia del rey para hacer el censo del 

pueblo de Israel.

5

 Cruzaron  el  Jordán  y  acamparon  en 

Aroer, a la derecha de la ciudad que está 

en medio del valle° de Gad, junto a Jazer.

6

 Después fueron a Galaad y a la tierra de 

Tahtim-hodsi,° y de allí a Dan-jaán y a los 

alrededores de Sidón.

7

 Fueron luego a la fortaleza de Tiro, y a 

todas las ciudades de los heveos y de los 

cananeos,  y  por  último  se  dirigieron  al 

sur de Judá, hasta Beerseba.

8

 Y habiendo recorrido el país, volvieron a 

Jerusalem al cabo de nueve meses y vein-

te días.

9

 Y  Joab  entregó  el  censo  del  pueblo  al 

rey. Y fueron los de Israel ochocientos mil 

hombres de guerra que portaban espada; y 

los de Judá eran quinientos mil hombres.

10

 Pero después que David hizo contar al 

pueblo,  le  remordió  el  corazón.  Así  que 

David dijo a YHVH: He pecado gravemen-

te al haber hecho esto. Ahora, oh YHVH, 

te ruego que perdones la iniquidad de tu 

siervo, porque he obrado neciamente.

11

 Cuando David se levantó por la maña-

na, la palabra de YHVH fue al profeta Gad, 

vidente de David, diciendo:

12

 Ve y di a David: Así dice YHVH: Tres co-

sas te propongo; escoge una de ellas, para 

que Yo te la haga.

13

 Y Gad fue a David, y se lo hizo saber, 

diciéndole:  ¿Te  sobrevendrán  siete  años 

23.21 .Benaía.  23.23 Es decir, no llegó a ser tan renombrado como el grupo de los tres valientes que se describen en 23.8-

12. 

23.23 Lit. Y lo puso David sobre sus escuchadores. Es decir, los que estaban cerca de David y escuchaban sus órdenes

23.30 Nde los torrentes de Gaas

→2 S.24.5.  23.39 En esta lista hay un total de treinta y seis nombres mencionados expre-

samente: Los de los tres valientes, los de Abisai, Benaía y Asael, y los de los treinta mencionados a partir de la segunda mitad 

del v. 24. Seguramente, el nombre que falta es el de Joab, mencionado indirectamente como el hermano de Abisai y Asael. 

24.1 Esto es, Satanás

→1 Cr.21.1.  24.5 Esta palabra denota un valle por el que pasa un torrente (más concretamente, el valle 

de un wadi, un torrente que solo contiene agua durante la estación de lluvias). En la cultura hebrea, ciertos wadis (con sus valles) 

eran usados para designar localidades. 

24.6 Na la tierra de los hititas, a Cades


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2 Samuel 24:14

348

de hambre en tu tierra? ¿Huirás tres me-

ses delante de tu adversario mientras te 

persigue? ¿Habrá tres días de peste en tu 

tierra?  Decide  ahora,  y  mira  qué  he  de 

responder al que me envía.

14

 Y  David  respondió  a  Gad:  Estoy  en 

gran angustia; pero es preferible caer en 

manos de YHVH, porque muchas son sus 

misericordias, que caer en manos de los 

hombres.

15

 Y YHVH envió la peste sobre Israel des-

de la mañana hasta el tiempo señalado; y 

desde  Dan  hasta  Beerseba  murieron  del 

pueblo setenta mil hombres.

16

 Pero  cuando  el  ángel°  extendió  su 

mano  hacia  Jerusalem  para  destruirla, 

YHVH  se  compadeció  por  esa  desgracia, 

y dijo al ángel que estaba destruyendo al 

pueblo:  ¡Basta  ya!  ¡Detén  tu  mano!  Y  el 

ángel  de  YHVH  estaba  junto  a  la  era  de 

Arauna, el jebuseo.

17

 Y  David,  cuando  vio  al  ángel  herir  al 

pueblo, habló a YHVH, y dijo: Yo mismo 

soy el que ha pecado, y yo soy el que ha 

obrado perversamente; pero estas ovejas, 

¿qué han hecho? ¡Sea ahora tu mano con-

tra mí y contra la casa de mi padre!

18

 Y Gad fue a David aquel día y le dijo: 

Sube y levanta un altar a YHVH en la era 

de Arauna el jebuseo.

24.16 

→2 S.14.17.  24.22 Lit. los utensilios de los bueyes. Es posible que esta expresión implique también otros elementos 

aparte de los yugos. 

19

 Entonces  David  subió  conforme  a  la 

palabra de Gad, tal como YHVH había or-

denado.

20

 Y tendiendo la vista, Arauna vio al rey 

y a sus siervos que avanzaban hacia él; y 

saliendo Arauna, se postró rostro en tie-

rra ante el rey.

21

 Y  preguntó  Arauna:  ¿Para  qué  viene 

mi señor el rey a su siervo? Y David res-

pondió: A comprarte la era para edificar 

un altar a YHVH a fin de detener la mor-

tandad del pueblo.

22

 Pero  Arauna  dijo  a  David:  Tómela  y 

ofrezca  mi  señor  el  rey  lo  que  le  parez-

ca bien. ¡He aquí los bueyes para el ho-

locausto,  y  los  trillos  y  los  yugos  de  los 

bueyes° para leña!

23

 ¡Todo, oh rey, lo da Arauna al rey! Tam-

bién dijo Arauna al rey: ¡YHVH tu Dios te 

sea propicio!

24

 Pero el rey dijo a Arauna: No, sino que 

ciertamente  por  precio  te  lo  compraré, 

pues no elevaré holocaustos a YHVH mi 

Dios que no me cuesten nada. Así David 

compró la era y los bueyes por cincuenta 

siclos de plata.

25

 Entonces David edificó allí un altar a 

YHVH,  y  elevó  holocaustos  y  sacrificios 

de paz. Y YHVH se aplacó con la tierra, y 

cesó la plaga en Israel.


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1

El rey David era ya anciano, avanzado 

en días, y lo cubrían con vestidos, pero 

no entraba en calor.

2

 Por lo cual le dijeron sus siervos: Que 

busquen para mi señor el rey una joven 

virgen, y que ella esté delante del rey y sea 

una compañera para él, y que se recueste 

en tu seno, para que mi señor el rey pue-

da entrar en calor.

3

 Buscaron pues una joven hermosa por 

todos los confines de Israel, y hallaron a 

Abisag sunamita, y la llevaron al rey.

4

 Y la joven era muy hermosa, y se hizo 

compañera del rey y lo cuidaba, aunque 

el rey no la conoció.°

5

 Entonces  Adonías,  hijo  de  Haguit,  se 

enalteció y dijo: ¡Yo reinaré! Y se preparó 

carros y jinetes, y cincuenta hombres que 

corrían delante de él.°

6

 Y  su  padre  nunca  lo  había  amonesta-

do,  diciéndole:  ¿Por  qué  actúas  así?  Era 

además un hombre muy gallardo, y había 

nacido después de Absalón.

7

 Y  había  consultado  con  Joab,  hijo  de 

Sarvia, y con el sacerdote Abiatar, y ellos, 

siguiendo a Adonías, lo ayudaron.

8

 Pero el sacerdote Sadoc, y Benaías ben 

Joiada, y el profeta Natán, y Simei, y Rei, y 

los valientes que pertenecían a David, no 

estaban con Adonías.

9

 Y  Adonías  sacrificó  ovejas  y  novillos,  y 

animales cebados junto a la piedra de Zo-

helet, que está cerca de En-Roguel, y llamó 

a todos sus hermanos, los hijos del rey, y a 

todos los hombres de Judá, siervos del rey,

10

 pero  no  llamó  al  profeta  Natán,  ni  a 

Benaías, ni a los valientes, ni a su herma-

no Salomón.

11

 Entonces Natán habló a Betsabé, ma-

dre  de  Salomón,  diciendo:  ¿No  has  oído 

que Adonías, el hijo de Haguit, está rei-

nando, y David nuestro señor no lo sabe?

12

 Ahora  pues,  ven,  te  daré  un  consejo 

para que salves tu vida y la vida de tu hijo 

Salomón:

13

 Ve y preséntate ante el rey David y dile: 

¿No has jurado a tu sierva, oh rey señor 

mío,  diciendo:  Tu  hijo  Salomón  reinará 

después de mí, y se sentará en mi trono? 

¿Por qué entonces reina Adonías?

14

 He aquí mientras tú aún estés allí ha-

blando con el rey, yo entraré detrás de ti y 

confirmaré tus palabras.

15

 Entonces  Betsabé  entró  a  la  cámara 

del rey, quien a la sazón era muy anciano, 

y Abisag sunamita cuidaba al rey.

16

 Y Betsabé se inclinó y se postró ante el 

rey, y el rey dijo: ¿Qué deseas?

17

 Y ella le respondió: Señor mío, tú has 

jurado a tu sierva por YHVH tu Dios: Tu 

hijo Salomón reinará después de mí, y él 

se sentará en mi trono.

18

 Pero ahora, he aquí que reina Adonías; 

y tú, mi señor el rey, no lo sabes.

19

 Y  él  ha  sacrificado  bueyes  y  anima-

les  cebados  y  ovejas  en  abundancia,  y 

ha llamado a todos los hijos del rey, y al 

sacerdote  Abiatar  y  a  Joab,  general  del 

ejército, pero a Salomón tu siervo él no 

lo llamó.

20

 Y sobre ti, oh rey señor mío, están los 

ojos de todo Israel para que les declares 

quién se ha de sentar en el trono de mi 

señor el rey, después de él.

21

 De otra manera, acontecerá que cuan-

do mi señor el rey repose con sus padres, 

mi  hijo  Salomón  y  yo  seremos  tenidos 

como usurpadores.

Rebelión de Adonías 

Salomón rey

1.4 Es decir, maritalmente.  1.5 

→2 S.15.1 nota.


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1 Reyes 1:22

350

22

 Y he aquí, mientras ella todavía habla-

ba con el rey, llegó el profeta Natán.

23

 E informaron al rey diciendo: He aquí 

el profeta Natán. Y él entró a la presencia 

del rey y se postró en tierra sobre su ros-

tro ante el rey.

24

 Y dijo Natán: Mi señor el rey, ¿has dicho 

acaso: Adonías reinará después de mí, y él 

se sentará en mi trono?

25

 Porque  él  hoy  ha  bajado  y  sacrificado 

bueyes y animales cebados y ovejas en abun-

dancia, y ha invitado a todos los hijos del rey, 

y a los capitanes del ejército y al sacerdote 

Abiatar; y he aquí que comen y beben a su 

salud, y han dicho: ¡Viva el rey Adonías!

26

 Pero  no  me  ha  llamado  a  mí,  tu  sier-

vo; ni al sacerdote Sadoc, ni a Benaías ben 

Joiada, ni a tu siervo Salomón.

27

 ¿Ha sido hecho esto por mi señor el rey, 

sin informar a tus siervos quién había de 

sentarse en el trono de mi señor el rey des-

pués de él?

28

 Entonces el rey David respondió dicien-

do: Llamadme a Betsabé; y ella entró a la 

presencia del rey y estuvo de pie ante el rey.

29

 Y el rey juró y dijo: ¡Vive YHVH, que 

rescató mi alma de toda angustia,

30

 que así como te he jurado por YHVH, 

el  Dios  de  Israel,  diciendo:  Ciertamente 

tu hijo Salomón reinará después de mí, y 

él se sentará en mi trono en mi lugar, así 

lo haré hoy mismo!

31

 Y Betsabé se inclinó con el rostro a tie-

rra y se postró ante el rey, y dijo: ¡Viva mi 

señor el rey David para siempre!

32

 Y el rey David dijo: ¡Llamadme al sa-

cerdote  Sadoc,  al  profeta  Natán  y  a  Be-

naías  ben  Joiada!  Y  ellos  entraron  a  la 

presencia del rey.

33

 Y el rey les dijo: Tomad con vosotros a 

los siervos de vuestro señor, y haced que 

mi hijo Salomón monte sobre mi propia 

mula, y hacedle bajar a Guijón.

34

 Y el sacerdote Sadoc y el profeta Natán 

lo ungirán° allí por rey sobre Israel, y da-

réis soplido al shofar, y gritaréis: ¡Viva el 

rey Salomón!

35

 Enseguida subiréis tras él, y él vendrá 

y se sentará en mi trono, y reinará en mi 

lugar, pues lo he designado soberano so-

bre Israel y sobre Judá.

36

 Y Benaías ben Joiada respondió al rey 

diciendo: ¡Amén! ¡Así lo confirme YHVH, 

Dios de mi señor el rey!

37

 Así como ha estado YHVH con mi se-

ñor el rey, así esté Él con Salomón, y en-

grandezca su trono más que el trono de 

mi señor el rey David.

38

 Y el sacerdote Sadoc, y el profeta Na-

tán, y Benaías ben Joiada, junto con los 

cereteos y los peleteos, bajaron e hicieron 

montar a Salomón sobre la mula del rey 

David y lo condujeron a Guijón.

39

 Entonces  el  sacerdote  Sadoc  tomó  el 

cuerno de aceite del Tabernáculo y ungió a 

Salomón, y dieron soplido al shofar, y todo 

el pueblo exclamó: ¡Viva el rey Salomón!

40

 Y todo el pueblo subió tras él, y el pue-

blo tocaba flautas y se regocijaba con tal 

regocijo, que parecía que la tierra se hun-

día con el clamor de ellos.

41

 Y  Adonías  y  todos  los  huéspedes  que 

estaban con él oyeron eso cuando termi-

naron de comer. Y cuando Joab oyó el so-

nido del shofar, dijo: ¿Por qué hay tanto 

bullicio y tanto alboroto en la ciudad?

42

 Mientras él aún hablaba, he aquí llegó 

Jonatán,  el  hijo  del  sacerdote  Abiatar,  y 

Adonías le dijo: Entra, porque eres hom-

bre digno y traes buenas noticias.

43

 Pero Jonatán respondió y dijo a Ado-

nías:  Al  contrario,  nuestro  señor  el  rey 

David ha hecho rey a Salomón.

44

 Y el rey ha enviado con él al sacerdo-

te Sadoc, al profeta Natán, a Benaías ben 

Joiada, y a los cereteos y a los peleteos, y lo 

han hecho cabalgar sobre la mula del rey.

45

 Y el sacerdote Sadoc y el profeta Natán 

lo han ungido por rey en Guijón, y han 

subido  desde  allí  con  gran  regocijo,  de 

modo que la ciudad está alborotada; ese 

es el bullicio que habéis oído.

46

 Además, Salomón se ha sentado en el 

trono del reino,

47

 y también los siervos del rey han llega-

do a bendecir a nuestro señor, el rey David, 

diciendo: ¡Tu Dios haga el nombre de Salo-

món más ilustre que tu nombre, y engran-

dezca su trono más que el tuyo! Y el mismo 

rey ha hecho reverencia sobre su lecho.

48

 Y el rey también ha dicho así: ¡Bendito 

sea YHVH, Dios de Israel, que ha hecho 

1.34 Lit. ungirá..


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1 Reyes 2:19

351

que  alguien  se  sentara  en  mi  trono  en 

este día, y que mis ojos lo hayan visto!

49

 Entonces todos los huéspedes de Ado-

nías se estremecieron, y se levantaron, y 

cada uno se fue por su camino.

50

 Pero Adonías, tuvo temor de Salomón, 

y se levantó y fue a asirse de los cuernos 

del altar.

51

 E  informaron  a  Salomón  diciendo: 

He  aquí  que  Adonías  teme  al  rey  Salo-

món, porque se ha asido de los cuernos 

del  altar,  diciendo:  ¡Júreme  hoy  el  rey 

Salomón que no matará a su siervo con 

la espada!

52

 Y Salomón dijo: Si él se llega a mostrar 

como  un  hombre  digno,  ni  uno  de  sus 

cabellos  caerá  en  tierra,  pero  si  se  halla 

maldad en él, entonces morirá.

53

 El rey Salomón ordenó que lo hicieran 

bajar  del  altar,  y  él  vino  y  se  postró  de-

lante del rey Salomón; y Salomón le dijo: 

Vete a tu casa.

Muerte de David 

Salomón afirma su reino

2

Cuando  se  acercaban  los  días  de  la 

muerte  de  David,  mandó  a  su  hijo 

Salomón diciendo:

2

 Yo sigo el camino de todos en la tierra. 

Tú, ¡sé fuerte y sé hombre!

3

 Guardarás  la  obediencia  a  YHVH  tu 

Dios, para andar en sus caminos, y guar-

dar sus estatutos, y sus mandamientos, y 

sus decretos y sus testimonios, como está 

escrito en la Ley de Moisés, a fin de que 

procedas sabiamente en todo lo que hagas 

y a todo lo que te inclines;

4

 a  fin  de  que  YHVH  cumpla  su  palabra 

que habló acerca de mí, diciendo: Si tus 

hijos  guardan  sus  caminos  andando  de-

lante  de  mí  con  fidelidad,  con  todo  su 

corazón y con toda su alma, jamás te fal-

tará° varón sobre el trono de Israel.

5

 Ahora,  tú  sabes  lo  que  me  hizo  Joab 

hijo de Sarvia; lo que hizo a dos genera-

les de los ejércitos de Israel: a Abner ben 

Ner y a Amasa ben Jeter, a quienes mató 

derramando sangre de guerra en tiempo 

de paz, y poniendo sangre de guerra en el 

cinturón  que  llevaba  sobre  sus  lomos,  y 

en el calzado que tenía en sus pies.

6

 Haz  conforme  a  tu  sabiduría,  pero  no 

permitas  que  sus  canas  desciendan  en 

paz al Seol.

7

 Pero mostrarás benevolencia a los hijos 

de Barzilai galadita, y permite que estén 

entre los que comen a tu mesa, porque se 

pusieron  a  mi  lado  cuando  iba  huyendo 

de la faz de Absalón tu hermano.

8

 He  aquí,  tienes  contigo  a  Simei  ben 

Gera, benjamita, hijo de Bahurim, quien 

me  maldijo  con  una  cruel  maldición  el 

día que yo iba a Mahanaim. Pero él bajó 

a recibirme al Jordán, por lo que le juré 

por YHVH diciendo: No te haré morir con 

la espada.

9

 Pero ahora, no lo absolverás, pues eres 

hombre sabio, y sabes cómo debes hablar 

con él, y harás descender sus canas con 

sangre al Seol.

10

 Y David durmió con sus padres, y fue 

sepultado en la ciudad de David.

11

 Los días que David reinó sobre Israel 

fueron  cuarenta  años:  siete  años°  reinó 

en Hebrón, y treinta y tres años reinó en 

Jerusalem.

12

 Y Salomón se sentó en el trono de su 

padre  David,  y  su  reino  fue  firmemente 

establecido.

13

 Pero Adonías, el hijo de Haguit, fue a 

Betsabé, madre de Salomón, y ella le pre-

guntó: ¿Es pacífica tu visita? Y él respon-

dió: Es pacífica.

14

 Y agregó: Tengo algo que decirte. Ella 

respondió: Habla.

15

 Y él dijo: Tú sabes que el reino era mío 

y que todo Israel había puesto la mirada 

en  mí  para  que  yo  reinara;  pero  el  rei-

no cambió de manos y pasó a ser de mi 

hermano,  porque  por  determinación  de 

YHVH era suyo.

16

 Y ahora te hago una petición que rué-

gote no me la niegues.° Ella le dijo: Ha-

bla.

17

 Entonces él dijo: Te ruego que hables 

al rey Salomón, pues él no te lo negará, 

para que me dé por mujer a Abisag suna-

mita.

18

 Y Betsabé respondió: Bien, yo hablaré 

al rey por ti.

19

 Y Betsabé fue al rey Salomón para ha-

blarle por Adonías. El rey se levantó para 

2.4 Lit. no te será cortado.  2.11 Una parte del tiempo se pone por todo ese tiempo

→2 S.2.11.  2.16 Lit. no rechaces mi rostro


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1 Reyes 2:20

352

recibirla  y  le  hizo  reverencia;  luego  se 

sentó en su trono e hizo poner una silla 

para la madre del rey, quien se sentó a su 

diestra.

20

 Entonces ella dijo: Te haré una peque-

ña petición; no me la niegues.° Y el rey 

le dijo: Pide, madre mía, porque no te la 

negaré.°

21

 Ella dijo: Que Abisag la sunamita sea 

dada por mujer a tu hermano Adonías.

22

 Pero el rey Salomón respondió y dijo 

a  su  madre:  ¿Por  qué  pides  a  Abisag  la 

sunamita para Adonías? ¡Pide también el 

reino para él, porque es mi hermano ma-

yor, y con él están el sacerdote Abiatar y 

Joab hijo de Sarvia!

23

 Y  el  rey  Salomón  juró  por  YHVH  di-

ciendo:  ¡Así  me  haga  ’Elohim  y  aun  me 

añada,  si  Adonías  no  habló  este  asunto 

contra su propia vida!

24

 Y, ¡vive YHVH, que me ha confirmado 

y me ha puesto en el trono de David mi 

padre,  y  me  ha  hecho  casa  como  había 

prometido,  que  Adonías  será  muerto  en 

este día!

25

 Y  el  rey  Salomón  envió  por  mano  de 

Benaías ben Joiada, quien arremetió con-

tra él y lo mató.

26

 Pero  al  sacerdote  Abiatar  dijo  el  rey: 

Aunque eres digno de muerte,° retírate a 

tus campos en Anatot, no te mataré hoy, 

porque  has  cargado  el  Arca  de  Adonay 

YHVH  delante  de  mi  padre  David,  y  has 

participado en todo aquello que mi padre 

sufrió.

27

 Así Salomón excluyó a Abiatar del sa-

cerdocio  de  YHVH,  para  que  la  palabra 

de YHVH fuera cumplida, la cual Él dijo 

acerca de la casa de Elí en Silo.°

28

 Esta noticia llegó hasta Joab, y como 

Joab  también  se  había  adherido  a  Ado-

nías, aunque no había seguido a Absalón, 

Joab huyó al Tabernáculo de YHVH y se 

asió de los cuernos del altar.

29

 Y se dio aviso al rey Salomón: Joab ha 

huido al Tabernáculo de YHVH y he aquí 

está junto al altar. Entonces Salomón en-

vió a Benaías ben Joiada, diciendo: ¡Anda, 

arremete contra él!

30

 Y Benaías entró en el Tabernáculo de 

YHVH, y le dijo: Así dice el rey: ¡Sal! El 

respondió: ¡No, sino que aquí moriré! Be-

naías  llevó  la  respuesta  al  rey  diciendo: 

Así habló Joab, y así me respondió.

31

 Y el rey le dijo: Haz como él ha dicho: 

¡Arremete contra él y sepúltalo! Así quita-

rás de mí y de la casa de mi padre la sangre 

que Joab ha derramado injustamente.

32

 Y  YHVH  hará  recaer  su  sangre  sobre 

su propia cabeza, porque sin que lo supie-

ra mi padre David, arremetió y mató a es-

pada a dos hombres más justos y mejores 

que él: a Abner ben Ner, general del ejér-

cito de Israel, y a Amasa ben Jeter, general 

del ejército de Judá.

33

 De tal modo, la sangre de ellos se vol-

verá contra la cabeza de Joab y contra la 

cabeza de su simiente para siempre, pero 

para David y para su simiente, y para su 

casa, y para su trono, habrá paz de parte 

de YHVH por siempre.

34

 Y Benaías ben Joiada subió y arremetió 

contra él y lo mató, y fue sepultado en su 

propia casa, en el desierto.

35

 Y en lugar suyo, el rey puso al mando 

del ejército a Benaías ben Joiada, y el sa-

cerdote Sadoc fue designado por el rey en 

reemplazo de Abiatar.

36

 Luego el rey hizo llamar a Simei, y le 

dijo:  Edifícate  una  casa  en  Jerusalem  y 

habita allí, y no salgas de allí a ninguna 

parte,

37

 porque  el  día  que  salgas  y  cruces  el 

arroyo de Cedrón, ten por sabido que mo-

rirás  irremisiblemente,  y  tu  sangre  será 

sobre tu propia cabeza.

38

 Y Simei respondió al rey: Buena es la 

palabra. Como mi señor el rey ha dicho, 

así hará tu siervo. Y Simei habitó en Jeru-

salem muchos días.

39

 Pero  al  cabo  de  tres  años,  aconteció 

que dos siervos de Simei escaparon a Gat, 

al rey Aquís, hijo de Maca; e informaron 

a Simei, diciendo: He aquí, tus siervos es-

tán en Gat.

40

 Y Simei se levantó, enalbardó su asno 

y fue a Gat, ante Aquís, para buscar a sus 

siervos. Fue pues Simei e hizo traer a sus 

siervos de Gat.

41

 Y se le informó a Salomón que Simei 

había ido de Jerusalem a Gat y que había 

regresado.

2.20 Lit. no rechaces mi rostro.  2.20 Lit. no volveré tu rostro.  2.26 Lit. eres hombre de muerte.  2.27 

→1 S.2.30-36.


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1 Reyes 3:18

353

42

 El rey envió a llamar a Simei, y le dijo: 

¿Acaso no te hice jurar por YHVH, y testi-

fiqué contra ti, diciendo: El día que salgas 

y vayas a cualquier parte, ten por sabido 

que  morirás  irremisiblemente;  y  tú  me 

respondiste:  La  palabra  que  he  oído  es 

buena?

43

 ¿Por qué entonces no guardaste el ju-

ramento  de  YHVH,  y  el  mandato  que  te 

di?

44

 El rey dijo además a Simei: Tú sabes 

toda la maldad que cometiste contra mi 

padre  David,  y  tu  mismo  corazón  lo  re-

conoce. YHVH, pues, ha vuelto tu maldad 

sobre tu cabeza,

45

 pero  el  rey  Salomón  será  bendecido, 

y el trono de David será firme delante de 

YHVH para siempre.

46

 Y el rey ordenó a Benaías ben Joiada, 

quien salió y arremetió contra Simei y lo 

mató. Así fue consolidado el reino en ma-

nos de Salomón.

Sabiduría de Salomón

3

Salomón  emparentó  con  Faraón,  rey 

de Egipto, al tomar por mujer a la hija 

de Faraón, y la trajo a la ciudad de David 

hasta  que  terminó  de  edificar  su  propia 

casa, y la Casa de YHVH, y el muro alre-

dedor de Jerusalem.

2

 Sólo  que  el  pueblo  ofrecía  sacrificios 

en  los  lugares  altos,  porque  en  aquellos 

tiempos aún no había sido edificada Casa 

al nombre de YHVH.

3

 Y  Salomón  amaba  a  YHVH  y  andaba 

en  los  caminos  de  su  padre  David,  pero 

brindaba sus sacrificios y ofrendas en los 

lugares altos.

4

 Y  el  rey  iba  a  Gabaón  para  ofrecer  allí 

sacrificios, por ser el lugar alto más im-

portante. Salomón llegó a ofrecer mil ho-

locaustos sobre aquel altar.

5

 Y en Gabaón se apareció YHVH a Salo-

món  en  el  sueño  de  la  noche.  Y  le  dijo 

’Elohim:  Pide  lo  que  quieras  que  Yo  te 

dé.

6

 Y Salomón respondió: Tú has mostrado 

gran  misericordia  a  tu  siervo  David,  mi 

padre, porque él anduvo delante de ti con 

fidelidad, con justicia y con rectitud de co-

razón para contigo. Tú le has conservado 

esta gran misericordia, y le has dado un 

hijo que se siente en su trono, como en 

este día.

7

 Y  ahora,  oh  YHVH,  Dios  mío,  Tú  has 

constituido a tu siervo rey en lugar de mi 

padre David, aunque soy un joven peque-

ño, y no sé cómo salir ni cómo entrar.

8

 Y tu siervo está en medio de tu pueblo, 

al cual escogiste; un pueblo tan numero-

so que por su multitud no se puede con-

tar ni se puede numerar.

9

 Da pues a tu siervo un corazón que sepa 

escuchar, para juzgar a tu pueblo, y para 

discernir entre lo bueno y lo malo; por-

que,  ¿quién  será  capaz  de  juzgar  a  este 

pueblo tuyo tan grande?

10

 Y  esta  petición  agradó  a  Adonay,  por 

haber pedido Salomón semejante cosa.

11

 Y  ’Elohim  le  dijo:  Porque  has  pedido 

esto,  y  no  has  pedido  para  ti  una  larga 

vida, ni has pedido para ti riquezas, ni has 

pedido la vida de tus enemigos, sino que 

has  pedido  para  ti  inteligencia  para  dis-

cernir justicia;

12

 he aquí cumplo tu ruego y te doy un 

corazón sabio y entendido, tal que no ha 

habido otro antes de ti, ni lo habrá des-

pués de ti.°

13

 Y  también  te  concedo  lo  que  no  has 

pedido,  así  riquezas  como  honores,  de 

modo que no habrá entre los reyes hom-

bre como tú en todos tus días.

14

 Y si andas en mis caminos para cum-

plir  mis  estatutos  y  mis  mandamientos, 

como anduvo David tu padre, te prolon-

garé tus días.

15

 Y Salomón despertó, y he aquí era un 

sueño.  Volviendo  entonces  a  Jerusalem, 

se detuvo ante el Arca del Pacto de Ado-

nay, e hizo subir holocaustos y brindó sa-

crificios de paz, e hizo un banquete para 

todos sus siervos.

16

 Dos  mujeres  prostitutas  vinieron  al 

rey y se pusieron de pie delante de él.

17

 Y  dijo  una  de  las  mujeres:  ¡Ay,  señor 

mío!  Esta  mujer  y  yo  habitamos  en  la 

misma  casa;  y  di  a  luz  mientras  estaba 

con ella en la casa.

18

 Y sucedió que tres días después de mi 

parto, esta mujer también dio a luz. No-

sotras estábamos juntas y ningún extraño 

3.12 Esto es, entre los reyes

→v.13; 10.23.


background image

1 Reyes 3:19

354

estaba con nosotras en la casa; sólo noso-

tras dos estábamos en la casa.

19

 Y el hijo de esta mujer murió durante 

la noche, porque ella se durmió sobre él.

20

 Y levantándose a medianoche, tomó a 

mi hijo de junto a mí, pues tu servidora 

estaba dormida, y lo hizo recostar en su 

regazo, en tanto que a su hijo muerto lo 

recostó en mi seno.

21

 Cuando me levanté por la mañana para 

amamantar a mi hijo, ¡he aquí estaba muer-

to! Pero por la mañana lo observé bien, ¡y he 

aquí no era mi hijo, el que yo había parido!

22

 Pero  la  otra  mujer  replicó:  ¡No!  Sino 

que mi hijo es el vivo y tu hijo el muerto. 

Y la otra volvió a decir: ¡No! ¡Tu hijo es 

el muerto y mi hijo el vivo! Y disputaban 

muchísimo° delante del rey.

23

 Entonces dijo el rey: Esta dice: Mi hijo 

es  el  que  vive,  y  tu  hijo  es  el  muerto;  y 

la  otra  dice:  ¡No!  Sino  que  tu  hijo  es  el 

muerto, y mi hijo el vivo.

24

 Y  el  rey  dijo:  ¡Traedme  una  espada! 

Cuando trajeron la espada ante el rey,

25

 dispuso el rey: ¡Partid al niño vivo en 

dos, y dad la mitad a la una y la otra mitad 

a la otra!

26

 Pero entonces, la mujer de quien era el 

hijo vivo habló al rey (porque sus entrañas 

se conmovieron por su hijo), y exclamó: 

¡Ay,  señor  mío!  Dad  a  ésta  el  niño  vivo; 

pero no lo hagas morir. Pero la otra dijo: 

No sea ni para mí ni para ti. ¡Partidlo!

27

 Entonces  el  rey,  tomando  la  palabra, 

dijo: ¡Dadle a aquélla el niño vivo y no lo 

matéis! Ella es su madre.

28

 Y todo Israel se enteró de la sentencia 

que había dado el rey, y tuvieron temor al 

rey, porque vieron que la sabiduría de Dios 

estaba en su corazón para hacer justicia.

Administración del reino

4

El rey Salomón fue rey sobre todo Is-

rael.

2

 Y  éstos  eran  los  príncipes  que  tenía: 

Azarías, hijo del sacerdote Sadoc;

3

 Elihoref y Ahías, hijos de Sisa, eran los es-

cribas; Josafat ben Ahilud era el cronista;

4

 Benaías ben Joiada, estaba a cargo del ejér-

cito, y Sadoc y Abiatar, eran los sacerdotes.

5

 Azarías ben Natán, estaba sobre los in-

tendentes  reales;  Zabud  ben  Natán,  era 

ministro principal y consejero del rey.

6

 Ahisar estaba a cargo de la casa real, y Ado-

niram ben Abda, a cargo de los tributos.

7

 Salomón  tenía  doce  gobernadores  en 

todo  Israel,  que  abastecían  al  rey  y  a  su 

casa. Cada uno de ellos estaba obligado a 

abastecerlo durante un mes al año.

8

 Y estos eran sus nombres: Ben-Hur, en 

la serranía de Efraín;

9

 Ben-Decar,  en  Macaz,  en  Saalbim,  en 

Bet-semes, y en Elon-bet-janán;

10

 Ben-Jésed, en Arubot; éste también lo 

era en Soco y en toda la tierra de Hefer;

11

 Ben-Abinadab,  en  toda  la  región  de 

Dor (éste tenía por mujer a Tafat, hija de 

Salomón);

12

 Baaná ben Ahilud, en Taanac y Megui-

do, y en todo Bet-seán, que está junto a 

Zaretán,  más  abajo  de  Jezreel;  y  desde 

Bet-seán  hasta  Abel-mehola  y  hasta  la 

otra parte de Jocmeam;

13

 Ben-Geber,  en  Ramot  de  Galaad;  éste 

también  lo  era  en  las  aldeas  de  Jaír-Ma-

nasés,  que  estaban  en  Galaad,  y  tenía 

también  la  región  de  Argob,  que  está 

en  Basán,  con  sesenta  grandes  ciudades 

amuralladas y con barra de bronce;

14

 Ahinadab ben Ido, en Mahanaim;

15

 Ahimaas,  en  Neftalí  (quien  tomó  por 

mujer  a  Basemat,  también  hija  de  Salo-

món);

16

 Baaná ben Husai, en Aser y en Alot;

17

 Josafat ben Parúa, en Isacar;

18

 Simei ben Ela, en Benjamín;

19

 y Geber ben Uri, quien era el único go-

bernador en la tierra de Galaad, país de Se-

hón rey del amorreo, y de Og rey de Basán.

20

 Judá e Israel eran tan numerosos como 

la arena que está junto al mar en multi-

tud; y comían, bebían y se regocijaban.

21

 °Y Salomón gobernaba sobre todos los 

reinos, desde el Río° hasta la tierra de los 

filisteos  y  el  límite  con  Egipto.  Y  traían 

tributo, y sirvieron a Salomón todos los 

días de su vida.

22

 Las  provisiones  diarias  de  Salomón 

eran: treinta coros° de flor de harina, se-

senta coros° de harina corriente,

3.22  .muchísimo.  4.21 Aquí  comienza  el  c.5  en  ediciones  hebreas.  4.21  Es  decir,  el  Éufrates.  4.22 Aprox.  6.600  litros. 

4.22 Aprox. 13.200 litros.


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1 Reyes 5:12

355

23

 diez vacunos de engorde, veinte vacu-

nos de pasto, y cien ovejas, sin contar los 

venados, las gacelas, los corzos y las aves 

cebadas.

24

 Porque él señoreaba en toda la región 

al  otro  lado  del  río,  desde  Tifsaj  hasta 

Gaza,  sobre  todos  los  reyes  al  otro  lado 

del río, y tuvo paz por todos lados en de-

rredor suyo.

25

 Así, Judá e Israel habitaron con seguri-

dad todos los días de Salomón, cada cual 

debajo  de  su  vid  y  de  su  higuera,  desde 

Dan hasta Beerseba.

26

 Y tenía Salomón en sus establos cua-

renta mil caballos para sus carros, y doce 

mil jinetes.

27

 Y los gobernadores, cada uno un mes, 

proveían al rey Salomón y a todo el que se 

acercaba a la mesa del rey Salomón, ha-

ciendo que nada faltara.

28

 Hacían  llevar  también  cebada  y  paja 

para  los  caballos  y  para  las  bestias  de 

carga, al lugar donde él estaba, cada uno 

conforme a su cuota.

29

 Y  ’Elohim  dio  a  Salomón  sabiduría, 

gran entendimiento y amplitud de cora-

zón, como la arena que está a la orilla del 

mar.

30

 La sabiduría de Salomón sobrepasó la 

sabiduría de todos los orientales y toda la 

sabiduría de los egipcios.

31

 Él fue el más sabio de todos los hom-

bres: más que Eitán ezraíta y que Hemán, 

Calcol y Darda, hijos de Mahol; y su nom-

bre llegó a ser conocido en todas la nacio-

nes de alrededor.

32

 Compuso  tres  mil  proverbios  y  mil 

cinco cantares.

33

 Disertó acerca de los árboles, desde el 

cedro del Líbano hasta el hisopo que cre-

ce en la pared. Asimismo, habló acerca de 

los cuadrúpedos, de las aves, de los repti-

les y de los peces.

34

 De  todos  los  pueblos  venían  para  es-

cuchar la sabiduría de Salomón, de parte 

de todos los reyes de la tierra que habían 

oído de su sabiduría.

Preparativos para la edificación de la Casa

5

°Hiram,  rey  de  Tiro,  también  envió 

sus  embajadores  a  Salomón,  luego 

que oyó que lo habían ungido rey en lu-

gar de su padre, pues Hiram siempre ha-

bía apreciado a David.

2

 Y Salomón envió a decir a Hiram:

3

 Tú sabes que debido a las guerras que lo 

rodearon, mi padre David no pudo edifi-

car una Casa al nombre de YHVH su Dios, 

hasta  que  YHVH  puso  a  sus  enemigos 

bajo las plantas de sus pies.

4

 Pero ahora, YHVH mi Dios me ha dado 

paz por todas partes; no hay adversario ni 

calamidad.

5

 Y he aquí, me propongo construir una Casa 

para  el  nombre  de  YHVH  mi  Dios,  como 

YHVH habló a mi padre David diciendo: Tu 

hijo, al que pondré en tu trono en tu lugar, 

él edificará una Casa para mi Nombre.

6

 Te ruego pues, ordena que talen cedros 

del Líbano para mí, y mis siervos estarán 

con tus siervos, y pagaré por tus siervos 

conforme me digas, porque tú sabes que 

no  hay  ninguno  entre  nosotros  que  co-

nozca  acerca  de  la  tala  de  árboles  como 

los sidonios.

7

 Y  cuando  Hiram  oyó  las  palabras  de 

Salomón, se alegró mucho, y dijo: ¡Ben-

dito sea YHVH el día de hoy, que ha dado 

a David un hijo sabio sobre ese pueblo tan 

numeroso!

8

 Envió pues Hiram respuesta a Salomón, 

diciendo: He escuchado lo que me man-

daste decir. Cumpliré tu deseo en lo que 

concierne  a  los  árboles  de  cedro  y  a  los 

árboles de ciprés.

9

 Mis  siervos  los  bajarán  del  Líbano  al 

mar, y yo los haré llegar en balsas por el 

mar hasta el lugar que tú me indiques, y 

los haré desatar allí, y tú los recibirás. Y 

tú cumplirás mi deseo dando alimento a 

mi casa.

10

 Y así Hiram dio a Salomón toda la ma-

dera de cedro y de ciprés, de conformidad 

con todo su deseo.

11

 Y para el sustento de su casa, Salomón 

dio a Hiram veinte mil coros de trigo° y 

veinte mil batos° de aceite puro; esto daba 

Salomón a Hiram año tras año.

12

 Y YHVH dio a Salomón sabiduría, tal 

como le había prometido, y hubo paz en-

tre Hiram y Salomón, y ambos concerta-

ron alianza.

5.1 5.15 en el texto hebreo.  5.11 Aprox. 4.400.000 litros.  5.11 Aprox. 440.000 litros. 


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1 Reyes 5:13

356

13

 Y el rey Salomón decretó la recluta en 

todo  Israel,  y  fueron  reclutados  treinta 

mil hombres.

14

 Y los envió al Líbano, diez mil por mes, 

por turno, para que pasaran un mes en el 

Líbano, y dos meses en sus casas; y Adoni-

ram estaba a cargo del reclutamiento.

15

 Salomón  tenía  además  setenta  mil 

cargadores y ochenta mil canteros en la 

región montañosa,

16

 sin  contar  los  capataces  que  Salomón 

había establecido al frente de la obra, en 

número de tres mil trescientos, los cuales 

mandaban a la gente que hacía el trabajo.

17

 El  rey  mandó  que  extrajeran  piedras 

grandes, piedras costosas, para echar los 

cimientos de la Casa con piedras talladas.

18

 Y los constructores de Salomón, los de 

Hiram y los de Biblos, prepararon la ma-

dera y tallaron las piedras para construir 

la Casa.

Construcción de la Casa

6

En  el  año  cuatrocientos  ochenta  des-

pués de la salida de los hijos de Israel de 

la tierra de Egipto, en el cuarto año del rei-

nado de Salomón sobre Israel, en el mes de 

Ziv, que es el mes segundo,° aconteció que 

él comenzó a edificar la Casa de YHVH.

2

 La Casa que el rey Salomón edificó para 

YHVH tenía sesenta codos de largo, vein-

te codos de ancho y treinta codos de alto.

3

 El pórtico delante del lugar santo de la 

Casa tenía veinte codos de largo a todo lo 

ancho de la Casa, y diez codos de ancho 

en el frente de la Casa.

4

 Hizo  a  la  Casa  ventanas:  anchas  por 

dentro y estrechas por fuera.

5

 Y contra el muro de la Casa construyó 

galerías  alrededor  del  muro  de  la  Casa, 

tanto del lugar santo como del lugar san-

tísimo,  y  les  hizo  cámaras  laterales  en 

derredor.

6

 La galería inferior tenía cinco codos de an-

cho, la intermedia seis codos de ancho, y la 

tercera siete codos de ancho, porque había 

hecho reducciones en el lado exterior, alre-

dedor de la Casa, para no empotrar las vigas 

de las galerías en los muros de la Casa.

7

 En su construcción, la Casa fue edificada

con  piedras  labradas  en  las  cantería,  de 

manera  que  ni  martillos,  ni  hachas,  ni 

ningún instrumento de hierro se dejó oír 

en la Casa mientras la construían.

8

 La entrada a la galería intermedia estaba 

al lado derecho de la Casa, y se subía a la 

galería intermedia, y de ésta a la superior, 

mediante una escalera de caracol.

9

 Construyó, pues, la Casa y la terminó; y 

cubrió la Casa con vigas y tablas de cedro.

10

 Construyó  también  las  galerías  alre-

dedor de toda la Casa, cada una de cinco 

codos de altura, las cuales se trababan a la 

Casa mediante vigas de cedro.

11

 Y  la  palabra  de  YHVH  fue  dirigida  a 

Salomón, diciendo:

12

 En cuanto a la Casa que tú estás edifi-

cando, si andas en mis estatutos, y pones 

por obra mis juicios, y guardas todos mis 

mandamientos  para  andar  en  ellos,  Yo 

cumpliré contigo mi palabra que hablé a 

tu padre David:

13

 Tabernaculizaré° en medio de los hijos 

de  Israel,  y  no  abandonaré  a  mi  pueblo 

Israel.

14

 Y Salomón edificó la Casa y la terminó.

15

 Y revistió el lado interior de los muros 

de la Casa con tablas de cedro; los recubrió 

de madera por dentro, desde el suelo de la 

Casa hasta las paredes del artesonado, y cu-

brió el piso de la Casa con tablas de ciprés.

16

 Construyó los veinte codos en la par-

te trasera de la Casa con tablas de cedro, 

desde el piso hasta el techo; así le edificó 

el Santuario interior: el lugar santísimo.

17

 La Casa, es decir, la nave de adelante, 

tenía cuarenta codos.

18

 Por dentro, la Casa estaba revestida de 

cedro tallado en forma de calabazas y de 

flores  abiertas;  todo  era  cedro,  ninguna 

piedra se veía.

19

 Entonces  preparó  por  dentro  el  San-

tuario interior, al fondo de la Casa, para 

colocar allí el Arca del Pacto de YHVH.

20

 El Santuario interior tenía veinte co-

dos  de  largo,  veinte  codos  de  ancho  y 

veinte codos de alto; y lo recubrió de oro 

puro; y el altar lo recubrió de cedro.

21

 Después Salomón recubrió de oro puro 

el interior de la Casa, e hizo pasar cadenas 

6.1 Aprox. Abril-Mayo.  6.13 Es decir, habitaré en un tabernáculo. Aunque este verbo no existe en la lengua española, el texto 

hebreo utiliza aquí un verbo con la misma raíz que la palabra tabernáculo (Heb. mishcan

→ § 74.


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1 Reyes 7:9

357

de oro en la parte delantera del Santuario 

interior, y lo recubrió de oro.

22

 Revistió de oro toda la Casa, hasta que 

toda la Casa estuvo terminada; asimismo 

recubrió  de  oro  todo  el  altar  que  estaba 

delante del Santuario interior.

23

 Hizo también en el Santuario interior 

dos querubines de madera de olivo, cada 

uno de diez codos de alto.

24

 Un ala del querubín tenía cinco codos 

y  la  otra  ala  del  querubín  cinco  codos; 

desde el extremo de un ala hasta el extre-

mo de la otra había diez codos.

25

 De  la  misma  manera,  el  segundo 

querubín tenía diez codos; ambos queru-

bines tenían la misma medida y la misma 

forma.

26

 El primer querubín tenía diez codos de 

alto, e igualmente el segundo querubín.

27

 Y colocó los querubines en medio del 

Santuario interior. Las alas de los queru-

bines  se  extendían,  de  modo  que  el  ala 

de uno tocaba una pared y el ala del otro 

querubín tocaba la otra pared, y las otras 

dos alas que daban al centro del recinto se 

tocaban ala con ala.

28

 Luego recubrió de oro los querubines;

29

 y en todas las paredes alrededor de la 

Casa, en el interior y en el exterior, talló 

bajorrelieves de querubines, de palmeras 

y de flores abiertas.

30

 Y recubrió de oro el piso del Santuario, 

tanto el interior como el exterior.

31

 Para  la  entrada  del  lugar  santísimo 

hizo puertas de madera de olivo; los pos-

tes de la puerta eran pentagonales,

32

 y  las  dos  puertas  eran  de  madera  de 

olivo, en las cuales talló bajorrelieves de 

querubines, de palmeras y de flores abier-

tas, que recubrió de oro, e hizo laminar el 

oro sobre los querubines y las palmeras.

33

 También hizo así con la entrada del lu-

gar santo, donde colocó postes cuadran-

gulares de madera de olivo,

34

 y dos puertas de madera de ciprés; las 

dos hojas de una puerta eran giratorias, y 

las dos hojas de la otra puerta eran tam-

bién giratorias.

35

 Talló  asimismo  en  ellas  querubines, 

palmeras y flores abiertas, y las recubrió 

de oro ajustado a los grabados.

36

 Construyó el atrio interior con tres hi-

leras  de  piedras  talladas  y  una  hilera  de 

vigas de cedro.

37

 En  el  año  cuarto,  en  el  mes  de  Ziv,  se 

echaron los cimientos de la Casa de YHVH;

38

 y en el año undécimo, en el mes de Bul, 

que es el mes octavo,° la Casa fue termi-

nada con todos sus detalles y de confor-

midad con el diseño prefijado; de manera 

que la terminó de edificar en siete años.

Otras obras de Salomón 

Mobiliario de la Casa

7

Después  Salomón  edificó  su  propia 

casa en trece años, y terminó toda su 

casa.

2

 Edificó la casa del bosque del Líbano, la 

cual tenía cien codos de largo, cincuenta 

codos de ancho y treinta codos de alto, so-

bre cuatro hileras de columnas de cedro 

con vigas de cedro sobre las columnas.

3

 Estaba cubierta de cedro encima de las vi-

gas que se apoyaban sobre cuarenta y cinco 

columnas, quince columnas por hilera.

4

 Había tres hileras de ventanas, una ven-

tana frente a otra, en grupos de tres.

5

 Todas  las  puertas  y  ventanas  tenían 

marcos cuadrados, y una ventana estaba 

frente a otra ventana, en grupos de tres.

6

 También  hizo  el  pórtico  de  las  colum-

nas,  que  tenía  cincuenta  codos  de  largo 

por treinta codos de ancho; y frente a las 

columnas de este pórtico, había otro pór-

tico con columnas, que tenía una cubier-

ta delante.

7

 También  edificó  el  pórtico  del  trono 

donde había de juzgar (el pórtico del jui-

cio), y lo recubrió con cedro desde el sue-

lo hasta las vigas.

8

 En cuanto a la casa donde habitaba, ha-

bía otro atrio más adentro del pórtico, del 

mismo  tipo  de  construcción.  Salomón 

también edificó una casa parecida a este 

pórtico, para la hija del Faraón, que había 

tomado por mujer.

9

 Todas  estas  obras,  desde  los  cimientos 

hasta las cornisas, y afuera hasta el gran 

atrio,  eran  de  piedras  costosas,  bloques 

tallados  a  medida,  cortados  con  sierra, 

tanto por el lado interior como por el lado 

exterior.

6.38 Aprox. Octubre-Noviembre. 


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1 Reyes 7:10

358

10

 El cimiento era de piedras costosas y 

piedras grandes, piedras de diez codos y 

piedras de ocho codos.

11

 De allí hacia arriba, también eran pie-

dras costosas, bloques tallados a medida, 

y madera de cedro.

12

 Y  el  gran  atrio  tenía  en  derredor  un 

muro de tres hileras de bloques tallados 

y  una  hilera  de  vigas  de  cedro,  como  el 

atrio  interior  de  la  Casa  de  YHVH,  y  su 

pórtico.

13

 Y envió el rey Salomón e hizo traer a 

Hiram° desde Tiro.

14

 Este era hijo de una viuda de la tribu 

de Neftalí, cuyo padre era un hombre de 

Tiro, artesano en bronce; estaba lleno de 

sabiduría, inteligencia y pericia para ha-

cer cualquier obra en bronce; y él fue al 

rey Salomón e hizo toda su obra.

15

 Hizo el vaciado de las dos columnas de 

bronce: cada columna tenía dieciocho co-

dos de alto, y un cordel de doce codos medía 

la circunferencia de una y otra columna.

16

 Hizo  dos  capiteles  de  bronce  fundido 

para que fueran puestos en las cabezas de 

las columnas. Un capitel tenía cinco co-

dos de alto, y el otro capitel también tenía 

cinco codos de alto.

17

 Había redes de obra de malla y trenzas 

de obra de cadenilla para los capiteles que 

estaban  en  las  cabezas  de  las  columnas: 

siete para un capitel y siete para el otro 

capitel.

18

 Hizo también dos hileras de granadas 

alrededor de cada red, para cubrir los ca-

piteles que estaban en las cabezas de las 

columnas con las granadas, e hizo lo mis-

mo para el otro capitel.

19

 Los  capiteles  que  estaban  sobre  las 

columnas  en  el  pórtico  tenían  forma  de 

lirios, y eran de cuatro codos.

20

 Los  capiteles  sobre  las  columnas  te-

nían doscientas granadas, en dos hileras, 

sobre la parte abultada del capitel que es-

taba encima de la red, tanto en el primer 

capitel como en el segundo.

21

 Emplazó  también  las  columnas  en  el 

pórtico del lugar santo: erigió la columna 

derecha, y la llamó Jaquín,° y erigió la co-

lumna izquierda, y la llamó Boaz.°

22

 Y colocó en la parte superior de las co-

lumnas un motivo de lirios, y del mismo 

modo fueron diseñadas las columnas.

23

 Hizo también el mar de fundición, re-

dondo,  de  diez  codos  de  borde  a  borde, 

cinco codos de alto y treinta codos de cir-

cunferencia.°

24

 Debajo y alrededor del borde había cala-

bazas, diez por codo, dispuestas en dos hile-

ras alrededor del mar, las cuales habían sido 

fundidas en una sola pieza con el mar.

25

 Estaba  asentado  sobre  doce  bueyes: 

tres  miraban  al  norte,  tres  al  occidente, 

tres al sur y tres al oriente. El mar estaba 

asentado sobre ellos, y todas las ancas da-

ban hacia la parte interior.

26

 Su espesor era de un palmo menor, y 

su  borde,  como  el  borde  de  un  cáliz  de 

una flor de lirio, y su capacidad era de dos 

mil batos.°

27

 Hizo también las diez bases de bronce: 

cuatro codos era el largo de cada base, cua-

tro codos de ancho, y tres codos de alto.

28

 Este era el diseño de las bases: Tenían 

marcos,  y  los  marcos  estaban  entre  los 

paneles;

29

 y sobre los marcos que había entre los 

paneles,  había  figuras  de  leones,  bueyes 

y  querubines;  y  sobre  los  paneles,  tanto 

encima como debajo de los leones y de los 

bueyes, había molduras en bajorrelieve.

30

 Cada base tenía cuatro ruedas de bron-

ce con ejes de bronce, y sus cuatro patas 

tenían  soportes  debajo  de  la  fuente,  los 

cuales  eran  de  bronce  fundido  y  tenían 

molduras a cada lado.

31

 Su abertura sobresalía un codo del in-

terior,  a  manera  de  capitel.  Su  abertura 

era redonda, hecha como una base, de un 

codo y medio, y también alrededor de su 

abertura  había  bajorrelieves,  y  sus  mar-

cos eran cuadrados, no redondos.

32

 Las  cuatro  ruedas  estaban  debajo  de 

los  marcos;  los  ejes  de  las  ruedas  salían 

de la base, y cada rueda tenía un codo y 

medio de alto.

33

 El diseño de las ruedas era como el de 

las ruedas de un carro: sus ejes, sus aros, 

sus rayos y sus cubos, todo era de fundi-

ción.

7.13 No el rey Hiram.  7.21 Esto es, Él establecerá.  7.21 Esto es, con fortaleza.  7.23 Lit. un cordón de treinta codos lo rodea-

ba

7.26 Aprox. 44.000 litros, 3.000 batos en 2 Cr.4.5.


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1 Reyes 8:7

359

34

 Había  pues  cuatro  soportes  para  las 

cuatro  esquinas  de  cada  base  que  salían 

de la misma base.

35

 En la parte superior de cada base ha-

bía un soporte circular de medio codo de 

alto, y sobre la base había soportes y mar-

cos que salían de ella misma.

36

 Sobre  las  planchas  de  sus  soportes  y 

de sus marcos grabó querubines, leones 

y palmeras, según el espacio de cada uno, 

con molduras en derredor.

37

 De esta manera hizo las diez bases: de 

una sola fundición, de una misma medida 

y una misma forma.

38

 Hizo también diez fuentes de bronce. 

Cada una tenía una capacidad de cuaren-

ta batos.° Cada fuente tenía cuatro codos. 

Colocó una fuente sobre cada una de las 

diez bases,

39

 poniendo  cinco  bases  al  lado  sur  de 

la Casa y las otras cinco al lado norte de 

la  Casa,  en  tanto  que  el  mar  lo  colocó 

al  lado  meridional  de  la  Casa,  hacia  el 

sureste.

40

 Hiram  también  hizo  las  calderas,  las 

palas  y  los  aspersorios.  Así  terminó  Hi-

ram de realizar toda la obra que hizo para 

el rey Salomón en la Casa de YHVH:

41

 Las dos columnas, los cuencos de los 

capiteles  que  coronaban  las  dos  colum-

nas, y las dos redes que cubrían los dos 

cuencos  de  los  capiteles  que  coronaban 

las columnas;

42

 las cuatrocientas granadas para las dos 

redes:  dos  hileras  de  granadas  por  red, 

para cubrir los dos cuencos de los capite-

les que coronaban las columnas;

43

 las diez bases, y las diez fuentes sobre 

las bases;

44

 el mar, con los doce bueyes debajo del 

mar;

45

 las calderas, las palas y los tazones. To-

dos estos utensilios que hizo Hiram para 

el  rey  Salomón,  para  la  Casa  de  YHVH, 

eran de bronce bruñido.

46

 Y el rey hizo fundir todo esto en tierra 

arcillosa, en la llanura del Jordán, entre 

Sucot y Saretán.

47

 Y Salomón dejó sin pesar todos estos 

utensilios por su gran cantidad, y el peso 

del bronce nunca pudo ser averiguado.

48

 Salomón hizo también todos los uten-

silios de la Casa de YHVH: el altar de oro, 

la mesa de oro (sobre la cual estaba el pan 

de la proposición);°

49

 los cinco candelabros de oro puro (que 

estaban al sur), y los otros cinco (al norte, 

delante del lugar santísimo), con las flo-

res, las lámparas y las tenazas de oro.

50

 Asimismo, hizo de oro puro las copas, 

las  despabiladeras,  los  aspersorios,  las 

cucharas y los incensarios. También eran 

de oro los goznes de las puertas de la sala 

interior, del lugar santísimo, y los de las 

puertas de la sala de la Casa.

51

 Así se completó toda la obra que el rey 

Salomón  hizo  para  la  Casa  de  YHVH.  Y 

Salomón introdujo las cosas que su padre 

David había consagrado, y puso la plata y 

el oro y los utensilios en la tesorería de la 

Casa de YHVH.

Consagración de la Casa

8

Después  Salomón  hizo  reunir  en  Je-

rusalem  a  los  ancianos  de  Israel,  y  a 

todos los jefes de las tribus, los príncipes 

de las casas paternas de los hijos de Israel, 

ante el rey Salomón, para hacer subir el 

Arca del Pacto de YHVH desde la ciudad 

de David, la cual es Sion.

2

 Y todos los hombres de Israel se congre-

garon  ante  el  rey  Salomón  en  la  solem-

nidad° del mes de Etanim, que es el mes 

séptimo.

3

 Y  cuando  todos  los  ancianos  de  Israel 

llegaron, los sacerdotes alzaron el Arca.

4

 Y  subieron  el  Arca  de  YHVH,  el  Taber-

náculo de Reunión, y todos los utensilios 

sagrados que había dentro del Tabernáculo; 

los sacerdotes y los levitas los subieron.

5

 Y el rey Salomón, y toda la asamblea de 

Israel que se había reunido con él, estu-

vieron delante del Arca, sacrificando ove-

jas y bueyes que no pudieron ser contados 

ni calculados por su gran cantidad.

6

 Entonces  los  sacerdotes  introdujeron 

el  Arca  del  Pacto  de  YHVH  en  su  lugar, 

en el Santuario interior de la Casa, en el 

lugar santísimo, debajo de las alas de los 

querubines.

7

 Porque  los  querubines  extienden  las 

alas sobre el lugar del Arca, de modo que 

7.38 Aprox. 880 litros.  7.48 

→Ex.25.23, 30.  8.2 Esto es, de los Tabernáculos. →Lv.23.23-36.


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1 Reyes 8:8

360

los querubines cubren el Arca y sus varas 

por encima.

8

 Aunque  las  varas  eran  tan  largas,  que 

los extremos de las varas se dejaban ver 

desde el lugar santo, que está delante del 

Santuario interior, pero no podían verse 

desde afuera. Y así están hasta hoy.

9

 Ninguna cosa había en el Arca, excepto 

las dos tablas de piedra que Moisés había 

colocado allí en Horeb, donde YHVH ha-

bía pactado con los hijos de Israel, cuan-

do salieron de la tierra de Egipto.

10

 Y aconteció que al salir los sacerdotes 

del Santuario, una nube llenó la Casa de 

YHVH,

11

 y los sacerdotes no pudieron continuar 

ministrando por causa de la nube, porque 

la gloria de YHVH había llenado la Casa 

de YHVH.

12

 Entonces Salomón dijo: YHVH ha di-

cho que Él habitaría en densa oscuridad.

13

 Con empeño te he edificado una Casa 

por habitación, un lugar estable donde Tú 

habites por los siglos.

14

 Y  el  rey  volvió  su  rostro  y  bendijo  a 

toda la congregación de Israel, mientras 

toda la congregación de Israel se mante-

nía de pie.

15

 Y dijo: ¡Bendito sea YHVH Dios de Israel!, 

que ha cumplido con su mano lo que habló 

por su boca a David mi padre, diciendo:

16

 Desde el día en que saqué a mi pueblo 

Israel  de  Egipto,  no  he  escogido  a  nin-

guna ciudad de todas las tribus de Israel 

para edificar una Casa donde estuviera mi 

Nombre; aunque° escogí a David para que 

estuviera sobre mi pueblo Israel.

17

 Y estuvo en el corazón de mi padre Da-

vid el anhelo de edificar una Casa para el 

nombre de YHVH, el Dios de Israel.

18

 Pero YHVH dijo a mi padre David: Por 

cuanto ha estado en tu corazón el anhelo 

de edificar Casa para mi Nombre, bien has 

hecho en tener esto en tu corazón;

19

 pero tú no edificarás la Casa, sino que 

un hijo nacido de tus entrañas, él edifica-

rá la Casa para mi Nombre.°

20

 Y  YHVH  ha  cumplido  su  palabra  di-

cha,  pues  yo  me  he  levantado  en  lugar 

de David mi padre y me he sentado en el 

trono de Israel, tal como habló YHVH, y 

he  edificado  la  Casa  para  el  nombre  de 

YHVH, Dios de Israel.

21

 Y he puesto en ella lugar para el Arca, 

en la cual está el pacto° de YHVH, que Él 

hizo con nuestros padres al sacarlos de la 

tierra de Egipto.

22

 Luego Salomón se plantó ante el altar 

de YHVH, frente a toda la asamblea de Is-

rael, y extendiendo sus manos a los cielos,

23

 dijo: ¡Oh YHVH, Dios de Israel! No hay 

’Elohim como Tú, ni arriba en los cielos 

ni abajo en la tierra. Tú guardas el pacto 

y la misericordia para con tus siervos que 

andan delante de ti con todo su corazón.

24

 Tú has cumplido lo que prometiste a 

tu siervo David mi padre. Con tu boca lo 

hablaste, y con tu mano lo has cumplido, 

como en este día.

25

 Ahora pues, oh YHVH, Dios de Israel, 

cumple con tu siervo David mi padre lo 

que Tú le prometiste diciendo: No te fal-

tará varón delante de mí que se siente en 

el  trono  de  Israel,  con  tal  que  tus  hijos 

guarden su camino para andar delante de 

mí, como tú has andado delante de mí.

26

 Ahora pues, oh Dios de Israel, ruégote 

sea confirmada tu palabra que hablaste a 

tu siervo David mi padre.

27

 Aunque,  ¿en  verdad  ’Elohim  habitará 

en la tierra? He aquí, los cielos y los cielos 

de los cielos no te pueden contener, ¡cuán-

to menos esta Casa que he edificado!

28

 Sin  embargo,  oh  YHVH,  Dios  mío, 

Tú prestarás atención a la oración de tu 

siervo y su súplica, para oír el clamor y 

la oración que tu siervo hace hoy ante tu 

presencia,

29

 a fin de que tu ojo esté abierto hacia 

esta Casa noche y día, hacia el lugar del 

cual  has  dicho:  Allí  estará  mi  Nombre; 

para  escuchar  la  oración  que  tu  siervo 

haga hacia este lugar.

30

 Y Tú oirás la oración de tu siervo y de 

tu  pueblo  Israel  cuando  oren  hacia  este 

lugar. ¡Sí!, oye desde el lugar de tu mo-

rada  en  los  cielos,  y  cuando  hayas  oído, 

entonces perdona.

8.16 Prob. homeoteleuta del TM. LXX registra: aunque escogí Jerusalem, para que mi Nombre estuviera en ella, y escogí a David 

para que presidiera en mi pueblo Israel, quizá tomado de Crónicas. 

→2 Cr.6.6.  8.19 →2 S.7.12-13.  8.21 Esto es, las tablas del 

pacto

→Ex.34.28; Ro.9.4; Dt.9.9, 11, 15, 17. 


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1 Reyes 8:53

361

31

 Cuando un hombre peque contra otro, 

y  se  le  exija  juramento,  y  entre  en  esta 

Casa para jurar ante tu altar,

32

 entonces escucha Tú desde los cielos, 

y haz justicia a tus siervos, condenando al 

malvado para traer su conducta° sobre su 

propia cabeza, y justificando al justo para 

retribuirle conforme a su justicia.

33

 Cuando tu pueblo Israel sea derrotado 

ante el enemigo por haber pecado contra 

ti; si ellos se vuelven a ti y confiesan tu 

Nombre,  y  oran  y  te  hacen  súplicas  en 

esta Casa,

34

 entonces escucha Tú desde los cielos, y 

perdona el pecado de tu pueblo Israel, y ha-

zlos volver a la tierra que diste a sus padres.

35

 Cuando los cielos estén cerrados, y no 

haya lluvia, porque ellos han pecado con-

tra ti; si oran hacia este lugar, y confiesan 

tu Nombre, y se vuelven de su pecado por 

el que los afligiste,

36

 entonces escucha Tú desde los cielos, y 

perdona el pecado de tus siervos y de tu pue-

blo Israel. Sí, enséñales el buen camino por 

el que deben andar y dales lluvia sobre tu 

tierra, la cual diste a tu pueblo por heredad.

37

 Cuando  haya  hambre  en  la  tierra, 

cuando  haya  peste,  tizón  o  añublo,  lan-

gosta o pulgón, o cuando su enemigo ase-

die la puerta de su ciudad, cualquiera sea 

la plaga o la enfermedad,

38

 toda oración  o toda  súplica  que haga 

cualquier  persona  de  todo  tu  pueblo  Is-

rael,  reconociendo  cada  uno  la  aflicción 

de  su  mismo  corazón,  y  extiendan  sus 

manos hacia esta Casa,

39

 entonces escucha Tú desde los cielos, 

el lugar de tu morada, y perdona, y aplica 

lo que merezca cada uno conforme a to-

dos sus caminos, pues Tú conoces su co-

razón; porque sólo Tú conoces el corazón 

de todos los hijos del hombre;

40

 a fin de que te teman todos los días que 

vivan sobre la tierra que Tú diste a nues-

tros padres.

41

 Asimismo,  cuando  el  extranjero,  que 

no  es  de  tu  pueblo  Israel,  venga  de  una 

tierra lejana por causa de tu Nombre

42

 (porque oirán de tu gran Nombre, de 

tu poderosa mano y de tu brazo extendi-

do), y venga y ore hacia esta Casa,

43

 entonces escucha Tú desde los cielos, el 

lugar de tu morada, y haz conforme a todo 

lo que el extranjero te pida, para que todos 

los pueblos de la tierra puedan conocer tu 

Nombre, para que te teman como tu pue-

blo Israel, y sepan que a tu Nombre está 

consagrada esta Casa que he construido.

44

 Cuando  tu  pueblo  salga  a  la  batalla 

contra el enemigo, cualquiera sea el ca-

mino en que los envíes, y oren a YHVH en 

dirección a la ciudad que Tú has escogido, 

y en dirección a la Casa que he edificado 

para tu Nombre,

45

 entonces escucha Tú desde los cielos su 

oración y su súplica, y ampara su causa.

46

 Cuando  pequen  contra  ti  (porque  no 

hay hombre que no peque), y Tú, airado 

contra ellos, los entregues ante el enemi-

go, de modo que sean llevados cautivos a 

tierra del enemigo, sea lejos o cerca;

47

 si en la tierra a donde hayan sido lle-

vados cautivos ellos vuelven en sí, y en la 

tierra de su cautiverio se vuelven y te su-

plican,  diciendo:  Hemos  pecado,  hemos 

hecho  iniquidad,  hemos  actuado  impía-

mente;

48

 si en la tierra de sus enemigos, a donde 

los hayan llevado cautivos, ellos se vuel-

ven a ti con todo su corazón y con toda su 

alma, y oran a ti en dirección a la tierra 

que diste a sus padres, hacia la ciudad que 

Tú has elegido, y hacia la Casa que he edi-

ficado a tu Nombre,

49

 entonces escucha Tú su oración y su 

súplica desde los cielos, el lugar de tu mo-

rada, y ampara su causa,

50

 y perdona a tu pueblo que ha pecado 

contra ti, y todas sus transgresiones que 

han  cometido  contra  ti,  y  hazles  objeto 

de misericordia ante quienes los llevaron 

cautivos, para que se apiaden de ellos.

51

 Por cuanto son tu pueblo y tu heredad, 

que Tú sacaste de Egipto, de en medio del 

horno de hierro.

52

 Estén pues tus ojos abiertos a la súpli-

ca de tu siervo y a la súplica de tu pueblo 

Israel,  para  escucharles  en  todo  aquello 

que te invoquen.

53

 Porque Tú los separaste de entre todos 

los pueblos de la tierra para que fueran tu 

heredad, como hablaste por medio de tu 

8.32 Lit. camino


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1 Reyes 8:54

362

siervo Moisés, cuando sacaste a nuestros 

padres de Egipto, oh Adonay YHVH.

54

 Y sucedió que cuando Salomón termi-

nó de hacer toda esta oración y súplica a 

YHVH, se levantó de estar de rodillas, con 

sus manos extendidas a los cielos, delante 

del altar de YHVH.

55

 Y poniéndose en pie, bendijo en alta voz 

a toda la asamblea de Israel, diciendo:

56

 ¡Bendito  sea  YHVH,  que  ha  dado  des-

canso a su pueblo Israel, conforme a todo 

lo que Él había hablado! No ha fallado nin-

guna palabra de todas sus buenas palabras 

que habló por medio de Moisés su siervo.

57

 Como estuvo con nuestros padres, así 

YHVH nuestro Dios esté con nosotros; no 

nos desampare ni nos deje,

58

 e  incline  nuestro  corazón  hacia  Él, 

para que andemos en todos sus caminos y 

guardemos sus mandamientos, sus esta-

tutos y decretos que Él mandó a nuestros 

padres.

59

 Y  que  estas,  mis  palabras  con  que  he 

suplicado delante de YHVH, estén cerca de 

YHVH nuestro Dios día y noche, para que Él 

ampare la causa de su siervo y la de su pue-

blo Israel, según la necesidad de cada día;

60

 para que todos los pueblos de la tierra 

sepan que YHVH es Ha-’Elohim, y no hay 

otro.

61

 Sea,  pues,  íntegro  vuestro  corazón 

para con YHVH nuestro Dios, para andar 

en sus leyes y guardar sus mandamientos, 

como en este día.

62

 Entonces  el  rey,  y  todo  Israel  con  él, 

ofrecieron sacrificios delante de YHVH.

63

 Y Salomón brindó para la ofrenda pa-

cífica, que sacrificó a YHVH, veintidós mil 

bueyes y ciento veinte mil ovejas. Así el 

rey y todos los hijos de Israel consagraron 

la Casa de YHVH.

64

 Aquel  mismo  día  el  rey  consagró  la 

parte central del atrio que estaba delan-

te de la Casa de YHVH, pues allí preparó 

el  holocausto,  la  ofrenda  vegetal  y  las 

grosuras  de  los  sacrificios  de  paz;  por-

que el altar de bronce que estaba delan-

te de YHVH resultó demasiado pequeño 

para contener el holocausto, la ofrenda 

vegetal, y las grosuras de los sacrificios 

de paz.

65

 Así, en aquella ocasión, Salomón y todo 

Israel con él, una inmensa asamblea que 

acudió desde la entrada de Hamat hasta 

el arroyo de Egipto, celebraron la solem-

nidad delante de YHVH nuestro Dios por 

siete días,° y aun por otros siete días más, 

es decir, durante catorce días.

66

 Al octavo día despidió al pueblo, y ellos 

bendijeron al rey y se fueron a sus tiendas 

gozosos y alegres de corazón, por todo el 

bien que YHVH había mostrado a su sier-

vo David° y a su pueblo Israel.

Condiciones del pacto 

Otras actividades de Salomón

9

Sucedió  que  cuando  Salomón  hubo 

acabado la obra de la Casa de YHVH, 

de la casa real, y todo lo que había desea-

do hacer,

2

 YHVH  se  apareció  a  Salomón  por  se-

gunda vez, como se le había aparecido en 

Gabaón.

3

 Y  YHVH  le  dijo:  He  escuchado  tu  ora-

ción  y  tu  súplica  que  has  hecho  en  mi 

presencia. Yo he santificado esta Casa que 

tú has edificado, para poner mi Nombre 

en ella para siempre. Mis ojos y mi cora-

zón estarán allí todos los días.

4

 Y en cuanto a ti, si andas delante de mí 

como anduvo David tu padre, con integri-

dad de corazón y con rectitud, haciendo 

conforme a todo lo que te he mandado, y 

guardas mis estatutos y mis decretos,

5

 Yo afirmaré el trono de tu reino sobre 

Israel para siempre, tal como hablé a Da-

vid tu padre, diciendo: No te faltará varón 

sobre el trono de Israel.

6

 Pero si vosotros y vuestros hijos, obsti-

nadamente os apartáis de mí y no guar-

dáis  mis  mandamientos  y  mis  estatutos 

que  he  puesto  delante  de  vosotros,  y  os 

vais y servís a otros dioses, y os postráis 

ante ellos,

7

 entonces  haré  cortar  a  Israel  de  sobre 

la faz de la tierra que les he dado, y apar-

taré de mi presencia la Casa que he san-

tificado para mi Nombre, e Israel vendrá 

a ser de refrán y escarnio entre todas las 

naciones.

8

 Y  todo  el  que  pase  por  esta  Casa,  an-

tes sublime, se asombrará y se burlará, y 

8.65 LXX omite desde aquí hasta el final del v.  8.66 Se sobreentiende, a Salomón

→2 Cr.7.10.


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1 Reyes 10:5

363

preguntará: ¿Por qué ha hecho así YHVH 

a esta tierra y a esta Casa?

9

 Y  responderán:  Porque  abandonaron  a 

YHVH su Dios, que sacó a sus padres de 

la tierra de Egipto, y se aferraron a otros 

dioses,  y  se  postraron  ante  ellos  y  los 

sirvieron. Por eso YHVH ha traído sobre 

ellos todo este mal.

10

 Y aconteció al cabo de veinte años, du-

rante los cuales Salomón había edificado 

las dos casas: la Casa de YHVH y la casa 

real,

11

 (para las cuales Hiram, rey de Tiro, ha-

bía proporcionado a Salomón madera de 

cedro y de ciprés, y oro, conforme a todo 

su deseo), que el rey Salomón dio a Hi-

ram veinte ciudades en tierra de Galilea.

12

 Pero cuando Hiram salió de Tiro para 

ver  las  ciudades  que  Salomón  le  había 

dado, no fueron gratas a sus ojos,

13

 y dijo: ¿Qué ciudades son éstas que me 

has dado, hermano?; y uno las llamó Tie-

rra de Cabul,° hasta este día.

14

 Hiram  había  enviado  al  rey  ciento 

veinte talentos de oro.

15

 La razón de la recluta que el rey Salo-

món había impuesto era esta: edificar la 

Casa  de  YHVH,  su  propia  casa,  el  terra-

plén, la muralla de Jerusalem, Hazor, Me-

guido y Gezer,

16

 pues Faraón, rey de Egipto, había su-

bido y tomado Gezer, y la había incendia-

do; había dado muerte a los cananeos que 

habitaban  en  la  ciudad  y  la  había  dado 

como dote matrimonial a su hija, mujer 

de Salomón.

17

 Salomón,  pues,  reedificó  Gezer,  tam-

bién la Bet-jorón de abajo,

18

 Baalat y Tadmor, en el desierto del país,

19

 y  todas  las  ciudades  de  almacenaje 

que tenía Salomón, las ciudades para los 

carros de guerra, y las ciudades para los 

jinetes; todo lo que Salomón se propuso 

edificar en Jerusalem, en el Líbano, y en 

toda la tierra de su dominio.

20

 A todo el pueblo que había quedado del 

amorreo, del heteo, del ferezeo, del heveo 

y del jebuseo, que no eran de los hijos de 

Israel,

21

 esto  es,  a  sus  descendientes  (que  ha-

bían quedado después de ellos en la tierra, 

a quienes los hijos de Israel no quisieron 

exterminar),  Salomón  los  sometió  a  tri-

buto laboral, hasta este día.

22

 Pero no sometió a servidumbre a nin-

guno de los hijos de Israel, porque ellos 

eran hombres de guerra, sus servidores, 

sus oficiales, comandantes y capitanes de 

sus carros y jinetes.

23

 Los  jefes  de  los  capataces  que  Salo-

món tenía sobre la obra eran quinientos 

cincuenta, los cuales mandaban sobre la 

gente que hacía la obra.

24

 Una vez que la hija del Faraón subió de 

la ciudad de David a la casa que le° había 

construido, él edificó el terraplén.

25

 Tres veces al año Salomón hacía elevar 

holocaustos y sacrificios de paz sobre el 

altar que había edificado a YHVH, y cuan-

do hubo terminado la Casa, quemaba in-

cienso delante de YHVH.

26

 El  rey  Salomón  también  construyó 

una flota en Ezión-guever, que está junto 

a Eilat, a orillas del mar Rojo, en la tierra 

de Edom.

27

 E Hiram envió en la flota a sus siervos, 

marineros  y  conocedores  del  mar,  junto 

con los siervos de Salomón,

28

 los cuales fueron a Ofir y tomaron de 

allí cuatrocientos talentos de oro que lle-

varon al rey Salomón.

La reina de Sabá 

Riquezas de Salomón

10

La  reina  de  Sabá  oyó  de  la  fama 

de Salomón, debido al nombre de 

YHVH,  y  vino  a  probarlo  con  preguntas 

difíciles.

2

 Y llegó a Jerusalem con un gran séquito, 

con camellos cargados de especias aromá-

ticas,  oro  en  gran  abundancia  y  piedras 

preciosas. Cuando vino a Salomón, habló 

con él de todo lo que tenía en su mente.

3

 Y  Salomón  respondió  a  todas  sus  pre-

guntas, y no hubo cosa difícil que el rey 

no le pudiera responder.

4

 Y la reina de Sabá, al ver toda la sabi-

duría de Salomón, y el palacio que había 

edificado,

5

 y los manjares de su mesa, y los asientos 

de sus servidores, y la presentación y las 

vestiduras de sus siervos y coperos, y los 

9.13 Esto es, como nada.  9.24 Esto es, Salomón.


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1 Reyes 10:6

364

holocaustos que él hacía elevar en la Casa 

de YHVH, se quedó sin aliento,°

6

 y dijo al rey: ¡Es verdad lo que oí en mi 

tierra acerca de tus hechos y de tu sabi-

duría!

7

 Y no creía lo que me decían hasta que 

vine,  y  mis  ojos  lo  han  visto,  y  he  aquí 

no  se  me  había  contado  ni  la  mitad:  en 

sabiduría y bienes tú superas la fama que 

había oído.

8

 ¡Dichosos tus hombres, y dichosos estos 

siervos  tuyos,  que  continuamente  están 

en tu presencia y oyen tu sabiduría!

9

 ¡Bendito sea YHVH tu Dios, que se agra-

dó de ti para ponerte en el trono de Israel! 

Por causa del eterno amor que YHVH tie-

ne por Israel, te ha constituido rey, a fin 

de que practiques el derecho y la justicia.

10

 Y ella dio al rey ciento veinte talentos 

de oro, y gran cantidad de especias aromá-

ticas y piedras preciosas. Nunca más llegó 

tanta abundancia de especias aromáticas 

como las que la reina de Sabá trajo al rey 

Salomón.

11

 También  la  flota  de  Hiram,  que  ha-

bía traído oro de Ofir, trajo de Ofir gran 

cantidad de madera de sándalo y piedras 

preciosas.

12

 Y con la madera de sándalo el rey hizo 

pilares  para  la  Casa  de  YHVH  y  para  la 

casa real, además de arpas y liras para los 

músicos. Nunca llegó madera de sándalo 

tal, ni se ha visto hasta este día.

13

 El rey Salomón dio a la reina de Sabá 

cuanto  ella  quiso  pedirle,  además  de  lo 

que Salomón le había dado conforme a su 

real munificencia. Ella entonces se volvió 

y regresó a su tierra con sus siervos.

14

 El peso del oro que le llegaba a Salo-

món cada año era de seiscientos sesenta y 

seis talentos de oro,

15

 aparte  del  de  los  mercaderes,  y  el  de 

los negocios de los comerciantes, y el de 

todos los reyes de Arabia, y el de los go-

bernadores del país.

16

 El rey Salomón hizo doscientos pave-

ses° de oro batido, empleando en cada es-

cudo seiscientos siclos de oro;

17

 e hizo además trescientos escudos de 

oro  batido,  empleando  en  cada  escudo 

tres minas de oro, los cuales el rey colocó 

en la casa del bosque del Líbano.

18

 También hizo el rey un gran trono de 

marfil y lo recubrió de oro refinado;

19

 el trono tenía seis gradas, y el respal-

do tenía una cabeza de becerro; a ambos 

lados del asiento tenía soportes para los 

brazos, y junto a los brazos había dos leo-

nes de pie;

20

 había  igualmente  doce  leones  de  pie, 

uno a cada lado de las seis gradas. Jamás 

se hizo algo semejante para ningún rei-

no.

21

 Todos los vasos de beber del rey Salo-

món eran de oro puro, y todos los objetos 

de la casa del bosque del Líbano eran de 

oro  fino.  Nada  era  de  plata,  pues  en  los 

días de Salomón ésta no era estimada en 

absoluto;

22

 porque el rey tenía en el mar la flota 

de Tarsis con la flota de Hiram; y una vez 

cada tres años venía la flota de Tarsis tra-

yendo  oro,  plata,  marfil,  monos  y  pavos 

reales.

23

 El rey Salomón llegó a ser más grande 

que todos los reyes de la tierra en rique-

zas y en sabiduría.

24

 Y toda la tierra procuraba estar en pre-

sencia  de  Salomón  para  oír  la  sabiduría 

que ’Elohim había puesto en su corazón.

25

 Y año tras año, todos ellos le llevaban 

su presente: objetos de plata, objetos de 

oro,  vestiduras,  armas,  perfumes,  caba-

llos y mulos.

26

 Y reunió Salomón carros de guerra y 

jinetes, y tuvo mil cuatrocientos carros y 

doce mil jinetes, que situó en las ciudades 

de  los  carros,  y  en  Jerusalem,  cerca  del 

rey.

27

 Y el rey hizo que la plata fuera en Jeru-

salem como las piedras, y los cedros como 

los sicómoros de la Sefelá.

28

 Los caballos de Salomón provenían de 

Egipto y de Coa, que los mercaderes del 

rey adquirían en Coa al contado.

29

 Y  cada  carro  que  entraba  de  Egipto 

costaba seiscientos siclos de plata, y cada 

caballo ciento cincuenta siclos. Por medio 

de ellos también los adquirían todos los 

reyes de los heteos y los reyes de Siria.

10.5 Lit. y no hubo más espíritu en ella.  10.16 Heb. sinnah. Escudo grande, oblongo o rectangular, que cubre por completo al 

guerrero.


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1 Reyes 11:25

365

Apostasía de Salomón

11

Ahora  bien,  además  de  la  hija  de 

Faraón, el rey Salomón amó a mu-

chas mujeres extranjeras: moabitas, amo-

nitas, edomitas, sidonias y heteas;

2

 de  entre  las  naciones  que  había  dicho 

YHVH a los hijos de Israel: No penetréis 

en  ellas  ni  ellas  penetren  en  vosotros, 

pues  de  seguro  apartarán  vuestro  cora-

zón hacia sus dioses.° A éstos° Salomón 

se apegó apasionadamente,

3

 porque llegó a tener setecientas muje-

res  reinas  y  trescientas  concubinas,  que 

pervirtieron su corazón,

4

 pues  cuando  Salomón  era  ya  anciano, 

sucedió que sus mujeres hicieron desviar 

su corazón hacia otros dioses, y ya no es-

tuvo su corazón sumiso a la voluntad de 

YHVH su Dios, como el corazón de David 

su padre.

5

 Salomón anduvo en pos de Astarté, dio-

sa  de  los  sidonios,  y  en  pos  de  Milcom, 

ídolo abominable de los amonitas.

6

 E hizo Salomón lo malo ante los ojos de 

YHVH,  y  no  siguió  plenamente  a  YHVH 

como David su padre,

7

 pues Salomón edificó en el monte que está 

frente  a  Jerusalem,°  un  lugar  alto  a  Que-

mós, ídolo abominable de Moab, y a Moloc, 

ídolo abominable de los hijos de Amón.

8

 Y  así  hizo  para  todas  sus  mujeres  ex-

tranjeras, las cuales quemaban incienso e 

inmolaban víctimas a sus dioses.

9

 Y YHVH se indignó con Salomón, por-

que  su  corazón  se  había  desviado  de 

YHVH,  Dios  de  Israel,  quien  se  le  había 

aparecido dos veces,

10

 y le había mandado acerca de esto, que 

no siguiera a otros dioses; pero él no ob-

servó lo que YHVH le había ordenado.

11

 Entonces  YHVH  dijo  a  Salomón:  Por 

cuanto esto ha estado en tu mente, y no 

has  guardado  mi  pacto  y  mis  estatutos 

que te he ordenado, de seguro rasgaré tu 

reino y lo daré a un siervo tuyo.

12

 Pero por amor a tu padre David, no lo 

haré en tus días, sino que lo rasgaré de la 

mano de un hijo tuyo.

13

 Pero  no  le  arrebataré  todo  el  reino, 

sino que le daré a tu hijo una tribu, por 

amor a mi siervo David y por amor a Je-

rusalem, que Yo he escogido.

14

 Y YHVH levantó un adversario contra 

Salomón:  Hadad  edomita,  de  la  descen-

dencia real en Edom.

15

 Porque  sucedió  cuando  David  estaba 

en Edom, y Joab, general del ejército, ha-

bía subido a enterrar a los muertos (des-

pués de haber herido a todos los varones 

de Edom,

16

 porque Joab y todo Israel habían per-

manecido allí seis meses hasta que exter-

minaron a todos los varones de Edom),

17

 Hadad había huido a Egipto con algu-

nos edomitas de los siervos de su padre, 

siendo Hadad todavía un niño.

18

 Y partiendo de Madián, fueron a Parán, 

y tomaron consigo a algunos hombres de 

Parán y llegaron a Egipto, al Faraón rey 

de Egipto, quien le dio una casa, y le asig-

nó alimentos, y le dio tierras.

19

 Y Hadad halló gran favor ante los ojos 

del  Faraón,  quien  le  dio  por  mujer  a  la 

hermana de su esposa, la hermana de la 

reina° Tafnes.

20

 Y la hermana de Tafnes le parió a su hijo 

Genubat, a quien Tafnes amamantó en la 

casa  del  Faraón.  Y  Genubat  estaba  en  la 

casa del Faraón, entre los hijos del Faraón.

21

 Y  cuando  Hadad  supo  en  Egipto  que 

David  había  reposado  con  sus  padres, 

y  que  Joab,  general  del  ejército,  había 

muerto,  Hadad  dijo  al  Faraón:  Permite 

que me vaya y regrese a mi tierra.

22

 El  Faraón  le  preguntó:  Pero,  ¿qué  te 

falta conmigo para que procures irte a tu 

tierra? Y él respondió: Nada; pero de to-

dos modos déjame ir.

23

 ’Elohim también le levantó como ad-

versario  a  Rezón  hijo  de  Eliada,  quien 

había huido de su señor Hadad-ezer, rey 

de Soba.

24

 Éste reunió gente y vino a ser jefe de 

una banda armada cuando David destrozó 

a los de Soba, y fueron a Damasco y habi-

taron allí, y lo hicieron rey en Damasco.

25

 Fue adversario de Israel todos los días 

de  Salomón,  además  del  mal  que  hacía 

Hadad;  fue  hostil  a  Israel  y  reinó  sobre 

Siria.

11.2 

→Ex.34.15-16; Dt.7.1-4.  11.2 Es decir, a los dioses extraños. El TM registra el sufijo de 3ra. persona masculino plural. 

11.7 Prob. el Monte de los Olivos.  11.19 Lit. señora.


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1 Reyes 11:26

366

26

 También Jeroboam ben Nabat, efrateo 

de Zereda, siervo de Salomón, cuya ma-

dre era una mujer viuda llamada Zerúa, 

se rebeló y alzó su mano contra el rey.

27

 Y  ésta  fue  la  causa  por  la  que  alzó  su 

mano contra el rey: Salomón estaba edifi-

cando la fortaleza, y reparando la brecha de 

la muralla de la ciudad de David, su padre;

28

 y este Jeroboam era hombre esforzado, 

y viendo Salomón que el joven era eficien-

te, lo puso a cargo de todos los trabajos de 

la casa de José.

29

 Y en aquel tiempo aconteció que Jero-

boam salió de Jerusalem, y en el camino 

encontró al profeta Ahías silonita; y éste 

estaba cubierto con una capa nueva, y es-

taban ellos dos solos en el campo.

30

 Entonces Ahías tomó el manto nuevo que 

llevaba sobre sí, lo rasgó en doce trozos,

31

 y  dijo  a  Jeroboam:  Toma  tú  diez  tro-

zos, porque así dice YHVH, Dios de Israel: 

He aquí, Yo rasgo el reino de la mano de 

Salomón, y a ti te doy diez tribus,

32

 pues él tendrá una tribu, por amor a 

mi siervo David y por amor a Jerusalem, 

la ciudad que Yo escogí entre todas las tri-

bus de Israel.

33

 Porque  me  han  abandonado  y  se  han 

postrado ante Astarté, diosa de los sidonios, 

ante Quemós, dios de Moab, y ante Milcom 

dios de los hijos de Amón, y no han andado 

en mis caminos para hacer lo recto ante 

mis  ojos,  y  guardar°  mis  estatutos  y  mis 

decretos, como David su padre.

34

 Pero no quitaré de su mano todo el rei-

no, porque lo he puesto como gobernante 

todos  los  días  de  su  vida,  por  amor  a  mi 

siervo David, al cual Yo elegí, y el cual guar-

dó mis mandamientos y mis estatutos.

35

 Pero  quitaré  el  reino  de  mano  de  su 

hijo, y a ti te daré diez tribus.

36

 Y a su hijo le daré una tribu, para que 

mi siervo David tenga en él una lámpara 

delante de mí todos los días en Jerusalem, 

la ciudad que Yo me escogí para poner allí 

mi Nombre.

37

 Yo  pues  te  tomaré  a  ti,  y  tú  reinarás 

sobre todo lo que tu alma desee, y serás 

rey sobre Israel.

38

 Y sucederá que si obedeces todo lo que 

te mande, y andas en mis caminos y haces 

lo recto ante mis ojos guardando mis es-

tatutos  y  mis  mandamientos  como  hizo 

mi  siervo  David,  Yo  estaré  contigo  y  te 

edificaré una casa firme, como se la edifi-

qué a David, y te entregaré Israel;

39

 y por esto humillaré a la descendencia 

de David, pero no para siempre.°

40

 Salomón entonces procuró matar a Je-

roboam, pero Jeroboam se levantó y huyó 

a Egipto, a Sisac rey de Egipto, y estuvo 

en Egipto hasta la muerte de Salomón.

41

 Los demás hechos de Salomón, todas 

las cosas que hizo, y su sabiduría, ¿no es-

tán escritos en el rollo de las Crónicas de 

Salomón?

42

 Los días que Salomón reinó en Jeru-

salem  sobre  todo  Israel  fueron  cuarenta 

años.

43

 Y Salomón durmió con sus padres, y fue 

sepultado en la ciudad de David su padre, y 

Roboam su hijo reinó en su lugar.

Rebelión de Israel

12

Roboam  fue  pues  a  Siquem,  por-

que todo Israel se había convocado 

en Siquem para proclamarlo rey.

2

 Y sucedió que cuando lo oyó Jeroboam 

ben  Nabat  (que  aún  estaba  en  Egipto, 

adonde  había  huido  de  la  presencia  del 

rey Salomón), y como Jeroboam habitaba 

en Egipto,

3

 mandaron a llamarle, y Jeroboam llegó 

con  toda  la  congregación  de  Israel  para 

hablar a Roboam diciendo:

4

 Tu  padre  agravó  nuestro  yugo.  Ahora 

pues, haz que la dura servidumbre de tu 

padre, y el pesado yugo que nos impuso 

sea más llevadero, y te serviremos.

5

 Él les dijo: ¡Volved a mí dentro de tres 

días! Y el pueblo se retiró.

6

 Y el rey Roboam consultó a los ancianos 

que habían estado delante de la presencia 

de su padre Salomón, cuando aún vivía, 

diciendo: ¿Cómo aconsejáis que responda 

a este pueblo?

7

 Y ellos le hablaron, diciendo: Si te cons-

tituyes hoy en servidor de este pueblo y 

les  sirves,  y  les  hablas  buenas  palabras, 

entonces serán tus siervos por siempre.

8

 Pero  él  dejó  de  lado  el  consejo  que  le 

habían dado los ancianos y consultó a los 

11.33 .guardar.  11.39 Lit. todos los días.


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1 Reyes 12:32

367

jóvenes que habían crecido con él y esta-

ban delante de su presencia.

9

 Y les preguntó: ¿Qué aconsejáis vosotros 

que respondamos a este pueblo que me ha 

hablado diciendo: Alivia el yugo que tu pa-

dre impuso sobre nosotros?

10

 Y los jóvenes que habían crecido con él 

le  respondieron,  diciendo:  Así  dirás  a  esta 

gente que ha hablado contigo diciendo: Tu 

padre  hizo  pesado  nuestro  yugo,  pero  tú, 

hazlo  más  llevadero;  así  les  hablarás:  Mi 

meñique es más grueso que los lomos de 

mi padre.

11

 Y ahora, si mi padre os afligió con yugo 

pesado, yo lo haré más pesado aún. Mi pa-

dre os castigó con azotes, pero yo os casti-

garé con escorpiones.

12

 Al tercer día vino Jeroboam con todo el 

pueblo a Roboam, como el rey había dis-

puesto, diciendo: Volved a mí al tercer día.

13

 Entonces el rey respondió al pueblo de 

mal talante, y dejó de lado el consejo que 

le habían dado los ancianos.

14

 Y les habló siguiendo el consejo de los 

jóvenes,  diciendo:  Mi  padre  hizo  pesado 

vuestro yugo, pero yo lo haré más pesado 

aún. Mi padre os castigó con azotes, pero 

yo os castigaré con escorpiones.

15

 Así el rey no hizo caso del pueblo, por-

que esto era un cambio de parte de YHVH, 

para que se cumpliera la palabra que ha-

bía hablado por medio de Ahías silonita a 

Jeroboam ben Nabat.

16

 Y cuando todo Israel vio que el rey no 

los había escuchado, el pueblo le respon-

dió al rey, diciendo: ¿Qué parte tenemos 

en  David?  ¡No  tenemos  heredad  con  el 

hijo  de  Isaí!  ¡Israel,  a  tus  dioses!°  ¡Mira 

ahora, David, por tu propia casa! E Israel 

se retiró a sus tiendas.

17

 Pero  en  cuanto  a  los  hijos  de  Israel 

que  habitaban  en  las  ciudades  de  Judá, 

Roboam siguió reinando sobre ellos.

18

 Después  el  rey  Roboam  envió  a  Ado-

ram,° que estaba a cargo del tributo, pero 

todo Israel lo apedreó con piedras, de tal 

modo que murió; y el mismo rey Roboam 

tuvo que apresurarse a subir en un carro 

para huir a Jerusalem.

19

 Así  se  rebeló  Israel  contra  la  casa  de 

David, hasta este día.

20

 Aconteció que al oír todo Israel que Je-

roboam había vuelto, lo mandaron a llamar 

ante la asamblea e hicieron que reinara so-

bre todo Israel. No quedó quien siguiese a la 

casa de David, excepto la tribu de Judá.

21

 Y  Roboam  llegó  a  Jerusalem  e  hizo 

congregar de toda la casa de Judá y de la 

tribu  de  Benjamín  a  ciento  ochenta  mil 

guerreros escogidos para combatir contra 

la casa de Israel y devolver el reino a Ro-

boam ben Salomón.

22

 Pero la palabra de Dios llegó a Semaías, 

varón de Dios, diciendo:

23

 Habla a Roboam ben Salomón, rey de 

Judá, y a toda la casa de Judá y de Benja-

mín, y al resto del pueblo, diciendo:

24

 Así dice YHVH: No subiréis ni combati-

réis contra vuestros hermanos, los hijos de 

Israel. Volveos, cada uno a su casa, porque 

de parte mía ha sucedido esto. Y ellos es-

cucharon la palabra de YHVH y desistieron 

de ir, conforme a la palabra de YHVH.

25

 Entonces Jeroboam reedificó Siquem, 

en la región montañosa de Efraín, y habi-

tó en ella; y de allí fue y reedificó Penuel.

26

 Pero  Jeroboam  decía  en  su  corazón: 

Ahora volverá el reino a la casa de David.

27

 Si este pueblo sube a ofrecer sacrificios 

en la Casa de YHVH en Jerusalem, el co-

razón de este pueblo se volverá a su señor, 

a Roboam rey de Judá; y me matarán, y se 

volverán a Roboam rey de Judá.

28

 Y habiendo sido aconsejado, el rey hizo 

dos becerros de oro y les dijo: ¡Bastante 

habéis subido a Jerusalem! ¡He aquí tus 

dioses,  oh  Israel,  los  cuales  te  hicieron 

subir de la tierra de Egipto!

29

 Y puso uno en Bet-’El y el otro lo co-

locó en Dan.

30

 Y esto fue ocasión de pecado, porque el 

pueblo iba° aun hasta Dan a postrarse.°

31

 También  hizo  templos  en  los  lugares 

altos,  e  instituyó  sacerdotes  de  entre  la 

gente común, que no eran hijos de Leví.

32

 Jeroboam estableció una solemnidad el 

día quince del mes octavo, semejante a la 

solemnidad° que había en Judá, y subió al 

12.16 7ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 13.  12.18 Esto es, Adoniram →4.6.  12.30 Lit. el pueblo fue ante el uno hasta Dan

Prob. se refiere a que el pueblo iba hasta Dan a presentarse ante uno de los nuevos dioses. 

12.30 .postrarse.  12.32 Imitación 

de la solemnidad de los Tabernáculos. 

→Lv.23.34.


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1 Reyes 12:33

368

altar que había hecho en Bet-’El, para ofre-

cer sacrificios a los becerros que había pre-

parado y ofrecer holocaustos sobre el altar. 

También  estableció  sacerdotes  en  Bet-’El 

para los lugares altos que había hecho.

33

 Y el día quince del mes octavo, fecha que 

había ideado de su propio corazón, subió al 

altar que había hecho en Bet-’El, e institu-

yó una solemnidad para los hijos de Israel, 

y subió al altar para quemar incienso.

Profecía sobre Josías 

Los dos profetas

13

Pero he aquí un varón de Dios, que 

por revelación de YHVH llegó des-

de Judá a Bet-’El mientras Jeroboam esta-

ba quemando incienso junto al altar.

2

 Y por mandato de YHVH clamó contra el 

altar, diciendo: ¡altar, altar!, así dice YHVH: 

He aquí, a la casa de David le es nacido un 

hijo cuyo nombre es Josías, quien sacrifi-

cará sobre ti a los sacerdotes de los lugares 

altos que en ti queman incienso, y sobre ti 

quemarán huesos de hombres.°

3

 Aquel mismo día dio una señal dicien-

do: Esta es la señal que YHVH ha hablado: 

¡He aquí el altar se partirá, y se derramará 

la ceniza grasienta que está sobre él!

4

 Y sucedió que cuando el rey oyó la pala-

bra que el varón de Dios había dicho con-

tra el altar de Bet-’El, Jeroboam extendió 

su  mano  desde  el  altar,  diciendo:  ¡Pren-

dedle! Y al momento se le secó la mano 

que había extendido contra él, y no pudo 

recogerla hacia sí.

5

 Entonces el altar se partió, y la ceniza 

grasienta se derramó del altar, conforme 

a la señal que el varón de Dios había dado 

por mandato de YHVH.

6

 Entonces el rey, tomando la palabra, dijo 

al varón de Dios: Te ruego que aplaques 

el rostro de YHVH tu Dios y ores por mí, 

para que mi mano pueda recogerse hacia 

mí. Y el varón de Dios, en efecto, aplacó el 

rostro de YHVH, y la mano del rey le fue 

restaurada y volvió a ser como antes.

7

 Entonces  el  rey  dijo  al  varón  de  Dios: 

Ven conmigo a la casa, y susténtate, y te 

daré un presente.

8

 Pero el varón de Dios dijo al rey: Aun-

que me dieras la mitad de tu casa, no iría 

contigo, ni comería pan, ni bebería agua 

en este lugar;

9

 porque por la palabra de YHVH me ha 

sido ordenado, diciendo: No comerás pan, 

ni beberás agua, ni volverás por el camino 

que hayas ido.

10

 Marchó pues por otro camino, y no vol-

vió por el camino por el que había venido 

a Bet-’El.

11

 Pero había un profeta anciano que habi-

taba en Bet-’El, a quien fue su hijo y le con-

tó todo lo que el varón de Dios había hecho 

aquel día en Bet-’El; también contaron a su 

padre las palabras que había hablado al rey.

12

 Y su padre les dijo: ¿Por qué camino se 

fue?  Y  sus  hijos  le  mostraron  el  camino 

por  donde  se  había  ido  el  varón  de  Dios 

que había venido de Judá.

13

 Y él dijo a sus hijos: ¡Enalbardadme el 

asno! Le enalbardaron pues el asno, y se 

montó sobre él,

14

 y  fue  tras  aquel  varón  de  Dios,  y  ha-

llándolo  sentado  debajo  de  un  roble,  le 

preguntó: ¿Eres tú el varón de Dios que 

vino de Judá? Le respondió: Sí, soy.

15

 Entonces le dijo: Ven conmigo a casa 

y come pan.

16

 Pero él dijo: No puedo volver contigo 

ni entrar contigo, no comeré pan ni bebe-

ré agua contigo en este lugar,

17

 porque  por  revelación  de  YHVH  me 

fue ordenado, diciendo: No comerás pan 

ni beberás agua allí, ni volverás por el ca-

mino que hayas ido.

18

 Pero él le dijo: Yo también soy profeta 

así  como  tú,  y  un  ángel  me  ha  hablado 

por revelación de YHVH, diciendo: Hazle 

volver contigo a tu casa, para que coma 

pan y beba agua (pero le mintió).

19

 Y se volvió con él, y comió pan en su 

casa y bebió agua.

20

 Y aconteció que cuando ellos estaban 

a la mesa, el profeta que lo había hecho 

volver tuvo revelación de YHVH,

21

 y clamó diciendo al varón de Dios que 

había venido de Judá: Así dice YHVH: Por-

que has sido rebelde al dicho de YHVH, y 

no guardaste el mandato que te impuso 

YHVH tu Dios,

22

 sino que has vuelto atrás, y has comido 

pan y bebido agua en este lugar, del que se 

13.2 

→2 R.23.15-16.


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1 Reyes 14:10

369

te dijo: No comerás pan ni beberás agua, 

tu  cadáver  no  entrará  en  el  sepulcro  de 

tus padres.

23

 Y  sucedió  que  cuando  hubo  comido 

pan y bebido, el profeta que le había he-

cho volver le enalbardó el asno.

24

 Pero  yendo  en  el  camino  un  león  lo 

halló y lo mató. Y su cadáver quedó ten-

dido en el camino, y el asno estaba parado 

junto a él, y el león también estaba parado 

junto al cadáver.

25

 Y  he  aquí  pasaron  unos  hombres,  y 

vieron el cadáver tendido en el camino y 

al león junto al cadáver, y fueron y lo dije-

ron en la ciudad donde habitaba el profeta 

anciano.

26

 Cuando lo oyó el profeta que lo había 

hecho volver del camino, dijo: Es el varón 

de Dios que fue desobediente a la palabra 

de  YHVH;  por  eso  YHVH  lo  entregó  al 

león,  y  lo  ha  desgarrado  y  matado,  con-

forme a la palabra que YHVH le habló.

27

 Entonces  habló  a  sus  hijos  diciendo: 

¡Enalbardadme el asno! Ellos lo enalbar-

daron,

28

 y él fue y halló el cadáver tendido en 

el camino, y el asno y el león estaban pa-

rados  junto  al  cadáver:  el  león  no  había 

devorado el cadáver ni había desgarrado 

al asno.

29

 El profeta levantó el cadáver del varón 

de  Dios,  lo  colocó  sobre  el  asno  y  se  lo 

llevó. Y el profeta anciano fue a la ciudad 

para hacer duelo por él y sepultarlo.

30

 Y depositó su cadáver en su propio se-

pulcro,  y  ellos  lo  endecharon,  diciendo: 

¡Ay, hermano mío!

31

 Y después de haberlo sepultado, suce-

dió que habló a sus hijos diciendo: Cuan-

do yo muera, sepultadme en el sepulcro 

en  que  está  sepultado  el  varón  de  Dios. 

Poned mis huesos junto a los suyos,

32

 porque  indudablemente  se  cumplirá 

la palabra que por revelación de YHVH él 

proclamó contra el altar que está en Bet-

’El,  y  contra  todos  los  santuarios  de  los 

lugares altos que están en las ciudades de 

Samaria.

33

 Después de este suceso, Jeroboam no 

se volvió de su mal camino, sino que vol-

vió a designar sacerdotes para los lugares 

altos de entre el populacho: consagraba la 

mano a quien lo deseaba, y llegaba a ser 

sacerdote de los lugares altos.

34

 Y esto vino a ser el pecado de la casa de 

Jeroboam, por lo cual fue cortada y des-

truida de sobre la faz de la tierra.

Profecía contra Jeroboam 

Reinado de Roboam

14

En aquel tiempo, Abías, hijo de Je-

roboam, cayó enfermo.

2

 Y  dijo  Jeroboam  a  su  mujer:  Levántate 

ahora y disfrázate para que no te reconoz-

can como mujer de Jeroboam, y ve a Silo. 

Allí está el profeta Ahías, que habló de mí 

diciendo  que  yo  sería  rey  sobre  este  pue-

blo.

3

 Toma en tu mano diez panes, tortas, y 

una vasija de miel, y ve a él. Te dirá qué 

será del niño.

4

 Y  así  lo  hizo  la  mujer  de  Jeroboam,  y 

se levantó, fue a Silo y llegó a la casa de 

Ahías. Y Ahías ya no podía ver, pues sus 

ojos se habían quedado fijos por la vejez.

5

 Pero  YHVH  había  dicho  a  Ahías:  He 

aquí, la mujer de Jeroboam viene a bus-

car  palabra  de  ti  acerca  de  su  hijo  que 

está enfermo. Así y así le has de hablar, 

porque será que cuando ella entre, fingirá 

ser otra mujer.

6

 Y fue así que cuando Ahías oyó el ruido 

de sus pasos, al entrar ella por la puerta, 

dijo: Entra, mujer de Jeroboam, ¿por qué 

finges ser otra? Por cuanto a ti soy envia-

do con un duro mensaje.

7

 Ve, di a Jeroboam: Así dice YHVH, Dios 

de Israel: Por cuanto Yo te elevé de entre 

el pueblo y te hice caudillo de mi pueblo 

Israel;

8

 y rasgué el reino de la casa de David y te 

lo entregué a ti; sin embargo, tú no has 

sido  como  mi  siervo  David,  que  guardó 

mis  mandamientos  y  anduvo  en  pos  de 

mí con todo su corazón, haciendo sólo lo 

recto ante mis ojos;

9

 sino  que  has  hecho  lo  malo  más  que 

todos los que te precedieron, y has ido y 

te has hecho otros dioses, y has fundido 

imágenes  para  provocarme  a  ira,  y  me 

has dado la espalda;

10

 por tanto, he aquí que Yo traigo el mal 

sobre  la  casa  de  Jeroboam,  y  cortaré  de 

Jeroboam a todo meante a la pared, tanto 

al que está bajo servidumbre como al que 

es libre en Israel, y barreré por completo 

la posteridad de Jeroboam, como se barre 

el estiércol, hasta que no quede nada.


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1 Reyes 14:11

370

11

 Al que de Jeroboam muera en la ciu-

dad, lo comerán los perros, y al que mue-

ra en el campo, lo comerán las aves de los 

cielos, porque YHVH ha hablado.

12

 Levántate  por  tanto  y  vete  a  tu  casa: 

en cuanto tus pies entren en la ciudad, el 

niño morirá;

13

 y todo Israel hará duelo por él y lo se-

pultará;  pues  éste  es  el  único  de  los  de 

Jeroboam que será sepultado, porque de 

la casa de Jeroboam, sólo en él se ha ha-

llado algo bueno delante de YHVH, Dios 

de Israel;

14

 y YHVH hará levantar para sí un rey en 

Israel, el cual destruirá la casa de Jeroboam 

en su día, ¿y qué si es ahora mismo?°

15

 Por  cuanto  YHVH  sacudirá  a  Israel 

como  se  sacude  una  caña  en  el  agua,  y 

desarraigará a Israel de esta buena tierra 

que dio a sus padres, y los esparcirá más 

allá del Río,° porque se hicieron sus ase-

ras, provocando a ira a YHVH;

16

 y entregará a Israel a causa de los peca-

dos de Jeroboam, por los cuales pecó él, e 

hizo pecar a Israel.

17

 Entonces la mujer de Jeroboam se le-

vantó, se fue y llegó a Tirsa, y al pasar el 

umbral de la casa, el niño murió.

18

 Y lo sepultaron, y todo Israel hizo due-

lo por él, conforme a la palabra que YHVH 

había  hablado  por  medio  de  su  siervo 

Ahías, el profeta.

19

 Los demás hechos de Jeroboam, cómo 

guerreó y cómo reinó, he aquí están es-

critos  en  el  rollo  de  las  Crónicas  de  los 

reyes de Israel.

20

 Los  días  que  reinó  Jeroboam  fueron 

veintidós años, y durmió con sus padres, 

y su hijo Nadab reinó en su lugar.

21

 Roboam  ben  Salomón  reinó  en  Judá. 

Roboam tenía cuarenta y un años cuando 

comenzó a reinar, y reinó diecisiete años 

en Jerusalem, la ciudad que YHVH había 

escogido de entre todas las tribus de Is-

rael, para poner su Nombre allí. El nom-

bre de su madre era Naama, amonita.

22

 E  hizo  Judá  lo  malo  ante  los  ojos  de 

YHVH;  y  lo  provocaron  a  celos  con  sus 

pecados que cometieron, más que los que 

habían cometido sus padres,

23

 por cuanto ellos también se construye-

ron lugares altos, piedras rituales y aseras 

en  cada  serranía  y  debajo  de  todo  árbol 

frondoso.

24

 También había en el país varones con-

sagrados  a  la  prostitución  ritual,°  que 

hacían conforme a todas las prácticas abo-

minables de los pueblos que YHVH había 

echado de delante de los hijos de Israel.

25

 En  el  año  quinto  del  reinado  de  Ro-

boam, aconteció que Sisac, rey de Egipto, 

subió contra Jerusalem;

26

 y se apoderó de los tesoros de la Casa 

de YHVH, y de los tesoros de la casa del 

rey. Se lo llevó todo; incluso todos los es-

cudos de oro que había hecho Salomón.

27

 En lugar de ellos, el rey Roboam hizo 

escudos de bronce, y los confió en mano 

de los capitanes de la guardia, que prote-

gían la entrada de la casa del rey.

28

 Y sucedía que cuantas veces el rey en-

traba en la Casa de YHVH, los de la guar-

dia los portaban; luego los devolvían a la 

cámara de la guardia.

29

 Los demás hechos de Roboam y todas 

las cosas que hizo, ¿no están escritos en 

el  rollo  de  las  Crónicas  de  los  reyes  de 

Judá?

30

 Y  hubo  guerra  entre  Roboam  y  Jero-

boam todos los días.

31

 Y Roboam durmió con sus padres y fue 

sepultado con sus padres en la ciudad de 

David. El nombre de su madre era Naa-

ma, amonita; y reinó en su lugar Abiam 

su hijo.

Abiam y Asa, reyes de Judá 

Nadab y Baasa, reyes de Israel

15

En el año decimoctavo del rey Je-

roboam ben Nabat, Abiam comen-

zó a reinar sobre Judá.

2

 Y reinó tres años en Jerusalem. El nom-

bre  de  su  madre  era  Maaca  hija  de  Abi-

shalom.°

3

 Y anduvo en todos los pecados que había 

cometido su padre antes de él. Su corazón 

no fue íntegro con YHVH su Dios, como 

el corazón de David su padre.

4

 Pero por amor a David, YHVH su Dios le 

dio una lámpara en Jerusalem, levantando 

14.14 En efecto, Baasa, que había de destruir la casa de Jeroboam, había nacido ya. 

→15.27 ss.  14.15 Esto es, el Éufrates

14.24 

→Dt.23.17-18.  15.2 Esto es, padre de paz. Variante del nombre Absalón →15.10; 2 Cr.11.20. 


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1 Reyes 15:30

371

a un hijo suyo después de él, y mantenien-

do en pie a Jerusalem,

5

 porque David había hecho lo recto ante 

los  ojos  de  YHVH,  sin  apartarse  de  nin-

guna cosa que Él le había ordenado todos 

los días de su vida, excepto en el asunto 

de Urías heteo.

6

 Y  hubo  guerra  entre  Roboam°  y  Jero-

boam todos los días de su vida.

7

 Los demás hechos de Abías° y todas las 

cosas  que  hizo,  ¿no  están  escritos  en  el 

rollo de las Crónicas de los reyes de Judá? 

Y hubo guerra entre Abías y Jeroboam.

8

 Y Abías durmió con sus padres, y lo se-

pultaron en la ciudad de David; y Asa su 

hijo reinó en su lugar.

9

 En el vigésimo año de Jeroboam rey de 

Israel, Asa comenzó a reinar sobre Judá;

10

 y reinó cuarenta y un años en Jerusa-

lem. El nombre de su madre° era Maaca, 

hija de Abi-shalom.

11

 Y  Asa  hizo  lo  recto  ante  los  ojos  de 

YHVH, como David su padre.

12

 Barrió del país a los varones consagra-

dos a la prostitución ritual, y quitó todos 

los ídolos que habían hecho sus padres.

13

 También depuso a su madre Maaca de 

ser reina madre, porque ella había hecho 

una  abominable  imagen  de  una  asera,  y 

Asa taló la imagen abominable y la quemó 

junto al arroyo de Cedrón.

14

 Pero  los  lugares  altos  no  fueron  qui-

tados, sin embargo, el corazón de Asa fue 

íntegro para con YHVH todos sus días.

15

 Y trajo a la Casa de YHVH lo que su pa-

dre había consagrado, y lo que él mismo 

había consagrado: plata, oro y utensilios.

16

 Y hubo guerra entre Asa y Baasa, rey 

de Israel, todos sus días.

17

 Baasa, rey de Israel, subió contra Judá 

y fortificó a Ramá, para bloquear a cuan-

tos intentaran acceder a Asa, rey de Judá.

18

 Asa  tomó  entonces  toda  la  plata  y  el 

oro  que  habían  quedado  en  los  tesoros 

de la Casa de YHVH, juntamente con los 

tesoros  de  la  casa  real,  y  entregándolos 

en mano de sus servidores, el rey Asa los 

envió a Ben-hadad, hijo de Tabrimón, hijo 

de Hezión, rey de Siria, que habitaba en 

Damasco, diciendo:

19

 ¡Haya alianza entre tú y yo, como en-

tre mi padre y tu padre! He aquí, te envío 

un obsequio de plata y oro. ¡Ve y rompe tu 

alianza con Baasa rey de Israel, para que 

se aparte de mí!

20

 Y Ben-hadad escuchó al rey Asa, y envió 

a los capitanes de sus ejércitos contra las 

ciudades de Israel, y atacó a Ijón, a Dan, a 

Abel-bet-maaca y a toda la región de Kine-

ret,° con todo el territorio de Neftalí.

21

 Y sucedió que cuando Baasa oyó esto, 

cesó  de  fortificar  a  Ramá,  y  permaneció 

en Tirsa.

22

 Entonces  el  rey  Asa  convocó  a  todo 

Judá sin excepción, y se llevaron las pie-

dras y la madera de Ramá, con que Baasa 

la  estaba  fortificando,  y  con  ellas  el  rey 

Asa fortificó Geba de Benjamín y Mizpa.

23

 Todos  los  demás  hechos  de  Asa,  todo 

su poderío, y las cosas que hizo, y las ciu-

dades que fortificó, ¿no están escritos en 

el  rollo  de  las  Crónicas  de  los  reyes  de 

Judá? Sin embargo, en su vejez, enfermó 

de sus pies.

24

 Y Asa durmió con sus padres, y fue se-

pultado con ellos en la ciudad de David su 

padre, y reinó en su lugar su hijo Josafat.

25

 En el año segundo de Asa, rey de Judá, 

Nadab ben Jeroboam comenzó a reinar so-

bre Israel, y reinó sobre Israel dos años.

26

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

andando en el camino de su padre, y por 

sus pecados hizo pecar a Israel.

27

 Y Baasa ben Ahías, de la tribu de Isacar, 

conspiró contra él, y Baasa lo mató en Gi-

betón, ciudad de los filisteos, cuando Na-

dab e Israel entero asediaban a Gibetón.

28

 En  el  tercer  año  de  Asa  rey  de  Judá, 

Baasa lo mató, y reinó en su lugar.

29

 Y sucedió que tan pronto como fue rey, 

mató a todos los de la casa de Jeroboam. 

No dejó con vida a ninguno de los de Je-

roboam hasta destruirlos, conforme a la 

palabra que YHVH había hablado por me-

dio de su siervo Ahías silonita,

30

 a causa de los pecados con que había 

pecado Jeroboam, y por los cuales había 

hecho pecar a Israel, y por la provocación 

con  que  provocó  a  ira  a  YHVH,  Dios  de 

Israel.

15.6  Esto  es,  la  casa  de  Roboam;  es  decir,  Abías.  LXX  registra  Abías 

→2  Cr.13.2.  15.7  TM  Abiam.  →2  Cr.12.16;  14.1. 

15.10 Aquí, la abuela de Asa es llamada su madre.  15.20 Esto es, Galilea.


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1 Reyes 15:31

372

31

 Los demás hechos de Nadab, y todas las 

cosas que hizo, ¿no están escritos en el ro-

llo de las Crónicas de los reyes de Israel?

32

 Y hubo guerra entre Asa y Baasa, rey 

de Israel, todos sus días.

33

 En el tercer año de Asa, rey de Judá, 

comenzó a reinar Baasa ben Ahías sobre 

todo Israel en Tirsa, y reinó veinticuatro 

años.

34

 Él hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

y anduvo en el camino de Jeroboam, y en 

su pecado hizo pecar a Israel.

Desde Baasa hasta Acab

16

La palabra de YHVH fue dirigida a 

Jehú ben Hanani contra Baasa, di-

ciendo:

2

 Por cuanto Yo te levanté del polvo y te es-

tablecí como caudillo de mi pueblo Israel, 

pero tú has andado en el camino de Jero-

boam, y has hecho pecar a mi pueblo Is-

rael, provocándome a ira con sus pecados,

3

 he aquí que Yo barreré por completo a 

la posteridad de Baasa y a la posteridad de 

su casa, y dejaré tu casa como la casa de 

Jeroboam ben Nabat.

4

 Al que de Baasa muera en la ciudad, lo 

comerán los perros, y al que muera en el 

campo, lo comerán las aves de los cielos.

5

 Los  demás  hechos  de  Baasa,  las  cosas 

que hizo y su poderío, ¿no están escritos 

en el rollo de las Crónicas de los reyes de 

Israel?

6

 Y  durmió  Baasa  con  sus  padres,  y  fue 

sepultado en Tirsa, y Ela su hijo reinó en 

su lugar.

7

 También por medio del profeta Jehú ben 

Hanani llegó la palabra de YHVH contra 

Baasa y contra su casa, no sólo por toda la 

maldad que hizo ante los ojos de YHVH, 

provocándole con la obra de sus manos, 

siendo como los de la casa de Jeroboam, 

sino por haberla destruido.

8

 El  año  vigésimo  sexto  de  Asa,  rey  de 

Judá, comenzó a reinar Ela ben Baasa so-

bre Israel en Tirsa, y reinó dos años.

9

 Y su servidor Zimri, capitán de la mitad 

de los carros de guerra, conspiró contra 

él  en  ocasión  en  que  éste  se  hallaba  en 

Tirsa bebiendo hasta embriagarse en casa 

de Arsa, mayordomo del palacio en Tirsa.

10

 Así pues, irrumpió Zimri, y lo hirió y lo 

mató, en el año vigésimo séptimo de Asa, 

rey de Judá, y reinó en su lugar.

11

 Y aconteció que al comenzar a reinar, 

en cuanto se sentó sobre el trono, mató a 

todos los de la casa de Baasa, sin dejar de 

ella un sólo meante a la pared, ni de sus 

parientes redentores, ni de sus amigos.

12

 Así  Zimri  destruyó  a  todos  los  de  la 

casa de Baasa, conforme a la palabra que 

YHVH  había  hablado  contra  Baasa  por 

medio del profeta Jehú;

13

 por todos los pecados de Baasa y los pe-

cados de su hijo Ela, quienes pecaron e hi-

cieron pecar a Israel, provocando a YHVH, 

Dios de Israel, con sus ídolos vanos.

14

 Los demás hechos de Ela y todas las co-

sas que hizo, ¿no están escritos en el rollo 

de las Crónicas de los reyes de Israel?

15

 En el año vigésimo séptimo de Asa, rey 

de Judá, Zimri reinó siete días en Tirsa, 

mientras el pueblo estaba acampado con-

tra Gibetón, que era de los filisteos.

16

 Pero cuando el pueblo acampado oyó 

decir: ¡Zimri ha conspirado y ha matado 

al  rey!,  todo  Israel  en  aquel  mismo  día 

hizo rey sobre Israel a Omri, general del 

ejército, en medio del campamento.

17

 Luego  Omri  subió  desde  Gibetón,  y 

con él todo Israel, y sitiaron Tirsa.

18

 Y  sucedió  que  al  ver  que  la  ciudad 

había sido capturada, Zimri entró en la 

parte fortificada de la casa real y prendió 

fuego a la casa real con él adentro, y así 

murió,

19

 a causa de sus pecados que había co-

metido haciendo lo malo ante los ojos de 

YHVH, y andando en el camino de Jero-

boam, y en el pecado que cometió hacien-

do pecar a Israel.

20

 Los demás hechos de Zimri y la cons-

piración que hizo, ¿no están escritos en el 

rollo de las Crónicas de los reyes de Israel?

21

 Entonces  el  pueblo  de  Israel  se  divi-

dió en dos facciones: La mitad del pueblo 

seguía a Tibni ben Ginat, para hacer que 

reinara, y la otra mitad seguía a Omri.

22

 Pero el pueblo que seguía a Omri pudo 

más que el que seguía a Tibni ben Ginat. 

Tibni murió y Omri reinó.

23

 En  el  año  trigésimo  primero  de  Asa, 

rey de Judá, Omri comenzó a reinar sobre 

Israel, y reinó doce años. Seis años reinó 

en Tirsa;

24

 y compró a Semer el monte de Sama-

ria  por  dos  talentos  de  plata;  edificó  en 

el monte, y a la ciudad que edificó puso 


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1 Reyes 17:17

373

por nombre Samaria, según el nombre de 

Semer, dueño del monte.

25

 Omri  hizo  lo  malo  ante  los  ojos  de 

YHVH,  y  actuó  peor  que  todos  los  que 

fueron antes que él,

26

 pues anduvo en todo el camino de Jero-

boam ben Nabat, y en los pecados con que 

hizo pecar a Israel, provocando a YHVH, 

Dios de Israel, con sus ídolos vanos.

27

 Los demás hechos de Omri, las cosas 

que hizo y el poderío que logró, ¿no están 

escritos en el rollo de las Crónicas de los 

reyes de Israel?

28

 Y Omri durmió con sus padres, y fue 

sepultado  en  Samaria,  y  en  lugar  suyo 

reinó Acab su hijo.

29

 Acab ben Omri comenzó a reinar sobre 

Israel en el año trigésimo octavo de Asa, 

rey de Judá, y Acab ben Omri reinó sobre 

Israel en Samaria veintidós años.

30

 Y Acab ben Omri hizo lo malo ante los 

ojos de YHVH, más que todos los que fue-

ron antes de él;

31

 porque le fue cosa ligera andar en los 

pecados de Jeroboam ben Nabat, sino que 

tomó por mujer a Jezabel hija de Etbaal, 

rey de los sidonios; y fue a servir a Baal, y 

se postraba ante él.

32

 Y erigió un altar a Baal en el templo de 

Baal que había edificado en Samaria.

33

 Acab hizo también un árbol ritual de 

Asera, provocando a ira a YHVH, Dios de 

Israel, más que todos los reyes de Israel 

que habían sido antes de él.

34

 En ese tiempo Hiel de Bet-’El reedificó 

Jericó: a costa de Abiram su primogénito 

puso los cimientos, y a costa de Segub su 

hijo menor levantó sus puertas, conforme 

a la palabra que YHVH había hablado por 

medio de Josué ben Nun.°

Elías

17

Entonces  Elías  tisbita,  que  era  de 

los  moradores  de  Galaad,  dijo  a 

Acab: ¡Vive YHVH, Dios de Israel, en cuya 

presencia estoy, que no habrá rocío ni llu-

via en estos años, sino por mi palabra!

2

 Y la palabra de YHVH vino a él diciendo:

3

 Apártate  de  aquí,  dirígete  al  oriente  y 

escóndete junto al arroyo de Querit, que 

está frente al Jordán.

4

 Y sucederá que beberás del arroyo, y Yo 

he mandado a los cuervos que te susten-

ten allí.

5

 Y  fue  e  hizo  conforme  a  la  palabra  de 

YHVH, pues partió y vivió junto al arroyo 

de Querit, que está frente al Jordán.

6

 Y los cuervos le traían pan y carne por 

la mañana, y pan y carne al atardecer, y 

bebía del arroyo.

7

 Y sucedió que pasados los días° se secó 

el  arroyo,  porque  no  había  llovido  en  la 

tierra.

8

 Y  la  palabra  de  YHVH  vino  a  Elías  di-

ciendo:

9

 Levántate, ve a Sarepta de Sidón y mora 

allí;  he  aquí,  Yo  he  ordenado  allí  a  una 

mujer viuda que te sustente.

10

 Y él se levantó y fue a Sarepta. Y cuan-

do llegó a la puerta de la ciudad, he aquí 

una  mujer  viuda  estaba  allí  recogiendo 

leña, y él la llamó y le dijo: Te ruego que 

me traigas un poco de agua en un vaso, 

para que beba.

11

 Y al ir a traérsela, él la volvió a llamar, 

y le dijo: Te ruego que me traigas un bo-

cado de pan en tu mano.

12

 Pero  ella  respondió:  ¡Vive  YHVH,  tu 

Dios, que no tengo pan cocido! Solamen-

te tengo un puñado de harina en una ti-

naja y un poco de aceite en la vasija; y he 

aquí  estaba  recogiendo  un  par  de  leños, 

para entrar y prepararlo para mí y para mi 

hijo, para que comamos y muramos.

13

 Elías le dijo: No temas; ve, haz como 

has  dicho,  sólo  que  de  ello  hazme  a  mí 

primero  una  torta  pequeña  y  tráemela; 

después harás para ti y para tu hijo;

14

 porque YHVH, Dios de Israel, dice así: 

La harina de la tinaja no escaseará ni el 

aceite  de  la  vasija  disminuirá,°  hasta  el 

día  en  que  YHVH  mande  lluvia  sobre  la 

faz de la tierra.

15

 Y ella fue e hizo conforme a la palabra 

de Elías; y comieron él, ella, y su casa mu-

chos días.

16

 La harina de la tinaja no escaseó, ni el 

aceite de la vasija menguó, conforme a la 

palabra que YHVH había hablado por me-

dio de Elías.

17

 Después de estas cosas, aconteció que 

el  hijo  de  la  mujer  dueña  de  casa  cayó 

16.34 

→Jos.6.26.  17.7 Esto es, un año.  17.14 Lit. la tinaja de la harina no escaseará ni la vasija de aceite disminuirá


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1 Reyes 17:18

374

enfermo, y su enfermedad fue tan grave 

que no quedó aliento en él.

18

 Y ella dijo a Elías: ¿Qué tengo que ver 

contigo, varón de Dios? ¿Has venido aquí 

a recordarme mis pecados y hacer morir 

a mi hijo?

19

 Y  él  le  respondió:  ¡Dame  tu  hijo!  Y 

lo tomó del seno de ella, lo llevó al alti-

llo donde vivía, y lo acostó en su propia 

cama.

20

 Y clamando a YHVH, dijo: ¡Oh YHVH, 

Dios  mío!  ¿Aun  a  la  viuda  en  cuya  casa 

estoy  hospedado  has  afligido,  haciendo 

morir a su hijo?

21

 Luego  se  tendió  tres  veces  sobre  el 

niño,  y  clamó  a  YHVH  diciendo:  ¡Oh 

YHVH, Dios mío, te ruego, haz volver el 

alma de este niño a él!

22

 Y YHVH escuchó la voz de Elías, y el 

alma del niño volvió a él, y revivió.

23

 Entonces Elías tomó al niño, y baján-

dolo del altillo de la casa, lo entregó a su 

madre;  y  Elías  dijo:  ¡Mira,  tu  hijo  está 

vivo!

24

 Y la mujer dijo a Elías: ¡Ahora sé que 

tú eres varón de Dios, y que la palabra de 

YHVH es verdad en tu boca!

Los profetas de Baal

18

Pasados  muchos  días,°  al  tercer 

año,  la  palabra  de  YHVH  llegó  a 

Elías,  diciendo:  Ve,  preséntate  a  Acab,  y 

enviaré lluvia sobre la faz de la tierra.

2

 Y fue Elías a presentarse ante Acab. Y la 

hambruna era aguda en Samaria.

3

 Y Acab llamó a Abdías, que estaba a car-

go de la casa, y temía en gran manera a 

YHVH,

4

 porque  cuando  Jezabel  exterminaba  a 

los profetas de YHVH, Abdías tomó a cien 

profetas y los ocultó de cincuenta en cin-

cuenta en la cueva, y los sustentó con pan 

y agua.

5

 Y Acab dijo a Abdías: Ve por la tierra, a 

todos los manantiales de agua, y a todos 

los arroyos; quizás hallemos pasto y sal-

vemos a los caballos y a las mulas, y no 

perdamos todas las bestias.

6

 Así  dividieron  entre  ellos  el  territorio 

por el que pasaban: Acab iba solo por un 

camino, y Abdías iba por otro camino.

7

 Y cuando Abdías iba por el camino, he 

aquí Elías venía a su encuentro; y como lo 

reconoció, cayó sobre su rostro y le pre-

guntó: ¿Eres tú mi señor Elías?

8

 Y le respondió: Soy yo. Ve y di a tu se-

ñor: Elías está aquí.

9

 Pero él dijo: ¿En qué he pecado para que 

entregues  a  tu  siervo  en  mano  de  Acab 

para que me mate?

10

 ¡Vive YHVH tu Dios, que no hay nación 

ni reino adonde mi señor no haya enviado 

a buscarte! Cuando ellos decían: No está 

aquí, hacía jurar al reino y a la nación que 

no te habían hallado.

11

 ¡Y ahora me dices: Ve y di a tu señor, 

Elías está aquí!

12

 Lo que sucederá es que después que yo 

me haya alejado de ti, el Espíritu de YHVH 

te llevará donde yo no sepa, de modo que 

cuando yo vaya a decirle a Acab, él no te 

podrá hallar y me matará. Aunque yo, tu 

siervo, temo a YHVH desde mi juventud.

13

 ¿No le fue dicho a mi señor lo que hice 

cuando Jezabel mataba a los profetas de 

YHVH, cómo escondí en la cueva a cien 

de ellos de cincuenta en cincuenta y los 

sustenté con pan y agua?

14

 ¿Y dices que diga a mi amo: Elías está 

aquí, para que me mate?

15

 Pero Elías respondió: ¡Vive YHVH Se-

baot, en cuya presencia estoy, que hoy me 

presentaré ante él!

16

 Entonces  Abdías  fue  al  encuentro  de 

Acab y le informó; y Acab fue al encuen-

tro de Elías.

17

 Y sucedió que cuando Acab vio a Elías, 

le dijo: ¿Eres tú el que perturbas a Israel?

18

 Y él respondió: No he perturbado yo a 

Israel, sino tú y la casa de tu padre, que 

abandonaron los mandamientos de YHVH 

para seguir a los baales.

19

 Ahora pues, envía y convócame a todo 

Israel en el monte Carmelo, y a los cua-

trocientos  cincuenta  profetas  de  Baal,  y 

los  cuatrocientos  profetas  de  las  aseras, 

los cuales comen a la mesa de Jezabel.

20

 Y convocó Acab a todos los hijos de Is-

rael, y reunió a los profetas en el monte 

Carmelo.

21

 Y  Elías  se  acercó  a  todo  el  pueblo,  y 

dijo: ¿Hasta cuándo andaréis cojeando en 

18.1 Esto es, los tres años de sequía.


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1 Reyes 18:44

375

dos  muletas?°  Si  YHVH  es  Ha-’Elohim, 

seguidle; y si lo es Baal, seguidle a él. Pero 

el pueblo no le respondió palabra.

22

 Entonces Elías dijo al pueblo: Sólo yo 

he quedado como profeta de YHVH, pero 

de los profetas de Baal hay cuatrocientos 

cincuenta hombres.

23

 Dennos  pues  dos  novillos,  y  escojan 

ellos  un  novillo  para  sí,  córtenlo  en  pe-

dazos y pónganlo sobre la leña, pero no 

pongan  fuego  debajo;  y  yo  prepararé  el 

otro novillo, y lo pondré sobre la leña, y 

tampoco pondré fuego debajo.

24

 Luego invocad vosotros el nombre de 

vuestro dios, y yo invocaré el nombre de 

YHVH, y el Dios que responda con fuego, 

¡ése es Ha-’Elohim! Y todo el pueblo res-

pondió y dijo: ¡Bien dicho!

25

 Y Elías dijo a los profetas de Baal: Esco-

geos un novillo para vosotros, y preparadlo 

primero, porque sois muchos, e invocad el 

nombre de vuestro dios, pero no pongáis 

fuego debajo.

26

 Y tomaron el novillo que se les dio, y lo 

prepararon, e invocaron el nombre de Baal 

desde la mañana hasta el mediodía, dicien-

do: ¡Baal, respóndenos! Pero no se oía ni una 

voz  ni  una  respuesta,  mientras  brincaban 

en derredor del altar que habían hecho.

27

 Y sucedió que al mediodía Elías empezó 

a burlarse de ellos, diciendo: ¡Gritad más 

fuerte! Baal es dios, pero quizá esté medi-

tando, o quizá fue a hacer sus necesidades, 

o quizá esté de viaje, o tal vez esté dormido 

y haya que despertarlo.

28

 Y ellos clamaban con fuerza, y se sajaban 

según su costumbre con cuchillos y lance-

tas, hasta que la sangre brotaba de ellos.

29

 Y sucedió que pasado el mediodía, en-

traron en trance° hasta la hora de ofrecer 

el sacrifico de la tarde, pero no hubo voz, 

ni respuesta, ni nadie que escuchara.

30

 Entonces  dijo  Elías  a  todo  el  pueblo: 

¡Acercaos a mí! Y todo el pueblo se acercó 

a él; y reparó el altar de YHVH que había 

sido derribado.

31

 Y  Elías  tomó  doce  piedras,  conforme 

al número de las tribus de los hijos de Ja-

cob, al cual le fue dada palabra de YHVH 

diciendo, Israel será tu nombre.

32

 Y  con  las  piedras  construyó  un  altar 

en el nombre de YHVH, e hizo una zanja 

alrededor  del  altar,  en  que  cupieran  dos 

medidas de grano.

33

 Preparó luego la leña, cortó el novillo 

en trozos, y los colocó sobre la leña.

34

 Y  dijo:  Llenad  cuatro  cántaros  con 

agua y derramadla sobre el holocausto y 

sobre la leña. Y agregó: Hacedlo por se-

gunda vez, y lo hicieron por segunda vez. 

Dijo aún: Hacedlo por tercera vez, y lo hi-

cieron por tercera vez.

35

 Y corrió el agua alrededor del altar, y 

también la zanja se llenó de agua.

36

 Cuando  llegó  la  hora  de  presentar  la 

ofrenda  vegetal,  sucedió  que  el  profeta 

Elías  se  acercó,  y  dijo:  ¡Oh  YHVH,  Dios 

de Abraham, de Isaac, y de Israel, sea hoy 

manifiesto que Tú eres ’Elohim en Israel, 

y que yo soy tu siervo, y que he hecho to-

das estas cosas por tu palabra!

37

 ¡Respóndeme, oh YHVH, respóndeme! 

Y  este  pueblo  sabrá  que  Tú,  oh  YHVH, 

eres  Ha-’Elohim,  y  que  Tú  haces  volver 

sus corazones.

38

 Entonces cayó fuego de YHVH, y con-

sumió el holocausto, y la leña, y las pie-

dras, y el polvo, y lamió el agua que había 

en la zanja.

39

 Al  verlo,  toda  la  gente  cayó  sobre  su 

rostro,  y  dijo:  ¡YHVH  es  Ha-’Elohim! 

¡YHVH es Ha-’Elohim!

40

 Y Elías les dijo: ¡Prended a los profetas 

de Baal! ¡Que ninguno escape! Y los pren-

dieron, y Elías bajó con ellos al arroyo de 

Cisón, y allí los degolló.

41

 Y  Elías  dijo  a  Acab:  ¡Levántate,  come 

y bebe, porque hay sonido de abundancia 

de lluvia!

42

 Y Acab subió a comer y a beber; y Elías 

subió a la cumbre del Carmelo, y postrán-

dose  en  tierra,  puso  su  rostro  entre  sus 

rodillas;

43

 y dijo a su siervo: Sube ahora, y mira 

atentamente  hacia  el  mar;  y  él  subió,  y 

miró atentamente, y dijo: No hay nada. Y 

él volvió a decir siete veces: Vuelve.

44

 Y aconteció que a la séptima vez, dijo: 

He aquí, sube una nube del mar, tan pe-

queña como la mano de un hombre. Y él 

18.21 Es decir, hasta cuando vacilaréis entre dos opiniones.  18.29 Ndelirio profético


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1 Reyes 18:45

376

dijo: Ve y di a Acab: Unce tu carro° y baja, 

para que la lluvia no te detenga.

45

 Y mientras tanto, ocurrió que los cie-

los  se  oscurecieron  con  nubes  y  viento, 

y  hubo  una  gran  lluvia;  y  Acab  subió  al 

carruaje y se fue a Jezreel.

46

 Pero  la  mano  de  YHVH  estuvo  sobre 

Elías, de modo que ciñó sus lomos y co-

rrió delante de Acab hasta la entrada de 

Jezreel.

La huida a Horeb 

Eliseo

19

Acab informó a Jezabel todo lo que 

había  hecho  Elías,  y  cómo  había 

matado a espada a todos los profetas.

2

 Entonces Jezabel envió un mensajero a 

Elías, diciendo: ¡Así me hagan los dioses, 

y aun me añadan, si mañana a esta hora 

no he hecho tu vida como la vida de uno 

de ellos!

3

 Y él tuvo temor, y se levantó y huyó para 

salvar su vida; y llegó a Beerseba (que es 

de Judá) y dejó allí a su siervo.

4

 Y él se fue solo al desierto, donde andu-

vo todo un día; y llegó y se sentó debajo de 

un enebro, y ansiando morirse, dijo: ¡Bas-

ta ya, oh YHVH! ¡Quítame ahora la vida, 

porque no soy mejor que mis padres!

5

 Y  recostándose  debajo  del  enebro,  se 

quedó dormido; y he aquí el ángel lo tocó 

y le dijo: ¡Levántate y come!

6

 Y miró atentamente, y he aquí a su ca-

becera una torta cocida sobre las ascuas, 

y un cántaro de agua; y comió y bebió, y 

volvió a recostarse.

7

 Y  el  ángel  de  YHVH  vino  por  segunda 

vez, lo tocó, y le dijo: ¡Levántate y come, 

porque largo camino te resta!

8

 Y él se levantó, y comió y bebió; y con 

la  fuerza  de  esa  comida  anduvo  cuaren-

ta días y cuarenta noches hasta Horeb, el 

monte de Dios.

9

 Y  allí  entró  en  una  cueva,  donde  pasó 

la noche. Y he aquí que vino a él la pala-

bra de YHVH, diciendo: ¿Qué haces aquí, 

Elías?

10

 Y él respondió: He sentido un vivo celo 

por YHVH ’Elohe Sebaot,° porque los hi-

jos  de  Israel  han  abandonado  tu  pacto, 

han derribado tus altares, y han matado a 

espada a tus profetas; y yo solo he queda-

do, y me buscan para quitarme la vida.°

11

 Y Él dijo: Sal afuera y ponte de pie en 

el monte, delante de YHVH. Y he aquí que 

YHVH  pasaba:  y  un  grande  y  poderoso 

viento destrozaba las montañas y rompía 

las  peñas  delante  de  YHVH,  pero  YHVH 

no estaba en el viento. Después del viento 

hubo un terremoto, pero YHVH no estaba 

en el terremoto.

12

 Después del terremoto hubo un fuego, 

pero YHVH no estaba en el fuego. Y des-

pués del fuego hubo un susurro apacible 

y delicado.

13

 Y sucedió que al oírlo, Elías cubrió su 

rostro con su manto, y salió y estuvo de 

pie  a  la  entrada  de  la  cueva.  Y  he  aquí, 

vino a él una voz, y le preguntó: ¿Qué ha-

ces aquí, Elías?

14

 Y él respondió: He sentido un vivo celo 

por YHVH ’Elohe Sebaot, porque los hijos 

de  Israel  han  abandonado  tu  pacto,  han 

derribado tus altares, y han matado a es-

pada a tus profetas; y yo solo he quedado, 

y me buscan para quitarme la vida.

15

 Y YHVH le dijo: Ve, regresa por tu ca-

mino por el desierto de Damasco, y cuan-

do  llegues,  ungirás  a  Hazael  por  rey  de 

Siria.

16

 También ungirás como rey de Israel a 

Jehú  ben  Nimsi;  y  ungirás  a  Eliseo  ben 

Safat, de Abel-mehola, como profeta en tu 

lugar.

17

 Y sucederá que el que escape de la es-

pada de Hazael, lo matará Jehú; y el que 

escape  de  la  espada  de  Jehú,  lo  matará 

Eliseo.

18

 Y  Yo  he  hecho  que  queden  en  Israel 

siete  mil,  cuyas  rodillas  no  se  doblaron 

ante Baal y cuyas bocas no lo besaron.

19

 Y partiendo de allí, halló a Eliseo ben 

Safat,  que  araba  con  doce  yuntas  delan-

te de él, y él tenía la duodécima. Pasando 

Elías hacia él, echó su manto sobre él.

20

 Entonces  él  dejó  los  bueyes,  fue  co-

rriendo tras Elías y dijo: Besaré ahora a 

mi padre y a mi madre, y luego te seguiré. 

Él le dijo: Ve, vuélvete; pues, ¿qué te he 

hecho yo?

21

 Y dejó de ir tras él. Luego tomó la yun-

ta de bueyes y los sacrificó; y con el arado 

18.44 .carro.  19.10 

→ § 1-4.  19.10 →Ro.11.3.


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1 Reyes 20:23

377

de los bueyes cocinó su carne y la dio a 

la gente para que comiera. Después se le-

vantó y fue tras Elías, y lo servía.

Acab y los sirios

20

Ben-hadad, rey de Siria, concentró 

todo su ejército, y acompañado de 

treinta y dos reyes vasallos, con caballe-

ría y carros, marchó contra Samaria, y le 

puso sitio y la atacó.

2

 Y envió mensajeros a la ciudad, a Acab, 

rey de Israel, diciéndole:

3

 Así  ha  dicho  Ben-hadad:  Tu  plata  y  tu 

oro son míos; tus mujeres y los mejores 

de tus hijos son míos.

4

 Y el rey de Israel respondió y dijo: Como 

tú dices, oh mi señor el rey, yo soy tuyo 

con todo lo que tengo.

5

 Y los mensajeros volvieron otra vez y di-

jeron: Así habló Ben-hadad, diciendo: Por 

cierto envié a decirte: Tu plata y tu oro, 

también  tus  mujeres  y  tus  hijos  me  los 

has de dar.

6

 Porque si no, mañana a esta hora te en-

viaré  mis  siervos,  los  cuales  registrarán 

tu casa y las casas de tus siervos, y toma-

rán  y  se  llevarán  cuanto  haya  agradable 

a tus ojos.

7

 Y el rey de Israel llamó a todos los ancia-

nos del país, y les dijo: Reconoced ahora y 

ved  cómo  éste  no  busca  sino  hacer  daño; 

porque exige° mis mujeres y mis hijos, y mi 

plata y mi oro, sin habérselo yo negado.

8

 Y  todos  los  ancianos  y  todo  el  pueblo 

respondieron: No lo escuches ni accedas.

9

 Entonces él respondió a los mensajeros 

de  Ben-hadad:  Decid  a  mi  señor  el  rey: 

Haré  todo  lo  que  exigiste  a  tu  siervo  al 

principio,  pero  esto  no  lo  puedo  hacer. 

Los mensajeros fueron y le dieron la res-

puesta.

10

 Y  Ben-hadad  envió  a  decirle:  ¡Así  me 

hagan  los  dioses  y  aun  me  añadan,  que 

el polvo de Samaria no bastará para lle-

nar las manos de todo el pueblo que me 

sigue!

11

 Pero el rey de Israel respondió y dijo: 

Decidle: No se jacte tanto el que se ciñe 

las armas como el que se las desciñe.

12

 Y  sucedió  que  él  oyó  estas  palabras 

mientras  bebía  con  los  reyes  en  las 

tiendas,  y  dijo  a  sus  servidores:  ¡Tomad 

posiciones! Y tomaron posiciones contra 

la ciudad.

13

 Y he aquí, un profeta se acercó a Acab, 

rey  de  Israel,  y  le  dijo:  Así  dice  YHVH: 

¿Ves todo ese inmenso ejército? He aquí, 

Yo lo entrego hoy en tu mano, para que 

reconozcas que Yo soy YHVH.

14

 Y  Acab  dijo:  ¿Por  medio  de  quién?  Y 

él dijo: Así dice YHVH: Mediante los asis-

tentes de los capitanes de las provincias. 

Y  dijo:  ¿Quién  entablará  la  batalla?  Y  él 

respondió: Tú.

15

 Entonces pasó revista a los asistentes 

de los capitanes de las provincias, y eran 

doscientos treinta y dos. Después de ellos 

pasó revista a todo el pueblo, a todos los 

hijos de Israel, y eran siete mil.

16

 Y éstos salieron al mediodía, mientras 

Ben-hadad  estaba  bebiendo  hasta  embo-

rracharse en las tiendas con los reyes, los 

treinta y dos reyes que habían venido en 

su ayuda.

17

 Los  asistentes  de  los  capitanes  de  las 

provincias salieron primero. Y Ben-hadad 

había enviado a algunos, quienes le infor-

maron diciendo: Unos hombres han sali-

do de Samaria.

18

 Y él dijo: Si han salido en son de paz, 

prendedlos vivos; y si han salido a comba-

tir, prendedlos vivos también.

19

 Salieron pues de la ciudad los asisten-

tes  de  los  capitanes  de  las  provincias,  y 

tras ellos salió el ejército.

20

 Y cada cual mató a su hombre; y los si-

rios huyeron, e Israel los persiguió. Pero 

Ben-hadad  rey  de  Siria  escapó  a  caballo 

con algunos jinetes.

21

 Y el rey de Israel salió y atacó a la caba-

llería y a los carros de guerra, ocasionan-

do una gran derrota a los sirios.

22

 Y el profeta se acercó al rey de Israel, y 

le dijo: Ve, cobra ánimo; considera y mira 

lo que has de hacer, porque el rey de Siria 

volverá a la vuelta del año, probablemen-

te en la primavera.

23

 Y los siervos del rey de Siria le dijeron: 

Sus dioses son dioses de los montes; por 

eso fueron más fuertes que nosotros, pero 

si combatimos contra ellos en la llanura, 

sin duda seremos más fuertes que ellos.

20.7 Lit. envía.


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1 Reyes 20:24

378

24

 Haz  pues  así:  Saca  a  cada  uno  de  los 

reyes de su puesto, y pon capitanes en su 

lugar.

25

 Y organiza para ti otro ejército, como 

el  que  has  perdido,  caballo  por  caballo 

y  carro  por  carro;  y  pelearemos  contra 

ellos  en  la  llanura,  y  sin  duda  seremos 

más fuertes que ellos. Y escuchó la voz de 

ellos, y lo hizo así.

26

 Y  a  la  vuelta  del  año,  aconteció  que 

Ben-hadad pasó revista a los sirios, y fue a 

Afec para combatir contra Israel.

27

 Y los hijos de Israel fueron convocados; 

y provistos de raciones, les salieron al en-

cuentro,  pero  cuando  acamparon  frente 

a ellos, los hijos de Israel eran como dos 

pequeños  rebaños  de  cabritos,  mientras 

que los sirios llenaban el campo.

28

 Entonces  se  acercó  el  varón  de  Dios 

y  habló  al  rey  de  Israel,  y  dijo:  Así  dice 

YHVH:  Por  cuanto  los  sirios  han  dicho: 

YHVH es Dios de las montañas y no Dios 

de los valles, Yo he entregado a esa gran 

multitud en tu mano, para que reconoz-

cas que Yo soy YHVH.

29

 Y acamparon un bando contra el otro 

durante siete días, y sucedió que al sép-

timo día se libró la batalla, y los hijos de 

Israel  mataron  de  los  sirios  a  cien  mil 

hombres de a pie en un solo día.

30

 Y  los  demás  huyeron  a  Afec,  pero  el 

muro de la ciudad se derrumbó sobre los 

veintisiete mil hombres que quedaban. Y 

Ben-hadad huyó, y entró en la ciudad, y 

se escondía de casa en casa.

31

 Entonces  sus  siervos  le  dijeron:  He 

aquí, hemos oído que los reyes de la casa 

de  Israel  son  reyes  clementes.  Te  roga-

mos,  permítenos  ahora  ceñir  cilicio  so-

bre nuestros lomos, y ponernos sogas al 

cuello,  y  salir  al  rey  de  Israel;  quizás  te 

conceda la vida.

32

 Y se ciñeron sus lomos con cilicio, y se 

pusieron sogas al cuello, y fueron al rey 

de Israel, y dijeron: Tu siervo Ben-hadad 

ha dicho: ¡Déjame vivir, te ruego! Y él pre-

guntó: ¿Vive todavía? ¡Hermano mío es!

33

 Y  los  hombres  tomaron  esto  como 

buen  augurio  y  se  apresuraron  a  con-

firmarlo,  exclamando:  ¡Ben-hadad  es  tu 

hermano!  Él  dijo:  Id  y  traedle;  y  Ben-

hadad se presentó ante él, quien lo hizo 

subir a su carro.

34

 Y le dijo:° Las ciudades que mi padre 

quitó  a  tu  padre  las  restituiré;  y  harás 

para ti plazas en Damasco, como mi pa-

dre las hizo en Samaria. Y yo° te dejaré ir 

con este pacto. E hizo un pacto con él, y 

lo dejó ir.

35

 Entonces cierto varón de los hijos de 

los profetas dijo a su compañero, por la 

palabra de YHVH: ¡Golpéame ahora! Pero 

el hombre rehusó golpearle.

36

 Y él le dijo: Por cuanto no obedeciste 

la voz de YHVH, he aquí, cuando te apar-

tes de mí, te matará un león; y apenas se 

hubo separado de él, se encontró con un 

león que lo mató.

37

 Luego se encontró con otro hombre y 

le dijo: ¡Golpéame ahora! Y el hombre lo 

golpeó y le ocasionó una herida.

38

 Y el profeta fue y se puso delante del 

rey en el camino, y se disfrazó, ponién-

dose una venda sobre los ojos.

39

 Y sucedió que cuando el rey pasaba, 

aquél  gritó  al  rey  y  dijo:  ¡Tu  siervo  es-

tuvo  en  medio  de  la  batalla,  y  he  aquí, 

uno se apartó trayéndome a un hombre, 

y dijo: Guarda a este hombre, porque si 

llega  a  escapar,  tu  vida  responderá  por 

la suya, o tendrás que pesar° un talento 

de plata.

40

 Y sucedió que mientras tu siervo es-

taba ocupado en una y otra cosa, él des-

apareció.  Entonces  el  rey  de  Israel  le 

respondió: ¡Esa es tu sentencia! ¡Tú mis-

mo la has pronunciado!

41

 Y él se quitó apresuradamente la venda 

de  sus  ojos,  y  el  rey  de  Israel  reconoció 

que era uno de los profetas.

42

 Y le dijo: Así dice YHVH: Por cuanto sol-

taste de la mano al hombre que Yo había 

consagrado a la destrucción, ¡tu vida será 

por su vida, y tu pueblo por su pueblo!

43

 Y el rey de Israel fue a su casa decaído 

e irritado, y llegó a Samaria.

El viñedo de Nabot

21

Después  de  estas  cosas,  aconteció 

que  Nabot  jezreelita  tenía  un  vi-

ñedo en Jezreel, junto al palacio de Acab, 

rey de Samaria.

20.34 Esto es, Ben-hadad.  20.34 Esto es, Acab.  20.39 Es decir, pagar.


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1 Reyes 21:27

379

2

 Y  habló  Acab  a  Nabot,  diciendo:  Dame 

tu viñedo para que me sirva como huerto, 

porque está junto a mi casa, y te daré por él 

un viñedo mejor que ése, o si parece mejor 

ante tus ojos, te daré su precio en plata.

3

 Pero  Nabot  dijo  a  Acab:  ¡Guárdeme 

YHVH de darte la heredad de mis padres!

4

 Y Acab se fue a su casa decaído y enfa-

dado a causa de las palabras que le había 

hablado Nabot jezreelita, pues él le había 

dicho: ¡No te daré la heredad de mis pa-

dres!  Y  se  acostó  en  su  cama,  volvió  su 

rostro y no quiso comer pan.

5

 Por tanto vino a él Jezabel su mujer, y le 

preguntó: ¿Por qué está decaído tu espíri-

tu, y no comes pan?

6

 Y él le respondió: Porque hablé con Na-

bot jezreelita, y le dije: Dame tu viñedo por 

dinero; o si te parece mejor, te daré otro 

viñedo por él. Y me dijo: No te daré mi vi-

ñedo.

7

 Y su mujer Jezabel le dijo: ¿No gobier-

nas acaso el reino de Israel? ¡Levántate y 

come  pan,  y  alégrese  tu  corazón!  ¡Yo  te 

daré el viñedo de Nabot jezreelita!

8

 Ella entonces escribió cartas en nombre 

de Acab, las selló con su anillo, y las envió 

a los ancianos y a los principales que esta-

ban en su ciudad, aquellos que habitaban 

con Nabot.

9

 Y en las cartas escribió diciendo: Procla-

mad  ayuno  y  haced  que  Nabot  se  siente 

frente al pueblo,

10

 y que dos hombres, hijos de Belial, se 

sienten frente a él y testifiquen contra él 

diciendo:  ¡Has  maldecido  a  ’Elohim  y  al 

rey! Y haréis que lo saquen fuera y lo ape-

dreen hasta que muera.

11

 Y  los  hombres  de  la  ciudad,  es  decir, 

los ancianos y los principales que vivían 

en  su  ciudad,  hicieron  tal  como  Jezabel 

les  ordenó,  conforme  a  lo  escrito  en  las 

cartas que ella les había enviado.

12

 Proclamaron pues un ayuno e hicieron 

sentar a Nabot frente al pueblo;

13

 y los dos hombres, hijos de Belial, en-

traron y se sentaron ante él, y estos hijos 

de Belial testificaron contra Nabot delan-

te del pueblo, diciendo: ¡Nabot maldijo a 

’Elohim y al rey! Y ellos lo sacaron fuera 

de  la  ciudad  y  lo  lapidaron  con  piedras, 

hasta que murió.

14

 Luego enviaron a decir a Jezabel: Na-

bot ha sido apedreado y ha muerto.

15

 Y  sucedió  que  cuando  Jezabel  oyó 

que  Nabot  había  sido  apedreado  y  que 

había  muerto,  Jezabel  dijo  a  Acab:  Le-

vántate  y  toma  posesión  del  viñedo  de 

Nabot  jezreelita,  que  se  negó  a  dártelo 

por  dinero,  porque  Nabot  no  está  vivo, 

sino muerto.

16

 Y  sucedió  que  cuando  Acab  oyó  que 

Nabot había muerto, se levantó Acab para 

bajar  al  viñedo  de  Nabot  jezreelita  y  to-

mar posesión de él.

17

 Y la palabra de YHVH llegó a Elías tis-

bita, diciendo:

18

 Levántate, baja al encuentro de Acab, 

rey  de  Israel,  que  está  en  Samaria.  He 

aquí, está en el viñedo de Nabot, a donde 

bajó para tomar posesión de él.

19

 Y le hablarás diciendo: Así dice YHVH: 

¿Has  asesinado,  y  también  tomas  po-

sesión?  Y  le  hablarás  diciendo:  Así  dice 

YHVH:  En  el  mismo  sitio  donde  los  pe-

rros lamieron la sangre de Nabot, los pe-

rros también lamerán tu sangre.

20

 Y  Acab  dijo  a  Elías:  ¿Me  has  hallado, 

enemigo mío? Y él respondió: Te he ha-

llado, porque te has vendido para hacer el 

mal ante los ojos de YHVH.

21

 He aquí, Yo traigo el mal sobre ti, y te 

barreré por completo, y destruiré de Acab 

a todo meante a la pared, tanto al siervo 

como al que esté libre en Israel.

22

 Y haré tu casa como la casa de Jero-

boam ben Nabat, y como la casa de Baasa 

ben  Ahías,  por  la  provocación  con  que 

me  has  provocado  y  has  hecho  pecar  a 

Israel.

23

 Y también de Jezabel habla YHVH di-

ciendo: ¡Los perros comerán a Jezabel en 

el muro de Jezreel!

24

 Al  que  muera  de  Acab  en  la  ciudad, 

lo  comerán  los  perros,  y  al  que  muera 

en el campo, lo comerán las aves de los 

cielos.

25

 (Ciertamente no hubo ninguno como 

Acab, que se vendió para hacer el mal ante 

los ojos de YHVH, incitado por su mujer 

Jezabel;

26

 y procedió abominablemente a seguir 

tras  los  ídolos,  conforme  a  todo  lo  que 

hacía  el  amorreo,  al  cual  YHVH  había 

desposeído de delante de los hijos de Is-

rael.)

27

 Y sucedió que cuando Acab oyó estas 

palabras, rasgó sus vestiduras, puso cilicio 


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1 Reyes 21:28

380

sobre su cuerpo, y ayunó y se acostó con 

el cilicio, y anduvo abatido.

28

 Y la palabra de YHVH llegó a Elías tis-

bita, diciendo:

29

 ¿Has visto cómo se ha humillado Acab 

delante de mí? Por cuanto se ha humilla-

do delante de mí, no traeré el mal en sus 

días, sino que el mal sobre su casa lo trae-

ré en los días de su hijo.

Josafat y Acab contra los sirios 

Ocozías

22

Tres años pasaron sin guerra entre 

Siria e Israel.

2

 Pero al tercer año aconteció que Josafat, 

rey de Judá, bajó a visitar al rey de Israel.

3

 Y el rey de Israel dijo a sus siervos: ¿Sa-

béis  que  Ramot  de  Galaad  nos  pertene-

ce, y nada hemos hecho para quitarla de 

mano del rey de Siria?

4

 Y dijo a Josafat: ¿Irás conmigo a la gue-

rra a Ramot de Galaad? Y Josafat respon-

dió al rey de Israel: ¡Yo soy como tú, y mi 

pueblo  como  tu  pueblo,  y  mis  caballos 

como tus caballos!

5

 Y Josafat dijo al rey de Israel: Te ruego 

que consultes ahora la palabra de YHVH.

6

 Entonces el rey de Israel convocó a los 

profetas,  unos  cuatrocientos  hombres,  y 

les preguntó: ¿Iré a la guerra contra Ra-

mot de Galaad o desistiré? Y ellos respon-

dieron: ¡Sube, porque Adonay la entregará 

en mano del rey!

7

 Pero  Josafat  preguntó:  ¿No  habrá  aquí 

además algún profeta de YHVH, para que 

consultemos por medio de él?

8

 Y el rey de Israel dijo a Josafat: Aún hay 

un varón por el cual podríamos consultar 

a YHVH, Micaías ben Imla, pero yo lo abo-

rrezco,  porque  nunca  me  profetiza  para 

bien,  sino  siempre  para  mal.  Y  Josafat 

dijo: No hable así el rey.

9

 Entonces el rey de Israel llamó a cierto 

eunuco  y  le  ordenó:  ¡Trae  pronto  a  Mi-

caías ben Imla!

10

 Y el rey de Israel y Josafat, rey de Judá, 

estaban  sentados  cada  uno  en  su  trono, 

vestidos con sus mantos reales, en la pla-

za junto a la entrada de la puerta de Sa-

maria,  y  todos  los  profetas  profetizaban 

ante ellos.

11

 Y  Sedequías  ben  Quenaana  se  había 

hecho  unos  cuernos  de  hierro,  y  decía: 

Así  dice  YHVH:  ¡Con  éstos  embestirás  a 

los sirios hasta acabar con ellos!

12

 Y todos los profetas profetizaban de la 

misma manera, diciendo: ¡Sube a Ramot 

de Galaad y triunfa, porque YHVH la ha 

entregado en mano del rey!

13

 Y el mensajero que había ido a llamar 

a Micaías le habló, diciendo: He aquí, las 

palabras de los profetas declaran el bien 

al rey a una sola voz. Sea, pues, tu palabra 

como la de ellos, y anuncia el bien.

14

 Pero Micaías dijo: ¡Vive YHVH, que lo 

que YHVH me diga, eso hablaré!

15

 Y  cuando  llegó  ante  el  rey,  el  rey  le 

dijo: Micaías, ¿iremos a la guerra contra 

Ramot  de  Galaad,  o  desistiremos?  Y  él 

le respondió: Sube y serás prosperado, y 

YHVH la entregará en mano del rey.

16

 Pero el rey le dijo: ¿Cuántas veces ten-

go que hacerte jurar que no me digas sino 

la verdad en nombre de YHVH?

17

 Entonces  él  dijo:  Vi  a  todo  Israel  es-

parcido por los montes, como ovejas sin 

pastor, y a YHVH que decía: Éstos no tie-

nen amo. Retorne cada cual a su casa en 

paz.

18

 Y el rey de Israel dijo a Josafat: ¿No te 

dije  que  no  profetizaría  acerca  de  mí  el 

bien, sino el mal?

19

 Y  él°  dijo:  Por  eso,  oíd  la  palabra  de 

YHVH: Vi a YHVH sentado en su trono, y 

al ejército de los cielos alrededor de Él, a 

su diestra y a su siniestra.

20

 Y decía YHVH: ¿Quién inducirá a Acab 

para que suba y caiga en Ramot de Galaad? 

Y uno decía de una manera y otro de otra.

21

 Y se presentó un espíritu ante YHVH, 

y dijo: Yo lo induciré. Y le dijo YHVH: ¿De 

qué modo?

22

 Y respondió: Saldré y seré espíritu de 

mentira en la boca de todos sus profetas. 

Y Él dijo: Ciertamente lo inducirás y pre-

valecerás. ¡Ve y hazlo!

23

 Y ahora, he aquí YHVH ha puesto un 

espíritu  de  mentira  en  la  boca  de  todos 

estos, tus profetas, pues YHVH ha decre-

tado el mal contra ti.

24

 Entonces Sedequías ben Quenaana se 

acercó y golpeó a Micaías en la mejilla, y 

22.19 Esto es, el profeta Micaías


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1 Reyes 22:53

381

dijo: ¿Por qué camino pasó de mí el Espí-

ritu de YHVH para hablarte a ti?

25

 Y  Micaías  respondió:  ¡He  aquí,  tú  lo 

verás aquel día, cuando vayas de aposento 

en aposento para esconderte!

26

 Entonces dijo el rey de Israel: Toma a 

Micaías y hazlo volver a Amón, príncipe 

de la ciudad, y a Joás, hijo del rey,

27

 y  dirás:  Así  ha  dicho  el  rey:  Meted  a 

éste  en  la  cárcel,  y  dadle  pan  y  agua  de 

aflicción hasta que yo vuelva en paz.

28

 Y  Micaías  dijo:  ¡Si  vuelves  en  paz, 

YHVH no habló por mí! Y agregó: ¡Oídlo, 

pueblos todos!

29

 Enseguida el rey de Israel subió con Jo-

safat rey de Judá contra Ramot de Galaad.

30

 Y el rey de Israel dijo a Josafat: Yo me 

disfrazaré para entrar en la batalla; pero 

tú ponte tus atavíos reales. Y el rey de Is-

rael se disfrazó y entró en la batalla.

31

 Pero el rey de Siria había ordenado a 

sus treinta y dos capitanes de los carros 

que tenía, diciendo: No luchéis contra pe-

queño ni contra grande, sino sólo contra 

el rey de Israel.

32

 Y sucedió que cuando los capitanes de 

los carros vieron a Josafat, dijeron: ¡De se-

guro ése es el rey de Israel! Y se dirigieron 

a él para atacarlo, pero Josafat clamó.

33

 Y viendo los capitanes de los carros que 

no era el rey de Israel, se apartaron de él.

34

 Y un hombre tiró con su arco a la ven-

tura, e hirió al rey de Israel por entre las 

junturas de la armadura, por lo que dijo a 

su auriga: ¡Da vuelta y sácame del campa-

mento, porque estoy herido!

35

 Pero la batalla arreció aquel día, por lo 

cual el rey fue sostenido en su carro frente 

a los sirios, y al atardecer murió, y la sangre 

de la herida corrió hasta el fondo del carro.

36

 A la puesta del sol salió un pregón por 

el campamento, diciendo: ¡Cada uno a su 

ciudad! ¡Cada uno a su tierra!

37

 Así murió el rey, y fue llevado a Sama-

ria, y sepultaron al rey en Samaria.

38

 Y mientras uno lavaba el carro junto al 

estanque de Samaria (y allí se lavaban las ra-

meras), los perros lamieron su sangre, con-

forme a la palabra que YHVH había hablado.

39

 Los demás hechos de Acab y todo lo que 

hizo, la casa de marfil que edificó, y todas 

las ciudades que edificó, ¿no están escritos 

en el rollo de las Crónicas de los reyes de 

Israel?

40

 Y  Acab  durmió  con  sus  padres,  y  su 

hijo Ocozías reinó en su lugar.

41

 Y  Josafat  ben  Asa  había  comenzado 

a  reinar  sobre  Judá  en  el  cuarto  año  de 

Acab rey de Israel.

42

 Josafat tenía treinta y cinco años cuan-

do comenzó a reinar, y reinó veinticinco 

años en Jerusalem. Y el nombre de su ma-

dre era Azuba hija de Silhi.

43

 Y  él  anduvo  en  todo  el  camino  de  su 

padre Asa, sin apartarse de él, haciendo lo 

recto ante los ojos de YHVH. Pero° los lu-

gares altos no fueron quitados, porque aún 

el pueblo continuaba ofreciendo sacrificios 

y quemando incienso en los lugares altos.

44

 Y Josafat hizo la paz con el rey de Israel.

45

 Los  demás  hechos  de  Josafat,  el  po-

derío que logró, y las guerras que llevó a 

cabo, ¿no están escritos en el rollo de las 

Crónicas de los reyes de Judá?

46

 Y  él  eliminó  del  país  el  resto  de  los 

varones consagrados a la prostitución ri-

tual,  que  habían  quedado  del  tiempo  de 

su padre Asa.

47

 Entonces no había rey en Edom, sino 

un gobernador de parte del rey.

48

 Josafat hizo naves como las de Tarsis, 

para  ir  a  Ofir  por  oro,  pero  no  llegaron 

a  ir,  pues  las  naves  se  destrozaron  en 

Ezión-geber.

49

 Y Ocozías ben Acab dijo a Josafat: Que 

vayan mis siervos con tus siervos en las 

naves; pero Josafat no quiso.

50

 Y Josafat durmió con sus padres, y fue 

sepultado con ellos en la ciudad de David, 

su padre, y su hijo Joram reinó en su lugar.

51

 En  el  año  decimoséptimo  de  Josafat 

rey  de  Judá,  Ocozías  ben  Acab  comenzó 

a reinar sobre Israel en Samaria, y reinó 

dos años sobre Israel.

52

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, y 

anduvo en el camino de su padre, en el ca-

mino de su madre, y en el camino de Jero-

boam ben Nabat, quien hizo pecar a Israel;

53

 y  sirvió  a  Baal  y  se  postró  ante  él,  y 

provocó la ira de YHVH, el Dios de Israel, 

conforme a todas las cosas que había he-

cho su padre.

22.43 En TM comienza aquí el v.44 En adelante la numeración cambia en +1 y el c. termina con el v.54.


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1

Después de la muerte de Acab, Moab 

se rebeló contra Israel.

2

 Y Ocozías cayó por la ventana de su apo-

sento alto en Samaria y se lastimó. Y envió 

mensajeros a los que dijo: Id y consultad 

a Baal-zebub, dios de Ecrón, si sanaré de 

esta enfermedad.

3

 Entonces el ángel° de YHVH dijo a Elías 

tisbita:  Levántate,  sube  al  encuentro  de 

los mensajeros del rey de Samaria y diles: 

¿Es porque no hay ’Elohim en Israel por 

lo que vais a consultar a Baal-zebub, dios 

de Ecrón?

4

 Por tanto, así dice YHVH: No bajarás del 

lecho al que has subido, sino que cierta-

mente morirás. Y Elías se fue.

5

 Cuando los mensajeros volvieron a él,° 

les dijo: ¿Por qué habéis vuelto?

6

 Y  respondieron:  Ha  salido  a  nuestro 

encuentro  un  hombre  y  nos  ha  dicho: 

Id,  volved  al  rey  que  os  envió  y  decid-

le:  Así  dice  YHVH:  ¿Es  porque  no  hay 

’Elohim  en  Israel  por  lo  que  tú  man-

das  a  consultar  a  Baal-zebub,  dios  de 

Ecrón? Por tanto, del lecho al que has 

subido no bajarás, sino que ciertamente 

morirás.

7

 Entonces él les preguntó: ¿Qué tipo de 

hombre  era  el  que  subió  a  vuestro  en-

cuentro y os dijo estas palabras?

8

 Y le respondieron: Era un hombre ve-

lludo,° con un cinturón de cuero ceñido 

a sus lomos. Y él dijo: Es Elías tisbita.

9

 Entonces  le  envió  un  capitán  de  cin-

cuenta con sus cincuenta, el cual subió a 

él (pues estaba sentado en la cumbre del 

monte), y le dijo: ¡Varón de Dios, el rey ha 

ordenado que bajes!

10

 Y Elías respondió al capitán de cincuen-

ta, diciendo: Si yo soy varón de Dios, ¡des-

cienda fuego de los cielos y te consuma a ti 

y a tus cincuenta! Y bajó fuego de los cie-

los, y lo consumió a él y a sus cincuenta.

11

 Y volvió a enviarle otro capitán de cin-

cuenta  con  sus  cincuenta  quien  le  dijo: 

Varón de Dios, así ha dicho el rey: ¡Apre-

súrate y baja!

12

 Y respondió Elías: Si yo soy varón de 

Dios,  ¡descienda  fuego  de  los  cielos  y  te 

consuma  a  ti  y  a  tus  cincuenta!  Y  bajó 

fuego de Dios de los cielos y lo consumió 

a él y a sus cincuenta.

13

 Y volvió a enviar un tercer capitán de 

cincuenta con sus cincuenta; pero el ter-

cer capitán de cincuenta subió, y fue y se 

postró de rodillas° delante de Elías, y le 

suplicó diciendo: Varón de Dios, te ruego 

que mi vida y la vida de estos cincuenta 

siervos tuyos sea de valor ante tus ojos.

14

 He aquí, fuego de los cielos ha descen-

dido y ha consumido a los dos anteriores 

capitanes de cincuenta con sus cincuen-

ta; ahora pues, ¡que mi vida° sea de valor 

ante tus ojos!

15

 Entonces  el  ángel°  de  YHVH  dijo  a 

Elías: Baja con él, no tengas temor de su 

rostro.° Y se levantó y bajó con él al rey.

Elías y Ocozías

1.3 Lit. mensajero. Pero puede hacer referencia tanto a un mensajero humano (un profeta de Dios, un emisario real) como a un 

mensajero sobrenatural (más comúnmente denominado ángel). Generalmente el contexto deja claro el tipo de mensajero del 

que habla el texto bíblico, aunque la distinción no siempre es fácil. 

1.5 Esto es, el rey Ocozías.  1.8 Lit. dueño de pelo. En el texto 

bíblico, la palabra pelo se refiere siempre al cabello humano, por lo que cabe esperar que en este pasaje el sentido sea el mismo. 

Sin embargo, es posible considerar esta expresión como una manera de referirse a un vestido de piel con pelo

1.13 Lit. se 

arrodilló sobre sus rodillas

1.14 LXX registra el alma de tus siervos.  1.15 

→2 R.1.3 nota.  1.15 Es decir, no le tengas miedo.


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2 Reyes 2:20

383

16

 Y  le  dijo:  Así  dice  YHVH:  Por  cuanto 

has  enviado  mensajeros  a  consultar  a 

Baal-zebub, dios de Ecrón como si no hu-

biera ’Elohim en Israel para consultar su 

palabra,  no  bajarás  del  lecho  al  que  has 

subido, sino que ciertamente morirás.

17

 Y  murió  conforme  a  la  palabra  de 

YHVH que había dicho Elías. Y reinó en 

su lugar Joram° en el año segundo de Jo-

ram ben Josafat, rey de Judá, porque no 

tuvo° ningún hijo.

18

 Los demás hechos de Ocozías, ¿no es-

tán escritos en el rollo de las Crónicas de 

los reyes de Israel?

Elías y Eliseo

2

Sucedió que cuando YHVH iba a hacer 

subir a Elías a los cielos en el torbelli-

no, Elías venía de Gilgal con Eliseo.

2

 Y Elías dijo a Eliseo: Quédate ahora aquí, 

porque YHVH me ha enviado hasta Bet-

’El. Pero Eliseo respondió: ¡Vive YHVH y 

vive tu alma que no te dejaré! Entonces 

bajaron a Bet-’El.

3

 Y los hijos de los profetas que estaban 

en Bet-’El salieron a Eliseo y le pregun-

taron:  ¿Sabes  que  YHVH  arrebata  hoy  a 

tu  señor  de  encima  de  tu  cabeza?°  Y  él 

respondió: Sí, lo sé, callad.

4

 Y  Elías  le  dijo:  Eliseo,  quédate  ahora 

aquí, porque YHVH me ha enviado a Jeri-

có. Pero él dijo: ¡Vive YHVH y vive tu alma 

que no te dejaré! Y fueron a Jericó.

5

 Y los hijos de los profetas que estaban 

en Jericó se acercaron a Eliseo y le pre-

guntaron: ¿Sabes que YHVH arrebata hoy 

a tu señor de encima de tu cabeza? Y él 

dijo: Sí, lo sé, callad.

6

 Y Elías le dijo: Quédate ahora aquí, por-

que YHVH me ha enviado al Jordán. Pero 

él dijo: ¡Vive YHVH y vive tu alma, que no 

te dejaré! Y ambos se fueron.

7

 Y fueron cincuenta hombres de los hijos 

de  los  profetas,  y  se  detuvieron  frente  a 

ellos,  a  lo  lejos;  y  los  dos  se  detuvieron 

junto al Jordán.

8

 Entonces Elías tomó su manto, lo dobló y 

golpeó las aguas, y se separaron a uno y otro 

lado; y ambos cruzaron por tierra seca.

9

 Y  sucedió  que  cuando  cruzaban,  Elías 

dijo a Eliseo: Pide lo que he de hacer por 

ti antes que sea arrebatado de tu lado.° Y 

Eliseo respondió: ¡Te ruego que una doble 

porción de tu espíritu venga sobre mí!

10

 Y él le dijo: Difícil cosa has pedido. Si 

me ves cuando sea arrebatado de tu lado, 

será así; pero si no, no.

11

 Y mientras ellos iban caminando y ha-

blando,  he  aquí,  un  carro  de  fuego  con 

caballos de fuego apartó a los dos, y Elías 

subió a los cielos en el torbellino.

12

 Y  viéndolo  Eliseo,  clamaba:  ¡Padre 

mío, padre mío! ¡Carro y auriga de Israel! 

Y no lo vio más. Entonces tomó sus vesti-

dos y los rasgó en dos pedazos.

13

 Y recogió el manto de Elías, que se le 

había  caído,  y  se  volvió  y  se  detuvo  a  la 

orilla del Jordán.

14

 Y tomando el manto de Elías que se le 

había caído, golpeó las aguas, y dijo: ¿Dón-

de está YHVH, el Dios de Elías? Y cuando 

golpeó las aguas, también fueron divididas 

a uno y otro lado, y Eliseo cruzó.

15

 Y cuando lo vieron los hijos de los pro-

fetas que estaban en Jericó, al otro lado, 

dijeron: El espíritu de Elías ha venido so-

bre Eliseo. Luego fueron a su encuentro y 

se postraron en tierra ante él.

16

 Y  le  dijeron:  He  aquí,  ahora  hay  con 

tus  siervos  cincuenta  hombres  fuertes; 

permite  que  vayan,  te  rogamos,  y  bus-

quen  a  tu  señor,  no  sea  que  el  Espíritu 

de YHVH lo haya levantado y echado en 

algún monte o en algún valle. Pero él res-

pondió: No los enviéis.

17

 Mas ellos lo importunaron hasta que, 

hartándose, dijo: ¡Enviad! Y enviaron cin-

cuenta hombres que buscaron tres días y 

no lo hallaron.

18

 Y volvieron a él, estando él en Jericó. 

Entonces  les  dijo:  ¿Acaso  no  os  dije:  No 

vayáis?

19

 Luego los hombres de la ciudad dije-

ron a Eliseo: He aquí el lugar° de esta ciu-

dad es bueno, como ve mi señor, pero las 

aguas son malas y la tierra es estéril.

20

 Entonces  él  dijo:  Traedme  una  vasija 

nueva y poned allí sal. Y se la trajeron.

1.17 Este Joram es uno de los hermanos de Ocozías y no debe confundirse con el rey de Judá que tiene el mismo nombre (y que 

aparece también en este mismo versículo). 

1.17 Esto es, Ocozías.  2.3 N¿Sabes que hoy YHVH arrebatará a tu señor de sobre 

ti? 

2.9 Lit. de (estar) contigo.  2.19 Nterritorio o asentamiento


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2 Reyes 2:21

384

21

 Y salió al manantial, y echando allí la 

sal, dijo: Así dice YHVH: Yo he saneado es-

tas aguas, no habrá por ellas más muerte 

ni esterilidad.

22

 Y las aguas fueron sanas hasta este día, 

conforme a la palabra que habló Eliseo.

23

 De allí subió a Bet-’El; y mientras iba 

por el camino, salieron unos muchachos 

de la ciudad que se burlaron de él dicién-

dole: ¡Sube calvo! ¡Sube calvo!

24

 Y él se volvió para verlos, y los vio y los 

maldijo en el nombre de YHVH. Y salieron 

del  bosque  dos  osas  que  despedazaron  a 

cuarenta y dos de aquellos muchachos.°

25

 De allí fue al monte Carmelo, y desde 

allí volvió a Samaria.

Joram, rey de Israel 

Guerra contra Moab

3

En el año decimoctavo de Josafat, rey 

de Judá, Joram ben Acab fue rey sobre 

Israel en Samaria, y reinó doce años.

2

 E hizo lo malo a ojos de YHVH, aunque 

no tanto como su padre y su madre, pues 

quitó el pilar de Baal que había erigido su 

padre.

3

 Sin embargo, se dio a los pecados de Je-

roboam ben Nabat, por los que hizo pecar 

a Israel, y no se apartó de ellos.

4

 Entonces  Mesa,  rey  de  Moab,  era  cria-

dor de ovejas y tributaba al rey de Israel 

la  lana  de  cien  mil  corderos,  y  cien  mil 

carneros lanudos.°

5

 Pero  sucedió  cuando  murió  Acab,  que 

el rey de Moab se rebeló contra el rey de 

Israel.

6

 Y aquel día el rey Joram salió de Sama-

ria y pasó revista a todo Israel.

7

 También  fue  y  envió  a  decir  a  Josafat, 

rey de Judá: El rey de Moab se ha rebela-

do contra mí, ¿irás conmigo a la guerra 

contra  Moab?  Y  respondió:  ¡Subiré!,  yo 

soy como tú; mi pueblo como tu pueblo; 

mis caballos como tus caballos.

8

 Y añadió:° ¿Por cuál camino subiremos? 

Y  respondió:  El  camino  del  desierto  de 

Edom.

9

 Partieron  pues  el  rey  de  Israel,  el  rey 

de Judá y el rey de Edom, e hicieron una 

marcha de siete días, hasta que no hubo 

agua para el campamento ni para las bes-

tias que los seguían.

10

 Entonces  el  rey  de  Israel  dijo:  ¡Ay! 

¡YHVH  ha  traído  a  estos  tres  reyes  para 

entregarlos en manos de Moab!

11

 Pero Josafat preguntó: ¿No hay aquí un 

profeta de YHVH para que consultemos a 

YHVH por medio de él? Entonces uno de 

los  siervos  del  rey  de  Israel  respondió  y 

dijo: Aquí está Eliseo ben Safat, que vertía 

agua en manos de Elías.

12

 Y Josafat dijo: La palabra de YHVH está 

con él. Y el rey de Israel, Josafat, y el rey 

de Edom bajaron a él.

13

 Y Eliseo dijo al rey de Israel: ¿Qué ten-

go  yo  contigo?  Vete  a  los  profetas  de  tu 

padre y a los profetas de tu madre. Pero 

el rey de Israel le respondió: No, porque 

YHVH ha reunido a estos tres reyes para 

entregarlos en manos de Moab.

14

 Entonces Eliseo dijo: ¡Vive YHVH Se-

baot, ante quien estoy, que si no fuera por 

respeto  a  la  presencia  de  Josafat  rey  de 

Judá, no te haría caso ni te miraría!

15

 Pero,  traedme  ahora  un  tañedor.°  Y 

sucedió que mientras el tañedor tañía, la 

mano de YHVH vino sobre él,

16

 y  dijo:  Así  dice  YHVH:  Haced  en  este 

valle muchas zanjas,

17

 porque YHVH dice así: No veréis vien-

to,  ni  veréis  lluvia,  pero  aquel  valle  se 

llenará de agua, y beberéis vosotros, vues-

tros ganados° y vuestras bestias.

18

 Y si esto es poco a ojos de YHVH, Él en-

tregará también a Moab en vuestras manos.

19

 Y  les  conquistaréis  cada  ciudad  forti-

ficada  y  cada  ciudad  escogida,  y  talaréis 

todo árbol bueno, y cegaréis toda fuente 

de agua, y contristaréis° con piedras toda 

tierra fértil.

20

 Y sucedió por la mañana, al tiempo de 

ofrecerse  el  sacrificio  matutino,  he  aquí 

vinieron aguas por el camino de Edom, y 

la región se llenó de agua.

21

 Y  todo  Moab  escuchó  que  los  reyes 

subían  a  luchar  contra  ellos,  y  fueron 

llamados todos los que ceñían cinto° en 

adelante, y se emplazaron en la frontera.

2.24 Heb. yeladim=niños.  3.4 Es decir, carneros no esquilados, que eran de más valor por su lana. Ny la lana de cien mil 

carneros

3.8 Lit. dijo.  3.15 Esto es, quien toca instrumentos de cuerda.  3.17 LXX registra vuestros ejércitos.  3.19 Es decir, 

cubriréis

3.21 Esto es, los hombres aptos para la guerra, que llevaban ceñido el talabarte del que cuelga la espada.


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2 Reyes 4:16

385

22

 Cuando  se  levantaron  de  madrugada, 

el  sol  brillaba  sobre  las  aguas,  y  los  de 

Moab  vieron  desde  lejos  las  aguas  rojas 

como la sangre,

23

 y dijeron: ¡Es sangre! Ciertamente los 

reyes  se  han  atacado  uno  a  otro  y  cada 

uno  ha  matado  a  su  compañero.  Ahora 

pues Moab: ¡Al botín!

24

 Pero  cuando  llegaron  al  campo  de 

Israel, se levantaron los israelitas y ven-

cieron  a  los  moabitas,  quienes  huyeron 

ante  ellos.  Y  asolaron  la  tierra  de  Moab 

con furia,

25

 y destruyeron las ciudades, y en cada 

porción  de  buena  tierra,  cada  hombre 

arrojó su piedra cubriéndola,° y cegaron 

toda  fuente  de  agua,  y  talaron  todos  los 

buenos árboles, incluso en Kir-hareset no 

dejaron sino sus piedras, después que los 

honderos la cercaron y la destruyeron.

26

 Y cuando el rey de Moab vio que la ba-

talla arreciaba contra él, tomó consigo se-

tecientos hombres diestros en el manejo 

de la espada,° para abrirse paso contra el 

rey de Edom, pero no pudieron.

27

 Entonces  tomó  a  su  hijo  primogéni-

to, que había de reinar en su lugar, y lo 

ofreció  en  holocausto  sobre  el  muro.  Y 

hubo  una  gran  indignación  de  parte  de 

los israelitas, quienes se apartaron de él,° 

y volvieron a su tierra.

Hechos de Eliseo 

La sunamita

4

Una cierta mujer, de las mujeres de los 

hijos de los profetas, clamó a Eliseo di-

ciendo: Tu siervo, mi marido, ha muerto, 

y tú sabes que tu siervo era temeroso de 

YHVH. Ahora un acreedor ha venido a to-

mar a mis dos hijos como esclavos suyos.

2

 Y Eliseo le dijo: ¿Qué haré por ti? Dime 

qué  tienes  en  casa.  Y  ella  respondió:  Tu 

sierva no tiene en su casa sino una vasija 

de aceite.

3

 Y le dijo: Vete a pedir vasijas a todos tus 

vecinos, vasijas vacías; pide prestadas no 

pocas.

4

 Luego entrarás y cerrarás la puerta tras 

de ti y tras de tus hijos, y echarás° en to-

das esas vasijas, e irás poniendo aparte las 

que estén llenas.

5

 Y la mujer se alejó de él. Después cerró 

la puerta tras sí y tras sus hijos; y ellos le 

acercaban, y ella vertía.

6

 Y sucedió que cuando las vasijas estaban 

llenas, dijo a un hijo suyo: Acércame otra 

vasija; y él le respondió: No hay ni una va-

sija más. Entonces cesó el aceite.

7

 Y ella fue y se lo dijo al varón de Dios, 

y él respondió: Ve, vende el aceite, y paga 

tu deuda, y vive tú y tus hijos de lo que 

sobre.

8

 Aconteció  también  un  día,  que  pasaba 

Eliseo  por  Sunem,  y  había  allí  una  mu-

jer  distinguida,  la  cual  lo  invitó  con  in-

sistencia para que comiera; y así fue que 

siempre que pasaba por allí, él entraba a 

comer.

9

 Y ella dijo a su marido: He aquí ahora sé 

que el que siempre pasa por nuestra casa° 

es un santo varón de Dios.

10

 Te  ruego  que  hagamos  un  pequeño 

aposento alto de obra, y preparemos allí 

para él una cama, una mesa, una silla y 

un candelabro; y será que cuando venga a 

nosotros, se retirará allí.

11

 Y llegó el día que fue allí, y se retiró al 

aposento alto, y allí se acostó.

12

 Luego dijo a su siervo Giezi: Llama a 

esta sunamita; y cuando la llamó, se pre-

sentó ante él.

13

 Y le dijo:° Dile: He aquí has estado solí-

cita por nosotros con toda esta ansiedad:° 

¿qué puede hacerse por ti? ¿Querrías que 

hablara por ti al rey, o al capitán del ejér-

cito?  Pero  ella  respondió:  Yo  habito  en 

medio de mi pueblo.°

14

 Y él dijo: ¿Qué puede hacerse entonces 

por ella? Y respondió Giezi: En verdad ella 

no tiene hijo, y su marido es anciano.

15

 Y él dijo: Llámala. Así que la llamó y 

ella se detuvo ante la puerta.

16

 Y  él  dijo:  Para  este  tiempo,  según  el 

tiempo  de  la  vida,  abrazarás  a  un  hijo. 

3.25 Lit. y la llenaron.  3.26 Lit. que sacaban espada.  3.27 Es decir, del rey de Moab.  4.4 Esto es, el aceite.  4.9 Lit. el que siem-

pre pasa sobre nosotros

4.13 Esto es, a Giezi.  4.13 El verbo hebreo que traducimos has estado solícita, implica algo más que 

un cuidado o preocupación por alguien. Dicho verbo enuncia un movimiento ansioso, que en determinados contextos expresa 

un gran temor (incluso terror), mientras que en otros responde a un gran gozo o alegría. Debemos suponer que la expectación 

provocada por la visita del profeta es lo que hace que la sunamita actúe con tal ansiedad. 

4.13 Es decir, estoy satisfecha en 

medio de mi pueblo.


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2 Reyes 4:17

386

Pero  ella  respondió:  ¡No,  señor  mío,  va-

rón de Dios, no engañes a tu sierva!

17

 Pero la mujer concibió, y dio a luz un 

hijo en el tiempo que Eliseo le había di-

cho, según el tiempo de la vida.

18

 Y el niño creció; pero sucedió que un 

día,  habiendo  salido  con  su  padre  y  con 

los segadores,

19

 dijo a su padre: ¡Ay, mi cabeza, mi cabe-

za! Y él dijo al siervo: ¡Llévalo a su madre!

20

 Y cuando lo hubo llevado a su madre, 

se sentó en sus rodillas hasta el mediodía, 

y luego murió.

21

 Y ella subió y lo acostó en la cama del 

varón de Dios, y cerrando la puerta tras 

ella, salió.

22

 Luego llamó a su marido y le dijo: Mán-

dame ahora a uno de los criados y una de 

las asnas, para que pueda ir corriendo al 

varón de Dios y volver.

23

 Pero él preguntó: ¿Por qué has de ir a 

él hoy? No es luna nueva, ni shabbat. Ella 

respondió: Shalom.°

24

 Y  enalbardó  el  asna,  y  dijo  al  siervo: 

¡Arrea y anda sin detenerte, a menos que 

te lo diga!

25

 Y  fue  y  llegó  al  varón  de  Dios  en  el 

monte Carmelo. Y sucedió que cuando el 

varón  de  Dios°  la  vio  de  lejos,  dijo  a  su 

siervo Giezi: He aquí la sunamita.

26

 Corre ahora a su encuentro, y dile: ¿Es-

tás en paz? ¿Está en paz tu marido? ¿Está 

en paz el niño? Ella respondió: Shalom.

27

 Pero al llegar al monte ante el varón 

de Dios, ella se aferró a sus pies. Y Giezi 

se acercó para apartarla, pero el varón de 

Dios dijo: Déjala, porque su alma está en 

amargura, y YHVH me lo ha ocultado, y 

no me lo ha declarado.

28

 Entonces dijo ella: ¿Acaso pedí un hijo 

a mi señor? ¿No te dije que no me enga-

ñaras?

29

 Y él dijo a Giezi: Ciñe tus lomos, y toma 

mi cayado en tu mano y vete. Si alguno te 

encuentra, no lo saludes,° y si alguien te 

saluda,° no le respondas, y pon mi cayado 

sobre el rostro del niño.

30

 Y dijo la madre del niño: ¡Vive YHVH 

y  vive  tu  alma  que  no  te  dejaré!  Y  él  se 

levantó y la siguió.

31

 Y  Giezi  se  adelantó  a  ellos,  y  puso  el 

cayado sobre el rostro del niño, pero no 

hubo voz ni reacción, así que volvió a su 

encuentro y le declaró, diciendo: El niño 

no despierta.

32

 Cuando Eliseo llegó a la casa, he aquí, el 

jovencito muerto, tendido sobre su cama.

33

 Entonces  entró,  cerró  la  puerta  tras 

ellos dos, y oró a YHVH.

34

 Después subió y se echó sobre el niño, 

y puso su boca sobre la suya, sus ojos so-

bre los suyos, y sus manos sobre las su-

yas; se tendió así sobre él, y la carne del 

niño se calentó.

35

 Luego  volvió,  y  caminó  de  un  lado  a 

otro de la casa, después subió, se tendió 

sobre él, y el jovencito estornudó siete ve-

ces, y el jovencito abrió sus ojos.

36

 Entonces llamó a Giezi y dijo: Llama 

a esta sunamita. La llamó pues, y cuando 

ella llegó, él le dijo: ¡Alza a tu hijo!

37

 Ella entonces entró dentro y cayó a sus 

pies postrándose en tierra; después alzó a 

su hijo y salió.

38

 Y Eliseo volvió a Gilgal. Había enton-

ces hambre en la tierra, y los hijos de los 

profetas se sentaron delante de él, y dijo 

a su siervo: Prepara la olla grande y guisa 

un potaje para los hijos de los profetas.

39

 Y uno salió al campo a recoger hierbas, 

y encontró una parra silvestre, y recogió 

de ella calabazas silvestres hasta llenar su 

faldón, y regresó y las echó en la olla del 

potaje, pero no sabían lo que era.

40

 Y  sirvió  a  los  hombres  para  que  co-

mieran; pero sucedió que cuando comían 

del  potaje,  gritaron  diciendo:  ¡Varón  de 

Dios, hay muerte en esa olla! Y no pudie-

ron comer.

41

 Pero él dijo: Traedme harina. Y la echó 

en la olla y dijo: Sirve a la gente para que 

coma. Y no hubo nada malo en la olla.

42

 Un hombre llegó de Baal-salisa, y traía 

para  el  varón  de  Dios  pan  de  las  primi-

cias, veinte panes de cebada con espigas 

de  trigo  nuevo,  y  dijo:  Dadlo  a  la  gente 

para que coma.

43

 Pero su siervo preguntó: ¿Cómo pon-

dré  esto  delante  de  cien  hombres?  Y 

él  respondió:  Dadlo  a  la  gente  para  que 

4.23 Esto es, paz. Modo semítico de saludar o despedirse de alguien.  4.25 LXX registra Eliseo.  4.29 Lit. bendigas.  4.29 Lit. 

bendice.


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2 Reyes 5:20

387

coma,  porque  así  dice  YHVH:  Comerán, 

y sobrará.

44

 Y  lo  puso  delante  de  ellos,  y  comie-

ron, y les sobró, conforme a la palabra de 

YHVH.

Naamán

5

Naamán, capitán del ejército del rey 

de Siria, era un hombre muy estima-

do por su señor, porque por su interme-

dio  YHVH  había  dado  victoria°  a  Siria. 

Era  además  valeroso  en  extremo,  pero 

leproso.

2

 Y los sirios habían salido en escuadro-

nes, y habían llevado cautiva de la tierra 

de Israel a una jovencita, la cual estaba al 

servicio de la mujer de Naamán.

3

 Y ella dijo a su señora: ¡Ojalá estuviera 

mi señor con el profeta que está en Sama-

ria! Entonces lo libraría de su lepra.

4

 Y uno fue e informó a su señor dicien-

do: Esto y esto ha dicho la jovencita de la 

tierra de Israel.

5

 Y el rey de Siria dijo: Ve allí con una car-

ta° para el rey de Israel. Y partió llevando 

en su mano diez talentos de plata, seis mil 

piezas° de oro y diez mudas de vestidos.

6

 Y llevó la carta al rey de Israel, que de-

cía: Ahora pues, cuando esta carta llegue 

a ti, he aquí te envío a mi siervo Naamán, 

para que lo cures de su lepra.

7

 Y sucedió que al leer la carta, el rey de 

Israel  rasgó  sus  vestidos,  y  dijo:  ¿Acaso 

soy ’Elohim para matar o para hacer vivir, 

para que éste me envíe a un hombre a cu-

rarlo de su lepra? Considerad ahora, y ved 

cómo busca ocasión contra mí.

8

 Pero  aconteció  que  oyendo  Eliseo,  el 

varón de Dios, que el rey de Israel había 

rasgado sus vestidos, envió a decir al rey: 

¿Por  qué  has  rasgado  tus  vestidos?  Que 

venga  a  mí,  y  sabrá  que  hay  profeta  en 

Israel.

9

 Naamán fue pues con sus caballos y sus 

carros, y se detuvo a la puerta de la casa 

de Eliseo.

10

 Y Eliseo le envió un mensajero, dicien-

do: Ve y lávate en el Jordán siete veces, y 

tu carne se te restaurará, y serás limpio.

11

 Pero Naamán se retiró airado, diciendo: 

He  aquí  yo  pensaba:  Seguramente  saldrá 

a  mi  encuentro,  se  detendrá,  e  invocará 

el nombre de YHVH su Dios, y agitará su 

mano frente el lugar,° y curará la lepra.

12

 ¿Abana y Farfar, ríos de Damasco, no 

son mejores que todas las aguas de Israel? 

¿Acaso no me lavaré en ellos y seré lim-

pio? Y volviéndose, se fue airado.

13

 Pero sus siervos se acercaron y le ha-

blaron diciendo: Padre mío, si el profeta 

te hubiera dicho que hicieras alguna cosa 

difícil ¿no la cumplirías? ¿Cuánto más, di-

ciéndote: Lávate, y serás limpio?

14

 Entonces bajó y se sumergió siete ve-

ces en el Jordán, conforme a la palabra del 

varón de Dios, y su carne se volvió como 

la carne de un niño, y quedó limpio.

15

 Enseguida volvió al varón de Dios con 

toda su compañía, y fue, se presentó ante 

él, y dijo: He aquí ahora comprendo que 

no hay ’Elohim en toda la tierra, sino en 

Israel. ¡Recibe ahora, te ruego, algún pre-

sente de tu siervo!

16

 Pero él respondió: ¡Vive YHVH, delante 

de quien estoy, que no lo tomaré! E insis-

tió que lo recibiera, pero él no quiso.

17

 Y Naamán dijo: Pues entonces, te rue-

go  que  sea  dada  a  tu  siervo  la  carga  de 

tierra° de un par de mulos, pues tu siervo 

ya no ofrecerá holocausto ni sacrificio a 

otros dioses, sino a YHVH.

18

 En  esto  perdone  YHVH  a  tu  siervo: 

cuando  mi  señor  entre  al  templo  de  Ri-

món para postrarse allí, y se apoye en mi 

mano, y yo me incline en el templo de Ri-

món, cuando yo tenga que inclinarme en 

el templo de Rimón, perdone YHVH a tu 

siervo en esto.

19

 Y él le dijo: Ve en paz. Y se había aleja-

do de él una cierta distancia,

20

 cuando  Giezi,  siervo  de  Eliseo,  va-

rón de Dios, pensó: He aquí mi señor ha 

5.1 Lit. salvación.  5.5 En el texto bíblico, la palabra hebrea sefer, cuando alude a una carta, aparece relacionada, en la mayoría 

de los casos, con la realeza o la administración gubernamental, y tiene una connotación oficial. 

5.5 Prob. se trate de siclos, que 

es la unidad de peso básica (11.4 gramos), aunque el texto hebreo no lo matiza. 

5.11 Prob. se refiere a la parte afectada por la 

lepra (aunque algunos piensan que se trata de una alusión a la Casa). LXX omite hacia el lugar

5.17 Seguramente la petición 

de Naamán tiene como propósito erigir en su país un altar o lugar sagrado para el Dios de Israel. Téngase en cuenta que en las 

creencias antiguas, las deidades estaban ligadas a un territorio, por lo que, para adorarlo fuera de ese lugar, era necesario usar 

algún elemento relacionado con el territorio al que pertenecía esa divinidad. 


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2 Reyes 5:21

388

eximido  a  este  sirio  Naamán  al  no  reci-

bir  de  su  mano  lo  que  traía.  Pero,  ¡vive 

YHVH, que de seguro correré tras él para 

tomar algo suyo!

21

 Así  Giezi  siguió  a  Naamán,  y  cuando 

Naamán vio que corría tras él, se bajó del 

carro  para  recibirlo,  y  preguntó:  ¿Todo 

está bien?

22

 Y  él  dijo:  Todo  bien.  Mi  señor  me  ha 

enviado  diciendo:  He  aquí  que  en  este 

mismo momento han venido a mí desde 

la  serranía  de  Efraín  dos  jóvenes  de  los 

hijos de los profetas: Dales, te ruego, un 

talento de plata y dos mudas de vestidos.

23

 Y  Naamán  dijo:  Acepta  tomar  dos  ta-

lentos; y le insistió, y ató los dos talentos 

de plata en dos talegas con dos mudas de 

ropa, y los entregó a dos de sus siervos, 

que los llevaron delante de él.

24

 Y cuando llegó a Ófel,° los tomó de sus 

manos y los puso en la casa; y despachó a 

los hombres, que se fueron.

25

 Y  él  entró  y  se  detuvo  ante  su  señor. 

Entonces Eliseo le preguntó: ¿De dónde 

vienes, Giezi? Y éste respondió: Tu siervo 

no ha ido a ninguna parte.

26

 Pero él le dijo: ¿No iba mi corazón conti-

go° cuando el hombre se volvió de su carro 

a encontrarte?  ¿Es tiempo este  de  recibir 

plata, y de tomar vestidos, y olivares, y vi-

ñas, y ovejas, y bueyes, y siervos, y criadas?

27

 Por  tanto,  la  lepra  de  Naamán  se 

te  pegará  a  ti,  y  a  tu  descendencia  para 

siempre. Y salió de su presencia leproso, 

blanco como la nieve.

Eliseo y los sirios 

Sitio de Samaria

6

Los hijos de los profetas dijeron a Eli-

seo: He aquí, el lugar donde moramos 

delante de ti es estrecho para nosotros.

2

 Te rogamos que nos permitas ir al Jor-

dán, para que cada uno tome de allí una 

viga, y nos hagamos un lugar para habitar 

allí. Y él respondió: Id.

3

 Pero  uno  dijo:  Te  ruego  que  te  dignes 

venir con tus siervos. Y él respondió: Iré.

4

 Fue pues con ellos, y cuando llegaron al 

Jordán, talaron unos árboles.

5

 Y aconteció que mientras uno derribaba 

un árbol, se le cayó el hierro° al agua; y gri-

tó diciendo: ¡Ay, señor mío! ¡Era prestado!

6

 Y  el  varón  de  Dios  preguntó:  ¿Dónde 

cayó?  Y  le  mostró  el  lugar.  Entonces  él 

cortó un palo, lo echó allí e hizo flotar el 

hierro.

7

 Y dijo: Tómalo. Y él extendió su mano 

y lo tomó.

8

 El  rey  de  Siria  combatía  contra  Israel, 

cuando consultó con sus siervos, y dijo: 

En tal lugar estará mi campamento.

9

 Entonces el varón de Dios envió a decir 

al rey de Israel: Cuídate de pasar por tal lu-

gar, porque por allí van a bajar los sirios.

10

 Y el rey de Israel envió al lugar que el 

varón de Dios le había dicho; así que, al 

prevenirlo, él se guardó de ir allí, y esto 

no una ni dos veces.

11

 Y el corazón del rey de Siria estaba turba-

do por tal motivo, y llamando a sus siervos, 

les preguntó: ¿Acaso no me diréis quién de 

los nuestros está a favor del rey de Israel?

12

 Y uno de sus siervos respondió: No, rey 

y  señor  mío,  sino  que  el  profeta  Eliseo, 

que está en Israel, él revela al rey de Israel 

las palabras que tú hablas en el interior 

de tu aposento.

13

 Y  él  dijo:  Averiguad  dónde  está,  para 

que pueda hacerle prender. Y le fue dicho: 

He aquí está en Dotán.

14

 Entonces envió allá caballos y carros,° 

y un numeroso ejército, los cuales llega-

ron de noche y rodearon la ciudad.

15

 Y  cuando  el  siervo  del  varón  de  Dios 

madrugó  para  salir,  he  aquí  un  ejército 

con caballos y carros° rodeando la ciudad. 

Y su siervo le dijo: ¡Ay, señor mío! ¿Cómo 

haremos?

16

 Pero  él  respondió:  No  tengas  temor, 

porque más son los que están con noso-

tros que los que están con ellos.

17

 Y  oró  Eliseo  diciendo:  ¡Oh  YHVH,  te 

ruego que abras sus ojos para que vea! Y 

YHVH abrió los ojos del siervo, y miró, y 

he aquí el monte estaba repleto de caballos 

y carros° de fuego alrededor de Eliseo.

18

 Y cuando bajaron contra él, Eliseo oró 

a  YHVH,  y  dijo:  ¡Hiere  a  esta  gente  con 

5.24 Esta palabra, además de ser un topónimo, puede significar colina (elevación), o altura fortificada. En este caso, según 

algunos eruditos, podría referirse a una acrópolis situada en el territorio de Samaria. 

5.26 .contigo.  6.5 Es decir, la cabeza de 

hierro del hacha

6.14 Lit. caballo y carro.  6.15 Lit. caballo y carro.  6.17 Lit. y un carro. En todo el capítulo, carro aparece en 

singular, pero con sentido colectivo. 


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2 Reyes 7:3

389

ceguera, te ruego! Y Él los hirió con una 

ceguera°  total  conforme  a  la  palabra  de 

Eliseo.

19

 Entonces Eliseo les dijo: Este no es el 

camino, ni esta es la ciudad; seguidme y 

os llevaré al varón que buscáis. Y los con-

dujo a Samaria.

20

 Y cuando llegaron a Samaria, sucedió 

que Eliseo dijo: ¡Oh YHVH, abre los ojos 

de  éstos  para  que  puedan  ver!  Y  YHVH 

abrió sus ojos, y miraron, y he aquí, esta-

ban en medio de Samaria.

21

 Y cuando el rey de Israel los vio, dijo a 

Eliseo: Padre mío, ¿debo herirlos? ¿Debo 

herirlos?

22

 Y él dijo: No los herirás. ¿Matarías tú a los 

que capturaste con tu espada y con tu arco? 

Pon delante de ellos pan y agua, para que 

coman y beban, y vuelvan a sus señores.

23

 Entonces  preparó°  una  gran  comida 

para  ellos,  y  cuando  hubieron  comido  y 

bebido, los dejó ir, y regresaron a sus se-

ñores; y ya no volvieron a entrar cuadri-

llas° de Siria en la tierra de Israel.

24

 Después de esto, sucedió que Ben-adad 

rey de Siria reunió todo su ejército, y su-

bió y puso sitio a Samaria.

25

 Y hubo una gran hambruna en Sama-

ria,  pues  he  aquí  que  la  habían  sitiado, 

hasta  que  la  cabeza  de  un  asno  llegó  a 

venderse por ochenta piezas de plata,° y 

un cuarto de cab° de estiércol de paloma° 

por cinco piezas de plata.

26

 Y  sucedió  que  el  rey  de  Israel  pasaba 

por el muro, cuando una mujer clamó a 

él diciendo: ¡Ayúdame, mi señor, oh rey!

27

 Pero él dijo: Si YHVH no te salva, ¿de 

dónde te salvaré yo?° ¿Con algo del grane-

ro o del lagar?

28

 Y  agregó  el  rey:  ¿Qué  tienes?  Y  ella 

respondió:  Esta  mujer  me  dijo:  Entrega 

tu hijo para que podamos comerlo hoy, y 

mañana comeremos el mío.

29

 Cocimos, pues, mi hijo y lo comimos; 

y al día siguiente le dije: Entrega tu hijo 

para que podamos comerlo, pero ella ha 

escondido a su hijo.

30

 Cuando el rey escuchó las palabras de 

la  mujer,  mientras  pasaba  por  el  muro, 

rasgó sus vestidos; y el pueblo observó, y, 

he aquí, vestía de saco° sobre su cuerpo.

31

 Entonces dijo: ¡Así me haga ’Elohim, y 

aun me añada, si la cabeza de Eliseo ben 

Safat permanece hoy sobre él!

32

 Y  Eliseo  estaba  sentado  en  su  casa, 

y  los  ancianos  estaban  sentados  con  él, 

cuando  envió°  un  hombre  de  su  parte.° 

Pero antes que el mensajero llegara a él, 

dijo  a  los  ancianos:  ¿Habéis  visto  como 

este  hijo  de  homicida  ha  enviado  a  cor-

tarme la cabeza? Observad cuando llegue 

el emisario, cerrad la puerta y rechazadlo 

con esta.° ¿No se escucha tras él el ruido 

de los pasos de su amo?

33

 Aún hablaba con ellos, cuando he aquí 

el  mensajero°  bajaba  a  él,  y  dijo:  Reco-

nozco  que  esta  desgracia  es  de  parte  de 

YHVH. ¿Qué más podría esperar de parte 

de YHVH?°

Fin del sitio de Samaria

7

Y  Eliseo  dijo:  Oíd  palabra  de  YHVH: 

Así dice YHVH: ¡Mañana a esta hora: 

una medida de flor de harina por un siclo, 

y dos medidas de cebada por un siclo, en 

la puerta de Samaria!

2

 Entonces, el capitán° sobre cuya mano 

se apoyaba el rey, respondió al varón de 

Dios°  diciendo:  Aun  haciendo  YHVH 

ventanas  en  los  cielos,  ¿sucederá  tal 

cosa?  Y  él  respondió:  He  aquí  lo  verás 

con  tus  propios  ojos,  pero  no  comerás 

de ello.

3

 Y había cuatro leprosos a la entrada de 

la puerta que se habían dicho: ¿Por qué 

nos quedamos aquí hasta morir?

6.18 Lit. cegueras.  6.23 Esto es, el rey.  6.23 La palabra hebrea traducida como cuadrillas denota un grupo de soldados que 

realizan una incursión. NLas tropas de Siria ya no volvieron a realizar incursiones en la tierra de Israel

6.25 Las piezas de plata 

quizá sean siclos de plata, pero téngase en cuenta que la palabra hebrea que aparece aquí es distinta a la registrada en 7.1. 

6.25 El cab es una medida de capacidad de áridos; equivale a 1/6 de seah, o a, aproximadamente, 2,2 dm.  6.25 La dificultad de 

esta expresión ha llevado a los traductores a proponer correcciones al TM, ninguna de las cuales resulta del todo satisfactoria. 

6.27 Es decir, ¿de dónde te daré comida?  6.30 Tela áspera que antiguamente se usaba como muestra de contrición o dolor. 

6.32 Esto es, el rey de Israel.  6.32 Lit. de delante de él, o de su presencia.  6.32 Lit. sujetadle con la puerta.  6.33 Teniendo en 

cuenta el registro de 7.2, prob. se refiera al rey en lugar de mensajero. Esto no es tan difícil considerando que la diferencia entre 

ambas palabras hebreas es de una letra. 

6.33 Lit. He aquí esto. La desgracia es de parte de YHVH.  7.2 Esta palabra hebrea 

denota un alto oficial que sirve como ayudante (quizá como portador de escudo) del rey, sobre todo en el campo de batalla. 

7.2 LXX registra a Eliseo


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2 Reyes 7:4

390

4

 Si decidiéramos entrar en la ciudad, la 

hambruna está en la ciudad y moriremos 

allí; y si nos quedamos aquí, también mo-

riremos. Ahora pues, vayamos y pasémo-

nos al ejército de los sirios; si nos dejan 

con  vida,  viviremos,  y  si  nos  matan,  no 

haremos más que morir.

5

 Y se levantaron al alba para ir al cam-

pamento de los sirios, y cuando llegaron 

a la parte exterior del campamento de los 

sirios, he aquí, no había nadie.

6

 Porque  Adonay°  había  hecho  oír  en  el 

campamento  de  los  sirios  estruendo  de 

carros, y ruido de caballos, y estrépito de 

un gran ejército; y cada uno había dicho 

a su compañero: ¡He aquí el rey de Israel 

ha tomado a sueldo contra nosotros a los 

reyes de los hititas y a los reyes de Egipto 

para que vengan contra nosotros!

7

 Por  lo  que  se  levantaron  y  huyeron  al 

anochecer,  abandonando  sus  tiendas,  y 

sus caballos, y sus asnos; dejando el cam-

pamento tal como estaba, y habían huido 

por sus vidas.

8

 Cuando estos leprosos llegaron a la parte 

exterior del campamento, entraron en una 

tienda, y comieron y bebieron, y sacaron de 

allí plata, y oro, y vestidos, y se fueron y lo 

escondieron; luego regresaron y entraron 

en otra tienda, y también se llevaron cosas 

de allí, y se fueron y las escondieron.

9

 Después se dijeron el uno al otro: No es 

bueno lo que hacemos; este día es día de 

albricias, pero nosotros callamos, y si nos 

quedamos hasta la mañana, nuestra ini-

quidad nos alcanzará. Vayamos pues, en-

tremos, e informemos en la casa del rey.

10

 Y fueron y llamaron al centinela° de la 

ciudad, y les° informaron, diciendo: He-

mos ido al campamento de los sirios, y he 

aquí,  no  hay  allí  hombre,  ni  voz  alguna 

de hombre, sino caballos y asnos atados, 

y las tiendas intactas.

11

 Entonces los centinelas gritaron, y lo 

anunciaron dentro de la casa real.

12

 Y  el  rey  se  levantó  de  noche,  y  dijo 

a  sus  siervos:  Ahora  os  diré  lo  que  han 

planeado°  los  sirios:  Saben  que  estamos 

hambrientos, y han salido del campamen-

to para esconderse en el campo, diciendo: 

Cuando salgan de la ciudad, los prendere-

mos vivos y entraremos en la ciudad.

13

 Uno  de  sus  siervos  tomó  entonces  la 

palabra y dijo: Tómense cinco de los ca-

ballos que restan y enviémoslos y veamos, 

pues  los  que  en  ella  han  quedado  van  a 

correr igual suerte que toda la multitud 

de israelitas que ya ha perecido.

14

 Tomaron entonces dos carros con ca-

ballos, y el rey los envió tras el ejército de 

los sirios, diciendo: Id, y ved.

15

 Y  fueron  tras  ellos  hasta  el  Jordán,  y 

he  aquí,  todo  el  camino  estaba  lleno  de 

vestidos y utensilios que los sirios habían 

arrojado  en  su  apuro.  Y  volvieron  los 

mensajeros e informaron al rey.

16

 Entonces el pueblo salió y tomó el des-

pojo  del  campamento  de  los  sirios.  Así, 

una medida de flor de harina fue vendida 

por un siclo, y dos medidas de cebada por 

un siclo, conforme a la palabra de YHVH.

17

 Y el rey había puesto junto a la puerta 

al capitán en cuya mano se apoyaba, y el 

pueblo lo pisoteó° en la puerta, y murió, 

tal como había dicho el varón de Dios, que 

había hablado cuando el rey bajó a él.

18

 Sucedió  pues  como  el  varón  de  Dios 

había hablado al rey, diciendo: ¡Dos medi-

das de cebada por un siclo, y una medida 

de flor de harina por un siclo, mañana a 

estas horas, en la puerta de Samaria!

19

 Y el capitán había respondido al varón 

de Dios, diciendo: He aquí, aun haciendo 

YHVH  ventanas  en  los  cielos,  ¿sucederá 

tal cosa? Y él había respondido: He aquí 

lo verás con tus propios ojos, pero no co-

merás de ello.

20

 Y le sucedió así, pues el pueblo lo atro-

pelló en la puerta, y murió.

Eliseo en Damasco 

Joram y Ocozías

8

Y Eliseo había hablado a aquella mujer 

a  cuyo  hijo  había  resucitado,  dicien-

do: Levántate y vete, tú y tu casa, y vive 

donde puedas,° porque YHVH ha llamado 

7.6 Muchos mss. registran YHVH.  7.10 Se refiere al guardia (o guardias) que estaba en la entrada de la ciudad. Algunos mss. 

registran guardias. LXX y VUL registran puerta (en hebreo, la diferencia entre ambas palabras es tan solo vocálica). 

7.10 Es 

decir, a los guardias. Esta falta de concordancia aparece a menudo en el TM. 

7.12 Lit. nos han hecho.  7.17 Heb. verbo ramás 

pisar, o pisotear. No indica ni ausencia ni presencia de intención. Se usa en Is.41.25 respecto al alfarero que pisa el barro, o 

en Is.63.3 para referirse a pisar la uva. 

8.1 Lit. ve… y vive donde vivas


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2 Reyes 8:26

391

al hambre, la cual vendrá también sobre 

esta tierra por siete años.

2

 Y la mujer se levantó e hizo conforme a 

la palabra del varón de Dios, y se fue con 

los  de  su  casa,  y  habitó  como  extranje-

ra en tierra de los filisteos durante siete 

años.

3

 Y  sucedió  al  cabo  de  siete  años  que  la 

mujer volvió de la tierra de los filisteos, 

y salió para implorar al rey por su casa, y 

por su terreno.

4

 Y el rey hablaba a Giezi, siervo del varón 

de Dios, diciendo: Cuéntame ahora todos 

los prodigios que ha hecho Eliseo.

5

 Y  sucedió,  mientras  él  contaba  al  rey 

cómo había resucitado al muerto, he aquí 

la  mujer  a  cuyo  hijo  había  resucitado, 

llegó implorando al rey por su casa y por 

su terreno. Entonces dijo Giezi: Mi señor 

el rey, ésta es la mujer, y éste su hijo, a 

quien Eliseo resucitó.

6

 Entonces el rey preguntó a la mujer, y 

ella le contó. Después el rey le asignó un 

oficial  de  la  corte,  diciendo:  Restituye° 

todo lo que tenía, y todos los frutos cose-

chados del campo desde el día que dejó el 

país hasta ahora.

7

 Y Eliseo fue a Damasco, y Ben-adad, rey 

de Siria, estaba enfermo, y le dijeron: El 

varón de Dios ha venido aquí.

8

 Y el rey dijo a Hazael: Toma en tu mano 

un presente, y ve al encuentro del varón 

de Dios, y consulta a YHVH por medio de 

él, y pregunta: ¿Sanaré de esta enferme-

dad?

9

 Hazael fue pues a su encuentro lleván-

dose consigo un presente de lo mejor de 

Damasco,  una  carga  de  cuarenta  came-

llos, y se detuvo ante él, y le dijo: Tu hijo 

Ben-adad, rey de Siria, me envía a ti, pre-

guntando: ¿Sanaré de esta enfermedad?

10

 Y Eliseo le respondió: Ve, dile: De se-

guro sanarás. Aunque YHVH me ha mos-

trado que ciertamente morirá.

11

 Y lo miró fijamente hasta que se aver-

gonzó. Entonces el varón de Dios rompió 

a llorar.

12

 Y Hazael dijo: ¿Por qué llora mi señor? 

Y él dijo: Porque sé el mal que harás a los 

hijos de Israel: a sus fortalezas prenderás 

fuego, a sus jóvenes matarás a espada, y 

estrellarás a sus niños, y abrirás el vientre 

a sus mujeres embarazadas.

13

 Hazael dijo: Pero ¿qué es tu siervo, este 

perro, para que haga tan grandes cosas? Y 

Eliseo dijo: YHVH me ha mostrado que tú 

serás rey de Siria.

14

 Y  se  alejó  de  Eliseo  y  fue  a  su  señor, 

quien le dijo: ¿Qué te ha dicho Eliseo? Y él 

dijo: Me ha dicho que de seguro sanarás.

15

 Y  sucedió  que  al  día  siguiente,  tomó 

un cobertor, lo empapó en agua y lo ten-

dió sobre su rostro, y murió. Y reinó Ha-

zael en su lugar.

16

 En el año quinto de Joram ben Acab, 

rey de Israel, siendo Josafat rey de Judá, 

comenzó° a reinar Joram ben Josafat, rey 

de Judá.

17

 Cuando comenzó a reinar era de treinta y 

dos años, y reinó ocho años en Jerusalem.

18

 Y anduvo en el camino de los reyes de 

Israel,  como  la  casa  de  Acab,  pues  una 

hija de Acab fue su mujer, e hizo lo malo 

a ojos de YHVH.

19

 Pero  YHVH  no  quiso  destruir  a  Judá 

a causa de su siervo David, pues le había 

prometido  darle  a  él  y  a  sus  hijos  una 

lámpara para siempre.°

20

 En sus días se rebeló Edom contra el 

dominio° de Judá, e hicieron que un rey 

reinase sobre ellos.

21

 Y  Joram  avanzó  a  Zair  con  todos  los 

carros; y se levantó de noche y él mismo 

venció a Edom, que lo había rodeado jun-

to con los capitanes de los carros; enton-

ces el pueblo huyó a sus tiendas.

22

 Pero Edom siguió en rebelión contra 

el  dominio  de  Judá  hasta  hoy.  En  aquel 

tiempo también se rebeló Libna.

23

 El resto de los hechos de Joram, y todo 

lo que hizo, ¿no están escritos en el rollo 

de las Crónicas de los reyes de Judá?

24

 Y durmió Joram con sus padres, y fue 

sepultado con sus padres en la ciudad de 

David, y su hijo Ocozías reinó en su lugar.

25

 En  el  año  duodécimo  de  Joram  ben 

Acab,  rey  de  Israel,  comenzó  a  reinar 

Ocozías ben Joram, rey de Judá.

26

 Ocozías  era  de  veintidós  años  cuan-

do comenzó a reinar, y reinó un año en 

8.6 Se entiende, a la mujer.  8.16 Es decir, comenzó a reinar junto con su padre.  8.19 Hebraísmo que expresa la perdurabilidad 

de una dinastía. 

8.20 Lit. la mano.


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2 Reyes 8:27

392

Jerusalem.  El  nombre  de  su  madre  era 

Atalía, hija de Omri, rey de Israel.

27

 Y  anduvo  en  el  camino  de  la  casa  de 

Acab,  e  hizo  lo  malo  a  ojos  de  YHVH 

como la casa de Acab, porque era yerno 

de la casa de Acab.

28

 Y fue con Joram ben Acab a la guerra 

contra Hazael rey de Siria en Ramot de Ga-

laad, pero los sirios vencieron° a Joram.

29

 Y el rey Joram regresó para ser curado 

en Jezreel de las heridas que los sirios le 

habían hecho° en Ramá, cuando comba-

tía contra Hazael, rey de Siria. Entonces 

Ocozías  ben  Joram,  rey  de  Judá,  bajó  a 

Jezreel para ver a Joram ben Acab, porque 

estaba enfermo.

Jehú, mano vengadora de Dios

9

Y el profeta Eliseo llamó a uno de los 

hijos de los profetas y le dijo: Ciñe tus 

lomos,  toma  esta  vasija  de  aceite  en  tu 

mano y ve a Ramot de Galaad.

2

 Cuando llegues allí, visita en aquel lu-

gar a Jehú ben Josafat, hijo de Nimsi; en-

tonces entra, haz que se levante de entre 

sus hermanos, y llévalo a una habitación 

interior.

3

 Toma después la vasija de aceite, derrá-

malo sobre su cabeza y di: Así dice YHVH: 

¡Yo te he ungido por rey sobre Israel! Lue-

go abre la puerta y huye; no esperes.

4

 Fue pues el joven, el joven profeta, a Ra-

mot de Galaad.

5

 Y cuando llegó, he aquí que los capita-

nes del ejército estaban sentados. Y dijo: 

Oh príncipe, tengo una palabra para ti. Y 

Jehú dijo: ¿Para quién de todos nosotros? 

Y él dijo: Para ti, oh príncipe.

6

 Y él se levantó y entró en la casa, y Eli-

seo  derramó  el  aceite  sobre  su  cabeza  y 

le dijo: Así dice YHVH Dios de Israel: ¡Te 

he ungido como rey sobre Israel, pueblo 

de YHVH!°

7

 Herirás la casa de tu señor Acab, así ven-

garé la sangre de mis siervos los profetas 

y la sangre de todos los siervos de YHVH, 

de mano de Jezabel.

8

 Y  desaparecerá  toda  la  casa  de  Acab, 

pues extirparé de Acab todo meante a la 

pared, tanto al que está en servidumbre, 

como al que es libre en Israel.

9

 Y dejaré la casa de Acab como la casa de 

Jeroboam  ben  Nabat,  y  como  la  casa  de 

Baasa ben Ahías.

10

 Y  los  perros  comerán  a  Jezabel  en  el 

campo de Jezreel, y no habrá quien la se-

pulte. Y abrió la puerta y huyó.

11

 Después Jehú salió a los siervos de su 

señor, y uno le preguntó: ¿Todo en paz? 

¿Por qué vino a ti ese loco? Y les respon-

dió:  Vosotros  conocéis  a  ese  varón  y  su 

conversación.

12

 Pero dijeron: No es cierto. Dinos aho-

ra. Y él dijo: Así y así me ha hablado, di-

ciendo: Así dice YHVH: ¡Te he ungido por 

rey sobre Israel!

13

 Entonces  cada  uno  se  apresuró  a  to-

mar su manto y ponerlo debajo de él en 

un tramo de la escalera, y dieron soplido 

al shofar, y exclamaron: ¡Jehú reina!

14

 Así  se  conjuró  Jehú  ben  Josafat,  hijo 

de  Nimsi,  contra  Joram.  (Por  entonces 

Joram y todo Israel defendían a Ramot de 

Galaad por causa de Hazael rey de Siria,

15

 pero el rey Joram había regresado para 

ser curado en Jezreel de las heridas que 

le  habían  hecho  los  sirios  cuando  com-

batía contra Hazael, rey de Siria.) Enton-

ces Jehú dijo: Si es vuestra voluntad, que 

ninguno escape y salga de la ciudad para 

contarlo en Jezreel.

16

 Luego  Jehú  mismo  cabalgó  y  fue  a 

Jezreel,  porque  Joram  estaba  allí  enfer-

mo. Y Ocozías rey de Judá también había 

bajado para visitar a Joram.

17

 Entonces el vigía que estaba en la to-

rre de Jezreel, vio venir a la tropa de Jehú, 

y dijo: Veo una tropa. Y Joram dijo: Toma 

un jinete y envíalo a su encuentro, y que 

pregunte: ¿Hay paz?

18

 Salió, pues, el jinete a su encuentro y 

dijo: El rey dice así: ¿Hay paz? Y respondió 

Jehú: ¿Qué tienes tú que ver con la paz? 

¡Vuélvete detrás de mí! Y el vigía informó, 

diciendo: El mensajero llegó hasta ellos, 

pero no regresa.

19

 Entonces envió un segundo jinete, que 

fue hacia ellos y dijo: El rey dice así: ¿Hay 

paz?  Pero  Jehú  dijo:  ¿Qué  tienes  tú  que 

ver con la paz? ¡Vuélvete detrás de mí!

20

 Y el vigía informó diciendo: Llegó has-

ta ellos pero no regresa, y la manera de 

8.28 Lit. golpear fuertemente, herir y, por extensión, matar.  8.29 Lit. le habían herido.  9.6 sujeto elíptico.


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2 Reyes 10:6

393

conducir es como la de Jehú ben Nimsi, 

porque conduce impetuosamente.

21

 Entonces Joram dijo: ¡Unce!° Y le un-

cieron su carro; y salió Joram rey de Is-

rael con Ocozías, rey de Judá, cada uno en 

su  carro.  Salieron  pues  al  encuentro  de 

Jehú, y lo hallaron en el campo de Nabot 

jezreelita.

22

 Y  sucedió  que  cuando  Joram  vio  a 

Jehú, preguntó: ¿Hay paz, Jehú? Pero él 

respondió:  ¿Qué  paz,  siendo  tantas  las 

prostituciones de tu madre Jezabel, y sus 

muchas hechicerías?

23

 Entonces  Joram  volvió  sus  manos° 

para huir, y dijo a Ocozías: ¡Es traición, 

Ocozías!

24

 Pero Jehú tensó su arco, e hirió a Joram 

entre los hombros, y la flecha salió por el 

corazón, y se desplomó en su carro.

25

 Y dijo a Bidcar, su capitán: Levántalo 

y  échalo  en  el  campo  de  Nabot  jezreeli-

ta,  pues  recuerda:  Tú  y  yo  montábamos 

juntos tras su padre Acab, cuando YHVH 

levantó contra él esta sentencia:°

26

 Oráculo de YHVH: ¿No vi ayer la derra-

mada sangre de Nabot y la sangre de sus 

hijos? Yo voy a recompensarte por ello en 

este mismo sitio, dice YHVH. Así que, le-

vántalo y échalo en ese campo, conforme 

a la palabra de YHVH.

27

 Cuando Ocozías rey de Judá vio esto, 

huyó por el camino de Bet-hagán,° pero 

Jehú  lo  persiguió  diciendo:  ¡Herid  tam-

bién a ese en el carro! Y lo hirieron en la 

subida  de  Gur,  que  está  junto  a  Ibleam, 

pero él huyó a Meguido, donde murió.

28

 Y sus siervos lo llevaron en carro a Je-

rusalem,  y  lo  sepultaron  en  su  sepulcro 

con sus padres, en la ciudad de David.

29

 Y  Ocozías  había  comenzado  a  reinar 

sobre Judá en el año undécimo de Joram 

ben Acab.

30

 Cuando Jehú llegó a Jezreel, Jezabel lo 

supo, y se pintó sus ojos con antimonio, 

y se adornó su cabeza, y miró a través de 

la ventana.

31

 Y  cuando  Jehú  entraba  por  la  puerta 

de  la  ciudad,°  ella  dijo:  ¿Hubo  paz  para 

Zimri, asesino de su señor?°

32

 Entonces  él  alzó  su  rostro  hacia  la 

ventana,  y  dijo:  ¿Quién  está  conmigo? 

¿Quién?° Y dos o tres eunucos se asoma-

ron desde arriba.

33

 Y él les dijo: ¡Echadla abajo! Y la echa-

ron abajo, y parte de su sangre salpicó la 

pared y los caballos, y él la pisoteó.

34

 Cuando él hubo entrado, comió y be-

bió, y después dijo: ¡Ocupaos de esa mal-

dita y sepultadla, pues es hija de un rey!

35

 Fueron pues a sepultarla, pero no en-

contraron de ella más que la calavera, los 

pies, y las palmas de las manos.

36

 Y volvieron, y le informaron. Y él dijo: 

Es obra de YHVH, que habló por medio° 

de su siervo Elías tisbita, diciendo: En el 

campo  de  Jezreel  comerán  los  perros  la 

carne de Jezabel.

37

 Y  el  cadáver  de  Jezabel  fue  como  es-

tiércol sobre la faz del campo, en la here-

dad de Jezreel, para que no puedan decir: 

Esta es Jezabel.

Jehú, rey de Israel

10

Acab  tenía  setenta  hijos  en  Sa-

maria; y Jehú escribió cartas y las 

envió a Samaria, a los jefes de Jezreel, a 

los ancianos, y a los tutores de Acab, di-

ciendo:

2

 Ahora, al llegar esta carta a vosotros, ya 

que los hijos de vuestro señor están con 

vosotros, y tenéis con vosotros los carros 

y los caballos, y también ciudades fortifi-

cadas, y armamento,

3

 elegid pues al mejor y al más recto de 

los hijos de vuestro señor, y ponedlo en el 

trono de su padre, y luchad por la casa de 

vuestro señor.

4

 Pero ellos tuvieron gran temor, pues de-

cían: He aquí los dos reyes no le resistie-

ron, ¿cómo lograremos resistir nosotros?

5

 Y el que estaba sobre el palacio, y el que 

estaba sobre la ciudad, y los ancianos, y 

los tutores, enviaron a decir a Jehú: ¡So-

mos  tus  siervos  y  haremos  todo  lo  que 

nos digas! No proclamaremos rey a nadie; 

haz lo que te parezca bien ante tus ojos.

6

 Y él les escribió una segunda carta, di-

ciendo: Si estáis conmigo y hacéis caso a 

9.21 Esto es, a uno de sus servidores.  9.23 Prob. se refiere a la acción volver las riendas tirando de ellas para emprender la hui-

da. 

9.25 Lit. carga, peso.  9.27 Esto es, casa del huerto.  9.31 .de la ciudad.  9.31 

→1 R.16.8-10.  9.32 LXX registra ¿Quién 

eres tú? Baja conmigo

9.36 Lit. por mano de.


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2 Reyes 10:7

394

mi voz, tomad las cabezas de los hombres, 

los  hijos  de  vuestro  señor,  y  venid  a  mí 

mañana a esta hora a Jezreel. Y los hijos 

del rey (que eran setenta hombres) esta-

ban con los grandes de la ciudad, quienes 

los educaban.

7

 Y cuando la carta llegó a ellos, sucedió 

que ellos tomaron a los hijos del rey y los 

degollaron (setenta personas), y pusieron 

sus cabezas en canastos, y se las enviaron 

a Jezreel.

8

 Y  llegó  un  mensajero  que  le  informó, 

diciendo:  ¡Han  traído  las  cabezas  de  los 

hijos del rey! Y él respondió: Que hagan 

con ellas dos montones en la puerta de la 

ciudad, hasta la mañana.

9

 Y  sucedió  por  la  mañana,  que  salió  y 

puesto de pie, dijo a todo el pueblo: Vo-

sotros sois justos. He aquí yo me conju-

ré contra mi señor y le di muerte, ¿pero 

quién ha dado muerte a todos estos?

10

 Sabed por tanto que ninguna de las pa-

labras de YHVH, que YHVH habló acerca 

de la casa de Acab, caerá a tierra, porque 

YHVH ha hecho lo que dijo por medio de 

su siervo Elías.

11

 Y Jehú dio muerte a todos los que ha-

bían quedado de la casa de Acab en Jezreel, 

a todos sus grandes, a sus amigos, y a sus 

sacerdotes, hasta no dejarles remanente.

12

 Luego se levantó y partió hacia Sama-

ria; y estando de camino junto a una casa 

de esquileo° de pastores,

13

 Jehú encontró a los hermanos de Oco-

zías, rey de Judá, y dijo: ¿Quiénes sois? Y 

dijeron: Somos los hermanos de Ocozías, 

y bajamos a saludar a los hijos del rey y a 

los hijos de la reina.

14

 Entonces ordenó: ¡Prendedlos vivos! Y 

los prendieron vivos, y los degollaron jun-

to  al  pozo  de  Bet-equed:  cuarenta  y  dos 

hombres, y no quedó ninguno de ellos.

15

 Luego se fue de allí y encontró a Jona-

dab  ben  Recab,  que  iba  a  su  encuentro. 

Lo saludó y le dijo: ¿Es recto tu corazón 

como mi corazón con el tuyo? Y Jonadab 

respondió: Lo es. Entonces añadió:° Si lo 

es, dame tu mano. Y le dio la mano, y lo 

hizo subir al carro,

16

 y le dijo: Ven conmigo y comprueba mi 

celo por YHVH. E hicieron que se monta-

ra en su carro.

17

 Y cuando llegó a Samaria mató a todos 

los que habían quedado de Acab en Sama-

ria,  hasta  que  hubo  destruido  a  toda  su 

estirpe, conforme a la palabra de YHVH, 

que había hablado a Elías.

18

 Después Jehú convocó a todo el pueblo 

y  les  dijo:  Acab  sirvió  poco  a  Baal,  pero 

Jehú lo servirá mucho.

19

 Ahora  pues,  convocadme  a  todos  los 

profetas  de Baal, a todos  sus  siervos  y  a 

todos  sus  sacerdotes:  que  no  falte  nin-

guno, pues tengo un gran sacrificio para 

Baal, y todo el que falte, no sobrevivirá. 

Así obraba Jehú con astucia para extermi-

nar a los servidores de Baal.

20

 Y dijo Jehú: ¡Proclamad una asamblea 

solemne para Baal! Y la proclamaron.

21

 Y Jehú envió por todo Israel, y fueron 

todos los siervos de Baal, y no quedó nin-

guno que no fuera. Y entraron en el tem-

plo de Baal, y el templo de Baal se llenó de 

un extremo a otro.

22

 Después dijo al encargado del vestua-

rio: ¡Traed vestiduras para todos lo siervos 

de Baal! Y sacó para ellos vestimenta.

23

 Luego Jehú entró con Jonadab ben Re-

cab en el templo de Baal, y dijo a los siervos 

de Baal: Buscad para cercioraros de que no 

haya aquí con vosotros alguno de los sier-

vos de YHVH, sino sólo los siervos de Baal.

24

 Y cuando ellos entraron para brindar 

sacrificios y holocaustos, Jehú puso fuera 

a ochenta hombres y les dijo: Quien deje 

escapar a alguno de los hombres° que he 

puesto  en  vuestras  manos,  dará  su  vida 

por la del otro.°

25

 Y  sucedió  que  cuando  acabaron  de 

brindar  el  holocausto,  Jehú  dijo  a  los 

guardias reales° y a los capitanes: ¡Entrad 

y  matadlos;  que  no  salga  ninguno!  Los 

mataron pues a filo de espada, y los guar-

dias  reales  y  los  capitanes  los  arrojaron 

fuera. Luego avanzaron hasta la ciudadela 

del templo de Baal,°

26

 y  sacaron  los  ídolos°  del  templo  de 

Baal y los quemaron;

10.12 Lit., beth-eqed. Prob. topónimo.  10.15 .Entonces añadió.  10.24 Lit. el hombre que escape alguno de los hombres.  10.24 

Lit. su vida por su vida

10.25 Lit. los corredores. Prob. algún tipo de escolta que acompañaba al rey, quizá corriendo junto a su 

carruaje. 

→2 S.15.1.  10.25 LXX registra hasta la ciudadela del rey.  10.26 Esto es, los objetos de adoración


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2 Reyes 11:13

395

27

 y  destruyeron  el  pilar  de  Baal,  y  de-

rrumbaron el templo de Baal, el cual con-

virtieron en letrina hasta hoy.

28

 Así Jehú extirpó a Baal de Israel.

29

 Sin  embargo,  en  cuanto  los  pecados 

con que Jeroboam ben Nabat había hecho 

pecar a Israel, Jehú no se apartó de ellos, 

es decir, de los becerros de oro que esta-

ban en Bet-’El y en Dan.

30

 Y  YHVH  dijo  a  Jehú:  Por  cuanto  has 

obrado  bien  haciendo  lo  recto  ante  mis 

ojos, y has hecho a la casa de Acab con-

forme a todo lo que estaba en mi corazón, 

tus hijos se sentarán en el trono de Israel 

hasta la cuarta generación.°

31

 Pero Jehú no se cuidó de andar en las 

enseñanzas° de YHVH Dios de Israel con 

todo su corazón, ni se apartó de los pe-

cados de Jeroboam, por los cuales había 

hecho pecar a Israel.

32

 En  aquellos  días  YHVH  comenzó  a 

cercenar° a Israel, y Hazael los atacó en 

todos los confines de Israel:

33

 desde el Jordán al oriente, toda la tie-

rra  de  Galaad,  los  gaditas,  los  rubenitas 

y los manasitas, desde Aroer, junto al to-

rrente de Arnón, hasta Galaad y Basán.

34

 El resto de los hechos de Jehú, todo lo 

que hizo y todo su valor, ¿no están escri-

tos en el rollo de las Crónicas de los reyes 

de Israel?

35

 Y  durmió  Jehú  con  sus  padres,  y  lo 

sepultaron  en  Samaria;  y  su  hijo  Joacaz 

reinó en su lugar.

36

 El tiempo que reinó Jehú sobre Israel 

en Samaria fue de veintiocho años.

Atalía usurpa el trono de Judá

11

Cuando Atalía, madre de Ocozías, vio 

que su hijo había muerto, se levantó 

para destruir° a toda la estirpe real.

2

 Pero Josaba, hija del rey Joram y herma-

na de Ocozías, tomó a Joás ben Ocozías, 

y furtivamente lo quitó de entre los hijos 

del rey que estaban siendo asesinados, y 

lo  escondió  con  su  nodriza  en  un  cuar-

to. Así lo escondieron de Atalía, y no fue 

asesinado.

3

 Y estuvo escondido con ella en la Casa 

de  YHVH  seis  años.  Entre  tanto,  Atalía 

reinaba en el país.

4

 Pero  en  el  año  séptimo,  Joiada  envió  y 

tomó a los capitanes de centuria de los ce-

reteos° y de la guardia real, y los llevó con-

sigo a la Casa de YHVH, e hizo una alianza 

con ellos, y les tomó juramento en la Casa 

de YHVH, y les mostró al hijo del rey.

5

 Luego  les  ordenó,  diciendo:  Esto  es  lo 

que haréis: Un tercio de vosotros, que ha-

céis la guardia el shabbat, se ocuparán de 

la guardia de la casa real:

6

 un tercio estará en la puerta de Shur,° 

y otro tercio en la puerta detrás de la es-

colta real, y haréis por turno la guardia° 

de la Casa.

7

 Y las otras dos secciones de entre voso-

tros,°  todos  los  que  salen  de  servicio  el 

shabbat, montarán la guardia en la Casa 

de YHVH, junto al rey.

8

 Y rodearéis bien al rey, cada uno con sus 

armas en la mano, y quien pretenda pe-

netrar en las filas será muerto; asimismo 

acompañaréis al rey cuando salga y cuan-

do entre.

9

 Y  los  capitanes  de  centuria  hicieron 

conforme a todo lo que el sacerdote Joia-

da había ordenado, y cada uno tomó a sus 

hombres, los que entraban el shabbat con 

los que salían el shabbat, y fueron al sa-

cerdote Joiada.

10

 Y el sacerdote entregó a los capitanes 

de centuria la lanza y los escudos que ha-

bían sido del rey David, que estaban en la 

Casa de YHVH.

11

 Y  los  de  la  escolta,  cada  uno  con  sus 

armas en la mano, se emplazaron desde 

el lado sur de la Casa hasta el lado norte,° 

mirando hacia el altar y la Casa, alrededor 

del rey.

12

 Sacó° luego al hijo del rey, le puso la 

corona,  le  dio  el  Testimonio,°  y  lo  pro-

clamó  rey,  y  lo  ungieron,  y  aplaudieron 

gritando: ¡Viva el rey!

13

 Cuando  Atalía  oyó  el  tumulto  de  la 

guardia y del pueblo, se acercó al pueblo 

en la Casa de YHVH.

10.30 Lit. los hijos de la cuarta se te sentarán en el trono de Israel.  10.31 Nley o instrucción.  10.32 Es decir, comenzó a 

hacerlo perder territorio

11.1 Es decir, se dispuso a exterminar a la descendencia real.  11.4 Los quereteos eran mercenarios 

extranjeros que servían en Judá como guardias del rey. 

11.6 Esto es, de las caballerizas.  11.6 Lit. guardaréis la guardia.  11.7 

Esto es, los soldados que protegían al rey

11.11 Lit. desde el lado derecho hasta el lado izquierdo. Forma de referirse al sur y 

al norte respectivamente. 

11.12 Esto es, el sacerdote Joiada.  11.12 Esto es, el Rollo de la Ley


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2 Reyes 11:14

396

14

 Y miró, y he aquí el rey estaba de pie 

junto  a  la  columna,  conforme  a  la  cos-

tumbre,  y  los  príncipes  y  las  trompetas 

junto al rey, y todo el pueblo de la tierra 

estaba alegre y tocaba las trompetas. En-

tonces Atalía, rasgó sus vestidos y gritó: 

¡Traición! ¡Traición!

15

 Y el sacerdote Joiada mandó a los capi-

tanes de centuria encargados de la tropa, 

y les dijo: ¡Dejadla salir entre las filas,° y 

quien la siga, matadlo a espada! Pues el 

sacerdote había ordenado: ¡No sea muerta 

en la Casa de YHVH!

16

 Le dieron pues paso, y ella salió al ca-

mino por donde entran los caballos a la 

casa del rey, y allí fue ejecutada.

17

 Y Joiada hizo pacto entre YHVH y el rey 

y el pueblo, de que ellos serían el pueblo de 

YHVH,° asimismo entre el rey y el pueblo.

18

 Y todo el pueblo de la tierra fue al tem-

plo de Baal, y lo destruyeron; destrozaron 

completamente° sus altares y sus imáge-

nes, y mataron a Matán, sacerdote de Baal, 

ante los altares. Y el sacerdote estableció 

la vigilancia° para la Casa de YHVH.

19

 Después tomó a los capitanes de cen-

turia, a los quereteos, a los de la escolta, 

y a todo el pueblo de la tierra, e hicieron 

bajar al rey desde la Casa de YHVH, y en-

traron a la casa real por el camino de la 

entrada de la escolta, y él se sentó en el 

trono de los reyes.

20

 Y todo el pueblo de la tierra se alegró, 

y la ciudad reposó, pues habían matado a 

espada a Atalía en la casa real.

21

 Era Joás de siete años cuando comen-

zó a reinar.°

Joás, rey de Judá

12

En el año séptimo de Jehú comen-

zó a reinar Joás, y reinó cuarenta 

años en Jerusalem. El nombre de su ma-

dre era Sibia, de Beerseba.

2

 Y  Joás  hizo  lo  recto  ante  los  ojos  de 

YHVH todos sus días en que el sacerdote 

Joiada lo instruía.

3

 Sólo  que  no  se  abandonaron  los  luga-

res altos,° pues el pueblo todavía seguía 

sacrificando° y quemando incienso en los 

lugares altos.

4

 Y Joás dijo a los sacerdotes: Toda la plata 

consagrada que se acostumbra traer a la 

Casa de YHVH, tanto la plata del rescate 

de  cada  persona,  según  está  estipulado, 

así  como  la  plata  que  cada  uno  trae  vo-

luntariamente° a la Casa de YHVH,

5

 recíbanlo  los  sacerdotes,  cada  uno  de 

parte de su administrador, y reparen ellos 

los portillos de la Casa dondequiera que 

se hallen grietas.

6

 Pero  sucedió  que  en  el  año  vigésimo 

tercero del rey Joás, los sacerdotes aún no 

habían reparado los daños de la Casa.

7

 Y el rey Joás llamó al sacerdote Joiada y 

a los sacerdotes, y les dijo: ¿Por qué no ha-

béis reparado los daños de la Casa? Ahora 

pues, no os quedaréis más con la plata de 

vuestros conocidos, sino que la entregaréis 

para reparar los daños de la Casa.

8

 Y los sacerdotes consintieron en no to-

mar más dinero del pueblo, ni estar a car-

go de reparar los daños de la Casa.

9

 Pero el sumo sacerdote Joiada tomó un 

cofre, le hizo un agujero en su tapa y lo 

puso junto al altar, a la derecha, según se 

entra en la Casa de YHVH, y los sacerdo-

tes que guardaban la puerta depositaban 

allí toda la plata que era llevada a la Casa 

de YHVH.

10

 Y fue así que cuando veían que había 

mucha plata en el cofre, el escriba del rey 

y el sumo sacerdote iban y contaban, y co-

locaban en bolsas° la plata que se hallaba 

en la Casa de YHVH.

11

 Y  entregaban  la  plata  que  habían 

contado  en  las  manos  de  los  que  esta-

ban encargados de la obra en la Casa de 

YHVH, quienes pagaban a los carpinteros 

y constructores que reparaban la Casa de 

YHVH,

12

 y  a  los  albañiles  y  canteros,  y  por  la 

compra  de  madera  y  piedra  tallada  para 

11.15 Prob. llevadla escoltada.  11.17 Es decir, a guardarle fidelidad y no ir tras otros dioses.  11.18 Lit. destrozaron perfec-

tamente

11.18  Lit.  guardias.  Es  decir,  turnos  de  guardia.  11.21  El TM  coloca  este  v.  como  12.1.  Ello  provoca  desfase  de 

numeración del c.12 respecto a otras versiones. Por consiguiente el c.12 tiene un v. más en el texto hebreo pero el contenido no 

varía.  

12.3 Los lugares altos eran sitios considerados sagrados por algún motivo especial; generalmente se trataba de sitios 

elevados en los que se consideraba que se podía estar más cerca de la divinidad, aunque también podían ser lugares tenidos 

como sagrados por la presencia de algún elemento especial (como cierto tipo de árboles) o por algún suceso de importancia 

religiosa, todo ello relacionado con la influencia de adoración idolátrica de los cananeos. 

12.3 El verbo implica principalmente 

sacrificios idólatras realizados con regularidad. 

12.4 Lit. que sube al corazón de cada uno.  12.10 Lectura probable.


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2 Reyes 13:12

397

reparar  las  averías  de  la  Casa  de  YHVH, 

y por todo lo que se hacía para reparar la 

Casa.

13

 Pero de aquella plata que ingresó en la 

Casa de YHVH, no hicieron para la Casa 

de  YHVH  tazas  de  plata,  ni  despabilade-

ras, ni tazones, ni trompetas, ni ningún 

utensilio  de  oro,  ni  ningún  utensilio  de 

plata;

14

 sino  que  lo  entregaban  a  los  que  ha-

cían la obra, y reparaban con ello la Casa 

de YHVH.

15

 Además, no exigían cuentas a los hom-

bres en cuya mano se entregaba la plata 

para  hacer  los  trabajos,  pues  actuaban 

honradamente.

16

 La plata de las ofrendas por la culpa y 

la plata de las ofrendas por el pecado° no 

era ingresada a la Casa de YHVH, pues era 

para los sacerdotes.

17

 En aquel tiempo Hazael, rey de Siria, 

subió y luchó contra Gat, y la conquistó. 

Y  Hazael  se  dispuso°  subir  contra  Jeru-

salem.

18

 Pero Joás, rey de Judá, tomó todos los 

objetos consagrados que habían ofrecido 

sus padres Josafat, Joram y Ocozías, reyes 

de Judá, y sus propios objetos consagra-

dos, y todo el oro que se encontraba en 

los  tesoros  de  la  Casa  de  YHVH  y  en  la 

casa real, y lo envió a Hazael rey de Siria, 

el cual se retiró de Jerusalem.

19

 El resto de los hechos de Joás, y todo lo 

que hizo, ¿no están escritos en el rollo de 

las Crónicas de los reyes de Judá?

20

 Y se levantaron sus siervos y tramaron 

una  conspiración,  y  mataron  a  Joás  en 

Bet-milo, en el camino° que baja a Sila;

21

 porque sus siervos Josacar ben Simeat 

y Jozabad ben Somer lo hirieron de modo 

que  murió.  Y  lo  sepultaron  con  sus  pa-

dres en la ciudad de David, y reinó en su 

lugar Amasías su hijo.

Joacaz y Joás de Israel 

Muerte de Eliseo

13

En el año vigésimo tercero de Joás 

ben Ocozías, rey de Judá, comenzó 

a reinar Joacaz ben Jehú sobre Israel en 

Samaria.° Y reinó° diecisiete años.

2

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

porque fue tras los pecados de Jeroboam 

ben Nabat, por los cuales había hecho pe-

car a Israel, y no se apartó de ellos.

3

 Y  la  ira  de  YHVH  se  encendió  contra 

Israel,  y  los  entregó  repetidamente  en 

mano de Hazael rey de Siria, y en mano 

de Ben-adad, el hijo de Hazael.

4

 Pero  Joacaz  procuró  aplacar  el  rostro° 

de YHVH, y YHVH lo escuchó, porque Él 

veía la opresión de Israel, cómo los opri-

mía el rey de Siria.

5

 Y° YHVH dio a Israel un libertador, y se 

libraron de la mano de Siria; y los hijos 

de Israel habitaron en sus tiendas como 

antes.°

6

 Pero no se apartaron de los pecados de 

la casa de Jeroboam, por los cuales había 

hecho pecar a Israel, sino que anduvieron 

en ellos, y también la Asera° quedó en pie 

en Samaria.

7

 Aunque a Joacaz no le habían quedado 

sino cincuenta jinetes, diez carros y diez 

mil hombres de infantería, pues el rey de 

Siria los había destruido y los había pues-

to como polvo de la trilla.

8

 El  resto  de  los  hechos  de  Joacaz,  todo 

lo que hizo, y su valor, ¿no están escritos 

en el rollo de las Crónicas de los reyes de 

Israel?

9

 Y durmió Joacaz con sus padres y lo se-

pultaron en Samaria; y Jeoás su hijo rei-

nó en su lugar.

10

 En  el  año  trigésimo  séptimo  de  Joás 

rey de Judá, comenzó a reinar Jeoás ben 

Joacaz sobre Israel en Samaria: dieciséis 

años.

11

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, y 

no se apartó de todos los pecados de Jero-

boam ben Nabat, por los que había hecho 

pecar a Israel, sino que anduvo en ellos.

12

 El resto de los hechos de Jeoás, todo lo 

que hizo, y su valor con que luchó contra 

Amasías  rey  de  Judá,  ¿no  están  escritos 

en  el  rollo  de  las  Crónicas  de  los  reyes 

de Israel?

12.16 Nla plata de la culpa y la plata de los pecados.  12.17 Lit. afirmó su rostro para.  12.20 .en el camino.  13.1 LXX omite 

sobre Israel

13.1 .y reinó.  13.4 Es decir, por la oración y súplica lo indujo a mostrar gracia y misericordia en lugar de ira y 

castigo

13.5 Secuencia de lectura: vv. 5a 

→7 →5b-6 →8ss.  13.5 Lit. como ayer y anteayer.  13.6 Asera es el nombre de una 

diosa cananea cuyo culto se introdujo en el pueblo de Israel, pero puede aludir también a algunos de los símbolos que se usaban 

en su adoración (pilares o árboles considerados sagrados: aseras).


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2 Reyes 13:13

398

13

 Y durmió Jeoás con sus padres, y Je-

roboam se sentó en su trono. Y Jeoás fue 

sepultado en Samaria con los reyes de Is-

rael.

14

 Eliseo cayó enfermo de una enferme-

dad por la que iba a morir. Y Jeoás, rey de 

Israel, bajó y lloró delante de él, diciendo: 

¡Padre mío, padre mío! ¡Carro de Israel y 

su auriga!

15

 Y Eliseo le dijo: Toma un arco y unas 

saetas. Y tomó para él un arco y unas sae-

tas.

16

 Y dijo al rey de Israel: Pon tu mano so-

bre el arco. Cuando puso su mano, Eliseo 

apoyó sus manos sobre las manos del rey,

17

 y dijo: Abre la ventana hacia el oriente, 

y él la abrió. Entonces dijo Eliseo: ¡Tira! 

Y  habiendo  él  tirado,  dijo  Eliseo:  ¡Saeta 

de victoria de YHVH! ¡Sí, saeta de victoria 

contra Siria!, pues herirás a los sirios en 

Afec hasta acabarlos.

18

 Y agregó: Toma las saetas. Y las tomó. 

Entonces dijo al rey de Israel: ¡Golpea la 

tierra! Y él la golpeó tres veces, y se de-

tuvo.

19

 Y el varón de Dios estalló en ira contra 

él, y dijo: ¡De haber golpeado cinco o seis 

veces,  entonces  hubieras  herido  a  Siria 

hasta acabarla! Pero ahora vencerás a Si-

ria sólo tres veces.

20

 Murió pues Eliseo, y lo sepultaron. Al 

año siguiente entraron en la tierra unas 

bandas° de moabitas,

21

 y en momentos en que unos sepulta-

ban a un hombre, advirtieron que venía 

una  banda,  y  arrojaron  al  muerto  al  se-

pulcro de Eliseo; y apenas el cadáver tocó 

los huesos de Eliseo, revivió y se levantó 

sobre sus pies.

22

 Y Hazael rey de Siria oprimió a Israel 

todos los días de Joacaz.

23

 Pero YHVH tuvo misericordia de ellos 

y se compadeció de ellos, y se volvió hacia 

ellos  a  causa  de  su  pacto  con  Abraham, 

Isaac  y  Jacob;  y  no  quiso  destruirlos,  ni 

arrojarlos de su presencia hasta ahora.

24

 Y murió Hazael rey de Siria, y reinó en 

su lugar Ben-adad su hijo.

25

 Y Jeoás ben Joacaz volvió a quitar de 

mano de Ben-adad, el hijo de Hazael, las 

ciudades que éste había quitado en guerra 

de mano de Joacaz su padre; tres veces lo 

venció  Jeoás,  y  recobró  las  ciudades  de 

Israel.

Amasías de Judá 

Jeroboam II de Israel

14

En  el  año  segundo  de  Jeoás  ben 

Joacaz,  rey  de  Israel,  comenzó  a 

reinar Amasías ben Joás, rey de Judá.

2

 Era de veinticinco años cuando comen-

zó a reinar, y reinó veintinueve años en 

Jerusalem; y el nombre de su madre era 

Joadán, de Jerusalem.

3

 E hizo lo recto ante los ojos de YHVH, 

aunque no como David, su antepasado.° 

Hizo conforme a todo lo que había hecho 

Joás su padre.

4

 Sólo que no se abandonaron los lugares 

altos, pues el pueblo todavía sacrificaba° y 

quemaba incienso en los lugares altos.

5

 Y sucedió que tan pronto como el rei-

no se consolidó en su mano, mató a los 

siervos que habían asesinado° a su padre 

el rey.

6

 Pero no mató a los hijos de los asesinos, 

conforme a lo escrito en el rollo de la Ley 

de  Moisés,  donde  YHVH  había  mandado, 

diciendo:  No  morirán  los  padres  por  los 

hijos, ni los hijos morirán por los padres, 

sino que cada cual morirá por su pecado.°

7

 Él mató a diez mil de Edom en el Valle 

de la Sal, y durante la guerra conquistó 

Sela, y la llamó Jocteel, hasta este día.

8

 Y Amasías envió mensajeros a Jeoás ben 

Joacaz, hijo de Jehú, rey de Israel, dicien-

do: ¡Ven, veámonos las caras!

9

 Y  Jeoás  rey  de  Israel,  envió  a  decir  a 

Amasías rey de Judá: El cardo que está en 

el Líbano envió a decir al cedro que está 

en el Líbano: Da tu hija por mujer a mi 

hijo; y pasó una fiera de campo del Líbano 

y pisoteó el cardo.

10

 Ciertamente has vencido a Edom, y tu 

corazón te ha enaltecido. ¡Gloríate de eso 

y quédate en tu casa! ¿Por qué habrás de 

provocar una calamidad en la que puedas 

caer tú y Judá contigo?

11

 Pero Amasías no escuchó, por lo cual 

subió Jeoás rey de Israel, y se vieron las 

13.20 Se refiere a cuadrillas armadas que realizaban incursiones en territorio israelí.  14.3 Lit. su padre. En hebreo también 

indíca ascendientes o antepasados

14.4 

→12.3 nota.  14.5 Lit. que mató a sus siervos, los que habían matado a su padre

14.6 

→Dt.24.16.


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2 Reyes 15:7

399

caras, él y Amasías, rey de Judá, en Bet-

semes, que es de Judá.

12

 Y Judá fue derrotado por Israel, y hu-

yeron, cada uno a su tienda.

13

 Y Jeoás rey de Israel, capturó a Amasías 

rey de Judá, hijo de Joás, hijo de Ocozías, 

en Bet-semes, y entró a Jerusalem, y rom-

pió el muro de Jerusalem desde la puerta 

de  Efraín  hasta  la  puerta  de  la  esquina, 

cuatrocientos codos en total.

14

 Después tomó todo el oro y la plata, y 

todos  los  utensilios  que  se  encontraban 

en la Casa de YHVH y en los tesoros de la 

casa real; y tomó rehenes, y volvió a Sa-

maria.

15

 El resto de los hechos que realizó Jeoás, 

su valor, y cómo luchó contra Amasías rey 

de Judá, ¿no están escritos en el rollo de 

las Crónicas de los reyes de Israel?

16

 Y Jeoás durmió con sus padres, y fue 

sepultado  en  Samaria  con  los  reyes  de 

Israel,  y  reinó  en  su  lugar  Jeroboam  su 

hijo.

17

 Y  Amasías  ben  Joás,  rey  de  Judá,  vi-

vió quince años después de la muerte de 

Jeoás ben Joacaz, rey de Israel.

18

 El resto de los hechos de Amasías, ¿no 

están escritos en el rollo de las Crónicas 

de los reyes de Judá?

19

 E  hicieron  conspiración  contra  él  en 

Jerusalem, por lo que huyó a Laquis, pero 

lo persiguieron hasta Laquis, y allí lo ma-

taron.

20

 Y lo llevaron a Jerusalem sobre caba-

llos, y fue sepultado con sus padres en la 

ciudad de David.

21

 Entonces todo el pueblo de Judá tomó a 

Azarías,° que tenía dieciséis años, y lo hicie-

ron reinar en lugar de su padre Amasías.

22

 Él reedificó Elat y la restituyó a Judá, 

después de que el rey° durmiera con sus 

padres.

23

 En  el  año  decimoquinto  de  Amasías 

ben Joás, rey de Judá, comenzó a reinar 

Jeroboam ben Jeoás, rey de Israel, en Sa-

maria, cuarenta y un años.

24

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

y no se apartó de todos los pecados de Je-

roboam ben Nabat, por los que había he-

cho pecar a Israel.

25

 Él restableció la frontera de Israel des-

de la entrada de Hamat hasta el Mar del 

Arabá,° conforme a la palabra de YHVH, 

Dios de Israel, que había hablado por me-

dio de su siervo Jonás ben Amitay, el pro-

feta de Gat-hefer.

26

 Pues  YHVH  había  visto  la  amarga 

aflicción  de  Israel,  que  padecían  tanto 

esclavos  y  libres,  sin  que  nadie  ayudara 

a Israel.

27

 Pero YHVH no había determinado bo-

rrar el nombre de Israel de debajo de los 

cielos, por eso los salvó por mano de Jero-

boam ben Joás.

28

 El  resto  de  los  hechos  de  Jeroboam, 

todo lo que hizo, y su valor con que lu-

chó, y cómo recobró a Damasco y a Ha-

mat (que habían sido° de Judá) para Israel 

¿no están escritos en el rollo de las Cróni-

cas de los reyes de Israel?

29

 Y  durmió  Jeroboam  con  sus  padres, 

con los reyes de Israel, y Zacarías su hijo 

reinó en su lugar.

Azarías de Judá 

Zacarías y sus sucesores en Israel

15

En el año vigésimo séptimo de Je-

roboam,  rey  de  Israel,  comenzó  a 

reinar Azarías° ben Amasías, rey de Judá.

2

 De dieciséis años era cuando comenzó 

a reinar, y reinó cincuenta y dos años en 

Jerusalem.  El  nombre  de  su  madre  era 

Jecolía, de Jerusalem.

3

 E hizo lo recto ante los ojos de YHVH, 

conforme  a  todo  lo  que  había  hecho  su 

padre Amasías.

4

 Sólo que no se abandonaron los lugares 

altos, pues el pueblo todavía sacrificaba° y 

quemaba incienso en los lugares altos.

5

 Y YHVH hirió al rey, y fue leproso hasta 

el día de su muerte, y habitó en una casa 

aislada.  Y  Jotam,  el  hijo  del  rey,  estuvo 

sobre la casa, gobernando al pueblo de la 

tierra.

6

 El resto de los hechos de Azarías, y todo 

lo que hizo, ¿no están escritos en el rollo 

de las Crónicas de los reyes de Judá?

7

 Y  durmió  Azarías  con  sus  padres,  y  lo 

sepultaron con sus padres en la ciudad de 

David; y reinó en su lugar Jotam su hijo.

14.21  Esto  es,  Uzías 

→2  Cr.26.1.  14.22  Esto  es,  Amasías.  14.25  Esto  es,  el  Mar  Muerto.  14.28  .que  habían  sido

15.1 

→14.21 nota.  15.4 →12.3 nota. 


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2 Reyes 15:8

400

8

 En  el  año  trigésimo  octavo  de  Azarías 

rey de Judá, Zacarías ben Jeroboam, reinó 

seis meses sobre Israel en Samaria.

9

 E hizo lo malo a ojos de YHVH, como 

habían hecho sus padres: no se apartó de 

los pecados de Jeroboam ben Nabat, por 

los cuales había hecho pecar a Israel.

10

 Y Salum ben Jabes conspiró contra él, 

lo hirió delante del pueblo° y lo mató, y 

reinó en su lugar.

11

 El resto de los hechos de Zacarías, he 

aquí están escritos en el rollo de las Cró-

nicas de los reyes de Israel.

12

 Ésta fue la palabra de YHVH, que ha-

bía  hablado  a  Jehú,  diciendo:  Tus  hijos 

se sentarán en el trono de Israel hasta la 

cuarta generación.° Y sucedió así.

13

 Salum ben Jabes comenzó a reinar en 

el año trigésimo noveno de Uzías° rey de 

Judá,  y  reinó  por  espacio  de  un  mes  en 

Samaria,

14

 pues Manahem ben Gadi había subido 

de Tirsa a Samaria, e hirió a Salum ben 

Jabes en Samaria, y lo mató, y reinó en 

su lugar.

15

 El resto de los hechos de Salum, y la 

conspiración  que  tramó,  he  aquí  están 

escritos en el rollo de las Crónicas de los 

reyes de Israel.

16

 En aquel tiempo Manahem atacó a Tif-

sa, y a todos los que estaban dentro, y en 

sus  alrededores  desde  Tirsa,  por  cuanto 

no le habían abierto,° por tanto la atacó 

y abrió el vientre a todas las mujeres en-

cintas.

17

 En el año trigésimo noveno de Azarías, 

rey de Judá, Manahem ben Gadi comenzó 

a reinar sobre Israel, y reinó diez años en 

Samaria.

18

 E hizo lo malo a ojos de YHVH, y no se 

apartó en todos sus días de los pecados de 

Jeroboam ben Nabat, por los cuales había 

hecho pecar a Israel.

19

 Y Pul, rey de Asiria, fue contra el país, 

y Manahem dio a Pul mil talentos de plata 

para que su mano estuviera a favor de él, 

a fin de confirmar el reino en su mano.

20

 Y Manahem sacó la plata de Israel me-

diante  el  tributo  de  todos  los  hombres 

poderosos  y  opulentos:  cincuenta  siclos 

de plata por cada uno, para entregarlo al 

rey de Asiria. Con eso el rey de Asiria se 

retiró, y no permaneció en el país.

21

 El resto de los hechos de Manahem, y 

todo lo que hizo, ¿no están escritos en el 

rollo de las Crónicas de los reyes de Israel?

22

 Y durmió Manahem con sus padres, y 

reinó en su lugar Pekaía su hijo.

23

 En  el  año  quincuagésimo  de  Azarías, 

rey de Judá, Pekaía ben Manahem comen-

zó a reinar sobre Israel, y reinó en Sama-

ria dos años.

24

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH: 

no se apartó de los pecados de Jeroboam 

ben Nabat, por los cuales había hecho pe-

car a Israel.

25

 Su ayudante, Peka ben Remalías, cons-

piró contra él con cincuenta hombres de 

los hijos de los galaaditas, y lo mató junto 

con Argob y Arie en la ciudadela de la casa 

real  en  Samaria.  Lo  mató  y  reinó  en  su 

lugar.

26

 El resto de los hechos de Pekaía, y todo 

lo que hizo, he aquí están escritos en el ro-

llo de las Crónicas de los reyes de Israel.

27

 En el año quincuagésimo segundo de 

Azarías,  rey  de  Judá,  comenzó  a  reinar 

Peka  ben  Remalías  sobre  Israel,  y  reinó 

veinte años en Samaria.

28

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

pues  no  se  apartó  de  los  pecados  de  Je-

roboam  ben  Nabat,  por  los  cuales  había 

hecho pecar a Israel.

29

 En los días de Peka, rey de Israel, llegó 

Tiglat-pileser, rey de Asiria, y tomó Ijón, 

Abel-bet-maaca, Janoa, Cedes, Hazor, Ga-

laad y Galilea (toda la tierra de Neftalí), y 

los llevó cautivos a Asiria.

30

 En el año vigésimo de Jotam ben Uzías, 

Oseas ben Ela tramó una conjura contra 

Peka ben Remalías, y lo hirió, y lo mató, y 

reinó en su lugar.

31

 El resto de los hechos de Peka, y todo lo 

que hizo, he aquí están escritos en el rollo 

de las Crónicas de los reyes de Israel.

32

 En el segundo año de Peka ben Rema-

lías,  rey  de  Israel,  comenzó  a  reinar  Jo-

tam ben Uzías, rey de Judá.

15.10 La lectura aquí es difícil. Algunos mss. registran y Keblaam, y lo atacó. Sir. y VUL registran en presencia del pueblo. LXX: 

en Iblam

15.12 Lit. Los hijos de la cuarta se te sentarán en el trono de Israel.  15.13 Uzías es otro nombre del rey Azarías. 

15.16 Es decir, no la entregaron sin luchar.


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2 Reyes 16:15

401

33

 Cuando comenzó a reinar era de vein-

ticinco  años,  y  reinó  dieciséis  años  en 

Jerusalem.  El  nombre  de  su  madre  era 

Jerusa, hija de Sadoc.

34

 E hizo lo recto ante los ojos de YHVH, 

conforme  a  todo  lo  que  había  hecho  su 

padre Uzías.

35

 Sólo que no se abandonaron los luga-

res  altos,  pues  el  pueblo  todavía  sacrifi-

caba° y quemaba incienso en los lugares 

altos. Él construyó la puerta superior de 

la Casa de YHVH.

36

 El resto de los hechos de Jotam, y todo 

lo que hizo, ¿no están escritos en el rollo 

de las Crónicas de los reyes de Judá?

37

 En aquellos días YHVH comenzó a en-

viar contra Judá a Rezín, rey de Siria, y a 

Peka ben Remalías.

38

 Y durmió Jotam con sus padres, y fue 

sepultado con sus padres en la ciudad de 

su padre David, y reinó en su lugar Acaz 

su hijo.

Acaz rey de Judá

16

En el año décimo séptimo° de Peka 

ben  Remalías,  comenzó  a  reinar 

Acaz ben Jotam, rey de Judá.

2

 De  veinte  años  era  Acaz  cuando  co-

menzó  a  reinar,  y  reinó  en  Jerusalem 

dieciséis años, pero no hizo lo recto ante 

los ojos de YHVH su Dios, como su padre 

David,

3

 sino que anduvo en el camino de los re-

yes de Israel, incluso hizo pasar a su hijo 

por el fuego, conforme a las abominacio-

nes de los pueblos que YHVH había expul-

sado de delante de los hijos de Israel.

4

 Asimismo  sacrificó  y  quemó  incienso 

en los lugares altos, sobre los collados y 

debajo de todo árbol frondoso.°

5

 Entonces Rezín rey de Siria, y Peka ben 

Remalías, rey de Israel, subieron a Jerusa-

lem para hacer la guerra. Sitiaron a Acaz, 

pero no prevalecieron.°

6

 En aquel tiempo Rezín rey de Siria reco-

bró Elat para Siria, y expulsó a los judíos 

de Elat; y los sirios fueron a Elat, donde 

habitan hasta hoy.

7

 Entonces  Acaz  envió  mensajeros  a  Ti-

glat-Pilneser rey de Asiria, diciendo: Soy 

tu siervo y tu hijo. Sube y sálvame de la 

mano  del  rey  de  Siria  y  de  la  mano  del 

rey de Israel, que se han levantado contra 

mí.

8

 Y Acaz tomó la plata y el oro que halló 

en la Casa de YHVH y en los tesoros de la 

casa real, y lo envió como soborno al rey 

de Asiria.

9

 El rey de Asiria atendió a su petición, y 

subió el rey de Asiria contra Damasco y la 

conquistó, y llevó cautivos a sus habitan-

tes a Kir, y mató a Rezín.

10

 Cuando el rey Acaz fue a Damasco al 

encuentro de Tiglat-pileser rey de Asiria, 

observó el altar que había en Damasco, y 

el rey Acaz envió al sumo sacerdote Urías 

la representación del altar y sus medidas, 

según toda su hechura.

11

 Y el sumo sacerdote Urías construyó el 

altar conforme a todo lo que había envia-

do el rey Acaz desde Damasco. Así lo hizo 

el sumo sacerdote Urías antes que el rey 

Acaz regresara de Damasco.

12

 Cuando el monarca llegó de Damasco 

y vio el altar, el rey se acercó y subió al 

altar,

13

 e  hizo  quemar  su  holocausto  y  su 

ofrenda,  vertió  su  libación,  y  roció  la 

sangre de sus sacrificios de paz sobre el 

altar.

14

 En cuanto al altar de bronce que es-

taba  delante  de  YHVH,  lo  desplazó  de 

delante de la Casa, de entre el altar y la 

Casa de YHVH, y lo puso en el lado norte 

de su altar.

15

 Y  el  rey  Acaz  mandó  al  sumo  sacer-

dote  Urías,  diciendo:  Quema  sobre  el 

gran  altar  el  holocausto  de  la  mañana 

y la ofrenda cereal de la tarde, el holo-

causto  del  rey  y  su  ofrenda  de  cereal, 

con el holocausto de todo el pueblo de 

la tierra, su ofrenda cereal y sus libacio-

nes, y rocía sobre él toda la sangre del 

holocausto  y  toda  la  sangre  del  sacrifi-

cio, pero el altar de bronce será para mí, 

para consultar.

15.35 

→12.3 nota.  16.1 Sir. y LXX registran dieciocho.  16.4 Se refiere a árboles considerados sagrados por algún motivo, a 

la sombra de los cuales se realizaban ritos idólatras. Generalmente estos árboles se encontraban en los lugares altos y estaban 

dedicados a alguna divinidad cananea tal como Baal o Asera. Este culto al árbol, iniciado en los días de Nimrod, está preservado 

actualmente en muchas de las naciones llamadas cristianas

16.5 Lit. pero no pudieron luchar.


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2 Reyes 16:16

402

16

 Y  el  sacerdote  Urías  hizo  conforme  a 

todo lo que el rey Acaz había mandado.

17

 El rey Acaz cortó además los bordes de 

las bases y quitó la pila de encima de ellas, 

e hizo bajar el mar° de sobre los bueyes 

de bronce que estaban debajo, y lo colocó 

sobre un enlosado de piedra.

18

 Asimismo,  a  causa  del  rey  de  Asiria, 

modificó el pórtico del shabbat de la Casa 

de YHVH, que habían construido en el in-

terior,  y  la  entrada  exterior  reservada  al 

rey.

19

 El resto de los hechos de Acaz, ¿no es-

tán escritos en el rollo de las Crónicas de 

los reyes de Judá?

20

 Y  durmió  Acaz  con  sus  padres,  y  fue 

sepultado con sus padres en la ciudad de 

David;  y  reinó  en  su  lugar  su  hijo  Eze-

quías.

Oseas 

Caída de Samaria 

Cautiverio de Israel

17

En el año duodécimo de Acaz rey 

de  Judá,  Oseas  ben  Ela,  comenzó 

a  reinar  en  Samaria  sobre  Israel:  nueve 

años.

2

 E hizo lo malo a ojos de YHVH, aunque 

no  como  los  reyes  de  Israel  que  habían 

sido antes de él.

3

 Contra  éste  subió  Salmanasar,  rey  de 

Asiria, y Oseas se convirtió en su vasallo, 

y le pagó tributo.

4

 Pero el rey de Asiria descubrió una cons-

piración  por  parte  de  Oseas,  pues  había 

enviado mensajeros a So, rey de Egipto, 

y ya no siguió pagando tributo° al rey de 

Asiria, como lo hacía cada año, por lo que 

el rey de Asiria lo apresó y lo encerró en 

la cárcel.

5

 El rey de Asiria subió contra toda aque-

lla  tierra,  y  subió  a  Samaria  y  la  asedió 

durante tres años;

6

 y en el año noveno de Oseas, el rey de 

Asiria conquistó Samaria y llevó a Israel 

en cautiverio a Asiria, e hizo que habita-

ran en Halah y en Habor, junto al río Go-

zán, y en las ciudades de los medos.

7

 Esto sucedió porque los hijos de Israel 

habían pecado contra YHVH su Dios, que 

los  había  sacado  de  tierra  de  Egipto,  de 

debajo de la mano de Faraón rey de Egip-

to, reverenciando a otros dioses,

8

 y andando en las costumbres de las na-

ciones que YHVH había expulsado de de-

lante de los hijos de Israel, y en las que los 

reyes de Israel habían establecido.

9

 Y los hijos de Israel hicieron encubier-

tamente cosas impropias contra YHVH su 

Dios: Edificaron para sí lugares altos en 

todas sus ciudades, desde las torres de los 

vigías hasta las ciudades fortificadas,

10

 y erigieron para sí pilares° y aseras° en 

toda colina, y debajo de todo árbol fron-

doso;

11

 y  allí  quemaron  incienso,  en  todos 

los  lugares  altos,  como  los  pueblos  que 

YHVH  se  había  llevado  cautivos  de  de-

lante de ellos. Hicieron pues, cosas malas 

para provocar a ira a YHVH,

12

 porque sirvieron a los ídolos, respecto 

a lo cual YHVH les había dicho: No haréis 

tal cosa.

13

 Y YHVH amonestaba a Israel y a Judá 

por medio de todos los profetas° y de todo 

vidente,  diciendo:  Volveos  de  vuestros 

malos  caminos  y  guardad  mis  manda-

mientos y mis estatutos, conforme a toda 

la Ley que Yo prescribí a vuestros padres, 

y que os envié por mano de mis siervos 

los profetas.

14

 Pero  ellos  no  obedecieron,  sino  que 

endurecieron su cerviz, como la cerviz de 

sus padres, los cuales no habían perma-

necido fieles a YHVH su Dios.

15

 Y desecharon sus estatutos, y su pac-

to que había hecho con sus padres, y los 

testimonios con que les había advertido, 

y siguieron en pos de cosas vanas y se hi-

cieron  vanos,  y  fueron  tras  las  naciones 

que estaban a su alrededor, respecto a las 

cuales YHVH les había ordenado que no 

obraran como ellas.

16

 Y abandonaron todos los mandamien-

tos de YHVH su Dios, y se hicieron imá-

genes  de  fundición:  Dos  becerros  y  una 

16.17 Se refiere a la gran fuente de bronce utilizada por los sacerdotes para sus lavamientos. 

→1 R.7.23-26 y 2 Cr.4.1-5. 

17.4 Heb. minjah. En otros contextos, este término se usa para referirse a ofrendas vegetales hechas a la divinidad.  17.10 Prob. 

estacas votivas relacionadas con los cultos paganos

17.10 Esto es, imágenes talladas de madera que representaban a la diosa 

cananea que lleva este nombre. Estas imágenes solían plantarse en la tierra de un lugar alto (una colina o cualquier otra altura 

con especial significado religioso). 

17.13 LXX registra de todos sus profetas.


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2 Reyes 17:37

403

Asera,° y se postraron ante todo el ejérci-

to de los cielos, y sirvieron a Baal.

17

 E  hicieron  pasar  a  sus  hijos  y  a  sus 

hijas  por  el  fuego,  y  practicaron  los  en-

cantamientos y las adivinaciones, y se de-

dicaron a hacer lo malo ante los ojos de 

YHVH para provocarlo.

18

 Por lo cual YHVH se airó en gran ma-

nera contra Israel, y los apartó de su pre-

sencia,  y  no  quedó  sino  sólo  la  tribu  de 

Judá.°

19

 Pero tampoco Judá guardó los manda-

mientos de YHVH su Dios, sino que andu-

vieron en las costumbres que Israel había 

establecido.

20

 Entonces YHVH desechó a toda la si-

miente de Israel, y los afligió y los entregó 

en mano de saqueadores, hasta echarlos 

de su presencia.°

21

 Cuando Él arrancó a Israel de la casa de 

David, ellos proclamaron rey a Jeroboam 

ben Nabat, y Jeroboam apartó a Israel de 

en pos de YHVH,° y les hizo cometer un 

gran pecado.

22

 Y los hijos de Israel anduvieron en to-

dos los pecados que había cometido Jero-

boam; no se apartaron de ellos

23

 hasta que YHVH apartó a Israel de su 

presencia, tal como había dicho por mano 

de todos sus siervos los profetas. Enton-

ces Israel fue llevado cautivo de su tierra 

a Asiria, hasta este día.

24

 Y el rey de Asiria trajo gente° de Ba-

bilonia,  de  Cuta,  de  Ava,  de  Hamat  y  de 

Sefarvaim, y los hizo habitar en las ciu-

dades de Samaria, en lugar de los hijos de 

Israel. Así ocuparon Samaria, y habitaron 

en sus ciudades.

25

 Pero como no temían a YHVH, suce-

dió que cuando empezaron a habitar allí, 

YHVH envió leones contra ellos, y mata-

ron a muchos de ellos.

26

 Entonces  dijeron  al  rey  de  Asiria:  La 

gente que trasladaste y pusiste en las ciu-

dades de Samaria, no conocen la costum-

bre del Dios de aquella tierra, el cual ha 

enviado leones contra ellos, y he aquí que 

los están matando, porque no conocen la 

costumbre del Dios de esa tierra.

27

 Y el rey de Asiria dio instrucciones, di-

ciendo: Llevad allá a uno de los sacerdotes 

que trajisteis cautivos, que vaya y habite 

allí, y les enseñe la costumbre del Dios de 

esa tierra.

28

 Y llegó uno de los sacerdotes que ha-

bían  transportado  de  Samaria,  y  habitó 

en Bet-’El, y les enseñó cómo habían de 

temer a YHVH.

29

 Pero  cada  nación  continuó  haciendo 

sus propios dioses, y los pusieron en las 

ermitas de los lugares altos, que los sama-

ritanos habían hecho para cada pueblo en 

las ciudades donde habitaban.°

30

 Así los hombres de Babilonia rendían 

culto a Sucot-benot, los hombres de Cuta 

a Nergal, los hombres de Hamat a Asima,

31

 los heveos a Nibhaz y a Tartac, y los se-

farveos quemaban a sus hijos en el fuego 

como ofrenda° a Adramelec y Anamelec, 

dioses de Sefarvaim.

32

 Aunque temían a YHVH, de entre ellos 

designaron para sí sacerdotes de los luga-

res altos, que ofrecían sacrificios a favor de 

ellos en las ermitas de los lugares altos.

33

 De modo que, al tiempo que reveren-

ciaban  a  YHVH,  servían  a  sus  propios 

dioses,  conforme  a  la  costumbre  de  las 

naciones  de  donde  habían  sido  llevados 

cautivos.

34

 Y hasta hoy siguen obrando conforme 

a  las  costumbres  antiguas:  No  temen  a 

YHVH,  ni  actúan  conforme  a  sus  esta-

tutos,  ni  conforme  a  sus  ordenanzas,  ni 

conforme a la Ley, ni conforme al man-

damiento que YHVH prescribió a los hi-

jos  de  Jacob,  al  cual  puso  el  nombre  de 

Israel.

35

 YHVH había concertado un pacto con 

ellos, y les había ordenado, diciendo: No 

temeréis a otros dioses, ni os inclinaréis 

ante ellos, ni les serviréis, ni les ofreceréis 

sacrificios,

36

 sino que sólo a YHVH, que os hizo su-

bir de la tierra de Egipto con gran poder y 

brazo extendido, a Él temeréis, ante Él os 

inclinaréis, y a Él ofreceréis sacrificios.

37

 Atenderéis  a  los  estatutos,  las  orde-

nanzas,  la  enseñanza  y  el  mandamiento 

17.16 Lit. hicieron estatua de fundición, dos becerros, e hicieron (una) Asera.  17.18 Tropo de dicción (sinécdoque) que designa 

un todo con el nombre de una de sus partes, en este caso, Judá a Benjamín. 

17.20 Ver nota anterior.  17.21 Lit. de detrás de 

YHVH

17.24 .gente.  17.29 Lit. cada pueblo en sus ciudades que habitaban ellos allí.  17.31 .como ofrenda.


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2 Reyes 17:38

404

que escribió para vosotros, para ponerlos 

por  obra  todos  los  días.  No  temeréis  a 

otros dioses,

38

 ni olvidaréis el pacto que hice con vo-

sotros. No temeréis a otros dioses,

39

 sino  que  temeréis  a  YHVH  vuestro 

Dios, y Él os librará de la mano de todos 

vuestros enemigos.

40

 Pero ellos no escucharon, sino que hi-

cieron según su antigua costumbre.

41

 Así pues, aquellas gentes° reverenciaron 

a  YHVH,  pero  al  mismo  tiempo  rendían 

culto a sus imágenes. Y sus hijos, y los hi-

jos de sus hijos, han venido obrando hasta 

el día presente lo mismo que sus padres.

Reinado de Ezequías 

Senaquerib asedia a Jerusalem

18

En el año tercero de Oseas ben Ela, 

rey  de  Israel,  comenzó  a  reinar 

Ezequías ben Acaz, rey de Judá.

2

 Cuando comenzó a reinar era de vein-

ticinco años, y reinó veintinueve años en 

Jerusalem.  El  nombre  de  su  madre  era 

Abi,° hija de Zacarías.

3

 E hizo lo recto ante los ojos de YHVH, 

conforme a todo lo que había hecho Da-

vid su padre.

4

 Él  quitó  los  lugares  altos,  hizo  trizas 

las estatuas, y taló la Asera. También hizo 

pedazos la serpiente de bronce que había 

hecho Moisés, a la cual la llamó Nehus-

tán,° porque hasta aquellos días los hijos 

de Israel le quemaban incienso.

5

 En YHVH, Dios de Israel, puso su con-

fianza. Ni antes ni después de él hubo otro 

como él entre todos los reyes de Judá,

6

 pues se apegó a YHVH y no se apartó de 

Él,  sino  que  guardó  los  mandamientos 

que YHVH había ordenado a Moisés.

7

 Y YHVH estuvo con él, y prosperaba en 

todo lo que hacía. Él se rebeló contra el 

rey de Asiria, y no le sirvió.

8

 Hirió también a los filisteos hasta Gaza 

y su territorio, desde las torres de los ata-

layas hasta la ciudad fortificada.

9

 En el cuarto año del rey Ezequías, que 

era el año séptimo de Oseas ben Ela, rey 

de Israel, aconteció que Salmanasar, rey 

de Asiria, subió contra Samaria y la ase-

dió.

10

 Al cabo de tres años la capturaron; es 

decir, en el año sexto de Ezequías, que era 

el año noveno de Oseas rey de Israel, Sa-

maria fue capturada.

11

 El rey de Asiria llevó cautivos a los is-

raelitas a Asiria, y los puso en Halah y en 

Habor, junto al río Gozán, y las ciudades 

de los medos,

12

 por cuanto no habían atendido a la voz 

de YHVH su Dios, sino que quebrantaron 

su pacto; no escucharon ni pusieron por 

obra todo lo que Moisés siervo de YHVH 

había ordenado.

13

 Y en el año decimocuarto del rey Eze-

quías, Senaquerib rey de Asiria subió con-

tra todas las ciudades fortificadas de Judá 

y las conquistó.

14

 Entonces  Ezequías  rey  de  Judá  envió 

a decir al rey de Asiria en Laquis: Me he 

equivocado;° retírate de mí, y aceptaré lo 

que me impongas. Y el rey de Asiria im-

puso  a  Ezequías  rey  de  Judá  trescientos 

talentos de plata y treinta talentos de oro.

15

 Y  Ezequías  entregó  toda  la  plata  que 

había en la Casa de YHVH y en los tesoros 

de la casa real.

16

 En aquel tiempo Ezequías desmanteló las 

puertas de la Casa de YHVH, y los soportes 

que  había  recubierto  el  mismo°  Ezequías 

rey de Judá, y los entregó al rey de Asiria.

17

 Después  el  rey  de  Asiria  envió  desde 

Laquis a Jerusalem, al Tartán, al Rabsaris 

y al Rabsaces° con un gran ejército contra 

el rey Ezequías. Y subieron y llegaron a 

Jerusalem. Y cuando subieron, llegaron y 

se apostaron junto al acueducto del estan-

que superior, que está camino del Campo 

del Lavador.

18

 Y  llamaron  al  rey.  Entonces  salieron 

hacia ellos Eliaquim ben Hilcías, que es-

taba sobre el palacio, Sebna el escriba, y 

Joa ben Asaf, el cronista.

19

 Y  el  Rabsaces  les  dijo:  Decid  ahora  a 

Ezequías:  El  gran  rey,  el  rey  de  Asiria, 

dice así: ¿En qué fundas tu confianza?

20

 ¿Piensas  que  la  estrategia  y  el  poder 

para  la  guerra  es  cuestión  de  palabras? 

17.41  Heb.  Goyim. Aunque  este  término  se  aplica  generalmente  a  los  gentiles,  aquí  se  está  hablando  de  Israel.  Goyim  no 

tiene sentido religioso y equivale a am=pueblo

18.2 Esto es, mi padreAbía en 2 Cr.29.1.  18.4 Esto es, pedazo de bronce

18.14 Lit. errar el blanco. En contextos religiosos pecar.  18.16 .el mismo.  18.17 Tartán, Rabsaris, Rabsaces. Títulos de los 

más altos oficiales del imperio babilónico. 


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2 Reyes 19:4

405

¿En  quién  confías  para  rebelarte  contra 

mí?

21

 ¿Acaso  confías  en  ese  bastón  de  caña 

quebrada  que  es  Egipto?,  que  quien  se 

apoya en él, se le clava en la mano y se la 

atraviesa. Así es Faraón rey de Egipto para 

los que confían en él.

22

 Y si me decís: Nosotros confiamos en 

YHVH nuestro Dios, ¿acaso no es ése cu-

yos  lugares  altos  y  altares  ha  suprimido 

Ezequías, exigiendo a Judá y a Jerusalem 

que  se  postren  ante  ese  altar  en  Jerusa-

lem?

23

 Ahora pues, haz una apuesta con mi se-

ñor, el rey de Asiria, y yo te daré dos mil 

caballos, si es que tienes quien los monte.

24

 ¿Cómo te atreves a desairar a un capi-

tán, o al menor de los siervos de mi señor, 

confiando en los carros y en los jinetes de 

Egipto?

25

 ¿Acaso  he  subido  para  destruir  este 

lugar sin consultar a YHVH? Pues YHVH 

me  ha  dicho:  ¡Sube  contra  esta  tierra  y 

destrúyela!

26

 Entonces Eliaquim ben Hilcías, y Seb-

na y Joa, dijeron° al Rabsaces: Te rogamos 

que hables a tus siervos en siríaco,° que 

nosotros  lo  entendemos.  No  nos  hables 

en judío° ante la gente que está sobre el 

muro.

27

 Pero el Rabsaces les respondió: ¿Acaso 

me  ha  enviado  mi  señor  a  deciros  estas 

palabras sólo° a tu señor y a ti, y no a los 

hombres que están sentados en el muro, 

expuestos  a  comerse  con  vosotros  sus 

propios  excrementos  y  beber  su  propia 

orina?

28

 Y poniéndose en pie el Rabsaces, gri-

tó a gran voz en judío, y habló, diciendo: 

¡Escuchad palabra del gran rey, el rey de 

Asiria!

29

 Así dice el rey: Que no os engañe Eze-

quías,  porque  no  podrá  libraros  de  mi 

mano.

30

 Y que Ezequías no os haga confiar en 

YHVH, diciendo: Ciertamente YHVH nos 

librará, y esta ciudad no será entregada en 

mano del rey de Asiria.

31

 No  escuchéis  a  Ezequías,  porque  así 

dice el rey de Asiria: Haced la paz conmigo 

y salid a mí, y cada uno comerá de su vid y 

de su higuera, y cada uno beberá el agua 

de su pozo,

32

 hasta que yo venga para llevaros a una 

tierra  como  vuestra  propia  tierra:  tierra 

de  grano  y  de  mosto,°  tierra  de  pan  y 

de viñas, tierra de olivos, de aceite° y de 

miel;  y  viviréis,  y  no  moriréis.  No  escu-

chéis a Ezequías, que os persuade dicien-

do: YHVH nos librará.

33

 ¿Acaso alguno de los dioses de las na-

ciones ha podido librar a su tierra de la 

mano del rey de Asiria?

34

 ¿Dónde están los dioses de Hamat y de 

Arfad? ¿Dónde están los dioses de Sefar-

vaim, de Hena y de Iva? ¿Acaso pudieron 

librar a Samaria de mi mano?

35

 ¿Quiénes, de entre todos los dioses de 

las naciones, han librado a sus tierras de 

mi mano, para que YHVH libre a Jerusa-

lem de mi mano?

36

 Pero el pueblo calló y no le respondió 

palabra alguna, pues había una consigna 

del rey que decía: No le respondáis.

37

 Y Eliaquim ben Hilcías, que estaba so-

bre  la  casa,  Sebna,  el  escriba,  y  Joa  ben 

Asaf,  el  cronista,  fueron  a  Ezequías  con 

sus vestidos rasgados, y le comunicaron 

las palabras del Rabsaces.

Oración de Ezequías 

Jerusalem liberada

19

Y aconteció que al oírlo el rey Eze-

quías, rasgó sus vestidos, se cubrió 

de saco, y fue a la Casa de YHVH.

2

 Y  envió  a  Eliaquim,  el  mayordomo,  a 

Sebna, el escriba, y a los ancianos de los 

sacerdotes,  cubiertos  de  saco,  al  profeta 

Isaías ben Amoz.

3

 Y le dijeron: Así ha dicho Ezequías: ¡Hoy 

es día de angustia, de castigo y de blasfe-

mia: los hijos están para salir del vientre,° 

pero no hay fuerzas para parirlos!

4

 Quizá YHVH tu Dios escuche todas las 

palabras  del  Rabsaces,  a  quien  el  rey  de 

Asiria,  su  amo,  envió  para  vituperar  al 

Dios viviente, y reprenda las palabras que 

YHVH tu Dios ha oído. Eleva, por tanto, 

una  oración  a  favor  del  remanente  que 

aún nos queda.

18.26 Lit. dijo.  18.26 Esto es, en arameo.  18.26 Esto es, un dialecto del hebreo característico de los habitantes de Judá

18.27 .sólo.  18.32 Esto es, vino nuevo.  18.32 Esto es, aceite fresco no procesado.  19.3 Lit. han llegado hasta la salida. Heb. 

ad mashber=hasta la ruptura.


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2 Reyes 19:5

406

5

 Así los siervos del rey Ezequías se pre-

sentaron ante Isaías,

6

 e Isaías les respondió: Así diréis a vues-

tro  señor:  Así  dice  YHVH:  No  temas  las 

palabras que has oído, por las cuales los 

sirvientes del rey de Asiria me han blas-

femado.

7

 He aquí pondré un espíritu° sobre él, y 

oirá  un  rumor,  y  se  volverá  a  su  propia 

tierra, y en su propia tierra lo haré caer 

a espada.

8

 Cuando  el  Rabsaces  oyó  que  el  rey  de 

Asiria había partido de Laquis, regresó y 

lo halló combatiendo contra Libna.

9

 Pero cuando oyó° decir que Tirhaca, rey 

de  Etiopía,  había  salido  a  luchar  contra 

él, envió nuevamente mensajeros a Eze-

quías, diciendo:

10

 Así diréis a Ezequías, rey de Judá: No 

te engañe tu Dios, en el cual confías, di-

ciendo:  Jerusalem  no  será  entregada  en 

mano del rey de Asiria.

11

 He aquí tú has escuchado lo que los re-

yes de Asiria han hecho a todas las tierras, 

destruyéndolas, ¿y tú te librarás?

12

 ¿Acaso  los  dioses  de  las  naciones  las 

pudieron librar de la destrucción de mis 

padres, esto es, a Gozán, Harán y Resef, 

y a los hijos de Edén que estaban en Te-

lasar?

13

 ¿Dónde está el rey de Hamat, o el rey 

de  Arfad,  o  el  rey  de  la  ciudad  de  Sefar-

vaim, o de Hena, o de Iva?

14

 Y recibió Ezequías la carta de mano de 

los mensajeros y la leyó, y subió a la Casa 

de YHVH, y la desplegó Ezequías delante 

de YHVH.

15

 Y  oró  Ezequías  delante  de  YHVH,  y 

dijo:  ¡Oh  YHVH  Dios  de  Israel,  entroni-

zado° sobre querubines! ¡Sólo Tú eres el 

Dios de todos los reinos de la tierra! Tú 

hiciste los cielos y la tierra.

16

 Inclina tu oído, oh YHVH, y escucha; 

abre tus ojos, oh YHVH, y observa. Escu-

cha las palabras que ha enviado Senaque-

rib para vituperar al Dios viviente.

17

 Cierto  es,  oh  YHVH,  que  los  reyes 

de Asiria han asolado los pueblos y sus 

tierras,

18

 y  han  arrojado  sus  dioses  al  fuego, 

porque ellos no son ‘Elohim, sino obra de 

manos de hombres, de madera y de pie-

dra; por eso los han destruido.

19

 Ahora pues, oh YHVH Dios nuestro, te 

ruego que nos salves de su mano, y todos 

los  reinos  de  la  tierra  puedan  saber  que 

sólo Tú, oh YHVH, eres ’Elohim.

20

 Entonces Isaías ben Amoz envió a de-

cir a Ezequías: Así dice YHVH Dios de Is-

rael: He escuchado lo que me has rogado 

acerca de Senaquerib rey de Asiria.

21

 Esta es la palabra que dice YHVH acer-

ca de él:

Te menosprecia, se burla de ti la 

virgen hija de Sión;

Menea despectiva la cabeza tras de ti 

la hija de Jerusalem.

22

 ¿A quién has vituperado y contra quién 

has blasfemado? ¿Contra quién has alza-

do la voz y elevado tus ojos con altivez? 

Contra el Santo de Israel.

23

 Por  mano  de  tus  mensajeros  has  vi-

tuperado  a  Adonay,  y  has  dicho:  Con  la 

multitud de mis carros yo he escalado la 

cima  de  las  montañas,  a  lo  más  inacce-

sible del Líbano, y de allí he cortado los 

cedros altos y lo mejor de sus cipreses,° y 

he entrado en su más remoto refugio, en 

su bosque más frondoso.°

24

 He  cavado  pozos,  y  bebido  aguas  ex-

tranjeras, y con las plantas de mis pies he 

secado todos los ríos de Egipto.

25

 ¿Acaso no has escuchado que hace mu-

cho  tiempo  lo  he  determinado,  y  desde 

tiempos antiguos lo he planeado? Y ahora 

lo hago venir, para que conviertas ciuda-

des fortificadas en montones de ruinas;

26

 y sus habitantes, faltos de fuerza, con 

la vergüenza de la derrota,° sean como la 

hierba del campo, hierba tierna, herbaje 

de azoteas,° y mies agostada antes de es-

pigar.

27

 Pero sé cómo te sientas, cómo sales y 

cómo entras, y cómo te enfureces contra 

mí.

28

 A  causa  de  tu  furia  contra  mí  y  por 

cuanto  tu  soberbia  ha  subido  hasta  mis 

oídos, pondré mi argolla° en tu nariz, y 

19.7 Heb. ruaj = viento, espíritu, alma, aliento, carácter, disposición. En esta última acepción, denota un impulso inexplicable 

e irresistible para hacer algo. 

19.9 Esto es, el rey de Asiria.  19.15 Lit. sentado.  19.23 Nabetos.  19.23 Lit. el jardín de su 

bosque

19.26 Esto es, de ser llevado cautivo.  19.26 Esto es, que no tiene suficiente raíz.  19.28 Esto es, aro para controlar a 

los animales.


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2 Reyes 20:14

407

mi brida en tu hocico; y te haré volver por 

el camino por donde viniste.

29

 Y ésta será la señal para ti:° Este año 

comerás lo que brote del grano caído, y el 

segundo año lo que brote sin sembrar; y 

al tercer año sembrarás y segarás, y plan-

tarás viñas y comerás su fruto.

30

 Y  el  remanente  que  quede  de  la  casa 

de Judá, echará nuevamente raíces hacia 

abajo, y llevará fruto hacia arriba.

31

 Porque de Jerusalem saldrá un rema-

nente, y del monte Sión los que se salven. 

¡El celo de YHVH Sebaot hará esto!

32

 Por  tanto,  así  dice  YHVH  respecto  al 

rey de Asiria: No entrará en esta ciudad, 

ni disparará ahí ninguna saeta, ni se acer-

cará a ella con escudo, ni levantará contra 

ella terraplén.

33

 Por el camino que vino, por el mismo 

se  volverá;  y  nunca  entrará  en  esta  ciu-

dad. Oráculo de YHVH.

34

 Por  cuanto  Yo  defenderé  esta  ciudad 

para salvarla, a causa de mí, y de mi sier-

vo David.

35

 Y aquella noche aconteció que el ángel 

de YHVH salió e hirió a ciento ochenta y 

cinco  mil  en  el  campamento  de  los  asi-

rios, y cuando se levantaron de madruga-

da, he aquí todos eran cadáveres.

36

 Entonces Senaquerib rey de Asiria par-

tió y se retiró, y habitó en Nínive.

37

 Y cuando estaba postrado en el templo 

de  su  dios  Nisroc,  aconteció  que  Adra-

melec  y  Sarezer°  lo  mataron  a  espada  y 

huyeron  a  la  tierra  de  Ararat;  y  su  hijo 

Esar-hadón reinó en su lugar.

Enfermedad de Ezequías 

Fin de su reinado

20

En  aquellos  días°  Ezequías  cayó 

enfermo de muerte, y fue a él Isaías 

ben  Amoz,  el  profeta,  y  le  dijo:  Así  dice 

YHVH: Ordena tu casa, porque morirás y 

no vivirás.

2

 Y él volvió su rostro hacia la pared y oró 

a YHVH, diciendo:

3

 Te  ruego,  oh  YHVH,  te  ruego  que  re-

cuerdes que he andado delante de ti con 

verdad y con un corazón íntegro, y que he 

hecho lo bueno ante tus ojos. Y Ezequías 

lloraba amargamente.

4

 Y  aconteció  que  antes  que  Isaías  hu-

biera salido del patio central,° llegó a él 

palabra de YHVH, diciendo:

5

 Vuelve y di a Ezequías, príncipe de mi 

pueblo: Así dice YHVH, el Dios de Da-

vid tu padre: He escuchado tu oración 

y  he  visto  tus  lágrimas;  he  aquí  Yo  te 

sano; al tercer día subirás a la Casa de 

YHVH.

6

 Y añado a tus días quince años, y te li-

braré a ti y a esta ciudad de mano del rey 

de  Asiria,  y  ampararé  a  esta  ciudad  por 

mí y por mi siervo David.

7

 Y dijo Isaías: Tomad una masa de higos. 

Y la trajeron y la pusieron sobre la úlcera, 

y sanó.

8

 Y  Ezequías  había  dicho  a  Isaías:  ¿Qué 

señal tendré de que YHVH me sanará, y al 

tercer día subiré a la Casa de YHVH?

9

 Y dijo Isaías: Esto te será señal de parte 

de YHVH, que YHVH hará lo° que ha di-

cho: ¿Avanzará la sombra diez gradas,° o 

retrocederá diez gradas?

10

 Y Ezequías respondió: Fácil cosa es que 

la sombra avance diez gradas, pero no que 

la sombra vuelva atrás diez gradas.

11

 Entonces  el  profeta  Isaías  invocó  a 

YHVH, e hizo volver a la sombra por las 

gradas que había descendido en la grade-

ría de Acaz: diez gradas hacia atrás.

12

 En  aquel  tiempo  Berodac-baladán, 

hijo  de  Baladán,  rey  de  Babilonia,  envió 

una carta y un presente a Ezequías, por-

que había escuchado que Ezequías estaba 

enfermo.

13

 Y  Ezequías  los  recibió°  y  les  mostró 

toda la casa de su tesorería, la plata y el 

oro, las especias y el mejor aceite, su ar-

mería, y todo lo que se encontraba en sus 

tesoros.  No  hubo  nada  que  Ezequías  no 

les mostrara, ni en su casa ni en todos sus 

dominios.

14

 Entonces  el  profeta  Isaías  fue  al  rey 

Ezequías, y le dijo: ¿Qué dijeron esos hom-

bres y de dónde han venido? Y Ezequías le 

19.29 Esto es, a Ezequías.  19.37 Otras versiones añaden sus hijos.  20.1 Esto es, en los días de la invasión de Senaquerib

20.4 Lit. ciudad interior.  20.9 Lit. la cosa.  20.9 Esto es, el uso de gradas o escalones como reloj solar (en Egipto se ha descu-

bierto un reloj similar a la gradería de Acaz 

→v.11, cuyos escalones, con una proyección apropiada de sombra, sirven para medir 

las horas del día). 

20.13 Esto es, a los embajadores del rey de Babilonia


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2 Reyes 20:15

408

dijo: Han venido de una tierra lejana, de 

Babilonia.

15

 Y  él  preguntó:  ¿Qué  han  visto  en  tu 

casa? Y Ezequías respondió: Han visto todo 

lo que hay en mi casa, no hay nada entre 

mis tesoros que no les haya mostrado.

16

 E  Isaías  dijo  a  Ezequías:  Oye  palabra 

de YHVH:

17

 He aquí que vienen días en que todo 

lo que está en tu casa, y todo lo que tus 

padres  han  atesorado  hasta  hoy,  será 

llevado  a  Babilonia:  Nada  quedará,  dice 

YHVH.

18

 Y  de  tus  hijos  que  saldrán  de  ti,  que 

habrás  engendrado,  serán  tomados  para 

que sean eunucos en el palacio del rey de 

Babilonia.

19

 Y  Ezequías  dijo  a  Isaías:  Buena  es  la 

palabra de YHVH que has pronunciado. Y 

añadió:° ¿Acaso no será así, si hay paz y 

estabilidad en mis días?

20

 El  resto  de  los  hechos  de  Ezequías, 

todo su valor, y cómo hizo el estanque y 

el acueducto para llevar las aguas a la ciu-

dad, ¿no están escritos en el rollo de las 

Crónicas de los reyes de Judá?

21

 Y  durmió  Ezequías  con  sus  padres,  y 

reinó en su lugar Manasés su hijo.

Reinados de Manasés y Amón en Judá

21

De doce años era Manasés cuando 

comenzó a reinar, y reinó cincuen-

ta y cinco años en Jerusalem. El nombre 

de su madre era Hepsiba.°

2

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

conforme a las abominaciones de las na-

ciones que YHVH había expulsado de de-

lante de los hijos de Israel.

3

 Pues  volvió  a  edificar  los  lugares  altos 

que su padre Ezequías había destruido, y 

erigió altares a Baal, e hizo una Asera, tal 

como había hecho Acab rey de Israel, y se 

postró ante todo el ejército de los cielos, 

y los sirvió.

4

 Y construyó altares en la propia Casa de 

YHVH, de la cual YHVH había dicho: En 

Jerusalem pondré mi Nombre.

5

 Y levantó altares para todo el ejército de 

los cielos en los dos atrios de la Casa de 

YHVH.

6

 E hizo pasar por fuego a su hijo, y prac-

ticó la adivinación y la magia, y designó 

adivinadores por espíritus de muertos; y 

se empeñó en hacer lo malo ante los ojos 

de YHVH para provocarlo a ira.

7

 Además colocó en la Casa la imagen ta-

llada de Asera que él había hecho, acerca 

de la cual YHVH había dicho a David y a 

su hijo Salomón: En esta Casa, y en Jeru-

salem, a la cual escogí de todas las tribus 

de Israel, pondré mi Nombre para siem-

pre;

8

 y no volveré más a permitir que el pie 

de Israel se mueva de la tierra que di a sus 

padres, con tal que observen todo lo que 

les he ordenado, conforme a toda la Ley 

que mi siervo Moisés les ordenó.

9

 Pero no escucharon, pues Manasés los 

indujo a hacer el mal, más que las otras 

naciones a las que YHVH había destruido 

delante de los hijos de Israel.

10

 Entonces  YHVH  habló  por  mano  de 

sus siervos los profetas, diciendo:

11

 Por cuanto Manasés rey de Judá ha he-

cho estas abominaciones, y ha hecho más 

mal que todo el que hizo el amorreo que 

estuvo  antes  de  él,  y  también  ha  hecho 

pecar a Judá con sus ídolos,

12

 por tanto, así dice YHVH Dios de Is-

rael: He aquí Yo traigo desgracia tal so-

bre Jerusalem y sobre Judá, que todo el 

que oiga acerca de ella le retiñirán am-

bos oídos.

13

 He extendido sobre Jerusalem el cor-

del de Samaria y la plomada de la casa de 

Acab,°  y  escurriré  a  Jerusalem  como  se 

escurre un plato, escurriéndolo y volvién-

dolo boca abajo.

14

 Abandonaré  el  resto  de  mi  heredad  y 

los entregaré en mano de sus enemigos, 

y llegarán a ser como presa y botín para 

todos sus enemigos,

15

 porque han hecho lo malo a mis ojos 

y me han provocado a ira desde el día que 

sus padres salieron de Egipto hasta hoy.

16

 Además Manasés derramó mucha san-

gre inocente, hasta llenar de ella a Jeru-

salem de un extremo a otro, aparte de su 

pecado  con  que  hizo  pecar  a  Judá,  para 

que hiciera lo malo a ojos de YHVH.

20.19 Lit. dijo.  21.1 Esto es, mi deseo está en ella.  21.13 Es decir, el destino de Jerusalem sería el mismo que el de Samaria 

y la casa de Acab.


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2 Reyes 22:16

409

17

 El  resto  de  los  hechos  de  Manasés, 

todo lo que hizo y todo su pecado con que 

pecó, ¿no están escritos en el rollo de las 

Crónicas de los reyes de Judá?

18

 Y  durmió  Manasés  con  sus  padres,  y 

fue sepultado en el jardín de su casa, en 

el jardín de Uza; y Amón su hijo reinó en 

su lugar.

19

 De  veintidós  años  era  Amón  cuando 

comenzó a reinar, y reinó dos años en Je-

rusalem. El nombre de su madre era Me-

sulemet hija de Haruz, de Jotba.

20

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

como había hecho su padre Manasés.

21

 Anduvo  en  todos  los  caminos  en  que 

su padre había andado, y sirvió a los ído-

los a los que había servido su padre, y se 

postró ante ellos.

22

 Y  abandonó  a  YHVH,  el  Dios  de  sus 

padres,  y  no  anduvo  en  el  camino  de 

YHVH.

23

 Y los siervos de Amón conspiraron con-

tra él, y mataron al rey en su propia casa.

24

 Pero el pueblo de la tierra hizo morir 

a todos los que habían conspirado contra 

el rey Amón, y el pueblo de la tierra hizo 

que Josías su hijo reinara en su lugar.

25

 El resto de los hechos Amón, ¿no están 

escritos en el rollo de las Crónicas de los 

reyes de Judá?

26

 Y alguien lo sepultó en su sepulcro en 

el huerto de Uza, y Josías su hijo reinó en 

su lugar.

Reinado de Josías 

El Rollo de la Ley

22

Cuando Josías comenzó a reinar era 

de ocho años, y reinó en Jerusalem 

treinta y un años. El nombre de su madre 

era Jedida hija de Adaía, de Boscat.

2

 E hizo lo recto a ojos de YHVH, y andu-

vo en todo el camino de David su padre, y 

no se apartó ni a derecha ni a izquierda.

3

 En  el  año  decimoctavo  del  rey  Josías 

aconteció  que  el  rey  envió  a  Safán  ben 

Azalía,  hijo  de  Mesulam,  el  escriba,  a  la 

Casa de YHVH, diciendo:

4

 Sube al sumo sacerdote Hilcías para que 

calcule  la  plata  que  ha  sido  llevada  a  la 

Casa de YHVH, que los guardianes de la 

entrada° han recogido del pueblo,

5

 y lo pongan en mano de los que tienen 

a su cargo la supervisión del arreglo en la 

Casa de YHVH, a fin de que lo entreguen a 

los que hacen la obra de la Casa de YHVH 

para reparar las grietas de la Casa:

6

 a  los  ebanistas,  maestros  y  albañiles, 

para comprar madera y piedra de cantería 

para reparar la Casa;

7

 y que no se les pida cuenta de la plata 

que ponen en su mano, porque obran con 

fidelidad.

8

 Entonces el sumo sacerdote Hilcías dijo 

al escriba Safán: ¡He hallado en la Casa de 

YHVH el Rollo de la Ley! E Hilcías entre-

gó el Rollo a Safán, quien lo leyó.

9

 Y el escriba Safán fue al rey, y trajo res-

puesta  al  rey,  diciendo:  Tus  siervos  han 

sacado la plata que se halló en la Casa, y 

la han entregado en mano de los obreros 

que reparan la Casa de YHVH.

10

 El  escriba  Safán  también  informó  al 

rey, diciendo: El sacerdote Hilcías me ha 

entregado un rollo. Y Safán lo leyó delan-

te del rey.

11

 Y aconteció que cuando el rey escuchó 

las palabras del Rollo de la Ley, rasgó sus 

vestidos.

12

 Luego  el  rey  dio  orden  al  sacerdote 

Hilcías, y a Ahicam ben Safán, y a Acbor 

ben Micaías, y al escriba Safán, y a Asaías 

siervo del rey,° diciendo:

13

 Id y consultad a YHVH por mí, y por 

el pueblo, y por todo Judá, respecto a las 

palabras de este Rollo que se ha hallado, 

porque grande es la ira de YHVH que se 

ha  encendido  contra  nosotros,  porque 

nuestros padres no escucharon las pala-

bras de este Rollo, para hacer conforme a 

todo lo que fue escrito para nosotros.

14

 Y el sacerdote Hilcías, y Ahicam, y Ac-

bor, y Safán y Asaías, fueron a la profetisa 

Hulda, mujer de Salum ben Ticva, hijo de 

Harhas, guardián de las vestiduras, la cual 

vivía en el segundo sector° de Jerusalem, 

y hablaron con ella.

15

 Y ella les dijo: Así dice YHVH Dios de Is-

rael: Decid al varón que os ha enviado a mí:

16

 Así  dice  YHVH:  He  aquí  Yo  traigo  la 

desgracia a este lugar, y sobre sus habi-

tantes, como dicen las palabras del Rollo 

que ha leído el rey de Judá,

22.4 Lit. del umbral.  22.12 En este caso, siervo del rey se refiere a un alto oficial de la corte.  22.14 .sector


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2 Reyes 22:17

410

17

 por cuanto me han abandonado y han 

quemado  incienso  a  otros  dioses  para 

provocarme a ira con toda la obra de sus 

manos; así pues, mi ira se ha encendido 

contra este lugar y no podrá ser apagada.

18

 Pero al rey de Judá, que os ha envia-

do a consultar a YHVH, le diréis: Así dice 

YHVH  Dios  de  Israel:  Las  palabras  que 

has oído se cumplirán,

19

 pero  ya  que  tu  corazón  está  tierno  y 

humillado delante de YHVH al escuchar 

lo que he pronunciado contra este lugar 

y  contra  sus  habitantes,  que  llegarían  a 

ser desolación y maldición, y has rasgado 

tus vestidos, y has llorado delante de mí, 

también Yo he escuchado, dice YHVH.

20

 Por tanto, he aquí Yo te recogeré con 

tus padres, y serás llevado a tu sepulcro 

en  paz,  y  tus  ojos  no  verán  todo  el  mal 

que Yo traigo sobre este lugar. Y llevaron 

la respuesta al rey.

Reformas de Josías 

Sus sucesores

23

Entonces  el  rey  mandó  a  reunir 

con él a todos los ancianos de Judá 

y Jerusalem.

2

 Y el rey subió a la Casa de YHVH, y cada 

hombre de Judá y todos los habitantes de 

Jerusalem iban con él, así como los sacer-

dotes, los profetas y todo el pueblo, desde 

el menor hasta el mayor. Entonces él leyó 

a oído de ellos todas las palabras del Ro-

llo del pacto que había sido hallado en la 

Casa de YHVH.

3

 Y el rey se puso en pie junto a la colum-

na e hizo pacto delante de YHVH de andar 

en  pos  de  YHVH,  y  guardar  sus  manda-

mientos, testimonios y estatutos con todo 

el corazón y con toda el alma, y cumplir 

las palabras del pacto escritas en ese Ro-

llo. Y todo el pueblo confirmó el pacto.

4

 Y el rey ordenó al sumo sacerdote Hil-

cías,  y  a  los  sacerdotes  de  segundo  or-

den,° y a los guardianes de la entrada, que 

sacaran del Santuario de YHVH todos los 

utensilios hechos para Baal, y para Asera, 

y para todo el ejército de los cielos, y los 

quemó fuera de Jerusalem, en los campos 

del Cedrón, y llevó sus cenizas a Bet-’El.

5

 Y  destituyó  a  los  sacerdotes  idólatras 

que  los  reyes  de  Judá  habían  designado 

para  quemar  incienso  en  los  lugares  al-

tos, en las ciudades de Judá y en los al-

rededores  de  Jerusalem,  así  como  a  los 

que quemaban incienso a Baal, al sol y a 

la luna, a Mazzalot,° y a todo el ejército 

de los cielos.

6

 E  hizo  sacar  la  Asera  de  la  Casa  de 

YHVH, la llevó fuera de Jerusalem, al to-

rrente Cedrón, y la quemó en el torrente 

Cedrón hasta reducirla a ceniza, y echó su 

ceniza en la fosa común.°

7

 Derribó  además  las  casas  de  los  sodo-

mitas  dedicados  a  la  prostitución°  que 

estaban  en  la  Casa  de  YHVH,  donde  las 

mujeres tejían tiendas° para la Asera.

8

 Hizo  acudir  a  todos  los  sacerdotes  de 

las  ciudades  de  Judá,  y  declaró  inmun-

dos los lugares altos donde los sacerdotes 

quemaban  incienso,  desde  Gabaa  hasta 

Beerseba, y destruyó los lugares altos de 

las puertas que estaban en la entrada del 

portón de Josué, gobernador de la ciudad, 

a la izquierda de la entrada de la ciudad.

9

 Pero a los sacerdotes de los lugares altos 

no se les permitió subir al altar de YHVH 

en  Jerusalem,  aunque  sí  comían  panes 

ázimos entre sus hermanos.

10

 También  declaró  inmundo  al  Tofet° 

que estaba en el valle de Ben-hinom, para 

que  nadie  hiciera  pasar  por  fuego  a  su 

hijo o a su hija en honor de Moloc.

11

 Hizo  quitar  también  los  caballos  que 

los reyes de Judá habían dedicado al sol, 

en la entrada de la Casa de YHVH, junto a 

la cámara de Natán-melec, el eunuco que 

estaba en las dependencias,° y quemó en 

el fuego los carros del sol.

12

 Asimismo,  el  rey  demolió  los  altares 

que  los  reyes  de  Judá  habían  hecho  en 

la azotea del aposento superior de Acaz, 

23.4 Prob. se refiere a quienes seguían en rango al sumo sacerdote. 

→25.18.  23.5  Mazzalot=Constelaciones (o signos) del 

zodíaco 

→ § 164  23.6 Lit. las tumbas de los hijos del pueblo.  23.7 Esto es, funcionarios y funcionarias de templos paganos, 

encargados de realizar ritos sexuales licenciosos con el fin de garantizar la fertilidad de la tierra, de los animales y de los 

hombres. De ahí que a estas personas se las conozca como prostitutas o prostitutos sagrados (conocidos como hieródulos o 

hieródulas). 

23.7 Prob. se trate de algún tipo de cobertura o vestimenta para las estatuas o pilares que se erigían en los lugares 

altos. 

23.10 Lugar en el que los niños eran ofrecidos a Moloc a través del fuego. Con el tiempo pasó a significar cremato-

rio

23.11 Prob. se trata del espacio cubierto que precede a la entrada principal de la Casa.


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2 Reyes 23:30

411

y  los  altares  que  Manasés  había  erigido 

en los dos atrios de la Casa de YHVH; los 

destrozó allí y arrojó sus cenizas en el to-

rrente Cedrón.

13

 Asimismo el rey declaró inmundos los 

lugares altos° que estaban delante de Je-

rusalem,  al  sur  del  monte  de  la  corrup-

ción,°  que  Salomón  rey  de  Israel  había 

edificado  a  Astoret,  abominación  de  los 

Sidonios,  y  a  Quemos,  abominación  de 

Moab, y a Milcom, lo abominable de los 

hijos de Amón.

14

 También hizo trizas las estatuas, y taló 

las aseras, y llenó aquellos sitios de hue-

sos de hombres.

15

 Además, hizo trizas el altar que estaba 

en Bet-’El, y el lugar alto que había hecho 

Jeroboam  ben  Nabat  (mediante  el  cual 

había hecho pecar a Israel). Tanto ese al-

tar  como  el  lugar  alto  los  hizo  trizas,  y 

quemó el lugar alto, y lo redujo a ceniza, 

y quemó la Asera.

16

 Y al regresar, Josías vio los sepulcros 

que  estaban  allí  en  el  monte,  y  envió  a 

recoger los huesos de los sepulcros y los 

quemó  sobre  el  altar,  y  los  declaró  in-

mundos conforme a la palabra de YHVH 

que había proclamado el varón de Dios, el 

cual había anunciado estas cosas.

17

 Y preguntó: ¿Qué monumento es éste 

que veo? Y los hombres de la ciudad le res-

pondieron: Es el sepulcro del varón de Dios 

que  vino  de  Judá  y  proclamó  estas  cosas 

que has hecho contra el altar de Bet-’El.

18

 Y él dijo: Dejadlo, que nadie mueva sus 

huesos. Así fueron preservados sus hue-

sos  intactos,  con  los  huesos  del  profeta 

que había venido de Samaria.

19

 Josías  también  quitó  todos  los  san-

tuarios de los lugares altos que había en 

las ciudades de Samaria, que habían he-

cho los reyes de Israel para provocar ira, 

e hizo con ellos conforme a toda la obra 

que había hecho en Bet-’El.

20

 Y allí, sobre sus mismos altares, dego-

lló  a  todos  los  sacerdotes  de  los  lugares 

altos, y quemó sobre ellos huesos huma-

nos; y regresó a Jerusalem.

21

 Luego el rey ordenó a todo el pueblo, 

diciendo: Celebrad la Pascua para YHVH 

vuestro Dios, según lo escrito en este Ro-

llo del pacto.

22

 En verdad que tal Pascua no había sido 

celebrada desde los días de los jueces que 

juzgaron a Israel, ni en todos los días de 

los reyes de Israel y de los reyes de Judá.

23

 En  el  año  decimoctavo  del  rey  Josías 

fue hecha esta Pascua para YHVH en Je-

rusalem.

24

 Josías también eliminó a los médium 

y a los espiritistas, a los terafim,° y todos 

los ídolos abominables, y todos los ídolos 

detestables  que  se  veían  en  la  tierra  de 

Judá y en Jerusalem, para cumplir las pa-

labras de la Ley escritas en el Rollo que el 

sacerdote Hilcías había hallado en la Casa 

de YHVH.

25

 No hubo ningún rey como él antes de él, 

que se convirtiera a YHVH con todo su cora-

zón, con toda su alma y con toda su fuerza, 

conforme a toda la Ley de Moisés, ni tampo-

co se levantó otro igual después de él.

26

 Con todo, YHVH no desistió del ardor 

de  su  gran  ira,  pues  su  ira  se  había  en-

cendido contra Judá a causa de todas las 

provocaciones con que Manasés lo había 

provocado.

27

 Y  YHVH  había  dicho:  Como  aparté 

a  Israel,  también  a  Judá  apartaré  de  mi 

presencia, y desecharé a esta ciudad que 

había escogido, a Jerusalem, y a la casa de 

la cual dije: Allí estará mi Nombre.

28

 El resto de los hechos de Josías y todo 

lo que hizo, ¿no están escritos en el rollo 

de las Crónicas de los reyes de Judá?

29

 En  sus  días,  Faraón  Necao,  rey  de 

Egipto, subió hacia el río Éufrates al en-

cuentro del rey de Asiria; y el rey Josías 

fue a su encuentro, pero en cuanto aquél 

lo vio, le dio muerte en Meguido.

30

 Y sus siervos lo transportaron° muerto 

desde Meguido, y lo llevaron a Jerusalem 

y  lo  sepultaron  en  su  sepulcro.  Después 

el pueblo de la tierra tomó a Joacaz ben 

Josías, y lo ungieron y lo proclamaron rey 

en lugar de su padre.

23.13 LXX registra el templo.  23.13 El monte de los Olivos es llamado aquí monte de la corrupción, por las idolatrías cometidas 

en él. 

23.24 Los terafim son ídolos domésticos semejantes a lares o penates característicos de la religión romana 

→Gn.31.19, 

30 y 32, y Jue.18.17 y 24. Es posible que fueran usados como medio de adivinación en Israel (como en este pasaje), al igual que 

en las naciones paganas 

→Ez.21.21.  23.30 Esto es, en caballo o en carruaje


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2 Reyes 23:31

412

31

 Cuando  Joacaz  comenzó  a  reinar  era 

de veintitrés años, y reinó tres meses en 

Jerusalem.  El  nombre  de  su  madre  era 

Hamutal hija de Jeremías, de Libna.

32

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

conforme a todo lo que habían hecho sus 

padres.

33

 Y Faraón Necao lo encarceló en Ribla, 

en  el  territorio  de  Hamat,  para  que  no 

reinara en Jerusalem, e impuso sobre la 

tierra un tributo de cien talentos de plata 

y uno de oro.

34

 E hizo Faraón Necao que Eliaquim ben 

Josías reinara en lugar de Josías su padre, 

y cambió° su nombre por el de Joacim, y 

tomó a Joacaz y lo llevó a Egipto, donde 

murió.

35

 Y Joacim pagó la plata y el oro al Fa-

raón,  pero  tuvo  que  imponer  contribu-

ciones  al  país  para  entregar  el  dinero 

según la orden del Faraón. Exigió de la 

gente del pueblo, a cada uno según sus 

bienes,° la plata y el oro para darlo a Fa-

raón Necao.

36

 Cuando Joacim comenzó a reinar era 

de veinticinco años, y reinó once años en 

Jerusalem.  El  nombre  de  su  madre  era 

Zebuda, hija de Pedaías, de Ruma.

37

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

conforme a todo lo que habían hecho sus 

padres.

Reinado de Joacim y Joaquín 

Primera deportación

24

En sus días subió Nabucodonosor, 

rey  de  Babilonia,  y  Joacim  fue  su 

vasallo durante tres años. Luego cambió 

de parecer y se rebeló contra él.

2

 Entonces  YHVH  envió  contra  él  cua-

drillas  de  caldeos,  cuadrillas  de  sirios, 

cuadrillas  de  moabitas,  y  cuadrillas  de 

amonitas. Las envió contra Judá para des-

truirla, conforme a la palabra que YHVH 

había hablado por mano de sus siervos los 

profetas.

3

 Ciertamente por mandato de YHVH su-

cedió esto contra Judá, para quitarlos de 

su presencia por los pecados de Manasés, 

en conformidad con todo lo que él había 

hecho,

4

 y  también  por  la  sangre  inocente  que 

había derramado, pues había llenado a Je-

rusalem de sangre inocente, y YHVH no 

quiso perdonar.

5

 El resto de los hechos de Joacim, y todo 

lo que hizo, ¿no están escritos en el rollo 

de las Crónicas de los reyes de Judá?

6

 Y durmió Joacim con sus padres, y Joa-

quín su hijo reinó en su lugar.

7

 Y el rey de Egipto no volvió a salir de su 

tierra, pues el rey de Babilonia conquistó 

todo  lo  que  había  sido  del  rey  de  Egipto, 

desde el río de Egipto hasta el río Éufrates.

8

 Cuando  Joaquín  comenzó  a  reinar  era 

de dieciocho años, y reinó en Jerusalem 

tres meses.° El nombre de su madre era 

Nehusta, hija de Elnatán, de Jerusalem.

9

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

conforme  a  todo  lo  que  había  hecho  su 

padre.

10

 En  aquel  tiempo  los  siervos  de  Na-

bucodonosor, rey de Babilonia, subieron 

contra Jerusalem, y la ciudad fue sitiada.

11

 Y Nabucodonosor rey de Babilonia lle-

gó contra la ciudad cuando sus siervos la 

estaban asediando.

12

 Y Joaquín rey de Judá se rindió al rey 

de Babilonia juntamente con su madre, y 

sus siervos, y sus príncipes, y sus eunu-

cos; y en el año octavo de su reinado, el 

rey de Babilonia lo tomó prisionero.

13

 Y  sacó  de  allí  todos  los  tesoros  de  la 

Casa  de  YHVH,  y  los  tesoros  de  la  casa 

real,  e  hizo  pedazos  todos  los  utensilios 

de oro que Salomón, rey de Israel, había 

hecho  para  el  Santuario  de  YHVH,  tal 

como YHVH había hablado.

14

 Y  llevó  en  cautiverio  a  todo  Jerusa-

lem, y a todos los príncipes, y a todos los 

hombres de valor: Diez mil cautivos, así 

como  a  todos  los  artesanos  y  herreros.° 

No  quedó  sino  lo  más  pobre  del  pueblo 

de la tierra.

15

 También  llevó  cautivo  a  Babilonia  a 

Joaquín, y a la madre del rey, y a las muje-

res del rey, y a sus eunucos, y a los nobles 

del país: los hizo llevar cautivos desde Je-

rusalem hasta Babilonia.

16

 A  todos  los  hombres  de  guerra,  siete 

mil, y los artesanos y herreros, mil, todos 

23.34 Lit. volvió.  23.35 Es decir, según la tasación de su tierra.  24.8 Esto es, tres meses y diez días 

→2 Cr.36.9.  24.14 Más 

que a simples herreros, prob. se refiere a algún tipo de ingenieros capaces de construir baluartes defensivos para la ciudad. 


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2 Reyes 25:18

413

valientes  guerreros.  También  a  éstos  el 

rey de Babilonia llevó en cautiverio a Ba-

bilonia.

17

 Y el rey de Babilonia puso como rey en 

su° lugar a Matanías, su tío, y le cambió el 

nombre por el de Sedequías.

18

 Cuando  Sedequías  comenzó  a  reinar 

era  de  veintiún  años,  y  reinó  once  años 

en Jerusalem. El nombre de su madre era 

Hamutal, hija de Jeremías, de Libna.

19

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

conforme  a  todo  lo  que  había  hecho 

Joacim;

20

 porque por la ira que YHVH tenía con-

tra Jerusalem y contra Judá para arrojarlas 

de su presencia, fue que Sedequías llegó a 

rebelarse contra el rey de Babilonia.

Reinado de Sedequías 

Segunda deportación

25

En el año noveno de su reinado, en 

el  décimo  mes,  a  los  diez  días  del 

mes, aconteció que Nabucodonsor, rey de 

Babilonia, llegó con todo su ejército contra 

Jerusalem, y acampó contra ella, y constru-

yeron empalizadas° a su alrededor.

2

 De  tal  modo  que  la  ciudad  fue  sitiada 

hasta el año undécimo del rey Sedequías.

3

 Y  a  los  nueve  días  del  mes  cuarto,  el 

hambre  prevaleció  en  la  ciudad,  y  no 

hubo pan para el pueblo de la tierra.

4

 Y abierta ya una brecha° en la ciudad, 

mientras los caldeos tenían la ciudad cer-

cada  en  derredor,  todos  los  hombres  de 

guerra huyeron de noche por el camino 

del portón, entre los dos muros, que esta-

ba junto al jardín del rey, y se° fue camino 

del Arabá.

5

 Pero el ejército de los caldeos fue tras 

el rey y lo alcanzó en la llanura de Jeri-

có,  y  todo  su  ejército  fue  dispersado  de 

su lado.

6

 Y  capturaron  al  rey,  y  lo  llevaron  ante 

el rey de Babilonia en Ribla, y le dictaron 

sentencia.

7

 Degollaron a los hijos de Sedequías ante 

sus propios ojos, luego le sacaron los ojos 

a  Sedequías,  y  atándolo  con  cadenas  de 

bronce, lo llevaron a Babilonia.

8

 En  el  mes  quinto,  a  los  siete  días  del 

mes, siendo el año decimonoveno de Na-

bucodonosor, rey de Babilonia, Nabuzara-

dán, capitán de la guardia, siervo del rey 

de Babilonia, llegó a Jerusalem.

9

 Y  quemó  la  Casa  de  YHVH,  y  el  pala-

cio  real,  y  todas  las  casas  de  Jerusalem, 

y también prendió fuego a todas las casas 

de los nobles.

10

 Y todo el ejército de los caldeos que es-

taba con el capitán de la guardia, derribó 

los muros alrededor de Jerusalem.

11

 Y  al  resto  del  pueblo  que  había  que-

dado en la ciudad, y a los desertores que 

se habían pasado al rey de Babilonia, y al 

resto  de  la  multitud,  los  llevó  cautivos 

Nabuzaradán, capitán de la guardia.

12

 Pero el capitán de la guardia dejó al-

gunos de los más pobres del país para que 

fueran viñadores y labradores.

13

 Los  caldeos  hicieron  pedazos  las  co-

lumnas  de  bronce  que  había  en  la  Casa 

de YHVH, así como las bases y el mar de 

bronce que había en la Casa de YHVH, y 

llevaron su bronce a Babilonia.

14

 También tomaron los calderos, las pa-

letas°,  las  despabiladeras,  las  cucharas, 

y todos los utensilios de bronce con que 

ministraban.

15

 Asimismo  los  incensarios  y  los  tazo-

nes;° todo lo que era de oro, y todo lo que 

era de plata: todo se lo llevó el capitán de 

la guardia.

16

 En cuanto a las dos columnas, el úni-

co mar y las bases que Salomón había he-

cho para la Casa de YHVH, no fue posible 

calcular el peso del bronce de todos esos 

utensilios.

17

 La altura de una columna era de die-

ciocho codos: sobre ella había un capitel 

de  bronce,  y  la  altura  del  capitel  era  de 

tres codos, con obra de malla y granadas 

esculpidas alrededor del capitel, todo de 

bronce.  Igual  a  ésta  era  la  segunda  co-

lumna, con su obra de malla.

18

 Y  tomó  el  capitán  de  la  guardia  al 

sumo sacerdote Seraías, y a Sofonías, se-

gundo° sacerdote, y a los tres guardias del 

portón,

24.17 Esto es, de Joaquín.  25.1 Heb. Dayeq. Se refiere a obras para el asedio: empalizadas, muros, trincheras que aseguraban 

que nadie entrara ni saliera de la ciudad durante la guerra. 

25.4 Esto es, en el muro de la ciudad.  25.4 Esto es, el rey Sede-

quías

25.14 Prob. algún instrumento para limpiar el altar.  25.15 Se refiere a recipientes usados en los rituales para contener, 

derramar o rociar la sangre del holocausto. 

25.18 Prob. se refiere al segundo en rango después del sumo sacerdote. 

→23.4.


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2 Reyes 25:19

414

19

 y de la ciudad tomó a cierto eunuco 

que  estaba  encargado  de  los  hombres 

de guerra, y a cinco consejeros del rey° 

que se hallaban en la ciudad, y al escriba 

principal  del  ejército,  que  alistaba  a  la 

gente del país, y a sesenta hombres del 

pueblo de la tierra que se hallaban en la 

ciudad.

20

 A éstos tomó Nabuzaradán, capitán de 

la guardia, y los hizo llevar al rey de Babi-

lonia en Ribla.

21

 Y el rey de Babilonia los hirió y les dio 

muerte en Ribla, en tierra de Hamat. Así 

fue sacada Judá de su tierra y llevada en 

cautiverio.

22

 Y  Nabucodonosor,  rey  de  Babilonia, 

designó sobre el pueblo que había dejado 

en tierra de Judá a Gedalías ben Ahicam, 

hijo de Safán.

23

 Cuando todos los capitanes de la tropa, 

así como sus hombres, oyeron que el rey 

de Babilonia había designado a Gedalías, 

fueron  a  Gedalías  en  Mizpa:  Ismael  ben 

Netanías, Johanán ben Carea, Seraías ben 

Tanhumet netofatita, y Jaazanías, hijo de 

un maacateo, ellos y sus hombres.

24

 Y les juró Gedalías a ellos y a sus hom-

bres, y les dijo: No tengáis temor de los 

siervos de los caldeos; habitad en la tierra 

y servid al rey de Babilonia, y os irá bien.

25

 Pero en el mes séptimo aconteció que 

Ismael ben Netanías, hijo de Elisama, de 

la  estirpe  real,  fue  con  diez  hombres  y 

atacó a Gedalías, el cual murió junto con 

los judíos y los caldeos que estaban con él 

en Mizpa.

26

 Y  levantándose  todo  el  pueblo,  desde 

el menor hasta el mayor, con los capita-

nes de las tropas, se fueron a Egipto por 

temor a los caldeos.

27

 En el año trigésimo séptimo del cau-

tiverio de Joaquín rey de Judá, en el mes 

duodécimo, a los veintisiete días del mes, 

aconteció que Evil-merodac, rey de Babi-

lonia, en el año en que comenzó a reinar, 

elevó  el  rostro  de  Joaquín,  rey  de  Judá, 

sacándolo° de la cárcel.

28

 Y le habló con benevolencia, y puso su 

trono más alto que los tronos de los de-

más reyes vasallos en Babilonia.

29

 Y cambió los vestidos de su prisión, y 

comió pan siempre en su presencia, todos 

los días de su vida.

30

 Y en cuanto a su ración diaria, le fue dada 

una ración continua de parte del rey, cada 

cosa en su día, todos los días de su vida.

25.19 Lit. de los que ven el rostro del rey.  25.27 .sacándolo


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1

Adam,° Set, Enós,

2

 Cainán, Mahalaleel, Jared,

3

 Enoc, Matusalén, Lamec,

4

 Noé, Sem, Cam y Jafet.

5

 Hijos  de  Jafet:  Gomer,  Magog,  Madai, 

Javán, Tubal, Mesec y Tiras.

6

 Hijos de Gomer: Askenaz, Rifat y Togar-

ma.

7

 Hijos  de  Javán:  Elisa,  Tarsis,  Quitim  y 

Dodanim.

8

 Hijos de Cam: Cus, Mizraim, Fut y Ca-

naán.

9

 Hijos de Cus: Seba, Havila, Sabta, Raama 

y Sabteca. Hijos de Raama: Seba y Dedán.

10

 Cus engendró a Nimrod, quien llegó a 

ser poderoso en la tierra.

11

 Mizraim  engendró  a  Ludim,  a  Ana-

mim, a Lehabim, a Naftuhim,

12

 a Patrusim y a los Casluhim (de quienes 

proceden los filisteos), y a los caftoreos.

13

 Canaán  engendró  a  Sidón,  su  primo-

génito, y a Het,

14

 al jebuseo, al amorreo, al gergeseo,

15

 al heveo, al araceo, al sineo,

16

 al arvadeo, al zemareo y al hamateo.

17

 Los hijos de Sem: Elam, Asur, Arfaxad, 

Lud, Aram, Uz, Hul, Geter y Mesec.

18

 Arfaxad engendró a Sela, y Sela engen-

dró a Heber.

19

 Y a Heber nacieron dos hijos: el nom-

bre del uno fue Peleg, porque en sus días 

fue dividida la tierra, y el nombre de su 

hermano fue Joctán.

20

 Joctán  engendró  a  Almodad,  Selef, 

Hazar-mavet, y Jera,

21

 a Adoram también, a Uzal, a Dicla,

22

 a Ebal, a Abimael, a Seba,

23

 a Ofir, a Havila y a Jobab. Todos hijos 

de Joctán.

24

 De° Sem: Arfaxad, Sela,

25

 Heber, Peleg, Reu,

26

 Serug, Nacor, Taré,

27

 y Abram, el cual es Abraham.

28

 Hijos de Abraham: Isaac e Ismael.

29

 Y  éstas  son  sus  generaciones:  el  pri-

mogénito  de  Ismael  fue  Nebaiot,  luego 

Cedar, Adbeel, Mibsam,

30

 Misma, Duma, Massa, Hadad, Tema,

31

 Jetur, Nafis y Cedema: tales fueron los 

hijos de Ismael.

32

 Los  hijos  que  Cetura,°  concubina  de 

Abraham, dio a luz fueron: Zimram, Joc-

sán, Medán, Madián, Isbac y Súa. Los hi-

jos de Jocsán: Seba y Dedán.

33

 Hijos  de  Madián:  Efa,  Efer,  Hanoc, 

Abida y Elda. Todos éstos fueron hijos de 

Cetura.

34

 Abraham  engendró  a  Isaac.  Hijos  de 

Isaac: Esaú e Israel.

35

 Hijos de Esaú: Elifaz, Reuel, Jeús, Jaa-

lam y Coré.

36

 Hijos  de  Elifaz:  Temán,  Omar,  Zefo, 

Gatam, Cenaz, Timna y Amalec.

37

 Hijos  de  Reuel:  Nahat,  Zera,  Sama  y 

Miza.

38

 Hijos  de  Seir:  Lotán,  Sobal,  Zibeón, 

Aná, Disón, Ezer y Disán.

39

 Hijos de Lotán: Hori y Homam; y Tim-

na fue hermana de Lotán.

40

 Hijos de Sobal: Alván, Manahat, Ebal, 

Sefo y Onam. Hijos de Zibeón: Aja y Aná.

De Adam a Abraham a Israel

1.1 Las listas genealógicas de este primer cap. han sido confeccionadas a partir de datos tomados de Gn.(c. 5-37) y de otras 

tradiciones independientes. Comenzando por los descendientes de Adam, y mediante no pocas adiciones y detalles comple-

mentarios, la dinámica de las genealogías de los nueve primeros cap. nos lleva hasta David, centro de la atención del cronista. 

1.24 .De.  1.32 

→Gn.25.1-4.


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1 Crónicas 1:41

416

41

 Disón  fue  hijo  de  Aná;  y  los  hijos  de 

Disón: Amram, Esbán, Itrán y Querán.

42

 Hijos de Ezer: Bilhán, Zaaván y Jaacán. 

Hijos de Disán: Uz y Arán.

43

 Y éstos° son los reyes que reinaron en 

la tierra de Edom, antes que hubiera rey 

de los hijos de Israel: Bela hijo de Beor, y 

el nombre de su ciudad era Dinaba.

44

 Muerto Bela, reinó en su lugar Jobab, 

hijo de Zera, de Bosra.°

45

 Muerto  Jobab,  reinó  en  su  lugar  Hu-

sam, de la tierra de los temanitas.°

46

 Muerto Husam, reinó en su lugar Ha-

dad, hijo de Bedad, el que derrotó° a Ma-

dián en el campo de Moab; y el nombre de 

su ciudad fue Avit.

47

 Muerto  Hadad,  reinó  en  su  lugar 

Samla, de Masreca.

48

 Muerto Samla, reinó en su lugar Saúl, 

de Rehobot, que está junto al Éufrates.

49

 Muerto  Saúl,  reinó  en  su  lugar  Baal-

hanán, hijo de Acbor.

50

 Muerto Baal-hanán, reinó en su lugar 

Hadad, el nombre de cuya ciudad fue Pai. 

El  nombre  de  su  mujer,  Mehetabel,  hija 

de Matred, hija de Mezaab.

51

 Muerto  Hadad,  sucedieron  en  Edom 

los jeques Timna, Alva, Jetet,

52

 Aholibama, Ela, Pinón,

53

 Cenaz, Temán, Mibzar,

54

 Magdiel e Iram. Tales fueron los jeques 

de Edom.

Descendientes de Israel

2

Éstos  son  los  hijos  de  Israel:  Rubén, 

Simeón, Leví, Judá, Isacar, Zabulón,

2

 Dan, José, Benjamín, Neftalí, Gad y Aser.

3

 Hijos  de  Judá:  Er,  Onán  y  Sela.  Estos 

tres le nacieron de la hija de Súa, cana-

nea.  Pero  Er,  primogénito  de  Judá,  fue 

malvado ante los ojos de YHVH, quien lo 

hizo morir.

4

 Y Tamar° su nuera dio a luz a Fares y a 

Zera. Todos los hijos de Judá fueron cinco.

5

 Hijos de Fares:° Hezrón y Hamul.

6

 E  hijos  de  Zera:  Zimri,  Etán,  Hemán, 

Calcol y Dara: cinco por todos.

7

 Hijo  de  Carmi  fue  Acán,  perturbador 

de Israel, porque transgredió respecto al 

anatema.

8

 Hijo de Etán: Azarías.

9

 Los hijos que le nacieron a Hezrón: Je-

rameel, Ram y Quelubai.

10

 Ram engendró a Aminadab, y Amina-

dab  engendró  a  Naasón,  príncipe  de  los 

hijos de Judá.

11

 Naasón engendró a Salmón, y Salmón 

engendró a Booz.

12

 Booz engendró a Obed, y Obed engen-

dró a Isaí,

13

 e Isaí engendró a Eliab su primogénito, 

el segundo Abinadab, el tercero Simea,

14

 el cuarto Natanael, el quinto Radai,

15

 el sexto Ozem, el séptimo David,

16

 de  los  cuales  Sarvia  y  Abigail  fueron 

hermanas.  Los  hijos  de  Sarvia  fueron 

tres: Abisai, Joab y Asael.

17

 Abigail dio a luz a Amasa, cuyo padre 

fue Jeter ismaelita,

18

 Caleb ben Hezrón engendró a Jeriot de 

su mujer Azuba. Y los hijos de ella fueron 

Jeser, Sobab y Ardón.

19

 Muerta Azuba, Caleb tomó por mujer a 

Efrata, la cual dio a luz a Hur.

20

 Hur engendró a Uri, y Uri engendró a 

Bezaleel.

21

 Después Hezrón se llegó a la hija de Ma-

quir, padre de Galaad, a la cual tomó siendo 

él de sesenta años, y ella dio a luz a Segub.

22

 Segub  engendró  a  Jair,  quien  poseyó 

veintitrés ciudades en la tierra de Galaad.

23

 Pero  Gesur  y  Aram  tomaron  Havot-

jair,° con Kenat y sus aldeas: sesenta lu-

gares. Todas éstas las tomaron los hijos de 

Maquir, padre de Galaad.

24

 Después que murió Hezrón en Caleb-

efrata, Abías mujer de Hezrón dio a luz a 

Asur, padre de Tecoa.

25

 Los hijos de Jerameel, primogénito de 

Hezrón,  fueron:  Ram,  su  primogénito, 

Buna, Orén, Ozem y Ahías.

26

 Y  Jerameel  tuvo  otra  mujer  llamada 

Atara, que fue madre de Onam.

27

 Hijos de Ram, primogénito de Jerame-

el: Maaz, Jamín y Equer.

28

 Hijos de Onam: Samai y Jada. Hijos de 

Samai: Nadab y Abisur.

29

 Y  el  nombre  de  la  mujer  de  Abisur 

fue Abihail, la cual dio a luz a Ahbán y 

a Molid.

1.43 

→Gn.36.31-43.  1.44 →Is.34.6.  1.45 →Job 2.11.  1.46 Lit. hirió.  2.4 →Gn.38.13-30.  2.5 →Rt.4.18-22.  2.23 Ntoma-

ron las aldeas de Jair


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1 Crónicas 3:19

417

30

 Hijos de Nadab: Seled y Apaim. Y Seled 

murió sin hijos.

31

 Isi fue hijo de Apaim, y Sesán hijo de 

Isi, e hijo de Sesán, Ahlai.

32

 Hijos de Jada, hermano de Samai: Je-

ter y Jonatán. Y murió Jeter sin hijos.

33

 Hijos  de  Jonatán:  Pelet  y  Zaza.  Tales 

fueron los descendientes de Jerameel.

34

 Sesán  no  tuvo  hijos,  sino  hijas;  pero 

Sesán  tenía  un  siervo  egipcio  llamado 

Jarha.

35

 A éste, Sesán dio su hija por mujer, y 

ella dio a luz a Atai.

36

 Atai engendró a Natán, y Natán engen-

dró a Zabad;

37

 Zabad engendró a Eflal, Eflal engendró 

a Obed;

38

 Obed engendró a Jehú, Jehú engendró 

a Azarías;

39

 Azarías  engendró  a  Heles,  Heles  en-

gendró a Elasa;

40

 Elasa  engendró  a  Sismai,  Sismai  en-

gendró a Salum;

41

 Salum  engendró  a  Jecamías,  y  Jeca-

mías engendró a Elisama.

42

 Hijos  de  Caleb,  hermano  de  Jerameel: 

Mesa su primogénito, que fue el padre de 

Zif;  y  los  hijos  de  Maresa,  padre  de  He-

brón.

43

 Hijos de Hebrón: Coré, Tapúa, Requem 

y Sema.

44

 Sema  engendró  a  Raham,  padre  de 

Jorcoam, y Requem engendró a Samai.

45

 Maón fue hijo de Samai, y Maón padre 

de Bet-sur.

46

 Y Efa, concubina de Caleb, dio a luz a 

Harán, a Mosa y a Gazez. Y Harán engen-

dró a Gazez.

47

 Hijos de Jahdai: Regem, Jotam, Gesam, 

Pelet, Efa y Saaf.

48

 Maaca, concubina de Caleb, dio a luz a 

Seber y a Tirhana.

49

 También  dio  a  luz  a  Saaf,  padre  de 

Madmana, y a Seva, padre de Macbena, y 

padre de Gibea; y Acsa fue hija de Caleb.

50

 Éstos fueron los hijos de Caleb: hijos 

de Hur, primogénito de Efrata: Sobal, pa-

dre de Quiriat-jearim,

51

 Salma,  padre  de  Bet-léhem,  y  Haref, 

padre de Bet-gader.

52

 Hijos  de  Sobal,  padre  de  Quiriat-jea-

rim: Haroe, la mitad de los manahetitas.

53

 Familias  de  Quiriat-jearim:  los  itritas, 

los futitas, los sumatitas y los misraítas, de 

los cuales salieron los zoratitas y los estao-

litas.

54

 Hijos  de  Salma:  Bet-léhem,  y  los  ne-

tofatitas, Atrot-beth-joab, y Hazi-hamma-

nahti, zoraíta.

55

 Y las familias de los escribas que habita-

ban en Jabes: los tirateos, los simeateos y los 

sucateos, los cuales son los ceneos, que pro-

ceden de Hamat, padre de la casa de Recab.

Descendientes de David

3

Éstos son los hijos de David que le na-

cieron en Hebrón: Amnón, el primo-

génito, de Ahinoam jezreelita; el segundo, 

Daniel, de Abigail la de Carmel;

2

 el tercero, Absalón, hijo de Maaca, hija 

de Talmai, rey de Gesur; el cuarto, Ado-

nías, hijo de Haguit;

3

 el  quinto,  Sefatías,  de  Abital;  el  sexto, 

Itream, de su mujer Egla.

4

 Estos seis le nacieron en Hebrón, donde 

reinó siete años y seis meses. Luego reinó 

en Jerusalem treinta y tres años.

5

 Estos cuatro le nacieron en Jerusalem, 

de Betsabé, hija de Amiel: Simea, Sobab, 

Natán y Salomón.

6

 Y otros nueve: Ibhar, Elisama, Elifelet,

7

 Noga, Nefeg, Jafía,

8

 Elisama, Eliada y Elifelet.

9

 Todos  éstos  fueron  los  hijos  de  David, 

sin contar los hijos de las concubinas; y 

Tamar fue hermana de ellos.

10

 Hijo  de  Salomón  fue  Roboam,  cuyo 

hijo fue Abías, del cual fue hijo Asa, cuyo 

hijo fue Josafat,

11

 de quien fue hijo Joram, cuyo hijo fue 

Ocozías, hijo del cual fue Joás,

12

 del cual fue hijo Amasías, cuyo hijo fue 

Azarías, e hijo de éste, Jotam.

13

 Hijo de éste fue Acaz, del que fue hijo 

Ezequías, cuyo hijo fue Manasés,

14

 del cual fue hijo Amón, cuyo hijo fue 

Josías.

15

 Hijos de Josías: Johanán, su primogé-

nito, el segundo Joacim, el tercero Sede-

quías, el cuarto Salum.

16

 Hijos de Joacim: Jeconías su hijo, hijo 

del cual fue Sedequías.

17

 Hijos de Jeconías el cautivo: Salatiel,

18

 Malquiram,  Pedaías,  Senazar,  Jeca-

mías, Hosama y Nedabías.

19

 Hijos de Pedaías: Zorobabel y Simei. E 

hijos de Zorobabel: Mesulam, Hananías, y 

Selomit, su hermana.


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1 Crónicas 3:20

418

20

 También  estos  cinco:  Hasuba,  Ohel, 

Berequías, Hasadías y Jusab-hesed.

21

 E hijos de Hananías: Pelatías y Jesaías; 

su  hijo,  Refaías;  su  hijo,  Arnán;  su  hijo, 

Abdías; su hijo, Secanías.

22

 Hijo de Secanías fue Semaías; e hijos 

de  Semaías:  Hatús,  Igal,  Barías,  Nearías 

y Safat: seis.

23

 Hijos  de  Nearías  fueron  estos  tres: 

Elioenai, Ezequías y Azricam.

24

 Hijos  de  Elioenai  fueron  estos  siete: 

Hodavías, Eliasib, Pelaías, Acub, Johanán, 

Dalaías y Anani.

Descendientes de Judá y Simeón

4

Hijos de Judá: Fares, Hezrón, Carmi, 

Hur y Sobal.

2

 Reaía hijo de Sobal engendró a Jahat, y 

Jahat engendró a Ahumai y a Lahad. És-

tas son las familias de los zoratitas.

3

 Esta es la estirpe de Etam: Jezreel, Isma 

e Ibdas; y el nombre de su hermana: Ha-

ze-lelponi.

4

 Penuel fue padre de Gedor, y Ezer padre 

de Husa. Tales fueron los hijos de Hur pri-

mogénito de Efrata, padre de Bet-léhem.

5

 Asur, padre de Tecoa, tuvo dos mujeres: 

Hela y Naara.

6

 Y Naara dio a luz a Ahuzam, Hefer, Te-

meni y Ahastari. Tales fueron los hijos de 

Naara.

7

 Los hijos de Hela: Zeret, Jezoar, Etnán 

y Cos,

8

 el cual engendró a Anub, a Zobeba, y la 

familia de Aharhel hijo de Harum.

9

 Pero Jabes fue más ilustre que sus herma-

nos, al cual su madre llamó Jabes,° dicien-

do: ¡Ciertamente lo he parido con dolor!

10

 E  invocó  Jabes  al  Dios  de  Israel  di-

ciendo:  ¡Oh,  si  me  dieras  bendición,  y 

ensancharas  mi  territorio,  y  si  tu  mano 

estuviera conmigo, y me libraras del mal, 

para que no me dañe! Y ’Elohim le conce-

dió lo que había pedido.

11

 Quelub  hermano  de  Súa  engendró  a 

Mehir, el cual fue padre de Estón.

12

 Y Estón engendró a Bet-rafa, a Paseah, 

y a Tehina padre de Ir-nahas.° Estos son 

los varones de Reca.

13

 Hijos de Cenaz: Otoniel y Seraías. Hi-

jos de Otoniel: Hatat y Meonotai,

14

 el  cual  engendró  a  Ofra;  y  Seraías 

engendró  a  Joab,  padre  de  los  habitan-

tes  del  valle  de  Carisim,  porque  fueron 

artesanos.

15

 Hijos  de  Caleb  ben  Jefone:  Iru,  Ela  y 

Naam; e hijo de Ela fue Cenaz.

16

 Hijos  de  Jehalelel:  Zif,  Zifa,  Tirías  y 

Asareel.

17

 Hijos  de  Esdras:  Jeter,  Mered,  Efer  y 

Jalón. Y ella concibió a Miriam, a Samai y 

a Isba, padre de Estemoa.

18

 Y su mujer Jehudaía dio a luz a Jered 

padre de Gedor, a Heber padre de Soco y a 

Jecutiel padre de Zanoa. Tales fueron los 

hijos de Bitia, hija de Faraón, que Mered 

tomó por mujer.

19

 Hijos de la mujer de Hodías, hermana 

de Naham, fueron el padre de Keila gar-

mita, y Estemoa maacateo.

20

 Hijos  de  Simón:  Amnón,  Rina,  Ben-

hanán y Tilón. Hijos de Isi: Zohet y Ben-

zohet.

21

 Hijos  de  Sela  ben  Judá:  Er,  padre  de 

Leca, y Laada, padre de Maresa, y las fami-

lias de los que trabajan lino en Bet-asbea;

22

 y  Joacim,  y  los  varones  de  Cozeba,  y 

Joás,  y  Saraf,  los  cuales  dominaron  en 

Moab y volvieron a Léhem, según regis-

tros° antiguos.

23

 Éstos  eran  alfareros,  y  habitaban  en 

medio  de  plantíos  y  cercados,  cerca  del 

rey, ocupados en su servicio.

24

 Hijos de Simeón: Nemuel, Jamín, Ja-

rib, Zera, Saúl,

25

 y Salum su hijo, Mibsam su hijo y Mis-

ma su hijo.

26

 Hijos de Misma: Hamuel su hijo, Zacur 

su hijo, y Simei su hijo.

27

 Simei tuvo dieciséis hijos y seis hijas, 

pero sus hermanos no tuvieron muchos 

hijos, ni se multiplicaron en su clan como 

los hijos de Judá.

28

 Y habitaron en Beerseba, Molada, Ha-

zar-sual,

29

 Bilha, Ezem, Tolad,

30

 Betuel, Horma, Siclag,

31

 Bet-marcabot,  Hazar-susim,  Bet-birai 

y Saaraim. Éstas fueron sus ciudades has-

ta el reinado de David.

32

 Y  sus  aldeas:  Etam,  Aín,  Rimón,  To-

quén y Asán: cinco pueblos.

4.9 Esto es, dolor.  4.12 Nciudad de Nahas.  4.22 Lit. palabras.


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1 Crónicas 5:20

419

33

 Y todas sus aldeas estaban situadas en 

torno  a  estas  ciudades  hasta  Baal.  Éstas 

son las moradas de ellos y su genealogía.

34

 Asimismo°  Mesobab,  Jamlec,  Josías 

ben Amasías,

35

 Joel, Jehú ben Josibías, hijo de Seraías, 

hijo de Asiel,

36

 Elioenai,  Jaacoba,  Jesohaía,  Asaías, 

Adiel, Jesimiel, Benaía,

37

 y  Ziza  ben  Sifi,  hijo  de  Alón,  hijo  de 

Jedaías, hijo de Simri, hijo de Semaías.

38

 Éstos, por sus nombres, son los prín-

cipes entre sus familias, y las casas de sus 

padres fueron multiplicadas en gran ma-

nera.

39

 Y  llegaron  hasta  la  entrada  de  Gedor 

hasta el oriente del valle, en busca de pas-

tos para sus ganados.

40

 Y  hallaron  pastos  buenos  y  abundan-

tes, y la tierra era muy espaciosa, tranqui-

la y apacible, porque los de Cam la habían 

habitado anteriormente.

41

 Y éstos que han sido escritos por sus 

nombres,  vinieron  en  días  de  Ezequías 

rey  de  Judá,  y  destruyeron  las  tiendas  y 

cabañas que hallaron allí, y los dedicaron 

al exterminio hasta hoy, y habitaron allí 

en  lugar  de  ellos,  por  cuanto  allí  había 

pastos para sus ganados.

42

 Asimismo  quinientos  hombres  de 

ellos,  de  los  hijos  de  Simeón,  fueron  al 

monte  de  Seir,  llevando  por  capitanes  a 

Pelatías, Nearías, Refaías y Uziel, hijos de 

Isi,

43

 y destruyeron a los que habían queda-

do de Amalec, y habitaron allí hasta hoy.

Descendientes de Rubén, Gad y Manasés

5

Hijos de Rubén, primogénito de Israel 

(porque  él  era  el  primogénito,  pero 

habiendo profanado el lecho de su padre,° 

su primogenitura fue dada a los hijos de 

José° ben Israel, pues no era posible re-

gistrarlo como primogénito;

2

 y aunque la primogenitura correspondía 

a José, Judá fue superior entre sus herma-

nos, y de él proviene° un príncipe).°

3

 Fueron pues los hijos de Rubén, primo-

génito  de  Israel:  Hanoc,  Falú,  Hezrón  y 

Carmi.

4

 Hijos de Joel: Semaías su hijo, Gog su 

hijo, Simei su hijo,

5

 Micaía  su  hijo,  Reaía  su  hijo,  Baal  su 

hijo,

6

 Beera su hijo, el cual fue transportado 

por Tiglat-pileser rey de los asirios. Éste 

fue príncipe de los rubenitas.

7

 Y sus hermanos por sus familias, cuan-

do fueron contados en sus descendencias, 

tenían por príncipes a Jeiel y a Zacarías.

8

 Y Bela ben Azaz, hijo de Sema, hijo de 

Joel, habitó en Aroer hasta Nebo y Baal-

meón.

9

 Habitó también desde el oriente hasta la 

entrada del desierto, desde el río Éufrates, 

porque tenía mucho ganado en la tierra 

de Galaad.

10

 Pero en tiempo de Saúl hicieron guerra 

contra los agarenos, los cuales cayeron en 

su mano, y ellos habitaron en sus tiendas 

en toda la región oriental de Galaad.

11

 Los hijos de Gad habitaron enfrente de 

ellos en la tierra de Basán hasta Salca.

12

 Joel fue el principal en Basán; el segun-

do Safán, luego Jaanai, después Safat.

13

 Y  sus  hermanos,  según  las  familias 

de  sus  padres,  fueron  Micael,  Mesulam, 

Seba, Jorai, Jacán, Zía y Heber: siete.

14

 Éstos  fueron  los  hijos  de  Abihail  ben 

Huri, hijo de Jaroa, hijo de Galaad, hijo 

de Micael, hijo de Jesisai, hijo de Jahdo, 

hijo de Buz.

15

 También Ahí ben Abdiel, hijo de Guni, 

fue principal en la casa de sus padres.

16

 Y habitaron en Galaad, en Basán y en 

sus aldeas, y en todos los ejidos de Sarón° 

hasta sus confines.

17

 Todos éstos fueron contados por sus ge-

neraciones en los días de Jotam rey de Judá 

y en tiempo de Jeroboam rey de Israel.

18

 Los hijos de Rubén y de Gad, y la me-

dia tribu de Manasés, hombres valientes, 

hombres  que  portaban  escudo  y  espada, 

expertos en el manejo del arco y diestros 

en la guerra: cuarenta y cuatro mil sete-

cientos sesenta que salían a batalla.

19

 Éstos tuvieron guerra contra los aga-

renos, y Jetur, Nafis y Nodab.

20

 En  medio  del  combate  clamaron  a 

su  Dios,  y  les  fue  favorable  por  haber 

4.34 .Asimismo.  5.1 

→Gn.35.22; 49.4.  5.1 →Gn.48.15-22.  5.2 .proviene.  5.2 →Gn.49.8-10; Sal.60.7; 108.8; Miq.5.2; 

Mt.2.6. 

5.16 

→Cnt.2.1. 


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1 Crónicas 5:21

420

confiado en Él, y los agarenos y todos sus 

aliados fueron entregados en sus manos.

21

 Y tomaron sus ganados: cincuenta mil 

camellos, doscientas cincuenta mil ove-

jas y dos mil asnos, además de cien mil 

personas.

22

 Muchos,  pues,  cayeron  muertos,  por-

que la batalla era de Ha-’Elohim. Y habi-

taron en sus lugares hasta el cautiverio.°

23

 Los hijos de la media tribu de Manasés 

habitaron en la tierra desde Basán hasta 

Baal-hermón,  Senir  y  el  monte  de  Her-

món, y se multiplicaron en gran manera.

24

 Estos son los jefes de las casas de sus 

padres:  Efer,  Isi,  Eliel,  Azriel,  Jeremías, 

Hodavías  y  Jahdiel,  hombres  valientes  y 

esforzados,  varones  de  renombre  y  jefes 

de las casas de sus padres.

25

 Pero  se  rebelaron  contra  el  Dios  de 

sus padres, y se prostituyeron siguiendo 

a los dioses de los pueblos de la tierra, a 

los cuales YHVH había quitado de delante 

de ellos.

26

 Por lo cual el Dios de Israel excitó el 

espíritu  de  Pul,  rey  de  los  asirios,  y  el 

espíritu  de  Tiglat-pileser,  rey  de  los  asi-

rios, el cual transportó a los rubenitas y 

gaditas y a la media tribu de Manasés, y 

los llevó a Halah, a Habor, a Hara y al río 

Gozán, hasta hoy.

Descendientes de Leví

6

°Hijos de Leví: Gersón, Coat y Merari.

2

 Hijos  de  Coat:  Amram,  Izhar,  He-

brón y Uziel.

3

 Hijos  de  Amram:  Aarón,  Moisés  y  Mi-

riam. Hijos de Aarón: Nadab, Abiú, Elea-

zar e Itamar.

4

 Eleazar  engendró  a  Finees,  Finees  en-

gendró a Abisúa,

5

 Abisúa engendró a Buqui, Buqui engen-

dró a Uzi,

6

 Uzi engendró a Zeraías, Zeraías engen-

dró a Meraiot,

7

 Meraiot  engendró  a  Amarías,  Amarías 

engendró a Ahitob,

8

 Ahitob engendró a Sadoc, Sadoc engen-

dró a Ahimaas,

9

 Ahimaas  engendró  a  Azarías,  Azarías 

engendró a Johanán,

10

 y  Johanán  engendró  a  Azarías,  quien 

tuvo  el  sacerdocio  en  la  Casa  que  Salo-

món edificó en Jerusalem.

11

 Azarías  engendró  a  Amarías,  Amarías 

engendró a Ahitob,

12

 Ahitob  engendró  a  Sadoc,  Sadoc  en-

gendró a Salum,

13

 Salum engendró a Hilcías, Hilcías en-

gendró a Azarías,

14

 Azarías  engendró  a  Seraías,  y  Seraías 

engendró a Josadac.

15

 Y Josadac fue llevado cautivo, cuando 

YHVH hizo deportar a Judá y a Jerusalem 

por mano de Nabucodonosor.

16

 Hijos de Leví: Gersón, Coat y Merari.

17

 Y éstos son los nombres de los hijos de 

Gersón: Libni y Simei.

18

 Hijos de Coat: Amram, Izhar, Hebrón 

y Uziel.

19

 Hijos  de  Merari:  Mahli  y  Musi.  Éstas 

son las familias de Leví según sus descen-

dencias:

20

 Gersón:  Libni  su  hijo,  Jahat  su  hijo, 

Zima su hijo,

21

 Joa su hijo, Iddo su hijo, Zera su hijo, 

Jeatrai su hijo.

22

 Hijos de Coat: Aminadab su hijo, Coré 

su hijo, Asir su hijo,

23

 Elcana su hijo, Ebiasaf su hijo, Asir su 

hijo,

24

 Tahat  su  hijo,  Uriel  su  hijo,  Uzías  su 

hijo, y Saúl su hijo.

25

 Hijos de Elcana: Amasai y Ahimot,

26

 padre° de Elcana, padre de Zofai, padre 

de Nahat,

27

 padre de Eliab, padre de Jeroham, pa-

dre de Elcana.°

28

 Hijos de Samuel: Joel° el primogénito, 

y Abías el segundo.

29

 Hijos de Merari: Mahli, Libni su hijo, 

Simei su hijo, Uza su hijo,

30

 Simea su hijo, Haguía su hijo, Asaías 

su hijo.

31

 Éstos  son  los  que  David  puso  sobre 

las manos° del canto en la Casa de YHVH 

desde que el Arca había descansado allí,

5.22 

→2 R.15.29; 17.6.  6.26 Se cambia hijo por padre hasta el v. 27.  6.1 El TM continúa como c.5.27 hasta el 6.16 de nuestra 

numeración donde empieza el 6.1 de la numeración hebrea. 

6.27 Padre de Samuel. 

→1 S.1.1.  6.28 .Joel. La traducción el 

primogénito Vasni es incorrecta, ya que aquí hay una elipsis del nombre Joel, primogénito de Samuel 

→v.33; 1 S.8.2, mientras 

que vashní significa y el segundo, por lo que ha de suplirse la elipsis del nombre. 

6.31 Es decir, sobre los instrumentos con que 

se había de acompañar el canto


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1 Crónicas 6:70

421

32

 los cuales servían delante de la Tienda 

del  Tabernáculo  de  Reunión  en  el  can-

to, hasta que Salomón edificó la Casa de 

YHVH en Jerusalem; después estuvieron 

en su ministerio según su costumbre.

33

 Éstos  pues,  con  sus  hijos,  ayudaban: 

de los hijos de Coat, el cantor Hemán ben 

Joel, hijo de Samuel,

34

 hijo de Elcana, hijo de Jeroham, hijo 

de Eliel, hijo de Toa,

35

 hijo de Zuf, hijo de Elcana, hijo de Ma-

hat, hijo de Amasai,

36

 hijo  de  Elcana,  hijo  de  Joel,  hijo  de 

Azarías, hijo de Sofonías,

37

 hijo de Tahat, hijo de Asir, hijo de Ebia-

saf, hijo de Coré,

38

 hijo de Izhar, hijo de Coat, hijo de Leví, 

hijo de Israel;

39

 y su pariente Asaf, el cual estaba a su 

mano  derecha;  Asaf  ben  Berequías,  hijo 

de Simea,

40

 hijo de Micael, hijo de Baasías, hijo de 

Malquías,

41

 hijo de Etni, hijo de Zera, hijo de Adaía,

42

 hijo de Etán, hijo de Zima, hijo de Si-

mei,

43

 hijo de Jahat, hijo de Gersón, hijo de 

Leví.

44

 Y  los  hijos  de  Merari,  sus  hermanos, 

estaban a la izquierda, esto es: Etán ben 

Quisi, hijo de Abdi, hijo de Maluc,

45

 hijo de Hasabías, hijo de Amasías, hijo 

de Hilcías,

46

 hijo  de  Amsi,  hijo  de  Bani,  hijo  de 

Semer,

47

 hijo de Mahli, hijo de Musi, hijo de Me-

rari, hijo de Leví.

48

 Y  sus  hermanos  los  levitas  fueron 

puestos  sobre  todo  el  ministerio  del  Ta-

bernáculo de la Casa de Dios.

49

 Pero Aarón y sus hijos ofrecían sacri-

ficios sobre el altar del holocausto, y so-

bre el altar del incienso, y ministraban en 

toda la obra del lugar santísimo, y hacían 

las expiaciones por Israel conforme a todo 

lo que Moisés siervo de Dios había man-

dado.

50

 Los hijos de Aarón son estos: Eleazar 

su hijo, Finees su hijo, Abisúa su hijo,

51

 Buqui su hijo, Uzi su hijo, Zeraías su 

hijo,

52

 Meraiot su hijo, Amarías su hijo, Ahi-

tob su hijo,

53

 Sadoc su hijo, Ahimaas su hijo.

Ciudades de los levitas

54

 Éstas son sus habitaciones, conforme 

a sus domicilios y sus términos: las de los 

hijos de Aarón por las familias de los coa-

titas, porque a ellos les tocó en suerte.

55

 Les dieron pues Hebrón, en tierra de 

Judá, y sus ejidos alrededor de ella.

56

 Pero el territorio de la ciudad y sus al-

deas se dieron a Caleb ben Jefone.

57

 De Judá dieron a los hijos de Aarón la 

ciudad  de  refugio,  esto  es,  Hebrón;  ade-

más, Libna con sus ejidos, Jatir, Estemoa 

con sus ejidos,

58

 Hilén  con  sus  ejidos,  Debir  con  sus 

ejidos,

59

 Asán  con  sus  ejidos  y  Bet-semes  con 

sus ejidos.

60

 Y de la tribu de Benjamín: Geba con 

sus ejidos, Alemet con sus ejidos y Ana-

tot  con  sus  ejidos.  Todas  sus  ciudades 

fueron trece ciudades, repartidas por sus 

linajes.

61

 Y los demás hijos de Coat que queda-

ron  de  su  parentela,  dieron  por  suerte 

diez  ciudades  de  la  media  tribu  de  Ma-

nasés.

62

 A los hijos de Gersón, por sus linajes, 

fueron dadas de la tribu de Isacar, de la 

tribu de Aser, de la tribu de Neftalí y de 

la tribu de Manasés en Basán, trece ciu-

dades.

63

 Y a los hijos de Merari, por sus linajes, 

de la tribu de Rubén, de la tribu de Gad y 

de la tribu de Zabulón, dieron por suerte 

doce ciudades.

64

 Y los hijos de Israel dieron a los levitas 

ciudades con sus ejidos.

65

 De la tribu de los hijos de Judá, de la 

tribu de los hijos de Simeón y de la tri-

bu de los hijos de Benjamín, dieron por 

suerte  las  ciudades  que  nombraron  por 

sus nombres.

66

 A las familias de los hijos de Coat die-

ron ciudades con sus ejidos de la tribu de 

Efraín,

67

 y  las  siguientes  ciudades  de  refugio: 

Siquem con sus ejidos en la serranía de 

Efraín, Gezer con sus ejidos,

68

 Jocmeam  con  sus  ejidos,  Bet-horón 

con sus ejidos,

69

 Ajalón con sus ejidos y Gat-rimón con 

sus ejidos.

70

 De  la  media  tribu  de  Manasés:  Aner 

con  sus  ejidos  y  Bileam  con  sus  ejidos, 


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1 Crónicas 6:71

422

para los que habían quedado de las fami-

lias de los hijos de Coat.

71

 A los hijos de Gersón dieron, de la me-

dia tribu de Manasés, Golán en Basán con 

sus ejidos y Astarot con sus ejidos.

72

 De la tribu de Isacar: Cedes con sus eji-

dos, Daberat con sus ejidos,

73

 Ramot con sus ejidos y Anem con sus 

ejidos.

74

 De la tribu de Aser: Masal con sus eji-

dos, Abdón con sus ejidos,

75

 Hucoc con sus ejidos y Rehob con sus 

ejidos.

76

 De la tribu de Neftalí: Cedes, en Gali-

lea, con sus ejidos, Hamón con sus ejidos 

y Quiriataim con sus ejidos.

77

 A los hijos de Merari que habían que-

dado,  dieron  de  la  tribu  de  Zabulón, 

Rimón  con  sus  ejidos  y  Tabor  con  sus 

ejidos.

78

 Allende  el  Jordán,  frente  a  Jericó,  al 

oriente del Jordán, de la tribu de Rubén, 

dieron Beser, en el desierto, con sus eji-

dos, Jaza con sus ejidos,

79

 Cademot con sus ejidos y Mefaat con 

sus ejidos.

80

 Y  de  la  tribu  de  Gad:  Ramot  de  Ga-

laad  con  sus  ejidos,  Mahanaim  con  sus 

ejidos,

81

 Hesbón con sus ejidos y Jazer con sus 

ejidos.

Isacar, Benjamín, Neftalí, Efraín y Aser

7

Hijos  de  Isacar:  Tola,  Fúa,  Jasub  y 

Sim rón: cuatro.

2

 Hijos  de  Tola:  Uzi,  Refaías,  Jeriel, 

Jahmai,  Jibsam  y  Semuel,  jefes  de  las 

familias  de  sus  padres.  De  Tola  fueron 

contados por sus linajes en el tiempo de 

David veintidós mil seiscientos hombres 

de valor.

3

 Hijo de Uzi fue Israhías; y los hijos de 

Israhías: Micael, Obadías, Joel e Isías; por 

todos, cinco príncipes.

4

 Y había con ellos en sus linajes, por las 

familias de sus padres, treinta y seis mil 

hombres de guerra, porque tuvieron mu-

chas mujeres e hijos.

5

 Y  sus  hermanos  por  todas  las  familias 

de Isacar, contados todos por sus genea-

logías, eran ochenta y siete mil hombres 

valientes en extremo.

6

 Hijos  de  Benjamín:  Bela,  Bequer  y  Je-

diael: tres.

7

 Hijos  de  Bela:  Ezbón,  Uzi,  Uziel,  Jeri-

mot  e  Iri:  cinco  jefes  de  casas  paternas, 

hombres de valor, y de cuya descendencia 

fueron  contados  veintidós  mil  treinta  y 

cuatro.

8

 Hijos  de  Bequer:  Zemira,  Joás,  Eliezer, 

Elioenai,  Omri,  Jerimot,  Abías,  Anatot  y 

Alamet;  todos  éstos  fueron  hijos  de  Be-

quer.

9

 Y contados por sus descendencias, por 

sus linajes, los que eran jefes de familias 

resultaron veinte mil doscientos hombres 

esforzados.

10

 Hijo de Jediael fue Bilhán; y los hijos 

de Bilhán: Jeús, Benjamín, Aod, Quenaa-

na, Zetán, Tarsis y Ahisahar.

11

 Todos éstos fueron hijos de Jediael, je-

fes de familias, hombres valerosos, dieci-

siete mil doscientos que salían a combatir 

en la guerra.

12

 Supim y Hupim fueron hijos de Hir; y 

Husim, hijo de Aher.

13

 Hijos de Neftalí: Jahzeel, Guni, Jezer y 

Salum, hijos de Bilha.

14

 Hijos de Manasés: Asriel, al cual dio a 

luz su concubina la siria, la cual también 

dio a luz a Maquir, padre de Galaad.

15

 Y  Maquir  tomó  mujer  de  Hupim  y 

Supim,  cuya  hermana  tuvo  por  nombre 

Maaca; y el nombre del segundo fue Zelo-

fehad. Y Zelofehad tuvo hijas.

16

 Y Maaca mujer de Maquir dio a luz un 

hijo, y lo llamó Peres; y el nombre de su 

hermano  fue  Seres,  cuyos  hijos  fueron 

Ulam y Requem.

17

 Hijo de Ulam fue Bedán. Éstos fueron 

los  hijos  de  Galaad  ben  Maquir,  hijo  de 

Manasés.

18

 Y su hermana Hamolequet dio a luz a 

Isod, Abiezer, Mahala y Semida,

19

 hijos  del  cual  fueron  Ahián,  Siquem, 

Likhi y Aniam.

20

 Los  hijos  de  Efraín:  Sutela,  Bered  su 

hijo,  Tahat  su  hijo,  Elada  su  hijo,  Tahat 

su hijo,

21

 Zabad  su  hijo,  Sutela  su  hijo,  Ezer  y 

Elad. Pero los de Gat, naturales de aquella 

tierra, los mataron porque habían bajado 

a tomar sus ganados.

22

 Y  Efraín  su  padre  les  hizo  duelo  por 

muchos días, y sus hermanos vinieron a 

consolarlo.

23

 Luego se llegó a su mujer, la cual con-

cibió y dio a luz un hijo, al cual puso por 


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1 Crónicas 8:33

423

nombre Bería,° pues había nacido mien-

tras la desgracia reinaba en su casa.

24

 Hija suya fue Seera, la cual edificó a Bet-

horón, la baja y la alta, y a Uzen-seera.

25

 Hijo de éste Bería, fue Refa, y Resef, y 

Telah su hijo, y Tahán su hijo,

26

 Laadán su hijo, Amiud su hijo, Elisa-

ma su hijo,

27

 Non° su hijo, Josué su hijo.

28

 Y la heredad y habitación de ellos fue 

Bet-’El con sus aldeas; y hacia el oriente 

Naarán, y a la parte del occidente Gezer y 

sus aldeas; asimismo Siquem con sus al-

deas, hasta Gaza y sus aldeas;

29

 y junto al territorio de los hijos de Ma-

nasés,  Bet-seán  con  sus  aldeas,  Taanac 

con sus aldeas, Meguido con sus aldeas, y 

Dor con sus aldeas. En estos lugares habi-

taron los hijos de José ben Israel.

30

 Hijos de Aser: Imna, Isúa, Isúi, Bería, y 

su hermana Sera.

31

 Hijos  de  Bería:  Heber,  y  Malquiel,  el 

cual fue padre de Birzavit.

32

 Y Heber engendró a Jaflet, Semer, Ho-

tam, y Súa, hermana de ellos.

33

 Hijos de Jaflet: Pasac, Bimhal y Asvat. 

Éstos fueron los hijos de Jaflet.

34

 Hijos de Semer: Ahí, Rohga, Jehúba y 

Aram.

35

 Hijos  de  Helem  su  hermano:  Zofa, 

Imna, Seles y Amal.

36

 Hijos  de  Zofa:  Súa,  Harnefer,  Súal, 

Beri, Imra,

37

 Beser, Hod, Sama, Silsa, Itrán y Beera.

38

 Hijos de Jeter: Jefone, Pispa y Ara.

39

 Hijos de Ula: Ara, Haniel y Rezia.

40

 Todos éstos fueron hijos de Aser, cabe-

zas de familias paternas, escogidos, esfor-

zados, jefes de príncipes; y contados que 

fueron  por  sus  linajes  entre  los  que  po-

dían tomar las armas, el número de ellos 

fue veintiséis mil hombres.

Otros descendientes de Benjamín, 

hasta Saúl y su prole

8

Benjamín engendró a Bela su primo-

génito, Asbel el segundo, Ahara el ter-

cero,

2

 Noha el cuarto, y Rafa el quinto.

3

 Y  los  hijos  de  Bela  fueron  Adar,  Gera, 

Abiud,

4

 Abisúa, Naamán, Ahoa,

5

 Gera, Sefufán e Hiram.

6

 Estos son los hijos de Aod, estos los jefes 

de casas paternas que habitaron en Geba 

y a quienes deportaron a Manahat:

7

 Naamán, Ahías y Gera; éste los transpor-

tó, y engendró a Uza, a Ahiud y a Saraim,

8

 el  cual  engendró  hijos  en  la  provincia 

de Moab, después que dejó a Husim y a 

Baara que eran sus mujeres.

9

 Engendró,  pues,  de  Hodes  su  mujer  a 

Jobab, Sibia, Mesa, Malcam,

10

 Jeúz, Saquías y Mirma. Éstos son sus 

hijos, jefes de familias.

11

 Y de Husim engendró a Abitob y a El-

paal.

12

 Hijos  de  Elpaal:  Heber,  Misam  y  Se-

med, el cual edificó Ono, y Lod con sus 

aldeas.

13

 Bería y Sema, jefes de las familias de 

los  moradores  de  Ajalón,  echaron  a  los 

moradores de Gat.

14

 Y Ahío, Sasac, Jeremot,

15

 Zebadías, Arad, Ader,

16

 Micael, Ispa y Joha, hijos de Bería.

17

 Y Zebadías, Mesulam, Hizqui, Heber,

18

 Ismerai,  Jezlías  y  Jobab,  hijos  de  El-

paal.

19

 Y Jaquim, Zicri, Zabdi,

20

 Elienai, Ziletai, Eliel,

21

 Adaías, Beraías y Simrat, hijos de Si-

mei.

22

 E Ispán, Heber, Eliel,

23

 Abdón, Zicri, Hanán,

24

 Hananías, Elam, Anatotías,

25

 Ifdaías y Peniel, hijos de Sasac.

26

 Y Samserai, Seharías, Atalías,

27

 Jaresías, Elías y Zicri, hijos de Jeroham.

28

 Éstos fueron jefes principales de familias 

por sus linajes, y habitaron en Jerusalem.

29

 Y  en  Gabaón  habitaron  Abi-gabaón,° 

cuya mujer se llamó Maaca,

30

 y  su  hijo  primogénito  Abdón,  y  Zur, 

Cis, Baal, Nadab,

31

 Gedor, Ahío y Zequer.

32

 Y Miclot engendró a Simea. Éstos tam-

bién habitaron con sus hermanos en Je-

rusalem, enfrente de ellos.

33

 Ner  engendró  a  Cis,  Cis  engendró  a 

Saúl, y Saúl engendró a Jonatán, Malqui-

súa, Abinadab y Es-baal.°

7.23 Heb. beraah = desgracia, calamidad.  7.27 Esto es, Nun

→Ex.33.11.  8.29 Esto es, padre de Gabaón.  8.33 Is-boset


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1 Crónicas 8:34

424

34

 Hijo de Jonatán fue Merib-baal, y Me-

rib-baal° engendró a Micaía.

35

 Los hijos de Micaía: Pitón, Melec, Ta-

rea y Acaz.

36

 Acaz  engendró  a  Joada,  Joada  engen-

dró  a  Alemet,  Azmavet  y  Zimri,  y  Zimri 

engendró a Mosa.

37

 Mosa  engendró  a  Bina,  hijo  del  cual 

fue Rafa, hijo del cual fue Elasa, cuyo hijo 

fue Azel.

38

 Los  hijos  de  Azel  fueron  seis,  cuyos 

nombres  son:  Azricam,  Bocru,  Ismael, 

Searías,  Obadías  y  Hanán;  todos  éstos 

fueron hijos de Azel.

39

 Y los hijos de Esec su hermano: Ulam 

su primogénito, Jehús el segundo, Elife-

let el tercero.

40

 Fueron  los  hijos  de  Ulam  guerreros 

valientes  y  vigorosos,  flecheros  diestros, 

los cuales tuvieron muchos hijos y nietos: 

ciento cincuenta. Todos éstos fueron des-

cendientes de Benjamín.

Los que regresaron de Babilonia

9

Todo  Israel  fue  inscrito  por  sus  ge-

nealogías, y he aquí, están escritos en 

el rollo de los Reyes de Israel. Y Judá fue 

llevado al destierro a Babilonia por su in-

fidelidad.

2

 Los  primeros°  que  volvieron  a  habitar 

en sus posesiones en sus ciudades fueron 

de Israel, sacerdotes, levitas y netineos.°

3

 Y de los hijos de Judá, y de los hijos de 

Benjamín, y de los hijos de Efraín y Mana-

sés que habitaron en Jerusalem, son:

4

 Utai  ben  Amiud,  hijo  de  Omri,  hijo  de 

Imri, hijo de Bani, de los hijos de Fares 

ben Judá.

5

 Y de los silonitas: Asaías el primogénito, 

y sus hijos.

6

 De los hijos de Zera: Jeuel y sus herma-

nos: seiscientos noventa.

7

 Y de los hijos de Benjamín: Salú ben Me-

sulam, hijo de Hodavías, hijo de Asenúa,

8

 Ibneías  ben  Jeroham,  Ela  hijo  de  Uzi, 

hijo de Micri, y Mesulam hijo de Sefatías, 

hijo de Reuel, hijo de Ibnías.

9

 Y  sus  hermanos  por  sus  linajes:  no-

vecientos  cincuenta  y  seis.  Todos  estos 

hombres  fueron  jefes  de  familia  en  sus 

casas paternas.

10

 De los sacerdotes: Jedaías, Joiarib, Ja-

quín,

11

 Azarías ben Hilcías, hijo de Mesulam, 

hijo  de  Sadoc,  hijo  de  Meraiot,  hijo  de 

Ahitob, príncipe de la Casa de Dios;

12

 Adaía ben Jeroham, hijo de Pasur, hijo 

de Malquías; Masai hijo de Adiel, hijo de 

Jazera, hijo de Mesulam, hijo de Mesile-

mit, hijo de Imer,

13

 y  sus  hermanos,  jefes  de  sus  casas 

paternas,  en  número  de  mil  setecientos 

sesenta, hombres de valor en la obra del 

ministerio en la Casa de Dios.

14

 De los levitas: Semaías ben Hasub, hijo 

de Azricam, hijo de Hasabías, de los hijos 

de Merari,

15

 Bacbacar,  Heres,  Galal,  Matanías  ben 

Micaía, hijo de Zicri, hijo de Asaf,

16

 Obadías  ben  Semaías,  hijo  de  Galal, 

hijo de Jedutún; y Berequías ben Asa, hijo 

de Elcana, el cual habitó en las aldeas de 

los netofatitas.

17

 Y  los  porteros:  Salum,  Acub,  Tal-

món, Ahimán; su hermano Salum era el 

principal.

18

 Hasta entonces estaban encargados de 

la puerta real, al oriente, y eran porteros 

de los barrios de los levitas.

19

 Salum ben Coré, hijo de Abiasaf, hijo 

de Coré, y sus hermanos los coreítas, por 

la casa de su padre, tuvieron a su cargo la 

obra del ministerio, guardando los acce-

sos de la Tienda, como sus padres habían 

guardado la entrada del campamento de 

YHVH.

20

 En  tiempo  antiguo,  Finees  ben  Elea-

zar, había sido príncipe de ellos, y YHVH 

estuvo con él.

21

 Zacarías ben Meselemías era portero a 

la entrada de la Tienda de Reunión.

22

 Todos estos, escogidos para guardas en 

las puertas, eran doscientos doce cuando 

fueron contados por el orden de sus lina-

jes en sus aldeas, a los cuales David y el vi-

dente Samuel constituyeron en su oficio.

23

 Así ellos y sus hijos eran porteros por 

sus  turnos  a  las  puertas  de  la  Casa  de 

YHVH, la Casa de la Tienda.

24

 Y  estaban  los  porteros  a  los  cuatro 

vientos:°  hacia  el  oriente,  hacia  el  occi-

dente, hacia el norte y hacia el sur.

8.34 Mefi-boset.  9.2 

→Neh.11.3-24.  9.2 Esto es, entregados, servidores de la Casa de Dios.  9.24 Es decir, a los cuatro lados


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1 Crónicas 10:9

425

25

 Y  sus  hermanos  que  vivían  en  las  al-

deas tenían que entrar cada siete días para 

estar con ellos de tiempo en tiempo.

26

 Porque  los  cuatro  porteros  principa-

les, que eran levitas, estaban en servicio 

permanente a cargo de las cámaras y de 

los tesoros de la Casa de Dios.

27

 Pasaban  la  noche  en  los  alrededores 

de la Casa de Dios, pues ellos estaban en-

cargados  de  la  guardia  y  de  abrirla  cada 

mañana.

28

 Algunos de éstos tenían a su cargo los 

utensilios  para  el  ministerio,  los  cuales 

contaban cuando se entraban, y contaban 

cuando se sacaban;

29

 otros tenían a su cargo el mobiliario y 

todos los utensilios del Santuario, la flor 

de harina, el vino, el aceite, el incienso, y 

las especias;

30

 y otros, de los hijos de los sacerdotes, 

preparaban la mezcla de las especias aro-

máticas.

31

 Matatías, uno de los levitas, primogé-

nito de Salum coreíta, era responsable de 

las cosas que se preparaban en sartenes.

32

 Algunos de los hijos de Coat, y de sus 

hermanos, tenían a su cargo los panes de 

la  proposición,  para  prepararlos  de  sha-

bbat en shabbat.

33

 También  había  cantores,  jefes  de  fa-

milias  de  los  levitas,  que  habitaban  en 

las cámaras, libres de todo otro servicio, 

porque estaban en aquella obra de día y 

de noche.°

34

 Éstos eran jefes de familias de los levi-

tas por sus linajes, jefes que habitaban en 

Jerusalem.

35

 En  Gabaón  habitaba  Jehiel,  padre  de 

Gabaón,  el  nombre  de  cuya  mujer  era 

Maaca;

36

 y  Abdón,  su  hijo  primogénito,  luego 

Zur, Cis, Baal, Ner, Nadab,

37

 Gedor, Ahío, Zacarías y Miclot;

38

 y  Miclot  engendró  a  Simeam.  Éstos 

habitaban también en Jerusalem con sus 

hermanos enfrente de ellos.

39

 Ner  engendró  a  Cis,  Cis  engendró  a 

Saúl, y Saúl engendró a Jonatán, Malqui-

súa, Abinadab y Es-baal.

40

 Hijo de Jonatán fue Merib-baal, y Me-

rib-baal engendró a Micaía.

41

 Y los hijos de Micaía: Pitón, Melec, Ta-

rea y Acaz.

42

 Acaz engendró a Jara, Jara engendró a 

Alemet, Azmavet y Zimri, y Zimri engen-

dró a Mosa,

43

 y Mosa engendró a Bina, cuyo hijo fue 

Refaías, del que fue hijo Elasa, cuyo hijo 

fue Azel.

44

 Y Azel tuvo seis hijos, los nombres de 

los  cuales  son:  Azricam,  Bocru,  Ismael, 

Searías,  Obadías  y  Hanán.  Éstos  fueron 

los hijos de Azel.

Muerte de Saúl

10

Los  filisteos  combatieron  contra 

Israel,° y el israelita huyó delante 

del filisteo, y cayeron muertos en el mon-

te Gilboa.

2

 Y los filisteos siguieron de cerca a Saúl 

y a sus hijos; y mataron los filisteos a Jo-

natán, a Abinadab y a Malquisúa, hijos de 

Saúl.

3

 Y arreció la batalla contra Saúl, y los ar-

queros lo alcanzaron, y fue herido por los 

arqueros.

4

 Entonces Saúl dijo a su escudero: ¡Saca 

tu  espada  y  traspásame  con  ella,  no  sea 

que  estos  incircuncisos  vengan  y  hagan 

escarnio de mí! Pero su escudero no qui-

so,  porque  tenía  gran  temor.  Entonces 

Saúl tomó la espada y se echó sobre ella.

5

 Viendo  que  Saúl  moría,  su  escudero 

también  se  echó  sobre  la  espada,  y  mu-

rió.

6

 Murió pues Saúl con tres de sus hijos, 

y  todos  los  de  su  casa°  murieron  junta-

mente con él.

7

 Y  cuando  todos  los  hombres  de  Israel 

que  estaban  en  el  valle  vieron  que  ha-

bían huido, y que Saúl y sus hijos habían 

muerto, también abandonaron sus ciuda-

des y huyeron. Entonces los filisteos lle-

garon y habitaron en ellas.

8

 Al día siguiente aconteció que los filis-

teos  fueron  a  despojar  a  los  muertos,  y 

hallaron a Saúl y a sus hijos tendidos en 

el monte Gilboa.

9

 Y lo despojaron, y le arrancaron la ca-

beza y las armas, y enviaron a proclamar 

la noticia por toda la tierra de los filisteos 

entre sus ídolos y entre el pueblo.

9.33 

→Sal.134.1.  10.1 →1 S.31.1-13.  10.6 Esto es, todos sus servidores varones


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1 Crónicas 10:10

426

10

 Y colgaron sus armas en el templo de 

sus dioses, y enclavaron su cabeza en el 

templo de Dagón.

11

 Cuando los de Jabes de Galaad oyeron 

lo que los filisteos habían hecho de Saúl,

12

 se levantaron todos los hombres de va-

lor y tomaron el cadáver de Saúl y los ca-

dáveres de sus hijos, y los trajeron a Jabes, 

y sepultaron sus huesos debajo del gran 

árbol en Jabes, y ayunaron siete días.

13

 Así  murió  Saúl°  por  su  rebelión  con 

que  prevaricó  contra  YHVH,  contra  la 

palabra  de  YHVH,  la  cual  no  guardó,  y 

aun consultó a una que evoca espíritu de 

muertos,

14

 y no consultó a YHVH. Por esa causa 

le quitó la vida y traspasó el reino a David 

ben Isaí.

David, rey de Israel 

Conquista de Jerusalem 

Guerreros de David

11

Entonces  todo  Israel  se  congregó 

ante David en Hebrón, para decir: 

¡Henos aquí, hueso tuyo y carne tuya!

2

 Porque en días anteriores, cuando aún 

Saúl era rey, tú eras quien sacabas y quien 

volvías a traer a Israel, y YHVH tu Dios te 

dijo: Tú apacentarás a mi pueblo Israel, y 

serás el caudillo de mi pueblo Israel.

3

 Cuando los ancianos de Israel fueron ante 

el rey en Hebrón, David concertó un pacto 

en Hebrón delante de YHVH, y ungieron 

a David por rey sobre Israel conforme a la 

palabra de YHVH dada por Samuel.

4

 Entonces fue David con todo Israel a Je-

rusalem, la cual es Jebús; y los jebuseos 

habitaban en aquella tierra.

5

 Y los moradores de Jebús dijeron a Da-

vid: ¡No entrarás acá! Pero David capturó 

la fortaleza de Sión, que es la ciudad de 

David.

6

 Y  David  había  dicho:  El  que  primero 

derrote a los jebuseos será cabeza y jefe. 

Entonces Joab hijo de Sarvia subió el pri-

mero, y fue hecho jefe.

7

 Y David habitó en la fortaleza, y por esto 

la llamaron Ciudad de David.

8

 Y  edificó  la  ciudad  alrededor,  desde  el 

terraplén hasta el muro; y Joab reparó el 

resto de la ciudad.

9

 Y  David  se  engrandecía  cada  vez  más, 

porque YHVH Sebaot estaba con él.

10

 Éstos son los principales de los valien-

tes que David tuvo, y los que le ayudaron 

en su reino, con todo Israel, para hacerlo 

rey, conforme a la palabra de YHVH res-

pecto a Israel.

11

 Y  éste  es  el  número  de  los  valientes 

que  David  tuvo:  Jasobeam  ben  Hacmo-

ni, cabeza de los treinta, el cual blandió 

su  lanza  contra  trescientos,  a  los  cuales 

mató de una sola embestida.

12

 Tras él estaba Eleazar ben Dodo, aho-

híta, el cual era de los tres valientes.

13

 Éste  estuvo  con  David  en  Pasdamim, 

cuando los filisteos se reunieron allí para 

la  batalla;  y  había  una  parcela  de  tierra 

llena de cebada, y huyendo el pueblo de-

lante de los filisteos,

14

 ellos se pusieron en medio de la parce-

la y la defendieron, y vencieron a los filis-

teos, y YHVH los favoreció con una gran 

victoria.

15

 Y  tres  de  los  treinta  principales  ba-

jaron a la peña donde estaba David, a la 

cueva  de  Adulam,  mientras  los  filisteos 

acampaban en el valle de Refaim.

16

 David  estaba  entonces  en  la  fortaleza 

mientras la guarnición de los filisteos es-

taba en Bet-léhem.

17

 David  deseó  entonces  y  dijo:  ¡Quién 

me diera a beber de las aguas del pozo de 

Bet-léhem, que está a la puerta!

18

 Entonces aquellos tres irrumpieron en 

el campamento de los filisteos, y sacando 

agua del pozo de Bet-léhem que está jun-

to a la puerta, se la llevaron y la trajeron a 

David; pero David no la quiso beber, sino 

que la derramó para YHVH, y dijo:

19

 ¡Lejos  esté  de  mí,  oh  Dios,  el  hacer 

esto! ¿Beberé la sangre de estos hombres 

que con riesgo de sus vidas la han traído? 

Y  no  quiso  beberla.  Esto  hicieron  aque-

llos tres valientes.

20

 Y Abisai, hermano de Joab, era el prin-

cipal de los treinta, el cual blandió su lan-

za  contra  trescientos  y  los  mató,  y  tuvo 

renombre entre los tres.

21

 Fue el más ilustre de los treinta, y lle-

gó a ser su jefe, pero no fue incluido entre 

los tres.

10.13-14 

→1 S.13.13; 15.23, 28; 28.7; Lv.19.31; 20.6. 


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1 Crónicas 12:17

427

22

 Benaía ben Joiada, hijo de un hombre 

valeroso de múltiples proezas, natural de 

Cabseel, él venció a los hijos de Ariel de 

Moab, y en día de nieve, bajó y mató a un 

león dentro de un foso.

23

 También  mató  a  un  egipcio,  hombre 

de  cinco  codos  de  estatura;  y  el  egipcio 

traía una lanza como un rodillo de teje-

dor,  pero  él  bajó  con  un  cayado,  y  arre-

batando la lanza de mano del egipcio, lo 

mató con su propia lanza.

24

 Esto hizo Benaía ben Joiada, y tuvo 

tanto  renombre  como  los  tres  valien-

tes.

25

 He aquí, fue el más distinguido de los 

treinta, pero no igualó a los tres prime-

ros; y David lo puso al frente de su guar-

dia personal.

26

 Y  los  valientes  de  los  ejércitos:  Asael 

hermano de Joab, Elhanán ben Dodo, de 

Bet-léhem,

27

 Samot harodita, Heles pelonita;

28

 Ira ben Iques tecoíta, Abiezer anatoti-

ta,

29

 Sibecai husatita, Ilai ahohíta,

30

 Maharai  netofatita,  Heled  ben  Baana 

netofatita,

31

 Itai ben Ribai, de Gabaa de los hijos de 

Benjamín, Benaía piratonita,

32

 Hurai del río Gaas, Abiel arbatita,

33

 Azmavet  barhumita,  Eliaba  saalboni-

ta,

34

 los  hijos  de  Hasem  gizonita,  Jonatán 

ben Sagé, ararita,

35

 Ahíam  ben  Sacar  ararita,  Elifal  ben 

Ur,

36

 Hefer mequeratita, Ahías pelonita,

37

 Hezro carmelita, Naarai ben Ezbai,

38

 Joel  hermano  de  Natán,  Mibhar  ben 

Hagrai,

39

 Selec  amonita,  Naharai  beerotita,  es-

cudero de Joab hijo de Sarvia,

40

 Ira itrita, Gareb itrita,

41

 Urías heteo, Zabad ben Ahlai,

42

 Adina  ben  Siza  rubenita,  príncipe  de 

los rubenitas, y con él treinta;

43

 Hanán ben Maaca, Josafat mitnita,

44

 Uzías astarotita, Sama y Jehiel hijos de 

Hotam ahaziel;

45

 Jediael ben Simri, y Joha su hermano, 

tizita,

46

 Eliel mahavita, Jerebai y Josavía hijos 

de Elnaam, Itma moabita,

47

 Eliel, Obed, y ahaziel mesobaíta.

El ejército de David

12

Éstos son los que vinieron a David 

en Siclag, estando él aún encerra-

do por causa de Saúl ben Cis, y eran de 

los valientes que le ayudaron en la gue-

rra.

2

 Estaban armados con arcos, y usaban de 

ambas manos para tirar piedras con hon-

da y saetas con arco. De los hermanos de 

Saúl de Benjamín:

3

 El principal Ahiezer, después Joás, hijos 

de Semaa gabaatita; Jeziel y Pelet hijos de 

Azmavet, Beraca, Jehú anatotita,

4

 Ismaías  gabaonita,  valiente  entre  los 

treinta,  y  más  que  los  treinta;  Jeremías, 

Jahaziel, Johanán, Jozabad gederatita,

5

 Eluzai,  Jerimot,  Bealías,  Semarías,  Se-

fatías harufita,

6

 Elcana,  Isías,  hazi,  Joezer  y  Jasobeam, 

coreítas,

7

 y Joela y Zebadías hijos de Jeroham de 

Gedor.

8

 También de los de Gad se pasaron a Da-

vid, a la fortaleza en el desierto, hombres 

fuertes  y  valientes,  entrenados  para  la 

guerra, diestros con el escudo y la lanza, 

cuyos rostros eran como rostros de leo-

nes, y eran tan ligeros como las gacelas 

sobre las montañas.

9

 Ezer  el  primero,  Obadías  el  segundo, 

Eliab el tercero,

10

 Mismana el cuarto, Jeremías el quinto,

11

 Atai el sexto, Eliel el séptimo,

12

 Johanán el octavo, Elzabad el noveno,

13

 Jeremías el décimo y Macbanai el un-

décimo.

14

 Éstos fueron capitanes del ejército de 

los hijos de Gad. El menor tenía cargo de 

cien hombres, y el mayor de mil.

15

 Éstos pasaron el Jordán en el mes pri-

mero,  cuando  se  había  desbordado  por 

todas sus riberas, e hicieron huir a todos 

los de los valles, tanto al oriente como al 

poniente.

16

 También algunos de los hijos de Ben-

jamín y de Judá llegaron a David a la for-

taleza,

17

 y  saliendo  David  a  su  encuentro,  les 

habló diciendo: Si venís a mí en paz para 

ayudarme, mi corazón se unirá a vosotros; 

pero si es para entregarme a mis enemi-

gos,  sin  haber  iniquidad  en  mis  manos, 

¡que el Dios de nuestros padres lo vea y os 

lo demande!


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1 Crónicas 12:18

428

18

 Entonces el Espíritu vino sobre Ama-

sai, jefe de los treinta, y dijo: ¡Tuyos so-

mos, oh David, y contigo estamos, hijo de 

Isaí! ¡Paz, paz a ti, y paz a tus ayudadores, 

pues  también  tu  Dios  te  ayuda!  Y  David 

los recibió, y los puso entre los capitanes 

de la tropa.

19

 También  se  pasaron  a  David  algunos 

de Manasés cuando iba con los filisteos a 

la batalla contra Saúl (pero David no los 

ayudó,  porque  los  jefes  de  los  filisteos, 

habido consejo, lo despidieron, diciendo: 

¡Por nuestras cabezas se pasará a su señor 

Saúl!).

20

 Y  cuando  él  iba  a  Siclag,  se  pasaron 

a  él  de  los  de  Manasés:  Adnas,  Jozabad, 

Jediaiel,  Micael,  Jozabad,  Eliú  y  Ziletai, 

príncipes de millares de los de Manasés.

21

 Éstos ayudaron a David contra la ban-

da de merodeadores, pues todos ellos eran 

hombres valientes, y fueron capitanes en 

el ejército.

22

 En aquel tiempo venían día tras día a 

David para ayudarlo, hasta que se formó 

un gran campamento, como un ejército 

de Dios.

23

 Y éste es el número de los principales 

que estaban listos para la guerra, que vi-

nieron a David en Hebrón para traspasar-

le el reino de Saúl conforme al dicho de 

YHVH:

24

 De los hijos de Judá que portaban es-

cudo y lanza: seis mil ochocientos, listos 

para la guerra.

25

 De los hijos de Simeón: siete mil cien 

hombres,  valientes  y  esforzados  para  la 

guerra.

26

 De  los  hijos  de  Leví:  cuatro  mil  seis-

cientos,

27

 junto con Joiada, príncipe de los del lina-

je de Aarón, y con él tres mil setecientos;

28

 y  Sadoc,  joven  valiente  y  esforzado, 

con veintidós de los principales de la casa 

de su padre.

29

 De  los  hijos  de  Benjamín,  parientes 

de Saúl: tres mil, porque hasta entonces 

muchos de ellos se mantenían fieles a la 

casa de Saúl.

30

 De los hijos de Efraín: veinte mil ocho-

cientos,  muy  valientes,  varones  ilustres 

en las casas de sus padres.

31

 De la media tribu de Manasés: diecio-

cho  mil,  los  cuales  fueron  tomados  por 

lista para venir a poner a David por rey.

32

 De los hijos de Isacar: doscientos prin-

cipales, duchos en discernir los tiempos,° 

y  que  sabían  lo  que  Israel  debía  hacer, 

cuyo dicho seguían todos sus hermanos.

33

 De Zabulón: cincuenta mil, que salían 

a  campaña  prontos  para  la  batalla  con 

toda clase de armas de guerra, dispuestos 

a pelear sin doblez de corazón.

34

 De  Neftalí:  mil  capitanes,  y  con  ellos 

treinta y siete mil con escudo y lanza.

35

 De  los  de  Dan,  dispuestos  a  pelear: 

veintiocho mil seiscientos.

36

 De  Aser,  dispuestos  para  la  guerra  y 

preparados para pelear: cuarenta mil.

37

 Y del otro lado del Jordán, de los ru-

benitas  y  gaditas  y  de  la  media  tribu  de 

Manasés: ciento veinte mil con toda clase 

de armas de guerra.

38

 Todos  estos  hombres  de  guerra,  lis-

tos para la batalla, vinieron con corazón 

sincero  a  Hebrón,  para  hacer  que  David 

reinara sobre todo Israel; también todos 

los demás de Israel eran de un mismo pa-

recer para hacer reinar a David.

39

 Y  estuvieron  allí  con  David  tres  días, 

comiendo y bebiendo, porque sus herma-

nos habían hecho provisión para ellos.

40

 También  los  que  les  eran  vecinos, 

hasta Isacar y Zabulón y Neftalí, traje-

ron víveres en asnos, camellos, mulos y 

bueyes: grandes cantidades de tortas de 

harina, tortas de higos, racimos de uvas 

pasas,  vino  y  aceite,  y  bueyes  y  ovejas 

en abundancia, porque había alegría en 

Israel.

Traslado del Arca

13

Entonces David tomó consejo con 

los capitanes de millares y de cen-

tenas, y con todos los jefes.

2

 Y dijo David a toda la asamblea de Israel: 

Si  os  parece  bien  y  si  es  la  voluntad  de 

YHVH nuestro Dios, enviaremos a todas 

partes  por  nuestros  hermanos  que  han 

quedado  en  todas  las  tierras  de  Israel,  y 

por los sacerdotes y levitas que están con 

ellos en sus ciudades y ejidos, para que se 

reúnan con nosotros,

12.32 Es decir, las oportunidades para actuar


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1 Crónicas 15:1

429

3

 y  traigamos  el  Arca  de  nuestro  Dios  a 

nosotros, porque no la buscamos desde el 

tiempo de Saúl.

4

 Y la asamblea entera dijo que se hiciera 

así, porque la cosa pareció bien a todo el 

pueblo.

5

 Entonces  David  reunió  a  todo  Israel, 

desde Sihor de Egipto hasta la entrada de 

Hamat, para traer el Arca de Dios desde 

Quiriat-jearim.

6

 Y  subió  David  con  todo  Israel  a  Baala 

de Quiriat-jearim, que está en Judá, para 

hacer subir de allí el Arca de Dios, YHVH, 

que mora entre los querubines, sobre la 

cual es invocado su Nombre.

7

 Y llevaron el Arca de Dios de la casa de 

Abinadab en un carro nuevo, y Uza y Ahío 

guiaban el carro.

8

 Y  David  y  todo  Israel  se  regocijaban 

delante  de  Ha-’Elohim  con  todas  sus 

fuerzas,  con  cánticos,  arpas,  salterios, 

panderos, címbalos y trompetas.

9

 Pero cuando llegaron a la era de Quidón, 

Uza extendió su mano al Arca para soste-

nerla, porque los bueyes tropezaban.

10

 Y la ira de YHVH se encendió contra Uza 

y lo hirió, porque había extendido su mano 

al Arca, y murió allí delante de ’Elohim.

11

 Y David se disgustó porque YHVH ha-

bía quebrantado a Uza, por lo que llamó 

aquel lugar Pérez-Uza,° hasta hoy.

12

 Pero  aquel  día  David  tuvo  temor  de 

Ha-’Elohim, y dijo: ¿Cómo podrá venir a 

mí el Arca de Dios?

13

 Así David no llevó consigo el Arca a la 

ciudad de David, sino que la hizo trasla-

dar a casa de Obed-edom geteo.

14

 Y el Arca de Dios estuvo con la familia 

de Obed-edom, en su casa, tres meses; y 

bendijo  YHVH  la  casa  de  Obed-edom,  y 

todo lo que tenía.

David y su familia

14

Hiram rey de Tiro envió embajado-

res a David, con madera de cedro, 

artesanos y ebanistas, para que le edifica-

ran una casa.

2

 Y David comprendió que YHVH lo había 

establecido como rey sobre Israel, y que 

su reino había sido exaltado por amor a 

su pueblo Israel.

3

 Y  David  tomó  más  mujeres  en  Jerusa-

lem, y engendró David más hijos e hijas.

4

 Y  éstos  son  los  nombres  de  los  que  le 

nacieron  en  Jerusalem:  Samúa,  Sobab, 

Natán, Salomón,

5

 Ibhar, Elisúa, Elpelet,

6

 Noga, Nefeg, Jafía,

7

 Elisama, Beeliada y Elifelet.

8

 Oyendo los filisteos que David había sido 

ungido rey sobre todo Israel, todos los fi-

listeos subieron en busca de David; y cuan-

do David se enteró salió contra ellos,

9

 porque los filisteos habían llegado y se 

habían desplegado por el valle de Refaim.

10

 Entonces  David  consultó  a  ’Elohim, 

diciendo:  ¿Subiré  contra  los  filisteos? 

¿Los entregarás en mi mano? Y YHVH le 

respondió: Sube, porque Yo los entregaré 

en tu mano.

11

 Subieron  pues  a  Baal-perazim,  y  allí 

los derrotó David. Dijo luego David: ¡Ha-

’Elohim abrió brecha entre mis enemigos 

por mi mano, como corriente impetuosa! 

Por esto llamaron el nombre de aquel lu-

gar Baal-perazim.°

12

 Y ellos dejaron allí abandonados a sus 

dioses,  y  David  ordenó  que  fueran  que-

mados.

13

 Después los filisteos volvieron a incur-

sionar por el valle,

14

 y David volvió a consultar a ’Elohim, 

y Ha-’Elohim le dijo: No subas tras ellos, 

sino rodéalos por detrás, y sal a ellos fren-

te a las balsameras.

15

 Y cuando oigas el ruido de marcha en 

las copas de las balsameras, sal ensegui-

da a la batalla, porque Ha-’Elohim saldrá 

delante de ti para herir al ejército de los 

filisteos.

16

 Y David hizo tal como Ha-’Elohim le 

había  ordenado,  y  derrotaron  al  ejército 

de los filisteos desde Gabaón hasta Gezer.

17

 Y la fama de David fue divulgada por 

todas aquellas tierras; y YHVH puso el te-

mor de David sobre todas las naciones.

Traslado del Arca a Jerusalem

15

Y él hizo para sí casas en la ciudad 

de David, y preparó un lugar para 

el  Arca  de  Dios,  y  extendió  una  tienda 

para ella.

13.11 Esto es, muerte de Uza.   14.11 Esto es, el señor de las brechas


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1 Crónicas 15:2

430

2

 Entonces  dijo  David:  El  Arca  de  Dios 

no  debe  ser  llevada  sino  por  los  levitas, 

porque a ellos ha elegido YHVH para que 

lleven el Arca de YHVH, y lo sirvan perpe-

tuamente.

3

 Y  congregó  David  a  todo  Israel  en  Je-

rusalem, para que trasladaran el Arca de 

YHVH a su lugar, el cual le había él pre-

parado.

4

 Y David reunió a los hijos de Aarón y a 

los levitas:

5

 de los hijos de Coat: Uriel el principal, y 

sus hermanos, ciento veinte.

6

 De los hijos de Merari: Asaías el princi-

pal, y sus hermanos, doscientos veinte.

7

 De los hijos de Gersón: Joel el principal, 

y sus hermanos, ciento treinta.

8

 De  los  hijos  de  Elizafán:  Semaías  el 

principal, y sus hermanos, doscientos.

9

 De los hijos de Hebrón: Eliel el princi-

pal, y sus hermanos, ochenta.

10

 De  los  hijos  de  Uziel:  Aminadab  el 

principal, y sus hermanos, ciento doce.

11

 Y llamó David a los sacerdotes Sadoc y 

Abiatar, y a los levitas Uriel, Asaías, Joel, 

Semaías, Eliel y Aminadab,

12

 y les dijo: Vosotros que sois los prin-

cipales  padres  de  las  familias  de  los  le-

vitas,  santificaos,  vosotros  y  vuestros 

hermanos, para que hagáis subir el Arca 

de YHVH, Dios de Israel, al lugar que le 

he preparado.

13

 Pues por no haberlo hecho vosotros la 

primera vez, YHVH nuestro Dios nos que-

brantó, por cuanto no lo buscamos según 

el orden prescrito.°

14

 Así los sacerdotes y los levitas se santi-

ficaron para subir el Arca de YHVH, Dios 

de Israel.

15

 Y  los  hijos  de  los  levitas  llevaron  el 

Arca de Dios puestas las barras sobre sus 

hombros, tal como Moisés había ordena-

do, conforme a la palabra de YHVH.

16

 Asimismo dijo David a los principales de 

los levitas, que designasen de sus hermanos 

a  cantores  con  instrumentos  de  música, 

con salterios y arpas y címbalos que reso-

naran, y que alzaran la voz con alegría.

17

 Y  los  levitas  designaron  a  Hemán 

ben  Joel,  y  de  sus  parientes  a  Asaf  ben 

Berequías,  y  de  los  hijos  de  Merari  y  de 

sus hermanos, a Etán ben Cusaías.

18

 Y con ellos, a sus hermanos de segun-

do grado: a Zacarías ben Jahaziel, Semira-

mot, Jehiel, Unni, Eliab, Benaía, Maasías, 

Matatías,  Elifelehu,  Micnías,  Obed-edom 

y Jeiel, los porteros.

19

 Así Hemán, Asaf y Etán, que eran can-

tores, sonaban címbalos de bronce.

20

 Y  Zacarías,  Aziel,  Semiramot,  Jehiel, 

Uni, Eliab, Maasías y Benaía, con salterios 

sobre alamot.°

21

 Matatías,  Elifelehu,  Micnías,  Obed-

edom, Jeiel y Azazías, para dirigir con li-

ras templadas según el seminit.°

22

 Y  Quenanías,  principal  de  los  levitas 

en la música, fue puesto para entonar el 

canto, porque era talentoso.

23

 Berequías  y  Elcana  eran  porteros  del 

Arca.

24

 Y Sebanías, Josafat, Natanael, Amasai, 

Zacarías, Benaía y Eliezer, sacerdotes, to-

caban  las  trompetas  delante  del  Arca  de 

Dios, y Obed-edom y Jehías eran también 

porteros del Arca.

25

 Fue  pues  David,  con  los  ancianos  de 

Israel  y  los  capitanes  de  millares,  a  ha-

cer subir con alegría el Arca del Pacto de 

YHVH, desde la casa de Obed-edom.

26

 Y sucedió que como Ha-’Elohim ayu-

daba a los levitas que llevaban el Arca del 

Pacto de YHVH, sacrificaron siete novillos 

y siete carneros.

27

 Y  David  iba  vestido  de  un  manto  de 

lino fino, de igual modo que todos los le-

vitas que cargaban el Arca, y los cantores. 

Quenanías era el maestro de canto entre 

los cantores, y David llevaba sobre sí un 

éfod de lino.

28

 Así,  todo  Israel  iba  haciendo  subir  el 

Arca del Pacto de YHVH con aclamacio-

nes y al sonido del shofar, con trompetas 

y  címbalos  muy  resonantes,  y  al  son  de 

salterios y de arpas.

29

 Y cuando el Arca del Pacto de YHVH 

entró en la ciudad de David, aconteció 

que Mical, la hija de Saúl, miró por la 

ventana,  y  viendo  al  rey  David  saltan-

do  y  regocijándose,  lo  despreció  en  su 

corazón.

15.13 .prescrito.  15.20 Esto es, afinados en tono agudo (prob. indica una tonalidad musical alegre 

→v. 16).  15.21 Esto es, 

templadas o afinadas en la octava.


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1 Crónicas 16:31

431

Alabanza de David

16

Así  trajeron  el  Arca  de  Dios,  y  la 

asentaron  en  medio  de  la  tienda 

que David le había levantado; y ofrecieron 

holocaustos y sacrificios de paz delante de 

Ha-’Elohim.

2

 Y cuando David acabó de hacer subir el 

holocausto y las ofrendas de paz, bendijo 

al pueblo en el nombre de YHVH.

3

 Y  repartió  a  todos  en  Israel,  tanto  a 

hombres como a mujeres, a cada uno una 

torta de pan, una porción,° y una torta de 

uvas pasas.

4

 Y puso delante del Arca de YHVH minis-

tros de los levitas para que dieran gracias, 

recordaran  y  alabaran  a  YHVH,  Dios  de 

Israel:

5

 Asaf, el primero; el segundo después de 

él, Zacarías; Jeiel, Semiramot, Jehiel, Ma-

tatías, Eliab, Benaía, Obed-edom y Jeiel, 

con sus instrumentos de salterios y arpas; 

también  Asaf  tocaba  los  címbalos  reso-

nantes.

6

 Y los sacerdotes Benaía y Jahaziel toca-

ban continuamente las trompetas delante 

del Arca del Pacto de Dios.

7

 Aquel  día,  David,  por  primera  vez,  en-

cargó° para alabar a YHVH por mano de 

Asaf y de sus hermanos:

8

    ¡Alabad a YHVH, invocad su 

Nombre!

Haced conocer entre las naciones 

sus hazañas.

9

    Cantad a Él, cantadle salmos;

Meditad en todas sus maravillas.

10

    ¡Gloriaos en su santo Nombre!

¡Regocíjese el corazón de los que 

buscan a YHVH!

11

    Buscad a YHVH y su fortaleza;°

Buscad su rostro continuamente.

12

    Haced memoria de las maravillas 

que Él ha hecho,

Sus prodigios, y los juicios de su 

boca,

13

    ¡Oh vosotros, hijos de Israel, su 

siervo!

¡Oh hijos de Jacob, sus escogidos!

14

    YHVH, Él es nuestro Dios;

Sus juicios están sobre toda la tierra.

15

    Acordaos para siempre de su pacto,

De la palabra que ordenó para mil 

generaciones;

16

    Del pacto que hizo con Abraham,

Y de su juramento a Isaac;

17

    El cual confirmó a Jacob por estatuto,

Y a Israel por alianza sempiterna,

18

    Diciendo: A ti daré la tierra de 

Canaán,

Porción de tu heredad.

19

    Cuando ellos eran pocos en número,

Pocos y forasteros en ella,

20

    Y vagaban de nación en nación,

Y de un reino a otro pueblo,

21

    No permitió que nadie los 

oprimiera;

Y por amor a ellos reprendió a reyes, 

diciendo:

22

    No toquéis a mis ungidos,

Ni hagáis mal a mis profetas.

23

    Cantad a YHVH toda la tierra,

Proclamad de día en día su 

salvación.

24

    Declarad su gloria entre las naciones,

Y en todos los pueblos sus 

maravillas.

25

    Porque grande es YHVH, y digno de 

suprema alabanza,

Y de ser temido sobre todos los 

dioses.

26

    Porque todos los dioses de los 

pueblos son ídolos;

Pero YHVH hizo los cielos.

27

    Honra y majestad están delante 

de Él;

Fortaleza y alegría en su morada.

28

    ¡Tributad a YHVH, oh familias de los 

pueblos!

¡Dad a YHVH la gloria y el poder!

29

    ¡Dad a YHVH la honra debida a su 

Nombre!

Traed ofrenda, y venid delante de Él;

Postraos ante YHVH en la 

hermosura de la santidad.

30

    Temed en su presencia toda la tierra;

El mundo será aún establecido, para 

que nunca sea conmovido.

31

    Alégrense los cielos, y regocíjese la 

tierra,

Y digan en las naciones: ¡YHVH 

reina!

16.3 Prob. sea una porción de vino o de carne.  16.7 Se sobreentiende: este cántico o este salmo

→Sal.105.1-15.  16.11 Es 

decir, al Arca del Pacto

→Sal.105.4; 132.8. 


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1 Crónicas 16:32

432

32

    Brame el mar y su plenitud;

Regocíjese el campo, y todo lo que 

contiene.

33

    Entonces gritarán de júbilo los 

árboles de los bosques en 

presencia de YHVH,

Porque Él viene a juzgar la tierra.

34

    ¡Dad gracias a YHVH porque Él es 

bueno;

Porque para siempre es su 

misericordia!

35

    Y decid: ¡Sálvanos, oh Dios, 

salvación nuestra! ¡Recógenos, y 

líbranos de los gentiles,

Para que confesemos tu santo 

Nombre,

Y nos gloriemos en tus alabanzas!

36

    ¡Bendito sea YHVH, Dios de Israel,

Desde la eternidad hasta la 

eternidad!

Y todo el pueblo exclamó: ¡Amén! ¡Haya 

alabanza a YHVH!

37

 Y  allí,  delante  del  Arca  del  Pacto  de 

YHVH, dejó a Asaf y a sus hermanos para 

que ministraran de continuo delante del 

Arca, cada cosa en su día,

38

 junto con Obed-edom y sus sesenta y 

ocho hermanos, y puso como porteros a 

Obed-edom ben Jedutún y a Hosa.

39

 Y dejó al sacerdote Sadoc y a sus her-

manos los sacerdotes, delante del Taber-

náculo de YHVH en el alto de Gabaón,

40

 para  que  hicieran  elevar  holocaustos 

a YHVH continuamente sobre el altar del 

holocausto,  por  la  mañana  y  por  la  no-

che, conforme a todo lo que está escrito 

en la Ley de YHVH, que Él prescribió a 

Israel.

41

 Con ellos estaban Hemán y Jedutún, y 

el resto de los escogidos, que habían sido 

designados por nombre para dar gracias 

a YHVH, porque para siempre es su mi-

sericordia.

42

 Y Hemán y Jedutún estaban con ellos 

con  trompetas,  címbalos  resonantes  y 

otros  instrumentos  para  acompañar  los 

cánticos  a  Ha-’Elohim;  y  designó°  a  los 

hijos de Jedutún para la puerta.

43

 Y todo el pueblo se fue, cada uno a su 

casa,  y  David  se  volvió  para  bendecir  su 

casa.

Proyecto de la Casa

17

Cuando  David  ya  habitaba  en  su 

casa, sucedió que David dijo al pro-

feta Natán: He aquí yo habito en casa de 

cedro,  pero  el  Arca  del  Pacto  de  YHVH 

está entre cortinas.

2

 Y  Natán  respondió  a  David:  ¡Haz  todo 

lo  que  está  en  tu  corazón,  porque  Ha-

’Elohim está contigo!

3

 Pero esa misma noche vino palabra de 

Dios a Natán, diciendo:

4

 Ve y di a David mi siervo: Así dice YHVH: 

Tú no me edificarás Casa en que habite.

5

 Porque no he habitado en casa alguna 

desde  el  día  en  que  hice  subir  a  los  hi-

jos de Israel hasta hoy, sino que estuve de 

tienda en tienda, y en tabernáculo.

6

 Por  dondequiera  que  anduve  con  todo 

Israel, ¿acaso he hablado palabra con al-

guno de los jueces de Israel, a quien haya 

mandado apacentar a mi pueblo, para de-

cirles: ¿Por qué no me edificáis una Casa 

de cedro?

7

 Por  tanto,  ahora  dirás  a  mi  siervo  Da-

vid: Así dice YHVH Sebaot: Yo te tomé del 

redil,  de  seguir  tras  el  rebaño,  para  que 

fueras caudillo sobre mi pueblo Israel,

8

 y he estado contigo en todo cuanto has 

andado, y he cortado de tu presencia a to-

dos  tus  enemigos,  y  te  haré  un  nombre 

como el nombre de los grandes de la tie-

rra.

9

 Asimismo  he  dispuesto  un  lugar  para 

mi  pueblo  Israel,  y  lo  he  plantado  para 

que habite en él, y no sea más removido, 

ni los hijos de iniquidad continúen opri-

miéndolo como al principio,

10

 como desde los días en que puse jueces 

sobre mi pueblo Israel, y someteré a todos 

tus enemigos; además, te hago saber que 

YHVH te edificará casa.

11

 Y cuando tus días sean cumplidos para 

ir con tus padres, levantaré descendencia 

después de ti a uno de entre tus hijos y 

afirmaré su reino.

12

 Él me edificará Casa, y Yo confirmaré 

su trono eternamente.

13

 Yo le seré por padre y él me será por 

hijo, y no apartaré de él mi misericordia, 

como la aparté de aquél que estaba antes 

de ti,

16.42 .designó.


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1 Crónicas 18:11

433

14

 sino que lo confirmaré en mi Casa y en 

mi reino eternamente, y su trono perma-

necerá eternamente.

15

 Conforme a todas estas palabras, y se-

gún  toda  esta  visión,  así  habló  Natán  a 

David.

16

 Entonces  fue  el  rey  David,  y  se  sen-

tó  delante  de  YHVH,  y  dijo:  ¡Oh  YHVH 

’Elohim! ¿Quién soy yo y qué es mi casa, 

para que me lleves tan lejos?

17

 Y aun esto fue poco ante tus ojos, oh 

’Elohim, pues también has hablado de la 

casa de tu siervo para un lejano porvenir, 

y me has considerado según la medida de 

un hombre excelso, oh YHVH ’Elohim.

18

 ¿Y  qué  más  puede  decirte  David  en 

cuanto a la gloria con la que has honrado 

a tu siervo, si Tú conoces a tu siervo?

19

 Que  por  amor  a  tu  siervo,  oh  YHVH, 

y según tu corazón, has hecho toda esta 

gran  obra,  para  dar  a  conocer  todas  tus 

grandezas.

20

 ¡Oh YHVH!, no hay nadie como Tú, ni 

hay ’Elohim fuera de ti, conforme a todo 

lo que hemos oído con nuestros oídos.

21

 ¿Y  quién  como  tu  pueblo  Israel, 

nación  única  en  la  tierra  a  la  que  Ha-

’Elohim redimió como pueblo suyo, para 

manifestar tu Nombre mediante hazañas 

grandes y terribles, expulsando naciones 

de delante de tu pueblo, al que rescataste 

de Egipto?

22

 Pues hiciste a tu pueblo Israel pueblo 

tuyo  para  siempre,  y  Tú,  oh  YHVH,  has 

llegado a ser su Dios.

23

 Ahora pues, oh YHVH, confirma para 

siempre la palabra que has hablado acerca 

de tu siervo y de su casa, y haz como has 

dicho.

24

 Y  sea  confirmado  y  engrandecido  tu 

Nombre para siempre, a fin de que se diga: 

¡YHVH Sebaot, Dios de Israel, es ’Elohim 

para Israel! Y sea la casa de tu siervo Da-

vid establecida delante de tu presencia.

25

 Porque  tú,  Dios  mío,  has  revelado  al 

oído  de  tu  siervo  que  le  edificarás  una 

casa; por eso tu siervo ha hallado valor° 

para orar ante ti.

26

 Ahora  pues,  YHVH,  ¡Tú  eres  Ha-

’Elohim!, y has prometido a tu siervo este 

bien.

27

 Dígnate  pues  bendecir  la  casa  de  tu 

siervo,  para  que  permanezca  perpe-

tuamente  delante  de  ti,  porque  Tú,  oh 

YHVH,  la  has  bendecido,  y  será  bendita 

para siempre.

Victorias de David

18

Aconteció después de esto que Da-

vid derrotó a los filisteos y los so-

metió, y quitó a Gat y sus aldeas de mano 

de los filisteos.

2

 También derrotó a Moab, y los moabitas 

quedaron  sometidos  a  David  como  sier-

vos tributarios.

3

 Y  derrotó  David  a  Hadad-ezer,  rey  de 

Soba, cerca de Hamat, cuando éste fue a 

restablecer su dominio junto al río Éufra-

tes.

4

 David le capturó mil carros de guerra, 

siete  mil  jinetes  y  veinte  mil  infantes;  y 

desjarretó David todos los caballos de los 

carros,  dejando  sólo  caballos°  para  cien 

carros.

5

 Cuando vinieron los sirios de Damasco 

en ayuda de Hadad-ezer, rey de Soba, Da-

vid mató a veintidós mil hombres de los 

sirios.

6

 E impuso David guarniciones° en Siria 

de  Damasco,  y  los  sirios  fueron  siervos 

de  David  y  le  fueron  tributarios,  porque 

YHVH daba la victoria a David dondequie-

ra que iba.

7

 Y tomó David los escudos de oro que te-

nían los siervos de Hadad-ezer y los llevó 

a Jerusalem.

8

 Asimismo de Tibhat y de Cun, ciudades 

de Hadad-ezer, tomó David gran cantidad 

de  bronce,  con  el  que  Salomón  hizo  el 

mar de bronce, las columnas y los utensi-

lios de bronce.

9

 Cuando  Tou,  rey  de  Hamat,  oyó  que 

David había vencido a todo el ejército de 

Hadad-ezer, rey de Soba,

10

 envió  a  su  hijo  Adoram  al  rey  David 

para saludarlo y felicitarlo, porque había 

peleado contra Hadad-ezer y lo había de-

rrotado  (pues  Hadad-ezer  era  adversario 

de Tou). Y le obsequió toda clase de uten-

silios de oro, de plata y de bronce.

11

 Estos  también  consagró  el  rey  David 

a YHVH, junto con la plata y el oro que 

17.25 .valor.  18.4 .caballos.  18.6 .guarniciones


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1 Crónicas 18:12

434

tomó de todas las naciones de Edom, de 

Moab, de los hijos de Amón, de los filis-

teos y de Amalec.

12

 Además de esto, Abisai, hijo de Sarvia, 

destrozó a dieciocho mil edomitas en el 

valle de la Sal.

13

 E  impuso  guarniciones  en  Edom,  y 

todos los edomitas fueron siervos de Da-

vid, porque YHVH daba la victoria a David 

dondequiera que iba.

14

 Reinó pues David sobre todo Israel, y 

juzgaba con justicia a todo su pueblo.

15

 Joab, hijo de Sarvia, era general del ejér-

cito, y Josafat ben Ahilud, era el cronista.

16

 Sadoc ben Ahitob y Abimelec ben Abia-

tar eran sacerdotes, y Savsa, secretario.

17

 Y  Benaía  ben  Joiada  estaba  sobre  los 

cereteos  y  peleteos,  y  los  hijos  de  David 

eran los príncipes cerca del rey.

Derrota de los amonitas y de los sirios

19

Aconteció  después  de  estas  cosas 

que murió Nahas, rey de los amo-

nitas, y reinó en su lugar su hijo.

2

 Y dijo David: Haré misericordia con Ha-

nún, el hijo de Nahas, porque también su 

padre mostró misericordia para conmigo. 

Así  David  envió  embajadores  para  con-

solarlo  por  la  muerte  de  su  padre.  Pero 

cuando los siervos de David entraron en 

tierra  de  los  amonitas,  a  Hanún,  para 

consolarlo,

3

 los príncipes de los amonitas dijeron a 

Hanún: ¿Crees que David honra a tu pa-

dre porque te ha enviado consoladores? 

¿No  vienen  más  bien  sus  siervos  a  ti  a 

fin  de  reconocer  y  espiar  la  tierra  para 

destruirla?

4

 Entonces  Hanún  tomó  a  los  siervos  de 

David y los rapó, y les cortó los vestidos por 

la mitad hasta las nalgas, y los despidió.

5

 Se  fueron  luego,  y  cuando  llegó  a  Da-

vid  la  noticia  sobre  aquellos  varones,  él 

envió a recibirlos, pues los hombres esta-

ban muy avergonzados. El rey les mandó 

decir: Permaneced en Jericó hasta que os 

crezca la barba, y entonces volveréis.

6

 Y  viendo  los  amonitas  que  se  habían 

hecho  aborrecibles  a  David,  Hanún  y  los 

amonitas  enviaron  mil  talentos  de  plata 

para  tomar  a  sueldo  carros  de  guerra  y 

gente de a caballo de Mesopotamia, de Si-

ria, de Maaca y de Soba.

7

 Y tomaron a sueldo treinta y dos mil carros 

de guerra, y al rey de Maaca y a su ejército, 

los cuales vinieron y acamparon delante de 

Medeba. Y se juntaron también los amoni-

tas de sus ciudades, y vinieron a la guerra.

8

 Oyéndolo David, envió a Joab con todo 

el ejército de los hombres valientes.

9

 Y los amonitas salieron a presentar batalla 

a la entrada de la ciudad, y los reyes que ha-

bían venido, estaban aparte, en el campo.

10

 Viendo  Joab  que  la  batalla  se  le  pre-

sentaba por el frente y por la retaguardia, 

escogió de entre los mejores hombres de 

Israel, y los colocó en orden de batalla con-

tra los sirios.

11

 Y entregó el resto del pueblo en mano 

de Abisai su hermano, y poniéndolos en 

orden en batalla contra los amonitas,

12

 dijo: Si los sirios son demasiado fuer-

tes para mí, tú me ayudarás, y si los amo-

nitas son más fuertes que tú, entonces yo 

te ayudaré.

13

 Esfuérzate,  y  mostrémonos  valientes 

por amor a nuestro pueblo y por amor a 

las ciudades de nuestro Dios, y que YHVH 

haga lo que sea bueno ante sus ojos.

14

 Y Joab se fue acercando con el pueblo 

que tenía consigo para pelear contra los 

sirios, pero ellos huyeron delante de él.

15

 Y  viendo  los  amonitas  que  los  sirios 

huían, ellos también huyeron delante de 

su hermano Abisai, y entraron en la ciu-

dad. Entonces Joab regresó a Jerusalem.

16

 Pero cuando los sirios vieron que ha-

bían  sido  derrotados  delante  de  Israel, 

enviaron embajadores y trajeron a los si-

rios que estaban al otro lado del Éufrates, 

cuyo capitán era Sofac, general del ejérci-

to de Hadad-ezer.

17

 Cuando se dio aviso a David, éste reunió 

a  todo  Israel,  y  cruzando  el  Jordán  llegó 

frente a ellos, y ordenó batalla contra ellos. 

Y  cuando  David  hubo  ordenado  su  tropa 

contra los sirios, éstos pelearon contra él.

18

 Pero  los  sirios  huyeron  delante  de 

Israel, y David mató de los sirios a siete 

mil°  hombres  de  los  carros,  y  cuarenta 

mil infantes, y dio muerte a Sofac, el ge-

neral del ejército.

19.18 

→2 S.10.18 setecientos.


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1 Crónicas 21:15

435

19

 Cuando los siervos de Hadad-ezer vie-

ron  que  habían  caído  delante  de  Israel, 

concertaron paz con David y le quedaron 

sometidos; y los sirios no quisieron ayu-

dar más a los hijos de Amón.

Contra amonitas y filisteos

20

A  la  vuelta  del  año,  en  el  tiempo 

que los reyes suelen salir a la gue-

rra,  aconteció  que  Joab  sacó  las  fuerzas 

del ejército, y destruyó la tierra de los hi-

jos  de  Amón,  y  fue  y  puso  sitio  a  Rabá. 

Sin embargo, David permaneció en Jeru-

salem, en tanto que Joab atacaba a Rabá 

y la destruía.

2

 Después°  David  quitó  la  corona  de  so-

bre la cabeza del rey de Rabá, y halló que 

pesaba un talento de oro (y había en ella 

una piedra preciosa), y fue puesta sobre la 

cabeza de David. Además de esto sacó de 

la ciudad muy grande botín.

3

 Sacó también a la gente que estaba allí y 

la obligó a trabajar con sierras, con trillos 

de hierro y con hachas. Y así hizo David 

a todas las ciudades de los hijos de Amón. 

Y David regresó con todo el pueblo a Je-

rusalem.

4

 Sucedió  después  de  esto  que  se  levan-

tó guerra en Gezer contra los filisteos, y 

Sibecai husatita mató a Sipai, de los des-

cendientes de Rafaim,° los cuales fueron 

dominados.

5

 Volvió a levantarse guerra contra los fi-

listeos; y Elhanán ben Jair mató a Lahmi, 

hermano de Goliat geteo, el asta de cuya 

lanza era como un rodillo de telar.

6

 Y volvió a haber guerra en Gat, donde 

había un hombre de gran estatura, el cual 

tenía seis dedos en pies y manos, veinti-

cuatro  por  todos;  también  éste  descen-

diente de Rafaim.

7

 Y cuando desafió a Israel, lo mató Jona-

tán ben Simea, hermano de David.

8

 Éstos  fueron  los  descendientes  de  Ra-

faim en Gat, los cuales cayeron por mano 

de David y por mano de sus siervos.

El censo y la peste

21

Entonces Satán° se levantó contra 

Israel, e incitó a David a hacer un 

censo de Israel.

2

 Y  dijo  David  a  Joab  y  a  los  príncipes 

del pueblo: Id, haced un censo en Israel, 

desde  Beerseba  hasta  Dan,  y  traedme  el 

resultado para que yo sepa el número de 

ellos.

3

 Y  dijo  Joab:  Añada  YHVH  a  su  pueblo 

cien  veces  más,  rey  señor  mío,  ¿no  son 

todos  éstos  siervos  de  mi  señor?  ¿Para 

qué procura esto mi señor, que será para 

pecado a Israel?

4

 Pero la palabra del rey prevaleció sobre 

la de Joab, por lo cual Joab salió y reco-

rrió todo Israel, y volvió a Jerusalem.

5

 Y Joab dio a David el total del censo de 

todo  el  pueblo:  En  todo  Israel  había  un 

millón cien mil hombres que sacaban es-

pada, y en Judá cuatrocientos setenta mil 

hombres que sacaban espada.

6

 Entre éstos no fueron contados los le-

vitas ni los hijos de Benjamín, porque la 

orden del rey era abominable a Joab.

7

 También esto desagradó a Ha-’Elohim, 

e hirió a Israel.

8

 Entonces dijo David a Ha-’Elohim: He pe-

cado gravemente al hacer esto. Pero ahora 

te ruego que quites la iniquidad de tu sier-

vo, porque he obrado muy neciamente.

9

 Y habló YHVH a Gad, vidente de David, 

diciendo:

10

 Ve  y  habla  a  David,  y  dile:  Así  dice 

YHVH:  Tres  cosas  te  propongo;  escoge 

una de ellas para que Yo te la haga.

11

 Y  Gad  fue  a  David,  y  le  dijo:  Así  dice 

YHVH:

12

 Escoge  para  ti:  tres  años  de  hambre, 

o  tres  meses  de  derrotas  delante  de  tus 

enemigos,  y  que  la  espada  de  tus  adver-

sarios te alcance, o tres días de la espada 

de YHVH, esto es, la peste en la tierra y el 

ángel  de  YHVH  haciendo  estragos  hasta 

los confines de Israel. Mira pues qué res-

ponderé al que me envió.

13

 Respondió David a Gad: Estoy en gran-

de angustia, pero ¡caiga ahora yo en mano 

de YHVH, porque muchas son sus miseri-

cordias, y no caiga en mano de hombres!

14

 Así YHVH envió una peste en Israel, y 

murieron en Israel setenta mil hombres 

de Israel.

15

 Y  envió  Ha-’Elohim  al  ángel  a  Jeru-

salem para destruirla, pero cuando iba a 

20.2 

→2 S.12.26-28.  20.4 Ndel gigante (también en v. 6 y 8).  21.1 →2 S.24.1 nota.


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1 Crónicas 21:16

436

destruirla, miró YHVH y sintió pesar por 

aquella calamidad, y dijo al ángel que des-

truía: ¡Basta! ¡Detén tu mano! Y el ángel 

de YHVH estaba junto a la era de Ornán 

jebuseo.°

16

 Y alzando David sus ojos, vio al ángel 

de YHVH, que estaba entre la tierra y los 

cielos,  con  una  espada  desenvainada  en 

su mano, extendida sobre Jerusalem. En-

tonces David y los ancianos se postraron 

sobre sus rostros, cubiertos de cilicio,

17

 y dijo David a Ha-’Elohim: ¿No fui yo 

el que hizo contar el pueblo? Yo mismo 

soy el que ha pecado, y yo soy el que ha 

obrado perversamente; pero estas ovejas, 

¿qué  han  hecho?  ¡Oh  YHVH,  Dios  mío, 

sea ahora tu mano contra mí y contra la 

casa de mi padre, pero no venga la peste 

sobre tu pueblo!

18

 Y el ángel de YHVH ordenó a Gad que 

dijera a David que subiera y levantara un 

altar a YHVH en la era de Ornán jebuseo.

19

 Y  David  subió  conforme  a  la  palabra 

que  Gad  le  había  dicho  en  nombre  de 

YHVH.

20

 Y volviéndose Ornán, vio al ángel, por 

lo que cuatro hijos suyos que estaban con 

él se escondieron. Y Ornán estaba trillan-

do trigo.

21

 Cuando David llegó junto a Ornán, Or-

nán miró, y al ver a David, salió de la era y 

se postró ante David rostro en tierra.

22

 Entonces David dijo a Ornán: Dame este 

lugar de la era, para que edifique un altar 

a YHVH; me lo darás por plata llena,° para 

que sea detenida la plaga en el pueblo.

23

 Y  Ornán  respondió  a  David:  Tómala 

para ti, y que mi señor el rey haga lo que 

sea  bueno  ante  sus  ojos;  y  aun  los  bue-

yes daré para el holocausto, y los trillos 

para  leña,  y  trigo  para  la  ofrenda.  Yo  lo 

doy todo.

24

 Pero  el  rey  David  dijo  a  Ornán:  No, 

sino  que  efectivamente  la  compraré  por 

plata llena, porque no tomaré para YHVH 

lo que es tuyo, ni sacrificaré holocausto 

que nada me cueste.

25

 Y David dio a Ornán por aquel lugar el 

peso de seiscientos siclos de oro.

26

 Y edificó allí David un altar a YHVH, 

en el que ofreció holocaustos y ofrendas 

de paz, e invocó a YHVH, quien le respon-

dió por fuego desde los cielos sobre el al-

tar del holocausto.

27

 Y YHVH dio orden al ángel, y éste vol-

vió su espada a la vaina.

28

 Viendo David que YHVH le había escu-

chado en la era de Ornán jebuseo, ofreció 

sacrificios allí,

29

 porque  el  Tabernáculo  de  YHVH  que 

Moisés había hecho en el desierto, y el al-

tar del holocausto, estaban en el alto de 

Gabaón,

30

 y David no se atrevió a ir allá a consul-

tar a ’Elohim, porque estaba aterrorizado 

a causa de la espada del ángel de YHVH.

Preparativos para la Casa

22

Dijo pues David: Ésta es la Casa de 

YHVH Ha-’Elohim, y éste es el al-

tar del holocausto para Israel.

2

 Y David mandó que se reuniera a los ex-

tranjeros que había en la tierra de Israel, 

y señaló de entre ellos canteros que labra-

ran piedras para edificar la Casa de Dios.

3

 También  preparó  David  mucho  hierro 

para  los  clavos  de  las  hojas  de  las  puer-

tas y para las junturas; y más bronce del 

que podía pesarse, y madera de cedro sin 

cuenta,

4

 porque los sidonios y tirios habían traí-

do a David abundancia de madera de ce-

dro.

5

 Y dijo David: mi hijo Salomón es joven 

y sin experiencia, y la Casa que se ha de 

edificar a YHVH ha de ser magnífica por 

excelencia,  para  fama  gloriosa  en  todas 

las  tierras.  Por  tanto,  haré  preparativos 

para ella. Y David hizo grandes prepara-

tivos antes de su muerte.

6

 Llamó  entonces  David  a  Salomón  su 

hijo, y le mandó que edificara la Casa para 

YHVH, Dios de Israel.

7

 Y dijo David a Salomón: Hijo mío, en mi 

corazón  tuve  el  edificar  Casa  al  nombre 

de YHVH mi Dios,

8

 pero  la  palabra  de  YHVH  vino  contra 

mí,  diciendo:  Tú  has  derramado  mucha 

sangre, y has hecho grandes guerras, por 

tanto,  no  edificarás  Casa  a  mi  Nombre, 

porque has derramado mucha sangre en 

la tierra delante de mí.

21.15 Esto es, el monte de Moriah

→2 Cr.3.1.  21.22 Es decir, monedas de plata de valor genuino.


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1 Crónicas 23:19

437

9

 He aquí te nacerá un hijo, el cual será 

varón de paz, porque Yo le daré paz de to-

dos sus enemigos en derredor; por tanto, 

su nombre será Salomón,° y en sus días 

daré paz° y reposo a Israel.

10

 Él edificará Casa a mi Nombre, y él me 

será por hijo y Yo le seré por padre, y es-

tableceré el trono de su reino sobre Israel 

para siempre.

11

 Ahora pues, hijo mío, YHVH sea conti-

go para que prosperes y edifiques la Casa 

de YHVH tu Dios, como Él ha dicho acer-

ca de ti.

12

 Y YHVH te conceda prudencia y enten-

dimiento, para que cuando Él te dé domi-

nio sobre Israel, observes la Ley de YHVH 

tu Dios.

13

 Entonces  serás  prosperado,  si  cuidas 

de poner por obra los estatutos y decretos 

que  YHVH  mandó  a  Moisés  para  Israel. 

¡Esfuérzate  y  sé  valiente!  ¡No  temas  ni 

desmayes!

14

 He aquí yo, con grandes esfuerzos, he 

preparado para la Casa de YHVH cien mil 

talentos de oro y un millón de talentos de 

plata, y bronce y hierro sin medida, por-

que  es  mucho;  asimismo  he  preparado 

madera y piedra, a lo cual tú añadirás.

15

 Además,  hay  obreros  contigo  en 

abundancia:  canteros,  artesanos,  eba-

nistas, y hombres expertos en toda clase 

de obra.

16

 Del  oro,  de  la  plata,  del  bronce  y  del 

hierro, no hay cuenta. ¡Levántate, y ma-

nos a la obra, y YHVH sea contigo!

17

 Asimismo  mandó  David  a  todos  los 

príncipes de Israel que ayudaran a Salo-

món su hijo, diciendo:

18

 ¿No  está  con  vosotros  YHVH  vuestro 

Dios,  el  cual  os  ha  dado  paz  por  todas 

partes?  Por  cuanto  Él  ha  entregado  en 

mi mano a los moradores de la tierra, y la 

tierra ha sido sometida delante de YHVH 

y delante de su pueblo.

19

 Disponed  ahora  vuestro  corazón  y 

vuestra alma para buscar a YHVH vuestro 

Dios.  Levantaos  pues,  y  edificad  el  San-

tuario de YHVH Ha-’Elohim, para traer el 

Arca del Pacto de YHVH, y los utensilios 

consagrados a Ha-’Elohim, a la Casa que 

será edificada para el nombre de YHVH.

Distribución de los levitas

23

Cuando David era ya viejo y colma-

do de días, proclamó a Salomón su 

hijo como rey sobre Israel.

2

 Y reuniendo a todos los principales de 

Israel, con los sacerdotes y levitas,

3

 fueron  contados  los  levitas  de  treinta 

años arriba, y el número de ellos por sus 

cabezas,  contados  uno  por  uno,  fue  de 

treinta y ocho mil.

4

 De éstos, veinticuatro mil para dirigir la 

obra de la Casa de YHVH, y seis mil para 

gobernadores y jueces.

5

 Cuatro mil eran porteros, y cuatro mil 

alababan a YHVH, con los instrumentos 

que yo he hecho, dijo David,° para tribu-

tar alabanzas.

6

 Y los repartió David en grupos conforme 

a los hijos de Leví: Gersón, Coat y Merari.

7

 Los hijos de Gersón: Laadán y Simei.

8

 Los hijos de Laadán, tres: Jehiel el pri-

mero, después Zetam y Joel.

9

 Los hijos de Simei, tres: Selomit, Haziel 

y Harán. Éstos fueron los jefes de las fa-

milias de Laadán.

10

 Y los hijos de Simei: Jahat, Zina, Jeús 

y Bería. Estos cuatro fueron los hijos de 

Simei.

11

 Jahat era el primero, y Zina el segun-

do; pero Jeús y Bería no tuvieron muchos 

hijos, por lo cual fueron contados como 

una sola familia.

12

 Los hijos de Coat: Amram, Izhar, He-

brón y Uziel, ellos cuatro.

13

 Los hijos de Amram: Aarón y Moisés. 

Y Aarón fue apartado para ser dedicado a 

las cosas más santas, él y sus hijos para 

siempre, para quemar incienso delante de 

YHVH,  para  ministrarle  y  para  bendecir 

en su Nombre para siempre.

14

 Y  los  hijos  de  Moisés  varón  de  Dios 

fueron contados en la tribu de Leví.

15

 Los hijos de Moisés: Gersón y Eliezer.

16

 Hijo de Gersón fue Sebuel, el jefe.

17

 Hijo de Eliezer fue Rehabías el primero. 

Y Eliezer no tuvo otros hijos, pero los hijos 

de Rehabías se multiplicaron grandemente.

18

 Hijo de Izhar fue Selomit, el primero.

19

 Hijos  de  Hebrón:  Jerías  el  primero, 

Amarías el segundo, Jahaziel el tercero, y 

Jecamán el cuarto.

22.9 Heb. Shlomoh = pacífico.  22.9 Heb. shalom = paz.  23.5 .dijo David.


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1 Crónicas 23:20

438

20

 Hijos  de  Uziel:  Micaía  el  primero,  e 

Isías el segundo.

21

 Hijos de Merari: Mahli y Musi. Hijos de 

Mahli: Eleazar y Cis.

22

 Y Eleazar murió y no tuvo hijos, sino 

sólo  hijas,  de  modo  que  sus  parientes, 

los  hijos  de  Cis,  las  tomaron  por  mu-

jeres.

23

 Los hijos de Musi fueron tres: Mahli, 

Edar y Jeremot.

24

 Éstos son los hijos de Leví en las fami-

lias de sus padres, jefes de familias según 

el censo de ellos, contados por sus nom-

bres, por sus cabezas, de veinte años arri-

ba, los cuales trabajaban en el ministerio 

de la Casa de YHVH.

25

 Porque  David  había  dicho:  YHVH, 

Dios de Israel, ha dado paz a su pueblo 

Israel,  y  Él  habitará  en  Jerusalem  para 

siempre.

26

 Además,  los  levitas  no  tendrán  que 

cargar  más  el  Tabernáculo  y  todos  los 

utensilios para su ministerio.

27

 Así que, conforme a las postreras pa-

labras de David, los hijos de Leví fueron 

contados de veinte años arriba.

28

 Y estaban bajo las órdenes de los hi-

jos de Aarón para ministrar en la Casa de 

YHVH, en los atrios, en las cámaras, y en 

la  purificación  de  toda  cosa  consagrada 

y demás obras del ministerio de la Casa 

de Dios.

29

 Asimismo para los panes de la propo-

sición, para la flor de harina para el sacri-

ficio, para las hojuelas sin levadura, para 

lo preparado en sartén, para lo tostado, y 

para toda medida y cuenta,

30

 y  para  asistir  cada  mañana  todos  los 

días  a  dar  gracias  y  tributar  alabanzas  a 

YHVH, y asimismo por la tarde,

31

 y para ofrecer todos los holocaustos a 

YHVH  todos  los  días  de  reposo,°  las  lu-

nas nuevas y las solemnidades señaladas, 

según el número fijado por la ordenanza 

que las prescribe, continuamente delante 

de YHVH,

32

 y para que tuvieran la custodia del Ta-

bernáculo  de  Reunión  y  la  custodia  del 

Santuario, bajo las órdenes de los hijos de 

Aarón, sus hermanos, en el ministerio de 

la Casa de YHVH.

Organización de los sacerdotes

24

Estas fueron las clases de los des-

cendientes  de  Aarón:  Los  hijos  de 

Aarón: Nadab, Abiú, Eleazar e Itamar.

2

 Pero como Nadab y Abiú murieron antes 

que su padre, y no tuvieron hijos, Eleazar 

e Itamar ejercieron el sacerdocio.

3

 Y David, juntamente con Sadoc (de los 

hijos de Eleazar) y Ahimelec (de los hijos 

de Itamar), los repartió por sus turnos en 

el ministerio.

4

 Pero como de los hijos de Eleazar había 

más varones principales que de los hijos 

de Itamar, los repartieron así: De los hi-

jos de Eleazar, dieciséis cabezas de casas 

paternas, y de los hijos de Itamar, por sus 

casas paternas, ocho.

5

 Así  fueron  repartidos  por  sorteo  los 

unos y los otros, porque tanto de los hijos 

de  Eleazar  como  de  los  hijos  de  Itamar 

hubo príncipes del Santuario y príncipes 

de Dios.°

6

 Y  el  escriba  Semaías  ben  Natanael,  de 

los levitas, escribió sus nombres en pre-

sencia del rey y de los príncipes, y delante 

de  Sadoc  el  sacerdote,  de  Ahimelec  ben 

Abiatar y de los jefes de las casas paternas 

de  los  sacerdotes  y  levitas,  designando 

por sorteo una casa paterna para Eleazar 

y otra para Itamar.

7

 La primera suerte tocó a Joiarib, la se-

gunda a Jedaías,

8

 la tercera a Harim, la cuarta a Seorim,

9

 la quinta a Malquías, la sexta a Mijamín,

10

 la séptima a Cos, la octava a Abías,°

11

 la  novena  a  Jesúa,  la  décima  a  Seca-

nías,

12

 la undécima a Eliasib, la duodécima a 

Jaquim,

13

 la  decimotercera  a  Hupa,  la  decimo-

cuarta a Jesebeab,

14

 la decimoquinta a Bilga, la decimosex-

ta a Imer,

15

 la decimoséptima a Hezir, la decimoc-

tava a Afses,

16

 la decimonovena a Petaías, la vigésima 

a Hezequiel,

17

 la vigésimoprimera a Jaquín, la vigési-

mosegunda a Gamul,

18

 la vigésimotercera a Delaía, la vigési-

mocuarta a Maazías.

23.31 Heb. shabbatot.   24.5 Es decir, príncipes de la Casa de Dios.  24.10 

→Lc.1.5.


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1 Crónicas 25:20

439

19

 Éstos fueron distribuidos para su mi-

nisterio, para que entraran en la Casa de 

YHVH, según les fue ordenado por Aarón 

su padre, de la manera que le había man-

dado YHVH, el Dios de Israel.

20

 Y  para  el  resto  de  los  hijos  de  Leví: 

Subael,  de  los  hijos  de  Amram;  y  de  los 

hijos de Subael, Jehedías.

21

 Y de los hijos de Rehabías, Isías el pri-

mero.

22

 De los izharitas: Selomot; de los hijos 

de Selomot: Jahat.

23

 De los hijos de Hebrón:° Jerías el pri-

mero, Amarías el segundo, Jahaziel el ter-

cero, Jecamán el cuarto.

24

 De los hijo de Uziel, Micaía; de los hi-

jos de Micaía, Samir.

25

 El hermano de Micaía, Isías; de los hi-

jos de Isías, Zacarías.

26

 De los hijos de Merari: Mahli y Musi; 

de los hijos de Jaazías, Beno.

27

 Los hijos de Merari por Jaazías: Beno, 

Soham, Zacur e Ibri.

28

 Por Mahli, Eleazar, quien no tuvo hijos.

29

 Por Cis: de los hijos de Cis, Jerameel.

30

 Y los hijos de Musi: Mahli, Edar y Jeri-

mot. Éstos fueron los hijos de los levitas 

conforme a sus casas paternas.

31

 Éstos también echaron suertes, como 

sus  hermanos,  los  hijos  de  Aarón,  en 

presencia del rey David, y de Sadoc y de 

Ahimelec, y de los cabezas de las casas pa-

ternas, así de los sacerdotes como de los 

levitas; las casas paternas de los principa-

les,  lo  mismo  que  el  menor  de  sus  her-

manos.

Organización de los cantores

25

Asimismo David y los jefes del ejér-

cito apartaron para el ministerio a 

algunos de los hijos de Asaf, de Hemán y 

de Jedutún, quienes cantaban salmos pro-

féticos al son de arpas, salterios y címba-

los; y el número de los hombres idóneos 

para la obra de su ministerio, fue:

2

 De los hijos de Asaf: Zacur, José, Neta-

nías  y  Asarela,  hijos  de  Asaf,  a  cargo  de 

Asaf,  quien  cantaba  salmos  proféticos  al 

lado del rey.

3

 De  Jedutún,  los  hijos  de  Jedutún:  Ge-

dalías,  Zeri,  Jesaías,  Asabais  y  Matatías: 

seis,°  bajo  la  dirección  de  su  padre  Je-

dutún,  el  cual  también  cantaba  salmos 

proféticos al son del arpa para aclamar y 

alabar a YHVH.

4

 De  Hemán,  los  hijos  de  Hemán:  Bu-

quías,  Matanías,  Uziel,  Sebuel,  Jeremot, 

Hananías,  Hanani,  Eliata,  Gidalti,  Ro-

manti-ezer,  Josbecasa,  Maloti,  Hotir  y 

Mahaziot.

5

 Todos éstos eran los hijos de Hemán, vi-

dente del rey, y tenían palabras de Dios para 

exaltar  su  poder,  pues  Ha-’Elohim  había 

dado a Hemán catorce hijos y tres hijas.

6

 Todos ellos estaban bajo la dirección de 

su padre, en el canto de la Casa de YHVH, 

con acompañamiento de címbalos, salte-

rios  y  arpas,  para  el  ministerio  del  San-

tuario de Dios; y bajo la dirección del rey 

estaban Asaf, Jedutún y Hemán.

7

 El  número  de  ellos,  juntamente  con 

sus  hermanos  ejercitados  en  el  canto  a 

YHVH, todos los que eran hábiles, era de 

doscientos ochenta y ocho.

8

 Y  echaron  suertes  para  servir  por  tur-

nos, entrando el pequeño con el grande, 

lo mismo el maestro que el discípulo.

9

 La  primera  suerte  salió  por  Asaf  para 

José, la segunda para Gedalías, quien con 

sus hermanos e hijos fueron doce;

10

 la tercera para Zacur, con sus hijos y 

sus hermanos: doce;

11

 la cuarta para Izri, con sus hijos y sus 

hermanos: doce;

12

 la quinta para Netanías, con sus hijos y 

sus hermanos: doce;

13

 la sexta para Buquías, con sus hijos y 

sus hermanos: doce;

14

 la séptima para Jesarela, con sus hijos 

y sus hermanos: doce;

15

 la octava para Jesahías, con sus hijos y 

sus hermanos: doce;

16

 la novena para Matanías, con sus hijos 

y sus hermanos: doce;

17

 la décima para Simei, con sus hijos y 

sus hermanos: doce;

18

 la undécima para Azareel, con sus hi-

jos y sus hermanos: doce;

19

 la  duodécima  para  Hasabías,  con  sus 

hijos y sus hermanos: doce;

20

 la decimotercera para Subael, con sus 

hijos y sus hermanos: doce;

24.23 .Hebrón.  25.3 Simei, secto hijo de Jedutún

→v.17, no está registrado aquí.


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1 Crónicas 25:21

440

21

 la decimocuarta para Matatías, con sus 

hijos y sus hermanos: doce;

22

 la decimoquinta para Jeremot, con sus 

hijos y sus hermanos: doce;

23

 la decimosexta para Hananías, con sus 

hijos y sus hermanos: doce;

24

 la decimoséptima para Josbecasa, con 

sus hijos y sus hermanos: doce;

25

 la  decimoctava  para  Hanani,  con  sus 

hijos y sus hermanos: doce;

26

 la decimonovena para Maloti, con sus 

hijos y sus hermanos: doce;

27

 la vigésima para Eliata, con sus hijos y 

sus hermanos: doce;

28

 la vigesimoprimera para Hotir, con sus 

hijos y sus hermanos: doce;

29

 la  vigesimosegunda  para  Gidalti,  con 

sus hijos y sus hermanos: doce;

30

 la vigesimotercera para Mahaziot, con 

sus hijos y sus hermanos: doce;

31

 la  vigesimocuarta  para  Romanti-ezer, 

con sus hijos y sus hermanos: doce.

Organización de los porteros

26

La distribución de los porteros fue 

así: de los coreítas, Meselemías ben 

Coré, de los hijos de Asaf.

2

 Y Meselemías tuvo hijos: Zacarías el pri-

mogénito, Jediael el segundo, Zebadías el 

tercero, Jatniel el cuarto,

3

 Elam el quinto, Johanán el sexto, Elio-

enai el séptimo.

4

 También  Obed-edom  tuvo  hijos:  Se-

maías el primogénito, Jozabad el segundo, 

Joa el tercero, Sacar el cuarto, Natanael el 

quinto;

5

 Amiel el sexto, Isacar el séptimo y Peul-

tai  el  octavo;  porque  ’Elohim  lo  había 

bendecido.

6

 También a su hijo Semaías le nacieron hi-

jos que gobernaron la casa de su padre; por-

que eran varones valerosos y esforzados.

7

 Los hijos de Semaías: Otni, Rafael, Obed, 

Elzabad, y sus hermanos, hombres esfor-

zados; asimismo Eliú y Samaquías.

8

 Todos éstos de los hijos de Obed-edom; 

ellos con sus hijos y sus hermanos, hom-

bres  robustos  y  fuertes  para  el  servicio: 

sesenta y dos, de Obed-edom.

9

 Y los hijos de Meselemías y sus herma-

nos: dieciocho hombres de valor.

10

 También Hosa, uno los hijos de Merari, 

tuvo hijos: Simri el jefe (aunque no era el 

primogénito, su padre lo puso por cabeza),

11

 Hilcías el segundo, Tebalías el tercero, 

Zacarías el cuarto; todos los hijos de Hosa 

y sus hermanos fueron trece.

12

 Entre éstos se hizo la distribución de 

los porteros, alternando los principales de 

los varones en la guardia con sus herma-

nos, para ministrar en la Casa de YHVH.

13

 Y echaron suertes para cada puerta: el 

pequeño  con  el  grande,  según  sus  casas 

paternas.

14

 Y la suerte para la oriental cayó a Sele-

mías. Y metieron en las suertes a Zacarías 

su hijo, consejero entendido; y la suerte 

suya salió para la del norte.

15

 Y para Obed-edom la puerta del sur, y a 

sus hijos los almacenes de la Casa.

16

 Para  Supim  y  Hosa,  la  del  occidente, 

junto  a  la  puerta  de  Salequet,  en  el  ca-

mino de subida. Guardia con guardia se 

correspondían:

17

 Al oriente seis levitas, al norte cuatro 

de día, al sur cuatro de día, y en los alma-

cenes de dos en dos.

18

 En el atrio, al occidente: cuatro en el 

camino, y dos en el atrio mismo.

19

 Tales son las distribuciones de los por-

teros de los hijos de Coré y de los hijos de 

Merari.

20

 Y los parientes levitas° tenían a su car-

go los tesoros de la Casa de Dios y los te-

soros de las cosas consagradas.

21

 Los hijos de Laadán, hijos de los ger-

sonitas de Laadán, es decir, los jehielitas, 

eran los cabezas de las casas paternas de 

Laadán gersonita.

22

 Los  hijos  de  Jehieli,  Zetam  y  Joel  su 

hermano, estaban a cargo de los tesoros 

de la Casa de YHVH.

23

 De entre los amramitas, de los izhari-

tas, de los hebronitas y de los uzielitas,

24

 Sebuel hijo de Gersón, hijo de Moisés, 

era jefe sobre los tesoros.

25

 En cuanto a su hermano Eliezer, hijo 

de éste era Rehabías, hijo de éste Jesaías, 

hijo de éste Joram, hijo de éste Zicri, del 

que fue hijo Selomit.

26

 Este Selomit y sus hermanos estaban 

a cargo de todos los tesoros de todas las 

26.20 NAhías. Texto de lectura insegura y discutida. 


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1 Crónicas 27:20

441

cosas sagradas, que el rey David y los jefes 

de las casas paternas, junto con los capi-

tanes de millares y de centenas y jefes del 

ejército,

27

 habían consagrado de las guerras y del 

botín  para  el  mantenimiento  de  la  Casa 

de YHVH.

28

 Y todo lo que había consagrado el vi-

dente  Samuel,  y  Saúl  ben  Cis,  y  Abner 

ben Ner, y Joab hijo de Sarvia, y todo lo 

que cualquiera consagraba, estaba a car-

go de Selomit y sus hermanos.

29

 En cuanto a los izharitas, Quenanías y 

sus hijos fueron asignados para los asun-

tos exteriores de Israel como gobernado-

res y jueces.

30

 En  cuanto  a  los  hebronitas,  Hasabías 

y sus hermanos, mil setecientos hombres 

de valor, estaban a cargo de los negocios 

de Israel al occidente del Jordán, de toda 

la obra de YHVH, y del servicio del rey.

31

 De los hebronitas, Jerías era jefe (estos 

hebronitas fueron investigados en sus ge-

nealogías por sus casas paternas en el año 

cuarenta  del  reinado  de  David,  y  fueron 

hallados entre ellos hombres esforzados y 

valerosos en Jazer de Galaad),

32

 y  sus  hermanos,  hombres  de  valor, 

eran  dos  mil  setecientos  en  número, 

jefes de familias, los cuales el rey David 

constituyó  sobre  los  rubenitas,  los  ga-

ditas y la media tribu de Manasés, para 

todas las cosas de Dios, y en todo asunto 

del rey.

Oficiales del ejército

27

Y éstos son los hijos de Israel, se-

gún el número de ellos, cabezas de 

familias, jefes de millares y centenas, con 

sus  oficiales  que  servían  al  rey  en  todo 

asunto  de  las  divisiones,  los  cuales  en-

traban y salían cada mes durante todo el 

año: veinticuatro mil en cada división.

2

 Sobre  la  primera  división  del  primer 

mes estaba Jasobeam ben Zabdiel: veinti-

cuatro mil en su división.

3

 Él  era  de  los  hijos  de  Fares,  y  fue  jefe 

de todos los capitanes del ejército para el 

primer mes.

4

 Sobre  la  división  para  el  segundo  mes 

estaba  Dodai  ahohíta.  Miclot  era  el  jefe 

principal en esta división, en la que tam-

bién había veinticuatro mil.

5

 El jefe de la tercera división para el ter-

cer mes era Benaía, hijo del sumo sacer-

dote  Joiada,  y  su  división:  veinticuatro 

mil.

6

 Este es aquel Benaía que fue héroe entre 

los treinta, y que estaba sobre los treinta, 

y en su división estaba Amisabad su hijo.

7

 El cuarto para el cuarto mes era Asael, 

hermano de Joab, y después de él Zeba-

días su hijo, y en su división: veinticuatro 

mil.

8

 El quinto para el quinto mes era el jefe 

Samhut  izraíta,  y  en  su  división:  veinti-

cuatro mil.

9

 El  sexto  para  el  sexto  mes  era  Ira  ben 

Iques, de Tecoa, y en su división: veinti-

cuatro mil.

10

 El  séptimo  para  el  séptimo  mes  era 

Heles pelonita, de los hijos de Efraín, y en 

su división: veinticuatro mil.

11

 El octavo para el octavo mes era Sibe-

cai husatita, de los zeraítas, y en su divi-

sión: veinticuatro mil.

12

 El  noveno  para  el  noveno  mes  era 

Abiezer anatotita, de los benjamitas, y en 

su división: veinticuatro mil.

13

 El décimo para el décimo mes era Ma-

harai  netofatita,  de  los  zeraítas,  y  en  su 

división: veinticuatro mil.

14

 El undécimo para el undécimo mes era 

Benaía piratonita, de los hijos de Efraín, y 

en su división: veinticuatro mil.

15

 El duodécimo para el duodécimo mes 

era Heldai netofatita, de Otoniel, y en su 

división: veinticuatro mil.

16

 Asimismo sobre las tribus de Israel: el 

caudillo de los rubenitas era Eliezer ben 

Zicri; de los simeonitas, Sefatías ben Ma-

aca.

17

 De  los  levitas,  Hasabías  ben  Kemuel; 

de los de Aarón, Sadoc.

18

 De Judá, Elihú,° uno de los hermanos 

de David; de los de Isacar, Omri ben Mi-

cael.

19

 De los de Zabulón, Ismaías ben Abdías; 

de los de Neftalí, Jerimot ben Azriel.

20

 De los hijos de Efraín, Oseas ben Aza-

zías;  de  la  media  tribu  de  Manasés,  Joel 

ben Pedaías.

27.18 Esto es, Eliab


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1 Crónicas 27:21

442

21

 De la otra media tribu de Manasés, en 

Galaad, Iddo ben Zacarías; de los de Ben-

jamín, Jaasiel ben Abner.

22

 Y de Dan, Azareel ben Jeroham. Tales 

eran los príncipes de las tribus de Israel.

23

 Pero  no  tomó  David  el  censo  de  los 

que eran de veinte años abajo, por cuan-

to  YHVH  había  dicho  que  él  multipli-

caría  a  Israel  como  las  estrellas  de  los 

cielos.

24

 Joab, hijo de Sarvia, había empezado a 

contar, pero no acabó, pues por eso hubo 

una explosión de ira contra Israel, y así el 

número  no  fue  puesto  en  el  registro  de 

las crónicas del rey David.

25

 Azmavet  ben  Adiel  estaba  a  cargo  de 

los tesoros del rey, y Jonatán ben Uzías, 

de los almacenes en el campo y en las ciu-

dades, aldeas y torres.

26

 Ezri ben Quelub, de los que trabajaban 

en la labranza de las tierras;

27

 Simei  ramadita,  de  las  viñas;  y  Zabdi 

sifmita, del fruto de las viñas, para las bo-

degas del vino.

28

 De los olivares e higuerales de la Sefe-

la, Baal-hanán gederita; y de los almace-

nes del aceite, Joás.

29

 Del ganado que pastaba en Sarón, Si-

trai saronita; y del ganado que estaba en 

los valles, Safat ben Adlai.

30

 De los camellos, Obil ismaelita; de las 

asnas, Jehedías meronotita,

31

 y de las ovejas, Jaziz agareno. Todos és-

tos  eran  administradores  de  la  hacienda 

particular del rey David.

32

 Jonatán, tío de David, varón prudente, 

era consejero y escriba; y Jehiel ben Hac-

moni estaba° con los hijos del rey.

33

 También Ahitofel era consejero del rey, 

y Husai arquita era el amigo del rey.

34

 Después de Ahitofel seguían Joiada ben 

Benaía, y Abiatar; y Joab era el general del 

ejército del rey.

Instrucciones de David tocante a la Casa

28

David hizo congregar en Jerusalem 

a todos los principales de Israel: los 

jefes de tribus, los jefes de las divisiones 

que servían al rey, los jefes de millares y 

de centenas, los administradores de todo 

el patrimonio y hacienda del rey y de sus 

propios hijos, junto con los oficiales y to-

dos los guerreros valientes.

2

 Y levantándose el rey David, puesto en 

pie, dijo: Oídme hermanos míos y pueblo 

mío: Tenía en mi corazón el edificar una 

Casa en la cual reposara el Arca del Pacto 

de YHVH, y para el estrado de los pies de 

nuestro Dios. Y había ya preparado todo 

para edificarla,

3

 cuando ’Elohim me dijo: No edificarás 

Casa a mi Nombre, porque eres hombre 

de guerras y has derramado sangre.

4

 Pero YHVH, el Dios de Israel, me esco-

gió de entre toda la casa de mi padre para 

ser rey sobre Israel para siempre, porque 

a Judá escogió por caudillo, y de la casa de 

Judá, a la familia de mi padre, y de entre 

los hijos de mi padre se agradó de mí para 

hacerme rey sobre todo Israel.

5

 Y  de  entre  todos  mis  hijos  (porque 

YHVH me ha dado muchos hijos), escogió 

a mi hijo Salomón para que se siente en el 

trono del reino de YHVH sobre Israel.

6

 Y me ha dicho: Salomón tu hijo, él edi-

ficará mi Casa y mis atrios, porque lo he 

escogido por hijo, y Yo le seré por padre;

7

 y si se mantiene firme en cumplir mis 

mandamientos  y  mis  decretos,  como  en 

este día, estableceré su reino para siem-

pre.

8

 Ahora  pues,  ante  los  ojos  de  todo  Is-

rael, congregación de YHVH, y a oídos de 

nuestro  Dios:  Guardad  y  observad  todos 

los preceptos de YHVH vuestro Dios, para 

que  poseáis  la  buena  tierra,  y  la  dejéis 

como heredad a vuestros hijos después de 

vosotros para siempre.

9

 Y  tú  Salomón,  hijo  mío,  reconoce  al 

Dios  de  tu  padre,  y  sírvele  con  corazón 

perfecto y con ánimo voluntario, porque 

YHVH escudriña los corazones de todos, y 

conoce toda intención de los pensamien-

tos. Si lo buscas, será encontrado por ti; si 

lo abandonas, te rechazará para siempre.

10

 Ahora pues, considera que YHVH te ha 

escogido  para  edificar  Casa  para  el  San-

tuario; ¡esfuérzate, y manos a la obra!

11

 Y David dio a su hijo Salomón el plano 

del pórtico, de sus edificios y almacenes, 

de sus aposentos altos, cámaras interiores 

y del lugar del propiciatorio,

27.32 Es decir, estaba como ayo


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1 Crónicas 29:10

443

12

 junto con el diseño de todas las cosas 

que tenía en mente para los atrios de la 

Casa de YHVH, y todas las cámaras alre-

dedor, para los tesoros de la Casa de Dios 

y los tesoros de los objetos sagrados,

13

 y las secciones de los sacerdotes y los 

levitas, para toda la obra del ministerio de 

la Casa de YHVH, y para todos los utensi-

lios del ministerio de la Casa de YHVH.

14

 Y dio en peso oro para lo de oro, para 

todos  los  utensilios  de  cada  servicio,  y 

plata en peso para lo de plata, para todos 

los utensilios de cada servicio.

15

 Oro  en  peso  para  los  candelabros  de 

oro  y  sus  lámparas,  según  el  peso  de 

cada candelabro y sus lámparas; y plata° 

en  peso  para  los  candelabros  de  plata, 

según el peso de cada candelabro y sus 

lámparas,  conforme  al  servicio  de  cada 

candelabro;

16

 también por peso el oro necesario para 

cada una de las mesas de la proposición, y 

plata para las mesas de plata;

17

 y oro acrisolado para los garfios, lebri-

llos  y  copas;  para  los  tazones  de  oro,  el 

peso de oro correspondiente a cada tazón; 

y para los tazones de plata, el peso de pla-

ta correspondiente a cada tazón;

18

 y  para  el  altar  del  incienso,  dio  oro 

acrisolado por peso; y el diseño del carro° 

de los querubines de oro con las alas des-

plegadas  cubriendo  el  Arca  del  Pacto  de 

YHVH.

19

 Todas estas cosas, dijo David, me fue-

ron trazadas por la mano de YHVH, que 

me  hizo  entender  todos  los  detalles  del 

diseño.

20

 Y dijo David a Salomón su hijo: Esfuér-

zate, sé valiente y haz la obra; no temas, 

ni  desmayes,  porque  YHVH  ’Elohim,  mi 

Dios, estará contigo; Él no te dejará ni te 

desamparará hasta que toda la obra para 

el servicio de la Casa de YHVH haya sido 

acabada.

21

 He  aquí  los  grupos  de  los  sacerdotes 

y de los levitas para todo el ministerio de 

la Casa de Dios, estarán contigo en toda 

la obra; asimismo todo voluntario dotado 

de sabiduría para toda forma de servicio, 

y los príncipes, y todo el pueblo, estarán 

enteramente a tus órdenes.

Ofrendas para la Casa

29

Después el rey David dijo a toda la 

congregación: Sólo a mi hijo Salo-

món  ha  escogido  ’Elohim;  él  es  joven  e 

inmaduro,  y  la  obra  es  grande,  porque 

la  Casa  no  es  para  el  hombre  sino  para 

YHVH ’Elohim.

2

 Yo,  con  todas  mis  fuerzas,  he  provisto 

para la Casa de mi Dios, oro para las co-

sas de oro, plata para las cosas de plata, 

bronce para las de bronce, hierro para las 

de hierro, y madera para las de madera; 

y piedras de ónice, piedras preciosas, pie-

dras negras, piedras de diversos colores, y 

toda clase de piedras preciosas, y piedras 

de mármol en abundancia.

3

 Además, en mi amor por la Casa de mi 

Dios, el tesoro propio mío que tengo de 

oro y plata lo he dado a la Casa de mi Dios, 

además de todo lo que ya he provisto para 

la Casa del Santuario:

4

 tres mil talentos° de oro, del oro de Ofir, 

y siete mil talentos de plata refinada para 

cubrir las paredes de los edificios;

5

 oro, pues, para las cosas de oro, y plata 

para las cosas de plata, y para toda la obra 

de las manos de los artífices. ¿Y quién está 

dispuesto hoy a consagrar ofrenda volun-

taria para YHVH?

6

 Entonces  los  jefes  de  familia,  y  los 

príncipes de las tribus de Israel, jefes de 

millares y de centenas, con los adminis-

tradores de la hacienda del rey, ofrecieron 

voluntariamente,

7

 y  dieron  para  el  servicio  de  la  Casa  de 

Dios  cinco  mil  talentos  y  diez  mil  drac-

mas  de  oro,  diez  mil  talentos  de  plata, 

dieciocho mil talentos de bronce y cinco 

mil talentos de hierro.

8

 Y todo el que tenía piedras preciosas las 

dio para el tesoro de la Casa de YHVH, en 

mano de Jehiel gersonita.

9

 Y  el  pueblo  se  alegró  por  haber  con-

tribuido  voluntariamente,  porque  de 

todo corazón habían hecho su ofrenda a 

YHVH; y también el rey David se alegró 

en gran manera.

10

 Y  bendijo  David  a  YHVH  delante  de 

toda la congregación, y dijo David: ¡Ben-

dito Tú, oh YHVH, Dios de nuestro padre 

Israel, por los siglos de los siglos!

28.15 .plata.  28.18 Esto es, a manera o forma de carro.  29.4 1 talento = 34 kg. 


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1 Crónicas 29:11

444

11

 ¡Tuya,  oh  YHVH,  es  la  grandeza  y  el 

poder, y la gloria, y la victoria y el honor; 

porque todo cuanto existe en los cielos y 

en la tierra tuyo es! ¡Tuyo, oh YHVH, es el 

reino, que se eleva por cabeza de todo!

12

 De ti procede la riqueza y la honra, y 

Tú lo gobiernas todo, y en tu mano está el 

poder y la fortaleza, y en tu mano está el 

hacer grande y el dar poder a todos.

13

 Ahora pues, oh Dios nuestro, nosotros 

alabamos y loamos tu glorioso Nombre.

14

 Porque ¿quién soy yo, y quién es mi pue-

blo, para que podamos ofrecer voluntaria-

mente semejantes cosas? Pues todo es tuyo, 

y de lo recibido de tu mano te damos.

15

 Porque  extranjeros  somos  delante  de 

ti,  y  transeúntes,  lo  mismo  que  todos 

nuestros  padres;  nuestros  días  sobre  la 

tierra son como una sombra, y no hay es-

peranza.

16

 Oh  YHVH,  Dios  nuestro,  todo  este 

grande acopio que hemos preparado para 

edificar una Casa a tu santo Nombre, pro-

viene de tu mano, porque todo es tuyo.

17

 Yo sé, Dios mío, que Tú escudriñas los 

corazones, y te complaces en la rectitud; 

por eso yo, con rectitud de mi corazón te 

he  ofrecido  voluntariamente  todo  esto, 

y ahora veo con regocijo que tu pueblo, 

ahora aquí reunido, ha ofrendado para ti 

espontáneamente.

18

 Oh YHVH, Dios de nuestros padres, de 

Abraham, de Isaac y de Israel, conserva per-

petuamente esta voluntad del corazón de tu 

pueblo, y encamina su corazón hacia ti.

19

 Da  también  a  mi  hijo  Salomón  un 

corazón  perfecto,  para  que  guarde  tus 

mandamientos, tus testimonios y tus es-

tatutos, y para que haga todas las cosas, y 

te edifique la Casa para la cual yo he he-

cho preparativos.

20

 Después  dijo  David  a  toda  la  congre-

gación: ¡Bendecid ahora a YHVH vuestro 

Dios!  Y  toda  la  congregación  bendijo  a 

YHVH, Dios de sus padres, e inclinándo-

se, se postraron delante de YHVH y delan-

te del rey.

21

 Y  sacrificaron  víctimas  a  YHVH,  y  al 

día  siguiente  ofrecieron  a  YHVH  holo-

caustos de mil becerros, mil carneros, mil 

corderos con sus libaciones, y muchos sa-

crificios de parte de todo Israel.

22

 Y  comieron  y  bebieron  delante  de 

YHVH en aquel día con gran regocijo, y 

dieron por segunda vez la investidura del 

reino a Salomón ben David, y ante YHVH 

lo  ungieron  por  príncipe,  y  a  Sadoc  por 

sumo sacerdote.

23

 Y  se  sentó  Salomón  como  rey  en  el 

trono de YHVH en lugar de David su pa-

dre, y fue prosperado, y le obedeció todo 

Israel.

24

 Y  todos  los  príncipes  y  poderosos,  y 

todos  los  hijos  del  rey  David,  rindieron 

homenaje al rey Salomón.

25

 Y  YHVH  engrandeció  en  extremo  a 

Salomón  a  los  ojos  de  todo  Israel,  y  le 

confirió  una  majestad  real  como  no  la 

tuvo nunca rey alguno en Israel.

26

 David  ben  Isaí  reinó  pues  sobre  todo 

Israel.

27

 El  tiempo  que  reinó  sobre  Israel  fue 

cuarenta  años:  siete  años  reinó  en  He-

brón, y treinta y tres reinó en Jerusalem.

28

 Y murió en buena vejez, lleno de días, 

riquezas  y  honores,  y  Salomón  su  hijo 

reinó en su lugar.

29

 Los  hechos  del  rey  David,  primeros 

y postreros, he aquí están escritos en el 

rollo de las crónicas del vidente Samuel, 

en las crónicas del profeta Natán, y en las 

crónicas del vidente Gad,

30

 con todo lo referente° a su reinado y 

su poder, y los acontecimientos que vinie-

ron sobre él y sobre Israel, y sobre todos 

los reinos de aquellas tierras.

29.30 .referente


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1

Salomón ben David se consolidó en su 

reino, pues YHVH su Dios estaba con 

él, y lo engrandeció sobremanera.

2

 Y habló Salomón a todo Israel: a los ca-

pitanes de millares y de centenas, y a los 

jueces, y a todos los príncipes de todo Is-

rael, cabezas de las casas paternas.

3

 Y Salomón, y toda la congregación con 

él, fueron al lugar alto que había en Ga-

baón,  pues  allí  estaba  el  Tabernáculo  de 

Reunión  de  Dios,  que  Moisés,  siervo  de 

YHVH, había hecho en el desierto.

4

 Pero  David  había  hecho  subir  el  Arca 

de Dios desde Quiriat-jearim al lugar que 

David  le  había  preparado,  pues  le  había 

extendido una tienda en Jerusalem.

5

 Y el altar de bronce que había hecho Beza-

leel ben Uri, hijo de Hur, estaba allí delante 

del Tabernáculo de YHVH, y Salomón y la 

congregación fueron a consultar ante él.

6

 Subió  pues  Salomón  allá,  delante  de 

YHVH, al altar de bronce que estaba junto 

a la Tienda de Reunión,° y ofreció sobre él 

mil holocaustos.°

7

 Aquella  noche  ’Elohim  se  apareció  a 

Salomón y le dijo: Pide lo que quieras que 

Yo te dé.

8

 Y Salomón respondió a ’Elohim: Tú has 

mostrado gran benevolencia para con mi 

padre David, y has hecho que reine en su 

lugar.

9

 Ahora, oh YHVH ’Elohim, sea confirma-

da tu palabra que diste a David mi padre,° 

pues Tú has hecho que reine sobre un pue-

blo numeroso como el polvo de la tierra.

10

 Dame pues sabiduría y conocimiento, 

para que pueda salir y entrar delante de 

este pueblo, porque, ¿quién será capaz de 

juzgar a éste, tu pueblo tan grande?

11

 Y  ’Elohim  respondió  a  Salomón:  Por 

cuanto esto está en tu corazón, y no has 

pedido riquezas ni honores, ni la vida de 

los que te aborrecen, ni siquiera has pedi-

do larga vida, sino que has pedido ciencia 

y sabiduría para ti, para juzgar a mi pue-

blo sobre el cual te he hecho reinar,

12

 ciencia y sabiduría te son concedidas,° 

y además te daré riquezas y honores, tales 

como ningún rey los ha tenido hasta aho-

ra, ni los tendrá después de ti.

13

 Y Salomón salió del lugar alto de Ga-

baón, de estar ante la Tienda de Reunión, 

a Jerusalem, y reinó sobre Israel.

14

 Y reunió Salomón carros de guerra y 

jinetes,  y  tuvo  mil  cuatrocientos  carros 

de guerra y doce mil jinetes, que situó en 

las ciudades de los carros, y en Jerusalem, 

cerca del rey.

15

 Y el rey hizo que la plata y el oro fue-

ran en Jerusalem como las piedras, y los 

cedros como los sicómoros de la Sefelá,° 

por su abundancia.

16

 Los caballos de Salomón provenían de 

Egipto y de Cilicia,° donde los mercade-

res del rey los compraban por precio.°

17

 Traían de Egipto un carro por seiscien-

tas piezas de plata, y un caballo por ciento 

Reinado de Salomón

1.6 Lit. al altar de bronce delante de YHVH, que estaba en la Tienda de Reunión.  1.6 El hecho de que Salomón acudiera a 

Gabaón, se debe a que el altar de bronce era el objeto legalmente establecido para ofrecer holocaustos a Dios. Desde el punto 

de vista del cronista, es una muestra más de la sumisión del rey Salomón a la Ley divina (sobre todo teniendo en cuenta que el 

Arca del Pacto ya estaba en Jerusalem, y que David ya había edificado un altar en la era de Arauna el jebuseo). 

1.9 LXX registra 

que tu nombre sea establecido sobre mi padre David

1.12 LXX registra te doy.  1.15 Planicie costera de Israel.  1.16 Lit. Coa

1.16 Es decir, al contado, no por trueque


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2 Crónicas 2:1

446

cincuenta. Por medio de ellos también los 

adquirían todos los reyes de los hititas y 

los reyes de Siria.

Preparativos para la Casa de Dios

2

Y  Salomón  se  propuso  edificar  una 

Casa para el nombre de YHVH, y una 

casa real para sí.

2

 Y  Salomón  designó°  setenta  mil  hom-

bres  cargadores  y  ochenta  mil  hombres 

para labrar en los montes, y tres mil seis-

cientos° para dirigirlos.

3

 Y Salomón envió a decir a Huram° rey 

de  Tiro:  Haz  conmigo  como  hiciste  con 

mi  padre  David,  enviándole  cedros  para 

edificarle una casa para habitar.

4

 He aquí yo° voy a edificar una Casa para 

el nombre de YHVH mi Dios, para consa-

grarla a Él, y quemar ante Él incienso de 

especias,° para la hilera de continuidad,° 

y para los holocaustos de la mañana y de 

la tarde, y para los holocaustos de los días 

de reposo,° y de las lunas nuevas, y de las 

solemnidades señaladas de YHVH nuestro 

Dios; lo cual ha de ser perpetuo en Israel.

5

 Y la Casa que voy a edificar es grande, 

pues nuestro Dios es más grande que to-

dos los dioses.

6

 Pero  ¿quién  será  capaz  de  edificarle 

Casa, cuando los cielos, y los cielos de los 

cielos no lo pueden contener?° Y, ¿quién 

soy yo para que le edifique una Casa, sino 

tan sólo para quemar incienso ante Él?

7

 Ahora  pues,  envíame  un  perito°  para 

trabajar el oro, la plata, el bronce, el hie-

rro,  la  púrpura,  el  carmesí,  y  el  azul;° 

experto en hacer grabados, para trabajar 

con  los  maestros  que  están  conmigo  en 

Judá y en Jerusalem, los cuales contrató 

mi padre David.

8

 Envíame  asimismo  cedros,  y  cipre-

ses,° y sándalos° del Líbano. He aquí mis 

siervos irán con tus siervos, porque yo sé 

que tus siervos saben talar los árboles del 

Líbano,

9

 a fin de preparar madera en abundancia, 

porque la Casa que tengo que edificar ha 

de ser grandemente portentosa.

10

 He  aquí,  para  los  taladores,  para  los 

que  corten  los  árboles,  entregaré  veinte 

mil coros° de trigo molido,° y veinte mil 

coros  de  cebada,  y  veinte  mil  batos°  de 

vino, y veinte mil batos de aceite.

11

 Y respondió Huram rey de Tiro en una 

carta  que  envió  a  Salomón:  A  causa  del 

amor de YHVH por su pueblo, te ha hecho 

rey.

12

 Y añadió Huram:° ¡Bendito sea YHVH, 

Dios de Israel, que hizo los cielos y la tie-

rra, que ha dado al rey David un hijo sabio, 

dotado  de  discreción  y  entendimiento,° 

que ha de construir una Casa para YHVH, 

y una casa para su reino!

13

 Yo, pues, te envío a Huram-abí,° hom-

bre hábil y entendido,

14

 hijo de una mujer de las hijas de Dan, 

cuyo padre es un hombre de Tiro. Él sabe 

trabajar el oro, la plata, el bronce, el hie-

rro,  la  piedra,  la  madera,  la  púrpura,  el 

azul,  el  lino  fino  y  el  carmesí,  y  puede 

cincelar todo tipo de grabados,° y ejecutar 

cualquier proyecto que le sea encomenda-

do, quien se podrá poner entre tus peritos 

y los peritos de mi señor David, tu padre.

15

 En cuanto al trigo, la cebada, el aceite 

y el vino de los cuales mi señor ha habla-

do, entréguelos a sus siervos,

16

 y  nosotros  mismos  talaremos  árboles 

del Líbano, de acuerdo a todas tus nece-

sidades, y te los llevaremos en balsas por 

mar a Jope, y tú los harás subir a Jerusa-

lem.

17

 Y contó Salomón todos los extranjeros 

que había en la tierra de Israel, conforme 

2.2 Lit. contó.  2.2 

→1 R.5.16 tres mil trescientos.  2.3 Aunque tanto Hiram como Huram son lecturas variantes del mismo nom-

bre fenicio, los masoretas prefirieron la variante Huram, de tal manera que incluso en los vv. en que aparece Hiram 

→2 S.5.11; 

1 Cr.14.1; 2 Cr.4.11, etc., propusieron la lectura Huram

2.4 LXX añade su hijo.  2.4 Este término, que aparece siempre en plural y 

acompañando a la palabra incienso, alude a algún tipo de especia difícil de identificar. 

2.4 Esto es, las doce tortas de harina que los 

sacerdotes debían cocer y colocar cada shabbat sobre la mesa de los panes de la proposición (lit. los panes de la presencia). A este 

pan se le llamó hilera de continuidad porque debía ser dispuesto en dos hileras de seis tortas cada una y debía estar continuamente 

en su lugar. 

→Ex.25.23-30 y Lv.24.5-7.  2.4 Heb. shabbatot.  2.6 Es decir, no pueden contener su gloria.  2.7 LXX añade entendido.  

2.7 Los términos azul y púrpura son las traducciones convencionales de dos palabras hebreas que pueden referirse a una gama  

de colores que van desde el rojo brillante hasta el violeta intenso. 

2.8 Nabeto o pino.  2.8 Prob. familia del sándalo.  2.10 Esto 

es, unos 220 dm. 

2.10 LXX registra veinte mil coros de trigo como regalo.  2.10 Esto es, unos 22 litros (una décima parte de 

cor). 

2.12 

→2.3 nota.  2.12 Lit. que conoce inteligencia y entendimiento.  2.13 LXX registra a Hiram, que pertenecía a mi padre 

(otros textos de la LXX: a Hiram, mi hijo), mientras que la versión latina antigua registra a Hiram, mi hermano, y la Sir. omite 

Huram-abiHuram 

→2.3 nota.  2.14 Lit. grabar todos los grabados


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2 Crónicas 4:4

447

al censo que había hecho David su padre, 

y  se  halló  que  había  ciento  cincuenta  y 

tres mil seiscientos de ellos.

18

 Y  designó  a  setenta  mil  de  ellos  para 

portar cargas, y a ochenta mil para tallar 

piedras en los montes, y a tres mil seis-

cientos° capataces para dirigir la labor de 

la gente.

Construcción de la Casa

3

Comenzó  Salomón  pues  a  edificar  la 

Casa  de  YHVH  en  Jerusalem,  en  el 

monte Moriah, donde se había aparecido° a 

David su padre, en el lugar que David había 

preparado en la era de Ornán jebuseo.

2

 A los dos días del mes segundo, en el año 

cuarto de su reinado, comenzó a edificar.

3

 Y  estas  son  las  medidas  prescritas  a 

Salomón  para  los  cimientos°  de  la  Casa 

de  Dios:  La  longitud  en  codos,  según  la 

medida antigua, era de sesenta codos,° y 

el ancho, de veinte codos.

4

 El pórtico que estaba adelante tenía la 

longitud  conforme  al  ancho  de  la  Casa: 

veinte codos, y la altura: veinte codos;° y 

lo recubrió de oro puro por dentro.

5

 La nave principal la cubrió con madera 

de ciprés, y la recubrió del mejor oro, y la 

adornó con° palmas y cadenas esculpidas.

6

 Y  para  adornarla,  recubrió  la  Casa  de 

piedras preciosas, y el oro era oro de Par-

vaim.°

7

 Recubrió  de  oro  la  Casa:  las  vigas,  los 

umbrales,  y  sus  paredes  y  puertas,  y  es-

culpió querubines en las paredes.

8

 Construyó  el  lugar  santísimo,°  cuya 

longitud, conforme al ancho de la Casa, 

era de veinte codos, y su anchura de vein-

te codos, y lo recubrió con seiscientos ta-

lentos del mejor oro.

9

 Y el peso de los clavos era de cincuenta 

siclos de oro. También recubrió de oro los 

aposentos superiores.

10

 Adentro  del  lugar  santísimo  hizo  dos 

querubines de obra esculpida, y los recu-

brieron de oro.

11

 Las alas de los querubines tenían vein-

te  codos  de  longitud:  el  ala  de  uno,  de 

cinco codos, tocaba la pared de la Casa,° 

mientras que la otra ala, de cinco codos, 

tocaba el ala del otro querubín.

12

 El ala del otro querubín era de cinco 

codos, y alcanzaba a la pared de la Casa,° 

y la otra ala, de cinco codos, estaba unida 

al ala del otro querubín.

13

 Las  alas  extendidas  de  estos  querubi-

nes medían veinte codos, y ellos estaban 

de pie, con sus rostros vueltos hacia den-

tro.°

14

 E hizo el velo: de azul, púrpura, carme-

sí, y lino fino blanco, e hizo tejer queru-

bines sobre él.

15

 Delante de la Casa hizo las dos colum-

nas, de treinta y cinco codos de longitud,° 

y  el  capitel  que  coronaba  a  cada  una  de 

ellas medía cinco codos.

16

 E  hizo  cadenillas  como°  en  el  lugar 

santísimo,° y las colocó en lo alto de las 

columnas,° y esculpió cien granadas, que 

intercaló entre las cadenillas.

17

 Y emplazó las columnas frente al San-

tuario,°  una  a  la  derecha  y  otra  a  la  iz-

quierda, y llamó la de la derecha Jaquín° 

y la de la izquierda Boaz.°

Mobiliario de la Casa

4

Hizo el altar de bronce, de veinte co-

dos  de  longitud,  veinte  codos  de  an-

cho, y diez codos de altura.

2

 Hizo  también  el  mar  de  fundición,  re-

dondo,  de  diez  codos  de  borde  a  borde, 

cinco codos de alto y treinta codos de cir-

cunferencia.°

3

 Lo  rodeaba  un  motivo  de  bueyes,  diez 

por cada codo, dispuestos en dos hileras 

de bueyes en derredor, los cuales habían 

sido fundidos en una sola pieza con él.

4

 Se sostenía° sobre doce bueyes: tres mi-

raban  al  norte,  tres  al  occidente,  tres  al 

sur, y tres al oriente. El mar estaba asen-

tado sobre ellos, y todas sus ancas daban 

hacia la parte interior.

2.18 

→2.2 nota.  3.1 Esto es, el ángel de YHVH →2 S.24.15-25.  3.3 Lit. éstas son el fundamento de Salomón.  3.3 Siguiendo 

1 R.6.2, muchas versiones antiguas añaden: la altura, de treinta codos

3.4 Prob. alteración numérica del TM, el cual registra 

y la altura, de ciento veinte

3.5 Lit. y extendió sobre ella.  3.6 VUL registra excelente.  3.8 Lit. el lugar del santo de los santos

3.11 Es decir, la pared del lugar santísimo.  3.12 Es decir, del lugar santísimo.  3.13 Prob. se refiere a la nave principal de la 

Casa, el lugar santo

3.15 LXX y VUL registran altura.  3.16 .como.  3.16 Lit. la cámara más oculta.  3.16 Lit. sobre la cabeza 

de las columnas. Es decir, entre la columna y el capitel. 

3.17 

→4.7 nota.  3.17 Esto es, Él establecerá.  3.17 Prob. en Él hay 

fuerza

4.2 Lit. un cordón de treinta codos lo rodeaba.  4.4 Esto es, el mar de bronce


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2 Crónicas 4:5

448

5

 Su espesor era de un palmo menor, y su 

borde estaba cincelado como el borde de 

un cáliz, como una flor de lirio, y su capa-

cidad era de tres mil batos.°

6

 Hizo también diez fuentes, y puso cin-

co  al  sur  y  cinco  al  norte,°  para  lavar  y 

enjuagar en ellas la obra del holocausto,° 

pero el mar era para que los sacerdotes se 

lavaran en él.

7

 Hizo los diez candelabros de oro, según 

lo prescrito respecto de ellos, y los colocó 

en el Santuario,° cinco a la derecha y cin-

co a la izquierda.

8

 Hizo diez mesas, y las colocó en el Santua-

rio,° cinco a la derecha y cinco a la izquier-

da. También hizo cien aspersorios° de oro.

9

 Además hizo el atrio de los sacerdotes, y 

el gran atrio con sus puertas, y recubrió 

de bronce las puertas de ambos.

10

 Y asentó el mar al lado derecho° hacia 

el oriente, enfrente al mediodía.

11

 Huram° hizo también las calderas, las 

palas  y  los  aspersorios.  Así  terminó  Hi-

ram° de realizar la obra que hizo para el 

rey Salomón en la Casa de Dios:

12

 Las dos columnas, y los cuencos,° y los 

dos  capiteles  que  coronaban  las  colum-

nas, y las dos redes que cubrían los dos 

cuencos  de  los  capiteles  que  coronaban 

las columnas;°

13

 las  cuatrocientas  granadas°  para  las 

dos  redes:  dos  hileras  de  granadas  por 

red, para cubrir los dos cuencos de los ca-

piteles que coronaban las columnas.

14

 Hizo también las bases,° y sobre las ba-

ses hizo las fuentes,

15

 el mar, con los doce bueyes debajo de él;

16

 las  calderas,  las  palas  y  los  garfios.° 

Todos  estos  utensilios  que  hizo  Hiram-

abí° para el rey Salomón, para la Casa de 

YHVH, eran de bronce bruñido.

17

 Y el rey hizo fundir todo esto en tierra 

arcillosa, en la llanura del Jordán,° entre 

Sucot y Seredata.

18

 Todos  estos  utensilios  los  hizo  Salo-

món en tan gran cantidad, que el peso del 

bronce nunca pudo ser averiguado.

19

 Así hizo Salomón todos los utensilios 

que estaban en la Casa de Dios, así como 

el altar de oro° y las mesas sobre las que 

se colocaba el pan de la proposición;°

20

 y los candelabros con sus lámparas, de 

oro puro, para que iluminaran conforme 

al precepto ante el Santuario;

21

 y las flores, y las lámparas, y las tena-

zas, también de oro, de oro purísimo;

22

 y las despabiladeras, y los aspersorios, 

y  las  cucharas,  y  los  incensarios,  de  oro 

puro. En cuanto a la entrada de la Casa, 

las puertas interiores que daban al lugar 

santísimo, así como las puertas de la Casa, 

eran de oro.

Traslado del Arca

5

Acabada  la  obra  que  hizo  Salomón 

para la Casa de YHVH, metió Salomón 

los objetos que su padre David había con-

sagrado: la plata, el oro, y todos los uten-

silios, y los depositó en la tesorería de la 

Casa de Dios.

2

 Después Salomón hizo reunir en Jeru-

salem a los ancianos de Israel, y a todos 

los jefes de las tribus, los príncipes de las 

casas paternas de los hijos de Israel, para 

hacer  subir  el  Arca  del  Pacto  de  YHVH 

desde la ciudad de David, la cual es Sión.

3

 Y  todos  los  hombres  de  Israel  se  con-

gregaron ante el rey en la solemnidad del 

mes séptimo.°

4

 Y  cuando  todos  los  ancianos  de  Israel 

llegaron, los levitas alzaron el Arca.

5

 Y subieron el Arca y el Tabernáculo de 

Reunión, y todos los utensilios sagrados 

que había dentro del Tabernáculo; los sa-

cerdotes levitas° los subieron.

6

 Y el rey Salomón, y toda la asamblea de 

Israel que se había reunido con él, estuvie-

ron delante del Arca, sacrificando ovejas y 

4.5 Aprox. 66.000 lts. (2.000 batos en 1 R.7.26).  4.6 En el uso bíblico, el lado derecho equivale al sur y el lado izquierdo al 

norte. 

4.6 Esto es, tanto la víctima como los utensilios.  4.7 Esto es, la nave principal de la Casa, el lugar santo.  4.8 Véase nota 

anterior. 

4.8 Recipientes utilizados para contener, derramar o rociar la sangre de los sacrificios.  4.10 Algunos mss. hebreos 

añaden de la Casa, siguiendo 1 R.7.39. 

4.11 Huram 

→2.3 nota.  4.11 Hiram →2.3 nota.  4.12 Esto es, la parte esférica de los 

capiteles de las columnas

4.12 Lit. sobre la cabeza de las dos columnas.  4.13 LXX registra campanillas de oro.  4.14 LXX re-

gistra diez en lugar de hizo 

→1 R.7.43.  4.16 Se trata de un instrumento para los sacrificios, que seguramente tenía tres puntas 

como el mencionado en 1 S.2.13. 

4.16 LXX registra hizo Hiram y envió al rey Salomón.  4.17 Nen el vado de Adamá.  4.19 

Se refiere al altar del incienso. 

→Ex.37.25-28.  4.19 →2.4 nota.  5.3 Esto es, la solemnidad de los Tabernáculos →1 R.8.2. 

5.5 Muchos mss. y versiones antiguas siguen la lectura de 1 R.8.4, y registran y los levitas


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2 Crónicas 6:14

449

bueyes que no pudieron ser contados ni 

calculados por su gran cantidad.

7

 Entonces  los  sacerdotes  introdujeron 

el  Arca  del  Pacto  de  YHVH  en  su  lugar, 

en el Santuario interior de la Casa, en el 

lugar santísimo,° debajo de las alas de los 

querubines.

8

 Porque  los  querubines  extienden  las 

alas sobre el lugar del Arca, de modo que 

los querubines cubren por encima el Arca 

y sus varas.

9

 Aunque  las  varas  eran  tan  largas,  que 

los extremos de las varas se dejaban ver 

desde el Arca, frente al Santuario interior, 

pero no podían verse desde afuera. Y así 

están hasta hoy.

10

 Dentro del Arca no había sino las dos 

tablas que Moisés había puesto allí en Ho-

reb,  donde  YHVH  había  pactado  con  los 

hijos de Israel cuando salieron de Egipto.

11

 Y aconteció que cuando los sacerdotes 

salían del Santuario (porque todos los sa-

cerdotes  presentes  se  habían  santificado 

sin tener en cuenta las clases),°

12

 y todos los levitas cantores, Asaf, He-

mán, y Jedutún, con sus hijos y herma-

nos,° vestidos de lino fino blanco, estaban 

de pie con címbalos, salterios y arpas, al 

oriente° del altar, y con ellos ciento veinte 

sacerdotes que tocaban trompetas,

13

 los trompetistas y los cantores se unie-

ron para proclamar a una voz, alabando 

y dando gracias a YHVH; y al alzar la voz 

con  las  trompetas  y  los  címbalos,  y  los 

otros  instrumentos  musicales,  alababan 

a YHVH diciendo: Porque es bueno, por-

que para siempre es su misericordia, una 

nube llenó la Casa, la Casa de YHVH,°

14

 y los sacerdotes no pudieron continuar 

ministrando por causa de la nube, porque 

la gloria de YHVH había llenado la Casa 

de Dios.

Oración de Salomón en la dedicación

6

Entonces Salomón dijo: YHVH ha di-

cho que Él habita en densa oscuridad.

2

 Y  yo  he  construido  una  Casa  sublime 

para  ti,  un  lugar  en  que  habites  para 

siempre.

3

 Y el rey volvió su rostro y bendijo a toda 

la congregación de Israel, mientras toda 

la congregación de Israel se mantenía de 

pie.

4

 Y  dijo:  ¡Bendito  sea  YHVH  Dios  de  Is-

rael!,  que  ha  cumplido  con  su  mano  lo 

que habló con su boca a David mi padre, 

diciendo:

5

 Desde el día en que saqué a mi pueblo de 

la tierra de Egipto, no he escogido a nin-

guna ciudad de entre las tribus de Israel 

para edificar una Casa donde estuviera mi 

Nombre, ni escogí a hombre alguno para 

que fuera caudillo de mi pueblo Israel,

6

 sino que escogí a Jerusalem para que mi 

Nombre esté allí,° y escogí a David para 

que esté sobre mi pueblo Israel.

7

 Y estuvo en el corazón de mi padre Da-

vid edificar una Casa para el nombre de 

YHVH, Dios de Israel.

8

 Pero YHVH dijo a mi padre David: Por 

cuanto has tenido en tu corazón edificar 

Casa para mi Nombre, bien has hecho en 

tener esto en tu corazón;

9

 pero tú no edificarás la Casa, sino que tu 

hijo, que saldrá de tus lomos, él edificará 

la Casa para mi Nombre.°

10

 Y YHVH ha cumplido su palabra dicha, 

pues yo me he levantado en lugar de Da-

vid mi padre y me he sentado en el trono 

de Israel, tal como habló YHVH, y he edi-

ficado la Casa para el nombre de YHVH, 

Dios de Israel.

11

 Y he puesto allí el Arca, en la cual está 

el pacto de YHVH, que Él hizo con los hi-

jos de Israel.

12

 Luego se plantó ante el altar de YHVH, 

delante  de  toda  la  asamblea  de  Israel,  y 

extendió sus manos.

13

 (Salomón había hecho una plataforma 

de bronce y la había puesto en medio del 

atrio; su longitud era de cinco codos, su 

anchura  de  cinco  codos,  y  su  altura  de 

tres  codos.)  Se  puso  pues  sobre  ella,  e 

hincándose de rodillas delante de toda la 

congregación de Israel, y extendiendo sus 

manos a los cielos, dijo:

14

 ¡Oh  YHVH,  Dios  de  Israel,  no  hay 

’Elohim  como  Tú  en  los  cielos  ni  en  la 

5.7 Lit. al santo de los santos.  5.11 

→1 Cr.24.1 ss.  5.12 Puede referirse a hermanos de sangre o a otros parientes.  5.12 En el 

uso bíblico, el oriente está siempre enfrente, por lo que, al oriente del altar y frente al altar es básicamente lo mismo. 

5.13 LXX: 

una nube de gloria llenó la Casa del Señor

6.6 

→1 R.8.16.  6.9 →2 S.7.1-13; 1Cr.17.1-2.


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2 Crónicas 6:15

450

tierra,  que  guardas  el  pacto  y  la  miseri-

cordia para tus siervos que andan delante 

de ti con todo su corazón!

15

 Tú has cumplido lo que prometiste a 

tu  siervo  David,  mi  padre.  Sí,  cumpliste 

con  tu  mano  lo  que  prometiste  con  tu 

boca hasta el día de hoy.

16

 Ahora pues, oh YHVH, Dios de Israel, 

cumple  lo  que  le  prometiste  a  tu  siervo 

David,  mi  padre,  diciendo:  No  te  falta-

rá varón delante de mí que se siente en 

el  trono  de  Israel,  con  tal  que  tus  hijos 

guarden su camino para andar en mi Ley, 

como tú has andado delante de mí.

17

 Ahora pues, oh YHVH, Dios de Israel, 

ruégote  sea  confirmada  tu  palabra  que 

hablaste a tu siervo David.

18

 Pero, ¿en verdad ’Elohim habitará con 

el hombre en la tierra? He aquí, los cie-

los y los cielos de los cielos no te pueden 

contener, ¡cuánto menos esta Casa que he 

edificado!

19

 Sin  embargo,  oh  YHVH,  Dios  mío,  Tú 

prestarás atención a la oración de tu siervo 

y su súplica, para oír el clamor y la oración 

que tu siervo hace ante tu presencia,°

20

 a fin de que tus ojos estén abiertos ha-

cia esta Casa día y noche, hacia el lugar 

del cual dijiste que pondrías allí tu Nom-

bre para escuchar la oración que tu siervo 

haga hacia este lugar.

21

 Y Tú oirás las súplicas de tu siervo y de 

tu  pueblo  Israel  cuando  oren  hacia  este 

lugar. ¡Sí!, oye desde el lugar de tu mo-

rada  en  los  cielos,  y  cuando  hayas  oído, 

entonces perdona.

22

 Cuando un hombre peque contra otro, 

y  se  le  exija  juramento,  y  entre  en  esta 

Casa para jurar ante tu altar,

23

 entonces escucha Tú desde los cielos, 

y actúa y juzga a tus siervos, condenan-

do  al  malvado,  para  traer  su  conducta° 

sobre  su  propia  cabeza,  y  justificando 

al justo, para retribuirle conforme a su 

justicia.

24

 Cuando tu pueblo Israel sea derrotado 

ante  el  enemigo,  por  haber  pecado  con-

tra ti; si ellos se vuelven a ti y confiesan 

tu Nombre, y oran y te hacen súplicas en 

esta Casa,

25

 entonces escucha Tú desde los cielos, 

y perdona el pecado de tu pueblo Israel, 

y hazlos volver a la tierra que les diste a 

ellos y a sus padres.

26

 Cuando los cielos estén cerrados, y no 

haya lluvia porque ellos han pecado con-

tra ti; si oran hacia este lugar, y confiesan 

tu Nombre, y se vuelven de su pecado por 

el que los afligiste,

27

 entonces escucha Tú desde los cielos, 

y perdona el pecado de tus siervos y de tu 

pueblo Israel. Sí, enséñales el buen cami-

no por el que deben andar y dales lluvia 

sobre tu tierra, la cual diste a tu pueblo 

por heredad.

28

 Cuando  haya  hambre  en  la  tierra, 

cuando haya peste, tizón o añublo,° lan-

gosta o pulgón,° o cuando sus enemigos 

lo  acosen  en  sus  propias  puertas,°  cual-

quiera que sea la plaga o la enfermedad,

29

 toda oración  o toda  súplica  que haga 

cualquier  persona  de  todo  tu  pueblo  Is-

rael, reconociendo cada uno su aflicción 

y su dolor, y extiendan sus manos hacia 

esta Casa,

30

 entonces escucha Tú desde los cielos, 

el  lugar  de  tu  morada,  y  perdona,  retri-

buyendo  a  cada  uno,  cuyo  corazón  Tú 

conoces, conforme a todos sus caminos, 

porque sólo Tú conoces el corazón de los 

hijos de los hombres;

31

 para que te teman, y anden en tus ca-

minos todos los días que vivan en la tierra 

que Tú diste a nuestros padres.

32

 Asimismo, cuando el extranjero, que 

no es de tu pueblo Israel, venga de una 

tierra lejana por causa de tu gran Nom-

bre, y de tu poderosa mano y de tu bra-

zo  extendido,  y  venga  y  ore  hacia  esta 

Casa,

33

 entonces escucha Tú desde los cielos, 

desde tu morada, y haz conforme a todo lo 

que el extranjero te pida, para que todos 

los  pueblos  de  la  tierra  puedan  conocer 

tu  Nombre,  y  te  teman  como  tu  pueblo 

Israel, y sepan que a tu Nombre está con-

sagrada esta Casa.

34

 Cuando  tu  pueblo  salga  a  la  batalla 

contra  sus  enemigos,  cualquiera  sea  el 

camino en que los envíes, y oren a ti hacia 

6.19 LXX y Sir. armonizando con 1 R.8.28 añaden hoy.  6.23 Lit. camino.  6.28 Tizón y añublo: plagas que afectan el cultivo de 

cereales. 

6.28 

→Joel 1.4 nota.  6.28 Lit. en la tierra de sus puertas. Es decir, en sus propias ciudades.


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2 Crónicas 7:12

451

esta ciudad que has escogido, y hacia la 

Casa que he construido para tu Nombre,

35

 entonces escucha Tú desde los cielos su 

oración y su súplica, y ampara su causa.

36

 Cuando  pequen  contra  ti  (porque  no 

hay hombre que no peque), y Tú, airado 

contra  ellos,  los  entregues  ante  el  ene-

migo, y sus captores los lleven cautivos a 

una tierra lejana o cercana;

37

 si en la tierra adonde hayan sido lleva-

dos cautivos, ellos vuelven en sí, y en la 

tierra de su cautiverio se vuelven y te su-

plican,  diciendo:  Hemos  pecado,  hemos 

hecho  iniquidad,  hemos  actuado  impía-

mente;

38

 y  si  en  la  tierra  de  su  cautiverio,° 

adonde  los  hayan  llevado  cautivos,  ellos 

se vuelven a ti con todo su corazón y con 

toda su alma, y oran a ti en dirección a 

la tierra que diste a sus padres, hacia la 

ciudad que Tú escogiste, y hacia la Casa 

que he construido a tu Nombre,

39

 entonces escucha Tú su oración y sus 

súplicas  desde  los  cielos,  el  lugar  de  tu 

morada, y ampara su causa, y perdona a 

tu pueblo que ha pecado contra ti.

40

 Ahora pues, oh Dios mío, te ruego que 

tus ojos estén abiertos y tus oídos atentos 

a la oración que se eleva en este lugar.

41

 Y ahora, ¡levántate, oh YHVH ’Elohim, 

al lugar de reposo, Tú y el Arca de tu po-

der! ¡Vístanse de salvación tus sacerdotes, 

oh YHVH ’Elohim, y regocíjense tus sier-

vos piadosos!

42

 ¡Oh  YHVH  ’Elohim,  no  rechaces  el 

rostro de tu ungido! Recuerda las miseri-

cordias para con David tu siervo.

Solemnidades de la dedicación

7

Cuando  Salomón  terminó  de  orar, 

descendió  fuego  de  los  cielos  y  con-

sumió el holocausto y los sacrificios, y la 

gloria de YHVH llenó la Casa.

2

 Y  los  sacerdotes  no  pudieron  entrar 

en la Casa de YHVH, porque la gloria de 

YHVH había llenado la Casa de YHVH.

3

 Y todos los hijos de Israel, al ver des-

cender  el  fuego  y  la  gloria  de  YHVH 

sobre la Casa, se inclinaron rostro a tie-

rra  sobre  el  pavimento,  y  postrándose, 

dieron  gracias  a  YHVH,  diciendo:  ¡Por-

que Él es bueno, porque para siempre es 

su misericordia!

4

 Y  el  rey  y  todo  el  pueblo  sacrificaron 

víctimas delante de YHVH.

5

 Y  el  rey  Salomón  ofreció  en  sacrificio 

veintidós mil bueyes y ciento veinte mil 

ovejas. Así el rey y todo el pueblo dedica-

ron la Casa de Dios.

6

 Los  sacerdotes  estaban  de  pie  en  sus 

puestos,  y  los  levitas  tenían  los  instru-

mentos  musicales  de  YHVH,  que  el  rey 

David  había  hecho  para  dar  gracias  a 

YHVH,  porque  su  misericordia  es  para 

siempre, cuando David alababa por medio 

de ellos. Los sacerdotes los acompañaban 

tocando las trompetas, y todo Israel per-

manecía de pie.

7

 Y Salomón consagró el interior del atrio 

que estaba delante de la Casa de YHVH, 

pues  allí  ofreció  los  holocaustos  y  las 

grosuras° de las ofrendas de paz, porque 

el altar de bronce que había hecho Salo-

món no podía contener el holocausto, y la 

ofrenda vegetal, y las grosuras.

8

 Y mantuvo Salomón la solemnidad du-

rante siete días, y con él todo Israel, una 

asamblea  muy  grande,  desde  la  entrada 

de Hamat hasta el torrente de Egipto.°

9

 Al  octavo  día  hicieron  una  asamblea 

solemne, porque habían celebrado la de-

dicación  del  altar  en  siete  días  y  habían 

celebrado la solemnidad por siete días.°

10

 Y en el día veintitrés del mes séptimo 

mandó al pueblo a sus tiendas, regocijan-

tes y alegres de corazón por la benevolen-

cia que YHVH había mostrado a David y a 

Salomón, y a su pueblo Israel.

11

 Así Salomón terminó la Casa de YHVH 

y la casa real. Y todo lo que vino al corazón 

de Salomón hacer en la Casa de YHVH y 

en su propia casa, fue prosperado.

12

 Y  por  la  noche  YHVH  se  apareció  a 

Salomón y le dijo: He escuchado tu ora-

ción  y  he  escogido  para  mí  este  lugar 

como Casa de sacrificio.

6.38 LXX registra en la tierra de los que los han capturado.  7.7 Lit. las grasas.  7.8 El torrente de Egipto (80 Km. S. de Gaza) 

no debe ser confundido con el río Nilo. Aquél marcaba de forma natural la frontera SO de Israel. Actualmente se lo identifica 

con Wadi el-Arish

7.9 Según 1 R.8.65 y este pasaje, el acto se celebró durante los siete días anteriores a la solemnidad de los 

Tabernáculos (es decir, del día 8 al día 14 del mes séptimo), y fue seguida por dicha solemnidad, que según Lv.23.33-36 debía 

realizarse del 15 al 22 del mes séptimo.


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2 Crónicas 7:13

452

13

 Si Yo cierro los cielos para que no haya 

lluvia, o si mando la langosta para devo-

rar la tierra, o si envío pestilencia entre 

mi pueblo,

14

 y  se  humilla  mi  pueblo  sobre  el  cual 

es invocado mi Nombre, y oran, y buscan 

mi  rostro,  y  se  convierten  de  sus  malos 

caminos, entonces Yo oiré desde los cie-

los, y perdonaré sus pecados, y sanaré su 

tierra.

15

 Y mis ojos estarán abiertos y mis oídos 

atentos a la oración de este lugar,

16

 porque ahora he escogido y santifica-

do esta Casa, para que mi Nombre esté en 

ella para siempre, y mis ojos y mi corazón 

estén allí todos los días.

17

 En cuanto a ti, si andas delante de mí 

como  anduvo  David  tu  padre,  y  haces 

conforme a todo lo que te he mandado, y 

guardas mis estatutos y mis decretos,

18

 Yo afirmaré el trono de tu reino, como 

pacté con David tu padre, diciendo: No te 

faltará varón que gobierne sobre Israel.

19

 Pero si vosotros os apartáis y abando-

náis  mis  estatutos  y  mis  mandamientos 

que he puesto ante vosotros, y vais y ser-

vís a otros dioses, y os postráis ante ellos,

20

 entonces Yo os arrancaré de sobre mi 

tierra que os he dado,° y esta Casa que he 

santificado para mi Nombre, la echaré de 

mi presencia, y la pondré por refrán y es-

carnio entre todas las naciones.

21

 Y esta Casa que es tan excelsa, vendrá 

a ser de asombro a todo el que pase, de 

modo  que  dirá:  ¿Por  qué  ha  hecho  así 

YHVH a esta tierra y a esta Casa?

22

 Y responderán: Porque abandonaron a 

YHVH, el Dios de sus padres, que los ha-

bía sacado de la tierra de Egipto, y se afe-

rraron a otros dioses, y se postraron ante 

ellos,  y  los  sirvieron.  Por  eso  ha  traído 

sobre ellos todo este mal.

Otras obras de Salomón

8

Al cabo de veinte años, cuando Salo-

món  hubo  construido  la  Casa  de 

YHVH, y su propia casa,

2

 fue que Salomón reedificó las ciudades 

que Huram había entregado a Salomón, e 

hizo que los hijos de Israel habitaran allí.

3

 Después  Salomón  marchó  contra  Ha-

mat de Soba y se apoderó de ella.

4

 Reedificó también Tadmor en el desier-

to, junto con todas las ciudades de alma-

cenaje que había edificado en Hamat.

5

 Además reedificó la Bet-jorón de arriba 

y la Bet-jorón de abajo, ciudades fortifica-

das, con muros, puertas y barras;

6

 y a Baalat, y a todas las ciudades de al-

macenaje  que  tenía  Salomón,  todas  las 

ciudades para los carros, las ciudades para 

los jinetes, y todo lo que Salomón se pro-

puso° edificar en Jerusalem, en el Líbano, 

y en toda la tierra bajo su dominio.

7

 De todo el pueblo que había quedado de 

los  heteos,  amorreos,  ferezeos,  heveos  y 

jebuseos, que no eran de Israel,

8

 cuyos descendientes habían quedado en 

la tierra después de ellos, a los cuales los 

hijos de Israel no habían expulsado total-

mente,  Salomón  hizo  una  recluta,  y  los 

sometió a trabajos forzados hasta hoy.

9

 Pero  de  ninguno  de  los  hijos  de  Israel 

hizo Salomón siervos para su obra, por-

que eran hombres de guerra, sus capita-

nes escogidos, los aurigas de sus carros, y 

sus hombres de caballería.

10

 Los capitanes de guarnición que tenía 

el rey Salomón eran doscientos cincuen-

ta,  los  cuales  ejercían  autoridad  sobre 

aquella gente.

11

 Y  Salomón  trajo  a  la  hija  de  Faraón 

de la ciudad de David, a la casa que había 

edificado  para  ella,  pues  dijo:  Mi  mujer 

no habitará en la casa° de David, rey de 

Israel,  porque  aquellas  habitaciones  en 

las que ha entrado el Arca de YHVH son 

santas.

12

 Entonces  Salomón  hizo  elevar  holo-

caustos a YHVH sobre el altar de YHVH, 

que había edificado delante del pórtico,

13

 según  lo  prescrito  para  cada  día,  por 

mandato de Moisés, ofreciéndolos en los 

días de reposo,° en las lunas nuevas, y en 

los tiempos señalados, tres veces al año: 

en la Fiesta de los Ázimos,° en la Fiesta 

de las Semanas, y en la Fiesta de los Ta-

bernáculos.

14

 También  estableció  las  clases°  sacer-

dotales  en  sus  servicios,  conforme  a  la 

7.20 Lit. los arrancaré de mi tierra que les he dado.  8.6 Lit. y todo el deseo de Salomón, que quiso.  8.11 LXX registra en la 

ciudad

8.13 Heb. shabbatot.  8.13 panes sin levadura.  8.14 

→1 Cr. c.23-26. 


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2 Crónicas 9:16

453

ordenanza de David su padre, a los levitas 

en sus funciones, para alabar y ministrar 

ante los sacerdotes, según lo prescrito para 

cada día, y a los porteros, según sus gru-

pos, para cada puerta; porque así lo había 

ordenado David, varón de Dios.

15

 Y no se apartaron del mandato del rey en 

cuanto a los sacerdotes y a los levitas en nin-

gún asunto, incluyendo el de los tesoros.

16

 Así  fue  llevada  a  cabo  toda  la  obra  de 

Salomón desde el día° en que fueron pues-

tos los cimientos de la Casa de YHVH has-

ta su finalización. Así quedó terminada la 

Casa de YHVH.

17

 Entonces  Salomón  fue  a  Ezión-geber 

y a Elot, a la costa del mar en la tierra de 

Edom,

18

 porque  Huram  había  enviado  por 

mano  de  sus  siervos  naves  y  marineros 

diestros en el mar, los cuales fueron con 

los siervos de Salomón a Ofir, y tomaron 

de  allá  cuatrocientos  cincuenta  talentos 

de oro, y los trajeron al rey Salomón.

La reina de Sabá

9

Cuando la reina de Sabá° oyó la fama 

de Salomón, fue a Jerusalem para pro-

bar  a  Salomón  con  preguntas  difíciles. 

Ella  llegó  con  un  gran  séquito,  con  ca-

mellos cargados de especias, oro en gran 

abundancia y piedras preciosas. Al llegar 

ante Salomón, habló con él de todo lo que 

tenía en su mente.

2

 Y Salomón respondió todas sus pregun-

tas, y no hubo nada tan oscuro que Salo-

món no pudiera explicárselo.

3

 Y cuando la reina de Sabá vio la sabidu-

ría  de  Salomón,  y  el  palacio°  que  había 

edificado,

4

 y los manjares de su mesa, y los asientos° 

de sus siervos, la disposición° de sus mi-

nistros y sus vestiduras, sus mayordomos 

y sus vestiduras, y la escalinata que subía a 

la Casa de YHVH, se quedó sin aliento,

5

 y dijo al rey: ¡Es verdad lo que oí en mi tie-

rra acerca de tus hechos y de tu sabiduría!

6

 Yo no creía lo que se decía, hasta que yo 

misma he venido y lo he visto con mis pro-

pios ojos, y he aquí, no me había sido conta-

da ni la mitad de la grandeza de tu sabiduría. 

¡Tú excedes a la fama que yo había oído!

7

 ¡Dichosos tus hombres, y dichosos estos 

tus siervos, que continuamente están en 

tu presencia y oyen tu sabiduría!

8

 ¡Bendito sea YHVH tu Dios, que se agra-

dó de ti para ponerte en su trono como 

rey  para  YHVH  tu  Dios!  Porque  tu  Dios 

ama a Israel para afirmarlo perpetuamen-

te, por eso te ha puesto como su rey, para 

que practiques el derecho y la justicia.

9

 Y  ella  dio  al  rey  ciento  veinte  talentos 

de oro, y gran cantidad de especias aro-

máticas y piedras preciosas. Nunca hubo 

especias aromáticas como aquellas que la 

reina de Sabá trajo al rey Salomón.

10

 Y los siervos de Hiram° y los siervos de 

Salomón, que habían traído oro de Ofir, 

también trajeron ricas maderas de sánda-

lo y piedras preciosas.

11

 Y  con  tales  maderas,  el  rey  hizo  ba-

laustradas° para la Casa de YHVH y para 

la  casa  real,  además  de  arpas  y  salterios 

para los cantores. Y nunca se había visto 

madera como aquella en tierra de Judá.

12

 Y el rey Salomón dio a la reina de Sabá 

todo cuanto ella quiso pedirle, aparte de 

corresponder a lo que ella había traído al 

rey. Después ella se volvió y regresó a su 

tierra con sus siervos.

13

 El peso del oro que le llegaba a Salo-

món cada año era de seiscientos sesenta y 

seis talentos de oro,

14

 aparte  de  lo  que  aportaban  los  mer-

caderes y los traficantes, así como todos 

los reyes de Arabia y los gobernadores de 

aquella tierra, quienes llevaban oro y pla-

ta a Salomón.

15

 Hizo además el rey Salomón doscien-

tos paveses° de oro batido, empleando en 

cada pavés seiscientos siclos° de tal oro,°

16

 y  trescientos  escudos  de  oro  batido, 

en  cada  uno  de  los  cuales  emplearon 

8.16 Lit. hasta el día.  9.1 Sabá: reino situado en el SO de la península arábica, al E de la actual Etiopía.  9.3 Lit. casa. Este 

término puede referirse tanto a la Casa de Dios como a la casa de Salomón (aunque considerando el texto del v. siguiente es 

prob. que aluda a la residencia real). 

9.4 Lit. el asiento. Este término también puede referirse, en un sentido más amplio, a la 

habitación o vivienda. 

9.4 Este vocablo, que proviene de una raíz que denota estar de pie, explica la manera que tenían los 

sirvientes de permanecer de pie en espera de órdenes, o a su forma de atender al rey y a sus invitados. 

9.10 

→2.3 nota. 

9.11 Lit. calzadas.  9.15 Escudo grande que cubre casi todo el cuerpo del soldado.  9.15 .siclos.  9.15 Lit. seiscientos siclos 

de oro entraban en un pavés.


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2 Crónicas 9:17

454

trescientos siclos de oro,° los cuales el rey 

colocó en la casa del bosque del Líbano.

17

 El rey también hizo un gran trono de 

marfil, que recubrió de oro puro.

18

 El trono tenía seis gradas con un es-

cabel de oro fijado en él, y brazos a uno 

y otro lado del asiento,° y dos leones que 

estaban junto a los brazos.

19

 Asimismo, a uno y otro lado, estaban 

colocados doce leones sobre las seis gra-

das.  Jamás  se  hizo  algo  semejante  para 

ningún otro reino.

20

 Todos los vasos de beber del rey Salo-

món eran de oro puro, y todos los objetos 

de la casa del bosque del Líbano, de oro 

puro. Nada era de plata, pues en los días 

de  Salomón  ésta  se  consideraba  como 

nada.

21

 Porque  el  rey  poseía  naves  que  iban 

a Tarsis con los siervos de Huram, y una 

vez cada tres años llegaban las naves de 

Tarsis trayendo oro, plata, marfil, monos 

y pavos reales.

22

 Así el rey Salomón se engrandeció más 

que todos los reyes de la tierra en riqueza 

y en sabiduría.

23

 Y todos los reyes de la tierra procura-

ban estar en presencia de Salomón° para 

escuchar  su  sabiduría,  que  Ha-’Elohim 

había puesto en su corazón.

24

 Y año tras año cada uno traía su pre-

sente:  objetos  de  plata  y  objetos  de  oro, 

vestiduras,  armas,  especias  aromáticas, 

caballos y mulos.

25

 Salomón poseía caballerizas para cua-

tro mil caballos y carros, y doce mil jine-

tes, que instaló en las ciudades que tenía 

para sus carros, y en Jerusalem, cerca del 

rey.

26

 Dominaba sobre todos los reyes desde 

el río Éufrates hasta la tierra de los filis-

teos y hasta la frontera de Egipto.

27

 Y el rey hizo que la plata fuera en Jeru-

salem como las piedras, y los cedros como 

los sicómoros que hay en la Sefelá por la 

abundancia;

28

 y de Egipto y de todas las tierras se im-

portaban caballos para Salomón.

29

 El resto de los hechos de Salomón, los 

primeros y los últimos, ¿no están escritos 

en  las  crónicas  del  profeta  Natán,  en  la 

profecía de Ahías silonita, y en la visión 

del  vidente  Iddo  contra  Jeroboam  ben 

Nabat?

30

 Y Salomón reinó cuarenta años en Je-

rusalem sobre todo Israel.

31

 Y  durmió  Salomón  con  sus  padres,  y 

lo sepultaron en la ciudad de David su pa-

dre, y reinó en su lugar su hijo Roboam.

División del reino

10

Entonces  Roboam  fue  a  Siquem, 

porque todo Israel había ido a Si-

quem para proclamarlo rey.

2

 Y sucedió que cuando lo oyó Jeroboam 

ben  Nabat  (que  aún  estaba  en  Egipto, 

adonde  había  huido  de  la  presencia  del 

rey  Salomón),°  Jeroboam  regresó  de 

Egipto.

3

 Y mandaron a llamarle, y Jeroboam lle-

gó con todo Israel para hablar a Roboam 

diciendo:

4

 Tu  padre  agravó  nuestro  yugo.  Ahora 

pues, haz que la dura servidumbre de tu 

padre  y  el  pesado  yugo  que  nos  impuso 

sea más llevadero, y te serviremos.

5

 Y les respondió: ¡Volved a mí de aquí a 

tres días! Y el pueblo se retiró.

6

 Y el rey Roboam consultó a los ancianos 

que habían estado delante de su padre Salo-

món cuando estaba vivo, diciendo: ¿Cómo 

aconsejáis que responda a este pueblo?

7

 Y le hablaron diciendo: Si eres benevo-

lente para con este pueblo, y los compla-

ces,  y  les  hablas  buenas  palabras,  serán 

tus siervos todos los días.

8

 Pero  él  dejó  de  lado  el  consejo  que  le 

habían dado los ancianos, y consultó a los 

jóvenes que habían crecido con él y esta-

ban delante de su presencia.

9

 Y  les  preguntó:  ¿Qué  aconsejáis  voso-

tros que respondamos a este pueblo, que 

me  ha  hablado  diciendo:  Alivia  el  yugo 

que tu padre impuso sobre nosotros?

10

 Y los jóvenes que habían crecido con 

él le respondieron: Así dirás al pueblo que 

te  habló  diciendo:  Tu  padre  hizo  pesado 

nuestro  yugo,  tú,  pues,  alivia  nuestro 

yugo.  Así  les  dirás:  Mi  meñique  es  más 

grueso que los lomos de mi padre.

9.16 Lit. trescientos siclos de oro entraban en un escudo.  9.18 Lit. a ambos lados del lugar del asiento.  9.23 Lit. procuraban el 

rostro de Salomón

10.2 

→1 R.11.26-40.


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2 Crónicas 11:17

455

11

 Así que, si mi padre os impuso un yugo 

pesado, yo añadiré a vuestro yugo: mi pa-

dre  os  castigó  con  azotes,  pero  yo,  con 

escorpiones.

12

 Al tercer día Jeroboam y todo el pue-

blo fueron a Roboam, tal como les había 

hablado  el  rey,  diciendo:  Volved  a  mí  al 

tercer día.

13

 Y el rey les respondió duramente, pues 

el rey Roboam dejó de lado el consejo de 

los ancianos,

14

 y les habló siguiendo el consejo de los 

jóvenes,  diciendo:  Mi  padre  hizo  pesado 

vuestro  yugo,°  pero  yo  añadiré  a  él;  mi 

padre os castigó con azotes, pero yo, con 

escorpiones.

15

 Así  el  rey  no  escuchó  al  pueblo,  por-

que era designio de Dios,° para que YHVH 

cumpliera su palabra dicha por medio de 

Ahías silonita a Jeroboam ben Nabat.°

16

 Y cuando todo Israel vio que el rey no 

les escuchaba, el pueblo respondió al rey, 

diciendo: ¿Qué parte tenemos en David? 

¡No tenemos heredad con el hijo de Isaí! 

¡Israel,  cada  uno  a  sus  dioses!°  ¡David, 

mira ahora por tu propia casa! Y todo Is-

rael se retiró a sus tiendas.

17

 No  obstante,  Roboam  reinó  sobre  los 

hijos de Israel que habitaban en las ciu-

dades de Judá.

18

 Después  el  rey  Roboam  envió  a  Ado-

ram,° que estaba a cargo del tributo labo-

ral, pero los hijos de Israel lo lapidaron, 

y murió; y el mismo rey Roboam se tuvo 

que  apresurar  a  subir  en  su  carro  para 

huir a Jerusalem.

19

 Así  se  rebeló  Israel  contra  la  casa  de 

David hasta hoy.

Reinado de Roboam

11

Cuando Roboam llegó a Jerusalem, 

hizo congregar de la casa de Judá y 

de Benjamín a ciento ochenta mil guerre-

ros° escogidos, para luchar contra Israel y 

restituir el reino a Roboam.

2

 Pero  llegó  la  palabra  de  YHVH  a  Se-

maías, varón de Dios, diciendo:

3

 Habla  a  Roboam  ben  Salomón,  rey  de 

Judá, y a todo Israel en Judá y Benjamín, 

diciendo:

4

 Así  dice  YHVH:  No  subiréis  ni  lucha-

réis contra vuestros hermanos. Cada uno 

vuelva  a  su  casa,  porque  esto  proviene 

de mí. Y ellos escucharon las palabras de 

YHVH, y se volvieron, y no fueron contra 

Jeroboam.°

5

 Y Roboam habitó en Jerusalem, y edifi-

có ciudades fortificadas en Judá:

6

 Edificó Bet-léhem, y Etam, y Tecoa,

7

 y Bet-sur, Soco, Adulam,

8

 y Gat, y Maresa, y Zif,

9

 y Adoraim, y Laquis, y Azeca,

10

 y  Zora,  y  Ajalón,  y  Hebrón,  ciudades 

fortificadas que están en Judá y en Ben-

jamín.

11

 Además  reforzó  las  fortalezas,  y  puso 

en ellas comandantes, almacenes de pro-

visiones, aceite y vino.

12

 Y en cada ciudad puso paveses y lanzas, 

y las reforzó en gran manera. Así retuvo a 

Judá y Benjamín.

13

 Y los sacerdotes y levitas que estaban 

en todo Israel se presentaron a él° desde 

todos los confines,

14

 por cuanto los levitas habían abando-

nado sus ejidos y posesiones, y marchado 

a Judá y a Jerusalem, porque Jeroboam y 

sus hijos los habían destituido del sacer-

docio de YHVH.°

15

 Pues él° nombró sus propios sacerdotes 

para los lugares altos,° para los sátiros,° y 

para los becerros que había hecho.°

16

 Sin embargo, aquellos de entre todas 

las tribus de Israel que habían puesto su 

corazón  para  buscar  a  YHVH,  Dios  de 

Israel,  los  siguieron°  a  Jerusalem  para 

ofrecer sacrificios a YHVH, el Dios de sus 

padres.

17

 Así reforzaron el reino de Judá, y con-

solidaron a Roboam ben Salomón durante 

10.14  Lit.  haré  pesado  vuestro  yugo.  10.15  Lit.  esto  era  giro  de  los  hechos  de  parte  de  Dios.  10.15 

→1  R.11.29-39. 

10.16 8ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 14.  10.18 También Adoniram.  11.1 Lit. hacedores de guerra.  11.4 Lit. y volvie-

ron de ir contra Jeroboam

11.13 Lit. se colocaron junto a él.  11.14 Lit. de ser sacerdotes para YHVH.  11.15 Esto es, Jero-

boam

11.15 En un contexto religioso, la expresión lugar alto se refiere por lo general a colinas o montes donde se adoraba a 

las divinidades cananeas. Más adelante se usó para aludir a montículos artificiales o plataformas erigidas en algunas ciudades 

o bajo ciertos árboles considerados sagrados; y posteriormente llegó a utilizarse para referirse a algún tipo de ermita o pequeño 

santuario que albergaba ídolos. 

11.15 Este término hebreo alude a algún tipo de divinidad campestre y lasciva, con figura de 

hombre barbado, patas y orejas cabrunas y cola de chivo (esta palabra también se utiliza para referirse de forma despectiva a 

cualquier ídolo o demonio). 

11.15 

→1 R.12.26-29.  11.16 Esto es, a los levitas


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2 Crónicas 11:18

456

tres años, pues durante tres años anduvie-

ron en el camino de David y de Salomón.

18

 Y tomó Roboam por mujer a Mahalat, 

hija de Jerimot ben David, y a Abihail hija 

de Eliab ben Isaí.

19

 Y ella le dio a luz estos hijos: Jeús, Se-

marías y Zaham.

20

 Después de ella tomó a Maaca, hija de 

Absalón, que le dio a luz a Abías, a Atai, a 

Ziza y a Selomit.

21

 Y Roboam amó a Maaca, hija de Absa-

lón, más que a todas sus mujeres y concu-

binas. Tomó dieciocho mujeres y sesenta 

concubinas, y engendró veintiocho hijos 

y sesenta hijas.

22

 Y Roboam designó a Abías, hijo de Ma-

aca, como cabeza y príncipe entre sus her-

manos, porque quería hacer que reinara.

23

 Y actuando con astucia, distribuyó a to-

dos sus hijos por todo el territorio de Judá 

y Benjamín, y por todas las ciudades fortifi-

cadas, y les proporcionó alimento en abun-

dancia, y buscó para ellos muchas mujeres.

Castigo de Roboam

12

Pero aconteció que cuando el reino 

de Roboam se había consolidado, y 

él se había fortalecido, abandonó la Ley de 

YHVH, y todo Israel con él.

2

 Y por cuanto se habían rebelado contra 

YHVH, en el año quinto del rey Roboam, 

sucedió  que  Sisac  rey  de  Egipto  subió 

contra Jerusalem

3

 con  mil  doscientos  carros  de  guerra  y 

sesenta mil jinetes. El ejército de libios, 

suquienos y etíopes que venía con él des-

de Egipto era innumerable.

4

 Y conquistó las ciudades fortificadas de 

Judá y llegó hasta Jerusalem.

5

 Entonces  el  profeta  Semaías  fue  a  Ro-

boam  y  a  los  príncipes  de  Judá,  que  se 

habían reunido en Jerusalem a causa de 

Sisac, y les dijo: Así dice YHVH: Vosotros 

me  habéis  abandonado.  Yo  también  os 

abandono en manos de Sisac.

6

 Pero los príncipes de Israel y el rey se 

humillaron y dijeron: Justo es YHVH.

7

 Y cuando YHVH vio que se habían humi-

llado, la palabra de YHVH fue a Semaías, 

diciendo: Se han humillado, por lo que no 

los destruiré, sino que les daré cierta es-

capatoria, y mi ira no se derramará contra 

Jerusalem por mano de Sisac.

8

 Pero serán sus siervos, para que conoz-

can  la  diferencia  entre  servirme  a  mí  y 

servir a los reinos de las naciones.°

9

 Subió  pues  Sisac  rey  de  Egipto  contra 

Jerusalem, y se llevó los tesoros de la Casa 

de YHVH, y los tesoros de la casa real. Se 

apoderó  de  todo,  llevándose  también  los 

escudos de oro que había hecho Salomón.

10

 Y el rey Roboam hizo en su lugar es-

cudos de bronce, y los puso a cargo de los 

capitanes  de  la  guardia  que  custodiaban 

la entrada de la casa real.

11

 Y siempre que el rey iba a la Casa de 

YHVH,  la  guardia  los  portaba,  pero  des-

pués los volvían a traer a la cámara de la 

guardia.

12

 Cuando se° humilló, la ira de YHVH se 

apartó de él, de manera que no lo destru-

yó del todo, porque aún en Judá queda-

ban buenas cosas.

13

 Y el rey Roboam se consolidó en Jeru-

salem  y  siguió  reinando.  Roboam  tenía 

cuarenta  y  un  años  cuando  comenzó  a 

reinar, y reinó diecisiete años en Jerusa-

lem, la ciudad que YHVH había escogido 

de  entre  todas  las  tribus  de  Israel  para 

poner  allí  su  Nombre.  El  nombre  de  su 

madre era Naama, la amonita.

14

 E hizo lo malo, porque no dispuso su 

corazón para buscar a YHVH.

15

 Los hechos de Roboam, primeros y úl-

timos, ¿no están escritos en los hechos del 

profeta Semaías y del vidente Iddo, según 

el registro genealógico? Y todo el tiempo 

hubo guerra entre Roboam y Jeroboam.

16

 Y  durmió  Roboam  con  sus  padres,  y 

fue sepultado en la ciudad de David, y su 

hijo Abías reinó en su lugar.

Reinado de Abías

13

En el año decimoctavo del rey Je-

roboam  comenzó  a  reinar  Abías 

sobre Judá.

2

 Reinó tres años en Jerusalem. El nom-

bre  de  su  madre  era  Micaías,°  hija  de 

Uriel,  de  Gabaa.  Y  hubo  guerra  entre 

Abías y Jeroboam.

12.8 Lit. así conocerán mi servicio y el servicio de los reinos de las naciones.  12.12 Es decir, Roboam.  13.2 Posible error de 

copia. Es nombre masculino. LXX registra Maaka.


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2 Crónicas 14:2

457

3

 Abías comenzó la batalla con un ejército 

de cuatrocientos mil hombres escogidos, 

valientes  guerreros,  mientras  que  Jero-

boam dispuso batalla contra él con ocho-

cientos mil hombres escogidos, fuertes y 

valerosos.

4

 Y  se  levantó  Abías  en  el  monte  Zema-

raim, que está en la región montañosa de 

Efraín,  y  dijo:  Escuchadme,  Jeroboam  y 

todo Israel:

5

 ¿No sabéis que YHVH, el Dios de Israel, 

dio a David el reino sobre Israel para siem-

pre, a él y a sus hijos por pacto de sal?°

6

 Sin embargo Jeroboam ben Nabat, sier-

vo de Salomón ben David, se levantó y se 

rebeló contra su señor.

7

 Y  se  juntaron  con  él  hombres  ociosos,° 

hijos de Belial, y se impusieron sobre Ro-

boam ben Salomón cuando Roboam era jo-

ven y apocado, y no podía hacerles frente.

8

 Y  ahora  queréis  oponeros  al  reino  de 

YHVH, que está en manos de los hijos de 

David, porque sois una gran multitud, y 

están  con  vosotros  los  becerros  de  oro 

que Jeroboam os hizo por dioses.

9

 ¿No habéis expulsado acaso a los sacer-

dotes de YHVH, los hijos de Aarón y los 

levitas, poniendo en su lugar sacerdotes 

como  los  pueblos  de  los  gentiles,  de  tal 

manera que cualquiera que viene a sacri-

ficar un novillo y siete carneros llega a ser 

sacerdote de los que no son Dios?°

10

 En cuanto a nosotros, YHVH es nues-

tro  Dios,  y  no  lo  hemos  abandonado, 

y  nuestros  sacerdotes  que  ministran  a 

YHVH son hijos de Aarón, y los levitas es-

tán en la obra:

11

Ellos queman  holocaustos  a  YHVH 

cada  mañana  y  cada  tarde,  así  como  in-

cienso  de  especias,  y  ponen  la  hilera  de 

pan sobre la mesa pura, y encienden cada 

atardecer  el  candelabro  de  oro  con  sus 

lámparas, porque nosotros guardamos el 

mandato de YHVH nuestro Dios, pero vo-

sotros lo habéis abandonado.

12

 Pero he aquí, ’Elohim está con noso-

tros a la cabeza, y sus sacerdotes con las 

trompetas hacen resonar la alarma contra 

vosotros.  ¡Oh  hijos  de  Israel,  no  luchéis 

contra YHVH, el Dios de vuestros padres, 

porque no prosperaréis!

13

 Pero Jeroboam dispuso una embosca-

da para llegar a ellos por detrás. Así que 

ellos° estaban frente a Judá, mientras que 

la tropa emboscada estaba por detrás de 

ellos.°

14

 Y cuando Judá se volvió, he aquí que 

eran atacados° por el frente y por la re-

taguardia. Entonces clamaron a YHVH, y 

los sacerdotes tocaron las trompetas,

15

 y los hombres de Judá lanzaron el grito 

de guerra; y sucedió que cuando los hom-

bres de Judá lanzaron el grito de guerra, 

Ha-’Elohim  golpeó  a  Jeroboam  y  a  todo 

Israel delante de Abías y de Judá.

16

 Y los hijos de Israel huyeron delante de 

Judá, y ’Elohim los entregó en su mano.

17

 Y Abías y su pueblo hicieron una gran 

matanza entre ellos, y cayeron° en com-

bate  quinientos  mil  hombres  escogidos 

de Israel.

18

 Así fueron humillados los hijos de Is-

rael  en  aquel  tiempo,  mientras  que  los 

hijos  de  Judá  prevalecieron  porque  se 

habían apoyado en YHVH, el Dios de sus 

padres.

19

 Y Abías persiguió a Jeroboam y le con-

quistó algunas ciudades, tales como Bet-

’El con sus aldeas, Jesana con sus aldeas, 

y Efraín con sus aldeas.

20

 Jeroboam no volvió a recuperar su po-

der en los días de Abías, y YHVH lo hirió, 

de modo que murió.

21

 Y Abías se hizo fuerte, y tomó para sí 

catorce mujeres, y engendró veintidós hi-

jos y dieciséis hijas.

22

 El resto de los hechos de Abías, sus ca-

minos  y  sus  dichos,  están  escritos  en  el 

relatos del profeta Iddo.

Reinado de Asa

14

Durmió Abías con sus padres y lo 

sepultaron en la ciudad de David, 

y reinó en su lugar su hijo Asa. En sus 

días la tierra estuvo en paz durante diez 

años,

2

 pues Asa hizo lo bueno y lo recto ante 

los ojos de YHVH su Dios,

13.5 Aquí la sal, como símbolo de fidelidad, alude a un compromiso irrevocable y perpetuo. 

→Nm.18.19; Lv.2.13.  13.7 Lit. va-

cíos. Aplicado a personas, este adjetivo define a hombres inútiles o despreciables

13.9 Lit. de los no dioses.  13.13 Es decir, los 

israelitas

13.13 Es decir, los judíos.  13.14 Lit. que tenían la batalla.  13.17 Se refiere tanto a los heridos como a los muertos. 


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2 Crónicas 14:3

458

3

 porque suprimió los altares de culto ex-

traño,  y  los  lugares  altos,°  y  quebró  los 

pilares° y taló las aseras;°

4

 y mandó a Judá que buscara a YHVH, 

el Dios de sus padres, y que pusiera por 

obra la Ley y el mandamiento.

5

 Quitó  además  de  todas  las  ciudades 

de  Judá  los  lugares  altos  y  las  imáge-

nes del sol;° y el reino tuvo paz bajo su 

mando.

6

 También  edificó  ciudades  fortificadas 

en  Judá,  ya  que  la  tierra  estaba  en  paz, 

y  no  había  ninguna  guerra  contra  él  en 

aquellos años, pues YHVH le había dado 

reposo.

7

 Así que dijo a Judá: Edifiquemos estas 

ciudades  y  cerquémoslas  con  muros  y 

torres, portones° y barras, ya que la tie-

rra aún es nuestra,° pues hemos buscado 

a YHVH nuestro Dios, lo hemos buscado, 

y Él nos ha dado reposo por todas partes. 

Así pues, edificaron y prosperaron.

8

 Asa  tuvo  un  ejército  de  trescientos 

mil hombres de Judá, que portaban pa-

veses y lanzas, y doscientos ochenta mil 

de  Benjamín,  que  portaban  escudos  y 

tensaban arcos, todos ellos hombres de 

valor.

9

 Y salió contra ellos Zera, el etíope, con 

un ejército de mil millares° y trescientos 

carros; y llegó hasta Maresa.

10

 Entonces Asa salió contra él, y dispu-

sieron la batalla en el valle de Sefata, jun-

to a Maresa.

11

 Y Asa invocó a YHVH su Dios, y dijo: 

¡Oh  YHVH,  no  hay  otro  como  Tú  para 

ayudar,  tanto  al  poderoso  como  al  que 

no  tiene  fuerza!  ¡Ayúdanos,  oh  YHVH 

Dios nuestro, porque en ti nos apoyamos, 

y  en  tu  Nombre  hemos  venido  contra 

esta  multitud!  Oh  YHVH,  Tú  eres  nues-

tro Dios, ¡no prevalezca contra ti ningún 

mortal!

12

 Y YHVH derrotó a los etíopes delante 

Asa y de Judá, y los etíopes huyeron.

13

 Y Asa y el pueblo que lo acompañaba 

los  persiguieron  hasta  Gerar,  y  cayeron 

tantos de los etíopes que no quedaron su-

pervivientes,°  porque  fueron  destruidos 

ante YHVH y su ejército, y se obtuvo un 

botín muy grande.

14

 Después  atacaron  todas  las  ciudades 

alrededor  de  Gerar,  porque  el  terror  de 

YHVH  estaba  sobre  ellas,  y  saquearon 

todas las ciudades pues había en ellas un 

gran botín.

15

 También  atacaron  las  tiendas  de  los 

que  tenían  ganado,  y  se  llevaron  ovejas 

en abundancia y camellos, y regresaron a 

Jerusalem.

Reformas de Asa

15

Entonces  el  Espíritu  de  Dios  des-

cendió sobre Azarías ben Oded,

2

 quien salió al encuentro de Asa y le dijo: 

Oídme, Asa y todo Judá y Benjamín: YHVH 

está con vosotros mientras vosotros estéis 

con Él. Si lo buscáis, Él se dejará hallar 

por vosotros, pero si lo abandonáis, Él os 

abandonará.

3

 Muchos días ha estado Israel sin el Dios 

verdadero,  sin  sacerdote  que  instruya,  y 

sin Ley,

4

 pero cuando en su angustia se volvieron 

a YHVH, el Dios de Israel, y lo buscaron, 

Él se dejó encontrar por ellos.

5

 En aquellos tiempos no había paz para 

el que salía ni para el que entraba, sino 

que todos los habitantes de las tierras su-

frían grandes quebrantos.

6

 Y  las  naciones  y  las  ciudades°  se  des-

truían  unas  a  otras  porque  ’Elohim  las 

castigaba con toda clase de adversidades.

7

 Pero  vosotros  esforzaos  y  no  aflojéis 

vuestras  manos,  porque  vuestra  labor 

será recompensada.

8

 Al  oír  estas  palabras,  y  la  profecía  del 

profeta  Oded,°  Asa  se  reafirmó  e  hizo 

desaparecer  los  ídolos  abominables  de 

toda  la  tierra  de  Judá  y  Benjamín,  y  de 

14.3 

→1 R.12.26-29.  14.3 Se trata de piedras talladas consideradas sagradas y generalmente relacionadas con el culto pa-

gano. 

→Ex.23.24; Lv.26.1; 1R.14.23.  14.3 El término asera puede ser el nombre de una diosa cananea cuyo culto se introdujo 

en Israel pese a los mandamientos de Dios. 

→Ex.34.13; Dt.7.5, pero también puede referirse a objetos o símbolos relacionados 

con esta divinidad, tales como imágenes de madera (estacas votivas) o simples árboles. 

14.5 Se refiere a algún tipo de estruc-

tura u objeto de culto idolátrico relacionado con el sol. 

14.7 Lit. dos puertas.  14.7 Lit. la tierra aún está delante de nosotros

14.9 Prob. la expresión mil millares aluda a la magnitud del ejército más que a un número específico.  14.13 Lit. hasta que no 

tuvieron preservación de vida

15.6 Lit. fueron hechos pedazos nación por nación y ciudad por ciudad.  15.8 Es evidente que 

se refiere a Azarías. 

→15.1. 


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2 Crónicas 16:12

459

las ciudades que había conquistado en la 

serranía de Efraín, y reconstruyó el altar 

de YHVH, que estaba delante del pórtico 

de YHVH.

9

 Después reunió a todo Judá y Benjamín, 

y a los que vivían con ellos de Efraín, de 

Manasés y de Simeón, porque muchos is-

raelitas se habían pasado a él al ver que 

YHVH su Dios estaba con él.

10

 Y se reunieron en Jerusalem en el mes 

tercero del año decimoquinto del reinado 

de Asa.

11

 En  aquel  día  sacrificaron  a  YHVH, 

del botín que habían llevado, setecientos 

bueyes y siete mil ovejas.

12

 Y entraron en el pacto, para buscar a 

YHVH,  Dios  de  sus  padres,  con  todo  su 

corazón y con toda su alma,

13

 y  para  que  todo  el  que  no  buscara  a 

YHVH, Dios de Israel, fuera ejecutado, ya 

fuera humilde o encumbrado, hombre o 

mujer.

14

 Y  prestaron  juramento  a  YHVH  con 

gran voz, con gritos de júbilo, con trom-

petas, y con el shofar.°

15

 Y  todo  Judá  se  regocijó  a  causa  del 

juramento, pues habían jurado con todo 

su corazón que lo buscarían con toda su 

voluntad. Y así Él dejó que lo hallaran, y 

YHVH les dio paz en derredor.

16

 Y el rey Asa depuso a su propia madre 

Maaca  de  su  dignidad  real,  porque  ha-

bía  hecho  una  imagen  abominable  para 

Asera,° y Asa taló el ídolo abominable, lo 

desmenuzó y lo quemó junto al torrente 

Cedrón.

17

 Sin  embargo,  los  lugares  altos°  no 

fueron quitados de Israel, aunque el cora-

zón de Asa se mantuvo íntegro todos sus 

días.

18

 Y llevó a la Casa de Dios los objetos de 

plata y de oro y demás utensilios consa-

grados por su padre, y que él mismo había 

santificado.

19

 Y no hubo más guerra hasta el año tri-

gésimo quinto del reinado de Asa.

Lucha de Asa contra Israel y su muerte

16

Pero en el año trigésimo sexto del 

reinado de Asa, Baasa rey de Israel 

subió contra Judá, y fortificó a Ramá para 

que nadie pudiera entrar o salir en ayuda° 

de Asa rey de Judá.

2

 Entonces Asa hizo sacar la plata y el oro 

de los tesoros de la Casa de YHVH y de la 

casa real, y los envió a Ben-adad rey de Si-

ria, que habitaba en Damasco, diciendo:

3

 Haya alianza entre tú y yo, como hubo 

entre mi padre y tu padre. He aquí que te 

envío plata y oro; ve y rompe tu alianza 

con Baasa rey de Israel, para que se aparte 

de mí.

4

 Y Ben-adad atendió al rey Asa y envió a 

los  capitanes  de  sus  ejércitos  contra  las 

ciudades  de  Israel,  y  atacaron  a  Ijón,  a 

Dan, a Abel-maim y a todas las ciudades 

de almacenaje de Neftalí.

5

 Y aconteció que cuando Baasa se ente-

ró, dejó de fortificar a Ramá, y puso fin a 

su obra.

6

 Entonces  el  rey  Asa  trajo  a  todo  Judá, 

y  se  llevaron  las  piedras  y  la  madera  de 

Ramá con que Baasa la fortificaba, y con 

ellas reedificó Geba y Mizpa.

7

 En aquel tiempo el vidente Hanani fue 

a Asa, rey de Judá, y le dijo: Por cuanto te 

has apoyado en el rey de Siria, y no te has 

apoyado en YHVH tu Dios, por eso el ejér-

cito del rey de Siria escapó de tu mano.

8

 ¿Acaso los etíopes y los libios no eran un 

ejército numerosísimo, con carros y mu-

cha gente de a caballo? Con todo, porque 

te  apoyaste  en  YHVH,  Él  los  entregó  en 

tu mano.

9

 Porque  los  ojos  de  YHVH  contemplan 

toda la tierra, para ayudar a aquellos cuyo 

corazón es íntegro para con Él. ¡Locamen-

te has actuado en esto, porque de aquí en 

adelante habrá guerras contra ti!

10

 Pero Asa se irritó contra el vidente y lo 

metió en la cárcel° pues se había encole-

rizado en gran manera contra él por esto. 

Y por ese tiempo, Asa oprimió a algunos 

del pueblo.

11

 Los hechos de Asa, primeros y últimos, 

he  aquí  están  escritos  en  el  rollo  de  los 

Reyes de Judá y de Israel.

12

 En el año trigésimo noveno de su rei-

nado,  Asa  cayó  enfermo  de  los  pies.  Su 

enfermedad  era  grave,°  pero  aun  en  su 

15.14 Instrumento hecho de un cuerno de carnero.  15.16 

→14.3 nota.  15.17 →11.15 nota.  16.1 .en ayuda.  16.10 Lit. casa 

del cepo

16.12 Lit. hasta lo sumo era su enfermedad


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2 Crónicas 16:13

460

enfermedad no buscó a YHVH, sino a los 

médicos.

13

 Y  durmió  Asa  con  sus  padres,  y  mu-

rió en el año cuadragésimo primero de su 

reinado.

14

 Y lo sepultaron en su sepulcro que se 

había hecho excavar en la ciudad de David, 

el cual llenaron de toda clase de especias 

aromáticas y diversas clases de ungüentos 

preparados según el arte de la perfumería, 

y encendieron en su honor una gran ho-

guera.

Reinado de Josafat

17

Y reinó en su lugar su hijo Josafat, 

y se fortaleció contra Israel.

2

 Y emplazó ejércitos en todas las ciudades 

fortificadas de Judá, y puso guarniciones en 

la tierra de Judá y en las ciudades de Efraín, 

que su padre Asa había conquistado.

3

 Y YHVH estuvo con Josafat, porque an-

duvo en los primeros caminos de su padre 

David, y no buscó a los baales,

4

 sino  que  buscó  al  Dios  de  su  padre,  y 

anduvo en sus mandamientos, y no según 

las obras de Israel.

5

 Y YHVH consolidó el reino en su mano, 

y todo Judá ofreció presentes a Josafat, y 

tuvo riqueza y honores en abundancia.

6

 Y su corazón se animó en los caminos 

de  YHVH,  hasta  tal  punto  que  quitó  de 

Juda los lugares altos° y las aseras°.

7

 En el tercer año de su reinado, envió a 

sus  príncipes  Ben-hail,  Abdías,  Zacarías, 

Natanael  y  Micaías,  para  que  enseñaran 

en las ciudades de Judá.

8

 Y con ellos a los levitas Semaías, Neta-

nías,  Zebadías,  Asael,  Semiramot,  Jona-

tán, Adonías, Tobías y Tobadonías, y con 

ellos a los sacerdotes Elisama y Joram.

9

 Y  ellos  enseñaron  en  Judá  llevando 

consigo  el  Rollo  de  la  Ley  de  YHVH,  y 

recorrieron todas las ciudades de Judá, y 

enseñaron al pueblo.

10

 Y el terror de YHVH cayó sobre todos 

los reinos de las tierras que estaban alre-

dedor de Judá, de modo que no hicieron 

guerra contra Josafat.

11

 Y  algunos  de  los  filisteos  trajeron  a 

Josafat  presentes  y  plata  como  tributo. 

También  los  árabes  le  llevaron  rebaños: 

siete mil setecientos carneros y siete mil 

setecientos machos cabríos.

12

 Y Josafat se engrandeció hasta lo sumo, 

y edificó en Judá fortalezas y ciudades de 

abastecimiento.

13

 Tuvo además muchas posesiones en las 

ciudades  de  Judá,  y  en  Jerusalem  hom-

bres de guerra muy valerosos.°

14

 El  número  según  sus  casas  paternas 

era  éste:  de  los  capitanes  de  millares  de 

Judá,  el  jefe  Adnas,  con  trescientos  mil 

valientes;

15

 le seguía el jefe Johanán, con doscien-

tos ochenta mil;

16

 luego Amasías ben Zicri, quien se ha-

bía consagrado° a YHVH, con doscientos 

mil valientes;

17

 y de Benjamín: Eliada, hombre fuerte 

y  valeroso,  y  con  él  doscientos  mil  que 

portaban arco y escudo;

18

 y a continuación, Jozabad, con ciento 

ochenta mil equipados para la guerra.

19

 Éstos eran los que servían al rey, apar-

te de los que el rey había emplazado en las 

ciudades fortificadas por todo Judá.

Profecía de Micaías contra Acab

18

Josafat tenía riquezas y honores en 

abundancia,  pero  emparentó  con 

Acab.

2

 Al  cabo  de  unos  años  bajó  a  Samaria 

para visitar a Acab, y Acab hizo degollar 

numerosas  ovejas  y  bueyes  para  él  y  la 

gente  que  lo  acompañaba,  y  lo  incitó  a 

subir contra Ramot de Galaad.

3

 Y Acab rey de Israel dijo a Josafat rey de 

Judá: ¿Irás conmigo contra Ramot de Ga-

laad? Y él respondió: Yo soy como tú, y mi 

pueblo como tu pueblo. ¡Iremos° contigo 

a la guerra!

4

 Pero  Josafat  dijo  al  rey  de  Israel:  Te 

ruego que consultes ahora la palabra de 

YHVH.

5

 Entonces el rey de Israel convocó a los 

profetas,  unos  cuatrocientos  hombres,  y 

les preguntó: ¿Iremos a la guerra contra 

Ramot de Galaad o desistiré? Y ellos res-

pondieron:  Sube,  porque  Ha-’Elohim  la 

entregará en mano del rey.

17.6 

→11.15 nota.  17.6 →14.3 nota.  17.13 Lit. hombres de guerra, valientes guerreros.  17.16 Esto es, alguien que volunta-

riamente se ha ofrecido al servicio de Dios

18.3 .iremos.


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2 Crónicas 18:31

461

6

 Pero  Josafat  preguntó:  ¿No  habrá  aquí 

además algún profeta de YHVH, para que 

consultemos por medio de él?

7

 Y  el  rey  de  Israel  respondió  a  Josafat: 

Todavía queda un hombre por medio del 

cual podemos consultar a YHVH, pero yo 

lo aborrezco, porque nunca me profetiza 

para bien, sino siempre para mal. Es Mi-

caías  ben  Imla.  Y  dijo  Josafat:  No  hable 

así el rey.

8

 Entonces el rey de Israel llamó a cierto 

eunuco, y le dijo: ¡Trae pronto a Micaías 

ben Imla!

9

 Y el rey de Israel y Josafat, rey de Judá 

estaban  sentados  cada  uno  en  su  trono, 

vestidos con atavíos reales, y sentados en 

una plazoleta a la entrada de la puerta de 

Samaria, y todos los profetas profetizaban 

ante ellos.

10

 Y  Sedequías  ben  Quenaana  se  había 

hecho  unos  cuernos  de  hierro,  y  decía: 

Así  dice  YHVH:  ¡Con  éstos  acornearás  a 

los sirios hasta consumirlos!

11

 Y  todos  los  profetas  profetizaban  así, 

diciendo:  ¡Sube  a  Ramot  de  Galaad  y 

triunfa, pues YHVH la entregó en mano 

del rey!

12

 Y el mensajero que había ido a llamar 

a Micaías, le habló diciendo: He aquí que 

las palabras de los profetas declaran a una 

voz cosas buenas al rey. Sea pues tu pala-

bra como la de cada uno de ellos, y predi-

ce cosa buena.

13

 Pero  Micaías  replicó:  Vive  YHVH  que 

lo que mi Dios indique, eso hablaré.

14

 Y cuando llegó al rey, el rey le pregun-

tó:  Micaías,  ¿iremos  a  la  guerra  contra 

Ramot de Galaad, o desistiré? Y le respon-

dió: Subid y prosperad, pues serán entre-

gados en vuestra mano.

15

 Pero el rey le dijo: ¿Cuántas veces he 

de hacerte jurar que no me digas sino la 

verdad en nombre de YHVH?

16

 Entonces  respondió:  Vi  a  todo  Israel 

esparcido por los montes como ovejas sin 

pastor, y a YHVH que decía: Éstos no tie-

nen amo. Retorne cada cual a su casa en 

paz.

17

 Y el rey de Israel dijo a Josafat: ¿No te 

dije  que  éste  nunca  profetiza  lo  bueno 

acerca de mí, sino lo malo?

18

 Pero él° dijo: Por eso, oíd la palabra de 

YHVH: Vi a YHVH sentado en su trono, y 

todo el ejército de los cielos estaba a su 

diestra y a su siniestra.

19

 Y decía YHVH: ¿Quién inducirá a Acab 

rey de Israel para que suba y caiga en Ra-

mot de Galaad? Y uno decía de una mane-

ra y otro de otra.

20

 Y salió un espíritu que se puso delante 

de YHVH y dijo: Yo lo induciré. Y le dijo 

YHVH: ¿De qué modo?

21

 Le respondió: Saldré y seré espíritu de 

mentira en la boca de todos sus profetas. 

Y Él dijo: Lo inducirás y ciertamente pre-

valecerás. ¡Ve y hazlo!

22

 Y ahora, he aquí YHVH ha puesto un 

espíritu  de  mentira  en  la  boca  de  éstos, 

tus profetas, pues YHVH ha decretado el 

mal contra ti.

23

 Entonces Sedequías ben Quenaana se 

acercó y golpeó a Micaías en la mejilla, y 

dijo: ¿Por qué camino pasó de mí el Espí-

ritu de YHVH para hablarte a ti?

24

 Y  Micaías  respondió:  He  aquí,  ¿no  lo 

verás  en  aquel  día  cuando  vayas  escon-

diéndote de aposento en aposento?

25

 Entonces el rey de Israel dijo: Tomad 

a Micaías y hacedlo volver a Amón, go-

bernador de la ciudad, y a Joás, hijo del 

rey,

26

 y decidles: Así ha dicho el rey: Meted 

a éste en la cárcel y dadle pan y agua de 

aflicción hasta que yo vuelva en paz.

27

 Entonces  dijo  Micaías:  ¡Si  vuelves  en 

paz, YHVH no habló por mí!, y agregó:° 

¡Oídlo pueblos todos!

28

 Así, el rey de Israel subió con Josafat 

rey de Judá contra Ramot de Galaad.

29

 Y  el  rey  de  Israel  dijo  a  Josafat:  Me 

disfrazaré y entraré en la batalla, pero tú 

ponte tus atavíos reales. Y el rey de Israel 

se disfrazó, y entraron en la batalla.

30

 Pero el rey de Siria había ordenado a 

los capitanes de sus carros diciendo: No 

luchéis contra pequeño ni contra grande, 

sino sólo contra el rey de Israel.

31

 Cuando  pues  los  capitanes  de  los  ca-

rros  vieron  a  Josafat,  dijeron:  ¡Ése  es  el 

rey de Israel! Así que lo rodearon para lu-

char, pero Josafat clamó, y YHVH lo ayu-

dó. ’Elohim los desvió de él,

18.18 Esto es, el profeta Micaías.  18.27 Lit. y dijo.


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2 Crónicas 18:32

462

32

 porque sucedió que cuando los capita-

nes de los carros vieron que no era el rey 

de Israel, dejaron de perseguirlo.°

33

 Y  un  hombre  tiró  con  el  arco  a  la 

ventura, e hirió al rey de Israel entre las 

junturas de la armadura, por lo que dijo 

al auriga: ¡Vuelve tu mano° y sácame del 

campo, que estoy herido!

34

 Pero  la  batalla  arreció  aquel  día,  por 

lo  cual  el  rey  de  Israel  fue  sostenido  en 

su carro frente a los sirios hasta la tarde, 

pero murió al° ponerse el sol.

Josafat amonestado 

Sus reformas

19

Josafat rey de Judá regresó sano y 

salvo a su casa en Jerusalem.

2

 Pero  el  vidente  Jehú  ben  Hanani  salió 

a  su  encuentro,°  y  dijo  al  rey  Josafat: 

¿Conque ayudas al perverso y amas a los 

que aborrecen a YHVH? Por esto la ira de 

YHVH está sobre ti.°

3

 No obstante, se han hallado en ti cosas 

buenas, pues has eliminado las aseras° de 

la tierra y has dispuesto tu corazón para 

buscar a Ha-’Elohim.

4

 Y Josafat se quedó en Jerusalem, aunque 

salía  a  visitar  al  pueblo  desde  Beerseba 

hasta la serranía de Efraín, para hacerlos 

volver a YHVH, Dios de sus padres.

5

 Y  estableció  jueces  en  cada  una  de  las 

ciudades  fortificadas  del  territorio  de 

Judá;

6

 y advirtió a los jueces: Mirad lo que ha-

céis, porque no juzgáis con autoridad de 

hombres, sino con la de YHVH, que estará 

con vosotros cuando pronunciéis senten-

cia.

7

 Ahora  pues,  el  terror°  de  YHVH  sea 

sobre  vosotros.  Proceded  con  cuidado, 

porque en YHVH nuestro Dios no hay in-

justicia, ni acepción de personas, ni admi-

sión de soborno.

8

 Josafat  también  designó  en  Jerusalem 

a  algunos  levitas  y  sacerdotes,  así  como 

de los cabezas de familias de Israel, para 

la administración de justicia de YHVH, y 

para  los  litigios  de  los  habitantes  de  Je-

rusalem.

9

 Y  les  había  ordenado,  diciendo:  Proce-

ded en el temor° de YHVH con fidelidad y 

con corazón íntegro.

10

 Cuando  vuestros  hermanos,  que  ha-

bitan  en  sus  ciudades,  os  presenten 

cualquier  litigio  por  derramamiento  de 

sangre,  o  bien  os  consulten  sobre  leyes, 

preceptos, mandatos o decretos, vosotros 

los  amonestaréis  para  que  no  se  hagan 

culpables ante YHVH, y no se derrame la 

ira  sobre  vosotros  y  sobre  vuestros  her-

manos. Si actuáis así estaréis exentos de 

culpa.

11

 He  aquí,  el  sumo  sacerdote  Amarías 

presidirá  en  cualquier  asunto  de  YHVH, 

y  Zebadías  ben  Ismael,  gobernador  de 

la casa de Judá, en cualquier asunto del 

rey,° y los levitas actuarán ante vosotros 

como  oficiales.°  ¡Esforzaos  y  actuad,  y 

YHVH esté con el bueno!

Victoria contra Moab y Amón

20

Aconteció después de esto que los 

hijos de Moab y los hijos de Amón, 

y  con  ellos  algunos  de  los  amonitas,° 

marcharon a la guerra contra Josafat.

2

 Y fueron a informar a Josafat, diciendo: 

¡Una gran multitud viene de Siria° contra 

ti, del otro lado del mar,° y he aquí están 

en Hazezon-tamar! (la cual es En-gadi.)

3

 Y Josafat tuvo temor y dispuso su rostro 

para buscar a YHVH, y proclamó un ayu-

no en todo Judá.

4

 Y  los  de  Judá  se  reunieron  para  pedir 

socorro a YHVH, y acudieron de todas las 

ciudades de Judá para buscar a YHVH.

5

 Entonces Josafat se puso de pie en me-

dio  de  la  asamblea  de  Judá  y  de  Jerusa-

lem,  en  la  Casa  de  YHVH,  delante  del 

atrio nuevo,

6

 y dijo: Oh YHVH, Dios de nuestros pa-

dres, ¿no eres sólo Tú el Dios de los cie-

los? ¿No eres Tú quien gobierna todos los 

18.32 Lit. se volvieron de detrás de él.  18.33 Expresión que refiere la acción de tirar de las riendas para girar el carro y em-

prender la huida. 

18.34 Lit. en el tiempo de.  19.2 Lit. salió contra su rostro. Es decir, salió a confrontarlo.  19.2 Lit. por esto, 

la ira de la presencia de YHVH está sobre ti

19.3 

→14.3 nota.  19.7 La palabra implica más que un simple temor reverencial. 

19.9 Esta palabra no es la misma que registra el v. 7, y es la que generalmente se usa en hebreo para referirse al temor reve-

rente que todo creyente debe sentir hacia Dios

19.11 Es decir, cualquier asunto civil.  19.11 Esto es, juez menor u otro tipo de 

secretario judicial, civil o militar

20.1 Aparente inconsistencia del TM.  20.2 Heb. Aram.  20.2 Aquí puede referirse tanto al mar 

de Galilea como al mar Muerto.


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2 Crónicas 20:26

463

reinos de las naciones? En tu mano hay 

fuerza y poder, y no hay quien pueda re-

sistirte.

7

 ¿No arrojaste Tú, oh Dios nuestro, de-

lante de tu pueblo Israel, a los habitantes 

de esta tierra, y la diste para siempre a la 

simiente de tu amigo Abraham?

8

 Y  habitaron  en  ella,  y  en  ella  te  han 

edificado un Santuario para tu Nombre, 

diciendo:

9

 Si nos sobreviene el mal, ya sea con es-

pada, con peste o hambruna, nos congre-

garemos ante esta Casa y ante ti, porque 

tu Nombre está en esta Casa, y clamare-

mos a ti en nuestra aflicción, y Tú nos es-

cucharás y nos salvarás.°

10

 Ahora  pues,  he  aquí  los  hijos  de 

Amón, los de Moab y los del monte Seir, 

a quienes no permitiste que Israel inva-

diera cuando venía de la tierra de Egipto 

(por  eso  se  desviaron  de  ellos  y  no  los 

destruyeron);

11

 he aquí, ellos nos recompensan vinien-

do a echarnos de tu heredad, la cual nos 

diste en posesión.

12

 ¡Oh  Dios  nuestro!  ¿No  los  castigarás 

Tú?  Porque  no  hay  fuerza  en  nosotros 

contra esta gran multitud que viene con-

tra nosotros, ni sabemos qué hacer; por 

eso volvemos nuestros ojos a ti.

13

 Y  todo  Judá  permaneció  en  pie  ante 

YHVH, con sus pequeños, sus mujeres y 

sus hijos.

14

 Entonces el Espíritu de YHVH descen-

dió  en  medio  de  la  congregación  sobre 

Jahaziel ben Zacarías, hijo de Benaía, hijo 

de Jeiel, hijo de Matanías, levita de los hi-

jos de Asaf,

15

 y  dijo:  Oíd  con  atención,  todo  Judá, 

habitantes de Jerusalem, y tú, rey Josafat. 

Así os dice YHVH: No temáis ni os ame-

drentéis  a  causa  de  tan  gran  multitud, 

porque  la  batalla  no  es  vuestra,  sino  de 

Dios.

16

 Descended  contra  ellos  mañana.  He 

aquí ellos suben por la cuesta de Sis, así 

que los encontraréis en el límite del va-

lle,° frente al desierto de Jeruel.

17

 Pero  no  tendréis  que  luchar  en  esta 

ocasión;  resistid  y  estaos  quietos,  y  ved 

la salvación de YHVH para vosotros. ¡Oh 

Judá y Jerusalem, no temáis ni os aterro-

ricéis! Salid mañana contra ellos, porque 

YHVH está con vosotros.

18

 Entonces  Josafat  se  inclinó  rostro  en 

tierra, y todo Judá y los habitantes de Je-

rusalem cayeron ante YHVH, y se postra-

ron delante de YHVH.

19

 Y los levitas, de los hijos de los coati-

tas y de los hijos de los coreítas, se pusie-

ron de pie para alabar con fuertes voces a 

YHVH, el Dios de Israel.

20

 Y  se  levantaron  de  madrugada  y  sa-

lieron  al  desierto  de  Tecoa,  y  cuando 

avanzaban, Josafat se detuvo y dijo: Escu-

chadme, oh Judá, y vosotros, habitantes 

de  Jerusalem:  ¡Creed  en  YHVH  vuestro 

Dios y permaneceréis firmes! ¡Creed a sus 

profetas, y triunfaréis!

21

 Y habiendo consultado con el pueblo, 

designó  a  algunos  que,  vestidos  con  or-

namentos sagrados, cantaran y alabaran a 

YHVH al frente del ejército, diciendo:

¡Alabad a YHVH,

porque para siempre es su 

misericordia!

22

 Y  cuando  comenzaron  a  entonar  los 

cánticos  de  alabanza,°  YHVH  puso  em-

boscadas°  contra  los  hijos  de  Amón,  de 

Moab y del monte Seir, que venían contra 

Judá, y fueron derrotados;

23

 pues los hijos de Amón y de Moab ata-

caron a los del monte Seir hasta que los 

destruyeron por completo; y una vez que 

destruyeron a los de Seir, cada cual ayudó 

a la destrucción de su propio compañero.

24

 Así, cuando Judá llegó a la altura desde 

donde se atalayaba el desierto, dirigieron 

la mirada hacia la multitud, y he aquí que 

ellos no eran sino cadáveres tendidos por 

tierra, sin que nadie hubiera escapado.

25

 Entonces Josafat y su pueblo se llega-

ron para saquear sus despojos, y hallaron 

entre los cadáveres abundantes riquezas, 

y vestiduras, y objetos valiosos, que des-

pojaron  cada  cual  para  sí  hasta  más  no 

poder, y anduvieron tres días recogiendo 

despojos, porque era mucho.

26

 Al  cuarto  día  se  congregaron  en  el 

valle  de  Beracá,  porque  allí  bendijeron 

20.9 

→6.14-42.  20.16 Esto es, un torrente (wadi) que sólo contiene agua durante la estación de lluvias.  20.22 Lit. cuando 

comenzaron con clamor y con alabanza

20.22 Lit. emboscados. El participio alude a personas al acecho. 


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2 Crónicas 20:27

464

a  YHVH.  Por  eso  llamaron  aquel  lugar 

Émeq-berajáh° hasta hoy.

27

 Luego  retornaron  a  Jerusalem  con 

regocijo,  cada  cual  de  los  de  Judá  y  los 

de  Jerusalem,  con  Josafat  al  frente,  por 

cuanto YHVH había hecho que se regoci-

jaran delante de sus enemigos.

28

 Y llegaron a Jerusalem al son de salte-

rios, arpas y trompetas, entrando así a la 

Casa de YHVH.

29

 Y el terror de Dios sobrevino sobre to-

dos los reinos de esas tierras, cuando oye-

ron que YHVH había luchado contra los 

enemigos de Israel.

30

 Y el reino de Josafat fue tranquilo, por-

que su Dios le concedió paz en derredor.

31

 Y Josafat reinó sobre Judá. Tenía treinta y 

cinco años cuando comenzó a reinar, y rei-

nó veinticinco años en Jerusalem. El nom-

bre de su madre era Azuba, hija de Silhi.

32

 Y  anduvo  en  el  camino  de  su  padre 

Asa, y no se apartó de él, haciendo lo recto 

ante los ojos de YHVH.

33

 Sin  embargo,  no  se  abandonaron  los 

lugares altos,° pues el pueblo aún no ha-

bía dispuesto su corazón hacia el Dios de 

sus padres.

34

 El  resto  de  los  hechos  de  Josafat,  los 

primeros y los últimos, he aquí están es-

critos en los hechos de Jehú ben Hanani, 

que  se  hallan  insertos  en  el  rollo  de  los 

Reyes de Israel.

35

 Después de esto, Josafat rey de Judá se 

alió con Ocozías rey de Israel, quien obra-

ba impíamente.°

36

 Y se alió con él para construir navíos 

para ir a Tarsis; y construyeron las naves 

en Ezión-geber.

37

 Entonces Eliezer ben Dodava, de Ma-

resa,  profetizó  contra  Josafat,  diciendo: 

Por  haberte  aliado  con  Ocozías,  YHVH 

destruye tus obras. Y las naves se destro-

zaron y no pudieron ir a Tarsis.

Reinado de Joram de Judá

21

Y durmió Josafat con sus padres, y 

fue sepultado con sus padres en la 

ciudad de David. Y Joram su hijo reinó en 

su lugar.

2

 Y tuvo por hermanos, hijos de Josafat, a 

Azarías, y a Jeiel, y a Zacarías, y a Azarías, 

y a Micael y a Sefatías. Todos estos fueron 

hijos de Josafat, rey de Israel;°

3

 a quienes su padre dio grandes dádivas 

de plata, y de oro, y de cosas preciosas, así 

como ciudades fortificadas en Judá; pero 

el reino se lo dio a Joram, por cuanto era 

su primogénito.

4

 Joram  fue  elevado  pues  al  reino  de  su 

padre, pero cuando se hizo fuerte, pasó a 

cuchillo a todos sus hermanos, y también 

a algunos de los príncipes de Israel.

5

 Joram tenía treinta y dos años cuando 

comenzó a reinar, y reinó ocho años en 

Jerusalem.

6

 Y anduvo en el camino de los reyes de 

Israel,  como  la  casa  de  Acab,  pues  una 

hija de Acab fue su mujer, e hizo lo malo 

ante los ojos de YHVH.

7

 Pero YHVH no quiso destruir la casa de 

David a causa del pacto que había concer-

tado con David, y de conformidad con su 

promesa, que le daría una lámpara a él y a 

sus hijos para siempre.°

8

 En  sus  días  Edom  se  rebeló  contra  el 

dominio de Judá,° e hicieron que un rey 

reinara sobre ellos.

9

 Pero  Joram  avanzó  con  sus  capitanes,  y 

todos sus carros con él; y levantándose de 

noche, atacó a Edom,° que lo había rodeado 

junto con los capitanes de los carros.

10

 No  obstante,  Edom  siguió  rebelándose 

contra  el  dominio  de  Judá  hasta  hoy.  En 

aquel tiempo también se rebeló Libna con-

tra su poder, por cuanto había abandonado a 

YHVH Dios de sus padres.

11

 Construyó además lugares altos en los mon-

tes de Judá, e hizo fornicar° a los habitantes de 

Jerusalem, y también a Judá obligó a ello.

12

 Entonces le llegó una carta del profeta 

Elías, diciendo: Así dice YHVH, el Dios de 

David tu padre: Por cuanto no has andado 

en los caminos de tu padre Josafat, ni en los 

caminos de Asa, rey de Judá,

20.26 Esto es, valle de bendición.  20.33 

→11.15 nota.  20.35 Lit. que era impío al obrar.  21.2 LXX registra Judá. Aunque Josafat 

fue rey de Judá, a veces se aplica el nombre Israel a cualquiera de los dos reinos, pues Dios sigue siendo siempre el Dios de Israel

→2 Cr.20.19. También puede tratarse de un error de copista.  21.7 Lit. todos los días.  21.8 Lit. se rebeló de debajo de la mano de 

Judá

21.9 Ny venció a Edom.  21.11 Este verbo, que se usa para referirse a la fornicación propiamente dicha, alude indudable-

mente a dos tipos de conductas que, desde el punto de vista de Dios, son equiparables al comportamiento de una prostituta: a) Res-

pecto a alianzas políticas de Israel con otras naciones 

→Ez.23.30, y b) al trato de los israelitas con otros dioses. →Ex.34.15,16.


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2 Crónicas 22:10

465

13

 sino que has andado en el camino de 

los reyes de Israel, y has hecho que Judá 

y  los  habitantes  de  Jerusalem  forniquen 

conforme  a  la  fornicación  de  la  casa  de 

Acab,  y  por  cuanto  has  asesinado  a  tus 

hermanos, a la familia° de tu padre, que 

eran mejores que tú,

14

 he aquí YHVH golpea con un gran gol-

pe° a tu pueblo, a tus hijos y a tus muje-

res, y a todas tus posesiones.

15

 Y  tú  mismo  tendrás  grandes  enfer-

medades,°  con  dolencia  de  las  entrañas, 

hasta que salgan tus entrañas por causa 

de la enfermedad que se irá agravando día 

a día.

16

 Y  YHVH  incitó  contra  Joram  el  espí-

ritu  de  los  filisteos  y  de  los  árabes,  que 

estaban junto a los etíopes,

17

 y subieron contra Judá y la invadieron, 

y se llevaron todos los bienes que se en-

contraban en la casa del rey, y también a 

sus hijos y a sus mujeres, y no le quedó 

ningún hijo aparte de Joacaz,° el menor 

de sus hijos.

18

 Después  de  todo  esto,  YHVH  lo  hirió 

con una enfermedad incurable en sus en-

trañas.

19

 Y con el correr del tiempo, al cabo de 

dos  años,  aconteció  que  se  le  salieron 

las entrañas a causa de la enfermedad, y 

murió en medio de grandes dolores. Y su 

pueblo no prendió por él ninguna hogue-

ra, como había hecho por sus padres.°

20

 Tenía  treinta  y  dos  años  cuando  co-

menzó  a  reinar,  y  reinó  en  Jerusalem 

ocho años. Desapareció sin que nadie lo 

lamentara,  y  lo  sepultaron  en  la  ciudad 

de David, pero no en los sepulcros de los 

reyes.

Reinado y muerte de Ocozías 

Atalía

22

Y  los  habitantes  de  Jerusalem  hi-

cieron  que  en  su  lugar  reinara 

Ocozías,  el  menor  de  sus  hijos,  porque 

unas bandas° que habían venido con los 

árabes  al  campamento  habían  matado  a 

todos los hijos mayores.° Así pues reinó 

Ocozías ben Joram, rey de Judá.

2

 De veintidós° años era Ocozías cuando 

comenzó a reinar, y reinó un año en Jeru-

salem. El nombre de su madre era Atalía, 

hija de Omri.°

3

 También  él  anduvo  en  los  caminos  de 

la casa de Acab, y su propia madre fue su 

consejera para que obrara impíamente.

4

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

como  la  casa  de  Acab,  porque  después 

de la muerte de su padre, le aconsejaban 

para perdición suya.

5

 Porque andando en el consejo de ellos, 

fue con Joram ben Acab, rey de Israel, a 

la  guerra  contra  Hazael  rey  de  Siria,  en 

Ramot de Galaad, donde los sirios hirie-

ron a Joram,

6

 quien volvió a Jezreel para ser curado de 

las heridas que le habían hecho en Ramá 

cuando  combatía  contra  Hazael  rey  de 

Siria. Y Azarías° ben Joram, rey de Judá, 

bajó  a  ver  a  Joram  ben  Acab  en  Jezreel, 

pues estaba enfermo.

7

 Pero la derrota de Ocozías era designio 

de Dios, por haber ido a ver a Joram.° Al 

llegar  allí,  salió  con  Joram  contra  Jehú 

hijo de Nimsi, a quien YHVH había ungi-

do para exterminar la casa de Acab.

8

 Y cuando Jehú hacía justicia con la casa 

de Acab, encontró a los príncipes de Judá 

y a los hijos de los hermanos de Ocozías, 

que estaban al servicio de Ocozías, y los 

mató.

9

 También buscó a Ocozías, al cual pren-

dieron cuando estaba escondido en Sama-

ria, y lo trajeron ante Jehú, y lo mataron. 

Pero lo sepultaron, porque dijeron: Es el 

hijo  de  Josafat,  que  buscó  a  YHVH  con 

todo su corazón. Y no quedó ninguno de la 

casa de Ocozías capaz de retener el reino.

10

 Cuando Atalía, madre de Ocozías, vio 

que su hijo había muerto, se levantó para 

21.13 Lit. casa. LXX y Sir. registran a los hijos.  21.14 La expresión se relaciona con el juicio de Dios, y puede aludir a una plaga o 

pestilencia, o cualquier otro azote con el que Dios castiga a su pueblo por las iniquidades cometidas. 

21.15 La expresión puede 

entenderse en forma literal (numerosas enfermedades) o en forma literaria, una enfermedad que le provocará grandes dolores. 

21.17 Esto es, Ocozías.  21.19 Lit. como la hoguera de sus padres 

→16.14.  22.1 Esto es, grupos armados que realizaban incur-

siones en los territorios de Judá y de Israel

22.1 Lit. a todos los primeros.  22.2 Inconsistencia del TM, el cual registra cuarenta 

y dos 

→21.20.  22.2 Al igual que la palabra hijo, el término hija no se refiere necesariamente a la descendiente inmediata de 

una persona, sino que puede aludir a una nieta (como en este caso) o a un descendiente más lejano; seguramente, a Atalía se 

la llama hija de Omri porque éste había sido el fundador de su dinastía. 

22.6 Esto es, Ocozías.  22.7 Lit. sin embargo venía de 

Dios la destrucción de Ocozías al ir a Joram.


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2 Crónicas 22:11

466

exterminar a toda la estirpe real de la casa 

de Judá.

11

 Pero Josabet, hija del rey, tomó a Joás, 

hijo de Ocozías, y se lo llevó furtivamente 

de entre los hijos del rey que estaban sien-

do asesinados y lo escondió° juntamente 

con su nodriza en uno de los aposentos. 

Así Josabet, hija del rey Joram, mujer del 

sacerdote Joiada, la cual era hermana de 

Ocozías, lo escondió de Atalía,° y ella no 

pudo darle muerte.

12

 Y estuvo con ellos escondido en la Casa 

de Dios seis años, mientras Atalía reinaba 

sobre el país.

Joiada – Joás 

Muerte de Atalía

23

Pero  en  el  año  séptimo  Joiada  se 

hizo  fuerte,  y  concertó  un  pacto 

con  los  capitanes  de  centenas:  con  Aza-

rías ben Jeroham, e Ismael ben Johanán, 

y Azarías ben Obed, y Maasías ben Adaía, 

y Elisafat ben Zicri.

2

 Y recorrieron Judá para convocar a los 

levitas de todas las ciudades de Judá y a 

los cabezas de las familias de Israel, y fue-

ron a Jerusalem.

3

 Entonces  toda  la  asamblea  hizo  una 

alianza  respecto°  al  rey  en  la  Casa  de 

Dios, y él° les dijo: He aquí, el hijo del rey 

reinará, tal como YHVH habló acerca de 

los hijos de David.

4

 Esto es lo que haréis: un tercio de voso-

tros, los sacerdotes y los levitas que en-

tran en el shabbat, estarán de porteros en 

las puertas.

5

 Otro tercio estará en la casa real, y otro 

tercio,  en  la  puerta  del  Fundamento;  y 

todo  el  pueblo  estará  en  los  atrios  de  la 

Casa de YHVH.

6

 Pero nadie entrará en la Casa de YHVH, 

excepto  los  sacerdotes  y  los  levitas  que 

ministran; sólo éstos podrán entrar, por-

que están consagrados, pero todo el pue-

blo deberá guardar el mandato de YHVH.

7

 Los  levitas  rodearán  al  rey  por  todas 

partes, arma en mano, y cualquiera que 

entre  en  la  Casa  será  muerto;  y  estaréis 

con el rey cuando entre y cuando salga.

8

 Y los levitas y todo Judá hicieron con-

forme a todo lo que había ordenado el sa-

cerdote Joiada. Tomaron cada uno a sus 

hombres,  a  los  que  habían  de  entrar  en 

el shabbat y a los que habían de salir del 

shabbat, pues el sacerdote Joiada no dio 

licencia a ninguno de los grupos.°

9

 Después  el  sacerdote  Joiada  entregó  a 

los  capitanes  de  centenas  las  lanzas,  los 

escudos y los paveses del rey David, que 

estaban en la Casa de Dios.

10

 Y emplazó a todo el pueblo, cada uno 

con su dardo° en la mano, desde el cos-

tado derecho de la Casa hasta el costado 

izquierdo° de esta, delante del altar y de la 

Casa, alrededor del rey.

11

 Luego sacaron al hijo del rey, le pusie-

ron la corona, le dieron el Testimonio° y 

lo proclamaron rey. Y Joiada y sus hijos lo 

ungieron diciendo: ¡Viva el rey!

12

 Cuando Atalía oyó el ruido de la gente 

que corría y aclamaba al rey, se acercó al 

pueblo en la Casa de YHVH.

13

 Y miró, y he aquí el rey de pie en su 

estrado a la entrada, y los capitanes y los 

trompeteros junto al rey; y todo el pue-

blo  de  la  tierra  estaba  alborozado  y  ha-

cía  sonar  las  trompetas,  y  los  cantores 

con los instrumentos musicales dirigían 

las  aclamaciones.  Entonces  Atalía  rasgó 

sus vestiduras y exclamó: ¡Conspiración! 

¡Conspiración!

14

 Pero el sacerdote Joiada hizo salir a los 

capitanes de centenas que mandaban la tro-

pa, y les dijo: ¡Dejadla pasar entre las filas, 

y cualquiera que la siga, que sea muerto a 

espada! Pues el sacerdote había advertido: 

No la matéis en la Casa de YHVH.

15

 Y le abrieron paso, y cuando llegaba a 

la entrada de la puerta de los caballos en 

la casa real, allí le dieron muerte.

16

 Entonces  Joiada  pactó  con  todo  el 

pueblo  y  el  rey  que  serían  el  pueblo  de 

YHVH.

17

 Después todo el pueblo fue al templo 

de Baal y lo destruyó, y rompió sus altares 

y sus imágenes a pedazos, y dio muerte a 

Matán, sacerdote de Baal, delante de los 

altares.

22.11 Lit. puso.  22.11 Lit. de delante de Atalía.  23.3 Lit. con el rey.  23.3 Esto es, el sacerdote Joiada.  23.8 Lit. clases

→1 Cr. 

c.23–26. 

23.10 Prob. se refiere al arma de cada uno.  23.10 En la usanza bíblica, el E está al frente o adelante, por lo que la 

izquierda y la derecha señalan al N y al S respectivamente. 

23.11 Esto es, copia del Rollo de la Ley

→Dt.17.18-19. 


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2 Crónicas 24:18

467

18

 Y Joiada encargó los ministerios de la 

Casa de YHVH a los sacerdotes° levitas,° a 

quienes David había distribuido en la Casa 

de  YHVH  para  ofrecer  los  holocaustos  a 

YHVH, conforme a lo escrito en la Ley de 

Moisés, con regocijo y cánticos, conforme 

a las disposiciones de David.

19

 También  estableció  porteros  en  las 

puertas de la Casa de YHVH, para que na-

die impuro entrara por ningún motivo.

20

 Luego tomó a los capitanes de cente-

nas, y a los nobles, a los magistrados y a 

todo el pueblo de la tierra, e hizo bajar al 

rey desde la Casa de YHVH, y pasaron por 

la puerta superior a la casa real, e hicie-

ron que el rey se sentara sobre el trono 

del reino.

21

 Y todo el pueblo de la tierra estaba ju-

biloso, y la ciudad cobró sosiego después 

que Atalía fue muerta a espada.

Reinado de Joás de Judá

24

Joás  era  de  siete  años  cuando  co-

menzó  a  reinar,  y  reinó  cuarenta 

años en Jerusalem. El nombre de su ma-

dre era Sibia, de Beerseba.

2

 Y Joás hizo lo recto ante los ojos de YHVH 

todos los días del sacerdote Joiada.

3

 Y Joiada tomó para él dos mujeres, y en-

gendró hijos e hijas.

4

 Aconteció  después  de  esto  que  Joás  se 

propuso restaurar la Casa de YHVH.

5

 Y reunió a los sacerdotes y a los levitas, 

y les dijo: Salid por las ciudades de Judá y 

reunid dinero° de todo Israel para restau-

rar la Casa de vuestro Dios anualmente, 

y tratad de apresurar el asunto. Pero los 

levitas no se dieron prisa.

6

 Entonces el rey llamó al sumo sacerdote 

Joiada,  y  le  dijo:  ¿Por  qué  no  requeriste 

de  los  levitas  que  trajeran  de  Judá  y  de 

Jerusalem el tributo de Moisés, siervo de 

YHVH, y de la asamblea de Israel, para la 

Tienda de Reunión?°

7

 Porque los hijos de la impía Atalía ha-

bían deteriorado la Casa de Dios, y además 

habían usado para los baales todos los ob-

jetos consagrados de la Casa de YHVH.

8

 El rey dispuso entonces que hicieran un 

cofre, y lo colocaran fuera, en la entrada 

de la Casa de YHVH.

9

 Y pregonaron por Judá y Jerusalem que 

trajeran  a  YHVH  lo  que  Moisés  siervo  de 

Dios había prescrito a Israel en el desierto.°

10

 Y todos los príncipes y los del pueblo se 

alegraron, y trajeron y echaron en el cofre 

hasta llenarlo.°

11

 Y cuando venía el momento de llevar el 

cofre a la inspección real por mano de los 

levitas, si veían que la plata era mucha, en-

tonces el escriba del rey y el secretario del 

sumo sacerdote, vaciaban el cofre y lo vol-

vían a trasladar a su lugar. Así hacían diaria-

mente, y recogían dinero en abundancia.

12

 Y el rey y Joiada lo entregaban a los que 

hacían  la  obra  del  servicio  de  la  Casa  de 

YHVH. Y contrataron canteros y ebanistas 

para restaurar la Casa de YHVH, así como 

artífices de hierro y bronce para reparar la 

Casa de YHVH.

13

 Trabajaron  pues  los  encargados  de  la 

obra,  y  la  restauración  progresó  por  su 

mano, y devolvieron así la Casa de Dios a 

su antigua condición, y la consolidaron.

14

 Cuando  hubieron  terminado,  presen-

taron  ante  el  rey  y  Joiada  el  resto  de  la 

plata, e hicieron con ella utensilios para 

la Casa de YHVH: objetos para el servicio 

y para los holocaustos, cucharas y otros 

objetos de oro y de plata. Y todos los días 

de Joiada se ofrecieron holocaustos, con-

tinuamente en la Casa de YHVH.

15

 Pero Joiada envejeció, y murió saciado 

de días. Era de ciento treinta años cuando 

murió.

16

 Y  lo  sepultaron  con  los  reyes  en  la 

ciudad de David, por cuanto había hecho 

mucho  bien  a  Israel,  y  respecto  a  Ha-

’Elohim y su Casa.

17

 Pero después de la muerte de Joiada, 

los príncipes de Judá fueron y se inclina-

ron ante el rey, y el rey los escuchó.

18

 Y abandonaron la Casa de YHVH, Dios de 

sus padres, y sirvieron a los árboles rituales 

de Asera° y a los ídolos; y a causa de su cul-

pa, la ira° cayó sobre Judá y Jerusalem.

23.18 Nestableció las guardias de la Casa de YHVH mediante los sacerdotes

→2 R.11.18.  23.18 LXX: los sacerdotes y los le-

vitas

24.5 Lit. plata.  24.6 

→Ex.30.11-16.  24.9 Lit. el impuesto de Moisés sobre Israel en el desierto.  24.10 Lit. hasta acabar

Este verbo puede ser traducido de dos maneras: a) si entendemos que está relacionado con el cofre, se ha de traducir hasta 

llenarlo; o b) si se considera el verbo ligado al sujeto de la oración, la traducción debe ser hasta que todos echaron (es decir, 

hasta que se acabó el número de personas que debían contribuir). 

24.18 

→14.3 nota.  24.18 Esto es, la ira de Dios.


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2 Crónicas 24:19

468

19

 No obstante, Él les envió profetas que 

los hicieran volver a YHVH, los cuales los 

amonestaron, pero no prestaron oído.

20

 Entonces el Espíritu de Dios revistió a 

Zacarías, hijo del sacerdote Joiada, quien 

presentándose°  ante  el  pueblo,  les  dijo: 

Así dice Ha-’Elohim: ¿Por qué traspasáis 

los mandamientos de YHVH? No prospe-

raréis,  porque  por  haber  abandonado  a 

YHVH, Él también os abandonará.

21

 Pero conspiraron contra él y lo mata-

ron a pedradas en el atrio de la Casa de 

YHVH por mandato del rey.

22

 Así el rey Joás no se acordó de la mise-

ricordia que su padre Joiada había tenido 

con él, sino que asesinó a su hijo, quien 

al morir exclamó: ¡YHVH lo vea y lo de-

mande!°

23

 Y sucedió que al cabo de un año subió 

contra él un ejército de Siria, y llegaron a 

Judá y Jerusalem y exterminaron a todos 

los príncipes de entre el pueblo, y envia-

ron todo su despojo al rey de Damasco.

24

 Y aunque el ejército de Siria había su-

bido con pocos hombres, YHVH entregó a 

un  gran  ejército  en  su  mano,  por  cuanto 

habían abandonado a YHVH, el Dios de sus 

padres. Así ejecutaron el juicio contra Joás.

25

 Y cuando se apartaron de él, dejándolo 

con  muchos  sufrimientos,°  sus  propios 

siervos conspiraron contra él por la san-

gre de los hijos del sacerdote Joiada, y lo 

hirieron en su lecho, y murió. Y lo sepul-

taron en la ciudad de David, pero no en 

los sepulcros de los reyes.

26

 Y éstos son los que conspiraron contra 

él:  Zabad,  hijo  de  Simeat,  la  amonita,  y 

Jozabad, hijo de Simrit, la moabita.

27

 Acerca de sus hijos y de cómo se mul-

tiplicaron los oráculos contra él, así como 

de la restauración de la Casa de Dios, he 

aquí están escritos en el relato del rollo 

de los Reyes. Y reinó en su lugar su hijo 

Amasías.

Reinado de Amasías de Judá

25

Amasías  comenzó  a  reinar  cuan-

do era de veinticinco años, y reinó 

veintinueve años en Jerusalem. El nombre 

de su madre era Joadán, de Jerusalem.

2

 E hizo lo recto a ojos de YHVH, aunque 

no con un corazón íntegro.

3

 Cuando se le consolidó el reino, mató a 

sus siervos que habían matado a su padre 

el rey;

4

 pero no dio muerte a los hijos de ellos, 

conforme a lo escrito en la Ley, en el rollo 

de Moisés, donde YHVH había ordenado, 

diciendo:  No  morirán  los  padres  por  los 

hijos, ni los hijos morirán por los padres, 

sino que cada hombre morirá por su pe-

cado.°

5

 Después Amasías reunió a los de Judá y 

los ordenó conforme a sus casas paternas, 

bajo  capitanes  de  millares  y  capitanes 

de  centenas,  por  todo  Judá  y  Benjamín. 

E hizo un censo de ellos, de veinte años 

arriba,  de  los  cuales  había°  trescientos 

mil  escogidos,  que  salían  a  la  guerra  y 

portaban lanza y pavés.

6

 Además,  tomó  a  sueldo  a  cien  mil  va-

lientes guerreros de Israel por cien talen-

tos de plata.

7

 Pero un varón de Dios fue a él, dicien-

do: Oh rey, no dejes que el ejército de Is-

rael vaya contigo, porque YHVH no está 

con Israel ni con ninguno de los hijos de 

Efraín.

8

 Si fueras con ellos a la batalla, por mu-

cho que te esfuerces, ’Elohim te derribará 

delante del enemigo, porque en ’Elohim 

está la facultad de ayudar o de derribar.

9

 Y Amasías preguntó al varón de Dios: ¿Y 

qué haremos en cuanto a los cien talentos 

que pagué al ejército de Israel? Y el varón 

de  Dios  le  respondió:  YHVH  tiene  para 

darte mucho más que eso.

10

 Así Amasías hizo apartar a la tropa que 

había venido a él desde Efraín, para que 

volvieran a su lugar, por lo que la ira de 

ellos se encendió en gran manera contra 

Judá, y retornaron indignados a su lugar.

11

 Pero Amasías se fortaleció, y al frente 

de su pueblo fue al valle de la Sal y mató a 

diez mil de los hijos de Seir.

12

 Y los hijos de Judá capturaron vivos a 

otros diez mil, y los llevaron a la cumbre 

de la peña, y los arrojaron desde la cum-

bre de la peña, y todos ellos se hicieron 

pedazos.

24.20  Lit.  se  puso  de  pie  por  encima  del  pueblo.  24.22 

→Lc.11.48-51.  24.25  Se  refiere  a  las  heridas  de  guerra. 

25.4 

→Dt.24.16.  25.5 Lit. y encontró de ellos.


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2 Crónicas 26:7

469

13

 Pero los soldados de la tropa que Ama-

sías había despedido para que no fueran 

con  él  a  la  batalla,  irrumpieron  en  las 

ciudades  de  Judá,  desde  Samaria  hasta 

Bet-jorón, y mataron a tres mil de ellos y 

tomaron un gran botín.

14

 Pero aconteció que, después que Amasías 

regresó de la matanza de los edomitas, se 

trajo consigo los dioses de los hijos de Seir, 

y los puso para que fueran dioses suyos, y se 

postró ante ellos, y les quemó incienso.

15

 Entonces la ira de YHVH se encendió 

contra Amasías, y le envió un profeta que 

le dijo: ¿Por qué has ido en pos de los dio-

ses de un pueblo que no pudo ser librado 

por ellos de tu mano?

16

 Y  sucedió  que  mientras  le  hablaba, 

él  le  respondió:  ¿Acaso  te  hemos  puesto 

por consejero real? ¡Detente, no sea que 

te  maten!°  Entonces  el  profeta  desistió, 

pero agregó: Yo sé que ’Elohim ha decidi-

do destruirte, porque has hecho esto y no 

atiendes a mi consejo.

17

 Después  Amasías,  rey  de  Judá,  tomó 

consejo y envió a decir a Joás ben Joacaz, 

hijo de Jehú, rey de Israel: ¡Ven, veámo-

nos cara a cara!

18

 Y  Joás,  rey  de  Israel,  envió  a  decir  a 

Amasías, rey de Judá: El cardo que estaba 

en  el  Líbano  envió  a  decir  al  cedro  que 

estaba en el Líbano: Da tu hija por mujer 

a mi hijo. Y pasó una fiera del Líbano° y 

pisoteó el cardo.

19

 Tú dices: He aquí he vencido a Edom, 

y con eso tu corazón se enaltece. Ahora, 

quédate en tu casa, pues ¿por qué habrás 

de meterte en conflictos contra la adver-

sidad, y caer tú y Judá contigo?

20

 Pero Amasías no escuchó, porque esto 

provenía de Dios, que los quería entregar 

en su mano por haber ido en pos de los 

dioses de Edom.

21

 Subió  pues  Joás,  rey  de  Israel,  y  él  y 

Amasías, rey de Judá, se vieron las caras 

en Bet-semes, que pertenece a Judá.

22

 Y Judá fue derrotado por Israel, y hu-

yeron, cada uno a sus tiendas.

23

 Y Joás, rey de Israel, capturó a Amasías, 

rey de Judá, hijo de Joás, hijo de Joacaz,° 

en  Bet-semes,  y  lo  llevó  a  Jerusalem,  y 

abrió una brecha de cuatrocientos codos 

en el muro de Jerusalem, desde la puerta 

de Efraín hasta la puerta de la esquina.

24

 Y tomó todo el oro y la plata, y todos 

los  utensilios  que  fueron  hallados  en  la 

Casa de Dios a cargo de Obed-edom, así 

como los tesoros de la casa real; y tomó 

rehenes y volvió a Samaria.

25

 Y Amasías ben Joás, rey de Judá, vivió 

quince años después de la muerte de Joás 

ben Joacaz, rey de Israel.

26

 El resto de los hechos de Amasías, pri-

meros y últimos, he aquí ¿no están escritos 

en el rollo de los Reyes de Judá y de Israel?

27

 Y  desde  el  tiempo  en  que  Amasías  se 

apartó  de  YHVH,  tramaron  una  conjura 

contra  él  en  Jerusalem;  y  él  huyó  a  La-

quis,  pero  mandaron  tras  él  a  Laquis,  y 

allí lo hicieron morir,

28

 y lo llevaron sobre caballos y lo sepulta-

ron con sus padres en la ciudad de Judá.°

Reinado de Uzías (Azarías) de Judá

26

Entonces  todo  el  pueblo  de  Judá 

tomó  a  Uzías,  que  tenía  dieciséis 

años, e hicieron que reinara en lugar de 

su padre Amasías.

2

 Él  reconstruyó  Elot°  y  la  restituyó  a 

Judá, después de que el rey durmiera con 

sus padres.

3

 Uzías  era  de  dieciséis  años  cuando  co-

menzó a reinar, y reinó cincuenta y dos 

años en Jerusalem. El nombre de su ma-

dre era Jecolías, de Jerusalem.

4

 E hizo lo recto a ojos de YHVH, confor-

me  a  todo  lo  que  había  hecho  su  padre 

Amasías.

5

 Y persistió en buscar a ’Elohim en los 

días de Zacarías, entendido en visiones de 

Dios.° Y en los días en que buscó a YHVH, 

Ha-’Elohim lo hizo prosperar.

6

 Y salió a combatir contra los filisteos, y 

derribó el muro de Gat, el muro de Jabnia 

y el muro de Asdod, y edificó ciudades en 

la región de Asdod, entre los filisteos.

7

 Y Ha-’Elohim lo ayudó contra los filis-

teos,  y  contra  los  árabes  que  vivían  en 

Gur-baal, y contra los meunitas.

25.16 Lit. ¿por qué te matarán?  25.18 Lit. una fiera del campo que está en el Líbano.  25.23 Este Joacaz no puede ser otro 

que Ocozías rey de Judá. 

→22.11.  25.28 Mención indirecta de Jerusalem, ciudad de David.  26.2 Esto es, Elat. →2 R.14.22. 

26.5 Lit. entendido en ver a Dios. Es decir, profeta


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2 Crónicas 26:8

470

8

 Y los amonitas pagaron tributo a Uzías, 

y su fama se extendió hasta la entrada de 

Egipto, pues se había hecho sumamente 

fuerte.

9

 Asimismo Uzías edificó torres en Jeru-

salem, junto a la puerta de la esquina, y 

en la entrada del valle, y en el ángulo en-

trante del muro,° y las fortificó.

10

 También edificó torres en el desierto, 

y  excavó  muchas  cisternas,  pues  tenía 

numerosos  ganados,  tanto  en  la  Sefelá° 

como  en  la  planicie;°  poseía  además  la-

briegos  y  viñadores,  en  los  montes  y  en 

las regiones fértiles, pues amaba la agri-

cultura.

11

 Uzías  tuvo  un  ejército  de  guerreros 

que  salían  a  la  guerra  por  escuadrones, 

según  el  recuento  que  hacía  el  escriba 

Jeiel, y Maasías, el magistrado, bajo la di-

rección de Hananías, uno de los príncipes 

del rey.

12

 El número total de jefes de casas pa-

ternas, hombres de valor, era dos mil seis-

cientos,

13

 bajo  los  cuales  había  un  ejército  de 

trescientos  siete  mil  quinientos  podero-

sos guerreros, para ayudar al rey contra 

el enemigo.

14

 Y Uzías preparó para ellos, para todo el 

ejército, escudos, lanzas, yelmos, corazas y 

arcos, así como hondas para tirar piedras.°

15

 E  hizo  en  Jerusalem  artefactos,  in-

ventados  por  hombres  ingeniosos,  para 

lanzar flechas y grandes piedras, y fueron 

emplazados sobre las torres y sobre las es-

quinas. Y su fama se extendió lejos, por-

que fue ayudado maravillosamente hasta 

que llegó a ser fuerte.

16

 Sin embargo, cuando llegó a ser fuerte, 

su corazón se enalteció hasta corromper-

se,° y fue infiel a YHVH su Dios, pues llegó 

a entrar en la Casa de YHVH para quemar 

incienso sobre el altar del incienso.

17

 Tras él entró el sacerdote Azarías junto 

con  ochenta  sacerdotes  de  YHVH,  hom-

bres de valor,

18

 quienes se plantaron ante el rey Uzías, 

y le dijeron: ¡Oh Uzías, no te corresponde 

a  ti  quemar  incienso  a  YHVH,  sino  a  los 

sacerdotes hijos de Aarón, que están san-

tificados  para  quemar  incienso!  Sal  del 

Santuario, pues has sido infiel, y esto no te 

será por honra de parte de YHVH ’Elohim.

19

 Pero Uzías, quien tenía un incensario 

en su mano para quemar incienso, se irri-

tó; y en cuanto se irritó con los sacerdo-

tes, la lepra le brotó en la frente, delante 

de  los  sacerdotes,  en  la  Casa  de  YHVH, 

junto al altar del incienso.

20

 Y cuando el sumo sacerdote Azarías y 

todos los sacerdotes se volvieron hacia él, 

he aquí tenía leprosa la frente; entonces 

lo hicieron salir deprisa de allí, y él mis-

mo se dió prisa en salir, porque YHVH lo 

había herido.

21

 Y el rey Uzías fue leproso hasta el día 

de  su  muerte,  y  habitó  leproso  en  una 

casa aislada, pues había sido excluido de 

la Casa de YHVH. Y su hijo Jotam quedó a 

cargo de la casa real, juzgando al pueblo 

de la tierra.

22

 El resto de los hechos de Uzías, los pri-

meros y los últimos, lo escribió el profeta 

Isaías ben Amoz.

23

 Y durmió Uzías con sus padres, pero lo 

sepultaron con sus padres en el campo° de 

los sepulcros reales, porque dijeron: Es le-

proso. Y en su lugar reinó su hijo Jotam.

Reinado de Jotam de Judá

27

Jotam  era  de  veinticinco  años 

cuando comenzó a reinar, y reinó 

dieciséis  años  en  Jerusalem.  El  nombre 

de su madre era Jerusa, hija de Sadoc.

2

 E hizo lo recto a ojos de YHVH, confor-

me  a  todo  lo  que  había  hecho  su  padre 

Uzías, salvo que no entró en el Santuario 

de YHVH. Sin embargo, el pueblo conti-

nuaba corrompiéndose.

3

 Él edificó la entrada superior de la Casa 

de YHVH, e hizo muchas edificaciones en 

el muro de Ófel.°

26.9 Esto es, al lado E del muro de Jerusalem. 

→Neh.3.19 ss.  26.10 Planicie costera de Israel.  26.10 Territorio que se extendía 

al E del Mar Muerto, entre el Arnón y el Hesbón, perteneciente a la tribu de Rubén 

→Jos.13.15-17, reconquistado por Uzías 

tras un tiempo de dominación moabita o amonita. 

26.14 Lit. así como para piedras de hondas.  26.16 Nhasta obrar corrupta-

mente

26.23 Es decir, que para no contaminar el sepulcro de los reyes, el cuerpo de Uzías, que había muerto leproso, no fue 

sepultado en los sepulcros reales, sino en el terreno circundante. 

27.3 Este término, que podría ser traducido como montículo o 

colina, suele usarse como nombre propio para referirse a la altura fortificada que había en el interior de la ciudad de Jerusalem 

(en la colina oriental, al O de la Casa). 


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2 Crónicas 28:14

471

4

 También  edificó  ciudades  en  la  región 

montañosa de Judá, y construyó fortale-

zas y torres en los bosques.

5

 Luchó  además  contra  el  rey  de  los  hi-

jos de Amón, y prevaleció sobre ellos. En 

aquel año los amonitas le dieron cien ta-

lentos de plata, diez mil coros° de trigo y 

diez  mil  de  cebada.  Los  amonitas  le  pa-

garon también esto en el segundo y en el 

tercer año.

6

 Así Jotam se fortaleció, porque dispuso 

sus caminos delante de YHVH su Dios.

7

 El resto de los hechos de Jotam, todas 

sus guerras y sus caminos, he aquí están 

escritos en el rollo de los Reyes de Israel 

y de Judá.

8

 Era de veinticinco años cuando comen-

zó a reinar, y reinó dieciséis años en Je-

rusalem.

9

 Y durmió Jotam con sus padres, y lo se-

pultaron en la ciudad de David, y reinó en 

su lugar su hijo Acaz.

Reinado de Acaz de Judá

28

Acaz era de veinte años cuando co-

menzó a reinar, y reinó dieciséis años 

en Jerusalem, pero no hizo lo recto ante los 

ojos de YHVH como David su padre,

2

 sino que anduvo en los caminos de los 

reyes de Israel, y también hizo imágenes 

de fundición para los baales.

3

 Él mismo quemó incienso en el valle de 

Ben-hinom,° e hizo pasar a sus hijos por 

el  fuego,  conforme  a  las  abominaciones 

de los pueblos que YHVH había expulsado 

de delante de los hijos de Israel.

4

 Además, sacrificó y quemó incienso en 

los lugares altos,° sobre los collados, y de-

bajo de todo árbol frondoso.°

5

 Por lo cual YHVH su Dios lo entregó en 

mano  del  rey  de  los  sirios,  los  cuales  lo 

derrotaron y le tomaron gran número de 

prisioneros que llevaron a Damasco. Fue 

también  entregado  en  manos  del  rey  de 

Israel, que le causó una gran derrota.

6

 Porque  Peka  ben  Remalías  mató  en 

Judá a ciento veinte mil hombres en un 

solo día, todos ellos hombres de valor, por 

cuanto  habían  abandonado  a  YHVH,  el 

Dios de sus padres.

7

 Asimismo  Zicri,  un  valiente  de  Efraín, 

mató a Maasías, hijo del rey, a Azricam, 

mayordomo  del  palacio,  y  a  Elcana,  se-

gundo después del rey.

8

 Los hijos de Israel capturaron también 

de sus hermanos a doscientos mil, entre 

mujeres,  muchachos  y  muchachas.°  To-

maron de ellos además un gran botín y se 

lo llevaron a Samaria.

9

 Pero  había  allí  un  profeta  de  YHVH, 

cuyo nombre era Oded, quien salió al en-

cuentro del ejército que regresaba a Sa-

maria, y les dijo: He aquí, a causa de la ira 

contra  Judá,  YHVH,  el  Dios  de  vuestros 

padres los ha entregado en vuestra mano, 

pero vosotros los habéis matado con un 

furor que ha llegado hasta los cielos.

10

 Y ahora os proponéis someter a los hijos 

de Judá y de Jerusalem para que sean vues-

tros esclavos y esclavas. ¿No habéis pecado 

ya bastante contra YHVH vuestro Dios?°

11

 Ahora  pues,  oídme,  y  haced  volver  a 

los cautivos que habéis tomado de vues-

tros hermanos, pues el ardor de la ira de 

YHVH está contra vosotros.

12

 Entonces algunos hombres de los prín-

cipes  efraimitas  (Azarías  ben  Johanán, 

Berequías  ben  Mesilemot,  Ezequías  ben 

Salum y Amasa ben Hadlai) se levantaron 

contra los que venían de la batalla,

13

 y les dijeron: No traigáis acá a los cau-

tivos,  porque  el  pecado  contra  YHVH° 

estará  sobre  nosotros.  ¿Por  qué  tratáis 

de  añadir  a  nuestros  pecados  y  a  nues-

tras culpas, siendo que nuestra culpa es 

grande, y que el ardor de su ira está sobre 

Israel?

14

 Entonces  los  hombres  armados  deja-

ron a los cautivos y el botín delante de los 

príncipes y de toda la congregación.

27.5 

→2.10 nota.  28.3 El valle de Ben-hinom estaba situado al S de Jerusalem, famoso por ser allí donde los habitantes de 

Judá cometieron sus más grandes abominaciones. Estaba allí el lugar alto conocido como Tofet 

→Jer.7.31, donde los israelitas 

llegaron a ofrecer niños al dios Moloc 

→2 R.16.3. El rey Josías destruyó ese lugar y lo convirtió en un crematorio →2 R.23.10, 

basurero que vendría a ser conocido como Gehena

→Mt.5.22.  28.4 →11.15 nota.  28.4 Se refiere a árboles considerados 

sagrados a la sombra de los cuales se realizaban ritos idólatras. Generalmente estos árboles se encontraban en los lugares 

altos dedicados a la adoración de divinidades cananeas (Baal o Asera). 

28.8 Lit. a doscientas mil mujeres, hijos e hijas.  28.10 

Lit. ¿acaso no tenéis con vosotros culpas hacia YHVH vuestro Dios? 

28.13 Lit. la culpa de YHVH. Es decir, un pecado extrema-

damente terrible


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2 Crónicas 28:15

472

15

 Y los hombres que habían sido desig-

nados  por  nombre,  se  levantaron  y  to-

maron a los cautivos, y con los despojos 

vistieron a todos los que estaban desnu-

dos entre ellos; los vistieron y los calza-

ron, e hicieron que comieran y bebieran, 

y los ungieron, y condujeron a los débiles 

en asnos, y los llevaron a Jericó, la ciudad 

de las palmeras, cerca de sus hermanos; y 

ellos volvieron a Samaria.

16

 En aquel tiempo el rey Acaz envió a pe-

dir ayuda a los reyes de Asiria,

17

 porque  los  edomitas  habían  venido 

nuevamente y atacado a Judá, y se habían 

llevado algunos cautivos.

18

 También los filisteos habían irrumpido 

en las ciudades de la Sefelá y del Neguev° 

de  Judá,  y  habían  capturado  Bet-semes, 

Ajalón, Gederot y Soco con sus aldeas, y 

Timna  con  sus  aldeas,  y  Gimzo  con  sus 

aldeas, y se habían establecido allí.

19

 Por  cuanto  YHVH  había  humillado  a 

Judá a causa de Acaz rey de Judá,° quien 

había permitido el desenfreno en Judá, y 

había prevaricado contra YHVH.

20

 Y Tiglat-Pilneser, rey de Asiria, fue a él, 

pero lo afligió en lugar de fortalecerlo,

21

 porque  Acaz  había  despojado  la  Casa 

de YHVH, y la casa real, y la de los prín-

cipes, para pagar al rey de Asiria, pero de 

nada le sirvió.°

22

 Con  todo,  en  el  tiempo  de  su  angus-

tia, este rey Acaz aumentó su infidelidad 

a YHVH,

23

 pues ofreció sacrificios a los dioses de 

los  damascenos,  que  lo  habían  vencido, 

pues  decía:  Ya  que  los  dioses  de  los  re-

yes de Siria los han ayudado, yo también 

ofreceré  sacrificios  a  ellos  para  que  me 

ayuden. Pero ellos fueron la ruina para él 

y para todo Israel.

24

 Acaz recogió además los objetos de la 

Casa de Dios, e hizo pedazos los objetos 

de la Casa de Dios, y cerró las puertas de 

la Casa de YHVH, y se hizo altares en cada 

rincón de Jerusalem.

25

 Y en cada una de las ciudades de Judá 

erigió lugares altos para quemar incien-

so a otros dioses, provocando así la ira de 

YHVH, el Dios de sus padres.

26

 El resto de sus hechos, y todos sus ca-

minos, los primeros y los últimos, he aquí 

están escritos en el rollo de los Reyes de 

Judá y de Israel.

27

 Y Acaz durmió con sus padres, y lo se-

pultaron en la ciudad, en Jerusalem, pero 

no en los sepulcros de los reyes de Israel; 

y Ezequías su hijo reinó en su lugar.

Ezequías, rey de Judá

29

Ezequías  era  de  veinticinco  años 

cuando  comenzó  a  reinar,  y  reinó 

veintinueve años en Jerusalem. El nombre 

de su madre era Abías, hija de Zacarías.

2

 E hizo lo recto ante los ojos de YHVH, 

conforme  a  todo  lo  que  había  hecho  su 

padre David.

3

 En  el  primer  año  de  su  reinado,  en  el 

mes  primero,  él  abrió  las  puertas  de  la 

Casa de YHVH, y las reparó.

4

 E hizo venir a los sacerdotes y a los levi-

tas, y los reunió en la plaza oriental,

5

 y  les  dijo:  ¡Oídme,  levitas!  Santificaos 

y santificad la Casa de YHVH, el Dios de 

vuestros padres, y quitad del Santuario la 

inmundicia.

6

 Porque  nuestros  padres  han  sido  in-

fieles e hicieron lo malo ante los ojos de 

YHVH nuestro Dios, y lo abandonaron, y 

volvieron sus rostros del Tabernáculo de 

YHVH, y le han dado la espalda.

7

 Asimismo cerraron las puertas del atrio, 

y apagaron las lámparas, y no quemaron 

incienso ni ofrecieron holocaustos en el 

Santuario al Dios de Israel.

8

 Por eso la ira de YHVH ha venido sobre 

Judá y Jerusalem, y Él los ha entregado 

al oprobio, a la desolación y a la burla,° 

como lo estáis viendo con vuestros pro-

pios ojos.

9

 Porque  he  aquí  nuestros  padres  han 

caído  por  la  espada,  y  nuestros  hijos  y 

nuestras  hijas  y  nuestras  mujeres  están 

en cautividad a causa de esto.

10

 Ahora pues, está en mi corazón el que 

hagáis  un  pacto  con  YHVH,  Dios  de  Is-

rael, para que el ardor de su ira se aparte 

de nosotros.

11

 Hijos míos, no seáis negligentes, por-

que YHVH os ha escogido para que estéis 

28.18 Región al S de Judá.  28.19 El TM inconsistentemente registra Israel.  28.21 Lit. pero no para su ayuda.  29.8 Nlos ha 

convertido en objeto de horror, de desolación y de burla


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2 Crónicas 29:32

473

ante Él para servirle, para que le minis-

tréis, y le queméis incienso.

12

 Entonces  se  levantaron  los  levitas: 

Mahat ben Amasai, y Joel ben Azarías, de 

entre los hijos de Coat; y de entre los hi-

jos de Merari, Cis ben Abdi, y Azarías ben 

Jehalelel; y entre los gersonitas, Joa ben 

Zima, y Edén ben Joa;

13

 y de entre los hijos de Elizafán, Simri y 

Jeiel; y de entre los hijos de Asaf, Zacarías 

y Matanías;

14

 y de entre los hijos de Hemán, Jehiel 

y Simei; y de entre los hijos de Jedutún, 

Semaías y Uziel.

15

 Éstos reunieron a sus hermanos y se 

santificaron,  y  entraron  para  limpiar  la 

Casa de YHVH, conforme al mandamien-

to del rey, según las palabras de YHVH.

16

 Y entraron los sacerdotes en la Casa de 

YHVH para limpiarla, y sacaron al atrio de 

la Casa de YHVH toda la inmundicia que 

hallaron en el Santuario de YHVH, la cual 

tomaron los levitas para sacarla fuera, al 

torrente Cedrón.

17

 Comenzaron la santificación el día uno 

del mes primero, y el día octavo del mes lle-

garon al pórtico de YHVH. Santificaron la 

Casa de YHVH durante ocho días, y en el día 

decimosexto del mes primero terminaron.

18

 Luego  fueron  ante  el  rey  Ezequías  y 

dijeron: Hemos limpiado toda la Casa de 

YHVH, el altar del holocausto y todos sus 

utensilios, y la mesa de la hilera° y todos 

sus utensilios.

19

 También  hemos  preparado  y  consa-

grado todos los utensilios que el rey Acaz 

desechó durante su reinado a causa de su 

infidelidad, y he aquí están delante del al-

tar de YHVH.

20

 Y madrugó el rey Ezequías y reunió a 

los príncipes de la ciudad y subió a la Casa 

de YHVH.

21

 Y llevaron siete novillos, y siete carne-

ros, y siete corderos con siete machos ca-

bríos como ofrenda por el pecado, a favor 

del reino y del Santuario, y a favor de todo 

Judá;  y  mandó  a  los  sacerdotes,  descen-

dientes de Aarón, ofrecerlos sobre el altar 

de YHVH.

22

 Degollaron  pues  los  novillos,  y  los 

sacerdotes  recogieron  la  sangre  y  la 

rociaron hacia el altar; luego degollaron 

los carneros y rociaron la sangre hacia el 

altar, y degollaron los corderos y rociaron 

su sangre hacia el altar.

23

 Después  hicieron  acercar  los  machos 

cabríos para la ofrenda expiatoria ante el 

rey y la congregación, y pusieron sus ma-

nos sobre ellos,

24

 y los sacerdotes los degollaron, e hicie-

ron una ofrenda expiatoria con su sangre 

sobre  el  altar,  para  hacer  expiación  por 

todo Israel, porque el rey había ordenado 

que el holocausto y la ofrenda fuera he-

cha a favor de todo Israel.

25

 Y puso a los levitas en la Casa de YHVH 

con címbalos, con salterios y arpas, según 

el mandamiento de David, de Gad, viden-

te  del  rey,  y  del  profeta  Natán,  pues  ese 

mandamiento había venido de YHVH por 

medio de sus profetas.

26

 Y los levitas se colocaron de pie con los 

instrumentos  de  David,  y  los  sacerdotes 

con las trompetas.

27

 Entonces  Ezequías  ordenó  que  se 

ofreciera  el  holocausto  sobre  el  altar, 

y  cuando  comenzó  el  holocausto,  co-

menzó  también  el  cántico  de  YHVH  y 

el  sonar  de  las  trompetas  con  acompa-

ñamiento de los instrumentos de David, 

rey de Israel.

28

 Y toda la congregación se postró mien-

tras  entonaban  cánticos  y  resonaban  las 

trompetas, todo hasta que el holocausto 

fue consumido.

29

 Y cuando se hubo consumido el holo-

causto, el rey y todos los que estaban con 

él se inclinaron y se postraron.

30

 El rey Ezequías y los príncipes ordena-

ron  entonces  a  los  levitas  que  alabaran  a 

YHVH con las palabras de David y del vi-

dente Asaf, y ellos entonaron alabanzas con 

gran júbilo, y se inclinaron y se postraron.

31

 Entonces  Ezequías  tomó  la  palabra  y 

dijo:  Ahora  que  os  habéis  consagrado  a 

YHVH, acercaos y traed víctimas y sacri-

ficios de gratitud a la Casa de YHVH. Y la 

congregación  brindó  sacrificios  y  ofren-

das  de  gratitud,  y  todos  los  de  corazón 

dispuesto trajeron holocaustos.

32

 Y el número de los holocaustos que lle-

vó la congregación fue de setenta bueyes, 

29.18 

→2.4 nota.


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2 Crónicas 29:33

474

cien  carneros  y  doscientos  corderos,  to-

dos éstos para el holocausto para YHVH.

33

 Y  fueron  consagrados  también  seis-

cientos bueyes y tres mil ovejas.

34

 Pero  los  sacerdotes  eran  muy  pocos, 

de modo que no podían desollar a tantos 

animales,  por  lo  cual  les  ayudaron  sus 

hermanos  los  levitas,  hasta  que  la  labor 

quedó  concluida,  y  hasta  que  los  demás 

sacerdotes  se  hubieron  santificado,  por-

que los levitas eran de corazón más dis-

puesto  para  santificarse  que  los  propios 

sacerdotes.

35

 Y  hubo  holocaustos  en  abundancia, 

junto con las grosuras de las ofrendas de 

paz, y las libaciones para cada holocaus-

to. Así quedó restablecido el servicio en la 

Casa de YHVH.

36

 Y Ezequías se regocijó con todo el pue-

blo de que Ha-’Elohim hubiera dispuesto 

al pueblo, pues la cosa había sido hecha 

de improviso.

Solemnidad de la Pascua bajo Ezequías

30

Envió  Ezequías  por  todo  Israel  y 

Judá,  y  también  escribió  cartas  a 

Efraín y a Manasés para que fueran a la 

Casa de YHVH en Jerusalem a preparar la 

Pascua de YHVH, Dios de Israel.

2

 Porque el rey había tomado consejo con 

sus príncipes y con toda la congregación 

en Jerusalem, de preparar la Pascua en el 

mes segundo,

3

 porque  no  la  habían  podido  preparar 

a  su  debido  tiempo,  pues  los  sacerdotes 

no  se  habían  santificado  en  número  su-

ficiente, ni el pueblo todo° había podido 

reunirse en Jerusalem.

4

 Y esto pareció bien a ojos del rey y de la 

congregación.

5

 Y determinaron pasar una proclama por 

todo  Israel,  desde  Beerseba  hasta  Dan, 

para que fueran a preparar la Pascua de 

YHVH,  el  Dios  de  Israel,  en  Jerusalem, 

porque  en  mucho  tiempo  no  la  habían 

preparado según estaba escrito.

6

 Y  los  mensajeros  recorrieron  todo  Is-

rael y Judá llevando las cartas del rey y de 

sus autoridades y proclamando por orden 

real: Hijos de Israel, volveos a YHVH, al 

Dios  de  Abraham,  Isaac  e  Israel,  y  Él  se 

volverá al remanente que de vosotros ha 

escapado de la mano de los reyes de Asi-

ria.

7

 No seáis como vuestros padres y vues-

tros  hermanos,  que  fueron  infieles  a 

YHVH, Dios de sus padres, el cual los en-

tregó a desolación, como vosotros estáis 

viendo.

8

 Ahora  pues,  no  endurezcáis  vuestra 

cerviz  como  vuestros  padres;  someteos 

a YHVH° y venid a su Santuario, que Él 

consagró  para  siempre.  Servid  a  YHVH 

vuestro Dios, y el ardor de su ira se apar-

tará de vosotros.

9

 Porque  si  os  volvéis  a  YHVH,  vuestros 

hermanos  y  vuestros  hijos  hallarán  mi-

sericordia ante sus captores y regresarán 

a esta tierra, pues YHVH vuestro Dios es 

clemente y misericordioso, y si os volvéis 

a Él, no apartará de vosotros su rostro.

10

 Así los mensajeros pasaron de ciudad 

en ciudad por la tierra de Efraín y Mana-

sés,  hasta  la  región  de  Zabulón,  pero  se 

rieron y se burlaron de ellos.

11

 Sin embargo, algunos de los de Aser, y 

de Manasés y de Zabulón se humillaron y 

fueron a Jerusalem.

12

 También  en  Judá  estuvo  la  mano  de 

Dios para darles un corazón para cumplir 

el mandato del rey y de las autoridades, 

según la palabra de YHVH.

13

 Y  se  reunió  en  Jerusalem  una  gran 

muchedumbre para preparar la solemni-

dad de los panes sin levadura en el mes 

segundo: una vasta congregación.

14

 Y se levantaron y quitaron los altares 

que había en Jerusalem, y quitaron tam-

bién todos los altares donde se quemaba 

incienso,  y  los  arrojaron  al  torrente  Ce-

drón.

15

 Enseguida, el catorce del mes segundo, 

sacrificaron la Pascua; y los sacerdotes y 

los levitas que todavía estaban impuros,° 

se avergonzaron y se santificaron, y lleva-

ron holocaustos a la Casa de YHVH.

16

 Y  ocuparon  sus  puestos  en  su  orden, 

conforme  a  la  Ley  de  Moisés,  varón  de 

Dios.  Los  sacerdotes  rociaban  la  sangre 

que recibían de manos de los levitas,

17

 porque había muchos en la congrega-

ción que no se habían santificado, por eso 

30.3 .todo   30.8 Lit. dad la mano a YHVH.  30.15 .todavía impuros

→v.17.


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2 Crónicas 31:7

475

los levitas degollaban el cordero pascual 

para  quienes  estaban  impuros,  a  fin  de 

santificarlos para YHVH.°

18

 Porque gran parte del pueblo, muchos 

de Efraín y de Manasés, de Isacar y de Za-

bulón, no se habían purificado, y comie-

ron la Pascua sin ajustarse a lo que estaba 

escrito.

19

 Pero Ezequías oró por ellos, diciendo: 

YHVH,  que  es  bueno,  haga  propiciación 

a  todo  aquel  que  ha  dispuesto  su  cora-

zón para buscar a Ha-’Elohim, a YHVH, 

el Dios de sus padres, aunque no lo haga 

conforme a la purificación del Santuario.

20

 Y YHVH escuchó a Ezequías y sanó al 

pueblo.

21

 Y los hijos de Israel que estaban pre-

sentes  en  Jerusalem  hicieron  la  solem-

nidad  de  los  panes  sin  levadura  durante 

siete días con gran alegría; y los levitas y 

los sacerdotes alababan a YHVH día tras 

día, cantando° a YHVH con instrumentos 

resonantes.°

22

 Y Ezequías habló al corazón de todos 

los  levitas  que  mostraban  buen  enten-

dimiento  en  el  servicio  de  YHVH.  Y  co-

mieron de lo sacrificado en la solemnidad 

durante  siete  días,  ofreciendo  sacrificios 

de paz y dando gracias a YHVH, el Dios de 

sus padres.

23

 Y  toda  la  asamblea  decidió  celebrar 

otros siete días; y pudieron hacerlo otros 

siete días con gran júbilo,

24

 porque Ezequías rey de Judá ofreció a la 

congregación mil novillos y siete mil ove-

jas, y los príncipes ofrecieron a la asamblea 

mil novillos y diez mil ovejas, y gran nú-

mero de sacerdotes se santificaron.

25

 Y toda la asamblea de Judá se regocijó 

con  los  sacerdotes,  los  levitas,  y  todo  el 

pueblo que había venido de Israel, tanto 

los peregrinos procedentes de la tierra de 

Israel como los residentes de Judá.

26

 Y hubo gran alegría en Jerusalem, pues 

desde los días de Salomón ben David, rey 

de Israel, no había habido cosa semejante 

en Jerusalem.

27

 Después los sacerdotes y los levitas se 

levantaron y bendijeron al pueblo; y fue 

escuchada su voz, y su oración llegó hasta 

la morada de su santidad en los cielos.

Reorganización del servicio levítico

31

Hechas todas estas cosas, todos los 

de Israel que estaban presentes salie-

ron por las ciudades de Judá y quebraron 

los pilares, talaron las aseras, y destruyeron 

los lugares altos y los altares de todo Judá 

y Benjamín, y también en Efraín y en Ma-

nasés, hasta destruirlo todo. Después todos 

los hijos de Israel regresaron a sus ciuda-

des, cada uno a su posesión.

2

 Y Ezequías restableció los turnos de los 

sacerdotes y levitas, con arreglo a sus cla-

ses, cada uno según su servicio, así de los 

sacerdotes como de los levitas, para los ho-

locaustos y para las ofrendas de paz, para 

que ministraran, y dieran gracias y alaba-

ran en las puertas de los atrios de YHVH.

3

 También, de su propia hacienda, estable-

ció la porción del rey para los holocaus-

tos: para los holocaustos de la mañana y 

de la tarde, y para los holocaustos de los 

días de reposo, de las lunas nuevas y de 

los tiempos señalados, conforme a lo es-

crito en la Ley de YHVH.°

4

 Mandó también al pueblo que habitaba 

en Jerusalem que diera la porción corres-

pondiente a los sacerdotes y levitas,° a fin 

de que se dedicaran a la Ley de YHVH.

5

 Y cuando se divulgó el edicto, los hijos 

de Israel dieron muchas primicias de gra-

no, mosto, aceite y miel, y de todo fruto 

del campo, y trajeron los diezmos de to-

das las cosas.

6

 Y los hijos de Israel y de Judá que ha-

bitaban en las ciudades de Judá también 

trajeron el diezmo de bueyes y de ovejas, 

y  el  diezmo  de  las  cosas  santas  consa-

gradas a YHVH su Dios, y lo apilaron en 

montones.

7

 En el mes tercero comenzaron a formar 

aquellos montones, y los terminaron en 

el mes séptimo.

30.17 Según Ex.12.3-6 y Lv.1.3-5, 10-11, el sacrificio pascual debía ser realizado por el padre de familia, que después de de-

gollar a la víctima entregaba su sangre a los sacerdotes para que la rociaran sobre el altar. Sin embargo, en un caso como éste, 

en que muchos de los participantes acudían en un estado de impureza ritual, pareció más apropiado que los levitas se ocuparan 

de santificar y degollar a los corderos ofrecidos por aquellos israelitas que no se habían purificado (nótese, sin embargo, que 

todos ellos participaron de la comida pascual). 

30.21 .cantando.  30.21 Lit. con instrumentos de poder.  31.3 

→Nm.28 y 29. 

31.4 

→Ex.23.19; Lv.27.30-33; Nm.18.12-13, 21. 


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2 Crónicas 31:8

476

8

 Y cuando Ezequías y los príncipes fue-

ron  a  ver  los  montones,  bendijeron°  a 

YHVH y a su pueblo Israel.

9

 Entonces  Ezequías  preguntó  a  los  sa-

cerdotes y a los levitas acerca de los mon-

tones,

10

 y el sumo sacerdote Azarías, de la casa 

de  Sadoc,  le  respondió  diciendo:  Desde 

que comenzaron a traer las ofrendas a la 

Casa de YHVH, hemos comido y nos he-

mos saciado, y ha sobrado mucho, porque 

YHVH ha bendecido a su pueblo, y ha so-

brado esta gran cantidad.

11

 Y Ezequías mandó que prepararan cá-

maras en la Casa de YHVH. Y fueron pre-

paradas,

12

 y  traían  fielmente  las  ofrendas,  los 

diezmos y las cosas consagradas. Al fren-

te de todo ello estaba como intendente el 

levita Conanías, y como segundo, Simei, 

su hermano.

13

 Y Jeiel, Azazías, Nahat, Asael, Jerimot, 

Jozabad, Eliel, Ismaquías, Mahat, y Benaía 

eran supervisores bajo el mando de° Co-

nanías y de Simei su hermano, por orden 

del rey Ezequías y de Azarías, príncipe de 

la Casa de Dios.

14

 El  levita  Coré  ben  Imna,  portero  de 

la puerta oriental,° estaba a cargo de las 

ofrendas voluntarias a Ha-’Elohim, y de la 

distribución de la ofrenda alzada a YHVH, 

y de las cosas santísimas.°

15

 Le asistían fielmente° Edén, Miniamín, 

Jesúa, Semaías, Amarías y Secanías en las 

ciudades de los sacerdotes, para repartir 

fielmente a sus hermanos, según lo que 

les correspondía, tanto al grande como al 

pequeño;

16

 junto con los que eran contados por su 

genealogía masculina, de tres años arriba, 

y de todo el que entraba a la Casa de YHVH, 

según la tarea de cada día, para su servicio 

en sus guardias con arreglo a sus clases;°

17

 así como a los sacerdotes que estaban 

inscritos  genealógicamente  según  sus 

casas  paternas,  y  a  los  levitas  de  veinte 

años arriba, según sus oficios y sus clases;

18

 y  para  hacer  el  registro  genealógico 

de todos sus pequeños, sus mujeres, sus 

hijos  y  sus  hijas  en  toda  la  congrega-

ción,° porque se consagraban fielmente 

en santidad.

19

 También  para  los  hijos  de  Aarón,  los 

sacerdotes que vivían en los ejidos de sus 

ciudades, había hombres designados por 

nombre en cada una de las ciudades para 

dar porciones a todos los hombres entre 

los sacerdotes, y a todos los que eran re-

conocidos  por  sus  genealogías  entre  los 

levitas.

20

 Así hizo Ezequías en todo Judá, y obró 

lo que era bueno y correcto y justo ante 

YHVH su Dios.

21

 Y  en  cada  obra  que  emprendió  en  el 

servicio de la Casa de Dios, y según la Ley 

y los mandamientos, buscó a su Dios con 

todo su corazón, y prosperó.

Invasión de Senaquerib

32

Después de tales cosas y de tal fideli-

dad, Senaquerib, rey de Asiria, llegó 

y entró en Judá, y sitió las ciudades fortifi-

cadas y se propuso tomarlas por asalto.

2

 Y cuando Ezequías vio que Senaquerib 

había  venido  con  intención  de  combatir 

contra Jerusalem,°

3

 resolvió con sus príncipes y sus valien-

tes  cegar  los  manantiales  que  estaban 

fuera de la ciudad, y ellos lo apoyaron.

4

 Y se juntó mucho pueblo y cegaron to-

dos  los  manantiales,  así  como  el  arroyo 

que fluía a través del territorio, pues dije-

ron: ¿Por qué han de hallar agua los reyes 

de Asiria cuando vengan?°

5

 Y  cobró  ánimo  y  reconstruyó  todo  el 

muro  que  había  sido  derribado,  y  alzó 

torres sobre él, y levantó otro muro por 

fuera,  y  fortificó  el  terraplén  de  la  ciu-

dad de David, e hizo armas° y escudos en 

abundancia.

31.8 Aunque  el  verbo  es  usado  tan  solo  una  vez,  el  sentido  no  es  el  mismo  en  ambos  casos.  31.13  Lit.  de  la  mano  de

31.14 Lit. el portero hacia el oriente.  31.14 Es decir, que se encargaba de distribuir la porción de las ofrendas que correspondía 

a los sacerdotes y a los levitas, separando previamente lo que pertenecía a Dios. 

→Lv.2.2-3; 7.1-10 y Lv.6.14-18.  31.15 Lit. 

junto a él con fidelidad

31.16 Los sacerdotes y levitas que servían en la Casa de Dios recibían allí mismo su porción, por lo que 

no era necesario incluirlos en el reparto que se realizaba en las ciudades de los levitas. 

31.18 Aquí se refiere al conjunto de los 

sacerdotes y levitas que habitaban en las ciudades de los sacerdotes. 

32.2 Lit. que Senaquerib había venido y que su rostro iba 

a la guerra contra Jerusalem

32.4 Lit. ¿por qué vendrán los reyes de Asiria y encontrarán muchas aguas?  32.5 Este término, 

que proviene de la raíz del verbo enviar, suele aludir a armas arrojadizas, como una lanza o una flecha, aunque, en algunos 

contextos, se usa en un sentido más amplio para referirse a cualquier tipo de arma. 


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2 Crónicas 32:27

477

6

 Y puso capitanes° sobre el pueblo, y los 

reunió ante él en la plaza de la puerta de 

la ciudad, y les habló al corazón, dicien-

do:

7

 ¡Esforzaos  y  tened  valor!  No  temáis  ni 

os amedrentéis a causa del rey de Asiria ni 

ante la multitud que está con él, porque 

más hay con nosotros que con él.

8

 Con él está un brazo de carne, pero con 

nosotros  está  YHVH  nuestro  Dios,  para 

ayudarnos y pelear nuestras batallas. Y el 

pueblo  se  apoyó  en  las  palabras  de  Eze-

quías rey de Judá.

9

 Después de esto, Senaquerib, rey de Asi-

ria (que estaba sitiando Laquis con todas 

sus  fuerzas),  envió  a  sus  siervos  a  Jeru-

salem, a Ezequías, rey de Judá, y a todos 

los de Judá que estaban en Jerusalem, di-

ciendo:

10

 Así dice Senaquerib rey de Asiria: ¿En 

qué estáis confiando para que os quedéis 

dentro  de  las  fortificaciones  en  Jerusa-

lem?

11

 ¿Acaso  no  os  engaña  Ezequías  para 

haceros  morir°  de  hambre  y  de  sed,  di-

ciendo: YHVH nuestro Dios nos librará de 

mano del rey de Asiria?

12

 ¿No es el mismo Ezequías que supri-

mió sus lugares altos° y sus altares, y or-

denó a Judá y a Jerusalem, diciendo: Ante 

un  único  altar  os  postraréis,  y  sobre  él 

quemaréis incienso?

13

 ¿Acaso  no  sabéis  lo  que  yo  y  mis  pa-

dres hemos hecho a todos los pueblos de 

estas tierras? ¿Pudieron los dioses de las 

naciones de estas tierras librar su tierra 

de mi mano?

14

 ¿Quién  de  entre  todos  los  dioses  de 

las naciones que destruyeron mis padres 

pudo librar a su pueblo de mi mano, para 

que  vuestro  Dios  pueda  libraros  de  mi 

mano?

15

 Ahora  pues,  no  os  engañe  Ezequías 

haciéndoos  creer  tales  cosas,  porque 

ningún dios de nación o reino alguno ha 

podido librar a su pueblo de mi mano ni 

de la mano de mis padres. ¡Cuánto menos 

vuestro Dios podrá libraros de mi mano!

16

 Y  muchas  otras  cosas  hablaron  sus 

siervos contra YHVH Ha-’Elohim y con-

tra su siervo Ezequías.

17

 También  escribió  cartas  para  injuriar 

a YHVH, el Dios de Israel, hablando con-

tra Él de este modo: Así como los dioses 

de  otras  naciones  no  han  librado  a  sus 

pueblos de mi mano, tampoco el Dios de 

Ezequías podrá librar a su pueblo de mi 

mano.

18

 Y gritaban desaforadamente en lengua 

judía al pueblo de Jerusalem que estaba 

en el muro, para intimidarlos y aterrori-

zarlos a fin de apoderarse de la ciudad.

19

 Y  hablaron  del  Dios  de  Jerusalem 

como  de  los  dioses  de  los  pueblos  de  la 

tierra, obra de manos de hombres.

20

 Y el rey Ezequías y el profeta Isaías ben 

Amoz, oraron a causa de esto, y clamaron 

a los cielos.

21

 Y YHVH envió un ángel, el cual hirió a 

todos los guerreros esforzados, y capita-

nes y jefes, en el campamento del rey de 

Asiria, quien regresó a su tierra con rostro 

avergonzado; y cuando entró en el templo 

de  su  dios,  los  que  habían  salido  de  sus 

entrañas° lo mataron allí a espada.

22

 Así salvó YHVH a Ezequías y a los habi-

tantes de Jerusalem de mano de Senaque-

rib rey de Asiria, y de mano de cualquier 

otro, y les concedió reposo por todas par-

tes.

23

 Y muchos llevaron a Jerusalem ofren-

das para YHVH, y presentes para Ezequías 

rey  de  Judá,  quien  a  partir  de  entonces 

fue engrandecido a ojos de todas las na-

ciones.

24

 En aquellos días Ezequías enfermó de 

muerte,  pero  oró  a  YHVH,  quien  le  res-

pondió y le dio una señal.

25

 Pero Ezequías no correspondió al bien 

que había recibido, sino que su corazón 

se enalteció, por lo que hubo ira sobre él 

y sobre Judá y Jerusalem.

26

 Pero Ezequías se humilló con motivo 

de la altivez de su corazón, tanto él como 

los habitantes de Jerusalem, de modo que 

la ira de YHVH no recayó sobre ellos en 

los días de Ezequías.

27

 Y  tuvo  Ezequías  muchas  riquezas  y 

honores,  y  acumuló  grandes  tesoros  de 

plata, de oro, de piedras preciosas, de es-

pecias, de escudos, y toda suerte de obje-

tos deseables.

32.6 Lit. jefes de guerras.  32.11 Lit. para entregaros a morir.  32.12 

→11.15 nota.  32.21 Es decir, sus propios hijos.


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2 Crónicas 32:28

478

28

 Tuvo asimismo almacenes para el grano, 

el mosto y el aceite, y establos para toda cla-

se de bestias, y apriscos para los rebaños.

29

 También  hizo  ciudades  para  él,  pues 

tenía numerosos rebaños de ovejas y toda 

clase de ganado mayor, porque ’Elohim le 

había dado muchísimas riquezas.

30

 Este  mismo  Ezequías  fue  quien  con-

tuvo  el  manantial  superior  de  las  aguas 

del Gihón, desviándolas por abajo° hacia 

el occidente de la ciudad de David. Y Eze-

quías prosperó en toda sus obras.

31

 Sin embargo, en el asunto de los em-

bajadores  de  los  príncipes  de  Babilonia, 

que habían sido enviados a él para investi-

gar el prodigio que había acontecido en el 

país,°  Ha-’Elohim  lo  dejó  para  probarlo, 

para hacer conocer todo lo que había en 

su corazón.

32

 El resto de las acciones de Ezequías, y 

sus obras piadosas, he aquí están escritas 

en la visión del profeta Isaías ben Amoz, en 

el rollo de los Reyes de Judá y de Israel.

33

 Y durmió Ezequías con sus padres, y lo 

sepultaron en la subida de los sepulcros 

de  los  hijos  de  David;  y  todo  Judá  y  los 

habitantes de Jerusalem le rindieron ho-

nores en su muerte. Y reinó en su lugar 

Manasés su hijo.

Reinados de Manasés y de Amón en Judá

33

De doce años era Manasés cuando 

comenzó a reinar, y reinó cincuen-

ta y cinco años en Jerusalem.

2

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

conforme a las abominaciones de las na-

ciones que YHVH había expulsado de de-

lante de los hijos de Israel.

3

 Pues  él  reedificó  los  lugares  altos  que 

su padre Ezequías había destruido, levan-

tó altares a los baales e hizo aseras, y se 

postró ante todo el ejército de los cielos, 

y los sirvió.

4

 También  edificó  altares  en  la  Casa  de 

YHVH, de la cual YHVH había dicho: En 

Jerusalem permanecerá mi Nombre para 

siempre.

5

 Edificó asimismo altares a todo el ejér-

cito  de  los  cielos  en  los  dos  atrios  de  la 

Casa de YHVH.

6

 Hizo pasar a sus hijos por el fuego en el 

valle de Ben-hinom;° practicó la magia, la 

adivinación y la hechicería, evocó a espí-

ritus de muertos y practicó el espiritismo. 

Abundó en hacer lo malo ante los ojos de 

YHVH, provocándole a ira.

7

 Puso además, la imagen tallada del ídolo 

que había hecho en la Casa de Dios, de la 

cual ‘Elohim había dicho a David y a su hijo 

Salomón: En esta Casa, y en Jerusalem, la 

cual Yo escogí entre todas las tribus de Is-

rael, pondré mi Nombre para siempre;

8

 y no volveré a quitar el pie de Israel de 

sobre  la  tierra  que  di  a  vuestros  padres, 

con tal que se cuiden de poner en prác-

tica  cuanto  les  ordené  mediante  Moisés 

respecto a toda la Ley, los estatutos y las 

ordenanzas.

9

 Pero Manasés indujo a Judá y a los habi-

tantes de Jerusalem a obrar peor que las 

naciones  que  YHVH  había  destruido  de-

lante de los hijos de Israel.

10

 Y YHVH habló a Manasés y a su pue-

blo, pero ellos no prestaron atención;

11

 por lo que YHVH trajo sobre ellos a los 

capitanes del ejército del rey° de Asiria, los 

cuales encadenaron con grillos de bronce 

a Manasés y lo llevaron a Babilonia.

12

 Y, estando en tal angustia, quiso apla-

car el rostro de YHVH su Dios, y se humi-

lló grandemente delante del Dios de sus 

padres.

13

 Y oró a Él y le suplicó, y Él se mostró 

favorable y oyó su súplica, y lo hizo volver 

a Jerusalem, a su reino. Y Manasés reco-

noció que sólo YHVH es Ha-’Elohim.

14

 Después  de  esto,  construyó  el  muro 

exterior de la ciudad de David, al occiden-

te  de  Gihón,  en  el  valle,°  y  hasta  la  en-

trada de la puerta de los peces, alrededor 

de  Ófel,°  y  subió  el  muro  a  gran  altura, 

y puso capitanes de ejército en todas las 

ciudades fortificadas de Judá.

15

 Y quitó de la Casa de YHVH los dioses 

extranjeros y el ídolo,° así como todos los 

altares que había construido en el monte 

de la Casa de YHVH y en Jerusalem, y los 

arrojó fuera de la ciudad.

16

 Después reconstruyó el altar de YHVH 

y ofreció sobre él sacrificios de paz y de 

32.30 Esto es, un acueducto subterráneo.  32.31 

→2 R.20.8-19.  33.6 →28.3 nota.  33.11 Lit. del ejército que tenía el rey

33.14 

→20.16 nota.  33.14 →27.3 nota.  33.15 →v.7. 


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2 Crónicas 34:13

479

gratitud;  y  ordenó  a  Judá  que  sirviera  a 

YHVH, el Dios de Israel.

17

 Sin  embargo,  el  pueblo  siguió  ofre-

ciendo  sacrificios  en  los  lugares  altos,° 

aunque sólo a YHVH su Dios.

18

 El resto de los hechos de Manasés, sus 

súplicas  a  su  Dios  y  las  palabras  de  los 

videntes  que  le  hablaron  en  nombre  de 

YHVH Dios de Israel, he aquí están en los 

hechos de los Reyes de Israel.

19

 Y  su  oración,  y  cómo  fue  atendido,  y 

todo su pecado, su infidelidad, y los sitios 

donde  edificó  lugares  altos  y  erigió  ase-

ras y otras imágenes esculpidas, antes de 

humillarse, he aquí están escritos en los 

registros de los Hozai.°

20

 Y  durmió  Manasés  con  sus  padres,  y 

lo sepultaron en su propia casa; y su hijo 

Amón reinó en su lugar.

21

 Era  Amón  de  veintidós  años  cuando 

comenzó a reinar; y reinó dos años en Je-

rusalem.

22

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

como había hecho su padre Manasés, pues 

Amón ofreció sacrificios a todos los ídolos 

de talla que su padre Manasés había he-

cho, y los sirvió.

23

 Pero  no  se  humilló  delante  de  YHVH, 

como se había humillado Manasés su padre, 

sino que este Amón aumentó su culpa.

24

 Y conspiraron contra él sus siervos, y 

lo asesinaron en su propia casa.

25

 Pero el pueblo de la tierra dio muerte 

a todos los que habían conspirado contra 

el rey Amón; y el pueblo de la tierra hizo 

que su hijo Josías reinara en su lugar.

Josías, rey de Judá

34

De  ocho  años  era  Josías  cuando 

comenzó a reinar; y reinó treinta y 

un años en Jerusalem.

2

 E hizo lo recto a ojos de YHVH, y andu-

vo en los caminos de David su padre, sin 

apartarse ni a derecha ni a izquierda.

3

 En el año octavo de su reinado, siendo 

todavía muchacho, comenzó a buscar al 

Dios de David su padre; y en el año duo-

décimo  comenzó  a  purificar  a  Judá  y  a 

Jerusalem de los lugares altos, las aseras, 

los ídolos de talla, y las imágenes de fun-

dición.

4

 Demolieron en su presencia los altares 

de  los  baales,  y  taló  los  pilares  del  sol° 

que  había  sobre  ellos,  y  quebró  las  ase-

ras, los ídolos de talla y las imágenes de 

fundición, y las redujo a polvo, que espar-

ció sobre los sepulcros de los que habían 

ofrecido sacrificios a ellas.

5

 Quemó además los huesos de los sacer-

dotes  sobre  sus  altares,  y  purificó  así  a 

Judá y a Jerusalem.

6

 Y  en  las  ciudades  de  Manasés,  y  de 

Efraín, y de Simeón y de Neftalí, con sus 

alrededores,

7

 destruyó los altares, hizo pedazos las ase-

ras y los ídolos de talla, y los redujo a pol-

vo, y taló todos los pilares del sol por toda 

la tierra de Israel, y regresó a Jerusalem.

8

 En  el  año  decimoctavo  de  su  reinado, 

después  de  haber  limpiado  la  tierra  y  la 

Casa, envió a Safán ben Azalía, y a Maa-

sías gobernador de la ciudad, y a Joa ben 

Joacaz,  cronista,  para  que  repararan  la 

Casa de YHVH su Dios.

9

 Y fueron al sumo sacerdote Hilcías, y le 

dieron el dinero recaudado en la Casa de 

YHVH, que los levitas porteros de la en-

trada habían recibido de mano de los de 

Manasés, y de Efraín, y de todo el resto de 

Israel, y de todo Judá y Benjamín, y de los 

habitantes de Jerusalem.

10

 Y  lo  entregaron  en  mano  de  los  que 

hacían la obra, los encargados de la Casa 

de YHVH, los cuales lo daban a los obre-

ros  que  trabajaban  en  la  Casa  de  YHVH 

para reparar y restaurar la Casa.

11

 Daban asimismo a los ebanistas y a los 

constructores para que compraran piedra 

de cantería y madera, para los armazones 

y las vigas de los edificios que habían des-

truido los reyes de Judá.

12

 Estos hombres procedían con fidelidad 

en  la  obra,  y  para  dirigirlos  habían  sido 

designados Jahat y Abdías, levitas de los 

hijos de Merari, y Zacarías y Mesulam, de 

los hijos de los coatitas, como asimismo 

otros levitas, talentosos en instrumentos 

musicales.

13

 Estaban también sobre los cargadores, 

y dirigían a todos los que hacían la obra 

en cualquier servicio; y de los levitas ha-

bía escribas, oficiales y porteros.

33.17 

→11.15 nota.  33.19 LXX registra los videntes.  34.4 →14.5 nota.


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2 Crónicas 34:14

480

14

 Y cuando sacaban el dinero recaudado 

en la Casa de YHVH, el sacerdote Hilcías 

halló el Rollo de la Ley de YHVH dada por 

Moisés.

15

 E Hilcías habló al escriba Safán dicien-

do:  ¡He  hallado  el  Rollo  de  la  Ley  en  la 

Casa  de  YHVH!  E  Hilcías  dio  el  Rollo  a 

Safán,

16

 y Safán llevó el Rollo al rey, y además 

informó al rey del asunto, diciendo: Tus 

siervos han hecho todo lo que les ha sido 

encargado,

17

 y han contado el dinero que había en 

la Casa de YHVH, y lo han entregado en 

mano de los encargados y en mano de los 

obreros.

18

 Y el escriba Safán informó también al 

rey, diciendo: El sacerdote Hilcías me ha 

entregado un rollo. Y Safán leyó en él de-

lante del rey.

19

 Y aconteció que cuando el rey escuchó 

las palabras de la Ley, rasgó sus vestidos.

20

 Y  el  rey  ordenó  a  Hilcías,  a  Ahicam 

ben Safán, a Abdón ben Micaía, al escriba 

Safán y a Asaías siervo del rey, diciendo:

21

 Id y consultad a YHVH por mí y por el 

remanente de Israel y de Judá, acerca de 

las palabras del Rollo que ha sido hallado, 

porque grande es la ira de YHVH que se 

vuelca  sobre  nosotros,  porque  nuestros 

padres no guardaron la palabra de YHVH 

para obrar conforme a todo lo escrito en 

este Rollo.

22

 Entonces Hilcías y los del rey fueron 

a  la  profetisa  Hulda,  mujer  de  Salum 

ben  Toqhat,  hijo  de  Hasrá,  guardián  del 

vestuario, la cual moraba en el segundo 

sector° de Jerusalem, y hablaron del caso 

con ella.

23

 Y  ella  les  respondió:  Así  dice  YHVH 

Dios de Israel: Decid al hombre que os ha 

enviado a mí:

24

 Así  dice  YHVH:  He  aquí  Yo  traigo  el 

mal  sobre  este  lugar  y  sobre  sus  habi-

tantes: Todas las maldiciones escritas en 

el Rollo que ha sido leído ante el rey de 

Judá,

25

 por cuanto me han abandonado y han 

quemado  incienso  a  otros  dioses,  para 

provocarme a ira con todas las obras de 

sus manos. Por eso mi ira se volcará con-

tra este lugar, y no podrá ser aplacada.

26

 Pero al rey de Judá, que os ha enviado 

a consultar a YHVH, le diréis así: Así dice 

YHVH  Dios  de  Israel  acerca  de  las  pala-

bras que has escuchado:

27

 Por cuanto tu corazón se enterneció, 

y te has humillado ante ’Elohim al escu-

char sus palabras contra este lugar y con-

tra sus habitantes, y te humillaste ante mí 

rasgando  tus  vestiduras,  y  lloraste  ante 

mí, Yo te he escuchado, dice YHVH.

28

 He aquí te reuniré con tus padres, y se-

rás recogido en tus sepulcros en paz, y tus 

ojos no verán el mal que Yo traigo sobre 

este lugar y sobre sus habitantes. Y ellos 

llevaron al rey esta palabra.

29

 Entonces el rey ordenó que se reunieran 

todos los ancianos de Judá y de Jerusalem.

30

 Y subió el rey a la Casa de YHVH con 

todos los hombres de Judá, y los habitan-

tes  de  Jerusalem,  y  los  sacerdotes,  y  los 

levitas; con todo el pueblo, tanto encum-

brados como humildes, y leyó a oídos de 

ellos todas las palabras del Rollo del pac-

to  que  había  sido  hallado  en  la  Casa  de 

YHVH.

31

 Y el rey se puso de pie en su sitio e hizo 

un pacto ante YHVH: De andar en pos de 

YHVH y guardar sus mandamientos y sus 

testimonios  y  sus  estatutos  con  todo  su 

corazón y con toda su alma, y poner por 

obra las palabras del pacto escritas en el 

Rollo.

32

 E hizo que se obligaran a ello todos los 

que se hallaban en Jerusalem y en Benja-

mín; y los habitantes de Jerusalem obra-

ron conforme al pacto de Dios, del Dios 

de sus padres.

33

 Y Josías quitó todas las abominaciones 

de todas las tierras que pertenecían a los 

hijos de Israel, e hizo que todos los que 

se hallaban en Israel sirvieran a YHVH su 

Dios. Y en todos sus días° no se apartaron 

de seguir a YHVH, el Dios de sus padres.

Solemnidad de la Pascua bajo Josías

35

Josías hizo la Pascua para YHVH en 

Jerusalem, y en el catorce del mes 

primero degollaron el cordero pascual.

34.22 Lit. en el segundo. Prob. se refiere a un distrito o barrio de la antigua ciudad de Jerusalem.  34.33 Es decir, mientras 

Josías vivió


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2 Crónicas 35:20

481

2

 Y restableció a los sacerdotes según sus 

funciones,  alentándolos  a  dedicarse  al 

servicio de la Casa de YHVH.

3

 Y  dijo  a  los  levitas  que  enseñaban  en 

todo  Israel,  los  que  estaban  santificados 

para YHVH: Poned el Arca del Santuario 

en la Casa que edificó Salomón ben Da-

vid, rey de Israel; ya no la cargaréis más a 

hombros,° y servid a YHVH vuestro Dios, 

y a su pueblo Israel.

4

 Preparaos  según  el  orden  de  vuestras 

casas paternas y vuestras clases,° confor-

me a lo escrito por David rey de Israel, y a 

lo escrito por su hijo Salomón.

5

 Y ocupad vuestro lugar en el Santuario° 

conforme a las divisiones de las casas pa-

ternas de vuestros hermanos, los hijos del 

pueblo,°  y  haya  para  cada  cual  una  por-

ción de una casa paterna de los levitas.°

6

 Degollad el cordero pascual, santificaos, 

y  haced  los  preparativos  para  vuestros 

hermanos conforme a la palabra de YHVH 

dada por medio de Moisés.

7

 Y ofreció Josías para los hijos del pue-

blo  ovejas,  corderos  y  cabritos,  como 

víctimas pascuales para todos los que se 

hallaban presentes, en número de treinta 

mil, y tres mil bueyes, los cuales eran de 

la hacienda del rey.

8

 También  sus  príncipes  ofrendaron  al 

pueblo,  a  los  sacerdotes  y  a  los  levitas. 

Hilcías, Zacarías y Jehiel, príncipes de la 

Casa de Dios, dieron a los sacerdotes para 

las  ofrendas  pascuales  dos  mil  seiscien-

tos,° y trescientos bueyes.

9

 Asimismo Conanías y sus hermanos Se-

maías y Natanael, y Hasabías, Jeiel y Jo-

sabad, príncipes de los levitas, ofrecieron 

a  los  levitas  para  las  ofrendas  pascuales 

cinco mil,° y quinientos bueyes.

10

 De tal modo fue preparado el servicio, 

y los sacerdotes se colocaron en su pues-

to, y los levitas según sus turnos, confor-

me al mandato del rey.

11

 Y degollaron el cordero pascual, y los 

sacerdotes rociaban con su mano, mien-

tras los levitas desollaban.

12

 Y  apartaron  el  holocausto°  para  dar-

lo a los hijos del pueblo, según las casas 

paternas,  y  hacerlo  acercar  ante  YHVH, 

como está escrito en el Rollo de Moisés, y 

también hicieron así con los bueyes.

13

 Y asaron la Pascua al fuego conforme 

a  la  ordenanza,  y  cocieron  las  ofrendas 

santas en ollas, calderos y sartenes, y las 

repartieron  en  el  momento  entre  todos 

los hijos del pueblo.

14

 Después prepararon para ellos mismos 

y para los sacerdotes, porque los sacerdo-

tes hijos de Aarón estuvieron ofreciendo 

los holocaustos y las grosuras hasta la no-

che, así los levitas tuvieron que preparar 

para  ellos  mismos  y  para  los  sacerdotes 

hijos de Aarón.

15

 Y  los  cantores,  hijos  de  Asaf,  estaban 

en  sus  puestos  conforme  al  mandato  de 

David, de Asaf, de Hemán y de Jedutún, 

vidente  del  rey,  mientras  los  porteros 

guardaban todas las puertas, no era nece-

sario que se apartaran del servicio, porque 

sus hermanos los levitas habían hecho los 

preparativos para ellos.

16

 Así quedó preparado todo el servicio de 

YHVH en aquel día para hacer la Pascua 

y  hacer  subir  holocaustos  sobre  el  altar 

de  YHVH,  conforme  al  mandato  del  rey 

Josías.

17

 Y los hijos de Israel que estaban pre-

sentes hicieron la Pascua en ese tiempo, 

y la solemnidad de los panes sin levadura 

durante siete días.

18

 Y  no  se  había  observado  una  Pascua 

como ésa en Israel desde los días del pro-

feta  Samuel,  y  ninguno  de  los  reyes  de 

Israel  había  hecho  una  Pascua  como  la 

que hizo Josías° con los sacerdotes y los 

levitas, y todos los de Judá e Israel que es-

taban presentes junto con los habitantes 

de Jerusalem.

19

 Esta Pascua fue hecha en el año deci-

moctavo del reinado de Josías.

20

 Después  de  todas  estas  cosas,  cuan-

do  Josías  hubo  reparado  la  Casa,  Necao 

rey  de  Egipto  subió  para  combatir  en 

35.3 Lit. no será para vosotros una carga en vuestros hombros.  35.4 

→8.14 nota.  35.5 Esto es, el lugar santo.  35.5 Esto es, la 

gente común, el pueblo en general

35.5 Los levitas debían situarse de tal manera que una parte de cada una de sus divisiones 

pudiera atender a los miembros de cada uno de los grupos en que estaban distribuidas las casas paternas de Israel. 

35.8 

Aparte de los bueyes, el TM no menciona la clase de animal que los príncipes ofrecieron a los sacerdotes. 

35.9 Ver nota anterior. 

35.12 En este contexto, el término holocausto prob. se refiere a las partes del animal sacrificado.  35.18 Lit. y todos los reyes de 

Israel no hicieron como la pascua que hizo el rey Josías.


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2 Crónicas 35:21

482

Carquemis, junto al Éufrates, y Josías sa-

lió a su encuentro.

21

 Entonces  él  le  envió  mensajeros,  di-

ciendo:  ¿Qué  tengo  que  ver  contigo,  oh 

rey de Judá? No vengo contra ti hoy, sino 

contra la casa con la que estoy en guerra,° 

y ’Elohim ha dicho que me apresure. Deja 

de oponerte a ’Elohim, que está conmigo, 

para que Él no te destruya.

22

 Pero Josías no quiso volverse,° sino que 

se disfrazó° para luchar contra él, no aten-

diendo a las palabras de Necao, dictadas por 

Dios, y fue a combatir al valle de Meguido.

23

 Y los arqueros atacaron al rey Josías, 

y  el  rey  dijo  a  sus  siervos:  ¡Sacadme  de 

aquí° porque estoy malherido!

24

 Entonces  sus  siervos  lo  sacaron  de 

aquel  carro  y  lo  pusieron  en  el  otro  ca-

rro que tenía, y lo llevaron a Jerusalem, 

donde murió. Y fue sepultado en los se-

pulcros de sus padres, y todo Judá y Jeru-

salem hizo duelo por Josías.

25

 Y Jeremías levantó una endecha sobre 

Josías, y todos los cantores y cantoras alu-

den a Josías en sus cánticos de lamenta-

ción hasta el día de hoy, y lo establecieron 

como costumbre en Israel, y he aquí, es-

tán escritas en los Lamentos.°

26

 Los  demás  hechos  de  Josías,  y  sus 

obras piadosas según lo escrito en la Ley 

de YHVH,

27

 y sus hechos, primeros y últimos, he 

aquí están escritos en el rollo de los Reyes 

de Israel y de Judá.

Joacaz y sus sucesores

36

El pueblo de la tierra tomó a Joa-

caz ben Josías, e hizo que reinara 

en Jerusalem en lugar de su padre.

2

 Joacaz  era  de  veintitrés  años  cuando 

comenzó a reinar; y reinó tres meses en 

Jerusalem.

3

 Y el rey de Egipto lo destituyó en Jeru-

salem, e impuso al país un tributo de cien 

talentos de plata y uno de oro.

4

 Después  el  rey  de  Egipto  hizo  que  su 

hermano  Eliaquim  reinara  sobre  Judá  y 

Jerusalem,  y  cambió  su  nombre  por  el 

de Joacim.° Y Necao tomó a su hermano 

Joacaz y lo llevó a Egipto.

5

 De veinticinco años era Joacim cuando 

comenzó  a  reinar,  y  reinó  once  años  en 

Jerusalem, e hizo lo malo ante los ojos de 

YHVH su Dios.

6

 Contra él subió Nabucodonosor rey de 

Babilonia y lo ató con grillos de bronce, y 

lo llevó a Babilonia.

7

 Además, Nabucodonosor llevó a Babilonia 

parte de los utensilios de la Casa de YHVH, 

y los puso en su templo en Babilonia.

8

 El resto de los hechos de Joacim, y las 

abominaciones que cometió, y lo que fue 

hallado contra él, he aquí están escritos 

en el rollo de los Reyes de Israel y de Judá. 

Y Joaquín su hijo reinó en su lugar.

9

 Joaquín  era  de  ocho°  años  cuando  co-

menzó a reinar, y reinó tres meses y diez 

días° en Jerusalem, e hizo lo malo a ojos 

de YHVH.

10

 Y a la vuelta del año, el rey Nabucodo-

nosor  envió  y  lo  hizo  llevar  a  Babilonia 

juntamente  con  los  utensilios  más  pre-

ciosos de la Casa de YHVH, e hizo que su 

hermano Sedequías reinara sobre Judá y 

Jerusalem.

11

 Sedequías era de veintiún años cuando 

comenzó  a  reinar,  y  reinó  once  años  en 

Jerusalem.

12

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH 

su Dios, no se humilló ante Jeremías, el 

profeta que hablaba de parte de YHVH.°

13

 También se rebeló contra el rey Nabu-

codonosor, que le había hecho jurar por 

’Elohim;° y endureció su cerviz y obstinó 

su corazón, para no volverse a YHVH, el 

Dios de Israel.

14

 Asimismo,  todos  los  príncipes  de  los 

sacerdotes  y  el  pueblo  aumentaron  la 

infidelidad,°  obrando  según  las  abomi-

naciones de las naciones, y profanando la 

35.21 Lit. la casa de mi guerra. Se refiere a la dinastía real de una nación, y, por extensión, a la nación que lidera dicha dinastía 

real. 

35.22 Lit. no volvió su rostro de él.  35.22 LXX, VUL y Sir. registran se fortaleció.  35.23 Lit. hacedme pasar.  35.25 Prob. se 

trata de una recopilación de elegías, endechas y otros cantos similares. Estos Lamentos (heb. quinot) nada tienen que ver con 

el libro de Lamentaciones, entre otras cosas porque dicho libro se titula por su primera palabra del texto: Ekah ¡Cómo!. 

36.4 

Lit. y volvió su nombre Joacim

36.9 Unos mss. hebreos y algunos códices de la LXX registran dieciocho (véase también la nota 

siguiente). 

36.9 El TM discrepa entre el registro de Reyes y Crónicas.  36.12 Lit. no se humilló delante de Jeremías, el profeta 

de la boca de YHVH

36.13 Es decir, le había obligado a jurar por Dios que sería fiel al rey de Babilonia.  36.14 Lit. aumentaron 

el cometer infidelidad


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2 Crónicas 36:23

483

Casa  de  YHVH,  que  Él  había  santificado 

en Jerusalem.

15

 Y YHVH, el Dios de sus padres, les en-

viaba palabra° a través de sus mensajeros, 

continuamente  les  enviaba  palabra,  por-

que Él se compadecía de su pueblo y de 

su morada.

16

 Pero ellos se burlaron de los mensaje-

ros de Dios y despreciaron las palabras de 

Él, y trataron despectivamente a sus pro-

fetas, hasta que la ira de YHVH se encen-

dió contra su pueblo hasta que no hubo 

remedio.

17

 Entonces hizo subir contra ellos al rey 

de  los  caldeos,  que  mató  a  espada  a  sus 

jóvenes en la propia Casa de su Santuario, 

y no se compadeció del muchacho ni de la 

doncella, ni del anciano de cabeza cana; a 

todos los entregó en su mano.

18

 Y todos los utensilios de la Casa de Dios, 

grandes y pequeños, los tesoros de la Casa 

de  YHVH,  y  los  tesoros  del  rey  y  de  sus 

príncipes, todo lo llevó a Babilonia.

19

 Y  quemaron  la  Casa  de  Dios,  y  des-

truyeron  el  muro  de  Jerusalem,  y 

prendieron fuego° a su ciudadela, y des-

truyeron todos los objetos preciosos que 

había en ella.°

20

 Y a los que habían escapado de la es-

pada° llevó cautivos a Babilonia, y fueron 

esclavos de él y de sus hijos hasta que se 

impuso° el reino de Persia,

21

 para  que  se  cumpliera  la  palabra  de 

YHVH por boca de Jeremías, para que la 

tierra disfrutara de todos sus días de repo-

so. Reposó todos los días de su desolación 

hasta cumplirse° setenta años.

22

 Y en el primer año de Ciro rey de Per-

sia,  para  que  se  cumpliera  la  palabra  de 

YHVH dicha por boca de Jeremías, YHVH 

despertó el espíritu de Ciro rey de Persia, 

el cual hizo pregonar por todo su reino, 

por escrito, diciendo:

23

 Así dice Ciro rey de Persia: YHVH, el 

Dios de los cielos, me ha dado todos los 

reinos de la tierra, y Él me ha designado 

para que le construya una Casa en Jerusa-

lem, que está en Judá. Quien de vosotros 

sea de su pueblo, que YHVH su Dios esté 

con él, y suba allá.

36.15 .palabra.  36.19 Lit. quemaron con fuego.  36.19 Esto es, de Jerusalem.  36.20 Lit. al resto de la espada.  36.20 Lit. 

empezó a reinar

36.21 

→Jer.5.11, 27.7, 29.10. 


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1

Y° en el año primero° de Ciro rey de 

Persia, para que se cumpliera la pala-

bra de YHVH por boca de Jeremías, YHVH 

despertó el espíritu de Ciro rey de Persia° 

para que se proclamara en todo el reino 

por pregón y por escrito, diciendo:

2

 Así  dice  Ciro  rey  de  Persia:  Todos  los 

reinos de la tierra me han sido dados por 

YHVH, Dios de los cielos, y Él mismo me 

ha  encomendado  que  le  construya  Casa 

en Jerusalem, que está en Judá.

3

 Quien  de  entre  vosotros  pertenezca  a 

su pueblo, sea su Dios con él y suba a Je-

rusalem, que está en Judá, y construya la 

Casa de YHVH, el Dios de Israel, que es 

Ha-’Elohim, el cual está en Jerusalem.

4

 Y a todo el que haya quedado, en cualquier 

lugar donde viva, que lo ayuden sus vecinos 

con plata y con oro, y con bienes y ganado, 

además de las ofrendas voluntarias para la 

Casa de Dios que está en Jerusalem.

5

 Entonces  se  levantaron  los  cabezas  de 

familia de Judá y Benjamín, los sacerdotes 

y los levitas, todos aquellos cuyo espíritu 

había  despertado  Ha-’Elohim  para  que 

subieran a reconstruir la Casa de YHVH 

que está en Jerusalem.

6

 Y  todos  sus  vecinos  los  ayudaron  con 

objetos  de  plata,  con  oro,  con  bienes  y 

ganado  y  cosas  preciosas,  aparte  de  las 

ofrendas voluntarias.

7

 También el rey Ciro hizo sacar los uten-

silios de la Casa de YHVH que Nabucodo-

nosor había hecho sacar de Jerusalem y 

colocado en el templo de sus dioses.

8

 Los hizo traer pues Ciro rey de Persia, 

por medio del tesorero Mitrídates, quien 

los  consignó  en  mano  de  Sesbasar,  el 

príncipe de Judá.

9

 Y esta fue su cuenta: treinta tazones de 

oro, mil tazones de plata, veintinueve cu-

chillos,°

10

 treinta tazas de oro, cuatrocientas diez 

tazas de plata de otra clase,° y otros mil 

utensilios.

11

 Todos  los  utensilios  de  oro  y  de  plata 

fueron  cinco  mil  cuatrocientos;  todo  lo 

transportó Sesbasar cuando los del cauti-

verio regresaron de Babilonia a Jerusalem.

Los que regresaron de la deportación

2

Y estos son los hijos de la provincia° 

que subieron de la cautividad, los de-

portados que Nabucodonosor rey de Babi-

lonia había deportado a Babilonia, y que 

regresaron a Jerusalem y a Judá, cada uno 

a su ciudad.

2

 Los  que  volvieron  con  Zorobabel  fue-

ron:  Jesúa,  Nehemías,  Seraías,  Reelaías, 

Mardoqueo,  Bilsán,  Mispar,  Bigvai,  Re-

hum y Baana. El número de las personas 

del pueblo de Israel era:

3

 los hijos de Paros, dos mil ciento seten-

ta y dos;

4

 los hijos de Sefatías, trescientos setenta 

y dos;

5

 los  hijos  de  Ara,  setecientos  setenta  y 

cinco;

6

 los  hijos  de  Pajat-moab,  de  los  hijos 

de Jesúa y de Joab, dos mil ochocientos 

doce;

Regreso del cautiverio

1.1 La conjunción muestra su enlace con 2 Cr.36.23, que en sus últimos vv. introduce el relato de Esdras.  1.1 Esto es, el 538 

a.C., después de la conquista de Babilonia. 

1.1 Lit. hizo pasar voz.  1.9 La traducción de esta palabra puede variar por vasijas 

según sean sus consonantes o la vocalización de ellas. 

1.10 Nde recambio.  2.1 Esto es, la provincia de Judá. Porción territorial 

de una de las satrapías del imperio Medo-Persa.


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Esdras 2:57

485

7

 los  hijos  de  Elam,  mil  doscientos  cin-

cuenta y cuatro;

8

 los hijos de Zatu, novecientos cuarenta 

y cinco;

9

 los hijos de Zacai, setecientos sesenta;

10

 los hijos de Bani, seiscientos cuarenta 

y dos;

11

 los  hijos  de  Bebai,  seiscientos  veinti-

trés;

12

 los  hijos  de  Azgad,  mil  doscientos 

veintidós;

13

 los hijos de Adonicam, seiscientos se-

senta y seis;

14

 los hijos de Bigvai, dos mil cincuenta 

y seis;

15

 los  hijos  de  Adín,  cuatrocientos  cin-

cuenta y cuatro;

16

 los hijos de Ater, de Ezequías, noventa 

y ocho;

17

 los  hijos  de  Bezai,  trescientos  veinti-

trés;

18

 los hijos de Jora, ciento doce;

19

 los hijos de Hasum, doscientos veinti-

trés;

20

 los hijos de Gibar, noventa y cinco;

21

 los  hijos  de  Bet-léhem,  ciento  veinti-

trés;

22

 los  hombres  de  Netofa,  cincuenta  y 

seis;

23

 los hombres de Anatot, ciento veintio-

cho;

24

 los hijos de Azmavet, cuarenta y dos;

25

 los  hijos  de  Quiriat-jearim,  Cafira  y 

Beerot, setecientos cuarenta y tres;

26

 los hijos de Ramá y Geba, seiscientos 

veintiuno;

27

 los  hombres  de  Micmas,  ciento  vein-

tidós;

28

 los hombres de Bet-’El y Hai, doscien-

tos veintitrés;

29

 los hijos de Nebo, cincuenta y dos;

30

 los  hijos  de  Magbis,  ciento  cincuenta 

y seis;

31

 los hijos del otro Elam, mil doscientos 

cincuenta y cuatro;

32

 los hijos de Harim, trescientos veinte;

33

 los  hijos  de  Lod,  Hadid  y  Ono,  sete-

cientos veinticinco;

34

 los hijos de Jericó, trescientos cuaren-

ta y cinco;

35

 los hijos de Senaa, tres mil seiscientos 

treinta.

36

 Los  sacerdotes:  los  hijos  de  Jedaías, 

de  la  casa  de  Jesúa,  novecientos  setenta 

y tres;

37

 los hijos de Imer, mil cincuenta y dos;

38

 los hijos de Pasur, mil doscientos cua-

renta y siete;

39

 los hijos de Harim, mil diecisiete.

40

 Los levitas: los hijos de Jesúa y de Cad-

miel, de los hijos de Hodovías, setenta y 

cuatro.

41

 Los cantores: los hijos de Asaf, ciento 

veintiocho.

42

 Los  hijos  de  los  porteros:°  los  hijos 

de Salum, los hijos de Ater, los hijos de 

Talmón,  los  hijos  de  Acub,  los  hijos  de 

Hatita, los hijos de Sobai; el total, ciento 

treinta y nueve.

43

 Los netineos: los hijos de Ziha, los hi-

jos de Hasufa, los hijos de Tabaot,

44

 los hijos de Queros, los hijos de Siaha, 

los hijos de Padón;

45

 los hijos de Lebana, los hijos de Haga-

ba, los hijos de Acub;

46

 los hijos de Hagab, los hijos de Samlai, 

los hijos de Hanán;

47

 los hijos de Gidel, los hijos de Gahar, 

los hijos de Reaía;

48

 los hijos de Rezín, los hijos de Necoda, 

los hijos de Gazam;

49

 los  hijos  de  Uza,  los  hijos  de  Paseah, 

los hijos de Besai;

50

 los hijos de Asena, los hijos de los Meu-

nim,° los hijos de Nefusim;°

51

 los hijos de Bacbuc, los hijos de Hacu-

fa, los hijos de Harhur;

52

 los hijos de Bazlut, los hijos de Mehí-

da, los hijos de Harsa;

53

 los hijos de Barcos, los hijos de Sísara, 

los hijos de Tema;

54

 los hijos de Nezía, los hijos de Hatifa.

55

 Los  hijos  de  los  siervos  de  Salomón: 

los hijos de Sotai, los hijos de Soferet, los 

hijos de Peruda;

56

 los hijos de Jaala, los hijos de Darcón, 

los hijos de Gidel;

57

 los hijos de Sefatías, los hijos de Hatil, 

los  hijos  de  Poqueret  de  Hazebaim,  los 

hijos de Ami.

2.42 Lit. hijos de los porteros. Indica que el oficio pasa de padres a hijos.  2.50 Gentilicio que puede traducirse como nombre 

propio. 

2.50 Otro posible gentilicio. 


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Esdras 2:58

486

58

 Todos  los  servidores  de  la  Casa,  y  los 

hijos  de  los  siervos  de  Salomón  fueron 

trescientos noventa y dos.

59

 Y  éstos  son  los  que  subieron  de  Tel-

mela,  Tel-harsa,  Querub,  Addán  e  Imer 

(aunque  ellos  no  pudieron  demostrar  la 

casa de sus padres, ni su linaje, si eran de 

Israel):

60

 Los hijos de Delaía, los hijos de Tobías, 

los hijos de Necoda, seiscientos cincuenta 

y dos.

61

 Y de los hijos de los sacerdotes: los hi-

jos de Habaía, los hijos de Cos, los hijos 

de Barzilai, quien se había tomado mujer 

entre las hijas de Barzilai galaadita, con 

cuyo nombre fue llamado.

62

 Éstos  buscaron  su  registro  entre  los 

empadronados, pero no pudieron ser ha-

llados,  por  lo  que  fueron  declarados  in-

mundos y excluidos del sacerdocio.

63

 Y  el  gobernador°  les  dijo  que  no  de-

bían comer de las cosas santas hasta que 

se levantara sacerdote para usar el Urim 

y Tumim.°

64

 Toda la congregación en conjunto era 

de cuarenta y dos mil trescientos sesenta;

65

 además  de  sus  criados  y  criadas,°  los 

cuales eran siete mil trescientos treinta y 

siete; y de ellos había doscientos cantores 

y cantoras.

66

 Sus  caballos  eran  setecientos  treinta 

y seis; sus mulos, doscientos cuarenta y 

cinco;

67

 sus  camellos,  cuatrocientos  treinta  y 

cinco; asnos, seis mil setecientos veinte.

68

 Y cuando llegaron a la Casa de YHVH, 

algunos de los cabezas de familia que es-

taban en Jerusalem, dieron ofrendas vo-

luntarias para que reedificaran la Casa de 

Dios en sus propios cimientos.°

69

 Según sus recursos,° aportaron para la 

obra  sesenta  y  un  mil  dracmas°  de  oro, 

cinco mil minas° de plata, y cien túnicas 

sacerdotales.

70

 Y los sacerdotes, los levitas y parte del 

pueblo, y los cantores, los porteros, y los 

netineos,  habitaron  en  sus  ciudades,  y 

todo Israel en sus ciudades respectivas.

Reconstrucción del altar

3

Cuando llegó el mes séptimo, y los hi-

jos de Israel estaban en las ciudades, 

el pueblo se reunió como un solo hombre 

en Jerusalem.

2

 Entonces se levantó Jesúa ben Josadac, 

y  sus  hermanos  los  sacerdotes,  y  Zoro-

babel  ben  Salatiel,  con  sus  hermanos,  y 

edificaron el altar del Dios de Israel, para 

hacer  subir  sobre  él  holocaustos,  como 

está escrito en la Ley de Moisés, varón de 

Dios.

3

 Así,  aunque  estaban  con  temor  de  las 

poblaciones  del  país,  erigieron  el  altar 

sobre  su  base  e  hicieron  subir  sobre  él 

holocaustos a YHVH: holocaustos por la 

mañana y por la tarde.

4

 Y celebraron la festividad de los Taber-

náculos,°  como  está  escrito,  y  el  holo-

causto de cada día por número, conforme 

a la ordenanza para cada día.

5

 Y  después  de  esto,  el  holocausto  con-

tinuo,  las  lunas  nuevas,  y  de  todos  los 

tiempos señalados consagrados a YHVH, 

y cada uno presentaba una ofrenda volun-

taria a YHVH.

6

 Desde el primer día del mes séptimo co-

menzaron a hacer ascender holocaustos a 

YHVH, aunque el Santuario de YHVH no 

estaba aún cimentado.

7

 A los canteros y artesanos se les pagó en 

plata, y a los sidonios y tirios en alimen-

tos, y bebidas, y aceite, para que trajeran 

troncos  de  cedros  desde  el  Líbano  por 

mar hasta Jope,° conforme a la autoriza-

ción de Ciro rey de Persia.

8

 Y en el año segundo de su llegada a la 

Casa de Dios en Jerusalem, en el mes se-

gundo,° comenzaron° Zorobabel ben Sa-

latiel, y Jesúa ben Josadac, y el resto de 

sus  hermanos,  los  sacerdotes  y  los  levi-

tas, y todos los que habían regresado de 

la cautividad a Jerusalem, y designaron a 

los levitas de veinte años arriba para diri-

gir las obras de la Casa de YHVH.

9

 Entonces Jesúa con sus hijos y herma-

nos, Cadmiel y sus hijos, los hijos de Judá 

y los hijos de Henadad con sus hijos y sus 

2.63 Corresponde al cargo imperial de Tirsatha.  2.63 Instrumentos de consulta a Dios. 

→Ex.28.30.  2.65 Nesclavas.  2.68 Es 

decir, sobre el lugar que había ocupado originalmente. 

2.69 Nsu capacidad.  2.69 Monedas persas llamadas también dárico

2.69 La mina babilónica equivalía a 571, 2 g o 50 siclos.  3.4 

→Lv.23.34-36; Dt.16.13-15.  3.7 Jope es la actual Yafo.  3.8 Esto 

es, el mes de Iyar (Abril-Mayo) del 536 a.C. 

3.8 Es decir, a edificar.


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Esdras 4:13

487

hermanos levitas, se presentaron unáni-

mes para dirigir a los que trabajaban en 

la Casa de Dios.

10

 Cuando los constructores echaron los 

cimientos del Santuario de YHVH, se pre-

sentaron  los  sacerdotes  y  los  levitas,  hi-

jos de Asaf, ataviados con sus vestiduras, 

con  trompetas  y  címbalos  para  alabar  a 

YHVH  según  la  ordenanza  de  David  rey 

de Israel.

11

 Y entonaron un cántico de alabanza y 

gratitud a YHVH: Porque es bueno, por-

que para siempre es su misericordia so-

bre Israel. Entonces todo el pueblo gritó 

con gran alegría alabando a YHVH porque 

los cimientos de la Casa de YHVH habían 

sido echados.

12

 Pero muchos de los sacerdotes, de los 

levitas y de los jefes de familias, aquellos 

ancianos que habían visto la Casa prime-

ra,°  viendo  echar  los  cimientos  de  esta 

Casa ante sus ojos, lloraban en alta voz, 

en tanto que otros muchos daban gritos 

de júbilo,

13

 de  modo  que  la  gente  no  podía  dis-

tinguir  entre  el  clamor  de  los  gritos  de 

júbilo  y  el  clamor  del  llanto  del  pueblo, 

porque el pueblo gritaba a voz en cuello, 

y el bullicio se oía desde lejos.

Interrupción de la obra

4

Pero los adversarios de Judá y de Ben-

jamín oyeron que los hijos del cautive-

rio reedificaban el Santuario para YHVH, 

Dios de Israel,

2

 y se acercaron a Zorobabel y a las cabe-

zas paternas, y les dijeron: Edificaremos 

con vosotros, porque buscamos a vuestro 

Dios, como vosotros, y a Él sacrificamos 

desde los días de Esar-hadón, rey de Asi-

ria, que nos hizo subir aquí.

3

 Pero Zorobabel, Jesúa, y los demás ca-

bezas paternas de Israel les respondieron: 

Nada  tenéis  que  ver  con  nosotros°  para 

que edifiquéis Casa a nuestro Dios, sino 

que  nosotros  solos  construiremos  para 

YHVH, Dios de Israel, como nos ordenó 

Ciro rey de Persia.

4

 Entonces  sucedió  que  el  pueblo  de  la 

tierra° desalentaba° al pueblo de Judá, y 

los hostigó mientras construían,

5

 y  contrataron  consejeros  contra  ellos 

para  frustrar  sus  propósitos,  todos  los 

días de Ciro rey de Persia, hasta el reinado 

de Darío rey de Persia.°

6

 Y durante el reinado de Asuero, al prin-

cipio de su reinado, escribieron una acu-

sación contra los moradores de Judá y de 

Jerusalem.

7

 Y en días de Artajerjes, escribieron Bis-

lam, Mitrídates, Tabeel y los demás com-

pañeros suyos, a Artajerjes rey de Persia 

(la carta estaba escrita en arameo, y fue 

interpretada en arameo).°

8

 El  gobernador  Rehum  y  el  secretario 

Simsai  escribieron  al  rey  Artajerjes  una 

carta contra Jerusalem.

9

 En tal fecha el gobernador Rehum, y el 

secretario Simsai, y el resto de sus com-

pañeros:  los  jueces,  los  magistrados,  los 

oficiales, los funcionarios, los de Erec, los 

babilonios, los de Susa (es decir, los ela-

mitas),°

10

 y  los  demás  pueblos  que  el  grande  y 

noble  Asnapar°  había  hecho  deportar  y 

establecer en las ciudades de Samaria y en 

otras de la región de Más Allá del Río,°

11

 enviaron copia de ésta carta: Al rey Ar-

tajerjes, de tus siervos, habitantes de Más 

Allá del Río. Ahora,

12

 sea  notorio  al  rey  que  los  judíos  que 

subieron  de  ti,  han  venido  a  nosotros  a 

Jerusalem y están reedificando la ciudad 

rebelde  y  malvada,  y  han  terminado  los 

muros y están colocando los cimientos.

13

 Sepa ahora el rey que si esta ciudad es 

reedificada,  y  los  muros  terminados,  no 

han de pagar tributo, impuesto o contri-

bución alguna, con lo que se perjudicará 

el ingreso de los reyes.°

3.12 Se refiere a la primera Casa que edificó Salomón.  4.3 Lit. no vosotros y nosotros edificar.  4.4 Esto es, el conjunto de los 

demás pueblos vecinos de Judá. 

4.4 Lit. debilitaba las manos.  4.5 Estas fechas son: Ciro, 559-530; Esar Hadón, 681-669; 

Darío, 522-486; Artajerjes I, 465-423; y Asnapar (v.10, es decir, Asurbanipal), 669-633. 

4.7 A partir de 4.8 hasta 6.18, el texto 

se halla en lengua aramea, que era la lengua franca del imperio Medopersa. 

4.9 Esta lista de nombres es interpretada también 

como gentilicios: los de Din, de Afarsatak, de Tarpel, de Afaras, de Erek, de Babilonia, de Susa, de Dehá, de Elam,… 

4.10 Esto 

es, el rey Asurbanipal, quien siguió la política de intercambio de grupos minoritarios como sus predecesores Sargón y Esar 

Hadón. 

4.10 Esto es, la quinta satrapía del Imperio Persa (llamada Transeufratina) formada por los territorios al O del Éufrates y 

compuesta por Siria, Palestina, Chipre y Fenicia. 

4.13 Nlos reyes mismos padecerán quebranto


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Esdras 4:14

488

14

 Ahora,  puesto  que  dependemos  del 

palacio,°  y  no  soportamos  ver  la  afrenta 

del rey, por eso hemos enviado y lo hemos 

dado a conocer al rey,

15

 para que se indague en el rollo de las 

Memorias° de tus padres; y hallarás en el 

rollo de las Memorias, y sabrás que esta 

ciudad es una ciudad rebelde, y perjudi-

cial para reyes y provincias, y las revueltas 

se  producían  en  su  interior  desde  tiem-

pos muy antiguos, motivo por el cual esta 

ciudad fue asolada.

16

 Hacemos saber al rey que si esta ciudad 

es  reedificada  y  terminados  sus  muros, 

por  su  causa  no  tendrás  porción  alguna 

más acá del Río.

17

 Entonces el rey envió una respuesta al 

gobernador Rehum y al secretario Simsai, 

y a sus demás compañeros que habitaban 

en Samaria, y a los demás de Más Allá del 

río: Paz. Y ahora,

18

 la carta que nos enviasteis ha sido leí-

da con claridad ante mí;

19

 y  he  decretado  que  se  buscara,  y 

se  ha  hallado  que  esa  ciudad  se  rebela 

contra los reyes desde tiempo antiguo, 

y que en medio de ella se tramaron re-

beliones,

20

 y que en Jerusalem hubo reyes fuertes 

que dominaban toda la región de Más Allá 

del Río y que se les pagaban tributos, con-

tribuciones e impuestos.

21

 Ahora  pues,  disponed  que  esos  hom-

bres cesen su trabajo y que esa ciudad no 

sea  reedificada  hasta  que  un  edicto  sea 

promulgado por mí.

22

 Y guardaos de ser negligentes en ha-

cer esto, pues, ¿por qué ha de aumentar 

el daño en perjuicio de los reyes?

23

 Y tan pronto como la copia de la car-

ta del rey Artajerjes fue leída delante de 

Rehum, y del secretario Simsai, y de sus 

compañeros, se presentaron apresurada-

mente en Jerusalem ante los judíos, y los 

obligaron a cesar la obra mediante el po-

der y la fuerza.

24

 Y cesó la obra de la Casa de Dios que 

está  en  Jerusalem,  y  fue  interrumpida 

hasta el año segundo del reinado de Darío 

rey de Persia.

Reanudación de la obra

5

Entonces  los  profetas  Hageo  y  Zaca-

rías bar Iddo profetizaron a los judíos 

que  estaban  en  Judá  y  en  Jerusalem  en 

nombre  del  Dios  de  Israel,  quien  estaba 

con ellos.

2

 En ese tiempo se levantaron Zorobabel 

bar Salatiel y Jesúa bar Josadac y comen-

zaron  a  reedificar  la  Casa  de  Dios  que 

estaba en Jerusalem, y con ellos, los pro-

fetas de Dios que los apoyaban.

3

 Pero  al  mismo  tiempo  se  presentaron 

ante ellos Tatnai, gobernador de Más Allá 

del Río, y Setar-boznai y sus compañeros, 

para decirles: ¿Quién os ha dado orden para 

edificar esta Casa, y terminar estos muros?

4

 También  les  preguntaron  así:  ¿Cuáles 

son los nombres de los hombres que ree-

difican este edificio?

5

 Pero la mirada de Dios estaba sobre los 

ancianos judíos, y no los obligaron a in-

terrumpir el trabajo hasta que el asunto 

fuera  a  Darío  y  éste  diera  instrucciones 

por carta.

6

 Entonces  Tatnai,  gobernador  de  Más 

Allá  del  Río,  y  Setar-boznai,  y  sus  com-

pañeros, los afarsaquitas° de Más Allá del 

Río, enviaron al rey Darío

7

 una carta donde fue escrito esto: A Da-

río el rey sea toda paz.

8

 Sea notorio al rey que fuimos a la pro-

vincia de Judea, a la Casa del gran Dios, 

que es construida con grandes piedras y 

madera en las paredes. Esta obra se eje-

cuta diligentemente y prospera en las ma-

nos de ellos.

9

 Y  preguntamos  a  aquellos  ancianos: 

¿Quién os dio orden de edificar esta Casa 

y terminar este muro?

10

 Les  preguntamos  también  sus  nom-

bres para hacértelo saber, para informarte 

los nombres de los que están a la cabeza 

de ellos.

11

 Y nos respondieron diciendo así: Noso-

tros somos siervos del Dios de los cielos 

y de la tierra, y reedificamos la Casa que 

fue construida hace muchos años, la cual 

edificó y terminó un gran rey de Israel.

12

 Pero  por  cuanto  nuestros  antepasa-

dos  provocaron  al  Dios  de  los  cielos,  Él 

4.14 Lit. comemos la sal del palacio 4.14 Expresión aramea para indicar que están al servicio y mantenidos por el palacio. 

4.15 Esto es, los registros históricos.  5.6 Prob. título gubernamental de administradores de la región.


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Esdras 6:13

489

los  entregó  en  mano  de  Nabucodonosor 

rey de Babilonia, el caldeo, quien destru-

yó esta Casa, e hizo deportar al pueblo a 

Babilonia.

13

 Pero en el primer año de Ciro rey de 

Babilonia,  el  mismo  rey  Ciro  dio  orden 

para que esta Casa de Dios fuera recons-

truida.

14

 Y los utensilios de oro y de plata de 

la Casa de Dios, que Nabucodonosor ha-

bía  sacado  del  Santuario  de  Jerusalem 

y  puesto  en  el  templo  de  Babilonia,  el 

rey Ciro los sacó del templo de Babilo-

nia y fueron entregados a uno llamado 

Sesbasar,  a  quien  había  nombrado  go-

bernador.

15

 Y le dijo: Toma estos utensilios, anda y 

ponlos en el Santuario que está en Jeru-

salem, y que la Casa de Dios sea recons-

truida en su lugar.

16

 Y  el  mismo  Sesbasar  vino  y  echó  los 

fundamentos de la Casa de Dios que está 

en  Jerusalem,  y  desde  entonces  hasta 

ahora se ha estado construyendo, aunque 

no está terminada.

17

 Y ahora, si parece bien al rey, que se 

indague en la tesorería real que está allí 

en Babilonia, para verificar si por el rey 

Ciro fue dada orden para reconstruir esta 

Casa de Dios en Jerusalem, y se nos diga 

la voluntad del rey sobre esto.

Edicto de Darío 

Dedicación de la Casa 

La Pascua

6

Entonces  el  rey  Darío  dio  orden,  e 

indagaron en la casa de los archivos, 

donde  guardaban  los  tesoros  allí  en  Ba-

bilonia.

2

 Y en Acmeta,° en el palacio que está en 

la provincia de Media, fue hallado un ro-

llo donde estaba escrito: Memoria:

3

 En el año primero del rey Ciro, el mis-

mo rey Ciro dio orden acerca de la Casa 

de  Dios  que  esta  en  Jerusalem:  Que  la 

Casa sea reedificada en el lugar donde se 

ofrecen los holocaustos, y sus cimientos 

sean echados firmemente. Que su altura 

sea de sesenta codos y su anchura de se-

senta codos,

4

 con tres hileras de piedra tallada, y una 

hilera de madera nueva, y sean los gastos 

sufragados por la casa real;

5

 y sean restituidos a la Casa de Dios los 

utensilios de oro y de plata que Nabuco-

donosor sacó del Santuario de Jerusalem 

y transportó a Babilonia; sean devueltos 

y llevados otra vez al Santuario de Jeru-

salem, a su lugar, y sean colocados en la 

Casa de Dios.

6

 Por lo tanto: Tatnai, gobernador de Más 

Allá del Río, Setar-boznai y sus compañe-

ros, los afarsaquitas de Más Allá del Río,° 

apartaos de allí,

7

 y dejad llevar a cabo la obra de esa Casa 

de Dios, y que el gobernador de los judíos 

y los ancianos de los judíos reconstruyan 

esa Casa de Dios en su lugar.

8

 Y por mí es dada orden de lo que habéis 

de hacer con esos ancianos judíos para la 

construcción de esa Casa de Dios: Que del 

erario del rey, aun de los tributos de Más 

Allá del Río, sean pagados puntualmente 

los gastos a esos hombres, para que no se 

detengan.

9

 Y lo que sea necesario: tanto becerros 

como  carneros  y  corderos  para  holo-

caustos al Dios de los cielos, como asi-

mismo trigo, sal, vino y aceite, conforme 

a lo que digan los sacerdotes que están 

en  Jerusalem,  les  sea  dado  cada  día  sin 

falta,

10

 para que puedan ofrecer sacrificios de 

olor agradable al Dios de los cielos, y oren 

por la vida del rey y la de sus hijos.

11

 Asimismo decreto que cualquiera que 

infrinja este edicto, se arranque un made-

ro de su casa, y sea clavado y empalado en 

él, y que por ello, su casa sea convertida 

en estercolero.

12

 Y  ‘Elaha,°  que  hizo  que  su  Nombre 

habite  allí,  destruya  a  todos  los  reyes  y 

pueblos que alcen la mano para modificar 

o  destruir  esa  Casa  de  Dios  que  está  en 

Jerusalem. Yo, Darío, promulgo el edicto. 

Sea ejecutado con toda diligencia.

13

 Entonces  Tatnai,  gobernador  de  Más 

Allá del Río, Setar-boznai y sus compañe-

ros, hicieron puntualmente según el rey 

Darío había ordenado.

6.2 Capital del imperio Medo, llamada también Ecbatana, lugar donde se encontraba la residencia veraniega del rey.  6.6 Ny sus 

compañeros que habéis de administrar el territorio de allende el Eúfrates

6.12 Variante de ’Elohim

→§2. 


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Esdras 6:14

490

14

 Y  los  ancianos  judíos  construyeron  y 

prosperaron,  conforme  a  la  profecía  del 

profeta Hageo y de Zacarías bar Iddo. Y ter-

minaron  la  edificación  conforme  al  man-

dato del Dios de Israel, y al edicto de Ciro, 

al de Darío, y al de Artajerjes rey de Persia.

15

 Y  la  Casa  fue  terminada  al  tercer  día 

del mes de Adar, que era el año sexto del 

reinado del rey Darío.°

16

 Y los hijos de Israel, los sacerdotes y los 

levitas, y el resto de los hijos del cautiverio, 

consagraron esa Casa de Dios con regocijo.

17

 Y en la dedicación de esta Casa de Dios, 

hicieron acercar cien becerros, doscientos 

carneros y cuatrocientos corderos; y doce 

machos  cabríos  como  víctimas  expiato-

rias por todo Israel, según el número de 

las tribus de Israel.

18

 Y establecieron a los sacerdotes según 

sus clases y a los levitas según sus órdenes 

para el servicio de Dios en Jerusalem, con-

forme a lo escrito en el Rollo de Moisés.

19

 Y los hijos de la cautividad hicieron la 

Pascua el catorce del mes primero,°

20

 pues los sacerdotes y los levitas se ha-

bían  purificado  como  un  solo  hombre:° 

todos ellos estaban puros; luego sacrifica-

ron el cordero pascual por todos los hijos 

del cautiverio, y por sus hermanos los sa-

cerdotes, y por ellos mismos.

21

 Y  comieron  los  hijos  de  Israel  que 

habían vuelto del cautiverio, y todos los 

que  junto  a  ellos  se  habían  apartado  de 

las inmundicias paganas de la tierra, para 

buscar a YHVH, el Dios de Israel;

22

 y  celebraron  la  festividad  de  los  Ázi-

mos durante siete días con regocijo, por 

cuanto YHVH los había alegrado y había 

dispuesto en su favor el corazón del rey 

de Asiria para fortalecer sus manos en la 

obra de la Casa de Dios, el Dios de Israel.

Misión de Esdras 

Decreto de Artajerjes

7

Después de estas cosas, en el reinado 

de Artajerjes rey de Persia, Esdras ben 

Seraías, hijo de Azarías, hijo de Hilcías,

2

 hijo  de  Salum,  hijo  de  Sadoc,  hijo  de 

Ahitob,

3

 hijo de Amarías, hijo de Azarías, hijo de 

Meraiot,

4

 hijo de Zeraías, hijo de Uzi, hijo de Bu-

qui,

5

 hijo  de  Abisúa,  hijo  de  Finees,  hijo  de 

Eleazar, hijo de Aarón, primer sacerdote:

6

 Este Esdras subió° de Babilonia, donde 

era  diestro  escriba  de  la  Ley  de  Moisés 

dada por YHVH Dios de Israel, y el rey le 

concedió toda su petición, según la mano 

de YHVH su Dios era sobre él.

7

 En  el  año  séptimo  del  rey  Artajerjes 

también subieron a Jerusalem algunos de 

los  hijos  de  Israel,  y  de  los  sacerdotes  y 

levitas, y de los cantores y porteros, y de 

los netineos,

8

 y en el mes quinto del año séptimo del 

rey,° llegó a Jerusalem.

9

 Porque el primero del mes primero ha-

bía sido el inicio del retorno° de Babilo-

nia, y al primero del mes quinto llegó a 

Jerusalem, según la bondadosa mano de 

su Dios sobre él.

10

 Por  cuanto  Esdras  había  determina-

do  en  su  corazón  escudriñar°  la  Ley  de 

YHVH  y  practicarla,  y  enseñar  en  Israel 

sus estatutos y preceptos.

11

 Y  este  es  el  texto  de  la  carta  que  el 

rey  Artajerjes  dio  al  sacerdote  Esdras, 

escriba  erudito°  de  los  mandamientos 

de  YHVH,  y  de  sus  estatutos  acerca  de 

Israel:

12

 Artajerjes,  rey  de  reyes,  al  sacerdote 

Esdras, escriba erudito de la Ley del Dios 

de los cielos. Paz° completa.° Y ahora:

13

 Por mí es dado decreto para que todo 

aquel del pueblo de Israel, y sus sacerdo-

tes y levitas, que quieran ir contigo a Je-

rusalem, que vayan,

14

 por  cuanto  de  parte  del  rey  y  de  sus 

siete consejeros tú eres enviado a inspec-

cionar Judea y Jerusalem, conforme a la 

Ley de tu Dios, que está en tu mano,

15

 y llevar la plata y el oro que el rey y sus 

consejeros han ofrecido voluntariamente 

6.15 Esto es, Febrero-Marzo del 515 a.C.  6.19 Esto es, el mes de Nisán (Marzo-Abril).  6.20 LXX añade pero los demás repatria-

dos no estaban purificados. Ya que los levitas, pues (estaban puros… 

7.6 Esto es, a Jerusalem.  7.8 Esto es, el mes de Ab (Julio-

Agosto) del 398 a.C. o del 458 a.C., según se trate de Artajerjes I o de Artajerjes II. 

7.9 Lit. subida   7.10 También significa buscar, 

inquirir, explicar, cuidar de

7.11 LXX: escriba en la gramática de las palabras de la Biblia. VUL: escriba erudito en sermones

7.12 .Paz.  7.12 El texto arameo utiliza dos palabras: completo y etcétera, cuya finalidad prob. indica el carácter irrevocable 

de la orden.


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Esdras 8:14

491

al  Dios  de  Israel,  cuyo  Tabernáculo  está 

en Jerusalem,

16

 junto  con  toda  la  plata  y  el  oro  que 

encuentres°  en  toda  la  provincia  de  Ba-

bilonia,  con  las  ofrendas  voluntarias  del 

pueblo y de los sacerdotes, dedicadas para 

la Casa de su Dios que está en Jerusalem.

17

 Con este dinero pues, comprarás con 

toda diligencia becerros, carneros, corde-

ros, y sus ofrendas vegetales y sus libacio-

nes,° y los harás acercar al altar de la Casa 

de vuestro Dios que está en Jerusalem.

18

 Y con el resto de la plata y del oro, haz 

lo  que  te  parezca  bien  a  ti  y  a  tus  her-

manos; obrad conforme a la voluntad de 

vuestro Dios.

19

 Y  los  utensilios  sagrados  que  te  son 

entregados para el servicio de la Casa de 

tu Dios, los restituirás ante el Dios de Je-

rusalem.

20

 Y el resto de las cosas necesarias para 

la  Casa  de  tu  Dios  que  necesites  dar,  lo 

darás de las arcas reales.

21

 Y por mí, yo, el rey Artajerjes, es dada 

orden a todos los tesoreros de Más Allá del 

Río,° para que todo lo que os pida el sa-

cerdote Esdras, erudito de la Ley del Dios 

de los cielos, sea dado con toda solicitud

22

 hasta cien talentos de plata, hasta cien 

coros de trigo, hasta cien batos de vino y 

hasta cien batos de aceite, y sal sin me-

dida.

23

 Todo lo que es ordenado por el Dios de 

los cielos, sea hecho diligentemente para 

la Casa del Dios de los cielos, pues ¿por 

qué habría de encenderse la ira contra el 

reino del rey y de sus hijos?

24

 Y a vosotros os hacemos saber que a to-

dos los sacerdotes, y levitas, y cantores, los 

porteros, los netineos y siervos de la Casa 

de Dios, no será lícito imponerles tributo, 

contribución, o impuesto alguno.

25

 Y tú, Esdras, conforme a la sabiduría 

de tu Dios, que está en tu mano, estable-

ce magistrados y jueces, que administren 

justicia a todo el pueblo de Más Allá del 

Río, a todos los que conocen la Ley de tu 

Dios, y enseñaréis al que no la conoce.

26

 Y todo el que no cumpla la Ley de tu 

Dios,  y  la  ley  del  rey,  le  sea  ejecutado 

juicio  con  toda  diligencia,  ya  sea  para 

muerte, para destierro, para confiscación 

de bienes, o para prisión.

27

 ¡Bendito° sea YHVH, Dios de nuestros 

padres, que puso tales cosas en el corazón 

del rey, para embellecer la Casa de YHVH 

que está en Jerusalem,

28

 y  extendió  sobre  mí  su  misericordia 

ante  el  rey  y  sus  consejeros,  y  ante  los 

poderosos  gobernadores  del  rey!  Y  yo, 

fortalecido por la mano de YHVH mi Dios 

sobre mí, reuní a los jefes de Israel para 

que subieran conmigo.

Acompañantes de Esdras 

El viaje

8

Y  éstos  son  los  cabezas  de  las  casas 

paternas  y  la  genealogía  de  los  que 

subieron conmigo desde Babilonia en el 

reinado del rey Artajerjes:

2

 De los hijos de Finees, a Gersón; de los 

hijos de Itamar, a Daniel; de los hijos de 

David, a Hatús;

3

 de los hijos de Secanías (hijos de Paros), 

a Zacarías, y con él se reconocieron por 

genealogía a ciento cincuenta varones.

4

 De  los  hijos  de  Pajat-moab,  a  Elioenai 

ben Zeraías, y con él doscientos varones;

5

 de los hijos de Secanías,° al hijo de Ja-

haziel, y con él trescientos varones;

6

 de los hijos de Adín, a Ebed ben Jona-

tán, y con él cincuenta varones;

7

 de los hijos de Elam, a Jesaías ben Ata-

lías, y con él setenta varones;

8

 de los hijos de Sefatías, a Zebadías ben 

Micael, y con él ochenta varones;

9

 de los hijos de Joab, a Obadías ben Je-

hiel, y con él doscientos dieciocho varo-

nes;

10

 de los hijos de Selomit,° al hijo de Josi-

fías, y con él ciento sesenta varones;

11

 de  los  hijos  de  Bebai,  a  Zacarías  ben 

Bebai, y con él veintiocho varones;

12

 de los hijos de Azgad, a Johanán ben 

Hacatán, y con él ciento diez varones;

13

 de  los  hijos  de  Adonicam,  los  postre-

ros,  cuyos  nombres  son:  Elifelet,  Jeiel  y 

Semaías, y con ellos sesenta varones;

14

 y de los hijos de Bigvai, a Utai y Zabud, 

y con ellos setenta varones.

7.16 Nrecibas.  7.17 Se refiere a las ofrendas vegetales y al derramamiento del aceite o del vino.  7.21 Esto es, el Éufrates

7.27 Palabras de Esdras.  8.5 LXX añade Hijos de Zattu.  8.10 LXX también incluye Hijos de Bani


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Esdras 8:15

492

15

 Y los reuní junto al río que corre hacia 

Ahava, y acampamos allí tres días; y pasé 

revista al pueblo y a los sacerdotes, pero 

no encontré allí de los hijos de Leví.

16

 Entonces  envié  a  buscar  a  Eliezer,  a 

Ariel,  a  Semaías,  y  a  Elnatán,  y  a  Jarib, 

y  a  Elnatán,  y  a  Natán,  y  a  Zacarías  y  a 

Mesulam, hombres principales, así como 

a Joiarib y a Elnatán, hombres doctos,

17

 y  les  di  instrucciones  para  Iddo,  jefe 

en  la  localidad°  de  Casifia,  y  les  dije  lo 

que debían hablar a Iddo y a su hermano 

quienes  estaban  a  cargo  de  Casifia,  para 

que nos trajeran ayudantes para la Casa 

de nuestro Dios.

18

 Y  conforme  a  la  bondadosa  mano  de 

nuestro  Dios  sobre  nosotros,  nos  traje-

ron a un varón entendido de los hijos de 

Mahli, descendiente de Leví ben Israel; y 

a Serabías con sus hijos y sus hermanos: 

dieciocho;

19

 y a Hasabías, y con él a Jesaías, de los 

hijos de Merari, a sus hermanos y a sus 

hijos: veinte;

20

 y de los netineos, a quienes David y los 

príncipes  destinaron  para  el  servicio  de 

los levitas, fueron doscientos veinte servi-

dores del Santuario, todos designados por 

nombres.

21

 Y allí, junto al río de Ahava, proclamé 

un  ayuno  para  humillarnos  delante  de 

nuestro Dios, a fin de suplicar de Él un 

buen viaje para nosotros y para nuestros 

pequeños, así como para toda nuestra ha-

cienda.

22

 Porque tuve vergüenza de pedir al rey 

infantería y caballería que nos protegiera 

del enemigo en el camino, porque había-

mos hablado al rey, diciendo: La mano de 

nuestro Dios está a favor de todos los que 

lo  buscan,  pero  su  poder  y  su  ira  están 

contra todos los que lo abandonan.

23

 Ayunamos,  pues,  y  pedimos  a  nuestro 

Dios sobre esto, y Él atendió nuestro ruego.

24

 Aparté luego a doce de los principales 

entre los sacerdotes, a Serebías y a Hasa-

bías, y con ellos a diez de sus hermanos,

25

 y pesamos ante ellos la plata y el oro 

y  los  utensilios  sagrados,  y  también  la 

ofrenda para la Casa de nuestro Dios que 

habían brindado el rey y sus consejeros y 

sus príncipes y todos los que se encontra-

ban de Israel.

26

 Después  yo  pesé  en  mano  de  ellos° 

seiscientos  cincuenta  talentos°  de  plata, 

objetos de plata por cien talentos, cien ta-

lentos de oro,

27

 veinte tazones de oro por valor de mil 

dracmas°  y  dos  objetos  de  bronce  relu-

ciente, preciosos° como el oro,

28

 y les dije: Vosotros estáis consagrados 

a YHVH, y los objetos son sagrados, y la 

plata y el oro son una ofrenda voluntaria 

para YHVH, el Dios de vuestros padres.

29

 Sed  vigilantes  y  custodiadlos  hasta 

que los peséis en las cámaras de la Casa 

de YHVH, delante de los principales de los 

sacerdotes y levitas, y de los príncipes de 

las casas paternas de Israel en Jerusalem.

30

 Así, los sacerdotes y levitas recibieron 

el peso de la plata y del oro y de los obje-

tos para llevarlo a Jerusalem, a la Casa de 

nuestro Dios.

31

 Partimos  entonces  del  río  Ahava  el 

doce del mes primero° para ir a Jerusa-

lem, y la mano de nuestro Dios estaba so-

bre nosotros, y Él nos libró de mano del 

enemigo y de los salteadores del camino.

32

 Y  llegamos  a  Jerusalem  y  reposamos 

allí tres días.

33

 Al cuarto día, fueron pesados la plata 

y el oro y los vasos en la Casa de nuestro 

Dios en la mano de Meremot hijo del sa-

cerdote Urías, y con él estaba Eleazar ben 

Finees, y con ellos Jozabad ben Jesúa, y 

Noadías ben Binúi, levitas.

34

 Todo  fue  contado  por  número  y  por 

peso, y todo fue escrito en esa ocasión.

35

 Entonces los hijos del cautiverio que 

habían  regresado  del  exilio  hicieron 

acercar  holocaustos  al  Dios  de  Israel: 

doce  becerros  por  todo  Israel,  noventa 

y seis carneros, setenta y siete corderos; 

y  doce  machos  cabríos  como  ofrenda 

por  el  pecado,  todo  como  holocausto  a 

YHVH.

36

 Después entregaron los edictos del rey 

a los sátrapas° del rey y a los gobernado-

res de Más Allá del Río, los cuales favore-

cieron al pueblo y a la Casa de Dios.

8.17 Algunas versiones traducen este término por Santuario.  8.26 Otros añaden y les entregué.  8.26 Equivale a 22.000 kilos.  

8.27 

→2.69 nota.  8.27 Lit. deseados.  8.31 →6.19 nota.  8.36 Mandatarios de alta jerarquía del Imperio Persa.


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Esdras 10:1

493

Yugo desigual

9

Al completarse estas cosas, se aproxi-

maron  a  mí  los  príncipes,  diciendo: 

El pueblo de Israel y los sacerdotes y los 

levitas no se han separado de los pueblos 

de la tierra, y han hecho conforme a sus 

abominaciones, esto es, de los cananeos, 

los hititas, los ferezeos, los jebuseos, los 

amonitas, los moabitas, los egipcios y los 

amorreos.

2

 Porque  han  tomado  de  sus  hijas  para 

sí y para sus hijos, y han emparentado la 

descendencia santa con los pueblos de las 

tierras, y la mano de los príncipes y de los 

altos  dignatarios  ha  sido  la  primera  en 

esta infidelidad.

3

 Cuando  oí  hablar  de  este  suceso,  ras-

gué  mi  vestido  y  mi  manto,  y  arranqué 

cabellos de mi cabeza y de mi barba, y me 

senté consternado.

4

 Entonces  se  acercaron  a  mí  todos  los 

que temblaban ante las palabras del Dios 

de Israel, a causa de la infidelidad de los 

del  cautiverio,  pero  yo  seguía  sentado, 

consternado, hasta el sacrificio de la tar-

de.

5

 Y al sacrificio de la tarde me levanté de 

mi  aflicción,  y  rasgado  mi  vestido  y  mi 

manto, hinqué mis rodillas y extendí mis 

palmas hacia YHVH mi Dios,

6

 y le dije: ¡Oh Dios mío, estoy confuso y 

avergonzado para elevar mi rostro ante ti, 

Dios mío, porque nuestras iniquidades se 

han multiplicado por encima de nuestra 

cabeza y nuestros delitos han crecido has-

ta los cielos!

7

 Desde  los  días  de  nuestros  padres  he-

mos  pecado  en  gran  manera  hasta  este 

día, y por nuestras iniquidades nosotros, 

nuestros reyes y nuestros sacerdotes, he-

mos sido entregados en mano de los reyes 

de las tierras, a la espada, al cautiverio, al 

saqueo y a la confusión de rostro, como 

en este día.

8

 Y ahora, por un breve momento, es mi-

sericordia  de  YHVH  nuestro  Dios  dejar-

nos un remanente y darnos un puntal° en 

su lugar santo, al iluminar nuestro Dios 

nuestros ojos y concedernos un pequeño 

avivamiento° en medio de nuestra escla-

vitud.

9

 Por cuanto esclavos somos, pero en nues-

tra  esclavitud  no  nos  desamparó  nuestro 

Dios,  sino  que  extendió  sobre  nosotros 

misericordia delante de los reyes de Persia, 

para que se nos concediera la preservación 

de la vida, a fin de erigir la Casa de nuestro 

Dios y restaurar sus ruinas, y darnos ampa-

ro° en Judá y en Jerusalem.

10

 Pero ahora, oh Dios nuestro, ¿qué di-

remos después de esto? Porque nosotros 

hemos abandonado tus mandamientos,

11

 los  cuales  prescribiste  por  medio  de 

tus siervos los profetas, diciendo: La tierra 

que vais a poseer es una tierra inmunda a 

causa de la abominación de los pueblos de 

las tierras, por sus prácticas abominables 

con que la han llenado de un extremo a 

otro con sus inmundicias,

12

 por lo que no habréis de dar vuestras 

hijas a los hijos de ellos, ni sus hijas to-

maréis para vuestros hijos, ni procuraréis 

su paz ni su bien para siempre, a fin de 

que seáis fortalecidos, y comáis lo bueno 

de la tierra, y la dejéis en posesión a vues-

tros hijos para siempre.

13

 Pero después de todo lo que nos ha so-

brevenido por nuestras malas obras y por 

nuestra gran culpa, viendo que Tú, Dios 

nuestro, nos has preservado, incluso bajo 

nuestra iniquidad,° y nos diste un rema-

nente como éste,

14

 ¿volveremos a violar tus mandamientos 

emparentando con pueblos que cometen 

tales  abominaciones?  ¿No  te  indignarías 

contra  nosotros  hasta  consumirnos,  sin 

que quedara remanente ni escapatoria?

15

 ¡Oh YHVH, Dios de Israel! Tú eres jus-

to, porque nos ha quedado un remanente 

hasta  este  día.  He  aquí  estamos  ante  ti 

con  nuestra  culpa,  porque  nadie  puede 

estar en pie delante de ti a causa de esto.

Arrepentimiento del pueblo

10

Y mientras Esdras oraba y hacía con-

fesión,  llorando  y  postrado  delante 

9.8 Nestaca, apoyo, un lugar seguro.  9.8 Lit. preservación de la vida 

→v.9.  9.9 También cercado, vallado, en señal de pro-

tección. 

9.13 Nnos has imputado menos culpa de la que teníamos; Nhas atenuado nuestra culpa; Nno nos has castigado 

tanto como merecíamos por nuestros pecados; Nhas disminuido nuestros crímenes. En algunos mss. aparece el verbo estimar

N

has estimado por debajo nuestra iniquidad.


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Esdras 10:2

494

de la Casa de Dios, se reunió en torno a él 

una gran multitud de hombres y mujeres 

y niños de Israel; y todo el pueblo lloraba 

amargamente.

2

 Entonces  Secanías  ben  Jehiel,  uno  de 

los hijos de Elam, tomó la palabra y dijo 

a  Esdras:  Nosotros  hemos  sido  infieles 

para con nuestro Dios, cohabitando con 

mujeres extranjeras de los pueblos de la 

tierra, pero aún hay esperanza para Israel 

con relación a esto.

3

 Ahora pues, concertemos un pacto con 

nuestro  Dios  para  expulsar  a  todas  las 

mujeres  y  los  nacidos  de  ellas,  según  el 

consejo de mi señor y de los que tiemblan 

ante el mandamiento de nuestro Dios, y 

sea hecho eso de acuerdo con la Ley.

4

 ¡Levántate, porque sobre ti está la tarea, 

y nosotros estaremos contigo! ¡Esfuérza-

te, y pon manos a la obra!

5

 Entonces Esdras se levantó, e hizo jurar 

a  los  principales  sacerdotes  y  a  los  levi-

tas, y a todo Israel, que harían conforme a 

esta palabra; y así juraron.

6

 Levantóse pues Esdras de delante de la 

Casa de Dios, y entró en la cámara de Jo-

hanán ben Eliasib. Y cuando estuvo allí, 

no comió pan ni bebió agua, pues estaba 

afligido por causa de la infidelidad de los 

deportados.

7

 E hicieron pasar pregón por Judá y Je-

rusalem  a  todos  los  hijos  del  cautiverio 

que  debían  reunirse  en  asamblea  en  Je-

rusalem,

8

 y a todo el que no llegara en tres días, 

conforme al acuerdo de los príncipes y de 

los ancianos, toda su hacienda fuera he-

cha anatema, y él mismo fuera proscrito 

de la congregación del cautiverio.

9

 Se reunieron, pues, todos los hombres 

de Judá y Benjamín en Jerusalem dentro 

de  los  tres  días.  Era  el  mes  noveno,°  el 

veinte del mes, y todo el pueblo se sentó 

en la plaza de la Casa de Dios, temblan-

do a causa de aquel asunto y por la gran 

lluvia.

10

 Y el sacerdote Esdras se levantó y les 

dijo: Vosotros habéis sido infieles cohabi-

tando  con  mujeres  extranjeras,  aumen-

tando la culpabilidad de Israel.

11

 Ahora pues, haced confesión a YHVH, 

el Dios de vuestros padres, y haced lo que 

a Él le agrada, y apartaos de los pueblos de 

esta tierra y de las mujeres extranjeras.

12

 Entonces  toda  la  congregación  res-

pondió y dijo a gran voz: ¡Sí! que se haga 

con nosotros conforme a tu palabra;

13

 pero la gente es mucha y es tiempo de 

lluvias, y no tenemos fuerza para perma-

necer afuera, ni es éste un trabajo de un 

día o dos, porque somos muchos los que 

hemos pecado en esto.

14

 Permanezcan ahora nuestros principa-

les por toda la congregación, y todos los 

que en nuestras ciudades tengan mujeres 

extranjeras  vengan  en  tiempos  determi-

nados,  y  con  ellos  los  ancianos  de  cada 

ciudad,  y  sus  jueces,  hasta  que  se  haya 

apartado de nosotros el ardor de la ira de 

nuestro Dios acerca de este asunto.

15

 Sólo Jonatán ben Asael y Jahazías ben 

Ticva se opusieron, y los levitas Mesulam 

y Sabetai los apoyaron.

16

 Pero los hijos del cautiverio lo hicie-

ron  así.  Y  fueron  escogidos  por  el  sa-

cerdote  Esdras  hombres  cabezas  de  las 

familias  de  la  casa  de  sus  padres,  todos 

ellos por sus nombres. El primer día del 

mes décimo° se sentaron para considerar 

el asunto,

17

 y  en  el  primer  día  del  mes  primero 

concluyeron  el  juicio  de  todos  aquellos 

que  habían  cohabitado  con  mujeres  ex-

tranjeras.

18

 Y entre los hijos de los sacerdotes, se 

halló que habían cohabitado con mujeres 

extranjeras, algunos° de los hijos de Jesúa 

ben Josadac, y de sus hermanos, Maasías, 

Eliezer, Jarib y Gedalías.

19

 Y estuvieron de acuerdo° en expulsar a 

sus mujeres, y por ser culpables, ofrecie-

ron un carnero del rebaño por su delito.

20

 De los hijos de Imer: Hanani y Zeba-

días.

21

 De los hijos de Harim: Maasías, Elías, 

Semaías, Jehiel y Uzías.

22

 De  los  hijos  de  Pasur:  Elioenai,  Maa-

sías, Ismael, Netanel, Jozabad y Elasa.

23

 De  los  levitas:  Jozabad,  Simei,  Kelaía 

(éste es Kelita), Petaías, Judá y Eliezer.

10.9  Esto  es,  el  mes  de  Kislev  (Noviembre-Diciembre).  10.16  Esto  es,  el  mes  Tebet  (Diciembre-  Enero).  10.18  .algunos

10.19 Lit. se dieron la mano.


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Esdras 10:44

495

24

 De los cantores: Eliasib; de los porte-

ros: Salum, Telem y Uri.

25

 De entre los de Israel: de los hijos de 

Paros: Ramía, Jezías, Malquías, Mijamín, 

Eleazar, Malquías y Benaía.

26

 De los hijos de Elam: Matanías, Zaca-

rías, Jehiel, Abdi, Jeremot y Elías.

27

 De los hijos de Zatu: Elioenai, Eliasib, 

Matanías, Jeremot, Zabad y Aziza.

28

 De los hijos de Bebai: Johanán, Hana-

nías, Zabai, Atlai.

29

 Y de los hijos de Bani, Mesulam, Ma-

luc, Adaía, Jasub, Seal y Ramot.

30

 De los hijos de Pajat-moab: Adna, Que-

lal,  Benaía,  Maasías,  Matanías,  Bezaleel, 

Binúi y Manasés.

31

 De  los  hijos  de  Harim:  Eliezer,  Isías, 

Malquías, Semeías, Simeón,

32

 Benjamín, Maluc, Semarías.

33

 De los hijos de Hasum: Matenai, Ma-

tata, y Zabad, Elifelet, Jeremai, Manasés, 

Simei.

34

 De los hijos de Bani: Madai, Amram y 

Uel,

35

 Benaía, Bedías, Quelúhi,

36

 Vanías, Meremot, Eliasib,

37

 Matanías, Matenai y Jaasai,

38

 Bani, y Binúi, Simei,

39

 Selemías, Natán, y Adaía,

40

 Macnadebai, Sasai, Sarai,

41

 Azareel, y Selemías, Semarías,

42

 Salum, Amarías y José.

43

 De  los  hijos  de  Nebo:  Jeiel,  Matatías, 

Zabad, Zebina, Jadau, Joel y Benaía.

44

 Todos  éstos  habían  cohabitado  con 

mujeres  extranjeras,  y  algunos  de  ellos 

tenían mujeres que les habían dado a luz 

hijos.°

10.44 Nalgunas de las cuales habían tenido hijos


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1

Palabras  de  Nehemías  ben  Hacalías. 

Aconteció en el mes de Kislev° del año 

vigésimo,° que estando yo en Susa, la ciu-

dadela,°

2

 llegó Hanani, uno de mis hermanos, con 

algunos hombres desde Judá. Y les pregunté 

acerca de los judíos evadidos, sobrevivientes 

del cautiverio, y acerca de Jerusalem.

3

 Y  me  dijeron:  Los  del  remanente  que 

quedan de la cautividad allí en la provin-

cia están en gran desventura y humilla-

ción, y el muro de Jerusalem está lleno de 

brechas, y sus puertas han sido devasta-

das por el fuego.

4

 Cuando oí estas palabras me senté, llo-

ré, e hice duelo por algunos días, y ayuné 

y oré ante el Dios de los cielos,

5

 y  exclamé:  ¡Ay  YHVH,  Dios  de  los  cie-

los! Grande y terrible° Dios, que guarda el 

pacto y la misericordia a los que lo aman 

y guardan sus mandamientos:

6

 Esté  ahora  atento  tu  oído  y  tus  ojos 

abiertos, para oír la oración de tu siervo, 

que yo hago hoy ante ti, día y noche, por 

los hijos de Israel tus siervos, confesando 

los pecados de los hijos de Israel que he-

mos cometido contra ti. ¡Sí, yo y la casa 

de mi padre hemos pecado!

7

 Nos hemos corrompido en extremo ante 

ti, no guardando los mandamientos ni los 

estatutos ni los preceptos que Tú dictaste 

a tu siervo Moisés.

8

 Te ruego que te acuerdes de la palabra 

que Tú ordenaste a tu siervo Moisés, di-

ciendo: Si vosotros prevaricáis, Yo os dis-

persaré entre los pueblos,

9

 pero si os volvéis a mí y observáis mis 

mandamientos  y  los  cumplís,  aunque 

vuestros  exiliados  estén  en  el  extremo 

de los cielos, de allí Yo los recogeré y los 

conduciré  de  nuevo  al  lugar  que  escogí 

para que allí tabernaculice mi Nombre.

10

 Ellos pues son tus siervos y tu pueblo, 

los cuales rescataste con tu gran fortaleza 

y con tu mano poderosa.

11

 Te ruego, oh YHVH, esté atento ahora 

tu oído a la oración de tu siervo y a la ora-

ción de tus siervos que se complacen en 

temer tu Nombre, y da prosperidad, te lo 

ruego, a tu siervo hoy, y concédele gracia 

delante de este hombre. (Entonces yo era 

el copero del rey.)

Autorización de Artajerjes 

Llegada a Jerusalem

2

Y en el año vigésimo del rey Artajer-

jes, en el mes de Nisán,° aconteció que 

estando el vino delante de él, yo tomé el 

vino y se lo serví al rey. Y como yo nunca 

antes había estado triste en su presencia,

2

 el  rey  me  dijo:  ¿Por  qué  está  triste  tu 

rostro, ya que no estás enfermo? ¿No es 

esto aflicción de corazón? Entonces temí 

en gran manera,

3

 y respondí al rey: ¡Viva el rey para siem-

pre! ¿Cómo no ha de estar triste mi rostro, 

cuando la ciudad, casa de los sepulcros de 

mis padres, está en ruinas y sus puertas 

consumidas por el fuego?

4

 Y me preguntó el rey: ¿Qué es lo que me 

pides? Entonces oré al Dios de los cielos,

5

 y  dije  al  rey:  Si  al  rey  le  place,  y  si  tu 

siervo ha hallado gracia delante de ti, te 

Oración de Nehemías

1.1 Esto es, Noviembre-Diciembre.  1.1 Esto es, el año 445 a.C. (del rey Artajerjes 465-423 a.C.).  1.1 Es decir, la capital del 

reino

1.5 Nadmirable, prodigioso, imponente.  2.1 Esto es, Marzo-Abril del año 445 a.C. 


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Nehemías 3:4

497

ruego que me envíes a Judá, a la ciudad 

de los sepulcros de mis padres, para que 

pueda reedificarla.

6

 Y  el  rey  me  dijo  (estando  la  consor-

te junto a él): ¿Cuánto durará tu viaje y 

cuándo volverás? Y como al rey le pareció 

bien enviarme, yo le definí el plazo.

7

 Dije  además  al  rey:  Si  al  rey  le  parece 

bien,  que  se  me  den  cartas  para  los  go-

bernadores de Más Allá del Río,° para que 

me franqueen el paso hasta que llegue a 

Judá,

8

 y  también  una  carta  para  Asaf,  guarda 

del  bosque  del  rey,  a  fin  de  que  me  dé 

madera para enmaderar las puertas de la 

ciudadela que está junto a la Casa,° y para 

el muro de la ciudad, y para la casa en que 

yo  he  de  estar.  Y  el  rey  me  lo  concedió, 

según la benéfica mano de mi Dios sobre 

mí.

9

 Y  el  rey  envió  conmigo  capitanes  del 

ejército  y  jinetes,  y  así,  cuando  llegué  a 

los gobernadores de Más Allá del Río les 

entregué las cartas reales.

10

 Pero  cuando  Sanbalat  horonita  y  To-

bías, el siervo amonita, lo oyeron, se dis-

gustaron en gran manera de que alguien 

llegara a procurar el bien de los hijos de 

Israel.

11

 Así llegué a Jerusalem y estuve allí tres 

días.

12

 Y me levanté de noche, yo y unos po-

cos hombres conmigo, y a nadie declaré 

lo que mi Dios había puesto en mi cora-

zón para hacer por Jerusalem. No había 

bestia alguna conmigo, excepto el animal 

en que cabalgaba.

13

 Y salí de noche por la puerta del Valle, 

y pasé por la fuente del Dragón y por la 

puerta  del  Muladar,  y  estuve  inspeccio-

nando los muros de Jerusalem, que esta-

ban destruidos, y sus puertas consumidas 

por el fuego.

14

 Pasé luego a la puerta de la Fuente y 

fui hasta el estanque del Rey, pero no ha-

bía  espacio  para  que  pasara  la  bestia  en 

que iba.

15

 Y subí de noche por el torrente e ins-

peccioné  el  muro,  y  al  volver,  entré  de 

nuevo por la puerta del Valle, y así regre-

sé.

16

 Pero los prefectos no sabían a dónde yo 

había ido ni qué había hecho, pues hasta 

entonces no había informado a los judíos 

ni a los sacerdotes, ni a los principales ni 

a los prefectos ni a los demás que hacían 

la obra.

17

 Entonces les dije: Vosotros veis el mal 

en  que  estamos,  cómo  Jerusalem  está 

destruida y sus puertas devastadas por el 

fuego. ¡Venid y reedifiquemos el muro de 

Jerusalem, y no estemos más en oprobio!

18

 Y les declaré cómo la mano de mi Dios 

había  sido  buena  sobre  mí,  y  asimismo 

las  palabras  que  me  había  dicho  el  rey. 

Entonces respondieron: ¡Levantémonos y 

reedifiquemos! Así fortalecieron ellos sus 

manos para la buena obra.

19

 Pero cuando Sanbalat horonita, y To-

bías, el siervo amonita, y Gesem el árabe,° 

lo oyeron, se burlaron de nosotros y nos 

dijeron despectivamente: ¿Qué estáis ha-

ciendo vosotros? ¿Acaso os rebeláis con-

tra el rey?

20

 Y les respondí diciendo: El Dios de los 

cielos nos prosperará; por tanto nosotros, 

sus  siervos,  nos  levantaremos  y  edifica-

remos, pero vosotros no tenéis parte, ni 

derecho, ni memoria en Jerusalem.

Reconstrucción del muro

3

Entonces el sumo sacerdote Eliasib se 

levantó con sus hermanos los sacerdo-

tes, y reedificaron la puerta de las Ovejas. 

Ellos  mismos  consagraron  y  levantaron 

las puertas, desde la torre Hamea hasta la 

torre Hanan-’El.

2

 Y  junto  a  él°  reedificaron  los  varones 

de  Jericó,  y  a  su  lado  también  reedificó 

Zacur ben Imri.

3

 Y  los  hijos  de  Senaa  reedificaron  la 

puerta de los Peces,° y ellos mismos la en-

maderaron  y  colocaron  sus  puertas,  sus 

cerraduras y sus barras.

4

 Junto a ellos reparó Meremot ben Urías, 

hijo de Cos, y junto a ellos restauró Mesu-

lam ben Berequías, hijo de Mesezabeel, y 

a su lado reparó Sadoc ben Baana.

2.7 

→Esd.4.10 nota.  2.8 Esto es, la Casa de Dios.  2.19 Sanbalat, Tobías y Gesem eran gobernadores establecidos por los 

persas en las regiones circundantes de Jerusalem. 

3.2 Esto es, el sumo sacerdote Eliasib. NJunto a ella (la torre).  3.3 También 

conocida como puerta del Pescado


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Nehemías 3:5

498

5

 Junto a ellos repararon los tecoítas, pero 

sus nobles no doblegaron su cerviz° ante 

la obra de su Señor.

6

 La puerta Antigua fue reparada por Joia-

da  ben  Pasea,  y  Mesulam  ben  Besodías. 

Ellos  mismos  la  enmaderaron  y  asenta-

ron sus puertas, y colocaron sus cerradu-

ras y sus barras.

7

 Junto a ellos repararon Melatías gabao-

nita y Jadón meronotita, hombres de Ga-

baón y de Mizpa, según la autoridad del 

gobernador de Más Allá del Río.

8

 Al lado de ellos reparó Uziel ben Harha-

ya, uno de los orfebres, y junto a él hizo 

reparaciones Hananías, hijo de los perfu-

mistas.° Así restauraron Jerusalem hasta 

el muro ancho.

9

 Junto  a  ellos  hizo  reparar  Refaías  ben 

Hur,  intendente  de  la  mitad  del  distrito 

de Jerusalem.

10

 Y junto a ellos reparó Jedaías ben Ha-

rumaf, hasta el frente de su casa, y a su 

lado reparó Hatús ben Hasabnías.

11

Malquías ben Harim y Hasub ben Pajat-

moab, repararon el otro tramo y la torre 

de los Hornos.

12

 Junto  a  ellos  reparó  Salum  ben  Ha-

lohes, intendente de la otra mitad del dis-

trito de Jerusalem, él y sus hijas.

13

 La  puerta  del  Valle  la  reparó  Hanún 

con los habitantes de Zanoa; ellos la cons-

truyeron y colocaron sus puertas, sus ce-

rraduras y sus barras, y además mil codos 

del muro hasta la puerta del Muladar.

14

 Malquías ben Recab, jefe del distrito de 

Bet-haquerem reparó la puerta del Mula-

dar;  él°  mismo  la  reedificó  y  colocó  sus 

puertas, sus cerraduras y sus barras.

15

 Y Salum ben Colhoze, jefe de la región 

de Mizpa, reparó la puerta de la Fuente; 

él la reedificó, la enmaderó y colocó sus 

hojas, sus cerraduras y sus barras; edificó 

también el muro junto al estanque de Si-

loé, hacia el jardín del rey, hasta las gradas 

que descienden de la Ciudad de David.

16

 Después  de  él,  Nehemías  ben  Azbuc, 

jefe  de  la  mitad  del  distrito  de  Bet-sur, 

reparó hasta frente a los sepulcros de Da-

vid, y hasta el estanque artificial, y hasta 

la casa de los Valientes.

17

 Tras  él  repararon  los  levitas:  Rehum 

ben Bani, junto al cual reparó Hasabías, 

jefe de la mitad del distrito de Keila, por 

cuenta de su distrito.

18

 Detrás de él repararon sus hermanos, 

y Bavay ben Henadad, jefe de la otra mi-

tad de Keila.

19

 Y  junto  a  él,  Ezer  ben  Jesuá,  jefe  de 

Mizpa,  reparó  el  otro  tramo,  frente  a  la 

subida de la Armería, junto al ángulo en-

trante del muro.

20

 Tras él, Baruc ben Zabay se apresuró a 

reparar el tramo que va desde este ángu-

lo hasta la puerta de la casa de Eliasib, el 

sumo sacerdote.

21

 Tras  él,  Meremot  ben  Urías,  hijo  de 

Cos, reparó otro tramo desde la entrada 

de la casa de Eliasib hasta el extremo de 

la casa de Eliasib.

22

 Detrás  de  él  repararon  los  sacerdotes 

procedentes de la llanura.

23

 A  continuación  de  ellos  repararon 

Benjamín y Hasub, frente a su casa, y tras 

éstos reparó Azarías ben Maasías, hijo de 

Ananías, junto a su propia casa.

24

 A  continuación,  Binúi  ben  Henadad, 

reparó  otro  tramo  desde  la  casa  de  Aza-

rías hasta el ángulo entrante del muro, y 

hasta la esquina.

25

 Palal ben Uzay reparó frente al ángulo 

y la torre elevada que sobresale de la casa 

del rey, que está en el patio de la cárcel; y 

tras él, Pedaías ben Faros.

26

 También  los  netineos,  establecidos 

en  Ófel,  repararon°  hasta  enfrente  de  la 

puerta de las Aguas, al oriente de la torre 

que sale hacia fuera.

27

 Detrás de ellos los tecoítas repararon 

otro tramo, desde frente a la torre grande 

que sobresale, hasta el muro de Ófel.

28

 Más arriba de la puerta de los Caballos 

repararon los sacerdotes, cada uno frente 

a su casa.

29

 Detrás de ellos reparó Sadoc ben Imer, 

frente  a  su  casa;  y  tras  él  reparó  Semaías 

ben Secanías, guarda de la puerta Oriental.

30

 Y  tras  él,  Hananías  ben  Selemías  re-

paró otro tramo junto con Hanún, sexto 

hijo de Salaf, y tras éste reparó Mesulam 

ben Berequías, frente a su casa.

3.5 Es decir, se negaron a participar en la obra.  3.8 Indica la persona que pertenece a un gremio determinado.  3.14 LXX añade 

y sus hijos

3.26 .repararon


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Nehemías 4:21

499

31

 Detrás  de  él  reparó  Malquías,  hijo  del 

platero,° hasta las casas de los netineos y 

de los mercaderes, enfrente de la puerta del 

Mifcad,° y hasta la subida de la esquina;

32

 y  entre  la  subida  de  la  esquina  y  la 

puerta de las Ovejas repararon los plate-

ros y los mercaderes.°

Oposición de los samaritanos

4

°Pero sucedió que cuando Sanbalat se 

enteró  de  que  estábamos  reconstru-

yendo el muro, se indignó en gran mane-

ra, y burlándose de los judíos,

2

 habló ante sus hermanos y el ejército de 

Samaria  diciendo:  ¿Qué  pretenden  estos 

miserables  judíos?  ¿La  han  de  restau-

rar  para  sí?  ¿Sacrificarán?  ¿Acabarán  en 

un día? ¿Harán revivir las piedras de los 

montones de escombros, viendo que es-

tán consumidas?

3

 Y  Tobías  amonita,  que  estaba  junto  a 

él, dijo: ¡Hasta una zorra, si sube allí, po-

dría derribar el muro de piedra que están 

construyendo!

4

 ¡Oye,  oh  Dios  nuestro,  cómo  somos 

menospreciados! ¡Haz recaer sus ofensas 

sobre  su  propia  cabeza,  y  entrégalos  al 

despojo en tierra de cautiverio!

5

 ¡No cubras su iniquidad, ni sea borrado 

su pecado delante de tu presencia, porque 

te han provocado a ira delante de los que 

edifican!

6

 Reedificamos  pues  el  muro,  y  toda  la 

muralla quedó rehecha hasta media altu-

ra, y el pueblo tuvo ánimo para trabajar.

7

 °Pero  cuando  Sanbalat  y  Tobías  y  los 

árabes y los amonitas y los de Asdod oye-

ron  que  la  reparación  de  los  muros  de 

Jerusalem  avanzaba,  y  las  brechas  co-

menzaban a cerrarse, se encolerizaron en 

gran manera,

8

 y todos a una se confabularon para venir 

a atacar Jerusalem y causarle daño.

9

 Pero nosotros oramos a nuestro Dios, y 

nos pusimos en guardia contra ellos día 

y noche.

10

 Y  los  de  Judá  dijeron:  Desfallecen  ya 

las fuerzas de los cargadores, y los escom-

bros son muchos, por lo que no seremos 

capaces de reedificar el muro.

11

 Y  nuestros  enemigos  se  decían:  Ellos 

no lo sabrán ni lo verán, hasta que caiga-

mos entre ellos y los matemos, y hagamos 

cesar la obra.

12

 Pero  cuando  llegaron  los  judíos  que 

habitaban cerca de ellos, nos decían hasta 

diez veces: De todos los lugares a los que 

os volváis, caerán sobre nosotros.

13

 Por lo cual aposté en los lugares bajos, 

detrás del muro y en los claros a la gente, 

por familias, con sus espadas, sus lanzas 

y sus arcos.

14

 Y miré, y me levanté y dije a los prin-

cipales y a los prefectos y al resto del pue-

blo:  ¡No  temáis  ante  ellos!  ¡Acordaos  de 

Adonay,  grande  y  prodigioso,°  y  luchad 

por vuestros hermanos, por vuestros hi-

jos y vuestras hijas, por vuestras mujeres 

y por vuestras casas!

15

 Y  sucedió  que  cuando  nuestros  ene-

migos se enteraron de que habíamos sido 

advertidos, Ha-’Elohim desbarató sus pla-

nes, y todos nosotros pudimos regresar al 

muro, cada uno a su obra.

16

 Y  desde  aquel  día,  aconteció  que  la 

mitad de mis servidores trabajaba en la 

obra y la otra mitad sostenía las lanzas, 

los escudos, los arcos y las corazas; y los 

jefes estaban detrás de toda la estirpe de 

Judá.

17

 Los  que  trabajaban  en  el  muro  y  los 

que acarreaban las cargas, con una mano 

trabajaban en la obra y con la otra empu-

ñaban la jabalina.

18

 En  cuanto  a  los  constructores,  cada 

uno llevaba su espada ceñida a sus lomos, 

y así edificaban; y el que soplaba el shofar 

estaba junto a mí.

19

 Pues yo había dicho a los principales, a 

los prefectos y al resto del pueblo: La obra 

es mucha y extensa, y nosotros estamos 

esparcidos por el muro, lejos los unos de 

los otros.°

20

 Dondequiera  que  oigáis  el  sonido  del 

shofar,  reuníos  desde  allí  junto  a  noso-

tros. ¡Nuestro Dios peleará por nosotros!

21

 Así trabajábamos en la obra: la mitad 

de  ellos  empuñaban  las  lanzas,  desde  el 

despuntar  del  alba  hasta  que  salían  las 

estrellas.

3.31 Esto es, perteneciente al gremio de los orfebres.  3.31 Lugar donde se pasa revista de formación e inspección.  3.32 El 

TM continúa hasta el v. 38 que corresponde a 4.1-6. 

4.1 3.33 en el TM  4.7 4.1 en el TM  4.14 

→1.5.  4.19 Lit. un hombre de 

su hermano.


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Nehemías 4:22

500

22

 También  en  ese  tiempo  hablé  al  pue-

blo:  Cada  uno  pernocte  con  su  criado 

dentro de Jerusalem, para que nos sirvan 

de guardia de noche, y de día en la obra.

23

 °Y ni yo, ni mis hermanos, ni mis ser-

vidores, ni los hombres de la guardia que 

me  seguía,  nos  despojamos  de  nuestros 

vestidos, y cada uno tenía el arma en su 

diestra.°

Abolición de la usura

5

Entonces  hubo  un  gran  clamor  del 

pueblo  y  de  sus  mujeres  contra  sus 

hermanos judíos,

2

 porque había quienes decían: Nosotros, 

nuestros  hijos  y  nuestras  hijas  somos 

muchos, y necesitamos grano para comer 

y vivir.

3

 Y  había  quienes  decían:  Hemos  empe-

ñado  nuestros  campos,  nuestras  viñas  y 

nuestras casas para obtener grano duran-

te la hambruna.

4

 Había otros que decían: Hemos tomado 

dinero prestado para el tributo del rey, y 

eso sobre nuestros campos y viñedos.

5

 Ahora  bien,  nuestra  carne  es  como  la 

carne  de  nuestros  hermanos,  sus  hijos 

como nuestros hijos, y he aquí que vamos 

sujetando a servidumbre a nuestros hijos 

y a nuestras hijas; y hay hijas nuestras ya 

esclavizadas,  sin  que  nosotros  podamos 

rescatarlas, puesto que nuestros campos 

y nuestras viñas ya son de otros.

6

 Cuando escuché su clamor y esas pala-

bras me indigné en gran manera,

7

 y mi corazón se turbó dentro de mí, y 

reprendí a los principales y a los prefec-

tos,  y  les  dije:  ¿Vosotros  cobráis  usura, 

cada  uno  a  su  hermano?  Y  convoqué  a 

una gran asamblea contra ellos,

8

 y les dije: Nosotros, según nuestras po-

sibilidades,  hemos  rescatado  a  nuestros 

hermanos  judíos  que  tuvieron  que  ven-

derse  a  los  gentiles;  y  vosotros,  ¿vende-

réis a vuestros hermanos después de ser 

rescatados por nosotros? Y ellos callaron, 

porque no hallaron respuesta.°

9

 Y agregué: No es bueno lo que hacéis, 

¿no deberíais andar en el temor de nuestro 

Dios, a causa del oprobio de nuestros ene-

migos los gentiles?

10

 También  yo  y  mis  hermanos  y  mis 

criados les hemos prestado dinero y gra-

no. ¡Renunciemos ahora a esta usura!

11

 Os  ruego  que  les  devolváis  hoy  sus 

campos, sus viñas, sus olivares y sus ca-

sas,  y  renunciad  a  la  usura  que  les  de-

mandáis por el dinero, por el grano, por 

el vino nuevo y por el aceite.

12

 Entonces respondieron: Lo devolvere-

mos y no lo requeriremos más. Haremos 

así como tú dices. Entonces convoqué a 

los sacerdotes y les hice jurar que harían 

conforme a este asunto.

13

 Y sacudí mi regazo° y dije: ¡Así sacuda 

Ha-’Elohim de su Casa y de su beneficio a 

todo aquel que no cumpla esta promesa! 

¡Así sea sacudido y vaciado! Y toda la con-

gregación  respondió:  ¡Amén!  Y  alabaron 

a YHVH. El pueblo hizo conforme a este 

asunto.

14

 Además, desde el tiempo en que fui de-

signado° gobernador en la tierra de Judá, 

desde el año vigésimo hasta el año trigé-

simo segundo del rey Artajerjes, esto es, 

doce años, ni yo ni mis hermanos comi-

mos el pan del gobernador.

15

 Y aunque los gobernadores que fueron 

antes  de  mí  subyugaban  al  pueblo  y  les 

cobraban más de cuarenta siclos de plata 

por el pan y por el vino, y aun sus criados 

oprimían al pueblo, yo no lo hice, a causa 

del temor de Dios.

16

 En cambio, tomé parte en la obra de 

este  muro,  y  no  adquirí  campo  alguno, 

y todos mis criados han estado reunidos 

para la obra.

17

 Además, de los judíos y de los prefectos 

había en mi mesa ciento cincuenta hom-

bres, sin contar los que venían a nosotros 

de los países vecinos.

18

 Y lo que se preparaba para un solo día 

era un buey y seis ovejas escogidas, y tam-

bién me preparaban aves, y una vez cada 

diez días toda clase de vinos. A pesar de 

todo  esto,  nunca  exigí  el  pan  del  gober-

nador, porque el trabajo era pesado para 

este pueblo.

4.23 4.17 en el TM.  4.23 Texto de difícil traducción. LXX omite la frase. VUL: se desnudaba sólo para lavarse. Ncada uno tenía 

su recipiente de agua. Ncada uno llevaba su espada al ir a beber (o a buscar agua). Nninguno se despojaba de sus vestidos 

sino cerca del agua

5.8 Lit. no hallaron palabra.  5.13 Simbolismo para expulsar a alguien de la comunidad.  5.14 Algunos mss. 

añaden por el rey. El TM no registra el sujeto.


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Nehemías 7:3

501

19

 Acuérdate  de  mí  para  bien,  oh  Dios 

mío, de todo lo que hice por este pueblo.

Trampas de los enemigos

6

Sucedió que habiendo oído Sanbalat y 

Tobías, y Gesem el árabe, y el resto de 

nuestros enemigos, que yo había recons-

truido el muro y que no había quedado en 

él brecha alguna (aunque hasta ese mo-

mento no habían colocado las hojas de las 

puertas),

2

 Sanbalat y Gesem mandaron a decirme: 

Ven y reunámonos en Kefirim,° en el va-

lle de Ono. Pero ellos pensaban hacerme 

daño.

3

 Y  les  envié  mensajeros  diciendo:  Yo 

hago una gran obra, y no puedo ir. ¿Por 

qué ha de cesar la obra dejándola yo para 

ir a vosotros?

4

 E  insistieron  cuatro  veces  sobre  este 

asunto, pero yo les respondí de la misma 

manera.

5

 Entonces Sanbalat me envió a su criado 

con este asunto por quinta vez, con una 

carta abierta en la mano,

6

 en  la  cual  estaba  escrito:  Se  rumorea 

entre  las  naciones  vecinas,  y  Gasmu°  lo 

afirma, que tú y los judíos pensáis rebe-

laros, motivo por el cual reconstruyes el 

muro, con la mira, según esos rumores, 

de ser tú su rey.

7

 Y que además designaste profetas para 

que te proclamen en Jerusalem, diciendo: 

¡Hay rey en Judá! Y ahora, estas palabras 

serán  oídas  por  el  rey;  por  tanto,  ven  y 

convengamos juntos.

8

 Entonces  envié  a  decirle:  No  hay  tal 

cosa como dices, sino que las inventas de 

tu propio corazón.

9

 Porque  ellos  querían  atemorizarnos, 

pensando  que  nuestras  manos  estarían 

debilitadas  por  la  obra  y  que  desistiría-

mos de ella. Pero ahora, ¡fortalece Tú mis 

manos!°

10

 En cuanto a mí, fui a casa de Semaías 

ben Delaía, hijo de Mehe-tabel, porque él 

estaba confinado,° y él dijo: Reunámonos 

en la Casa de Dios, dentro del Santuario, 

y  cerremos  las  puertas  del  Santuario, 

porque vienen a matarte. Sí, esta noche 

vienen a matarte.

11

 Pero respondí: ¿Huir un hombre como 

yo?  Además,  ¿cómo  podría  un  hombre 

como yo° entrar en el Santuario y seguir 

viviendo? No entraré.

12

 Y discerní que ’Elohim no lo había en-

viado,  sino  que  hablaba  aquella  profecía 

contra mí porque Tobías y Sanbalat lo ha-

bían sobornado.

13

 Porque  él  había  sido  sobornado  para 

atemorizarme,  a  fin  de  que  yo  actuara 

de ese modo y pecara, y así tener motivo 

para difamarme.°

14

 ¡Acuérdate  Dios  mío  de  Tobías  y  de 

Sanbalat, conforme a aquellas, sus pala-

bras,  y  de  la  profetisa  Noadías  y  demás 

profetas que querían atemorizarme!

15

 Y el muro fue terminado el veinticinco 

de Elul,° en el quincuagésimo segundo día.

16

 Y cuando todos nuestros enemigos lo 

supieron, sucedió que todas las naciones 

vecinas tuvieron temor y se sintieron hu-

milladas,  porque  reconocieron  que  este 

trabajo era obra de nuestro Dios.

17

 En  aquellos  días  los  nobles  de  Judá 

multiplicaban sus cartas a Tobías, y las de 

Tobías llegaban a ellos.

18

 Porque  muchos  en  Judá  se  habían 

conjurado con él, pues era yerno de Se-

canías ben Ara, y su hijo Johanán había 

tomado por mujer a la hija de Mesulam 

ben Berequías.

19

 Asimismo contaban sus bondades ante 

mí, y le referían mis palabras; y Tobías en-

viaba cartas para atemorizarme.

Previsiones de seguridad 

Censo de los repatriados

7

Cuando el muro quedó reconstruido y 

hube colocado las hojas de las puertas, 

se encargaron de sus funciones los porte-

ros, los cantores y los levitas.

2

 Entonces puse al frente de Jerusalem a 

mi hermano Hanani, y a Hananías, jefe de 

la  ciudadela,  pues  era  un  hombre  leal  y 

temía a Ha-’Elohim más que muchos.

3

 Les  dije:  Las  puertas  de  Jerusalem  no 

serán  abiertas  hasta  que  caliente  el  sol. 

6.2  Lugar  en  territorio  de  la  tribu  de  Benjamín.  6.6  O  Gesem.  6.9  Algunos  mss.,  sin  respaldo  del  TM,  añaden  ¡oh  Dios! 

6.10 Nimpedido.  6.11 Es decir, un laico.  6.13 Esto es, por entrar en el Santuario sin ser sacerdote

→v.11.  6.15 Esto es, 

Agosto-Septiembre.


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Nehemías 7:4

502

Aunque los porteros° estén presentes, las 

puertas  permanecerán  cerradas  y  atran-

cadas; y sean apostados vigías de entre los 

habitantes de Jerusalem, cada cual en su 

vigilia, y cada uno frente a su propia casa.

4

 Porque la ciudad era espaciosa y grande, 

pero la gente que allí moraba era poca, y 

las casas aún no estaban reconstruidas.

5

 Y  mi  Dios  puso  en  mi  corazón  reunir 

a los nobles, a los prefectos y al pueblo, 

para  que  pudieran  ser  reconocidos  por 

genealogía, pues yo había encontrado el 

libro de la genealogía de los que habían 

subido primero, donde hallé escrito:

6

 Estos son hijos de la provincia° que su-

bieron  del  cautiverio  de  los  que  habían 

sido deportados, a quienes Nabucodono-

sor  rey  de  Babilonia  se  había  llevado,  y 

que retornaron a Jerusalem y a Judá, cada 

uno a su ciudad,

7

 los  cuales  vinieron  con  Zorobabel,  Je-

suá,  Nehemías,  Azarías,  Raamías,  Na-

hamani,  Mardoqueo,  Bilsán,  Misperet, 

Bigvay, Nehum, Baana. El número de los 

varones del pueblo de Israel fue:

8

 Hijos  de  Paros:  dos  mil  ciento  setenta 

y dos;

9

 hijos  de  Sefatías:  trescientos  setenta  y 

dos;

10

 hijos  de  Ara:  seiscientos  cincuenta  y 

dos;

11

 hijos  de  Pahat-moab,  de  los  hijos  de 

Jesuá y Joab: dos mil ochocientos diecio-

cho;

12

 hijos de Elam: mil doscientos cincuen-

ta y cuatro;

13

 hijos de Zatu: ochocientos cuarenta y 

cinco;

14

 hijos de Zacay: setecientos sesenta;

15

 hijos de Binúi: seiscientos cuarenta y 

ocho;

16

 hijos de Bebay: seiscientos veintiocho;

17

 hijos  de  Azgad:  dos  mil  trescientos 

veintidós;

18

 hijos de Adonicam: seiscientos sesenta 

y siete;

19

 hijos de Bigvay: dos mil sesenta y siete;

20

 hijos de Adín: seiscientos cincuenta y 

cinco;

21

 hijos  de  Ater,  de  Ezequías:  noventa  y 

ocho;

22

 hijos  de  Hasum:  trescientos  veintio-

cho;

23

 hijos de Bezay: trescientos veinticuatro;

24

 hijos de Harif: ciento doce;

25

 hijos de Gabaón: noventa y cinco;

26

 personas  de  Bet-léhem  y  de  Netofa: 

ciento ochenta y ocho;

27

 personas de Anatot: ciento veintiocho;

28

 personas  de  Bet-azmavet:  cuarenta  y 

dos;

29

 personas  de  Quiriat-jearim,  Cafira  y 

Beerot: setecientos cuarenta y tres;

30

 personas de Ramá y de Geba: seiscien-

tos veintiuna;

31

 personas de Micmás: ciento veintidós;

32

 personas  de  Bet-’El  y  de  Hai:  ciento 

veintitrés;

33

 personas del otro Nebo: cincuenta y dos;

34

 hijos  del  otro  Elam:  mil  doscientos 

cincuenta y cuatro;

35

 hijos de Harim: trescientos veinte;

36

 hijos de Jericó: trescientos cuarenta y 

cinco;

37

 hijos de Lod, Hadid, y Ono: setecientos 

veintiuno;

38

 hijos  de  Senaa:  tres  mil  novecientos 

treinta.

39

 Los  sacerdotes:  hijos  de  Jedaía,  de  la 

casa de Jesuá: novecientos setenta y tres;

40

 hijos de Imer: mil cincuenta y dos;

41

 hijos de Pasur: mil doscientos cuaren-

ta y siete;

42

 hijos de Harim: mil diecisiete.

43

 Los levitas, hijos de Jesuá, de Cadmiel, 

de los hijos de Hodavías: setenta y cuatro.

44

 Los cantores, hijos de Asaf: ciento cua-

renta y ocho.

45

 Los porteros, hijos de Salum, hijos de 

Ater, hijos de Talmón, hijos de Acub, hijos 

de Hatita, hijos de Sobay: ciento treinta 

y ocho.

46

 Los  netineos,  hijos  de  Ziha,  hijos  de 

Hasufa, hijos de Tabaot,

47

 hijos de Queros, hijos de Siaha, hijos 

de Padón,

48

 hijos de Lebana, hijos de Hagaba, hijos 

de Salmai,

49

 hijos de Hanán, hijos de Gidel, hijos de 

Gahar,

50

 hijos de Reaía, hijos de Rezín, hijos de 

Necoda,

7.3 Lit. ellos. .los porteros.  7.6 

→Esd.2.1 nota.


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Nehemías 8:6

503

51

 hijos de Gazam, hijos de Uza, hijos de 

Paseah,

52

 hijos de Besai, hijos de Mehunim,° hi-

jos de Nefisesim,

53

 hijos de Bacbuc, hijos de Hacufa, hijos 

de Harhur,

54

 hijos de Bazlut, hijos de Mehída, hijos 

de Harsa,

55

 hijos de Barcos, hijos de Sísara, hijos 

de Tema,

56

 hijos de Nezía, hijos de Hatifa,

57

 hijos  de  los  siervos  de  Salomón,  hijos 

de Sotay, hijos de Soferet, hijos de Perida,

58

 hijos  de  Jaala,  hijos  de  Darcón,  hijos 

de Gidel,

59

 hijos de Sefatías, hijos de Hatil, hijos 

de Poqueret-hazebaim, hijos de Amón:

60

 Todos  los  netineos  y  los  hijos  de  los 

siervos de Salomón eran trescientos no-

venta y dos.

61

 Y éstos son los que subieron de Telme-

la,  Telharsa,  Querub,  Adón  e  Imer,  y  no 

pudieron indicar sus casas paternas, ni su 

linaje, ni si eran de Israel o no:

62

 Los hijos de Delaía, los hijos de Tobías, 

los hijos de Necoda: seiscientos cuarenta 

y dos.

63

 Y  de  los  sacerdotes:  los  hijos  de  Ha-

baía,  los  hijos  de  Cos,  los  hijos  de  Bar-

zilay, el cual tomó mujer de las hijas de 

Barzilay galaadita, con cuyo nombre fue 

llamado.

64

 Éstos buscaron su registro genealógi-

co pero no fue hallado, por lo cual fueron 

excluidos del sacerdocio por impuros.

65

 Y  les  dijo  el  gobernador°  que  no  co-

mieran  de  las  cosas  santas  hasta  que  se 

levantara sacerdote con Urim y Tumim.°

66

 Reunida  toda  congregación,  era  de 

cuarenta y dos mil trescientos sesenta,

67

 aparte de sus siervos y sus criadas, que 

eran siete mil trescientos treinta y siete; 

y entre ellos había doscientos cuarenta y 

cinco cantores y cantoras.

68

 Sus  caballos  eran  setecientos  treinta 

y seis, y sus mulos doscientos cuarenta y 

cinco.

69

 Sus camellos eran cuatrocientos trein-

ta y cinco, y sus asnos seis mil setecientos 

veinte.°

70

 Y algunos cabezas de las casas paternas 

aportaron para la obra: El gobernador dio 

al tesoro mil dracmas de oro, cincuenta 

tazones  y  quinientas  treinta  túnicas  sa-

cerdotales.

71

 Y  algunos  cabezas  de  las  casas  pater-

nas ofrendaron para el tesoro de la obra 

veinte mil dracmas de oro y dos mil dos-

cientas libras de plata.

72

 Y lo que dio el resto del pueblo fue veinte 

mil dracmas de oro, dos mil libras de plata, 

y sesenta y siete túnicas sacerdotales.

73

Y los sacerdotes y levitas, y los porte-

ros y cantores, y algunos del pueblo, y los 

netineos, y todo Israel habitaron nueva-

mente en sus ciudades. Y cuando llegó el 

mes  séptimo,  los  hijos  de  Israel  estaban 

en sus ciudades.

Lectura de la Ley 

Solemnidad de los Tabernáculos

8

Y  todo  el  pueblo  se  reunió  como  un 

solo hombre en la plaza que está fren-

te a la puerta de las Aguas, y le pidieron a 

Esdras el escriba que llevara el Rollo de la 

Ley de Moisés, que YHVH había ordenado 

a Israel.

2

 Y  en  el  primer  día  del  mes  séptimo,  el 

sacerdote Esdras llevó la Ley ante la con-

gregación, que constaba de hombres y mu-

jeres° que podían entender lo que oían.

3

 Y delante de la plaza que está frente a 

la puerta de las Aguas, leyó en él desde el 

amanecer hasta el mediodía, en presencia 

de los hombres y de las mujeres que po-

dían entender, y los oídos de todo el pue-

blo estaban atentos al Rollo de la Ley.

4

 El escriba Esdras estaba sobre un estra-

do de madera, que habían hecho para el 

acontecimiento, y junto a él, a su diestra, 

estaban Matatías, Sema, Anías, Urías, Hil-

cías y Maasías; y a su izquierda, Pedaías, 

Misael, Malquías, Hasum, Hasbadana, Za-

carías, Mesulam.

5

 Y Esdras abrió el Rollo ante los ojos de 

todo el pueblo (porque estaba por encima 

de todo el pueblo), y cuando lo abrió, todo 

el pueblo se puso en pie.

6

 Y  Esdras  bendijo  a  YHVH,  Ha-’Elohim 

Ha-Gadol.° Y todo el pueblo, alzando sus 

7.52 

→Esd.2.50 nota.  7.65 Corresponde al cargo imperial de Tirsatha.  7.65 Instrumentos de consulta a Dios →Ex.28.30. 

7.68 Algunos mss. insertan aquí Esd.2. 66.  8.2 Lit. desde un hombre hasta una mujer.  8.6 Esto es, el Gran Dios


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Nehemías 8:7

504

manos, respondió: ¡Amén! ¡Amén! Y reve-

renciando, se postraron ante YHVH ros-

tro en tierra.

7

 Y  los  levitas  Jesuá,  Bani,  Serebías,  Ja-

mín,  Acub,  Sabetay,  Hodías,  Maasías, 

Kelita, Azarías, Jozabed, Hanán y Pelaía, 

hacían  entender  al  pueblo  la  Ley,°  y  el 

pueblo permanecía atento en su lugar.°

8

 Y leían en el Rollo de la Ley de Dios ex-

plicando y aclarando el sentido, de modo 

que entendieran la lectura.

9

 Y  mientras  escuchaba  las  palabras  de 

la  Ley,  todo  el  pueblo  lloraba;  entonces 

Nehemías, el gobernador, y Esdras, sacer-

dote y escriba, y los levitas que hacían en-

tender al pueblo, dijeron a todo el pueblo: 

Hoy es día santo para YHVH vuestro Dios; 

no os lamentéis ni lloréis.

10

 Luego les dijo: ¡Id, comed ricos man-

jares° y bebed, y enviad porciones al que 

nada tiene preparado, porque hoy es día 

santo para nuestro Señor! ¡No os entris-

tezcáis, porque el gozo de YHVH es vues-

tra fortaleza!

11

 Los  levitas  acallaron  pues  a  todo  el 

pueblo,  diciendo:  No  os  entristezcáis, 

porque  el  día  es  santo.  ¡Cesad  vuestros 

lamentos!

12

 Y todo el pueblo se alejó para comer y 

beber y enviar porciones, y celebrar con 

gran alegría, porque habían entendido las 

palabras que se les habían dicho.

13

 Al  día  siguiente  se  reunieron  los  ca-

bezas  de  las  casas  paternas  de  todo  el 

pueblo, los sacerdotes y los levitas, junto 

a Esdras el escriba, para profundizar las 

palabras de la Ley.

14

 Y  hallaron  escrito  en  la  Ley  cómo 

YHVH había ordenado, por medio de Moi-

sés, que los hijos de Israel moraran en ta-

bernáculos durante la festividad del mes 

séptimo,°

15

 y que proclamaran e hicieran pregonar 

por  todas  sus  ciudades  y  por  Jerusalem, 

diciendo: Salid al monte y traed ramas de 

olivo, y ramas de olivo silvestre, y ramas 

de arrayán, y ramas de palmeras y ramas 

de mirto, para hacer tabernáculos, como 

está escrito.

16

 Salió, pues, el pueblo, y trajeron, y se 

hicieron tabernáculos, cada uno sobre su 

propio terrado, y en sus patios, y en los 

atrios de la Casa de Dios, y en la plaza de 

la puerta de las Aguas y en la plaza de la 

puerta de Efraín.

17

 Y toda la congregación de los que ha-

bían  retornado  del  cautiverio  hicieron 

tabernáculos,  y  moraron  en  los  taber-

náculos,  cosa  que  los  hijos  de  Israel  no 

habían hecho desde los días de Josué ben 

Nun. Y hubo gran alegría.

18

 Y  diariamente  leía°  en  el  Rollo  de  la 

Ley de Dios, desde el primer día hasta el 

último. Y celebraron la festividad duran-

te  siete  días,  y  al  octavo  hubo  solemne 

asamblea, conforme a la ordenanza.

Contrición y confesión

9

El día veinticuatro del mismo mes, los 

hijos  de  Israel  se  reunieron  ayunos, 

con saco y ceniza sobre ellos.°

2

 Y los del linaje de Israel se separaron de 

todos  los  extranjeros°  y  confesaron  sus 

pecados y las iniquidades de sus padres.

3

 Y  puestos  de  pie  en  su  lugar,  leyeron 

en el Rollo de la Ley de YHVH su Dios la 

cuarta parte del día, y durante otra cuarta 

parte  hicieron  confesión  y  se  postraron 

ante YHVH su Dios.

4

 Luego subieron al estrado de los levitas, 

Jesuá, Bani, Cadmiel, Sebanías, Buni, Se-

rebías, Bani y Quenani, y clamaron a gran 

voz a YHVH su Dios.

5

 Y los levitas Jesuá, Cadmiel, Bani, Ha-

sabnías,  Serebías,  Hodías,  Sebanías  y 

Petaías  dijeron:  ¡Levantaos  y  bendecid 

a YHVH vuestro Dios desde la eternidad 

hasta la eternidad! ¡Bendigan tu Nombre 

glorioso, y sea exaltado más que toda ben-

dición y alabanza!

6

 ¡Tú solo eres YHVH! Tú hiciste los cielos, 

los cielos de los cielos y toda su hueste, la 

tierra  y  cuanto  hay  en  ella,  los  mares  y 

todo lo que contienen. Tú das vida a todo 

ello, y las huestes de los cielos se postran 

ante ti.

7

 Oh YHVH, Tú eres el Dios que escogis-

te a Abram, a quien sacaste de Ur de los 

8.7  Entiéndase  instrucción.  8.7  Nel  pueblo  estaba  atento  en  su  lugar.  Nel  pueblo  permanecía  de  pie  en  su  puesto

8.10 Cosas muy dulces

→Cnt.5.16.  8.14 La festividad de los Tabernáculos se celebraba durante siete días a partir del día 15 

del mes de Tishrei (Septiembre-Octubre) 

→Lv.23.33-43; Dt.16.13-15.  8.18 Prob. Esdras.  9.1 El TM define estos signos de 

arrepentimiento de manera escueta. 

9.2 Lit. hijos del extranjero.


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Nehemías 9:27

505

caldeos  y  le  pusiste  por  nombre  Abra-

ham,

8

 y hallaste que su corazón te era fiel, y 

concertaste un pacto con él para darle la 

tierra del cananeo, del heteo, del amorreo, 

y del ferezeo, y del jebuseo y del gergeseo, 

para  darla  a  su  simiente  cumpliendo  tu 

palabra, porque Tú eres justo.

9

 Luego viste la aflicción de nuestros pa-

dres  en  Egipto,  y  escuchaste  su  clamor 

junto al mar Rojo,°

10

 e  hiciste  señales  y  maravillas  delante 

de Faraón y de todos sus siervos y en todo 

el pueblo de su tierra,° porque sabías que 

habían obrado con soberbia contra ellos, 

y te hiciste renombre, como en este día.

11

 Y partiste el mar delante de ellos, y pa-

saron en seco por el medio del mar, mien-

tras que a sus perseguidores los lanzaste 

en las profundidades, como una piedra, a 

las aguas violentas.

12

 De  día  los  guiaste  con  columna  de 

nube, y de noche con columna de fuego, 

para alumbrarles el camino por donde ha-

bían de ir.

13

 Después  descendiste  sobre  el  monte 

Sinay y hablaste con ellos desde los cielos, 

y les diste preceptos justos y leyes verda-

deras, estatutos y mandamientos buenos.

14

 Y les diste a conocer tu santo shabbat, 

y les prescribiste mandamientos, estatu-

tos, y una Ley, por la mano de Moisés tu 

siervo.

15

 En su hambre° les diste pan del cielo, 

y en su sed les sacaste aguas de la peña, y 

les propusiste entrar a poseer la tierra por 

la cual alzaste tu mano para jurar° que se 

la darías.

16

 Pero  ellos  y  nuestros  padres  obraron 

con soberbia y endurecieron su cerviz, y 

no escucharon tus mandamientos.

17

 Rehusaron  escuchar,  y  no  tuvieron 

presente  las  maravillas  que  hacías  entre 

ellos, sino que endurecieron su cerviz, y 

en su rebelión° designaron a un caudillo 

que los volviera a su esclavitud. Pero Tú 

eres un Dios presto al perdón, clemente y 

compasivo, lento para la ira, y grande en 

misericordia, y no los abandonaste,

18

 ni aun cuando se hicieron un becerro 

fundido y dijeron: ¡Este es tu dios que te 

hizo subir de Egipto! cometiendo grandes 

abominaciones.

19

 Pero  Tú,  por  tus  muchas  misericor-

dias,  no  los  abandonaste  en  el  desierto: 

la columna de nube no se apartó de ellos 

para guiarlos por el camino de día, ni la 

columna de fuego para alumbrarles el ca-

mino por el cual debían andar durante la 

noche.

20

 Y diste tu buen Espíritu para instruir-

los, y no retuviste tu maná de su boca, y 

les diste agua para su sed.

21

 Sí, los sustentaste cuarenta años en el 

desierto: no tuvieron necesidad, sus ves-

tidos no se desgastaron ni se hincharon 

sus pies.

22

 Les diste reinos° y pueblos, y los dis-

tribuiste por regiones, y se adueñaron de 

la tierra de Sehón, es decir, la tierra del 

rey de Hesbón, y de la tierra de Og rey de 

Basán.

23

 Multiplicaste sus hijos como las estre-

llas del cielo, y los introdujiste en la tie-

rra que dijiste a sus padres que llegarían 

a poseer.

24

 Y  los  hijos  vinieron  y  poseyeron  la 

tierra,  y  ante  ellos  humillaste  a  los  mo-

radores de aquella tierra, los cananeos, a 

los cuales entregaste en su mano, con sus 

reyes y los pueblos de la tierra, para que 

hicieran con ellos como quisieran.

25

 Así capturaron ciudades fortificadas y 

una tierra fértil, y poseyeron casas llenas 

de  todo  bien,  cisternas  excavadas,  viñas 

y olivares, y frutales° en abundancia, de 

modo que comieron y se hartaron y en-

gordaron y se deleitaron en tu gran bon-

dad.

26

 Aun  así  desobedecieron°  y  se  rebela-

ron contra ti, y echaron tu Ley tras sus 

espaldas, y asesinaron a tus profetas que 

testificaban contra ellos para acercarlos a 

ti, e hicieron grandes abominaciones.

27

 Por eso Tú los entregaste en mano de 

sus enemigos, quienes los afligieron; pero 

en  el  tiempo  de  su  aflicción  clamaron  a 

ti, y Tú los escuchaste desde los cielos, y 

9.9 Lit. mar de los Juncos.  9.10 También país.  9.15 Alzar la mano indica juramento. 9.15 .para jurar.  9.17 Algunos mss. gr.: 

se obstinaron en volverse a su servidumbre en Egipto; se obstinaron en volver a Egipto y a su servidumbre

9.22 Lit. de los 

reinos

9.25 Lit. árbol de comer.  9.26 Nte provocaron a ira


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Nehemías 9:28

506

según tus muchas misericordias, les diste 

libertadores que los libraran de mano de 

sus enemigos.

28

 Pero  cuando  tenían  reposo,  volvían  a 

hacer lo malo delante de ti, y Tú los en-

tregabas  en  mano  de  sus  enemigos,  los 

cuales se enseñoreaban de ellos. Después 

se arrepentían y clamaban a ti, y Tú los 

escuchabas  desde  los  cielos,  y  así  los  li-

brabas  muchas  veces  según  tus  miseri-

cordias.

29

 Testificaste  contra  ellos  para  que  se 

volvieran a tu Ley, pero fueron arrogantes 

y no escucharon tus mandamientos, sino 

que pecaron contra tus preceptos, por los 

cuales vive el hombre que los cumple, y 

volvieron  obstinadamente  la  espalda,  y 

endurecieron  su  cerviz,°  y  no  quisieron 

escuchar.

30

 Pero Tú continuaste a favor de ellos° 

muchos  años,  y  testificaste  contra  ellos 

mediante  tu  Espíritu  por  mano  de  tus 

profetas, pero no dieron oído; por eso los 

entregaste en mano de los pueblos de la 

tierra.

31

 Pero  por  tus  muchas  misericordias 

no  los  exterminaste  ni  los  abandonaste, 

porque  eres  un  Dios  clemente  y  miseri-

cordioso.

32

 Ahora pues, ¡oh Dios nuestro! ¡Oh Ha-

Gadol!,° poderoso y terrible,° que guardas 

el pacto y la misericordia: No tengas en 

poco  toda  la  calamidad  que  nos  ha  so-

brevenido a nosotros, a nuestros reyes, a 

nuestros príncipes, a nuestros sacerdotes, 

a nuestros profetas, a nuestros padres y a 

nuestro pueblo entero, desde los días de 

los reyes de Asiria hasta este día.

33

 Tú has sido justo en todo lo que nos 

ha sobrevenido, porque has actuado fiel-

mente, pero nosotros hemos actuado per-

versamente.

34

 Porque  nuestros  reyes,  nuestros  go-

bernantes, nuestros sacerdotes y nuestros 

padres no ejecutaron tu Ley ni atendieron 

tus  mandamientos  ni  tus  testimonios, 

con los cuales testificaste contra ellos.

35

 Porque no te sirvieron en su reino, y 

en  tu  inmenso  bien  que  les  concediste 

en la tierra espaciosa y fértil que pusiste 

ante ellos, ni se arrepintieron de sus ma-

las obras.

36

 Por  eso,  ¡henos  aquí  esclavos  en  la 

misma tierra que diste a nuestros padres 

para comer su fruto y su bien! He aquí, 

esclavos somos en ella,

37

 pues a causa de nuestros pecados, su 

cosecha se multiplica para los reyes que 

impusiste sobre nosotros, quienes se en-

señorean sobre nuestros cuerpos y sobre 

nuestras bestias conforme a su voluntad, 

y estamos en gran aflicción.

38

 A  causa,  pues,  de  todo  esto,  nosotros 

hacemos  fiel  promesa,  y  la  escribimos, 

firmada por nuestros príncipes, por nues-

tros levitas y por nuestros sacerdotes.°

Renovación del pacto

10

Y  los  que  firmaron  fueron:  el  go-

bernador Nehemías ben Hacalías, y 

los sacerdotes Sedequías,

2

 Seraías, Azarías,° Jeremías,

3

 Pasur, Amarías, Malquías,

4

 Hatús, Sebanías, Maluc,

5

 Harim, Meremot, Obadías,

6

 Daniel, Ginetón, Baruc,

7

 Mesulam, Abías, Mijamín,

8

 Maazías, Bilgay y Semeías;

9

 y los levitas Jesuá ben Azanías, Binúi, de 

los hijos de Henadad, Cadmiel,

10

 y sus hermanos Sebanías, Hodías, Ke-

lita, Pelaías, Hanán;

11

 Micaía, Rehob, Hasabías,

12

 Zacur, Serebías, Sebanías,

13

 Hodías, Bani, Beninu;

14

 los  cabezas  del  pueblo:  Paros,  Pahat 

Moab, Elam, Zatu, Bani,

15

 Buni, Azgad, Bebay,

16

 Adonías, Bigvay, Adín,

17

 Ater, Ezequías, Azur,

18

 Hodías, Hasum, Bezay,

19

 Harif, Anatot, Nebay,

20

 Magpías, Mesulam, Hezir,

21

 Mesezabeel, Sadoc, Jadúa,

22

 Pelatías, Hanán, Anaías,

23

 Oseas, Hananías, Hasub,

24

 Halohes, Pilha, Sobec,

25

 Rehum, Hasabna, Maasías,

9.29 NSe volvieron testarudos e iban a la suya.  9.30 NTuviste paciencia con ellos durante muchos años; Nfuiste magnánimo 

con ellos muchos años

9.32 

→8.6 nota.  9.32 →1.5 nota.  9.38 = 10.1 en el TM.  10.2 Esto es, Esdras. (Prob. se trata de una 

pronunciación distinta del nombre).


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Nehemías 11:5

507

26

 Ahías, Hanán, Anán,

27

 Maluc, Harim y Baana.

28

 Y el resto del pueblo, y los sacerdotes y 

los levitas, los porteros y cantores, los ne-

tineos y todos los que se habían apartado 

de los pueblos de la tierra hacia la Ley de 

Dios,  sus  mujeres,  sus  hijos  y  sus  hijas, 

todo  el  que  tenía  comprensión  y  discer-

nimiento,

29

 se  unieron  a  sus  hermanos,  sus  no-

bles,°  y  acudieron  con  la  promesa  y  el 

juramento  de  andar  en  la  Ley  de  Dios, 

dada por Moisés, siervo de Dios, y obser-

var y cumplir todos los mandamientos de 

YHVH nuestro Señor, así como sus decre-

tos y estatutos;

30

 y que no daríamos nuestras hijas a los 

pueblos  de  la  tierra,  ni  tomaríamos  sus 

hijas para nuestros hijos;

31

 y que no les compraríamos en shabbat 

a los pueblos de la tierra que traían mer-

caderías y cereales de todo tipo para ven-

der en día de shabbat ni en día santo; y 

que dejaríamos descansar la tierra° en el 

año séptimo, y en él remitiríamos° toda 

deuda.

32

 Además, nos impusimos la obligación° 

de contribuir cada año con el tercio de un 

siclo para el servicio de la Casa de nuestro 

Dios:

33

 El pan de la proposición y la ofrenda 

continua,  el  holocausto  perpetuo  de  los 

días de reposo,° novilunios y tiempos se-

ñalados, las consagraciones y ofrendas por 

el pecado en expiación por Israel, y para 

toda obra en la Casa de nuestro Dios.

34

 E hicimos echar suerte entre los sacer-

dotes y levitas y el pueblo respecto a la leña 

para la ofrenda,° a fin de traerla a la Casa de 

nuestro Dios, según nuestras casas pater-

nas, en tiempos determinados, de año en 

año, para quemar sobre el altar de YHVH 

nuestro Dios, como está escrito en la Ley.

35

 Y para traer de año en año las primicias 

de nuestra tierra y las primicias de todo 

fruto de todo árbol a la Casa de YHVH;

36

 así  como  también  los  primogénitos 

de  nuestros  hijos  y  los  primerizos  de 

nuestras bestias, como está escrito en la 

Ley,  así  como  los  de  nuestras  vacadas  y 

rebaños  a  la  Casa  de  nuestro  Dios,  para 

los  sacerdotes  que  ministran  en  la  Casa 

de nuestro Dios.

37

 También acordamos llevar la primicia 

de nuestras masas, de nuestras ofrendas 

alzadas, del fruto de todo árbol, del vino 

nuevo  y  del  aceite  para  los  sacerdotes  a 

las  cámaras  de  la  Casa  de  nuestro  Dios, 

y el diezmo de nuestro terreno a los levi-

tas,  porque  ellos,  los  levitas,  reciben  los 

diezmos de nuestra labranza en todas las 

ciudades.

38

 Y  un  sacerdote  hijo  de  Aarón  estaría 

con los levitas, cuando los levitas tomen 

los diezmos, y los levitas traerían el diez-

mo de los diezmos a la Casa de nuestro 

Dios, a las cámaras, en la tesorería.

39

 Por cuanto los hijos de Israel y los hijos 

de Leví han de llevar la ofrenda del grano, 

del vino nuevo y del aceite a las cámaras 

donde están los utensilios del Santuario, 

los sacerdotes que ministran, los porteros 

y los cantores; y nos comprometimos a no 

abandonar la Casa de nuestro Dios.

Moradores de Jerusalem 

y de las ciudades de Judá

11

Habitaron los jefes del pueblo en Je-

rusalem, y el resto del pueblo echó 

suertes para que uno de cada diez habitara 

en Jerusalem, la ciudad santa, y los nueve 

restantes en las demás ciudades;

2

 y el pueblo bendijo a todas las personas 

que voluntariamente se ofrecieron a vivir 

en Jerusalem.

3

 En  las  distintas  ciudades  de  Judá  cada 

cual habitó en su propiedad, en sus ciuda-

des: de los israelitas, sacerdotes y levitas, 

netineos,  y  de  los  descendientes  de  los 

siervos de Salomón;

4

 y en Jerusalem habitaron algunos de los 

descendientes de Judá y de Benjamín. Y 

éstos son los jefes de la provincia que se 

instalaron en Jerusalem: De los hijos de 

Judá:  Ataías  ben  Uzías,  hijo  de  Zacarías, 

hijo de Amarías, hijo de Sefatías, hijo de 

Mahalaleel, de los hijos de Fares,

5

 y  Maasías  ben  Baruc,  hijo  de  Colhoze, 

hijo de Hazaías, hijo de Adaías, hijo de Jo-

yarib, hijo de Zacarías, hijo de Siloni.

10.29 LXX: los que los maldecían.  10.31 .descansar la tierra.  10.31 .remitiríamos.  10.32 Esto es, compromiso de carácter 

legal

10.33 Heb. shabbatot.  10.34 Esto es, para alimentar el fuego que continuamente debía arder en el altar.


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Nehemías 11:6

508

6

 Todos los hijos de Fares que habitaron 

en Jerusalem fueron cuatrocientos sesen-

ta y ocho hombres de valor.

7

 Y estos son los hijos de Benjamín: Salú 

ben  Mesulam,  hijo  de  Joed,  hijo  de  Pe-

daías,  hijo  de  Colaías,  hijo  de  Maasías, 

hijo de Itiel, hijo de Jesaías.

8

 Y después de él,° Gabay y Salay: nove-

cientos veintiocho.

9

 Y  Joel  ben  Zicri  era  inspector  sobre 

ellos, y Judá ben Senúa era el segundo en 

la ciudad.

10

 De los sacerdotes: Jedaías ben Joyarib, 

Jaquín,

11

 Seraías ben Hilcías, hijo de Mesulam, 

hijo  de  Sadoc,  hijo  de  Meraiot,  hijo  de 

Ahitob, director de la Casa de Dios;

12

 y  sus  hermanos,  que  hacían  la  obra 

de la Casa, eran ochocientos veintidós; y 

Adaías ben Jeroham, hijo de Pelalías, hijo 

de Amsi, hijo de Zacarías, hijo de Pasur, 

hijo de Malaquías,

13

 y  sus  hermanos,  cabezas  paternas, 

doscientos cuarenta y dos; y Amasay ben 

Azarael, hijo de Azay, hijo de Mesilemot, 

hijo de Imer,

14

 y  sus  hermanos,  hombres  de  valor, 

eran ciento veintiocho, el jefe de los cua-

les era Zabdiel ben Haguedolim.

15

 Y de los levitas: Semaías ben Hasub, hijo 

de Azricam, hijo de Hasabías, hijo de Buni;

16

 y Sabetay y Jozabad, de los jefes de los 

levitas, estaban sobre la obra externa de la 

Casa de Dios;

17

 y Matanías ben Micaía, hijo de Zabdi, 

hijo de Asaf, cantor principal que entona-

ba las acciones de gracias en° la oración, 

y Bacbuquías, segundo entre sus herma-

nos, y Abda ben Samúa, hijo de Galal, hijo 

de Jedutún.

18

 El total de los levitas en la ciudad santa 

era de doscientos ochenta y cuatro.

19

 Los porteros Acub, Talmón y sus her-

manos, guardianes de las puertas: ciento 

setenta y dos.

20

 Y el resto de Israel, de los sacerdotes 

y de los levitas, en todas las ciudades de 

Judá, cada uno en su heredad.

21

 A  su  vez,  los  netineos  habitaban  en 

Ófel,  y  Ziha  y  Gispa  estaban  a  cargo  de 

estos servidores.

22

 El  superintendente  de  los  levitas  en 

Jerusalem era Uzi ben Bani, hijo de Hasa-

bías, hijo de Matanías, hijo de Micaía, de 

los hijos de Asaf, cantores que estaban al 

frente del servicio de la Casa de Dios,

23

 por cuanto había un mandato del rey 

acerca de ellos, y un reglamento para los 

cantores, que determinaba las cosas para 

cada día.

24

 Y Petaías ben Mesezabeel, de los hijos 

de Zera ben Judá, representaba al rey para 

todos los asuntos del pueblo.

25

 En cuanto a las aldeas con sus campos, 

algunos de los hijos de Judá habitaron en 

Quiriat-arba y sus aldeas,° en Dibón y sus 

aldeas, en Jecabseel y sus aldeas;

26

 en Jesuá, en Molada, en Bet-pelet;

27

 en  Hazar-sual,  en  Beerseba  y  sus  al-

deas;

28

 en Siclag, en Mecona y sus aldeas;

29

 en En-rimón, en Zora, en Jarmut,

30

 Zanoa, Adulam y sus aldeas, Laquis y 

sus campos, Azeca y sus aldeas. Y acam-

paron  desde  Beerseba  hasta  el  valle  de 

Hinom.

31

 Y  los  hijos  de  Benjamín  estaban  en 

Geba, Micmas, Aía, y Bet-’El y sus aldeas;

32

 en Anatot, Nob, Ananías;

33

 Hazor, Ramá, Gitaim;

34

 Hadid, Seboim, Nebalat;

35

 Lod y Ono, el valle de los Artesanos.°

36

 Y de los levitas, había algunas clases en 

Judá y otras en Benjamín.°

Listas 

Dedicación del muro 

Reorganización del servicio

12

Estos  son  los  sacerdotes  y  los  le-

vitas  que  subieron  con  Zorobabel 

ben  Salatiel  y  con  Jesuá:  Seraías,  Jere-

mías, Esdras,

2

 Amarías, Maluc, Hartús,

3

 Secanías, Rehum, Meremot,

4

 Iddo, Gineto, Abías,

5

 Mijamín, Maadías, Bilga,

11.8 LXX: y sus hermanos.  11.17 Algunos mss. añaden al TM: al tiempo.  11.25 Poblaciones cercanas o dependientes de otra 

principal; literalmente y sus hijos

11.35 Algunas versiones mantienen el nombre propio.  11.36 El TM es poco claro aquí. Se 

interpreta que algunos levitas pasaban de un territorio a otro, o que los levitas se encontraban tanto en territorio de Judá como 

de Benjamín.


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Nehemías 12:37

509

6

 Semaías y Joyarib, Jedaías,

7

 Salú, Amoc, Hilcías y Jedaías. Esos fue-

ron los principales de los sacerdotes y de 

sus hermanos en días de Jesuá.

8

 Y los levitas eran Jesuá, Binúi, Cadmiel, 

Serebías, Judá y Matanías, quien, con sus 

hermanos, dirigía los cánticos de alaban-

za.°

9

 Y Bacbuquías y Uni, sus hermanos, esta-

ban frente a ellos en el servicio.

10

 Y Jesuá engendró a Joyaquim, y Joya-

quim engendró a Eliasib, y Eliasib engen-

dró a Joiada,

11

 y Joiada engendró a Jonatán, y Jonatán 

engendró a Jadúa.

12

 Y en días de Joyaquim, los sacerdotes 

cabezas  de  casas  paternas  eran:  de  Se-

raías, Meraías; de Jeremías, Hananías;

13

 de Esdras, Mesulam; de Amarías, Joha-

nán;

14

 de Melicú, Jonatán; de Sebanías, José;

15

 de Harim, Adna; de Meraiot, Helcay;

16

 de  Iddo,  Zacarías;  de  Ginetón,  Mesu-

lam;

17

 de  Abías,  Zicri;  de  Miniamín,  de 

Moadías, Piltay;

18

 de Bilga, Samúa; de Semaías, Jonatán;

19

 de Joyarib, Matenay; de Jedaías, Uzi;

20

 de Salay, Calay; de Amoc, Eber;

21

 de Hilcías, Hasabías; de Jedaías, Nata-

nael.

22

 En  días  de  Eliasib,  de  Joiada,  de  Jo-

hanán y Jadúa, los levitas fueron inscri-

tos por sus casas paternas, así como los 

sacerdotes,  hasta  el  reinado  de  Darío  el 

persa.°

23

 Los hijos de Leví, cabezas de las casas 

paternas,  fueron  inscritos  en  el  libro  de 

las  Crónicas  hasta  los  días  de  Johanán 

ben Eliasib.

24

 Y los cabezas de los levitas: Hasabías, 

Serebías  y  Jesuá  ben  Cadmiel,  con  sus 

hermanos al frente de ellos, fueron desig-

nados° por turnos alternos° para alabar y 

tributar acciones de gracias, conforme al 

mandato de David, varón de Dios.

25

 Matanías, Bacbuquías, Obadías, Mesu-

lam,  Talmón,  Acub,  porteros,  montaban 

guardia  en  los  almacenes  junto  a  las 

puertas.

26

 Estos estaban en los días de Joyaquim 

ben Jesuá, hijo de Josadac, y en los días 

del  gobernador  Nehemías,  y  de  Esdras, 

sacerdote y escriba.

27

 Y  para  la  dedicación  del  muro  de  Je-

rusalem  buscaron  a  los  levitas  de  todas 

partes, para traerlos a Jerusalem, a fin de 

celebrar la dedicación y la fiesta con cán-

ticos y acciones de gracias, con címbalos, 

salterios y arpas.

28

 Así  fueron  reunidos  los  hijos  de  los 

cantores,° tanto del valle que circunda a 

Jerusalem como de las aldeas de los ne-

tofatitas,

29

 y también de Bet-Gilgal y de los cam-

pos de Geba y Azmavet, porque los can-

tores se habían edificado aldeas alrededor 

de Jerusalem.

30

 Se purificaron, pues, los sacerdotes y 

los levitas, también purificaron al pueblo, 

y las puertas y el muro.

31

 Entonces  hice  subir  a  los  principales 

de  Judá  sobre  el  muro,  y  establecí  dos 

grandes  coros  que  elevaban  alabanzas  y 

acciones de gracias. El primero marchaba 

a la derecha del muro, hacia la puerta del 

Muladar,

32

 y tras ellos iba Osaías, la mitad de los 

principales de Judá,

33

 Azarías, Esdras, Mesulam,

34

 Judá, Benjamín, Semaías y Jeremías.

35

 Y algunos de los hijos de los sacerdotes 

marchaban  con  trompetas:  Zacarías  ben 

Jonatán,  hijo  de  Semaías,  hijo  de  Mata-

nías, hijo de Micaías, hijo de Zacur, hijo 

de Asaf;

36

 y sus hermanos Semaías, Azarael, Mi-

lalay,  Gilalay,  Maay,  Natanael,  Judá,  Ha-

nani, con los instrumentos musicales de 

David varón de Dios; y Esdras el escriba 

marchaba al frente de ellos.

37

 Y junto a la puerta de la Fuente subie-

ron las gradas de la ciudad de David, por 

la subida del muro, desde lo alto de la casa 

de David, hasta la puerta de las Aguas, en 

dirección al oriente.

12.8 Lit. Matanías, sobre los cantos de alabanza, él y sus hermanos.  12.22 No es claro si se refiere a: Darío I (521-486), Darío 

II, (424-404), o Darío III (336-331), quien fue destronado por Alejandro Magno. 

12.24 .fueron designados.  12.24 Lit. el que 

aguarda frente al que espera: Describe la disposición de los dos grupos de levitas en el acto de la alabanza, donde se alternaban 

en sus intervenciones. Nrespondiendo un grupo a otro; Nunos y otros alternaban el canto; Ndurante su turno de servicio

12.28 Esto es, los levitas cantores.


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Nehemías 12:38

510

38

 El segundo coro que elevaba alabanzas 

y acciones de gracias marchaba en senti-

do contrario, y yo con ellos, con la mitad 

del pueblo sobre el muro, desde la torre 

de los Hornos hasta el muro ancho,

39

 y pasaron por la puerta de Efraín y por 

la puerta Antigua, y por la puerta del Pes-

cado, y la torre de Hanan-’El, y la torre de 

Hamea, hasta la puerta de las Ovejas, y se 

detuvieron en la puerta de la Guardia.

40

 Entonces  los  dos  coros  que  elevaban 

alabanzas y acciones de gracias se detu-

vieron en la Casa de Dios, y yo y la mitad 

de los prefectos conmigo.

41

 Los sacerdotes Elyaqim, Maaseías, Mi-

niamín, Micaías, Elioe-nay, Zacarías y Ha-

nanías tenían las trompetas,

42

 y Maasías, Semaías, Eliazar, Uzi, Joha-

nán, Malquías, Elam Ezer y los cantores 

cantaban  a  viva  voz  dirigidos  por  Izra-

hías.

43

 Y aquel día inmolaron grandes sacrifi-

cios y se alegraron, porque Dios los había 

deleitado con gran regocijo, del que parti-

cipaban también las mujeres y los niños. 

Y la alegría de Jerusalem se oía desde le-

jos.

44

 En  aquel  día  fueron  designados  al-

gunos para estar a cargo de la tesorería, 

de las ofrendas, de las primicias y de los 

diezmos, para recoger en ellas según los 

productos  del  campo  y  las  porciones  le-

gales que correspondían a los sacerdotes 

y a los levitas, porque Judá se alegraba de 

contemplar a los sacerdotes y a los levitas 

en su servicio.

45

 Éstos guardaban el precepto de su Dios 

y observaban las purificaciones. También 

los cantores y porteros cumplían lo pre-

ceptuado para ellos conforme a los man-

datos de David y de Salomón su hijo,

46

 porque desde los días de David y Asaf, 

desde  antiguo,  había  directores  para  los 

cantores y los cánticos de alabanza y de 

acción de gracias a ’Elohim.

47

 Y  en  días  de  Zorobabel  y  en  los  días 

de Nehemías, todo Israel daba porciones 

a los cantores y a los porteros, como era 

requerido día a día, quedando consagrado 

lo prescrito para los levitas, así como para 

los hijos de Aarón.

Exclusión de extranjeros 

Segundo viaje de Nehemías

13

Aquel  día  se  leyó  en  el  Rollo  de 

Moisés  a  oídos  del  pueblo,  y  se 

encontró  escrito  en  él  que  los  amonitas 

y moabitas no debían entrar jamás en la 

congregación de Dios,

2

 porque no habían salido a recibir a los 

hijos de Israel con pan y agua, sino que 

alquilaron a Balaam contra ellos para que 

los maldijera, pero nuestro Dios convirtió 

la maldición en bendición.°

3

 Por lo que, al escuchar la Ley, excluye-

ron de Israel a todo extranjero.

4

 Pero antes de esto, el sacerdote Eliasib, 

encargado de la cámara de la Casa de nues-

tro Dios, había emparentado con Tobías,

5

 y le había preparado un gran aposento 

donde  antes  se  depositaban  las  ofrendas 

vegetales,  el  incienso,  los  vasos,  y  los 

diezmos del grano, del vino nuevo y del 

aceite, prescrito para los levitas, cantores 

y  porteros,  así  como  la  ofrenda  para  los 

sacerdotes.

6

 Durante todo esto, yo no estaba en Je-

rusalem, porque en el trigésimo segundo 

año de Artajerjes rey de Babilonia había 

ido ante el rey. Al cabo de algún tiempo 

pedí permiso al rey,

7

 y regresé a Jerusalem, donde me perca-

té del mal que había hecho Eliasib a favor 

de Tobías al prepararle un aposento en los 

atrios de la Casa de Dios.

8

 Y eso me indignó sobremanera, por lo 

que hice sacar todas las pertenencias de 

Tobías fuera de la cámara.

9

 Y ordené que limpiaran las cámaras, y 

dispuse  que  restituyeran  allí  los  utensi-

lios sagrados de la Casa de Dios, con las 

ofrendas vegetales y el incienso.

10

 Advertí también que a los levitas no les 

habían sido dadas sus porciones, de ma-

nera que los levitas y los cantores, en vez 

de cumplir sus tareas, habían huido cada 

uno a su campo.

11

 Entonces recriminé a los prefectos, y 

dije:  ¿Por  qué  está  abandonada  la  Casa 

de Dios? Y los reuní y los coloqué en su 

puesto.

12

 Y todo Judá trajo el diezmo del grano, 

del vino nuevo y del aceite, a la tesorería.

13.2 

→Dt.23. 3-5.


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Nehemías 13:31

511

13

 Y puse por tesoreros a cargo de los de-

pósitos al sacerdote Selemías y al escriba 

Sadoc,  y  de  los  levitas  a  Pedaías.  Junto 

a  ellos  estaba  Hanán  ben  Zacur,  hijo  de 

Matanías,  porque  eran  considerados  fie-

les, y les correspondió repartir entre sus 

hermanos.

14

 ¡Acuérdate  de  mí  por  esto,  oh  Dios 

mío, y no borres mis buenas obras que he 

hecho  para  la  Casa  de  mi  Dios  y  por  su 

cuidado!

15

 En esos días vi en Judá a unos que pi-

saban lagares en shabbat y traían gavillas 

cargadas sobre asnos, y que traían a Jeru-

salem también vino y uvas e higos, y toda 

clase de carga en día shabbat. Y protesté 

a causa del día en que vendían las provi-

siones.

16

 Vivían  allí  también  hombres  de  Tiro, 

los cuales traían pescado y otras mercan-

cías que vendían en shabbat a los natura-

les de Judá en Jerusalem.

17

 Entonces  reprendí  a  los  nobles  de 

Judá y les dije: ¿Qué significa esta mala 

acción que hacéis, profanando así el día 

del shabbat?

18

 ¿No  hicieron  así  vuestros  padres,  y 

nuestro Dios trajo toda esta desgracia so-

bre nosotros y sobre esta ciudad? ¡Y voso-

tros aumentáis la ira divina contra Israel 

al profanar el shabbat!

19

 Y aconteció que en la víspera del sha-

bbat, cuando iba anocheciendo a las puer-

tas de Jerusalem, ordené que las puertas 

fueran cerradas hasta pasar el shabbat, y 

emplacé  a  algunos  de  mis  criados  sobre 

las puertas para que no entrara carga al-

guna en día shabbat.

20

 Pero los mercaderes y vendedores de 

toda  esa  suerte  de  mercancías  pasaron 

la  noche  fuera  de  Jerusalem  una  y  dos 

veces.

21

 Entonces  yo  les  advertí  y  les  dije: 

¿Por qué pernoctáis frente al muro? Si lo 

hacéis  otra  vez,  os  echaré  mano.  Desde 

ese tiempo no vinieron más en shabbat.

22

 Por otra parte, ordené a los levitas que 

se  purificaran  y  acudieran  a  guardar  las 

puertas para santificar el día del shabbat. 

¡Acuérdate  de  mí  también  por  esto,  oh 

Dios  mío,  y  considérame  conforme  a  la 

inmensidad de tu misericordia!

23

 En aquellos días pude ver también que 

algunos judíos cohabitaban con mujeres 

asdoditas, amonitas y moabitas,

24

 y sus hijos hablaban a medias el len-

guaje asdodita y no podían hablar bien el 

idioma de los judíos, sino conforme a la 

lengua de aquellos pueblos.

25

 Y  contendí  con  ellos  y  los  maldije,  y 

castigué a algunos de ellos, y les arranqué 

los cabellos,° y les hice jurar por ’Elohim, 

diciendo:° No daréis vuestras hijas a sus 

hijos, ni tomaréis de sus hijas para vues-

tros hijos ni para vosotros.

26

 ¿No fue acaso por eso mismo que pecó 

Salomón  rey  de  Israel?  Y  aunque  entre 

muchas naciones no hubo rey como él, y 

fue amado por su Dios, y ’Elohim lo hizo 

rey sobre todo Israel, sin embargo, aun a 

él, lo hicieron pecar mujeres extranjeras.

27

 ¿Haremos entonces como vosotros este 

gran mal prevaricando contra nuestro Dios, 

al cohabitar con mujeres extranjeras?

28

 Y  ahuyenté  de  mi  lado  a  uno  de  los 

hijos de Joiada, hijo del sumo sacerdote 

Eliasib, porque era yerno de Sanbalat ho-

ronita.

29

 ¡Acuérdate de ellos, oh Dios mío, por-

que profanaron la investidura sacerdotal 

y el pacto del sacerdocio y de los levitas!

30

 Así los purifiqué de todo lo extranjero, 

y establecí las funciones para los sacerdo-

tes y los levitas, cada uno en su obra,

31

 así como para la ofrenda de la leña en 

los  tiempos  señalados,  y  para  las  primi-

cias. ¡Acuérdate de mí, oh Dios mío, para 

bien!

13.25 Lit. arrancar, pelar, rapar.  13.25 Algunas traducciones omiten por Dios (’Elohim). 


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1

Aconteció en los días de Asuero° (el° 

mismo Asuero que reinó desde la In-

dia hasta Etiopía sobre ciento veintisiete 

provincias),

2

 cuando el rey Asuero ya se había senta-

do en el trono de su reino, que estaba en 

Susa, en la ciudadela,°

3

 en el tercer año de su reinado, hizo un 

banquete para todos sus príncipes y sier-

vos, teniendo en su presencia al ejército° 

de Persia y de Media, a los nobles, y a las 

autoridades de las provincias.

4

 Y por muchos días,° ciento ochenta días, 

exhibió las riquezas de la gloria de su rei-

no y la magnificencia de su poderío.

5

 Y  cuando  se  cumplieron  esos  días,°  el 

rey brindó un banquete a todo el pueblo 

que había en Susa, la ciudadela, tanto a 

los  encumbrados  como  a  los  humildes, 

durante siete días, en el patio del jardín 

del palacio real.

6

 Había allí toldos de fino algodón° blan-

co  y  azul,  colgados  entre  columnas  de 

alabastro por aros de plata, y sujetos con 

cordones  de  lino  color  púrpura.°  Los 

reclinatorios° eran de oro y plata, y es-

taban sobre un enlosado de pórfido y de 

mármol,  con  incrustaciones  de  nácar  y 

de ónice.°

7

 Y conforme a la generosidad del rey, da-

ban a beber vino real en abundancia, en 

copas de oro de distintas clases.

8

 Y  la  bebida  era  brindada,  según  lo  es-

tablecido, sin compulsión para nadie, por 

cuanto el rey había dispuesto que los fun-

cionarios  de  su  palacio  vieran  que  cada 

cual hiciera según su propio gusto.

9

 También Vasti, la reina, ofreció un ban-

quete para las mujeres de la casa real que 

pertenecían al rey Asuero.

10

 Al  séptimo  día,  cuando  el  rey  estaba 

alegre a causa del vino, ordenó a Mehu-

mán, Bizta, Harbona, Bigta, Abagta, Zetar 

y Carcas, los siete eunucos que servían al 

rey Asuero,

11

 que condujeran a la reina Vasti ante el 

rey, ornada con la corona real, para mos-

trar su belleza a la gente y a los príncipes, 

porque era muy hermosa.

12

 Pero la reina Vasti se negó a cumplir 

la orden que el rey envió a través de° los 

eunucos, por lo que el rey se indignó en 

gran manera y se llenó de ira.

13

 Entonces el rey, como era la costum-

bre del rey con los que conocían la ley° y 

el derecho

14

 (de  quienes  los  más  cercanos  eran 

Carsena,  Setar,  Admata,  Tarsis,  Meres, 

Marsena  y  Memucán,  los  siete  príncipes 

de Persia y Media, quienes veían el rostro 

El banquete de Asuero 

La reina Vasti

1.1 Esto es, Jerjes (nombre gr. del mismo monarca persa).  1.1 Sir. añade él era hijo de.  1.2 Esta palabra designa la fortaleza 

interior de la ciudad, y prob. define la capital

1.3 Seguramente se refiere a los altos oficiales del ejército.  1.4 LXX omite por 

muchos días

1.5 LXX: cuando se cumplieron los días de la fiesta nupcial.  1.6 Palabra de origen sánscrito cuyo significado 

exacto se desconoce. En el TM sólo aparece aquí. Puede referirse tanto a un tejido de lino fino como a uno de algodón. 

1.6 azul 

púrpura. Traducciones convencionales de dos palabras heb. que pueden referirse a una gama de colores que van desde el rojo 

brillante hasta el violeta intenso. 

1.6 reclinatorio, tipo de asiento alargado y mullido utilizado en los banquetes en los cuales los 

comensales se reclinaban (no se sentaban) a la mesa. 

→Cnt.1.12.  1.6 Designa un tipo de piedra usada junto con el mármol para 

enlosar. Esta palabra, cuyo significado exacto se desconoce, solo aparece una vez en la Biblia. Su raíz en idioma asirio significa 

piedra preciosa. 

1.12 Lit. por mano de

→1.15.  1.13 Heb. dat. No debe confundirse con la que se usa para referirse a la Ley de 

Dios (toráh). El término dat, propio del periodo persa, alude a un decreto o ley permanente de origen humano. 


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Ester 2:11

513

del rey° y se sentaban los primeros en el 

reino) consultó a los sabios que conocían 

los tiempos,° diciendo:

15

 Según la ley,° ¿qué ha de hacerse con 

la  reina  Vasti  por  no  haber  cumplido  la 

orden  del  rey  Asuero  enviada  mediante 

los eunucos?

16

 Entonces  respondió  Memucán  ante  el 

rey  y  los  príncipes:  La  reina  Vasti  no  ha 

faltado  el  respeto  solamente  el  rey,  sino 

también a todos los príncipes y a todos los 

pueblos que están en todas las provincias 

del rey Asuero.

17

 Porque esta acción de la reina llegará a oí-

dos de todas las mujeres,° las cuales podrían 

menospreciar a sus maridos cuando se diga 

que el rey Asuero ordenó a la reina Vasti que 

se presentara ante él, y ella no quiso.

18

 Y en este mismo día las princesas de 

Persia  y  de  Media,  enteradas  del  proce-

der de la reina, podrán decir lo mismo a 

todos los príncipes del rey, de modo que 

se levantará una gran indignación y des-

precio.

19

 Si parece bien al rey,° expídase un edicto 

real de su parte, que sea escrito entre las 

leyes  de  Persia  y  de  Media,  con  carácter 

irrevocable, que Vasti no comparezca más 

ante la presencia del rey Asuero, y otorgue 

el rey su título de reina a otra más digna 

que ella.

20

 Y así, cuando el edicto del rey, el que 

va a hacer, sea oído en todo su reino ¡que 

siempre  sea  grande!°  todas  las  mujeres 

darán honra a sus maridos, desde el más 

importante hasta el más humilde.°

21

 Y el consejo agradó al rey y a los prín-

cipes, y el rey hizo conforme a la palabra 

de Memucán,

22

 y envió cartas a todas las provincias del 

rey, a cada provincia según su escritura, y a 

cada pueblo según su lengua, para que cada 

varón fuera cabeza en su casa y lo difundie-

ra conforme a la lengua de su pueblo.

Ester, elegida reina

2

Después de estas cosas, cuando la ira del 

rey Asuero se hubo aplacado, se acordó 

de Vasti, y de lo que había hecho y de lo que 

había sido decretado contra ella.

2

 Entonces los asistentes personales que 

servían al rey dijeron: Búsquense para el 

rey jóvenes vírgenes y de hermoso pare-

cer,

3

 y designe el rey funcionarios en todas las 

provincias de su reino para que reúnan a 

todas las jóvenes vírgenes y de hermosa 

apariencia en Susa, la ciudadela, en el ha-

rén, bajo la custodia de Hegai, eunuco del 

rey, guardián de las mujeres, y que se les 

den sus atavíos,°

4

 y  la  joven  que  sea  agradable  ante  los 

ojos del rey, que reine en lugar de Vasti. Y 

el consejo agradó al rey, y lo hizo así.

5

 Había un varón judío en Susa, la ciuda-

dela, llamado Mardoqueo ben Jair, hijo de 

Simei, hijo de Cis, benjamita,

6

 el cual había sido deportado de Jerusa-

lem  con  los  cautivos  que  fueron  depor-

tados con Jeconías, rey de Judá, a quien 

Nabucodonosor  rey  de  Babilonia  había 

llevado cautivo.

7

 Éste había criado a Hadasa (que es Es-

ter), hija de un tío suyo,° porque ella no 

tenía padre ni madre, y la muchacha era 

de  bella  figura  y  hermosa  apariencia. 

Cuando  murieron  su  padre  y  su  madre, 

Mardoqueo la tomó como hija suya.

8

 Y cuando se divulgó la orden del rey y su 

edicto,  aconteció  que  muchas  doncellas 

fueron reunidas en la ciudadela de Susa 

bajo la custodia de Hegai, y Ester también 

fue llevada al palacio real, al cuidado de 

Hegai, guardián de las mujeres.

9

 Y la joven halló gracia ante sus ojos° y 

él fue bondadoso con ella, por lo que se 

apresuró a darle sus atavíos y ungüentos, 

y le asignó siete doncellas del palacio real 

para  que  la  sirvieran,  y  la  puso  con  sus 

doncellas en el mejor lugar del harén.

10

 Ester no declaró cuál era su pueblo ni 

su linaje, porque Mardoqueo le había or-

denado que no lo declarara.

11

 Y  cada  día  Mardoqueo  se  paseaba  de-

lante del patio del harén para saber cómo 

estaba Ester y cómo la trataban.°

1.14 Lit. que veían el rostro del rey.  1.14 Es decir, qué convenía hacer en cada ocasión, presente o futura.  1.15 

→1.13 nota. 

1.17  Lit.  el  hecho  de  la  reina  saldrá  a  todas  las  mujeres.  1.19  Lit.  si  es  bueno  para  el  rey.  1.20  LXX  omite  grande

1.20 

→§158.  2.3 Es decir, todo lo que necesitaban para presentarse hermosas ante el rey.  2.7 La LXX añade Aminadab

2.9 Lit. fue buena a sus ojos.  2.11 Lit. para conocer la paz de Ester y lo que era hecho con ella


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Ester 2:12

514

12

 Y al llegar el turno de cada doncella para 

acudir al rey Asuero, al cabo de haber es-

tado doce meses sometidas al reglamento 

vigente para las mujeres (porque el tiempo 

de su embellecimiento era este:° seis me-

ses  con  óleo  de  mirra  y  otros  seis  meses 

con perfumes y atavíos femeninos),

13

 entonces  la  doncella  acudía  al  rey;  y 

todo  lo  que  ella  pedía  le  era  dado,  para 

llevar consigo del harén al palacio real.

14

 Entraba por la tarde, y por la mañana 

regresaba a un segundo harén, al cuidado 

de Saasgaz, eunuco del rey y guardián de 

las concubinas. Y no acudía más al rey, a 

menos que el rey la deseara, y la mandara 

a llamar por su nombre.

15

 Y cuando le tocó el turno de ir al rey a 

Ester, hija de Abihail, tío de Mardoqueo, 

quien la había tomado por hija suya, ella 

no solicitó cosa alguna, sino lo que había 

indicado Hegai, eunuco del rey y guardián 

de las mujeres, pues Ester hallaba gracia 

a los ojos de todos cuantos la veían.

16

 Así pues, Ester fue llevada al rey Asue-

ro,  a  su  palacio  real,  en  el  mes  décimo, 

que es el mes de Tebet, en el año séptimo 

de su reinado.

17

 Y amó el rey a Ester más que a todas 

las mujeres, y logró ante él más gracia y 

favor que todas las doncellas,° tanto que 

él le puso la corona real sobre la cabeza, y 

la proclamó reina en lugar de Vasti.

18

 Y el rey celebró un gran banquete para 

todos sus príncipes y servidores: el ban-

quete de Ester; y condonó tributos° a las 

provincias, y dio presentes conforme a la 

generosidad del rey.

19

 Y  cuando  las  doncellas  fueron  reuni-

das por segunda vez,° Mardoqueo estaba 

junto a la puerta real.

20

 Ester no había revelado aún su estir-

pe ni su pueblo, como le había encargado 

Mardoqueo;° pues Ester hacía todo lo que 

le  ordenaba  Mardoqueo,  como  cuando 

ella era criada por él.

21

 En aquellos días, mientras Mardoqueo 

estaba  junto  a  la  puerta  real,  dos  de  los 

eunucos del rey, Bigtán y Teres, que guar-

daban la puerta,° en un arranque de ira 

proyectaron poner mano en el rey Asue-

ro.

22

 Pero el asunto fue conocido por Mar-

doqueo, quien lo declaró a la reina Ester, 

y Ester lo dijo al rey en nombre de Mar-

doqueo.

23

 Investigado  y  comprobado  el  asunto, 

aquellos dos fueron colgados en un ma-

dero.° Y esto fue escrito en el rollo de las 

crónicas, en presencia del rey.

El adversario de los judíos

3

Después de estas cosas, el rey Asuero 

engrandeció a Amán, hijo de Hameda-

ta, el agagueo, y lo ensalzó y estableció su 

autoridad por encima de todos los prínci-

pes° que estaban con él.

2

 Y todos los súbditos del rey que estaban 

en la puerta real se inclinaban y se postra-

ban ante Amán, porque el rey así lo había 

dispuesto. Pero Mardoqueo no se inclina-

ba ni se postraba ante él.

3

 Y los súbditos del rey que estaban en la 

puerta  real  preguntaban  a  Mardoqueo: 

¿Por qué desafías el mandato del rey?

4

 Y  preguntándole  ellos  cada  día  sin  que 

él les prestara atención, ocurrió que lo de-

nunciaron a Amán, para ver si Mardoqueo 

se mantendría firme a su dicho, por cuan-

to él les había declarado que era judío.

5

 Y cuando Amán observó que Mardoqueo 

no se inclinaba ni se postraba ante él, se 

llenó de furor.

6

 Pero tuvo en poco poner mano en Mar-

doqueo solamente, pues como le habían 

declarado  cuál  era  el  pueblo  de  Mardo-

queo, Amán procuró exterminar a todos 

los judíos que había en todo el reino de 

Asuero, por ser° el pueblo de Mardoqueo.

7

 En el mes primero, que es el mes de Ni-

sán,° en el año duodécimo del rey Asuero, 

uno hizo caer Pur,° es decir, la suerte, de-

lante de Amán, día por día y mes por mes, 

y la suerte salió para el mes duodécimo, 

que es el mes de Adar.

2.12 

→2.3 nota.  2.17 Heb. btulah. Aquí designa a una joven en edad de casarse.  2.18 Puede referirse a impuestos o indul-

tos. 

2.19 Se reunieron en el segundo harén después de haber estado con el rey.  2.20 LXX añade que temiera a Dios.  2.21 

Es decir, la entrada del palacio

2.23 Lit. árbol, pero llegó a significar también madero o poste.  3.1 Lit. y puso su silla sobre 

todos los príncipes

3.6 .por ser.  3.7 La LXX omite en el mes primero, que es el mes de Nisán.  3.7 Método para echar suerte 

mediante piedrecillas. La palabra pur es de origen asirio y prob. significa piedra pequeña. De esta palabra procede el nombre de 

la alegre festividad del Purim, en la que se celebra la salvación del exterminio del pueblo judío.


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Ester 4:11

515

8

 Entonces dijo Amán al rey Asuero: Exis-

te un pueblo esparcido y disperso entre 

los pueblos de todas las provincias de tu 

reino, cuyas leyes son distintas de las de 

cualquier otro pueblo, y no cumplen las 

leyes del rey, por lo que no conviene que 

el rey los tolere,

9

 Si parece bien al rey, decrétese su des-

trucción, y yo pesaré diez mil talentos de 

plata  en  manos  de  quienes  manejan  la 

hacienda°  para  que  los  ingresen  en  los 

tesoros del rey.

10

 Entonces  el  rey  se  quitó  el  sello  de 

su mano y se lo dio a Amán hijo de Ha-

medata,  el  agagueo,  adversario  de  los 

judíos.

11

 Y  el  rey  dijo  a  Amán:  La  plata  sea 

para  ti,  y  también  el  pueblo,  para  que 

hagas  con  él  lo  que  parezca  bien  ante 

tus ojos.

12

 Y  en  el  día  trece  del  mes  primero° 

fueron llamados los escribas del rey y fue 

escrito  conforme  a  todo  lo  que  ordenó 

Amán,  a  los  sátrapas°  del  rey,  a  los  go-

bernadores que estaban sobre cada pro-

vincia, y a los príncipes de cada pueblo, a 

cada provincia conforme a su escritura, 

y a cada pueblo según su lengua. Fue es-

crito en nombre del rey Asuero, y sellado 

con el sello real.

13

 Y  los  decretos  fueron  enviados  por 

correos a todas las provincias del rey, or-

denando destruir, matar y exterminar a 

todos los judíos, desde el joven hasta el 

viejo, niños y mujeres, en un mismo día, 

el trece del mes duodécimo, o sea el de 

Adar, y saquear sus bienes.

14

 Una copia del documento que había de 

darse  como  ley  en  cada  provincia,  sería 

publicada para cada pueblo, para que es-

tuvieran preparados para aquel día.

15

 Así pues, los correos salieron apresu-

radamente  por  mandato  del  rey,  pues  el 

edicto  había  sido  promulgado  en  Susa, 

la capital. Y el rey y Amán se sentaron a 

beber, mientras la ciudad de Susa estaba 

perpleja.

Duelo de los judíos – Decisión de Ester

4

Mardoqueo supo todo lo que se había 

hecho. Entonces Mardoqueo rasgó sus 

vestidos y se vistió de saco° y de ceniza, y 

entró al medio de la ciudad,° y allí clamó 

amargamente.

2

 Luego llegó hasta delante de la puerta 

real, pues no era permitido entrar en la 

puerta real cubierto de saco.

3

 Y en cada una de las provincias, donde-

quiera llegaba la orden del rey y su edicto, 

hubo gran duelo entre los judíos: ayuno y 

llanto y lamentaciones, y el saco y la ceni-

za llegaron a ser cama para muchos.

4

 Cuando  las  doncellas  de  Ester  y  sus 

eunucos  le  informaron,  la  reina  se  es-

tremeció° en gran manera. Luego envió 

vestiduras  para  que  se  las  vistiera  Mar-

doqueo, y se quitara de encima su saco,° 

pero él no lo aceptó.

5

 Entonces  Ester  llamó  a  Hatac,  uno  de 

los  eunucos  que  el  rey  había  puesto  al 

servicio  de  ella,  y  lo  envió  a  Mardoqueo 

para  averiguar  qué  era  aquel  asunto  y  a 

qué se debía.

6

 Salió pues Hatac hacia Mardoqueo, a la 

plaza de la ciudad, que estaba delante de 

la puerta real.

7

 Y Mardoqueo le refirió todo lo que le ha-

bía sucedido, y el monto exacto de plata 

que Amán había prometido pesar para los 

tesoros del rey° por el exterminio de los 

judíos.

8

 Le dio además una copia del edicto que 

había sido promulgado en Susa para que 

fueran destruidos, para que la mostrara a 

Ester y le contara todo, encargándole que 

acudiera al rey e intercediera ante él por 

su pueblo.

9

 Y regresó Hatac y declaró a Ester las pa-

labras de Mardoqueo.

10

 Entonces  Ester  habló  con  Hatac  y  lo 

envió a Mardoqueo, diciendo:°

11

 Todos  los  siervos  del  rey,  y  la  gen-

te  de  las  provincias  del  rey,  saben  bien 

que para cualquier hombre o mujer que 

acuda al rey en el patio interior, sin ser 

3.9 Lit. en manos de los que hacen la obra.  3.12 Lit. en el mes primero, en el día trece en él. Simbología: El decreto fue sellado 

el día trece del mes trece del año trece de Asuero. 

3.12 sátrapas. Gobernadores de las distintas satrapías (provincias o regio-

nes) en que estaba dividido el imperio medo-persa. 

4.1 saco y ceniza. Costumbre oriental que refleja un profundo dolor. 

→4.3; 

2 S.3.31; 2 R.6.30. 

4.1 Lit. salió en medio de la ciudad.  4.4 Lit. se retorció. Denota sentimiento de gran dolor o ansiedad.  4.4 

Lit. y para quitar su saco de sobre él

4.7 Esto es, de los bienes de los judíos una vez exterminados.  4.10 .diciendo


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Ester 4:12

516

llamado, hay una sola ley: Ha de morir, 

salvo aquél a quien el rey extienda el ce-

tro de oro para que viva; y yo no he sido 

llamada para acudir al rey en estos trein-

ta días.

12

 Refirieron  entonces  a  Mardoqueo  las 

palabras de Ester,

13

 y Mardoqueo mandó que respondieran 

a Ester: No creas dentro de tu alma que 

has de escapar en la casa del rey más que 

cualquier otro judío.

14

 Por cuanto si en este momento callas, 

socorro  y  liberación  vendrá  de  alguna 

otra  parte  para  los  judíos,  pero  tú  y  la 

casa de tu padre perecerán, y ¿quién sabe 

si para un tiempo como éste has llegado 

al reino?

15

 Y Ester dijo que respondieran a Mar-

doqueo:

16

 Ve  y  reúne  a  todos  los  judíos  que 

están  en  Susa,  y  ayunad  por  mí,  y  no 

comáis  ni  bebáis  durante  tres  días,  ni 

de noche ni de día. Yo también ayunaré 

igualmente con mis doncellas, y enton-

ces  acudiré  al  rey  aunque  no  sea  con-

forme a la ley,° ¡y si he de perecer, que 

perezca!°

17

 Entonces  Mardoqueo  se  fue  e  hizo 

conforme a todo lo que Ester le había en-

comendado.

Ester ante Asuero (primer banquete)

5

Al tercer día sucedió que Ester vistió 

sus atavíos reales, y se presentó en el 

patio interior de la casa del rey, frente a 

la cámara real, y el rey estaba sentado en 

su trono real, dentro de la cámara real, 

frente a la entrada del palacio.°

2

 Y sucedió que cuando el rey vio a la rei-

na Ester, que estaba en pie en el patio, ella 

halló gracia ante sus ojos, y el rey exten-

dió a Ester el cetro de oro que tenía en su 

mano. Entonces Ester se acercó y tocó la 

punta del cetro.

3

 Y el rey le dijo: ¿Qué deseas, reina Es-

ter? Cualquier cosa que me pidas, hasta la 

mitad del reino, te será concedida.

4

 Y Ester dijo: Si place al rey, venga hoy 

el rey con Amán al banquete que le tengo 

preparado.°

5

 Y ordenó el rey: llámese presto a Amán, 

para que se haga como Ester ha dicho.° 

Así el rey fue con Amán al banquete que 

había preparado Ester.

6

 Y al brindar en el banquete,° el rey dijo 

a  Ester:  ¿Cuál  es  tu  petición?  Pues  te 

será concedida; ¿y cuál es tu demanda? 

¡Hasta la mitad del reino te será conce-

dida!°

7

 Y Ester respondió y dijo: Mi petición y 

mi demanda es:

8

 Si  he  hallado  gracia  ante  los  ojos  del 

rey, y si place al rey conceder mi petición 

y cumplir mi demanda, que el rey venga 

con Amán al banquete que les prepararé, 

y mañana haré conforme a la palabra del 

rey.°

9

 Salió pues Amán aquel día radiante de 

alegría  y  corazón  gozoso,  pero  cuando 

Amán vio a Mardoqueo en la puerta real, 

que  permanecía  allí  sin  siquiera  mover-

se a su paso, Amán se llenó de ira contra 

Mardoqueo;

10

 pero  se  refrenó,  y  se  fue  a  su  casa,  e 

hizo venir° a sus amigos y a Zeres su mu-

jer.

11

 Y  Amán  les  contó  la  gloria  de  su  ri-

queza, y la multitud de sus hijos, y como 

el rey lo había engrandecido y exaltado° 

sobre los príncipes y sobre los servidores 

del rey.

12

 Y Amán agregó: Además de esto, la rei-

na Ester a ninguno ha permitido entrar 

con el rey al banquete que le hizo, sino 

a mí; y mañana también he sido invitado 

por ella, con el rey.

13

 Pero,  ¡nada  me  aprovecha°  mientras 

vea  al  judío  Mardoqueo  sentado  en  la 

puerta real!

14

 Entonces su mujer Zeres y todos sus 

amigos  le  dijeron:  Manda  a  preparar  un 

madero alto, de cincuenta codos, y por la 

mañana  di  al  rey  que  cuelgue  a  Mardo-

queo en él; después ve alegre con el rey al 

4.16 

→1.13  nota.  4.16  Lit.  cuando  haya  muerto,  habré  muerto  →Gn.43.14.  5.1.  Lit.  en  el  patio  interior  del  palacio  real, 

frente al palacio real… dentro del palacio real, frente a la entrada del palacio

5.4 

→§158.  5.5 Lit. para cumplir la palabra 

de Ester

5.6 Lit. en el banquete de vino.  5.6 Lit. te será satisfecha.  5.8 Es decir, responderé a la pregunta que el rey me ha 

hecho en dos ocasiones

5.10 Lit. y envió e hizo venir.  5.11 Lit. y todo lo que el rey lo había engrandecido y lo que lo había 

ensalzado

5.13 En esta porción del texto también se forma el tetragrama YHVH. 

→1.20; 5.4 y 7.7.


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Ester 7:7

517

banquete. Y la propuesta agradó a Amán, 

y preparó° el madero.

Mardoqueo y Amán

6

Aquella noche el sueño huyó del rey, 

y  ordenó  que  trajeran  el  rollo  de  las 

crónicas, el cual fue leído delante del rey.

2

 Y se halló escrito que Mardoqueo había 

denunciado  a  Bigtán  y  Teres,  dos  eunu-

cos del rey, de los guardianes del palacio,° 

que habían proyectado poner mano en el 

rey Asuero.

3

 Y preguntó el rey: ¿Qué honor o distin-

ción se concedió a Mardoqueo por esto? 

Y los ministros servidores del rey respon-

dieron: Nada se ha hecho por él.

4

 Entonces dijo el rey: ¿Quién está en el 

patio? (Y Amán estaba entrando en el pa-

tio exterior de la casa del rey para propo-

ner al rey que hiciera colgar a Mardoqueo 

en el madero que él le había preparado.)

5

 Y  los  siervos  del  rey  respondieron:  He 

aquí Amán está en el patio. Y el rey dijo: 

Que entre.

6

 Entró pues Amán, y el rey le preguntó: 

¿Qué  se  hará  al  hombre  cuya  honra  de-

sea el rey? Y Amán dijo en su corazón: ¿A 

quién  deseará  honrar°  el  rey  más  que  a 

mí?

7

 Y Amán respondió al rey: Para el hom-

bre cuya honra desea el rey,

8

 sean traídos los atavíos reales que el rey 

suele usar, y el caballo en que cabalga el 

rey,  y  póngase  en  su  cabeza  la  diadema 

real,°

9

 y dense los atavíos y el caballo en mano 

del más noble príncipe del rey, para que 

vista  así  al  hombre  cuya  honra  desea  el 

rey, y lo haga pasear a caballo por las ca-

lles de la ciudad, proclamando delante de 

él: ¡Así se hace al hombre cuya honra de-

sea el rey!

10

 Entonces el rey dijo a Amán: ¡Apresú-

rate, toma los atavíos y el caballo, y haz 

como has dicho con Mardoqueo el judío, 

que  está  sentado  en  la  puerta  real!  ¡No 

omitas nada de todo lo que has dicho!

11

 Así Amán tuvo que tomar los atavíos y 

el caballo, y vestir a Mardoqueo, y hacer 

que cabalgara por las calles de la ciudad, 

proclamando delante de él: ¡Así se hace al 

hombre cuya honra desea el rey!

12

 Y  volvió  Mardoqueo  a  la  puerta  real, 

mientras  Amán  regresaba  apresurada-

mente a su casa, lamentándose y con la 

cabeza cubierta.

13

 Y  Amán  refirió  a  su  mujer  Zeres  y  a 

todos sus amigos todo lo que le había su-

cedido. Entonces sus atinados amigos, y 

Zeres, su mujer, le dijeron: Si Mardoqueo, 

ante  quien  has  comenzado  a  caer,  es  de 

la simiente de los judíos, no prevalecerás 

contra él, sino que de seguro caerás ante 

él.°

14

 Aún  estaban  ellos  hablando  con  él, 

cuando llegaron los eunucos del rey y se 

apresuraron a llevar a Amán al banquete 

que Ester tenía preparado.

Segundo banquete – Muerte de Amán

7

Fueron  pues  el  rey  y  Amán  a  beber 

con la reina Ester.

2

 Y al segundo día, mientras bebían vino 

en el banquete, el rey volvió preguntar a 

Ester:  ¿Cuál  es  tu  petición,  reina  Ester? 

Pues  te  será  concedida.  ¿Cuál  es  tu  de-

manda? ¡Hasta la mitad del reino te será 

concedido!

3

 Entonces  la  reina  Ester  respondió  y 

dijo: Oh rey, si he hallado gracia ante tus 

ojos, y si ello place al rey, ¡concédase mi 

vida por mi petición y la de mi pueblo por 

mi demanda!

4

 ¡Porque yo y mi pueblo hemos sido ven-

didos para ser destruidos, matados y ex-

terminados! Si como esclavos o esclavas 

hubiéramos sido vendidos, yo habría ca-

llado, porque aun tal calamidad no sería 

digna de la molestia del rey.

5

 Y tomando la palabra, el rey Asuero pre-

guntó a la reina Ester: ¿Quién es y dónde 

está el que ha ensoberbecido su corazón 

para hacer tal cosa?

6

 Ester dijo: ¡El adversario y enemigo es 

este malvado Amán! Y Amán quedó ate-

rrorizado delante del rey y de la reina.

7

 Entonces  el  rey  se  levantó  enfurecido 

del  banquete  y  se  fue  al  jardín  del  pala-

cio, pero Amán se quedó para rogar por 

su vida a la reina Ester, porque vio que el 

5.14 preparó. La estructura es Qal. Es decir, lo construyó personalmente.  6.2 Lit. umbral.  6.6 Lit. hacer honra.  6.8 Nen cuya 

cabeza haya una diadema real

6.13 LXX añade pues el Dios vivo está con él.


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Ester 7:8

518

mal ya estaba determinado° contra él de 

parte del rey.

8

 Cuando el rey volvió del jardín del pa-

lacio al aposento donde estaban bebiendo 

el vino, ¡he aquí Amán se había caído en-

cima del reclinatorio° en que Ester se ha-

llaba recostada! Por lo que el rey exclamó: 

¿Acaso querrá también violar a la reina en 

mi presencia y en mi propia casa? No bien 

hubo salido tal exclamación de la boca del 

rey, cubrieron el rostro de Amán.°

9

 Y  dijo  Harbona,  uno  de  los  eunucos 

que estaban en presencia del rey: ¡He allí 

precisamente colocado en casa de Amán 

un madero de cincuenta codos de altura, 

el  cual  Amán  preparó  para  Mardoqueo, 

quien habló en provecho del rey!° Y el rey 

ordenó: ¡Colgadlo en él!

10

 Y colgaron a Amán en el madero que 

él había preparado para Mardoqueo, y se 

aplacó la ira del rey.

El edicto

8

Aquel mismo día, el rey Asuero dio a 

la reina Ester la casa de Amán, el ad-

versario  de  los  judíos.  Y  Mardoqueo  fue 

ante la presencia del rey, porque Ester le 

declaró lo que él era respecto a ella.

2

 Entonces el rey se quitó el sello que ha-

bía recobrado de Amán, y lo dio a Mardo-

queo; y Ester puso a Mardoqueo sobre la 

casa de Amán.

3

 Ester  habló  nuevamente  ante  el  rey,  y 

cayó ante sus pies, y con lágrimas en los 

ojos le rogó que impidiera la perversidad 

de Amán agagueo y el plan que había tra-

mado contra los judíos.

4

 Entonces el rey extendió hacia Ester el 

cetro de oro, y Ester se levantó y se puso 

en pie delante del rey,

5

 y dijo: Si place al rey, y si he hallado gra-

cia ante sus ojos, y el asunto parece acer-

tado al rey, y yo soy grata ante sus ojos, 

escríbase  revocando  el  decreto  ideado 

por Amán hijo de Hamedata, el agagueo, 

el cual escribió para destruir a todos los 

judíos° que están en todas las provincias 

del rey.

6

 Porque, ¿cómo podré yo ver el mal que 

alcanzará  a  mi  pueblo?  ¿Y  cómo  podré 

contemplar  la  destrucción  de  mi  paren-

tela?

7

 Entonces  el  rey  Asuero  dijo  a  la  reina 

Ester  y  al  judío  Mardoqueo:  He  aquí  he 

dado a Ester la casa de Amán, y él ha sido 

colgado en su propio madero, por cuanto 

extendió su mano contra los judíos.

8

 Ahora pues, escribid en nombre del rey 

respecto  a  los  judíos  lo  que  bien  os  pa-

rezca, y selladlo con el sello del rey , por-

que lo° que es escrito en nombre del rey 

y sellado con el sello del rey no puede ser 

revocado.

9

 Así, en aquel momento, en el mes terce-

ro, que es Siván, a los veintitrés días del 

mes,° fueron llamados los escribas del rey 

y, conforme a todo lo que mandó Mardo-

queo con relación a los judíos, fue escrito 

a los sátrapas y a los gobernadores y prín-

cipes  de  las  ciento  veintisiete  provincias 

que están desde la India hasta Etiopía,° a 

cada provincia según su escritura, y a cada 

pueblo según su lengua, y a los judíos con-

forme a su escritura y según su lengua.

10

 Y él escribió en nombre del rey Asuero 

y lo selló con el sello del rey, y envió car-

tas  mediante  correos  a  caballo,  quienes 

emplearon veloces corceles reales,°

11

 en las cuales el rey permitía que los ju-

díos de cada ciudad se reunieran para de-

fender sus vidas, y destruyeran, mataran 

y exterminaran a cualquier gente armada 

del pueblo o provincia que los hostiliza-

ra,° incluidos niños y mujeres, y tomaran 

sus despojos por botín

12

 en todas las provincias del rey Asuero, 

todo en un mismo día, es decir, el día tre-

ce del mes duodécimo, que es el mes de 

Adar.

13

 La copia de la escritura que había de 

darse como edicto en cada provincia, fue 

publicada para todos los pueblos, a fin de 

que en ese día los judíos estuvieran pre-

parados para vengarse de sus enemigos.

14

 Los correos, montados en corceles rea-

les,  partieron  apresurados,°  apremiados 

7.7 

→§158.  7.8 reclinatorio →1.6 nota.  7.8 Esto es, señal de la sentencia de muerte.  7.9 →2.21-23.  8.5 Mss. heb. me-

dievales y la Sir registran a todos los judíos

8.8 Lit. el escrito.  8.9 Esto es, 70 días después del primer edicto.  8.9 Lit. y a las 

autoridades de las provincias que había desde la India hasta Etiopía, ciento veintisiete provincias

8.10 Lit. hijos de yeguas 

reales. Caballos especiales por la pureza de su raza y su cuidado, lo cual destaca la importancia que el rey da a la petición de 

Ester. 

8.11 Nque mostrara hostilidad hacia ellos.  8.14 Lit. apurados y apresurados


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Ester 9:17

519

por la orden del rey, porque la ley había 

sido promulgada en Susa, la ciudadela.

15

 Después,  Mardoqueo  salió  de  delante 

de la presencia del rey con atavíos reales 

de colores azul y blanco, y con una gran 

corona  de  oro  y  un  manto  de  lino  fino 

blanco y púrpura. Y la ciudad de Susa lo 

aclamó y se regocijó.

16

 Y para los judíos todo fue luz y alegría, 

regocijo y honra.

17

 Y  en  cada  provincia  y  ciudad,  donde-

quiera llegaba la orden del rey y su edicto, 

los judíos tenían regocijo y alegría, ban-

quetes y día de solemnidad. Y muchos de 

entre los pueblos de la tierra se hicieron 

judíos,° porque el temor de los judíos ha-

bía caído sobre ellos.

La fiesta de Purim

9

Y en el mes duodécimo, que es el mes 

de  Adar,  a  los  trece  días  de  ese  mes, 

cuando la orden del rey y su edicto esta-

ban  a  punto  de  ejecutarse,  en  el  día  en 

que los enemigos de los judíos esperaban 

prevalecer sobre ellos, sucedió lo contra-

rio:  Que  los  judíos  prevalecieron  sobre 

quienes los odiaban.

2

 Y en todas las provincias del rey Asuero 

los judíos se congregaron en sus ciudades 

para echar mano a los que habían procu-

rado su desgracia, y nadie pudo resistir-

los, porque el temor de ellos había caído 

sobre todos los pueblos.

3

 Y todos los príncipes de las provincias, 

y  los  sátrapas,  y  los  gobernadores,  y  los 

funcionarios menores del rey, apoyaban a 

los judíos, porque el temor de Mardoqueo 

había caído sobre ellos,

4

 por cuanto Mardoqueo se había engran-

decido en la casa del rey, y su fama se había 

extendido a todas las provincias, pues el va-

rón Mardoqueo se hacía más y más grande.

5

 Y  los  judíos  mataron  a  todos  sus  ene-

migos a filo de cuchillo, con mortandad y 

destrucción; e hicieron lo que quisieron° 

contra quienes los odiaban.

6

 En Susa, la ciudadela, los judíos mata-

ron y destruyeron a quinientos hombres.

7

 También mataron°

a

Parsandata,

a

Dalfón,

a

Aspata,

8

 a

Porata,

a

Adalía,

a

Aridata,

9

 a

Parmasta,

a

Arisai,

a

Aridai

y a

Vaizata,

10

 los diez hijos de Amán hijo de Hame-

data, adversario de los judíos, pero no pu-

sieron la mano en el botín.

11

 En aquel día, cuando el rey obtuvo el 

recuento de los muertos° en la ciudadela 

de Susa,

12

 dijo el rey a la reina Ester: En Susa, la 

ciudadela,  los  judíos  han  matado  y  des-

truido a quinientos hombres y a los diez 

hijos  de  Amán,  ¡qué  no  habrán  hecho 

en las otras provincias del rey! Así pues, 

¿cuál es tu petición? Pues te será conce-

dida. ¿Qué más es tu demanda? Pues será 

satisfecha.

13

 Y respondió Ester: Si place al rey, con-

cédase  también  mañana  a  los  judíos  en 

Susa que hagan conforme a la ley de hoy, 

y que cuelguen en la horca° a los diez hi-

jos de Amán.

14

 Y el rey ordenó que se hiciera así. La 

ley se promulgó en Susa, y colgaron a los 

diez hijos de Amán.

15

 Los judíos que residían en Susa se re-

unieron  también  el  día  catorce  del  mes 

de Adar y mataron a trescientos hombres 

en Susa, pero no pusieron la mano en el 

botín.

16

 En  cuanto  al  resto  de  los  judíos  que 

estaban en las provincias del rey, que se 

habían  reunido  para  defender  sus  vidas, 

tuvieron reposo de sus enemigos luego de 

haber matado entre los que los odiaban a 

setenta y cinco mil, pero no pusieron la 

mano en el botín.

17

 Esto fue en el día trece del mes de Adar, 

y en el catorce del mismo reposaron, y lo 

hicieron día de banquete y de alegría.

8.17 LXX: fueron circuncidados y se hicieron judíos.  9.5 Lit. conforme a su voluntad.  9.7 Así aparece esta lista en el Códice de 

Leningrado y en toda impresión del texto hebreo: nombre bajo nombre, sin aprovechar todo el espacio de la línea. Ver también 

→Jos.12.9-24, donde la lista de reyes derrotados aparece dispuesta en forma similar. → § 143.  9.11 Lit. cuando el recuento 

de los muertos fue delante del rey

9.13 Lit. en el madero.


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Ester 9:18

520

18

 Pero los judíos que estaban en Susa se 

reunieron el día trece y catorce del mis-

mo mes, y el quince reposaron, haciéndo-

lo día de banquete y de alegría.

19

 Por eso los judíos aldeanos que habi-

tan en las ciudades abiertas° hacen del día 

catorce  del  mes  de  Adar  día  de  regocijo 

y convite, y día de festividad y en que se 

envían regalos° unos a otros.

20

 Y Mardoqueo escribió estas cosas y en-

vió cartas a todos los judíos que había en 

todas las provincias del rey Asuero, próxi-

mas y lejanas,

21

 ordenándoles que cada año celebraran 

el día catorce y quince del mes de Adar,

22

 como días en que los judíos tuvieron 

reposo de sus enemigos, en un mes que se 

convirtió para ellos de tristeza en alegría 

y de luto en día de fiesta, y que los hicie-

ran días de banquete, de regocijo y de en-

vío de regalos de cada uno a su prójimo, y 

de dádivas a los pobres.

23

 Y los judíos se comprometieron a se-

guir  esa  práctica  ya  iniciada,  tal  como 

Mardoqueo les había escrito,

24

 porque  Amán  hijo  de  Hamedata,  el 

agagueo,  adversario  de  todos  los  judíos, 

había  tramado  la  destrucción  de  los  ju-

díos y había echado Pur, que es la suerte,° 

para turbarlos y exterminarlos;

25

 pero  al  presentarse  ella°  ante  el  rey, 

éste ordenó mediante el decreto, que re-

cayera sobre su° cabeza el malvado plan 

que había tramado contra los judíos, y lo 

colgaran, a él y a sus hijos en el madero.

26

 Por esto llamaron aquellos días Purim, 

del nombre Pur. Por tanto, a causa de to-

das las palabras de aquella carta, y por lo 

que  ellos  habían  experimentado  con  ese 

motivo, y lo que les había acaecido,°

27

 los  judíos  establecieron  y  tomaron 

sobre sí y sobre su descendencia y sobre 

todos los que se unieran a ellos, de modo 

que  nunca  fuera  anulado,°  el  continuar 

observando estos dos días según está es-

crito respecto a ellos, y según su tiempo 

señalado, en cada año,

28

 y  que  estos  días  fueran  recordados  y 

observados de generación en generación, 

de familia en familia, en cada provincia y 

en cada ciudad, y que estos días de Purim 

no cayeran en desuso entre los judíos, ni 

su  recuerdo  cesara  entre  su  descenden-

cia.

29

 Por  tanto  la  reina  Ester,  hija  de  Abi-

hail,  y  el  judío  Mardoqueo,  escribieron 

con  plena  autoridad,  confirmando  esta 

segunda° carta de Purim.

30

 Y él envió cartas a todos los judíos que 

había en las ciento veintisiete provincias 

del reino de Asuero, con palabras de paz 

y verdad,

31

 confirmando los días de Purim en su 

tiempo determinado, según el judío Mar-

doqueo y la reina Ester habían ordenado 

respecto a ellos, y según habían tomado 

sobre sí mismos° y sobre su descenden-

cia, en° lo concerniente a los ayunos y a 

su clamor.

32

 Y la orden de Ester confirmó estas co-

sas del Purim, y fue escrito en el rollo.

Conclusión

10

E impuso el rey Asuero un tributo 

sobre la tierra, y sobre las islas del 

mar.

2

 Todos  los  actos  de  autoridad  y  poder, 

así como la declaración de la grandeza de 

Mardoqueo,  a  quien  el  rey  engrandeció, 

¿no están escritos en el rollo de las cróni-

cas de los reyes de Media y de Persia?

3

 Porque el judío Mardoqueo llegó a ser 

el segundo del rey Asuero, y grande entre 

los judíos, y acepto por la multitud de sus 

hermanos, procurando el bienestar de su 

pueblo, y hablando paz a todo su linaje.°

9.19 Es decir, sin muros.  9.19 Lit. porciones.  9.24 

→3.7 nota.  9.25 Esto es, Ester.  9.25 Esto es, Amán.  9.26 Esto es, a los 

judíos que vivían fuera de Susa

9.27 LXX: para no hacer de otra manera.  9.29 LXX y Sir. omiten segunda.  9.31 Lit. sobre sus 

vidas

9.31 Es decir, para conmemorar lo concerniente.  10.3 No se refiere únicamente a la descendencia directa de Mardo-

queo, sino, en el sentido más amplio, a todo el pueblo judío. 


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1

Hubo  un  hombre  en  la  tierra  de  Uz 

llamado Job, y era aquel varón perfec-

to y honrado, temeroso de Dios y aparta-

do del mal.

2

 Y le nacieron siete hijos y tres hijas.

3

 Su  hacienda  era  de  siete  mil  ovejas, 

tres  mil  camellos,  quinientas  yuntas  de 

bueyes, quinientas asnas y una muy nu-

merosa  servidumbre,  de  modo  que  este 

hombre  era  el  más  grande  de  todos  los 

orientales.°

4

 Sus  hijos  solían  ofrecer  banquetes  en 

sus casas, cada uno en su día respectivo, 

y acostumbraban a invitar a sus tres her-

manas para que comieran y bebieran con 

ellos.

5

 Y  ocurría  que  al  finalizar  los  días  del 

festín,  Job  enviaba  por  ellos°  para  puri-

ficarlos,  y  levantándose  de  madrugada, 

ofrecía holocaustos por todos ellos, con-

forme a su número, pues decía Job: Qui-

zás mis hijos han pecado contra ’Elohim 

y blasfemado en su corazón. Así hacía Job 

siempre.

Preludio celestial

6

 Llegado el día en que los hijos de Dios° 

se  presentan  ante  YHVH,  vino  también 

con ellos el Acusador.°

7

 Y  YHVH  preguntó  al  Acusador:  ¿De 

dónde vienes? Y el Acusador respondió a 

YHVH y dijo: De rodear la tierra y andar 

por ella.

8

 Y  dijo  YHVH  al  Acusador:  ¿Acaso  has 

puesto  tu  corazón  contra  mi  siervo  Job 

porque no hay como él en la tierra, varón 

perfecto  y  honrado,  temeroso  de  Dios  y 

apartado del mal?

9

 Entonces el Acusador respondió a YHVH 

diciendo:  ¿Acaso  Job  teme  a  ’Elohim  de 

balde?

10

 ¿No has puesto un vallado en torno a 

él, y en torno a su casa, y en torno a todo 

cuanto  posee?  Porque  has  bendecido  la 

obra  de  sus  manos,  y  sus  posesiones  se 

desbordan por la tierra.

11

 Pero,  extiende  ahora  tu  mano  y  toca 

todo lo que tiene, y verás si no te maldice° 

en tu propio Rostro.

12

 Entonces  dijo  YHVH  al  Acusador:  He 

aquí todo lo que tiene está en tu mano, 

sólo que no pongas tu mano sobre él. Y 

el  Acusador  se  retiró  de  la  presencia  de 

YHVH.

La prueba de Job

13

 Y llegó el día, cuando sus hijos y sus 

hijas  estaban  comiendo  y  bebiendo  vino 

en casa del hermano primogénito,

14

 que un mensajero llegó a Job y le dijo: 

Los  bueyes  estaban  arando,  y  las  asnas 

pastando junto a ellos,

15

 e irrumpieron los sabeos y se los lleva-

ron, y mataron a los criados a filo de espa-

da, y sólo yo escapé para darte la noticia.

16

 Aún estaba hablando éste, cuando vino 

otro que dijo: ¡Fuego° de Dios cayó de los 

cielos que abrasó a las ovejas y devoró a 

los criados! Sólo yo escapé para darte la 

noticia.

17

 Todavía estaba éste hablando, cuando 

vino otro que dijo: Los caldeos formaron 

tres cuadrillas y se abalanzaron sobre los 

Preludio terrenal

1.3  Lit.  los  hijos  del  oriente.  1.5  .por  ellos.  1.6  Esto  es,  los  ángeles.  1.6  Esto  es,  Satanás 

→Ap.12.10;  1  Jn.2.1.  1.11 

→Sal.10.3 nota.  1.16 Es decir, rayos →2 R.1.12. 


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Job 1:18

522

camellos y se los llevaron y pasaron a cu-

chillo a los criados, y sólo yo escapé para 

darte la noticia.

18

 Aún estaba éste hablando, cuando vino 

otro que dijo: Tus hijos y tus hijas estaban 

comiendo y bebiendo vino en casa de su 

hermano primogénito,

19

 cuando he aquí vino un torbellino del 

desierto  que  golpeó  las  cuatro  esquinas 

de la casa, la cual cayó sobre los jóvenes, 

y murieron. Sólo yo escapé para darte la 

noticia.

20

 Entonces  Job  se  levantó,  y  rasgó  su 

manto y se rapó la cabeza, y cayendo en 

tierra se postró,

21

 y dijo: ¡Desnudo salí del vientre de mi 

madre y desnudo volveré allá! ¡YHVH dio 

y YHVH quitó! ¡Bendito sea el nombre de 

YHVH!

22

 En todo esto Job no pecó ni atribuyó a 

’Elohim despropósito alguno.

La prueba sobre su persona

2

Llegado el día en que los hijos de Dios 

se  presentan  ante  YHVH,  vino  tam-

bién con ellos el Acusador a presentarse 

delante de YHVH.

2

 Y dijo YHVH al Acusador: ¿De dónde vie-

nes? Y el Acusador respondió a YHVH di-

ciendo: De rodear la tierra y andar por ella.

3

 Y  YHVH  dijo  al  Acusador:  ¿Acaso  has 

puesto  tu  corazón  contra  mi  siervo  Job 

porque  no  hay  como  él  en  la  tierra,  va-

rón íntegro y honrado, temeroso de Dios 

y  apartado  del  mal,  que  aún  se  aferra  a 

su integridad a pesar de que me incitaste 

contra él para arruinarlo sin causa?

4

 Y el Acusador respondió a YHVH y dijo: 

¡Piel por piel! Todo lo que tiene el hombre 

lo dará por su vida.

5

 Pero extiende ahora tu mano y toca sus 

huesos y su carne, y verás cómo te maldi-

ce° en tu propio Rostro.

6

 Y  YHVH  respondió  al  Acusador:  Helo 

ahí en tu mano. Sólo no toques su vida.

7

 Y  el  Acusador  salió  de  la  presencia 

de  YHVH  e  hirió  a  Job  con  una  úlcera 

maligna desde la planta del pie hasta la 

coronilla.

8

 Y  tomando  un  tiesto  roto,  se  rascaba 

con  él,  estando  sentado  en  medio  de  la 

ceniza.°

9

 Entonces le dijo su mujer: ¿Aún te afe-

rras a tu integridad? ¡Maldice° a ’Elohim 

y muérete!°

10

 Pero él le respondió: Como suelen ha-

blar las insensatas has hablado tú. Si re-

cibimos de ’Elohim el bien, ¿no hemos de 

aceptar también el mal? En todo esto no 

pecó Job con sus labios.

Los amigos de Job

11

 Tres amigos de Job oyeron de los ma-

les que le habían sobrevenido, y acudie-

ron cada uno de su lugar: Elifaz temanita, 

Bildad sujita y Sofar° naamatita, quienes 

convinieron en ir juntos para condolerse 

con él y consolarlo.

12

 Pero cuando alzaron los ojos desde le-

jos, no pudieron reconocerlo, y echaron a 

llorar a voz en cuello, y rasgaron sus ves-

tiduras, y esparcieron polvo al aire sobre 

sus cabezas.

13

 Y estuvieron sentados con él en el sue-

lo durante siete días con sus siete noches, 

no hablándole palabra, por cuanto veían 

que su mal era muy grande.

Imprecación de Job

3

Después  de  esto  abrió  Job  su  boca  y 

maldijo su día.°

2

 Y Job habló diciendo:

3

    Perezca el día en que nací

Y la noche en que se dijo: Varón es 

concebido.

4

    Sea aquel día tinieblas.

No pregunte Dios por él desde 

lo alto

Ni lo alumbre la luz.

5

    Que la oscuridad lo reclame y las 

tinieblas moren sobre él;

Que una nube lo espante como 

amarguras del día.

6

    Apodérense de esa noche densas 

tinieblas.

No se alegre entre los días del año

Ni se cuente en el número de los 

meses.

2.5 

→Sal.10.3 nota.  2.8 Señal de dolor, duelo y desesperación.  2.9 →Sal.10.3 nota.  2.9 Prob. el sentido aquí es que el 

remedio más expedito para que Job terminara con su triste existencia, consistía en maldecir a Dios, toda vez que el castigo del 

blasfemo era la muerte. 

2.11 Heb. Tsofar.  3.1 Es decir, el día de su nacimiento.


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Job 4:13

523

7

    Sea esa noche estéril

Y no haya en ella regocijo.

8

    Maldíganla los que maldicen el día,

Los que se aprestan a excitar al 

Leviatán.

9

    Oscurézcanse las estrellas de su 

alborada

Para que busque la luz, y no halle 

ninguna,

Ni contemple los párpados de la 

aurora,

10

    Por cuanto no cerró las puertas de la 

matriz que fue mía,

Ni escondió de mis ojos la miseria.

11

    ¿Por qué no morí yo en la matriz,

O expiré al salir del vientre?

12

    ¿Por qué hallé rodillas que me 

acogieron,

Y pechos que me amamantaron?

13

    Pues ahora yacería tranquilo,

Dormiría, y estaría descansando

14

    Con reyes y consejeros de la tierra

Que edificaron palacios que hoy son 

ruinas,

15

    O con príncipes ricos en oro,

Que llenaron de plata sus palacios.

16

    ¡Oh!, ¿por qué no fui escondido cual 

aborto,

Como los fetos, que nunca ven 

la luz?

17

    Allí dejan de perturbar los malvados,

Allí descansan los de agotadas 

fuerzas,

18

    A una con los cautivos gozan del 

reposo,

Sin oír la voz del capataz.

19

    Allí están el pequeño y el grande,

Y el esclavo está libre de su amo.

20

    ¿Por qué se da luz al desdichado,

Y vida a los de alma amargada,

21

    A los que ansían la muerte, y no les 

llega,°

Aunque la buscan más que a tesoros 

escondidos.

22

    A los que se alegran en extremo,

Y se regocijan al hallar la tumba.

23

    Al hombre que le están ocultos sus 

caminos,

Y a quien Dios tiene acorralado?

24

    Porque en lugar de mi pan, viene mi 

suspiro,

Y mis gemidos se derraman como 

aguas,

25

    Porque lo que temía me ha 

sobrevenido,

Y lo que recelaba me ha llegado.

26

    ¡No tengo paz ni tranquilidad ni 

reposo, sino sólo turbación!

Elifaz

4

Entonces  intervino  Elifaz  temanita  y 

dijo:

2

   Si intentamos razonar contigo, te 

será molesto.

Pero, ¿quién podrá contener las 

palabras?

3

    He aquí tú enseñabas a muchos,

Y fortalecías las manos débiles.

4

    Tus palabras sostenían al que 

tambaleaba,

Y afirmabas las rodillas decaídas.

5

    Pero ahora que te llega a ti, te 

desalientas,

Te ha tocado a ti, y te turbas.

6

    ¿No es tu temor de Dios tu 

confianza,

Y la integridad de tus caminos tu 

esperanza?

7

    Ruégote consideres, ¿quién pereció 

jamás siendo inocente?

O, ¿dónde fueron los justos 

destruidos?

8

    Según tengo visto, quienes aran 

iniquidad

Y siembran aflicción, la cosechan.

9

    Por el aliento de Dios perecen,

Y por el soplo de su ira son 

consumidos.

10

    Aunque ruja el león, y la leona le 

haga coro,

Los dientes de sus cachorros son 

quebrados.

11

    El león viejo perece por falta de 

presa,

Y los cachorros de la leona se 

dispersan.

12

    A mí empero suele traérseme 

furtivamente una palabra,

Y mi oído percibe un leve rumor de 

ella.

13

    En pensamientos de visiones 

nocturnas,

3.21 Lit. no la hay.


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Job 4:14

524

Cuando el sueño profundo se adueña 

de los hombres,

14

    Un terror se apoderó de mí, y 

temblando,

Todos mis huesos se estremecieron:

15

    Un espíritu pasa ante mi rostro,

Que eriza el pelo de mi carne.

16

    Se detiene, pero no puedo distinguir 

su semblante:

Una apariencia está delante de mis 

ojos,

Hay silencio… y oigo una voz:

17

    ¿Será el mortal más justo que Dios?

¿El hombre, más puro que su 

Hacedor?

18

    He aquí que en sus siervos no 

confía,

Y a sus ángeles imputa insensatez,

19

    ¡Cuánto menos en quienes habitan 

en casas de barro cimentadas en 

el polvo,

Desmenuzados por la polilla!

20

    Entre la mañana y la tarde son 

destruidos,

Y sin que nadie se dé cuenta, 

perecen para siempre.

21

    ¿No les son arrancadas las cuerdas 

de sus tiendas?

En ellas mueren, pero no con 

sabiduría.

5

  ¡Clama ahora! ¿Habrá quién te 

  responda?

¿A cuál de los santos acudirás?

2

    Es cierto que el encono mata al 

necio,

Y la envidia carcome al simple.

3

    He visto al necio echar raíces,

Pero al punto maldije su morada.

4

    Sus hijos están lejos de toda 

seguridad,

Y son aplastados en la puerta sin que 

nadie los defienda.

5

    Su cosecha la devoran los 

hambrientos

Sacándola aun de entre los espinos,

Y el tramposo sorbe su fortuna.

6

    Porque no sale del polvo la miseria,

Ni las desdichas brotan de la tierra,

7

    Sino que es el hombre quien nace 

para la aflicción,

Como las chispas para alzar el vuelo.

8

    Si yo fuera tú, me dirigiría a Dios,

Y expondría mi causa ante ’Elohim,

9

    Que hace prodigios inescrutables,

Y maravillas sin número:

10

    Da lluvia a la tierra,

Riega los campos,

11

    Exalta a los humildes,

Da lugar seguro a los afligidos,

12

    Malogra los planes del astuto,

Para que fracase su propósito,

13

    Prende a los pícaros en su propia 

astucia,

Y trastorna las intrigas del taimado.

14

    En pleno día, tropiezan con tinieblas,

A plena luz, andan a tientas como de 

noche.

15

    Así salva al pobre de la lengua 

afilada,

Y de la mano de los poderosos.

16

    Así el desvalido conserva la 

esperanza,

Y la iniquidad tiene que cerrar su 

boca.

17

    Dichoso el hombre a quien Dios 

disciplina:

No menosprecies la corrección de 

’El-Shadday,°

18

    Porque Él hace la herida y la venda,

Hiere, pero sus manos sanan.

19

    De seis tribulaciones te librará,

Y aun en siete no te tocará el mal:

20

    Durante la hambruna te salvará de 

la muerte,

Y en la guerra, del poder de la 

espada.

21

    Estarás a cubierto del azote de la 

lengua,

Y no temerás cuando llegue el 

desastre.

22

    Te reirás del estrago y del hambre,

Y no tendrás miedo a las fieras de la 

tierra,

23

    Pues aun con las piedras del campo 

harás alianza,

Y las bestias del campo te serán 

mansas.

24

    Tendrás paz en tu tienda,

Y al recorrer tu morada, no echarás 

nada de menos.

25

    Verás asimismo una descendencia 

numerosa,

5.17 

→ § 5.


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Job 6:28

525

Y que tu prole es como la hierba de 

la tierra.

26

    Irás al sepulcro en edad madura,

Como la gavilla que se recoge a su 

tiempo.

27

    He aquí, todo esto hemos indagado, 

y así es.

Óyelo, y aplícatelo.

Justificación de Job

6

Respondió entonces Job, y dijo:

2

    ¡Oh, si pudiera pesarse mi vejación,

Y con mi calamidad alzarse juntas 

en balanza!

3

    ¡Pesarían ahora más que la arena 

del mar!

Por eso mis palabras son 

desatinadas,

4

    Porque en mí están clavadas° las 

saetas de ’El-Shadday,

Y mi espíritu sorbe su veneno,

Y los terrores de Dios se alistan 

contra mí en orden de batalla.

5

    ¿Rebuznará el asno montés junto a 

la hierba?

¿Mugirá el buey junto a su pasto?

6

    ¿Se comerá lo insípido sin sal?

¿Hay sabor en la clara del huevo?°

7

    Las cosas que mi alma rehusaba 

tocar,

Son ahora mi alimento 

nauseabundo.°

8

    Quién me diera tener mi petición,

Y que Dios me otorgara lo que tanto 

anhelo:

9

    ¡Que Dios se dignara aplastarme,

Y soltara su mano para acabar 

conmigo!

10

    Eso sería mi consuelo,

Y aun en medio de un dolor que no 

da tregua, saltaría de gozo,

Porque no he negado° la palabra del 

Santísimo.

11

    ¿Cuál es mi fortaleza, para que siga 

esperando?

¿Cuál es mi propósito, para que 

tenga aún paciencia?

12

    ¿Es mi fortaleza la de las piedras,

O es de bronce mi carne?

13

    He aquí, no encuentro en mí ayuda 

alguna,

Y todo auxilio ha sido alejado de mí.

14

    Para el abatido es la lealtad de los 

amigos,

Aunque haya abandonado el temor 

de ’El-Shadday.

15

    Mis hermanos me traicionaron cual 

torrente,

Como corriente de arroyos 

pasajeros,

16

    Que van turbios a causa del 

deshielo,

Y de la nieve que se deshace en ellos.

17

    Al tiempo del calor, se desvanecen,

Y al calentarse, se extinguen en su 

cauce.

18

    Se apartan de la senda de su rumbo,

Se evaporan en la nada, y se pierden.

19

    Las caravanas de Temán los otean,

Los caminantes de Sabá tienen 

puesta su esperanza en ellos.

20

    Son avergonzados por lo mismo en 

que confiaban,

Pues llegan hasta ellos, y quedan 

defraudados.

21

    Así vosotros, no sois nada.°

Habéis visto algo terrible y teméis.

22

    ¿Es acaso porque dije: Dadme algo,

O: De vuestra hacienda sobornad a 

favor mío,

23

    O: Libradme de manos del 

adversario,

O: Rescatadme del poder del 

opresor?

24

    Instruidme, y callaré.

Hacedme entender en qué he 

errado.

25

    Los dichos probos son fuertes,

Pero, ¿qué reprende vuestra 

reprensión?

26

    Criticáis meros vocablos,

Porque viento, nada más,° son los 

dichos de un desesperado

27

    Hasta sobre un huérfano echaríais 

suertes,

Y trataríais el precio del amigo.

28

    Ahora pues, dignaos mirarme de 

frente,

¿Mentiré aun ante vuestro rostro?

6.4 .clavadas.  6.6 Nel jugo del malvavisco.  6.7 Tanto el léxico como la construcción gramatical y el sentido de toda la porción 

son de difícil traducción. 

6.10 Lit. ocultado.  6.21 Lit. (como) él. Es decir, como el arroyo 

→v. 15.  6.26 .nada más


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Job 6:29

526

29

    ¡Tornad, os ruego! ¡No haya 

injusticias!

¡Tornad, sí! Pues va en ello mi 

justicia.

30

    ¿Acaso hay injusticia en mi lengua,

Y mi paladar no puede distinguir lo 

inicuo?

Job se queja ante Dios

7

  ¿No es una milicia el destino del 

   hombre en la tierra?

¿No son sus días como los días de 

un jornalero?

2

    Como un esclavo que anhela la 

sombra,

Y como un jornalero que espera su 

paga,

3

    Así he heredado yo meses sin 

provecho,°

Y noches de aflicción me fueron 

asignadas.

4

    Si me acuesto, entonces digo: 

¿Cuándo me levantaré?

Y la noche se alarga, y me harto de 

dar vueltas hasta el alba.

5

    Mi carne está vestida de gusanos y 

de costra polvorienta,

Mi piel se agrieta y supura,

6

    Mis días se me van más veloces que 

la lanzadera,°

Y se me acaban por falta de hilo.°

7

    ¡Acuérdate de que mi vida es un 

soplo,

Y que mis ojos no volverán a ver el 

bien!

8

    El ojo del que me ve, ya no me verá 

más,

Tus ojos se fijarán en mí, pero ya no 

existiré.°

9

    Como la nube se deshace y se va,

Así quien baja al Seol,° no vuelve 

más.

10

    No retorna más a su morada,

Ni su lugar lo reconoce ya.

11

    Por tanto, no refrenaré mi boca,

Hablaré en la angustia de mi 

espíritu,

Me quejaré en la amargura de mi 

alma.

12

    ¿Soy yo acaso el mar, o el monstruo 

marino,

Para que pongas guardia sobre mí?

13

    Si digo: Me consolará mi lecho,

Mi cama aliviará mi queja;

14

    Entonces me aterras con sueños

Y me turbas con visiones.

15

    De manera que mi alma prefiere la 

estrangulación y la muerte,

Antes que estos huesos míos.

16

    ¡Abomino la vida! ¡No quiero vivir ya!

¡Déjame, mis días son vanidad!°

17

    ¿Qué es el mortal, para que lo 

engrandezcas,

Y pongas en él tu atención,°

18

    Y lo examines cada mañana,

Y lo pongas a prueba cada tarde?

19

    ¿Hasta cuándo no apartarás de mí tu 

mirada,

Ni me soltarás para que trague 

saliva?

20

    Si he pecado, ¿qué te hago a ti, oh 

Guardián del hombre?

¿Por qué me pones por blanco tuyo,

Hasta convertirme en una carga 

para ti?°

21

    ¿Por qué no quitas mis pecados y 

haces que pase mi iniquidad?

Porque en breve me acostaré en el 

polvo,

Me buscarás, pero no existiré.

Discurso de Bildad

8

Intervino Bildad sujita y dijo:

2

    ¿Hasta cuándo seguirás hablando 

tales cosas,

Viendo que los dichos de tu boca son 

como un viento impetuoso?

3

    ¿Acaso tuerce Él el derecho,

O ’El-Shadday hace desviar la 

justicia?

4

    Si tus hijos pecaron contra Él,

Él los entregó en mano de sus 

propias transgresiones.°

7.3 Lit. meses de vaciedad.  7.6 Esto es, instrumento para tramar la tela.  7.6 Heb. tiqvah = esperanza, pero también cuerda. De 

allí la traducción hilo, para completar la metáfora. 

7.8 Lit. y nada de mí. Lo mismo al final del v. 21.  7.9 Heb. Sheol (gr. Hades) = 

morada de las sombras. Esto es, lugar de los espíritus de los muertos. 

7.16 Heb. hébel. Es decir, sin sentido (distinto del v. 3). 

7.17 Lit. tu corazón.  7.20 16ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 22.  8.4 Bildad desconoce (o no considera) la ofrenda de Job 

por sus hijos 

→1.5. 


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Job 9:17

527

5

    Si tú buscas a Dios con diligencia,

E imploras a ’El-Shadday,

6

    Si eres puro y recto,

De seguro despertará sobre ti

Y restaurará la morada de tu justicia.

7

    Y aunque tu principio haya sido 

pequeño,

Tu final prosperará en gran manera.

8

    Te ruego pues, que preguntes a las 

generaciones pasadas,

Y considera lo que averiguaron sus 

padres.

9

    Porque no somos más que de ayer, y 

nada sabemos,

Porque nuestros días sobre la tierra 

son una sombra.

10

    ¿No te instruirán ellos hablándote 

con palabras salidas de su 

corazón?

11

    ¿Crece el papiro fuera del fango?

¿Crece el junco sin el agua?

12

    Cuando todavía son verdes y no 

están cortados,

Se secan antes que las otras hierbas.

13

    Así son las sendas de todos los que 

olvidan a Dios,

Y así se desvanece la esperanza del 

impío,

14

    Porque su confianza es frágil,

Y su seguridad como tela de araña.

15

    Se apoyará en su casa, y ésta no se 

sostendrá,

Si se aferra a ella, no lo soportará.

16

    Lleno de savia luce° ante el sol,

Y por encima de su huerto brota su 

renuevo,

17

    Aunque sus raíces están 

entrelazadas sobre un montón de 

piedras,

Y se asoman entre los pedregales,

18

    Si se le arranca de su lugar,

Éste lo negará diciendo: ¡Nunca te 

he visto!

19

    He aquí, éste es el gozo de su camino,

Y del polvo brotarán otros.

20

    Mira que Dios no rechaza 

al íntegro,

Ni sostiene la mano de los malvados.

21

    Aún llenará de risa tu boca,

Y tus labios prorrumpirán en gritos 

de júbilo.

22

    Los que te aborrecen serán vestidos 

de vergüenza,

Y la tienda de los impíos 

desaparecerá.°

Justicia de Dios - Aflicción del justo

9

Entonces Job respondió diciendo:

2

    Ciertamente yo sé que es así,

Pero, ¿cómo puede un hombre tener 

razón° ante Dios?

3

    Aunque pretenda disputar con Él,

No le podría responder una entre 

mil razones.

4

    Él es sabio de corazón y poderoso en 

fortaleza.

¿Quién se endureció contra Él y 

salió ileso?°

5

    Arranca los montes con su furor,

Y no se sabe quién los trastorna.

6

    Sacude la tierra de su lugar,

Y hace temblar sus columnas.

7

    Manda al sol, y no sale,

Y pone sello a las estrellas.

8

    Él solo extendió los cielos,

Y anda sobre las olas del mar.

9

    Hacedor de la Osa y del Orión,

De las Pléyades y las recónditas° 

cámaras del mediodía.

10

    Hacedor de cosas grandiosas e 

inescrutables,

Y de maravillas sin número.

11

    He aquí pasa junto a mí, y no lo 

percibo,

Se desliza, pero no lo advierto.

12

    He aquí Él arrebata, ¿y quién se lo 

impedirá?

¿Quién le dirá: ¿Qué haces?

13

    Dios no reprime su ira:

Debajo de Él se abaten los secuaces 

de los soberbios.

14

    ¿Cuánto menos podría replicarle yo,

Rebuscando palabras frente a Él?

15

    A quien yo, por recto que fuera, no 

osaría responder,

Antes bien, imploraría la clemencia 

de mi Juez.

16

    Si lo invoco, y Él me responde.

No podría creer que me está oyendo,

17

    Porque me ha quebrantado con un 

torbellino,

8.16 Esto es, el impío.  8.22 Lit. nada de ella.  9.2 Lit. ser justo.  9.4 Lit. quedó en paz.  9.9 .recónditas.


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Job 9:18

528

Y multiplica mis heridas sin causa.

18

    No me deja recobrar aliento,

Sino que me harta de amarguras.

19

    Si apelo a la fuerza, ¡ciertamente Él 

es más fuerte!

Y si a la justicia, ¿quién me fijará el 

tiempo?°

20

    Si me tengo por justo, mi boca me 

condenará,

Aunque sea íntegro,° ella me 

declarará perverso.

21

    Pero, ¿soy íntegro? ¡Ni yo mismo me 

conozco!°

¡Desprecio mi vida!

22

    Todo es una misma cosa,

Por eso digo que Él destruye al 

inocente y al malvado.

23

    Si el azote destruye de repente,

Él se burla de la desesperación del 

inocente.

24

    La tierra es entregada en mano del 

impío,

Él cubre los rostros de sus jueces.°

Si no,° ¿quién es entonces?

25

    Mis días han sido más veloces que 

un corredor,

Volaron sin ver cosa buena,

26

    Se deslizaron como canoas de junco,

Como águila que se lanza sobre la 

presa.

27

    Si digo: Olvidaré mis quejas,

Mudaré mi semblante y me alegraré,

28

    Entonces me turban todos mis 

dolores.

Sé que no me tendrás por inocente,

29

    Y que seré declarado culpable.

¿Para qué entonces fatigarme en 

vano?

30

    Aunque me lave con agua de nieve,

Y limpie mis manos con lejía,

31

    Aun así me hundirás en el lodo 

cenagoso,

Y mis propias vestiduras me 

aborrecerán.

32

    Porque no es hombre como yo para 

que le responda,

Y vayamos juntos a juicio.

33

    Si hubiera un mediador entre 

nosotros,

Que pusiera su mano entrambos,

34

    Entonces Él apartaría de sobre mí 

su vara,

Y su terror no me espantaría,

35

    Hablaría, y no le temería.

Pero no es esa mi situación.°

10

¡Mi alma está hastiada de mi vida!

Daré rienda suelta a mis quejas.

Hablaré en la amargura de mi alma.

2

    Diré a Dios: ¡No me condenes!

¡Hazme saber por qué contiendes 

conmigo!

3

    ¿Es justo para ti oprimir,

Desechar la obra de tus manos,

Y favorecer el designio de los malos?

4

    ¿Acaso tienes ojos de carne,

Y miras como mira el hombre?

5

    ¿Son tus días como los días del 

hombre,

O tus años como los años del 

hombre,

6

    Para que indagues mi iniquidad,

E inquieras por mi pecado,

7

    A sabiendas de que no soy culpable,

Y que no hay quien libre de tu 

mano?

8

    Tus manos me hicieron y me dieron 

forma,

¿Y aún así quieres aniquilarme?

9

    Recuerda, te ruego, que del barro 

me moldeaste,

¿Y al polvo me harás volver?

10

    ¿Acaso no me vertiste como leche,

Y me cuajaste como queso?

11

    De piel y de carne me vestiste,

Con huesos y tendones me tejiste,

12

    Me otorgaste° vida y misericordia,

Y tu Providencia preserva mi 

espíritu.

13

    Y aun así, tenías estas cosas° ocultas 

en tu corazón,

Yo sé que las tenías presentes.

14

    Si peco, Tú me observas,

Y no me absolverás de mi pecado.

15

    Si soy malo, ¡ay de mí!

Y si soy justo, no me atrevo a 

levantar mi cabeza.

¡Harto estoy de la ignominia,

Y de ver mi aflicción!

9.19 Esto es, el tiempo de mi defensa.  9.20 Es decir, inocente.  9.21 Lit. no conozco mi alma.  9.24 Esto es, los jueces de la 

tierra

9.24 Es decir, si no es Él.  9.35 Lit. pero no así yo conmigo.  10.12 Lit. hiciste conmigo.  10.13 Esto es, los padecimientos 

de Job


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Job 12:2

529

16

    Si mi cabeza se yergue, me das caza 

cual león,

Y vuelves a mostrar tus proezas 

en mí.

17

    Renuevas tus testigos contra mí,

Y aumentas contra mí tu 

indignación como tropas de 

relevo.

18

    ¿Por qué entonces me sacaste de la 

matriz?

¡Hubiera yo expirado sin que ningún 

ojo me viera!

19

    Sería como si nunca hubiera 

existido,

Llevado del vientre a la sepultura.

20

    ¿No son pocos mis días?

Cesa pues, y apártate de mí, para que 

pueda consolarme un poco,

21

    Antes que me vaya para nunca más 

volver,

A la región tenebrosa de la muerte,

22

    Tierra de oscuridad lóbrega,

Lugar de sombra de muerte, sin 

orden alguno,

Cuya luz es como las mismas 

tinieblas.

Acusación de Sofar

11

A lo que Sofar naamatita respondió 

diciendo:

2

    ¿Quedarán sin respuesta las muchas 

palabras,

Para que el que mucho habla sea 

justificado?

3

    ¿Harán callar a los hombres tus 

jactancias?

¿Harás escarnio sin que nadie te 

avergüence?

4

    Pues has dicho: Mi enseñanza es 

pura,

Y: Soy limpio ante tus ojos.

5

    Pero, quién diera que Dios hablara,

Y abriera su boca para contigo,

6

    Y te declarara secretos de sabiduría,

Que van mucho más allá de tus 

argucias,

Porque Dios te castiga menos de lo 

que mereces.

7

    ¿Descubrirás tú las profundidades 

de Dios?

¿Conocerás el propósito de 

’El-Shadday?

8

    Es más alto que los cielos, ¿qué 

puedes tú hacer?

Es más profundo que el Seol, ¿qué 

puedes tú saber?

9

    Su medida es más extensa que la 

tierra,

Y más ancha que la mar.

10

    Si Él acomete, o mete en prisiones,

O llamara a juicio, ¿quién se le 

opondrá?

11

    Porque Él conoce a los hombres 

vanos,

Ve también su iniquidad, ¿y no lo 

considerará?

12

    El hombre vano° cobrará sentido,

Cuando el asno salvaje nazca 

humano.

13

    Si tú dispusieras tu corazón,

Y extendieras a Él tus manos,

14

    Y ahuyentaras la iniquidad que se 

posa en tus manos,

Y no permitieras que la maldad 

habite en tus moradas,

15

    Entonces podrías alzar un rostro sin 

mancilla,

Estarías firme y nada temerías,

16

    Porque habrías olvidado tu aflicción,

Y la recordarías como aguas que 

pasaron.

17

    Tu existencia sería más clara que el 

mediodía,

Y aunque hubiera oscuridad, sería 

como la alborada,

18

    Y estarías confiado, porque habría 

esperanza.

Sí, mirarías en derredor y 

descansarías tranquilo,

19

    Reposarías, sin que nadie te 

espantara,

Y muchos implorarían tu favor.°

20

    Pero los ojos de los malvados se 

consumirán,

Porque no les queda escape:

Su esperanza es entregar el alma.°

Job responde a Sofar

12

Respondió Job, y dijo:

2

    No hay duda que vosotros sois la 

nobleza,

11.12 Lit. hueco, es decir, de cabeza hueca.  11.19 Lit. tu rostro.  11.20 Lit. el expirar del alma.


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Job 12:3

530

Y con vosotros se termina° la 

sabiduría.

3

    Pero yo tengo tanto entendimiento 

como vosotros,

No soy menos que vosotros.

Sí, ¿quién no sabe tales cosas?

4

    Yo: objeto de risa para su amigo,

¡El que clamaba a Dios y le 

respondía!

¡El justo y el perfecto, ha venido a 

ser bufón!

5

    Pues desprecia el infortunio quien 

está en holgura,

Y recibe zancadilla aquel cuyo pie 

resbala.

6

    Prosperan las moradas de los 

ladrones,

Y los que provocan a Dios están 

seguros,

Como si todo lo hubiera puesto Él 

en sus manos.

7

    Y si no, pregunta ahora a las bestias, 

y ellas te enseñarán,

O a las aves de los cielos, y ellas te 

mostrarán,

8

    O habla a la tierra, para que te 

instruya,

Y te lo declaren los peces del mar.

9

    ¿Quién de ellos no sabe que la mano 

de YHVH ha hecho esto,

10

    En cuya mano está el alma de todo 

viviente,

Y el hálito de toda la humanidad?

11

    ¿No discierne el oído las palabras

Como el paladar prueba su comida?

12

    ¿Está la sabiduría con los ancianos,

O con la largura de días el 

entendimiento?

13

    ¡Es con Él que están la sabiduría y 

el poder!

¡Suyos son el consejo y la 

inteligencia!

14

    He aquí, si Él derriba, nadie puede 

reedificar,

Si Él encierra al hombre, no hay 

quien le abra.

15

    He aquí, Él retiene las aguas y se 

secan,

Y si las suelta, devastan la tierra.

16

    Con Él están la fortaleza y la 

profunda sabiduría,

Suyos son el que yerra y el que hace 

errar.

17

    Hace vagar descalzos° a los 

consejeros,

Y entontece a los jueces.

18

    Suelta las ataduras que imponen los 

reyes,

Y ata con soga sus lomos.

19

    Hace vagar descalzos a los 

sacerdotes,

Y derriba a los poderosos.

20

    Priva del habla° a los hombres de 

confianza,

Y del discernimiento a los ancianos.

21

    Vierte desprecio sobre los príncipes,

Y afloja el cinto de los fuertes.

22

    Descubre las profundidades de las 

tinieblas,

Y saca a la luz la sombra de la 

muerte.

23

    Engrandece las naciones, y las 

destruye,

Ensancha los pueblos, y los 

abandona.

24

    Priva de discreción° a los caudillos 

de los pueblos de la tierra,

Y los hace deambular por un 

desierto sin camino.

25

    Van a tientas, sin luz en las tinieblas,

Y los hace tambalearse como ebrios.

Job defiende su integridad

13

Ciertamente mis ojos han visto 

  todo esto,

Mis oídos lo han escuchado y 

entendido.

2

    Como vosotros lo sabéis, yo también 

lo sé,

En nada soy menos que vosotros.

3

    Pero en verdad, a quien yo me dirijo 

es a ’El-Shadday,

Porque quiero disputar con Dios,

4

    Mientras vosotros ensuciáis con 

falsedades.

¡Médicos inútiles sois todos 

vosotros!

5

    ¡Quién diera que callarais de 

una vez!

Os sería contado por sabiduría.

6

    Oíd ahora mi razonamiento,

Y atended los alegatos de mi boca:

12.2 Lit. muere.  12.17 Es decir, faltos de consejo.  12.20 Lit. Silencia el labio.  12.24 Lit. corazón.


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Job 14:11

531

7

    ¿Diréis falsedades a favor de Dios?

¿Hablaréis engaño en beneficio 

suyo?

8

    ¿Mostraréis parcialidad a su favor?

¿Contenderéis vosotros por Dios?

9

    ¿Os irá bien cuando Él os escudriñe?

O como quien se burla del mortal, 

¿podréis burlaros de Él?

10

    De seguro os reprenderá,

Si secretamente sois parciales aun 

en favor suyo.

11

    ¿No os aterrorizará acaso su 

majestad,

Cuando caiga sobre vosotros el 

terror divino?

12

    Vuestros dichos memorables 

vendrán a ser refranes de ceniza,

Y vuestros baluartes, baluartes de 

barro.

13

    Callad, para que yo pueda hablar,

¡Y que me sobrevenga lo que sea!

14

    ¡Yo tomo mi carne entre mis 

dientes,

Y pongo mi vida en las palmas de 

mis manos!

15

    Aunque me mate, en Él esperaré,

Con tal de defenderme ante Él,

16

    Lo cual me será por salvación,

Porque el impío no comparece en su 

presencia.

17

    Escuchad atentamente mis palabras,

Penetre mi discurso en vuestros 

oídos:

18

    He aquí, he preparado mi defensa,°

Y sé que soy inocente.

19

    ¿Quiere alguno contender conmigo?

Porque si ahora callara, expiraría.

20

    Sólo dos cosas haz° conmigo,

Y no me esconderé de tu presencia:

21

    Aparta de sobre mí tu mano,

Y no me espanten tus terrores.

22

    Después acúsame, y yo responderé,

O déjame hablar, y Tú me 

responderás.

23

    ¿Cuántos son mis pecados y mis 

culpas?

¡Demuéstrame mis transgresiones y 

pecados!

24

    ¿Por qué ocultas tu rostro

Y me tienes por enemigo tuyo?

25

    ¿Por qué atemorizas a una hoja 

volandera,

Y persigues a una paja seca,

26

    Apuntando contra mí cosas 

amargas,

E imputándome° las culpas de mi 

mocedad?

27

    Pones mis pies en el cepo,

Vigilas mis pasos,

Examinas mis huellas,

28

    Y él,° como cosa podrida, se 

deshace,

Cual vestido raído de polilla.

La brevedad de la vida

14

El hombre, el nacido de mujer, 

Corto de días y hastiado de 

sinsabores.

2

    Brota como una flor, pero es 

cortado,

Pasa como una sombra, y 

desaparece.

3

    ¿Y sobre éste abres tus ojos,

Y me traes a juicio contigo?

4

    ¿Quién hará limpio lo inmundo?

¡Nadie!

5

    Si sus días pues están determinados,

Y el número de sus meses depende 

de ti,

Si le fijaste sus límites, y no los 

puede traspasar,

6

    ¡Aparta entonces de él tu mirada y 

déjalo que descanse,

Hasta que como jornalero complete 

su día!

7

    Porque hasta para el árbol hay 

esperanza:

Si es cortado, retoñará de nuevo,

Y sus renuevos no cesarán,

8

    Aunque en el suelo haya muerto su 

tronco,

Y en la tierra envejezca su raíz,

9

    Con la fragancia del agua 

reverdecerá,

Y como planta joven volverá a echar 

hojas.

10

    Pero el hombre° muere, y yace 

inerte.

Expira el hombre, ¿y adónde va?

11

    Como las aguas se van del mar

13.18 Lit. un juicio.  13.20 Lit. no hagas.  13.26 Lit. heredar.  13.28 Es decir, ése a quien Tú persigues. El TM registra un cambio 

súbito de 1ª a 3ª persona. 

14.10 Heb. Guéber. Varón apto para la guerra. 


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Job 14:12

532

Y el río se agota y se seca,

12

    Así el hombre yace y no se levantará,

Hasta que no haya cielos, no serán 

despertados,

Ni serán levantados de su sueño.

13

    ¡Oh si me guardaras escondido en 

el Seol

Mientras se aplaca tu ira,

Y fijaras un plazo para acordarte 

de mí!

14

    Si un varón muere ¿revivirá?°

Todos los días de mi servicio 

esperaría.

Hasta la llegada de mi relevo.

15

    Añorarías la hechura de tus manos,

Me llamarías, y yo te respondería.

16

    Entonces contarías mis pasos,

Y darías tregua a mi pecado.

17

    Mis transgresiones estarían selladas 

en un saco,

Acumuladas° con mis iniquidades.

18

    Pero como el monte que cae se 

desmorona,

Y las piedras cambian de lugar,

19

    Y las aguas desgastan los guijarros,

Y arrastran el polvo del terreno,

Así destruyes la esperanza del 

mortal.°

20

    Prevaleces para siempre, y él se va.

Le cambias su semblante, y lo 

despides.

21

    Si sus hijos alcanzan honores, no se 

entera,

Y si son humillados, no lo advierte.

22

    Sólo siente el tormento de su carne,

Sólo siente la amargura de su alma.

Segundo discurso de Elifaz

15

Respondió Elifaz temanita, y dijo:

2

    ¿Responderá el sabio con doctrina 

vana,°

Llenando su vientre de viento 

solano?

3

    ¿Argüirá con palabras inútiles,

O con vocablos sin provecho?

4

    Tú destruyes aun la reverencia,°

Y estorbas la oración delante 

de Dios,

5

    Porque tu iniquidad instiga° tu 

boca,

Y adoptas la lengua del taimado.

6

    Tu propia boca te condena, no 

la mía.

Sí, tus propios labios testifican 

contra ti.

7

    ¿Eres tú el primer hombre que 

nació?

¿Te engendraron antes que a los 

montes?

8

    ¿Has escuchado el consejo secreto 

de Dios,

Y acaparas para ti solo la sabiduría?

9

    ¿Qué sabes que nosotros no 

sepamos?

¿Qué entiendes, que nosotros no 

entendamos?

10

    Con nosotros están las cabezas 

canas y los hombres muy 

ancianos,

Más grandes que tu padre en días.

11

    ¿En tan poco tienes los consuelos 

de Dios

Y las palabras que con dulzura se te 

brindan?

12

    ¿Por qué tu corazón te arrastra,

Y por qué centellean° tus ojos?

13

    ¿Por qué vuelves contra Dios tu 

espíritu,

Y dejas salir tales palabras de tu 

boca?

14

    ¿Qué es el hombre para que sea 

puro,

Y el nacido de mujer, para que sea 

justo?

15

    He aquí, en sus santos no confía,

Y ante sus ojos ni aun los cielos son 

puros.

16

    ¡Cuánto menos este ser detestable y 

corrompido,

Que bebe la iniquidad como agua!

17

    Voy a explicarte, óyeme,

Y lo que he visto te referiré,

18

    Lo que los sabios han dado a conocer,

Sin ocultar lo recibido de sus padres

19

    (A ellos solos fue dada la tierra,

Y ningún extranjero transitó entre 

ellos):

14.14 Esta frase debería leerse al final del v. 19.  14.17 Lit. apegas (o encolasencima de mi iniquidad (hasta formar un montón 

bien compacto). 

14.19 Heb. enosh = ser humano en su condición de mortal.  15.2 Lit. de aire.  15.4 Lit. el temor.  15.5 Lit. enseña

15.12 Heb. yirzemún = guiñan, parpadean. La raíz razam no ocurre en ningún otro lugar del TM, pero expresa magníficamente 

los accesos de cólera reprimida en un rapidísimo parpadeo de uno o ambos ojos 

→v. 13.


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Job 16:14

533

20

    Todos sus días sufre tormento el 

malvado,

Y contados años le están reservados 

al tirano.

21

    Voces espantosas suenan en su oído,

En plena prosperidad° lo acomete el 

destructor.

22

    Sabe que no volverá de las tinieblas,

Porque la espada lo espera.

23

    Vaga en busca del pan, diciendo: 

¿Dónde está?

Sabe que el día de las tinieblas está 

cerca.°

24

    La aflicción y la angustia lo 

dominan,

Prevalecen contra él como rey 

presto a la batalla.

25

    Por cuanto extendió su mano contra 

Dios,

Contra ’El-Shadday se comportó con 

soberbia,

26

    Y embistió contra Él con erguida 

cerviz,

Con el grueso relieve de su escudo,

27

    Recubierto su rostro de grosura,

Crecidos de grasa los pliegues de sus 

lomos.

28

    Habitará en ciudades destruidas,

En casas inhabitadas, a punto de ser 

ruinas.

29

    No será rico, no se sostendrá su 

hacienda,

Ni se extenderán sus posesiones.

30

    No escapará de las tinieblas,

La llama consumirá sus renuevos,

Y por el aliento de su° boca 

perecerá.

31

    Que no confíe en la vanidad, 

engañándose a sí mismo,

Porque la vanidad será su 

recompensa.

32

    Antes de su tiempo se marchitará,

Y su ramaje no será frondoso.

33

    Será vid que daña su agraz,

Olivo que sacude sus flores.

34

    La congregación del impío será 

estéril,

Y el fuego devorará las tiendas del 

soborno.

35

    Concibieron malicia, paren iniquidad,

Y en sus entrañas° se nutre el 

engaño.

Job responde a Elifaz y sus amigos

16

Job respondió y dijo:

2

    He oído muchas cosas como éstas.

Tristes consoladores me sois todos 

vosotros.

3

    ¿Habrá fin para las palabras huecas?

¿Qué te hace responder así?

4

    Yo también podría hablar como 

vosotros,

Si vuestra alma estuviera en lugar de 

la mía,

Podría hilvanar vocablos contra 

vosotros,

Y menear la cabeza contra vosotros.

5

    Pero, os alentaría con mi boca,

Y el movimiento de mis labios 

calmaría vuestras penas.

6

    Aunque hablo, no se calma mi dolor,

Y si me abstengo, ¿se aleja de mí?

7

    Ahora precisamente me ha agotado.°

Has desolado a toda mi familia,

8

    Y a mí me llenaste de arrugas,

Que testifican en mi contra,

Mi flacura se levanta contra mí,

Y ante mi propio rostro responde.

9

    Su ira me desgarra y me hostiga,

Rechina sus dientes contra mí,

Aguza contra mí ojos de enemigo.

10

    Abren sus bocas contra mí,

Hirieron mis mejillas con afrenta,

A una se han juntado contra mí.

11

    Dios me ha entregado a los impíos,

Y arrojado en manos del malvado.

12

    Tranquilo estaba yo, y Él me 

quebrantó,

Sí, me agarró por la cerviz y me hizo 

trizas,

Y me ha puesto por blanco de sus 

dardos.

13

    Sus arqueros me hostigan en 

derredor,

Y atraviesa mis riñones sin piedad.

Derrama mi hiel por tierra,

14

    Abre en mí brecha tras brecha,

Y arremete contra mí como un 

gigante.

15.21 Lit. en la paz.  15.23 Lit. está listo a su mano.  15.30 Esto es, la boca de Dios.  15.35 Lit. su vientre.  16.7 Puede que se 

refiera al dolor o a Dios.


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Job 16:15

534

15

    He cosido un sayal° sobre mi piel,

Y he echado mi dignidad° en el polvo.

16

    Mi rostro está enrojecido de tanto 

llorar,

Y sobre mis párpados se afirma la 

sombra de la muerte,

17

    Aunque no hubo violencia en mis 

manos,

Y fue pura mi oración.

18

    ¡Oh tierra, no encubras mi sangre,

Ni haya lugar de reposo para mi 

clamor!

19

    He aquí, ahora mismo mi testigo 

está en los cielos,

Y el que atestigua a mi favor en las 

alturas.

20

    Mis íntimos pensamientos son mis 

intercesores,

Mis ojos derraman lágrimas a Dios.

21

    ¡Oh si alguien pudiera llevar la causa 

del hombre ante Dios,

Como un hombre lo hace a favor de 

su amigo!

22

    Ciertamente son contados los años 

venideros,

E iré por el camino de donde no se 

regresa.

17

Mi espíritu está consumido, 

  mis días, extinguidos,

Hay sepulcros preparados para mí.

2

    No hay sino escarnecedores 

conmigo,

Y mis ojos tienen que soportar su 

provocación.

3

    Deposita, te ruego, mi fianza junto 

a ti.

¿Quién si no ha de estrechar mi 

mano?°

4

    Has privado su corazón de 

entendimiento,

Por tanto, no los exaltarás.

5

    Desfallecerán los ojos de los hijos

Del que por lisonjas traiciona a sus 

amigos.

6

    Se me ha puesto por refrán del 

pueblo,

Sí, he venido a ser uno a quien le 

escupen en la cara.

7

    Mis ojos están oscurecidos por la 

tristeza,

Y todos mis miembros son como 

una sombra.

8

    Los rectos se asombran ante esto,

Y el inocente se agita contra el 

impío.

9

    Con todo, el justo se aferrará a su 

camino,

Y el limpio de manos se hará cada 

vez más fuerte.

10

    Pero ahora, ¡volveos y llegaos aquí!

De seguro no hallaré un sabio entre 

vosotros.

11

    Mis días han pasado, mis planes se 

han deshecho,

Aun los anhelos de mi corazón,

12

    Que solían mudar la noche en día, y 

me decían:° Tras la tiniebla está 

la luz.

13

    Pero aun si espero, yo sé que el Seol 

es mi morada:

En las tinieblas tengo extendido mi 

lecho.

14

    A la descomposición digo: 

¡Padre mío!

Y al gusano: ¡Madre mía, 

hermana mía!

15

    ¿Dónde está entonces mi 

esperanza?

¡Sí! mi esperanza, ¿quién la verá?

16

    Descenderá conmigo al Seol,

Y juntos nos hundiremos en el 

polvo.

Segundo discurso de Bildad

18

Volvió a intervenir Bildad sujita, y 

dijo:

2

    ¿Hasta cuándo tenderás lazo con 

palabras?

Recapacita, y después hablemos.

3

    ¿Por qué somos reputados como 

bestias,

Y menospreciados ante tus ojos?

4

    ¡Tú, que a ti mismo te desgarras en 

tu ira!

¿Deberá abandonarse la tierra por tu 

causa,

O removerse las peñas de su sitio?

5

    Ciertamente la luz de los impíos 

será apagada,

Y la chispa de su fuego no brillará.

16.15 Esto es, vestido de tela áspera para vestir en momentos de dolor y desesperación.  16.15 Lit. cuerno.  17.3 Es decir, 

¿quién se atrevería a ser mi fiador? 

17.12 .me decían.


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Job 19:17

535

6

    La luz de su tienda estará oscura,

Porque su lámpara será apagada.

7

    Los pasos de su vigor, acortados,

Y sus propios designios lo 

derribarán,

8

    Porque sus propios pies lo habrán 

echado en la red,

Y deambulará en la maraña.

9

    Un lazo lo prenderá por el calcañar,

Y una trampa se cerrará sobre su 

cabeza.°

10

    Un lazo está oculto en la tierra 

para él,

Y una trampa lo espera en el sendero.

11

    Espantos lo asaltan por doquier,

Y lo hostigan paso a paso.

12

    Su vigor se torna famélico,

Y la calamidad está presta para su 

caída.

13

    La enfermedad devorará su piel,

Y el primogénito de la muerte° sus 

miembros.

14

    Será removido de la seguridad de su 

tienda,

Y arrastrado hasta el rey de los 

espantos.°

15

    El fuego habitará en su tienda,

Y azufre ardiente será esparcido 

sobre su morada.

16

    Desde abajo se secarán sus raíces,

Y desde arriba se marchitará su 

ramaje.

17

    Su recuerdo desaparecerá de la 

tierra,

Y no tendrá ya nombre en ella.°

18

    De la luz será empujado a las 

tinieblas,

Y lo echarán fuera del orbe.

19

    No tendrá descendencia ni 

posteridad entre su pueblo,

Ni sobreviviente alguno en su 

peregrinaje.

20

    Los que vengan después° se 

asombrarán de su destino,°

Como se aterrorizaron los que se 

fueron antes.°

21

    Ciertamente así son las moradas del 

impío,

Y tal el lugar de quien ignora a Dios.

Esperanza de Job

19

Respondió Job, y dijo:

2

    ¿Hasta cuándo afligiréis mi alma

Y me aplastaréis con palabras?

3

    Con ellas me habéis reprochado ya 

diez veces.

¿No os avergonzáis de injuriarme?

4

    Aunque en verdad yo haya errado,

Sobre mí recaería la culpa.

5

    Pero si en realidad queréis 

engrandeceros sobre mí,

Y alegar contra mí mi oprobio,

6

    Sabed entonces que es Dios quien 

me ha trastornado,

Y me ha envuelto en sus redes.

7

    He aquí grito: ¡Violencia!

Y no se me responde,

Pido auxilio, pero no hay justicia.

8

    Él ha bloqueado mi camino para que 

no pase,

Ha llenado de tinieblas mi sendero.

9

    Me despojó de mi honor,

Y ha quitado la corona de mi cabeza.

10

    Me quebranta por todos lados, y 

perezco,

Y ha arrancado mi esperanza como 

un árbol.

11

    Su ira se encendió contra mí,

Y me considera entre sus enemigos.

12

    Convoca a sus tropas,

Se atrincheran contra mí,

Y acampan cercando mi tienda.

13

    Hizo que mis hermanos se alejaran 

de mí,

Mis conocidos se han hecho del todo 

esquivos,

14

    Me han faltado mis parientes,

Y mis amigos íntimos se han 

olvidado de mí.

15

    Mis criadas me tienen por extraño,

Cual extranjero soy ante sus ojos.

16

    Doy voces a mi siervo, y no me 

responde,

Con mi propia boca tengo que 

rogarle.

17

    Mi aliento es repugnante para mi 

mujer,

Y apesto ante mis propios hermanos.°

18.9 Lit. sobre él.  18.13 Prob. se refiere a la peste.  18.14 Esto es, la Muerte.  18.17 Lit. sobre la faz de la región.  18.20 Lit los 

del occidente

18.20 Lit. su día. Prob. 

→Is.14.16-17.  18.20 Lit. los del oriente.  19.17 Heb. beney bitní = hijos de mi vientre

Es decir, los hijos del vientre de mi madre


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Job 19:18

536

18

    Hasta los muchachos me desprecian,

Y me insultan apenas me levanto.

19

    Todos los hombres de mi consejo me 

aborrecen,

Y aquellos a quienes amo se vuelven 

contra mí.

20

    Mi piel y mi carne se pegan a mis 

huesos,

Y he escapado tan solo con la piel de 

mis dientes.

21

    ¡Piedad, piedad de mí, amigos míos,

Que la mano de Dios me está 

golpeando!

22

    ¿Por qué como Dios me perseguís,

Y no os hartáis de escarnecerme?

23

    ¡Quién diera que mis palabras 

fueran escritas!

¡Quién diera que fueran escritas en 

un rollo!

24

    ¡Que con cincel de hierro y plomo,

Fueran para siempre esculpidas en 

la roca!

25

    Yo sé que mi Redentor vive,

Y al fin se levantará° sobre el polvo,

26

    Y después de deshecha esta mi piel,

En mi carne he de ver a Dios,

27

    Al cual veré por mí mismo,

Y mis ojos lo verán, y no otros.

Mis riñones desfallecen dentro 

de mí.°

28

    Porque si la raíz de mi situación está 

en mí mismo,

Entonces, ¿por qué decís: 

Persigámoslo?

29

    ¡Temed ante la espada!

Porque la ira de la espada viene a 

causa de la injusticia,

Para que sepáis que hay un juicio.

Sofar: La suerte del impío

20

Respondió entonces Sofar 

naamatita, y dijo:

2

    En verdad mis pensamientos 

impulsan mi réplica,

A causa de la agitación que hay en mí.

3

    He oído una reprensión que me 

afrenta,

Y el espíritu de mi entendimiento 

hace que responda.

4

    ¿No sabes acaso desde la antigüedad,

Desde que el hombre fue puesto en 

la tierra,

5

    Que el triunfo de los malvados es 

efímero,

Y que la alegría del profano dura un 

instante?

6

    Aunque su altivez suba hasta los 

cielos,

Y su cabeza toque las nubes,

7

    Como sus mismas heces, perecerá 

para siempre.

Quienes lo veían se preguntarán: 

¿Dónde está?

8

    Se esfumará como un sueño, y no 

será hallado,

Se disipará como visión nocturna,

9

    El ojo que lo miraba, no lo verá más,

Ni su lugar volverá a contemplarlo.

10

    Tendrá que devolver sus riquezas 

mal habidas,

Y sus hijos mendigarán como 

indigentes.

11

    Sus huesos se acostarán con él en el 

polvo

Llenos aún de vigor juvenil,

12

    Y aunque la maldad haya sido dulce 

en su boca,

Y la haya ocultado debajo de su 

lengua,

13

    Y retenida, no la haya querido soltar,

Y la mantenga en su boca,

14

    Su manjar se descompondrá en sus 

entrañas,

Por la hiel de áspides en sus 

intestinos.

15

    Devoró riquezas, pero las vomitará,

Porque Dios se las sacará del vientre.

16

    Chupará el veneno del áspid,

Y lo matará la lengua de la víbora.

17

    No verá los arroyos que fluyen,

Los torrentes que fluyen leche y miel.

18

    Devolverá el fruto de su labor sin 

haberlo tragado,

Y no disfrutará el lucro de su comercio,

19

    Por cuanto oprimió y desamparó al 

pobre,

Y se apoderó de casas que no 

construyó.

20

    Porque su vientre no conoció el 

sosiego,°

19.25 Esto es, en mi defensa 

→Dt.19.15.  19.27 Esto es, hasta que sus ojos vean al Redentor.  20.20 Es decir, su codicia era 

insaciable.


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Job 21:21

537

Nada retendrá de lo que más 

codiciaba.

21

    Por cuanto nadie escapó a su 

rapacidad,

Su prosperidad no será duradera.

22

    En la plenitud de su opulencia, 

sufrirá estrechez,

Y lo alcanzará todo golpe del 

infortunio.

23

    Cuando se disponga a llenar su 

vientre,

Dios enviará sobre él el furor de 

su ira,

Y la hará llover sobre él mientras 

come.

24

    Si huye del arma de hierro,

Lo traspasará una saeta de bronce,

25

    Si logra arrancarse la saeta que le 

sale por la espalda,

¡He aquí, la punta reluciente 

procede de su hiel!

Y sobre él se abatirá el pavor.°

26

    Las más densas tinieblas están 

reservadas para sus tesoros,

Un fuego no atizado por el hombre° 

lo devorará,

Y consumirá el remanente en su 

tienda.

27

    Los cielos revelarán su iniquidad,

La tierra misma se alzará contra él,

28

    Una inundación arrastrará su casa,

Aguas derramadas en el día del furor 

divino.

29

    Tal es la porción de Dios para el 

hombre impío,

Y la herencia que Dios le destina.

La prosperidad de los impíos

21

Pero Job respondió diciendo:

2

    Escuchad atentamente mis palabras,

Y que os sirvan de consuelo.

3

    Toleradme mientras hablo,

Y después que haya hablado, podrás 

burlarte.°

4

    ¿Son acaso mis quejas ante el 

hombre?

¿Se impacienta mi espíritu sin 

razón?

5

    Miradme, que de puro asombro,

Os llevaréis la mano a vuestra boca.

6

    Cuando lo recuerdo, quedo 

consternado,

Y el horror se apodera de mi carne.

7

    ¿Por qué siguen vivos los impíos,

Y envejecen, y acrecientan su poder?

8

    Su simiente es afianzada, con ellos y 

ante ellos:

Ahí están sus vástagos ante sus ojos,

9

    Sus casas están seguras, sin 

temores,

Y la vara de Dios no los azota.

10

    Su toro fecunda sin fallar,

Su vaca pare, y no aborta.

11

    Sueltan a sus pequeños cual rebaño,

Y sus hijos andan brincando,

12

    Cantan al son de cítaras y panderos,

Y se regocijan con el tono de la 

flauta.

13

    Sus días transcurren en prosperidad,

Y bajan serenamente al sepulcro.

14

    Sin embargo, han dicho a Dios:

¡Apártate de nosotros, que no nos 

interesa el conocimiento de tus 

caminos!

15

    ¿Quién es ’El-Shadday para que le 

sirvamos,

Y qué nos aprovecha el suplicarle?

16

    ¿No está en sus propias manos su 

bienestar,

Aunque el plan de los malvados esté 

lejos de Él?

17

    Porque, ¿cuántas veces es apagada la 

lámpara de los impíos,

O se abate sobre ellos su quebranto,

O les reparte sufrimientos en 

 su ira?

18

    ¿Son acaso como paja al viento,

O como tamo que arrebata el 

torbellino?

19

    ¿Reservará Dios el castigo para los 

hijos de ellos?

¡Déselo a él mismo para que 

aprenda!

20

    ¡Vean sus propios ojos su ruina,

y beba él mismo de la ira de 

’El-Shadday!

21

   Pues, ¿qué le importará su familia 

una vez muerto,

Y acabada la cuenta de sus meses?

20.25 Es decir, le sobreviene el presentimiento de la muerte.  20.26 .por el hombre. (A causa de la voz pasiva).  21.3 Esto es, 

Sofar 

→20.1.


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Job 21:22

538

22

    Pero, ¿puede alguno aleccionar a 

Dios?

Él es quien juzga a los 

encumbrados.

23

    Uno muere en la plenitud de su 

vigor,

Enteramente tranquilo y confiado,

24

    Con los ijares llenos de grosura,

Y su médula bien nutrida.

25

    Mientras otro muere con el alma 

amarga,

Sin haber comido cosa buena.

26

    Ambos yacen en el polvo,

Y los gusanos los cubren por igual.

27

    Yo conozco vuestros pensamientos,

Y vuestros planes violentos 

contra mí.

28

    Sé que decís: ¿Dónde está la casa del 

que era poderoso,

Y la tienda en que habitaban los 

impíos?

29

    ¿Por qué no lo preguntáis a los 

viajeros,

Por cuya respuesta no podréis negar,

30

    Que el malo es preservado en el día 

del infortunio,

Y que del día de la ira se lo excluye?°

31

    Y ¿quién le echa en cara su 

conducta?°

Y lo que ha hecho, ¿quién se lo 

retribuye?

32

    Porque es conducido al sepulcro,

Y dulces le son los terrones del valle,

33

    Y junto al mausoleo se le monta 

guardia.°

Así, después de él, todo el mundo 

desfila,

Y antes que él, otros sinnúmero.

34

    ¡Cuán inútil es el consuelo que me 

dais!

De vuestras respuestas sólo queda el 

engaño.

Nueva acusación de Elifaz

22

Elifaz  temanita  habló  otra  vez  y 

dijo:

2

    ¿Puede alguien ser provechoso a 

Dios?

¿Puede un sabio serle útil?

3

    ¿Qué saca ’El-Shadday con que tú 

seas justo?

¿Qué gana Él si tus caminos son 

rectos?

4

    Pero, ¿te reprocha acaso por tu 

reverencia,°

O te lleva a juicio a causa de tu 

piedad?

5

    ¿No es más bien por tu gran 

impiedad,

Y por tus iniquidades, que no tienen 

fin?

6

    Exigías sin razón prendas a tu 

prójimo,

Despojabas de sus ropas al desnudo,

7

    No diste agua de beber al sediento,

Y negaste el pan al hambriento.

8

    Como hombre poderoso,° dueño del 

terruño,

Y como enaltecido que habitaba 

en él,

9

    Despedías a las viudas con las manos 

vacías,

Y así, los brazos de los huérfanos 

fueron quebrantados.

10

    Por eso hay lazos en derredor tuyo,

Y te espantan terrores repentinos,

11

    Y tinieblas, que no te dejan ver,

Y te anega una inundación de aguas.

12

    ¿No está Dios en la altura de los 

cielos?

¡Mira cuán altas están las estrellas!

13

    Y dijiste: ¿Qué sabe Dios?

¿Podrá distinguir a través del 

nubarrón?

14

    Las espesas nubes lo tapan y no lo 

dejan ver,

Mientras Él pasea por la bóveda° 

celeste.

15

    ¿Seguirás la senda antigua,

Que hollaron los hombres perversos,

16

    Arrastrados antes del tiempo,

Cuyos cimientos fueron arrasados 

por un río?

17

    Los que decían a Dios:

¡Apártate de nosotros!

¿Qué puede hacernos ’El-Shadday?

18

    Aunque había llenado sus moradas 

de bienes,

21.30 NQue el malo es preservado para el día del infortunio y ellos serán conducidos en el día de la ira. Pero no es posible si 

se es consecuente con vv. 7-18. 

21.31 Lit. ¿quién se lo paga?  21.33 Es decir, se le rinden honores póstumos.  22.4 Lit. temor

Es decir, temor de Dios

22.8 Lit. de brazo.  22.14 Lit. el círculo.


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Job 24:2

539

Y los malos hacían sus planes sin 

contar con Él.

19

    Pero los justos vieron esto y se 

alegraron,

Los inocentes se rieron de ellos, 

diciendo:

20

    ¡En verdad nuestros adversarios 

fueron destruidos,

Y lo que queda de ellos lo devora el 

fuego!

21

    Reconcíliate y ten paz con Él,

Que ello te vendrá bien.

22

    Acepta la instrucción de su boca,

Y guarda sus dichos en tu corazón.

23

    Si te vuelves a ’El-Shadday, serás 

reedificado.

Si alejas de tus tiendas la injusticia,

24

    Y arrojas al polvo tu tesoro,

Y como piedras del arroyo el oro de 

Ofir,

25

    Entonces ’El-Shadday será tu oro,

Y plata preciosa para ti.

26

    Entonces te deleitarás en ’El-

Shadday,

Y alzarás tu rostro a Dios.

27

    Orarás a Él, y te escuchará,

Y tú podrás cumplir tus votos.

28

    Cuando decidas una cosa, te saldrá 

bien,

Y brillará la luz en tus caminos.

29

    Cuando otros° sean abatidos, dirás:

¡Hay quien levanta y salva al 

humilde de ojos!

30

    Librará aun al que no es inocente,

Quien escapará a causa de la 

limpieza de tus manos.

Réplica de Job

23

Respondió Job, y dijo:

2

    Aun hoy es amarga mi queja,

Pues mi llaga° agrava mis gemidos.

3

    ¡Quién me diera saber dónde 

hallarlo!

Yo iría hasta su trono,

4

    Expondría ante Él mi causa,

Llenaría mi boca de argumentos,

5

    Sabría con qué palabras me replica,

Y entendería qué me está diciendo.

6

    ¿Contendería conmigo haciendo 

gala de su fuerza?

No, sino que me prestaría atención.

7

    Allí el justo podría razonar con Él,

Y yo quedaría libre para siempre de 

mi Juez.

8

    Pero, si voy hacia el levante, no está 

allí,

Al poniente, y tampoco lo percibo.

9

    Si se manifiesta al norte, no lo 

diviso,

Y si se oculta en el sur, no lo veo.

10

    Pero ya que Él conoce el camino que 

yo sigo,°

Que me pruebe, y saldré como el 

oro.

11

    Mis pies han seguido fielmente sus 

huellas,°

He guardado su camino sin 

torcerme,

12

    No me aparté del mandato de su 

boca,

Y atesoré sus dichos más que mi 

porción señalada.°

13

    Pero Él ya tomó su decisión, ¿quién 

podrá disuadirlo?

Todo lo que quiere, eso hace,

14

    Y ejecutará lo que ha decretado 

para mí,

Y otras muchas cosas que hay en su 

mente.

15

    Por eso me aterroriza su presencia,°

Y de Él siento temor sólo al 

pensarlo,

16

    Porque Dios ha hecho desmayar mi 

corazón,

’El-Shadday me ha aterrorizado.

17

    ¡Ojalá me desvaneciera en las 

tinieblas,

Y cubriera mi rostro la oscuridad!

Impasibilidad ante la maldad

24

¿Por qué ’El-Shadday se reserva 

  sus sazones?

¿Por qué quienes lo conocen no 

pueden vislumbrar sus días?°

2

    Hay quienes traspasan linderos,

Quitan los rebaños con violencia y 

los devoran.

22.29 .otros.  23.2 Lit. mi mano.  23.10 Lit. el camino conmigo.  23.11 Lit. mi pie se adhirió a su paso.  23.12 Es decir, el ali-

mento necesario para subsistir

23.15 Es decir, la expectativa de su presencia.  24.1 Es decir, ¿Por qué sus amigos no pueden 

presenciar sus intervenciones?


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Job 24:3

540

3

    Se llevan el asno del huérfano,

Y toman en prenda el buey de la viuda.

4

    Apartan de sí a los necesitados,

De modo que los miserables tienen 

que esconderse.

5

    Helos allí, como asnos del desierto,

Salen a su tarea y buscan con ansia 

el sustento,

El páramo es el que ofrece alimento 

a sus hijos,

6

    Cosechan en campo ajeno,

Y tienen que rebuscar en la viña del 

impío.

7

    Pasan la noche desnudos, faltos de 

ropa,

Y no tienen cobertura contra el frío.

8

    El aguacero de los montes los 

empapa,

Y se pegan a las rocas por falta de 

refugio.

9

    Hay otros que arrancan del pecho al 

huérfano,

Y toman en prenda al hijo del pobre,

10

    Hacen que anden desnudos, faltos 

de ropa,

Y le quitan las gavillas a los 

hambrientos,

11

    Los que exprimen el aceite en sus 

molinos,

Y pisan sus lagares, pero pasan sed.°

12

    Por la angustia gime el moribundo,

Y el alma de los heridos clama por 

auxilio,

Pero Dios no toma en cuenta 

necedades.

13

    Otros son rebeldes a la luz,

No conocen sus caminos

Ni frecuentan sus sendas.

14

    Al alba se levanta el asesino,

Para matar al pobre y al menesteroso.

De noche ronda el ladrón,

°A oscuras penetra en las casas.

15

    El adúltero espera el crepúsculo, y 

se dice: Nadie me verá;

Y se oculta el rostro.

16

    Durante el día se encierran,

Nada quieren con la luz.

17

    Acostumbrados al terror de las 

tinieblas,

La mañana es oscura para ellos.

18

    Se deslizan ligeros como el agua,

Su porción es maldita en la tierra,

Y no volverán por el camino de las 

viñas.

19

    Como el calor y la sequía le roban el 

agua a la nieve,

Así el Seol a los que han pecado.

20

    Los olvidará el seno materno,

Dulce le será su sabor al gusano,

Nunca serán recordados,

Y como a un árbol se talará su 

injusticia,

21

    Porque maltrataron a la estéril sin 

hijos,

Y no socorrieron a la viuda.

22

    Aunque el poderoso prolongue su 

vigor y se mantenga en pie,

No puede prometerse vida.

23

    Aunque le sea dado habitar con 

seguridad,

Los ojos observan sus caminos.

24

    Aunque exaltados por un tiempo, 

luego dejan de existir,

Abatidos y marchitos como plantas,

Son segados como espigas.

25

    Y si esto no es así, que alguien me 

desmienta,

Y reduzca a nada mis palabras.

Respuesta de Bildad

25

Respondió  entonces  Bildad  sujita, 

y dijo:

2

    ¡El señorío y el temor pertenecen al 

que impone paz en las alturas!

3

    ¿Tienen número sus huestes?

¿Sobre quién no se levanta su luz?

4

    ¿Cómo entonces puede el hombre 

tener razón ante Dios?

¿Y cómo puede ser puro el nacido de 

mujer?

5

    Si ni siquiera la luna es brillante,

Ni a sus ojos son puras las estrellas.

6

    ¡Cuánto menos el hombre, ese 

gusano,

El ser humano, esa lombriz!

Job proclama la soberanía divina

26

A lo cual respondió Job diciendo:

2

    ¡Qué bien ayudas al débil,

24.11 Es decir, los pobres tienen que exprimir el aceite y pisar las uvas en los molinos y lagares de los ricos, pero no pueden 

disfrutar de ellos

24.14 Esta frase corresponde al v. 16a.


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Job 27:22

541

Y socorres al brazo sin fuerza!

3

    ¡Cómo aconsejas al ignorante!

¡Qué talento tan grande 

manifiestas!°

4

    ¿Para quién profieres tus palabras?

¿Qué espíritu habla por ti?

5

    Los muertos se estremecen,

Debajo del mar y de sus habitantes.

6

    Ante Él el Seol está desnudo,

Y el Abadón no tiene cubierta.

7

    Él extendió el norte sobre el abismo,

Y suspendió la tierra sobre la nada,

8

    Embolsa las aguas en sus densas 

nubes,

Y la nube no se desgarra con el peso,

9

    Encubre la faz de su trono,

Y sobre él despliega su nube.

10

    Trazó un círculo sobre la faz de las 

aguas,

En el límite de la luz con las 

tinieblas.

11

    Los pilares de los cielos se 

estremecen,

Y quedan atónitos ante su 

reprensión.

12

    Aquieta el mar con su poder,

Y con su inteligencia lo hiere en su 

arrogancia.

13

    Su Espíritu hermoseó los cielos,

Y su mano traspasó la serpiente 

tortuosa.

14

    He aquí, esto no es más que el borde 

de sus caminos,

De Él oímos apenas un murmullo,

El trueno de su proeza, entonces,

¿Quién lo comprenderá?

El castigo de los malos

27

Job prosiguió su proverbio dicien-

do:

2

    ¡Vive Dios, que ha quitado mi 

derecho,

Y ’El-Shadday, que amarga mi alma,

3

    Que mientras tenga aliento,

El hálito de Dios en mis narices,

4

    Mis labios no hablarán 

perversidades,

Ni mi lengua proferirá engaño!

5

    Lejos de mí que os dé la razón:°

Hasta que expire mantendré mi 

integridad,

6

    Me aferraré a mi justicia, y no la 

soltaré,

Mi corazón no me reprochará 

mientras viva.

7

    ¡Sea la suerte del impío como la de 

mi enemigo,

Y la del perverso como la de mi 

adversario!

8

    Pues, ¿qué esperanza le queda al 

impío,

Por mucho que haya robado,

Cuando Dios reclame su alma?

9

    ¿Oirá Dios su clamor,

Cuando le sobrevenga la angustia?

10

    ¿Se deleitaba acaso en ’El-Shadday?

¿Invocaba a Dios en todo tiempo?

11

    Os instruiré en el poder de Dios,

No ocultaré lo concerniente a 

’El-Shadday.

12

    Si todos vosotros lo habéis 

observado,

¿Por qué repetís vaciedades?

13

    Esta es la porción que Dios reserva 

al malvado,

Y la heredad que los opresores 

recibirán de ’El-Shadday:

14

    Aunque sus hijos se hayan 

multiplicado,

Serán para la espada,

Y sus vástagos no tendrán pan 

suficiente.

15

    Los que queden de él, los sepultará 

la peste,

Y sus viudas no los llorarán.

16

    Aunque amontone plata como polvo,

Y almacene vestiduras como lodo,

17

    Las almacenará, pero el justo las 

vestirá,

Y los inocentes se repartirán la plata.

18

    Construirá su casa como la polilla,

O como enramada de guarda.

19

    Se acostará rico, pero no volverá a 

serlo,°

Abrirá los ojos, y no le quedará nada.

20

    De día lo asaltarán los terrores,

De noche lo arrebatará el huracán.

21

    Un viento solano se lo llevará,

Lo arrancará fuera de su morada, y 

se irá.

22

    Sí, aunque intente huir por todas 

partes,

26.3 Lit. has dado a conocer.  27.5 Lit. os declare justos.  27.19 Lit. no será añadido


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Job 27:23

542

Lo arrojará y no lo perdonará.

23

    Y al marchar de su lugar,

Le harán coro con palmadas y 

silbidos.°

Elogio a la sabiduría

28

La plata tiene sus veneros, Y el oro 

un lugar donde refinarlo.

2

    De la tierra se saca el hierro,

Y de la piedra se funde el cobre.

3

    Pone° término a la oscuridad,

Excavando hasta el último rincón,

La piedra oscura y sombría,

4

    Lejos de donde la gente transita,

Socavan retorcidas galerías,

Apartados de la humanidad.

5

    La tierra de donde sale el pan,

Por debajo es trastornada como por 

fuego,

6

    Las piedras que allí se hallan son el 

lugar de los zafiros,

Y también hay polvo de oro.

7

    Tal senda es desconocida por el ave 

de presa,

Jamás el ojo del halcón la ha 

divisado.

8

    Nunca hollada por fieras arrogantes,

Ni ha pasado por allí el león.

9

    Alarga su mano sobre el pedernal,

Trastoca las montañas de raíz,

10

    Entre la roca abre galerías,

Y su ojo logra ver todo lo precioso.

11

    Detiene las corrientes, para que no 

lloren,°

Y hace que lo escondido salga 

a la luz.

12

    Pero la sabiduría, ¿de dónde se saca?

¿Dónde está el yacimiento de la 

prudencia?

13

    El hombre no conoce el valor de 

ella:

No se halla en la tierra de los 

vivientes,

14

    El abismo dice: No está en mí,

El mar dice: No está conmigo.

15

    No se puede obtener con oro fino,

Ni la plata puede ser pesada por su 

precio.

16

    No puede evaluarse con oro de Ofir,

Ni con el ónice precioso o el zafiro.

17

    Oro y diamantes no se le pueden 

igualar,

Ni se puede pagar con vasos de oro 

fino.

18

    El coral y el cristal, ni se mencionen,

Porque la adquisición de la sabiduría

Supera las piedras preciosas.

19

    El topacio de Etiopía no la igualaría,

Ni podrá ser evaluada con oro puro.

20

    ¿De dónde pues, proviene la 

sabiduría?

¿Y cuál es el lugar de la prudencia?

21

    Ha sido encubierta a los ojos de 

todos los vivientes,

Y oculta a todas las aves de los 

cielos.

22

    El Abadón y la Muerte dijeron:

¡Su fama hemos oído con nuestros 

oídos!

23

    Dios conoce el camino de ella,

Y sabe el lugar donde se halla,

24

    Porque contempla hasta los confines 

del orbe,

Y ve cuanto hay bajo los cielos,

25

    Cuando da su peso al viento,

Y determina las aguas por medida.

26

    Cuando dicta una ley para la lluvia,

Y un sendero a relámpagos y 

truenos.

27

    Entonces Él la veía, y la manifestó,

La estableció, e incluso la 

escudriñó.°

28

    Y dijo al hombre: He aquí, el temor 

de Adonay es la sabiduría,

Y el apartarse del mal, la prudencia.

Condición anterior de Job

29

Job continuó su proverbio,° y dijo:

2

    ¡Quién me diera ser como en meses 

pasados,

Cuando Dios velaba sobre mí!

3

    Cuando su lámpara brillaba sobre mi 

cabeza,

Y a su luz cruzaba las tinieblas.

4

    Aquellos días de mi vigor,

Cuando Dios era íntimo° en mi 

tienda,

5

    Cuando ’El-Shadday aún estaba 

conmigo,

27.23 Es decir, se burlarán.  28.3 Esto es, el minero. Y así hasta el v. 11.  28.11 Esto es (poéticamente), para que no filtren

28.27 Nprobó.  29.1 Es decir, su modo de hablar en verso.  29.4 Lit. el consejo.


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Job 30:13

543

Y mis hijos, alrededor mío.

6

    Cuando mis pasos eran lavados con 

leche,

Y la roca me derramaba ríos de 

aceite.

7

    Cuando salía a la puerta de la 

ciudad,

Y en la plaza hacía preparar mi 

asiento.

8

    Los jóvenes me veían y se escondían,

Los ancianos se levantaban y 

permanecían de pie.

9

    Los príncipes detenían sus palabras,

Se tapaban la boca con la mano.

10

    La voz de los nobles enmudecía,

Y su lengua se les pegaba al paladar.

11

    Los oídos que me oían me llamaban 

bienaventurado,

Y los ojos que me veían daban 

testimonio a favor mío.

12

    Yo libraba al pobre que clamaba,

Y al huérfano indefenso.

13

    Recibía la bendición del 

menesteroso,

Y hacía cantar el corazón de la 

viuda.

14

    Me vestía de rectitud, y ella me 

cubría,

Mi justicia era como un manto y 

una diadema.

15

    Yo era ojos al ciego,

Y pies al cojo.

16

    Era el padre de los pobres,

Y de la causa que no conocía, me 

informaba con diligencia.

17

    Rompía las quijadas del inicuo,

Y de sus dientes hacía soltar la 

presa.

18

    Me decía: En mi nido moriré,

Y como la arena multiplicaré mis 

días.

19

    Mi raíz se extendía junto a las aguas,

Y el rocío pernoctaba en mi ramaje.

20

    Mi gloria era siempre nueva,

Y mi arco se reforzaba en mi mano.

21

    Me escuchaban expectantes,

Atentos en silencio a mi consejo.

22

    Después de hablar yo, nada añadían,

Mis palabras destilaban sobre ellos,

23

    Las esperaban como la lluvia 

temprana,

Se las bebían como lluvia tardía.

24

    Si me reía con ellos, no lo creían,

Y no tenían en menos° la luz de mi 

semblante.

25

    Yo les escogía el camino,

Y me sentaba entre ellos como 

caudillo.

Me colocaba como rey entre la tropa,

Como quien consuela a los que 

están de duelo.

Job lamenta su desdicha

30

Pero ahora, se burlan de mí los 

  que son más jóvenes que yo,

A cuyos padres había yo rehusado 

aun dejar los perros de 

mi rebaño,

2

    Pues ¿para qué me servía la fuerza 

de sus manos, si su vigor había 

desaparecido?°

3

    Por el hambre y la miseria andaban 

solitarios,

Royendo la tierra seca en la 

desolación del desierto,

4

    Arrancando bledo entre matorrales,

Y alimentándose de raíces de 

retama.

5

    Expulsados de en medio de los 

hombres,

A gritos, como ladrones,

6

    Habitando en barrancos espantosos,

En cuevas de la tierra y de las peñas,

7

    Aullando entre los matorrales,

Y apiñándose bajo las ortigas.

8

    Generación de necios,

Generación sin nombre

Han sido eliminados de esta tierra.

9

    ¡Y ahora he venido a ser su 

cantinela,°

Y les sirvo de refrán!

10

    Me abominan, se alejan de mí,

Y de mi rostro no refrenan su saliva.

11

    Por cuanto Él aflojó la cuerda de mi 

arco, y me ha afligido,

Ellos se han quitado el freno frente 

a mí.

12

    A mi diestra se levanta la chusma,

Enredan mis pies,

Me preparan caminos de 

destrucción,

13

    Atajan mi senda,

29.24 Lit. abatían.  30.2 Lit. perecido.  30.9 Es decir, el objeto de su burla


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Job 30:14

544

Adelantan mi caída,

Y no hay quien los detenga.

14

    Irrumpen como por brecha ancha,

Y por sobre los escombros se 

abalanzan contra mí.

15

    Los terrores me asaltan de repente,

Mi honor es perseguido como por el 

viento,

Y mi prosperidad desapareció como 

una nube.

16

    Ahora mi alma se me derrama,

Porque los días de aflicción se han 

apoderado de mí.

17

    La noche me taladra los huesos,

Y los dolores que me roen no 

descansan.

18

    Una fuerza poderosa ha desfigurado 

mi vestido,°

Y me aprieta como el cuello de mi 

sayal.

19

    Me ha derribado en el fango,

Y he quedado como el polvo y las 

cenizas.

20

    Te digo mis lamentos,

Y no me respondes,

Me pongo de pie,

Y te quedas observándome.

21

    Te has vuelto cruel para conmigo,

Me atacas con la fuerza de tu mano,

22

    Me alzas al viento,

Me obligas a cabalgar en él,

Y me deshaces en la tormenta.

23

    Yo sé que me conduces a la muerte,

A la casa destinada para todos los 

vivientes.

24

    ¿No alarga uno la mano al hundirse,

O no grita por socorro ante el 

desastre?

25

    ¿Acaso no lloré por el de vida dura,

O no se contristó mi alma por el 

menesteroso?

26

    Pero cuando esperaba el bien, vino 

el mal,

Esperaba luz, y vino oscuridad.

27

    Mis entrañas hierven y no tienen 

sosiego,

Han venido a mi encuentro días de 

aflicción.

28

    Ando ennegrecido, y no por el sol,

Me levanto en la asamblea, y clamo 

por ayuda.

29

    He llegado a ser hermano de 

chacales

Y compañero de avestruces.

30

    Mi piel se ha ennegrecido y se 

me cae,

Y mis huesos arden de calor.

31

    Por eso mi arpa tañe con dolor,

Y mi flauta es voz de los que lloran.

Job reafirma su integridad

31

Hice un pacto con mis ojos: 

¿Fijaré la mirada en una doncella?

2

    Porque, ¿cuál sería la porción de 

Dios allá arriba,

Y qué herencia de ’El-Shadday en las 

alturas?

3

    ¿No es acaso la calamidad para el 

inicuo,

Y el desastre para quienes obran 

injusticia?

4

    ¿No observa Él mis caminos,

Y cuenta todos mis pasos?

5

    Si he andado con falsía,

Y mi pie se apresuró al engaño,

6

    ¡Sea yo pesado en balanza justa,

Y conozca Dios mi integridad!

7

    Si mi paso se ha apartado del 

camino,

Y mi corazón se fue en pos de mis 

ojos,

O si alguna mancha se pegó a mis 

manos,

8

    ¡Siembre yo y coma otro!

¡Sí, sea arrancado el producto de mi 

campo!

9

    Si mi corazón se dejó arrastrar por 

una mujer,

Y he acechado junto a la puerta de 

mi prójimo,

10

    ¡Muela mi mujer para otro,

Y encórvense otros sobre ella!

11

    Eso sería una infamia,

Y un delito castigado por los jueces;

12

    Un fuego que consume hasta el 

Abadón,

Y que arrancaría de raíz mis cosechas.

13

    Si denegué su derecho a mi siervo o 

a mi sierva,

Cuando se quejaban contra mí,

14

    ¿Qué haré cuando Dios se ponga 

en pie?

30.18 Esto es, mi cuerpo.


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Job 32:3

545

¿Qué le responderé cuando me pida 

cuentas?

15

    El que me hizo en el vientre, ¿no lo 

hizo también a él?

¿No nos formó a ambos en la matriz?

16

    Si he rehusado algo a los pobres,

O dejé a la viuda consumirse en 

llanto,

17

    O si comí mi bocado a solas,

Sin compartirlo con el huérfano,

18

    (Aunque desde mi juventud creció 

éste conmigo como con un padre,

Y lo guié desde el seno materno.)

19

    Si vi a algún vagabundo sin ropas,

O algún menesteroso sin nada que 

ponerse,

20

    Y sus lomos no me bendijeron

Al calentarse con el vellón de mis 

ovejas,

21

    Si alcé mi mano contra el inocente,

Porque veía mi apoyo en la puerta,°

22

    ¡Despréndase mi hombro de la 

paletilla,

Y descoyúntese mi brazo de su hueso!

23

    Porque temo el castigo de Dios,

Ante cuya majestad no puedo hacer 

nada.

24

    Si puse en el oro mi confianza,

Y al metal precioso dije: Tú eres° mi 

esperanza;

25

    Si me complací de mis grandes 

riquezas,

Y de que mi mano hubiera agarrado° 

mucho,

26

    Si al contemplar al sol en su brillar,°

O a la luna, marchando en su 

esplendor,

27

    Mi corazón, en secreto seducido,

Con mi mano le envió un beso de mi 

boca,

28

    También sería iniquidad digna de 

castigo,

Por negar al Dios que está en lo alto.

29

    ¿Acaso me alegré de la ruina del que 

me aborrecía,

O salté de júbilo porque el mal lo 

había alcanzado?

30

    ¡No!, ni tampoco di al pecado mi 

lengua,°

Ni reclamé con una imprecación su 

vida.

31

    ¿Acaso los siervos de mi tienda no 

decían: ¿Quién podrá hallar a 

alguno que no se haya saciado 

con su° alimento?

32

   El forastero no pasaba la noche en 

la calle,

Yo abría mis puertas al viajero.

33

    ¿Acaso, como Adam, encubrí mis 

transgresiones, ocultando mi 

iniquidad en mi seno,

34

   Por temor a la muchedumbre, 

o porque me intimidara el 

desprecio de la gente, para 

guardar silencio, y no salir a la 

puerta?

35

   ¡Quién me diera que me escuchara!

¡He aquí mi firma!°

¡Que ’El-Shadday me responda!

¡Oh! si tuviera el libelo que ha 

escrito mi acusador,

36

    De seguro lo llevaría sobre mi 

hombro,

Y me lo ceñiría a la cabeza cual 

corona.

37

    Le daría cuenta del número de mis 

pasos,

Y como príncipe me acercaría 

ante Él.

38

    Si mi tierra clamara contra mí,

Y a una lloraran sus surcos,

39

    Si he comido su fruto° sin pagar,

O afligido el alma de sus labradores,

40

    ¡Crezcan abrojos en lugar de trigo,

Y en vez de cebada hierba mala!

Aquí terminan las palabras de Job.

Eliú

32

Aquellos  tres  hombres  cesaron  de 

replicar a Job, por cuanto les pare-

ció que era justo.

2

 Entonces Eliú,° hijo de Baraquel, buzi-

ta, de la familia de Ram, se encendió en 

ira contra Job, porque él se justificaba a sí 

mismo antes que a ’Elohim.

3

 También  se  enardeció  contra  sus  tres 

amigos, pues al no hallar respuesta, ha-

bían dejado a Dios° por culpable.

31.21 Esto es, las puertas de la ciudad, donde se celebraban los juicios (tribunal del pueblo).  31.24 .Tú eres.  31.25 Lit. 

hallado

31.26 Se refiere a la adoración astral 

→vv. 26-28.  31.30 Lit. paladar.  31.31 Es decir, con el alimento que daba Job

31.35 Lit. marca.  31.39 Lit. su fuerza.  32.2 Elihú = Dios es él.  32.3 17ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 23.


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Job 32:4

546

4

 Y  Eliú  había  esperado  ansiosamente 

mientras hablaban con Job, porque ellos 

eran mayores que él.

5

 Pero viendo que no había respuesta en 

la boca de aquellos tres hombres, Eliú se 

encendió en ira.

6

 Y tomando la palabra Eliú, hijo de Bara-

quel, buzita, dijo:

Yo soy menor en edad y vosotros 

ancianos,

Por eso me abstuve, y temí 

declararos mi parecer.

7

    Yo decía: Los días hablarán,

Y la muchedumbre de años declarará 

sabiduría.

8

    Pero es el espíritu del hombre,

El aliento de ’El-Shadday, el que da 

inteligencia.

9

    No son los sabios los de mucha edad,

Ni los ancianos disciernen lo que es 

justo.

10

    Por eso digo: ¡Oídme!

¡También yo declararé mi saber!

11

    He aquí, esperaba vuestras palabras,

Escuché vuestras razones,

En tanto buscabais qué decir.

12

    Pero por más que escuché con 

atención,

Ninguno de vosotros ha podido 

refutar a Job,

Ni responder a sus razonamientos.

13

    No digáis: Hemos topado con un 

saber,

Que sólo Dios puede refutar, y no el 

hombre.

14

    Ahora bien, él no ha dirigido sus 

palabras contra mí,

Ni yo le responderé con vuestros 

dichos.

15

    Ellos, desconcertados, ya no 

responden,

No tienen más palabras.

16

    ¿Debo esperar porque ellos no 

hablan,

Porque cesaron y no responden 

más?

17

    Yo también responderé mi parte,

Yo también declararé mi parecer.

18

    Porque estoy lleno de palabras,

Y el espíritu me constriñe dentro 

de mí.°

19

    Mis entrañas° son como vino sin 

respiradero,

Como odres nuevos, que están por 

reventar.

20

    Hablaré pues, y me desahogaré,

Abriré mi boca y responderé.

21

    No haré ahora acepción de personas,

Ni usaré con nadie títulos lisonjeros,

22

    Porque no sé hablar lisonjas,

De otra manera, en breve mi 

Hacedor me consumiría.

Eliú censura a Job

33

Por tanto, Job, oye ahora mis 

  razones,

Y atiende a todas mis palabras.

2

    He aquí, ahora abro mi boca,

Mi lengua habla con mi paladar.

3

    Mis palabras declararán la rectitud 

de mi corazón,

Y lo que saben mis labios lo hablarán 

sinceramente:

4

    El Espíritu de Dios me hizo,

Y el soplo de ’El-Shadday me dio 

vida.

5

    Respóndeme si puedes,

Alístate y ponte en pie ante mí.

6

    Heme aquí a mí en presencia de 

Dios, conforme a tu pedimento,

Del barro fui yo también formado.

7

    He aquí, mi terror no te espantará,

Ni mi mano será demasiado pesada 

sobre ti.

8

    De cierto tú dijiste a oídos míos

(Porque el son de tus palabras yo 

mismo escuchaba):

9

    Limpio soy, sin transgresión.

Soy puro, y no hay iniquidad en mí.

10

    Pero he aquí, Él busca ocasión 

contra mí,

Y me cuenta por enemigo Suyo.

11

    Ha puesto mis pies en el cepo,

Y vigila mis pasos.

12

    He aquí yo te respondo: En esto no 

eres justo,

Pues Dios es mayor que el hombre.

13

    ¿Por qué contiendes con Él?

Porque Él no da cuenta de ninguno 

de sus actos.

14

    Aunque Dios habla de una manera, y 

aun de dos,

32.18 Lit. el espíritu de mi vientre.  32.19 Lit. mi vientre.


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Job 34:14

547

Pero nadie lo percibe:

15

    En sueño, en visión nocturna, 

cuando el sopor cae sobre los 

hombres,

Mientras dormitan en el lecho,

16

    Él abre el oído de los hombres,

Y los amonesta secretamente,

17

    Para apartar al hombre de su mala° 

obra,

Y destruir del varón la soberbia,°

18

    Para librar su alma del sepulcro,

Y su vida de que perezca a cuchillo.

19

    También sobre su lecho es corregido 

con dolores,

Con la agonía incesante de sus 

miembros,

20

    Hasta que su alma llega a aborrecer 

el pan,

Y su garganta el manjar más 

delicado.

21

    Su carne se consume, hasta que no 

se ve,

Y sus huesos, que antes no se veían, 

aparecen,

22

    Su alma se acerca a la fosa,

Y su vida a los que causan la muerte.

23

    Si tuviera cerca de él algún 

elocuente mediador muy 

escogido,

Que anuncie al hombre su deber,

24

    Y se apiade de él, y diga:

¡Líbralo de bajar al sepulcro,

Porque he hallado su rescate!

25

    Entonces su carne sería más tierna 

que la del niño,

Volvería a los días de su juventud,

26

    Invocaría a Dios, y Éste le sería 

propicio,

Para que vea su rostro con gritos de 

júbilo,

Y restauraría° al hombre su justicia.

27

    Cantaría entre los hombres 

diciendo:

¡Pequé y pervertí lo recto,

Pero no me fue tomado en cuenta!°

28

    ¡Ha redimido mi alma para que no 

baje al sepulcro,

Y mi vida ya ve la luz!

29

    He aquí, todas estas cosas hace Dios 

con el hombre,

Dos veces, y aun tres veces,

30

    Para rescatar su alma del sepulcro,

Para que resplandezca con la luz de 

la vida.

31

    Pon atención Job, óyeme;

Calla, y yo hablaré.

32

    Si tienes algo que decir, 

respóndeme.

Habla, que yo te quiero justificar.

33

    Si no, óyeme tú a mí;

Calla, y yo te enseñaré sabiduría.

Eliú justifica a Dios

34

Prosiguió Eliú, y dijo:

2

    ¡Oíd, oh sabios, mis palabras,

Y vosotros, doctos, escuchadme!

3

    Porque el oído discierne las palabras,

Como el paladar degusta los sabores.

4

    Así nosotros escojamos lo que es 

justo,

Y distingamos lo que es bueno.

5

    Porque Job ha dicho: Aunque soy 

inocente,

Dios ha quitado mi derecho,

6

    Aunque tengo razón,° paso por 

mentiroso,

Aunque no he pecado, el flechazo es 

incurable.

7

    ¿Quién hay como Job,

Que suelta sarcasmos como quien 

bebe agua,

8

    Que se junta con malhechores,

Y va en compañía de malvados?

9

    Pues afirma: De nada le sirve al 

hombre deleitarse en Dios.

10

   Por tanto, hombres cuerdos, 

escuchadme:

¡Lejos esté de Dios la maldad,

Y de ’El-Shadday la injusticia!

11

    Porque Él pagará al hombre 

conforme a sus obras,

Y hará que cada uno halle según su 

camino.

12

    Ciertamente Dios no obra con 

maldad,

Ni ’El-Shadday pervierte la justicia.

13

    ¿Quién le puso a cargo la tierra?

¿Quién le confió el universo?

14

    Si por su cuenta decidiera,

33.17 .mala.  33.17 Lit. esconder del varón el orgullo.  33.26 Esto es, el Mediador.  33.27 Lit. retribuido.  34.6 Lit. contra mi 

derecho.


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Job 34:15

548

Retirar su espíritu y su aliento,

15

    Toda carne perecería a una,

Y el hombre volvería al polvo.

16

    Si tienes inteligencia, oye esto,

Escucha la voz de mis palabras:

17

    ¿Podrá juzgar el que aborrece la 

justicia?

¿Te atreves a condenar al Justo?

18

    ¿A Aquél que declara criminales a 

los reyes,

Y malvados a los príncipes?

19

    Él no hace acepción con príncipes,

Ni considera al rico más que al 

pobre,

Pues todos ellos son obra de sus 

manos.

20

    De repente a medianoche, mueren,

La gente se estremece y ya no está,

Y el poderoso es derribado no con 

mano,°

21

    Porque sus ojos están sobre las 

sendas del mortal,

Y Él observa todas sus andanzas.

22

    No hay tinieblas ni sombras,

Donde puedan ocultarse los 

culpables de iniquidad.

23

    Pues no le da preaviso° al hombre,

Para que comparezca en juicio ante 

Dios.

24

    Quebranta a los poderosos sin 

inquirir,

Y coloca a otros en lugar de ellos.

25

    Por cuanto conoce sus obras,

Los trastorna de noche,

Y quedan deshechos.

26

    Los azota por sus maldades,

En un lugar donde todos los vean,

27

    Porque se apartaron de seguirle,

Y no consideraron sus caminos,

28

    Haciendo que llegue a Él el clamor 

del pobre,

Y oiga el clamor de los afligidos.

29

    Pero si calla, ¿quién lo inculpará?

Si esconde su rostro, ¿quién podrá 

verlo?

Vela sobre pueblos y hombres,

30

    Para que no reine el impío,

Ni engañe más al pueblo.

31

    Porque, ¿quién ha dicho a Dios:

He sido seducido, no pecaré más,

32

    Enséñame Tú lo que yo no veo,

Si obré mal, no lo haré más?°

33

    ¿Acaso Él retribuirá a tu antojo?

Bien sea que rehúses o que aceptes,

Él te retribuirá, no yo.

Y si no es así, di lo que sabes.

34

    Los hombres cuerdos que me oyen

Y los sabios, confesarán,

35

    Que Job habló sin conocimiento;

Que sus palabras fueron sin 

discernimiento;

36

    Que Job debe ser probado hasta el 

límite,

Porque respondió como los malvados,

37

    Y a su pecado añade rebelión,

Bate palmas ante nosotros,°

Y multiplica sus palabras 

contra Dios.

Eliú: Su tercer discurso

35

Eliú prosiguió diciendo:

2

    ¿Piensas que es correcto decir:

Mis razones contra Dios son justas?

3

    Y añades: ¿Qué gano con no pecar?

Porque a ti poco te importa.

4

    Yo te daré la respuesta,

Y a tus compañeros contigo:

5

    Observa atentamente los cielos, y 

mira,

Contempla las nubes, que son más 

altas que tú:

6

    Si pecas, ¿qué mal le haces a Él?

Si tus transgresiones se multiplican,

¿Qué daño le haces a Él?

7

    Si eres justo, ¿qué obtiene Él de ti,

O qué recibe de tu mano?

8

    Es al hombre a quien afecta tu 

maldad,

Y al humano como tú, tu justicia.

9

    Bajo el peso de la opresión claman,°

Y gritan contra los poderosos,

10

    Pero ninguno dice: ¿Dónde está 

nuestro Hacedor,

Que restaura las fuerzas durante la 

noche,

11

    Que nos instruye por las bestias de 

la tierra,

Y por las aves de los cielos nos 

enseña?

34.20 Es decir, no con mano de hombre.  34.23 Lit. no le pone plazo.  34.32 Lit. no añadiré.  34.37 Es decir, se burla.  35.9 Esto 

es, los hombres


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Job 36:29

549

12

    Entonces, por la arrogancia de los 

malvados claman,

Pero Él no responde,

13

    Porque Dios no oye el falso clamor,

’El-Shadday no lo tiene en cuenta.

14

    ¡Cuánto menos cuando tú dices que 

no lo ves,

Que la causa está ante Él y sigues 

esperando!

15

    Pero ahora, por cuanto aún° no 

visita con su ira,

Ni toma pronto conocimiento de las 

trasgresiones,

16

    Job ha abierto vanamente su boca,

Y multiplica palabras sin cordura.

Eliú exalta la grandeza de Dios

36

Continuó Eliú replicando, y dijo:

2

    Tolérame un poco, y te diré más,

Porque aún queda algo por decir en 

defensa de Dios.

3

    De lejos traeré mi saber, y atribuiré 

justicia a mi Hacedor.

4

    Porque en verdad mis palabras no 

son falsas;

Uno perfecto en conocimiento está 

contigo.

5

    He aquí, Dios es poderoso,

Y sin embargo no desprecia a nadie;

Es poderoso en la fuerza del 

entendimiento.

6

    No deja que el perverso viva,

Y hace justicia a los pobres.

7

    No aparta sus ojos del justo,

Lo hace sentar con reyes en el trono 

para que sea exaltado.

8

    Si están aprisionados con grilletes,

Y atrapados con cuerdas de aflicción,

9

    Los reprende por sus malas obras,

Y por haberse conducido con 

soberbia.

10

    Les abre así el oído a la corrección,

Y los exhorta a volverse de la 

iniquidad.

11

    Si escuchan y se someten,

Sus días acaban en prosperidad,

Y sus años en delicias.

12

    Pero si no escuchan,

Perecen por la espada,

Y expiran por su ignorancia.

13

    Los impíos de corazón atesoran ira,

No claman por auxilio cuando Él los 

aprieta,

14

    Sus almas perecen en pleno vigor,

Y sus vidas entre los sodomitas 

sagrados.°

15

    Con la aflicción Él salva al afligido,

Le abre sus oídos con el sufrimiento.

16

    Entonces, en verdad, Él te impulsa a 

salir de las garras de la angustia,

A un lugar espacioso y abierto,

Para servirte una mesa llena de 

grosura.

17

    Pero tú te has saturado del juicio 

que merece el inicuo,

En vez de sustentar el derecho y la 

justicia.

18

    Por lo cual, teme: no sea que en su 

ira te quite de un golpe,

Del que no te podrá librar ni un 

gran rescate.

19

    ¿Tendrá Él en cuenta tus riquezas,

O todas las fuerzas del poder?

20

    No anheles la noche en que los 

pueblos desaparecerán de su 

lugar.

21

   ¡Cuídate! No vuelvas tu rostro a la 

iniquidad,

Aunque la hayas escogido a causa de 

tu aflicción.

22

    He aquí Dios se exalta en su poder:

¿Quién hay que enseñe como Él?

23

    ¿Quién le señala el camino?

¿Quién le dirá jamás: Has cometido 

injusticia?

24

    Acuérdate de engrandecer su obra,

De la cual han cantado los hombres,

25

    Todos la contemplan,

Los humanos la miran desde lejos.

26

    He aquí, Dios es grande,

Más de lo que podemos entender.

El número de sus años es 

inescrutable,

27

    Va atrayendo las gotas de agua,

Cuando el vapor se convierte en 

lluvia,

28

    Que destilan las nubes,

Y se vierten en raudales sobre el 

hombre.

29

    ¿Se entenderán los despliegues del 

nublado,

35.15 .aún.  36.14 Se refiere a homosexuales que se prostituían en templos idolátricos.


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Job 36:30

550

Y el estruendo de su tabernáculo?

30

    He aquí, despliega su relámpago° 

sobre él,

Y cubre las raíces° del mar.

31

    Con tales cosas juzga a los pueblos,

Y da alimento en abundancia.

32

    Esconde el relámpago en su palma,

Y lo lanza certero hacia su blanco.

33

    El trueno anuncia su presencia,

Y su ira provoca tormenta.°

37

Por lo cual palpita mi corazón,

Y salta fuera de su sitio.

2

    ¡Oíd atentamente el trueno de su 

voz,

Y el estruendo que sale de su boca!

3

    Suelta por debajo de todos los cielos 

sus relámpagos,

Que alcanzan hasta los extremos del 

orbe.

4

    Tras ellos ruge su voz,

Atruena con voz majestuosa,

Y una vez oída su voz, no los detiene.

5

    Dios truena con voz maravillosa,

Y hace proezas que no podemos 

comprender.

6

    A la nieve dice: ¡Cae a tierra!

Y a la lluvia torrencial: ¡Apresúrate!

7

    Así hace que todo hombre se retire,

Para que el mortal reconozca su 

obra.

8

    Las fieras se meten en sus 

madrigueras,

Y permanecen en sus guaridas.

9

    De las cámaras del sur manda el 

torbellino,

Y de los vientos del norte la helada.

10

    Del soplo de Dios se forma el hielo,

Y se cuaja la superficie de las aguas.

11

    Carga de humedad las densas nubes,

Y dispersa las nubes de tormenta,

12

    Que giran y dan vueltas conforme a 

sus designios,

Para cumplir sus encargos sobre la 

faz del orbe,

13

    Y hace que acierten, unas veces 

como azote,

Otras, a favor de su tierra,

Y otras por misericordia.

14

    Oh Job, escucha esto,

Detente y pondera las maravillas 

de Dios:

15

    ¿Acaso sabes cómo Dios las° 

establece,

Y hace fulgurar la luz de su nube?

16

    ¿Conoces tú el equilibrio de las 

nubes,

Las obras prodigiosas de Aquél que 

es perfecto en sabiduría?

17

    O: ¿por qué están calientes tus 

vestidos,

Cuando la tierra se sosiega bajo el 

solano?

18

    ¿Extendiste junto con Él el 

firmamento,

Sólido cual espejo de metal fundido?

19

    ¡Haznos saber qué le diremos!

Porque no podemos ordenar 

nuestros pensamientos a causa 

de las tinieblas.

20

    ¿Necesitará ser informado de lo que 

yo digo?

¿Se le ha de referir lo que dice el 

humano?

21

    He aquí, aún no es posible mirar la 

luz oscurecida por las nubes,

Pero un viento pasa, y las despeja.

22

    Del norte asoma un resplandor 

de oro:

¡En Dios hay una majestad terrible!

23

    ¡’El-Shadday!

¡No lo podemos escudriñar!

Sublime en poder, rico en justicia,

Que no menoscaba el derecho.

24

    Por eso todos los hombres lo temen,

En tanto que Él no estima a los que 

se creen sabios en su corazón.

Intervención de Dios

38

YHVH respondió a Job desde el tor-

bellino, y dijo:

2

    ¿Quién es el que oscurece mis 

designios con palabras sin 

sabiduría?

3

    Ciñe ahora tus riñones cual varón,

Yo te preguntaré, y tú me 

responderás:

4

    ¿Dónde estabas tú cuando Yo 

fundaba la tierra?

Decláralo, si tienes inteligencia.

5

    ¿Quién determinó sus medidas?

Ya que tanto sabes,

¿Quién extendió sobre ella cordel?

36.30 Lit. luz.  36.30 Es decir, las profundidades o los abismos.  36.33 .tormenta.  37.15 Esto es, las nubes.


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Job 38:38

551

6

    ¿Sobre qué están fundadas sus bases?

¿Quién puso su piedra angular,

7

    Cuando alababan todas las estrellas 

del alba,

Y todos los hijos de Dios daban 

gritos de júbilo?

8

    ¿Quién encerró al mar con doble 

puerta,

Cuando irrumpía saliéndose de su 

seno?

9

    Cuando le puse nubes por vestido,

Y densas tinieblas por envoltura,

10

    Cuando establecí sobre él mi límite,

Y puse barra en sus puertas,

11

    Y le dije: ¡Hasta aquí llegarás y no 

pasarás,

Y aquí se detendrá el orgullo de tus 

olas!

12

    ¿Has dado orden en tu vida al 

mañana,°

Para que enseñe a la aurora su lugar,

13

    A fin de que tome los bordes de la 

tierra,

Y sacuda de ella a los malvados,

14

    Le dé forma como arcilla modelada,

Y haga que ellas° se presenten como 

vestidura,

15

    Para que se retire la luz de los 

malvados,

Y se quiebre el brazo enaltecido?

16

    ¿Has penetrado tú hasta los 

manantiales del mar,

O te has paseado por las 

profundidades del abismo?

17

    ¿Te han sido reveladas las puertas de 

la muerte?

¿Has visto las puertas de la sombra 

de muerte?

18

    ¿Has considerado toda la anchura de 

la tierra?

Declara si sabes esto:

19

    ¿Dónde está el camino hacia el lugar 

en que mora la luz?

¿Dónde viven las tinieblas?

20

    ¿Podrás conducirlas a sus linderos,

O mostrarles la senda a su 

habitación?

21

    ¡Tú lo sabes, porque entonces ya 

habías nacido,

Y el número de tus días es grande!°

22

    ¿Has entrado acaso en los tesoros de 

la nieve,

O has visto los tesoros del granizo,

23

    Que tengo reservado para el tiempo 

de angustia,

Para el día de la batalla y de la 

guerra?

24

    ¿Por qué camino se reparte la luz?

¿Por dónde se difunde el solano 

sobre la tierra?

25

    ¿Quién le abrió cauce al aluvión,

O camino al rayo del trueno,°

26

    Para hacer llover en tierra 

deshabitada,°

En la estepa donde no hay hombre 

alguno,

27

    Para saciar las tierras desoladas,

Y hacer retoñar las semillas de la 

hierba?

28

    ¿Tiene padre la lluvia?

¿Quién engendró las gotas de rocío?

29

    ¿De qué matriz proviene el hielo?

Y la escarcha del cielo, ¿quién la 

engendró,

30

    Para que las aguas se cubran con 

una losa,

Aprisionando la faz del abismo?

31

    ¿Podrás anudar los lazos de las 

Pléyades,

O desatar las ligaduras de Orión?

32

    ¿Sacarás a su tiempo Mazzarot,°

O guiarás el Arcturo con sus hijos?

33

    ¿Conoces tú los estatutos de los 

cielos?

¿Dispondrás tú de su dominio en la 

tierra?

34

    ¿Alzarás tu voz hasta las nubes,

Para que te cubra el chaparrón?

35

    ¿Despacharás a los relámpagos,

Para que vengan y te digan: ¡Aquí 

estamos!?

36

    ¿Quién puso sabiduría en lo íntimo?

¿Quién dio inteligencia a la mente?

37

    ¿Quién cuenta las nubes con 

sabiduría,

Y vuelca los cántaros de los cielos,

38

    Cuando el polvo se funde en una 

masa,

38.12-14 Prob. se refiere a ciertas fuerzas determinadas en el tiempo y el espacio que actúan en el universo. 

→v.33; He.1.2; 

Hch.2.23; Ef.1.3-14. 

38.14 Prob. se refiere a las nubes.  38.21 Ironía.  38.25 Lit. voces.  38.26 Lit. sin varón.  38.32 Esto es, 

las constelaciones del zodiaco 

→ § 164.


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Job 38:39

552

Y los terrones se abrazan entre sí?

39

    ¿Cazarás tú presa para la leona?

¿Saciarás el hambre de los leoncillos,

40

    Cuando se echan en sus guaridas,

O se agazapan al acecho en la 

espesura?

41

    ¿Quién provee al cuervo su comida,

Cuando sus pichones claman a Dios,

Mientras ellos vagan en procura de 

alimento?

39

¿Sabes tú cuándo paren las cabras 

monteses?

¿Has asistido al parto de las ciervas?

2

    ¿Puedes contar los meses de su 

preñez,

Y saber el tiempo en que han de 

parir?

3

    Se encorvan, fuerzan a salir a las crías,

Echan fuera sus dolores de parto.

4

    Sus crías crecen y se hacen fuertes,

Salen a campo abierto y no vuelven.

5

    ¿Quién dio al asno montés su 

libertad?

¿Quién soltó las ataduras del onagro,

6

    A quien di el desierto por hogar,

Y por morada tierra salitrosa?

7

    Se burla del tumulto de la ciudad,

Y no hace caso de los gritos del 

arriero,

8

    Explora los montes, que son su pasto,

Y anda rastreando toda cosa verde.

9

    ¿Consentirá el búfalo en servirte,

O pasará la noche junto a tu establo?

10

    ¿Atarás al búfalo con coyundas al 

arado?

¿Querrá rastrear los valles por ti?

11

    ¿Confiarás en él porque es robusto,

Dejando a su cuidado tu labor?

12

   ¿Te fiarás de él para que te traiga tu 

cosecha,

Y reúna el grano en tu era?

13

    Baten alegres las alas del avestruz,

Pero ¿con el ala y el plumaje del 

amor?°

14

    Abandona sus huevos en la tierra,

En el polvo los calienta,

15

    Y se olvida que un pie puede 

aplastarlos,

O una bestia salvaje pisotearlos.

16

    Es cruel con sus polluelos, como si 

no fueran suyos,

No le importa que se malogre su 

fatiga,

17

    Porque Dios la privó de sabio 

instinto,

Y no le repartió inteligencia.

18

    Pero cuando se yergue batiéndose 

los flancos,

Se burla del caballo y su jinete.

19

    ¿Diste al corcel su valentía?

¿Vestiste tú su cuello de crines 

ondulantes?

20

    ¿Lo harás brincar como langosta?

Sus relinchos son majestuosos y 

temibles,

21

    Escarba en el valle,

Se regocija en su fuerza,

Sale al encuentro de las armas,

22

    Se ríe del miedo, y no se espanta,

Ni retrocede ante la espada.

23

    La aljaba resuena contra él,

Fulguran lanza y jabalina,

24

    Y no obstante, con ímpetu y furor 

devora la distancia,

Sin importarle el son de la trompeta.

25

    Parece decir entre clarines: ¡Ea! ¡Ea!

Olfateando desde lejos la batalla,

La tronante voz de capitanes, y los 

alaridos de guerra.

26

    ¿Enseñaste tú al halcón a 

emprender vuelo,

Y extender sus alas hacia el mediodía?

27

    ¿Mandarás tú acaso a remontar el 

águila,

Y que en la altura cuelgue su nido?

28

    Vive y tiene su morada en la roca,

Sobre el risco de la roca, en lugar 

inaccesible.

29

    Desde allí la presa atisba,

Sus ojos la divisan de muy lejos,

30

    Sus polluelos chupan sangre a 

lengüetadas,

Y donde hay carroña, allí está ella.

40

YHVH continuó diciendo a Job:

2

    ¿Contenderá el censor con ’El-

Shadday?

El que argumenta con Dios, responda.

3

    Entonces Job respondió a Dios, y 

dijo:

4

    He aquí, soy insignificante,

¿Qué puedo responderte?

39.13 Ver contexto. Texto de difícil traducción en el segundo hemistiquio. Posible problema textual.


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Job 41 :15

553

Pongo mi mano en mi boca.

5

    Una vez he hablado, pero no 

responderé más.

Y aun dos veces, pero no añadiré 

nada.

6

    Entonces YHVH respondió a Job 

desde el torbellino, y dijo:

7

    Cíñete ahora como varón tus riñones:

Yo te preguntaré, y tú me harás saber:

8

    ¿Invalidarás mi juicio?

¿Me condenarás para justificarte?

9

    Si tienes un brazo como el de Dios,

Y tu voz atruena como la suya,

10

    ¡Adórnate de gloria y majestad!

¡Vístete de honra y hermosura!

11

    Derrama los torrentes de tu ira,

Y abate con una mirada al soberbio.

12

    Observa a todo arrogante, y 

humíllalo,

Quebranta a los impíos en su sitio,

13

    Entiérralos juntos en el polvo,

Y véndales los rostros en las 

tinieblas.°

14

    Entonces Yo también reconoceré,

Que tu propia diestra puede salvarte.

15

    Contempla ahora a Behemot, a 

quien hice igual que a ti:

Come hierba como buey,

16

    Mira la pujanza de sus lomos,

La potencia de su vientre musculoso,

17

    Cuando atiesa su cola como un 

cedro,

Trenzando los tendones de los 

muslos.

18

    Sus huesos son tubos de bronce,

Su osamenta, barras de hierro.

19

    Él es el principal de las obras de 

Dios,

Su Hacedor le dio su espada como 

presente,

20

    Los montes le traen tributo,

Y las fieras del campo retozan junto 

a él.

21

    Se tumba debajo de los lotos,

Se oculta entre las cañas del 

pantano,

22

    Lo cubren los lotos con su sombra,

Lo envuelven los sauces del arroyo.

23

    He aquí, cuando el río se embravece, 

él no se alarma,

Queda tranquilo, aunque el Jordán 

espumee contra su hocico.

24

    ¿Podrá alguien enfrentarse a él y 

atraparlo,

Horadando sus narices con un 

garfio?

41

°¿Sacarás con anzuelo al Leviatán,

O amarrarás con una cuerda su 

lengua?

2

    ¿Pondrás anillo en su nariz,

O perforarás con un garfio su quijada?

3

    ¿Se acercará a ti con muchas súplicas,

O te hablará con palabras sumisas?

4

    ¿Hará un pacto contigo,

Para que lo tomes como esclavo de 

por vida?

5

    ¿Juguetearás con él como con algún 

pajarillo?

¿Lo atarás para entretener a tus 

niñas?

6

    ¿Traficarán con él las cuadrillas de 

pescadores?

¿Lo trocearán entre los mercaderes?

7

    ¿Podrás acribillarle el cuero con 

dardos,

O su cabeza con arpones?

8

    Pon la mano sobre él,

Piensa en la batalla, y no lo volverás 

a hacer.

9

    He aquí la esperanza de aquél° 

queda frustrada.

¿No se desfallece con sólo verlo?

10

    Nadie tiene la osadía de atreverse a 

despertarlo.

¿Quién pues podrá estar delante de 

mí?

11

    ¿Quién me ha dado a mí primero, 

para que Yo restituya?

Todo lo que hay debajo de los cielos 

es mío.

12

    No dejaré de describir sus 

miembros,

Ni su fuerza incomparable.

13

    ¿Quién le abrió el revestimiento,

Y penetró por su doble coraza?

14

    ¿Quién abrió las dos puertas de sus 

fauces,

Rodeada de dientes espantosos?

15

    Las hileras de escamas son su 

orgullo,

40.13 Algo así como: encarcélalos en el calabozo.  41.1 Corresponde al 40.25 del TM y sucesivamente hasta 40.32, correspon-

diente al 41.8 de las versiones. 

41.9 Esto es, del que se atreve a poner su mano sobre él.


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Job 41:16

554

Cerradas sin rendijas, como un sello.

16

    Tan unidas una a la otra,

Que ni el aire pasa entre ellas,

17

    Soldadas están, cada una a la de su 

vecino,

Trabadas entre sí, no se pueden 

separar.

18

    Su estornudo lanza destellos de luz,

Sus ojos son como los párpados de 

la aurora.

19

    De sus fauces salen antorchas,

Y se escapan centellas de fuego.

20

    De sus narices sale una fumarada,

Como la de un caldero atizado e 

hirviente.

21

    Su aliento enciende los carbones,

Y saltan llamaradas de sus fauces.

22

    En su cerviz se asienta la fuerza,

Ante él cunde el terror.

23

    Los pliegues de su carne son 

compactos,

Están firmes sobre él, y no se 

mueven.

24

    Su corazón es duro como la piedra,

Firme como la muela de abajo.

25

    Cuando se yergue, tiemblan los 

valientes,

Y ante el quebrantamiento, 

retroceden.

26

    La espada que lo alcance, no resiste,

Ni la lanza ni el dardo ni la jabalina,

27

    Para él el hierro es como paja,

Y el bronce madera carcomida.

28

    No lo ahuyentan las saetas,

Y las piedras de la honda se le 

vuelven rastrojos,

29

    Como hojarasca le es reputado el 

garrote,

Y se burla del blandir de la jabalina.

30

    Su panza de tejuelas puntiagudas,

Se extiende como un trillo sobre el 

lodo.

31

    Hace hervir como un caldero lo 

profundo del mar,

Lo pone como redoma de ungüento,

32

    Detrás de sí brilla una estela:

El agua como barba encanecida.

33

    Nada hay semejante a él sobre la 

tierra,

Exento de temor,

34

    Observa todo cuanto es elevado,

Es rey sobre todos los hijos de 

soberbia.

Arrepentimiento de Job

42

Job respondió a YHVH, y dijo:

2

    Reconozco que todo lo puedes,

Y que ningún propósito te puede ser 

estorbado.

3

    Tú dijiste:° ¿Quién es el que 

oscurece mis designios con 

palabras sin sabiduría?

¡Yo!, que hablaba lo que no entendía,

Cosas demasiado maravillosas para 

mí, que jamás comprenderé.

4

    Escúchame te ruego, y hablaré,

Te preguntaré, y Tú me enseñarás:

5

    De oídas te había oído,

Pero ahora que mis ojos te ven,

6

    ¡Me aborrezco y me arrepiento, 

echándome polvo y ceniza!

Epílogo

7

 Después que YHVH habló estas palabras 

a Job, aconteció que YHVH dijo a Elifaz 

temanita: Mi ira se ha encendido contra 

ti  y  contra  tus  dos  amigos,  porque  no 

habéis hablado lo recto de mí, como mi 

siervo Job.

8

 Tomad, pues, siete becerros y siete carne-

ros, e id a mi siervo Job y ofreced holocaus-

to por vosotros. Y mi siervo Job intercederá 

por vosotros, porque Yo levantaré su ros-

tro, para no hacer con vosotros conforme a 

vuestra insensatez, pues no habéis hablado 

de mí lo recto, como mi siervo Job.

9

 Y Elifaz temanita, Bildad sujita y Sofar 

naamatita, fueron e hicieron como YHVH 

les  había  ordenado.  Y  YHVH  levantó  el 

rostro de Job.

10

 Y  al  orar  por  sus  amigos,  YHVH  res-

tauró a Job de su cautividad, y aumentó 

YHVH al doble todo lo que Job había po-

seído.

11

 Y vinieron a él todos sus hermanos y 

todas sus hermanas y todos sus antiguos 

conocidos, y comieron con él en su casa, 

y se condolieron de él, y lo consolaron por 

toda la desgracia que YHVH había hecho 

venir sobre él. Y cada uno le dio una pieza 

de plata y un anillo de oro.

42.3 .Tú dijiste


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Job 42:17

555

12

 Y YHVH bendijo los postreros días° de 

Job  más  que  los  primeros,  porque  tuvo 

catorce mil ovejas, seis mil camellos, mil 

yuntas de bueyes, mil asnas,

13

 y siete hijos y tres hijas.

14

 A  la  primera  puso  por  nombre  Jemi-

ma,°  a  la  segunda  Casia°  y  a  la  tercera, 

Keren-hapuc.°

42.12 .días.  42.14 Jemima = Paloma.  42.14 Casia es la planta del incienso.  42.14 Keren-hapuc = Frasco de esencias

15

 Y en toda la tierra no había mujeres tan 

hermosas como las hijas de Job, y su padre 

les dio herencia entre sus hermanos.

16

 Después  de  estas  cosas,  vivió  Job 

ciento  cuarenta  años,  y  vio  a  sus  hijos 

y a los hijos de sus hijos hasta la cuarta 

generación.

17

 Y murió Job anciano y lleno de días.


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1

    ¡Cuán bienaventurado es el varón 

que no anduvo en consejo de 

malos,

Ni se detuvo en camino de pecadores,

Ni en silla de escarnecedores se ha 

sentado!

2

    Sino que en la Ley de YHVH está su 

delicia,

Y en su Ley medita° de día y de 

noche.

3

    Será como árbol plantado junto a 

corrientes de agua,°

Que da su fruto a su tiempo, y su 

hoja no se marchita,

Y todo lo que hace prosperará.

4

    No así los malos, que son como la 

paja que arrebata el viento.°

5

    Por lo que no se erguirán° los malos 

en el juicio,

Ni los pecadores en la asamblea de 

los justos,

6

    Porque YHVH conoce° el camino de 

los justos,

Pero la senda de los malos conduce a 

la perdición.

S

almo

 2

1

    ¿Para qué se sublevan° las naciones,

Y los pueblos traman cosas vanas?

2

    Se alzarán los reyes de la tierra,

Y con príncipes consultarán unidos,

Contra YHVH y contra su Ungido, 

diciendo:°

3

    ¡Rompamos sus ligaduras

Y echemos de nosotros sus cuerdas!

4

    El que se sienta en los cielos se 

sonreirá,

Adonay° se burlará de ellos.

5

    Luego les hablará en su ardiente ira,

Los aterrorizará en su indignación.

6

    Yo mismo he ungido° a mi Rey sobre 

Sión, mi santo monte.°

7

    Yo promulgaré el decreto:

YHVH me ha dicho: Mi hijo eres Tú,

Yo te he engendrado° hoy.

8

    ¡Pídeme!, y te daré por herencia las 

naciones,

Y como posesión tuya los confines 

de la tierra.

9

    Los quebrantarás con cetro de hierro,

Los desmenuzarás como vasija de 

alfarero.

10

    Ahora pues, oh reyes, actuad 

sabiamente.

Admitid amonestación, jueces de la 

tierra:

11

    Servid a YHVH con temor,

Y regocijaos con temblor.

12

    ¡Besad los pies° al Hijo!°

No sea que se irrite y perezcáis en el 

camino,

S

almo

 1

1.2 Lit. susurrar como la paloma 

→Is.38.14.  1.3 Heb. palgué máyim = surcos de riego. Es decir, meditar en la palabra de Dios 

asegura  protección  y  cuidado,  como  un  árbol  en  un  huerto  privado,  beneficios  que  no  disfruta  uno  silvestre. 

1.4 

→Dn.2.35. 

1.5 LXX registra resucitarán.  1.6 Es decir, aprueba.  2.1 Arm. ragash. Esta palabra sólo aparece aquí. Su forma aramea se en-

cuentra en Dn.6.6, 12, 15 y significa estar en tumulto

2.2 .diciendo.  2.4 Adonay 

→ § 5. Otros mss registran YHVH.  2.6 Es decir, 

mediante una libación

2.6 LXX: Yo he sido hecho su rey sobre Sion, su santo monte.  2.7 El acto de engendrar al hijo tiene conno-

taciones proféticas referentes a la naturaleza humana del Mesías y su resurrección 

→Hch.13.33.  2.12 Besad los pies. En señal de 

temor reverente y sumisión. 

2.12 Hijo. Resulta incomprensible en ciertas versiones la negativa a ver el sust. arm. rB’ (bar). Nada 

oscuro hay en este registro del TM, el cual, como en otros pasajes 

→Pr.31.2 (3 veces); Esd.5.1-2; 6.1, debe ser traducido hijo.


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Salmo 5:3

557

Pues de repente se inflama su ira.

¡Cuán bienaventurados son todos los 

que se refugian en Él!

S

almo

 3

Salmo de David, 

Cuando huía delante de su hijo Absalón

1

    ¡Oh YHVH, cómo se han 

multiplicado mis adversidades!

Muchos son los que se levantan 

contra mí.

2

    Muchos dicen de mi alma:

No hay salvación para él en ’Elohim.

Selah°

3

    Pero tú, oh YHVH, eres escudo 

alrededor mío,

Mi gloria, y el que hace levantar mi 

cabeza.

4

    Con mi voz clamé a YHVH,

Y Él me respondió desde su Santo 

Monte.

Selah

5

    Yo me acosté y dormí,

Y desperté, porque YHVH me sostiene.

6

    No temeré a decenas de millares° de 

gente

Que pongan sitio contra mí.

7

    ¡Levántate, oh YHVH, y sálvame 

Dios mío!

Porque Tú eres el que golpea a todos 

mis enemigos en la mejilla,

Y quebrantas los dientes de los 

malvados.

8

    La salvación es de YHVH,°

Sobre tu pueblo sea tu bendición.

Selah

S

almo

 4

Al director del coro, con neguinot.° 

Salmo de David.

1

    ¡Oh Dios de mi justicia,° 

respóndeme cuando clamo!°

Tú, que en la estrechez me diste 

holgura,°

Ten misericordia de mí y escucha 

mi oración.

2

    Oh hijos del hombre, ¿hasta cuándo 

volveréis mi honra en infamia?

¿Hasta cuando amaréis lo vano y 

buscaréis la mentira?

Selah

3

    Conoced pues que YHVH ha hecho 

apartar al piadoso para sí;°

YHVH escucha cuando clamo a Él.

4

    ¡Temblad, y no pequéis!°

Meditad° en vuestro corazón sobre 

vuestro lecho,

Estad en silencio.

Selah

5

    Ofreced sacrificios de justicia,

Y confiad en YHVH.

6

    Muchos dicen: ¿Quién nos mostrará 

el bien?

¡Oh YHVH, alza sobre nosotros la 

luz de tu rostro!

7

    Has dado alegría a mi corazón,

Mayor que la de ellos, aun cuando 

abundan en grano y mosto.

8

    En paz me acostaré y asimismo 

dormiré,

Porque sólo Tú, YHVH, me haces 

vivir confiado.

S

almo

 5

Al director del coro, para nejilot.° 

Salmo de David.

1

    Escucha, oh YHVH, mis palabras, 

Considera mi pensamiento.°

2

    Atiende a la voz de mi clamor,

Rey mío y Dios mío, porque a ti 

oraré.

3

    Oh YHVH, oirás mi voz de mañana,

De mañana la presentaré ante ti,

Y esperaré.°

3.2 Selah. Palabra de significado dudoso, y se la interpreta: a) como indicación de una pausa en la lectura, b) como un interludio 

para instrumentos de cuerda, c) como un cambio de melodía o de énfasis. La LXX traduce este término como diapsalma inter-

ludio, lo que sugiere una observación musical en la redacción litúrgica del salmo. 

3.6 En el Targum se tradujo contiendas de 

pueblo

3.8 Heb. YHVH ha yeshuah.  4.Tít. Heb. neguinot = instrumentos de cuerda. Es prob. que este Salmo fuera entregado 

al director del coro para ser interpretado por los levitas mediante el acompañamiento musical de instrumentos melodiosos 

→1 Cr.15.21.  4.1 David no está refiriéndose aquí directamente a su propia justicia, sino a la justicia de Dios al vindicarlo. 

4.1  Lit.  En  mi  clamor.  4.1  Figura  de  dicción  que  indica  la  libertad  que  se  disfruta  después  de  la  opresión  de  la  angustia. 

4.3 Nqué maravillosa misericordia me ha mostrado YHVH 

→Sal.17.7, 31.21.  4.4 →Ef.4.26.  4.4 Lit. decid.  5.Tít. Heb. nejilot 

= instrumentos de viento. Del vocablo jalil = flauta. Esto es, el Salmo debía interpretarse al son de instrumentos de viento. 

5.1 Heb. haguiguí = mi susurro, que apenas mueve los labios 

→1 S.1.13.  5.3 Heb. Tsafáh. Es decir, observar atentamente


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Salmo 5:4

558

4

    Porque tú no eres un Dios que se 

complace en la impiedad,

La maldad no habita contigo.

5

    Los arrogantes no se presentarán 

ante tu vista,

Aborreces a todos los que hacen 

iniquidad.

6

    Destruyes a los que hablan falsedad,

YHVH abomina al hombre 

sanguinario y engañador.

7

    Pero yo entraré en tu Casa en la 

abundancia de tu misericordia,

Y en tu temor me postraré hacia tu 

santo templo.°

8

    Guíame, oh YHVH, en tu justicia,

A causa de los que se oponen 

contra mí,

Haz llano° tu camino delante de mí.

9

    Porque no hay sinceridad en la boca 

de ellos,

Todas sus entrañas son insidias,

Sepulcro abierto es su garganta,

Con su lengua hablan lisonjas.

10

    ¡Oh ’Elohim, castígalos!

¡Caigan por sus propios consejos!

¡Extravíense en la multitud de sus 

transgresiones,

Porque se han rebelado contra ti!

11

    Pero, ¡alégrense todos los que en ti 

confían!

¡Den voces de júbilo para siempre 

porque Tú los defiendes!

¡Regocíjense en ti los que aman tu 

Nombre!

12

    Porque Tú, oh YHVH, bendices al 

justo,

Y como un escudo lo rodeas de tu 

favor.

S

almo

 6

Al director del coro, con neguinot,° 

sobre sheminit.° Salmo de David.

1

    Oh YHVH, no me reprendas en 

tu ira,

Ni me castigues en tu ardiente 

indignación.

2

    ¡Ten piedad de mí, oh YHVH, porque 

desfallezco!

Sáname, oh YHVH, porque mis 

huesos se estremecen,

3

    Y mi alma está turbada en gran 

manera,

Y Tú, oh YHVH… ¿hasta cuándo?

4

    Vuélvete YHVH, y rescata mi alma,

Sálvame por tu misericordia.

5

    Porque no habrá memoria de ti en la 

Muerte,

Y en el Seol ¿quién te alabará?

6

    Estoy agotado de tanto gemir,

Todas las noches inundo° mi lecho;

Con mis lágrimas empapo mi cama.

7

    Mis ojos están enturbiados de tanto 

sufrir,

Se han envejecido a causa de todos 

mis adversarios.

8

    ¡Apartaos de mí todos vosotros, los 

que hacéis iniquidad!

Porque YHVH ha oído la voz de mi 

llanto,

9

    YHVH ha escuchado mi súplica,

YHVH ha recibido mi oración:

10

    Todos mis enemigos serán 

avergonzados y muy confundidos;

Serán vueltos atrás,

Y repentinamente avergonzados.

S

almo

 7

Shigayón° de David, que cantó a YHVH 

por causa de las palabras de Cus° benjamita.

1

    ¡Oh YHVH, Dios mío, en ti me he 

refugiado!

¡Sálvame y líbrame de todos los que 

me persiguen!

2

    No sea que desgarre mi alma cual 

león,

Que despedace, y no haya quien libre.

3

    Oh, YHVH Dios mío, si he hecho 

esto:

Si hubo iniquidad en mis manos,

4

    Si pagué con mal al que estaba en 

paz conmigo,

5.7 Lit. el templo de tu santidad.  5.8 Heb. haysar. En este caso allanar 

→Is.45.2,13.  6.Tít. Neguinot →4. Tít. nota.  6.Tít. Heb. 

sheminit. Instrumento de ocho cuerdas, afinado en el tono más bajo del solfeo. El tono menor indica un sentimiento de dolor y 

arrepentimiento. 

6.6 Lit. nado.  7.Tít. Tono musical de acompañamiento 

→Hab.3.1. Prob. significa errores.  7.Tít. Cus. Prob. 

el rey Saúl. 


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Salmo 9:1

559

(Antes, liberté al que sin causa era 

mi adversario),

5

    Que mi enemigo me persiga y me dé 

alcance,

Que pisotee por tierra mi vida,

Y ponga mi honra en el polvo.

Selah

6

    ¡Levántate, oh YHVH, en tu ira!

¡Álzate contra la furia de mis 

adversarios,

Y despierta a favor mío en el juicio 

que convocaste!

7

    ¡Que te rodee la asamblea de naciones,

Y presídela Tú desde las alturas!

8

    Oh YHVH, Tú que impartes justicia 

a los pueblos:

¡Júzgame YHVH, conforme a mi 

rectitud,

Conforme a la integridad que hay 

en mí!

9

    ¡Acábese ahora la maldad de los 

malvados,

Y sea el recto firmemente establecido!

Porque el Dios justo examina el 

corazón y los riñones.°

10

    Mi escudo está en ’Elohim,

Que salva a los rectos de corazón.

11

    ’Elohim es Juez justo,

Es un Dios que sentencia cada día.

12

    Si no se convierten,° afilará su espada,

Tensará su arco y apuntará.

13

    Preparará sus armas mortales,

Y dispondrá sus flechas abrasadoras.

14

    He aquí el inicuo° se preñó de 

iniquidad,

Concibió perversidad y dio a luz la 

falsedad.

15

    Hizo un hoyo y lo ha ahondado,

¡Pero él mismo ha caído en el foso 

preparado!

16

    Su perversidad se revierte sobre su 

cabeza,

Y su violencia desciende sobre su 

coronilla.

17

    ¡Alabaré a YHVH conforme a su 

justicia,

Y cantaré salmos al nombre de 

YHVH ’Elyón.°

S

almo

 8

Al director del coro, sobre guittit.° 

Salmo de David.

1

    ¡Oh YHVH, Señor nuestro,

Cuán glorioso es tu Nombre en toda 

la tierra!

Has puesto tu majestad sobre los 

cielos.

2

    De la boca de los niños y de los que 

maman,

Estableciste la alabanza frente a tus 

adversarios,

Para hacer callar al enemigo y al 

vengativo.

3

    Cuando contemplo tus cielos, obra 

de tus dedos,°

La luna y las estrellas que Tú afirmaste,

4

    Digo:° ¿Qué es el hombre, para que 

te acuerdes de él,

El hijo de Adam, para que lo consideres?

5

    Lo hiciste un poco menor que los 

ángeles,°

Lo coronaste de gloria y honor.

6

    Lo haces señorear en las obras de 

tus manos,

Pusiste todas las cosas debajo de sus 

pies:

7

    Ovejas y bueyes, todo ello,

Y también los animales del campo,

8

    Las aves de los cielos y los peces del 

mar,

Todo cuanto atraviesa las sendas de 

los mares.

9

    ¡Oh YHVH, Señor nuestro,

Cuán glorioso es tu Nombre en toda 

la tierra!

S

almo

 9

Al director del coro, sobre Mut-labbén.° 

Salmo de David.

a

1

    Oh YHVH, te alabaré con todo mi 

corazón,

7.9 Esto es, el subconsciente 

→Sal.16.7.  7.12 Es decir, los inicuos.  7.14 .el inicuo.  7.17 Esto es, Altísimo → § 5.  8.Tít. 

Prob. cántico de vendimia, o nombre del instrumento (guittit) referido al lugar de su fabricación (la ciudad de Gat). 

8.3 Es 

decir, la punta de tus dedos. Antropomorfismo que indica la facilidad con que Dios creó el Universo 

→Is.53.1 nota.  8.4 .Digo

8.5 Heb. elohim = dioses.  9.Tít. Lit. (prob.) muerte para el hijo


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Salmo 9:2

560

Contaré todas tus maravillas.

2

    Me alegraré y me regocijaré en ti;

Entonaré salmos a tu Nombre, oh 

’Elyón.°

b

3

    Cuando mis enemigos se volvieron 

atrás,

Tropezaron contigo y perecieron.

4

    Porque Tú has mantenido mi causa 

y mi derecho.

Te has sentado en el trono como 

Juez justo que eres:

g

5

    Reprendiste a las naciones,

Hiciste perecer al malvado,

Has borrado su nombre para 

siempre.

6

    El enemigo ha sucumbido en 

desolación eterna,

Destruiste sus ciudades,

Y con ellas ha perecido su 

recuerdo.

h

7

   °Pero YHVH permanece para 

siempre,

Él ha establecido su trono para el 

juicio,

8

    Y juzgará al mundo con justicia,

Ejecutará con equidad juicio a las 

naciones.

w

9

    ¡Sea YHVH un alto refugio para el 

oprimido,

Un baluarte en tiempos de angustia!

10

    En ti confiarán los que conocen tu 

Nombre,

Por cuanto Tú, oh YHVH, no 

abandonas a los que te buscan.

z

11

    ¡Cantad salmos a YHVH, que habita 

en Sión!

¡Anunciad entre los pueblos sus 

proezas!

12

    Porque Aquél que demanda la 

sangre° se acordó de ellos,

No ha olvidado el clamor de los 

humildes.

j

13

    Oh YHVH, ten piedad de mí,

Mira mi aflicción a causa de quienes 

me aborrecen,

Tú, que me levantaste de las puertas 

de la Muerte,

14

    Para que pueda alabarte delante de 

todos

En las puertas de la hija de Sión,°

Y pueda regocijarme en tu 

salvación.

f

15

    Las naciones se hundieron en la fosa 

que cavaron,

Sus pies quedaron atrapados en la red 

que ellos mismos escondieron.

16

    YHVH se ha dado a conocer,

Ha impartido justicia.

El malvado fue atrapado en la obra 

de sus propias manos.

Higaión.° Selah

y

17

    ¡Retornen los malvados al Seol,

Como todas las naciones que se 

olvidaron de ’Elohim!

k

18

    Porque no para siempre será 

olvidado el pobre,

Ni la esperanza de los afligidos 

perecerá para siempre.

19

    ¡Levántate, oh YHVH, y no 

prevalezca el mortal!

¡Sean juzgadas las naciones delante 

de tu presencia!

20

    ¡Infúndeles tu terror, oh YHVH,

Y conozcan los gentiles que no son 

sino mortales!

l

S

almo

 10

1

    ¿Por qué estás lejos, oh YHVH,

Y te escondes en tiempos de angustia?

9.2 Esto es, Altísimo 

→ § 5.  9.7 Nótese la falta de la cuarta letra, la dalet.  9.12 Esto es, la sangre inocente.  9.14 Esto es, 

Jerusalem

9.16 Heb. higaión del verbo hagah = susurrar, meditar. Prob. tonalidad solemne para meditar.


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Salmo 11:4

561

2

    Bajo la soberbia del impío el pobre 

es consumido.

¡Queden presos en las tramas que 

ellos mismos urdieron!

3

    Porque el malo se jacta de lo que su 

alma ansía,

Y el avaro maldice, y aborrece a 

YHVH.°

4

    Por la altivez de su rostro el malvado 

no inquiere,

’Elohim no está en sus 

pensamientos.

5

    En todo tiempo sus caminos son 

torcidos,

Tiene tus juicios lejos de su vista;

Desprecia° a todos sus adversarios,

6

    Y dice en su corazón: No seré 

conmovido jamás,

El infortunio no me alcanzará.

p

7

    °Su boca desborda de insultos, de 

engaños y de opresión,

Debajo de su lengua hay agravios y 

maldades.

8

    Se sienta al acecho, cerca de las 

aldeas,

En escondrijos asesina al inocente.

[

Sus ojos acechan para caerle al 

desvalido.

9

    Acecha en lo encubierto, como el 

león desde su guarida,

Acecha para arrebatar al pobre,

Arrebata al pobre, atrayéndolo a 

su red.

10

    Se encoge, se agazapa,

Y los menesterosos caen en sus 

fuertes garras.

11

    Dice en su corazón: ’El° ha olvidado,

Ha escondido su rostro, no lo verá 

jamás.

q

12

    °¡Levántate, oh YHVH!

¡Oh ’El, alza tu mano,

Y no te olvides del humilde!

13

    ¿Por qué el malvado menosprecia a 

’Elohim?

Porque en su corazón piensa que no 

le pedirás cuenta.

r

14

    Sin embargo Tú lo ves,

Porque observas el agravio y la 

vejación,

Para retribuirlo con tu mano.

¡A ti se encomienda el desvalido!

¡Tú eres el defensor del huérfano!

v

15

    ¡Quebranta el brazo del malvado y 

del perverso!

¡Persigue su impiedad hasta que no 

quede ninguna!

16

    YHVH es Rey por siempre jamás,

Las naciones que ocupaban su tierra 

han perecido.

t

17

    Oh YHVH, Tú has oído el anhelo de 

los humildes,

Sosiegas su corazón, tienes atento 

tu oído,

18

    Para vindicar a los huérfanos y a los 

oprimidos,

Para que el hombre de la tierra no 

vuelva a causar opresión.

S

almo

 11

Al director del coro. Salmo de David.

1

    En YHVH me he refugiado,

¿Cómo decís a mi alma,

Que escape al monte cual ave?

2

    Pues he aquí los malvados tensan el 

arco,

Preparan su saeta en la cuerda,

Para asaetear en la oscuridad a los 

de corazón recto.

3

    Si fueran destruidos los fundamentos,

¿Qué ha de hacer el justo?

4

    YHVH está en su santo templo,

YHVH tiene en los cielos su trono.

Sus ojos observan,

Sus párpados examinan a los hijos 

del hombre.

10.3 Enmienda adicional de los Soferim 

→ § 6 - § 26.  10.5 Lit. a todos sus adversarios les sopla.  10.7 Debe notarse que faltan 

las letras mem nun samej ayin pero esta última está en el v. 8 formando así el Acróstico. 

10.11 Contracción de ’Elohim.  10.12 

Falta la letra tsadei.


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Salmo 11:5

562

5

    YHVH prueba al justo,

Pero su alma aborrece al malvado,

Y al que ama la violencia.

6

    Hará llover ascuas sobre los 

malvados,

Fuego y azufre y viento abrasador,

Tal será la porción de la copa de 

ellos,

7

    Porque YHVH es justo y ama la 

justicia.

Los rectos contemplarán su rostro.

S

almo

 12

Al director del coro. En sheminit.° 

Salmo de David.

1

    ¡Salva, oh YHVH, porque se están 

acabando los piadosos!

Porque han desaparecido los leales 

entre los hijos del hombre.

2

    Hablan falsedades, cada uno a su 

prójimo,

Hablan con labios lisonjeros y doblez 

de corazón.

3

    ¡Corte YHVH todo labio lisonjero,

Y la lengua que habla altanerías!

4

    A los que dicen: Haremos poderosa a 

nuestra lengua,

Nuestros labios están 

con nosotros,

¿Quién es señor sobre nosotros?

5

    Por la opresión de los pobres,

Por el gemido del menesteroso,

Ahora me levantaré, dice YHVH.

Pondré en seguridad a los que son 

escarnecidos.

6

    Las palabras de YHVH son palabras 

puras,

Como plata refinada en un crisol en 

la tierra,

Purificada siete veces.

7

    Tú los guardarás, oh YHVH,

Nos preservarás de esta generación 

para siempre.

8

    Por todos lados deambulan los 

malvados,

Cuando la vileza es exaltada entre 

los hijos del hombre.

S

almo

 13

Al director del coro. Salmo de David.

1

    ¿Hasta cuándo, YHVH?

¿Me olvidarás para siempre?

¿Hasta cuándo esconderás tu rostro 

de mí?

2

    ¿Hasta cuándo he de estar cavilando,

Con tristeza en mi corazón cada día?

¿Hasta cuándo prevalecerá mi 

enemigo?

3

    ¡Considera, oh YHVH, Dios mío, y 

respóndeme!

Alumbra mis ojos, para que no 

duerma el sueño de la muerte,

4

    Para que mi enemigo no diga: ¡Lo 

vencí!

Ni mi adversario se alegre cuando 

sea sacudido.

5

    Porque yo en tu misericordia he 

confiado,

Y mi corazón se regocijará en tu 

salvación.

6

    Cantaré a YHVH,

Porque me ha colmado de bienes.

S

almo

 14

Al director del coro. Salmo de David.

1

    Dice el necio en su corazón: No hay 

Dios.°

Se han corrompido, hacen obras 

abominables.

No hay quien haga el bien.

2

    YHVH miró desde los cielos sobre 

los hijos del hombre,

Para ver si había algún entendido 

que buscara° a ’Elohim.

3

    Todos se desviaron, a una se han 

corrompido,

No hay quien haga lo bueno, no hay 

ni siquiera uno.

4

    ¿No tienen discernimiento todos los 

que hacen iniquidad,

Que devoran a mi pueblo como si 

comieran pan,

Y a YHVH no invocan?

12.Tít. Heb. sheminit. Esto es, octava menor.  14.1 Heb. ’Elohim.  14.2 Heb. darash. En el sentido de indagar o escudriñar


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Salmo 17:3

563

5

    Allí temblarán de espanto,

Porque ’Elohim está con la 

generación de los justos.

6

    Del consejo del pobre os habéis 

burlado,

Pero YHVH es su refugio.

7

    ¡Ah, si de Sión viniera la salvación 

de Israel!

Cuando YHVH haya hecho tornar la 

cautividad de su pueblo,

Se regocijará Jacob y se alegrará 

Israel.

S

almo

 15

Salmo de David.

1

    Oh YHVH, ¿quién habitará en tu 

Tabernáculo?

¿Quién morará en tu santo monte?

2

    El que anda en integridad y hace 

justicia,

Y habla verdad en su corazón.

3

    El que no calumnia con su lengua,

Ni hace daño a su prójimo,

Ni hace agravio a su conciudadano.

4

    Aquel ante cuyos ojos el vil es 

menospreciado,

Pero honra a los que temen a YHVH.

El que jurando aun en perjuicio suyo,

No por eso deja de cumplir.

5

    Quien no presta su dinero con usura,

Ni acepta soborno contra el inocente.

El que hace estas cosas no será 

conmovido jamás.

S

almo

 16

Mictam° de David.

1

    Guárdame, oh ’El, porque en ti me 

he refugiado.

2

    Dije° a YHVH: Tú eres mi Señor,

No hay para mí bien fuera de ti.

3

    Para los santos y para los íntegros 

que están en la tierra,

Es toda mi complacencia.

4

    Multiplicarán sus dolores quienes 

corren tras dioses° extraños;

No derramaré sus libaciones de 

sangre,

Ni en mis labios tomaré sus 

nombres.

5

    YHVH es la porción de mi herencia y 

de mi copa.

Tú sustentas mi suerte.

6

    Las cuerdas me cayeron en lugares 

deleitosos,

Y es hermosa la heredad que me ha 

tocado.

7

    Bendeciré a YHVH que me aconseja,

Aun en las noches me corrigen mis 

riñones.°

8

    A YHVH he puesto siempre delante 

de mí,

Porque está a mi diestra, no seré 

conmovido.

9

    Por lo que se alegró mi corazón, y se 

regocijó mi gloria.°

Mi carne reposará también 

confiadamente,

10

    Porque no dejarás mi alma en el 

Seol,

Ni permitirás que tu santo vea 

corrupción.

11

    Me mostrarás la senda de la vida,

En tu presencia hay plenitud de 

gozo,

Delicias a tu diestra para siempre.

S

almo

 17

Oración de David.

1

    Oye, oh YHVH, una causa justa, está 

atento a mi clamor,

Escucha mi oración hecha de labios 

sin engaño.

2

    De tu presencia proceda mi 

vindicación,

Vean tus ojos la rectitud.

3

    Tú has probado mi corazón,

Me has examinado de noche,

Me pasaste por el crisol, y nada 

hallaste.

He resuelto que mi lengua° no haga 

transgresión.

16.Tít. Término técnico, cuyo significado exacto se desconoce. LXX lo traduce como estilografía. Prob. significa tesoro escon-

dido, corona de oro o pudiera ser también el nombre de un instrumento musical de la época. 

16.2 Dije. Así, según los mss. 

más fiables. 

16.4 .dioses 

→Ex.43.14.  16.7 La parte más profunda del ser. Es decir, mi conciencia o mis entrañas o mis más 

íntimos pensamientos

16.9 Es decir, mi lengua que glorifica 

→Hch.2.26.  17.3 Lit. boca


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Salmo 17:4

564

4

    En cuanto a las obras humanas,

Con la palabra de tus labios,

Me he guardado del camino del 

violento,

5

    Mis pasos se han sostenido en tus 

caminos,

Mis pies no resbalarán.

6

    Oh ’El, yo te invocaré, y Tú me 

responderás;

Inclina tu oído hacia mí y escucha 

mis palabras.

7

    ¡Haz maravillosas tus misericordias,

Oh Tú, que salvas de los turbulentos a 

quienes se refugian a tu diestra!

8

    Guárdame como a la niña de tus ojos,

Escóndeme a la sombra de tus alas,

9

    De delante de los malvados que me 

oprimen,

De los enemigos mortales que me 

rodean.

10

    Protegidos están en su grosura,

Con su boca hablan con soberbia.

11

    En nuestros pasos nos han cercado 

ahora;

Tienen puestos sus ojos en nosotros 

para echarnos por tierra;

12

    Como león, ávido por hacer presa,

Como leoncillo agazapado en su 

cueva.

13

    ¡Levántate, oh YHVH!

¡Hazle frente!

Haz que sea derribado.

Con tu espada libra mi alma del 

inicuo,

14

    Y con tu mano, oh YHVH, de los 

hombres mundanos,

Cuya porción está en esta vida,

Cuyo vientre Tú hinchas con su 

destino:°

¡Sean saciados, pues, sus hijos,

Y dejen las migajas a los hijos de sus 

hijos!

15

    En cuanto a mí, veré tu rostro en 

justicia,

Estaré satisfecho cuando despierte a 

tu semejanza.

S

almo

 18

Al director del coro. Salmo de David, siervo de 

YHVH, el cual habló a YHVH las palabras de este 

cántico el día que YHVH lo libró de la mano 

de todos sus enemigos, y de la mano de Saúl.

1

    Dijo: ¡Te amo entrañablemente,° oh 

YHVH, fortaleza mía!

2

    ¡YHVH, roca mía y castillo mío, 

y mi libertador!

Dios mío y fortaleza mía, en quien 

me refugio,

Mi escudo y mi cuerno de salvación, 

mi alta torre.

3

    Invocaré a YHVH, quien es digno de 

toda alabanza,

Y seré salvo de mis enemigos.

4

    Me rodearon los lazos de la Muerte,

Sentí el espanto de los torrentes de 

Belial.

5

    Me rodearon las ligaduras del Seol,

Las trampas de la Muerte surgieron 

ante mí.

6

    En mi angustia invoqué a YHVH, 

clamé a mi Dios;

Y Él oyó mi voz desde su templo,

Y mi clamor delante de su presencia 

llegó a sus oídos.

7

    La tierra fue conmovida y tembló,

Se conmovieron los fundamentos de 

los montes,

Fueron sacudidos, porque Él se 

indignó.

8

    De su nariz se alzó una humareda,

Un fuego voraz de su boca,

Ascuas de fuego se encendían en Él.

9

    Inclinó los cielos, y descendió,

Con densas tinieblas bajo sus pies,

10

    Cabalgó sobre un querubín y voló,

Precipitándose sobre las alas del 

viento.

11

    Puso oscuridad por escondedero,

Con su pabellón en derredor suyo,

Oscuridad de aguas,

Densas nubes de los cielos.

12

    Por el fulgor de su presencia,

Atravesaron las densas nubes,

Descargando° granizo y ascuas 

de fuego.

17.14 Lit. tu esconder.  18.1 David no usa aquí el verbo ahav = amar, sino rajam, que denota un amor profundo y entrañable. 

18.12 .descargando


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Salmo 18:42

565

13

    YHVH tronó desde los cielos,

’Elyón hizo oír su voz:

¡Granizo y ascuas de fuego!

14

    Disparó sus saetas y los dispersó,

Puñados de relámpagos, y los 

enloqueció.

15

    Ante tu bramido, oh YHVH,

Ante el airado resoplar de tu nariz,

Se hicieron visibles los abismos del 

mar,

Y se descubrieron los cimientos del 

orbe.

16

    Envió desde lo alto y me tomó,

Me sacó de las muchas aguas.

17

    Me libró de mi más poderoso 

enemigo,

Y de los que me aborrecían,

Porque eran más fuertes que yo.

18

    Me habían acometido en el día de mi 

quebranto,

Pero YHVH fue mi apoyo.

19

    Me sacó a un lugar espacioso,

Me rescató, se complació en mí.

20

    YHVH me ha premiado conforme a 

mi justicia,

Me ha retribuido según la pureza de 

mis manos,

21

    Porque he guardado los caminos de 

YHVH,

Y no me aparté impíamente de mi 

Dios.

22

    Pues todos sus preceptos estuvieron 

delante de mí,

Y no me he quitado de encima sus 

estatutos.

23

    He sido para con Él irreprensible,

Y me he guardado de cometer 

iniquidad.

24

    YHVH ha retribuido mi rectitud,

La pureza de mis manos ante sus 

ojos.

25

    Con el misericordioso te mostrarás 

misericordioso,

Y recto para con el hombre íntegro.

26

    Puro te mostrarás con el puro,

Y con el pícaro te mostrarás sagaz.

27

    En verdad, Tú salvas al pueblo 

afligido,

Y humillas los ojos altaneros.

28

    En verdad, oh YHVH, Tú enciendes 

mi lámpara.

¡Oh Dios mío, Tú iluminas mi 

oscuridad!

29

    En verdad, contigo desbarataré 

ejércitos,

Con mi Dios asaltaré muros.

30

    El camino de Ha-’El° es perfecto,

La palabra de YHVH, acrisolada.

Escudo es a todos los que se 

refugian en Él.

31

    Porque, ¿quién es ’Eloah° aparte de 

YHVH?

¿Y quién es la Roca fuera de nuestro 

Dios?

32

    Ha-’El es quien me ciñe de poder,

Y quien hace perfecto mi camino,

33

    Que hace mis pies como de ciervas,

Y me hace estar firme en mis 

alturas,

34

    Que adiestra mis manos para la 

batalla,

De modo que mis brazos puedan 

entesar el arco de bronce.

35

    Me diste también el escudo de tu 

salvación,

Tu diestra me ha sustentado,

Y tu benignidad me ha 

engrandecido.

36

    Ensanchaste mis pasos debajo de mí,

Y mis tobillos no flaquearon.

37

    Perseguí a mis enemigos, y les di 

alcance,

Y no regresé hasta que acabé con 

ellos.

38

    Los golpeé, y no pudieron 

levantarse,

Cayeron debajo de mis pies.

39

    Me ceñiste de valor para la guerra,

Doblegaste a los que me resistían.

40

    Pusiste en fuga a mis enemigos,

Y pude destruir a quienes me 

aborrecían.

41

    Clamaron, pero no hubo quien los 

librara,

Aun a YHVH, pero no les respondió.

42

    Los desmenucé como polvo ante el 

viento,

Los arrojé como el fango de las 

calles.

18.30 Ha-’El = el Dios 

→ § 2.  18.31 ’Eloah. Singular de ’Elohim → § 2.


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Salmo 18:43

566

43

    Me has librado de las contiendas del 

pueblo,

Me has hecho cabeza de las 

naciones,

Un pueblo que no conocía me sirve.

44

    No bien oyen de mí, me obedecen,

Los extranjeros se sometieron a mí.

45

    Los extranjeros desfallecen,

Y salen temblando de sus fortalezas.

46

    ¡Viva YHVH! ¡Bendita sea mi Roca!

Sea enaltecido el Dios de mi 

salvación,

47

    El Dios que ejecuta mi venganza,

Y somete pueblos debajo de mí.

48

    Me has librado de mis enemigos,

Sí, me exaltaste sobre los que se 

alzaron contra mí,

Y me libraste del varón violento.

49

    Por tanto yo te confesaré entre las 

naciones,

¡Oh YHVH! y cantaré salmos de 

gloria a tu Nombre.

50

    Él ha engrandecido las victorias de 

su rey,

Y ha mostrado misericordia a su 

ungido:

A David y a su descendencia para 

siempre.

S

almo

 19

Al director del coro. Salmo de David.°

1

    Los cielos cuentan la gloria de Dios,

Y el firmamento muestra la obra de 

sus manos.°

2

    Día tras día vierte su mensaje,

Y noche tras noche da a conocer la 

sabiduría.

3

    No hay lenguaje ni idioma,

En que la voz de ellos no sea oída,

4

    Su trazo° llega a toda la tierra,

Y sus palabras° hasta los confines 

del orbe.

En ellos° puso tabernáculo para el 

sol,

5

    Y éste, como esposo que sale de su 

alcoba,

Se alegra cual atleta corriendo la 

carrera.

6

    De un extremo de los cielos es su 

salida,

Y su órbita hasta el término de ellos,

Y nada queda escondido de su calor.

7

    La Ley de YHVH es perfecta,

Restaura el alma.

El testimonio de YHVH es fiel,

Hace sabio al sencillo.

8

    Los mandamientos de YHVH son 

rectos,

Alegran el corazón,

El precepto de YHVH es puro,

Alumbra los ojos.

9

    El temor de YHVH es limpio,

Permanece para siempre,

Los juicios de YHVH son verdad,

Todos justos.

10

    Deseables son más que el oro,

Más que mucho oro afinado,

Y más dulces que la miel,

Las gotas que destilan del panal.

11

    Tu siervo es además amonestado por 

ellos,

En guardarlos hay grande galardón.

12

    ¿Quién discernirá sus propios 

errores?

Declárame inocente de los que me 

son ocultos.

13

    Aparta también a tu siervo de las 

soberbias,

Que no se enseñoreen de mí.

Entonces seré íntegro,

Y quedaré absuelto de gran 

transgresión.

14

    Sean aceptos delante de ti los dichos 

de mi boca,

Y la meditación de mi corazón,

Oh YHVH, Roca mía y Redentor 

mío.

S

almo

 20

Al director del coro. Salmo de David.

1

    YHVH te responda en el día de la 

adversidad,

El nombre del Dios de Jacob te 

defienda.

2

    Te envíe ayuda desde el Santuario,

Y desde Sión te sostenga.

19.Tít. 

→Sal.97.6.  19.1. → §164. 19.4 trazo. Lit. línea.  19.4 palabras: milléhem = discurso. Vocablo arameo registrado aquí 

por única vez en el TM. 

19.4 en ellos. Esto es, en los cielos


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Salmo 22:5

567

3

    Haga memoria de todas tus ofrendas

Y acepte la grosura de tus 

holocaustos.

Selah

4

    Te dé conforme al deseo de tu 

corazón,

Y cumpla todos tus propósitos.

5

    Nosotros nos alegraremos en tu 

salvación,

Y alzaremos pendón en el nombre de 

nuestro Dios.

YHVH te conceda todas tus 

peticiones.

6

    Ahora sé que YHVH salva a su 

ungido,

Le responderá desde sus santos 

cielos,

Con las poderosas acciones de su 

diestra salvadora.

7

    Éstos confían en carros de guerra, y 

aquéllos en caballos,

Pero nosotros nos acordamos del 

nombre de YHVH nuestro Dios.

8

    Ellos flaquean y caen,

Pero nosotros nos levantamos y 

estamos firmes.

9

    ¡Salva, oh YHVH!

¡Que el Rey nos responda el día que 

lo invoquemos!

S

almo

 21

Al director del coro. Salmo de David.

1

    Oh YHVH, el rey se alegra en tu 

poder,

Y en tu salvación ¡cuánto se 

regocija!

2

    Le diste el deseo de su corazón,

Y no le negaste la petición de sus 

labios.

Selah

3

    Con bendiciones escogidas saliste a 

su encuentro,

Y colocaste en su cabeza una corona 

de oro fino.

4

    Vida te pidió, y se la concediste,

Largura de días, eternamente y para 

siempre.

5

    Grande es su gloria por tu 

salvación,

Has puesto sobre él honra y majestad.

6

    Lo has bendecido para siempre.

Lo llenaste de alegría con tu 

presencia.

7

    Por cuanto el rey confía en YHVH,

Por la misericordia de ’Elyón, no 

será conmovido.

8

    Tu mano alcanzará a todos tus 

enemigos,

Tu diestra alcanzará a los que te 

aborrecen.

9

    Los convertirás en horno abrasador 

en el tiempo de tu ira,

YHVH los tragará en su ira, y el 

fuego los consumirá.

10

    Destruirás su fruto de la tierra,

Y su simiente de entre los hijos del 

hombre.

11

    Porque tramaron el mal contra ti,

Fraguaron artificios, pero no 

prevalecerán.

12

    Pues los harás huir con tus arcos,° 

Apuntarás contra sus rostros.

13

    ¡Engrandécete, oh YHVH, con tu 

fortaleza!

Cantaremos y alabaremos tu 

poderío.

S

almo

 22

Al director del coro. Sobre Aye-let Hashajar.° 

Salmo de David.

1

    ¡Dios mío, Dios mío!

¿Por qué me has desamparado?°

¿Por qué estás lejos de mi 

salvación y de las palabras de 

mi clamor?

2

    Dios mío, clamo de día, y no 

respondes,

Y de noche, y no hay sosiego 

para mí.

3

    Pero Tú eres santo,

¡Tú, que habitas entre las alabanzas 

de Israel!

4

    En ti confiaron nuestros padres,

Confiaron, y Tú los libraste.

5

    Clamaron a ti, y fueron librados,

21.12 Lit. tus cuerdas (de arco), LXX: Pues les harás volver la espalda en tu triunfo, prepararás su rostro.  22.Tít. La cierva de la 

aurora. Prob. nombre de una melodía para acompañar la letra del Salmo. 

22.1 La misma exclamación pronunciada por Jesús 

en la cruz. ¡Elí, Elí!, ¿lamá azabtani? 

→Mr.15.34. 


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Salmo 22:6

568

Confiaron en ti, y no fueron 

avergonzados.

6

    Pero yo soy gusano y no hombre,

Oprobio de los hombres y 

despreciado del pueblo.

7

    Todos los que me ven me 

escarnecen,

Hacen una mueca con los labios,

Menean la cabeza, diciendo:

8

    Se encomendó a YHVH, líbrelo Él,

Que Él lo rescate, puesto que en Él 

se complacía.

9

    Porque Tú eres el que me sacó del 

vientre,

Me diste confianza desde que estaba 

sobre los pechos de mi madre.

10

    A ti fui entregado desde la matriz,

Desde el vientre de mi madre,

Tú eres mi Dios.

11

    No te alejes de mí, porque la 

angustia está cerca,

Porque no hay quien ayude.

12

    Me han rodeado muchos toros,

Fuertes toros de Basán me han 

cercado.

13

    Abren su boca contra mí,

Como león voraz y rugiente.

14

    Soy derramado como aguas,

Y todos mis huesos 

se descoyuntan,

Mi corazón se ha derretido como 

cera

Dentro de mi pecho.

15

    Mi vigor se ha secado como tiesto,

Y mi lengua se pega a mi paladar.°

¡Me has puesto en el polvo de la 

muerte!

16

    Perros me han rodeado,

Me ha cercado cuadrilla de 

malignos,

Horadaron° mis manos y mis pies;

17

    Contar puedo todos mis huesos,

Entre tanto, ellos me miran y me 

observan.

18

    Repartieron entre sí mis vestiduras,

Y sobre mi túnica echan suertes.

19

    Pero Tú, oh YHVH, ¡no te alejes, 

fortaleza mía!

¡Apresúrate a socorrerme!

20

    ¡Libra mi alma de la espada,

Y del poder del perro mi vida!

21

    ¡Sálvame de la boca del león

Y de los cuernos de los toros salvajes!

¡Me has respondido!

22

    Anunciaré tu Nombre a mis hermanos,

En medio de la congregación te 

alabaré.°

23

    ¡Los que teméis a YHVH, alabadlo!

Glorificadlo, descendencia toda de 

Jacob,

Y temedle vosotros, descendencia 

toda de Israel,

24

    Porque no menospreció ni rechazó 

el dolor del afligido,

Ni de él ocultó su rostro,

Sino que cuando clamó a Él, lo 

escuchó.

25

    De ti viene mi alabanza en la gran 

congregación,

Cumpliré mis votos delante de los 

que lo temen.

26

    ¡Que coman y que se sacien los 

humildes!

¡Alaben a YHVH los que lo buscan,

Y vuestro corazón viva para siempre!

27

    Se acordarán y se volverán a YHVH 

de todos los confines de la tierra,

Y todas las familias de las naciones 

se postrarán delante de ti,

28

    Porque de YHVH es el reino,

Y Él regirá a las naciones.

29

    Los que comieron y engordaron en 

la tierra se postrarán ante Él,

Los que bajan al polvo se postrarán 

ante Él,

Los que no pueden conservar viva 

su alma.

22.15 Lit. mandíbulas.  22.16 La Masorah ofrece una lista de palabras que ocurren dos veces con sentidos distintos. Una de 

ellas es ka’ari = como un león, que ocurre aquí y en Is.38.13. Por otra parte, no cabe duda de que en varios códices hebreos se 

lee ka’aru = horadaron. Es probable que el texto primitivo registrara ambos vocablos. Considerando las probabilidades intrínse-

cas de trascripción se ha preferido esta última ka’aru

22.22 

→He. 2.12.


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Salmo 25:6

569

30

    Una simiente escogida° lo servirá.

Esto se dirá de Adonay hasta la 

postrera generación.

31

    Vendrán y anunciarán su justicia,

A pueblo no nacido aún, 

anunciarán° que Él hizo esto.

S

almo

 23

Salmo de David.

1

    YHVH es mi pastor, nada me falta.

2

    En lugares de tiernos pastizales me 

hace descansar,

Junto a aguas de reposo me conduce.

3

    Restaura mi alma,

Me guía por sendas de justicia por 

amor de su Nombre.

4

    Aunque ande en valle de sombra de 

muerte,

No temeré mal alguno, porque Tú 

estás conmigo,

Tu vara y tu cayado me infunden 

aliento.

5

    Aderezas mesa delante de mí en 

presencia de mis angustiadores,

Has ungido mi cabeza con aceite,

Mi copa está rebosando.

6

    Ciertamente el bien y la 

misericordia me escoltarán todos 

los días de mi vida,

Y en la Casa de YHVH moraré por 

largos días.

S

almo

 24

Salmo de David.

1

    De YHVH es la tierra y su plenitud,

El mundo y los que en él habitan.

2

    Porque Él la fundó sobre los mares

Y la afirmó sobre las corrientes.

3

    ¿Quién subirá al Monte de YHVH?

¿Y quién podrá estar en pie en su 

lugar santo?

4

    El limpio de manos y puro de 

corazón,

El que no ha elevado su alma a cosas 

vanas,

Ni ha jurado con engaño.

5

    Éste llevará la bendición de YHVH,

Y la justicia del Dios de su salvación.

6

    Tal es la generación de quienes lo 

buscan,

De los que buscan tu rostro, oh Dios 

de Jacob.

Selah

7

    ¡Alzad, oh puertas, 

vuestras cabezas!

¡Sed levantados vosotros, portales 

eternos,

Y entrará el Rey de gloria!

8

    ¿Quién es este Rey de gloria?

¡YHVH, el fuerte y poderoso!

¡YHVH, el poderoso en batalla!

9

    ¡Alzad, oh puertas, vuestras cabezas!

¡Sed levantados vosotros, portales 

eternos,

Y entrará el Rey de gloria!

10

    ¿Quién es este Rey de gloria?

¡YHVH Sebaot!

¡Él es el Rey de gloria!

Selah

S

almo

 25

De David.

a

1

    A ti, oh YHVH, elevo mi alma.

b

2

    ¡Dios mío, en ti confío!

No sea yo avergonzado,

No se alegren de mí mis enemigos.

g

3

    Ciertamente ninguno de los que 

confían en ti será defraudado.

Serán avergonzados los que se 

rebelan sin causa.

d

4

    Muéstrame, oh YHVH, tus caminos,

Enséñame tus sendas.

h

5

    Encamíname en tu verdad,

Y enséñame, porque tú eres el Dios 

de mi salvación.

w

En ti he esperado todo el día.

z

6

    Acuérdate, oh YHVH, de tus 

piedades y de tus misericordias,

Que son perpetuas.

22.30 .escogida.  22.31 .anunciarán.


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Salmo 25:7

570

j

7

    De los pecados de mi juventud y de 

mis rebeliones, no te acuerdes.

Conforme a tu misericordia 

acuérdate de mí,

Por tu bondad, oh YHVH.

f

8

    Bueno y justo es YHVH;

Por tanto Él mostrará a los 

pecadores el camino.

y

9

    Hará andar a los humildes en 

justicia,

Y enseñará a los mansos su senda.

k

10

    Todas las sendas de YHVH son 

misericordia y verdad,

Para los que observan su pacto y sus 

preceptos.

l

11

    Por amor de tu nombre, oh YHVH,

Perdonarás mi iniquidad, que es 

grande.

m

12

    ¿Quién es el hombre que teme a 

YHVH?

Él lo instruirá en el camino que 

debe escoger.

n

13

    Su alma reposará en la prosperidad,

Y su descendencia heredará la tierra.

s

14

    El secreto de YHVH es para los que 

lo temen;

A ellos hará conocer su pacto.

[

15

    Mis ojos están siempre hacia YHVH,

Pues Él sacará mis pies de la red.

p

16

    Vuélvete hacia mí y tenme 

compasión,

Porque estoy solo y afligido.

x

17

    Las angustias de mi corazón se han 

aumentado.

¡Oh sácame de mis congojas!

q

18

    °Mira mi aflicción y mi fatiga,

Y quita° todos mis pecados.

r

19

    ¡Considera cuántos son mis enemigos,

Y el aborrecimiento cruel con el que 

me aborrecen!

v

20

    ¡Guarda mi alma y líbrame!

No sea yo avergonzado,

porque en ti me refugio.

t

21

    Integridad y rectitud me preserven,

Porque en ti espero.

22

    ¡Oh ’Elohim, redime a Israel

de todas sus angustias!

S

almo

 26

De David.

1

    Hazme justicia, oh YHVH, porque en 

mi integridad he andado,

Y en YHVH confié sin titubear.

2

    Examíname, oh YHVH, y pruébame;

Escudriña mis riñones y mi corazón,

3

    Porque tu misericordia está delante 

de mis ojos,

Y ando en tu verdad.

4

    No me he sentado con hombres 

falsos,

Ni ando con hipócritas.

5

    Aborrezco la congregación de los 

malignos,

Y no me sentaré con los inicuos.

6

    Lavaré en inocencia mis manos,

Y así andaré en torno a tu altar, oh 

YHVH,

7

    Haciendo oír mi voz de gratitud,

Y contando todas tus maravillas.

8

    Oh YHVH, yo amo la Casa donde 

habitas,

25.18 Según el alfabeto hebreo, en este Acróstico falta la letra qof.  25.18 Lit. carga 

→ § 31.


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Salmo 28:4

571

Y el lugar donde reside tu gloria.

9

    No arrebates mi alma con los 

pecadores,

Ni mi vida con hombres sanguinarios,

10

    En cuyas manos está el crimen,

Y su diestra está llena de sobornos.

11

    Pero yo andaré en mi integridad.

¡Redímeme y ten misericordia de mí!

12

    Mis pies están en suelo firme,

En las congregaciones bendeciré a 

YHVH.

S

almo

 27

De David.

1

    YHVH es mi luz y mi salvación,

¿De quién temeré?

YHVH es la fortaleza de mi vida, ¿de 

quién he de atemorizarme?

2

    Cuando se juntaron contra mí 

los malignos para devorar mis 

carnes, mis adversarios y mis 

enemigos tropezaron y cayeron.

3

    Aunque un ejército acampe contra 

mí, no temerá mi corazón,

Aunque contra mí se levante guerra, 

yo estaré confiado.

4

    Una cosa he demandado a YHVH, 

ésta buscaré:

Que esté yo en la Casa de YHVH 

todos los días de mi vida,

Para contemplar la hermosura de 

YHVH, e inquirir en su templo.

5

    Porque Él me esconderá en su 

refugio en el día del mal,

Me ocultará en lo reservado de su 

Tienda.

Me pondrá en alto sobre una roca.

6

    Y mi cabeza será levantada sobre 

mis enemigos en derredor,

Y en su Tienda ofreceré sacrificios 

con voz de júbilo.

Cantaré, sí, cantaré salmos a YHVH.

7

    ¡Escucha, oh YHVH, cuando clamo 

con mi voz!

¡Ten piedad de mí y respóndeme!

8

    Sobre ti dijo mi corazón:

¡Buscad mi rostro!

Tu rostro buscaré, oh YHVH.

9

    No escondas tu rostro de mí,

Ni rechaces con ira a tu siervo.

Has sido mi ayuda, no me dejes ni 

me desampares,

Oh Dios de mi salvación.

10

    Aunque mi padre y mi madre me 

abandonen,

YHVH me recogerá.

11

    Enséñame, oh YHVH, tu camino,

Y guíame por senda llana, a causa de 

los que me acechan.

12

    No me entregues a la voluntad de 

mis adversarios,

Porque se han levantado contra mí 

testigos falsos,

Y aquellos que respiran violencia.

13

    Creo que veré la bondad de YHVH 

en la tierra de los vivientes.°

14

    Aguarda a YHVH.

¡Esfuérzate y aliéntese tu corazón!

¡Sí, espera a YHVH!

S

almo

 28

De David.

1

    A ti clamo, oh YHVH, Roca mía.

No guardes silencio para conmigo,

No sea que te desentiendas de mí,

Y llegue a ser semejante a los que 

bajan al sepulcro.

2

    Oye la voz de mis súplicas cuando 

clamo a ti,

Cuando alzo mis manos hacia 

el lugar santísimo de tu 

Santuario.

3

    No me arrastres junto con los 

impíos,

con los que hacen iniquidad,

Los cuales hablan de paz con su 

prójimo,

Mientras albergan el mal en sus 

corazones.

4

    Dales conforme a su obra y según la 

maldad de sus hechos.

27.13 Otras versiones registran: Habría yo desmayado, si no creyerse que veré la bondad… La conjunción condicional si y el 

adverbio no (que en hebreo forman la sola palabra luló’) es una falsa elipsis, pues, están puntuadas en el TM y, por tanto, deben 

omitirse.


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Salmo 28:5

572

Retribúyeles de acuerdo con la obra 

de sus manos.

¡Dales su recompensa!

5

    Por cuanto no atendieron a los 

hechos de YHVH,

Ni a la obra de sus manos,

Él los derribará y no los edificará.

6

    ¡Bendito sea YHVH,

Que oyó la voz de mis súplicas!

7

    YHVH es mi fortaleza y mi escudo,

En Él confió mi corazón, y fui 

ayudado,

Por lo que mi corazón se regocija,

Y lo alabo con mi cántico.

8

    YHVH es la fuerza para él,°

Y el refugio salvador para su ungido.

9

    ¡Salva a tu pueblo, y bendice a tu 

heredad!

¡Pastoréalos, y carga con ellos para 

siempre!

S

almo

 29

Salmo de David.

1

    ¡Tributad a YHVH, oh seres 

celestiales,°

Tributad a YHVH la gloria y la 

fortaleza!

2

    ¡Tributad a YHVH la gloria debida a 

su Nombre!

¡Postraos ante YHVH en el esplendor 

de la santidad!

3

    Voz de YHVH sobre las aguas:

¡El Dios de gloria ha tronado!

¡Es YHVH sobre las grandes aguas!

4

    La voz de YHVH es poderosa,

La voz de YHVH es majestuosa.

5

    La voz de YHVH quebranta los cedros,

Sí, YHVH tritura los cedros del 

Líbano.

6

    Hace saltar al Líbano como a un 

becerro,

Y al Sirión como a crías de toros 

salvajes.

7

    La voz de YHVH arranca llamas de 

fuego.

8

    La voz de YHVH estremece el 

desierto.

YHVH sacude al desierto de Cades.

9

    La voz de YHVH hace parir las 

ciervas, y desnuda los bosques.

Y en su Casa todo dice: ¡Gloria!

10

    YHVH preside en el diluvio,

YHVH se sienta como Rey para 

siempre.

11

    YHVH dará fuerza a su pueblo,

YHVH bendecirá a su pueblo con 

la paz.

S

almo

 30

Cántico para la dedicación de la Casa.° 

Salmo de David.

1

    Te glorifico oh YHVH, porque me 

has levantado,

Y no has dejado que mis enemigos 

se alegren de mí.

2

    ¡Oh YHVH, Dios mío!

Clamé a ti, y me sanaste.

3

    ¡Oh YHVH, arrebataste mi alma del 

Seol,

Cuando bajaba al sepulcro, hiciste 

que volviera a vivir.

4

    Cantad salmos a YHVH, vosotros sus 

santos,

Y celebrad la memoria de su santidad.

5

    Porque por un momento es su ira,

Pero su favor dura toda la vida.

Por la noche dura el llanto,

Pero al amanecer viene la alegría.

6

    En medio de mi seguridad, me 

decía:

No seré conmovido jamás,

7

    Porque con tu favor, oh YHVH,

Me habías afirmado como un monte 

fuerte.

Escondiste tu rostro, fui turbado;

8

    A ti clamé, oh YHVH,

A Adonay dirigí mi súplica:

9

    ¿Que provecho hay en mi muerte° 

cuando baje a la sepultura?

¿Te alabará el polvo?

28.8 Esto es, para David.  29.1 Heb. beney elim = hijos de ’Elohim. Prob. se refiere a los ángeles, tal como lo definen los mss. de 

Qumram. La expresión paralela de Sal.89.6, único pasaje adicional en los Salmos en donde aparece esta frase, parece apoyar esta 

idea, en contraste con Sal.96.7 que tiene una connotación terrenal. 

30.Tít. La Escritura no menciona que este salmo haya sido 

cantado en la dedicación de la primera Casa. Es notable entonces su connotación profética, pues el mismo será entonado por el 

rey David, resucitado, en ocasión de la dedicación de la futura Casa 

→17.15; Os.3.5; Ez.37.25; 44.3; 45.17.  30.9 Lit. sangre


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Salmo 31:21

573

¿Anunciará tu verdad?

10

    Escucha, oh YHVH, y ten piedad 

de mí,

¡Oh YHVH, sé Tú mi ayudador!

11

    Cambiaste mi lamento en baile,

Desataste mi cilicio y me vestiste de 

alegría,

12

    Para que mi lengua° entone salmos 

y no calle más.

¡Oh YHVH, Dios mío, te alabaré para 

siempre!

S

almo

 31

Al director del coro. Salmo de David.

1

    En ti, oh YHVH, me he refugiado,

No sea yo avergonzado jamás,

Líbrame en tu justicia.

2

    Inclina a mí tu oído y rescátame 

pronto,

¡Sé Tú mi roca fuerte y la fortaleza 

para salvarme!

3

    Porque Tú eres mi Roca y mi 

fortaleza,

Por amor de tu Nombre me guiarás 

y me encaminarás.

4

    ¡Sácame de la red que me han 

tendido,

Porque Tú eres mi refugio!

5

    En tus manos encomiendo mi 

espíritu,°

Tú, oh YHVH, Dios de verdad, me 

has redimido.

6

    Aborrezco a los que confían en 

ídolos vanos,

Pero en cuanto a mí, en YHVH he 

esperado.

7

    Me regocijaré y me alegraré en tu 

misericordia,

Porque has visto mi aflicción,

Y has tenido en cuenta las angustias 

de mi alma,

8

    No me entregaste en mano del 

enemigo,

Sino que pusiste mis pies en lugar 

espacioso.

9

    Ten misericordia de mí, oh YHVH, 

porque estoy en angustia.

Mis ojos, mi alma y mis entrañas 

están consumidos de tristeza.

10

    Mi vida se ha agotado en tristeza, y 

mis años en suspiros.

A causa de mi iniquidad mi vigor 

ha decaído, y se consumen mis 

huesos.

11

    A causa de todos mis adversarios, he 

venido a ser objeto de oprobio,

Y de mis vecinos lo soy en gran 

manera, y horror de mis 

conocidos.

Los que me ven en la calle huyen 

de mí.

12

    He sido olvidado como un muerto, 

de quien ya nadie se acuerda.

He venido a ser como un vaso 

quebrado.

13

    Oigo la calumnia de muchos,

El terror me asalta por doquier,

Mientras conspiran unidos contra mí,

Y traman quitarme la vida.

14

    Pero en ti, oh YHVH, yo he puesto 

mi confianza.

He dicho: Tú eres mi Dios.

15

    En tu mano están mis tiempos,

Líbrame de la mano de mis 

enemigos y de mis perseguidores.

16

    Haz resplandecer tu rostro sobre tu 

siervo,

¡Sálvame por tu misericordia!

17

    No sea avergonzado, oh YHVH,

por cuanto te he invocado,

¡Sean avergonzados los malos,

y bajen en silencio al Seol!

18

    Enmudezcan los labios mentirosos,

Que arrogantemente hablan contra 

el justo,

Con soberbia y menosprecio.

19

    ¡Cuán grande es tu bondad que has 

guardado para los que te temen,

Que has preparado para los que en ti 

confían,

Delante de los hijos del hombre!

20

    En lo secreto de tu presencia los 

esconderás de intrigas humanas.

En un refugio los guardarás de las 

contiendas de la lengua.

21

    ¡Bendito sea YHVH, que hizo 

maravillosa su misericordia 

para conmigo como en ciudad 

fortificada!

30.12 Lit. mi gloria.  31.5 

→Lc.23.46.


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Salmo 31:22

574

22

    Alarmado, me dije:

¡Cortado fui de tu presencia!

Pero Tú oíste la voz de mis súplicas 

cuando clamé a ti.

23

    Amad a YHVH, vosotros todos sus 

santos.

YHVH preserva a los fieles,

Pero retribuye con creces al que 

actúa con soberbia.

24

    ¡Esforzaos todos los que esperáis en 

YHVH,

Y tome aliento vuestro corazón!

S

almo

 32

Maskil° de David.

1

    ¡Cuán bienaventurado es aquel cuya 

trasgresión ha sido quitada,°

Y cubierto su pecado!

2

    ¡Cuán bienaventurado es el hombre a 

quien YHVH no le imputa iniquidad,

Y en cuyo espíritu no hay engaño!

3

    Mientras callé, se consumieron mis 

huesos,

En mi gemir todo el día.

4

    Porque de día y de noche tu mano se 

agravaba sobre mí,

Hasta que mi vigor se convirtió en 

sequedades de verano.

Selah

5

    Mi pecado te hice saber y no encubrí 

mi iniquidad.

Dije: Confesaré mis transgresiones a 

YHVH,

Y Tú mismo° cargaste° con la 

maldad de mi pecado.

Selah

6

    Por esto orará a ti todo santo en el 

tiempo en que puedas ser hallado.

Ciertamente en la inundación de 

muchas aguas,

Éstas no llegarán a él.

7

    Tú eres mi refugio, me guardarás de 

la angustia,

Me rodearás con cánticos de 

liberación.

Selah

8

    Te haré entender y te enseñaré el 

camino en que debes andar,

Sobre ti fijaré mis ojos, y te 

aconsejaré.

9

    No seáis como el caballo o el mulo, 

sin entendimiento.

Cuya boca ha de ser frenada con 

bozal y freno,

Para que se acerquen a ti.°

10

    Muchos dolores habrá para el 

impío,

Pero al que confía en YHVH lo rodea 

la misericordia.

11

    ¡Alegraos, oh justos, en YHVH, y 

regocijaos!

¡Cantad con júbilo todos vosotros, 

los rectos de corazón!

S

almo

 33

1

    ¡Alegraos, oh justos, en YHVH!

En los íntegros es hermosa la 

alabanza.

2

    Dad gracias a YHVH con arpa,

Cantadle con salterio y decacordio.

3

    Cantadle cántico nuevo,

¡Hacedlo bien, tañendo con júbilo!

4

    Pues recta es la palabra de YHVH,

Y toda su obra es con fidelidad.

5

    Él ama la rectitud y la justicia.

De la misericordia de YHVH está 

llena la tierra.

6

    Por la palabra de YHVH fueron 

hechos los cielos,

Y todas sus constelaciones por el 

aliento de su boca.

7

    Él junta como montón las aguas del 

mar,

Él pone en depósitos los abismos.

8

    ¡Tema a YHVH toda la tierra!

¡Tiemblen delante de Él todos los 

habitantes del mundo!

9

    Porque Él dijo y se hizo,

Él ordenó y se cumplió.

10

    YHVH hace nulo el consejo de las 

naciones,

Y frustra los planes de los pueblos.

32.Tít. Esto es, poema instructivo.  32.1 Heb. nasa’ = cargar 

→ § 31.  32.5 El pronombre personal es enfático.  32.5 Heb. nasa’

Este verbo expresa una acción triple: levantar, cargar sobre sí mismo y alejar 

→ § 31.  32.9 Lit. nada de acercarse a ti. Expresión 

ambigua que puede entenderse en dos sentidos contrarios: para que se acerquen a ti, o, para que no se acerquen a ti.


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Salmo 34:12

575

11

    El consejo de YHVH permanece para 

siempre,

Y los pensamientos de su corazón 

por todas las generaciones.

12

    ¡Cuán bienaventurada es la nación 

cuyo Dios es YHVH!

El pueblo que Él escogió para su 

propia heredad.

13

    YHVH mira desde los cielos,

Contempla a todos los hijos del 

hombre.

14

    Desde el lugar de su morada,

Observa a todos los habitantes de la 

tierra.

15

    El que forma los corazones de todos 

ellos,

Considera todas sus acciones.

16

    El rey no se salva por la multitud del 

ejército,

Ni el poderoso escapa por la mucha 

fuerza.

17

    Vano es el caballo para la victoria,

Ni su gran fuerza permitirá escapar.

18

    He aquí el ojo de YHVH sobre los 

que lo temen,

Sobre los que esperan en su 

misericordia,

19

    Para salvar sus almas de la muerte,

Y mantenerlos vivos en tiempo de 

hambre.

20

    Nuestra alma ha esperado por 

YHVH,

Él es nuestra ayuda y nuestro escudo.

21

    Por tanto, en Él se alegrará nuestro 

corazón,

Porque en su santo Nombre hemos 

confiado.

22

    Sea tu misericordia sobre nosotros, 

oh YHVH,

Según esperamos en ti.

S

almo

 34

De David. Cuando cambió su conducta ante 

Abimelec, y éste lo echó y se fue.

a

1

    Bendeciré a YHVH en todo tiempo,

Su alabanza estará de continuo en 

mi boca.

b

2

    En YHVH se gloriará mi alma,

Lo oirán los mansos y se alegrarán.

g

3

    Engrandeced a YHVH conmigo,

Y exaltemos a una su Nombre.

d

4

    Busqué a YHVH y Él me respondió,

Y me libró de todos mis temores.

h

5

    Los que miraron a Él fueron 

iluminados,

Y sus rostros nunca serán 

avergonzados.°

z

6

    Este pobre clamó, y YHVH lo escuchó,

Y lo libró de todas sus angustias.

j

7

    El ángel de YHVH acampa alrededor 

de los que lo temen,

Y los defiende.

f

8

    Gustad y ved que YHVH es bueno.

¡Cuán bienaventurado es el varón 

que se refugia en Él!

y

9

    Temed a YHVH, vosotros sus santos,

Porque nada falta a los que le temen.

k

10

    Los leoncillos necesitan y tienen 

hambre,

Pero los que buscan a YHVH no 

tendrán falta de ningún bien.

l

11

    Venid hijos, escuchadme,

El temor de YHVH os enseñaré.

m

12

    ¿Quién es el hombre que desea la 

vida,

Que desea muchos días para ver el 

bien?

34.5 Según alfabeto hebreo, falta la letra vav.


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Salmo 34:13

576

n

13

    Guarda tu lengua del mal,

Y tus labios de hablar engaño.

s

14

    Apártate del mal y haz el bien;

Busca la paz y persíguela.°

[

15

    Los ojos de YHVH están sobre los 

justos,

Y sus oídos atentos al clamor de 

ellos.

p

16

    El rostro de YHVH está contra los 

que hacen el mal,

Para cortar su memoria de la tierra.

x

17

    Claman los justos,° y YHVH los oye,

Y los libra de todas sus angustias.

q

18

    Cercano está YHVH a los 

quebrantados de corazón,

Y salva a los contritos de espíritu.

r

19

    Muchas son las aflicciones del justo,

Pero de todas ellas lo librará YHVH.

v

20

    Él guarda todos sus huesos,

Ni uno de ellos será quebrantado.

t

21

    Matará al malo la maldad,

Y los que aborrecen al justo serán 

declarados culpables.

22

    YHVH redimirá el alma de sus 

siervos,

No serán condenados cuantos en Él 

confían.

S

almo

 35

Salmo de David.

1

    ¡Oh YHVH, contiende con los que 

contienden contra mí!

¡Pelea contra los que me combaten!

2

    ¡Echa mano del escudo y del broquel,

Y levántate en mi ayuda!

3

    Saca la lanza y cierra el paso a mis 

perseguidores.

Di a mi alma: ¡Yo soy tu victoria!

4

    Sean avergonzados y confundidos 

los que buscan mi vida,

Sean vueltos atrás y confundidos los 

que intentan mi mal,

5

    Sean como la paja al viento,

Y acóselos el ángel de YHVH;

6

    Sea su camino tenebroso y 

resbaladizo,

Y el ángel de YHVH los persiga;

7

    Porque sin causa me tendieron su 

red,

Sin motivo cavaron fosa para mi 

alma.

8

    Véngale la destrucción inesperada;

Préndalo la red que él mismo puso, y 

caiga en ella con quebranto.

9

    Mi alma se deleitará en YHVH,

Se regocijará en su salvación.

10

    Todos mis huesos dirán:

Oh YHVH, ¿quién como Tú,

Que libras al débil del que es más 

fuerte que él,

Y al pobre y menesteroso del que lo 

despoja?

11

    Se levantan testigos falsos;

De lo que no sé me preguntan.

12

    Me devuelven mal por bien,

Causando desolación a mi alma,

13

    Yo en cambio, estando ellos 

enfermos, me vestía de cilicio,

Y afligía mi alma con ayuno,

Hasta que mi súplica a favor de ellos 

me era concedida.

14

    Como por mi compañero, como por 

mi hermano actuaba;

Como el que llora por su madre, 

afligido me humillaba.

15

    Pero ellos, en mi adversidad se 

alegran, y se juntan contra mí 

con otros, a quienes no conozco, 

y no cesan de hostigarme.

34.14 Es decir, activamente 

→Mt.5.9 nota.  34.17 .los justos.


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Salmo 37:1

577

16

    Se mofan de mí con las burlas más 

profanas,

Y sobre mí hacen rechinar sus 

dientes.

17

    Oh Adonay, ¿hasta cuándo seguirás 

mirando esto?

¡Libra mi vida de sus destrucciones,

Mi alma solitaria de los leones!

18

    Yo te daré gracias ante la gran 

congregación,

Te alabaré entre un pueblo 

numeroso.

19

    No se alegren de mí los que sin 

causa son mis enemigos,

Ni guiñen el ojo los que me 

aborrecen sin causa.

20

    Por cuanto no hablan de paz,

Sino que contra los mansos de la 

tierra,

Inventan palabras calumniosas.

21

    Ensanchan su boca contra mí, 

diciendo:

¡Ea, nuestros ojos lo están viendo!

22

    ¡Oh YHVH, Tú también lo estás 

viendo: ¡No calles!

¡Oh Adonay, no estés lejos de mí!

23

    ¡Despierta y alértate a mi defensa,

Dios mío y Señor mío, para defender 

mi causa!

24

    Júzgame conforme a tu justicia, oh 

YHVH Dios mío,

Y no se alegren ellos a costa mía.

25

    No digan satisfechos: ¡He aquí 

nuestro deseo!

No digan: ¡Lo hemos devorado!

26

    Sean avergonzados y abochornados a 

una los que se alegran de mi mal,

Vístanse de vergüenza y confusión 

los que se engrandecen 

contra mí.

27

    Canten de júbilo y alégrense los que 

se deleitan en mi justicia,

Y digan siempre:

¡Engrandecido sea YHVH,

Que se complace en la prosperidad 

de su siervo!

28

    Y mi lengua hablará de tu justicia,

Y de tu alabanza todo el día.

S

almo

 36

Al director del coro. De David, siervo de YHVH.

1

    El oráculo de iniquidad del impío° 

me dice al corazón:

No hay temor de Dios delante de sus 

ojos.

2

    Se ilusiona de que su culpa no será 

descubierta ni aborrecida.

3

    Las palabras de su boca son de 

maldad y engaño,

Ha dejado de actuar con sensatez 

para hacer el bien.

4

    Trama iniquidad sobre su cama,

Se mantiene en camino no bueno,

Pues lo malo no aborrece.

5

    Oh YHVH, tu misericordia llega 

hasta los cielos,

Y hasta las nubes tu fidelidad.

6

    Tu justicia es semejante a los 

montes de Dios,

Tus juicios, al inmenso abismo.

Tú, oh YHVH, preservas al hombre y 

la bestia.

7

    ¡Oh ’Elohim, cuán preciosa es tu 

misericordia!

Por eso los hombres se amparan 

bajo la sombra de tus alas.

8

    Serán completamente saciados con 

la grosura de tu Casa,

Y los abrevarás del torrente de tus 

delicias.

9

    Porque contigo está el manantial de 

la vida,

En tu luz veremos la luz.

10

    Extiende tu misericordia a los que te 

conocen,

Y tu justicia a los rectos de corazón.

11

    No me alcance el pie de 

la soberbia,

Ni me mueva la mano del malvado.

12

    Entonces caerán los que obran 

iniquidad,

Serán derribados, y no podrán 

levantarse.

S

almo

 37

De David.

a

1

    No te irrites a causa de los malignos,

36.1 Es decir, la maldad que lleva dentro de sí


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Salmo 37:2

578

Ni tengas envidia de los que hacen 

iniquidad.

2

    Porque como hierba, pronto serán 

cortados,

Y como la hierba verde se secarán.

b

3

    Confía en YHVH y practica el bien;

Habita en la tierra y apaciéntate de 

la fidelidad.

4

    Deléitate asimismo en YHVH,

Y Él te concederá las peticiones de 

tu corazón.

g

5

    Encomienda a YHVH tu camino,

Y confía en Él, y Él hará.

6

    Exhibirá tu justicia como la luz,

Y tu derecho como el mediodía.

d

7

    Guarda silencio ante YHVH,

Y espérale con paciencia.

No te irrites a causa del que prospera 

en su camino,

A causa del hombre que maquina 

intrigas.

h

8

    Deja la ira, desecha el enojo,

No te enardezcas en manera alguna 

a hacer el mal.

9

    Porque los malos serán cortados,

Pero los que esperan en YHVH 

heredarán la tierra.

w

10

    Un poco aún, y el malo no existirá 

más,

Examinarás con diligencia su lugar, 

y él no estará allí.

11

    Pero los mansos heredarán 

la tierra,

Y se deleitarán con 

abundante paz.

z

12

    Maquina el malo contra el justo,

Y cruje sus dientes contra él.

13

    Adonay se ríe de él,

Porque ve que le llega su día.

j

14

    Los impíos desenvainan la espada y 

entesan su arco para derribar al 

pobre y al menesteroso,

Para matar a los de recto proceder.

15

    Su espada penetrará en su mismo 

corazón,

Y sus arcos serán quebrados.

f

16

    Mejor es lo poco del justo,

Que la abundancia de muchos 

malvados.

17

    Porque los brazos de los impíos 

serán quebrados,

Pero YHVH sostiene a los justos.

y

18

    Conoce YHVH los días de los 

íntegros,

Y la heredad de ellos será para 

siempre.

19

    No serán avergonzados en tiempo 

adverso,

Y en los días de hambre serán 

saciados.

k

20

    No así los malvados, que perecerán.

Los enemigos de YHVH serán 

consumidos como grosura de 

carneros,

Y se disiparán como el humo.

l

21

    El malvado toma prestado y no paga,

Pero el justo tiene misericordia, 

y da.

22

    Porque sus benditos heredarán la 

tierra,

Y los por Él malditos serán cortados.

m

23

    Por YHVH son afirmados los pasos 

del hombre aquel

En cuyo camino Él se complace.°

24

    Aunque caiga, no quedará postrado,

Porque YHVH sostiene su mano.

n

25

    Joven fui, y he envejecido,

37.23 

→ § 41. 


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Salmo 38:6

579

Y no he visto justo desamparado,

Ni a su descendencia que mendigue 

pan.

26

    En todo tiempo tiene misericordia, 

y presta,

Y su linaje es para bendición.

s

27

    Apártate del mal, y practica el bien,

Y tendrás morada para siempre.

28

    Porque YHVH ama la causa justa,

Y no desampara a sus piadosos,

Para siempre° serán guardados,

Pero la descendencia de los malos se 

extinguirá.

[

29

    Los justos heredarán la tierra,

Y habitarán en ella perpetuamente.

p

30

    La boca del justo profiere sabiduría,

Y su lengua habla justicia.

31

    La Ley de su Dios está en su 

corazón,

En ninguno de sus pasos resbala.

x

32

    Acecha el malvado al justo,

Y procura matarlo.

33

    YHVH no lo abandonará en su 

mano,

Ni tolerará que sea condenado en el 

juicio.

q

34

    Espera en YHVH y guarda su 

camino,

Y te exaltará para que poseas la 

tierra,

Cuando los malvados sean cortados, 

tú lo veras.

r

35

    He visto al malvado, sumamente 

enaltecido,

Extenderse como árbol frondoso en 

su propio suelo.

36

    Pero uno pasa junto a él,

y he aquí, ya no está más,

Lo busqué, y no fue hallado.

v

37

    Considera al recto y mira al justo,

Porque hay un final dichoso para el 

hombre de paz.

38

    Pero los trasgresores serán todos a 

una destruidos,

La posteridad de los malvados será 

cortada.

t

39

    La salvación de los justos proviene 

de YHVH,

Él es su fortaleza en el tiempo de 

angustia.

40

    YHVH los ayuda y los libra,

Los liberta de los malvados y los 

salva,

Porque se han refugiado en Él.

S

almo

 38

Salmo de David, para recordar.°

1

    Oh YHVH, no me reprendas en tu 

ira,

Ni me castigues en tu ardiente 

indignación.

2

    Porque tus saetas se han clavado 

en mí,

Y tu mano ha descendido sobre mí.

3

    Nada sano° hay en mi carne a causa 

de tu indignación,

Nada intacto hay en mis huesos a 

causa de mi pecado.

4

    Porque mis iniquidades rebasan mi 

cabeza,

Y como pesada carga se agravan 

sobre mí;

5

    Mis llagas hieden y supuran,

Por causa de mi locura.

6

    Estoy encorvado, y abatido en gran 

manera;

Todo el día camino ensombrecido,

37.28 Aquí debería comenzar una sección con la letra áyin, pero el término leolam tiene una lámed prefijada, que hace que no 

forme parte del Acróstico. La LXX sugiere la adición de la palabra hebrea avalim que en griego es anomoi = malvados y que en 

hebreo sí comienza con áyin

38.Tít. Heb. lehazkir. Expresión que también aparece en el Sal.70.1. Si se considera a la luz de 

la terminología de Lv.2.2; 24.7,8 y 1 Cr.16.4, parece indicar un cántico especial para recordar ante YHVH, con gratitud, durante 

las ofrendas vegetales. 

38.3 

→Is.1.6. 


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Salmo 38:7

580

7

    Porque mis lomos están llenos de 

ardor,

Y nada sano hay en mi cuerpo.°

8

    Estoy debilitado y molido en gran 

manera,

Gimo a causa de la conmoción de mi 

corazón.

9

    ¡Oh Adonay, ante ti están todos mis 

deseos,

Y mi suspiro no te es oculto!

10

    Mi corazón palpita, me ha dejado mi 

vigor,

Y la luz de mis ojos, aun ésta, me 

falta ya.

11

    Mis amigos y mis compañeros se 

mantienen lejos de mi herida,

Mis allegados permanecen a 

distancia.

12

    Los que buscan mi vida me tienden 

lazos,

Y los que procuran mi desgracia 

dicen desventuras,

Y traman engaños todo el día.

13

    Y yo no oigo, como si fuera sordo,

Y como mudo, que no abre su boca.

14

    Sí, he llegado a ser como un hombre 

que no oye,

Y en cuya boca faltan argumentos.

15

    Porque en ti, oh YHVH, espero,

Y Tú, Adonay, Dios mío, serás quien 

me responda.

16

    Digo por tanto: No se alegren a 

costa mía;

No se insolenten contra mí cuando 

mi pie resbale

17

    Porque estoy a punto de caer,

Y mi dolor está ante mí 

continuamente.

18

    Te confesaré por tanto mi iniquidad,

Y me contristaré por mi pecado.

19

    Mis enemigos están vivos y son 

fuertes,

Y se han multiplicado los que me 

aborrecen sin causa.

20

    Me son hostiles, y me pagan mal por 

bien,

Porque he seguido lo bueno.

21

    ¡No me desampares, oh YHVH, Dios 

mío,

Ni te quedes lejos de mí!

22

    ¡Apresúrate a socorrerme,

oh Adonay, salvación mía!

S

almo

 39

Al director del coro, para Jedutún.° 

Salmo de David.

1

    Dije: Guardaré mis caminos para no 

pecar con mi lengua,

Llevaré mordaza en mi boca mientras 

el inicuo esté delante de mí.

2

    Enmudecí con profundo silencio,

Me callé, aun acerca de lo bueno, y 

se agravó mi dolor.

3

    Mi corazón se enardeció dentro 

de mí,

El fuego se avivó con mi meditación;

Entonces hablé así con mi lengua:

4

    Oh YHVH, hazme saber mi final,

Cuál sea la medida de mis días,

Para que yo mismo sepa cuán 

efímero soy.

5

    He aquí, como a palmos me has 

dado mis días,

Y mi edad es como nada ante ti.

Ciertamente es completa vanidad 

todo hombre que vive.°

Selah

6

    Solamente en una semejanza de 

realidad° anda el hombre en 

derredor,

Solamente para correr tras el viento 

se afana,°

Pues atesora, pero no sabe quién lo 

recogerá.

7

    Y ahora Adonay, ¿qué más espero?

Mi esperanza está en ti.

8

    Líbrame de todas mis trasgresiones,

No me pongas por escarnio del 

insensato.

9

    Enmudecí, no abrí mi boca,

Porque Tú lo dispusiste.

10

    Quita de sobre mí tu azote,

Porque por el golpe de tu mano 

estoy siendo consumido.

11

    Con castigos corriges al hombre por 

su iniquidad,

38.7  Lit.  carne.  39.Tít.  Heb.  Yedutún  o  Yeditún 

→62.1;  77.1.  Levita  cantor  de  la  Casa  de  Dios  →1  Cr.16.41-42;  25.1  y 

2 Cr.5.12. 

39.5 Lit. que está en pie.  39.6 .de realidad.  39.6 se afana 

→Ecl.1.3, 14. 


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Salmo 40:17

581

Como la polilla consumes su 

hermosura.

Ciertamente todo hombre es 

vanidad.

Selah

12

    Escucha mi oración, oh YHVH,

Y presta oído a mi clamor;

No guardes silencio ante mis lágrimas,

Porque he llegado a ser un extraño 

para ti,

Un forastero, como todos mis 

padres.

13

    Aparta de mí tu ira, para que tome 

aliento,

Antes que me vaya, y no exista más.

S

almo

 40

Al director del coro. Salmo de David.

1

    Pacientemente esperé° a YHVH,

Y se inclinó hacia mí y oyó mi 

clamor.

2

    Me hizo subir del pozo de la 

desesperación, del lodo cenagoso;

Asentó mis pies sobre una roca y 

afirmó mis pasos.

3

    Puso luego en mi boca un cántico 

nuevo,

Alabanza a nuestro Dios.

Verán esto muchos, y temerán,

Y confiarán en YHVH.

4

    ¡Cuán bienaventurado es el varón 

que puso en YHVH su confianza!

Que no mira a los soberbios ni a los 

que se desvían tras la mentira.

5

    ¡Oh YHVH, Dios mío, has 

aumentado tus maravillas,

Y tus designios para con nosotros!

¡No hay nadie comparable a ti!

Si los anunciara y hablara de ellos,

No pueden ser enumerados.

6

    Sacrificio y ofrenda° no te agradan;

Has abierto mis oídos;

Holocausto y expiación° no has 

demandado.

7

    Entonces dije: He aquí, vengo:

En la cabecilla° del rollo está escrito 

acerca de mí:

8

    Oh Dios mío, el hacer tu voluntad 

me ha agradado,

Y tu Ley está en mis entrañas.

9

    He proclamado las buenas nuevas de 

justicia

Delante de la gran congregación,

He aquí, oh YHVH, Tú lo sabes; no 

refrené mis labios,

10

    Ni encubrí tu justicia dentro de mi 

corazón.

He proclamado tu fidelidad y tu 

salvación;

No he ocultado tu misericordia 

y tu verdad ante la gran 

congregación.

11

    Tú, pues, oh YHVH, no retengas de 

mí tus misericordias,

Y tu bondad y fidelidad me guarden 

siempre.

12

    Porque me han rodeado males sin 

número;

Me han sobrecogido mis 

iniquidades,

Y no puedo levantar la vista;

Superan en número los cabellos de 

mi cabeza,

Y mi corazón me falla.

13

    ¡Oh YHVH, quieras Tú librarme!

¡Oh YHVH, apresúrate a socorrerme!

14

    ¡Sean abochornados y confundidos 

a una los que me buscan para 

destruirme!

¡Sean vueltos atrás y avergüéncense 

los que desean mi mal!

15

    ¡Queden atónitos a causa de su 

vergüenza

Los que me dicen: Ea, ea!

16

    ¡Regocíjense y alégrense en ti todos 

los que te buscan!

Digan siempre los que aman tu 

salvación:

¡Engrandecido sea YHVH!

17

    Aunque estoy afligido y necesitado,

Adonay se acordará de mí.

Tú eres mi ayuda y mi libertador;

¡Dios mío no te tardes!

40.1 Lit. Esperando esperé. Indica énfasis.  40.6 Heb. zévaj - minjáh. Términos que describen la ofrenda de sangre y la vegetal 

respectivamente. 

40.6 Lit. ofrenda expiatoria. Es decir: consumida totalmente por el fuego.  40.7 Esto es, la parte donde el rollo 

se une al eje o cilindro.


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Salmo 41:1

582

S

almo

 41

Al director del coro. Salmo de David.

1

    ¡Oh las bienaventuranzas de aquel 

que se preocupa por el pobre!

En el día malo lo librará YHVH.

2

    YHVH lo guardará y le dará vida;

Será dichoso en la tierra,

Y no lo entregará a la voluntad de 

sus enemigos.

3

    YHVH lo sustentará en su lecho de 

dolor:

En su enfermedad mullirás bien su 

cama.

4

    Dije yo: Oh YHVH, ten misericordia 

de mí;

Sana mi alma, porque contra ti he 

pecado.

5

    Mis enemigos dicen mal de mí:

¿Cuándo morirá y perecerá su 

nombre?

6

    Y si alguno viene a verme, habla 

mentira,

Su corazón recoge malas noticias,

Y saliendo afuera, las divulga.

7

    Todos los que me aborrecen 

murmuran reunidos contra mí;

Maquinan el mal contra mí, diciendo:

8

    Cosa diabólica° se ha apoderado 

en él;

Ahora que cayó en cama, no volverá 

a levantarse.

9

    Aun el hombre de mi paz, en quien 

yo confiaba, que comía de mi pan,

Levantó contra mí su calcañar.

10

    Pero Tú, oh YHVH, ten misericordia 

de mí;

Haz que me levante, y les daré su 

merecido.

11

    En esto conoceré que te complaces 

en mí:

En que mi enemigo no triunfe 

sobre mí.

12

    En cuanto a mí, en mi integridad 

me has sustentado,

Y me afirmarás en tu presencia para 

siempre.

13

    ¡Bendito sea YHVH el Dios de Israel,

Desde la eternidad y hasta la 

eternidad!

¡Amén y amén!

S

almo

 42

Al director del coro. 

Maskil de los hijos de Coré.

1

    Como el ciervo brama por las 

corrientes de agua,

Así, oh ’Elohim, te anhela el alma 

mía.

2

    Mi alma tiene sed de Dios, del Dios 

vivo.

¿Cuándo entraré y veré° el rostro de 

Dios?

3

    Mis lágrimas fueron mi pan de día y 

de noche,

Mientras todo el día me dicen: 

¿Dónde está tu Dios?

4

    Me acuerdo de estas cosas, y 

derramo mi alma dentro de mí:

De cómo marchaba con la multitud 

y los conducía hasta la Casa de 

Dios,

Entre voces de júbilo y de acción de 

gracias de la multitud en fiesta 

solemne.

5

    ¿Por qué te abates, oh alma mía,

Y te turbas dentro de mí?

Espera en ’Elohim, porque aún he 

de alabarlo:

¡Salvación mía y Dios mío!

6

    Mi alma está abatida dentro de mí,

Por tanto, me acordaré de ti desde la 

tierra del Jordán,

Y de los hermonitas, del monte 

Mitsar.

7

    Un abismo llama a otro abismo con 

el rumor de tus cascadas,

Todas tus ondas y tus olas pasaron 

sobre mí.

8

    De día YHVH enviará su 

misericordia,

Y de noche su cántico estará 

conmigo.

Oración al Dios de mi vida:

41.8 Lit. de Belial.  42.2 Un cambio en la vocalización (respaldado por el Targum, Siríaca, Col.1.15 y Heb.1.3) hace que la fórmula 

se lea: ¿cuándo entraré y veré el rostro de Dios? pero debido al escrúpulo teológico judío (de que ningún hombre puede ver a 

Dios 

→Ex.33.2), el TM fue vocalizado para que trasmita la fórmula me presentaré ante Dios


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Salmo 44:16

583

9

    Digo a ’El: Roca mía, ¿por qué te has 

olvidado de mí?

¿Por qué ando enlutado por la 

opresión del enemigo?

10

    Como quien quebranta mis huesos, 

mis enemigos me afrentan,

Diciéndome cada día: ¿Dónde está 

tu Dios?

11

    ¿Por qué te abates alma mía, y te 

turbas dentro de mí?

Espera en ’Elohim, porque aún he 

de alabarlo:

¡Salvación mía y Dios mío!

S

almo

 43

1

    ¡Hazme justicia, oh ’Elohim, y 

defiende mi causa!

Líbrame de la gente impía, del 

hombre perverso y engañador.

2

    Pues Tú eres el Dios de mi 

fortaleza,

¿Por qué me has desechado?

¿Por qué ando afligido por la 

opresión del enemigo?

3

    Envía tu luz y tu verdad, éstas me 

guiarán,

Me llevarán a tu santo monte, y a tus 

moradas.

4

    Entonces entraré al altar de Dios, al 

Dios que es la alegría de mi gozo,

Y te alabaré con el decacordio, oh 

’Elohim, Dios mío.

5

    ¿Por qué te abates, alma mía,

y por qué te turbas dentro de mí?

Espera en ’Elohim, porque aún he 

de alabarlo.

¡Salvación mía y Dios mío!

S

almo

 44

Al director del coro. 

Maskil de los hijos de Coré.

1

    Oh ’Elohim, hemos oído con 

nuestros oídos,

Nuestros padres nos lo han dicho: 

Una obra portentosa hiciste en 

sus días,

En los días de la antigüedad.

2

    Para plantarlos, expulsaste con tu 

mano a las naciones,

Abatiste a los pueblos, para hacerlos 

arraigar.

3

    Aunque no por su espada heredaron 

la tierra, ni su brazo les dio la 

victoria,

Sino tu diestra, tu brazo, y la luz de 

tu rostro,

Porque te complacías en ellos.

4

    Tú eres mi rey y mi Dios.

¡Ordena la salvación de Jacob!

5

    Contigo derribaremos a nuestros 

enemigos,

En tu Nombre hollaremos a 

nuestros adversarios.

6

    No confiaré en mi arco,

Ni mi espada me hará vencedor,

7

    Porque eres Tú el que nos libras de 

nuestros opresores,

Y el que avergüenzas a los que nos 

aborrecen.

8

    En ’Elohim nos gloriaremos todo el 

día,

Y alabaremos tu Nombre para 

siempre.

Selah

9

    Pero ahora nos has desechado y 

confundido;

No sales ya con nuestros ejércitos.

10

    Nos haces retroceder ante el 

adversario,

Y los que nos aborrecen nos 

saquean.

11

    Nos entregaste como ovejas al 

matadero,

Y nos has esparcido entre las 

naciones.

12

    Has vendido a tu pueblo de balde,

Sin exigir ningún precio por ellos.

13

    Nos convertiste en el oprobio de 

nuestros vecinos;

En escarnio y burla de cuantos nos 

rodean.

14

    Nos pusiste como refrán entre las 

naciones;

Como objeto de burla en medio de 

los pueblos.

15

    Cada día mi vergüenza está delante 

de mí,

Y la confusión ha cubierto mi 

rostro,

16

    Por el grito del que me vitupera y 

me deshonra;

Por causa del enemigo y del 

vengativo.


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Salmo 44:17

584

17

    Todo esto nos ha sobrevenido, pero 

no nos hemos olvidado de ti, ni 

hemos sido infieles a tu pacto.

18

    Nuestro corazón no se ha vuelto 

atrás,

Ni nuestros pasos se han desviado de 

tu senda,

19

    Aun así, nos has quebrantado en 

sitio de chacales,

Y nos has cubierto con la sombra de 

la muerte.

20

    Si nos hubiéramos olvidado del 

nombre de nuestro Dios,

O alzado nuestras palmas a dioses 

extraños,

21

    ¿Acaso ’Elohim no demandaría esto?

Porque Él conoce los secretos del 

corazón.

22

    Pero por causa de ti somos muertos 

cada día,

Somos contados como ovejas para el 

degüello.

23

    ¡Despierta Adonay! ¿Por qué 

duermes?

Desvélate, no nos abandones para 

siempre.

24

    ¿Por qué escondes tu rostro, y te 

olvidas de la aflicción,

Y de la opresión nuestra?

25

    Porque nuestra alma está agobiada 

hasta el polvo,

Y nuestro cuerpo postrado en la 

tierra.

26

    ¡Levántate, oh Ayuda nuestra,

Y redímenos por tu misericordia!

S

almo

 45

Al director del coro. Sobre lirios.° 

Maskil de los hijos de Coré. Canción de amor.

1

    Rebosa° mi corazón palabra buena,

Dirijo al Rey mi canto.

Mi lengua es como buril° de diestro 

escriba:

2

    Eres el más hermoso de los hijos de 

los hombres,

La gracia se derramó en tus labios,

Por tanto, ’Elohim te ha bendecido 

para siempre.

3

    ¡Cíñete tu espada sobre el muslo, oh 

Valiente!

¡Cíñete° de gloria y majestad!

4

    ¡Cabalga en tu majestad, y triunfa 

por causa de la verdad, la 

mansedumbre y la justicia,

Y tu diestra te guiará a hazañas 

terribles!°

5

    Pueblos caerán debajo de ti;

Tus saetas agudas penetrarán en el 

corazón de los enemigos del Rey.

6

    Tu trono, oh ’Elohim, es eterno y 

para siempre.

Cetro de equidad es el cetro de tu 

reino.

7

    Has amado la justicia y aborrecido la 

impiedad,

Por eso te ungió ’Elohim, el Dios 

tuyo,

Con óleo de alegría más que a tus 

compañeros.

8

    Mirra, áloe y casia exhalan todos tus 

vestidos,

Desde los palacios de marfil te 

alegran instrumentos de cuerda;

9

    Hijas de reyes están entre tus nobles.

A tu diestra está la novia,° con oro 

de Ofir.

10

    Oye, hija, y mira, y aplica tu oído,

Olvida tu pueblo y la casa de tu 

padre,

11

    Y deseará el Rey tu hermosura,

E inclínate a Él, porque él es tu 

Señor.

12

    Y las hijas de Tiro vendrán con 

ofrendas,

Los más ricos de los pueblos 

implorarán tu favor.

13

    Toda gloriosa es la princesa en su 

aposento,

De brocado de oro es su vestido,

14

    Con vestidos bordados será llevada 

ante el Rey,

45.Tít. Heb. shoshannim. Prob. signifique lirios. Nmelodía sobre la seis cuerdas.  45.1 Heb. rajásh = proferir, hacer brotar. Este 

verbo aparece solamente aquí y en un sustantivo derivado que significa sartén 

→Lv.2.7; 7.9. En hebreo moderno significa susu-

rrar, hacer murmullos

45.1 Heb. ‘et. Instrumento usado para grabar en piedra 

→Job 19.24.  45.3 .Cíñete.  45.4 →Is.63.1-6. 

45.9 Heb. segal. Único registro en el TM. 


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Salmo 48:1

585

Vírgenes irán en pos de ella,

Compañeras suyas que serán 

llevadas a ti.

15

    Serán conducidas con alegría y 

regocijo,

Y entrarán en el palacio del Rey.

16

    En lugar de tus padres estarán tus 

hijos,

A quienes harás príncipes en toda la 

tierra.

17

    Haré que la memoria de tu Nombre 

sea recordada en todas las 

generaciones,

Por lo cual los pueblos te confesarán 

eternamente y para siempre.

S

almo

 46

Al director del coro. 

De los hijos de Coré, sobre Alamot.° Cántico.

1

    Dios es nuestro amparo y fortaleza,

Nuestro pronto auxilio en las 

tribulaciones.

2

    Por tanto, no temeremos aunque la 

tierra sea removida,

Y los montes se derrumben en el 

corazón del mar;

3

    Aunque bramen y se turben sus aguas,

Y tiemblen los montes a causa de su 

braveza.

Selah

4

    Hay un río cuyas corrientes alegran 

la ciudad de Dios,

El Santuario, la morada de ’Elyón.°

5

    ’Elohim está en medio de ella, no 

será conmovida,

’Elohim la ayudará al clarear la 

mañana.

6

    Se conmocionan las naciones,

Tambaléanse los reinos,

Al dar su voz, se derrite la tierra.

7

    YHVH Sebaot° está con nosotros,

Nuestro refugio es el Dios de Jacob.

Selah

8

    Venid, contemplad las obras de 

YHVH,

Que puso asolamientos en la tierra,

9

    Que hace cesar las guerras hasta los 

confines de la tierra,

Que quiebra el arco, que parte la 

lanza,

Y quema los carros en el fuego.

10

    Estad quietos, y conoced que

Yo soy ’Elohim,

Seré exaltado entre las naciones,

Seré enaltecido en la tierra.

11

    YHVH Sebaot está con nosotros,

Nuestro refugio es el Dios de Jacob.

Selah

S

almo

 47

Al director del coro. 

Salmo de los hijos de Coré.

1

    ¡Batid palmas° pueblos todos! 

¡Aclamad a ’Elohim con voz de 

júbilo!

2

    Porque YHVH ’Elyón° es temible,

Rey grande sobre toda la tierra.

3

    Él someterá los pueblos a nosotros,

Las naciones bajo nuestros pies,

4

    Pues Él eligió nuestra heredad,

La hermosura de Jacob, al cual amó.

Selah

5

    ’Elohim asciende entre 

aclamaciones de júbilo,

YHVH asciende al son del shofar.

6

    ¡Cantad a ’Elohim, cantad!

¡Cantad a nuestro Rey, cantad!

7

    Porque ’Elohim es el Rey de toda la 

tierra,

¡Cantad con entendimiento!

8

    ¡’Elohim reina sobre las naciones!

¡’Elohim se sienta en su santo trono!

9

    Los príncipes de las naciones se 

reúnen como pueblo del Dios de 

Abraham,

10

    Porque de ’Elohim son los escudos 

de la tierra,

Y Él es sublime en gran manera.

S

almo

 48

Cántico. Salmo de los hijos de Coré.

1

    ¡Grande es YHVH, y digno de ser 

alabado en gran manera

En la ciudad de nuestro Dios, en su 

santo monte,

46.Tít. Término musical, cuyo significado más probable es tonos altos 

→1 Cr.15.20ss.  46.4 → § 5.  46.7 → § 4.  47.1 Heb. 

taqá´. La expresión no es común cuando se refiere a las palmas de las manos 

→Nah.3.19, mientras que sí lo es cuando se usa 

para tocar la trompeta o el shofar 

→Sal.81.4.  47.2 → § 5. 


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Salmo 48:2

586

2

    Hermosa elevación, gozo de toda la 

tierra;

Monte Sión, vórtice del Aquilón,°

Ciudad del gran Rey.

3

    ’Elohim entre sus palacios, descuella 

como alta torre.

4

    He aquí, se aliaron los reyes de la 

tierra,

Y avanzaron unidos;

5

    Pero al verla así, quedaron abismados,

Se turbaron, huyeron aterrorizados.

6

    Allí les sobrecogió un temblor,

Dolores como de parturienta.

7

    Con el solano

Quebraste las naves de Tarsis.

8

    Tal como lo oímos, lo hemos visto,

En la ciudad de YHVH Sebaot, la 

ciudad de nuestro Dios,

’Elohim la afirmará para siempre.

Selah

9

    Nos acordamos de tu misericordia, 

oh ’Elohim,

En medio de tu templo;

10

    Como tu Nombre, oh ’Elohim,

Así tu loor llega hasta el extremo de 

la tierra,

Tu diestra está llena de justicia.

11

    ¡Alégrese el Monte Sión!

¡Regocíjense las hijas de Judá a 

causa de tus juicios!

12

    Rodead a Sión y andad alrededor de 

ella,

Contad sus torres,

13

    Observad atentamente su antemuro,

Contemplad su ciudadela,

Para que lo contéis a la generación 

venidera.

14

    Que así es ’Elohim, nuestro Dios, 

eternamente y para siempre.

¡Él nos capitaneará más allá de la 

muerte!

S

almo

 49

Al director del coro. 

Salmo de los hijos de Coré

1

    Oíd esto, pueblos todos,

Escuchad, habitantes del mundo,

2

    Los de humilde condición, y los 

encumbrados,°

Ricos y pobres juntamente:

3

    Mi boca hablará sabiduría,°

Y la meditación de mi corazón, 

inteligencia.

4

    Inclinaré al proverbio mi oído,

Propondré con el arpa mi enigma:

5

    ¿Por qué he de temer los días 

aciagos,

Cuando me rodee la perversidad de 

mis opresores,

6

    Que confían en las riquezas,

Y se glorían en sus fortunas 

inmensas?

7

    Ninguno de ellos podrá en modo 

alguno redimir al hermano,

Ni pagar a ’Elohim su rescate

8

    (porque la redención de su alma 

es de tan alto precio, que no se 

logrará jamás),°

9

    Para que viva eternamente,

Y jamás vea corrupción.

10

    Porque verá que hasta los sabios 

mueren,

Lo mismo que perecen el ignorante 

y el necio,

Y dejan a otros sus riquezas.

11

    Su íntima aspiración es que sus 

casas serán eternas;

Sus moradas, de generación en 

generación,

Y a sus tierras han puesto sus 

nombres.

12

    Pero el hombre no permanecerá en 

honra;

Es semejante a las bestias que 

perecen.

13

    Este camino suyo es necedad,

Con todo, sus seguidores se 

complacen en sus dichos.

Selah

14

    Se han destinado a sí mismos como 

un rebaño para el Seol,

La Muerte los pastorea,

Bajan directamente a la tumba,

Su figura se desvanece,°

48.2 lit. los lados del norte. Esto es, el centro del viento huracanado que proviene del norte.  49.2 Lit. los hijos de Adam como 

los hijos del hombre

49.3 Es de notar que tanto sabiduría como inteligencia están en lo que en hebreo se denomina plural de 

intensidad, denotando así sabiduría profunda e inteligencia aguda. 

49.8 En hebreo, esta negación es muy enfática. Sin embar-

go, ocho mss. hebreos registran ciertamente nadie puede redimirse a sí mismo, en una clara referencia a Nm.18.15. 

49.14 Es 

decir, su cuerpo, ya a punto de convertirse en polvo. 


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Salmo 50:23

587

Y el Seol es su morada.

15

    Pero ’Elohim redimirá mi alma del 

poder° del Seol,

Porque me llevará consigo.

Selah

16

    No te perturbes cuando alguno se 

enriquece,

Cuando aumenta la gloria de su 

casa,

17

    Porque nada llevará en su muerte, 

ni descenderá tras él su gloria.

18

    Aunque su propia alma lo bendiga 

mientras vive,

Y sea alabado porque prospera,

19

    Se irá a la generación de sus 

mayores,

Y no verá más la luz.

20

    El hombre que vive con honores, y 

no entiende esto,

Es semejante a las bestias que 

perecen.

S

almo

 50

Salmo de Asaf.

1

    ’El, ’Elohim, YHVH: Ha hablado y 

convocado a la tierra desde el 

levante hasta el poniente.

2

    Desde Sión, perfección de hermosura,

’Elohim resplandeció.

3

    Nuestro Dios viene, y no en silencio;

Un fuego devorador lo precede,

Y en derredor suyo ruge una gran 

tempestad.

4

    Desde arriba convoca a los cielos y a 

la tierra,

Para juzgar a su pueblo:

5

    ¡Juntadme a mis santos!

Que sellaron pacto conmigo por 

medio del sacrificio.

6

    Los cielos proclamarán su justicia, 

porque ’Elohim es el Juez.

Selah

7

    Oye, pueblo mío, y hablaré,

Testificaré contra ti, Israel.

Yo soy ’Elohim, el Dios tuyo.

8

    No te reprendo por tus sacrificios,

Ni por tus holocaustos, que están 

siempre delante de mí.

9

    No aceptaré becerros de tu casa,

Ni machos cabríos de tus apriscos.

10

    Porque mía es toda bestia del 

bosque,

Y los ganados sobre mil colinas.

11

    Conozco toda ave de los montes,

Y todo lo que se mueve en el campo 

me pertenece.

12

    Si tuviera hambre, no te lo diría a ti,

Porque mía es la tierra y su 

plenitud.

13

    ¿Como Yo acaso carne de bueyes, o 

bebo sangre de machos cabríos?

14

    ¡Sacrifica a ’Elohim ofrenda de 

alabanza!

¡Cumple a ’Elyón tus votos!

15

    Invócame entonces en el día de 

angustia,

Yo te libraré, y tú me honrarás.

16

    Pero al malo dijo Dios:

¿Quién eres tú para recitar mis 

preceptos, y tomar mi pacto en 

tu boca?

17

    Tú, que aborreces la corrección, y 

das la espalda a mis palabras.

18

    Que si ves a un ladrón, corres en su 

compañía,

Y con los adúlteros es tu parte.

19

    Entregaste tu boca al mal,

Y tu lengua trama el engaño.

20

    Te sientas,° y hablas contra tu 

hermano,

Y difamas al hijo de tu propia madre.

21

    Estas cosas has hecho,

¿Y guardaré silencio?

¿Pensaste que Yo soy igual a ti?

Te reprenderé y expondré tus 

pecados ante tus propios ojos.

22

    Entended bien esto, los que de 

’Eloah os olvidáis,

No sea que os destroce y no haya 

quien os salve.

23

    El que sacrifica acciones de gracias, 

ése me honrará,

Y al que ordena rectamente su 

camino,

Le mostraré la salvación de Dios.

49.15 Lit. de la mano.  50.20 Esta postura simboliza deliberación calculada 

→1.1, no hablar mal en un momento de acalora-

miento. 


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Salmo 51:1

588

S

almo

 51

Al director del coro. Salmo de David, cuando el 

profeta Natán vino a él, después que 

se había llegado a Betsabé.

1

    ¡Ten piedad de mí, oh ’Elohim, 

conforme a tu misericordia,

Conforme a la multitud de 

tus piedades, borra mis 

transgresiones!

2

    ¡Lávame más y más de mi maldad, y 

purifícame de mi pecado!

3    Porque yo reconozco mis 

transgresiones,

Y mi pecado está siempre delante de 

mí.

4

    Contra ti, contra ti solo he pecado,

Y he hecho lo malo delante de tus 

ojos,

Para que seas reconocido justo en tu 

sentencia,

Y tenido por puro en tu juicio.

5

    He aquí, en maldad fui formado,

Y en pecado me concibió mi madre.

6

    He aquí, Tú deseas la verdad en lo 

íntimo,

Por tanto en lo secreto hazme 

conocer sabiduría.

7

    ¡Purifícame con hisopo° y seré 

limpio,

Lávame, y quedaré más blanco que 

la nieve!

8

    ¡Hazme oír gozo y alegría, y 

regocíjense los huesos que abatiste!

9

    ¡Aparta tu rostro de mis pecados, y 

borra todas mis iniquidades!

10

    ¡Oh ’Elohim, crea en mí un corazón 

limpio,

Y renueva un espíritu recto dentro 

de mí!

11

    ¡No me eches de tu presencia,

Ni quites de mí tu santo Espíritu!

12

    ¡Restitúyeme el gozo de tu 

salvación,

Y un espíritu noble me sustente!

13

    Así enseñaré a los transgresores tus 

caminos,

Y los pecadores se convertirán a ti.

14

    ¡Líbrame del delito de sangre,°

Oh ’Elohim, Dios de mi salvación,

Y mi lengua cantará con gozo tu 

justicia!

15

    Oh Adonay, abre mis labios, y mi 

boca proclamará tu alabanza.

16

    Porque no quieres sacrificio, que yo 

daría,

Y si doy holocausto, no lo aceptas.

17

    El sacrificio grato a ’Elohim° es el 

espíritu quebrantado.

Al corazón contrito y humillado no 

despreciarás Tú, oh ’Elohim.

18

    Haz bien con tu benevolencia a 

Sión,

Edifica los muros de Jerusalem.

19

    Entonces te agradarán los sacrificios 

de justicia,

Holocaustos y ofrendas enteramente 

quemadas;

Entonces se ofrecerán novillos sobre 

tu altar.

S

almo

 52

Al director del coro. Maskil de David, cuando Doeg 

edomita llegó y dio aviso a Saúl, diciéndole: 

David ha entrado en casa de Ahimelec.

1

    ¿Por qué te jactas del mal, oh 

poderoso?

¡La misericordia de ’Elohim es 

continua!

2

    Tu lengua maquina destrucción,

Produce engaños, como una navaja 

afilada.

3

    Has amado el mal más que el bien;

La mentira, más que el hablar 

justicia.

Selah

4

    Oh, lengua engañosa,

Has amado toda suerte de palabras 

perversas;

5

    Por lo que ’Elohim te derrumbará 

para siempre,

Te arrastrará y te arrancará de tu 

morada,

Él te desarraigará de la tierra de los 

vivientes.

Selah

6

    Verán esto los justos y temerán, y se 

reirán de él, diciendo:

51.7 En la ley ceremonial se usaba el hisopo en los ritos de purificación 

→Ex.12.22; Lv.14.4; Nm.19.18.  51.14 Esto es, homi-

cidio

51.17 Lit. los sacrificios de ’Elohim


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Salmo 55:4

589

7

    ¡Ved al hombre que no puso a 

’Elohim como su baluarte,

Sino que confió en sus muchas 

riquezas y se hizo fuerte en su 

maldad!

8

    Pero yo estaré como olivo frondoso 

en la Casa de Dios,

Porque en la misericordia de Dios 

confío eternamente y para 

siempre.

9

    Te daré gracias eternamente porque 

has actuado,

Y pacientemente esperaré en tu 

Nombre,

Porque es bueno delante de tus santos.

S

almo

 53

Al director del coro. Sobre Majalat.° 

Maskil de David.

1

    Dice el necio en su corazón: No hay 

Dios.

Se han corrompido, e hicieron 

abominable maldad,

No hay quien haga el bien.

2

    ’Elohim observa desde los cielos a 

los hijos del hombre,

Para ver si hay quien entienda,

Si hay quien busque a ’Elohim.

3

    Todos ellos se apartaron,

A una se hicieron inútiles,

No hay quien haga lo bueno,

No hay ni siquiera uno.

4

    ¿Acaso los que hacen iniquidad no 

saben que devoran a mi pueblo 

como si comieran pan,

Y que a ’Elohim no invocan?

5

    Allí, donde no había nada que temer, 

se sobresaltaron de terror,

Porque ’Elohim esparció los huesos 

del que puso asedio contra ti,

Los avergonzaste, porque ’Elohim 

los desechó.

6

    ¡Quién hiciera venir desde Sión la 

salvación a Israel!

Cuando ’Elohim haga volver del 

cautiverio a su pueblo,

¡Regocíjese Jacob y alégrese Israel!

S

almo

 54

Al director del coro. Sobre Neguinot. Maskil de 

David, cuando llegaron los zifeos y anunciaron a 

Saúl: ¿Acaso no se esconde David entre nosotros?

1

    Oh ’Elohim, sálvame por tu Nombre,

y hazme justicia con tu poder.

2

    Oh ’Elohim, escucha mi oración,

Presta oído a los dichos de mi boca.

3

    Porque extraños se han levantado 

contra mí, y hombres violentos 

buscan mi vida,

No han puesto a ’Elohim delante de sí.

Selah

4

    He aquí ’Elohim es el que me ayuda,

Adonay está con los que sostienen 

mi alma.

5

    ¡Devuelve el mal a mis enemigos,

Y córtalos en tu verdad!

6

    Con ofrenda voluntaria te ofreceré 

sacrificios,

¡Oh YHVH, daré gracias a tu 

Nombre, porque es bueno,

7

    Porque me ha librado de toda 

angustia

Y mi ojo ha visto por encima de mis 

enemigos!°

S

almo

 55

Al director del coro. Sobre Neguinot. 

Maskil de David.

1

    Oh ’Elohim, oye mi oración,

Y no te escondas de mi súplica.

2

    Atiéndeme y respóndeme;

Me lamento en mi meditación, y 

estoy conturbado,

3

    A causa de la voz del enemigo,

Por la opresión del malvado,

Porque vierten iniquidad sobre mí, y 

me persiguen con furia.

4

    Mi corazón se retuerce dentro de mí,

53.Tít. Término musical, cuyo significado se desconoce, probablemente, sobre tono de flauta. Este salmo es muy similar al 14, 

salvo algunas variantes como el v. 6, pero se diferencia especialmente en que ahora, bajo la tradición Elohista, se sustituye el 

nombre YHVH por ’Elohim

54.7 Heb. que los enemigos han sido derrotados.


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Salmo 55:5

590

Y sobre mí han caído los terrores de 

la Muerte.

5

    Me han sobrevenido temores y 

temblores,

El horror me está abrumando,

6

    Y digo:

¡Quién me diera alas como de 

paloma!

Volaría yo, y descansaría;

7

    Ciertamente huiría lejos,

Moraría en el desierto.

Selah

8

    Me apresuraría a buscar refugio,

Del turbión y la tormenta.

9

    ¡Devora Adonay, divide sus lenguas!

Que he visto en la ciudad violencia y 

discordia;

10

    Día y noche rondan sobre sus 

muros,

Y la maldad y la injusticia están 

adentro.

11

    Dentro de ella hay insidias,

Y de su plaza no se apartan la 

arbitrariedad y el fraude.

12

    Porque no es un enemigo el que 

me agravia, pues lo soportaría, 

ni se alzó contra mí el que me 

aborrecía,

Pues me habría ocultado de él,

13

    Sino tú, un hombre igual a mí,

Mi compañero, mi íntimo amigo,

14

    Que juntos teníamos dulce 

comunión,

Y amistosamente andábamos en la 

Casa de Dios.

15

    ¡Sorpréndalos la Muerte y 

desciendan vivos al Seol!

Porque el mal está en sus moradas, 

instalado en medio de ellos.

16

    Pero yo clamaré a ’Elohim, y YHVH 

me salvará.

17

    De tarde, de mañana y a mediodía° 

me lamentaré y gemiré,

Y Él oirá mi voz,

18

    Y en paz redimirá mi alma del 

ataque en contra mío.°

Aunque contra mí haya muchos,

19

    Dios oirá y los humillará,

Él, que reina desde antiguo.

Selah

Porque ellos no cambian, ni temen a 

’Elohim.

20

    Extendió sus manos contra los que 

estaban en paz con él;

Violó su pacto.

21

    Su boca fue más blanda que la 

mantequilla,

Pero en su corazón había guerra;

Más suaves que el aceite fueron sus 

palabras,

Pero eran puñales.

22

    Echa sobre YHVH tu carga, y Él te 

sustentará,

No para siempre dejará caído al 

justo.

23

    Oh ’Elohim, Tú los harás bajar a la 

fosa profunda;

Los sanguinarios y los traidores no 

llegarán a la mitad de sus días,

Pero yo he confiado en ti.

S

almo

 56

Al director del coro. Sobre la paloma silenciosa 

en parajes muy lejanos.° Mictam de David, cuando 

los filisteos lo capturaron en Gat.

1

    ¡Oh ’Elohim, ten misericordia de mí!

Porque el hombre me devoraría;

Me ataca y me acosa sin tregua.

2

    Mis enemigos me pisotean todo el 

día,

Muchos son los que combaten con 

soberbia contra mí.

3

    El día en que temo, yo confío en ti;

4

    En ’Elohim, cuya palabra alabo,

En ’Elohim he confiado, no temeré.

¿Qué puede hacerme el hombre?°

5

    Todo el día pervierten mis palabras,

Todos sus pensamientos son contra 

mí para mal.

6

    Se reúnen, acechan, observan mis 

pasos,

Esperan atrapar mi alma.

7

    ¿Escaparán por su iniquidad?

¡Oh ’Elohim, derriba a los pueblos 

en tu furor!

55.17 Nótese la apropiada forma de secuenciar el día 

→Gn.1.5,8, etc.  55.18 Npara que no se acerquen a mí. La raíz hebrea 

qarav significa tanto acercarse como atacar

56.Tít. El significado de esta frase es desconocido. Se sugiere que es una alusión 

a los años de peregrinación de David. 

56.4 Lit. carne


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Salmo 58:7

591

8

    Tú has contado mi deambular,

Pon mis lágrimas en tu redoma.

¿No están ellas en tu Rollo?

9

    El día en que yo te invoque, 

retrocederán mis enemigos.

Esto sé: ¡’Elohim está por mí!

10

    En ’Elohim, cuya palabra alabo, en 

YHVH, cuya palabra alabo,

11

    En Dios he confiado, no temeré.

¿Qué puede hacerme el hombre?

12

    Oh ’Elohim, sobre mí están los votos 

que te hice,

Te pagaré sacrificios de acción de 

gracias.

13

    Porque has librado mi alma de la 

muerte,

Y mis pies de la caída,

Para que ande delante de ’Elohim en 

la luz de la vida.

S

almo

 57

Al director del coro. Sobre Al Tashjet.° 

Mictam de David, en la cueva, cuando huía de Saúl.

1

    Ten misericordia de mí, oh’ Elohim,

Ten misericordia de mí,

Porque en ti ha confiado mi alma, 

y a la sombra de tus alas me 

refugio hasta que pase la 

calamidad.

2

    Clamaré a ’Elohim ’Elyón,° al Dios 

que me favorece.

3

    Él enviará desde los cielos y me librará 

de la infamia del que me acosa.

Selah

¡’Elohim enviará su misericordia y 

su verdad!

4

    Mi alma está en medio de leones,

Estoy echado entre hijos de hombres 

que vomitan fuego,

Sus dientes son lanzas y saetas,

Y su lengua espada aguda.

5

    ¡Exaltado seas sobre los cielos, oh 

’Elohim!

¡Tu gloria sea sobre toda la tierra!

6

    Tendieron una red ante mis pasos,

Y mi alma fue oprimida,

Cavaron un hoyo delante mío, pero 

ellos mismos han caído en él.

Selah

7

    Pronto está mi corazón, oh ’Elohim, 

mi corazón está dispuesto,

Cantaré y entonaré salmos.

8

    ¡Despierta, gloria mía!°

¡Despertad, salterio y arpa!

Que yo despertaré al alba.

9

    Te alabaré entre los pueblos, 

oh Adonay,

Te entonaré salmos entre las 

naciones.

10

    Porque grande hasta los cielos es tu 

misericordia,

Y hasta las nubes tu verdad.

11

    ¡Exaltado seas sobre los cielos, oh 

’Elohim!

¡Tu gloria sea sobre toda la tierra!

S

almo

 58

Al director del coro. Sobre Al Tashjet.° 

Mictam de David.

1

    Magistrados: ¿Pronunciáis en verdad 

justicia?

¿Juzgáis rectamente, hijos del 

hombre?

2

    Antes, cometéis crímenes a 

conciencia en la tierra,

Y vuestras manos sopesan° violencia.

3

    Los malvados se extravían desde la 

matriz,

Desde el vientre se pervierten los 

que hablan mentira.

4

    Llevan veneno como veneno de 

serpiente,

De víbora sorda que cierra el oído,

5

    Para no oír la voz de los que encantan,

Del más experto en encantamientos.

6

    ¡Oh ’Elohim, rompe sus dientes en 

su boca!

¡Oh YHVH, quiebra los colmillos de 

los leones!

7

    ¡Escúrranse como aguas que se 

pierden!

Al disparar sus saetas, ¡queden éstas 

despuntadas!

57.Tít. Esto es, no destruyas.  57.2 

→ § 5.  57.8 Esto es, lengua mía.  58.1 Heb. élem. Significado desconocido. Prob. el término 

en el original era elim. = dioses 

→Sal.82.1.  58.Tít. Esto es, no destruyas.  58.2 Es decir, la balanza como instrumento para una 

transacción equitativa, era utilizada en perjuicio del inocente. 


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Salmo 58:8

592

8

    Sean como el caracol, que se deslíe 

al arrastrarse;

Como aborto, que no llega a ver el 

sol.

9

    Antes que vuestras ollas° sientan el 

fuego de los espinos,

Así vivos, así airados, los barrerá el 

torbellino.

10

    El justo se alegrará cuando vea la 

venganza,

Y lave sus pies en la sangre del 

impío.

11

    Entonces dirá el hombre: ¡En verdad 

hay galardón para el justo!

¡En verdad hay un Dios que juzga en 

la tierra!

S

almo

 59

Al director del coro. Sobre Al Tashjet. 

Mictam de David, cuando Saúl envió a
vigilar la casa para hacer que muriera.

1

    ¡Oh Dios mío, líbrame de mis 

enemigos!

Ponme en lo alto, lejos de los que se 

levantan contra mí.

2

    Líbrame de los que hacen iniquidad,

Y sálvame de hombres 

sanguinarios.

3

    Porque he aquí han puesto 

emboscada a mi vida,

Hombres fieros se conjuran contra 

mí,

No por trasgresión o por pecado 

mío, ¡oh YHVH!

4

    Sin culpa mía corren y se aprestan.

Despierta, ven a mi encuentro, y 

mira,

5

    Tú, YHVH ’Elohim Sebaot, Dios de 

Israel: ¡Despierta para castigar a 

todos los gentiles!

No tengas misericordia de ningún 

inicuo traidor.

Selah

6

    Vuelven al anochecer,

Aullando como perros, rondan la 

ciudad.

7

    He aquí, se jactan con su boca,

Y en sus labios hay puñales, y dicen: 

¿Quién nos oye?

8

    Oh YHVH, Tú te reirás de ellos, te 

burlarás de todos los gentiles.

9

    ¡Oh Fuerza mía, en ti espero!

¡’Elohim es mi baluarte!

10

    Mi Dios, con su clemencia, acudirá a 

mi encuentro,

’Elohim hará que impasible vea a 

mis adversarios.

11

    ¡No los mates, no sea que mi pueblo 

olvide!

¡Dispérsalos con tu poder y 

humíllalos, oh Adonay, escudo 

nuestro!

12

    El pecado de su boca es la palabra de 

sus labios,

Sean pues apresados en su soberbia,

Por las mentiras y maldiciones que 

han proferido.

13

    ¡Acábalos en indignación, acábalos 

para que no sean más,

Y sépase hasta los confines de la 

tierra

Que ’Elohim gobierna en Jacob!

Selah

14

    ¡Vuelvan al anochecer y aúllen como 

perros rondando la ciudad!

15

    ¡Vaguen buscando qué comer y

en toda la noche no se sacien y 

gruñan!

16

    Pero yo cantaré de tu poder,

Aclamaré de mañana tu 

misericordia,

Porque fuiste mi alto refugio y 

amparo en el día de mi angustia.

17

    ¡Oh fuerza mía, te cantaré salmos!

Porque Tú, oh ’Elohim, eres mi alto 

refugio,

Y el Dios de mi misericordia.

S

almo

 60

Al director del coro. Al shoshan edot.° Mictam de 

David, para enseñar, cuando combatió contra Aram 

Najaraim y contra Aram-soba, y volvió Joab e hirió a 

doce mil edomitas en el Valle de la Sal.

1

    ¡Oh ’Elohim! Tú nos has rechazado,

Airado, nos quebrantaste.°

¡Vuélvete a nosotros!

58.9 Esto es, olla de intrigas.  60 Tít. Esto es, a la tonada del lirio del testimonio.  60.1 Heb. paráts. Este verbo heb. da la idea del 

rompimiento de filas en un ejército, o bien, la brecha de una muralla producida por arietes durante un asedio. 


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Salmo 62:8

593

2

    Has hecho temblar el país, lo 

resquebrajaste.

¡Repara sus grietas, porque se 

desmorona!

3

    Duras cosas has hecho ver a tu pueblo,

Nos has dado a beber el vino del 

aturdimiento.

4

    Pero a tus fieles has dado un 

estandarte,

Para que sea desplegado por causa 

de la verdad,

Selah

5

    Para que sean librados tus amados,

¡Haz que tu diestra nos salve, y 

respóndenos!°

6

    Dios respondió desde su Santuario:

¡Yo me alegraré!

Repartiré a Siquem, y mediré el 

Valle de Sucot!

7

    Mío es Galaad y mío es Manasés,

Efraín es el yelmo de mi cabeza,

Y Judá cetro de mi justicia;

8

    Moab, vasija para lavarme;

Sobre Edom echaré mi calzado,

Y sobre Filistea lanzaré mi grito de 

victoria.

9

    ¿Quién me conducirá a la ciudad 

fortificada?

¿Quién me guiará hasta Edom?

10

    ¿No serás Tú, oh ’Elohim, que nos 

habías rechazado?

Oh ’Elohim ¿no saldrás más con 

nuestros ejércitos?

11

    ¡Socórrenos contra el adversario,

Porque vana es la ayuda del hombre!

12

    ¡Con ’Elohim haremos proezas!

Él hollará a nuestros enemigos.

S

almo

 61

Al director del coro. Sobre Neguinot. 

Salmo de David.

1

    ¡Oh ’Elohim, oye mi clamor y 

atiende mi oración!

2

    Cuando mi corazón desmaya, clamo 

a ti desde el extremo de la tierra:

¡Llévame a la Roca que es más alta 

que yo!

3

    Porque Tú has sido mi refugio,

Torre fuerte frente al enemigo.

4

    ¡Oh, que yo pueda morar en tu 

Tienda para siempre,

Refugiado al amparo de tus alas!

Selah

5

    Porque Tú, ’Elohim, has oído mis votos,

Has dado heredad a los que temen tu 

Nombre.

6

    Añadirás días a los días del rey,

Sus años serán como generaciones.

7

    Se sentará para siempre delante de 

Dios,

Concede misericordia y verdad, para 

que lo guarden.

8

    Así cantaré salmos a tu Nombre para 

siempre,

Cumpliendo mis votos día tras día.

S

almo

 62

Al director del coro, para Jedutún. 

Salmo de David.

1

    ¡Sólo° en Dios se aquieta mi alma!

¡De Él procede mi salvación!

2

    Sólo Él es mi Roca y mi salvación,

Mi alto refugio; no resbalaré 

mucho.

3

    ¿Hasta cuándo arremeteréis° todos 

juntos contra un hombre,

Para derribarlo como pared 

desplomada o tapia ruinosa?

4

    Sólo consultan para derribarlo de su 

eminencia

Se deleitan en la mentira;

Bendicen con su boca, pero 

maldicen en su corazón.

Selah

5

    Sólo en Dios aquiétate alma mía,

Porque de Él procede mi esperanza.

6

    Sólo Él es mi Roca y mi salvación,

Mi alto refugio: no seré sacudido.

7

    En ’Elohim está mi salvación 

y mi gloria,

La Roca de mi fortaleza, mi refugio, 

está en ’Elohim.

8

    Oh pueblo, confiad en Él en todo 

tiempo,

60.5 El TM registra anénu = respóndenos. Si bien es cierto, los masoretas hacen el cambio al margen por anéni = respóndeme

y en 47 ocasiones más, a lo largo de todo el AP. Sin embargo, en este caso, no existe ningún motivo aparente para apartarse 

del texto hebreo original. 

62.1 Heb. ‘Aj. Esta partícula que intensifica o refuerza la palabra o frase que acompaña aparece seis 

veces en este salmo, en los vv. 1, 2, 4, 5, 6, 9. 

62.3 El verbo hebreo que se usa aquí sólo aparece una vez en todo el AP y su 

significado no es claro. Prob. derive de la raíz hut que significa ensañarse, atacar


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Salmo 62:9

594

Derramad vuestro corazón ante Él,

’Elohim es nuestro refugio.

Selah

9

    Sólo Vanidad son los del vulgo,

Mentira son los nobles.

Puestos en balanza, suben,

Pero serán más livianos que un 

soplo.

10

    No confiéis en la opresión,

Ni en el dolo pongáis vuestra 

esperanza,

Aunque aumenten las riquezas,

no pongáis el corazón en ellas.

11

    Una vez habló ’Elohim,

Dos veces he oído esto:

Que la fortaleza está con ’Elohim.

12

    En ti, Adonay, hay misericordia,

Porque Tú pagas a cada uno 

conforme a su obra.

S

almo

 63

Salmo de David, 

cuando estaba en el desierto de Judá.

1

    ¡Oh ’Elohim, Tú eres mi Dios!

Te buscaré ansiosamente;

Mi alma tiene sed de ti,

Mi carne desfallece por ti,

En tierra seca y yerma, donde no hay 

agua.

2

    Así te he buscado en el Santuario, 

para ver tu poder y tu gloria.

3

    Pues tu misericordia es mejor que 

la vida,

Mis labios te alabarán.

4

    Te bendeciré mientras viva;

En tu Nombre alzaré mis palmas.

5

    Como de meollo y de grosura será 

saciada mi alma,

Y mi boca te alabará con labios de 

júbilo.

6

    Cuando en mi lecho me acuerdo de 

ti,

En ti medito en las vigilias de la 

noche.

7

    Porque Tú has sido mi socorro,

Y así, en la sombra de tus alas, canto 

jubiloso.

8

    Mi alma está apegada a ti y te 

sigue,

Tu diestra me sostiene con vigor.

9

    Pero los que buscan mi alma para 

destrucción,

Bajarán a las partes más profundas 

de la tierra.

10

    Serán entregados al poder de la 

espada,

Y vendrán a ser presa de chacales.

11

    Pero el rey se regocijará en 

’Elohim,

Y cualquiera que jura por Él será 

alabado,

Porque la boca de los que hablan 

mentiras serán tapadas.

S

almo

 64

Al director del coro. Salmo de David.

1

    Oh ’Elohim, escucha la voz de mi 

queja;

Preserva mi vida del terror del 

enemigo.

2

    Ocúltame de la conjura de los 

perversos,

Del tumulto de los que obran 

iniquidad,

3

    Que afilan la lengua como espada,

Y la emplean como saeta 

envenenada,

4

    Para dispararla en oculto al 

inocente,

Disparan presto sus saetas, sin 

temor alguno.

5

    Se animan entre sí en sus malas 

obras;

Planean en secreto tender trampas, y 

dicen: ¿Quién las verá?

6

    Traman cosas perversas, diciendo:

¡Hemos completado un plan bien 

concebido!

Y el íntimo pensamiento de cada 

uno de ellos,

Se corrompe en lo recóndito de su 

corazón.

7

    Pero ’Elohim les dispara una 

saeta:

De pronto, ya están malheridos;

8

    Los hace tropezar su lengua;

Los que asisten se espantarán,

9

    Y temerán todos los hombres,

Entonces proclamarán la obra de 

’Elohim,

Y entenderán sus hechos.

10

    El justo se alegrará en YHVH, y se 

refugiará en Él,

Y todos los rectos de corazón se 

gloriarán.


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Salmo 66:12

595

S

almo

 65

Al director del coro. Salmo. Cántico de David.

1

    ¡Oh ’Elohim, aún te aguarda la 

alabanza en Sión!

A ti se pagarán los votos.

2

    Oh Tú que escuchas la oración:

A ti vendrá toda carne.°

3

    La suma° de mis iniquidades es 

demasiado pesada para mí,

Pero Tú mismo° harás expiación por 

nuestras transgresiones.

4

    ¡Cuán bienaventurado es aquél a 

quien Tú escoges,

Y haces que se acerque a ti para que 

more en tus atrios!

Seremos saciados del bien de tu 

Casa, de tu santo templo.

5

    ¡Nos responderás con terribles 

proezas de justicia,

Oh Dios de nuestra salvación!

¡Esperanza de todos los confines de 

la tierra,

Y de las más lejanas islas del mar!

6

    Tú, el que afirma las montañas con 

su fortaleza,

Ceñido de valentía;

7

    El que sosiega el estruendo de los 

mares,

El estruendo de sus olas,

Y el alboroto de las naciones.

8

    Por eso los que habitan en los 

últimos confines temen delante 

de tus portentos.

¡Tú haces alegrar las puertas de la 

aurora y la entrada del ocaso!

9

    Visitas la tierra, y la riegas 

abundantemente,

La colmas de tus riquezas

Con el torrente de Dios pleno de aguas,

Preparas sus trigales cuando la has 

aparejado.

10

    Inundas sus surcos;

Haces descender el agua en sus 

canales;

Igualas los terrones; con la llovizna 

los vuelves esponjosos,

Y bendices sus brotes.

11

    Coronas el año con tus bondades,

Y tus sendas destilan abundancia.

12

    Vístese el desierto de hierba,

Y los collados resplandecen de alegría.

13

    Los prados se adornan de rebaños,

Los valles se cubren de grano, dan 

voces de júbilo, y cantan.

S

almo

 66

Al director del coro. Cántico. Salmo.

1

    ¡Aclamad a ’Elohim tierra toda!

2

    Salmodiad la gloria de su Nombre;

Dadle gloria con la alabanza.

3

    Decid a ’Elohim:

¡Cuán admirables son tus obras!

Por la grandeza de tu poder, se 

someterán a ti tus enemigos.

4

    ¡Toda la tierra se postrará ante ti y te 

cantarán alabanzas!

¡Cantarán salmos a tu Nombre!

Selah

5

    Venid, contemplad las obras de Dios,

Terrible en sus acciones para con los 

hijos del hombre.

6

    Convirtió el mar en tierra seca,

Por el río pasaron a pie,

¡Regocijémonos allí en Él!

7

    Él señorea con su poder para siempre,

Sus ojos atalayan sobre las naciones:

No se enaltezcan los rebeldes.

Selah

8

    Bendecid, pueblos, a nuestro Dios,

Y haced oír la voz de su alabanza.

9

    Él dio vida a nuestra alma,

Y no permite que nuestro pie 

resbale.

10

    Tú nos probaste, oh ’Elohim,

Nos acrisolaste como se acrisola la 

plata.

11

    Nos metiste en la red,

Echaste sobre nuestros lomos una 

carga muy pesada.

12

    Hiciste cabalgar hombres sobre 

nuestras cabezas,

Pasamos por el fuego y por las 

aguas,

Pero luego nos sacaste a la 

abundancia.°

65.2 Es decir, el ser humano en su condición terrenal de humillación 

→Jn.1.14.  65.3 Es decir, el resumen de lo dicho.  65.3 

Tú mismo. El pronombre está enfatizado 

→Is.53.6-10.  66.12 Heb. revayáh. Este vocablo sólo aparece una vez más en el TM 

(Sal.23.5) donde se traduce rebosando. LXX emplea el término respiro, alivio


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Salmo 66:13

596

13

    Entraré en tu Casa con holocaustos,

Te pagaré mis votos,

14

    Los que pronunciaron mis labios,

Los que habló mi boca cuando 

estaba angustiado.

15

    Te ofreceré holocaustos engordados,

Con sahumerio de carneros,

Sacrificaré bueyes y machos cabríos.

Selah

16

    Venid, oíd, todos los que teméis a 

’Elohim,

Y relataré lo que ha hecho a mi alma.

17

    A Él clamé con mi boca,

Y fue exaltado con° mi lengua.

18

    Si en mi corazón hubiera yo mirado 

la iniquidad,

Adonay no me habría escuchado.

19

    Pero ciertamente me escuchó 

’Elohim,

Y atendió a la voz de mi súplica.

20

    ¡Bendito sea ’Elohim, que no 

desechó mi oración,

Ni apartó de mí su misericordia!

S

almo

 67

Al director del coro. En Neguinot. Salmo. Cántico.

1

    ’Elohim tenga misericordia de 

nosotros y nos bendiga,

Haga resplandecer su rostro sobre 

nosotros,

Selah

2

    Para que tu camino sea conocido en 

la tierra,

Y tu salvación entre todas las 

naciones.

3

    ¡Alábente los pueblos, oh ’Elohim!

¡Alábente los pueblos, todos ellos!

4

    ¡Regocíjense y canten con júbilo las 

naciones!

Porque Tú juzgarás a los pueblos 

con equidad,

Y guiarás a las naciones de la tierra.

Selah

5

    ¡Alábente los pueblos, oh ’Elohim!

¡Alábente los pueblos, todos ellos!

6

    La tierra ha dado su fruto,

’Elohim, el Dios nuestro, nos 

bendecirá;

7

    ¡Bendíganos ’Elohim, y témanlo 

todos los confines de la tierra!

S

almo

 68

Al director del coro. 

Salmo de David. Cántico.

1

    ¡Levántese ’Elohim y sean esparcidos 

sus enemigos!

¡Huyan de su presencia° quienes lo 

aborrecen!

2

    ¡Disípense como se disipa el humo!

Como la cera se derrite ante el fuego,

Así perezcan los malvados ante la 

presencia de Dios.

3

    Pero regocíjense los justos,

Y sean exaltados ante ’Elohim,

¡Sí, salten de alegría!

4

    Cantad a ’Elohim,

Cantad salmos a su Nombre.

Preparad camino al que cabalga las 

nubes.°

¡YH es su nombre!

¡Regocijaos en su presencia!

5

    Padre de huérfanos y protector de 

viudas,

Es ’Elohim en la morada de su 

Santuario.

6

    El Dios que hace habitar en familia a 

los desamparados,

Que saca los cautivos a prosperidad,

Y los rebeldes quedan solos en la 

tierra seca.

7

    Oh ’Elohim, cuando salías al frente 

de tu pueblo,

Cuando avanzabas por el desierto,

Selah

8

    La tierra tembló y los cielos 

diluviaron ante el Dios del Sinay,

Ante la presencia de ’Elohim, el Dios 

de Israel.

9

    Una lluvia generosa derramaste, oh 

’Elohim;

Tú reanimaste tu heredad exhausta,

10

    Los que son de tu grey han morado 

en ella,

La que en tu bondad, oh ’Elohim, 

has provisto al pobre.

11

    Adonay da la orden:

66.17 Lit. debajo de.  68.1 Lit. rostro.  68.4 Heb. rojev ba’aravot. Esta última palabra es la forma plural araváh que significa 

desierto, pero en el ugarítico la misma voz escrita con p en vez de b significa nubes.


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Salmo 68:35

597

¡Las que dan buenas noticias son 

multitud!

12

    Reyes y ejércitos huyen 

precipitadamente,

Y la que se queda en casa reparte 

despojos.

13

    Mientras dormís entre los apriscos,

Las alas de la paloma se cubren de 

plata,

Y el oro refulge en sus plumas.

14

    Cuando ’El-Shadday desbarataba a 

los reyes,

Una nieve blanca caía en el Valle de 

la Oscuridad.°

15

    Monte de Dios es el monte de Basán;

Monte alto el de Basán.

16

    ¿Por qué, oh montes altos, miráis 

con envidia,

Al monte que ’Elohim escogió para 

su morada?

Ciertamente YHVH habitará en él 

para siempre.

17

    Los carros de Dios son miríadas, y 

millares de millares,

Desde el Sinay Adonay avanza entre 

ellos al Santuario.

18

    Subiste a lo alto, cautivaste la 

cautividad,

Tomaste dones y los diste a los 

hombres, incluso a los rebeldes,

Para habitar entre ellos, ¡oh YH 

’Elohim!

19

    ¡Bendito sea Adonay!

¡Día tras día lleva nuestra carga el 

Dios de nuestra salvación!

Selah

20

    ’Elohim es para nosotros el Dios 

Salvador,

De YHVH Adonay es el librar de la 

muerte.

21

    Ciertamente ’Elohim herirá la 

cabeza de sus enemigos,

La testa cabelluda del que ufano se 

pasea entre sus pecados.

22

    Adonay ha dicho: De Basán los haré 

volver,

Los haré volver de las honduras del 

mar,

23

    Para que tu pie los aplaste en sangre,

Y la lengua de tus perros tenga la 

porción de tus enemigos.

24

    ¡Aparece tu cortejo, oh ’Elohim!

El cortejo de mi Dios y Rey hacia el 

Santuario.

25

    Los cantores van delante, y los 

músicos detrás,

En medio de doncellas que tocan 

panderetas.

26

    ¡Bendecid a ’Elohim en las 

congregaciones,

A YHVH, los que sois de la estirpe de 

Israel!

27

    Allí acaudilla Benjamín, el más 

pequeño,

A los príncipes de Judá con su 

multitud;

A los príncipes de Zabulón,

A los príncipes de Neftalí.

28

    Tu Dios ha ordenado tu fuerza.

¡Oh ’Elohim, confirma lo que has 

hecho por nosotros!

29

    A causa de tu templo en Jerusalem, 

los reyes te traerán tributo.

30

    Reprende las bestias de las 

cañadas,

La manada de toros, con los 

becerros de los pueblos,

Que pisotean las piezas de plata.

¡Esparce a las naciones que se 

complacen en la guerra!

31

    Príncipes vendrán de Egipto,

Etiopía se apresurará a extender sus 

manos a ’Elohim.

32

    ¡Oh reinos de la tierra, cantad a 

’Elohim,

Cantad salmos a Adonay!

Selah

33

    Al que cabalga sobre los cielos de los 

cielos,

Que son desde la antigüedad,

¡Mirad! Él emite su voz, su poderosa 

voz.

34

    ¡Reconoced el poder de Dios!

¡Sea sobre Israel su 

magnificencia,

Y su poder en los cielos!

35

    ¡Oh ’Elohim, Tú eres formidable 

desde tus Santuarios!

68.14 Heb. Har-tsalmón.


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Salmo 69:1

598

El Dios de Israel es quien da vigor y 

poder a su pueblo.

¡Bendito sea ’Elohim!

S

almo

 69

Al director del coro. Sobre lírios. De David.

1

    Sálvame ’Elohim, porque las aguas 

han entrado hasta el alma.°

2

    Estoy hundido en el cieno profundo,

Y no hallo donde asentar el pie;

He entrado en aguas profundas,

Y la corriente me ha anegado.

3

    Estoy cansado de llamar,

Mi garganta ha enronquecido,

Mis ojos desfallecen esperando a 

mi Dios.

4

    Más que los cabellos de mi cabeza 

son los que me aborrecen sin 

causa.

Los que intentan destruirme son 

fuertes,

Se han hecho mis enemigos sin 

tener por qué,

Y ahora tengo que pagar lo que no 

robé.

5

    Oh ’Elohim, Tú conoces mi 

insensatez,

Y mis pecados no te son ocultos.

6

    No sean avergonzados por mi causa 

los que en ti esperan, oh Adonay 

YHVH Sebaot,

No sean confundidos por mi causa 

los que te buscan, oh Dios de 

Israel.

7

    Porque por tu causa he sufrido 

afrenta,

Y la confusión ha cubierto mi rostro.

8

    He venido a ser extraño para mis 

hermanos,

Y extranjero para los hijos de mi 

madre.

9

    Porque el celo de tu Casa me 

consume,

Y los vituperios de los que te 

vituperaban cayeron sobre mí.

10

    Lloré afligiendo con ayuno mi alma,

Y esto me ha sido por afrenta.

11

    Puse además cilicio por vestido,

Y vine a serles por proverbio.

12

    Los que se sientan a la puerta 

murmuran de mí,

Y he venido a ser copla de 

borrachos.°

13

    Pero yo elevo mi oración a ti, oh 

YHVH, en el tiempo de tu buena 

voluntad;

Oh ’Elohim, por la abundancia de tu 

misericordia,

Respóndeme con la verdad de tu 

salvación.

14

    Sácame del lodo, y no dejes que me 

hunda;

Sea yo libertado de los que me 

aborrecen,

Y de las profundidades de las aguas.

15

    No me anegue la corriente de las 

aguas,

Ni me trague el abismo,

Ni la fosa cierre sobre mí su boca.

16

    Respóndeme, oh YHVH, porque tu 

misericordia es benigna,

Vuélvete a mí conforme a la 

multitud de tus piedades.

17

    No escondas tu rostro de tu siervo,

Porque estoy en angustia,

Apresúrate a responderme.

18

    ¡Acércate a mi alma y redímela!

¡Rescátame por causa de mis 

enemigos!

19

    Tú conoces mi afrenta, mi confusión 

y mi oprobio,

Delante de ti están todos mis 

adversarios.

20

    El oprobio ha quebrantado mi 

corazón, y estoy acongojado,

Esperé compasión, y no la hubo,

Y consoladores, pero ninguno hallé.

21

    Me pusieron además hiel por 

comida,

Y en mi sed me dieron a beber 

vinagre.

22

    Sea su mesa delante de ellos por 

lazo,

Y lo que es para bien, por trampa.

23

    Sean oscurecidos sus ojos para que 

no vean,

Y haz que sus lomos tiemblen 

continuamente.

69.1 Ngarganta.  69.12 Lit. los que beben licor fuerte.


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Salmo 71:9

599

24

    Derrama sobre ellos tu ira,

Y alcánzalos con la furia de tu 

indignación.

25

    Sea su palacio asolado,

Y en sus tiendas no haya morador.

26

    Porque persiguen al que Tú has 

herido,

Y comentan° el dolor de los que Tú 

llagaste.

27

    ¡Añádeles iniquidad sobre su 

iniquidad,

Y no entren ellos en tu justicia!

28

    ¡Sean borrados del rollo de la vida,

Y no sean inscritos con los justos!

29

    Pero a mí, afligido y adolorido,

¡Póngame en alto tu salvación, oh 

’Elohim!

30

    Yo alabaré el nombre de Dios con 

cántico,

Y lo exaltaré con acción de gracias.

31

    Y agradará a YHVH más que el 

sacrificio de bueyes,

O novillo con cuernos y pezuñas.

32

    Lo verán los oprimidos y se 

regocijarán.

Vosotros, que buscáis a ’Elohim:

¡Anímese vuestro corazón!

33

    Porque YHVH oye a los menesterosos,

Y no menosprecia a sus prisioneros.

34

    ¡Alábenlo los cielos y la tierra,

Los mares, y cuanto se mueve en 

ellos!

35

    Porque ’Elohim salvará a Sión,

Y reedificará las ciudades de Judá,

Y habitarán allí y la poseerán.

36

    La descendencia de sus siervos la 

heredará,

Y los que aman su Nombre 

habitarán en ella.

S

almo

 70

Al director del coro. De David. 

En conmemoración.

1

    ¡Oh ’Elohim, ven a librarme! 

¡Apresúrate YHVH a socorrerme!

2

    Sean avergonzados y humillados los 

que buscan mi vida;

Sean vueltos atrás y confundidos los 

que desean mi mal.

3

    Sean vueltos atrás en pago de su 

afrenta los que dicen: ¡Ea, ea!

4

    ¡Regocíjense y alégrense en ti todos 

los que te buscan!

Y aquellos que aman tu salvación 

digan siempre:

¡Engrandecido sea ’Elohim!

5

    Pero yo estoy afligido y menesteroso.

¡Oh ’Elohim, apresúrate y ven a mí!

Tú eres mi ayudador y mi libertador;

¡Oh YHVH, no te tardes!

S

almo

 71

1

    Oh YHVH, en ti he puesto mi 

confianza,

No sea yo avergonzado jamás.

2

    ¡Líbrame en tu justicia, y hazme 

escapar!

¡Inclina a mí tu oído, y sálvame!

3

    Sé para mí roca de refugio,

Adonde recurra yo continuamente.

Tú has dado mandamiento para 

salvarme,

Porque Tú eres mi Roca° y mi 

baluarte.

4

    Dios mío, rescátame de la mano del 

malvado,

De la mano del perverso y del 

violento,

5

    Porque Tú, oh Adonay YHVH, eres 

mi esperanza;

Mi confianza desde mi juventud.

6

    Por ti he sido sustentado desde el 

vientre,

Tú eres quien me sacó de las 

entrañas de mi madre,

¡De ti será mi alabanza 

perpetuamente!

7

    He venido a ser asombro para 

muchos,

Pero Tú eres mi refugio fuerte.

8

    Llena está mi boca de tu alabanza,

Y de tu gloria todo el día.

9

    No me deseches en el tiempo de la 

vejez,

69.26 Esto es, comentan irrisoriamente.  71.3 Heb. selá, este vocablo difiere del usado en la 1ª. parte del verbo heb. tsur, y 

también tiene diferente significado, pues aquí significa hendidura de roca. Tampoco debe confundirse con el selah = pausa

pues se escribe de diferente manera.


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Salmo 71:10

600

Ni me desampares cuando se agote 

mi vigor.

10

    Porque mis enemigos han hablado 

contra mí,

Y los que acechan mi alma 

conspiran unidos,

11

    Diciendo: ’Elohim lo ha 

desamparado,

¡Perseguidlo y prendedlo, pues no 

hay quien lo libre!

12

    ¡Oh ’Elohim, no te alejes de mí!

Dios mío, apresúrate a socorrerme.

13

    Sean avergonzados y perezcan los 

adversarios de mi alma;

Sean cubiertos de vergüenza y 

confusión los que procuran mi 

mal.

14

    En cuanto a mí, esperaré por 

siempre,

Y te alabaré más y más.

15

    Mi boca proclamará tu justicia y tu 

salvación todo el día.

Aunque no sepa enumerarlos,

16

    Vendré a los poderosos hechos de 

Adonay YHVH,

Haré mención de tu justicia, de la 

tuya sola.

17

    Tú ’Elohim, me has enseñado desde 

mi tierna infancia,

Y hasta ahora he manifestado tus 

maravillas.

18

    Así Tú también, hasta la vejez y las 

canas

No me desampares, oh ’Elohim, 

hasta que proclame tu poder a 

esta generación,

Tu poderío, a todo el que ha de venir.

19

    También tu justicia, oh ’Elohim, 

llega hasta las alturas,

Y aquellas grandes cosas que has 

hecho.

¿Quién como Tú, ’Elohim?

20

    Tú, que me has hecho ver muchas 

angustias y males,

Volverás a darme vida,

Y de nuevo me levantarás de los 

abismos de la tierra,

21

    Aumentarás mi grandeza,

Y volverás a consolarme.

22

    Yo también te alabaré con el 

salterio,

A causa de tu verdad, Dios mío,

Te cantaré salmos con el arpa, ¡oh 

Santo de Israel!

23

    Mis labios se alegrarán al entonarte 

salmos,

Junto con mi alma, que Tú has 

redimido.

24

    Mi lengua también susurrará todo el 

día tu justicia,

Porque fueron avergonzados y 

confundidos los que procuraban 

mi mal.

S

almo

 72

De Salomón.

1

    Oh ’Elohim, encomienda tus juicios 

al Rey,

Y tu justicia al Hijo del Rey,

2

    Él juzgará a tu pueblo con rectitud,

Y a tus afligidos con justicia.

3

    Entonces los montes producirán 

paz para el pueblo, mediante la 

justicia.

4

    Que defienda a la gente oprimida,

Que salve a los hijos del 

menesteroso,

Y quebrante al opresor.

5

    Que le teman mientras duren el sol 

y la luna,°

De generación en generación.

6

    Que descienda como la lluvia sobre 

la hierba cortada,

Como los aguaceros, que riegan 

abundantemente la tierra.

7

    Que en sus días florezcan los justos,

Y la paz abunde hasta que no haya 

luna.

8

    Que domine de mar a mar,

Desde el Gran Río hasta los confines 

de la tierra.

9

    Que ante él se abatan los moradores 

del desierto,

Y sus enemigos muerdan el polvo.

10

    Que los reyes de Tarsis y las islas le 

paguen tributo,

Que los reyes de Sabá y de Seba le 

ofrezcan sus dones.

11

    Que se postren ante él todos los 

reyes,

Y todas las naciones le sirvan.

72.5 Lit. con el sol y en presencia de la luna


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Salmo 73:18

601

12

    Porque él librará al necesitado que 

suplica,

Y al pobre, que no tiene quien lo 

ayude.

13

    Tendrá misericordia del desvalido y 

del afligido,

Y salvará las almas de los 

menesterosos.

14

    Redimirá sus almas de la opresión y 

la violencia,

Y la sangre de ellos será preciosa 

ante sus ojos.

15

    ¡Que viva, pues, y se le dé el oro de 

Sabá!

¡Que se ore por él continuamente,

Y que todo el día lo bendigan!

16

    Que las mieses del campo abunden,

Y se agiten en la cima de los 

montes,

Que su fruto esté lozano como los 

cedros del Líbano,

Y los de la ciudad florezcan como la 

hierba del campo.

17

    ¡Que su Nombre sea por siempre!

Que su Nombre sea propagado 

mientras dure el sol,

Y que en él se bendigan los 

hombres!

Que todas las naciones lo llamen 

bienaventurado.

18

    ¡Bendito sea YHVH ’Elohim, el Dios 

de Israel,

El único que hace maravillas!

19

    ¡Bendito para siempre sea su 

Nombre glorioso,

Y que toda la tierra sea llena de su 

gloria! ¡Amén, amén!

20

 

Aquí terminan las oraciones de David ben Isaí.

S

almo

 73

Salmo de Asaf.

1

    Ciertamente ’Elohim es bueno para 

con Israel,

Para con los limpios de corazón.

2

    En cuanto a mí, casi se deslizaron 

mis pies;

Por poco resbalaron mis pasos.

3

    Porque tuve envidia de los 

soberbios,

Viendo la prosperidad de los 

malvados.

4

    Porque no hay dolores° en su 

muerte,

Y su vientre está lleno de grosura.

5

    No pasan trabajos como los otros 

mortales,

Ni son azotados como los demás 

hombres;°

6

    Por lo que la soberbia los ciñe cual 

collar,

Y como con un manto se visten de 

violencia.

7

    Los ojos se les saltan de gordura,

Y logran con creces los antojos del 

corazón.

8

    Se burlan y hablan con maldad,

Con altanería planean la opresión.

9

    Ponen su boca en el cielo,

Pero su lengua se arrastra por la 

tierra.

10

    Por eso mi pueblo va hacia ellos,

Y bebe sus aguas° abundantemente.

11

    Y dicen: ¿Cómo puede ’El saberlo?

¿Hay conocimiento en ’Elyón?

12

    He aquí, que así son los malvados,

Y, sin ser turbados, incrementan su 

riqueza.

13

    Entonces ¿en vano he limpiado mi 

corazón,

Y lavado mis manos en inocencia?

14

    Pues he sido azotado todo el día,

Y mi castigo viene cada mañana.

15

    Si dijera yo: Hablaré como ellos,

He aquí, a la generación de tus hijos 

sería infiel.

16

    Meditaba pues para entender esto,

Y resultaba ardua tarea ante mis 

ojos.

17

    Hasta que entrando en el Santuario 

de Dios,

Percibí el fin de ellos.

18

    Ciertamente los has puesto en 

deslizaderos,

Y harás que caigan en la 

destrucción.

73.4 Heb. jartsubot = dolores de parto.  73.5 Lit. No tienen el trabajo duro del mortal (Heb. henos), ni son azotados como el ser 

humano (Heb. adam). 

73.10 Es decir, sus palabras.


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Salmo 73:19

602

19

    ¡Cómo fueron asolados de repente!

¡Cómo perecieron consumidos de 

terrores!

20

    Como al despertar del sueño,

Así Adonay, cuando Tú despiertes,

Despreciarás sus apariencias.

21

    Cuando mi corazón se exacerbaba,

Y sentía traspasados mis riñones,

22

    Era entonces torpe e ignorante,

Como una bestia ante ti.

23

    Con todo, yo siempre estoy contigo.

Tú sostienes mi diestra.

24

    Me guiarás con tu consejo,

Y después me recibirás en gloria.

25

    ¿A quién tengo yo en los cielos?

Y fuera de ti, nada deseo en la tierra.

26

    Mi carne y mi corazón desfallecen,

Pero la roca de mi corazón y mi 

porción es ’Elohim para siempre.

27

    Porque, he aquí, los que se alejan de 

ti perecerán,

Tú destruirás a todo aquel que se 

prostituye apartándose de ti.

28

    En cuanto a mí, la proximidad de 

’Elohim es mi dicha;

En YHVH Adonay he puesto mi 

refugio,

Para contar todas tus obras.

S

almo

 74

Maskil de Asaf.

1

    Oh ’Elohim, ¿por qué nos has 

desechado para siempre?

¿Por qué humea tu ira contra las 

ovejas de tu prado?

2

    Acuérdate de tu congregación,

La que adquiriste desde tiempos 

antiguos,

La que redimiste para hacerla tribu 

de tu heredad,

Y de este monte Sión, donde has 

habitado.

3

    Dirige tus pasos hacia estas ruinas 

perpetuas,

Y considera todo el mal que hizo el 

enemigo en el Santuario.

4

    Tus adversarios vociferan en medio 

de tu lugar de reunión,

Pusieron sus propios estandartes por 

divisa.

5

    Se asemejan a los que alzan el hacha 

en la espesura del bosque.

6

    Y ahora, con hachas y con mazos,

Hacen trizas sus entalladuras.°

7

    Han prendido fuego a tu Santuario,

Y hasta los cimientos profanaron la 

morada de tu Nombre.

8

    Dijeron en su corazón: 

¡Destruyámoslos de una vez!

Y quemaron todas las sinagogas de 

Dios en la tierra.

9

    No vemos ya nuestras señales,

No hay más profeta,

Ni hay entre nosotros quien sepa 

hasta cuándo.

10

    ¿Hasta cuándo, ’Elohim, seguirá 

afrentándonos el adversario?

¿Seguirá blasfemando tu Nombre 

por siempre?

11

    ¿Por qué retraes tu mano?

¡Sí, tu diestra!

¡Extiéndela y destrúyelos!

12

    Con todo, ’Elohim es mi Rey desde 

antaño,

Que opera salvación en la tierra.

13

    Tú dividiste el mar con tu poder,

Quebrantaste en las aguas las 

cabezas de los monstruos 

marinos.

14

    Tú aplastaste las cabezas de 

Leviatán,

Y lo diste por comida a los 

moradores del desierto.

15

    Tú abriste la fuente y el torrente,

Tú secaste ríos impetuosos.

16

    Tuyo es el día, tuya también la 

noche,

Tú estableciste las luminarias y el 

sol.

17

    Tú has establecido todos los 

términos de la tierra,

Tú hiciste el verano y el invierno.

18

    Acuérdate de cómo el enemigo ha 

injuriado a YHVH,

Y cómo un pueblo vil ha blasfemado 

tu Nombre.

19

    No entregues el alma de tu tórtola a 

las bestias salvajes,

74.6 Esto es, de la Casa de Dios


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Salmo 76:10

603

No te olvides para siempre de la 

congregación de tus afligidos.

20

    Considera atentamente el pacto,

Porque los lugares oscuros de la 

tierra están llenos de moradas de 

violencia.

21

    No permitas que el oprimido se 

vuelva avergonzado,

Haz que los afligidos y los 

menesterosos alaben tu Nombre.

22

    ¡Levántate, oh ’Elohim, y sustenta 

tu propia causa!

Acuérdate de cómo el vil te injuria 

cada día.

23

    No olvides el vocerío de tus 

adversarios,

El tumulto de los que se levantan 

contra ti, que sube de continuo.

S

almo

 75

Al director del coro. Al Tashjet.° 

Salmo de Asaf. Cántico.

1

    Te damos gracias a ti, ’Elohim, te 

damos gracias,

Porque tu Nombre está cercano;

Ellos cuentan tus maravillas.

2

    Al tiempo que Yo señale,

Yo, por mí mismo, juzgaré con 

equidad.

3

    Cuando se derrita la tierra y todos 

sus habitantes,

Yo mismo sustentaré sus columnas.

Selah

4

    Digo a los soberbios: No os 

ensoberbezcáis;

Y a los malvados: No alcéis vuestra 

frente,

5

    Ni levantéis en alto vuestro cuerno,°

Ni habléis con erguida cerviz.

6

    Porque ni del oriente ni del 

occidente,

Ni del desierto viene el enaltecimiento,

7

    Sino que ’Elohim es el Juez,

Y a éste humilla y a aquél enaltece.

8

    Hay un cáliz en la mano de YHVH,

Y el vino fermenta lleno de mixtura.

Él lo derramará, y tendrá que ser 

sorbido hasta sus sedimentos:

¡Todos los malvados de la tierra lo 

beberán!

9

    Pero yo lo anunciaré por siempre,

Entonaré salmos al Dios de Jacob.

10

    Quebrantaré el cuerno de los 

malvados,

Y el cuerno° de los justos será 

exaltado.

S

almo

 76

Al director del coro. En Neguinot. 

Salmo de Asaf. Cántico.

1

    ’Elohim es conocido en Judá,

Y en Israel es grande su Nombre.

2

    En Salem está su Tienda,

Y tiene su morada en Sión.

3

    Allí quebró las centellas del arco,

El escudo, la espada y las armas de 

guerra.

Selah

4

    Esplendoroso y majestuoso eres Tú,

¡Más que los montes de rapiña!°

5

    Los robustos de corazón fueron 

despojados;

Duermen su sueño,

Ninguno de los hombres esforzados 

pudo usar sus manos.

6

    ¡A tu reprensión, oh Dios de Jacob,

Carros y caballos yacen postrados en 

profundo sueño!

7

    ¡Tú, sólo Tú eres terrible!

¿Quién podrá resistir delante de ti 

cuando se encienda tu ira?

8

    Desde los cielos has hecho oír la 

sentencia,

La tierra tuvo temor y permaneció 

en suspenso,

9

    Cuando ’Elohim se levantó para 

juzgar,

Para salvar a todos los mansos de la 

tierra.

Selah

10

    Ciertamente el furor del hombre te 

exaltará,

Y te ceñirás con el residuo de 

inútiles furores.°

75.Tít. Esto es, no destruyas.  75.5 Es decir, No hagáis alarde de vuestro poder.  75.10 Esto es, el poder.  76.4 Metáfora de las 

conquistas militares de Judá. 

76.10 La idea es que el furor de los enemigos del Pueblo Escogido dará ocasión para que el Dios 

de Israel sea exaltado. 


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Salmo 76:11

604

11

    Haced votos a YHVH vuestro Dios, y 

cumplidlos;

Todos los que lo rodean traigan 

presentes al que debe ser temido.

12

    Él humillará el espíritu° de los 

príncipes,

Y será terrible para con los reyes de 

la tierra.

S

almo

 77

Al director del coro, para Jedutún. 

Salmo de Asaf.

1

    Con mi voz clamé a ’Elohim,

A ’Elohim clamé, 

y Él me escuchó.

2

    En el día de mi angustia busqué a 

Adonay;

A Él alzaba mis manos de noche sin 

descanso,

Mi alma rehusaba consuelo.

3

    Me acuerdo de ’Elohim, y me 

conmuevo,

Me lamento, y mi espíritu desmaya.

Selah

4

    Mantienes mis ojos desvelados,

Estoy turbado, y no puedo hablar.

5

    He considerado los días desde el 

principio,

Los años de los siglos.

6

    Recuerdo mi cántico en la noche,

Medito en mi corazón, y mi espíritu 

escudriña:

7

    ¿Desechará Adonay para siempre, y 

no volverá más a amar?

8

    ¿Se ha agotado por completo su 

compasión?

¿Se ha extinguido para siempre su 

promesa?

9

    ¿Habrá olvidado ’Elohim el tener 

misericordia?

¿Encerró en su ira sus piedades?

Selah

10

    Entonces dije: Enfermedad mía es 

ésta:

Que la diestra de ’Elyón pueda 

cambiar.

11

    Me acordaré de las obras de YH,

¡Sí! me acordaré de tus maravillas de 

antaño.

12

    Meditaré en toda tu obra,

Y reflexionaré en tus proezas.

13

    ¡Oh ’Elohim, en santidad es tu 

camino!

¿Qué dios es tan grande como 

’Elohim?

14

    Tú eres el Dios que obra maravillas;

Hiciste notorio en los pueblos tu 

poder.

15

    Con tu brazo redimiste a tu pueblo,

A los hijos de Jacob y de José.

Selah

16

    Te vieron las aguas, oh ’Elohim,

Las aguas te vieron y temieron,

Los abismos también se estremecieron.

17

    Las nubes derramaron torrentes de 

aguas,

Los nubarrones dieron su voz,°

Y tus saetas° salieron disparadas.°

18

    La voz de tu trueno estaba en el 

torbellino,

Tus relámpagos alumbraron el 

mundo,

Se estremeció y tembló la tierra.

19

    Abriste tu camino en el mar,

Tus sendas, en las aguas caudalosas,

Y tus pisadas no dejaron rastro.

20

    Como rebaño guiaste a tu pueblo,

Por mano de Moisés y Aarón.

S

almo

 78

Maskil de Asaf.

1

    ¡Escucha, pueblo mío, mi Ley!

Inclinad vuestro oído a los dichos de 

mi boca.

2

    Abriré mi boca en proverbios;

Declararé° enigmas° de tiempos 

antiguos,

3

    Los cuales hemos oído y entendido,

Que nos relataron nuestros padres.

4

    No los encubriremos a sus hijos.

Relataremos a la generación 

venidera las alabanzas de YHVH,

Y de su poder y de las maravillas que 

hizo.

76.12 Esta frase lit. puede traducirse de dos maneras, dependiendo del significado que se dé al vocablo ruaj = espíritu. Si se 

entiende como espíritu sería espíritu orgulloso, significa que los humillará. Si se entiende como aliento vital, significa que les 

acortará la vida. 

77.17 Descripción del trueno.  77.17 Los relámpagos.  77.17 Lit. se iban a sí mismas.  78.2 Heb. ‘abbi’ah = 

haré aflorar. Es decir, aclararé

78.2 Heb. jidah = enigma, arcano. Es decir, dicho anudado que necesita ser soltado para hallar 

su solución. Los enigmas de este salmo están relacionados con las cosas escondidas en Mt.13.35. 


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Salmo 78:34

605

5

    Él estableció testimonio en Jacob,

Y puso Ley en Israel,

La cual mandó a nuestros padres,

Que la notificaran a sus hijos,

6

    Para que la generación venidera lo 

supiera,

Y los hijos que habrían de nacer,

Se levantaran y lo relataran a sus 

hijos;

7

    Para que pusieran en ’Elohim su 

confianza,

Y no se olvidaran de las proezas de 

Dios,

Sino que atesoraran sus 

mandamientos,

8

    Y no fueran como sus padres,

Generación contumaz y rebelde,

Generación que no dispuso su 

corazón,

Ni su espíritu fue fiel para con 

’Elohim.

9

    Los hijos de Efraín, arqueros 

armados,

Dieron la espalda en el día de la 

batalla;

10

    No guardaron el pacto de Dios,

Y rehusaron andar en su Ley;

11

    Se olvidaron de sus proezas,

Y de sus maravillas que les había 

mostrado.

12

    Delante de sus padres realizó 

portentos,

En la tierra de Egipto, en el campo 

de Zoán,

13

    Dividió el mar y los hizo pasar,

Detuvo° las aguas como en un 

montón;

14

    De día los guiaba con nube,

Con resplandor de fuego en la 

noche.

15

    Hendió las peñas del desierto,

Y les dio a beber raudales sin 

medida,

16

    Hizo brotar arroyos de la peña,

Y descender las aguas como ríos.

17

    Pero ellos pecaron contra Él,

Se rebelaron contra ’Elyón en el 

desierto,

18

    Y en sus corazones tentaron 

 a ’Elohim,

Reclamando comida conforme a su 

avidez.°

19

    Hablaron contra ’Elohim diciendo: 

¿Podrá ’El° poner una mesa en el 

desierto?

20

    He aquí, hirió la roca y brotaron 

aguas y se desbordaron torrentes,

Pero, ¿podrá dar pan o disponer 

carne para su pueblo?

21

    Lo oyó YHVH y se indignó:

Un fuego se encendió contra Jacob,

Y la ira subió contra Israel,

22

    Por cuanto no creyeron en ’Elohim,

Ni confiaron en su salvación.

23

    Con todo, mandó a las nubes desde 

arriba,

Y abrió las puertas de los cielos,

24

    Hizo llover sobre ellos maná para 

comer,

Y les dio pan° del cielo;

25

    Pan de fuertes comió el hombre,

Les envió provisión hasta saciarlos.

26

    Hizo soplar el solano en los cielos,

Y atrayendo el ábrego con su poder,

27

    Hizo llover sobre ellos carne como 

polvo;

Como arena del mar aves que vuelan,

28

    Las hizo caer en medio del 

campamento,

Alrededor de sus tiendas.

29

    Comieron y se hartaron;

Les cumplió, pues, su deseo.

30

    Pero no habían quitado de sí su 

anhelo;

Aún estaba la comida en su boca,

31

    Cuando vino sobre ellos el furor 

Divino,

Que hizo morir a los más fornidos 

entre ellos,

E hizo arrodillar a lo escogido de 

Israel.

32

    Con todo, siguieron pecando,

Y no dieron crédito a sus maravillas.

33

    Por tanto, consumió sus días en 

vanidad,

Y sus años en disgustos.

34

    Cuando los hacía morir, entonces lo 

buscaban,

78.13 Heb. natsav expresa la idea de que las aguas se quedaron como de pie, en sentido vertical.  78.18 Lit. a sus almas

78.19 Contracción del nombre ’Elohim, que indica un gran poder concentrado.  78.24 Lit. grano.


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Salmo 78:35

606

Se arrepentían, y a ’El solicitaban.

35

    Se acordaban que ’Elohim era su 

Roca,

’El-’Elyón su Redentor.

36

    Lo lisonjeaban con su boca,

Pero con su lengua le mentían.

37

    Pues sus corazones no eran rectos 

para con Él,

Ni eran fieles a su pacto.

38

    Pero Él, misericordioso,

Hacía expiación por la maldad, y no 

los destruía.

Muchas veces contuvo su ira,

Y no despertó todo su enojo.

39

    Se acordó de que eran carne,°

Soplo que va y no vuelve.

40

    ¡Cuántas veces lo provocaron en el 

desierto,

Y lo contristaron en el yermo!

41

    Luego volvieron a tentar a ’El,

Irritaron al Santo de Israel.

42

    No se acordaron de su mano,

Del día en que los redimió del 

adversario,

43

    Cuando obró en Egipto sus señales,

Y sus portentos en la tierra de Zoán.

44

    Cuando convirtió sus ríos en sangre,

Para que no pudieran beber de sus 

corrientes.

45

    Cuando envió entre ellos enjambres 

de moscas que los devoraban,

Y la rana, que los infectó.

46

    Cuando dio a la oruga sus cosechas,

Y el fruto de su trabajo a la langosta.

47

    Cuando destruyó sus viñas con granizo,

Y sus sicómoros con escarcha.

48

    Cuando entregó al pedrisco sus 

vacadas,

Y a los rayos sus rebaños.

49

    Cuando envió sobre ellos el ardor de 

su ira,

Enojo, indignación y congoja,

Tropel de mensajeros de desgracias.

50

    Cuando dispuso camino a su ira,

Y no eximió sus almas de la muerte,

Sino que entregó sus vidas a la 

pestilencia,

51

    E hirió a todos los primogénitos de 

Egipto,

Las primicias de su virilidad en las 

tiendas de Cam.

52

    E hizo salir a su pueblo como ovejas,

Y cual rebaño los guió por el 

desierto.

53

    Los condujo con seguridad, y no 

tuvieron temor,

En tanto que el mar cubría a sus 

enemigos.

54

    Los llevó hasta las fronteras de su 

tierra santa;

A este monte que adquirió su 

diestra.

55

    Echó las naciones de delante de ellos,

Con cuerda repartió sus tierras en 

heredad,

E hizo habitar en sus tiendas a las 

tribus de Israel.

56

    Pero ellos tentaron y provocaron a 

’Elyón,

Y no guardaron sus testimonios;

57

    Se volvieron atrás,

Tal como sus padres, fueron 

desleales;

Se desviaron como arco torcido;°

58

    Lo irritaron con sus lugares altos,

Y lo provocaron a celo con sus 

imágenes de talla.

59

    Lo oyó ’Elohim, y se indignó,

Y aborreció a Israel en gran manera.

60

    Por lo que abandonó el Tabernáculo 

de Silo,

La tienda en que habitaba entre los 

hombres,

61

    Y entregó al cautiverio su poderío,

Y su gloria° en mano del enemigo.

62

    Entregó también su pueblo a la 

espada,

Y se irritó contra su heredad.

63

    El fuego devoró a sus jóvenes,

Y sus doncellas no tuvieron cánticos 

nupciales.

64

    Sus sacerdotes cayeron a espada,

Y sus viudas no hicieron 

lamentación.

65

    Pero entonces, como quien duerme,

Como un valiente que se recupera 

del vino,°

78.39 ¡Solemne contraste con el v. 42a!  78.57 Es decir, que no sirve.  78.61 Esto es, el Arca del Pacto 

→1 S.4.11ss.  78.65 El 

uso de esta figura de dicción (el símil de un valiente que grita al despertar de su embriaguez) es extraño para nuestra mentalidad 

occidental, pero no para el antiguo pensamiento del Medio Oriente, el cual era muy común en la época 

→1 R.18.27. 


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Salmo 80:2

607

Despertó Adonay,

66

    E hirió a sus adversarios por la 

espalda,

Poniendo sobre ellos afrenta 

perpetua.

67

    Desechó la tienda° de José,

Y no eligió a la tribu de Efraín,

68

    Sino que escogió a la tribu de Judá,

Y en el monte de Sión, al cual 

amaba,

69

    Construyó en las alturas su 

Santuario,

Como la tierra, que había cimentado 

para siempre.

70

    Escogió a David, su siervo,

A quien sacó de entre los apriscos 

del rebaño,

71

    Lo trajo de detrás de las ovejas,°

Para que apacentara a Jacob su 

pueblo,

Y a Israel su heredad.

72

    Los pastoreó conforme a la 

integridad de su corazón,

Y los guió con la destreza de sus 

manos.

S

almo

 79

Salmo de Asaf.

1

    ¡Oh ’Elohim, los gentiles han 

invadido tu heredad,

Han profanado tu Santuario 

y reducido Jerusalem a 

escombros!

2

    Dieron los cuerpos de tus siervos 

por comida a las aves del cielo;

La carne de tus santos a las bestias 

de la tierra.

3

    Han derramado su sangre como 

agua en torno a Jerusalem,

Y no hay quien los sepulte.

4

    Hemos venido a ser oprobio de 

nuestros vecinos,

Escarnio y burla de quienes nos 

rodean.

5

    ¿Hasta cuándo, oh YHVH?

¿Estarás airado para siempre?

¿Arderá tu celo como fuego?

6

    Derrama tu ira sobre las naciones 

que no te conocen,

Y sobre los reinos que no invocan tu 

Nombre.

7

    Porque han consumido a Jacob, y 

han desolado su morada.

8

    No tengas en memoria contra 

nosotros las iniquidades de 

nuestros antepasados,

¡Apresúrate!, y vengan a nuestro 

encuentro tus misericordias;

Porque estamos abatidos en 

extremo.

9

    ¡Oh Dios de nuestra salvación,

Ayúdanos, por la gloria de tu 

Nombre!

¡Haznos libres y expía nuestros 

pecados, por amor de tu Nombre!

10

    ¿Por qué han de decir los gentiles: 

Dónde está su Dios?

¡Sea conocida entre las naciones, 

a nuestra vista, la venganza 

de la sangre derramada de tus 

siervos!

11

    ¡Llegue ante ti el gemido del 

cautivo!

Conforme a la grandeza de tu brazo, 

preserva a los sentenciados a 

muerte,°

12

    Y devuelve a nuestros vecinos en su 

mismo seno, siete veces la afrenta 

con que te han afrentado, ¡oh 

Adonay!

13

    Así nosotros, pueblo tuyo y ovejas de 

tu prado,

Te alabaremos para siempre,

De generación en generación 

contaremos de tu alabanza.

S

almo

 80

Al director del coro. Sobre lirios. Testimonio. 

Salmo de Asaf.

1

    Oh Pastor de Israel, escucha: Tú, 

que pastoreas a José como un 

rebaño,

Tú, que estás entronizado sobre los 

querubines: ¡Resplandece!

2

    Delante de Efraín, de Benjamín y de 

Manasés,

¡Despierta tu poder y ven a 

salvarnos!

78.67 Es decir, la tribu de José.  78.71 Lit. las que lactaban.  79.11 Lit. los hijos de la muerte.


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Salmo 80:3

608

3

    ¡Restáuranos, oh ’Elohim!

¡Haz resplandecer tu rostro, y 

seremos salvos!

4

    Oh YHVH, ’Elohim Sebaot,

¿Hasta cuándo estarás airado° contra 

la oración de tu pueblo?

5

    Los has hecho comer pan de 

lágrimas,

Les diste a beber lágrimas en 

abundancia.°

6

    Nos pusiste por escarnio de nuestros 

vecinos,

Y nuestros enemigos se ríen entre sí.

7

    ¡Oh ’Elohim Sebaot, restáuranos!

¡Haz resplandecer tu rostro, y 

seremos salvos!

8

    Hiciste venir una vid de Egipto,

Expulsaste las naciones y la 

plantaste.

9

    Limpiaste sitio delante de ella,

Hiciste arraigar sus raíces, y llenó la 

tierra.

10

    Los montes fueron cubiertos por su 

sombra,

Y con sus sarmientos los cedros de 

Dios.

11

    Extendió sus vástagos hasta el mar,

Y hasta el río sus renuevos.

12

    ¿Por qué derribaste sus vallados,

De modo que la vendimian todos los 

que pasan de camino?

13

    El puerco montés la ha destrozado,

Y las alimañas del campo la devoran.

14

    Oh ’Elohim Sebaot, vuelve, te 

rogamos,

Mira desde los cielos, y considera, y 

visita esta viña,

15

    La cepa que plantó tu diestra,

Y el vástago que fortaleciste para ti 

mismo,

16

    ¡Quemada a fuego está, y cortada;

Perece por la reprensión de tu 

rostro!

17

    ¡Sea tu mano sobre el varón de tu 

diestra,

Sobre el hijo del hombre que para ti 

fortaleciste!

18

    Así no nos apartaremos de ti:

¡Vivifícanos e invocaremos tu 

Nombre!

19

    Oh YHVH, ’Elohim Sebaot, ¡haznos 

volver!

¡Haz resplandecer tu rostro, y 

seremos salvos!

S

almo

 81

Al director del coro. Sobre guittit.° 

De Asaf.

1

    ¡Cantad con gozo a ’Elohim, 

fortaleza nuestra!

¡Aclamad con júbilo al Dios de 

Jacob!

2

    Entonad el salmo y batid el pandero,

La dulce cítara con el salterio.

3

    Soplad el shofar en el novilunio, en 

la luna llena,

En el día de nuestra solemnidad.

4

    Porque estatuto es para Israel,

Ordenanza del Dios de Jacob.

5

    Lo estableció como testimonio en 

José,

Cuando salió de la tierra de Egipto.

Voz que no había conocido, oí que 

decía:°

6

    He quitado su hombro de debajo de 

la carga,

Sus manos se libraron del peso de 

los cestos.

7

    En la angustia clamaste, y Yo te 

rescaté,

Te respondí en lo secreto del trueno,

Te puse a prueba junto a las aguas de 

Meriba.

Selah

8

    ¡Oye, pueblo mío, y te amonestaré!

Oh Israel, si me oyes,

9

    No habrá junto a ti dioses ajenos,

Ni te postrarás ante dios extraño.

10

    Yo soy YHVH, tu Dios,

El que te hizo subir de la tierra de 

Egipto;

¡Ensancha tu boca, y Yo la llenaré!

11

    Pero mi pueblo no escuchó mi voz,

Y nada quiso conmigo Israel.

12

    Los entregué, por tanto, a la 

obstinación de su corazón,

Para que anduvieran en sus propios 

designios.

80.4 Lit. echarás humo.  80.5 Lit. (prob.) el tercio de un efa

→Is.40.12.  81.Tít. →Sal.8.1.  81.5 .que decía.


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Salmo 83:18

609

13

    ¡Oh, si mi pueblo me hubiera 

escuchado!

Si Israel hubiera andado en mis 

caminos,

14

    En un momento Yo habría 

subyugado a sus enemigos,

Y vuelto mi mano contra sus 

adversarios.

15

    Los que aborrecen a YHVH le dirían 

lisonjas serviles,

Pero su sometimiento hubiera sido 

para siempre.

16

    Habríalos sustentado con la grosura 

del trigo,

Y saciado con miel de la peña.

S

almo

 82

Salmo de Asaf.

1

    ’Elohim se levanta en la sinagoga de 

los jueces,°

Y en medio de los jueces juzga:

2

    ¿Hasta cuándo juzgaréis 

injustamente,

Y levantaréis el rostro de los 

malvados?

Selah

3

    ¡Defended al débil y al huérfano!

¡Haced justicia al afligido y al pobre!

4

    ¡Rescatad al afligido y al necesitado!

¡Libradlos° de mano de los impíos!

5

    Pero no saben ni quieren entender;

Siguen andando en tinieblas,

Tiemblan todos los cimientos de la 

tierra.°

6

    Yo dije: Dioses sois,°

Y vosotros todos hijos de ’Elyón.

7

    Sin embargo, como hombres 

moriréis;

Como cualquiera de los príncipes 

caeréis.

8

    ¡Levántate, oh ’Elohim, y juzga la 

tierra,

Porque Tú eres el dueño de todas las 

naciones!

S

almo

 83

Cántico. Salmo de Asaf.

1

    ¡Oh ’Elohim, no guardes silencio!

¡Oh ’Elohim, no calles ni te estés 

quieto!

2

    Pues he aquí, rugen tus enemigos,

Y los que te aborrecen alzan la 

cabeza.

3

    Astutamente traman conjura contra 

tu pueblo,

Y conspiran contra tus protegidos.

4

    Han dicho: Venid y destruyámoslos 

para que no sean° nación,

Ni haya más memoria del nombre de 

Israel.

5

    Porque de corazón han conspirado 

a una,

Y contra ti conciertan alianza:

6

    Las tiendas de Edom y los ismaelitas,

Moab y los agarenos,

7

    Gebal, Amón y Amalec,

Filistea con los habitantes de Tiro,

8

    También Asiria se juntó con ellos,

Sirven de brazo a los hijos de Lot.

Selah

9

    Hazles como a Madián,

Como a Sísara, como a Jabín, en el 

torrente Cisón,

10

    Que fueron destruidos en Endor,

Y vinieron a ser estiércol para la 

tierra.

11

    Pon a sus capitanes como a Oreb y 

a Zeeb,

Y a todos sus príncipes como a Zeba 

y Zalmuna,

12

    Pues dijeron: Tomemos como 

posesión nuestra

Los prados de Dios.

13

    ¡Dios mío, ponlos como torbellino 

de polvo,° como hojarasca delante 

del viento!

14

    Como el fuego consume el bosque,

Como la llama abrasa las 

montañas,

15

    Así persíguelos con tu tempestad,

Y atérralos con tu turbión.

16

    Llena sus rostros de deshonra,

Para que busquen tu Nombre, 

¡oh YHVH!

17

    ¡Sean avergonzados y turbados para 

siempre!

¡Sean humillados y perezcan,

18

    Y sepan que Tú solo, cuyo nombre 

es YHVH,

Eres ’Elyón sobre toda la tierra!

82.1  Lit.  elohim 

→ § 2.  82.4  Lit.  librad.  82.5  Es  decir,  cuando  se  pervierte  la  justicia,  se  tambalea  la  paz  del  mundo 

→Is.32.17.  82.6 →Jn.10.34.  83.4 Lit. de ser.  83.13 .de polvo


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Salmo 84:1

610

S

almo

 84

Al director del coro. Sobre guittit.° 

Salmo de los hijos de Coré.

1

    ¡Cuán amables son tus moradas, oh 

YHVH Sebaot!

2

    Mi alma anhela y aun desea con 

ansias los atrios de YHVH,

Mi corazón y mi carne cantan al 

Dios vivo.

3

    Aun el gorrión halla casa,

Y la golondrina nido para sí, donde 

ponga sus polluelos.

En tus altares,° oh YHVH Sebaot,

Rey mío y Dios mío.

4

    ¡Cuán bienaventurados son los que 

habitan en tu Casa!

Perpetuamente te alabarán.

Selah

5

    ¡Cuán bienaventurado es el 

hombre que tiene en ti sus 

fuerzas,

En cuyo corazón están las sendas!°

6

    Atravesando el valle de Baca° lo 

cambian en fuente,

Y la lluvia temprana lo cubre de 

bendición.

7

    Irán de poder en poder,

Verán a ’Elohim en Sión.

8

    ¡Oh YHVH, ’Elohim Sebaot, oye mi 

oración!

¡Presta oído, oh Dios de Jacob!

Selah

9

    Ve, oh ’Elohim, escudo nuestro,

Y mira el rostro de tu ungido.

10

    Porque mejor es un día en tus atrios 

que mil fuera de ellos.°

Escogería antes estar a la puerta de 

la Casa de mi Dios,

Que habitar en las tiendas de 

maldad.

11

    Porque sol y escudo es YHVH 

’Elohim,

Favor y honor concede YHVH,

No quitará el bien a los que andan 

en integridad.

12

    ¡Oh YHVH Sebaot, cuán 

bienaventurado es el hombre que 

confía en ti!

S

almo

 85

Al director del coro. 

Salmo de los hijos de Coré.

1

    Oh YHVH, has sido propicio a tu 

tierra,

Volviste la cautividad de Jacob.

2

    Cargaste con la iniquidad de tu pueblo,

Cubriste todo su pecado.

Selah

3

    Depusiste toda tu indignación,

Te apartaste del ardor de tu ira.

4

    Restáuranos, oh Dios de nuestra 

salvación,

Y haz cesar tu ira de sobre nosotros.

5

    ¿Estarás indignado contra nosotros 

para siempre?

¿Extenderás tu ira de generación en 

generación?

6

    ¿No volverás Tú a darnos vida,

Para que tu pueblo se regocije en ti?

7

    ¡Muéstranos, oh YHVH, tu 

misericordia

Y danos tu salvación!

8

    Escucharé lo que dirá Ha-’El;

YHVH hablará de paz a su pueblo y a 

sus santos,

Para que no vuelvan a la insensatez.

9

    Ciertamente cercana está su 

salvación a los que lo temen,

Para que habite la gloria en nuestra 

tierra.

10

    La misericordia y la verdad se 

encontraron;

La justicia y la paz se besaron.

11

    La verdad brotará de la tierra,

Y la justicia mirará desde los cielos.

12

    Ciertamente YHVH dará el bien,

Y nuestra tierra dará su fruto.

13

    La justicia irá delante de Él,

Y nos pondrá en el camino de sus 

pasos.

S

almo

 86

Oración de David.

1

    ¡Oh YHVH, inclina tu oído y 

respóndeme!

Porque estoy afligido y menesteroso.

84.Tít 

→Sal.8.1.  84.3 Esto es, en los atrios →v. 2. La elipsis ha de suplirse así: Así (como el gorrión y la golondrina hallan 

nido) he hallado yo cobijo en tus altares… 

84.5 Se refiere a las sendas a Sión.  84.6 Prob. se refiera al valle de lágrimas

84.10 .fuera de ellos.


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Salmo 88:5

611

2

    Guarda mi alma, porque soy piadoso,

Dios mío, salva a tu siervo que en ti 

confía.

3

    Oh Adonay, ten misericordia de mí,

Porque a ti clamo todo el día.

4

    Oh Adonay, alegra el alma de tu 

siervo,

Porque a ti elevo mi alma.

5

    Porque Tú Adonay, eres bueno y 

perdonador,

Y grande en misericordia para con 

todos los que te invocan.

6

    Oh YHVH, oye mi oración,

Y atiende a la voz de mis ruegos.

7

    En el día de mi adversidad te llamaré,

Porque Tú me responderás.

8

    Oh Adonay, no hay como Tú entre 

los dioses,

Ni obras como las tuyas.

9

    Oh Adonay, todas las naciones que 

hiciste vendrán y se postrarán 

delante de ti,

Y glorificarán tu Nombre,

10

    Porque Tú eres grande, y hacedor de 

maravillas;

¡Sólo Tú eres ’Elohim!

11

    Enséñame, oh YHVH, tu camino; 

caminaré en tu verdad;

Afirma mi corazón, para que tema 

tu Nombre.

12

    ¡Oh Adonay, Dios mío, te alabaré 

con todo mi corazón,

Y glorificaré tu Nombre para 

siempre!

13

    Porque tu misericordia ha sido 

grande para conmigo,

Has librado mi alma de las 

profundidades del Seol.

14

    ¡Oh ’Elohim! los soberbios se 

levantaron contra mí,

Y una banda de violentos busca mi 

vida,

Y no te han tenido en cuenta.°

15

    Pero Tú, Adonay, eres un Dios 

compasivo y misericordioso,

Lento para la ira y grande en 

misericordia y verdad.

16

    Mírame, y ten misericordia de mí,

Da tu fortaleza a tu siervo

Y salva al hijo de tu sierva.

17

    Muéstrame alguna señal de tu favor,

Véanla los que me aborrecen, y sean 

avergonzados,

Porque Tú, oh YHVH, me has 

ayudado y consolado.

S

almo

 87

Salmo de los hijos de Coré.° 

Cántico.

1

    Él la fundó sobre los santos montes.

2

    Ama YHVH las puertas de Sión

Más que todas las moradas de Jacob.

3

    Cosas gloriosas se dicen de ti,

¡Oh ciudad de Dios!

Selah

4

    Yo haré mención de Rahab,° y 

de Babilonia entre los que me 

conocen,

He aquí Filistea, Tiro y Etiopía:

°Éste nació allá.

5

    Y de Sión se dirá: Éste y aquél han 

nacido en ella,

Y ’Elyón mismo la establecerá.

6

    YHVH contará al inscribir a los 

pueblos: Éste nació allí.

Selah

7

    Entonces los que cantan y los que 

danzan dirán:

¡Todas mis fuentes° están en ti!

S

almo

 88

Cántico. Salmo de los hijos de Coré.° 

Al director del coro, sobre Mahalat Leannot.° 

Maskil de Hemán ezrajita.

1

    Oh YHVH, Dios de mi salvación,

Día y noche clamo delante de ti.

2

    Llegue mi oración a tu presencia, 

inclina tu oído a mi clamor.

3

    Porque mi alma está hastiada de 

males,

Y mi vida se acerca al Seol.

4

    Soy contado entre los que 

descienden al sepulcro,

He llegado a ser como un varón sin 

fuerza,

5

    Confinado° entre los muertos, como 

los traspasados que yacen en el 

sepulcro,

86.14  Lit.  no  te  han  puesto  delante  de  ellos.  87.Tít.  Qóraj

→Sal.42.1.  87.4 Nombre alegórico de Egipto.  87.4 La elipsis 

puede  ser:  de  sus  moradores  se  dirá

87.7  Es  decir,  los  manantiales  de  salvación 

→Is.12.3.  88.Tít.  Qóraj.  →ISal.42.1. 

88.Tít. Mahalat Leannot = enfermedad aflictiva.  88.5 Lit. libre. Es decir, puesto aparte


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Salmo 88:6

612

De quienes ya no te acuerdas, que 

han sido cortados por tu mano.

6

    Me has puesto en el hoyo más 

profundo,

En tinieblas abismales, en 

profundidades.

7

    Tu ira gravita sobre mí;

Me afliges con todas tus olas.

Selah

8

    Has alejado a mis conocidos de mí,

Me has hecho repugnante para ellos,

Estoy encerrado, y no puedo salir.

9

    Oh YHVH, los ojos se me nublan de 

pesar;

Cada día te invoco, y tiendo mis 

manos hacia ti:

10

    ¿Harás milagros por los muertos?

¿Se levantarán las sombras° para 

darte gracias?

Selah

11

    ¿Se anunciará en el sepulcro tu 

misericordia,

Y tu fidelidad en el Abadón?

12

    ¿Serán reconocidas tus maravillas 

en las tinieblas,

O tu justicia en la tierra del olvido?

13

    Pero yo a ti, oh YHVH, te pido 

auxilio:

De mañana irá a tu encuentro mi 

súplica.

14

    ¿Por qué, oh YHVH, desechas mi 

alma y me escondes tu rostro?

15

    Desde mi juventud he estado 

afligido y a punto de morir,

He soportado tus terrores, estoy 

desconcertado.°

16

    Sobre mí ha pasado tu grande ira,

Tus terrores me han cortado,

17

    Como aguas me rodean todo el día,

A una me han cercado.

18

    Alejaste de mí a mis amigos y 

compañeros,

Y mi compañía son las tinieblas.

S

almo

 89

Maskil de Etán ezrajita.

1

    Las misericordias de YHVH cantaré 

perpetuamente,

De generación en generación haré 

notoria tu fidelidad con mi boca;

2

    Porque dije: La misericordia será 

edificada para siempre,

En los cielos mismos establecerás tu 

verdad.

3

    Hice pacto con mi escogido,

Juré a David mi siervo, diciendo:

4

    Confirmaré tu linaje para siempre,

Y edificaré tu trono de generación 

en generación.

Selah

5

    Los cielos confesarán tus maravillas, 

oh YHVH,

Y también tu fidelidad en la 

congregación de los santos.

6

    Porque, ¿quién entre los cielos 

puede compararse a YHVH?

¿Quién entre los seres divinos se 

asemeja a YHVH,

7

    Dios terrible en el consejo de los 

santos,

Temido por todos los que están a su 

alrededor?

8

    Oh YHVH, ’Elohim Sebaot, ¿quién 

como Tú, poderoso YH?

Tu fidelidad te rodea.

9

    Tú dominas la soberbia° del mar;

Cuando se encrespan sus olas, Tú las 

sosiegas.

10

    Como a herido de muerte,

Tú quebrantaste a Rahab;°

Con tu brazo fuerte° esparciste a tus 

enemigos.

11

    Tuyos son los cielos, tuya también 

la tierra,

El mundo y su plenitud, Tú lo 

fundaste.

12

    El norte y el sur, tú los creaste,

El Tabor y el Hermón se regocijan 

en tu Nombre.

13

    Tuyo es el brazo potente,

Fuerte es tu mano,

Exaltada tu diestra.

14

    La justicia y el derecho son el 

fundamento de tu trono,

La misericordia y la verdad van 

delante de tu rostro.

15

    ¡Bienaventurado el pueblo que 

conoce el grito de júbilo!

88.10 Lit. los debilitados o impotentes. Es decir, los espíritus de los difuntos ubicados en el Seol.  88.15 desconcertado. Es una 

traducción conjetural del vocablo heb. afvunah, que no ocurre en ningún otro lugar de la Biblia. Las distintas versiones propo-

nen una variedad de opciones, pero resulta imposible dar una traducción segura. 

89.9 Lit. la subida.  89.10 Esto es, Egipto

89.10 Lit. con el brazo de tu fuerza.


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Salmo 89:47

613

Andarán a la luz de tu rostro, 

oh YHVH;

16

    En tu Nombre se alegrarán todo el 

día,

Y por tu justicia serán enaltecidos.

17

    Porque Tú eres el esplendor de su 

potencia,

Y por tu buena voluntad exaltarás 

nuestro poderío,°

18

    Pues de YHVH es nuestro escudo,

Del Santo de Israel, nuestro Rey.

19

    Antiguamente hablaste en visión a 

tus santos,

Dijiste: He puesto el socorro sobre 

uno que es poderoso,

He exaltado a uno escogido de entre 

el pueblo.°

20

    Hallé a David mi siervo,

Lo ungí con mi santa unción,

21

    Mi mano estará siempre con él,

Mi brazo también lo fortalecerá.

22

    El enemigo no podrá hacer reclamo 

sobre él,°

Ni el maligno lo quebrantará,

23

    Porque Yo aplastaré a sus 

adversarios delante de él,

Y heriré a los que lo aborrecen.

24

    Mi fidelidad y mi misericordia 

estarán con él,

Y en mi Nombre será exaltado su 

poder.

25

    Pondré asimismo su mano sobre el 

mar,

Y los ríos sobre su diestra.

26

    Él clamará a mí: ¡Tú eres mi Padre,

Mi Dios y la Roca de mi salvación!

27

    Yo también lo constituiré por 

primogénito,

El más excelso de los reyes de la 

tierra.

28

    Para siempre le conservaré mi 

misericordia,

Y mi pacto con él será firme.

29

    Así estableceré su linaje para 

siempre,

Y su trono como los días de los 

cielos.

30

    Si sus hijos abandonan mi Ley,

Y no andan en mis ordenanzas;

31

    Si profanan mis estatutos,

Y no guardan mis mandamientos,

32

    Entonces visitaré con vara su 

transgresión,

Y con azotes su iniquidad.

33

    Pero no quitaré de él mi 

misercordia,

Ni faltaré a mi fidelidad.

34

    No olvidaré mi pacto,

Ni mudaré lo que salió de mis labios.

35

    Una vez juré por mi santidad,

Y no mentiré a David:

36

    Su linaje será para siempre,

Y su trono como el sol delante de mí.

37

    Será establecido para siempre, como 

la luna,

Testigo fiel en el firmamento.

Selah

38

    Pero ahora° Tú desechas a tu siervo 

y menosprecias a tu ungido,

Te has airado con él.

39

    Rompiste la alianza con tu siervo,

Has derribado su corona por tierra;°

40

    Has desportillado todos sus vallados,

Y convertido en ruinas sus 

fortalezas.

41

    Todos los que pasan de camino lo 

saquean,

Ha venido a ser oprobio para sus 

vecinos.

42

    Has hecho exaltar la diestra de sus 

adversarios,

Has hecho alegrar a todos sus 

enemigos.

43

    Has hecho embotar el filo de su 

espada,

Y que no esté firme en la batalla.

44

    Has hecho cesar su gloria

Y has echado su trono por tierra.

45

    Has hecho que los días de su 

juventud se acorten,

Y sean cubiertos de ignominia.

Selah

46

    ¿Hasta cuándo, oh YHVH?

¿Te esconderás para siempre?

¿Hasta cuándo° arderá tu ira como 

el fuego?

47

    Recuerda cuán breve es mi tiempo,°

¿Has creado en vano a todos los 

hijos del hombre?

89.17  Lit.  cuerno.  89.19 

→Jn.1.26.  89.22 Es decir, el enemigo no podrá hacer que el acreedor (de Davidactúe contra él 

→Lc.22.31.  89.38 .ahora.  89.39 Es decir, arrojándola a la tierra.  89.46 .Hasta cuando.  89.47 Lit. de qué duración (soyyo.


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Salmo 89:48

614

48

    ¿Qué hombre vivirá sin ver la 

Muerte?

¿Quién podrá librar su alma de la 

garra del Seol?

Selah

49

    Oh Adonay, ¿dónde están tus 

antiguas misericordias, que en tu 

fidelidad juraste a David?

50

    ¡Acuérdate, oh Adonay, del oprobio° 

de tus siervos, oprobio° que llevo 

en mi seno de parte de todos, los 

muchos pueblos!

51

    Acuérdate° de que tus enemigos han 

afrentado, oh YHVH,

Han afrentado las pisadas de tu 

ungido.

52

    ¡Bendito sea YHVH para siempre!

Amén, amén.

S

almo

 90

Oración de Moisés, varón de Dios.

1

    ¡Oh Adonay, Tú has sido nuestra 

morada°

De generación en generación!

2

    Antes que los montes fueran 

engendrados,

Y dieras a luz la tierra y el mundo,

Desde la eternidad y hasta la 

eternidad, Tú° eres ’El.

3

    Haces que el hombre vuelva al 

polvo,

Y dices: Volveos, hijos de Adam.

4

    Porque mil años delante de tus ojos

Son como el día de ayer, que pasó,

Y como una de las vigilias de la 

noche.

5

    Los arrastras como una 

inundación,

Son como un sueño al amanecer,

Como la hierba que crece:

6

    A la mañana reverdece y florece,

A la tarde se marchita y se seca.

7

    ¡Cómo somos consumidos por 

tu ira

Y turbados por tu indignación!

8

    Pusiste nuestras iniquidades ante ti,

Nuestras cosas ocultas a la luz de tu 

rostro,

9

    Ciertamente todos nuestros días 

declinan a causa de tu ira;

Consumimos nuestros años como 

un suspiro.

10

    Los días de nuestros años son 

setenta años,

Y en los robustos, ochenta años,

Pero todo su orgullo no es más que 

afán y vanidad,

Porque pronto pasan… y volamos.

11

    ¿Quién conoce el poder de tu ira y 

de tu indignación conforme al 

temor que se te debe?

12

    Enséñanos a contar nuestros días de 

tal modo,

Que traigamos al corazón 

sabiduría.°

13

    ¡Vuélvete, YHVH! ¿Hasta cuándo?

¡Ten compasión de tus siervos!

14

    ¡Sácianos presto de tu misericordia,

Y cantaremos y nos alegraremos 

todos nuestros días!

15

    Alégranos conforme a los días que 

nos afligiste,

Y los años en que hemos visto 

males.

16

    Manifiesta en tus siervos tu obra,

Y sobre sus hijos tu gloria,

17

    Y la hermosura de Adonay nuestro 

Dios sea sobre nosotros;

Y confirma sobre nosotros la obra de 

nuestras manos;

¡Sí, la obra de nuestras manos 

confirma!

S

almo

 91

1

    El que habita al abrigo de ’Elyón°

Morará bajo la sombra de ’El-

Shadday.°

2

    Diré yo a YHVH:

¡Refugio mío y fortaleza mía, mi 

Dios en quien confío!

3

    Él te librará del lazo del pajarero,°

De la peste destructora.

4

    Con sus plumas te cubrirá

Y debajo de sus alas hallarás 

refugio,

Escudo y adarga es su verdad.

89.50 .oprobio.  89.51 .Acuérdate.  90.1 LXX: un refugio.  90.2  es enfático en el texto hebreo.  90.12 Lit. que hagamos 

venir un corazón de sabiduría

91.1 Esto es, el Dios Altísimo.  91.1 Esto es, Dios Todo-suficiente o Todo-poderoso.  91.3 Esto 

es, de la trampa del cazador de aves.


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Salmo 93:3

615

5

    No temerás el terror nocturno,

Ni saeta que vuele de día,

6

    Ni pestilencia que ande en 

oscuridad,

Ni mortandad que en medio del día 

destruya.

7

    Caerán a tu lado mil, y diez mil a tu 

diestra,

Pero a ti no llegará.

8

    Ciertamente con tus ojos mirarás,

Y verás la paga de los impíos.

9

    Por cuanto has puesto a YHVH, que 

es mi refugio,

A ’Elyón, por habitación tuya,

10

    No te sobrevendrá mal,

Ni plaga alguna tocará tu morada,

11

    Pues a sus ángeles mandará acerca 

de ti,

Que te guarden en todos tus caminos,

12

    Sobre las palmas te llevarán,

Para que tu pie no tropiece en 

piedra,

13

    Sobre el león y el áspid pisarás,

Hollarás al cachorro del león y al 

dragón.

14

    Por cuanto en mí ha puesto su 

amor, Yo también lo libraré,

Lo pondré en alto, por cuanto ha 

conocido mi Nombre.

15

    Me invocará y Yo le responderé,

Con él estaré en la angustia,

Lo libraré y lo glorificaré,

16

    Lo saciaré de larga vida,

Y haré que vea mi salvación.

S

almo

 92

Salmo. Cántico para el Shabbat.

1

    ¡Bueno es alabarte, oh YHVH,

Y cantar salmos a tu nombre, oh 

’Elyón!

2

    Anunciar por la mañana tu 

misericordia,

Y tu fidelidad en las noches,

3

    Con el decacordio y el salterio,

Con el dulce tono del arpa.

4

    Oh YHVH, ciertamente me has 

hecho alegrar en tu obra;

Por las obras de tus manos doy 

gritos de júbilo.

5

    ¡Cuán grandes son tus obras, oh 

YHVH!

Muy profundos son tus 

pensamientos.

6

    El hombre torpe no lo sabe,

El insensato no entiende esto:

7

    Cuando los malvados reverdecen 

como la hierba,

Y florecen todos los que hacen 

iniquidad,

Es para que sean destruidos 

eternamente.

8

    Pero Tú, YHVH, eres exaltado por 

siempre.

9

    Porque he aquí tus enemigos, oh 

YHVH,

He aquí tus enemigos perecerán;

Serán dispersados todos los que 

hacen iniquidad.

10

    Pero Tú aumentarás mi fuerza como 

la del búfalo,

Seré ungido con aceite fresco,

11

    Y mis ojos mirarán por encima de 

mis enemigos,

Y mis oídos oirán de aquellos 

inicuos que se levantaron 

contra mí.

12

    El justo florecerá como la palmera,

Crecerá como cedro en el Líbano,

13

    Plantados en la Casa de YHVH,

Florecerán en los atrios de nuestro 

Dios.

14

    Aun en la vejez darán fruto,

Estarán llenos de savia y verdor,°

15

    Para manifestar que YHVH es recto,

Mi Roca es, y no hay injusticia en Él.

S

almo

 93

1

    ¡YHVH reina! se ha vestido de 

majestad!

YHVH se viste y se ciñe de poder.

El mundo está establecido y no será 

conmovido.

2

    Tu trono está establecido desde la 

antigüedad,

Tú eres desde la eternidad.

3

    Oh YHVH, los torrentes se elevan,

Las crecientes han alzado su voz,

92.14 Lit. gordos y verdes.


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Salmo 93:4

616

Las olas hacen oír su estruendo.

4

    YHVH en las alturas es más 

poderoso que el estruendo de 

muchas aguas,

Que las recias olas del mar.

5

    Tus testimonios son firmes en gran 

manera.

Oh YHVH, la santidad es propia de 

tu Casa,

Por los siglos y para siempre.

S

almo

 94

1

    ¡Oh YHVH, Dios vengador! ¡Oh Dios 

vengador, aparece!

2

    ¡Levántate, oh Juez de la tierra, y da 

el pago a los soberbios!

3

    ¿Hasta cuándo los malvados, oh YHVH,

Hasta cuándo se exaltarán los 

malvados?

4

    ¿Hasta cuándo hablarán insolencias, 

y se vanagloriarán todos los que 

hacen iniquidad?

5

    A tu pueblo quebrantan, oh YHVH,

Y oprimen a tu heredad;

6

    Asesinan a la viuda y al extranjero, 

matan a los huérfanos,

7

    Y dicen: No lo verá YH,

El Dios de Jacob no lo tomará en 

cuenta.

8

    Entended, torpes del pueblo,

Y vosotros necios:

¿Cuándo actuaréis sabiamente?

9

    El que hizo el oído, ¿no oirá?

El que formó el ojo, ¿no verá?

10

    El que corrige a las naciones, ¿no 

castigará?

El que enseña al hombre el 

conocimiento, ¿no conocerá?°

11

    YHVH conoce los pensamientos del 

hombre,

Que son vanidad.

12

    ¡Cuán bienaventurado es el varón 

a quien Tú, oh YH, corriges e 

instruyes en tu Ley!

13

    Para darle descanso de los días malos,

Mientras la fosa se cava para los 

inicuos.

14

    Porque YHVH no abandonará a su 

pueblo,

Ni desamparará a su heredad,

15

    Porque el juicio retornará a la 

justicia,

Y todos los rectos de corazón irán en 

pos de ella.

16

    ¿Quién se levantará por mí contra 

los malignos?

¿Quién se mantendrá en pie por mí 

contra los que hacen iniquidad?

17

    Si no me ayudara YHVH,

Pronto mi alma moraría en el 

silencio.

18

    Cuando digo: ¡Mi pie resbala!

Tu misericordia, oh YHVH, me 

sustenta.

19

    Cuando mis inquietudes se 

multiplican en mí,

Tus consuelos deleitan mi alma.

20

    ¿Se aliará contigo el trono de 

iniquidad,°

Que mediante presuntas leyes 

comete agravios?

21

    Conspiran en tropa contra la vida 

del justo,

Y condenan a muerte° al inocente.

22

    Pero YHVH me ha sido por refugio,

Mi Dios, por roca de mi confianza.

23

    Él hará volver sobre ellos su 

iniquidad,

Y los aniquilará en su propia 

maldad,

YHVH nuestro Dios los aniquilará.

S

almo

 95

1

    ¡Venid, cantemos con gozo a YHVH!

¡Aclamemos con júbilo a la Roca de 

nuestra salvación!

2

    Entremos en su presencia con 

acción de gracias,

Aclamémosle con salmos.

3

    Porque YHVH es Dios grande,

Y gran Rey sobre todos los dioses,

4

    En su mano están las profundidades 

de la tierra,

Y suyas son las alturas de los 

montes.

5

    Suyo es el mar, pues Él lo hizo,

Y sus manos formaron la tierra 

firme.

94.10 .¿no conocerá?  94.20 Lit. destrucciones.  94.21 Lit. la sangre.


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Salmo 97:8

617

6

    ¡Venid, inclinémonos y 

postrémonos,

Arrodillémonos ante la presencia de 

YHVH, nuestro Hacedor!

7

    Porque Él es nuestro Dios,

Y nosotros pueblo de su prado y 

ovejas de su mano.

Si oyereis hoy su voz,

8

    No endurezcáis vuestro corazón 

como en Meriba,

Como en el día de Masah en el 

desierto,

9

    Donde me tentaron vuestros 

padres;

Debatieron, aunque habían visto mi 

obra.

10

    Durante cuarenta años estuve 

disgustado con aquella 

generación,

Y dije: Es un pueblo que divaga en 

su corazón,

Y no han conocido mis caminos;

11

    Por tanto, juré en mi ira

Que no entrarían en mi reposo.

S

almo

 96

1

    ¡Cantad a YHVH un cántico 

nuevo!

¡Cantad a YHVH toda la tierra!

2

    ¡Cantad a YHVH, bendecid su 

Nombre!

Proclamad de día en día las buenas 

nuevas de su salvación;

3

    Relatad su gloria entre las 

naciones,

Entre todos los pueblos sus 

maravillas.

4

    Porque grande es YHVH, y digno de 

suprema alabanza,

Temible sobre todos los dioses.

5

    Porque todos los dioses de los 

pueblos son meras figuras,

Pero YHVH hizo los cielos.

6

    Ante Él están la gloria y la 

majestad,

Fortaleza y hermosura hay en su 

Santuario.

7

    Tributad a YHVH, oh familias de los 

pueblos,

Tributad a YHVH gloria y poder.

8

    Tributad a YHVH la honra debida a 

su Nombre,

Llevad ofrenda y entrad en sus 

atrios.

9

    Adorad a YHVH en la hermosura de 

la santidad,

Temblad ante su presencia, toda la 

tierra.

10

    Decid entre las naciones: ¡YHVH 

reina!

Ciertamente Él ha afirmado el 

mundo, y no será conmovido.

Él juzgará a los pueblos con 

equidad.

11

    ¡Alégrense los cielos y gócese la 

tierra!

Brame el mar y su plenitud;

12

    Regocíjese el campo y todo lo que 

hay en él.

Entonces todos los árboles del 

bosque cantarán jubilosos,

13

    Delante de YHVH, porque viene,

Porque viene a juzgar la tierra.

Juzgará al mundo con justicia,

Y a los pueblos con fidelidad.

S

almo

 97

1

    ¡YHVH reina!

¡Regocíjese la tierra!

¡Alégrense la multitud de 

las islas!

2

    Las nubes y densa oscuridad lo 

rodean,

La equidad y la justicia son el 

fundamento de su trono.

3

    Un fuego avanza delante de Él,

Que abrasa a sus adversarios en 

derredor.

4

    Sus relámpagos iluminan el 

orbe,

La tierra mira y se estremece.

5

    Ante la presencia de YHVH las 

montañas se derriten como 

cera,

Delante del Señor de toda 

la tierra.

6

    Los cielos hacen saber su justicia,

Y todos los pueblos ven su gloria.

7

    ¡Sean avergonzados todos los que 

sirven a imágenes talladas,

Y cuantos se glorían en los ídolos!

¡Póstrense ante Él todos los 

dioses!

8

    Lo oyó Sión y se alegró,


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Salmo 97:9

618

Y las hijas de Judá se regocijaron, oh 

YHVH,

A causa de tus juicios,

9

    Porque Tú, oh YHVH, eres ’Elyón 

sobre toda la tierra,

Infinitamente enaltecido sobre todos 

los dioses.

10

    Los que amáis a YHVH, aborreced 

el mal,

Él guarda las almas de sus santos,

Las libra de la mano de los 

malvados.

11

    Luz está sembrada para el justo,

Y alegría para los rectos de corazón.

12

    ¡Alegraos justos en YHVH,

Y dad gracias a la memoria de su 

santidad!

S

almo

 98

Salmo.

1

    Cantad a YHVH un cántico nuevo,

Porque Él ha hecho maravillas,

Su santo brazo, su misma diestra lo 

ha salvado,°

2

    YHVH ha hecho notoria su 

salvación,

Ha manifestado su justicia a vista de 

las naciones;

3

    Ha recordado su misericordia y su 

fidelidad a la casa de Israel,

¡Todos los confines de la tierra han 

visto la salvación de nuestro 

Dios!

4

    ¡Aclamad a YHVH toda la tierra!

¡Prorrumpid en alabanzas, cantad, y 

tañed salmos!

5

    Tañed salmos a YHVH con arpa,

Con arpa y al son del salterio,

6

    Con trompetas y al sonido del 

shofar.

¡Mostrad vuestro alborozo en 

presencia del Rey YHVH!

7

    ¡Conmuévase el mar, y cuanto hay 

en él,

El mundo, y los que en él habitan!

8

    ¡Batan palmas los ríos,

Y a una canten con júbilo los montes 

delante de YHVH!

9

    Porque Él viene a juzgar la tierra.

Juzgará al mundo con justicia,

Y a los pueblos con equidad.

S

almo

 99

1

    ¡YHVH reina! ¡Tiemblen los pueblos!

Se sienta sobre los querubines, 

¡Conmuévase la tierra!

2

    YHVH es grande en Sión,

Y exaltado sobre todos los pueblos.

3

    Confiesen todos tu grande y temible 

Nombre:

¡Santo es Él!

4

    Y el poder del Rey es afecto a la 

justicia.

Tú has establecido la equidad,

Tú has hecho juicio y justicia en 

Jacob.

5

    Exaltad a YHVH nuestro Dios,

Y postraos ante el estrado de sus 

pies,

¡Santo es Él!

6

    Moisés y Aarón entre sus sacerdotes,

Y Samuel, entre los que invocan su 

Nombre,

Invocaban a YHVH, y Él les respondía.

7

    En columna de nube hablaba con 

ellos,

Guardaban sus testimonios, y el 

estatuto que les había dado.

8

    Oh YHVH Dios nuestro, Tú mismo 

les respondías,

Fuiste para ellos un Dios 

perdonador,

Aunque vindicador de sus delitos.

9

    Exaltad a YHVH nuestro Dios, y 

postraos hacia su santo monte,

Porque YHVH nuestro Dios es santo.

S

almo

 100

Salmo de acción de gracias.

1

    ¡Aclamad con júbilo a YHVH toda la 

tierra!

2

    Servid a YHVH con alegría,

Venid ante su presencia con 

regocijo.

3

    Reconoced que YHVH es ’El,

Él nos hizo y suyos somos,

98.1 Es decir, le dio la victoria 

→Is.63.4-6.


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Salmo 102:16

619

Pueblo suyo y ovejas de su prado.

4

    Entrad por sus puertas con acción 

de gracias,

Por sus atrios con alabanza,

Dadle gracias, bendecid su Nombre,

5

    Porque YHVH es bueno;

Para siempre es su misericordia,

Y su fidelidad de generación en 

generación.

S

almo

 101

Salmo de David.

1

    ¡Cantaré acerca de tu misericordia y 

tu justicia!

A ti, oh YHVH, entonaré salmos.

2

    Observaré atentamente el camino de 

la integridad.

¿Cuándo vendrás a mí?

Andaré en la integridad de mi 

corazón en medio de mi casa.

3

    No consideraré ningún asunto de 

Belial.

Aborrezco la obra de los que se 

desvían,° no se me pegará.

4

    El corazón perverso se alejará de mí,

No reconoceré al malo,

5

    Destruiré al que calumnia en secreto 

a su prójimo,

No soportaré al altanero de ojos y 

vanidoso de corazón.

6

    Sobre los fieles de la tierra fijaré mis 

ojos,

Para que estén conmigo.

El que anda en camino de 

integridad, éste me servirá.°

7

    El que practica engaño no morará 

en mi casa,

Quien profiera mentiras no 

permanecerá ante mis ojos.

8

    Día a día destruiré a todos los 

malvados de la tierra,

Para extirpar de la ciudad de YHVH a 

todos los que obran iniquidad.

S

almo

 102

Oración de un afligido que desmaya, y en presencia 

de YHVH derrama su querella.

1

    ¡Oh YHVH, escucha mi oración,

Y llegue a ti mi clamor!

2

    ¡No escondas de mí tu rostro en el 

día de mi angustia!

¡Inclina a mí tu oído!

¡Respóndeme pronto el día en que te 

invoco!

3

    Porque los días se desvanecen como 

humo

Y mis huesos arden como leña seca.

4

    Mi corazón herido se agosta como la 

hierba,

Y aun de comer mi pan me olvido.

5

    Al son de mis gemidos

La piel° se me pega a los huesos.

6

    Soy semejante a la lechuza del 

desierto,

He venido a ser como un búho de las 

soledades.

7

    Estoy desvelado, y me siento como 

pájaro sin pareja en el tejado.

8

    Mis enemigos me afrentan cada día,

Mis escarnecedores me maldicen.

9

    He comido, pues, cenizas como pan,

Y he mezclado con lágrimas mi 

bebida,

10

    A causa de tu indignación y de tu ira,

Porque me alzaste en vilo y me 

arrojaste.

11

    Mis días son una sombra que se 

alarga,

Y me voy secando como la hierba.

12

    Tú en cambio, oh YHVH, 

permaneces para siempre,

Tu Nombre pasa de generación en 

en generación.

13

    Te levantarás y tendrás compasión 

de Sión,

Porque es el momento de tener 

misericordia de ella,

Porque ha llegado el tiempo 

señalado,

14

    Porque tus siervos aman sus piedras,

Y miran con afecto hasta su mismo 

polvo.

15

    Así las naciones temerán el nombre 

de YHVH,

Y todos los reyes de la tierra tu 

gloria.

16

    Porque YHVH habrá reedificado a 

Sión,

101.3 Lit. obra de desviaciones.  101.6 Lit. ministrará.  102.5 Lit. carne.


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Salmo 102:17

620

Habrá aparecido en su gloria,

17

    Habrá vuelto el rostro a la oración 

de los desamparados,

Pues no habrá despreciado su ruego.

18

    Esto será escrito para la postrera 

generación,

Para que un pueblo aún por crear 

alabe a YH,

19

    Que se asomó desde su excelso 

Santuario.

Desde los cielos YHVH se fijó en la 

tierra,

20

    Para oír el lamento del cautivo,

Para libertar a los condenados a 

muerte.

21

    Así se pregonará en Sión la fama de 

YHVH,

Y su alabanza en Jerusalem,

22

    Cuando los pueblos y los reinos sean 

congregados a una,

Para servir a YHVH.

23

    Él agotó mi fuerza en el camino,

Acortó mis días.

24

    Digo: ¡Dios mío, no me arrebates° 

en la mitad de mis días!

Tú, cuyos años se miden por 

generaciones.

25

    Tú desde el principio fundaste la 

tierra,

Y los cielos son obra de tus manos.

26

    Ellos ciertamente perecerán, pero 

Tú permaneces.

Todos ellos se desgastarán como una 

vestidura,

Como vestido los cambiarás, y 

desaparecerán.

27

    Pero Tú eres el mismo,

Y tus años no se acaban.

28

    Los hijos de tus siervos 

permanecerán,

Y su simiente será establecida 

delante de ti.

S

almo

 103

De David.

1

    Bendice alma mía a YHVH, Y 

bendiga todo mi ser su santo 

Nombre.

2

    Bendice alma mía a YHVH,

Y no olvides ninguno de sus 

beneficios.

3

    Él es quien perdona todas tus 

iniquidades,

El que sana todas tus dolencias;

4

    El que rescata del hoyo tu vida,

El que te corona de favores y 

misericordias,

5

    El que sacia con bien tus anhelos,

Para que rejuvenezcas como el 

águila.

6

    YHVH es el que hace justicia,

Y derecho a todos los oprimidos.

7

    Dio a conocer sus caminos a Moisés,

Y a los hijos de Israel sus proezas.

8

    Misericordioso y clemente es YHVH,

Lento para la ira y grande en 

misericordia.

9

    No contenderá para siempre,

Ni para siempre estará enojado.

10

    No ha hecho con nosotros conforme 

a nuestros pecados,

Ni nos ha retribuido conforme a 

nuestras iniquidades.

11

    Porque como la altura de los cielos 

sobre la tierra,

Engrandeció su misericordia para 

los que lo temen.

12

    Como el oriente está lejos del 

occidente,

Así hizo alejar de nosotros nuestras 

transgresiones.

13

    Como el padre se enternece con sus 

hijos,

Así se enternece YHVH de los que lo 

temen.

14

    Porque Él conoce nuestra condición,

Se acuerda de que somos polvo.

15

    El hombre, como la hierba son sus 

días,

Florece como la flor del campo,

16

    Que el viento la roza, y ya no existe,

Y su lugar no la conocerá jamás.

17

    Pero la misericordia de YHVH 

es desde la eternidad hasta la 

eternidad sobre los que lo temen,

Y su justicia sobre los hijos de los 

hijos,

102.24 Lit. no me hagas subir.


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Salmo 104:23

621

18

    Sobre los que observan su pacto

Y se acuerdan de sus preceptos para 

cumplirlos.

19

    YHVH afirmó en los cielos su trono,

Y su reino domina sobre todo.

20

    Bendecid a YHVH, vosotros sus 

ángeles,

Poderosos en fortaleza, que ejecutáis 

su palabra,

Obedeciendo la voz de su precepto.

21

    Bendecid a YHVH, vosotros todos 

sus ejércitos,

Ministros suyos, que hacéis su 

voluntad.

22

    Bendecid a YHVH, vosotras todas 

sus obras,

En todos los lugares de su señorío,

¡Bendice, oh alma mía, a YHVH!

S

almo

 104

1

    Bendice alma mía a YHVH.

¡Oh YHVH, Dios mío, cuánto te has 

engrandecido!

Te has revestido de gloria y 

majestad,

2

    Eres° el que se viste de luz como 

con un manto,

Que despliega los cielos como una 

cortina,

3

    Que entabla sobre las aguas sus altas 

moradas,

Que pone las nubes por su carroza,

Que anda sobre las alas del viento,

4

    Que hace de los vientos sus 

mensajeros,

Y de las flamas del fuego sus 

ministros.

5

    Estableció la tierra sobre sus 

cimientos,

Para que nunca sea sacudida,

6

    Cual vestido la cubriste con el 

abismo,

Sobre los montes estaban las aguas.

7

    A tu reprensión huyeron,

A la voz de tu trueno se precipitaron.

8

    Subieron los montes, descendieron 

los valles,

Al lugar que les habías fijado.

9

    Les pusiste límite, el cual no 

traspasarán,

Ni volverán a cubrir la tierra.

10

    Eres° el que envía fuentes por los 

valles,

Que corren entre los montes,

11

    Dan de beber a todas las bestias del 

campo,

Mitigan su sed los asnos monteses;

12

    A sus orillas habitan las aves de los 

cielos,

Trinan entre las ramas.

13

    El que da de beber a los montes 

desde sus aposentos,

Del fruto de tus obras está saciada la 

tierra.

14

    El que hace brotar la hierba para el 

ganado,

Y la vegetación para el servicio del 

hombre,

Para que él saque el pan de la 

tierra,

15

    Y el vino, que alegra el corazón del 

hombre;

Y el aceite, que hace brillar su 

rostro,

Y el alimento, que sustenta el 

corazón del hombre.

16

    Los árboles de YHVH se llenan de 

savia,

Los cedros del Líbano que Él plantó,

17

    Allí anidan las aves,

La cigüeña, cuya casa está en los 

cipreses.

18

    Los montes altos para las cabras 

monteses,

Las peñas, madrigueras para los 

conejos.

19

    Hizo la luna para las estaciones,

Y el sol, que conoce el punto de su 

ocaso.

20

    Traes la oscuridad y llega a ser de 

noche,

En ella se arrastran todas las bestias 

del bosque.

21

    Los leoncillos rugen tras la presa,

Y buscan de ’El su comida.

22

    Al salir el sol se recogen,

Y se echan en sus guaridas.

23

    Sale el hombre a su labor,

A su labranza hasta la tarde.

104.2 .Eres.  104.10 .Eres.


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Salmo 104:24

622

24

    ¡Cuán innumerables son tus obras, 

oh YHVH!

Hiciste todas ellas con sabiduría,

La tierra está llena de tus 

posesiones.

25

    He allí el grande y ancho mar,

Donde hay un hervidero 

innumerable de seres,

Seres pequeños y grandes.

26

    Allí navegan las naves,

Allí ese Leviatán que formaste para 

que jugueteara en él.

27

    Todos ellos esperan en ti

Para que les des comida a su tiempo.

28

    Les das y recogen;

Abres tu mano, y se sacian del bien.

29

    Cuando ocultas tu rostro, se turban,

Si retiras el soplo, dejan de ser,

Y vuelven a su polvo.

30

    Si envías tu hálito, son creados,

Y renuevas la faz de la tierra.

31

    ¡Sea la gloria de YHVH para 

siempre!

¡Alégrese YHVH en sus obras!

32

    El cual mira a la tierra, y ella 

tiembla,

Toca los montes, y humean.

33

    A YHVH cantaré en mi vida,

A mi Dios entonaré salmos mientras 

viva.

34

    Séale agradable mi meditación;

Yo me regocijaré en YHVH.

35

    ¡Desaparezcan de la tierra los 

pecadores,

Y los impíos dejen de ser!

¡Bendice alma mía a YHVH!

¡Alabad a YH!

S

almo

 105

1

    ¡Alabad a YHVH, e invocad su 

Nombre!

Dad a conocer sus obras entre los 

pueblos.

2

    ¡Cantadle, entonadle salmos!

Meditad en todas sus maravillas.

3

    Gloriaos en su santo Nombre,

Alégrese el corazón de los que 

buscan a YHVH.

4

    Buscad a YHVH y su poder,

Buscad siempre su rostro.

5

    Recordad las maravillas que Él hizo,

De sus prodigios y de los juicios de 

su boca,

6

    ¡Oh vosotros, descendencia de 

Abraham su siervo,

Hijos de Jacob, su escogido!

7

    Él es YHVH nuestro Dios,

En toda la tierra están sus juicios.

8

    Se acordó para siempre de su pacto,

De la promesa que ordenó para mil 

generaciones,

9

    Pacto que hizo con Abraham,

Y su juramento a Isaac,

10

    Que estableció a Jacob por decreto,

A Israel por alianza sempiterna,

11

    Diciendo: A ti te daré la tierra de 

Canaán,

Como porción de vuestra heredad.

12

    Cuando ellos eran unos pocos 

mortales,°

Muy pocos, y forasteros en ella,

13

    Pues vagaban de nación en nación,

Y de un reino a otro pueblo,

14

    No permitió que hombre alguno les 

hiciera agravio,

Y por su causa reprendió a reyes, 

diciendo:

15

    No toquéis a mis ungidos,

Ni hagáis mal a mis profetas.

16

    Trajo hambre sobre la tierra,

Y quebrantó todo sustento de pan.

17

    Envió un varón delante de ellos,

A José, vendido como esclavo.

18

    Afligieron sus pies con grilletes

En hierro fue puesta su alma,°

19

    Hasta que se cumplió su 

predicción,°

El vaticinio de YHVH lo puso a 

prueba.

20

    El rey envió y lo soltó,

El soberano le abrió la prisión.

21

    Lo puso por señor de su casa,

Y por gobernador de todas sus 

posesiones,

22

    Para que disciplinara a sus príncipes 

como él quisiera,

E hiciera sabios a sus ancianos.

23

    Después entró Israel en Egipto,

105.12 Lit. mortales de número.  105.18 Es decir, fue puesto en la cárcel y encadenado.  105.19 Lit. hasta el tiempo en que 

llegó su palabra


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Salmo 106:9

623

Y Jacob peregrinó en la tierra de 

Cam.

24

    Hizo que su pueblo fuera muy 

fecundo,

Y los hizo más fuertes que sus 

adversarios.

25

    Cambió el corazón de ellos° para 

que aborrecieran a su pueblo,

Para que obraran astutamente 

contra sus siervos.

26

    Envió a Moisés su siervo,

Y a Aarón, al cual había escogido.

27

    Por medio de ellos manifestó las 

palabras de sus señales,°

Y sus maravillas en la tierra de Cam.

28

    Envió tinieblas, y trajo oscuridad,

Sin embargo, se rebelaron contra 

sus palabras.

29

    Volvió sus aguas en sangre,

E hizo morir sus peces.

30

    Pululó su tierra de ranas,

Hasta en las alcobas de sus reyes.

31

    Habló, y vinieron enjambres de 

moscas,

Y piojos en todo su territorio.

32

    Les dio granizo por lluvia,

Y llamas de fuego en su tierra.

33

    Arrasó sus viñas y sus higueras,

Y destrozó los árboles de su 

territorio.

34

    Habló, y vinieron langostas

Y saltamontes sin número,

35

    Que devoraron toda la hierba en su 

tierra,

Y se comieron el fruto de su suelo.

36

    Golpeó también a todo primogénito 

en su tierra,

Las primicias de todo su vigor viril.

37

    Los sacó con plata y oro,

Y entre sus tribus no hubo quien 

tropezara.

38

    Egipto se alegró de que salieran,

Porque su terror había caído sobre 

ellos.

39

    Extendió una nube por cubierta,

Y fuego para alumbrar la noche.

40

    Pidieron, e hizo venir codornices,°

Y los sació de pan del cielo.

41

    Abrió la roca, y brotaron aguas,

Corrieron por los sequedales como 

un río.

42

    Porque se acordó de su santa Palabra

Dada a Abraham su siervo.

43

    Sacó, pues, a su pueblo con gozo,

Con cánticos de júbilo a sus 

escogidos,

44

    Y les dio las tierras de las naciones,

Y tomaron posesión del fruto del 

trabajo de los pueblos,

45

    Para que guardaran sus estatutos,

Y observaran sus leyes. ¡Aleluya!

S

almo

 106

1

    ¡Aleluya! ¡Alabad a YHVH, porque Él 

es bueno,

Porque para siempre es su 

misericordia!

2

    ¿Quién podrá contar las proezas de 

YHVH?

¿Quién hará oír toda su alabanza?

3

    ¡Cuán bienaventurados son los que 

guardan el derecho,

Los que practican la justicia en todo 

tiempo!

4

    Acuérdate de mí, oh YHVH, cuando 

favorezcas a tu pueblo,

Visítame con tu salvación,

5

    Para que yo pueda ver el bien de tus 

escogidos,

Para que me regocije en la alegría de 

tu nación,

Y me gloríe con tu heredad.

6

    Hemos pecado juntamente con 

nuestros padres,

Hemos hecho iniquidad, y nos 

comportamos impíamente.

7

    Nuestros padres no entendieron tus 

maravillas en Egipto,

No se acordaron de la multitud de 

tus misericordias,

Sino que se rebelaron junto al mar, 

en el Mar Rojo.

8

    Pero Él los salvó por amor de su 

Nombre,

Para hacer notorio su poder.

9

    Reprendió al Mar Rojo y quedó seco,

Y los hizo pasar por las profundidades, 

como por un desierto.

105.25 Esto es, de los egipcios.  105.27 Es decir, sus milagros portentosos.  105.40 Doble elipsis: Pidió (el puebloe hizo venir 

(Dioscodornices 

→Ex.16.12.


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Salmo 106:10

624

10

    Los salvó de mano del que los 

aborrecía,

Y los redimió de mano del enemigo.

11

    Cubrieron las aguas a sus enemigos,

No quedó ni uno de ellos.

12

    Entonces creyeron a sus palabras,

Y cantaron su alabanza.

13

    Bien pronto echaron al olvido sus 

obras;

No esperaron su consejo.

14

    Apetecieron con avidez en el 

desierto,

Y en el yermo tentaron a Dios.

15

    Él les dio lo que pedían,

Pero les envió un cólico por su gula.

16

    Envidiaron a Moisés en el 

campamento,

Y a Aarón, consagrado de YHVH.

17

    Se abrió la tierra y se tragó a Datán,

Y se cerró sobre Abiram y sus 

secuaces.

18

    El fuego se encendió contra su 

cuadrilla,

Y una llama consumió a los 

culpables.

19

    Hicieron becerro en Horeb,

Se postraron ante una imagen de 

fundición.

20

    Cambiaron mi° gloria

Por la imagen de un animal que 

come hierba.

21

    Olvidaron a Dios, su Salvador,

Que había hecho prodigios en 

Egipto,

22

    Maravillas en la tierra de Cam,

Y portentos junto al Mar Rojo.

23

    Dijo entonces que los hubiera 

destruido,

A no ser porque Moisés su escogido,

Se plantó en la brecha frente a Él,

Para apartar su ira del exterminio.

24

    Desdeñaron un país deleitoso,

Desconfiando de su palabra,

25

    Antes, murmuraron en sus tiendas,

Y no obedecieron la voz de YHVH.

26

    Alzando la mano les juró

Que los haría caer en el desierto,

27

    Que haría caer su linaje entre las 

naciones,

Y los esparciría por las tierras.

28

    Se enyugaron con Baal-Peor,

Y comieron de lo sacrificado a los 

ídolos° muertos.

29

    Lo provocaron con sus hechos,

Y una plaga irrumpió entre ellos.

30

    Pero Finees se alzó e hizo justicia,

Y la plaga se detuvo,

31

    Y le fue contado a su favor

Por generaciones para siempre.

32

    Lo irritaron en las aguas de Meriba,

Y le fue mal a Moisés por causa de 

ellos,

33

    Porque hicieron rebelar su espíritu,

Y él habló precipitadamente con sus 

labios.

34

    No destruyeron a los pueblos,

Que YHVH les había mandado,

35

    Antes, se mezclaron con gentiles,

E imitaron sus costumbres,

36

    Y sirvieron a sus ídolos,

Y cayeron en su trampa,

37

    Inmolaron sus hijos y sus hijas a los 

demonios,

38

    Derramaron sangre inocente,

La sangre de sus hijos y de sus hijas,

Que ofrecieron en sacrificio a los 

ídolos de Canaán,

Y la tierra fue contaminada con 

delitos de sangre.

39

    Así se contaminaron con sus obras,

Y se prostituyeron con sus hechos.

40

    Por tanto la ira de YHVH se 

encendió contra su pueblo,

Y abominó su heredad;

41

    Los entregó en mano de gentiles,

Y quienes los aborrecían se 

enseñorearon de ellos.

42

    Sus enemigos los oprimían,

Y eran quebrantados bajo su poder.

43

    ¡Cuántas veces los libró!

Pero ellos, obstinados en su actitud,

Se hundían en su maldad.

44

    Con todo, Él miraba su angustia

Y oía su clamor,

45

    Se acordaba de su pacto con ellos,

Y se compadecía° conforme a la 

multitud de sus misericordias.

46

    Hizo que tuvieran piedad

Todos los que los tenían cautivos.

47

    Oh YHVH, Dios nuestro, sálvanos

Y recógenos de entre las naciones,

Para que alabemos tu santo Nombre,

106.20 15ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 21.  106.28 .ídolos. →Nm.25.1-15.  106.45 Lit. se arrepentía.


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Salmo 107:29

625

Para que nos gloriemos en tu 

alabanza.

48

    ¡Bendito sea YHVH, Dios de Israel,

Desde la eternidad y hasta la 

eternidad!

Y todo el pueblo diga: ¡Amén!

¡Aleluya!°

S

almo

 107

1

    ¡Alabad a YHVH, porque Él es 

bueno,

Porque para siempre es su 

misericordia!

2

    Díganlo los redimidos de YHVH,

Los que ha redimido del poder del 

enemigo,

3

    Y los ha congregado de las tierras,

Del oriente y del occidente,

Del Aquilón y del mar.°

4

    Deambularon por un desierto 

solitario y sin camino,

Sin hallar ciudad donde vivir,

5

    Hambrientos y sedientos,

Su alma desfallecía en ellos.

6

    Pero clamaron a YHVH en su 

angustia,

Y los libró de su tribulación.

7

    Los condujo por un camino llano,

Para que dieran con una ciudad 

habitable.

8

    ¡Den gracias a YHVH por su 

misericordia,

Y por sus maravillas para con los 

hijos del hombre!

9

    Porque Él sacia al alma sedienta,

Y colma de bienes al alma 

hambrienta.

10

    Moraban en tinieblas y sombra de 

muerte,

Aprisionados en aflicción y en 

cadenas,°

11

    Por cuanto fueron rebeldes a las 

palabras de ’El,

Y aborrecieron el consejo de 

’Elyón.

12

    Por eso humilló sus corazones con 

duros trabajos,

Tropezaron, y no hubo quien 

ayudara.

13

    Pero en su angustia clamaron a 

YHVH,

Y los libró de su tribulación;

14

    Los sacó de las tinieblas y de la 

sombra de muerte,

Y desligó sus ataduras.

15

    ¡Den gracias a YHVH por su 

misericordia

Y por sus maravillas para con los 

hijos del hombre!

16

    Porque quebró las puertas de 

bronce,

Y arrancó los cerrojos de hierro.

17

    Andaban afligidos por sus 

rebeliones,

Ayunando por sus maldades,

18

    Aborrecieron todo manjar,

Y ya tocaban las puertas de la 

muerte,

19

    Pero clamaron a YHVH en su 

angustia,

Y Él los libró de su tribulación;

20

    Envió su palabra y los sanó,

Y los libró del sepulcro.

21

    ¡Den gracias a YHVH por su 

misericordia,

Y por sus maravillas para con los 

hijos del hombre!

22

    Y ofrezcan sacrificios de acción de 

gracias,

Y publiquen sus obras con cánticos 

de júbilo.

23

    Se adentraron en naves por el mar,

Para traficar en las inmensas aguas,

24

    Contemplando las obras de YHVH,

Sus maravillas en lo profundo.

25

    Mandó alzarse un viento 

tempestuoso,

Que encrespó el oleaje.

26

    Subían a los cielos, bajaban al 

abismo,

Sus almas revueltas por las náuseas,

27

    Rodaban y se tambaleaban como 

ebrios,

De nada les valía su pericia.

28

    Pero clamaron a YHVH en su 

angustia,

Y los libró de su tribulación.

29

    Hizo acallar la tormenta,

106.48 ¡Aleluya! Transliteración usual del heb. Hallelu-Yah = Alabad a YH. Frecuente en los salmos, YH es la abreviatura del 

nombre YHVH 

→ § 3.  107.3 Es decir, del norte y del sur.  107.10 Lit. hierros.  107.10 Esto es, sus estómagos


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Salmo 107:30

626

Enmudeció el oleaje,

30

    Se alegraron de la bonanza;

Los condujo al puerto que anhelaban.

31

    ¡Den gracias a YHVH por su 

misericordia,

Y por sus maravillas para con los 

hijos del hombre!

32

    Exáltenlo en la congregación del 

pueblo,

Y alábenlo en la reunión de los 

ancianos.

33

    Convierte ríos en un desierto,

Y los manantiales en sequedales,

34

    La tierra fértil en estéril,

Por la maldad de quienes 

la habitan.

35

    Vuelve el desierto en estanques,

Y la tierra seca en manantiales,

36

    Allí asienta a los hambrientos,

Para que tengan ciudad habitable,

37

    Siembren campos y planten viñas,

Que den fruto en la cosecha.

38

    Los bendice, y se multiplican,

Y no deja que disminuya su 

ganado.

39

    Cuando abatidos por la carga, 

menguan,

A causa de infortunios y congojas,

40

    Él esparce menosprecio sobre los 

nobles,

Y los descarría por un yermo sin 

camino.

41

    Levanta al pobre de la miseria,

Y multiplica sus familias como 

rebaños.

42

    Los rectos lo verán y se alegrarán,

Y la iniquidad tendrá que cerrar su 

boca.

43

    Aquel que sea sabio y guarde estas 

cosas,

Entenderá la gran misericordia de 

YHVH.

S

almo

 108

Cántico. Salmo de David.

1

    ¡Oh ’Elohim, mi corazón 

está firme!

Cantaré y entonaré salmos, 

Gloria mía.

2

    ¡Despiértate salterio y arpa,

Que yo despertaré al alba!

3

    Oh YHVH, te daré gracias entre 

los pueblos,

Te entonaré salmos entre las 

naciones,

4

    Porque tu misericordia llega hasta 

los cielos,

Y tu verdad hasta el firmamento.

5

    Exaltado seas sobre los cielos, oh 

’Elohim,

Y sobre toda la tierra sea enaltecida 

tu gloria.

6

    Para que sean librados 

tus amados,

¡Haz que tu diestra nos salve, y 

respóndeme!

7

    Dios respondió desde su 

Santuario:

¡Triunfante repartiré a Siquem, y 

mediré el valle de Sucot!

8

    Mío es Galaad, mío es Manasés,

Efraín es el yelmo de mi cabeza,

Y Judá cetro de mi justicia;

9

    Moab, vasija para lavarme;

Sobre Edom echaré mi calzado,

Y sobre Filistea lanzaré mi grito de 

victoria.

10

    ¿Quién me conducirá a la ciudad 

fortificada?

¿Quién me guiará hasta Edom?

11

    ¿No serás Tú, oh ’Elohim, que nos 

habías rechazado?

Oh ’Elohim ¿no saldrás más con 

nuestros ejércitos?

12

    ¡Socórrenos contra el adversario,

Pues vana es la ayuda del 

hombre!

13

    ¡Con ’Elohim haremos proezas!

Él hollará a nuestros enemigos.

S

almo

 109

Al director del coro. Salmo de David.

1

    ¡Oh Dios de mi alabanza, no 

ensordezcas!

2

    Porque una boca malvada y una 

boca engañosa se ha abierto 

contra mí;

Han hablado de mí con lengua 

mentirosa.

3

    Con palabras de odio me han 

rodeado,

Y pelearon contra mí sin causa.

4

    En pago de mi amor me son 

adversarios,

Aunque yo oraba.

5

    Me devuelven mal por bien,


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Salmo 110:2

627

Y odio por mi amor, diciendo:°

6

    ¡Levanta sobre él al impío,

Y sea Satanás° a su diestra!

7

    ¡Salga culpable cuando sea juzgado,

Y conviértase su oración en pecado!

8

    ¡Sean pocos sus días,

Y tome otro su oficio!

9

    ¡Sean sus hijos huérfanos,

Y su mujer viuda!

10

    ¡Vaguen errantes sus hijos y 

mendiguen,

Y busquen su pan expulsados de sus 

ruinas!

11

    ¡Apodérense usureros de todo lo que 

tiene,

Y extraños saqueen su trabajo!

12

    No tenga quien le haga misericordia,

Ni haya quien se compadezca de sus 

huérfanos.

13

    ¡Sea exterminada su posteridad!

¡Sea su nombre borrado en la 

segunda generación!

14

    Venga en memoria ante YHVH la 

iniquidad de sus padres,

Y no sea borrado el pecado de su 

madre;

15

    Estén siempre delante de YHVH,

Para que Él corte de la tierra su 

memoria,

16

    Por cuanto no se acordó de hacer 

misericordia,

Sino que persiguió al hombre 

afligido y menesteroso,

Al quebrantado de corazón, para 

darle muerte.

17

    Amó la maldición, y ésta le 

sobrevino,

Rehusó la bendición, y ella se alejó 

de él.

18

    Como de su manto, se vistió de 

maldición,

Y ella entró como agua en sus 

entrañas,

Como aceite en sus huesos.

19

    ¡Séale cual vestido que lo cubra,

Y como cinto que lo ciña siempre!

20

    Así pague YHVH a los que me acusan,

A los que dicen mal contra mi alma.

21

    Tú, en cambio, oh YHVH, Señor 

mío,

Trata conmigo por amor de tu 

Nombre,

Líbrame, porque tu misericordia es 

buena.

22

    Porque yo estoy afligido y necesitado,

Y mi corazón está herido dentro 

de mí.

23

    Voy pasando cual sombra que 

declina,

Me sacuden como a la langosta.

24

    Se me doblan las rodillas a causa del 

ayuno,

Y mi carne desfallece por falta de 

gordura.

25

    Soy la burla de ellos,

Me miran, y menean la cabeza.

26

    ¡Ayúdame YHVH Dios mío!

¡Sálvame conforme a tu 

misericordia!

27

    Entiendan que ésta es tu mano,

Que Tú, oh YHVH, has hecho esto.

28

    Maldigan ellos, pero Tú bendice,

Se han levantado, pero serán 

avergonzados,

Y tu siervo se alegrará.

29

    Mis acusadores serán vestidos de 

infamia,

Y la confusión los envolverá como 

un manto.

30

    Daré gracias a YHVH en gran 

manera con mi boca,

En medio de muchos lo alabaré,

31

    Porque Él se puso a la diestra del 

pobre,

Para salvar su alma de los que lo 

juzgan.

S

almo

 110

Salmo de David.

1

    Oráculo° de YHVH a mi Señor:

Siéntate a mi diestra,

Hasta que ponga a tus enemigos por 

estrado de tus pies.

2

    YHVH enviará desde Sión la vara de 

tu poder:

109.5 .diciendo. Prob. los vv. 6-20 no son palabras de David, sino de sus enemigos, que le desean toda suerte de males a 

pesar de la bondad del rey, quien se niega a maldecirlos 

→v.28.  109.6 Nel Acusador →Job 1.6ss y Zac.3.1.  110.1 Esto es, 

declaración profética 

→36.1. 


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Salmo 110:3

628

Domina en medio de 

tus enemigos.

3

    En el día de tu poder, tu pueblo se 

ofrecerá voluntariamente,

En la hermosura de la santidad.

Desde el vientre de la aurora,

Tienes el rocío de tu juventud.°

4

    Juró YHVH y no se retractará:

Tú eres sacerdote para siempre 

según el orden de Melquisedec.

5

    Adonay está a tu diestra;

Quebrantará a los reyes en el día de 

su ira.

6

    Juzgará entre las naciones,

Las llenará de cadáveres;

Quebrantará cabezas sobre un 

inmenso territorio;

7

    Beberá del torrente en el camino,

Por lo cual levantará la cabeza.

S

almo

 111

¡Aleluya!°

a

1

    Daré gracias a YHVH con todo el 

corazón

b

En la reunión íntima de los rectos y 

en la asamblea.

g

2

    Grandes son las obras de YHVH,

d

Dignas de ser escudriñadas por 

cuantos en ellas se deleitan.

h

3

    Gloria y hermosura hay en su obra,

w

Y su justicia permanece para 

siempre.

z

4

    Hizo memorables sus maravillas;

j

Clemente y misericordioso es YHVH.

f

5

    Dio alimento a los que lo temen,

y

Para siempre se acordará de su 

pacto.

k

6

    El poder de sus obras manifestó a su 

pueblo,

l

Dándole la heredad de las naciones.

m

7

    Las obras de sus manos son verdad y 

justicia,

n

Todos sus mandamientos son fieles;

s

8

    Afirmados eternamente y para 

siempre,

[

Hechos sobre verdad y rectitud.

p

9

    Ha enviado redención a su pueblo;

x

Ha establecido su pacto para 

siempre;

q

Santo y terrible es su Nombre.

r

10

    El principio de la sabiduría es el 

temor de YHVH,

v

Sano juicio tienen los que lo 

practican;

t

Su alabanza permanece para 

siempre.

110.3 Es decir, tus jóvenes te nacerán (se adherirán a ticomo nace el rocío al despertar el día.  111.Tít. Este salmo está 

redactado en acróstico. Es decir, cada línea comienza con una letra del alfabeto hebreo, y prob. conforma una sola unidad con 

el siguiente salmo. 


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Salmo 113:7

629

S

almo

 112

¡Aleluya!

a

1

    ¡Oh, las bienaventuranzas del 

hombre que teme a YHVH,

b

Y en sus mandamientos se deleita 

en gran manera!

g

2

    Su linaje será poderoso en 

la tierra,

d

La generación de los rectos será 

bendita.

h

3

    Bienes y riquezas hay en su casa,

w

Y su justicia permanece para 

siempre.

z

4

    Para el recto resplandece luz en las 

tinieblas;°

j

Es clemente, misericordioso, y 

justo.

f

5

    El hombre de bien tiene 

misericordia y presta,

y

Conduce rectamente sus asuntos,

k

6

    Por lo cual nunca será conmovido.

l

El justo será recordado para 

siempre,

m

7

    No tendrá temor de malas noticias,

n

Su corazón está firme, confiado en 

YHVH.

s

8

    Su corazón está asegurado, nada 

temerá,

[

Hasta que vea por encima de sus 

adversarios.°

p

9

    Reparte, da a los pobres,

x

Su justicia permanece para siempre,

q

Su poder será exaltado con gloria.

r

10

    Lo verá el malvado y se irritará,

v

Crujirá los dientes, pero será 

consumido;

t

La ambición de los malos perecerá.

S

almo

 113

¡Aleluya!

1

    ¡Alabad, siervos de YHVH,

Alabad el nombre de YHVH!

2

    ¡Bendito sea el nombre de YHVH

Desde ahora y para siempre!

3

    Desde el nacimiento del sol hasta su 

ocaso,

Sea alabado el nombre de YHVH.

4

    YHVH se eleva sobre todas las 

naciones,

Y sobre los cielos su gloria.

5

    ¿Quién como YHVH nuestro Dios,

Entronizado en las alturas,

6

    Que se rebaja para mirar

En los cielos y en la tierra?

7

    Que levanta del polvo al pobre,

112.4 NResplandece (Diosen las tinieblas (comouna luz para los rectos. El contexto posterior menciona perfecciones de Dios. 

Con todo, si se acepta la versión del texto, más correcta gramaticalmente, tenemos una enseñanza bíblica muy importante: el 

justo participa de las perfecciones divinas de orden moral y espiritual

112.8 Es decir, vea derrotados a sus adversarios


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Salmo 113:8

630

Que saca del basurero al miserable,

8

    Para hacerlos sentar con los 

príncipes,

Con los príncipes de su pueblo.

9

    Que hace sentar en familia a la 

estéril,

Gozosa en ser madre de hijos. 

¡Aleluya!

S

almo

 114

1

    Cuando Israel salió de Egipto,

La casa de Jacob de un pueblo de 

lengua extraña,

2

    Judá fue su santuario,

E Israel su señorío.

3

    El mar lo vio y huyó,

El Jordán se volvió atrás.

4

    Los montes saltaron como carneros,

Los collados como corderos.°

5

    ¿Qué tuviste, oh mar, que huiste?

¿Y tú, oh Jordán, que retrocediste?

6

    ¿Por qué, oh montes, saltasteis 

como carneros,

Y vosotros, collados, como corderos?

7

    ¡Tiembla, oh tierra, en presencia de 

Adón,°

En presencia del Dios de Jacob,

8

    Que convirtió la peña en estanque 

de aguas,

Y el pedernal en manantial de aguas.

S

almo

 115

1

    No a nosotros, oh YHVH, no a 

nosotros,

Sino a tu Nombre da gloria,

Por tu misericordia, por tu verdad.

2

    ¿Por qué han de decir los gentiles:

Dónde está su Dios?

3

    Nuestro Dios está en los cielos,

Todo lo que quiere hace.

4

    Los ídolos de ellos son plata y oro,

Obra de manos de hombre.

5

    Tienen boca, y no hablan,

Tienen ojos, y no ven,

6

    Tienen orejas, y no oyen,

Tienen narices, y no huelen,

7

    Tienen manos, y no palpan,

Tienen pies, y no andan,

No emiten sonido con su garganta.

8

    Semejantes a ellos son los que los 

hacen,

Y cualquiera que confía en ellos.

9

    ¡Oh Israel, confía en YHVH!

(Él es su ayuda y escudo.)

10

    ¡Oh casa de Aarón, confía en YHVH!

(Él es su ayuda y escudo.)

11

    ¡Los que teméis a YHVH, confiad en 

YHVH!

(Él es su ayuda y escudo.)

12

    YHVH se acordó de nosotros,

Él nos bendecirá,

Bendecirá a la casa de Israel,

Bendecirá a la casa de Aarón,

13

    Bendecirá a los que temen a YHVH,

A pequeños y a grandes.

14

    YHVH acreciente sobre vosotros,

Sobre vosotros y sobre vuestros 

hijos.

15

    Benditos vosotros de YHVH,

Que hizo los cielos y la tierra.

16

    Los cielos son los cielos de YHVH,

Y ha dado la tierra a los hijos del 

hombre.

17

    No alabarán los muertos a YH,

Ni cuantos bajan al silencio.

18

    Pero nosotros bendecimos a YH

Desde ahora y para siempre.

¡Aleluya!

S

almo

 116

1

    Amo a YHVH, pues ha escuchado mi 

voz y mis súplicas,

2

    Porque ha inclinado a mí su oído,

Por tanto, lo invocaré en todos mis 

días.

3

    Me rodearon los lazos de la Muerte,

Me atraparon los terrores del Seol,

Angustia y dolor había yo hallado.

4

    Entonces invoqué el nombre de 

YHVH:

¡Oh YHVH, libra ahora mi alma!

5

    Clemente y justo es YHVH;

Sí, misericordioso es nuestro Dios.

6

    YHVH guarda a los sencillos,

Estaba yo postrado y me salvó.

114.4 Lit. como hijos del rebaño.  114.7 Contracción de Adonay = Señor.


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Salmo 118:22

631

7

    Vuelve, alma mía, a tu reposo,

Porque YHVH te ha colmado de 

favores.

8

    Tú has librado mi alma de la 

Muerte,

Mis ojos de las lágrimas,

Y mis pies de los tropiezos.

9

    Me encaminaré a la presencia de 

YHVH

En la tierra de los vivientes.

10

    Creí, por tanto hablé,

Estando afligido en gran manera,

11

    Y dije en mi apresuramiento:

Todo hombre es mentiroso.

12

    ¿Qué pagaré a YHVH

Por todos sus beneficios para 

conmigo?

13

    ¡Tomaré la copa de la salvación,

E invocaré el nombre de YHVH!

14

    A YHVH cumpliré mis votos,

Sí, en presencia de todo su pueblo.

15

    Estimada es a los ojos de YHVH

La muerte de sus santos.

16

    Oh YHVH, ciertamente yo soy tu 

siervo,

Siervo tuyo soy, hijo de tu sierva,

Tú desataste mis ataduras.

17

    A ti ofreceré sacrificio de acción de 

gracias,

E invocaré el nombre de YHVH.

18

    A YHVH cumpliré mis votos,

Sí, en presencia de todo su pueblo,

19

    En los atrios de la Casa de YHVH,

En medio de ti, oh Jerusalem.

¡Aleluya!

S

almo

 117

1

    ¡Alabad a YHVH naciones todas!

¡Pueblos todos, alabadlo!

2

    Porque ha engrandecido sobre 

nosotros su misericordia,

Y la fidelidad de YHVH es para 

siempre.

¡Aleluya!

S

almo

 118

1

    Dad gracias a YHVH, porque Él es 

bueno,

Porque para siempre es su 

misericordia.

2

    Diga ahora Israel,

Que para siempre es su misericordia.

3

    Diga ahora la casa de Aarón,

Que para siempre es su 

misericordia.

4

    Digan ahora los que temen a YHVH,

Que para siempre es su misericordia.

5

    En angustia clamé a YH,

Y YH me respondió con liberación.

6

    YHVH está conmigo, no temeré.

¿Qué puede hacerme el hombre?

7

    YHVH está conmigo entre los que 

me ayudan,

Por tanto, yo miraré por encima de 

los que me aborrecen.

8

    Mejor es confiar en YHVH

Que confiar en el hombre.

9

    Mejor es confiar en YHVH

Que confiar en príncipes.

10

    Todas las naciones me rodearon;

En el nombre de YHVH ciertamente 

las destruiré.

11

    Me rodearon, sí, me rodearon;

En el nombre de YHVH ciertamente 

las destruiré.

12

    Me rodearon como abejas,

Se enardecieron como fuego de 

espinos;

En el nombre de YHVH ciertamente 

las destruiré.

13

    Fui empujado con violencia para 

que cayera,

Pero me ayudó YHVH.

14

    Mi fortaleza y mi cántico es YH,

Y Él ha venido a ser mi salvación.

15

    ¡Voz de júbilo y de salvación hay en 

las tiendas de los justos!

¡La diestra de YHVH hace proezas!

16

    ¡La diestra de YHVH está levantada 

en alto!

¡La diestra de YHVH hace proezas!

17

    No moriré, sino que viviré,

Y contaré las obras de YH.

18

    Me castigó severamente YH,

Pero no me entregó a la Muerte.

19

    Abridme las puertas de la justicia,

Entraré por ellas, alabaré a YH;

20

    Esta es la puerta de YHVH,

Por ella entrarán los justos.

21

    Te alabaré porque me has oído,

Y has venido a ser mi salvación.

22

    La piedra que desecharon los 

edificadores


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Salmo 118:23

632

Ha venido a ser cabeza del ángulo.°

23

    De parte de YHVH es ésta,°

Y es admirable ante nuestros ojos.

24

    Este es el día que hizo YHVH,

¡Alegrémonos y regocijémonos 

en Él!

25

    Te rogamos, oh YHVH: ¡Sálvanos 

ahora!

Te rogamos, oh YHVH: ¡Haznos 

prosperar ahora!

26

    ¡Bendito el que viene en el Nombre 

de YHVH!

Desde la Casa de YHVH os 

bendecimos.

27

    ’El es YHVH, y nos ha dado luz,

¡Atad las víctimas° de la fiesta 

solemne a los cuernos del altar!

28

    Tú eres mi Dios y te daré gracias,

Tú eres mi Dios y te exaltaré.

29

    Dad gracias a YHVH porque Él es 

bueno,

Porque para siempre es su 

misericordia.

S

almo

 119

a

1

    °¡Cuán bienaventurados son los de 

conducta intachable,°

Los que andan en la Ley° de YHVH!

2

    ¡Cuán bienaventurados son los que 

guardan sus testimonios,°

Y con todo el corazón lo buscan!

3

    En verdad no hacen iniquidad,

Porque andan en sus caminos.

4

    Tú nos has encomendado° tus 

preceptos°

Para que sean muy guardados.

5

    ¡Cómo anhelo que sean ordenados 

mis caminos,

Para poder guardar tus estatutos!°

6

    Entonces no me avergonzaría

Al contemplar todos tus 

mandamientos.°

7

    Te alabaré con rectitud de corazón,

Cuando aprenda tus justos 

preceptos,°

8

    Guardaré tus estatutos,

¡No me abandones del todo!

b

9

    ¿Cómo podrá el joven mantener 

puro su camino?

¡Guardando tu palabra!°

10

    Con todo mi corazón te he buscado,

No permitas que me desvíe de tus 

mandamientos.

11

    En mi corazón he guardado tus 

dichos,°

Para no pecar contra ti.

12

    ¡Bendito Tú, oh YHVH!

¡Enséñame tus estatutos!

13

    He contado con mis labios

Todos los juicios de tu boca.

14

    Me he regocijado en el camino de 

tus testimonios,

Más que sobre todas las riquezas.

15

    Meditaré en tus preceptos,

Consideraré tus caminos.

16

    Me deleitaré en tus estatutos,

No me olvidaré de tu palabra.

g

17

    Haz bien a tu siervo,

Para que viva y guarde tu palabra.

18

    Abre mis ojos,

Y contemplaré las maravillas de tu 

Ley.

19

    Estoy de paso en la tierra,

No encubras de mí tus 

mandamientos.

20

    Mi alma se quebranta anhelando

Tus preceptos en todo tiempo.

21

    Reprendiste a los soberbios:

118.22 Lit. por cabeza de esquina.  118.23 Es decir, la piedra.  118.27 .las víctimas.  119.1 Este salmo, el más extenso del 

Salterio (176 vv.) está distribuido en 22 grupos de 8 vv. cada uno; tantos como las letras del alfabeto hebreo. Por ello es llamado 

salmo acróstico 

→Sal.111.1 nota, en el que cada uno de los 8 vv. de cada grupo comienza con la misma letra, desde alef a tav

como se indica en el propio texto. 

119.1 Lit. Camino intachable.  119.1 Heb. torta (de toráh) = ley. La primera y más importante 

de las ocho palabras claves (en cierto modo, sinónimos) de este salmo. El vocablo toráh = ley significa primordialmente instruc-

ción o enseñanza, más bien que un elemento del sistema legal. Dios, para ordenar, primero instruye

119.2 Heb. edith = testi-

monios. Segunda palabra clave: reglas de conducta que atestiguan la voluntad de Dios. 

119.4 encomendado 

→Ro.3.2.  119.4 

Heb. piqqudim. Tercera palabra clave que significa: normas personales que el ser humano tiene que obedecer. 

119.5 Heb. 

juqqim. Cuarta palabra clave: normas sociales que rigen la conducta del individuo como miembro de la sociedad. 

119.6 Heb. 

mitsvot. Quinta palabra clave: leyes divinas en la esfera de una vida santa propuesta por Dios. 

119.7 Heb. mishpatim. Sexta 

palabra clave: normas de rectitud para respetar los derechos del prójimo. 

119.9 Heb. dabar. Séptima palabra clave que expresa 

la voluntad de Dios. 

119.11 Heb. imrah. Octava y última palabra clave: variante poética de dabar = palabra que expresa el 

resumen del discurso divino.


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Salmo 119:52

633

¡Malditos los que se desvían de tus 

mandamientos!

22

    Aparta de mí el oprobio y el 

menosprecio,

Pues he guardado tus testimonios.

23

    Aunque los príncipes se sienten y 

hablen contra mí,

Tu siervo medita en tus estatutos.

24

    Sí, yo me deleito en tus testimonios,

Porque ellos son mis consejeros.°

d

25

    Postrada en el polvo está el alma 

mía,

Vivifícame conforme a tu palabra.

26

    Te he expuesto mis caminos, y me 

has respondido;

Enséñame tus estatutos.

27

    Hazme entender el camino de tus 

preceptos,

Y meditaré en tus maravillas.

28

    Mi alma se deshace de tristeza,

¡Susténtame con tu palabra!

29

    Aparta de mí el camino de la 

mentira,

Y concédeme el favor de tu Ley.

30

    He escogido el camino de la 

fidelidad,

Me he propuesto tus ordenanzas,

31

    Me he apegado a tus testimonios,

¡Oh YHVH, no permitas que sea 

avergonzado!

32

    Correré por el camino de tus 

mandamientos,

Porque Tú habrás ensanchado mi 

corazón.

h

33

    Enséñame, oh YHVH, el camino de 

tus estatutos,

Y lo guardaré hasta el fin.

34

    Hazme entender, y atesoraré tu Ley,

Y la guardaré con todo el corazón.

35

    Hazme andar por la senda de tus 

mandamientos,

Porque en ella me deleito.

36

    Inclina mi corazón a tus 

testimonios,

Y no a la avaricia.°

37

    Aparta mis ojos, que no vean la 

vanidad,

Vivifícame en tus caminos.

38

    Confirma tu palabra a tu siervo,

Que es para los que te temen.

39

    Aleja de mí el oprobio que temo,

Porque tus preceptos son buenos.

40

    He aquí, anhelo tus mandamientos,

Vivifícame en tu justicia,°

w

41

    Y venga a mí, oh YHVH, tu 

misericordia,

Tu salvación, conforme a tu dicho,

42

    Para dar repuesta al que me afrenta,

Porque en tu palabra he confiado.

43

    No quites jamás de mi boca la 

palabra de verdad,

Porque en tus juicios espero 

ansiosamente.

44

    Así guardaré tu Ley continuamente,

Eternamente y para siempre.

45

    Y me encaminaré en lugar 

espacioso,

Porque he escudriñado tus 

preceptos.

46

    Delante de reyes hablaré de tus 

testimonios,

Y no me avergonzaré.

47

    Me deleitaré en tus mandamientos, 

los cuales amo.

48

    Alzaré mis manos hacia tus 

preceptos, los cuales amo,

Y meditaré en tus estatutos.

z

49

    Acuérdate de la palabra dada a tu 

siervo,

En la cual me has hecho esperar 

ansiosamente.

50

    Ella ha sido mi consuelo en mi 

aflicción,

Porque tu promesa me ha dado vida.

51

    Mucho me han escarnecido los 

soberbios,

Pero no me he apartado de tu Ley.

52

    Recordando tus antiguos 

mandamientos,

Oh YHVH, quedé consolado.

119.24 Lit. los hombres de mi consejo.  119.36 Heb. batsá = ganancia injusta. El vocablo señala la avidez por las riquezas 

materiales, sin reparar en los medios para conseguirlas. 

119.40 Es decir, el Dios infinitamente justo sostiene a sus fieles ante 

las injusticias de la vida. 


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Salmo 119:53

634

53

    Me domina la indignación a causa 

de los malvados,

Que abandonan tu Ley.

54

    Tus estatutos han venido a ser mis 

salmos,

En la morada de mi peregrinación.°

55

    Recuerdo en la noche tu Nombre, 

oh YHVH,

Y deseo guardar tu Ley.

56

    Esto me ha sucedido,

Porque he guardado tus preceptos.

j

57

    Mi porción es YHVH,

He resuelto guardar tus palabras.

58

    He suplicado tu favor de todo 

corazón,

Ten misericordia de mí conforme a 

tu dicho.

59

    Consideré mis caminos,

Y volví mis pies a tus testimonios.

60

    Me apresuré, no me retardé

En guardar tus mandamientos.

61

    Lazos de impíos me han envuelto,

Pero no he olvidado tu Ley.

62

    A medianoche me levanto para darte 

gracias,

Por tus justos mandamientos.

63

    Soy compañero de todos los que te 

temen,

Y de los que observan tus preceptos.

64

    Oh YHVH, la tierra está llena de tu 

misericordia.

¡Enséñame tus estatutos!

f

65

    Oh YHVH, bien has hecho a tu 

siervo,

Conforme a tu palabra.

66

    Enséñame a discernir y a entender,°

Porque en tus mandamientos he 

creído.

67

    Antes de ser humillado, yo erraba,

Pero ahora, guardo tu palabra.

68

    Bueno eres Tú, y bienhechor,

Enséñame tus estatutos.

69

    Los soberbios forjaron mentiras 

contra mí,

Pero yo atesoro tus preceptos de 

todo corazón.

70

    El corazón de ellos está engrosado 

como sebo,

Pero yo me deleito en tu Ley.

71

    Bueno me es haber sido humillado,

Para que aprenda tus estatutos.

72

    Mejor me es la Ley de tu boca

Que millares de oro y plata.

y

73

    Tus manos me hicieron y me 

afirmaron;

Hazme entender, y aprenderé tus 

mandamientos.

74

    Que los que te temen me vean y se 

alegren,

Porque yo espero con ansia en tu 

palabra.

75

    Reconozco, oh YHVH, que tus 

mandamientos son justos,

Que con razón me afligiste.

76

    Sea ahora tu misericordia para 

consolarme,

Conforme prometiste a tu siervo.

77

    Alcáncenme tus misericordias, para 

que viva,

Porque tu Ley es mi delicia.

78

    Sean avergonzados los soberbios, 

porque sin causa me han 

calumniado;

Yo meditaré en tus mandamientos.

79

    Vuélvanse a mí los que te temen

Y conocen tus testimonios.

80

    Sea mi corazón íntegro en tus 

estatutos,

Para que no me avergüence.

k

81

    Mi alma desfallece por tu salvación,

Pero en tu palabra he puesto mi 

esperanza.

82

    Mis ojos se consumen ante tu 

promesa,°

¿Cuándo me consolarás?

83

    Porque he venido a ser como odre al 

humo,°

Pero no he olvidado tus estatutos.

119.54 Esto es, de mi cuerpo.  119.66 Lit. bondad de gusto. Es decir, una especie de instinto espiritual para apreciar el valor mo-

ral de los mandamientos de Dios

119.82 Es decir, mis ojos se consumen mirando por el cumplimiento de tu Palabra.  119.83 

Esta expresión explica una costumbre en oriente, de colgar los odres en una habitación cerrada, sin escape para el humo, con lo 

cual aquéllos se encogían y se secaban. Tal era la forma en que el salmista se veía en medio de sus aflicciones. 


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Salmo 119:116

635

84

    ¿Cuántos son los días de tu siervo?

¿Cuándo juzgarás a mis 

perseguidores?

85

    Los soberbios han cavado fosas 

para mí,

Lo cual no es conforme a tu Ley.

86

    Todos tus mandamientos son fieles,

Sin causa me persiguen, ¡ayúdame!

87

    Casi me han echado por tierra,

Pero yo no abandono tus preceptos.

88

    Vivifícame conforme a tu 

misericordia,

Y guardaré los testimonios de tu 

boca.

l

89

    Oh YHVH, tu palabra permanece en 

los cielos para siempre.

90

    De generación en generación es tu 

fidelidad;

Afirmaste la tierra, y permanece.

91

    Todo subsiste hasta hoy por tu 

mandato,

Porque todas las cosas te sirven.°

92

    Si tu Ley no hubiera sido mi deleite,

Ya habría perecido en mi aflicción.

93

    Jamás me olvidaré de tus preceptos,

Porque con ellos me has vivificado.

94

    Tuyo soy, ¡sálvame!

Por cuanto he escudriñado tus 

preceptos.

95

    Acéchanme los malos para 

destruirme,

Pero yo consideraré tus testimonios.

96

    En toda perfección he visto límite,°

Pero tu mandamiento es amplio en 

gran manera.

m

97

    ¡Oh, cuánto amo yo tu Ley!

¡Todo el día es ella mi meditación!

98

    Más sabio que mis enemigos me han 

hecho tus mandamientos,

Porque siempre están conmigo.

99

    Entiendo más que todos mis 

maestros,

Porque tus testimonios son mi 

meditación.

100

  Comprendo más que los ancianos,

Porque he guardado tus preceptos.

101

  He refrenado mis pies de todo mal 

camino,

Para guardar tu palabra.

102

  No he apostatado de tus 

mandamientos,

Porque Tú me has instruido.

103

  ¡Cuán dulces son tus palabras a mi 

paladar!

Sí, más que la miel en la boca.

104

  De tus preceptos he adquirido 

entendimiento,

Por lo cual aborrezco toda senda de 

mentira.

n

105

  Lámpara a mis pies es tu palabra,

Y lumbrera a mi camino.

106

  He jurado, y lo confirmo:

Guardaré tus justos mandamientos.

107

  Estoy afligido en gran manera,

¡Oh YHVH, vivifícame con tu 

palabra!

108

  Acepta ahora las ofrendas 

voluntarias de mi boca, oh YHVH,

Y enséñame tus juicios.

109

  Mi vida está de continuo en peligro,°

Pero no he olvidado tu Ley.

110

  Los impíos me tendieron lazo,

Pero no me he desviado de tus 

preceptos.

111

  Por herencia eterna he tomado tus 

testimonios,

Porque son el gozo de mi corazón.

112

  Incliné mi corazón a cumplir tus 

estatutos,

De continuo y hasta el fin.

s

113

  Aborrezco a los de doble ánimo,°

Pero amo tu Ley.

114

  Tú eres mi escondedero y mi escudo,

En tu palabra he puesto mi 

esperanza.

115

  Apartaos de mí, perversos,

Para que pueda atesorar los 

mandamientos de mi Dios.

116

  Susténtame conforme a tu dicho, y 

viviré,

119.91 Lit. todas las cosas son tus siervas.  119.96 Lit. final. Todas las cosas de este mundo tienen límite; sólo los mandamien-

tos de Dios carecen de esa limitación. 

119.109 Lit. mi alma está continuamente en la palma de mi mano.  119.113 Lit. los de 

mente dividida


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Salmo 119:117

636

Y no permitas que quede 

avergonzado de mi esperanza.

117

  Susténtame, y estaré a salvo,

Y contemplaré continuamente tus 

estatutos.

118

  Repudias a todos los que se desvían 

de tus estatutos,

Porque sus maquinaciones son 

vanas.

119

  Apartaste como escorias a todos los 

malvados de la tierra,

Por eso amo tus testimonios.

120

  Mi carne se estremece de 

temor a ti,

Y ante tus juicios me lleno de pavor.

[

121

  He actuado con justicia y rectitud,

No me dejes a merced de mis 

opresores.

122

  Sé fiador de tu siervo para bien,

No me opriman los soberbios.

123

  Mis ojos desfallecen por tu 

salvación,

Y por la promesa de tu justicia.

124

  Haz con tu siervo según tu 

misericordia,

Y enséñame tus estatutos.

125

  Yo soy tu siervo, dame 

entendimiento,

Y comprenderé tus testimonios.

126

  Tiempo es de actuar, oh YHVH,

Porque han invalidado tu Ley.

127

  Por eso amo tus mandamientos

Más que el oro más puro.

128

  Por eso estimé rectos todos tus 

mandamientos sobre todas las 

cosas,

Y aborrecí toda senda de mentira.

p

129

  ¡Maravillosos son tus testimonios!

Por eso los conserva mi alma.

130

  La explicación de tus palabras 

alumbra,

Hace entender a los simples.

131

  Abrí mi boca y suspiré,

Porque anhelaba tus 

mandamientos.

132

  Vuelve tu rostro hacia mí y 

concédeme tu gracia,

Como acostumbras con los que 

aman tu Nombre.

133

  Afirma mis pasos en tu palabra,

Y ninguna iniquidad se enseñoree 

de mí.

134

  Líbrame de la opresión del 

hombre,

Así guardaré tus preceptos.

135

  Haz resplandecer tu rostro sobre tu 

siervo,

Y enséñame tus estatutos.

136

  Ríos de aguas° descendieron de mis 

ojos,

Porque no guardaban tu Ley.

x

137

  Justo eres Tú, oh YHVH,

Y rectos son tus mandamientos.

138

  Tus testimonios que nos has 

encomendado son rectos,

Y están llenos de fidelidad.

139

  Mi celo me consume,

Porque mis adversarios han 

olvidado tus palabras.

140

  Tu palabra es en extremo pura,

Y tu siervo la ama.

141

  Soy pequeño y despreciado,

Pero no he olvidado 

tus preceptos.

142

  Tu justicia es justicia eterna,

Y tu Ley, verdad.

143

  La angustia y la aflicción me han 

alcanzado,

Pero tus mandamientos son mis 

delicias.

144

  Tus testimonios son justos para 

siempre,

¡Dame entendimiento y viviré!

q

145

  He clamado con todo el corazón, 

¡Respóndeme, oh YHVH!

Tus estatutos atesoro.

146

  A ti he clamado, ¡sálvame!

Y observaré tus testimonios.

147

  Me anticipé al alba y clamé,

Esperé con ansias en 

tu palabra.

148

  Mis ojos se anticiparon a las vigilias 

de la noche,

Para meditar en tu palabra.

119.136 Heb. palguey mayim = canales (o surcos) de aguas


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Salmo 120:2

637

149

  Oye mi voz conforme a tu 

misericordia,

Vivifícame, oh YHVH, conforme a tu 

decreto.

150

  Mis perseguidores se acercan a la 

maldad,

Se alejan de tu Ley.

151

  Pero Tú, YHVH, estás cerca,

Y todos tus mandamientos son 

verdaderos.

152

  Hace ya mucho que entendí tus 

testimonios,

Que los has establecido para 

siempre.

r

153

  Mira mi aflicción y líbrame,

Porque no me he olvidado de tu Ley.

154

  Aboga por mi causa, redímeme;

Y vivifícame por tu palabra.

155

  Lejos de los malvados queda la 

salvación,

Porque no escudriñan tus estatutos.

156

  ¡Oh YHVH, grande es tu 

misericordia!

¡Vivifícame conforme a tu justicia!

157

  Los enemigos que me persiguen son 

muchos,

Pero yo no me aparto de tus 

testimonios.

158

  Veo a los traidores y me repugnan,

Porque no guardan tu palabra.

159

  ¡Mira cuánto amo tus preceptos!

¡Vivifícame, oh YHVH, conforme a 

tu misericordia!

160

  La suma° de tu palabra es verdad,

Y eterno todo decreto de tu justicia.

v

161

  Príncipes me han perseguido sin 

causa,

Pero mi corazón tiembla ante tus 

palabras.

162

  Me regocijo en tu palabra,

Como quien halla muchos 

despojos.°

163

  Aborrezco y abomino la mentira;

Amo tu Ley.

164

  Siete veces al día te alabo,

A causa de tus justos 

mandamientos.

165

  Mucha paz tienen los que aman tu 

Ley,

Y no hay para ellos piedra de 

tropiezo.

166

  Oh YHVH, he esperado por tu 

salvación,

Y he practicado tus mandamientos.

167

  Mi alma guarda tus testimonios,

Y los ama intensamente.

168

  He observado tus preceptos y tus 

testimonios,

Porque todos mis caminos están 

delante de ti.

t

169

  Llegue mi clamor a tu presencia, oh 

YHVH,

Dame entendimiento conforme a tu 

palabra.

170

  Llegue mi oración a tu presencia,

Líbrame conforme a tu palabra.

171

  Profieran mis labios alabanza,

Porque Tú me enseñas tus 

estatutos.

172

  Mi lengua hablará° de tus dichos,

Porque todos tus mandamientos 

son justos.

173

  Sea tu mano para socorrerme,

Porque tus preceptos he escogido.

174

  Anhelo tu salvación, oh YHVH,

Y tu Ley es mi delicia.

175

  ¡Viva mi alma y te alabe,

Y ayúdenme tus juicios!

176

  Anduve errante como oveja 

descarriada,

¡Busca a tu siervo, porque no ha 

olvidado tus mandamientos!

S

almo

 120

Cántico gradual.

°

1

    En mi angustia clamé a YHVH,

Y Él me respondió.

2

    ¡Oh YHVH, libra mi alma de los 

labios mentirosos,

Y de la lengua fraudulenta!

119.160 

→ § 148.  119.162 Es decir, el botín.  119.172 Lit. responderá.  120.Tít. Heb. shir ha-maaloth = cántico de las subidas 

→Se da este nombre a un grupo de 15 salmos (120-134), también llamados cánticos graduales (del latín gradus = paso). Es 

prob. que el vocablo aplicado signifique que los israelitas tenían en sus labios las palabras de estos Salmos mientras ascendían 

al monte Sión en su peregrinaje a Jerusalem, durante las tres grandes solemnidades del año. 


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Salmo 120:3

638

3

    ¿Qué se te dará, o qué te 

aprovechará,

Oh lengua engañosa?

4

    Agudas saetas de valiente,

Forjadas con brasas de enebro.

5

    ¡Ay de mí, que estoy desterrado en 

Mesec,

Y habito en las tiendas de Cedar!

6

    Mucho tiempo ha morado mi alma

Con los que aborrecen la paz.

7

    Yo estoy por la paz, y si hablo, ellos 

están por la guerra.

S

almo

 121

Cántico gradual.

1

    Alzaré mis ojos a los montes,

¿De dónde vendrá mi socorro?

2

    Mi socorro viene de YHVH,

Que hizo los cielos y la tierra.

3

    No dará tu pie al resbaladero,

Ni se dormirá el que te guarda.

4

    He aquí no se adormecerá ni 

dormirá,

El que guarda a Israel.

5

    YHVH es tu guardador,

YHVH es tu sombra a tu mano 

derecha.

6

    El sol no te fatigará de día,

Ni la luna de noche.

7

    YHVH te guardará de todo mal,

Él guardará tu alma.

8

    YHVH guardará tu salida y tu 

entrada

Desde ahora y para siempre.

S

almo

 122

Cántico gradual. De David.

1

    Yo me alegré con los que me decían:

¡Vayamos a la Casa de YHVH!

2

    ¡Nuestros pies ya están plantados 

dentro de tus puertas, oh 

Jerusalem!

3

    Jerusalem, que estás edificada como 

ciudad bien unida y compacta,°

4

    Adonde suben las tribus, las tribus 

de YH,

Según la costumbre de Israel, a dar 

gracias al nombre de YHVH,

5

    Porque allí están los tronos 

del juicio,

Los tronos de la casa de David.

6

    Rogad por la paz de Jerusalem,

Sean prosperados los que te aman.

7

    Haya paz dentro de tus muros,

Y tranquilidad en tus palacios.

8

    Por amor a mis hermanos y 

compañeros, diré ahora:

Sea la paz dentro de ti.

9

    Por amor a la Casa de YHVH nuestro 

Dios,

Procuraré tu bien.

S

almo

 123

Cántico gradual.

1

    A ti alzo mis ojos,

A ti, que estás sentado en los cielos.

2

    He aquí, como los ojos de los siervos 

miran la mano de sus señores,

Y los ojos de la sierva la mano de su 

señora,

Así nuestros ojos miran a YHVH 

nuestro Dios,

Hasta que tenga misericordia de 

nosotros.

3

    ¡Ten misericordia de nosotros, oh 

YHVH!

¡Ten misericordia de nosotros!

Porque estamos saturados de 

desprecios;

4

    Saturada está nuestra alma del 

escarnio de los que están en 

holgura,

Y del desprecio de los soberbios.

S

almo

 124

Cántico gradual. De David.

1

    De no haber estado YHVH por 

nosotros,

Diga ahora Israel:

2

    De no haber estado YHVH por 

nosotros,

Cuando los hombres se levantaron 

contra nosotros,

3

    Nos habrían tragado vivos,

Cuando su ira se encendió contra 

nosotros,

4

    Entonces nos habrían anegado las 

aguas,

122.3 En sentido espiritual, esto es, bien trabados en compañerismo.


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Salmo 128:2

639

Y el torrente nos llegaría al cuello;

5

    Las aguas impetuosas habrían 

pasado sobre nosotros.

6

    ¡Bendito sea YHVH,

Que no nos entregó por presa de sus 

dientes!

7

    Como el pájaro que escapa de la 

trampa del pajarero,° así escapó 

nuestra alma;

¡La trampa fue rota, y hemos 

escapado!

8

    Nuestro socorro está en el nombre 

de YHVH,

Que hizo los cielos y la tierra.

S

almo

 125

Cántico gradual.

1

    Los que confían en YHVH son como 

el monte de Sión,

Que no se mueve, mas siempre está 

firme.

2

    Como Jerusalem tiene montes 

alrededor de ella,

Así YHVH está alrededor de su 

pueblo,

Desde ahora y para siempre.

3

    Porque no reposará el cetro de la 

impiedad sobre la heredad de los 

justos,

No sea que los justos extiendan sus 

manos a la iniquidad.

4

    ¡Oh YHVH, haz bien a los buenos,

Y a los rectos de corazón!

5

    Pero a los que se apartan por 

caminos torcidos,

YHVH los hará llevar con los que 

hacen iniquidad.

¡Paz sea sobre Israel!

S

almo

 126

Cántico gradual.

1

    Cuando YHVH haga volver de la 

cautividad a Sión,

Seremos como los que sueñan.

2

    Entonces nuestra boca se llenará de 

risa,

Y nuestra lengua de gritos de alegría;

Entonces dirán entre los gentiles:

¡Grandes cosas ha hecho YHVH por 

éstos!

3

    ¡Sí, YHVH ha hecho grandes cosas 

por nosotros,

Y estamos alegres!

4

    ¡Haz volver a nuestros cautivos, oh 

YHVH,

Como haces volver° los torrentes del 

Neguev!

5

    Los que siembran con lágrimas,

Segarán con regocijo.

6

    Aunque vaya llorando el que lleva la 

preciosa semilla,

Volverá cargando sus gavillas con 

regocijo.

S

almo

 127

Cántico gradual. Para Salomón.

1

    Si YHVH no edifica la Casa,° en vano 

trabajan los que la edifican,

Si YHVH no guarda la ciudad, en 

vano vela la guardia.

2

    En vano es que os levantéis de 

madrugada,

Y tarde vayáis a descansar,

Y que comáis el pan de afanes,

Pues lo dará a su amado mientras 

duerme.

3

    He aquí, herencia de YHVH son los 

hijos,

Y una recompensa el fruto del vientre.

4

    Como saetas en manos 

del valiente,

Así son los hijos habidos en la 

juventud.

5

    ¡Cuán bienaventurado es el varón 

que llena su aljaba de ellos!

No será avergonzado cuando hable 

con sus enemigos en la puerta.°

S

almo

 128

Cántico gradual.

1

    ¡Cuán bienaventurado es el que 

teme a YHVH,

Y anda en sus caminos!

2

    Cuando comas del duro trabajo de 

tus manos,

Serás bienaventurado y te irá bien.

124.7 Heb. yoqshim = los que cazan pájaros. Vocablo distinto del que se usa para cazadores de fieras, etc.  126.4 .haces 

volver

127.1 Al tratarse de un salmo para Salomón, la Casa hace referencia al templo que el rey estaba edificando.  127.5 Se 

refiere a la puerta de la ciudad, donde la gente se reunía para hablar y negociar.


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Salmo 128:3

640

3

    Tu mujer será como vid fecunda en 

la intimidad de tu casa,

Tus hijos, como renuevos del olivo 

en torno a tu mesa.

4

    He aquí así será bendecido el 

valiente° que teme a YHVH.

5

    ¡Desde Sión te bendiga YHVH,

Y veas el bien de Jerusalem todos los 

días de tu vida,

6

    Y veas a los hijos de tus hijos

¡Paz sea sobre Israel!

S

almo

 129

Cántico gradual.

1

    Mucho me han angustiado desde mi 

juventud,

Diga ahora Israel:

2

    Mucho me han angustiado desde mi 

juventud,

Pero no prevalecieron contra mí.

3

    Sobre mis espaldas araron los 

aradores,

Hicieron largos sus surcos.

4

    YHVH es justo,

Cortó las coyundas de los malvados.

5

    Sean avergonzados y vueltos atrás

Los que aborrecen a Sión.

6

    Sean como hierba de terrado,

Que se seca antes de brotar,°

7

    Que no llena la mano del segador,

Ni la brazada del que agavilla,

8

    Ni le dicen los que pasan:

La bendición de YHVH sea sobre 

vosotros,

Os bendecimos en el nombre de 

YHVH.

S

almo

 130

Cántico gradual.

1

    ¡Oh YHVH, de lo profundo clamo 

a ti!

2

    ¡Oh Adonay, oye mi voz,

Y tus oídos estén atentos a la voz de 

mis súplicas!

3

    YH, si tomaras en cuenta los 

pecados,

¿Quién, Adonay, podrá mantenerse?

4

    Pero en ti hay perdón, para que seas 

temido.

5

    Espero en YHVH, mi alma espera,

En su palabra espero.

6

    Más que los centinelas a la aurora, 

Mi alma espera a Adonay,

¡Sí, más que los centinelas a la aurora!

7

    Espere Israel en YHVH,

Porque con YHVH está la 

misericordia,

Y con Él, abundante redención.

8

    Él redimirá a Israel de todos sus 

pecados.

S

almo

 131

Cántico gradual. De David

1

    Oh YHVH, mi corazón no se ha 

ensoberbecido ni mis ojos se han 

enaltecido;

No he andado en pos de grandezas, 

ni en cosas demasiado sublimes 

para mí.

2

    Ciertamente he sosegado y acallado 

mi deseo,

Como niño destetado de su madre,

Como un niño destetado he sujetado 

mi deseo.

3

    Espera, oh Israel, en YHVH,

Desde ahora y para siempre.

S

almo

 132

Cántico gradual.

1

    Oh YHVH, tenle en cuenta a David,

Todas sus aflicciones.

2

    De cómo juró a YHVH,

Y prometió al Fuerte de Jacob:

3

    Ciertamente no entraré al abrigo de 

mi casa,

Ni subiré al lecho de mi reposo,

4

    Ciertamente no concederé sueño a 

mis ojos,

Ni a mis párpados adormecimiento,

5

    Hasta que halle lugar para YHVH,

Tabernáculo para el Fuerte de Jacob.

6

    He aquí en Efrata oímos de ella,°

La hallamos en los campos de Jaar.°

128.4 Heb. guéber = valiente, guerrero. Siempre dispuesto para la batalla.  129.6 Lit. de ser desenvainada.  132.6 Esto es, el 

Arca del Pacto. 

132.6 Lit. en los campos de madera. Es decir, en el distrito de Kiriat-Jearim = ciudad de maderas. Allí estuvo el 

Arca por veinte años 

→1 S.7.1 ss. 


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Salmo 135:11

641

7

    Entremos en su Tabernáculo,

Postrémonos ante el estrado de 

sus pies.

8

    ¡Oh YHVH, levántate al lugar de tu 

reposo,

Así Tú como el Arca de tu poder!

9

    ¡Vístanse tus sacerdotes de justicia,

Y griten de júbilo tus santos!

10

    Por amor de David tu siervo,

No hagas volver el rostro de tu 

ungido.

11

    En verdad juró YHVH a David, y no 

se retractará:

Un fruto de tus entrañas pondré en 

tu trono;

12

    Si tus hijos guardan mi pacto,

Y mi testimonio que Yo les enseñaré,

Sus hijos también se sentarán sobre 

tu trono para siempre.

13

    Porque YHVH ha escogido a Sión,

La ha deseado para habitación suya:

14

    Este es para siempre el lugar de mi 

reposo,

Aquí habitaré, porque la he deseado.

15

    Bendeciré abundantemente su 

provisión,

Y saciaré de pan a sus 

menesterosos.

16

    Vestiré con salvación a sus 

sacerdotes,

Y sus santos darán voces de júbilo.

17

    Allí haré retoñar para David un 

Vástago,

Dispondré una lámpara para mi 

Ungido.

18

    A sus enemigos vestiré de 

vergüenza,

Pero sobre él resplandecerá su 

corona.

S

almo

 133

Cántico gradual. De David.

1

    ¡Mirad cuán bueno y cuán 

delicioso es

Habitar los hermanos juntos en 

armonía!

2

    Es como el buen óleo sobre la 

cabeza,

El cual desciende sobre la barba,

La barba de Aarón,

Y baja hasta el borde de sus vestiduras.

3

    Como el rocío del Hermón,

Que desciende sobre los montes de 

Sión,

Porque allí envía YHVH bendición y 

vida eterna.

S

almo

 134

Cántico gradual.

1

    Mirad, bendecid a YHVH,

Vosotros todos los siervos de YHVH,

Los que en la Casa de YHVH estáis 

por las noches.

2

    Alzad vuestras manos al Santuario,

Y bendecid a YHVH.

3

    Desde Sión te bendiga YHVH,

El cual ha hecho los cielos y la 

tierra.

S

almo

 135

¡Aleluya!

1

    Alabad el nombre de YHVH,

Alabadle, siervos de YHVH,

2

    Los que estáis en la Casa de YHVH,

En los atrios de la Casa de nuestro 

Dios.

3

    ¡Aleluya!, porque YHVH es bueno,

Entonad salmos a su Nombre, 

porque es agradable.

4

    Que YH ha escogido a Jacob para sí,

A Israel como su especial tesoro.

5

    Yo sé que YHVH es grande,

El Señor nuestro más que todos los 

dioses.

6

    Todo lo que YHVH quiere hace,

En los cielos y en la tierra,

En los mares y en todos los 

abismos.

7

    Hace subir las nubes de los extremos 

de la tierra,

Hace relámpagos para el aguacero,

Saca de sus tesoros el viento.

8

    Hirió a los primogénitos de Egipto,

Desde el hombre hasta el animal.

9

    En medio de ti, oh Egipto, envió 

señales y prodigios,

Contra Faraón y contra todos sus 

siervos.

10

    Destruyó a muchas naciones,

Y dio muerte a reyes poderosos:

11

    A Sehón rey amorreo, a Og rey de 

Basán,

Y a toda la realeza de Canaán,


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Salmo 135:12

642

12

    Y dio en heredad la tierra de ellos,

En heredad a su pueblo Israel.

13

    ¡Oh YHVH, eterno es tu Nombre!

Tu renombre, YHVH, por todas las 

generaciones.

14

    Ciertamente YHVH hará justicia a 

su pueblo,

Y se compadecerá de sus siervos.

15

    Los ídolos de las naciones son plata 

y oro,

Hechura de manos de hombre:

16

    Tienen boca, y no hablan,

Tienen ojos, y no ven,

17

    Tienen oídos, y no oyen,

Tienen nariz, y no respiran.

18

    Semejantes a ellos son los que los 

hacen,

Y todos los que confían en ellos.

19

    ¡Oh casa de Israel, bendecid a 

YHVH!

¡Oh casa de Aarón, bendecid a 

YHVH!

20

    ¡Oh casa de Leví, bendecid a YHVH!

Los que teméis a YHVH, ¡bendecid a 

YHVH!

21

    ¡Bendito sea YHVH desde Sión, que 

mora en Jerusalem!

¡Aleluya!°

S

almo

 136

1

    Alabad a YHVH porque Él es bueno,°

Porque para siempre es su 

misericordia.

2

    Alabad al Dios de los dioses,

Porque para siempre es su 

misericordia.

3

    Alabad al Señor de los señores,

Porque para siempre es su 

misericordia.

4

    Al único que hace grandes maravillas,

Porque para siempre es su 

misericordia.

5

    Al que hizo los cielos con maestría,

Porque para siempre es su 

misericordia.

6

    Al que extendió la tierra sobre las 

aguas,

Porque para siempre es su 

misericordia.

7

    Al que hizo las grandes lumbreras,

Porque para siempre es su 

misericordia.

8

    El sol para que domine de día,

Porque para siempre es su 

misericordia.

9

    La luna y las estrellas para que 

dominen de noche,

Porque para siempre es su 

misericordia.

10

    Al que hirió a Egipto en sus 

primogénitos,

Porque para siempre es su 

misericordia.

11

    Y sacó a Israel de en medio de ellos,

Porque para siempre es su 

misericordia.

12

    Con mano fuerte, y con brazo 

extendido,

Porque para siempre es su 

misericordia.

13

    Al que dividió en partes el Mar Rojo,

Porque para siempre es su 

misericordia.

14

    E hizo pasar por en medio a Israel,

Porque para siempre es su 

misericordia.

15

    Y arrojó a Faraón y a su ejército en 

el Mar Rojo,

Porque para siempre es su 

misericordia.

16

    Al que condujo a su pueblo por el 

desierto.

Porque para siempre es su 

misericordia.

17

    Al que hirió a grandes reyes,

Porque para siempre es su 

misericordia.

18

    Y dio muerte a reyes poderosos,

Porque para siempre es su 

misericordia.

19

    A Sehón rey amorreo,

Porque para siempre es su 

misericordia.

135.21 Como también en otros salmos, tenemos aquí la frase hebrea Hallelu-Yah = alabad a YH.  136.1 Este salmo se abre de la 

misma manera que los salmos 106, 107 y 118. Pero lo peculiar de éste es que la 2ª. parte de cada v. es igual en cada uno de sus 

26 vv. Por su estructura, se nota que era cantado de forma antifonal, el estribillo lo cantaban los levitas o la congregación. 


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Salmo 138:8

643

20

    Y a Og rey de Basán,

Porque para siempre es su 

misericordia.

21

    Y dio en heredad la tierra de ellos,

Porque para siempre es su 

misericordia.

22

    En heredad a Israel su siervo,

Porque para siempre es su 

misericordia.

23

    El que en nuestra humillación se 

acordó de nosotros,

Porque para siempre es su 

misericordia.

24

    Y nos rescató de nuestros enemigos,

Porque para siempre es su 

misericordia.

25

    El que da alimento a todo ser 

viviente,

Porque para siempre es su 

misericordia.

26

    Dad gracias al Dios de los cielos,°

¡Porque para siempre es su 

misericordia!

S

almo

 137

1

    Junto a los ríos de Babilonia nos 

sentábamos y llorábamos,

Acordándonos de Sión.

2

    Sobre los sauces, en medio de ella,

Colgamos nuestras cítaras.

3

    Los que nos habían llevado cautivos 

allí, nos invitaban a cantar;

Los que nos habían hecho llorar nos 

pedían alegría, diciendo:

¡Cantadnos algún cántico de Sión!

4

    ¿Cómo cantaremos cánticos de 

YHVH en tierra extranjera?

5

    Si me olvido de ti, oh Jerusalem,

Que mi diestra se olvide de mí.°

6

    Que mi lengua se pegue a mi 

paladar,

Si no me acuerdo de ti;

Si no enaltezco a Jerusalem por 

encima de mi mayor gozo.

7

    Oh YHVH, ajusta cuentas con los 

idumeos por el día de Jerusalem,

Cuando incitaban: ¡Arrasadla!

¡Arrasadla hasta sus cimientos!

8

    Oh destructiva hija de Babilonia,

¡Dichoso el que pueda pagarte el mal 

que nos has hecho!

9

    ¡Dichoso el que agarre a tus hijos y 

los estrelle contra la peña!°

S

almo

 138

De David.

1

    Oh YHVH,° te doy gracias con todo 

mi corazón,

Ante la faz de ’Elohim entonaré 

salmos para ti.

2

    Me postraré hacia tu Santuario,°

Y daré gracias a tu Nombre por tu 

misericordia y tu fidelidad,

Porque engrandeciste tu palabra 

conforme a tu Nombre.

3

    En el día en que invoqué, Tú me 

respondiste,

Me hiciste osado con fortaleza en mi 

alma.

4

    Que todos los reyes de la tierra te 

confiesen, oh YHVH,

Cuando hayan oído los oráculos de 

tu boca.

5

    Que canten acerca de los caminos de 

YHVH:

¡Cuán grande es la gloria de YHVH!

6

    Aunque YHVH es excelso, atiende al 

humilde,

Pero al altivo lo reconoce de lejos.°

7

    Aunque yo ande en medio de la 

angustia,

Tú me vivificarás,

Extenderás tu mano frente a la ira 

de mis enemigos,

Y me salvará tu diestra.

8

    YHVH cumplirá su propósito en mí.

¡Oh YHVH, tu misericordia es para 

siempre,

136.26 Heb. El-hashamáyim = Dios de los cielos 

→Jon.1.9 y con frecuencia, en los últimos libros del AP. La universalidad del 

v. 25 (lit. da alimento a toda carne) exige una gratitud que abarque no sólo al Dios de Israel, sino al Dios de los cielos, del cual 

todo bien desciende a la tierra 

→Jac.1.17.  137.5 Esto es, que mi diestra pierda su destreza para trabajar para mí, para ganar el 

sustento o defenderme

137.9 Imprecación ajustada a la ley del talión 

→2 R.8.12; Os.10.14 y Jer.51.24 a la vista de Is.13.16. 

138.1 Se sigue aquí al mss. de Qumram, el cual registra el Tetragrama.  138.2 Lit. el templo de tu santidad.  138.6 Es decir, a 

pesar de la gran distancia que los separa, el malvado no debe pensar que es inmune al profundo conocimiento que Dios tiene 

de él.


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Salmo 139:1

644

No desampares la obra de tus 

manos!

S

almo

 139

Al director del coro. Salmo de David.

1

    Oh YHVH, Tú me has escudriñado y 

conocido.

2

    Tú conoces mi sentarme y mi 

levantarme,

De lejos° percibes mis pensamientos;

3

    Escudriñas mi senda y mi reposo,

Y todos mis caminos te son conocidos,

4

    Porque aún no está la palabra en mi 

lengua,

Y he aquí, oh YHVH, Tú la sabes toda.

5

    Me has constreñido por detrás y por 

delante,

Y has puesto sobre mí tu mano.

6

    Tal conocimiento es demasiado 

maravilloso para mí,

Alto es, no lo puedo alcanzar.

7

    ¿Adónde me alejaré de tu Espíritu?

¿Adónde huiré de tu presencia?

8

    Si subo a los cielos, allí estás Tú,

Y si en el Seol preparo mi lecho, allí 

estás Tú.

9

    Si tomara las alas del alba,

Y habitara al extremo de los mares,

10

    Aun allí me alcanzará tu mano,

Y me asirá tu diestra.

11

    Si digo: ¡Sórbanme las tinieblas,

Y que la luz en torno a mí se haga 

como la noche!

12

    Tampoco la oscuridad es oscura 

para ti,

La noche resplandece como el día,

¡Lo mismo te son las tinieblas que 

la luz!

13

    Tú formaste mis riñones,°

Me tejiste en el vientre de mi madre.

14

    Te alabaré, porque asombrosa y 

maravillosamente fui formado.

Maravillosas son tus obras,

Y mi alma lo sabe muy bien.

15

    No fueron encubiertos de ti mis 

huesos,°

Aunque en lo oculto fui formado,

Y entretejido en lo más profundo de 

la tierra.

16

    Tus ojos veían mi embrión,

Todos mis días fueron trazados,°

Y se escribieron en tu Rollo,

Cuando aún no existía ninguno de 

ellos.°

17

    ¡Oh ’El, cuán preciosos me son tus 

pensamientos!

¡Cuán inmensa es la suma de ellos!

18

    Si los enumero, se multiplican más 

que la arena.

Despierto, y aún estoy contigo.

19

    ¡Oh ’Eloah, si hicieras morir al impío,

Y los sanguinarios se alejaran de mí!

20

    Que hablan contra ti intrigando,

Que toman tu Nombre en vano.

21

    ¡Oh YHVH! ¿No aborrezco a quienes 

te aborrecen?

¿No me repugnan los que se alzan 

contra ti?

22

    ¡Con gran aborrecimiento los 

aborrezco,

Y los tengo por enemigos!

23

    Escudríñame, oh ’Elohim, y conoce 

mi corazón,

Pruébame, y conoce mis pensamientos,

24

    Y ve si hay en mí camino de 

perversidad,

Y guíame en el camino eterno.

S

almo

 140

Al director del coro. Salmo de David.

1

    ¡Líbrame, oh YHVH, del malvado,

Y guárdame del violento!

2

    Quienes maquinan males en su 

corazón,

Y cada día provocan contiendas,

3

    Aguzan su lengua como serpiente,

Veneno de víbora hay debajo de sus 

labios.

Selah

4

    Defiéndeme, oh YHVH, de la mano 

perversa,

Guárdame de los hombres violentos,

139.2 Heb. merajoq = desde lo más alto de los cielos.  139.13 Es decir, mis entrañas.  139.15 Es decir, estructura ósea, esque-

leto

139.16 Lit. modelados, en el sentido metafórico de dispuestos por Dios según su plan eterno.  139.16 El TM registra y no 

uno entre ellos, pero se advierte un cambio efectuado por los escribas, y así el vocablo no ha de tomarse como una negación, 

sino como un pronombre, es decir, para él. De aquí la traducción y para el embrión hubo un día entre ellos.


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Salmo 142:4

645

Que planean trastornar mis pasos.

5

    Soberbios que me esconden trampa, 

que me tienden lazos,

Junto al sendero han puesto la 

trampa.

Selah

6

    Digo a YHVH: Tú eres mi Dios,

Oye, oh YHVH, la voz de mis súplicas.

7

    Oh YHVH Adonay, fortaleza de mi 

salvación,

Que cubres mi cabeza en el día de 

las armas.

8

    No concedas, oh YHVH, los deseos 

del impío,

No permitas que sus designios 

salgan adelante, ¡no se exalten!

Selah

9

    En cuanto a los que por todas partes 

me rodean,

La malicia de sus propios labios 

cubrirá sus cabezas.

10

    Carbones encendidos caerán sobre 

ellos:

Serán echados al fuego en abismos 

profundos,

De donde no se levantarán.

11

    El hombre de mala° lengua no se 

afianzará en la tierra,

Y el mal perseguirá al varón violento.

12

    Yo sé que YHVH tomará a cargo 

suyo la causa del afligido,

Y el derecho de los pobres.

13

    Ciertamente los justos darán gracias 

a tu Nombre,

Los rectos morarán en tu presencia.

S

almo

 141

Salmo de David.

1

    ¡Oh YHVH, a ti he clamado, 

apresúrate a venir a mí!

Oye mi voz cuando te invoco.

2

    Mi oración está aquí como incienso 

en tu presencia,

Mis palmas elevadas como ofrenda 

de la tarde.

3

    Coloca, oh YHVH, un guardia a mi 

boca,

Vigila en la puerta de mis labios.

4

    No permitas que mi corazón se 

incline a cosa mala,

Para hacer obras perversas con 

hombres malhechores.

No seré comensal en sus banquetes.

5

    Será un favor que el justo me 

castigue y me reprenda;

Pero que el ungüento del impío no 

perfume mi cabeza,

Porque mi oración es de continuo 

contra su maldad.

6

    Sean lanzados sus jueces contra los 

costados de la peña,

Y oigan mis dichos, que son 

agradables.

7

    Como cuando se ara y se parte la 

tierra,

Nuestros huesos han sido esparcidos 

a la boca del Seol.°

8

    ¡A ti, Adonay YHVH, se vuelven mis 

ojos,

En ti me he refugiado, no 

desampares° mi alma!

9

    ¡Guárdame del lazo que me han 

tendido,

De las trampas de los que hacen 

iniquidad!

10

    ¡Caigan a una los malvados en sus 

propias redes,

Mientras yo paso adelante!

S

almo

 142

Maskil de David. Oración cuando estaba en la cueva.

1

    Con mi voz clamo a YHVH,

Con mi voz ruego a YHVH 

misericordia.

2

    Ante su presencia derramo mis afanes,

Ante su presencia expongo mi 

angustia,

3

    Mientras mi espíritu desmaya dentro 

de mí.

Pero Tú conoces mi sendero,

Que en el camino por donde avanzo 

me han escondido una trampa.

4

    Mira a mi diestra y observa, que no 

hay quien me reconozca.

No tengo refugio ni hay quien 

pregunte por mí.

140.11 .mala.  141.7 La idea es que, del mismo modo que, cuando se corta leña, saltan muchas astillas, así también los 

huesos de los amigos del salmista, asesinados por los malvados, están abundantemente esparcidos a la entrada del sepulcro. 

141.8 Lit. derrames.


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Salmo 142:5

646

5

    ¡A ti clamo, oh YHVH!

Te digo: Tú eres mi refugio,

Mi porción en la tierra de los 

vivientes.

6

    ¡Oye mi clamor, porque estoy 

abatido en gran manera!

Líbrame de los que me persiguen, 

porque son más fuertes que yo.

7

    Saca mi alma de la prisión, para que 

dé gracias a tu Nombre,

Me rodearán los justos, porque Tú 

me serás propicio.

S

almo

 143

Salmo de David.

1

    ¡Oh YHVH, escucha mi oración!

Por tu fidelidad atiende a mi 

súplica,

Por tu justicia, respóndeme.

2

    No entres en juicio con tu siervo,

Porque ningún viviente podrá 

justificarse delante de ti.

3

    El enemigo persiguió mi alma,

Ha postrado mi vida contra el suelo,

Me ha hecho habitar en tinieblas, 

como los que hace tiempo han 

muerto.

4

    Por tanto mi espíritu desfallece 

dentro de mí,

Mi corazón está desolado.

5

    Me acordé de los días de antaño,

Medito en todas tus acciones,

Reflexiono sobre la obra de tus 

manos.

6

    A ti alzo mis manos,

Mi alma te anhela como la tierra 

sedienta.

Selah

7

    Oh YHVH, respóndeme pronto, 

porque mi espíritu desfallece,

No escondas de mí tu rostro,

De modo que yo sea como los que 

bajan al sepulcro.

8

    Hazme oír por la mañana tu 

misericordia, porque en ti confío;

Hazme saber el camino por el que 

debo andar, porque a ti elevo mi 

alma.

9

    Oh YHVH, líbrame de mis enemigos, 

Junto a ti me refugio.

10

   Enséñame a hacer tu voluntad, 

porque Tú eres mi Dios,

Tu buen Espíritu me guíe por tierra 

llana.

11

    Vivifícame, oh YHVH, por amor a tu 

Nombre,

Por tu justicia saca mi alma de la 

angustia,

12

    Por tu misericordia silencia a mis 

adversarios;

Destruye a todos los enemigos de mi 

alma, porque yo soy tu siervo.

S

almo

 144

De David.

1

    ¡Bendito sea YHVH, mi Roca,

Que adiestra mis manos para la 

guerra,

Y mis dedos para la batalla!

2

    Misericordia mía y fortaleza mía,

Mi baluarte y mi libertador,

Escudo mío, en quien me he 

refugiado,

El que sujeta a mi pueblo debajo 

de mí.

3

    Oh YHVH, ¿qué es el hombre para te 

fijes en él,

El mortal para que lo tengas en 

cuenta?

4

    El hombre es como un soplo,

Sus días como una sombra que 

pasa.

5

    Oh YHVH, inclina tus cielos y 

desciende,

Toca los montes, y humeen.

6

    Despide relámpagos y 

dispérsalos,

Envía tus saetas y confúndelos.

7

    Extiende tus manos desde lo alto,

Rescátame y líbrame de las aguas 

caudalosas,

De la mano de extranjeros,

8

    Cuya boca habla falsedad,

Y cuya diestra jura en falso.

9

    Oh ’Elohim, a ti cantaré cántico 

nuevo,

Con salterio de diez cuerdas te 

entonaré salmos,

10

    Tú das la victoria a los reyes,

Tú protegiste a David tu siervo.

11

    Defiéndeme de la espada cruel, 

líbrame de la mano de 

extranjeros,

Cuya boca habla falsedad,

Y cuya diestra jura en falso.

12

    Sean nuestros hijos como plantas 

crecidas en su juventud,


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Salmo 145:18

647

Y nuestras hijas como esquinas 

labradas cual las de un palacio.

13

    Estén llenos nuestros graneros,

Y provean toda clase de grano,

Sean nuestros rebaños por miles,

Y diez miles en nuestros contornos.

14

    Nuestro ganado vaya bien cargado, 

sin ruptura y sin pérdida,

Y no haya grito de alarma en 

nuestras plazas.

15

    ¡Cuán bienaventurado es el pueblo 

que tiene esto!

¡Cuán bienaventurado es el pueblo 

cuyo Dios es YHVH!

S

almo

 145

Salmo de alabanza. De David.

a

1

    Te exaltaré, mi Dios, mi Rey,

Y bendeciré tu Nombre eternamente 

y para siempre.

b

2

    Cada día te bendeciré y alabaré tu 

Nombre eternamente y para siempre.

g

3

    Grande es YHVH, y digno de 

suprema alabanza,

Y su grandeza es inescrutable.

d

4

    Generación a generación celebrará 

tus obras,

Y anunciará tus proezas.

h

5

    Yo meditaré en la hermosura de la 

gloria de tu majestad,

Y en tus obras maravillosas.

w

6

    Hablarán del poder de tus terribles 

proezas,

Y yo publicaré tu grandeza.

z

7

    Proclamarán la memoria de tu 

inmensa bondad,

Y cantarán con regocijo acerca de tu 

justicia.

j

8

    Clemente y misericordioso es YHVH,

Lento para la ira y grande en 

misericordia.

f

9

    YHVH es bueno para con todos,

Y su gran misericordia está en todas 

sus obras.

y

10

    ¡Oh YHVH, todas tus obras te alabarán,

Y tus santos te bendecirán!

k

11

    Que proclamen la gloria de tu reino,

Que relaten tus proezas,

l

12

    Para hacer saber a los hombres tus 

proezas,

Y la gloria y majestad de tu reino.

m

13

    Tu reino es un reino eterno,

Y tu señorío de generación en 

generación.

s

14

    °YHVH sostiene a todos los que 

están por caer,

Y levanta a todos los que han sido 

doblegados.

[

15

    Los ojos de todos esperan en ti,

Tú les das su comida a su tiempo.

p

16

    Abres tu mano, y sacias el deseo de 

todo ser viviente.

x

17

    Justo es YHVH en todos sus caminos,

Y misericordioso en todas sus obras.

q

18

    Cercano está YHVH a todos los que 

lo invocan,

A todos los que lo invocan 

sinceramente.

145.14 Al faltar la letra nun, en este acróstico sólo hay 21 letras.


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Salmo 145:19

648

r

19

    Cumplirá el deseo de los que lo 

temen,

Oirá asimismo el clamor de ellos, y 

los salvará.

v

20

    YHVH guarda a todos los que lo 

aman,

Pero destruirá a todos los impíos.

t

21

    Mi boca hablará la alabanza de YHVH,

¡Bendiga todo mortal° su santo 

Nombre,

Eternamente y para siempre!

S

almo

 146

1

    ¡Aleluya!

¡Alaba alma mía a YHVH!

2

    Alabaré a YHVH en mi vida,

Tañeré para mi Dios mientras viva.

3

    No confiéis en príncipes,

Ni en hijo de hombre, en quien no 

hay salvación.

4

    Sale su espíritu y vuelve al polvo;

Ese día perecen sus planes.

5

    ¡Cuán bienaventurado es aquél cuyo 

ayudador es el Dios de Jacob!

Aquel cuya esperanza está en YHVH 

su Dios,

6

    Que hizo los cielos y la tierra; el 

mar, y todo lo que en ellos hay.

Que mantiene su fidelidad 

perpetuamente,

7

    Que hace justicia a los oprimidos,

Que da pan a los hambrientos.

YHVH liberta a los cautivos,

8

    YHVH da vista a los ciegos,

YHVH levanta a los caídos,

YHVH ama a los justos,

9

    YHVH guarda a los extranjeros,

Al huérfano y a la viuda sostiene,

Y trastorna el camino de los impíos.

10

    Reinará YHVH para siempre,

Tu Dios, oh Sión,

De generación en generación.

¡Aleluya!

S

almo

 147

1

    ¡Alabad a YH!

Porque es bueno entonar salmos a 

nuestro Dios,

Porque suave y hermosa es la 

alabanza.

2

    YHVH es el que edifica a Jerusalem

Y congrega a los dispersos de Israel,

3

    El que sana a los quebrantados de 

corazón,

Y venda sus heridas.

4

    El que cuenta la muchedumbre de 

las estrellas,

A cada una la llama por su nombre.

5

    Grande es nuestro Señor y 

abundante en poder,

Y su inteligencia es infinita.

6

    YHVH sostiene a los humildes,

Y abate a los malos hasta el polvo.

7

    Cantad a YHVH en acción de gracias,

Entonad salmos con la cítara a 

nuestro Dios,

8

    El que cubre de nubes los cielos,

El que prepara lluvia para la tierra,

El que hace brotar la hierba en los 

montes.

9

    El que da su alimento al ganado,

Y a las crías del cuervo que graznan.

10

    No se deleita con la fortaleza del 

caballo,

Ni estima la agilidad de las piernas 

del hombre.

11

    YHVH se complace en los que lo 

temen,

Los que con ansia esperan en su 

misericordia.

12

    ¡Alaba a YHVH, oh Jerusalem!

¡Alaba a tu Dios, oh Sión!

13

    Porque ha reforzado los cerrojos° de 

tus puertas,

Y bendice a tus hijos dentro de ti.

14

    El que pone paz en tus fronteras,

Y te sacia con lo mejor del trigo.

15

    El que envía su mensaje a la tierra,

Y su palabra corre velozmente.

16

    El que envía la nieve como lana,

Y esparce la escarcha como ceniza.

17

    El que arroja su granizo como 

mendrugos,

145.21 Lit. toda carne.  147.13 Lit. las barras


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Salmo 150:3

649

¿Quién puede resistir su helada?

18

    Envía una orden, y los derrite,

Hace que su viento sople, y fluyen 

las aguas.

19

    Manifestó sus palabras a Jacob,

Sus decretos y mandatos a Israel.

20

    Con ninguna nación hizo así,

Ni les dio a conocer sus mandatos.

¡Aleluya!

S

almo

 148

¡Aleluya!

1

    ¡Alabad a YHVH desde los cielos!

¡Alabadlo en las alturas!

2

    ¡Alabadlo, vosotros todos sus 

mensajeros!

¡Alabadlo, vosotros todos sus 

ejércitos!

3

    ¡Alabadlo, sol y luna!

¡Alabadlo, vosotras todas lucientes 

estrellas!

4

    ¡Alabadlo, cielos de los cielos,

Y las aguas que están sobre los cielos!

5

    Alaben el nombre de YHVH,

Pues Él lo mandó, y fueron creados.

6

    Y los estableció a perpetuidad, para 

siempre,

Un decreto que no pasará.

7

    Alabad a YHVH desde la tierra,

Cetáceos de todos los océanos,

8

    El fuego y el granizo, la nieve y el 

vapor,

El viento huracanado, que cumple 

su mandato,

9

    Los montes y todos los collados,

Los árboles frutales y los cedros,

10

    Las fieras y todos los ganados,

Los reptiles y los pájaros alados;

11

    Los reyes de la tierra y los pueblos 

del orbe,

Los príncipes, y todos los jueces de 

la tierra,

12

    Los jóvenes y las doncellas,

Y los ancianos junto con los niños.

13

    Alaben el nombre de YHVH,

Porque sólo su Nombre es sublime,

Su majestad es más alta que los 

cielos y la tierra.

14

    Y Él ha exaltado el poderío de su 

pueblo,°

Motivo de alabanza de todos sus 

santos,

De los hijos de Israel, su pueblo a Él 

allegado.

¡Aleluya!

S

almo

 149

¡Aleluya!

1

    ¡Cantad a YHVH un cántico nuevo!

¡Resuene su alabanza en la 

congregación de los santos!

2

    ¡Alégrese Israel en su Hacedor!

¡Regocíjense en su Rey los hijos de 

Sión!

3

    ¡Alabad su Nombre con danza,

Y cantadle con pandero y arpa!

4

    Porque YHVH ama a su pueblo,

Y con su salvación corona a los 

oprimidos.

5

    Que los santos celebren su gloria,

Que canten con regocijo desde sus 

lechos.

6

    Que enaltezcan a ’El con sus 

gargantas,

Y en su diestra sostengan la espada 

de doble filo,

7

    Para tomar venganza entre las 

naciones,

Y dar el castigo a los gentiles.

8

    Para aprisionar a sus reyes con 

grilletes,

Y a sus nobles con cadenas de 

hierro.

9

    ¡Ejecutar la sentencia será la honra 

de todos sus santos!

¡Aleluya!

S

almo

 150

¡Aleluya!

1

    ¡Alabad a ’El° en su Santuario!

¡Alabadlo en la magnificencia de su 

firmamento!

2

    ¡Alabadlo por sus proezas!

¡Alabadlo por la inmensidad de su 

grandeza!

3

    ¡Alabadlo con el toque del shofar!

148.14 Lit. ha alzado el cuerno de su pueblo.  150.1 ’El 

→ § 2. 


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Salmo 150:4

650

¡Alabadlo con salterio y arpa!

4

    ¡Alabadlo con pandero y danza!

¡Alabadlo con cuerdas y flautas!

5

    ¡Alabadlo con címbalos resonantes!

150.6 

→ § 42. 

¡Alabadlo con címbalos 

vibrantes!

6

    ¡Todo lo que respira alabe a YH!

¡Aleluya!°


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1

Proverbios de Salomón ben David, rey 

de Israel,

2

    Para adquirir sabiduría e 

instrucción,

Para comprender las palabras de la 

inteligencia,

3

    Para recibir el consejo de prudencia,

Justicia, derecho y equidad.

4

    Para dar sagacidad al incauto,

Y a los jóvenes ciencia y discreción,

5

    Oígalo también el sabio y aumentará 

el saber,

Y el entendido obtendrá consejos 

sabios.

6

    Para hacer entender el proverbio y la 

parábola,

Las palabras de los sabios y sus 

enigmas.

7

    El principio de la sabiduría es el 

temor de YHVH,

Pero los insensatos desprecian la 

sabiduría y la instrucción.

El clamor de la sabiduría

8

    Oye, hijo mío, la instrucción de tu 

padre,

Y no abandones las enseñanzas de tu 

madre,

9

    Porque hermosa diadema serán a tu 

cabeza,

Y collar en tu garganta.

10

    Hijo mío, si los pervertidos te 

quieren seducir,

No consientas.

11

    Si dicen: Ven con nosotros a tender 

trampas mortales,

A acechar, sin motivo, al inocente;

12

    ¡Devorémoslo vivo, como el Seol,

Enteros, como los que bajan a la 

fosa!

13

    Hallaremos objetos valiosos,

Llenaremos nuestras casas del botín.

14

    Comparte tu suerte con nosotros,

Y tengamos todos una misma bolsa.

15

    Hijo mío, no los acompañes en su 

camino,

Aparta tu pie de sus senderos,

16

    Porque sus pies corren hacia el mal,

Y se apresuran a derramar sangre.

17

    En vano se tiende la red

Ante los ojos mismos del ave,

18

    Pero ellos atentan contra su propia 

sangre,

Y ante sus propias vidas tienden la 

trampa.

19

    Tales son las sendas del que es ávido 

de ganancia injusta,

La cual quita la vida de sus dueños.

20

    La Sabiduría clama por las calles,

Y en las plazas hace oír su voz,

21

    Grita en el bullicio de la ciudad,

Y en la entrada de la puerta pregona 

sus razones:

22

    Oh simples ¿hasta cuándo amaréis la 

simpleza,

Y vosotros, insolentes, os 

complaceréis en la insolencia,

Y vosotros, insensatos, aborreceréis 

el saber?

23

    ¡Volveos ante mi reprensión,

Y os manifestaré mi espíritu,

Y os haré conocer mis palabras!

24

    He llamado, y os rehusasteis,

Extendí mi mano, y no habéis hecho 

caso.

25

    Desechasteis todo mi consejo,

Y nadie quiso aceptar mi reprensión.

26

    Yo también me reiré cuando llegue 

vuestra calamidad,

Y me burlaré cuando os alcance el 

terror.

Motivación


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Proverbios 1:27

652

27

    Cuando lo que teméis venga como 

una tormenta,

Y vuestra calamidad llegue como un 

torbellino,

Cuando os sobrevenga tribulación y 

angustia,

28

    Entonces me llamaréis, y no 

responderé,

Me buscarán, pero no me 

encontrarán,

29

    Por cuanto aborrecieron la ciencia,

Y no escogieron el temor de YHVH.

30

    No quisieron mi consejo,

Y menospreciaron toda reprensión 

mía.

31

    Comerán pues, del fruto de su 

propio camino,

Y se hartarán de sus propios 

consejos.

32

    El descarrío de los simples los 

matará,

Y la complacencia de los necios los 

destruirá.

33

    Pero el que me oiga, habitará 

confiadamente,

Y estará tranquilo, sin temor del 

mal.

Excelencias de la sabiduría

2

 Hijo mío, si aceptas mis palabras,

Y guardas mis mandamientos dentro 

de ti,

2

    Haciendo atento tu oído a la sabiduría,

E inclinando tu corazón a la 

inteligencia,

3

    Si invocas a la prudencia,

Y al entendimiento alzas tu voz,

4

    Si la procuras como a la plata,

Y la rebuscas como a tesoros 

escondidos,

5

    Entonces entenderás el temor de 

YHVH,

Y hallarás el conocimiento de Dios.

6

    Porque YHVH da la sabiduría,

De su boca procede la ciencia y la 

inteligencia.

7

    Él atesora el acierto para los 

hombres rectos,

Es escudo al que anda en integridad.

8

    Es el que guarda las sendas de la 

justicia,

Y preserva el camino de sus santos.

9

    Entonces entenderás la justicia y el 

derecho,

La equidad, y todo buen camino,

10

    Cuando la sabiduría haya entrado en 

tu corazón,

Y el conocimiento sea dulce a tu 

alma,

11

    Te guardará la discreción,

Y te preservará la prudencia,

12

    Para librarte del camino malo;

Del hombre que habla cosas perversas,

13

    De los que abandonan los caminos 

rectos,

Para andar por sendas tenebrosas;

14

    De los que gozan haciendo el mal,

Y se alegran en las perversidades del 

vicio,

15

    Cuyas sendas son tortuosas,

Y sus caminos extraviados.

16

    Te librará° de la mujer ajena,

De la extraña que endulza sus 

palabras,

17

    Que abandona al compañero de su 

juventud,

Y olvida el pacto de su Dios.

18

    Su casa se inclina hacia la muerte,

Sus sendas hacia el país de las 

sombras.

19

    Cuantos entran en él, no regresan,

Ni retoman los senderos de la vida.

20

    Para que sigas el buen camino,

Y guardes los senderos del justo.

21

    Porque los rectos habitarán en la 

tierra,

Y los de limpio corazón 

permanecerán en ella.

22

    Pero el malvado será cortado de la 

tierra,

Y de ella serán desarraigados los 

transgresores.

Exhortación a la obediencia

3

 Hijo mío, no olvides mis enseñanzas,

Y tu corazón guarde mis 

mandamientos.

2

    Porque largura de días, y años de 

vida,

Y paz te aumentarán.

3

    Nunca se aparten de ti la 

misericordia y la verdad,

2.16 Esto es, la sabiduría


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Proverbios 4:2

653

Átalas a tu cuello, escríbelas en la 

tabla de tu corazón,

4

    Y hallarás gracia y buena opinión

Ante los ojos de Dios y del hombre.

5

    Confía en YHVH con todo tu 

corazón,

Y no te apoyes en tu propia 

inteligencia.

6

    Reconócelo en todos tus caminos,

Y Él enderezará tus sendas.

7

    No seas sabio en tu propia opinión.

Teme a YHVH, y apártate del mal,

8

    Porque será medicina a tu ombligo,

Y tuétano a tus huesos.

9

    Honra a YHVH con tus bienes,

Y con las primicias de todos tus 

frutos,

10

    Y tus graneros se henchirán de 

abundancia,

Y tus lagares rebosarán de mosto.

11

    Hijo mío, no menosprecies el 

castigo de YHVH,

Ni te fatigues de su corrección,

12

    Porque YHVH al que ama 

disciplina,

Como el padre al hijo en quien se 

complace.

13

    Bienaventurado el hombre que halla 

la sabiduría,

Y el mortal que obtiene la 

inteligencia.

14

    Porque su provecho es mayor que el 

de la plata,

Y su resultado es mejor que el oro 

fino.

15

    Es más preciosa que las piedras 

preciosas,

Nada de lo que desees puede 

compararse con ella.

16

    En su diestra hay abundancia de 

días,

Y en su izquierda, riquezas y 

honra.

17

    Sus caminos son caminos 

deleitosos,

Y todas sus sendas son sendas de 

paz.

18

    Es árbol de vida a los que echan 

mano de ella,

Y los que la retienen son 

bienaventurados.

19

    YHVH fundó la tierra con sabiduría,

Y con inteligencia estableció los 

cielos,

20

    Y por su ciencia fueron divididos los 

abismos,

Y las nubes destilan el rocío.

21

    Hijo mío, no se aparten estas cosas 

de tus ojos,

Guarda la prudencia y el 

discernimiento,

22

    Y serán vida a tu alma,

Y gracia a tu garganta.

23

    Entonces andarás con seguridad en 

tu camino,

Y tu pie no tropezará.

24

    Cuando te acuestes, no tendrás 

temor,

Te acostarás, y tu sueño será dulce.

25

    No temerás el pavor repentino,

Ni el ataque de los impíos cuando 

venga,

26

    Porque YHVH será tu confianza,

Y Él guardará tu pie para que no sea 

atrapado.

27

    No niegues el bien a quien es 

debido,

Cuando está en tu mano el hacerlo.

28

    No digas a tu prójimo: Anda y ven de 

nuevo, que mañana te lo daré,

Cuando contigo tienes qué darle.

29

    No trames el mal contra el prójimo

Que habita confiado junto a ti.

30

    No tengas pleito con nadie sin 

causa,

Si no te ha hecho agravio.

31

    No envidies al hombre violento,

Ni escojas ninguno de sus caminos,

32

    Porque YHVH aborrece al perverso,

Y su íntima comunión es con los 

rectos.

33

    La maldición de YHVH gravita sobre 

la casa del impío,

Al paso que bendice la morada de los 

justos.

34

    Ciertamente a los escarnecedores 

escarnece,

Y da gracia a los humildes.

35

    Los sabios heredarán honra,

Los necios, ignominia.

Beneficios de la sabiduría

4

 Oíd, hijos, la instrucción de un 

    padre,

Y estad atentos para adquirir 

entendimiento,

2

    Porque os doy buena doctrina;

No abandonéis mis enseñanzas,


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Proverbios 4:3

654

3

    Porque yo fui hijo predilecto° de mi 

padre,

Delicado y único delante de mi 

madre,

4

    Y él me enseñaba y me decía:

Retenga tu corazón mis palabras,

Guarda mis mandamientos, y 

vivirás.

5

    Adquiere sabiduría, adquiere 

inteligencia,

No te olvides ni te apartes de los 

dichos de mi boca,

6

    No la° abandones, y ella te guardará,

Ámala, y te preservará.

7

    Sabiduría ante todo, adquiere 

sabiduría,

Y sobre toda posesión tuya adquiere 

inteligencia.

8

    Engrandécela, y ella te 

engrandecerá,

Cuando tú la hayas abrazado, ella te 

honrará.

9

    Dará a tu cabeza una guirnalda de 

gracia,

Y te entregará una corona de gloria.

10

    Oye, hijo mío, y recibe mis razones,

Y se te multiplicarán años de vida.

11

    Te he encaminado por el camino de 

la sabiduría,

Y te he hecho andar por sendas de 

rectitud.

12

    En tu caminar no se estrecharán tus 

pasos,

Y si corres, no tropezarás.

13

    Aférrate a la corrección, no la 

abandones,

Guárdala, porque ella es tu vida.

14

    No entres por el camino del impío,

Ni vayas por la senda de los malos.

15

    Esquívalo, no pases por él,

Desvíate de él, pasa de largo.

16

    Porque ellos no duermen si no 

hacen daño,

Y se les quita el sueño si no hacen 

caer a alguien.

17

    Porque comen pan de iniquidad,

Y beben vino de violencia.

18

    Pero la senda de los justos es como 

la luz de la aurora,

Que va en aumento hasta que el día 

es perfecto.

19

    El camino de los impíos es como la 

oscuridad:

No saben en qué tropiezan.

20

    Hijo mío, considera mis palabras,

Inclina tu oído a mis razones,

21

    No se aparten de tus ojos,

Guárdalas en medio de tu corazón.

22

    Pues son vida a los que las hallan,

Y sanidad a toda su carne.

23

    Sobre toda cosa guardada, guarda tu 

corazón,

Porque de él mana la vida.

24

    Aparta de ti la boca perversa,

Y aleja de ti la falsedad de labios.

25

    Tus ojos miren de frente,

Y ábranse tus párpados hacia lo que 

está delante.

26

    Examina la senda de tus pies,

Y sean rectos todos tus caminos.

27

    No te desvíes a diestra ni a siniestra,

Aparta tu pie del mal.

Contra la impureza

5

 Hijo mío, atiende a mi sabiduría, 

E inclina tu oído a mi inteligencia,

2

    Para que guardes discreción,

Y tus labios conserven ciencia:

3

    Los labios de la mujer ajena destilan 

miel,

Y su paladar es más suave que el 

aceite,

4

    Pero su propósito es amargo como 

el ajenjo,

Y agudo como espada de doble filo.

5

    Sus pies descienden a la Muerte,

Sus pasos se precipitan al Seol.

6

    No considera el camino de la vida,

Sus sendas son inestables, pero no 

lo sabe.

7

    Ahora, pues, hijos, oídme,

No os apartéis de los dichos de mi 

boca:

8

    Aleja de ella tu camino,

No te acerques a la puerta de su casa,

9

    No sea que des a otros tu vigor,

Y tus años al cruel.

10

    No sea que los extraños se llenen de 

tu fuerza,

Y tu esfuerzo se quede en casa ajena.

11

    Gemirás cuando te llegue el 

desenlace,

4.3 .predilecto.  4.6 Esto es, la sabiduría.


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Proverbios 6:21

655

Y se consuma la carne de tu cuerpo.

12

    Entonces dirás: ¿Por qué aborrecí la 

corrección,

Y mi corazón menospreció la 

reprimenda?

13

    ¿Por qué no hice caso a mis 

maestros,

Ni presté oído a mis enseñadores?

14

    Casi en el colmo de todo mal he 

estado,

En medio de la asamblea reunida.

15

    ¡Bebe el agua de tu propia cisterna,

Y los raudales de tu propio pozo!

16

    ¿Se habrán de derramar tus fuentes 

por las calles,

Y tus corrientes de aguas por las 

plazas?

17

    ¡Sean solamente tuyos,

Y no de extraños contigo!

18

    ¡Sea bendito tu manantial,

Y alégrate con la mujer de tu 

juventud!

19

    Como hermosa cierva o graciosa 

gacela,

Sus pechos te satisfagan en todo 

tiempo,

Y embriágate siempre con su amor.

20

    ¿Por qué, hijo mío, has de 

enceguecerte por la ajena,

Y abrazar el seno de la que no te 

pertenece?

21

    Porque los caminos del hombre 

están ante los ojos de YHVH,

Y Él observa todas sus sendas.

22

    En su propia iniquidad quedará 

atrapado el inicuo,

Amarrado con la soga de su pecado.

23

    Morirá sin corrección,

Extraviado en la inmensidad de su 

locura.

Contra la pereza y la falsedad

6

 Hijo mío, si has salido fiador por tu 

  vecino,

Dando la mano° a un extraño,

2

    Si te has enredado con tus palabras,

Y has quedado atrapado con los 

dichos de tu boca,

3

    Haz esto ahora hijo mío, y líbrate,

Ya que has caído en la mano de tu 

prójimo:

Ve, humíllate, e importuna a tu 

prójimo.

4

    No concedas sueño a tus ojos,

Ni adormecimiento a tus párpados.

5

    Líbrate como gacela del cazador,

O como pájaro de la trampa.

6

    Observa a la hormiga, oh perezoso,

Mira sus caminos, y sé sabio,

7

    La cual no teniendo capitán,

Ni gobernador, ni soberano,

8

    Prepara en el verano su comida,

Y en el tiempo de la siega guarda su 

sustento.

9

    ¿Hasta cuándo dormirás, oh 

perezoso?

¿Cuándo te levantarás de tu sueño?

10

    Un rato duermes, otro dormitas,

Un rato cruzas los brazos y 

descansas,

11

    Y te llega la miseria del vagabundo,

Y la indigencia del mendigo.°

12

    Hombre de Belial es el hombre 

inicuo,

Que camina torciendo la boca,

13

    Guiñando un ojo, meneando los 

pies,

Señalando con el dedo.

14

    En su corazón hay perversidades,

Maquina maldades, y 

constantemente enciende 

rencillas.

15

    Por tanto su calamidad vendrá de 

repente,

Súbitamente será quebrantado, y no 

habrá remedio.

16

    Seis cosas aborrece YHVH,

Y aun siete abomina su alma:

17

    Ojos altivos, lengua mentirosa,

Manos que derraman sangre 

inocente,

18

    Corazón que maquina planes 

perversos,

Pies presurosos para correr al mal,

19

    Testigo falso que habla mentiras,

Y el que enciende rencillas entre sus 

hermanos.

20

    Hijo mío, guarda el mandamiento 

de tu padre,

Y no abandones la enseñanza de tu 

madre.

21

    Átalos siempre a tu corazón,

6.1 Lit. batiendo palmas.  6.11 Lit. hombre de escudo


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Proverbios 6:22

656

Enlázalos en torno a tu cuello.

22

    Cuando camines, te guiarán,

Cuando descanses, te guardarán,

Y al despertar hablarán contigo.

23

    Porque el mandamiento es lámpara

Y la enseñanza luz,

Y camino de vida la reprensión que 

corrige.

24

    Te guardarán de la mala mujer,

De la blandura de la lengua de la 

mujer ajena.

25

    No codicies en tu corazón su 

hermosura,

Ni te dejes prender por su mirada,°

26

    Porque si la ramera va en busca de 

un trozo de pan,

La adúltera va a la caza de una vida 

preciosa.

27

    ¿Tomará el hombre fuego en su seno,

Sin que sus vestidos ardan?

28

    ¿Andará el hombre sobre las brasas,

Sin que sus pies se quemen?

29

    Así será con el que se llega a la 

mujer de su prójimo,

Ninguno que la toque quedará 

impune.

30

    ¿No se infama el ladrón cuando 

hurta,

Aun para llenar su estómago cuando 

pasa hambre,

31

    Y si es sorprendido, tiene que pagar 

siete veces,

Y entregar todo el haber de su casa?

32

    Pues el adúltero es hombre sin 

cordura,°

Destructor de sí mismo es el que tal 

hace.

33

    Llaga vergonzosa° hallará,

Y su infamia nunca será borrada.

34

    Porque los celos son la ira del 

hombre,

En el día de la venganza no 

perdonará,

35

    Ni considerará rescate alguno;

No querrá perdonar aunque 

aumentes el soborno.

Artimañas de la ramera

7

  Hijo mío, guarda mis dichos,

Y atesora mis mandamientos dentro 

de ti.

2

    ¡Guarda mis mandamientos, y vive!

¡Sí! ¡Guarda mi enseñanza como la 

niña de tus ojos!

3

    ¡Átalos a tus dedos,

Escríbelos en la tabla de tu corazón!

4

    Di a la Sabiduría: Tú eres mi 

hermana,

Y llama a la Inteligencia tu mejor 

amiga,

5

    Para que te guarden de la mujer 

ajena,

De la desconocida de palabras 

seductoras.

6

    Pues cuando desde la ventana de mi 

casa,

Atisbaba entre las celosías,

7

    Vi entre los simples, advertí entre 

los mancebos,

A un joven falto de entendimiento,

8

    Pasando por la calle, junto a su 

esquina,

Y caminando en dirección a casa de 

ella,

9

    Al crepúsculo, cuando ya oscurecía,

En lo profundo de la noche y de las 

tinieblas,

10

    La mujer sale a su encuentro,

Taimada de corazón, ataviada de 

ramera,

11

    Bullanguera y desenfrenada,

Con pies que no saben estarse en 

casa,

12

    Unas veces en la calle, otras en la 

plaza,

Acecha en todas las esquinas.

13

    Se traba de él y lo besa,

Y con rostro impúdico le dice:

14

    Prometí sacrificios de paz,

Y hoy he cumplido mis votos,

15

    Por lo cual salí a tu encuentro,

Ansiosa de verte, y te he hallado.

16

    He tendido mi cama con hermosos 

cobertores,

Recamados con cordoncillo de 

Egipto.

17

    He perfumado mi lecho

Con mirra, áloes, y canela.

18

    Ven, deleitémonos con caricias hasta 

el alba,

Embriaguémonos de amores,

19

    Porque mi marido no está en casa.

6.25 Lit. párpados.  6.32 Lit. corazón.  6.33 Llaga vergonzosa. Esto es, lepra 

→Is.53.8 nota. 


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Proverbios 8:25

657

Ha emprendido un largo viaje,

20

    Ha tomado la bolsa del dinero,

Y hasta el novilunio no regresa.

21

    Lo atrae con la mucha suavidad de 

sus palabras,

Lo seduce con sus labios lisonjeros.

22

    Prontamente él va en pos de ella,

Como buey llevado al matadero,

Como ciervo que se enredó en el 

lazo,

23

    Como ave que se arroja contra la red,

Sin saber que en ello le va la vida,

Hasta que la flecha le traspasa el 

hígado.

24

    Ahora pues, hijos, oídme,

Prestad atención a los dichos de mi 

boca:

25

    No dejes ir tu corazón tras los 

caminos de aquélla,

Ni te extravíes en sus sendas.

26

    Porque ella ha dejado un montón de 

heridos,

Y aun los más fuertes han sido por 

ella muertos.

27

    Su casa es un camino al Seol,

Que desciende a las cámaras de la 

Muerte.

Exclencia y eternidad de la sabiduría

8

  ¿No clama acaso la sabiduría,

Y la inteligencia hace oír su voz?

2

    En las cimas más altas junto al 

camino,

Donde se encuentran las sendas, allí 

está ella.

3

    Junto a las puertas, a la entrada de 

la ciudad,

En la entrada de las puertas grita a 

voces:

4

    ¡A vosotros, hombres, os pregono,

Y mi voz es para los hijos de Adam!

5

    Oh simples, aprended prudencia,

Y vosotros, insensatos, sed de 

corazón inteligente.

6

    Oíd, porque diré cosas excelentes,

Y abriré mis labios para cosas 

rectas.

7

    Mi boca proferirá verdades,

Porque la maldad es abominación 

para mis labios.

8

    Todas las palabras de mi boca 

muestran justicia,

En ellas nada hay perverso ni 

torcido.

9

    Son claras para el que las entiende,

Y rectas a los que hallan el 

conocimiento.

10

    Recibid mi enseñanza y no plata,

Conocimiento, antes que oro fino.

11

    Pues mejor es la sabiduría que las 

perlas,

Y todas las cosas deseables, no se le 

pueden comparar.

12

    Yo, la Sabiduría, habito con la 

prudencia,

Y descubro la perspicacia de los 

artificios.

13

    El temor de YHVH es aborrecer el 

mal.

La soberbia, la arrogancia, el mal 

camino

Y la boca perversa, aborrezco.

14

    Mío es el consejo y la intuición,

Mía es la inteligencia y mía la 

fortaleza.

15

    Por mí reinan los reyes,

Y los príncipes administran justicia.

16

    Por mí gobiernan los gobernantes,

Y los nobles que juzgan con 

justicia.

17

    Yo amo a los que me aman,

Y me hallan los que temprano me 

buscan.

18

    Las riquezas y la honra están 

conmigo.

¡Sí, riquezas y justicia perdurable!

19

    Mi fruto es mejor que el oro.

¡Sí!, mejor que el oro afinado,

Y mi ganancia mejor que la plata 

escogida.

20

    Yo hago andar por sendas de justicia,

En medio de senderos de equidad,

21

    Y hago que los que me aman 

obtengan su heredad.

¡Sí!, para que yo llene sus tesoros.

22

    YHVH me poseía en el principio,

Ya de antiguo, antes de sus obras.

23

    Eternamente estaba establecida,

Ya en el principio,

Antes de los orígenes de la tierra.

24

    Antes de los abismos yo estaba 

engendrada,

Antes que fueran las fuentes de las 

muchas aguas.

25

    Antes que los montes fueran 

fundados,

Antes de los collados, yo estaba 

engendrada.


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Proverbios 8:26

658

26

    No había hecho aún la tierra, ni los 

campos,

Ni el principio del polvo.

27

    Cuando estableció los cielos, allí 

estaba yo,

Cuando trazó el círculo sobre la faz 

del abismo,

28

    Cuando afirmó los cielos en lo alto,

Cuando afirmó las fuentes del 

abismo,

29

    Cuando señaló al mar su estatuto,

Para que las aguas no traspasaran su 

mandamiento,

Cuando estableció los fundamentos 

de la tierra,

30

    Yo estaba junto a Él como 

arquitecto,

Y era su delicia todos los días,

Regocijándome ante Él en todo 

tiempo,

31

    Jugueteando en la parte habitable de 

su tierra,

Y teniendo mis delicias en los hijos 

de Adam.

32

    Ahora pues, hijos, oídme,

Porque los que guardan mis 

caminos son bienaventurados.

33

    Atended el consejo, y sed sabios,

Y no lo menospreciéis.

34

    ¡Cuán bienaventurado es el hombre 

que me escucha,

Vigilando en mis portones cada día,

Aguardando en el umbral de mis 

entradas!

35

    Porque el que me halla, halla la vida,

Y alcanza el favor de YHVH,

36

    Pero el que peca contra mí, defrauda 

su propia alma;

Todos los que me aborrecen aman la 

Muerte.

La sabiduría y la mujer insensata

9

  La Sabiduría edificó su casa,

Labró sus siete columnas,

2

    Degolló sus víctimas,

Mezcló su vino,

Puso su mesa,

3

    Y envió a sus criadas

A pregonarlo por doquier en la 

ciudad:

4

    ¡El que sea simple, venga acá!

Al falto de entendimiento le quiero 

hablar:

5

    ¡Venid, comed de mis manjares,

Y bebed del vino que he mezclado!

6

    ¡Dejad las simplezas y vivid,

Y andad por el camino de la 

inteligencia!

7

    Quien corrige al cínico se acarrea 

insultos,

Quien amonesta al malvado, 

desprecios.

8

    No reprendas al escarnecedor, no sea 

que te aborrezca,

Corrige al sabio, y te amará.

9

    Da al sabio, y será más sabio,

Enseña al justo, y aumentará su 

saber.

10

    El temor de YHVH es el principio de 

la sabiduría,

Y el conocimiento del Santísimo es 

la inteligencia.

11

    Porque por mí se aumentarán tus 

días,

Y años de vida se te añadirán.

12

    Si eres sabio, para tu propio bien lo 

eres,

Y si eres escarnecedor, sólo tú 

llevarás el daño.

13

    La mujer libertina es turbulenta;

Es simple, no conoce la vergüenza.

14

    Se sienta a la puerta de su casa,

O en un asiento en los altos de la 

ciudad,

15

    Para llamar a los que pasan,

A los que van derechos por su senda:

16

    ¡Todos los simples vengan acá!

Y dice a los incautos:

17

    ¡El agua robada es más dulce!

¡El pan a escondidas es más sabroso!

18

    Él no sabe que en su casa moran las 

sombras,

Y sus huéspedes yacen en la 

profundidad del Seol.

Contrastes

10

Proverbios de Salomón.

El hijo sabio alegra al padre,

Pero el hijo necio es tristeza de su 

madre.°

2

    Los tesoros de impiedad no son de 

provecho,

10.1 Este paralelismo expresa la alegría o tristeza de ambos padres

→15.20; 23.24; 30.17. 


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Proverbios 11:2

659

Pero la justicia libra de la Muerte.

3

    YHVH no deja padecer hambre al 

alma del justo,

Pero impide que se sacie la avidez de 

los malvados.

4

    La mano negligente empobrece,

Pero la mano de los diligentes 

enriquece.

5

    El que recoge en verano es hijo 

sensato,

Pero el que ronca en la siega es hijo 

que avergüenza.

6

    Hay bendiciones sobre la cabeza del 

justo,

Pero la boca de los malvados oculta 

violencia.

7

    La memoria del justo será bendita,

Pero el nombre de los impíos se 

pudrirá.

8

    El sabio de corazón acepta los 

mandamientos,

Pero el insensato de labios se hunde.

9

    El que camina en integridad anda 

confiado,

Pero el que pervierte sus caminos 

será puesto en descubierto.

10

    El que guiña el ojo acarrea tristeza,

Y el necio de labios será castigado.

11

    La boca del justo es manantial de 

vida,

Pero la boca de los impíos oculta 

violencia.

12

    El odio suscita rencillas,

Pero el amor cubre toda suerte de 

ofensas.

13

    La sabiduría está en los labios del 

prudente,

Pero la vara es para la espalda del 

insensato.

14

    Los sabios atesoran conocimiento,

Pero la boca del necio es calamidad 

cercana.

15

    La riqueza del rico es su torre fuerte,

La ruina de los pobres es su 

pobreza.

16

    El salario del justo es para vida,

El lucro del impío, para pecado.

17

    El que acepta la instrucción va en la 

senda de la vida,

Pero quien desecha la reprensión, 

yerra.

18

    Los labios rectos aplacan el odio,

Pero el que esparce calumnia es 

un necio.

19

    En las muchas palabras no falta 

pecado,

Pero el que refrena sus labios es 

prudente.

20

    La lengua del justo es plata pura,

Pero el corazón del malvado nada 

vale.

21

    Los labios del justo nutren a 

muchos,

Pero los necios mueren por falta de 

entendimiento.

22

    La bendición de YHVH es la que 

enriquece,

Y no añade tristeza con ella.

23

    El necio se divierte con las trampas,

El hombre prudente, con la 

sabiduría.

24

    Lo que teme el malvado, eso le 

vendrá,

Pero el deseo de los justos les es 

concedido.

25

    Cual pasa el torbellino, desaparece 

el malo,

Pero el justo permanece para siempre.

26

    Vinagre a los dientes y humo a los 

ojos,

Así es el perezoso para quienes lo 

comisionan.

27

    El temor de YHVH aumenta los días,

Pero los años de los malvados serán 

acortados.

28

    La esperanza de los justos es alegre,

Pero la esperanza de los impíos 

perecerá.

29

    El camino de YHVH es refugio para 

el íntegro,

Pero ruina para los malhechores.

30

    El justo no será removido jamás,

Pero los malvados no habitarán la 

tierra.

31

    De la boca del justo brota sabiduría,

Pero la lengua perversa será 

cortada.

32

    Los labios del justo destilan 

benevolencia,

Pero la boca de los impíos, maldad.

11

La balanza falsa es abominación a 

YHVH,

Pero la pesa cabal es su 

complacencia.

2

    Si irrumpe la soberbia, sobreviene la 

deshonra,

Pero la sabiduría acompaña a los 

humildes.


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Proverbios 11:3

660

3

    La integridad de los rectos los 

encamina,

Pero a los pecadores los destruye su 

propia maldad.

4

    De nada sirven riquezas en el día de 

la ira,

Pero la justicia librará de la Muerte.

5

    La justicia del justo le allana el 

camino,

Pero el impío caerá por su propia 

impiedad.

6

    La rectitud del justo lo librará,

Pero el traidor quedará atrapado en 

su codicia.

7

    Muerto el impío, muerta su 

esperanza:

La expectación de los malvados 

perecerá.

8

    El justo es librado de la tribulación,

Y el impío entra en lugar suyo.

9

    El hipócrita hunde al prójimo con 

su boca,

Pero los honrados se libran porque 

lo saben.

10

    La ciudad festeja el éxito de los 

justos,

Y cuando fracasan los impíos, canta 

de júbilo.

11

    Con la bendición de los rectos la 

ciudad prospera,

Pero la boca de los impíos la 

arruina.

12

    Quien desprecia al prójimo no tiene 

juicio,

Pero el prudente calla.

13

    El que anda chismeando, descubre 

el secreto,

Pero el hombre de fiar se guarda el 

asunto.

14

    Por falta de dirección se arruina un 

pueblo,

Pero en la multitud de consejeros 

hay seguridad.

15

    Quien sale fiador del extraño se 

perjudica,

Pero el que aborrece las fianzas vive 

seguro.

16

    La mujer agraciada adquiere honra,

Así como los fuertes adquieren 

riquezas.

17

    El misericordioso hace bien 

a su alma,

Pero el cruel daña su propia carne.

18

    El malvado logra ganancias 

engañosas,

Pero quien siembra justicia tiene 

galardón seguro.

19

    La firmeza de rectitud tiende a la 

vida,

Pero quien anda tras la maldad, 

persigue su propia muerte.

20

    Abominación a YHVH son los de 

corazón perverso,

Pero los de camino intachable son 

su deleite.

21

    Con toda certeza°, el malo no 

quedará sin castigo,

Pero la descendencia de los justos 

será librada.

22

    Como zarcillo de oro en hocico de 

un cerdo,

Es la mujer hermosa que carece de 

discreción.

23

    El anhelo de los justos es sólo el 

bien,

Pero la expectativa de los impíos es 

la ira.

24

    Hay quienes reparten, y más se les 

añade,

Y hay quienes retienen más de 

lo justo, y terminan en la 

indigencia.

25

    El alma generosa será saciada,

Y el que sacia a otros, también él 

será saciado.

26

    El que acapara trigo será maldecido 

por el pueblo,

Pero la cabeza de quien lo vende 

obtendrá bendición.

27

    El que busca el bien, busca el favor 

divino,°

Pero el que busca el mal, éste le 

sobrevendrá.

28

    El que confía en sus riquezas, caerá,

Pero los justos reverdecerán como 

el follaje.

29

    El que conturba su casa, heredará el 

viento,

Y el necio se tornará esclavo del 

sabio de corazón.

30

    El fruto del justo es árbol de vida,

Y el que gana almas, es sabio.

11.21 Lit. mano a mano  11.27 .divino


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Proverbios 12:28

661

31

    He aquí el justo será recompensado 

en la tierra,

¡Cuánto más el malo y el pecador!

12

El que ama la corrección ama el 

conocimiento,

Pero el que aborrece la reprensión 

es necio.

2

    El bueno alcanzará el favor de YHVH,

Pero Él condenará al hombre de 

malos designios.

3

    El hombre no se afianzará por 

medio de la impiedad,

Pero la raíz de los justos nunca será 

removida.

4

    La mujer virtuosa es corona de su 

marido,

Pero la que lo avergüenza, como 

carcoma en sus huesos.

5

    Los pensamientos de los justos son 

rectitud,

Pero los consejos de los impíos, 

engaño.

6

    Las palabras del malvado son 

asechanzas mortales,

Pero a los rectos los libra su propia 

boca.

7

    Se derrumban los malvados, y ya no 

existen,

Pero la casa de los justos 

permanecerá.

8

    Conforme a su sabiduría es alabado 

el hombre,

Pero el perverso de corazón será 

despreciado.

9

    Más vale el modesto, pero que tiene 

servidor,

Que el que se alaba, y carece de pan.

10

    El justo atiende al sustento de su 

bestia,

Pero aun° las compasiones de los 

inicuos son crueles.

11

    El que labra su tierra, se saciará de 

pan,

Pero el que persigue lo vano carece 

de entendimiento.

12

    El impío codicia el botín de los 

malvados,

Pero la raíz de los justos da fruto.°

13

    En la falsedad de sus labios se 

enreda el malvado,

Pero el justo saldrá de la tribulación.

14

    De lo que uno habla, se saciará,

Y de lo que uno hace, le pagarán.

15

    El camino del necio es recto ante 

sus propios ojos,

Pero el que escucha el consejo es 

sabio.

16

    El necio manifiesta su ira al 

instante,

Pero el prudente pasa por alto la 

injuria.

17

    El testigo veraz declara con justicia,

El testigo falso, con mentira.

18

    Hay quien profiere palabras como 

estocadas,

Pero la lengua de los sabios es 

medicina.

19

    El labio veraz permanece para 

siempre,

Pero la lengua mentirosa por un 

instante.

20

    Hay engaño en el corazón del que 

trama el mal,

Mas para los consejeros de la paz 

hay alegría.

21

    Ninguna iniquidad es deseada por el 

justo,

Pero los malvados están colmados 

por el mal.

22

    Abominación a YHVH es el labio 

mentiroso,

Pero su deleite está en los que obran 

fielmente.

23

    El hombre prudente encubre su 

conocimiento,

Pero el corazón de los necios hace 

pública su necedad.

24

    La mano del diligente señoreará,

Mas las indolentes serán tributarias.

25

    La congoja abate el corazón del 

hombre,

Pero la buena palabra lo alegra.

26

    El justo sirve de guía a su prójimo,

Pero el camino de los malvados los 

hace errar.

27

    ¡Ni su propia presa asará el 

indolente!

¡Precioso tesoro del hombre es la 

diligencia!

28

    En la senda de la justicia está la 

vida,

En su sendero no hay muerte.

12.10 .aun.  12.12 .fruto


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Proverbios 13:1

662

13

El hijo sabio toma consejo del 

  padre,

Pero el burlador no escucha la 

reprensión.

2

    Del fruto de su boca el hombre 

comerá el bien,

Pero el alma de los traidores se 

hartará de violencia.

3

    El que guarda su boca guarda su 

alma,

Pero el que suelta sus labios tendrá 

calamidad.

4

    El alma del perezoso desea, y nada 

alcanza,

Pero el alma del diligente será 

gratificada.

5

    El justo aborrece la palabra de 

mentira,

Pero el malvado se hace odioso e 

infame.

6

    La justicia guarda al de perfecto 

camino,

Pero la impiedad trastornará al 

pecador.

7

    Hay quienes se enriquecen, y nada 

tienen,

Y hay quienes se hacen pobres, y 

tienen grandes riquezas.

8

    La redención de la vida del hombre 

puede ser su riqueza,°

Pero el pobre no escucha censuras.

9

    La luz de los justos difunde alegría,

Pero la lámpara de los impíos será 

apagada.

10

    Con la soberbia sólo se provoca 

contienda,

Pero con los bien aconsejados está la 

sabiduría.

11

    Fortuna sin esfuerzo se desvanece,

Pero el que recoge con mano 

laboriosa, la aumenta.

12

    La esperanza que tarda es tormento 

del corazón,

Pero árbol de vida es el deseo 

cumplido.

13

    El que menosprecia la Palabra, 

perecerá por ello,

Pero el que teme el mandamiento 

será recompensado.

14

    La enseñanza del sabio es manantial 

de vida,

Que aparta de los lazos de la Muerte.

15

    El buen entendimiento confiere 

gracia,

Pero el camino de los transgresores 

va a la ruina.

16

    El sagaz actúa con prudencia,

Pero el necio hace manifiesta su 

necedad.

17

    El mensajero malvado caerá en 

desgracia,

Pero el enviado fiel es medicina.

18

    Miseria y oprobio para quien 

rechaza la corrección,

Pero el que guarda el consejo, será 

honrado.

19

    El deseo cumplido deleita el alma,

Apartarse del mal es abominación a 

los necios.

20

    Quien con sabios anda, sabio será,

Pero el que se allega a necios, se 

echa a perder.

21

    La desgracia persigue a los pecadores,

A los justos, la paz y el bien.

22

    La herencia del bueno queda en su 

familia,

Pero la riqueza del pecador está 

reservada al justo.

23

    El barbecho de los pobres abunda en 

alimento,

Pero se puede perder por falta de 

justicia.

24

    El que escatima el castigo aborrece 

a su hijo,

El que lo ama, temprano lo corrige.

25

    El justo come y sacia su apetito,

Pero el vientre de los impíos padece 

escasez.

14

La mujer sabia edifica su casa,

La necia con sus manos la derriba.

2

    El que anda en su rectitud teme a 

YHVH,

Pero el de caminos torcidos lo 

desprecia.

3

    De la boca del necio brota la vara de 

la soberbia,

Pero los sabios son preservados por 

sus labios.

4

    Donde no hay bueyes el establo está 

limpio,

Pero mucho rendimiento hay por la 

fuerza del buey.

13.8 

→Lc.16.1-9.


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Proverbios 14:35

663

5

    El testigo veraz no miente,

El testigo falso respira mentiras.

6

    El burlador busca la sabiduría, y no 

la halla,

Pero el conocimiento es fácil para 

quien tiene discernimiento.

7

    Apártate de la presencia del necio,

No percibirás en él labios sabios.

8

    Discernir el camino es sabiduría del 

sagaz,

Pero la necedad de los necios es 

puro engaño.

9

    Se burla el necio del pecado,

Pero con los rectos hay 

complacencia.

10

    El corazón conoce su propia 

amargura,

Y en su alegría no participa el 

extraño.

11

    La casa de los malvados será asolada,

Pero la tienda de los rectos florecerá.

12

    Hay camino que al hombre parece 

derecho,

Pero su fin es camino de muerte.

13

    También entre risas llora el corazón,

Y la alegría termina en aflicción.

14

    El insensato se hartará de sus 

propios caminos,

Pero el hombre bueno estará 

satisfecho con el suyo.

15

    El simple cree cualquier cosa,

Pero el prudente mide bien sus 

pasos.

16

    El sabio teme y se aparta del mal,

Mas el necio se lanza confiado.

17

    El rápido en iras obra neciamente,

Y el hombre malicioso será 

aborrecido.

18

    Los simples se adornan con la 

necedad,

Pero el prudente se corona de 

conocimiento.

19

    Los malos se inclinarán ante los 

buenos,

Y los impíos ante las puertas del 

justo.

20

    El pobre es odioso aun a sus 

parientes,

Pero muchos son los que aman al 

rico.

21

    El que menosprecia a su 

prójimo peca,

Pero el que se compadece de los 

pobres es bienaventurado.

22

    ¿No yerran los que piensan mal?

Pero misericordia y verdad 

experimentan° quienes meditan 

en el bien.

23

    En toda labor hay fruto,

Pero la charlatanería sólo trae 

indigencia.

24

    Corona de los sabios es su 

inteligencia,°

Pero la insensatez de los necios es 

locura.

25

    El testigo veraz libra las almas,

Pero el impostor respira mentiras.

26

    En el temor de YHVH hay fuerte 

confianza,

Que servirá de refugio a los hijos.

27

    El temor de YHVH es manantial de 

vida,

Que aparta de los lazos de la Muerte.

28

    En la multitud de pueblo está la 

gloria del rey,

Y en la falta de pueblo la flaqueza del 

príncipe.

29

    El que tarda en airarse es rico en 

entendimiento,

Pero el impaciente de espíritu exalta 

la necedad.

30

    Un corazón apacible es vida para el 

cuerpo,

Pero la envidia es carcoma en los 

huesos.

31

    El que oprime al menesteroso 

afrenta a su Hacedor,

Pero lo honra quien se apiada del 

pobre.

32

    Por su propia maldad será derribado 

el impío,

Pero el justo tiene esperanza aun en 

su muerte.

33

    En el corazón del que discierne 

reposa la sabiduría,

Aun en medio de necios se da a 

conocer.

34

    La justicia enaltece a una nación,

Pero el pecado es afrenta de los 

pueblos.

35

    La benevolencia del rey es para con 

el servidor prudente,

14.22 .experimentan.  14.24 Lit. riquezas.


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Proverbios 15:1

664

Pero su enojo contra el que lo 

avergüenza.

15

La blanda respuesta aplaca la ira,

Pero la palabra hiriente hace subir 

el furor.

2

    La lengua de los sabios destila 

ciencia,

La boca de los necios profiere 

sandeces.

3

    Los ojos de YHVH están en todo 

lugar,

Escrutando a malos y buenos.

4

    Árbol de vida es la lengua apacible,

Pero la perversa hiere en lo vivo.

5

    El necio desprecia el consejo de su 

padre,

Pero el que guarda la corrección, se 

hace sagaz.

6

    En la casa del justo hay muchos 

bienes,

Pero en las ganancias del malvado, 

desbarajuste.

7

    Los labios de los sabios esparcen 

ciencia,

No así el corazón de los necios.

8

    Abominación a YHVH es el sacrificio 

de los impíos,

Pero la oración de los rectos es su 

deleite.

9

    YHVH aborrece el camino del 

malvado,

Pero ama a quien va en pos de la 

justicia.

10

    La reconvención molesta al que 

abandona el camino,

El que aborrece la corrección morirá.

11

    El Seol y el Abadón están delante de 

YHVH,

¡Cuánto más los corazones de los 

hijos del hombre!

12

    El escarnecedor no ama al que lo 

reprende,

Ni frecuenta a los sabios.

13

    Un corazón alegre hermosea el 

rostro,

Pero el dolor del corazón abate el 

ánimo.

14

    El corazón entendido busca la 

sabiduría,

Pero la boca de los necios se 

apacienta de necedad.

15

    Todos los días del desdichado son 

difíciles,

Pero el de corazón alegre tiene un 

banquete continuo.

16

    Más vale poco con el temor de 

YHVH,

Que grandes tesoros con sobresaltos.

17

    Mejor es ración de legumbres donde 

hay amor,

Que buey engordado donde hay 

rencor.

18

    El hombre iracundo provoca 

contiendas,

Pero el que tarde se enoja, apacigua 

la rencilla.

19

    El camino del perezoso es como seto 

de espinos,

Pero la senda de los rectos es llana.

20

    El hijo sabio alegra al padre,

Pero el hombre necio es deshonra de 

su madre.

21

    La necedad divierte al falto de 

entendimiento,

Pero el hombre inteligente endereza 

su andar.

22

    Los planes fracasan cuando no se 

delibera,

Pero resultan a fuerza de consejeros.

23

    ¡Qué alegría saber qué responder!

¡Cuán buena es la palabra oportuna!

24

    El prudente sube por el camino de 

la vida,

Que lo aparta de la bajada al Seol.

25

    YHVH arranca la casa del soberbio,

Y planta la heredad de la viuda.

26

    Aborrece YHVH los pensamientos 

del malvado,

Puros le son en cambio los dichos 

placenteros.

27

    El que aspira a ganancias 

deshonestas arruina su casa,

Pero el que aborrece el soborno 

vivirá.

28

    La mente honrada medita la 

respuesta,

Pero la boca del inicuo derrama 

cosas malas.

29

    YHVH está lejos de los malvados,

Pero escucha la oración de los 

justos.

30

    La mirada serena alegra el corazón,

Y una buena noticia da vigor a los 

huesos.

31

    Oído que oye sana reprensión,

Se hospedará entre los sabios.


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Proverbios 16:29

665

32

    Quien rechaza la corrección 

menosprecia su alma,

Quien escucha la amonestación 

adquiere cordura.

33

    El temor de YHVH es escuela de 

sabiduría,

Y antes del honor está la humildad.

Sobre la vida y la conducta

16

Del hombre son las disposiciones 

  del corazón,

Pero de YHVH la respuesta de la 

lengua.

2

    Todos los caminos del hombre son 

limpios en su propia opinión,

Pero YHVH pesa los espíritus.

3

    Encomienda a YHVH tus obras,

Y tus pensamientos serán afirmados.

4

    Todas las cosas las hizo YHVH para 

sí mismo,

Aun al impío para el día malo.

5

    Abominación a YHVH es todo altivo 

de corazón,

Tarde o temprano, no quedará 

impune.

6

    Por la misericordia y la verdad se 

expía el pecado,

Y mediante el temor de YHVH se 

aparta uno del mal.

7

    Cuando los caminos del hombre 

agradan a YHVH,

Él hace que sus enemigos estén en 

paz con él.

8

    Más vale poco con justicia,

Que muchas ganancias injustas.

9

    El corazón del hombre traza su 

camino,

Pero YHVH establece sus pasos.

10

    Hay un oráculo en los labios del rey,

Su boca no yerra en la sentencia.

11

    Peso y balanzas justas son de YHVH,

Todas las pesas de la bolsa son obra 

suya.

12

    Abominable cosa es que los reyes 

obren con maldad,

Porque el trono se afianza con la 

justicia.

13

    Los reyes aprueban los labios 

sinceros,

Y aman a quien habla rectamente.

14

    La ira del rey es heraldo de muerte,

Pero el hombre sensato logrará 

aplacarlo.

15

    En la serenidad del rostro del rey 

está la vida,

Y su benevolencia es como nube de 

lluvia tardía.

16

    Mejor es adquirir sabiduría que oro,

Más vale comprar prudencia que 

plata.

17

    El camino de los rectos es apartarse 

del mal,

El que guarda su camino guarda su 

alma.

18

    Antes del quebrantamiento viene la 

soberbia,

Y antes de la caída, la altivez de 

espíritu.

19

    Más vale ser humilde con los pobres,

Que repartir despojos con los 

soberbios.

20

    El que atiende la Palabra hallará el 

bien,

Y el que confía en YHVH es 

bienaventurado.

21

    El sabio de corazón será llamado 

prudente,

Y la dulzura de labios aumentará la 

doctrina.

22

    Manantial de vida es la sensatez para 

el que la posee,

Pero la erudición de los necios es 

necedad.

23

    El corazón del sabio hace prudente 

su boca,

Y sus labios aumentan la doctrina.

24

    Panal de miel son los dichos 

agradables.

Dulces para el alma y saludables 

para los huesos.

25

    Hay camino que al hombre parece 

derecho,

Pero su fin es camino de muerte.

26

    El alma del que trabaja, para sí 

trabaja,

Porque su boca lo constriñe.

27

    El hombre perverso cava el mal,

Y lleva en sus labios fuego abrasador.

28

    El hombre perverso levanta 

contienda,

Y el chismoso divide a los mejores 

amigos.

29

    El hombre violento seduce a su 

prójimo,

Para conducirlo por camino 

no bueno,


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Proverbios 16:30

666

30

    El que guiña los ojos, trama intrigas,

El que frunce los labios, ya hizo el 

mal.

31

    Corona de honra es la cabeza cana,

Cuando está en el camino de justicia.

32

    Más vale paciencia que valentía,

Y dominarse que conquistar una 

ciudad.

33

    Las suertes se echan en el regazo,

Pero la decisión es de YHVH.

17

Más vale un bocado seco y en paz,

Que casa de comilonas con 

contiendas.

2

    El siervo prudente se impondrá al 

hijo indigno,

Y entre los hermanos compartirá la 

herencia.

3

    El crisol para la plata y la hornaza 

para el oro,

Así YHVH prueba los corazones.

4

    El malvado hace caso al labio 

maldiciente,

Y el mentiroso escucha la lengua 

detractora.

5

    El que escarnece al pobre, afrenta a 

su Hacedor,

Quien se alegra de la desgracia no 

quedará impune.

6

    Corona de los ancianos son los hijos 

de los hijos,

Honra de los hijos son los padres.

7

    No conviene al necio la 

grandilocuencia°,

¡Cuánto menos al príncipe el labio 

mentiroso!

8

    El soborno le parece piedra mágica 

al que lo da:

Consigue cuanto se propone.

9

    Quien busca amistad encubre la falta,

Pero el que reitera la acción, aparta 

al amigo.

10

    Una sola reprensión aprovecha al 

prudente

Más que cien golpes al imprudente.

11

    El rebelde no busca sino camorra,

Por lo que le será enviado un 

implacable alguacil.

12

    Mejor toparse con una osa despojada 

de su cría,

Que con un necio empeñado en su 

necedad.

13

    Quien paga mal por bien,

El mal no se apartará de su casa.

14

    Suelta el chorro el que comienza 

una riña,

Antes de enzarzarte, abandona la 

porfía.

15

    El que justifica al impío, y el que 

condena al justo,

Ambos igualmente son abominación 

a YHVH.

16

    ¿A qué el dinero en mano del necio 

para adquirir sabiduría, si no 

tiene entendimiento?

17

    En todo tiempo ama el amigo,

Y el hermano nace para el tiempo de 

adversidad.

18

    Anda falto de juicio quien da presto 

la mano,

Saliendo fiador de su vecino.

19

    El que ama la disputa, ama la 

transgresión,

Y quien abre mucho la puerta, busca 

su propia ruina.

20

    El corazón tortuoso nunca hallará 

el bien,

Y el de lengua retorcida caerá en la 

desgracia.

21

    El que engendra a un insensato, para 

su propia tristeza lo engendra,

Y el padre de un necio no tendrá 

alegría.

22

    El corazón alegre es una buena 

medicina,

Pero el espíritu quebrantado seca los 

huesos.

23

    El malvado recibe el soborno bajo 

cuerda,

Para torcer el curso de la justicia.

24

    En el rostro del inteligente se 

muestra la sabiduría,

Pero los ojos del necio vagan al 

infinito.

25

    El hijo necio es pesadumbre del padre,

Y amargura de la que lo concibió.

26

    Ciertamente no es bueno condenar 

al justo,

Ni herir a la gente noble que hace lo 

recto.

27

    El que mide sus palabras sabe lo que 

hace,

No se acalora el hombre prudente.

17.7 Heb. Safat-yeter = demasiada lengua.


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Proverbios 19:7

667

28

    Aun el necio cuando calla es tenido 

por sabio,

El que cierra sus labios es 

entendido.

18

El hombre esquivo anda en pos de 

sus caprichos,

Y se encoleriza contra todo buen 

consejo.

2

    El necio no se deleita en la 

discreción,

Sino en publicar lo que piensa.

3

    A la desgracia sobreviene el 

desprecio,

Y a la deshonra, la afrenta.

4

    Las palabras del sabio son aguas 

profundas,

Torrente caudaloso, manantial de 

sensatez.

5

    No es bueno favorecer al culpable,

Para torcer el derecho del inocente.

6

    Los labios del necio provocan 

contienda,

Y su boca clama por azotes.

7

    La boca del necio es su propia ruina,

Y sus labios, lazo para su alma.

8

    Las palabras del chismoso son 

manjares,

Que penetran hasta el fondo de sus 

entrañas.

9

    El negligente en su obra,

Es hermano del disipador.

10

    Torre fuerte es el nombre de YHVH,

A ella corre el justo y es inaccesible.

11

    Las riquezas del rico son su ciudad 

fortificada,

Como un alto muro en su 

imaginación.

12

    Antes del quebrantamiento el 

corazón del hombre es altivo:

A la honra precede la humildad.

13

    El que responde antes de escuchar,

Sufrirá el sonrojo de su necedad.

14

    El buen ánimo sostiene en la 

enfermedad,

Pero el ánimo abatido, ¿quién lo 

soportará?

15

    El corazón del entendido adquiere 

sabiduría,

Y el oído de los sabios busca la 

ciencia.

16

    Los regalos abren paso al hombre,

Y lo conducen ante la presencia de 

los grandes.

17

    El primero que se defiende parece 

tener razón,

Hasta que llega el otro y le contradice.

18

    Echar suerte pone fin al pleito,

Y decide entre los poderosos.

19

    El hermano ofendido es más tenaz 

que un castillo fuerte,°

Y los litigios entre hermanos son 

como cerrojos de fortaleza.

20

    El vientre del hombre será llenado 

con el fruto de su boca,

Del producto de sus labios será 

saciado.

21

    La muerte y la vida están en poder 

de la lengua:

Lo que escoja, eso comerá.°

22

    El que halla mujer halla el bien,

Y una benevolencia ha obtenido de 

YHVH.

23

    El pobre habla suplicando,

El rico responde con durezas.

24

    Hay amigos para ruina del hombre,

Pero hay un amigo más unido que 

un hermano.

19

Más vale pobre que anda en su 

integridad,

Que rico° fatuo de labios y al mismo 

tiempo necio.

2

    De nada vale el empeño sin 

reflexión:

El que apremia el paso, tropieza.

3

    La insensatez del hombre tuerce su 

camino,

Y luego, su corazón se irrita contra 

YHVH.

4

    Mientras más riquezas más amigos,

Pero el pobre es abandonado hasta 

por su amigo.

5

    El testigo falso no se irá sin castigo,

Y el que alienta mentiras no 

escapará.

6

    Muchos buscan el favor del 

generoso,

Y todos son amigos del hombre 

que da.

7

    Todos los hermanos del pobre lo 

aborrecen,

¡Cuánto más se distanciarán de él 

sus amigos!

18.19 Es decir, es tan difícil de convencer como conquistar una fortaleza.  18.21 

→Dt.30.15.  19.1 .rico


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Proverbios 19:8

668

Los persigue con sus letanías, pero 

ya se han ido.

8

    El que adquiere cordura se ama a sí 

mismo,

Al que guarda la prudencia le irá 

bien.

9

    El testigo falso no se irá sin castigo,

Y el que alienta mentiras perecerá.

10

    El lujo no conviene al insensato,

¡Cuánto menos al siervo tener 

dominio sobre príncipes!

11

    La cordura del hombre detiene su 

furor,

Y su honra es pasar por alto la 

ofensa.

12

    Rugido de león es la ira del rey,

Rocío sobre la hierba su favor.

13

    El hijo necio es desgracia del 

padre,

Y gotera continua las contiendas de 

una mujer.

14

    Casa y fortuna son herencia de los 

padres,

Pero la mujer prudente es un don de 

YHVH.

15

    La pereza hace caer en sueño 

profundo:

El alma ociosa pasará hambre.

16

    El que guarda el mandamiento, 

guarda su vida,

Pero el que menosprecia sus 

caminos, morirá.

17

    El que da al pobre presta a YHVH,

Y Él se lo devolverá.

18

    Castiga a tu hijo mientras hay 

esperanza,

Pero no desee tu alma causarle la 

muerte.

19

    El hombre de grandes iras sufrirá 

castigo,

Y el que se interponga será castigado 

también.

20

    Escucha el consejo y acepta la 

corrección,

Para que llegues a ser sabio.

21

    Muchos designios hay en el corazón 

del hombre,

Pero el propósito de YHVH es el que 

prevalece.

22

    Lo que los hombres aprecian es la 

lealtad:

Es preferible ser pobre que traidor.

23

    El temor de YHVH es para vida,

El que lo tiene vivirá satisfecho,

Y no será visitado por el mal.

24

    El perezoso mete la mano en el 

plato,

Y le fatiga aun llevarla a su boca.

25

    Golpea al burlador, y el simple se 

hará prudente,

Corrige al inteligente, y aumentará 

su saber.

26

    El que roba a su padre y echa fuera a 

su madre,

Es hijo que trae vergüenza y 

deshonra.

27

    Hijo mío, deja de oír consejos

Que te apartan de las palabras de 

sabiduría.

28

    El testigo perverso se burla de la 

justicia,

Y la boca de los impíos encubre la 

iniquidad.

29

    Hay castigos preparados para los 

burladores,

Y azotes para la espalda del necio.

20

El vino es pendenciero, 

alborotador el licor:

El que se tambalea con ellos no es 

sabio.

2

    Como rugido de león es el terror del 

rey,

El que provoca su ira, expone su 

propia vida.

3

    Honra del hombre es evitar la 

contienda,

Pero todo insensato se envolverá en 

ella.

4

    En otoño no ara el holgazán,

Rebuscará en la cosecha, pero no 

hallará nada.

5

    Agua profunda es el consejo en el 

corazón del hombre,

El hombre entendido logrará 

sacarlo.

6

    Muchos proclaman sus propias 

bondades,

Pero un hombre de fiar, ¿quién lo 

hallará?

7

    El justo que camina en su 

integridad,

Deja hijos bienaventurados tras él.

8

    Un rey sentado en el tribunal,

Disipa con su mirada toda 

maldad.

9

    ¿Quién podrá decir:

Tengo la conciencia pura,

Limpio estoy de mi pecado?


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Proverbios 21:9

669

10

    Pesa falsa y medida falsa,

Ambas son abominación a YHVH.

11

    Ya con sus acciones deja ver el niño,

Si su conducta será limpia y recta.

12

    El oído que oye y el ojo que ve:

Ambas cosas las hizo YHVH.

13

    No te aficiones al sueño,

No sea que te empobrezcas,

Despega tus ojos y te saciarás de 

pan.

14

    Caro, caro,° dice el comprador,

Pero se marcha restregándose las 

manos.°

15

    Está el oro y multitud de rubíes,

Pero los labios sabios son una joya 

preciosa.

16

    Quítale el vestido a quien sale fiador 

de un forastero,

Y tómalo en prenda cuando da 

garantía por los forasteros.

17

    Dulce es al hombre el pan de la 

falsedad,

Pero cuando haya llenado su boca, 

se convertirá en cascajo.

18

    Sopesa los planes mediante el 

consejo,

Y con sabias direcciones haz la 

guerra.

19

    Quien descubre secretos levanta 

calumnia,

No frecuentes, pues, al que abre 

mucho la boca.

20

    Al que insulte a su padre o a su 

madre,

Se le apagará su lámpara en la más 

densa oscuridad.

21

    Herencia adquirida con rapacidad al 

comienzo,

No será bendita en su fin.

22

    No digas: yo me vengaré,

Espera a YHVH, y Él te salvará.

23

    Las pesas desiguales son 

abominación a YHVH,

Y una balanza con trampa no es 

buena.

24

    De YHVH son los pasos del hombre,

¿Cómo, pues, podrá el hombre 

entender su camino?

25

    Lazo es al hombre hacer 

apresuradamente un voto,

Y después de prometido, pensarlo.

26

    El rey sabio avienta a los malvados,

Y hace pasar sobre ellos la rueda de 

trillar.

27

    Lámpara de YHVH es el espíritu del 

hombre,

Que escudriña las profundidades del 

alma.°

28

    Misericordia y verdad preservan al 

rey,

Y la clemencia sustenta su trono.

29

    La gloria de los jóvenes es su 

fortaleza,

Y el esplendor de los ancianos, la 

cabeza cana.

30

    Las heridas y las llagas drenan el 

mal,

Y los golpes llegan a lo íntimo del 

corazón.

21

Como los repartimientos de las 

  aguas,

Así el corazón del rey está en la 

mano de YHVH,

A todo lo que quiere lo inclina.°

2

    Todo camino del hombre es recto en 

su propia opinión,

Pero YHVH pesa los corazones.

3

    Practicar el derecho y la justicia

YHVH lo prefiere a los sacrificios.

4

    Ojos altivos y corazón arrogante:

La lámpara° de los malvados es 

pecado.

5

    Los planes del diligente sólo traen 

ganancia,

Los del precipitado, sólo indigencia.

6

    Acumular tesoros con lengua 

mentirosa,

Es vanidad ilusoria y lazo de muerte.

7

    La violencia de los impíos los 

arrastrará,

Por cuanto se niegan a obrar con 

justicia.

8

    La senda del vicioso es sinuosa y 

extraña,

Las acciones del puro son rectas.

9

    Más vale vivir en rincón de azotea,

20.14 Lit. malo, malo.  20.14 Esto es, después de haber comprado.  20.27 Lit. todas las cámaras del vientre.  21.1 Esto es, 

Como las reparticiones de las aguas están en el pie del hortelano 

→Dt.11.10, así el corazón del rey esta en la mano de YHVH

El paralelismo puede expresarse así: Si el hortelano puede dirigir tan fácilmente, con un movimiento de su pie, el curso de las 

aguas, ¡cuánto más fácil le será a Dios inclinar en la dirección que le plazca las voluntades de los poderosos! 

21.4 Es decir, la 

continua existencia.


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Proverbios 21:10

670

Que en casa espaciosa con mujer 

rencillosa.

10

    Afán del malvado es desear el mal,

Su prójimo nunca halla favor a sus 

ojos.

11

    Cuando el burlador es castigado, el 

simple se hace prudente,

Y cuando el sabio es instruido, 

adquiere conocimiento.

12

    El justo hace sopesar la casa del 

impío,

Precipitando al impío a la ruina.°

13

    Quien cierra sus oídos al clamor del 

pobre,

No será escuchado cuando grite.

14

    Un regalo en secreto aplaca la ira,

Y un soborno bajo el manto, el gran 

furor.

15

    Alegría para el justo es que se haga 

justicia,

Pero terror para los que practican 

iniquidad.

16

    Hombre que se extravía del camino 

de la sabiduría,

Va a parar a la asamblea de los 

difuntos.

17

    El que ama el deleite será un 

hombre pobre,

Quien ama el vino y los ungüentos 

no enriquecerá.

18

    Para rescate del justo sirve el malo,

Y para los rectos, el prevaricador.

19

    Más vale habitar en tierra desierta,

Que con mujer rencillosa e 

iracunda.

20

    Preciosos tesoros y óleo hay en la 

casa del sabio,

Pero el hombre insensato lo 

dilapida.

21

    El que va tras la justicia y la 

misericordia,

Halla vida, prosperidad y honra.

22

    El sabio conquista la ciudad de los 

poderosos,

Y humilla la fortaleza en la que 

aquélla confía.

23

    El que guarda su boca y su lengua,

Guarda su alma de penurias.

24

    El soberbio presuntuoso tiene por 

nombre insolente,

Y obra con saña y furor.

25

    Los deseos del perezoso lo matan,

Pues sus manos no quieren trabajar,

26

    Todo el día desea y más desea,

Pero el justo da y no escatima.

27

    Los sacrificios del malvado son 

abominación,

¡Cuánto más cuando los ofrece con 

malicia!

28

    El testigo falso perecerá,

Pero el que atiende,° habla 

perpetuamente.

29

    El malvado se presenta desafiante,

Pero el recto examina su camino.

30

    No hay habilidad, ni inteligencia,

Ni consejo frente a YHVH.

31

    El caballo es preparado para el día 

de la batalla,

Pero la victoria es de YHVH.

22

Más vale el buen nombre que las 

muchas riquezas,

Y el ser apreciado más que la plata 

y el oro.

2

    El rico y el pobre se encuentran:°

A todos ellos los hizo YHVH.

3

    El prudente ve el mal y se aparta,

Los simples siguen, y llevan el daño.

4

    En las huellas de la humildad y del 

temor de YHVH,

Andan riqueza, honor y vida.

5

    Espinos y lazos hay en el camino de 

los perversos,

El que guarda su alma se aparta de 

ellos.

6

    Instruye al niño en el camino que ha 

de seguir,°

Aun cuando sea viejo no se apartará 

de él.

7

    El rico domina al pobre,

Y el que pide prestado es siervo del 

prestamista.

8

    Quien siembra maldad cosecha 

desgracia,

Y la vara de su arrogancia se 

consumirá.

9

    El que tiene ojo generoso será 

bendecido,

Porque repartió su pan con el pobre.

10

    Echa fuera al escarnecedor, y se irá 

la discordia,

21.12 Es decir, las acciones justas resaltan las injustas para mal de su autor.  21.28 Esto es, obedece los mandamientos divi-

nos

22.2 Es decir, tienen en común.  22.6 Lit. a la boca de su camino


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Proverbios 23:16

671

Y también saldrán la contienda y las 

afrentas.

11

    El que ama la pureza de corazón,

El que tiene gracia en sus labios,

Tendrá como amigo al propio rey.

12

    Los ojos de YHVH velan por la 

verdad,

Y Él descubre el engaño de los 

traicioneros.

13

    Dice el perezoso: Afuera hay un 

león,

En plena calle me matará.

14

    Abismo profundo es la boca de la 

mujer ajena,

El aborrecido de YHVH caerá allí.

15

    La necedad se pega al corazón del 

niño,

La vara de la corrección se la 

apartará.

16

    Quien oprime al pobre enriquece,

Quien da al rico se empobrece.

17

    Inclina tu oído y escucha las 

palabras de los sabios,

Y aplica tu corazón a mis 

enseñanzas,

18

    Porque será bueno que las guardes 

dentro de ti,

Y las establezcas sobre tus labios,

19

    Para que pongas en YHVH tu 

confianza,

También a ti te instruiré.

20

    ¿No te he escrito cosas excelentes

De consejos y enseñanzas,

21

    Para que conozcas la certeza de los 

dichos de verdad,

Y puedas hacerlas llegar a los que te 

son enviados?

22

    No explotes al pobre, porque es 

pobre,

Ni atropelles al desgraciado en la 

puerta,°

23

    Porque YHVH defenderá su causa,

Y quitará la vida a los que la quitan 

a otro.

24

    No hagas amistad con el hombre 

iracundo,

Ni te hagas acompañar del hombre 

violento,

25

    No sea que te acostumbres a sus 

caminos,

Y pongas lazo a tu propia alma.

26

    No seas tú de los que dan la mano,

Y salen por fiadores de deudas.

27

    Si no tienes con qué pagar,

¿Por qué te habrán de quitar tu 

propia cama?

28

    No remuevas el lindero antiguo

Que pusieron tus padres.

29

    ¿Has visto hombre diligente en su 

obra?

Estará delante de los reyes y no de la 

gentuza.

23

Cuando te sientes a comer con un 

señor,

Considera bien al que está ante ti,

2

    Y pon cuchillo a tu garganta,

Si eres dado a la gula.

3

    No codicies sus manjares delicados,

Porque es pan engañoso.

4

    No te afanes por hacer riquezas,

Sé prudente, y desiste,

5

    Pues le echas una mirada, y ya no 

están,

Han echado alas como un águila que 

vuela a los cielos.

6

    No te sientes a comer con el avaro,

Ni codicies sus manjares,

7

    Porque según piensa en su alma, 

así es;

Come y bebe, te dirá,

Pero su corazón no está contigo;

8

    Vomitarás el bocado que comiste,

Y habrás malgastado tus cumplidos.

9

    No hables a oídos insensatos,

Porque despreciarán tus sensatas 

razones.

10

    No remuevas el lindero antiguo,

Ni te metas en el campo de los 

huérfanos,

11

    Porque su Redentor es fuerte,

Y defenderá la causa de ellos ante ti.

12

    Aplica tu corazón a la enseñanza,

Y tus oídos a las palabras sabias.

13

    No escatimes corregir al muchacho,

Si lo castigas con vara, no morirá.

14

    Lo castigarás con vara,

Y librarás su alma del Seol.

15

    Hijo mío, si tu corazón llega a ser 

sabio,

También a mí se me alegrará el 

corazón,

16

    También se alegrarán mis riñones,

22.22 Esto es, la plaza de la ciudad, donde se realizaban los juicios


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Proverbios 23:17

672

Cuando tus labios hablen cosas 

rectas.

17

    No tengas envidia de los pecadores,

Antes, persevera en el temor de 

YHVH en todo tiempo,

18

    Porque ciertamente hay un porvenir,

Y tu esperanza no será frustrada.

19

    Oye tú, hijo mío, y sé sabio,

Y dirige tu corazón por el buen 

camino.

20

    No te juntes con los bebedores de 

vino,

Ni con los comilones de carne,

21

    Porque el ebrio y el glotón se 

empobrecen,

Y el dormitar hace vestir harapos.

22

    Escucha al padre que te engendró,

Y no desprecies a tu madre cuando 

sea anciana.

23

    Compra la verdad y no la vendas,

También sensatez, educación y 

prudencia.

24

    El padre del justo se alegrará en 

gran manera,

El que engendra un hijo sabio se 

gozará con él.

25

    ¡Alégrense tu padre y tu madre,

Y regocíjese la que te concibió!

26

    Dame, hijo mío, tu corazón,

Y observen tus ojos mis caminos,

27

    Porque hoyo profundo es la ramera,

Y abismo profundo la mujer ajena.

28

    También ella, como salteador, 

acecha,

Y provoca traiciones entre los 

hombres.

29

    ¿De quién son los ayes?

¿De quién las tristezas?

¿De quién las contiendas?

¿De quién el quejido?

¿De quién las heridas sin causa?

¿De quién los ojos enrojecidos?

30

    De quien se alarga en el vino,

De los que van catando licores 

mezclados.

31

    No mires al vino cuando rojea,

Y lanza destellos en la copa,

Porque fluye suavemente,

32

    Pero al fin, muerde como una 

serpiente;

Pica como una víbora.

33

    Tus ojos desearán la mujer ajena,

Y tu corazón hablará cosas 

perversas,

34

    Y serás como el que está acostado en 

alta mar,

Como el que duerme en el cabo de 

un mástil,

35

    Y dirás: Me han golpeado y no me ha 

dolido,

Me han sacudido y no lo he sentido,

En cuanto despierte, volveré a pedir 

más.

24

No envidies a los malvados,

Ni desees estar con ellos,

2

    Porque su corazón trama violencia,

Y sus labios hablan agravios.

3

    Con la sabiduría se edifica una casa,

Con la prudencia se afirma,

4

    Y con el conocimiento sus 

habitaciones son llenadas

De ornamentos muy preciados.

5

    El varón sabio es fuerte,

Y el hombre docto aumenta su 

poder.

6

    Con sabios consejos harás tu guerra,

Y en la multitud de consejeros habrá 

victoria.

7

    La sabiduría está demasiado alta 

para el necio,

En la puerta° no abrirá su boca.

8

    Al que trama el mal,

Lo llamarán forjador de intrigas.

9

    El pensamiento del insensato es 

pecado,

Y el insolente es detestado por los 

hombres.

10

    Si en el día de la adversidad flaqueas,

¡Ciertamente eres débil!

11

    ¡Libra a los que son arrastrados a la 

muerte!

¡Rescata a los que están por ser 

degollados!

12

    Si dices: He aquí, no lo sabíamos.

El que sopesa los corazones, ¿no lo 

sabrá?

¿No lo sabrá el que vigila tu vida,

Y paga al hombre según sus obras?

13

    Come miel hijo mío, pues es buena,

Sí, el panal es dulce a tu paladar.

14

    Así será, sábelo, la sabiduría para 

tu alma,

24.7 

→22.22 nota. 


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Proverbios 25:11

673

Si la hallas, habrá un porvenir,

Y tu esperanza no será frustrada.

15

    ¡Oh impío!, no aceches la tienda del 

justo,

Ni saquees su recámara,

16

    Porque aunque caiga siete veces, se 

levantará,

Pero los impíos tropiezan y caen en 

la adversidad.

17

    Si tu enemigo cae, no te alegres,

Y si tropieza, no se regocije tu 

corazón,

18

    No sea que YHVH lo vea y le 

desagrade,

Y de él revierta su ira hacia ti.

19

    No te impacientes a causa de los 

malignos,

Ni tengas envidia de los impíos,

20

    Porque para el malo no habrá buen 

fin,

Y la lámpara de los impíos será 

apagada.

21

    Hijo mío: Teme a YHVH, y también 

al rey,

Y no te asocies con los sediciosos,

22

    Porque su calamidad viene de 

repente,

Y el castigo que proviene de ambos,° 

¿quién lo conocerá?

23

    Esto también pertenece a los sabios:

No es bueno hacer acepción de 

personas en el juicio.°

24

    El que dice al rey° malo: Justo eres,

Los pueblos lo maldecirán,

Y lo execrarán las naciones.

25

    Pero para quienes deciden con 

justicia habrá complacencia,

Y una gran bendición vendrá sobre 

ellos.

26

    Besa los labios

Quien da respuesta oportuna.

27

    Prepara tus labores de fuera,

Y disponlas en el campo para ti,

Y después edifica tu casa.

28

    No atestigües negligentemente° 

contra tu prójimo,

Ni engañes con tus labios.

29

    No digas: Le haré a él como él me 

hizo a mí,

Le retribuiré conforme a su obra.

30

    Pasé junto al campo del perezoso,

Por la viña de un hombre sin 

entendimiento,

31

    Y he aquí todo estaba cubierto de 

espinas,

Su faz estaba cubierta de ortigas,

Y su muro de piedra, derribado.

32

    Al verlo, reflexioné.

Lo vi, y aprendí la lección:

33

    Un poco de soñar, un poco de 

dormitar,

Un poco de cruzar las manos para 

descansar,

34

    Y tu miseria te sobrevendrá como la 

del vagabundo,

Y tu indigencia como la del 

mendigo.

Lecciones y comparaciones

25

También  éstos  son  proverbios  de 

Salomón, los cuales transcribieron 

los varones de Ezequías, rey de Judá:

2

    Gloria de Dios es encubrir un 

asunto,

Pero honra del rey es escudriñarlo.

3

    Así como la altura de los cielos y la 

profundidad de la tierra,

El corazón de los reyes es 

inescrutable.

4

    Apártese la escoria de la plata,

Y saldrá un vaso para el platero.

5

    Aparta al malvado del rey,

Y su trono se afianzará en la justicia.

6

    No te alabes delante del rey,

Ni estés en el lugar de los grandes,

7

    Más vale escuchar: Sube acá,

Que ser humillado ante un noble.

Aun cuando tus ojos hayan visto 

algo,

8

    No te des prisa en pleitear,

Porque ¿qué harás al final cuando te 

haya avergonzado tu prójimo?

9

    Debate el pleito con tu vecino,

Pero no descubras el secreto 

de otro,

10

    No sea que el que lo oiga te denigre,

Y tu mala fama no pueda repararse.

11

    Manzana de oro en canastillo de 

plata

Es la palabra dicha oportunamente.

24.22 Esto es, de Dios y del rey 

→v. 21.  24.23 Lit. No es bueno conocer rostros en el juicio.  24.24 .rey. El contexto (v. 21-25) 

indica que las palabras se dirigen al rey. 

24.28 Es decir, sin ponderar el caso


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Proverbios 25:12

674

12

    Zarcillo de oro y joya de oro fino,

Es el sabio que reprende al oído 

dócil.

13

    Frescura de nieve en tiempo de 

siega,

Es el mensajero fiel para quien lo 

envía,

Pues refresca el alma de su señor.

14

    Como nubes y vientos sin lluvia,

Es quien se jacta falsamente de 

dadivoso.

15

    Con la mucha paciencia se aplaca al 

príncipe,

Pues la lengua blanda quebranta los 

huesos.°

16

    ¿Hallaste miel? come lo que te baste,

No sea que, harto, la vomites.

17

    No frecuente tu pie la casa de tu 

vecino,

No sea que, harto de ti, te aborrezca.

18

    Mazo, espada y saeta aguda,

Es el hombre que da falso 

testimonio contra su prójimo.

19

    Como diente roto y pie 

descoyuntado,

Es confiar en el desleal en día de 

angustia.

20

    Vinagre en la llaga, ir sin ropa en el 

frío,

Es cantar coplas a corazón afligido.

21

    Si tu enemigo tiene hambre, dale de 

comer,

Si tiene sed, dale de beber,

22

    Porque ascuas de fuego 

amontonarás sobre su cabeza,

Y YHVH te recompensará.

23

    Como el viento del norte ahuyenta° 

la lluvia,

Así el rostro airado, la lengua 

detractora.

24

    Más vale vivir en rincón de azotea,

Que en casa espaciosa con mujer 

pendenciera.

25

    Como agua fresca a la garganta 

sedienta,

Es la buena noticia desde tierra 

lejana.

26

    Manantial enturbiado y pozo en 

ruinas,

Es el justo que flaquea ante el 

malvado.

27

    No es bueno comer mucha miel,

Ni escudriñar uno su propia gloria 

es gloria.

28

    Ciudad invadida y sin murallas,

Es el hombre que no domina su 

pasión.°

26

Ni la nieve al verano ni la lluvia a 

la siega,

Ni la honra al necio les van bien.

2

    Cual gorrión que aletea y golondrina 

que vuela,

Así la maldición sin causa no se 

cumple.

3

    El látigo para el caballo, la brida 

para el asno,

Y la vara para la espalda del necio.

4

    No respondas al necio según su 

necedad,

No sea que te iguales a él.

5

    Responde al necio como merece su 

necedad,

No sea que se tenga por sabio.

6

    Se corta los pies y bebe el perjuicio 

para sí mismo,°

Quien envía recado por medio de un 

necio.

7

    Al lisiado le cuelgan las piernas,

Al necio el proverbio en la boca.

8

    Pretende sujetar una piedra en la 

honda,

Quien concede honores al necio.

9

    Como rama de espinos que agarra 

un borracho,

Así es el proverbio en boca del necio.

10

    Arquero que dispara contra 

cualquiera,

Es el que contrata a insensatos y 

vagabundos.

11

    Como perro que vuelve a su vómito,

Así el necio repite sus necedades.

12

    ¿Has visto a alguien sabio en su 

propia opinión?

Pues más se puede esperar de un 

necio.

13

    Dice el perezoso:

Hay un león en el camino,

Hay una fiera en la calle.

25.15 Es decir, una expresión pacífica supera la obstinación.  25.23 Tanto desde el punto de vista gramatical como por sentido 

común, esta es la única traducción posible. El viento norte no trae la lluvia, sino todo lo contrario, hace que se vaya

25.28 Lit. 

espíritu

26.6 .para sí mismo.


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Proverbios 27:20

675

14

    Como la puerta gira sobre su quicio,

Así el perezoso en su cama.

15

    El perezoso mete su mano en el 

plato,

Y le fatiga aun llevarla a su boca.

16

    El perezoso se cree más sabio,

Que siete que responden con 

acierto.

17

    Agarra un perro por las orejas,

Quien se mete en pleito ajeno.

18

    El alocado dispara dardos 

encendidos

Y flechas mortales,

19

    Así es quien engaña a su amigo

Y luego dice: Era en broma.

20

    Sin leña se apaga el fuego,

Y donde no hay chismoso, cesa la 

contienda.

21

    Fuelle para las brasas y leña para el 

fuego,

Es el pendenciero para atizar la 

contienda.

22

    Las palabras del chismoso son 

manjares,

Que bajan hasta lo hondo del vientre.

23

    Como tiesto barnizado con escoria 

de plata,

Son los labios enardecidos y el 

corazón vil.

24

    Disimula con sus labios el que odia,

Pero en su interior trama el engaño.

25

    Aunque suavice la voz, no le creas,

Porque siete abominaciones lleva 

dentro.

26

    Aunque con disimulo encubra su 

odio,

Su maldad será descubierta en la 

asamblea.

27

    Quien cave una fosa, caerá en ella,

Y quien ruede una piedra, le caerá 

encima.

28

    Lengua mentirosa duplica los 

daños,

Y boca lisonjera causa ruina.

27

No te jactes del mañana,

Pues no sabes lo que traerá el día.

2

    Alábete el extraño y no tu propia 

boca,

El ajeno, y no los labios tuyos.

3

    Pesada es la piedra, carga gravosa la 

arena,

Pero la provocación del necio es más 

pesada que ambas.

4

    Cruel es la furia e impetuosa la ira,

Pero ¿quién resistirá a los celos?

5

    Mejor es reprensión manifiesta,

Que amor oculto.

6

    Leales son los golpes del amigo,

Pero hipócritas los besos del que 

odia.

7

    El alma saciada pisotea el panal,

Pero al alma hambrienta, hasta lo 

amargo le parece dulce.

8

    Cual ave que se va de su nido,

Tal es el hombre que se va de su 

lugar.

9

    Los óleos y los perfumes alegran el 

corazón,

Y el consejo del amigo endulza el 

alma.

10

    No abandones a tu amigo, ni al 

amigo de tu padre,

Y en la desgracia no vayas a casa de 

tu hermano.

Más vale vecino cerca que hermano 

lejos.

11

    Sé sabio hijo mío, y alegra mi 

corazón,

Y podré replicar a quien me 

afrente.

12

    El prudente ve el mal y se aparta,

Pero los simples siguen, y llevan el 

daño.

13

    Quítale el vestido a quien sale fiador 

de un extraño,

Y toma prendas del que se obliga por 

la extraña.

14

    Quien a gritos bendice de 

madrugada a su prójimo,

Puede reputársele por maldición.

15

    Una gotera continua en tiempo de 

lluvia

Y mujer pendenciera, hacen pareja:

16

    Pretender refrenarla es como 

refrenar el viento,

O sujetar aceite en la diestra.

17

    El hierro con el hierro se afila,

Así aguza el hombre el semblante de 

su amigo.

18

    Quien cuida la higuera comerá 

higos,

Y el que custodia a su amo recibirá 

honores.

19

    Como el rostro se refleja en el agua,

Así el hombre en su conciencia.

20

    El Seol y el Abadón no se sacian 

jamás,

Así los ojos del hombre nunca 


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Proverbios 27:21

676

están satisfechos.

21

    El crisol prueba la plata y la hornaza 

el oro,

Y al hombre la boca de quien lo 

alaba.

22

    Aunque machaques al necio con el 

pisón del mortero,

No le quitarás su necedad.

23

    Observa bien el aspecto de tus 

ovejas,

Y fíjate en tus rebaños,

24

    Porque no para siempre son las 

riquezas,

Ni la corona de edad en edad.

25

    Apunta la hierba y aparece el retoño,

Y la hierba de los montes es segada.

26

    Las ovejas te dan vestido,

Los cabritos el precio del campo,

27

    Las cabras leche para tu alimento,

Para el alimento de tu casa,

Y el sustento de tus criadas.

Proverbios antitéticos

28

Huye el impío sin que nadie lo 

persiga,

Pero como león está confiado el 

justo.

2

    Por la rebelión de la tierra sus 

príncipes son muchos,

Pero por el hombre entendido y 

sabio permanece estable.

3

    Pobre que explota a los indigentes,

Es lluvia que arrasa y no deja pan.

4

    Los que abandonan la Ley alaban al 

impío,

Los que guardan la Ley rompen con 

ellos.

5

    Los malvados no entienden de 

justicia,

Pero el que busca a YHVH lo 

entiende todo.

6

    Más vale pobre que anda en 

integridad,

Que rico de caminos tortuosos.

7

    El que observa la Ley es prudente,

El que se junta con disolutos, 

avergüenza a su padre.

8

    El que aumenta su fortuna con 

interés y usura,

Para el que se apiada de los pobres la 

acumula.

9

    Al que aparta sus oídos de oír la Ley,

Aun su oración le será abominable.

10

    El que extravía al recto por el mal 

camino,

Caerá en su propia fosa,

Pero los íntegros heredarán el bien.

11

    El hombre rico es sabio en su propia 

opinión,

Pero el pobre que es inteligente lo 

escudriña.

12

    Cuando el justo triunfa hay gran 

esplendor,

Cuando se yerguen los malvados, la 

gente se esconde.

13

    El que encubre sus pecados no 

prosperará,

Pero el que los confiesa y se aparta, 

alcanzará misericordia.

14

    ¡Dichoso el hombre que teme 

siempre!

Pero el contumaz caerá en la 

desgracia.

15

    León rugiente y oso hambriento,

Es el gobernante impío para un 

pueblo pobre.

16

    El príncipe imprudente oprime a 

muchos,

Pero el que aborrece la avaricia, 

prolongará sus días.

17

    El hombre culpable de homicidio 

corre a la fosa:

¡Nadie lo detenga!

18

    El que anda en integridad, será 

librado,

Pero el perverso de dos caminos 

caerá de repente.

19

    El que labra su tierra se saciará de 

pan,

Pero el que va en pos de vanidades 

se hartará de pobreza.

20

    El hombre leal abunda en 

bendiciones,

Pero el que se apresura a 

enriquecerse no quedará impune.

21

    Hacer acepción de personas no es 

bueno,

Pero, ¡hasta por un bocado de pan 

puede prevaricar el hombre!

22

    El hombre de pérfida mirada se 

afana por enriquecerse,

Y no sabe que lo alcanzará la 

miseria.

23

    El que reprende a otro será más 

estimado

Que el de lengua aduladora.


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Proverbios 29:27

677

24

    El que hurta a padre o madre, y dice 

que no es pecado,

Es compañero del Destructor.

25

    El arrogante suscita contiendas,

Pero el que confía en YHVH 

prosperará.

26

    El que confía en su propio corazón 

es un necio,

Pero el que anda en sabiduría será 

librado.

27

    El que da al pobre no pasará 

necesidad,

Pero el que aparta sus ojos tendrá 

muchas maldiciones.

28

    Cuando se yerguen los malvados, la 

gente se esconde,

Pero cuando perecen, aumentan los 

justos.

29

El hombre que, reprendido, 

endurece la cerviz,

Será quebrantado de repente, y no 

habrá para él medicina.

2

    Cuando abundan los justos, el 

pueblo se regocija,

Cuando gobierna el impío, el pueblo 

gime.

3

    El que ama la sabiduría, alegra a su 

padre,

Pero el que se junta con rameras, 

disipa su fortuna.

4

    Un rey justo hace estable el país,

Pero el que lo carga de tributos lo 

destruye.

5

    El hombre que adula a su prójimo,

Le tiende una red a sus pasos.

6

    La transgresión del malvado es su 

propia trampa,

Mientras que el justo canta y se 

regocija.

7

    Preocupa al justo la causa del pobre,

Y el malvado no lo entiende.

8

    Los escarnecedores agitan la ciudad,

Pero los sabios aplacan la ira.

9

    Si un sabio contiende con un necio,

Se enoje éste o se ría, no habrá 

sosiego.

10

    Los sanguinarios aborrecen al 

hombre íntegro,

Los rectos se preocupan por él.

11

    Desfoga el necio todas sus pasiones,

Pero el sabio dentro de sí las aquieta.

12

    El gobernante que hace caso de 

embustes,

Tendrá criminales por ministros.

13

    El oprimido y el opresor coinciden 

en esto:

A los ojos de ambos dio vista YHVH.

14

    El rey que juzga lealmente a los 

desvalidos,

Afianzará su trono para siempre.

15

    Palos y reprensiones meten en 

razón,

Pero el muchacho consentido 

avergonzará a su madre.

16

    Cuando los malvados mandan los 

crímenes aumentan,

Pero los justos presenciarán su caída.

17

    Corrige a tu hijo y te dará descanso,

Y dará satisfacciones a tu alma.

18

    Donde no hay visión profética, el 

pueblo se desenfrena,

Pero, ¡cuán bienaventurado es el que 

guarda la Ley!

19

    Sólo con palabras no escarmienta el 

siervo,

Porque entiende, pero no hace caso.

20

    ¿Has observado a un hombre 

precipitado al hablar?

Pues más se puede esperar de un 

necio.

21

    El consentido desde la niñez es un 

esclavo,

Al final lo lamentará.

22

    El hombre irascible levanta 

contiendas,

Y el furioso abunda en transgresiones.

23

    La soberbia del hombre lo 

humillará,

Pero el de espíritu humilde recibirá 

honra.

24

    El que se asocia a un ladrón 

aborrece su propia alma,

Oye la maldición, pero no lo 

denuncia.

25

    El que teme a los hombres caerá en 

el lazo,

Pero el que confía en YHVH es 

inaccesible.

26

    Muchos buscan el favor del que 

manda,

Pero la sentencia para el hombre 

procede de YHVH.

27

    El hombre inicuo es aborrecido por 

los justos,

Y el de camino recto es aborrecido 

por los inicuos.


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Proverbios 30:1

678

Las palabras de Agur

30

Palabras de Agur ben Jaqué, el de 

Masá. Oráculo del varón:

¡Oh Dios, en gran manera me he 

fatigado,° y desisto!°

2

    En verdad soy el más ignorante de 

los hombres,

Y no tengo inteligencia humana.

3

    No he aprendido sabiduría,

Ni comprendo la ciencia del Santo:°

4

    ¿Quién subió a los cielos, y 

descendió?°

¿Quién encerró los vientos en sus 

puños?

¿Quién ató las aguas en un paño?

¿Quién afirmó todos los términos de 

la tierra?

¿Cuál es su Nombre, y el nombre de 

su Hijo, si sabes?

5

    Toda palabra de Dios es limpia,°

Él es escudo a los que lo esperan.

6

    No añadas a sus palabras, para que 

no te reprenda,

Y seas hallado mentiroso.

7

    Dos cosas te he demandado,

No me las niegues mientras viva:

8

    Aparta de mí la falsedad y la mentira,

Y no me des pobreza ni riquezas.

Manténme del pan necesario,

9

    No sea que, harto, te niegue y diga: 

¿Quién es YHVH?

O que, siendo pobre, hurte, y 

blasfeme el nombre de mi Dios.

10

    No acuses al siervo ante su señor,

No sea que te maldiga, y seas hallado 

culpable.

11

    Hay quien maldice a su padre,

Y no bendice a su madre,

12

    Hay quien es puro ante sus propios 

ojos,

Pero no está lavado de su inmundicia.

13

    Hay quien mira con ojos altaneros

Y párpados bien levantados,

14

    Hay quien tiene dientes como 

espadas y muelas como cuchillos,

Para devorar a los pobres de la tierra 

y a los necesitados de entre los 

hombres.

15

    La sanguijuela tiene dos hijas: Dame 

y Dame.

Tres cosas hay que nunca se sacian,

Aun la cuarta jamás dice: ¡Basta!

16

    El Seol, la matriz estéril,

La tierra, que no se harta de agua,

Y el fuego, que nunca dice: ¡Basta!

17

    Ojo que se burla del padre y desdeña 

la obediencia a la madre,

¡Arránquenlo los cuervos del valle y 

devórenlo los hijos del buitre!

18

    Tres cosas me son ocultas,

Aun tampoco sé la cuarta:

19

    El rastro del águila por los cielos,

El rastro de la culebra sobre la peña,

El rastro de la nave en el mar,

Y el rastro del hombre en la 

doncella.

20

    Así procede la adúltera:

Come, se limpia la boca y dice:

No he hecho nada malo.

21

    Por tres cosas se estremece la tierra,

Y cuatro no puede soportar:

22

    Por el siervo, cuando llega a reinar,

Por el necio, cuando se harta de pan,

23

    Por la mujer aborrecida, cuando se 

casa,

Y por la criada, cuando desplaza a su 

señora.

24

    Cuatro cosas son pequeñas en la 

tierra,

Pero más sabias que los sabios:

25

    Las hormigas, pueblo no fuerte,

Pero preparan su sustento en el 

verano,

26

    Los conejos, pueblo nada esforzado,

Pero hacen madriguera en la peña,

27

    Las langostas, que no tienen rey,

Pero salen todas en cuadrillas.

28

    Las lagartijas, que se agarran con la 

mano,

Pero entran en los palacios reales.

29

    Tres cosas hay de hermoso andar,

Y la cuarta pasea muy bien:

30

    El león, el más valiente de los 

animales,

Que no se vuelve atrás por nada,

31

    El caballo ceñido de lomos,

Asimismo el macho cabrío,

Y el rey, contra el cual nadie se 

levanta.

32

    Si te has hecho necio al ensalzarte,

30.1 Lit me he fatigado, me he fatigado.  30.1 Es decir, ceso en mi intento (de comprender) 

→§144.  30.3 Lit. Santos. Plural 

intensivo de significado singular. 

30.4 

→Jn.3.13.  30.5 →Jn.5.39. 


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Proverbios 31:31

679

O has tramado el mal, ponte la 

mano en la boca,

33

    Porque así como batiendo leche se 

saca mantequilla,

Y sonándose recio se saca sangre,

Provocando la ira se saca contienda.

Exhortación al rey

31

Palabras del rey Lemuel, Oráculo 

con que lo corrigió su madre:

2

    ¿Qué te diré, hijo mío?

¡Oh, hijo de mis entrañas!

¿Qué decirte, hijo de mis votos?

3

    No des tu fuerza a las mujeres,

Ni tu vigor a las que corrompen 

reyes.

4

    No es de reyes, oh Lemuel, 

no es de reyes darse al vino,

Ni de príncipes al licor.

5

    No sea que bebiendo, olviden lo 

instituido,

Y perviertan el derecho de los 

afligidos.

6

    Dad el licor fuerte al desfallecido,

Y el vino a los amargados de alma.

7

    Que beban y olviden su miseria,

Y de sus penas no se acuerden más.

8

    Abre tu boca a favor del mudo,

En el juicio de todos los abocados a 

la muerte.°

9

    Abre tu boca y da sentencia justa,

Y defiende al pobre y al necesitado.

Elogio a la mujer virtuosa

10

    Mujer virtuosa, ¿quién la hallará?

Porque su estima sobrepasa 

largamente a la de las piedras 

preciosas.

11

    El corazón de su marido está 

confiado en ella,

Y no carecerá de ganancias.

12

    Ella le acarreará el bien y no el mal

Todos los días de su vida.

13

    Busca la lana y el lino,

Y diligentemente trabaja con sus 

manos.

14

    Es como la nave del mercader,

31.8 Es decir, de los que no tienen quien los defienda.  31.23 Esto es, lugar donde se celebran los juicios.  31.25 Es decir, ante 

la incertidumbre del porvenir

Que trae su pan desde lejos.

15

    Se levanta cuando aún es de noche,

Da alimento a su familia,

Y la porción asignada a sus criadas.

16

    Evalúa un campo, y lo compra,

Y del fruto de sus manos planta una 

viña.

17

    Ciñe con fuerza sus lomos,

Y fortalece sus brazos.

18

    Ve que sus negocios van bien,

Su lámpara no se apaga de noche.

19

    Aplica sus manos a la rueca,

Y sus dedos manejan el huso.

20

    Extiende su mano al pobre,

Sí, alarga sus manos al necesitado.

21

    No tiene temor de la nieve por los de 

su casa,

Porque toda su familia está vestida 

de vestidos dobles.

22

    Teje tapices para sí,

De lino fino y de púrpura es su 

vestido.

23

    Su marido es respetado en la 

puerta,°

Cuando se sienta con los ancianos 

de la tierra.

24

    Teje ropa de lino y la vende,

Y provee ceñidores al mercader.

25

    Está vestida de fuerza y dignidad,

Y se sonríe ante el mañana.°

26

    Abre su boca con sabiduría,

Y la ley de la clemencia está en su 

lengua.

27

    Vigila la marcha de su casa,

Y no come su pan de balde.

28

    Sus hijos crecen, y la bendicen,

Su marido también la alaba 

diciendo:

29

    Muchas son las mujeres hacendosas,

Pero tú las has superado a todas.

30

    Engañosa es la gracia y fugaz la 

hermosura,

Pero la mujer que teme a YHVH, ésa 

será alabada.

31

    ¡Dadle del fruto de sus manos,

Y que sus mismas obras la alaben en 

la puerta!


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1

Las palabras° de Cohélet,° hijo de Da-

vid, rey en Jerusalem.

2

    Vanidad de vanidades, dice Cohélet.

Vanidad de vanidades,° todo es 

vanidad.

3

    ¿Qué provecho tiene el ser humano 

de toda su labor con que se afana 

debajo del sol?°

4

    Generación va y generación viene,

Pero la tierra sigue siempre igual.

5

    Sale el sol, y se va el sol,

Jadeando° hasta su lugar,

Y desde allí vuelve a salir.

6

    El viento sopla de tramontana,

Y gira del mediodía,

Y girando sin cesar,

Vuelve de nuevo a sus giros el viento.

7

    Todos los ríos van al mar,

Y el mar nunca se llena.

Al lugar de donde vinieron los ríos,

Allí vuelven, para correr de nuevo.°

8

    Todas las cosas son fatigosas,

Más de lo que el hombre puede expresar.

El ojo nunca se sacia de ver,

Ni el oído se harta de oír.

9

    ¿Qué es lo que fue? Lo mismo que 

será.

¿Qué es lo hecho? Lo mismo que se 

hará.

No hay nada nuevo debajo del sol.

10

    ¿Hay cosa de la que se diga: He aquí, 

esto es nuevo?

Ya existía en los siglos que nos 

precedieron.

11

    No hay memoria de lo primero,

Ni tampoco de lo postrero habrá 

memoria,

Entre los que vendrán después.

12

 Cuando yo, Cohélet, vine a ser rey so-

bre Israel en Jerusalem,

13

 entonces apliqué mi corazón a inqui-

rir  e  investigar,  con  sabiduría,  todo  lo 

que  se  hace  debajo  de  los  cielos,  tarea 

penosa que ’Elohim° ha impuesto a los 

hijos del hombre para que sean afligidos 

con ella.

14

 He visto todas las obras que se hacen 

debajo del sol, y he aquí que todo es vani-

dad y correr tras el viento.

15

 Lo torcido no se puede enderezar, y lo 

incompleto no se puede completar.

16

 Hablé  con  mi  corazón  diciéndole: 

Mira, me he engrandecido y he crecido en 

sabiduría sobre todos los que fueron an-

tes de mí en Jerusalem, y mi corazón ha 

experimentado sabiduría y conocimiento 

en abundancia.

17

 He dedicado mi corazón a conocer sa-

biduría, y a entender la locura y la insen-

satez, y comprendí que aun esto es correr 

tras el viento.

18

 Porque en la mucha sabiduría hay mu-

cha frustración,° y el que aumenta cono-

cimiento, aumenta su aflicción.

Vanidad de los placeres

2

Dije en mi corazón:

¡Ven pues, te probaré con el placer! 

¡Prueba la felicidad!

La rueda de la futilidad

1.1 Es decir, reflexiones.  1.1 Heb. qohéleth = el que convoca a la asamblea (con el propósito de comunicar verdades divinas). 

1.2 Heb. hábel habalím = soplo de soplos. Superlativo que expresa la máxima vanidad en sentido de algo vacío y fugaz como 

el aliento. 

1.3 debajo del sol. Esta expresión (que se repite 29 veces) señala las realidades intrascendentes de este mundo. 

1.5 Hebraísmo que expresa apresuramiento

→Sal.19.5.  1.7 Lit. a ir.  1.13 Cohélet nunca menciona a ’Elohim → § 2, como 

YHVH, el Dios de Israel, sino como el Gobernador de lo que está debajo del sol, es decir, del mundo. 

1.18 Lit. tristeza


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Eclesiastés 3:1

681

Pero he aquí también esto era 

vanidad.

2

    A la risa dije: ¡Necia!,

Y al placer: ¿Qué logras?

3

 Aun cuando mi corazón me guiaba con 

sabiduría,  decidí  agasajar  mi  carne  con 

vino y entregarme a la insensatez, hasta 

ver cuál era el bien del hombre en que se 

ocupa bajo los cielos los pocos días de su 

vida.

4

 Engrandecí mis obras, me edifiqué pala-

cios y planté viñedos para mí;

5

 me hice huertos y jardines, y planté toda 

clase de árboles frutales,

6

 me hice estanques de agua, para regar 

con ellos el soto donde se cultivaban mis 

árboles;

7

 compré  esclavos  y  esclavas,  y  tuve  a 

otros nacidos en casa;° también tuve una 

gran hacienda de vacadas y rebaños, más 

que  todos  mis  predecesores  en  Jerusa-

lem.

8

 Acumulé  para  mí  plata  y  oro,  tesoro 

digno  de  reinos  y  provincias;  contraté 

cantores y cantoras, y tuve un harén de 

concubinas  para  gozar  como  suelen  los 

hombres.

9

 Fui más grande y magnífico de cuantos 

me  precedieron  en  Jerusalem,  en  tanto 

que mi sabiduría permanecía conmigo.°

10

 Nada de cuanto mis ojos deseaban les 

negué, ni privé a mi corazón de placer al-

guno, pues mi corazón gozaba de toda mi 

labor,  y  esta  era  la  porción°  de  todo  mi 

trabajo.

11

 Luego,  consideré  todas  las  obras  que 

habían hecho mis manos, y el duro traba-

jo con que me había afanado en hacerlas, 

¡y he aquí todo era vanidad y correr tras el 

viento! No había provecho alguno debajo 

del sol.

12

 Después  volví  a  considerar  la  sabidu-

ría,  la  locura  y  la  necedad  (¿qué  podrá 

añadir el hombre que suceda al rey, a lo 

que ya se hizo?),

13

 y vi que la sabiduría aventaja a la nece-

dad, como la luz a las tinieblas.

14

 Los ojos del sabio están en su cabeza, 

mas  el  necio  anda  en  tinieblas.  Aunque 

también comprendí que una misma cosa 

les acontece a ambos.

15

 Entonces me dije en mi corazón: Como 

la  suerte  del  necio,  así  me  acontecerá  a 

mí. ¿Para qué, entonces, he sido más sa-

bio? Y me dije en mi corazón que también 

esto es vanidad.

16

 Porque ni del sabio ni del necio habrá 

memoria  para  siempre,  pues  en  los  días 

venideros  todo  habrá  sido  olvidado.  ¿Y 

cómo muere el sabio? ¡Como el necio!

17

 Aborrecí  pues  la  vida,  porque  la  obra 

que  se  hace  debajo  del  sol  me  era  fasti-

diosa, por cuanto todo es vanidad y correr 

tras el viento.

18

 Y aborrecí todo mi trabajo en que me 

había afanado debajo del sol, viendo que 

tenía  que  dejarlo  a  alguno  que  vendrá 

después de mí.

19

 ¿Y quién sabe si será sabio o necio? Con 

todo, él señoreará en todo el fruto del es-

fuerzo que realicé y en que me mostré sabio 

debajo del sol, y también esto es vanidad.

20

 Y a causa de todo mi trabajo con que 

me había afanado debajo del sol entregué 

mi corazón a la desesperación:

21

 ¡Que un hombre trabaje con sabiduría, 

conocimiento y maestría, y tenga que de-

jar su porción a otro que nunca se afanó 

en ello, esto es vanidad y grande mal!

22

 Entonces, ¿qué saca el hombre de to-

dos sus afanes y del ansia de su corazón 

con que tanto se fatiga debajo del sol?

23

 Porque todos sus días son dolores; y su 

tarea, frustración, pues ni aun de noche su 

corazón reposa; y esto también es vanidad.

24

 No hay, pues, mejor cosa para el hom-

bre  que  comer  y  beber,  y  hacer  que  su 

alma vea lo bueno de su trabajo. Y he vis-

to que esto proviene de la mano de Dios.

25

 Porque, ¿quién podrá comer y regoci-

jarse sin Él?

26

 Porque al hombre que le agrada, Él le 

da sabiduría, conocimiento y gozo, pero 

al pecador le impone la tarea de recoger y 

amontonar para darlo a quien Ha-’Elohim 

le agrada.° Esto también es vanidad y co-

rrer tras el viento.

El hombre y sus circunstancias

3

Todo  tiene  su  tiempo,  y  todo  lo  que 

se quiere debajo de los cielos tiene su 

hora:

2.7 Lit. hijos de la casa.  2.9 

→2.3.  2.10 Es decir, la recompensa.  2.26 Lit. al que es bueno ante Él


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Eclesiastés 3:2

682

2

    Tiempo de nacer y tiempo de morir,

Tiempo de plantar y tiempo de 

arrancar lo plantado,

3

    Tiempo de matar y tiempo de curar,

Tiempo de destruir y tiempo de 

edificar,

4

    Tiempo de llorar y tiempo de reír,

Tiempo de endechar y tiempo de 

bailar,

5

    Tiempo de esparcir piedras y tiempo 

de juntar piedras,

Tiempo de abrazar y tiempo de 

abstenerse de abrazar,

6

    Tiempo de buscar y tiempo de perder,

Tiempo de guardar y tiempo de 

desechar,

7

    Tiempo de romper y tiempo de 

coser,

Tiempo de callar y tiempo de hablar,

8

    Tiempo de amar y tiempo de 

aborrecer,

Tiempo de guerra y tiempo de paz.

9

 ¿Qué  provecho  tiene  quien  trabaja,  de 

todo aquello en que se afana?

10

 He visto el trabajo que ’Elohim ha im-

puesto a los hijos del hombre para que lo 

cumplan.

11

 Todo  lo  hizo  hermoso  en  su  tiempo, 

y puso eternidad° en el corazón de ellos, 

sin que el hombre alcance a entender la 

obra  que  Ha-’Elohim  ha  hecho  desde  el 

principio hasta el fin.

12

 Sé  que  no  hay  nada  mejor  para  ellos 

que alegrarse y disfrutar su vida.

13

 Y también que es don de Dios que todo 

hombre  coma  y  beba,  y  vea  el  fruto  de 

toda su labor.

14

 He  entendido  que  todo  lo  que  hace 

Ha-’Elohim es perpetuo; sobre aquello no 

se añadirá, ni de ello se disminuirá. Ha-

’Elohim lo hizo así, para que los hombres 

teman delante de Él.

15

    Lo que es, ya ha sido,

Y lo que será, ya fue,

Y ’Elohim hace volver lo que pasó.°

16

 Vi más debajo del sol: en el lugar del 

derecho, allí la impiedad; y en el lugar de 

la justicia, allí la iniquidad.

17

 Y dije en mi corazón: Al justo y al mal-

vado los juzgará Ha-’Elohim, porque allí 

hay  un  tiempo  para  cada  asunto  y  para 

cada obra.

18

 Respecto  a  los  hijos  del  hombre,  dije 

en mi corazón: Ha-’Elohim los ha proba-

do  para  que  ellos  mismos  vean  que  son 

semejantes a las bestias,

19

 porque lo mismo que sucede al hom-

bre sucede a la bestia, un mismo suceso 

es: como muere uno, así muere el otro. 

Todos tienen un mismo aliento. El hom-

bre no tiene ventaja sobre el animal, por-

que todo es vanidad.

20

    Todos van a un mismo lugar,

Todos proceden del polvo,

Y todos vuelven al polvo.

21

 ¿Quién conoce el espíritu de los hijos 

del hombre? ¿Sube él hacia arriba? ¿Y el 

hálito de la bestia? ¿Baja a la tierra?°

22

 Así, pues, he visto que no hay nada me-

jor para el hombre que alegrarse en sus 

obras, porque ésa es su porción. Porque, 

¿quién lo llevará para que vea lo que ha-

brá después de él?

Paradojas de la sociedad

4

Me volví y vi todas las opresiones que 

se  cometen  debajo  del  sol,  y  he  aquí 

las  lágrimas  de  los  oprimidos  sin  nadie 

que los consolara, y del lado de sus opre-

sores  la  fuerza  bruta,  sin  nadie  que  los 

consolara.

2

 Y alabé a los que ya habían muerto más 

que a los que todavía viven,

3

 pero más dichoso que ambos, es aquel 

que  hasta  ahora  no  ha  sido,  que  no  ha 

visto las malas obras que se hacen debajo 

del sol.

4

 He  visto  asimismo  que  todo  trabajo  y 

toda  obra  excelente  despierta  la  envidia 

del hombre contra su prójimo. También 

esto es vanidad y correr tras el viento.

5

 El necio se cruza de brazos, y devora su 

propia carne.

6

 Más vale un puñado de sosiego, que am-

bos  puños  llenos  de  trabajo  y  de  correr 

tras el viento.

3.11 Heb. ha´olám. El vocablo significa primordialmente lo que está oculto para el hombre (entre las brumas de un pasado y un 

futuro igualmente remotos). Es decir, la dificultad extrema del ser humano para comprender la obra de Dios. Pero aún así, el 

Creador puso en el hombre el concepto de la eternidad (de que vive a través del tiempo) y por lo tanto se sabe mortal. El estilo 

pertinente de Cohélet, cuyo interés se mueve únicamente entre las cosas que suceden debajo del sol, exhibe el fracaso de todos 

los humanos sin distingo ante la realidad de la muerte. 

3.15 Lit. lo perseguido.  3.21 Enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 27. 


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Eclesiastés 5:19

683

7

 Me volví otra vez, y vi esta vanidad de-

bajo del sol:

8

 Hay  quien  está  solo,  sin  nadie  que  lo 

acompañe,  sin  hijos  ni  hermanos,  pero 

aun así su afán no tiene fin, su ojo no se 

harta de riquezas, y no se pregunta: ¿Para 

qué pues me afano y me privo de placeres? 

También esto es vanidad y tarea penosa.

9

 Dos  pueden  más  que  uno,  porque  tie-

nen mejor paga por su trabajo.

10

 Porque  si  caen,  el  uno  levantará  al 

otro; pero, ¡ay del que está solo! Cuando 

caiga no habrá quien que lo levante.

11

 Si  dos  se  acuestan  juntos,  se  calientan 

entre sí, pero, ¿cómo se calentará uno solo?

12

 Y si alguien prevalece contra uno, dos 

lo resistirán; y cordel de tres dobleces no 

se rompe pronto.

13

 Más vale joven pobre y sabio, que rey 

viejo y necio que no admite consejos;

14

 aunque  para  reinar  haya  salido  de  la 

cárcel, o aunque en su reino haya nacido 

pobre.

15

 Vi a todos los vivientes debajo del sol 

marchando  con  el  joven  sucesor  que  lo 

reemplazaba.

16

 No  tenía  fin  la  muchedumbre  que  lo 

seguía; sin embargo, los que vengan des-

pués  tampoco  estarán  contentos  con  él. 

Ciertamente  esto  también  es  vanidad  y 

correr tras el viento.

Vanidad de la riqueza

5

Cuando vayas a la Casa de Dios guar-

da tu pie, y acércate más para oír, que 

para  ofrecer  el  sacrificio  de  los  necios, 

porque no saben que hacen mal.

2

 No te des prisa con tu boca, ni se apre-

sure  tu  corazón  a  proferir  palabra  ante 

Ha-’Elohim,  porque  Ha-’Elohim  está  en 

los cielos y tú en la tierra, por tanto, sean 

pocas tus palabras.

3

 Porque de las muchas ocupaciones vie-

nen los sueños, y de las muchas palabras 

el dicho del necio.

4

 Cuando  hagas  un  voto  a  ’Elohim,  no 

tardes en cumplirlo, porque no hay com-

placencia  en  los  necios.  Cumple  lo  que 

prometes.

5

 Mejor es que no prometas, a que prome-

tas y no cumplas.

6

 No dejes que tu boca te haga pecar, ni 

digas delante del ángel que fue ignoran-

cia.  ¿Por  qué  harás  que  Ha-’Elohim  se 

enoje a causa de tus palabras y destruya 

la obra de tus manos?

7

 Porque donde abundan los sueños abun-

dan las vanidades y las muchas palabras. 

Pero tú, teme a Ha-’Elohim.

8

 Si ves la opresión a los pobres, y la per-

versión del derecho y la justicia en algu-

na provincia, no te turbes a causa de esto, 

porque sobre el alto vigila otro más alto, y 

hay Alguien aún más alto que ellos.

9

 Pero en todo sentido, el provecho de un 

país es que el rey mismo se preocupe por 

su territorio.°

10

 El que ama la plata nunca se saciará de 

la plata, y el que ama la riqueza no sacará 

ganancia, y también esto es vanidad.

11

 Cuando aumentan los bienes, aumen-

tan  quienes  los  consumen.  ¿Qué  pro-

vecho,  pues,  tendrá  su  dueño  aparte  de 

verlos con sus propios ojos?

12

 Coma  poco  o  coma  mucho,  dulce  es 

el  sueño  del  hombre  trabajador;  pero  la 

abundancia no deja dormir al rico.

13

 Hay un mal grave que he visto debajo 

del  sol:  riqueza  guardada  por  su  dueño 

para su propio perjuicio.

14

 Pues  se  pierde  esa  riqueza  en  un  ne-

gocio infortunado, y cuando engendra un 

hijo, nada le queda en su mano.°

15

 Como salió del vientre de su madre, así 

volverá desnudo como vino, y por sus afa-

nes  no  recibirá  nada  que  pueda  llevarse 

en la mano.

16

 Y este también es un mal grave: el que 

tenga que irse tal como vino, y ¿qué pro-

vecho le quedará de haberse afanado por 

perseguir el viento?

17

 Ya que todos sus días comió en tinie-

blas, afanándose, enfermándose y enoján-

dose.

18

 He  aquí  lo  que  he  visto:  Es  bueno  y 

propio que el hombre coma y beba y dis-

frute del bien de todo el trabajo con que 

se fatiga debajo del sol todos los días de 

vida que Ha-’Elohim le concedió, porque 

ésta es su porción.

19

 Asimismo, a todo hombre a quien Ha-

’Elohim  ha  dado  bienes  y  riquezas,  y  le 

5.9 Texto de difícil traducción.  5.14 Es decir, para mantener a su hijo.


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Eclesiastés 5:20

684

ha  dado  facultad  para  que  las  disfrute  y 

tome su porción y se regocije en su traba-

jo, esto también es don de Dios,

20

 para que no reflexione mucho duran-

te  los  días  de  su  vanidad,  mientras  Ha-

’Elohim lo mantenía absorto con el gozo 

de su corazón.

Incertidumbre de la vida

6

Hay otro mal que he visto debajo del 

sol,  y  que  es  gravoso  para  los  hom-

bres:

2

 El del hombre a quien Ha-’Elohim le ha 

dado riquezas, tesoros y honores, de modo 

que nada le falta de todo lo que su alma 

pueda desear, pero a quien Ha-’Elohim no 

le permite disfrutarlo, sino que lo disfru-

tan los extraños. Esto es vanidad y un mal 

doloroso.

3

 Aunque  un  hombre  engendre  cien  hi-

jos° y viva muchos años, y sean numero-

sos los días de su vida, si su alma no se 

sació de felicidad,° digo: mejor que él es 

un aborto,

4

 que  llega  en  un  soplo  y  se  marcha  a 

oscuras, y la oscuridad encubre su nom-

bre;

5

 no vio el sol, ni se enteró de nada, ni re-

cibe sepultura, pero descansa mejor que 

el otro,

6

 porque aunque hubiera vivido mil años 

dos veces, si no disfrutó de felicidad, ¿no 

van todos a un mismo lugar?

7

 Todo  el  trabajo  del  hombre  es  para  su 

boca, y aun así, su alma no se sacia.

8

 ¿Qué  provecho  tiene  el  sabio  más  que 

el necio? ¿Qué ventaja tiene el pobre que 

supo comportarse entre los vivientes?

9

 Más vale lo que ven los ojos que el diva-

gar del alma.° También esto es vanidad y 

correr tras el viento.

10

 Al que existe ya se le había dado nom-

bre, y se sabe que es sólo un hombre, y 

que no puede contender con quien es más 

fuerte que él.

11

 Cuantas  más  palabras,  más  vanidad: 

¿qué provecho saca el hombre?°

12

 Porque  ¿quién  sabe  lo  que  es  bueno 

para el hombre en la vida, todos los días 

de  su  vana  vida?  Los  pasará  como  una 

sombra,  pues  ¿quién  anunciará  al  hom-

bre lo que sucederá después de él debajo 

del sol?

Mejor es…

7

 Mejor es un buen nombre que un 

  buen ungüento,°

Y mejor el día de la muerte que el 

día del nacimiento.

2

    Mejor es ir a la casa del luto que a la 

casa del banquete,

Porque aquello es el paradero de 

todos los hombres,

Y el que vive debe poner esto en su 

corazón.

3

    Mejor la tristeza que la risa,

Porque con la tristeza de rostro se 

enmienda el corazón.

4

    El corazón del los sabios está en la 

casa del luto,

Pero el corazón del necio, en la casa 

del placer.

5

    Mejor es oír la reprensión del sabio

Que el canto de los necios,

6

    Porque como el crepitar de los 

espinos bajo la olla,

Así es la risa del necio,

Y también esto es vanidad.

7

    Ciertamente las presiones° 

perturban al sabio,

Y el regalo corrompe el corazón.

8

    Mejor es el fin de un asunto que su 

comienzo,

Y el paciente de espíritu mejor que 

el altivo de espíritu.

9

    No te apresures en tu alma a 

enojarte,

Porque la ira reposa en el seno de los 

necios.

10

    Nunca digas: ¿Por qué los tiempos 

pasados fueron mejores que éstos?

No es sabio que preguntes esto.

11

    El conocimiento es tan bueno como 

la heredad,

Y aprovecha a los que ven el sol.

12

    Porque estar a la sombra del 

conocimiento es como estar a la 

sombra del dinero,

6.3 .hijos.  6.3 Recibe sepultura va en el v. 5.  6.9 Es decir, de los deseos.  6.11 Es decir, de tanto hablar.  7.1 Asonancia de 

shem = nombre, con shémen = aceite (o ungüento). 

7.7 Según el contexto, prob. se refiere aquí a la presión que ejerce el dinero 

en las decisiones humanas.


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Eclesiastés 8:12

685

Pero la sabiduría° aventaja al 

conocimiento en que da vida a 

sus poseedores.

13

    Considera la obra de Dios: ¿quién 

podrá enderezar lo que Él torció?

14

 En el día del bien goza del bien, y en 

el  día  de  la  adversidad  reflexiona:  Ha-

’Elohim  ha  hecho  tanto  el  uno  como  el 

otro, para que el hombre no sepa lo que 

sucederá después de él.

15

 Esta dualidad he visto en mi vida vana: 

Hay  justo  que  fracasa  por  su  justicia,  y 

hay impío que prospera en su impiedad.

16

 No seas demasiado justo, ni presumas 

ser muy sabio; ¿para qué matarse?

17

 No seas demasiado impío ni insensato. 

¿Por qué morir antes de tiempo?

18

 Bueno es agarrar lo uno sin soltar lo 

otro,  porque  el  que  teme  a  ’Elohim  de 

todo sale bien parado.

19

 La sabiduría hace al sabio más fuerte 

que diez poderosos en una ciudad.

20

 Ciertamente no hay hombre justo en 

la tierra, que haga el bien y nunca peque.

21

 No hagas caso de todo lo que se habla, 

ni escuches a tu siervo cuando te maldi-

ce,

22

 pues sabes muy bien que muchas ve-

ces tú mismo has maldecido a otros.

23

 Todas  estas  cosas  experimenté  con 

sabiduría, diciendo: Seré sabio; pero eso 

estaba lejos de mí.

24

 Lo que existe es remoto y en extremo 

profundo, ¿quién lo podrá hallar?

25

 Dirigí mi corazón al saber, a escudri-

ñar y a buscar el conocimiento y la razón, 

procurando conocer cuál es la peor insen-

satez, la necedad más absurda,

26

 y hallé más trágica que la muerte a la 

mujer  cuyo  corazón  es  lazos  y  redes,  y 

sus manos ligaduras. El que agrada a Ha-

’Elohim escapará de ella, pero el pecador 

será atrapado por ella.

27

 He  aquí,  dice  Cohélet,  sopesando  las 

cosas  una  por  una,  para  hallar  una  ra-

zón,

28

 lo que aún busca mi alma sin haberlo 

encontrado: Un hombre entre mil hallé, 

pero una mujer entre todas ellas no la he 

encontrado.

29

 Sólo esto he hallado: que Ha-’Elohim 

hizo al hombre recto, pero ellos buscaron 

muchas perversiones.

Misterio de la obra de Dios

8

¿Quién como el sabio?

¿Quién sabe interpretar un asunto?

La sabiduría ilumina el rostro del 

hombre,

Y cambia la dureza de su semblante.

2

    Digo: guarda el mandato° del rey,

A causa del juramento ante ’Elohim.

3

    No te apresures a retirarte° de su 

presencia ni resistas a su amenaza, 

porque él hace lo que le place,

4

    Y la palabra del rey es soberana. 

¿Quién le pedirá cuenta de lo que 

hace?

5

    El que observa el mandamiento no 

experimentará cosa mala,

Y el corazón del sabio discierne el 

tiempo y el juicio,°

6

    Porque para cada asunto hay un 

tiempo y un juicio.

Ciertamente el mal que gravita sobre 

el hombre es grande,

7

    Pues no sabe qué sucederá.

Y cuando esté por suceder, ¿quién se 

lo anunciará?

8

 No hay hombre que tenga potestad so-

bre el espíritu para retener el espíritu, ni 

potestad sobre el día de la muerte. No hay 

escape en tal guerra, ni la impiedad libra-

rá al que la posee.

9

 Todo esto he visto, y dediqué mi cora-

zón a todo lo que sucede debajo del sol, 

mientras un hombre domina a otro para 

su mal.

10

 Vi también los grandes funerales de los 

impíos  que  frecuentaban  el  lugar  santo, 

mientras que en la ciudad pronto eran ol-

vidados quienes actuaron honestamente. 

También esto es vanidad.

11

 Por cuanto no se ejecuta sentencia in-

mediata contra una obra mala, el corazón 

de los hijos del hombre está presto a ha-

cer el mal.

12

 Pero  aunque  el  pecador  haga  el  mal 

cien veces y prolongue sus días, sé que le 

irá bien al que teme delante de Dios,

7.12 Heb. da´ath. Esto es, conocimiento experimental de Dios.  8.2 la orden. Lit. la boca.  8.3 Esto es, a retirarte airado.  8.5 Es 

decir, el tiempo oportuno y el procedimiento correcto. Lo mismo en el v. 6 que, en realidad, es un paréntesis.


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Eclesiastés 8:13

686

13

 y que no le irá bien al impío, ni le se-

rán prolongados sus días, que serán como 

una sombra, por cuanto no teme delante 

de Dios.

14

 Hay otra vanidad que ocurre sobre la 

tierra:  hay  justos  a  quienes  les  sucede 

conforme a la obra de los impíos, y hay 

impíos a quienes les sucede conforme a la 

obra de los justos. Digo que también esto 

es vanidad.

15

 Por tanto, alabo el placer, porque no hay 

cosa mejor para el hombre debajo del sol 

que comer y beber y estar alegre, y que esto 

le quede de sus afanes los días de su vida 

que Ha-’Elohim le concede debajo del sol.

16

 Cuando apliqué° mi corazón a cono-

cer  la  sabiduría  y  a  ver  la  tarea  que  se 

hace sobre la tierra (porque hay quienes 

ni de día ni de noche ven el sueño con 

sus ojos),

17

 consideré toda la obra de Dios, la cual 

no puede ser descifrada por el hombre de-

bajo del sol, pues por más que se afane en 

ello, el hombre no lo averiguará, y aun-

que algún sabio pretenda saberlo, no por 

eso lo descubrirá.

Elogio a la sabiduría

9

Por todo ello dediqué mi corazón para 

declarar que los justos y los sabios y 

sus  obras,  todas  estas  cosas,  están  en  la 

mano de Dios, aun el amor y el odio, pero 

el  hombre  no  lo  sabe,  aunque  todo  está 

delante de ellos.

2

 Todo  acontece  a  todos  de  una  misma 

forma. Lo mismo le ocurre al justo que al 

impío, al bueno, al puro y al impuro, al que 

ofrece sacrificios y al que no los ofrece; tan-

to al recto como al pecador, al que jura en 

vano° como al que respeta su juramento.

3

 Tal es el mal entre todo lo que ocurre 

debajo del sol, que haya una misma suer-

te para todos, y que el corazón de los hijos 

del hombre esté lleno de maldad, y que la 

locura anide en su corazón mientras viva, 

y después de esto… ¡a los muertos!

4

 Pero hay esperanza para todo el que está 

entre los vivos, pues mejor es perro vivo 

que león muerto.

5

 Porque  los  vivos  saben  que  han  de 

morir,  pero  los  muertos  nada  saben,  ni 

tienen más recompensa, porque hasta su 

memoria es puesta en el olvido.

6

 Han perecido con su amor, con su odio 

y  con  su  envidia,  y  nunca  más  tendrán 

parte alguna en todo lo que se hace de-

bajo del sol.

7

 Anda, come tu pan con gozo, y bebe tu 

vino con corazón alegre, porque tus obras 

ya son aceptables a Ha-’Elohim.

8

 En todo tiempo sean blancas tus vesti-

duras,  y  nunca  falte  ungüento  sobre  tu 

cabeza.

9

 Goza de la vida con la mujer que amas, 

todos los días de tu vida vana que te han 

concedido  debajo  del  sol.  Sí,  todos  tus 

días  de  vanidad,  pues  ésta  es  tu  recom-

pensa en la vida y en el trabajo en que te 

afanas° debajo del sol.

10

 Todo  cuanto  halle  hacer  tu  mano, 

haz lo con tus fuerzas, porque en el Seol, 

adonde vas, no hay obra ni propósito, ni 

conocimiento ni sabiduría.

11

 Me volví y vi debajo del sol que la ca-

rrera no es de los veloces, ni la batalla de 

los fuertes, ni de los sabios el pan, ni de 

los inteligentes la riqueza, ni de los elo-

cuentes  el  favor,  sino  que  un  tiempo  y 

una suerte alcanzan a todos ellos.

12

 Pero el hombre no conoce su tiempo. 

Como los peces son atrapados en la ma-

lévola red y los pájaros caen en la tram-

pa,  así  son  atrapados  los  hombres  en  el 

tiempo malo, cuando ello les sobreviene 

de repente.

13

 También vi algo que para mí es de gran 

sabiduría debajo del sol:

14

 Una  pequeña  ciudad  con  pocos  hom-

bres  en  ella,  y  llega  contra  ella  un  gran 

rey,  y  la  asedia  y  construye  contra  ella 

grandes torres de asedio.

15

 Y  en  ella  se  halla  un  hombre  pobre 

pero sabio, el cual libra a la ciudad con su 

sabiduría. Sin embargo, nadie se acorda-

ba de aquel hombre pobre.

16

 Entonces me dije: Mejor es la sabiduría 

que la fuerza, pero la sabiduría del pobre 

es menospreciada, y sus palabras no son 

escuchadas.

17

 Las  palabras  de  los  sabios  dichas  en 

quietud, son más aceptables que el voci-

ferar de un soberano entre los necios.

8.16 Lit. di.  9.2 .en vano.  9.9 Lit. que trabajas.


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Eclesiastés 11:5

687

18

 Mejor es la sabiduría que las armas de 

guerra,  pero  uno  solo  que  yerre  puede 

destruir muchas cosas buenas.

Ventajas del sabio sobre el necio

10

Una  mosca  muerta  hace  heder  el 

perfume  del  perfumista.  Así  una 

pequeña locura al que es estimado como 

sabio y honorable.

2

 El corazón del sabio se inclina a su dies-

tra; pero el corazón del necio, a su sinies-

tra.

3

 Aun mientras va de camino le falta cor-

dura al necio; a todos va anunciando° que 

es necio.

4

 Si el ánimo° del príncipe se alza contra 

ti,  no  dejes  tu  lugar,°  porque  la  manse-

dumbre apacigua grandes ofensas.

5

 Hay un mal que he visto debajo del sol, 

como yerro que procede del soberano:

6

    El necio encumbrado en un alto 

cargo,

Mientras los dotados permanecen 

humillados.

7

    He visto siervos a caballo,

Y príncipes andando a pie como 

siervos.

8

    El que cava un hoyo caerá en él,

Y al que rompa el cerco lo morderá 

una serpiente.

9

    El que corta piedras se lastimará con 

ellas,

Y el que parte leños peligra en ello.

10

    Si el hierro está embotado,

Y uno no lo afila,

Hay que aplicar más fuerza.

Lo provechoso pues es emplear la 

sabiduría.

11

    Si la serpiente muerde antes de ser 

encantada,

De nada sirve el encantador.°

12

    Las palabras del sabio son 

provechosas,

Pero los labios del necio causan su 

propia ruina.

13

    El principio de las palabras de su 

boca es la necedad,

Y el fin de su perorata° no es más 

que un triste desvarío.

14

    Asimismo el necio multiplica las 

palabras:

El hombre no sabe lo que le ha de 

suceder,

Y lo que sucederá tras él, ¿quién se 

lo anunciará?

15

    El trabajo de los necios los fatiga 

tanto,

Que ni saben cómo ir a la ciudad.°

16

    ¡Ay de ti, oh tierra, cuando tu rey es 

un muchacho,

Y tus príncipes banquetean° de 

mañana!

17

    ¡Dichosa tú, oh tierra, cuando tu rey 

es hijo de nobles,

Y tus príncipes comen a su tiempo 

para reponer fuerzas y no para 

embriagarse!°

18

    Por la holgazanería se derrumba el 

techo,

Y por indolencia de manos la casa se 

llena de goteras.

19

    Por placer se hace el banquete,

Y el vino alegra la vida,

Y el dinero sirve para todo.°

20

    Ni en tu pensamiento insultes al rey,

Ni en tu misma recámara maldigas 

al rico,

Porque un ave de los cielos llevará el 

rumor,

Un ser alado° contará el asunto.

Consejos de práctica diaria

11

Echa tu pan° sobre las aguas,

Porque después de muchos días lo 

hallarás.

2

    Reparte porción a siete, y aun a ocho,

Porque no sabes el mal que vendrá 

sobre la tierra.

3

    Si las nubes están llenas de lluvia,

Se vaciarán sobre la tierra,

Y si un árbol cae hacia el sur o hacia 

el norte,

En el lugar donde caiga quedará.

4

    El que considera el viento, no 

sembrará,

Y el que mira las nubes, no segará.

5

    Así como no sabes cuál es la senda 

del espíritu,°

10.3  Esto  es,  con  su  modo  de  comportarse.  10.4  Lit.  espíritu.  10.4  Es  decir,  no  pierdas  la  calma.  10.11  Lit.  dueño  de  la 

lengua

10.13 Lit. de su boca.  10.15 Esto es, a pesar de que la calzada principal la puede discernir cualquiera.  10.16 Lit. 

comen

10.17 Lit. para fuerza y no para festín.  10.19 Lit. la plata responde a todo.  10.20 Lit. un dueño de alas.  11.1 Esto es, 

tu semilla de trigo

11.5 

→3.21. 


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Eclesiastés 11:6

688

Ni cómo crecen los huesos en el 

vientre de la que está encinta,

Así ignoras la obra de Dios,

El cual hace todas las cosas.

6

    Por la mañana siembra tu semilla,

Y a la tarde no dejes reposar tu 

mano,

Porque no sabes qué es lo mejor, si 

esto o aquello,

O si ambas cosas serán igualmente 

buenas.

7

    Dulce, ciertamente, es la luz,

Y grato a los ojos contemplar el sol,

8

    Pero aunque el hombre viva muchos 

años,

Y en todos ellos tenga gozo,

Considere empero que muchos más 

serán los días de oscuridad.

¡Todo cuanto viene es vanidad!

9

    Alégrate, oh joven, por tu juventud,

Y tome placer tu corazón en los días 

de tu mocedad.

Anda en los caminos de tu corazón,

Y tras la vista de tus ojos,

Pero ten en cuenta que por todas 

estas cosas,

Te juzgará Ha-’Elohim.

10

    Aparta, entonces, la frustración de 

tu corazón

Y aleja el mal de tu carne,

Porque la mocedad y la juventud son 

vanidad.

Preludio de la muerte

12

Acuérdate de tus Creadores° en los 

días de tu juventud,

Antes que vengan los días malos,

Y se acerquen los años en 

que digas:

No tengo en ellos contentamiento.

2

    Antes que se oscurezcan el sol y la 

luz,° y la luna y las estrellas,

Y las nubes vuelvan tras la lluvia.

3

    El día en que tiemblen los 

guardianes de la casa,°

Y se encorven los hombres fuertes,°

Y cesen las que muelen,° porque han 

disminuido,

Y se enturbien las que miran por las 

celosías.°

4

    Cuando se cierren las puertas de la 

calle,° por ser débil el sonido del 

molino,°

Y uno se despierte con el gorjeo del 

pajarillo,°

Y enmudezcan todas las hijas del 

canto.°

5

    Cuando también se tema a lo que es 

alto,

Y a los terrores del camino,

Y florezca el almendro,°

Y se arrastre la langosta,°

Y el alcaparrón° no haga su efecto,

Porque el hombre marcha hacia su 

morada eterna,

Mientras los que endechan° rondan 

por las calles.

6

    Antes que se rompa el cordón de 

plata° y se aplaste el cuenco de 

oro,°

Y se quiebre el cántaro° junto a la 

fuente,

Y la rueda, hecha pedazos, caiga en 

el pozo,°

7

    Y el polvo° vuelva a la tierra, de 

donde procede,

Y el espíritu retorne a Ha-’Elohim, 

que lo dio.

8

    Vanidad de vanidades, dice Cohélet.

¡Todo es vanidad!

Exhortación final

9

 Cuanto  más  sabio  fue  Cohélet,  tanto 

más impartió al pueblo su conocimiento. 

Y sopesó, y escudriñó y compuso muchos 

proverbios.

10

 Cohélet procuró hallar palabras acep-

tables  y  escritura  recta,  palabras  de  ver-

dad.

11

 Las  palabras  de  los  sabios  son  como 

espinos  y  como  estacas  clavadas  por  los 

amos de los rebaños dados a un pastor.

12.1 El TM registra el plural.  12.2 Prob. pérdida de visión.  12.3 Prob. el sistema óseo.  12.3 Prob. las piernas.  12.3 Esto es, las 

muelas y dientes

12.3 Heb. arubóth = ventanas pequeñas. Es decir, los ojos.  12.4 Prob. los oídos o las aberturas inferiores del 

cuerpo

12.4 Prob. dificultad de la digestión.  12.4 Prob. la fragilidad del sueño.  12.4 Prob. las cuerdas vocales.  12.5 florezca 

el almendro. Prob. se refiera a las canas. 

12.5 Prob. el arrastrar los pies.  12.5 Fruto de la alcaparra utilizado para estimular la 

sexualidad. 

12.5 Profesionales del lamento que andaban por las calles aguardando que alguien muriera.  12.6 Prob. el hilo de 

la vida

12.6 Prob. el cráneo.  12.6 Prob. el cuerpo como un todo.  12.6 Prob. la rueda de la vida (la energía vital) que cae en el 

sepulcro. 

12.7 Es decir, el hombre 

→Gn.3.19 


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Eclesiastés 12:14

689

12

 Hijo mío, ten en cuenta que el hacer 

muchos rollos° no tiene fin, y el mucho 

estudio es fatiga de la carne.

13

 La  conclusión  de  todo  discurso  oído, 

es:  Teme  a  Ha-’Elohim,  y  guarda  sus 

mandamientos, porque esto es el todo del 

hombre.

14

 Porque Ha-’Elohim traerá toda obra a 

juicio, juntamente con toda cosa oculta, 

sea buena o sea mala.

12.12 Esto es, libros


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1

 Cantar de los cantares, 

  según° Salomón.

Ella

2

    ¡Oh, si él me besara con besos de su 

boca!

Porque tus caricias° son mejores 

que el vino.°

3

    Tus ungüentos tienen una grata 

fragancia.

Tu nombre es como ungüento 

derramado,

Por eso las doncellas te aman.

4

    ¡Atráeme, y correremos en 

pos de ti!

El rey me introdujo en su recámara:

Nos regocijaremos y nos 

alegraremos en ti,

Y hallaremos tu amor más fragante 

que el vino.

¡Con justísima causa te aman!

5

    Hijas de Jerusalem,

Soy negra,° pero codiciable,

Como las tiendas de Cedar,

Como las cortinas de Salomón.

6

    No reparéis en que soy muy morena,

Porque el sol me ha mirado.

Los hijos de mi madre se airaron 

contra mí,

Me pusieron a guardar las viñas,

Y mi viña, que era mía, no la guardé.

7

    Hazme saber, oh tú, a quien ama mi 

alma:

¿Dónde pastoreas?

¿Dónde lo° haces descansar al 

mediodía?

Entre los rebaños de tus 

compañeros?

Coro

8

    Si no lo sabes, ¡oh tú, la más 

hermosa de las mujeres!

Sal tras las huellas del rebaño,

Y apacienta tus cabritas

Junto a las cabañas de los pastores.

Él

9

    A mi yegua favorita° entre los carros 

de Faraón te he comparado,

Oh amada mía.

10

    Hermosas son tus mejillas entre las 

trenzas,

Tu cuello, entre collares de corales.

11

    Te haremos zarcillos de oro,

Con incrustaciones de plata.

Ella

12

    Mientras el rey está en su 

reclinatorio,°

Mi nardo difunde su fragancia.

13

    Mi amado es para mí un manojito de 

mirra,

Que reposa entre mis pechos.

14

    Ramillete de flores de alheña es mi 

amado para mí,

En las viñas de En-gadi.

Él

15

    He aquí eres hermosa, oh amada 

mía.

1.1 Es decir, al estilo de Salomón 

→ § 142.  1.2 Heb. dodey = caricias y otras manifestaciones de amor.  1.2 Esto es, el banquete 

del vino 

→Est.7.2.  1.5 Heb. shejoráh.  1.7 Esto es, al rebaño.  1.9 .favorita.  1.12 Diván de poca altura utilizado en el oriente 

para comer. 

→Mt.9.10. 

Pues, ¿por qué he de ser como una 

que está velada,


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Cantares 3:3

691

¡Cuán bella eres!

Tus ojos son como palomas.

Ella

16

    He aquí eres hermoso, oh amado 

mío,

También placentero.

Nuestro lecho es de flores,°

17

    Las vigas de nuestras casas son de 

cedro,

Y nuestros artesonados, de ciprés.

2

  Soy la rosa de Sarón,

Y el lirio de los valles.

Él

2

    Como el lirio entre los espinos,

Así es mi amada entre las doncellas.

Ella

3

    Como el manzano entre los árboles 

del bosque,

Así es mi amado entre los jóvenes.

A su sombra he deseado sentarme,

Y comer sus dulces frutos.

4

    Él me condujo a la sala del 

banquete,°

Y su estandarte sobre mí es el amor.

5

    ¡Sustentadme con pasas,

Confortadme con manzanas,

Porque desfallezco de amor!

6

    ¡Sea tu izquierda bajo mi cabeza,

Y abráceme tu diestra!

Él

7

    ¡Oh hijas de Jerusalem, os conjuro 

por las gacelas y por las ciervas 

del campo,

Que no disturbéis al amor ni lo 

despertéis hasta que quiera!

Ella

8

    ¡La voz de mi amado!

¡Helo allí, saltando sobre las 

montañas,

Brincando sobre las colinas!

9

    Mi amado es como la gacela o el 

cervatillo.

¡Mirad! Está tras nuestro muro,

Mirando por las ventanas,

Atisbando por las celosías.

10

    Mi amado habló, y me dijo:

Él

¡Oh amada mía, hermosa mía, 

levántate y sal conmigo!

11

    Porque ha pasado el invierno,

La lluvia ha cesado, y se ha ido.

12

    Las flores aparecen en el campo,

El tiempo de la poda ha llegado,

Y el arrullo de la tórtola se deja oír 

en nuestra tierra.

13

    La higuera ya madura sus brevas,

Y las vides en cierne exhalan su 

aroma.

¡Levántate, oh amada mía, hermosa 

mía, y ven!

14

    ¡Oh paloma mía!

Tú, que anidas° en las hendiduras de 

la peña,

En las grietas de la escarpa:

¡Muéstrate! ¡Hazme oír tu voz!

Porque dulce es tu voz,

Y agraciado tu rostro.

Él y ella

15

    ¡Cazadnos las zorras!

Las zorras pequeñas que echan a 

perder las viñas… 

¡Nuestras viñas en flor!

Ella

16

    ¡Mi amado es mío y yo suya!

Él pastorea entre los lirios

17

    Hasta que refresque el día

Y declinen las sombras.

¡Vuelve, oh amado mío!

Sé como el corzo o el cervatillo,

Sobre las montañas de Béter.°

3

  Por las noches en mi lecho,

Buscaba al que ama mi alma.

Lo busqué, pero no lo hallé.

2

    Me levantaré ahora e iré por la 

ciudad,

Por las calles y por las plazas.

¡Debo hallar al que ama mi alma!

Lo busqué, pero no lo encontré.

3

    Me hallaron los guardas que rondan 

la ciudad.

¿Habéis visto al que ama mi alma?

1.16 Es decir, de exuberante vegetación.  2.4 Lit. cámara del vino.  2.14 .que anidas.  2.17 Béter = de la partición. Prob. 

alusión a 

→Gn.15.10. 


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Cantares 3:4

692

4

    Apenas los había pasado,

Hallé al que ama mi alma,

Me prendí de él y no quise soltarlo,

Hasta que lo introduje en la casa de 

mi madre,

En la alcoba de la que me concibió.

Él

5

    ¡Os conjuro, oh hijas de Jerusalem,

Por las gacelas y por las ciervas del 

campo,

Que no disturbéis al amor

Ni lo despertéis hasta que quiera!

Coro

6

    ¿Qué es lo que sube del desierto

Como columnas de humo,

Perfumado con mirra e incienso,

Y con todos los aromas del mercader?

7

    ¡He aquí la litera° de Salomón!

Escoltada por sesenta valientes,

De entre los héroes de Israel.

8

    Todos ellos empuñan espada,

Expertos en la batalla.

Cada uno tiene su espada sobre su 

muslo,

Por los peligros de la noche.

9

    El rey Salomón hizo para sí un 

palanquín

De maderas del Líbano.

10

    Hizo sus columnas de plata,

Su respaldo de oro,

Su asiento de púrpura,

Su interior tapizado con amor por 

las hijas de Jerusalem.

11

    ¡Salid, oh hijas de Sión, y 

contemplad al rey Salomón,

Con la diadema que le coronó su 

madre el día de su boda,

El día del gozo de su corazón!

Él

4

  He aquí eres hermosa, amada mía. 

   ¡He aquí, eres hermosa!

Tus ojos son palomas a través de tu 

velo,

Tus cabellos como un rebaño de 

cabras

Que descienden al alba del monte 

Galaad.

2

    Tus dientes, cual rebaño de ovejas 

trasquiladas,

Que suben del lavadero,

Todas con crías gemelas

Y ninguna estéril entre ellas.

3

    Tus labios son como una cinta de 

grana,

Y tu hablar, gracioso.

Tus mejillas, cual granada partida

Detrás de tu velo.

4

    Tu cuello, como la torre de David,

Construida con roquetas,

De donde penden mil escudos,

Todos paveses° de valientes.

5

    Tus dos pechos, como crías mellizas 

de gacela,

Que apacientan entre lirios.

6

    Hasta que refresque el día y declinen 

las sombras,

Me iré al monte de la mirra,

Y al collado del incienso.

7

    ¡Toda tú, oh amada mía, eres 

hermosa,

Y en ti no hay mancha!

8

    ¡Ven conmigo desde el Líbano!

¡Oh esposa mía, ven del Líbano!

Sal, desde la cumbre del Amaná,

Desde la cumbre del Senir y del 

Hermón,

Desde las guaridas de los leones,

Desde los montes de los leopardos.

9

    ¡Has arrebatado mi corazón,°

Hermana mía y esposa mía!

¡Has arrebatado mi corazón,

Con una sola mirada° de tus ojos,

Con una sola gargantilla de tu 

collar!

10

    ¡Cuán perfecto es tu amor,

Hermana mía y esposa mía!

¡Cuánto mejores que el vino son tus 

caricias!

¡Cuánto mejor la fragancia de 

tus ungüentos que todos los 

perfumes!

11

    Oh esposa mía, tus labios destilan 

miel,

3.7 Heb. mittathó, sinónimo de aprión = palanquín (v. 9).  4.4 Heb. shiltey. Escudo grande que cubre el cuerpo totalmente. 

4.9 Lit. me has dado corazón. Puede significar también me has animado, estimulado, motivado.  4.9 .mirada


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Cantares 5:12

693

La miel y la leche están debajo de tu 

lengua,

Y el aroma de tus vestidos es como 

la fragancia del Líbano.

12

    Huerto cerrado eres, hermana mía, 

esposa mía,

Fuente cerrada, manantial sellado.

13

    Tus renuevos son paraíso de 

granados

Con toda suerte de frutos deleitosos,

De flores de alheña y de nardos,

14

    Nardo y azafrán, cálamo aromático 

y canela,

Con todos los árboles de incienso,

Mirra y áloes, con los mejores 

bálsamos y aromas.

15

    Eres el manantial del huerto,

Pozo de aguas vivas,

Que fluye del Líbano.

16

    ¡Despierta, oh Aquilón!

¡Ven, oh Austro, y sopla sobre mi 

huerto para que se esparzan sus 

aromas!

Ella

¡Venga mi amado a su huerto

Y coma sus preciados frutos!

Él

5

  ¡He venido a mi huerto, oh 

   hermana mía y esposa mía;

He recogido mi mirra con mi 

bálsamo,

He comido mi panal con mi miel;

He bebido mi vino con mi leche!

¡Comed, amigos!

¡Bebed y embriagaos, oh amados!

Ella

2

    Yo dormía, pero mi corazón velaba:

¡Una voz!

¡Mi amado está llamando!

Él

¡Ábreme, hermana mía, amada mía,

Paloma mía, perfecta mía!

Porque mi cabeza está empapada de 

rocío,

Y mis cabellos del relente de la noche.

Ella

3

    Me he quitado mi vestido,

¿Cómo° lo volveré a vestir?

Me he lavado los pies,

¿Cómo los volveré a ensuciar?

4

    Mi amado extendió° su mano a 

través del resquicio,°

Y mis entrañas se conmovieron 

por él.

5

    Me levanté para abrir a mi amado,

Mis manos destilaron mirra,

De mis dedos se escurrió la mirra 

por la manecilla del cerrojo.

6

    Abrí a mi amado,

Pero mi amado ya se había ido,

Había pasado,

Y mi alma salió tras su hablar.

Lo busqué, pero no lo hallé,

Lo llamé, pero no me respondió.

7

    Los guardas que rondan la ciudad 

me hallaron,

Me golpearon y me hirieron.

Los guardas de las murallas me 

despojaron de mi manto.

8

    Os conjuro, oh hijas de Jerusalem,

Si halláis a mi amado,

¿Le diréis que desfallezco de amor?

Coro

9

    ¿Qué es tu amado más que otro 

amado,

Oh tú, la más hermosa entre las 

mujeres?

¿Qué es tu amado más que otro 

amado,

Que así nos conjuras?

Ella

10

    Mi amado es radiante y lozano,°

Distinguido entre diez mil.°

11

    Su cabeza es como el oro más fino,

Sus cabellos, ondulados,°

Negros como el cuervo.

12

    Sus ojos son como palomas

Junto a corrientes de agua,

5.3  El  vocablo  heb.  que  traduce ¿Cómo…  ¿Cómo…  (última  línea),  es  especial  y  enfático.  Sólo  aparece  aquí  y  en  Est.8.6. 

5.4 Lit. envió.  5.4 Abertura entre el quicio y la puerta (la cual está cerrada. 

→v. 5).  5.10 Heb. adóm = rojo.  5.10 Lit. señalado 

por un estandarte. Es decir, como el portador del estandarte. 

5.11 Heb. taltallím = montones sobre montones.


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Cantares 5:13

694

Bañados con leche,

Que descansan en la orilla.°

13

    Sus mejillas, como un jardín de 

especias,

Que exhalan su fragancia,

Sus labios son como lirios,

Que destilan abundante mirra.

14

    Sus brazos como barras de oro

Engastados con piedras de Tarsis;

Su torso, tallado de marfil,

Recubierto de zafiros.

15

    Sus piernas son cual columnas de 

alabastro,

Asentadas sobre basas de oro puro.

Su aspecto, como el del Líbano,

Majestuoso° como los cedros.

16

    Su paladar es dulcísimo,°

Y todo él, la dulzura misma.

¡Tal es mi amado y tal es mi amigo,

Oh hijas de Jerusalem!

Coro

6

  ¿Adónde se ha ido tu amado,

Oh tú, la más hermosa entre las 

mujeres?

¿Adónde fue tu amado,

Para que lo busquemos contigo?

Ella

2

    Mi amado bajó a su huerto,

A las eras de las especias,

Para apacentar entre los huertos

Y recoger los lirios.

3

    Yo soy de mi amado y mi amado es 

mío,

Él apacienta entre lirios.

Él

4

    Oh amada mía, eres hermosa como 

Tirsa,°

Deseable como Jerusalem,

Imponente como un ejército con 

estandartes.

5

    Aparta tus ojos de mí,

Porque me conturban.

Tu cabellera es como un rebaño de 

cabras

Recostadas en las laderas de Galaad.

6

    Tus dientes, como un rebaño de 

ovejas

Que suben del lavadero,

Todas con crías gemelas,

Y ninguna entre ellas estéril.

7

    Tus mejillas, detrás de tu velo,

Dos mitades de granada.

8

    Si sesenta son las reinas,

Ochenta las concubinas,

Y sin número las doncellas,

9

    Una sola es mi paloma, la perfecta 

mía,

Una sola, predilecta de su madre.

Las doncellas la vieron,

Y la llamaron bienaventurada,

La alabaron las reinas y las 

concubinas.

Coro

10

    ¿Quién es la que se asoma como el 

alba,

Hermosa como la luna,

Límpida como el sol,

Imponente como un escuadrón 

abanderado?

Él

11

    Al huerto de los nogales descendí,

A ver los frutos del valle,

A ver si brotaba la vid,

Si florecían los granados.

12

    Antes que lo supiera, mi alma me 

puso

Entre los carros de Abinadab.

Coro

13

    ¡Vuelve, vuelve, oh sulamita!

¡Vuelve, vuelve, y te contemplaremos!

Él

¿Qué queréis ver en la sulamita?

Coro

Algo como las danzas de Majanaim.°

Él

7

  ¡Cuán graciosos son tus pasos en 

   sandalias,

Oh hija del príncipe!

Los contornos de tus muslos son 

como joyas,

5.12 Lit. sentados de lleno.  5.15 Lit. escogido.  5.16 Lit. dulzuras.  6.4 Tirsa = deliciosa. Ciudad que después que el reino se 

dividió, vino a ser la residencia de los reyes de Israel. 

6.13 Majanaim = dos campamentos.


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Cantares 8:8

695

Obra de manos de un hábil orfebre.

2

    Tu ombligo es como un ánfora,

Donde no falta ningún vino 

generoso.

Tu vientre, una gavilla de trigo 

cercada de lirios.

3

    Tus dos pechos, como crías mellizas 

de gacela.

4

    Tu cuello, una torre de marfil,

Tus ojos, claros° como los estanques 

de Hesbón,

Junto al portal de Bat-rabim.

Tu perfil es como la torre del Líbano,

Que mira hacia Damasco.

5

    Tu cabeza se yergue como el 

Carmelo,

Y tu cabellera es como la púrpura,

¡El rey está cautivo en tus trenzas!

6

    ¡Cuán hermosa y dulce eres,

Oh amor deleitoso!

7

    Tu talle se asemeja a la palmera,

Y tus pechos, a sus racimos.

Alguien

8

    Dije: Subiré a la palmera,

Tomaré sus frutos:

Sean tus pechos como racimos de 

la vid,

Y la fragancia de tu aliento como de 

manzanas,

9

    Y el cielo de tu boca como el vino 

generoso,

Que de mi amado fluye suavemente,

Y hace mover apaciblemente los 

labios de los que duermen.

Ella

10

    Yo soy de mi amado,

Y hacia mí él tiende su deseo.

11

    Ven, amado mío,

Salgamos al campo,

Pernoctemos en las aldeas.

12

    Madruguemos y vayamos° a las viñas,

Veamos si ha brotado la vid,

Si ya se abrieron sus flores,

Si florecen los granados;

Allí te daré mis caricias.

13

    Las mandrágoras exhalan su 

fragancia,

Y a nuestra puerta hay toda suerte 

de frutos deliciosos,

Nuevos y añejos,

Que he guardado para ti, oh amado 

mío.

8

  ¡Oh, si tú fueras como mi hermano, 

  que mamó los pechos de mi 

  propia madre!

Al hallarte afuera yo te besaría,

Y nadie me despreciaría por ello.

2

    Te guiaría, te metería en la casa de 

mi madre,

Tú me enseñarías,

Y yo te daría a beber vino 

aromatizado

Con el mosto de mis granadas.

3

    Su izquierda estaría bajo mi cabeza,

Y su diestra me abrazaría.

Él

4

    ¡Os conjuro, oh hijas de Jerusalem,

Que no disturbéis al amor

Ni lo despertéis hasta que quiera!

Coro

5

    ¿Quién es la que sube del desierto,

Recostada sobre su amado?

Él

Debajo del manzano te desperté.

Allí tuvo los dolores tu madre,

Allí tuvo los dolores la que te dio a 

luz.

6

    Ponme como un sello sobre tu 

corazón,

Como una marca sobre tu brazo,

Porque fuerte como la Muerte es el 

amor,

Y obstinados son los celos, como el 

Seol,

Sus ascuas son ascuas de fuego,

Y sus llamas, llamarada de YH.°

7

    Las muchas aguas no podrán apagar 

el amor,

Ni los ríos podrán extinguirlo.

Si uno diera por el amor todas las 

riquezas de su casa,

De cierto sería menospreciado.

Ella

8

    Tenemos una hermana pequeña,

Que aún no tiene pechos.

7.4 .claros.  7.12 .vayamos.  8.6 Contracción del Tetragrama 

→ § 3. 


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Cantares 8:9

696

¿Qué haremos por nuestra hermana

En el día en que sea pedida?°

Él

9

    Si ella es muro,

Le pondremos torrecillas de plata,

Y si es puerta,

La reforzaremos con tablones de 

cedro.

Ella

10

    Yo soy muro,

Y mis pechos son torreones,

Y ahora soy ante sus ojos°

Como la mensajera de paz.

Coro

11

    Salomón tuvo una viña en Baal-hamón.

Arrendó la viña a los guardas,

Que le traen por su fruto,

Cada uno mil siclos° de plata.

Él

12

    Mi viña, que es mía, está delante 

de mí.

Tú, oh Salomón, tendrás los mil,

Y los que guardan su fruto 

doscientos.

Ella

13

    ¡Oh, tú que habitas en los huertos,

Los compañeros anhelan oír tu voz!

¡Házmela oír!

14

    Oh amado mío, apresúrate,°

Y sé como la gacela o el cervatillo, 

sobre los montes de los aromas.

8.8 Es decir, pedida en matrimonio.  8.10 Es decir, a los ojos de su amado.  8.11 .siclo.  8.14 Lit. Huye


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1

Visión de Isaías ben Amoz, que vio so-

bre Judá y Jerusalem en días de Uzías, 

de Jotam, de Acaz y de Ezequías, reyes de 

Judá.

2

    ¡Oíd, cielos, y tú, tierra, escucha, 

que habla YHVH!

Crié hijos y los engrandecí, pero 

ellos se rebelaron contra mí.

3

    El buey conoce a su dueño, y el asno 

el pesebre de su señor,

Pero Israel no me conoce, mi pueblo 

no tiene entendimiento.

4

    ¡Oh gente pecadora, pueblo cargado 

de maldad,

Generación° de perversos, hijos 

depravados!

Abandonaron a YHVH, despreciaron 

al Santo de Israel y se volvieron 

atrás.

5

    ¿Dónde° seguiros hiriendo si os 

seguís rebelando?

Toda la cabeza está enferma, y el 

corazón, agotado.

6

    Desde la planta del pie hasta la 

cabeza no hay nada sano,

Solo llaga, contusión, y heridas 

supurantes,

No drenadas ni vendadas, ni 

aliviadas con ungüento.

7

    Vuestra tierra está asolada, vuestras 

ciudades incendiadas,

Vuestro país, devorado ante vosotros 

mismos;

Desolado, como la desolación que 

causan los extraños.°

8

    La hija de Sión° ha quedado como 

cobertizo de viñedo,

Como choza de melonar, como 

ciudad sitiada.

9

    Si YHVH Sebaot no nos hubiera

dejado un pequeño remanente,

Habríamos llegado a ser como 

Sodoma, semejantes a Gomorra.

Llamado al arrepentimiento

10

    ¡Oíd la palabra de YHVH, príncipes 

de Sodoma!

¡Escuchad la Ley de nuestro Dios, 

pueblo de Gomorra!

11

    ¿De qué me sirve, dice YHVH, la 

multitud de vuestros sacrificios? 

Harto estoy de holocaustos de 

carneros y de sebo de ganado 

gordo.

No quiero sangre de bueyes, ni de 

corderos, ni de machos cabríos.

12

    ¿Quién demanda esto de vuestras 

manos,

Cuando os presentáis ante mí 

pisoteando mis atrios?

13

    No sigáis trayendo ofrendas inútiles;

El incienso me es abominación,

También los novilunios, los 

shabbatot y el convocar 

asamblea.

¡No tolero la iniquidad junto a la 

asamblea solemne!°

14

    Mi alma aborrece vuestras 

solemnidades y novilunios;

Se me han vuelto una carga que no 

soporto más.

15

    Cuando extendáis vuestras manos, 

Esconderé de vosotros mi rostro,

Acerca de Israel

1.4 También hijos, descendencia.  1.5 Es decir, en qué parte de vuestro ser.  1.7 Tradición oral: como en la destrucción de 

Sodoma

1.8 Personificación poética de Jerusalem.  1.13 

→Lv.23.1-44.


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Isaías 1:16

698

Y aunque multipliquéis vuestras 

oraciones, no escucharé,

Porque vuestras manos están llenas 

de sangre.°

16

    ¡Lavaos, purificaos, y quitad de mi 

vista la maldad de vuestras obras!

¡Cesad de hacer el mal!

17

    Aprended a hacer lo bueno,

Buscad la justicia, enderezad al 

opresor,°

Defended el derecho del huérfano, 

abogad por la causa de la viuda.

18

    Y venid después y estaremos a 

cuenta, dice YHVH:

Aunque vuestros pecados sean como 

la grana, como la nieve serán 

emblanquecidos;

Aunque sean rojos como el carmesí, 

vendrán a ser como blanca° lana.

19

    Si sois bien dispuestos y 

obedientes,

Comeréis lo mejor de la tierra.

20

    Pero si rehusáis y os rebeláis, la 

espada os devorará,

Porque la boca de YHVH lo ha dicho.

Amonestación y promesa

21

    ¡Cómo se convirtió en ramera la 

Ciudad Fiel!

Llena estuvo de justicia, y en ella 

pernoctaba la equidad;

Ahora, los asesinos.

22

    Tu plata se ha vuelto escoria,

Tu vino está adulterado con agua.°

23

    Tus príncipes° son rebeldes y 

cómplices de ladrones,

Todos aman el soborno y corren tras 

las dádivas.

No hacen justicia al huérfano ni la 

causa de la viuda llega a ellos.

24

    Por tanto, dice el Soberano, YHVH 

Sebaot, el Fuerte de Israel:

¡Ah, Yo me desquitaré de mis 

adversarios y me vengaré de mis 

enemigos!

25

    ¡Volveré mi mano contra ti y 

purificaré totalmente tus 

escorias,

Y quitaré toda tu impureza!°

26

    Restauraré tus jueces como al 

principio,

Y tus consejeros como los de antaño.

Entonces te llamarán Ciudad Justa, 

Ciudad Fiel.

27

    Sión será rescatada con el derecho,

Y sus convertidos° con la justicia.

28

    Pero la destrucción de impíos y 

pecadores será simultánea,

Y los que abandonan° a YHVH serán 

consumidos.

29

    Entonces se avergonzarán° de las 

encinas que amasteis,

Y os sonrojaréis de los huertos que 

escogisteis.°

30

    Porque seréis como encina de hoja 

seca,

Y como huerto al que le faltan aguas.

31

    El fuerte será la estopa, y su obra la 

chispa,

Y ambos arderán juntos, y no habrá 

quien los apague.

Reinado de YHVH en la Tierra

2

Visión°  que  tuvo  Isaías  ben  Amoz, 

acerca de Judá y de Jerusalem:

2

    Acontecerá en los postreros días

Que el Monte de la Casa de YHVH 

será establecido en la cima de los 

montes,

Y se alzará sobre los collados y 

acudirán° a él todas las naciones.

3

    E irán muchos pueblos y dirán: ¡Venid, 

subamos al Monte de YHVH,

A la Casa del Dios de Jacob!

Él nos enseñará sus caminos,

Y nosotros marcharemos por sus 

sendas,

Porque de Sión saldrá la Ley y de 

Jerusalem la palabra de YHVH.

4

    Él juzgará entre las naciones, y 

reprenderá a muchos pueblos.

De sus espadas forjarán arados y de 

sus lanzas, hoces;

No alzará la espada nación contra 

nación ni se adiestrarán más 

para la guerra.

5

    ¡Oh casa de Jacob, venid, y 

marchemos a la luz de YHVH!

1.15 Es decir, de crímenes de sangre.  1.17 LXX, Vul. y Sir: ayudad (o fortificadal oprimido.  1.18 .blanca.  1.22 Ntu bebida está 

aguada

1.23 Es decir, tus gobernantes.  1.25 Lit. estaño.  1.27 LXX y Sir: su cautividad o sus cautivos.  1.28 Ndesatienden, re-

nuncian

1.29 No es posible identificar al sujeto. Prob. aquellos a quienes se dirige el mensaje son declarados culpables del mismo 

pecado. 

1.29 Esto es, utilizaban árboles y huertos con fines idolátricos en honor a Tamuz.  2.1 Lit. la cosa que vio.  2.2 Lit. fluirán


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Isaías 3:5

699

Contra los soberbios

6

   Tú has desechado a tu pueblo, la 

casa de Jacob,°

Porque están llenos de costumbres 

del oriente,°

Y de agoreros, como los filisteos,

Y baten palmas con los hijos del 

extranjero.°

7

    Su tierra está llena de plata y oro, y 

sus tesoros no tienen fin;

Su tierra está llena de caballos, y sus 

carros no tienen número.

8

    Su tierra también está llena de 

ídolos: ¡Se postran ante la obra de 

sus propias manos,

Delante de lo que han hecho sus 

mismos dedos!

9

    ¡Así se ha postrado el hombre!

¡Así se ha rebajado el humano!

Por tanto no los perdones.

10

    ¡Métete en la peña° y escóndete en 

el polvo,

A causa del Terror° de YHVH y del 

resplandor de su majestad!°

11

    Los ojos altivos del hombre serán 

abatidos,

Y la soberbia de los hombres será 

humillada,

Y sólo YHVH será exaltado en aquel 

día.

12

    Porque el día de YHVH° Sebaot 

vendrá contra todo soberbio y 

altivo,

Contra todo enaltecido,° y será 

abatido;

13

    Contra todos los cedros del Líbano 

altos y erguidos,

Y contra todas las encinas de Basán;°

14

    Contra todas las altas montañas,

Y contra toda colina elevada;

15

    Contra toda torre alta,

Y contra todo muro fortificado;

16

    Contra todas las naves de Tarsis,°

Y contra todo navío suntuoso.

17

    Entonces se doblegará la soberbia 

humana

Y la altivez de los hombres será 

humillada.°

18

    Aquel día desaparecerán totalmente 

los ídolos,

Y sólo YHVH será exaltado.

19

    Y se meterán° en las cuevas de 

las peñas y en las rendijas de la 

tierra,°

A causa del Terror de YHVH, y de la 

gloria de su majestad,

Cuando Él se levante para sacudir 

terriblemente la tierra.°

20

    Aquel día el ser humano arrojará al 

zorro volador° y a los murciélagos 

sus ídolos de plata y sus ídolos de 

oro, que se hicieron para adorar.

21

    Y se meterán en las hendiduras de las 

rocas y en las cuevas de las peñas,

A causa del Terror de YHVH, y 

del resplandor de su majestad, 

Cuando Él se levante para hacer 

temblar la tierra.°

22

    Desentendeos° del hombre, cuyo 

hálito° está en su nariz,

Porque, ¿qué vale realmente?

Contra Judá y Jerusalem

3

 Porque he aquí que el Soberano, 

  YHVH Sebaot,

Aparta de Jerusalem y de Judá todo 

apoyo y sustento,

Todo sustento de pan y todo 

sustento de agua,

2

    Al poderoso y al guerrero,

Al juez y al profeta,

Al adivino y al anciano,

3

    Al capitán,° al honorable y al 

consejero,

Al diestro en la magia y al práctico 

en hechizos.

4

    Por príncipes les pondré 

muchachos,

Y la arbitrariedad regirá sobre ellos.

5

    Brotará entre el pueblo la violencia 

de unos contra otros,

Cada cual contra su compañero.

2.6 LXX registra casa de Israel.  2.6 Lit. de oriente. Se trata de un texto con diversas interpretaciones; LXX: como del principio 

del país; Vul y Sir, como de oriente

2.6 Ny han pactado con extraños.  2.10 

→Ap.6.15  2.10 →Gn.31.42, 53.  2.10 majestad 

→2.19. LXX añade: cuando se levante para oprimir la tierra.  2.12 Primer registro bíblico del Día de YHVH.  2.12 LXX añade: y altivo

2.13 Importante región rica en pastos, ganado y bosques situada al N de Israel.  2.16 Lugar no bien identificado, prob. situado 

en la costa occidental del Mediterráneo. Se refiere a un lugar lejano y se aplica a grandes navíos que efectúan largos recorridos 

comerciales. 

2.17 El cierre de este v. se traslada al v. siguiente.  2.19 Esto es, los idólatras.  2.19 Npolvo.  2.19 Paralelo a 

2.10, 21. 

2.20 Se trata del Ronsettus Aegyptiacus, mamífero con alas de piel, parecido al murciélago.  2.21 Paralelo a 2.10, 19. 

2.22 Nabsteneos, renunciad.  2.22 Nalma, aliento.  3.3 Soldado armado con cinco tipos de armas. 


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Isaías 3:6

700

El joven atacará al anciano, y el 

plebeyo al noble.

6

    Entonces un hombre echará mano 

a su hermano en casa de su padre 

diciendo:°

Tú tienes manto, ¡sé nuestro 

príncipe, y toma esta ruina en 

tus manos!

7

    Ese día otro jurará, diciendo:

¡No soy médico, y en mi casa no hay 

pan ni manto; no me pongáis por 

caudillo del pueblo!

8

    ¡Cierto!, se desmorona Jerusalem y 

se derrumba Judá,

Porque sus palabras y hechos han 

estado contra° YHVH

Para provocar los ojos de su majestad.

9

    La expresión de su rostro atestigua 

contra ellos,

Porque como Sodoma publican su 

pecado, y no lo disimulan.

¡Ay de ellos, porque a sí mismos se 

labran la desgracia!

10

    Decid al justo que le irá bien,

Porque comerá del fruto de su obra.

11

    ¡Ay del impío! Todo le irá mal,

Porque la obra de sus manos será su 

recompensa.

12

    Los opresores de mi pueblo son 

muchachos,°

Y las mujeres° se enseñorean de 

él. ¡Oh pueblo mío, los que te 

conducen te hacen errar,

Y enmarañan el trazado de tus sendas.

13

    A punto de litigar está YHVH,

Y en pie para juzgar a los pueblos.°

14

    YHVH vendrá a juicio contra los 

ancianos y príncipes de su pueblo,

Porque vosotros habéis devastado° 

la viña,

Y el despojo de los pobres está en 

vuestras casas.

15

    ¿Qué es esto? ¿Trituráis a mi pueblo?

¿Moléis el rostro de los desvalidos?

Oráculo de Adonay YHVH Sebaot.

Contra las hijas de Sión

16

    Dice YHVH: Por cuanto las hijas de 

Sión son altivas,

Y caminan con estirado cuello y 

mirada provocativa,

Y andan con pasitos menudos 

haciendo tintinear las cadenillas 

en sus pies,

17

    Adonay cubrirá de tiña la coronilla 

de las hijas de Sión,

YHVH descubrirá sus vergüenzas.°

18

    Aquel día Adonay quitará el ornato 

de las ajorcas,

De las redecillas y las lunetas,

19

    De los pendientes, las pulseras y los 

mantos,

20

    De las diademas, las cadenillas 

tobilleras, y las cintas,

De los pomos de perfume y los 

amuletos,

21

    De los anillos y los aretes 

de la nariz,

22

    De los vestidos preciosos y las 

manteletas,

De los chales y las bolsas,

23

    De los espejos y las camisas de lino, 

De las tiaras y las mantillas.

24

    Y sucederá que en lugar de perfume 

habrá putrefacción;

En lugar de cinturón, cuerda;

En lugar de trenza, calvicie;

En lugar de amplio manto, saco,

Y en lugar de hermosura, 

cicatriz.

25

    Tus varones caerán a espada, y tus 

poderosos en la batalla.

26

    Sus puertas° se entristecerán y se 

enlutarán,

Y desolada, se sentará en el suelo.°

4

 Siete mujeres echarán mano de un 

   mismo varón aquel día, diciendo:

Comeremos nuestro pan y 

vestiremos nuestras ropas,

¡Sólo danos tu apellido y quita 

nuestra deshonra!°

La gloria de Jerusalem

2

    Aquel día el Renuevo de YHVH será 

espléndido y glorioso,

Y el fruto de la tierra excelente y 

hermoso

Para los salvados de Israel.

3.6 .y le dirá.  3.8 Nhan llegado ante.  3.12 Siguiendo la LXX y Vul algunas versiones traducen: sus exactores lo esquilman

los opresores lo ahogan con tributos. 

3.12 LXX: y los que reclaman.  3.13 LXX: a su pueblo.  3.14 Nquemar, consumir, des-

trozar

3.17 Nel Señor decalvará sus sienes.  3.26 Sitio donde se realizaban los juicios del pueblo.  3.26 Según la costumbre 

oriental 

→Job 1.20 y 2.13.  4.1 →13.16; Zac.14.2. 


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Isaías 5:17

701

3

    Y sucederá que quien quede en Sión,

Los que sean dejados en Jerusalem, 

serán llamados santos;

Los inscritos en Jerusalem entre los 

vivos.

4

    Cuando Adonay lave la suciedad de 

las hijas de Sión,

Y limpie la sangre derramada dentro 

de Jerusalem,

Con un viento justiciero, con soplo 

devastador,°

5

    YHVH creará en todo el recinto del 

Monte Sión y su asamblea

Una nube y un humo de día,

Y un fuego llameante de noche;

Porque sobre todos habrá una 

cubierta de gloria,

6

    Enramada° de sombra contra el calor,

Refugio en la tormenta, y cobijo 

contra el aguacero.

La viña de YHVH

5

 Cantaré en nombre de mi amado un 

   canto de amor respecto a su viña:

Tuvo mi amado una viña en un 

collado fértil.

2

    La cavó y despedregó, y plantó una 

preciada cepa.

Construyó una torre en su centro, y 

cavó en ella un lagar.

Esperó a que diera uvas, pero dio 

agrazones.°

3

    Y ahora, oh habitantes de Jerusalem 

y varones de Judá,

Juzgad entre mí y mi viña.

4

    ¿Qué más cabía hacer por mi viña 

que Yo no hubiera hecho?

¿Por qué, esperando que diera uvas, 

dio agrazones?

5

    Os mostraré pues lo que haré con 

mi viña:

Quitaré su vallado para que sirva de 

pasto,

Derribaré su cerca para que la pisoteen.

6

    La dejaré arrasada, no será podada ni 

labrada,

Le crecerán las zarzas y los espinos

Y a las nubes impondré mandato 

para que no lluevan sobre ella.

7

    La viña de YHVH Sebaot es la casa 

de Israel,

Y los hombres de Judá su plantel 

preferido.

Esperaba equidad, y he aquí 

iniquidad;

Rectitud, ¡y he aquí acritud!°

Seis ayes

8

    ¡Ay de los que añaden casas a casas y 

juntan campos con campos,

Hasta que todo lo ocupan y viven 

ellos solos en medio del país!

9

    °YHVH Sebaot ha dicho a mis 

oídos: Sus muchas casas serán 

arrasadas, sus magníficos palacios 

quedarán desolados;

10

    Diez yugadas° de viña darán un 

tonel,°

Y un homer° de semilla un efa.°

11

    ¡Ay de los que madrugan en busca 

de licores,° y el vino los enardece 

hasta el crepúsculo!

12

    Todo es arpa y salterio, flauta y 

tamboril, y vino en sus banquetes,

Pero no consideran lo que YHVH ha 

hecho,

Ni miran la obra de sus manos.

13

    Y así mi pueblo, sin darse cuenta, 

marcha al cautiverio;

Sus nobles mueren de hambre, y el 

vulgo se abrasa de sed.

14

    Por eso el Seol° ensancha sus 

fauces, y dilata su boca sin 

medida:

Allá bajan nobles y plebeyos,

Con su gloria y su alborozo,

Y el que se regocijaba en ella.°

15

    Se doblegará el mortal, será 

humillado el hombre,

Los ojos altivos se bajarán,

16

    Pero YHVH Sebaot será exaltado al 

juzgar,

Al sentenciar el Dios Santo mostrará 

su santidad.°

17

    Los chivos cebados tascarán en sus 

ruinas,

Los corderos pastarán como en sus 

propios pastizales;

4.4 Ncon espíritu de juicio y con espíritu de devastación.  4.6 Ntabernáculo, cabaña.  5.2 Esto es, calidad de uva que nunca 

madura

5.7 Esto es, el clamor irritado de los oprimidos.  5.9 El v. 17 debería leerse a continuación.  5.10 Aprox. 2.5 Has. 

5.10 Aprox. 37 lits.  5.10 Aprox. 300 Kgs.  5.10 Aprox. 37 lits.  5.11 Lit. un licor siguieron.  5.14 Nel sepulcro.  5.14 Esto es, 

Jerusalem

5.17 Este v. debería leerse a continuación del v.9.


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Isaías 5:18

702

18

    ¡Ay de los que arrastran la iniquidad 

con cuerdas de bueyes,

Y el pecado con sogas de carretas!°

19

    Que dicen: ¡Venga ya, apresúrese su 

obra para que la veamos!

¡Cúmplase ya el plan del Santo de 

Israel, para que lo comprobemos!

20

    ¡Ay de los que llaman al mal bien y 

al bien mal;

Que hacen de la luz tinieblas y de las 

tinieblas luz;

Que ponen lo amargo por dulce y lo 

dulce por amargo!

21

    ¡Ay de los que se tienen por sabios,

Y a sí mismos se consideran 

prudentes!

22

    ¡Ay de los valientes para beber vino,

Y de los aguerridos para mezclar licor;

23

    De los que por soborno absuelven al 

culpable,

Y a los inocentes° le quitan su 

derecho!

24

    Porque como la lengua de fuego 

devora el rastrojo, y la paja se 

consume en la llama,

Su raíz se pudrirá y sus brotes se 

desvanecerán como el tamo,

Porque desecharon la Ley de YHVH 

Sebaot,

Y despreciaron la palabra del Santo 

de Israel.

25

    Por eso la ira de YHVH se ha 

inflamado contra su pueblo,

Y extiende su mano para herirlo.

Los montes se estremecen y sus 

cadáveres° yacen como basura en 

la calle;

Y con todo, no se aplaca su ira:

Su mano sigue extendida.

26

    Alzará pendón a un pueblo lejano;

Silbará hacia el extremo de la tierra: 

¡Mirad cuán rápida y velozmente 

viene!

27

    Nadie se cansa ni tropieza,

Ninguno se acuesta ni se adormece,

No se le afloja el cinto de sus lomos

Ni se le rompe la correa de la 

sandalia.

28

    Sus saetas están afiladas y todos sus 

arcos entesados;

Los cascos de sus caballos son 

pedernal,

Y las ruedas, torbellinos.

29

    Su rugido es de león, ruge como los 

leoncillos,

Gruñe, atrapa la presa, y la retiene,

Y nadie se la arrebata.

30

    Pero un día rugirán contra ella° 

como rugen las olas del mar.

Mirarán al país en tinieblas y en 

angustia,°

Y en sus cielos se oscurecerá la luz.

Visión y ministerio

6

El año de la muerte del rey Uzías vi a 

Adonay sentado sobre un trono alto y 

sublime, y sus faldones llenaban la Casa.

2

 Por encima de Él había serafines: cada 

uno tenía seis alas, con dos cubrían sus 

rostros,  con  dos  cubrían  sus  pies  y  con 

dos alas se cernían.

3

 Y alternándose, clamaban:

¡Santo, Santo, Santo, 

YHVH Sebaot!

¡La tierra está llena de su gloria!°

4

 Y los umbrales de las puertas temblaban 

al clamor de su voz, y la Casa estaba llena 

de humo.

5

 Entonces dije: ¡Ay de mí, muerto soy! ¡Yo, 

hombre de labios inmundos, que habito en 

medio de un pueblo de labios inmundos, he 

visto con mis ojos al Rey, a YHVH Sebaot!

6

 Pero uno de los serafines voló hacia mí 

con un ascua en la mano,° que había to-

mado del altar con unas tenazas,

7

 y  tocando  con  ella  mi  boca,  dijo:  ¡He 

aquí  esto  toca  tus  labios:  quitada  es  tu 

culpa y limpio tu pecado!

8

 Entonces oí la voz de Adonay que decía:

¿A quién enviaré?

¿Quién irá por nosotros?

Y dije: ¡Heme aquí, envíame a mí!

9

    Dijo pues: Anda, y di a este pueblo: 

Oíd bien, pero no entendáis;

Ved por cierto, pero no comprendáis.

10

    Embota el corazón de este pueblo

Y que sus oídos se endurezcan y sus 

ojos se cieguen;

No sea que viendo con sus ojos

Y oyendo con sus oídos

5.18 Ncoyundas de novilla.  5.23 LXX y Vul: al justo.  5.25 Otros mss. añaden: Y mató a los príncipes.  5.30 Esto es, Babilo-

nia

5.30 Otras versiones: densa oscuridad.  6.3 NToda la tierra está llena de su gloria.  6.6 Nuna piedra candente


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Isaías 7:19

703

Y entendiendo con su corazón,

Se convierta, y sea sanado.

11

    Y pregunté: ¿Hasta cuándo, Adonay?

Y declaró: Hasta que las ciudades 

estén asoladas y sin morador,

Y no haya hombres en las casas,

Y la tierra venga a ser una 

desolación completa.

12

    Hasta que YHVH haya alejado a los 

hombres°

Y los lugares abandonados sean 

muchos en medio de la tierra.

13

    Y aunque quede en ella una décima 

parte,

De nuevo será barrida.

Pero como el roble o la encina,

Que al ser talados aún les queda la 

cepa,

Así será la cepa de ella, la simiente 

santa.

El mensaje al rey Acaz

7

Aconteció en los días de Acaz ben Jo-

tam,  hijo  de  Uzías,  rey  de  Judá,  que 

Rezín, rey de Siria, y Peka ben Remalías, 

rey de Israel, subieron a Jerusalem para 

conquistarla, pero no prevalecieron con-

tra ella.

2

 Y cuando fue dado aviso al heredero de 

David, diciendo: Siria° se ha confederado 

con Efraín,° el corazón suyo, y el del pue-

blo, se estremecieron° como se estreme-

cen los árboles del bosque con el viento.

3

 Entonces YHVH dijo a Isaías: Sal ahora 

al  encuentro  de  Acaz  con  tu  hijo  Sear-

Yasub,° al extremo del canal del Estanque 

de Arriba, en el camino del Campo del La-

vador,° y dile:

4

    Ten calma y observa:

No temas ni te acobardes ante esos 

dos tizones humeantes,

Por el ardor de la ira de Rezín, y de 

Siria, y del hijo de Remalías,

5

    Pues aunque Siria trame tu ruina,

Y junto con Efraín y el hijo de 

Remalías, haya dicho:

6

    Subamos contra Judá y hostiguemos 

la ciudad,

Abramos una brecha en ella,

Y pongamos en ella por rey al hijo de 

Tabeel,

7

    Así dice Adonay YHVH:

No se cumplirá ni sucederá:

8

    Damasco es capital de Siria,

Rezín, caudillo de Damasco,

9

    Samaria es capital de Efraín,

Y el hijo de Remalías caudillo de 

Samaria.

(Dentro de sesenta y cinco años, 

Efraín, destruido, dejará de ser 

pueblo).

Si no creéis, no subsistiréis.

10

    Y volvió YHVH a hablar a Acaz, y dijo:

11

    Pide una señal a YHVH tu Dios,

En lo profundo del abismo o en lo 

alto de los cielos.

12

    Pero Acaz respondió:

¡No pediré ni tentaré a YHVH!

13

    Dijo° entonces: Oye ahora heredero 

de David:

¿Os es poco el ser molestos a los 

hombres,

Para que también lo seáis a mi Dios?

14

    Por tanto, Adonay mismo os dará 

señal:

He aquí, la virgen° quedará encinta 

y dará a luz un hijo,

Y llamará su nombre Emmanuel.°

15

    Comerá requesón con miel

Hasta que aprenda a rechazar el mal 

y escoger el bien.

16

    Porque antes que el niño aprenda a 

rechazar el mal y escoger el bien,

Será abandonada la tierra por los 

dos reyes que te hacen temer.

17

    YHVH hará venir sobre ti y sobre tu 

pueblo, y sobre la casa de tu padre,

Días como nunca vinieron desde que 

Efraín se separó de Judá,

Esto es, al rey de Asiria.

18

    Aquel día YHVH silbará a los tábanos 

del confín del delta° de Egipto,

Y a las abejas de la tierra de Asiria,°

19

    Y vendrán y se posarán todos ellos 

en las honduras de las quebradas,

Y en las hendiduras de las rocas,

Y en todo matorral y en todo 

abrevadero.

6.12  Sustantivo  singular  con  sentido  colectivo.  7.2  NAram.  7.2  Referencia  al  reino  del  Norte  (Israel).  7.2  Lit  estremeció

7.3  Esto  es,  un  remanente  volverá.  7.3  Nbatanero.  7.13  Esto  es,  Isaías.  7.14  Ndoncella.  7.14  Esto  es,  Dios  con  noso-

tros

7.18 Algunas versiones traducen por los Nilos.  7.18 Referencia a egipcios y asirios respectivamente. 


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Isaías 7:20

704

20

    Aquel día, con una navaja° alquilada 

más allá del Río,°

Esto es, con el rey de Asiria,

Adonay rasurará la cabeza y el pelo 

de sus partes,

Y también afeitará la barba.

21

    Aquel día cada uno mantendrá una 

novilla y dos ovejas,

22

    Y por la abundancia de leche 

comerán cuajada.

Sí, todo el que quede en el país 

comerá cuajada y miel.

23

    Aquel día, en un terreno de mil 

cepas,

Otrora valuadas en mil siclos de 

plata,

Habrá zarzas y espinos.

24

    Tendrán que entrar en él con arcos 

y flechas,

Porque todo el país estará lleno de 

zarzas y espinos.

25

    Y en ninguna de las praderas que 

hoy se labran con la azada,

Se podrá entrar por temor a las 

zarzas y a los espinos;

Serán pasto de vacunos, holladas por 

el ganado.

El saqueo y el botín

8

Me dijo YHVH: Tómate una tabla gran-

de y escribe en ella con letra legible:° 

Para Maher-salal-hasbaz.°

2

 Y Yo me tomaré por testigos fieles, para 

atestiguar la profecía,° al sacerdote Urías 

y a Zacarías ben Baraquías.

3

 Me  llegué  entonces  a  la  profetisa,°  la 

cual concibió y dio a luz un hijo. Me dijo 

YHVH:  Ponle  por  nombre  Maher-salal-

hasbaz.

4

 Porque antes que el niño aprenda a de-

cir papá y mamá, la riqueza de Damasco y 

los despojos de Samaria serán llevados al 

rey de Asiria.

5

 Otra  vez  YHVH  volvió  a  hablarme,  di-

ciendo:

6

    Por cuanto este pueblo desprecia las 

mansas aguas de Siloé,

Y desfallece ante Rezín y el hijo de 

Remalías,

7

    Sabed que Adonay los sumergirá en 

las aguas del Éufrates,

Torrenciales e impetuosas (el rey de 

Asiria con todo su ejército),

Que rebasan los cauces y desbordan 

las riberas.

8

    E inundarán Judá, y crecerán y 

llegarán hasta el cuello,

Y se desplegarán sus alas hasta 

cubrir la anchura de tu tierra,

¡Oh Emmanuel!

9

    Oh pueblos, ¡ensañaos y sed 

derrotados!

Prestad oído, lejanías todas de la 

tierra:

¡Armaos, y sed derrotados!

¡Armaos, y sed derrotados!

10

    Trazad un plan, y fracasará;

Proferid amenazas, y no se 

cumplirán,

Porque tenemos a Emmanuel.

11

    Así me habló YHVH, y su mano era 

fuerte sobre mí,

Y me amonestó para que no 

anduviera en el camino de este 

pueblo:

12

    No llaméis aliados a todo lo que este 

pueblo llama aliados,

Ni participéis en su temor ni os 

amedrentéis.

13

    ¡A YHVH Sebaot santificad!

¡Sea Él vuestro temor y sea Él 

vuestro pavor!

14

    Él os será por santuario,

Pero piedra de tropiezo y roca de 

caída

Para ambas casas de Israel;

Red y trampa para los habitantes de 

Jerusalem.

15

    Muchos tropezarán entre ellos,

Y caerán y serán quebrantados;

Se enredarán y quedarán apresados.

16

    Ata el rollo° del testimonio,

Y sella la Ley° entre mis discípulos.

17

    Esperaré a YHVH, que ha escondido 

su rostro de la casa de Jacob;

Sí, a Él esperaré.°

18

    He aquí, yo y los hijos que YHVH 

me dio,

7.20  LXX:  con  una  gran  navaja.  7.20  Esto  es,  el  Éufrates.  8.1  Lit.  pluma  o  punzón  de  hombre.  Ncon  escritura  corriente

8.1 Esto es, pronto saqueo, rápido botín. El nombre se explica en 10.6.  8.2 .la profecía.  8.3 Esto es, la esposa de Isaías

8.16 .el rollo.  8.16 Nalianza.  8.17 Nconfiaré


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Isaías 9:13

705

Como señales y presagios para 

Israel,

De parte de YHVH Sebaot que habita 

en el Monte Sión.

19

    Y cuando os digan:

Consultad a los que evocan a los 

muertos

Y a los adivinos que musitan y 

susurran, responded:

¿No consultará el pueblo a su Dios?

¿Por qué habrán de ir los vivos a 

consultar a los muertos?

20

    ¡A la Ley y al testimonio!

Si no dicen conforme a esta palabra,

Es porque no les ha amanecido.°

21

    Pasarán por la tierra fatigados y 

hambrientos,

Y sucederá que teniendo hambre,

Se indignarán y maldecirán a su rey 

y a su Dios.

Alzarán la vista

22

    Y mirarán la tierra,

Y he allí tribulación y tinieblas, 

angustia y oscuridad,

Y serán sumidos en la oscuridad.

El Mesías

9

Pero no habrá siempre oscuridad para 

la° que está ahora en angustia. Como 

en tiempos pasados hizo° que fuera des-

preciada la tierra de Zabulón y la tierra de 

Neftalí, así en los venideros la hará glo-

riosa por el camino del mar, al otro lado 

del Jordán,° en Galilea de los gentiles.

2

    El pueblo que andaba en tinieblas 

verá gran luz;

A los que moraban en tierra de 

sombra de muerte,

Les resplandecerá la luz.

3

    Multiplicaste la alegría,°

Aumentaste el gozo;

Se alegrarán delante de ti como se 

alegran en la siega,

Como se gozan cuando reparten 

despojos.

4

    Porque el yugo de su carga y la vara 

de su hombro,

Y el cetro de su opresor,°

Los quebraste, como en el día de 

Madián.

5

    Porque toda bota que pisa con 

estrépito°

Y toda capa empapada en sangre,

Serán para quemar, pasto del fuego.

6

    Porque un Niño nos es nacido, Hijo 

nos es dado;

El dominio estará sobre 

su hombro,

Y se llamará su nombre:

Admirable, Consejero,° Dios Fuerte, 

Padre Eterno, Príncipe de Paz.

7

    Lo dilatado de su principado y la paz 

no tendrán fin

Sobre el trono de David y sobre su 

reino,

Para disponerlo y afirmarlo con la 

justicia y el derecho

Desde ahora y para siempre.

¡El celo de YHVH Sebaot hará esto!

Contra Israel

8

    Adonay° ha enviado un oráculo 

contra Jacob,

Y éste ha caído en Israel.

9

    Lo entenderá el pueblo entero,

Efraín y los habitantes de Samaria,

Que van diciendo con soberbia y 

altivez de corazón:

10

    ¿Los ladrillos se cayeron?

¡Pues con piedras labradas 

volveremos a edificar!

¿Los sicómoros fueron talados?

¡Pues con cedros los 

reemplazaremos!

11

    Por tanto YHVH levanta contra ellos 

al adversario, al de Rezín,

E incita a sus enemigos:

12

    A los sirios° desde el levante°

Y a los filisteos desde el poniente,°

Para que a boca llena devoren a 

Israel;

Y con todo, no se aplaca su ira:

Su mano sigue extendida.

13

    Pero el pueblo no se vuelve al que lo 

castiga,

Ni busca a YHVH Sebaot.

8.20 Lit. no tiene amanecer. LXX y Sir: no sería traída ofrenda para él.  9.1 Nel. Pero el femenino se sostiene por el pueblo de 

Israel como esposa o hija de Sión

9.1 Esto es, Dios.  9.1 Nla Transjordania.  9.3 Nla gente.  9.4 Ndel que le fustiga.  9.5 Se 

refiere al fragor de la batalla. Por analogía con el caldeo: Npues toda bota militar que taconea con estrépito

9.6 Hay versiones 

que registran Admirable consejero

9.8 LXX: muerte.  9.12 Narameos.  9.12 Npor delante.  9.12 Npor detrás.


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Isaías 9:14

706

14

    Por tanto, YHVH cortará de Israel 

cabeza y cola,

Palma y junco en un mismo día.

15

    El anciano honorable es la cabeza,

El profeta embaucador la cola.

16

    Los que guían a este pueblo lo 

extravían,

Y los que se dejan guiar son 

destruidos.

17

    Por tanto, Adonay no se 

compadecerá de sus jóvenes,

Ni tendrá compasión de sus 

huérfanos y de sus viudas;

Porque todos son impíos y 

malvados,

Y toda boca habla infamias.°

Y con todo, no se aplaca su ira:

Su mano sigue extendida.

18

    ¡Sí!, la maldad arderá como fuego,

Devorará las zarzas y los espinos,

Encenderá la espesura del bosque,

Y se elevará en densa humareda.

19

    ¡Por la ira de YHVH Sebaot el país se 

tambalea,°

Y el pueblo es pasto del fuego!

20

    Cada uno devora la carne de su 

prójimo

Y ninguno perdona a su hermano.

Devora a diestra, y sigue con 

hambre,

Devora a siniestra, pero no se harta.

21

    Manasés contra Efraín,

Y Efraín contra Manasés,

Y ambos se alzan contra Judá;

Y con todo, no se aplaca su ira:

Su mano sigue extendida.

10

¡Ay de quienes decretan decretos 

injustos,

Y legislan leyes inicuas,

2

    Que privan de justicia al débil,

Y niegan el derecho a los pobres de 

mi pueblo;

Que hacen de las viudas su presa,

Y despojan a los huérfanos!

3

    ¿Qué haréis el día del escarmiento, 

cuando la tempestad° lejana se os 

venga encima?

¿A quién acudiréis por auxilio?

¿A quién ofreceréis vuestra riqueza

4

    Para no marchar encorvados con los 

cautivos,

Para no caer entre los asesinados?

Y con todo, no se aplaca su ira:

Su mano sigue extendida.

Destino de Asiria

5

    ¡Ay Asiria, vara de mi ira!

Mi indignación, cetro de tu mano.

6

    Lo envié contra una nación infiel,

Lo despaché contra el pueblo de mi 

ira,

Para que capturara el botín, tomara 

despojos,

Y lo pisoteara como barro 

callejero.

7

    Pero no lo entendió así, ni eran esos 

sus designios;

Su propósito era aniquilar y 

exterminar no pocas naciones.

8

    Porque dijo:

¿No son todos mis ministros reyes?

9

    ¿No fue Calno cual Carquemis?

¿No fue Hamat como Arfad°

Y Samaria como Damasco?

10

    Así como mi mano alcanzó reinos de 

dioses,

Cuyas imágenes eran más que las de 

Jerusalem y de Samaria,

11

    Lo que hice a Samaria y a sus 

imágenes,

¿No lo haré con Jerusalem y sus 

ídolos?

12

    °Por eso, cuando Adonay acabe toda 

su obra en el Monte Sión y en 

Jerusalem,

Castigará° el fruto de la soberbia del 

corazón del rey de Asiria,

Y la arrogancia altanera de sus ojos.

13

    Porque dijo:

Con la fuerza de mi mano he hecho 

esto,

Con mi talento, porque soy muy 

entendido;

Así cambio las fronteras de los 

pueblos,

Me apodero de sus tesoros,

Y, como valiente,° derribo a los que 

están entronizados.°

9.17 Ninfamia, bajeza.  9.19 Ntambalearse, incendiarse.  10.3 Es decir, ruina, destrucción, devastación.  10.9 Ciudades del 

norte  de  Siria,  ocupadas  por  los  asirios. 

10.12  Este  versículo  debería  leerse  después  del  v.15 

→§163  10.12 Lit. castiga-

10.13 Es decir, como valiente que soy.  10.13 Lit, sentados.


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Isaías 10:34

707

14

    Mi mano toma, como de un nido, la 

riqueza de los pueblos;

Como cualquiera recoge huevos 

abandonados,°

Así he recogido yo todos los tesoros 

de la tierra,

Y no ha habido quien moviera el ala 

ni dijera pío.

15

    ¿Se enaltecerá el hacha contra el 

que la empuña?

¿Se engrandecerá la sierra sobre el 

que la maneja?

¡Como si el cetro manejara a quien 

lo alza,

O la vara levantara al que no es leño!

16

    Por eso el Soberano YHVH Sebaot 

meterá escualidez en sus 

robustos,°

Y debajo de su gloria arderá una 

hoguera de fuego abrasador.

17

    La chispa de Israel se convertirá en 

fuego,

Y su Santo en llama que arderá

Y consumirá en un solo día sus 

zarzas y sus espinos.

18

    Él consumirá en cuerpo y alma 

la gloria de su bosque y de su 

huerto fructífero,°

Y será como abanderado en derrota.°

19

    Y quedarán tan pocos árboles de su 

bosque,

Que hasta un niño podrá contarlos.

20

    Aquel día el remanente de Israel

Y los sobrevivientes de la casa de 

Jacob,

No se apoyarán más en su agresor, 

Sino que en verdad se apoyarán 

en YHVH, el Santo de Israel.

21

    Un remanente volverá,

Un remanente de Jacob volverá al 

Guerrero Divino.

22

    Pues aunque tu pueblo, oh Israel, 

fuera como la arena del mar,

Sólo un remanente volverá.

¡La destrucción está decretada y 

rebosa de justicia!

23

    Adonay YHVH Sebaot ejecutará la 

sentencia definitiva° e irrevocable 

En medio de toda la tierra.

24

    Por tanto, así dice Adonay YHVH 

Sebaot:

¡Oh pueblo mío que moras 

en Sión,

No temas a Asiria aunque te hiera 

con vara,

Y alce su cetro contra ti, a la manera 

egipcia!

25

    Porque dentro de muy poco la ira se 

aplacará,

Y mi furor los aniquilará.

26

    YHVH Sebaot chasqueará su látigo 

contra ellos,

Como cuando hirió a Madián en la 

peña de Oreb,

Como cuando alzó su vara contra el 

mar, en el camino de Egipto.

27

    Aquel día su carga será quitada de tu 

hombro y su yugo de tu cerviz,

Y el yugo se pudrirá a causa de tu 

robustez.°

28

    Viene contra Ajat, pasa por Migrón,

Y en Micmas revisa sus armas.°

29

    Pasa el vado y pernoctan en Geba,

Alarmada está Ramá,

Gabaa de Saúl ha huido.

30

    ¡Clama a gran voz, Bat-Galim!° 

¡Escúchala, Lais!

¡Oh pobre Anatot!

31

    Madmena huye en tropel,

Y los moradores de Gebim buscan 

refugio.

32

    Hoy mismo hace alto en Nob,°

Ya agita la mano contra el monte de 

las hijas de Sión,

La colina de Jerusalem.

33

    ¡Mirad! el Soberano YHVH Sebaot 

descuaja el ramaje con violencia°

¡Los más altos son talados!

¡Los más altos se desploman!

34

    ¡Cortada a hachazos es la espesura 

del bosque!

Y a manos del Poderoso el Líbano va 

cayendo.

10.14  Nabandonados,  desamparados.    10.16  Ngordura,  hombres  fornidos  y  vigorosos.  10.18  Ntierra  fértil,  huerto

10.18 Ny será como el consumirse de un calenturiento; Ncomo roe la carcoma; Nserá como el languidecer de un enfer-

mo

10.23 Es decir destrucción, exterminio, aniquilación, consumación.  10.27 Lit. cuello gordo. A causa de su difícil inter-

pretación, el final de este v. ha sido objeto de varias correcciones y omisiones. LXX: se corromperá el yugo sobre tu hombro

10.28 LXX: bienes, aparejos.  10.30 Nombre citado en 1 S.25.44.  10.32 Lugar del cual se desconoce su enclave, aunque se cita 

en varias ocasiones 

→1 S.22.9,11,19; Ne.11.32.  10.33 Ncon una gran hacha.


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Isaías 11:1

708

Reinado del Mesías

11

Pero saldrá una vara del tronco de 

Isaí,°

Y un vástago retoñará° de sus 

raíces.

2

    Y sobre Él reposará el Espíritu de 

YHVH:

Espíritu de sabiduría y de 

inteligencia,

Espíritu de consejo y de poder,

Espíritu de conocimiento y de temor 

de YHVH.

3

    Se deleitará en el temor de YHVH,

No juzgará según la vista de sus 

ojos,

Ni arbitrará por lo que oigan sus 

oídos,

4

    Sino que juzgará con justicia a los 

pobres,

Y arbitrará con equidad por los 

mansos° de la tierra;

Herirá al opresor° con la vara de su 

boca,

Y con el espíritu de sus labios 

matará° al impío.

5

    La justicia será el cinto de sus 

lomos,

Y la fidelidad, ceñidor de su cintura.

6

    Entonces morará el lobo con el 

cordero,

Y el leopardo sesteará junto con el 

cabrito;

El becerro, el cachorro de león y el 

animal cebado crecerán° juntos

Y un niño los pastoreará.

7

    Pacerán la vaca y la osa,

Y sus crías se echarán juntas,

Y el león comerá paja como el buey.

8

    El niño de pecho jugará sobre la 

cueva del áspid,

Y el recién destetado meterá su 

mano en el escondrijo de la 

serpiente.

9

    No harán mal ni dañarán en todo mi 

Santo Monte,

Porque como las aguas colman el mar,

Así la tierra estará llena del 

conocimiento de YHVH.

10

    Aquel día que las naciones buscarán 

a Aquél que es la raíz de Isaí,

El cual estará en pie como 

estandarte° a los gentiles,

Y su morada será gloriosa.

11

    En aquel día Adonay° volverá a 

recobrar con su mano,

Por segunda vez, al remanente de su 

pueblo,

Que haya quedado en Asiria y en 

Egipto,

En Patros, en Etiopía y en Persia,°

En Caldea,° en Hamat° y en las islas 

del mar.

12

    Y alzará pendón ante las naciones,

Para juntar a los desterrados de 

Israel,

Y congregar a los esparcidos de 

Judá,

De los cuatro extremos de la tierra.

13

    Entonces será quitada la envidia de 

Efraín,

Y se acabará el rencor de Judá;

Efraín no tendrá envidia de Judá,

Ni Judá afligirá más a Efraín.

14

    Desde el occidente volarán sobre los 

hombros de los filisteos,°

Y unidos despojarán a los hijos de 

oriente.

Edom y Moab caerán en sus manos,

Y los hijos de Amón les obedecerán.

15

    YHVH secará la lengua del mar de 

Egipto;

Con el poder de su aliento alzará su 

mano contra el Río,°

Lo partirá en siete cauces que se 

pasarán en sandalias.

16

    Y habrá una calzada para el 

remanente de su pueblo que 

quede en Asiria,

Como la tuvo Israel cuando subió de 

la tierra de Egipto.

Adoración en el reino

12

Aquel día dirás:

Cantaré° a ti, oh YHVH,

Porque estabas airado contra mí,

Pero tu indignación ha cesado

11.1 Nun vástago de la estirpe de Jesé.  11.1 Nfructificará.  11.4 Nhumildes.  11.4 El registro ‘erets = tierra, es un evidente 

error del copista. A causa del paralelismo, el vocablo original era sin duda ‘arits = opresor, el cual sufrió corrupción textual 

debido a semejanza fonética. 

11.4 Nhará perecer, ajusticiará, destruirá.  11.6 LXX: pacerán juntos.  11.10 En sentido figura-

do: por señal, por prodigio

11.11 

→ § 5. Otras versiones registran YHVH.  11.11 NElam.  11.11 NSinar.  11.11 Ciudad siria. 

11.14 Nhacia el mar.  11.15 Esto es, el Éufrates.  12.1 Es decir, daré gracias


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Isaías 13:18

709

Y me has consolado.

2

    He aquí Dios es mi salvación;

Me aseguraré° y no temeré,

Porque mi fortaleza y mi cántico es 

YH, YHVH,

Y Él fue mi salvación.

3

    Sacaréis aguas con alegría

Del manantial de la salvación.

4

    Y diréis aquel día: ¡Dad gracias a 

YHVH, e invocad su Nombre!

¡Contad a los pueblos sus proezas!

¡Proclamad que su Nombre es 

excelso!

5

    ¡Cantad° a YHVH, que hizo proezas!

¡Sean conocidas en toda la tierra!

6

    ¡Regocíjate y canta, oh habitante de 

Sión,

Porque el Santo de Israel se ha 

engrandecido en medio de ti!

Contra Babilonia

13

Carga de Babilonia, que recibió en 

visión° Isaías ben Amoz.

2

    ¡Alzad estandarte sobre un monte 

desolado!

¡Gritadles con fuerza agitando la 

mano,

Para que entren por las puertas de 

los príncipes!

3

    He comisionado a mis consagrados,

Recluté a los valientes de mi ira,

Que se alegran en mi triunfo.

4

    ¡Ruido de tumulto hay en los 

montes,

Como de un ejército numeroso!

¡Voz de bullicio de reinos y naciones 

coligadas!

¡YHVH Sebaot alista su ejército para 

la batalla!

5

    Vienen de tierra lejana, del confín de 

los cielos:

YHVH con las armas de su ira,° para 

asolar la tierra entera.

6

    Gemid, porque cercano está el día de 

YHVH;

Vendrá como azote de ’El-Shadday.°

7

    Todos los brazos desmayarán,

Todo corazón humano desfallecerá,

8

    Estarán consternados;

Los sobrecogerán dolores y 

espasmos,

Se retorcerán cual parturienta,

Se mirarán atónitos unos a otros,°

Sus rostros serán rostros 

llameantes.

9

    He aquí viene implacable el día de 

YHVH,

Con indignación y ardiente ira,

Para dejar la tierra desolada

Y extirpar de ella los pecadores.

10

    Las estrellas de los cielos y su 

constelación de Orión no 

despedirán luz;

El sol se oscurecerá al salir

Y la luna no dará su resplandor.

11

    Castigaré al mundo por su maldad,

A los inicuos por su iniquidad.

Haré cesar la arrogancia de los 

soberbios

Y humillaré la altivez de los tiranos.

12

    Haré al mortal más escaso que el 

oro;

Y a la humanidad más que el oro de 

Ofir,

13

    Porque haré estremecer los cielos,

Y la tierra se sacudirá de su sitio,

Por la indignación de YHVH 

Sebaot,

El día del ardor de su ira.

14

    Entonces, como gacela acosada,

O como rebaño que nadie recoge,

Cada uno mirará hacia su pueblo,

Y cada uno huirá a su tierra.

15

    El que sea atrapado, será traspasado;

Y el que capturado, caerá a espada.

16

    Sus niños° serán estrellados ante 

sus propios ojos,

Sus casas saqueadas, sus mujeres 

violadas.

17

    He aquí, Yo alzo contra ellos a los 

medos,

Que no estiman la plata ni codician 

el oro.

18

    Derribarán con sus arcos a los 

muchachos,

Y no tendrán piedad del fruto del 

vientre,

Ni su ojo perdonará a los niños.

12.2 Nconfiaré.  12.5 La LXX emplea un verbo que significa cantar con himnos, de ahí que algunas versiones han traducido 

cantad salmos

13.1 Npredijo, profetizó, discernió.  13.5 Nindignación, furor, maldición.  13.6 

→ § 5.  13.8 Lit. cada uno a su 

compañero

13.16 Nrecién nacidos


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Isaías 13:19

710

19

    Y Babilonia, perla de los reinos,

Joya y orgullo de los caldeos,

Vendrá a ser como cuando ’Elohim 

arrasó a Sodoma y Gomorra:

20

    Nunca jamás será habitada,

Ni morarán en ella de generación en 

generación;

No plantará allí el beduino su tienda,

Ni harán allí los pastores aprisco,

21

    Sino que sestearán allí los 

moradores del desierto,

Y sus casas se llenarán de hurones;°

Habitarán allí las crías del avestruz,

Y saltarán allí las cabras salvajes.°

22

    La hienas aullarán en sus° palacios,

Y en sus lujosas mansiones los 

chacales.

Su hora está al llegar, y sus días no 

serán prolongados.

Contra el rey de Babilonia

14

Sí, YHVH tendrá misericordia de 

Jacob,

Él volverá a escoger a Israel.

Y los hará reposar en su propia 

tierra;

Los extranjeros se juntarán a ellos,

Y se unirán a la casa de Jacob.

2

    Las naciones los recogerán y los 

llevarán a su lugar,

Y la casa de Israel se apropiará de 

ellos como siervos y siervas en la 

tierra de YHVH,

Y cautivarán a sus cautivadores,

Y subyugarán a sus tiranos.

3

    Aquel día YHVH te dará descanso de 

tu labor y de tu tribulación,

Y de la dura servidumbre que te fue 

impuesta.

4

    Entonces pronunciarás mofa contra 

el rey de Babilonia, diciendo:

¡Cómo terminó el tirano!

¡Cómo acabó su prepotencia!

5

    YHVH ha hecho pedazos la vara de 

los impíos,

El cetro de los dominadores,

6

    Que con furia golpeaba a los pueblos 

sin parar,

E iracundo oprimía a las naciones 

con acoso imposible de impedir.

7

    La tierra entera reposa tranquila y 

prorrumpe en gritos de júbilo.

8

    Aun los cipreses y los cedros del 

Líbano se alegran de tu suerte, 

diciendo:

¡Desde que fuiste derribado, ya no 

sube el talador contra nosotros!

9

    El Seol se estremecerá por ti en lo 

profundo al topar con tu llegada,

Y despertará en tu honor a todos los 

espíritus de los muertos,

A todos los potentados de la tierra,

Y levantará de sus tronos a todos los 

reyes de las naciones.

10

    Y todos ellos te cantarán a coro, 

diciendo:

¿También tú fuiste debilitado como 

nosotros,

Y has llegado a ser como nosotros?

11

    Descendió al Seol tu soberbia,

Y ya no se oye el estruendo de tus 

salterios;

Debajo tuyo hace cama 

la gusanera,

Y los gusanos son tu cobertor.

12

    ¡Cómo caíste del cielo, oh Lucero, 

hijo de la mañana!

Tú, que abatías las naciones, has 

sido derribado a tierra.

13

    Tú que decías en tu corazón:

Subiré a los cielos, en lo alto,

Junto a las estrellas de Dios 

levantaré mi trono,

Y en el monte del testimonio me 

sentaré, a los lados del norte.

14

    Sobre las alturas de las nubes° 

subiré,

Y seré semejante a ’Elyón.°

15

    ¡Ay, pero tú, derribado eres hasta el 

Seol,

A lo profundo del abismo!

16

    Los que te vean te observarán 

atentamente,

Se cerciorarán de ti, y dirán:

¿Es éste aquel varón que hacía 

temblar la tierra,

Que sacudía los reinos,

17

    Que convirtió el mundo en un 

desierto,

13.21 Nchacales.  13.21 Nsátiros, demonios personificados mitad hombre y mitad macho cabrío.  13.22 Esto es, Babilonia

14.14 Lit. una nube.  14.14 

→ § 5.


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Isaías 15:5

711

Que asoló sus ciudades,

Y a sus presos nunca abrió la cárcel?

18

    Todos los reyes de la tierra,

Todos ellos yacen con honra,

Cada uno en su última morada.

19

    Pero tú eres echado de tu sepulcro 

como vástago abominable,

Como ropaje de muertos pasados a 

espada,

Precipitados al fondo de la fosa, 

como un cadáver pisoteado.

20

    No te unirás a ellos 

en la sepultura,

Porque tú destruiste tu tierra y 

mataste a tu pueblo,

Y la simiente de los malignos nunca 

jamás será nombrada.

21

    Preparad la matanza de sus hijos por 

la maldad de sus padres,

No sea que se levanten y posean la 

tierra, y llenen de ciudades la faz 

del mundo.

22

    Porque me levantaré contra ellos, 

dice YHVH Sebaot,

Y extirparé de Babilonia la 

posteridad y el apellido,

Al retoño y a la descendencia, dice 

YHVH.

23

    Y la convertiré en posesión de erizos 

y en ciénaga,

Y la barreré con la escoba del 

exterminio, dice YHVH Sebaot.

Contra Asiria

24

    YHVH Sebaot juró diciendo:

Ciertamente lo que he planeado 

sucederá,

Y lo que he decidido permanecerá 

estable:

25

    Al Asirio quebrantaré en mi tierra,

Y sobre mis montes lo pisotearé;

Su yugo será quitado de ellos

Y su carga apartada de su espalda.

26

    Éste es el consejo planeado contra 

toda la tierra,

Y ésta la mano extendida contra 

todas las naciones.

27

    Si YHVH Sebaot lo ha determinado 

¿Quién lo impedirá?

Su mano extendida ¿quién la hará 

volver atrás?

Contra Filistea

28

 En el año que murió el rey Acaz, hubo 

esta profecía:

29

    No te alegres, oh Filistea toda,

De que haya sido rota la vara del que 

te hería,

Porque de la cepa de la serpiente 

saldrá una víbora,

Y su fruto será un dragón alado,

30

    Que hará morir de hambre a tu cepa 

y matará tu remanente,

Mientras que los más indigentes 

serán apacentados

Y los pobres reposarán confiados.

31

    ¡Aúlla, puerta! ¡Grita, ciudad!

¡Desfallece, oh Filistea, 

toda tú!

Porque un humo viene del norte,

Y no hay rezagado en sus huestes.

32

    ¿Y qué se responderá a los 

mensajeros de las naciones?

Que YHVH ha cimentado a Sión,

Y que en ella se refugian los afligidos 

de su pueblo.

Contra Moab

15

Carga de Moab:

Cierto, la noche que asolaron Ar,° 

sucumbió Moab.

Cierto, la noche que asolaron Kir,° 

sucumbió Moab.

2

    La hija de Dibón sube a los lugares 

altos para llorar,

Moab gime sobre el Nebo y sobre 

Medeba,

En todas sus cabezas hay calvez,

Y toda barba está rasurada.

3

    En sus plazas se ciñen de saco,

Sobre sus terrados y en sus calles 

todos lanzan alaridos,

Desechos en llanto.

4

    Se lamentan Hesbón y Eleale,

Hasta Jahaza llega su clamor,

Gimen los guerreros de Moab,

Y el alma de cada uno desfallece 

dentro de sí.

5

    Mi corazón clama por Moab;

Sus fugitivos se extienden hasta 

Zoar, hasta Eglat.

Por la cuesta de Luhit suben 

llorando,

15.1 Esto es, ciudad.  15.1 Esto es, fortaleza


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Isaías 15:6

712

Por el camino de Horonaim lanzan 

gritos de quebranto,

6

    Porque las aguas de Nimrim se han 

secado,

La hierba está marchita, no hay 

verdor y se consume el pasto.

7

    Por eso, las riquezas que han 

adquirido y han almacenado,

Las llevan al Torrente de los Sauces;

8

    Porque el llanto se ha extendido a 

los confines de Moab,

Hasta Eglaim se oye su lamento,

Hasta Beer-elim° su clamor.

9

    Porque las aguas de Dimón están 

llenas de sangre,

Reservo nuevas plagas contra 

Dimón:

El león contra el resto de Moab,

Contra los que queden en el campo.

Las mujeres de Moab

16

Enviad el cordero° al soberano de 

la tierra,

Desde Petra,° por el desierto,

Al Monte de la hija de Sión.

2

    Cual ave espantada que huye del 

nido,

Irán las hijas de Moab en los vados 

de Arnón.

3

    ¡Dad consejo, haced lo justo!

Haz que tu sombra sea grata como la 

noche en el ardor del mediodía:

¡Esconde los desterrados,

Y no descubras al fugitivo!

4

    Moren contigo mis fugitivos de 

Moab.

Sé para ellos refugio ante el 

destructor hasta que cese el 

opresor,

Hasta que acabe el devastador

Y el agresor desaparezca de la tierra.

5

    En el tabernáculo de David será 

establecido un trono fundado en 

la misericordia y la verdad.

En él se sentará un Juez celoso del 

derecho, solícito de la justicia.

6

    Hemos oído del orgullo de Moab,

Su gran orgullo, su soberbia, su 

arrogancia y su insolencia;

Pero es vana su jactancia,

7

    Porque Moab gemirá por Moab,

Toda ella se lamentará por las tortas 

de pasas de Kir-hareset.

Sí, gemiréis enteramente 

desconsolados.

8

    Los campos de Hesbón se 

marchitarán como las vides de 

Sibma.

Los jefes de las naciones pisotearán 

sus mejores vides,°

Cuyos sarmientos llegaban hasta 

Jazer y se desviaban al desierto,

Cuyos vástagos se extendían y 

cruzaban las aguas.

9

    Por eso lloro con el lloro de Jazer 

por la viña de Sibma.

Te regaré con mis lágrimas Hesbón, 

y también a ti, Eleale,

Porque sobre tus cosechas y tus 

siegas caerán clamores de 

guerra.

10

    Se retirará del campo el gozo y la 

alegría;

No cantarán jubilosos en las viñas, 

ni pisarán el vino en el lagar,

Porque habré hecho cesar los 

cánticos.

11

    Por eso mis entrañas vibran como 

un arpa por Moab,

Y mi pecho por Kir-hareset.

12

    Y cuando Moab se muestre cansado 

sobre los lugares altos,

Cuando entre a orar en su santuario, 

de nada le servirá.

13

    Ésta es la palabra que YHVH habló 

antes acerca de Moab.

14

    Pero ahora YHVH habla, diciendo:

Dentro de tres años, años de 

jornalero, la gloria de Moab 

será abatida con toda su gran 

multitud,

Y los que queden serán pocos, 

escasos, y sin ningún valor.

Contra Damasco

17

La carga de Damasco:

He aquí Damasco dejará de ser 

ciudad,°

Y vendrá a ser un montón de ruinas.

2

    Abandonadas para siempre, las 

15.8 LXX: pozo, cisterna.  16.1 Nmensajero.  16.1 Ciudad al S del Mar Muerto.  16.8 Npámpanosracimos.  17.1 Lit. será 

apartada de ciudad.


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Isaías 18:5

713

ciudades de Aroer serán para 

rebaños

Que se tumbarán sin que nadie los 

espante.

3

    Efraín perderá su fortaleza y 

Damasco su soberanía,

Y el resto de los sirios serán como 

la nobleza de Israel, dice YHVH 

Sebaot.

Acerca de Israel

4

    En aquel tiempo menguará la gloria 

de Jacob

Y enflaquecerá la grosura de su 

carne.

5

    Será como cuando el segador abraza 

la mies

Y su brazo siega las espigas;

Como cuando recogen las espigas en 

el valle de Refaim.

6

    Pero, como en el vareo del olivo, así 

quedará en él un rebusco:

Dos o tres olivas en lo alto de la 

copa,

Cuatro o cinco en su rama más 

fructífera, dice YHVH, Dios de 

Israel.

7

    Aquel día el hombre mirará a su 

Hacedor,

Sus ojos contemplarán al Santo de 

Israel.

8

    Y no mirará los altares que sus 

propias manos construyeron,

Ni mirará lo que hicieron sus dedos,

Ni a los símbolos de Asera,°

Ni a las imágenes del sol.

9

    Aquel día sus plazas fuertes serán 

como ruinas abandonadas° ante 

los hijos de Israel,

Y quedarán desiertas,

10

    Pues olvidaste a Dios tu Salvador,

Y no te acordaste de la Roca de tu 

fortaleza.

Por ello, aunque siembres plantas 

deleitosas,

E injertes vides importadas,

11

    Y en el día que las plantes logres que 

germinen,

Y logres que florezcan de mañana,

No obstante la cosecha se malogrará 

en el día funesto de dolor 

incurable.

12

    ¡Ay, tumulto de muchos pueblos, 

que rugen como ruge el mar!

¡Tropel de naciones como el ímpetu 

de aguas poderosas!

13

    Las naciones bramarán como el 

bramido de muchas aguas,

Pero Él las reprenderá y huirán 

lejos,

Serán hostigadas como tamo del 

monte ante el viento,

Y como remolino de polvo ante la 

tormenta.

14

    He aquí, al anochecer se presenta el 

terror,

Pero antes del amanecer ya no existen.

Tal es el destino de los que nos 

oprimen,

La suerte de quienes nos saquean.

Acerca de Etiopía

18

¡Ay de la tierra que retumba,

Que está allende los ríos de 

Etiopía!°

2

    Que envía embajadores por el mar 

navegando en naves de papiro, 

que dicen:

Corred presto mensajeros, al pueblo 

de elevada estatura y de brillante 

piel,

A un pueblo temido por cercanos y 

lejanos,

Nación agresiva y atropelladora,

Cuya tierra dividen los ríos.

3

    Vosotros, habitantes del mundo y 

moradores de la tierra:

Al alzarse la bandera en los montes, 

mirad;

Al soplido del shofar,° escuchad,

4

    Que así me ha dicho YHVH:

Como el calor vibrante ante la luz,

Como el vaho de la nube al 

bochorno de la siega,

Desde mi morada Yo contemplaré 

sereno,

5

    Antes de la vendimia,° cuando haya 

acabado la floración,

17.8  Hitos  sagrados  a  los  que  se  rendía  culto  entre  los  cananeos.  17.9  Prob.  abandonadas  por  los  heveos  y  cananeos

18.1  O:  tierra  de  Etiopía,  situada  en  el  Alto  Nilo,  pudiendo  designar  a  su  vez  a  Egipto,  que  se  hallaba  bajo  su  dominio. 

18.3 Corneta hecha de un cuerno de carnero.  18.5 Ncosecha


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Isaías 18:6

714

Y se produzca el fruto, y maduren 

las uvas,

Podará con podaderas los 

pámpanos,°

Y arrancará las cepas, y las arrojará.

6

    Juntos serán abandonados a los 

buitres del monte y a las fieras de 

la tierra.

Las aves de rapiña veranearán sobre 

ellos,

Y todas las fieras de la tierra 

invernarán sobre ellos.

7

    En aquel tiempo, será traído un 

presente a YHVH Sebaot por un 

pueblo de elevada estatura y tez 

brillante,

Gente temida por cercanos y lejanos,

Nación agresiva y atropelladora,

Cuya tierra dividen los ríos,

Al lugar dedicado para el nombre de 

YHVH Sebaot: El Monte Sión.

Acerca de Egipto

19

Carga de Egipto.

¡Mirad, YHVH cabalgando en nube 

veloz entra en Egipto!

Ante Él se tambalean los ídolos de 

Egipto,

El corazón de los egipcios se derrite 

en ellos.

2

    Incitaré a egipcios contra egipcios,

Cada uno peleará contra su hermano

Y cada uno contra su prójimo:

Ciudad contra ciudad y reino contra 

reino.

3

    El espíritu de Egipto se trastornará 

dentro de sí, y destruiré sus 

planes.

Consultarán a ídolos y a hechiceros,

A nigromantes° y adivinos.

4

    Entregaré a Egipto en mano de un 

amo cruel,

Un rey fiero los dominará, dice el 

Soberano, YHVH Sebaot.

5

    Las aguas del Nilo se secarán,

El río quedará seco y árido;

6

    Los canales apestarán,

El Delta de Masor° menguará,

Y las cañas y los juncos se 

marchitarán.

7

    Los prados° de la ribera del Nilo

Y todo sembradío junto al Nilo 

se secarán, se perderán, y 

desaparecerán.

8

    Los pescadores se lamentarán,

Todos los que echan anzuelo en el 

Nilo harán duelo,

Y los que extienden su red sobre las 

aguas desfallecerán.

9

    Los que urden el lino cardado serán 

confundidos,

Y los que tejen el lino fino palidecerán.°

10

    Los amos° estarán consternados,

Los jornaleros, apesadumbrados.°

11

    Necios son ciertamente los príncipes 

de Zoán,°

Los sabios de Faraón han dado un 

desatinado consejo.

¿Cómo diréis al sabio° Faraón:

Soy discípulo de sabios, discípulo de 

antiguos reyes?

12

    ¿Dónde están tus sabios?

¡Que te digan ahora y te hagan saber 

lo que YHVH Sebaot resolvió 

sobre Egipto!

13

    Necios son los príncipes de Zoán,

Los príncipes de Nof° han sido 

engañados;

Los caudillos de sus tribus han 

hecho extraviar a Egipto.

14

    YHVH ha infundido en ellos un 

espíritu de vértigo:

Como el borracho da traspiés 

vomitando,

Sus consejeros descarrían a Egipto 

en todas sus empresas.

15

    Nada de lo que hagan aprovechará a 

Egipto,

Sean cabeza o cola, palma o junco.

16

    Aquel día los egipcios serán como 

las mujeres:

Temblarán y estarán aterrorizados 

por la mano que YHVH Sebaot 

habrá alzado contra ellos.

17

    Judea será espanto para Egipto;

Su sola mención le producirá terror,

18.5 Nsarmientos.  19.3 Esto es, los que consultan a los muertos.  19.6 Esto es, Egipto en sentido figurado.  19.7 Vocablo du-

doso que parece referirse tanto a los prados como a todo lo que está cercano al río. 

19.9 Relación con el blanco pálido del lino. 

19.10  Lit.  columnas.  19.10  Lit.  afligidos  de  espíritu.  19.11  Esto  es, Tanis  situada  al  E  del  Delta  del  Nilo.  19.11  .sabio

19.13 Esto es, Menfis.


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Isaías 21:5

715

Por el designio que YHVH Sebaot ha 

determinado contra Egipto.

18

    Aquel día habrá cinco ciudades en la 

tierra de Egipto,

Que hablarán la lengua de Canaán,

Y jurarán por YHVH Sebaot,

Y una de ellas será llamada Ciudad 

Herez.°

19

    Aquel día habrá un altar para YHVH 

en medio de la tierra de Egipto,

Y un monumento° a YHVH junto a 

su frontera.

20

    Será señal y testimonio de YHVH 

Sebaot en la tierra de Egipto.

Cuando clamen a YHVH a causa de 

su opresor,

Él les enviará un salvador y 

defensor° para librarlos.

21

    Aquel día YHVH se dará a conocer 

en Egipto,

Y los egipcios conocerán a YHVH.

Sí, presentarán sacrificios y ofrendas 

vegetales,

Y harán votos a YHVH, y los cumplirán.

22

    YHVH herirá a Egipto, lo herirá y lo 

sanará,

Y ellos se convertirán a YHVH,

Y Él les será propicio y los sanará.

23

    Aquel día habrá una calzada de 

Egipto a Asiria;

Los asirios entrarán en Egipto y los 

egipcios en Asiria.

Entonces los egipcios y los asirios 

servirán juntos.°

24

    Aquel día Israel será tercero con 

Egipto y con Asiria,

Para bendición en medio de la tierra,

25

    Porque YHVH Sebaot los habrá 

bendecido, diciendo:

¡Bendito sea mi pueblo, Egipto,

Y Asiria, obra de mis manos,

Y mi heredad, Israel!

Derrota de Egipto y Etiopía

20

En el año en que el Tartán° llegó a 

Asdod° enviado por Sargón, rey de 

Asiria, atacó a Asdod y la conquistó.

2

 En aquel tiempo YHVH habló por medio 

de Isaías ben Amoz, diciendo: Ve, despója-

te del cilicio de sobre tus lomos y quita el 

calzado de tus pies. Y lo hizo así, y andaba 

desnudo y descalzo.

3

 Después dijo YHVH: Así como mi sier-

vo Isaías anduvo desnudo y descalzo tres 

años como señal y presagio contra Egipto 

y Etiopía,

4

 así conducirá el rey de Asiria a los cauti-

vos de Egipto y a los desterrados de Etio-

pía, jóvenes y viejos, desnudos y descalzos, 

con las nalgas al aire, para vergüenza de 

los egipcios.

5

 Aquel día los moradores de esta costa se 

asustarán y avergonzarán por la suerte de 

Etiopía, su esperanza, y de Egipto, su es-

plendor, y dirán:

6

 ¡Mirad a los que eran nuestra esperan-

za, a donde acudíamos en busca de auxilio 

para que nos libraran del rey de Asiria! Y 

ahora, ¿cómo escaparemos?

Sobre el Desierto del Mar

21

Carga del Desierto del Mar:°

Como tempestades que azotan al 

Neguev,

Así viene° del desierto, de una tierra 

temible.

2

    Una visión siniestra me fue 

manifestada:

El traidor traicionado, el destructor 

destruido.

¡Álzate Elam!° ¡Asedia Media!

¡Acallad todo gemido!

3

    Al verlo, mis riñones se agitan con 

espasmos;

Me han sobrecogido angustias, como 

angustias de parturienta;

Me agita el oírlo, me espanta el 

mirarlo;

4

    Se me turba el corazón y el terror 

me sobrecoge;

El crepúsculo anhelado se me 

convirtió en espanto.

5

    Disponed la mesa y extended el 

mantel:° ¡A comer y a beber!

19.18 Prob. identificada con Heliópolis. NCiudad del Sol, NCiudad de destrucción.  19.19 Heb. massebah. Estela o hito geográ-

fico conmemorativo, también empleado para delimitar fronteras. Se identifica en esta función con los kudurru o piedras de límite 

de la propiedad, donde la mención de la divinidad actúa como garante y protectora de pactos y acuerdos 

→Gn.31.51ss.  19.20 

LXX: defensor en un pleito

19.23 Esto es, a Dios.  20.1 Esto es, el general en jefe del ejército asirio.  20.1 Ciudad filistea 

bajo la égida de Egipto, que fue conquistada por Sargón II, después de haberse rebelado contra Asiria, alrededor del 711 a.C. 

21.1 Prob. modo de referirse a Babilonia.  21.1 Esto es, el enemigo.  21.2 NPersia.  21.5 Prob. se refiere al mirar el atalaya.


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Isaías 21:6

716

¡En pie, capitanes! Engrasad el 

escudo,

6

    Que así me ha dicho Adonay:

Anda, pon el centinela, que anuncie 

lo que vea:

7

    Si ve hombres montados, en parejas 

de jinetes, con tiros de asnos y 

tiros de camellos,

Que preste atención, redoblada 

atención.

8

    Entonces clamó:° ¡Oh Adonay, 

sobre la atalaya estoy de pie 

continuamente de día,

Y en mi guardia sigo erguido toda la 

noche!

9

    ¡He aquí, vienen montados parejas 

de jinetes!

Después habló y dijo: ¡Ha caído, ha 

caído Babilonia,°

Y todos los ídolos de sus dioses se 

han hecho pedazos° por tierra!

10

    Pueblo mío, trillado en la era,

Lo que he oído de parte de YHVH 

Sebaot, Dios de Israel,

Te lo he anunciado.

Sobre Duma

11

    Carga de Duma:°

De Seir alguien me grita:

¡Centinela!, ¿cuánto queda de la 

noche?

¡Centinela!, ¿cuánto queda de la 

noche?

12

    Responde el centinela:

Llegará la mañana y también la noche.

Si queréis preguntar, venid otra vez 

y preguntad.

Sobre Arabia

13

    Carga de Arabia:°

En la maleza de las estepas pasaréis 

la noche,

Oh caminantes de Dedán.°

14

    Oh moradores de Tema, salid con 

agua al encuentro del sediento;

Salid con pan al encuentro del que 

huye.

15

    Porque huyen de la espada,

De la espada afilada y del arco 

entesado;

De la lucha encarnizada.

16

    Esto me ha dicho YHVH: Dentro de 

un año, año de jornalero,

Toda la gloria de Cedar° será 

desecha,

17

    Y de los héroes de Cedar quedará 

bien poca cosa.

Lo ha dicho YHVH, Dios de Israel.

El Valle de la Visión

22

Carga del Valle de la Visión:°

Pero, ¿qué tienes ahora que subes 

con los tuyos a las azoteas?

2

    ¡Oh tú, llena de bullicio, ciudad 

turbulenta, urbe desenfrenada!

Tus caídos no cayeron a cuchillo ni 

murieron en combate.

3

    Todos tus caudillos huyeron a una,

Y sin tiro° de arco fueron 

apresados.

Todos los tuyos fueron copados 

cuando se alejaban huyendo.

4

    Por eso digo: Apartad la mirada de 

mí,

Expresaré mi amargura con llanto.

No os afanéis en consolarme por 

la destrucción de la hija de mi 

pueblo.

5

    Porque un día de pánico,° angustia 

y consternación tiene Adonay 

YHVH Sebaot en el Valle de la 

Visión,

Día de socavar muros y de clamores 

hasta las montañas.°

6

    ¡Elam toma la aljaba, Siria irrumpe 

con carros y Kir saca el escudo!

7

    He ahí tus mejores valles llenos de 

carros,

Y los jinetes° apostados frente a la 

puerta.

8

    Ha sido quitada la defensa° 

de Judá,

Y en semejante día, miráis las armas 

de la casa del Bosque,

21.8  Esto  es,  el  vidente.  21.9 

→Ap.14.8;  18.2.  21.9  Lit.  pedazo.  21.11  Esto  es,  profecía  acerca  de  Edom.  21.13  LXX 

omite  el  encabezamiento. 

21.13  Árabes  que  habitaban  la  región  del  Golfo  Pérsico,  descendientes  de  Noé 

→Gn.10.7; 

25.2-3;  Jer.49.8;  Ez.27.20. 

21.16  Tribu  de  Arabia  que  colabora  con  el  invasor  asirio 

→Is.42.11;  60.7;  Jer.49.28-

33;  Ez.27.21. 

22.1  Prob.  referencia  al  Valle  de  Hinnom  en  Jerusalem.  22.3  .tiro.  22.5  Nperturbación,  desconcier-

to,  revuelta

22.5  NQir  socava  el  muro  y  Soa  corre  a  la  montaña.  22.7  LXX:  ha  montado  Aram  sobre  los  caballos

22.8 Lit. cobertura


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Isaías 23:4

717

9

    Y véis que son muchas las brechas 

en la ciudad de David,

Y recogéis las aguas del estanque de 

abajo,

10

    Y hacéis recuento de las casas de 

Jerusalem,

Y demoléis casas para reforzar el 

muro,

11

    Y entre los dos muros hacéis un foso 

para las aguas del estanque viejo;

Pero no consideráis° al que hace que 

ocurra esto,

Ni véis al que hace mucho tiempo lo 

produjo.

12

    Aquel día Adonay YHVH Sebaot os 

convocó al llanto y al lamento,

A raparse el cabello° y a vestirse de 

saco.

13

    Pero, he aquí gozo y alegría, 

matanza de bueyes, degüello de 

ovejas y hartazgo de carne y de 

vino,

Y dijisteis: ¡Comamos y bebamos, 

porque mañana moriremos!

14

    Por eso YHVH Sebaot reveló a mis 

oídos:

Ciertamente este pecado no os será 

perdonado hasta que muráis, dice 

Adonay YHVH Sebaot.

Sebna y Eliaquim

15

    Así dice Adonay YHVH Sebaot:

Anda, ve a Sebna, ese mayordomo de 

palacio

16

    Que se labra en lo alto un sepulcro

Y en la piedra se hace un mausoleo, 

y dile:

¿Qué tienes aquí, a quién tienes 

aquí,

Que te labras aquí un sepulcro?

17

    He aquí YHVH te aferrará con fuerza

Y te arrojará con violencia,

18

    Y te hará rodar como una bola sobre 

una tierra ancha.°

Allí morirás y allí pararán tus 

gloriosos carros,

¡Oh vergüenza de la casa de tu 

señor!

19

    Te depondré° de tu cargo,

Te quitará° de tu puesto.

20

    Aquel día llamaré a mi siervo 

Eliaquim ben Hilcías,

21

    Y lo vestiré con tu túnica y lo ceñiré 

con tu cinto,

Y entregaré en su mano tu poder,

Y será por padre a los habitantes de 

Jerusalem y a la casa de Judá.

22

    Pondré la llave de la casa de David 

sobre su hombro:

Cuando abra no habrá quien cierre,

Y cuando cierre, no existirá quien 

abra.

23

    Lo clavaré como estaca en lugar 

firme,

Y será un trono de honra para la 

casa de su padre.

24

    De él penderá toda la gloria de la 

casa de su padre, la prole y la 

posteridad,°

Y todos los utensilios pequeños, de 

los tazones hasta los cántaros.°

25

    Aquel día, dice YHVH Sebaot, la 

estaca clavada en lugar firme 

cederá,

Y la carga° que pendía de ella caerá y 

se romperá,

Porque YHVH ha hablado.

Contra Tiro

23

Carga de Tiro:

¡Gemid, naves de Tarsis,°

Porque vuestro puerto está destruido!

Al volver de la tierra de Quitim° lo 

han descubierto.

2

    ¡Enmudeced, oh habitantes de la 

costa y mercaderes de Sidón,

Que recorréis el mar cual viajeros en 

aguas caudalosas!

3

    El grano de Sijor° y la cosecha del 

Nilo eran su ganancia,

Y había llegado a convertirse en 

emporio de las naciones.

4

    Avergüénzate, oh Sidón, fortaleza 

del mar,

Porque dijo el mar: Nunca estuve 

con dolores de parto,

Ni di a luz, ni crié muchachos, ni 

hice crecer° vírgenes.

22.11  Nmirar,  fijar  la  vista.  22.12  Lit.  a  la  calvicie.  22.18  Prob.  referencia  a  Mesopotamia.  22.19  Nexpulsaré,  alejaré

22.19  3ª  pers.  en  el  TM.  22.24  Es  decir,  hijos  y  nietos.  22.24  También  significa  arpa  o  lira.  22.25  Esto  es,  la  profecía

23.1 

→2.16.  23.1 Esto es, la isla de Chipre →Gn.10.4.  23.3 Prob. frontera de Egipto.  23.4 crié, eduqué.


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Isaías 23:5

718

5

    En cuanto la noticia llegue a Egipto, 

Se estremecerán por la nueva de 

Tiro.

6

    ¡Oh habitantes de la costa, pasad a 

Tarsis y gemid!

7

    ¿Es ésta vuestra ciudad divertida, de 

remoto abolengo,

Cuyos pies la llevaban a colonias 

lejanas?

8

    ¿Quién decretó tal cosa sobre Tiro, 

que regalaba coronas,

Cuyos comerciantes eran príncipes

Y sus mercaderes° los nobles de la 

tierra?

9

    YHVH Sebaot así lo decretó para 

abatir la soberbia de toda gloria,

Y humillar a todos los nobles de la 

tierra.

10

    Vuelve° a tu tierra, oh hija de Tarsis,

Que el puerto no existe más.

11

    Él extendió su mano contra el mar, y 

ha hecho temblar los reinos.

YHVH ha ordenado destruir las 

fortalezas de Canaán,

12

    Y ha dicho: No volverás a 

alborozarte más, oh doncella 

ultrajada, hija de Sidón.

Levántate para pasar a Quitim, pero 

ni aun allí tendrás reposo.

13

    He allí la tierra de los caldeos;° tal 

pueblo no existía.

Asiria lo había fundado para las 

bestias del desierto.

Erigieron sus torres de asedio, 

destruyeron su ciudadela y la 

redujeron a escombros.

14

    ¡Gemid, oh naves de Tarsis,

Pues vuestro baluarte ha sido 

destruido!

15

    Aquel día Tiro quedará olvidada 

setenta años (años dinásticos),°

Y al cabo de setenta años aplicarán a 

Tiro la copla de la ramera:

16

    ¡Toma un arpa y rodea la ciudad, oh 

ramera olvidada!

¡Acompaña con tiento y canta 

muchas coplas,

A ver si se acuerdan de ti!°

17

    Al cabo de setenta años YHVH se 

ocupará de Tiro,

Y ella volverá a su salario de 

prostituta,

Y fornicará de nuevo con todos los 

reinos del mundo sobre la faz de 

la tierra.

18

    Pero su paga estará consagrada a 

YHVH.

No se guardará ni se atesorará, 

porque sus ganancias serán para 

los que estén delante de YHVH,

Para que coman hasta hartarse y 

vistan con esplendidez.

Juicio sobre la Tierra

24

He aquí, YHVH vacía° la tierra y la 

deja desolada,

Trastorna su faz y hace esparcir a 

sus habitantes:

2

    Lo mismo al pueblo que al 

sacerdote,

Al siervo que a su señor,

A la criada que a su señora,

Al comprador que al vendedor,

Al prestamista que al prestatario,

Al acreedor que al deudor.

3

    Queda la tierra enteramente vaciada,

Queda totalmente saqueada.°

YHVH ha pronunciado esta palabra:

4

    De duelo está la tierra, se reseca;

Languidece el universo, se marchita;

Los encumbrados° de la tierra 

desfallecen.

5

    La tierra fue contaminada por sus 

moradores,

Porque transgredieron las 

leyes, falsearon el derecho y 

quebrantaron el pacto eterno.°

6

    Por esto una maldición devora la 

tierra,

Y sus habitantes lo pagan.

Por esta causa los habitantes de la 

tierra son consumidos,

Y la humanidad ha disminuido.

7

    El vino nuevo languidece, 

marchítase la vid,

Y gime el corazón otrora alegre.

23.8 Lit. cananeos.  23.10 Sir y Qumram: Cultiva tu tierra.  23.13 Esto es, Babilonia, conquistada por Tiglat-Pileser III en el 732 

a.C. 

23.15 Nque es la duración de la vida de un reySetenta años se refiere a un período completo de tiempo 

→Jer.25.11; 

29.10; Zac.1.12; Dn.9.2; 2 Cr.36.21. 

23.16 Esto es, Canaán 

→23.11.  24.1 Nasola.  24.3 Lit. Vaciada será vaciada la tierra, y 

saqueada será saqueada. Expresión característica del hebreo para denotar énfasis. LXX la omite. 

24.4 Nlo más noble. Qumram: 

las cimas de la tierra

24.5 La alianza establecida con la humanidad tras el diluvio 

→Gn.9.16.


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Isaías 25:6

719

8

    Cesa el júbilo de los panderos,

Cesa el bullicio de quienes se 

divierten,

Cesa la armonía del arpa.

9

    Ya no se bebe vino entre canciones

Y el licor sabe amargo al que lo bebe.

10

    Quebrantada está la ciudad del caos.

Toda casa está cerrada, para que 

nadie pueda entrar.

11

    Hay lamentos en las plazas por la 

falta de vino.

Todo gozo se ha ensombrecido,

La alegría se ha ido de la tierra.

12

    En la ciudad sólo quedan 

escombros;

Sus puertas han sido heridas con la 

ruina.

13

    En medio de la tierra y en medio de 

los pueblos,

Sucederá lo que en el vareo del 

olivo,

O en el rebusco después de la 

vendimia.

14

    A causa de la majestad de YHVH,

Alzarán la voz desde el poniente, 

diciendo:

15

    ¡Aclamad desde el oriente a YHVH,

De las costas del mar, al nombre de 

YHVH, Dios de Israel!

16

    Desde el confín de la tierra oímos 

cánticos: ¡Gloria al Justo!

Pero yo digo: ¡Qué dolor, qué dolor, 

ay de mí!

Los traidores traicionan,

Los traidores traicionan 

traidoramente.

17

    ¡Terror, fosa y red sobre ti,

Oh morador de la tierra!

18

    El que escape del grito de pánico 

caerá en la fosa;

El que salga del fondo de la fosa, 

quedará atrapado en la red.

Las ventanas de lo alto se han 

abierto,

Se conmueven los cimientos de la 

tierra.

19

    La tierra se sacude y se agrieta,

La tierra se deshace en pedazos,

La tierra tiembla una y otra vez,

20

    La tierra se tambalea,

Vacila como un ebrio,

Se tambalea como una barraca,

¡Tanto le pesa su pecado!

Se desploma, y no se alza más.

21

    Aquel día YHVH castigará° en lo alto 

al ejército de las alturas,°

Y a los reyes de la tierra en la tierra:

22

    Se agrupan en montones y quedan 

encerrados, presos en mazmorras;

Después de muchos días serán 

visitados.

23

    La luna° se avergonzará, y el sol° se 

confundirá,

Cuando YHVH Sebaot reine en el 

Monte Sión y en Jerusalem,

Y la gloria esté delante de sus 

ancianos.°

El favor divino

25

¡Oh YHVH, tú eres mi Dios!

Te exaltaré, alabaré tu Nombre,

Porque has hecho portentos;°

Designios asegurados desde la 

antigüedad.

2

    Convertiste la ciudad en escombros,

Y la plaza fuerte en ruinas,

Y el palacio de los extranjeros en 

algo que nunca será reedificado.

3

    Por eso te honran pueblos 

poderosos,

Y las capitales de tiránicas naciones 

te temen.

4

    Porque has sido fortaleza al débil,

Fortaleza al pobre en su angustia,

Abrigo contra el aguacero, y sombra 

contra el calor,

Cuando el resoplido de los tiranos 

era cual tormenta que se abate 

contra el muro.

5

    Como el calor durante la sequía,

Así abates el tumulto de los 

extranjeros,

Como el bochorno debajo de la nube,

Así silencias el cántico de los tiranos.

6

    En este monte YHVH Sebaot 

ofrecerá a todos los pueblos,

Su banquete de manjares 

suculentos,

24.21 Nvisitará.  24.21 Prob. se refiere a las potencias cósmicas, las cuales, aunque sometidas a Dios, tienen parte en el 

gobierno del mundo 

→Ef.6.12.  24.23 Lit. la blanca. Otro modo de denominar a la luna (y al sol, el ardiente). El sol y la luna 

recibían culto en las culturas cananeas como señores de la noche y el día. 

24.23 Lit. el ardiente.  24.23 En LXX: será glorificado

25.1 Lit. maravilla.


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Isaías 25:7

720

Su banquete de vinos generosos,

De manjares tiernos de mucho 

meollo,

Y de vinos añejos, bien clarificados.°

7

    En este monte sorberá la mortaja

Que amortaja a todos los pueblos,

El velo que vela a todas las naciones:

8

    ¡Ha sorbido la Muerte para siempre!

YHVH Adonay enjugará las lágrimas 

de todo rostro,

Y quitará el oprobio de su pueblo de 

sobre toda la tierra,

Porque YHVH lo ha dicho.

9

    Aquel día se dirá:

¡He aquí nuestro Dios!

¡Lo esperamos, y nos ha salvado!

¡Éste es YHVH, en quien esperamos!

¡Regocijémonos y alegrémonos por 

su salvación!

10

    La mano de YHVH se posará en este 

monte,

Mientras que Moab será pisoteado 

en su sitio,

Como se pisa la paja en el agua del 

muladar,°

11

    Y allí dentro extenderá sus manos 

como el nadador al nadar,

Pero Él abatirá su soberbia y el 

esfuerzo de sus manos,

12

    Y derribará tus altos e inexpugnables 

muros,

Los abatirá en tierra hasta el mismo 

polvo.

La protección divina

26

Aquel día se cantará este cántico 

en la tierra° de Judá:

¡Ciudad fuerte tenemos!°

¡Salvación le ha puesto° por muro y 

antemuro!

2

    ¡Abrid las puertas y entrará un pueblo 

justo que guarda la fidelidad!

3

    Tú guardarás en completa paz a aquel 

cuyo pensamiento en ti persevera,

Porque en ti ha confiado.

4

    Confiad en YHVH perpetuamente,

Porque en YH° YHVH está la Roca 

de los siglos.

5

    Derribó a los que moraban en las 

alturas,

Humilló a la ciudad exaltada,

La abatió hasta la tierra y la derribó 

hasta el polvo;

6

    Será pisoteada por los pies del 

oprimido,

Por las pisadas de los menesterosos.

7

    La senda del justo es recta;

Tú, ¡oh Recto! allanas la senda del 

justo.

8

    Oh YHVH, en la senda de tus juicios 

te esperamos,

Tu Nombre y tu memoria son el 

anhelo del alma.

9

    Mi alma te anhela de noche,

Y por ti madruga mi espíritu dentro 

de mí,

Porque cuando tus juicios se 

manifiestan en la tierra,

Los habitantes del mundo aprenden 

justicia.

10

    Se mostrará piedad al malvado,

Pero no aprenderá justicia;

Aun en tierra de rectitud seguirá 

practicando el mal,

Y no considerará la grandeza de 

YHVH.

11

    Aunque alces tu mano, oh YHVH, no 

la miran;

Que miren avergonzados tu celo por 

el pueblo,

Y que el fuego devore a tus enemigos.

12

    Tú, oh YHVH, nos gobernarás en 

paz,

Porque todas nuestras obras las has 

hecho a nuestro favor.

13

    Oh YHVH Dios nuestro, otros amos 

aparte de ti nos han dominado,

Pero sólo reconocemos tu Nombre, 

el tuyo solo.

14

    Los muertos no vivirán,

Las sombras no se alzarán,°

Por cuanto Tú los juzgaste y los 

destruiste,

E hiciste perecer su memoria.

15

    Multiplicaste al pueblo, oh YHVH,

Multiplicaste al pueblo y 

manifestaste tu gloria:

Ensanchaste los confines del país.

16

    Oh YHVH, en la angustia acudieron 

a ti;

25.6  Lit.  purificados.  25.10  Nen  las  aguas  de  (Kit).  26.1  Npaís.  26.1 Vul:  Tenemos  un  salvador.  26.1 Algunas  versiones 

insertan Dios

26.4 Apócope de YHVH.  26.14 Es decir, no resucitarán


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Isaías 28:1

721

Derramaron la oración cuando la 

fuerza de tu castigo arreciaba.

17

    Como la parturienta que le llega el 

parto,

Se retuerce y grita de dolor,

Así hemos estado en tu presencia, 

oh YHVH.

18

    Concebimos, nos retorcimos,

Pero dimos a luz viento;

No trajimos salvación° a la tierra,

Ni le nacieron habitantes al mundo.

19

    ¡Tus muertos vivirán!

¡Con mi cuerpo muerto° resucitarán!

¡Despertad y cantad jubilosos 

moradores del polvo!

Porque tu rocío es rocío de luz, la 

tierra parirá a las sombras.

20

    Anda, pueblo mío, entra en tus 

aposentos;

Cierra detrás de ti tus puertas,

Escóndete por un breve momento,

Hasta que pase la indignación.

21

    He aquí YHVH sale de su morada,

Para castigar la culpa del morador 

de la tierra:

La tierra descubrirá la sangre 

derramada,

No encubrirá ya más a los 

asesinados en ella.

El regreso de Israel

27

Aquel día YHVH visitará con 

su espada, grande, templada y 

poderosa,

Al Leviatán, serpiente huidiza,

Al Leviatán, serpiente tortuosa,

Y matará al dragón del mar.

2

    Aquel día entonaréis el cántico de la 

viña deleitosa.

3

    Yo, YHVH, soy su guardián,

La riego en todo momento

Para que nadie la dañe,

La guardo noche y día.

4

    No hay indignación en mí;

Si me diera espinos y cardos,

Me lanzaría sobre ella para 

quemarlos todos;

5

    Si se acoge a mi amparo,

Hará las paces conmigo,

Sí, las paces hará conmigo.

6

    En días por venir Jacob echará 

raíces,

Israel florecerá y echará renuevos,

Y sus frutos llenarán la faz del 

mundo.

7

    ¿Lo hirió como hirió al que lo hirió?

¿Lo mató como mató a los que lo 

mataron?°

8

    Antes, al enviarla lejos, contendiste 

con ella con moderación;

Con su viento recio la apartó en día 

de solano.

9

    Con esto se expiará la transgresión 

de Jacob;

Y éste será el fruto de alejar su pecado:

Dejar las piedras de los altares

Como piedra caliza triturada,

Y no dejar en pie aseras° ni estelas.°

10

    La ciudad fortificada está solitaria,

Sus moradas abandonadas,

Dejada como un desierto.

Allí pastan los novillos,

Allí caen y se secan sus sarmientos.

11

    Secándose las ramas, se quiebran;

Vienen mujeres y las hacen arder.

Porque es un pueblo insensato,

Su Hacedor no se apiada,

Su Creador no lo compadece.

12

    Aquel día trillará YHVH las espigas, 

desde el Gran Río° hasta el 

Torrente de Egipto,°

Pero vosotros, hijos de Israel, seréis 

espigados uno a uno.

13

    Aquel día resonará fuertemente el 

shofar,°

Y vendrán los dispersos de Asiria y 

los desterrados de Egipto,

Y se postrarán ante YHVH en el 

Monte Santo, en Jerusalem.

Juicio a Efraín

28

¡Ay de la arrogante corona de los 

ebrios de Efraín;

De la flor marchita de su gloriosa 

hermosura,

26.18 O Producido liberación, rescate o ayuda.  26.19 El sustantivo está registrado en singular con sufijo de primera persona 

→Col.1.18. Las versiones que siguen a la Siríaca traducen: sus cadáveres.  27.7 Para enfatizar, el heb. utiliza una misma raíz 

para el sustantivo y las formas verbales. 

27.9 Tronco o imagen idolátrica.  27.9 Cipos dedicados al sol llamados hammanim

27.12 Esto es, el Éufrates.  27.12 Esto es, Wadi-el-Arish, que junto con el Éufrates, conforma los dos extremos del territorio ideal 

de Israel 

→Gn.15.18.  27.13 Corneta construida de un cuerno de carnero utilizado para congregar al pueblo →Lv.25.9-10. 


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Isaías 28:2

722

Que está sobre la cabeza de los que 

se glorían en la abundancia, 

aturdidos por el vino!

2

    He aquí Adonay dispone un robusto 

y fuerte azote,°

Como turbión de granizo y tormenta 

asoladora;

Como turbión de aguas desbordantes,

Que barren la tierra con violencia.

3

    Con los pies pisoteará la arrogante 

corona de los ebrios de Efraín.

4

    Y la flor marchita de su gloriosa 

hermosura,

Que está sobre la cabeza de los que 

se glorían en la abundancia,

Será como breva cuando llega el 

verano: el primero que la ve, la 

agarra y se la traga.

5

    Aquel día YHVH Sebaot será por 

corona de gloria y diadema de 

hermosura al remanente de su 

pueblo.

6

    Sentido de justicia para los que se 

sienten a juzgar,

Valor para los que rechazan el asalto 

a la puerta.

7

    También éstos se tambalean por el 

vino

Y dan traspiés por el licor;

Sacerdotes y profetas se tambalean 

por el licor,

Los aturde el vino,

Dan traspiés por el licor,

Tambaléanse en la visión,

Titubean en la sentencia.

8

    Todas las mesas están llenas de 

vómito y suciedad,

Y no queda sitio limpio.

9

    ¿A quién, dicen ellos,° viene a 

adoctrinar?

¿A quién trata de enseñar?

¿A recién destetados apartados del 

pecho?

10

    Porque es precepto a precepto,

Mandamiento a mandamiento,

Renglón por renglón, línea por 

línea,

Un poquito allí, otro poquito allá.°

11

    Cierto, con lengua balbuciente,

En lenguaje extraño° hablará a este 

pueblo,

12

    El que les había dicho:

Aquí está el reposo, dad reposo al 

cansado,

Esto es lugar de descanso;

Pero no quisieron oír.

13

    Por lo que la palabra de YHVH será 

para ellos precepto a precepto,

Mandamiento a mandamiento,

Renglón por renglón, línea por 

línea,

Un poquito allí, otro poquito allá;°

Hasta que vayan y caigan de espalda,

Y sean quebrantados y se enreden, y 

queden atrapados.

Exhortación a Jerusalem

14

 Oh  coplistas  burlones,  que  gobernáis 

a ese pueblo de Jerusalem, oíd la palabra 

de YHVH:

15

    Habéis dicho: Hemos hecho un 

pacto con la Muerte,

Y con el Seol° tenemos alianza:

Cuando el azote pase cual torrente, 

no nos alcanzará,

Porque hemos hecho de la mentira 

nuestro refugio,

Y de la falsedad nuestro escondrijo.

16

    Por tanto, Adonay YHVH dice así: He 

aquí Yo pongo por fundamento en 

Sión una piedra,

Piedra probada,° angular, preciosa, 

de cimiento estable.°

El que crea, no será conturbado.°

17

    Pondré la justicia por cordel y la 

rectitud por plomada,

El granizo arrasará vuestro refugio 

de mentiras,

Y las aguas arrollarán vuestro 

escondrijo.

18

    Y será anulado vuestro pacto con la 

Muerte,

Y vuestra alianza con el Seol no será 

estable.

28.2 .azote.  28.9 .dicen ellos.  28.10 Este v. ilustra la actitud de burla de profetas y sacerdotes ante la predicación de Isaías, 

y se fundamenta en la repetición de palabras breves, imitando el balbuceo incomprensible de un bebé o la incoherencia de un 

borracho: Porque: tsav latsav, tsav lqtsav, qav laqav, qav laqav, zer sham, zer sham; Escuchadlo: P-a-pa, p-a-pa, t-a-ta, t-a-ta

28.11 En lenguaje balbuciente y estrafalario.  28.13 

→28.10 nota.  28.15 NSepulcro.  28.16 También sólida, de granito. Llama-

da también piedra de testimonio, de gran valor, utilizada para discernir entre el bien y el mal. 

28.16 Nfirme.  28.16 Esta misma 

raíz verbal contiene la acepción estar preocupado o sentir inquietud


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Isaías 29:9

723

Cuando pase el turbión del azote os 

pisoteará,

19

    Cada vez que pase, os arrollará;

Y pasará mañana tras mañana,° de 

día y de noche;

Entonces el terror habrá sido 

bastante,

Para aprender la lección.°

20

    La cama será corta para estirarse

Y estrecha la manta para envolverse.

21

    YHVH se alzará como en Perazim,°

Se desperezará como en el valle de 

Gabaón,°

Para hacer su obra, su extraña obra,

Para hacer su tarea, su insólita 

tarea.

22

    Por tanto, no os burléis, no sea que 

se aprieten más vuestras ataduras,

Porque me he enterado de la 

destrucción decretada por 

Adonay YHVH Sebaot contra todo 

el país.

23

    Estad atentos y oíd mi voz,

Atended y escuchad mi dicho:

24

    El que ara para sembrar, ¿arará día 

tras día?

¿Abrirá surcos en la tierra y 

desterronará sin cesar?

25

    Y una vez allanado el campo, ¿no 

siembra el eneldo y esparce el 

comino,

Y echa el trigo en sus surcos, o la 

cebada en la parcela determinada, 

y la avena en sus lindes?

26

    Porque su Dios lo instruye,

Y le enseña lo que es conveniente:

27

    Que el eneldo no se trilla con el 

trillo,

Ni sobre el comino se ha de hacer 

rodar la rueda de la carreta,

Sino que con el palo se bate el 

eneldo y con la vara el comino.

28

    No se muele hasta lo último el 

grano,

Sino que se trilla haciendo que la 

rueda de la carreta lo rompa sin 

molerlo.

29

    También esto procede de YHVH 

Sebaot,

Que hace maravilloso su consejo y 

grande su sabiduría.

El clamor de Ariel

29

¡Ay Ariel,° Ariel, ciudad que sitió 

David!

¡Añadid año tras año, y que el 

ciclo de las solemnidades siga 

girando!

2

    Pero no obstante, Yo asediaré a Ariel,

Y habrá llantos y lamentos, y vendrá 

a ser para mí como Ariel.°

3

    Te sitiaré en derredor, te estrecharé 

con torres de asedio,

Y levantaré contra ti baluartes.

4

    Abatida, hablarás desde el suelo,

Y tu palabra sonará apagada desde el 

polvo;

Como voz de espíritu pitónico desde 

la tumba,

Susurrarás tus palabras desde el 

polvo.

5

    La multitud de tus enemigos será 

como granos de polvo.

La multitud de tus agresores como 

nube de tamo.

Pero de improviso, de repente,

6

    YHVH Sebaot te auxiliará con el

fragor y el estruendo de grandes 

truenos,

Con huracán y vendaval y rayos 

abrasadores.

7

    Y la multitud de los pueblos que 

combaten a Ariel, acabarán como 

sueño o visión nocturna,

Sin trincheras, sin baluartes, y sin 

angustiadores.

8

    Como el hambriento sueña que 

come, y se despierta con el 

estómago° vacío;

Como el sediento sueña que bebe, 

y se despierta con la garganta 

reseca,

Así será la multitud de los pueblos 

que combaten contra el Monte 

Sión.

Ceguera de los profetas

9

    ¡Asombraos y quedad atónitos!

28.19 Lit. por la mañana, por la mañana.  28.19 Nanuncio, noticia.  28.21 Perazim 

→2 S.5.20; 1 Cr.14.11.  28.21 Gabaón 

→Jos.10.9-12.  29.1 Nombre de Jerusalem, relacionado con el león de Dios →Gn.49.8-10, o con el altar donde se quemaban 

las víctimas del sacrificio. 

29.2 Esto es, altar de Dios.  29.8 Lit. alma


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Isaías 29:10

724

¡Deslumbraos y quedad ciegos!

¡Embriagaos, y no de vino!

¡Tambaleaos, y no por el licor!

10

    Porque YHVH ha volcado sobre 

vosotros, oh profetas, un espíritu 

de letargo,°

Y ha cerrado vuestros ojos, oh 

videntes, y cubierto vuestras 

cabezas.

11

    Y así, toda revelación os ha venido 

a ser como palabras en un rollo 

sellado,

Que se da a uno que sabe leer, y se 

dice: Lee ahora esto.

Y responde: No puedo, porque está 

sellado.

12

    Luego se da el rollo al que no sabe 

leer, diciendo: Lee ahora esto,

Y él responde: No sé leer.

13

    Dice pues Adonay: Ya que este 

pueblo se me acerca con la boca y 

me honra con los labios,

Mientras su corazón está lejos de mí,

Y su temor para conmigo es mera 

rutina de preceptos humanos,

14

    Yo seguiré prodigando prodigios 

asombrosos a este pueblo,

Hasta que fracase la sabiduría de sus 

sabios,

Y se desvanezca la inteligencia de 

sus entendidos.

15

    ¡Ay de los que ahondan para 

ocultarle sus designios a YHVH!

Hacen sus obras en tinieblas, y 

dicen:

¿Quién nos ve, quién se entera?

16

    ¡Craso error!

Como si el barro se considerara 

alfarero,

O como si la obra dijera al hacedor: 

No me ha hecho;

Como si la vasija dijera al alfarero: 

No me entiende.

Bendición a Israel

17

    Pronto, muy pronto, el Líbano se 

convertirá en Carmel,°

Y el Carmel será considerado un 

bosque.

18

    Aquel día los sordos oirán las 

palabras del Rollo,

Y los ojos de los ciegos verán sin 

tinieblas ni oscuridad.

19

    Los humildes volverán a alegrarse 

en YHVH,

Y el más pobre de los hombres se 

regocijará con el Santo de Israel.

20

    Porque no quedarán tiranos, se 

acabarán los cínicos,

Y serán extirpados todos los que se 

desvelan° por hacer el mal;

21

    Los que con palabras inducen al 

hombre a pecar,

Y tienden trampas al que defiende 

en el juicio,°

Y pervierten la causa del justo con 

falsas argumentaciones.

22

    Por tanto, YHVH, que redimió a 

Abraham, dice así a la casa de 

Jacob:

Ya no se avergonzará más Jacob, ni 

se sonrojará° su rostro.

23

    Cuando vean lo que hace mi mano 

en medio de ellos, santificarán mi 

Nombre.

Sí, santificarán al Santo de Jacob, y 

temerán° al Dios de Israel.

24

    Los extraviados de espíritu tendrán 

inteligencia,

Y los murmuradores aprenderán la 

lección.

Advertencia acerca de Egipto

30

¡Ay de los hijos rebeldes!, dice 

   YHVH

Que hacen planes sin contar 

conmigo,

Que firman° pactos sin mi Espíritu, 

añadiendo pecado sobre pecado,

2

    Que bajan a Egipto sin inquirir de 

mi boca,°

Buscando la protección de Faraón 

para ampararse a la sombra de 

Egipto.

3

    Pero la protección de Faraón será 

vuestra vergüenza,

Y el amparo a la sombra de Egipto 

vuestra confusión.

29.10 Nsueño profundo.  29.17 Esto es vergel.  29.20 En heb. rabínico: los que perseveran, los que se aplican.  29.21 Lit. 

en  la  plaza.  Lugar  donde  se  celebraban  los  juicios. 

29.22  Lit.  palidecerán,  dado  que  Jacob  representa  aquí  al  colectivo. 

29.23 Nvenerarán, honrarán.  30.1 Esto es, los profetas.  30.2 Idem nota anterior. 


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Isaías 30:22

725

4

    Aunque sus príncipes estén ya en 

Zoán,

Y sus embajadores hayan llegado a 

Hanes,°

5

    todos se sentirán defraudados de un 

pueblo que de nada les servirá,

Pues no son de ayuda ni de 

provecho, sino de afrenta y hasta 

de humillación.

6

    Carga de las bestias del Néguev:°

Por tierra hostil y siniestra,

De rugientes leones y leonas,

De áspides y alados dragones,

Llevan sus riquezas a lomo de asno,

Y sus tesoros a giba de camello,°

A un pueblo que no les será de 

provecho,

7

    A un Egipto cuya ayuda es vana e 

inútil,

Por lo que lo llamé Rahab-

hemsabet.°

8

    Ahora pues, anda y escríbelo en una 

tablilla ante ellos, e inscríbelo en 

un rollo,

Para que dure hasta el día postrero 

para siempre jamás,

9

    Porque pueblo rebelde es éste,

Hijos mentirosos, hijos que no 

quieren escuchar la Ley de YHVH;

10

    Que dicen a los videntes: No veáis, y 

a los profetas:° No profeticéis para 

nosotros cosas rectas,

Decidnos cosas halagüeñas, 

¡profetizad ilusiones!

11

    ¡Desviaos del camino, apartaos de la 

senda!

¡Quitad de delante de nosotros al 

Santo de Israel!

12

    Por tanto, así dice el Santo de Israel:

Por cuanto despreciáis esta palabra,

Y confiáis en la opresión y en la 

perversidad, apoyándoos en ello,

13

    Este pecado os será como brecha 

que amenaza ruina y se extiende 

de lo alto del muro,

Hasta que súbita y repentinamente, 

se desploma.

14

    Lo quebrará como se quiebra un 

vaso de alfarero,

Hecho trizas sin compasión,

Hasta no quedar entre sus pedazos 

ni un tiesto con que sacar brasas 

del rescoldo,

Con que sacar agua del aljibe.

15

    Pues así decía el Soberano, YHVH, el 

Santo de Israel:

Vuestra salvación está en volveros a 

mí y tener calma;

Vuestra fortaleza consiste en confiar y 

estar tranquilos; pero no quisisteis,

16

    Sino que dijisteis: ¡No! Huiremos a 

caballo.

Por eso, ¡ciertamente huiréis!

Dijisteis: ¡En veloces corceles 

cabalgaremos!

Por eso, ¡más veloces serán vuestros 

perseguidores!

17

    Mil huirán por la amenaza de uno,

Y por la amenaza de cinco huiréis 

vosotros todos,

Hasta que seáis dejados como asta 

en la cumbre de un monte,

Como estandarte en una colina 

pelada.

La gracia divina

18

 Pero YHVH espera para otorgaros gracia, 

y por eso se levanta para compadecerse de 

vosotros, pues YHVH es Dios justo. ¡Bien-

aventurados todos los que esperan en Él!

19

 Oh  pueblo  de  Sión  que  moras  en  Je-

rusalem, en verdad nunca más volverás a 

llorar; en verdad Aquél que es compasivo 

se compadecerá de ti, y te responderá al 

oír la voz de tu clamor.

20

 Aunque Adonay os dé pan de escasez y 

agua de angustia, tu Maestro ya no se es-

conderá más de ti, y con tus propios ojos 

podrás ver a tu Maestro.

21

 Si  os  desviáis  a  derecha  o  izquierda, 

tus oídos oirán una llamada a la espalda: 

Éste es el camino, andad por él.

22

 Entonces  tendrás  por  impuros°  tus 

ídolos enchapados de plata y tus estatuas 

30.4 Zoan o Tanis; Hanes o Heracleópolis Magna, al SO del oasis de Fayum; ciudades del Delta del Nilo.  30.6 También sur 

mediodía

30.6 Se refiere al tributo que tenían de pagar a Egipto por su ayuda.  30.7 Esto es, Egipto el que reposa. Nom-

bre figurado para referirse a Egipto, identificado con un monstruo marino o dragón, imagen propia de la mitología cananea. 

30.10 Los que predicen o pronostican.  30.22 Lit. profanareis (declarar impuro, mancillar), porque en hebreo concuerda con un 

colectivo (el pueblo). 


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Isaías 30:23

726

revestidas de oro; los arrojarás como tra-

po de menstruo, y les dirás: ¡Fuera!

23

 Te dará lluvia para la semilla que siem-

bres en el campo; el grano de la cosecha 

de  la  tierra  será  rico  y  sustancioso;  en 

aquel  día  tus  ganados  pastarán  en  am-

plios pastizales.

24

 Los bueyes y asnos que labran la tierra 

comerán  forraje  fermentado,  aventado 

con bieldo y horquilla.

25

 En todo monte alto, en toda colina se-

ñera, habrá torrentes y cauces de agua, en 

el día de la gran matanza, cuando caigan 

las torres.

26

 La luz de la Cándida será como la del 

Ardiente, y la luz del Ardiente será siete 

veces  más  intensa,  como  la  luz  de  siete 

días,  cuando  YHVH  ponga  vendas  a  la 

fractura de su pueblo, y cure la llaga que 

Él le causó.

Contra Asiria

27

    He aquí, el nombre de YHVH° viene 

de lejos,

Y se acerca airado y levanta densa 

humareda;

Sus labios están llenos de ira, y su 

lengua es fuego devorador,

28

    Su resuello° es como un torrente 

que inunda, que alcanza hasta la 

garganta,

Para zarandear las naciones con 

zarandeo funesto,

Y poner brida de extravío en las 

quijadas de los pueblos.

29

    Pero vuestros cánticos resonarán 

como en atardecer sagrado de 

solemnidad,°

El corazón se alegrará como el que 

camina al son de la flauta,

Mientras marcha hacia el Monte de 

YHVH, a la Roca de Israel.

30

    Y YHVH hará oír la majestad de su 

voz,

Y mostrará su brazo que descarga 

con indignación su ira,

Con llamas de fuego devorador,

Con turbión y tempestad y granizo.

31

    A la voz de YHVH serán hechos 

pedazos los asirios;

Él los herirá con vara,

32

    Y cada golpe de la vara justiciera que 

YHVH descargue en ellos,

Será acompañado con panderos y 

con arpas,

Cuando se enfrente contra ellos en 

la tumultuosa batalla.

33

    Porque tiempo ha que un Tofet° está 

dispuesto también para Moloc,

Dispuesto con abundante leña en un 

pozo ancho y profundo,

Que el soplo de YHVH encenderá 

como un torrente de azufre.

Vanidad de la ayuda humana

31

¡Ay de los que bajan a Egipto por 

socorro,

Y confían en caballos y confían en 

carros, porque son muchos,

Y en jinetes, porque son fuertes,

Y no se fijan en el Santo de Israel,

Y no consultan a YHVH!

2

    Pues Él también es hábil para enviar 

desgracias,

Y no revoca su palabra:

Se alzará contra una casa de 

malvados,

Contra un auxilio de malhechores.

3

    Los egipcios son hombres y no 

dioses,

Sus caballos son carne y no espíritu.

YHVH extenderá su mano y el 

protector tropezará,

Y caerá el protegido, y ambos 

perecerán,

Pues así me ha dicho YHVH:

4

    Como gruñe el león o el cachorro 

con su presa,

Y no se amedrenta por el griterío de 

los pastores que viene contra él,

Ni se intimida por su tumulto,

Así descenderá YHVH Sebaot

A combatir sobre el Monte Sión,

Sobre su cima.

5

    Como ave que revolotea,°

Así amparará YHVH Sebaot a 

Jerusalem,

Amparando y salvando,

30.27 Esto es, YHVH mismo.  30.28 El mismo término indica espíritu, temperamento.  30.29 Algunos traducen por pascua, pero 

el TM no especifica aquí que se trate de dicha fiesta, la cual tiene un término específico. 

30.33 Es decir, un banquete. Localidad 

al S de Jerusalem, donde se ofrecían niños en sacrificio a Moloc por medio del fuego 

→2 R.23.10; Lv.18.21.  31.5 Es decir, 

como el ave ampara a sus polluelos revoloteando sobre ellos en el nido


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Isaías 32:19

727

Perdonando y libertando.

6

    ¡Oh hijos de Israel, volveos a Aquél

De quien tan radicalmente os habéis 

apartado!

7

    Aquel día cada cual rechazará con 

desprecio

Sus ídolos de plata y sus ídolos de 

oro,

Que vuestras manos os hicieron para 

pecar.

8

    Asiria caerá con espada, pero no de 

hombre,

Espada no de mortal la devorará,

Y si sus jóvenes escapan de la 

espada,

Llegarán a ser tributarios.°

9

    Su roca escapará despavorida,

Sus príncipes quedarán espantados 

ante su estandarte, dice YHVH,

Que tiene su hoguera en Sión,

Y su horno en Jerusalem.

El Rey Libertador

32

He aquí para justicia reinará 

  un rey,

Y sus príncipes° presidirán en 

juicio.

2

    Aquel varón será como abrigo del 

viento,

Como refugio contra la tempestad,

Como corrientes de aguas en tierra 

seca,

Como sombra de roca maciza en 

tierra calurosa.

3

    Los ojos de los que ven no estarán 

cerrados,

Y los oídos de los que oyen 

atenderán.

4

    El corazón del imprudente 

aprenderá sensatez,

La lengua tartamuda hablará con 

soltura y claridad.

5

    Ya no llamarán generoso al 

mezquino,

Ni tratarán de excelencia al 

tramposo.

6

    Pues el necio dice necedades,

Y su corazón maquina° iniquidades

Para cometer impiedades,

Para blasfemar contra YHVH,

Al dejar vacío al hambriento,

Al privar de agua al sediento.

7

    Perversas son las armas del canalla,

Con tramoyas inicuas enreda al 

simple,

Con palabras de calumnia al 

desvalido

Cuando éste defiende su derecho.°

8

    En cambio, el noble tiene planes 

nobles,

Y está firme en su noble sentir.

9

    ¡Oh mujeres indolentes, levantaos!

Damas confiadas, escuchad mis 

razones, y oíd mi voz:

10

    Dentro de un año y unos días,

Las confiadas temblaréis;

Pues se acabará la vendimia,

Y no habrá cosecha.

11

    ¡Estremeceos las despreocupadas!

¡Temblad las que vivís confiadas!

¡Desnudaos del todo y ceñíos un 

sayal!°

12

    Golpeaos el pecho en duelo

Por los campos deleitosos,

Por las viñas fecundas,

13

    Por las tierras de mi pueblo

Donde crecerán zarzas y espinos;

Sí, por todas las casas alegres

Y por la ciudad divertida.

14

    El palacio quedará vacío,

La ciudad populosa desierta,

El collado y la atalaya, convertidos 

en baldíos para siempre,

En delicia de asnos

Y pastizal de rebaños.

15

    Hasta que se derrame sobre 

nosotros un hálito° de lo alto,

Y el desierto se convierta en un 

vergel,

Y el vergel se cuente como bosque.

16

    En el desierto morará la justicia, y el 

derecho habitará en el vergel.

17

     El efecto de la justicia será la paz,

El resultado de la justicia será la 

calma y seguridad perpetuas.

18

    Mi pueblo habitará en un lugar 

pacífico,

En moradas seguras,

En lugares de reposo apacible.

19

    Pero caerá granizo;

31.8 Esto es, serán sometidos a trabajos forzados.  32.1 LXX: príncipes, magistrados.  32.6 LXX: pensará.  32.7 Njuicio, justi-

cia

32.11 .sayal.  32.15 Heb. ruaj = viento, espíritu, soplo.


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Isaías 32:20

728

El bosque será talado;

La ciudad será totalmente abatida.

20

    ¡Cuán bienaventurados seréis 

vosotros,

Que habréis sembrado junto a todas 

las aguas,

Dando suelta al buey y al asno!

Promesas y exhortaciones

33

¡Ay de ti, devastador, nunca 

devastado,

traidor, nunca traicionado!

Cuando acabes de devastar, serás 

devastado,

Cuando acabes de traicionar, serás 

traicionado.

2

    ¡Oh YHVH, ten misericordia de 

nosotros!

¡En ti esperamos!

¡Sé nuestro brazo cada mañana, y 

nuestra salvación en el peligro!

3

    A tu voz atronadora se desbandaron 

los pueblos,

Al levantarte Tú se dispersaron las 

naciones,

4

    Y se recogía el botín como se recoge 

el saltamonte,

Se abalanzan a él como avalancha de 

langostas.

5

    Excelso es YHVH, porque mora en 

lo alto,

Él ha llenado a Sión de equidad y 

justicia.

6

    La fidelidad será su adorno, la 

sabiduría y el conocimiento

Serán su provisión salvadora, y el 

temor de YHVH será su tesoro.

7

    ¡Oíd! Los heraldos claman en las 

calles,

Los mensajeros de paz lloran 

amargamente.

8

    Las calzadas están desiertas, los 

caminantes han cesado.

Ha anulado el pacto,

Desprecia las ciudades,

No tuvo en cuenta a 

hombre alguno.

9

    La tierra está de luto y desfallece,

El Líbano está avergonzado y 

languidece,

Sarón° se ha tornado un desierto,

El Basán° y el Carmelo° sacuden el 

follaje.

10

    Ahora me levantaré, dice YHVH,

Ahora me exaltaré,

Ahora seré engrandecido.

11

    Habéis concebido hojarasca, pariréis 

paja,

Y vuestro propio resoplido prenderá 

un fuego que os devorará.

12

    Los pueblos serán como 

combustiones de cal,

Como espinos cortados que arden en 

el fuego.

13

    Los de lejos oyeron lo que hice,

Los de cerca conocieron mi fuerza:

14

    Aterrados están los pecadores en 

Sión,

El temblor se apoderó de los impíos.

¿Quién de nosotros podrá habitar en 

el fuego consumidor?

¿Quién de nosotros podrá habitar en 

las ascuas eternas?

15

    El que anda en justicia y habla 

rectitudes,

Que rehúsa con desprecio el lucro 

de opresiones,°

Que sacude su mano para rechazar 

el soborno,

Que tapa su oído a propuestas 

sanguinarias,°

Que cierra sus ojos para no ver el mal:

16

    Ése morará en las alturas,

Picachos rocosos serán su refugio,

Se le dará su pan,

Y sus aguas estarán seguras.

17

    Al Rey en su esplendor 

contemplarán tus ojos,

Verán una tierra de grandes 

extensiones.

18

    Tu corazón reflexionará acerca del 

horror pasado,°

Y dirá: ¿Dónde está el escriba?

¿Dónde está el que pesaba el tributo?

¿Dónde está el que inspeccionaba las 

torres?

33.9 Región costera de Canaán formada por una extensa llanura desde el Carmelo hasta Hafa. 33.9 Situado al E del Jordán y 

del lago de Genesaret 

→Nm.21.33-35; Dt.32.14.  33.9 Conjunto montañoso situado al N de Sarón entre el valle de Jezreel y el 

Mediterráneo. Este nombre significa vergel 

→Is.35.2; 1 R.18; 2 R.2.25; 4.25.  33.15 rectitudes… opresiones. El plural indica 

énfasis e intensidad. 

33.15 Lit. el que tapa sus oídos para no oír de sangres.  33.18 .pasado


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Isaías 34:13

729

19

    Ya no verás más a aquel pueblo 

fiero,

Aquel pueblo de lengua oscura que 

no se entiende,

Que pronuncia un lenguaje 

incomprensible.

20

    Contempla a Sión, ciudad de 

nuestras solemnidades;

Tus ojos verán a Jerusalem,

Morada tranquila, tienda 

permanente,

Cuyas estacas nunca se arrancarán,

Cuyas cuerdas no se soltarán.

21

    °Que allí YHVH es nuestro capitán,

En un lugar de anchurosos ríos y 

corrientes,

Donde no surcarán galeras de 

remos°

Ni los cruzará la nave capitana,

Pues sus jarcias, aflojadas,

No podrán sujetar el mástil ni 

desplegar las velas.

22

    Porque YHVH es nuestro Juez,

YHVH es nuestro Legislador,

YHVH es nuestro Rey,

Él mismo nos salvará.

23

    °Entonces el ciego repartirá copioso 

botín,

Y aun los cojos se darán al saqueo,

24

    Y ningún habitante° dirá: Estoy 

enfermo;

Pues al pueblo que allí habita le 

habrá sido perdonada su culpa.

Indignación contra las naciones

34

¡Acercaos, naciones, para oír, y 

vosotros, pueblos, escuchad!

¡Oiga la tierra y los que la llenan,

el mundo, y todos sus vástagos!°

2

    Porque YHVH está indignado con 

todas las naciones,

Airado contra todos sus ejércitos;

Los consagra al exterminio,

Los entrega al degüello.

3

    Sus muertos serán arrojados,

de los cadáveres subirá el hedor,

Y los montes estarán pringados con 

su sangre.

4

    Todo el ejército de los cielos se 

consumirá,

Y como un rollo se enrollarán los 

cielos,

Y caerán todas sus huestes,

Como cae la hoja de la vid,

Como el higo cae de la higuera.

5

    Mi espada se embriagará en los 

cielos,

Y para juicio descenderá en Edom°

Sobre el pueblo de mi anatema.°

6

    La espada de YHVH chorrea sangre, 

está untada de grosura,

De sangre de corderos y machos 

cabríos,

De grosura de riñones de carneros,

Porque YHVH tiene un sacrificio en 

Bosra,°

Y una gran matanza en Edom,

7

    Y caen juntos búfalos con toros y 

novillos;

La tierra se embriaga de su sangre, y 

el polvo grasiento de su sebo.

8

    Porque es el día de la venganza de 

YHVH,

Año de desquite para la causa de 

Sión.

9

    Sus torrentes se convierten en brea, 

y su polvo en azufre,

Su territorio se torna brea ardiente,

10

    Que no se apaga ni de noche ni de 

día,

Y su humareda sube perpetuamente.

De generación en generación 

seguirá desolada,

Por siglos de siglos nadie la 

transitará.

11

    Se adueñan de ella el pelícano y el 

alcaraván,

La lechuza y el cuervo la habitan.

Sobre ella fue aplicada° la plomada 

del caos

Y el nivel del vacío;

12

    Y no queda nombre con que llamar 

a su reino,

Pues todos sus príncipes vuelven a 

la nada.

13

    En sus palacios crecen los espinos,

33.21-23 

→§163.  33.21 Prob. se refiere a la esclavitud.  33.21-23 →§163.  33.24 Esto es, de Jerusalem.  34.1 O todo lo 

que brota o germina en él

34.5 Sobrenombre dado a Esaú que pasó a ser una denominación común de los enemigos de 

Dios. 

34.5 Esto es, el pueblo que se ha hecho digno de mi maldición para ser destruido.  34.6 Para ese momento, la capital de 

Edom. 

34.11 Nel Señor o YHVH extenderá.


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Isaías 34:14

730

En sus torreones ortigas y abrojos,

Se convierte en cubil de chacales,

En coto de avestruces.

14

    Allí se dan cita hienas y chacales,

Y los sátiros° llaman a sus 

compañeros,

Para que allí venga a descansar 

Lilit,°

Y halle para sí el lugar de su reposo.

15

    Allí tiene su nido la serpiente,

Pone, incuba y empolla sus huevos,

Allí se juntan los buitres,

Cada uno con su compañera.

16

    Escudriñad el Rollo de YHVH° y leed:

Ni uno solo de ellos falta,

Ninguno echará de menos al otro,

Porque la Boca lo ha ordenado,

Y su Aliento los ha congregado.

17

    Él le° ha echado suertes,

Y su mano les ha repartido a cordel,

Para siempre la poseerán,

Habitarán en ella por todas las 

generaciones.

Bendición del reino

35

¡Alégrense el desierto y el 

sequedal! ¡Regocíjese el Arabá y 

florezca como el lirio,

2

    Florezca exuberante y desborde de 

júbilo,

Alégrese y cante alabanzas!

Porque le fue dada la gloria del 

Líbano,°

La hermosura del Carmelo y de 

Sarón.°

Sí, ellos verán la gloria de YHVH,

La majestad de nuestro Dios.

3

    Fortaleced las manos cansadas,

Afirmad las rodillas endebles,

4

    Decid a los de corazón apocado:

¡Esforzaos, no temáis!

He aquí vuestro Dios viene con 

retribución:

La venganza es de ’Elohim;

Él mismo vendrá y os salvará.

5

    Entonces los ojos de los ciegos serán 

abiertos,

Y los oídos de los sordos destapados.

6

    Entonces el cojo saltará como un 

ciervo,

Y cantará la lengua del mudo,

Porque aguas han brotado en el 

desierto,

Y° torrentes en el Arabá.

7

    La tierra árida se convertirá en 

lagunas,

Y el sequedal en manantiales de 

aguas,

Pastizales, juncos y cañaverales en 

el lugar

Donde se tumbaban chacales.

8

    Y habrá allí calzada y camino,°

Y será llamado Camino 

de Santidad.

No pasará inmundo por él.

El que ande por este Camino,

Por torpe que sea, no se extraviará,

Porque Él mismo estará con ellos.

9

    No habrá allí león, ni fiera subirá 

por él, ni será allí hallada,

Para que caminen los redimidos.

10

    Y los redimidos de YHVH volverán 

y entrarán en Sión con gritos de 

júbilo,

Alegría perpetua coronará sus 

cabezas,

Y retendrán el alborozo y el regocijo,

Porque la tristeza y el lamento 

habrán huido.

Invasión de Asiria

36

En  el  año  decimocuarto  del  rey 

Ezequías,° aconteció que Senaque-

rib°  rey  de  Asiria  subió  contra  todas  las 

ciudades fortificadas de Judá y se apoderó 

de ellas.

2

 Desde  Laquis  el  rey  de  Asiria  envió  al 

Rabsaces° con un gran ejército a Jerusa-

lem,  contra  el  rey  Ezequías,  e  hizo  alto 

junto al acueducto del estanque superior, 

en la senda del Campo del Lavador.

3

 Y  salió  a  él  Eliaquim  ben  Hilcías,  ma-

yordomo  de  palacio;  Sebna  el  escriba,  y 

Joa ben Asaf, el cronista.

34.14 O chivo salvaje. Prob. algún tipo de demonio masculino.  34.14 Demonio femenino, con alas y extremidades propias de 

las aves; espectro de la noche que habita en los lugares desiertos y entre las ruinas. Hapax legómena

34.16 Prob. conjunto 

de profecías no identificado, tal vez procedentes del mismo Isaías. 

34.17 Esto es, Edom.  35.2 Sierra situada al N, rodeando 

Palestina, famosa por su riqueza forestal 

→1 R.6.10,15,16.  35.2 →33.9 notas.  35.6 Qumram: fluirán.  35.8 LXX añade puro.  

36.1 Corresponde al 701 a.C.  36.1 

→2 R.18.13.  36.2 Más que nombre propio parece ser un cargo militar (ayudante de campo 

o especie de comandante), otros traducen copero del rey.


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Isaías 37:6

731

4

 Y  les  dijo  Rabsaces:  Decid  a  Ezequías: 

Así afirma el gran rey, el rey de Asiria: ¿En 

qué fundas tu confianza?

5

 Te digo que el consejo y poderío para la 

guerra de que hablas no son más que va-

nas palabras. Ahora pues, ¿en quién con-

fías para rebelarte contra mí?

6

 ¿Te fías de ese bastón de caña cascada que 

es Egipto? ¡Al que se apoya en él se le clava 

en la mano y se la atraviesa! Así es Faraón 

rey de Egipto para los que confían en él.

7

 Y si me replicas: En YHVH nuestro Dios 

confiamos  ¿no  es  éste  acaso  el  mismo 

cuyos  lugares  altos  y  cuyos  altares  hizo 

quitar Ezequías exigiendo a Judá y a Je-

rusalem que se postraran solamente ante 

ese altar?

8

 Por tanto, haz una apuesta con mi señor, 

el rey de Asiria, y te daré dos mil caballos si 

logras proveerte de jinetes para ellos.

9

 ¿Cómo podrás resistir al más ínfimo de 

los siervos de mi señor, aun confiando en 

que Egipto te dará carros y jinetes?

10

 Además,  ¿he  subido  acaso  sin  YHVH 

contra esta tierra para destruirla? YHVH me 

dijo: Sube contra esa tierra y destrúyela.

11

 Entonces Eliaquim, Sebna y Joa, dije-

ron al Rabsaces: Te rogamos que hables a 

tus  siervos  en  arameo°,  que  nosotros  lo 

entendemos, no nos hables en judío° ante 

la gente que está sobre el muro.

12

 Pero  respondió  Rabsaces:  ¿Crees  que 

mi señor me ha enviado a hablar estas pa-

labras a ti y a tu señor? ¿No me ha enviado 

a los hombres que están en el muro, ex-

puestos a comerse sus propios excremen-

tos y beberse sus orinas con vosotros?

13

 Y poniéndose en pie, Rabsaces gritó en 

judío a voz en cuello: Oíd las palabras del 

gran rey, el rey de Asiria.

14

 Así dice el rey: No os engañe Ezequías, 

porque no os podrá librar;

15

 ni  os  infunda  Ezequías  confianza  en 

YHVH, diciendo: Ciertamente YHVH nos 

librará,° y esta ciudad no será entregada 

en manos del rey de Asiria.

16

 No escuchéis a Ezequías, porque el rey 

de Asiria dice así: ¡Haced conmigo la paz 

y salid a mí!,° y coma cada uno de su vid y 

cada uno de su higuera, y beba cada cual 

las aguas de su pozo,

17

 hasta que yo venga y os traslade° a una 

tierra como vuestro país, tierra de grano 

y mosto, tierra de pan y viñas.

18

 Que no os persuada Ezequías diciendo: 

¡YHVH nos librará! Pues ¿acaso alguno de 

los dioses de las naciones ha librado a su 

tierra de la mano del rey de Asiria?

19

 ¿Dónde están los dioses de Hamat y de 

Arfad? ¿Dónde están los dioses de Sefar-

vaim? ¿Libraron a Samaria de mi mano?

20

 ¿Qué dios de esas tierras ha podido li-

brar sus territorios de mi mano? ¿Y YHVH 

va a librar a Jerusalem de mi mano?

21

 Pero ellos callaron y no respondieron 

palabra, porque la orden del rey decía: No 

le respondáis.

22

 Entonces  Eliaquim  ben  Hilcías,  ma-

yordomo de palacio, y Sebna, el escriba, 

y Joa ben Asaf, el cronista, se presentaron 

ante Ezequías con sus vestidos rasgados y 

le refirieron las palabras del Rabsaces.

Judá es librado del rey de Asiria

37

Y  sucedió  que  cuando  el  rey  Eze-

quías  lo  oyó,  también  rasgó  sus 

vestidos,  y  se  cubrió  de  saco,  y  fue  a  la 

Casa de YHVH.

2

 Y envió a Eliaquim, mayordomo de pa-

lacio,  y  a  Sebna,  el  escriba,  y  a  los  más 

ancianos  de  los  sacerdotes,  cubiertos  de 

saco, al profeta Isaías ben Amoz,

3

 y le dijeron: Así ha dicho Ezequías: ¡Hoy 

es un día de angustia, de castigo y de ver-

güenza; los hijos han llegado hasta el cuello 

del útero, pero no hay fuerza para parir!

4

 Quizá YHVH tu Dios haya escuchado las 

palabras  del  Rabsaces,  a  quien  su  amo, 

el rey de Asiria, mandó para provocar al 

Dios viviente, y castigue las palabras que 

YHVH tu Dios ha oído. ¡Eleva pues ora-

ción por el remanente que aún subsiste!

5

 Así fueron los siervos del rey Ezequías 

a Isaías,

6

 el cual les respondió: Decid a vuestro se-

ñor: Así dice YHVH: No temas las palabras 

que has oído, con las cuales los servidores 

del rey de Asiria me han vituperado.

36.11 Heb. aramit = arameo. Se refiere al arameo imperial. Una modalidad del arameo hablada en Asiria y Persia desde el siglo VIII 

a.C. hasta los tiempos de Jesús. 

36.11 Heb. yehudit judío, hebreo.  36.15 Hebraísmo: Salvando nos salvará. Modo de enfatizar la 

acción. 

36.16 NCapitulad, y rendíos a mí.  36.17 Ntomar, arrebatar.


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Isaías 37:7

732

7

 He aquí pondré cierto espíritu en él, y 

oirá un rumor,° y regresará a su tierra, y 

en su tierra lo haré caer a espada.

8

 Volvió pues Rabsaces, y halló al rey de 

Asiria  peleando  contra  Libna,  porque 

supo que se había retirado de Laquis,

9

 al oír que Tirhaca rey de Etiopía había 

salido a luchar contra él. Entonces envió 

mensajeros a Ezequías, diciendo:

10

 Así  hablaréis  a  Ezequías  rey  de  Judá, 

diciendo: No te engañe tu Dios en quien 

confías, pensando que Jerusalem no será 

entregada en mano del rey de Asiria.

11

 He  aquí,  tú  mismo  has  oído  lo  que 

los reyes de Asiria han hecho a todos los 

países, exterminándolos, ¿y tú te vas a li-

brar?

12

 ¿Por ventura han podido librar los dio-

ses  a  sus  naciones  que  mis  antepasados 

destruyeron: Gozán, Harán, y Resef, y los 

hijos de Edén que estaban en Telasar?

13

 ¿Dónde están el rey de Hamat, el rey 

de Arpad, el rey de la ciudad de Sefarvaim, 

de Hena y de Iva?

14

 Recibió,  pues,  Ezequías  la  carta  de 

mano  de  los  mensajeros  y  la  leyó.  Des-

pués subió Ezequías a la Casa de YHVH, y 

la extendió ante YHVH.

15

 Y oró Ezequías a YHVH, y dijo:

16

 ¡Oh YHVH Sebaot, Dios de Israel, que 

te sientas sobre los querubines! Sólo Tú 

eres Dios sobre todos los reinos de la tie-

rra. Tú hiciste los cielos y la tierra.

17

 Inclina tu oído ¡oh YHVH!, y escucha. 

Abre tus ojos ¡oh YHVH!, y mira. Escucha 

todas las palabras con que Senaquerib ha 

mandado para provocar al Dios viviente.

18

 Oh  YHVH,  ciertamente  los  reyes  de 

Asiria  han  asolado  todas  las  naciones  y 

sus comarcas,

19

 y han arrojado sus dioses al fuego, por-

que no son dioses, sino obra de manos de 

hombre, de madera y de piedra, y por eso 

han sido aniquilados.

20

 Ahora pues, YHVH Dios nuestro, sálva-

nos de su mano, y sepan todos los reinos 

de la tierra que Tú, sólo Tú, eres YHVH.

21

 Entonces Isaías ben Amoz envió a de-

cir  a  Ezequías:  Así  dice  YHVH  Dios  de 

Israel: En cuanto a lo que pediste en ora-

ción acerca de Senaquerib rey de Asiria,

22

 éste  es  el  oráculo  que  YHVH  ha  pro-

nunciado acerca de él: La virgen hija de 

Sión te desprecia y se burla de ti. La hija 

de  Jerusalem  menea  despectivamente  la 

cabeza a tu espalda.

23

 ¿A quién has provocado y vituperado? 

¿Contra quién has alzado la voz y levanta-

do tus ojos con altivez? ¡Contra el Santo 

de Israel!

24

 Por medio de tus siervos has provoca-

do  a  Adonay,  pues  dijiste:  Con  la  multi-

tud de mis carros he subido a las alturas 

de las montañas, a lo más inaccesible del 

Líbano. He talado sus más altos cedros y 

sus mejores cipreses; he llegado hasta el 

último de sus refugios, hasta lo más den-

so de su bosque;

25

 he cavado y he bebido aguas,° y con la 

planta de mis pies he secado todos los ríos 

de Egipto.°

26

 ¿No lo has oído? Desde antiguo lo deci-

dí; en tiempos remotos lo preparé, y aho-

ra hago que suceda. Tú estás puesto para 

reducir las ciudades fortificadas a monto-

nes de ruinas,

27

 y  que  sus  habitantes,  impotentes,° 

abatidos y confusos, sean como pasto del 

campo, como hierba verde, como herbaje 

de tejado agostada antes de crecer.°

28

 Yo  conozco  tu  sentarte,  tu  salir  y  tu 

entrar, y tu airarte contra mí.

29

 Por  cuanto  tu  enfurecimiento  contra 

mí y tu soberbia° han llegado a mis oídos, 

pondré mi garfio en tu nariz y mi brida en 

tu boca, y te haré volver por el camino en 

que viniste.

30

 Esto te servirá de señal: Este año co-

meréis lo que brota de por sí, y el segundo 

año de lo que brote sin sembrar, y al ter-

cer año sembrad y segad, plantad viñas y 

comed de su fruto.

31

 Y el remanente de la casa de Judá que 

quede a salvo, de nuevo echará raíces por 

abajo y dará frutos por arriba.

32

 Porque de Jerusalem saldrá un rema-

nente, los sobrevivientes del Monte Sión. 

¡El celo de YHVH Sebaot hará esto!

37.7 Nnoticia, revelación.  37.25 Siguiendo el texto paralelo 

→2 R.19.24, algunas versiones añaden extrañas, extranjeras

37.25 Lit. la fortaleza.  37.27 Lit. cortos de mano.  37.27 Qumram: el viento del desierto abrasan. Siguiendo a 2 R.19.26, el 

aparato crítico sugiere traducir la mies agostada antes de espigar

37.29 Narrogancia.


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Isaías 38:19

733

33

 Por tanto, así dice YHVH acerca del rey 

de Asiria: No entrará a esta ciudad, ni dis-

parará allí flecha, ni le opondrá escudo, ni 

levantará contra ella baluartes.

34

 Por el camino que vino volverá, y no 

entrará en esta ciudad, dice YHVH.

35

 Yo ampararé a esta ciudad para salvar-

la, por amor a mí mismo, y por amor a 

David mi siervo.

36

 Y°  salió  el  ángel  de  YHVH  y  mató  a 

ciento ochenta y cinco mil hombres en el 

campamento de los asirios, y a la hora de 

levantarse por la mañana, he aquí todos 

eran cadáveres.

37

 Entonces Senaquerib, rey de Asiria, le-

vantó el campamento, se volvió a Nínive 

y se quedó allí.

38

 Y  sucedió  que  mientras  estaba  pos-

trado en el templo de su dios Nisroc, sus 

hijos Adremelec y Sarezer lo asesinaron a 

espada, y huyeron a la tierra de Ararat, y 

en lugar suyo reinó su hijo Esar-hadón.

Enfermedad de Ezequías

38

En aquellos días Ezequías cayó en-

fermo de muerte. Y vino a él Isaías 

ben  Amoz,  el  profeta,  y  le  dijo:  Así  dice 

YHVH: Ordena tu casa, porque morirás y 

no vivirás.

2

 Entonces volvió Ezequías su rostro ha-

cia el muro, y oró a YHVH,

3

 y dijo: Oh YHVH, te ruego que te acuer-

des ahora que he andado delante de ti en 

verdad  y  con  íntegro  corazón,  y  que  he 

hecho lo que ha sido agradable ante tus 

ojos. Y lloró Ezequías con gran llanto.

4

 Entonces  la  palabra  de  YHVH  llegó  a 

Isaías, diciendo:

5

 Ve y di a Ezequías: YHVH, Dios de David 

tu padre dice así: He oído tu oración y vis-

to tus lágrimas. He aquí, añado a tus días 

otros quince años.

6

 Además, te libraré de la mano del rey de 

Asiria, a ti y a esta ciudad, a la cual am-

pararé.

7

 Y esto te será señal de parte de YHVH, 

que YHVH hará lo que ha dicho:

8

 He aquí Yo hago retroceder diez gradas° 

la  sombra  del  sol  que  ha  descendido  en 

la gradería de Acaz. Y el sol° volvió atrás 

diez gradas, sobre las cuales ya había des-

cendido.

9

 Escrito de Ezequías rey de Judá, cuando 

enfermó y fue sanado de su enfermedad:

10

    Yo me dije: ¡En lo mejor de mis días 

entraré por las puertas del Seol!

¡Privado soy del resto de mis años!

11

    Dije: No veré a YH, a YH en la tierra 

de los vivientes,

No veré más a hombre alguno

Cuando esté° con los moradores del 

lugar donde todo ha cesado.

12

    Mi morada es levantada y enrollada 

como tienda de pastores.

Cual tejedor devanaba yo mi vida,

Pero hoy° me cortan la trama.

¡Del día a la noche acabas 

conmigo!

13

    Te tuve cual león ante mí, y yo 

pensaba:°

¡Me romperá todos los huesos!

¡Del día a la noche acabas conmigo!

14

    Cual grulla o golondrina piaba yo, 

gemía como paloma;

Mis ojos se consumían mirando a lo 

alto:

¡Oh Adonay, estoy angustiado, sal 

fiador por mí!

15

    ¿Qué puedo decir o pensar, si Él es 

quien lo hace?

En la amargura de mi alma,

Andaré con inquietud todos mis 

años.

16

    Los que Adonay protege, viven, y 

entre ellos vivirá mi espíritu:

¡Me has sanado y hecho revivir!

17

    He aquí, mi amargura se me volvió 

paz,

Cuando detuviste mi alma de la fosa 

de la nada,

Y en tu espalda cargaste todos mis 

pecados.

18

    El Seol no te exaltará,

Ni la Muerte te alabará,

Ni esperarán en tu fidelidad° los que 

bajan al sepulcro.

19

    Sólo el que vive, ¡el que vive!,

Ése te alaba como yo hoy.

37.36 Siguiendo 2 R.19.35, algunas versiones añaden: sucedió en aquella noche que.  38.8 Heb. hamma-alót = grada, escalón

Relacionado como parte de un reloj de sol, donde la sombra del edificio se proyectaba sobre gradas o escalones. 

38.8 Es decir, 

la sombra del sol

38.11 .cuando esté.  38.12 .hoy.  38.13 .pensaba.  38.18 LXX: tu gracia


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Isaías 38:20

734

El padre enseñará a sus hijos tu 

fidelidad.

20

    ¡YHVH fue presto a salvarme!

Entonaremos cánticos con 

instrumentos de cuerda todos los 

días de nuestra vida en la Casa de 

YHVH.°

21

 Porque Isaías había dicho: Tomad una 

masa de higos, trituradla y aplicadla so-

bre la úlcera, y sanará.

22

 Y  Ezequías  había  dicho:  ¿Qué  señal 

tendré de que subiré a la Casa de YHVH?

Los emisarios de Babilonia

39

En  aquel  tiempo  Merodac-Bala-

dán,° hijo de Baladán, rey de Babi-

lonia, envió cartas y regalos a Ezequías, al 

saber que había estado enfermo y se había 

restablecido.

2

 Y  se  alegró  Ezequías  con  ellos,  y  les 

mostró la tesorería,° la plata y el oro, las 

especias  y  los  ungüentos  aromáticos,  y 

toda  su  casa  de  armas,  y  todo  lo  que  se 

encontraba  entre  sus  tesoros.  No  hubo 

nada en su casa ni en sus dominios que 

Ezequías no les mostrara.

3

 Entonces el profeta Isaías fue al rey Eze-

quías,  y  le  preguntó:  ¿Qué  ha  dicho  esa 

gente y de dónde vienen a visitarte? Eze-

quías respondió: De una tierra lejana han 

venido a visitarme: de Babilonia.

4

 Le  preguntó  pues:  ¿Qué  han  visto  en 

tu casa? Y dijo Ezequías: Han visto todo 

cuanto  hay  en  mi  casa,  y  no  hay  nada 

entre mis tesoros que no les haya mos-

trado.

5

 Entonces  dijo  Isaías  a  Ezequías:  Escu-

cha la palabra de YHVH Sebaot:

6

 He aquí vienen días en que todo lo que 

hay en tu casa, cuanto atesoraron tus pa-

dres hasta hoy, será llevado a Babilonia; 

no quedará nada, dice YHVH.

7

 Y de entre tus hijos, que procederán de 

ti,° a quienes habrás engendrado, serán eu-

nucos en el palacio del rey de Babilonia.

8

 Entonces Ezequías dijo a Isaías: La pa-

labra de YHVH que has hablado es buena. 

Pues pensó: Al menos habrá paz y seguri-

dad en mis días.

El nuevo mensaje

40

¡Consolad,  consolad  a  mi  pueblo, 

dice vuestro Dios!

2

    ¡Hablad al corazón de Jerusalem!

¡Gritadle que su dura milicia ha 

terminado,

Y su culpa ha sido cancelada!

Pues de mano de YHVH ha recibido 

el doble por sus pecados.

3

    Una voz clama: ¡Preparad en el 

desierto el camino a YHVH!°

¡Allanad en el yermo una calzada a 

nuestro Dios!

4

    Que los valles se levanten;

Que los montes y las colinas se 

abajen;

Que lo torcido se enderece,

Y lo escabroso se allane.

5

    Y se manifestará la gloria de YHVH,

Y toda carne° juntamente la verá,

Porque la boca de YHVH lo ha dicho.

6

    Una voz dice: ¡Proclama!

Otra responde: ¿Qué proclamaré?

Que toda carne es como hierba,

Y toda su gloria° como flor 

campestre:

7

    Sécase la hierba, marchítase la flor,

Cuando el aliento de YHVH sopla 

sobre ellos.

¡En verdad el pueblo es hierba!

8

    Sécase la hierba, marchítase la flor,

Pero la palabra del Dios nuestro

Permanece para siempre.

9

    ¡Súbete a un monte alto, oh Sión,

Anunciadora de buenas nuevas!

¡Alza fuerte tu voz, oh Jerusalem,

Anunciadora de buenas nuevas!

¡Álzala, no temas!

Di a las ciudades de Judá:

¡Aquí está vuestro Dios!

10

    ¡Mirad: Adonay YHVH viene con 

poder, y su brazo manda!

¡He aquí su galardón con Él y su 

recompensa lo precede!

11

    Como pastor apacentará su grey,

Recogerá a los corderitos en sus 

brazos,

Los llevará en su regazo,

Y sustentará a las recién paridas.

38.20 Según el mss. de Qumram, se omiten los v. 21 y 22, que sí aparecen en el TM, y cuyo paralelo se registra en 2 R.20.7-8.  

39.1 Esto es, Marduk Baladán proclamado rey de Babilonia en el 721 apoyado por el rey de Elam.  39.2 Lit. la casa de su teso-

ro

39.7 Qumram: de tus lomos.  40.3 LXX: Voz de aquel que clama en el desierto.  40.5 En sentido figurado todo ser viviente.  

40.6 LXX: su gloria


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Isaías 41:2

735

El Dios formidable

12

    ¿Quién midió a puñados el mar, o 

mensuró a palmos los cielos, o a 

cuartillos el polvo de la tierra?

¿Quién pesó en balanza los montes, 

y en báscula las colinas?

13

    ¿Quién ha precisado el Espíritu de 

YHVH, y como consejero suyo le 

ha enseñado?

14

    ¿De quién tomó consejo, o quién 

lo instruyó, o lo adoctrinó en el 

camino de la justicia, o le enseñó 

el conocimiento,° o le mostró el 

camino del discernimiento?°

15

    He aquí, las naciones le son gotas en 

un cubo;

Valen lo que el polvillo de 

la balanza;

Las islas le pesan lo que un grano de 

polvo;

16

    El Líbano no basta para leña,

Ni sus bestias alcanzan para el 

holocausto.

17

    Delante de Él todas las cosas son 

como nada,

Como cosa vana le son estimadas.

18

    ¿Con quién compararéis a ’El?

¿Qué imagen le contrapondréis?

19

    °¿La estatua que funde el escultor y 

el orfebre recubre de oro,

Y el platero le suelda cadenillas de 

plata?

20

    El que es muy pobre en la ofrenda,

Escoge un leño que no se pudra,

Se busca un hábil tallador,

Que le talle una estatua que no se 

mueva.

21

    ¿No sabéis ni habéis oído?

¿No os lo anunciaron de antemano?

¿No lo habéis entendido desde la 

fundación del mundo?

22

    El que se sienta sobre el círculo de 

la tierra,

Cuyos habitantes le son como 

langostas;

Que extendió los cielos como un velo,

Y los desplegó como tienda que se 

habita;

23

    Que reduce los príncipes a nada,

Y convierte en vanidad° a los jueces 

de la tierra:

24

    Apenas plantados, apenas 

sembrados,

Apenas arraigados en la tierra,

Sopla sobre ellos, y se agostan,

Y el vendaval los arrebata como 

paja.

25

    ¿A quién me compararéis, para que 

me asemeje? Dice el Santo.

26

    Alzad vuestros ojos a lo alto y mirad: 

¿Quién creó aquello?°

El que saca a sus ejércitos por 

número,

Y a cada uno llama por su nombre,

Y por la grandeza de su fuerza y 

fortaleza de su poder

Ninguno deja de presentarse.

27

    ¿Por qué hablas, oh Jacob, y dices, 

Israel:

Mi camino está oculto a YHVH, mi 

Dios ignora mi causa?

28

    ¿Acaso no lo sabes ni lo has oído?

YHVH es Dios eterno,

Creador de los confines de la tierra, 

no se cansa ni se fatiga,

Y su inteligencia es insondable.

29

    Él fortalece al cansado,

Acrecienta el vigor al que no tiene;

30

    Aun los muchachos se fatigan y se 

cansan,

Los jóvenes tropiezan y vacilan,

31

    Pero los que esperan en YHVH 

tienen nuevas fuerzas,

Remontan vuelo como las águilas,

Corren y no se fatigan, andan y no 

se cansan.

El socorro de Israel

41

¡Guardad silencio delante de mí, 

oh tierras lejanas!

Renueven sus fuerzas las naciones, 

y acérquense y hablen,

Y juntos vengamos a juicio.

2

    ¿Quién lo° ha levantado de oriente, y 

le convoca la victoria a su paso,

Y le entrega pueblos, y le somete 

reyes?

Los dio como polvo a su espada, y 

como hojarasca arrebatada a su 

arco.

40.14 LXX omite: o le enseñó conocimiento.  40.14 Ninteligencia, prudencia.  40.19 Se sugiere leer a continuación 41.6-7 

→§163  40.23 Nvacío.  40.26 Es decir, estos cuerpos celestes.  41.2 Esto es, Ciro →45.1; 46.11.


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Isaías 41:3

736

3

    Los perseguirá, y pasará adelante 

con seguridad,

Por sendas que sus pies nunca 

habían hollado.

4

    ¿Quién lo planeó y lo ejecutó?

Yo, el que anuncia el futuro de 

antemano:

Yo, YHVH, que soy el primero,

También soy con los postreros.

5

    Las tierras lejanas vieron esto y 

temieron,

Temblaron los confines de la tierra, 

se congregaron, y vinieron.

6

    °Cada cual ayudó a su compañero,

Cada cual dijo a su hermano:

¡Ánimo!

7

    Así el escultor anima al orfebre, y el 

que forja a martillo al que bate el 

yunque,

Y dicen: ¡Buena soldadura!

Y la aseguran con clavos para que no 

se mueva.

8

    Pero tú, oh Israel, siervo mío, Jacob, 

a quien he escogido,

Simiente de Abraham, mi amigo;

9

    Tú, a quien tomé de los confines de 

la tierra,

Y te llamé de sus extremos,

A quien dije: Tú eres mi siervo,

Te escogí y no te deseché;

10

    No temas, porque Yo estoy contigo;

No desmayes, porque Yo soy tu Dios;

Te fortaleceré y siempre te ayudaré,

Sí, Yo te sostendré con mi diestra 

victoriosa.°

11

    Serán avergonzados y confundidos

Todos los que están airados contra 

ti,

Serán como nada y perecerán

Los que contienden contra ti.

12

    Buscarás a los que contienden 

contigo, y no los hallarás;

Los que guerrean contra ti serán 

aniquilados, y dejarán de existir.

13

    Porque Yo, YHVH tu Dios, soy el que 

sostengo tu diestra,

Y te digo: No temas, Yo mismo te 

ayudo.

14

    No temas, oh gusanillo de Jacob, 

Oruga de Israel:

Yo soy tu socorro, dice YHVH,

Tu Redentor es el Santo de Israel.

15

    He aquí, te convierto en trillo 

aguzado,

Afilado y dentado;

Trillarás los montes y los triturarás,

Y como a tamo reducirás los 

collados;

16

    Los aventarás, y el viento se los 

llevará,

Y los esparcirá el torbellino;

Pero tú te regocijarás con YHVH,

Te gloriarás en el Santo de Israel.

17

    Los pobres y menesterosos buscan 

agua, y no la hay,

Su lengua está reseca de sed.

Yo, YHVH, les responderé;

Yo, el Dios de Israel, no los 

desampararé.

18

    Abriré ríos en las dunas,

Manantiales en medio de las vaguadas,

Convertiré el desierto en lagunas,

El yermo en fuentes de agua.

19

    Haré crecer en el desierto cedros,

Y acacias, y mirtos, y olivos;

Y en la tierra árida plantaré cipreses

Junto con olmos y abetos.

20

    Para que vean y conozcan,

Para que reflexionen y entiendan de 

una vez,

Que la mano de YHVH hace esto,

Que el Santo de Israel lo ha creado.

La vanidad de los ídolos

21

    ¡Presentad vuestra causa! dice 

YHVH;

¡Exponed vuestras razones! dice el 

Rey de Jacob.

22

    Que se adelanten, y nos anuncien lo 

que va a suceder;

Declarad vuestras predicciones 

pasadas,

Para que las consideremos,

Y podamos comprobar en qué 

pararon;

Anunciadnos las cosas por venir,

23

    Declarad las cosas que vendrán en el 

futuro,

Para que sepamos que sois dioses.

¡Sí; haced algo, bueno o malo,

Para que todos lo veamos y nos 

maravillemos!

41.6 Se sugiere leer 41.6-7 después de 40.19 

→§163  41.10 Lit. de mi victoria.


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Isaías 42:12

737

24

    Pero, he aquí vosotros sois menos 

que la nada,

Vuestras obras son menos que el 

vacío,

¡Abominable es aquel que os escoge!

25

    Yo he levantado a uno° desde el 

norte, y ya viene;

Desde el nacimiento del sol invocará 

mi Nombre;

Pisoteará a príncipes como al lodo,

De la manera que el alfarero pisa el 

barro.

26

    ¿Quién anunció esto de antemano 

para que lo sepamos,

Por adelantado, para que digamos: 

Tiene razón?

Ciertamente ninguno lo declara,

Ninguno lo predice,

No hubo nadie que oyera vuestro 

discurso.

27

    Yo dije el primero a Sión: ¡Mira estas 

cosas!°

¡Daré a Jerusalem heraldos de 

buenas nuevas!

28

    Miré, y no había nadie, de ellos 

no había consejero que les 

preguntara y me respondieran.

29

    ¡He aquí todos ellos son vanidad,

Todas sus obras, nada son,

Viento y vacuidad son sus imágenes 

fundidas!

El Siervo de YHVH

42

He aquí° mi Siervo, a quien Yo 

sostengo;

Mi escogido,° en quien se complace 

mi alma.

He puesto mi Espíritu sobre Él,

Y Él traerá la justicia a las naciones.

2

    No voceará ni alzará su voz,

Ni la hará oír por las calles.

3

    No quebrará la caña cascada,

Ni apagará el pabilo que humea;

Hará que la justicia actúe conforme 

a la verdad.

4

    No vacilará ni desfallecerá,

Hasta que haya establecido la 

justicia en la tierra,

Y en su enseñanza esperanzarán las 

costas.

5

    Así dice Ha-’El YHVH,

Que creó los cielos y los desplegó,

Que afirmó la tierra y cuanto en ella 

brota,

Que da aliento a la gente que la 

habita,

Y espíritu a los que caminan por 

ella.

6

    Yo, YHVH, te he llamado para la 

justicia,

Te he tomado de la mano, te he 

formado,°

Y te pondré por alianza° del pueblo,

Y por luz de los gentiles,

7

    Para que abras los ojos de los ciegos,

Y saques de la cárcel a los presos,

Y de las casas de prisión a los que 

moran en tinieblas.

8

    Yo, YHVH: ¡Éste es mi Nombre,

No cedo mi gloria a nadie,

Ni mi alabanza a los ídolos!°

9

    He aquí, se cumplieron las cosas 

primeras.

Yo os anuncio cosas nuevas;

Antes que salgan a luz,

Yo os las hago saber.

Cántico de liberación

10

    ¡Cantad a YHVH un cántico nuevo!

¡Alabanza suya desde el confín de la 

tierra,

De los que se hacen a la mar, y los 

que la pueblan,

De las costas lejanas, y los 

habitantes de ellas!

11

    ¡Elévese desde el desierto y sus 

aldeas,

Desde las tiendas, donde habita 

Cedar!

¡Canten jubilosos los habitantes de 

Sela,°

Y desde la cima de los montes griten 

de alegría!

12

    ¡Tributen la gloria a YHVH,

Pronuncien su alabanza en las 

costas lejanas!

41.25 Esto es, Ciro 

→Esd.1.1-4.  41.27 Así es según el TM. Otras versiones: Yo soy el primero que he enseñado estas cosas 

a SiónAntes que nadie Yo digo a SiónUn precursor para Sión Yo nombro

42.1 LXX añade Jacob.  42.1 LXX añade Israel

42.6 Nte guardaré.  42.6 Npacto; Nte he constituido mediador.  42.8 Nimagen esculpida.  42.11 Lit. roca, peña. Prob. Petra 

o nombre dado a la capital de los nabateos.


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Isaías 42:13

738

El castigo de Israel

13

    YHVH sale cual varón esforzado,

Excita su ardor como guerrero,

Vocea, y lanza el alarido,

Se muestra fuerte delante del 

enemigo.

14

    Ya ha mucho que he estado quieto,

Me callaba, me aguantaba;

Pero ahora, como la parturienta,

Jadeo y a la vez resuello.

15

    Devastaré montes y collados,

Haré agostar todo su verdor;

Convertiré los ríos en islotes,

Y secaré las lagunas.

16

    Pero haré que los ciegos anden por 

un camino que no conocían,

Haré que sean conducidos por 

senderos que ignoraban;

Cambiaré las tinieblas en luz delante 

de ellos,

Y los lugares escabrosos en llanura.

Estas cosas haré por ellos y no los 

desampararé.

17

    Pero los que confían en los ídolos 

retrocederán defraudados;

Los que dicen a la estatua fundida: 

¡Tú eres nuestro dios!

18

    ¡Sordos, escuchad y oíd!

¡Ciegos, mirad y ved!

19

    ¿Quién es ciego sino mi siervo, 

y sordo sino el mensajero que 

envío?

¿Quién es ciego como el emisario, y 

ciego como el siervo de YHVH?

20

    Mucho mirar, pero no te percatas,

Con los oídos abiertos, pero no te 

enteras.

21

    YHVH, por causa de su propia 

justicia,

Quería engrandecer y magnificar la 

Ley,

22

    Pero éste es un pueblo saqueado y 

despojado;

Todos atrapados en covachas y 

encerrados en prisiones.

Lo saqueaban, y nadie lo libraba;

Lo despojaban, y nadie les decía: 

¡Devuélvelo!

23

    ¿Quién de entre vosotros prestará 

oído a esto,

Y atento, escuchará para lo por venir?

24

    ¿Quién entregó a Jacob al saqueo,

A Israel a los depredadores?

¿No fue acaso YHVH, contra quien 

pecamos,

En cuyos caminos no se quería andar,

Ni a cuya instrucción se daba oído?

25

    Descargó sobre él el ardor de su ira,

El furor de la guerra;

Lo rodeaban sus llamas, pero no se 

daba cuenta;

Lo quemaban, pero no hacía caso.

El único Redentor

43

Y  ahora  Jacob,  así  dice  YHVH,  el 

que te creó,

El que te formó, oh Israel:

No temas, porque Yo te redimí; te 

puse nombre, mío eres tú.

2

    Cuando pases por las aguas,

Yo estaré contigo,

La corriente no te anegará;

Cuando andes por el fuego, no te 

quemarás,

Ni la llama arderá en ti.

3

    Porque Yo, YHVH tu Dios,

El Santo de Israel, soy tu Salvador.

A Egipto he dado por tu rescate,

A Cus° y a Seba° a cambio de ti.

4

    Porque eres precioso a mis ojos, 

fuiste exaltado,

Porque Yo te amo, daré hombres 

por ti,

Y naciones por tu vida.

5

    No temas, porque Yo estoy contigo;

Del oriente traeré tu simiente,°

Y del occidente te recogeré.

6

    Diré al norte: ¡Da acá!

Y al sur: ¡No retengas!

Traed a mis hijos desde lejos,

Y a mis hijas de los confines de la 

tierra,

7

    A todos los llamados en mi Nombre,

A los que para gloria mía creé,

A los que hice y formé.

8

    ¡Comparezca el pueblo ciego que 

tiene ojos,

Los sordos que tienen oídos!

9

    ¡Congréguense a una las naciones, y 

júntense todos los pueblos!

¿Quién de ellos hay que nos 

anuncie esto,

43.3 Esto es, Etiopía.  43.3 Esto es, entre Egipto y Etiopía 

→Gn.10.7.  43.5 En sentido figurado descendencia


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Isaías 44:2

739

Que nos haga oír las cosas primeras?

¡Preséntense testigos para ganar su 

causa,

Y que se oiga y se diga: Es verdad!

10

    Vosotros sois mis testigos, dice 

YHVH,

Y mi siervo que Yo escogí,

Para que me conozcáis y me creáis,

Para que entendáis que Yo Soy.

Antes de mí no fue formado dios 

alguno,

Ni existirá después de mí.

11

    Yo, Yo soy YHVH,

Y fuera de mí° no hay quien salve.

12

    Yo predije y Yo salvé.

Yo os lo he hecho saber,

Y no ha habido dios extraño entre 

vosotros.

Por tanto vosotros sois mis testigos, 

dice YHVH.

13

    Yo soy ’Elohim,

Sí, antes que hubiera día, Yo Soy, y 

no hay nadie que pueda librar de 

mi mano.

Lo que Yo hago, ¿quién lo podrá 

deshacer?

14

    Así dice YHVH, vuestro Redentor, el 

Santo de Israel:

Por vuestra causa he enviado a 

Babilonia,

Y a todos ellos los haré bajar como 

fugitivos,

A los caldeos, en las naves de sus 

clamores.°

15

    Yo soy YHVH, vuestro Santo,

El Creador de Israel, vuestro Rey.

16

    Así dice YHVH, que abrió camino en 

el mar,

Y sendero en las aguas impetuosas,

17

    Que sacó a batalla° carros y 

caballos;

Tropas con sus valientes,

¡Juntos se acuestan, para no 

levantarse!

¡Se apagan como se apaga el pabilo!

18

    No recordéis lo de antaño,

Ni os cuidéis de lo pasado.

19

    He aquí, Yo hago algo nuevo,

Ya está brotando, ¿no lo notáis?

Abriré un camino en el desierto, ríos 

en la soledad.°

20

    Me darán honra las fieras salvajes, 

los chacales y las avestruces,

Porque daré aguas en el desierto y 

ríos en la soledad,

Para apagar la sed de mi pueblo, de 

mi escogido,

21

    El pueblo que Yo he formado para 

mí mismo,

Para que proclamara mi alabanza.

22

    Con todo, oh Jacob, no me 

invocaste,

Te cansaste de mí, Israel.

23

    No me trajiste el cordero° de tus 

holocaustos,

Ni me honraste con tus sacrificios.

No te abrumé exigiéndote ofrendas,

Ni te fatigué pidiéndote incienso.

24

    No me compraste canela con 

dinero,

Ni me saciaste con la grosura de tus 

sacrificios,

Sino que pusiste la carga° de tus 

pecados sobre mí,

Y me abrumaste con tus iniquidades.

25

    Yo, Yo soy el que borro tus 

rebeliones

Por amor de mí mismo,

Y no me acordaré de tus pecados.

26

    Hazme recordar,

Y entremos juntos a juicio;

Razona tu causa,

Para que puedas ser justificado.

27

    Ya tu primer padre pecó,

Tus representantes° se rebelaron 

contra mí;

28

    Por tanto, Yo he deshonrado a los 

príncipes del Santuario,

Y entregué a Jacob a la maldición,

Y a Israel al vituperio.

El Dios único

44

Y ahora oye, siervo mío Jacob, 

Israel, a quien escogí.

2

    Así dice YHVH, Hacedor tuyo,

Y el que te formó desde el seno 

materno, tu Ayudador:

No temas, siervo mío Jacob,

43.11 

→Mt.1.21.  43.14 LXX: en las naves estarán encadenados; otras versiones interpretan: gritos de duelo serán sus cla-

mores; o con cadenas al cuello se los encadenará

43.17 .a batalla.  43.19 En sentido figurado Npáramo, desierto, yermo

43.23 Nres de ganado menor.  43.24 

→Sal.32.5; 85.2; Jn.1.29 nota; Fil.2.8.  43.27 Nintérpretes, defensores.


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Isaías 44:3

740

Tú, Jesurún,° mi escogido.

3

    Yo derramaré aguas sobre el 

sequedal,

Y torrentes sobre la tierra seca:

Derramaré mi Espíritu sobre tu 

simiente,

Y mi bendición sobre tus renuevos.

4

    Brotarán como hierba junto a la 

fuente,

Como sauces junto a las riberas.

5

    Uno dirá: Soy de YHVH,

Otro se pondrá el nombre de Jacob;

Y otro se escribirá en la mano: Soy 

de YHVH,

Y se apellidará Israel.°

6

    Así dice YHVH, Rey de Israel,

Su Redentor, YHVH Sebaot:

Yo soy el Primero y Yo soy el Último;

Fuera de mí no hay Dios.

7

    ¿Y quién, como Yo, puede 

proclamarlo?

Que lo diga y lo exponga ante mí.

¡Sí!, que le anuncie las cosas 

venideras,

Las que han de suceder como Yo lo 

he hecho desde que establecí el 

pueblo antiguo.

8

    No temáis ni os amedrentéis:

¿No te lo he anunciado y predicho?

Entonces vosotros sois mis testigos:

¿Hay Dios o Roca fuera de mí?

No lo conozco.

Necedad de la idolatría

9

 Los que modelan ídolos, todos son vani-

dad, y sus obras más preciadas no aprove-

chan; sus testigos no ven ni saben nada, 

de modo que serán avergonzados.°

10

 ¿Quién ha moldeado un dios, o fundi-

do un ídolo que para nada aprovecha?

11

 He aquí todos sus adeptos serán aver-

gonzados, porque los artífices no son más 

que  simples  hombres.  ¡Júntense  todos 

ellos,  y  comparezcan!  ¡Tiemblen  y  sean 

avergonzados a una!

12

 El artífice en hierro prepara la herra-

mienta y lo° fabrica en las ascuas, lo for-

ma con martillos, lo trabaja con su brazo 

robusto;  luego  tiene  hambre  y  se  agota, 

no bebe agua, y desfallece.

13

 El tallista en madera aplica la cuerda 

de medir, traza la marca con buril, da la 

forma con cincel, dibuja con el compás, y 

le da figura de hombre y belleza humana, 

para colocarlo en un templo.

14

 Para  ello°  se  cortó  cedros,  tomó  el 

ciprés y la encina, que escogió entre los 

árboles del bosque, o bien planta un pino 

que crece con la lluvia.

15

 Luego  se  sirve  de  ellos  como  leña  y 

toma  de  ellos  para  calentarse,  también 

prende el horno y cuece panes, también 

hace un dios y lo adora, fabrica un ídolo, 

y se postra ante él.

16

 Parte  del  leño  quema  en  el  fuego  y 

sobre  él  asa  la  carne,  come  y  se  sacia. 

Después se calienta y dice: ¡Ah, me he ca-

lentado, he contemplado el fuego!

17

 Con  el  resto  se  hace  una  imagen  de 

dios, se postra ante él, lo adora y le ruega: 

Líbrame, que tú eres mi dios.

18

 No  comprenden  ni  distinguen,  sus 

ojos  han  sido  cerrados  para  no  ver  y  su 

corazón para no entender.

19

 Nadie medita en su corazón, ni hay co-

nocimiento ni criterio para decir: La mi-

tad quemé en el fuego y sobre sus ascuas 

cocí  pan  y  asé  carne  para  comer,  ¿haré 

del resto una abominación? ¿Me postraré 

ante un leño?

20

 Éste° se alimenta de cenizas, una men-

te ilusa lo extravía, de modo que no puede 

liberar  su  alma,  ni  decirse:  ¿No  es  pura 

mentira lo que tengo en mi diestra?

El Redentor de Israel

21

    Oh Jacob, acuérdate de esto,

Porque eres mi siervo, Israel;

Te he formado, mi siervo eres tú,

Oh Israel, no serás olvidado por mí.

22

    He disuelto como niebla tus 

rebeliones,

Como nube tus pecados:

Vuélvete a mí, porque Yo te redimí.

23

    ¡Cantad alabanzas, oh cielos,

Porque YHVH lo hizo!

¡Gritad de júbilo,

Oh profundidades de la tierra!

¡Entonen cánticos las montañas,

Y el bosque, y todo árbol que hay en él,

44.2 Esto es, justo o leal. Diminutivo aplicado a Israel.   44.5 Es decir, dirá bien alto el nombre de Israel.  44.9 Ndesencanten, 

desilusionen

44.12 Esto es, al ídolo.  44.14 .Para ello.  44.20 .Éste.


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Isaías 45:14

741

Porque YHVH ha redimido a Jacob,

Y se ha glorificado en Israel!

24

    Así dice YHVH, tu Redentor,

Y el que te formó desde el vientre:

Yo soy YHVH, Creador de todas las 

cosas;

Yo solo extendí los cielos,

Asenté la tierra por 

mí mismo.°

25

    Yo soy el que hace que fallen los 

presagios de los adivinos,

Y exhibe la maldad del hechicero,

Que hace retroceder a los sabios,

Y convierte en necedad su 

erudición;

26

    Yo soy el que confirma la palabra de 

sus siervos,

Y cumple el plan de sus mensajeros;

Que dice: ¡Jerusalem, serás habitada! 

¡Ciudades de Judá, seréis 

reconstruidas!

¡Ruinas, Yo os levantaré!

27

    El que dice: ¡Océano, aridece, secaré 

tus corrientes!

28

    El que dice: ¡Ciro, tú eres mi pastor, 

y cumplirás todos mis designios!

El que dice: ¡Jerusalem, serás 

reconstruida!

¡Templo, serás cimentado!

Para Ciro

45

Así dice YHVH a su ungido, a Ciro,

A quien he tomado por su diestra,

Para someter ante él naciones,

Y aflojar° los lomos de los reyes;

Para abrir delante de él los batientes

Y que las puertas no queden cerradas.

2

    Yo iré delante de ti, y allanaré los 

lugares escabrosos,°

Quebraré los batientes de bronce, y 

haré pedazos las barras de hierro.

3

    Te daré los tesoros escondidos, 

riquezas ocultas de los lugares 

secretos,

Para que sepas que Yo, YHVH, que te 

llama por tu nombre,

Soy el Dios de Israel.

4

    Por amor de mi siervo Jacob, de 

Israel mi escogido,

Te he llamado por tu nombre, 

aunque no me conocías,

Te he dado honroso apellido.

5

    Yo soy YHVH, y no hay otro,

Fuera de mí no hay Dios.

Yo te he ceñido, aunque no me 

conoces,

6

    Para que sepan del nacimiento del 

sol hasta su ocaso,

Que no hay otro fuera de mí.

¡Yo, YHVH, y no hay otro!

7

    Yo formo la luz y creo las 

tinieblas;

Hago la paz y creo la adversidad.

Yo, YHVH, hago todas estas cosas.

El único Creador

8

    ¡Destilad, oh cielos, el rocío,

Y derramen las nubes° la victoria!

¡Ábrase la tierra y produzca 

salvación,

Y con ella germine la justicia!

Yo, YHVH, lo he creado.

9

    ¡Ay del que contiende con su 

Hacedor,

Como tiesto entre los tiestos de 

barro!

¿Dirá el barro al alfarero: ¿Qué 

haces? o: Tu vasija no tiene asas?

10

    ¡Ay del que le dice al padre:

¿Por qué engendras?, o a la mujer: 

¿Por qué das a luz?

11

    Así dice YHVH, el Santo de Israel, su 

Formador:

¿Me pediréis cuenta de mis hijos,

Me daréis órdenes de la obra de mis 

manos?

12

    Yo hice la tierra y creé sobre ella al 

hombre.

Yo extendí los cielos con mis propias 

manos,

Y Yo soy el que da órdenes a todo su 

ejército.

13

    Yo lo he suscitado para la victoria, y 

allanaré todos sus caminos;

Él reconstruirá mi ciudad, y 

libertará a mis desterrados,

Sin precio ni soborno, dice YHVH 

Sebaot.

14

    Así dice YHVH: El fruto de Egipto,

La ganancia de Etiopía,

Y los sabeos, hombres de gran 

estatura,

44.24 LXX y Vul: ¿Quién conmigo?,  45.1 Es decir, dejar sin fuerzas.  45.2 Sir y Qumram: montañas.  45.8 Lit. polvo de nubes.


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Isaías 45:15

742

A ti pasarán, tuyos serán, tras de ti 

marcharán,

Irán cargados de cadenas,

Se inclinarán ante ti, y suplicarán:

En verdad ’Elohim está contigo,

Y no existe ningún otro, ningún 

otro dios.

15

    ¡En verdad Tú eres el Dios 

encubierto,

El Dios de Israel, el Salvador!

16

    Derrotados, humillados todos juntos,

Marcharán con deshonra los 

fabricantes de ídolos,

17

    Mientras YHVH salva a Israel con 

salvación eterna;

No seréis avergonzados ni 

humillados nunca más.

18

    Así dice YHVH, que creó los cielos:

Él es Ha-’Elohim, que formó la 

tierra, la hizo y la estableció;

No la creó para que estuviera 

desolada,

La formó para que fuera habitada.

Yo, YHVH, y no hay ningún otro.

19

    No hablé a escondidas en un país 

oscuro,

Ni dije a la descendencia de Jacob:

En vano me buscáis.

Yo soy YHVH, que hablo justicia, 

que anuncio rectitud.

Los ídolos de Babilonia

20

    ¡Congregaos, y venid!

¡Acercaos a una, sobrevivientes de 

las naciones!

¡Nada saben los que cargan sus 

ídolos de madera,

Y adoran a un dios que no puede 

salvar!

21

    Declarad, exponed pruebas,

Y entrad todos en consulta:

¿Quién ha hecho oír esto desde 

antaño?

¿Quién lo ha dicho desde entonces?

¿No he sido Yo, YHVH?

Y no hay otro Dios fuera de mí,

Dios justo y salvador;

No hay ninguno, excepto Yo.

22

    Miradme, y sed salvos en todos los 

confines de la tierra,

Porque Yo soy ’Elohim,

Y no hay ningún otro.°

23

    Por mí mismo he jurado;

De mi boca ha salido la sentencia,

Y no será revocada:

Que ante mí se doblará toda rodilla,

Y toda lengua prestará juramento,

24

    Diciendo: ¡Sólo en YHVH hallo 

fuerza y salvación!

A Él vendrán derrotados los que se 

enardecían contra Él,

25

    En YHVH será justificada y se 

gloriará la estirpe de Israel.

46

¡Bel° se postra, Nebo° se abate!

Sus ídolos son puestos sobre las 

bestias,

Y las estatuas que les cargan en 

andas,

Son una carga abrumadora.

2

    Se abaten y se postran a una:°

No pudieron librar de la carga,°

Y ellos mismos van en cautiverio.

3

    Escuchadme, oh casa de Jacob,

Remanente todo de la casa de Israel,

Que desde el nacimiento sois 

cargados por mí,

Llevados desde la matriz.

4

    Hasta vuestra vejez Yo seré el 

mismo,

Y hasta la ancianidad° cargaré con 

vosotros.

Yo lo he hecho, y os seguiré llevando;

Yo cargaré con vosotros y os salvaré.

5

    ¿A quién me asemejaréis, me 

igualaréis,

O me compararéis, para que seamos 

semejantes?

6

    Sacan oro de la bolsa, pesan plata en 

la balanza,

Contratan a un orfebre que haga de 

ello un dios,

Se postran y lo adoran,

7

    Se lo cargan a hombros, lo 

transportan;

Donde lo ponen, allí se queda,

No se mueve de su sitio;

Por mucho que le clamen, no 

responde,

Ni los libra de la tribulación.

45.22 

→Hch.4.12.  46.1  Deidad  principal  de  Mesopotamia.  46.1  Hijo  del  dios  Marduk.  46.2  Esto  es,  los  falsos  dioses

46.2 Esto es, la carga profética de Israel 

→13.1, 23.1.  46.4 Lit. hasta el cabello blanco


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Isaías 47:13

743

8

    Recordadlo y meditadlo,°

Oh rebeldes, tenedlo en vuestro 

corazón,

9

    Recordando de las cosas pasadas 

predichas:

Yo soy Dios, y no hay otro,

No hay otro Dios semejante a mí,

10

    Que desde el principio anuncio el 

fin,

Y desde antiguo° cosas que no 

estaban hechas,

Que digo: Mi designio se cumplirá y 

haré todo mi deseo;

11

    Que del oriente llamo al ave de 

rapiña,

De una tierra lejana al varón de mi 

propósito;

Yo hablé, eso hará que suceda,

Lo que me he propuesto, eso haré.

12

    Escuchadme, duros° de corazón,

Que estáis lejos de la justicia.

13

    Próxima está mi justicia, no está 

lejos,

Mi salvación no tardará;

Pondré salvación en Sión,

Y en Israel mi gloria.

Juicio sobre Babilonia

47

¡Baja, siéntate en el polvo, oh 

virgen hija de Babilonia!

¡Siéntate en el suelo, sin trono,

Oh hija de los caldeos!

Nunca más volverás a ser llamada 

tierna y delicada.

2

    Toma las piedras del molino y muele 

el grano;°

Quítate tu velo y despójate de tu 

ropaje largo,

Descubre tus muslos y vadea los ríos,

3

    ¡Descúbrase tu desnudez y sea vista 

tu vergüenza!

Tomaré venganza y no habrá quien 

interceda.

4

    Nuestro Redentor, cuyo nombre es 

YHVH Sebaot,

El Santo de Israel, dice:

5

    Siéntate y calla, y entra en las 

tinieblas, oh hija de los caldeos,

Porque nunca más te volverán a 

llamar soberana de reinos.

6

    Indignado contra mi pueblo, profané 

mi heredad, y la entregué en tu 

mano;

No tuviste compasión de ellos;

Abrumaste con tu yugo a los 

ancianos,

7

    Diciéndote: Seré señora por siempre 

jamás;

Sin considerar esto, sin pensar en el 

desenlace.

8

    Ahora pues, escucha esto, oh mujer° 

lasciva,

Tú, que reinabas confiadamente, y te 

decías: Yo y nadie más que yo.

No me quedaré viuda, ni perderé a 

mis hijos.

9

    Estas dos cosas te sobrevendrán de 

repente, en un mismo día,

Viuda y sin hijos te verás al mismo 

tiempo.

En su plena medida ya vienen contra 

ti,

A pesar de la multitud de tus 

hechizos y de tus más poderosos 

encantamientos.

10

    Porque te confiaste en tu maldad, 

diciendo: No hay quien me vea;

Fuiste pervertida por tu arrogante 

ciencia,

Y dijiste en tu corazón: Yo y nadie 

más que yo.

11

    Pero vendrá sobre ti una desgracia 

que no sabrás conjurar,

Caerá sobre ti una calamidad de la 

que no te podrás librar;

Antes que puedas darte cuenta, la 

devastación vendrá sobre ti de 

repente.

12

    Persiste ahora en tus conjuros y en 

tus muchas hechicerías,

Con las que te has desvelado desde 

tu juventud;

Quizá puedas sacar aún provecho, 

quizá ocasionar terror.

13

    Estás perdida en la multitud de tus 

consejos;

¡Levántense ahora los que reparten 

los cielos,

Y los que contemplan las estrellas, y 

los pronosticadores°

46.8 Sir: avergonzaos.  46.10 NDesde el comienzo.  46.12 Nobstinados.  47.2 Lit. harina.  47.8 .mujer.  47.13 Lit. los que 

pronostican en los novilunios


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Isaías 47:14

744

Y que te salven de lo que te 

sobrevendrá!

14

    He aquí, serán como paja, y el fuego 

los consumirá,

No podrán librar su vida del poder 

de unas llamas,

Que no son precisamente brasas 

para calentarse,

Ni lumbre ante el cual uno puede 

sentarse.

15

    Así han sido para ti aquellos por los 

cuales te afanaste;

Aquellos con quienes has traficado 

desde tu juventud;

Andarán errantes, cada uno por su 

lado,

Y no habrá quien te pueda salvar.

Infidelidad de Israel

48

Oíd esto, oh casa de Jacob,

Vosotros, que lleváis el nombre de 

Israel,

Y brotáis de la fuente de Judá;

Que juráis por el nombre de YHVH, 

e invocáis al Dios de Israel,

Pero no con sinceridad ni rectitud,

2

    Aunque os consideráis de la Ciudad 

Santa,

Y os apoyáis en el Dios de Israel, 

cuyo nombre es YHVH Sebaot.

3

    Las cosas primeras anuncié con 

anticipación;

Sí, de mi boca salieron: Yo las hice 

conocer;

De repente actué, y han acontecido.

4

    Porque sé que eres obstinado, y tu 

cerviz es un tendón de hierro,

Y tu frente es de bronce,

5

    Por eso te lo anuncié de antemano;

Antes que sucediera te lo hice oír,

Para que no dijeras: Mi ídolo lo ha 

hecho;

Mi estatua, de leño o de fundición, lo 

ha ordenado.

6

    Lo oíste, ¡contémplalo todo! ¿y no lo 

admitirás?

Desde ahora te hago saber cosas 

nuevas,

Cosas ocultas, que tú no conoces;

7

    Ahora han sido creadas, y no en días 

pasados,

Ni antes del día de hoy las habías 

oído,

Para que no digas: Ya lo sabía.

8

    Nada oíste acerca de ellas, ni las 

conociste,

Aún no estaba abierto tu oído,

Porque Yo sabía que tú actuarías 

deslealmente;

Tanto, que desde el seno materno se 

te llamó rebelde.

9

    Por causa de mi Nombre difiero mi 

ira;

Para mi propia alabanza la reprimo, 

para no destruirte.

10

    Mira, te purifico no como a plata;

Te probaré en el crisol de la aflicción.

11

    Por mí, por amor de mí mismo lo 

hago,

Para que mi Nombre no sea 

profanado,

Porque a otro no daré mi gloria.

12

    Escúchame, oh Jacob; tú oh Israel, a 

quien llamé:

Yo soy; soy el Primero, también soy 

el Último.

13

    Mi mano cimentó la tierra y mi 

diestra extendió los cielos;

Cuando Yo los llamo, comparecen 

juntos.

14

    Reuníos todos y escuchad:

¿Quién de ellos° ha predicho estas 

cosas?

Aquél° a quien YHVH ama, cumplirá 

los deseos de Él en Babilonia,

Y mostrará su brazo sobre los 

caldeos.

15

    Yo, Yo mismo he hablado y Yo lo he 

llamado,

Lo he traído, y ha de prosperar en su 

camino.

16

    Acercaos a mí, y oíd esto:

Yo no hago predicciones en secreto,

Cuando suceden, Yo ya estoy allí;

Y ahora me ha enviado Adonay 

YHVH y su Espíritu.

17

    Así dice YHVH tu Redentor, el Santo 

de Israel:

Yo soy YHVH tu Dios, que te enseña 

para tu provecho,

Y te conduce por el camino en que 

debes andar:

48.14 ellos. Esto es, los ídolos.  48.14 Aquél. Esto es, Ciro.


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Isaías 49:13

745

18

    Si hubieras atendido mis 

mandamientos,

Entonces tu paz habría sido como 

un río,

Y tu justicia como las olas del mar.

19

    Tu descendencia sería como la 

arena,

Como sus granos, los vástagos de 

tus entrañas,

Y tu nombre nunca sería cortado ni 

destruido delante de mí.

20

    ¡Salid de Babilonia, huid de los 

caldeos!

¡Anunciad con voz de júbilo, y 

proclamadlo,

Publicadlo hasta los confines de la 

tierra!

Decid: ¡YHVH ha redimido a su 

siervo Jacob!

21

    No padecieron sed cuando los guió 

por el desierto;

Hizo brotar agua de la roca para 

ellos;

Partió la peña, y corrieron aguas.

22

    No hay paz para los malos, dice 

YHVH.

El Siervo de YHVH

49

¡Oídme, costas, y atended, pueblos 

lejanos!

YHVH me llamó desde el vientre;

Desde las entrañas de mi madre tuvo 

en memoria mi nombre.

2

    Hizo de mi boca espada afilada,

Me cubrió con la sombra de su 

mano,

Hizo de mí saeta aguda, me guardó 

en su aljaba,

3

    Y me dijo: Israel, tú eres mi siervo,

En ti me glorificaré.

4

    Mientras yo me decía: En vano me 

he fatigado,

En viento y en nada he gastado mis 

fuerzas,

En realidad mi causa estaba siendo 

defendida por YHVH,

Mi recompensa estaba con mi Dios.

5

 Ahora pues, YHVH, que me formó desde 

el  vientre  como  siervo  suyo  para  que  le 

trajera a Jacob y le reuniera a Israel (tan-

to así me ha honrado YHVH, y mi Dios ha 

sido mi fortaleza),

6

 dice así: Cosa muy liviana es que seas mi 

siervo y restablezcas las tribus de Jacob y 

restaures el remanente de Israel.

He aquí Yo te pongo por luz de los 

gentiles,°

Para que mi salvación alcance los 

confines de la tierra.

7

    Así dice YHVH, el Redentor y el 

Santo de Israel,

Al despreciado de los hombres,

Al aborrecido de los gentiles,

Al esclavo de los tiranos:

Reyes te verán y se levantarán;

Príncipes, y se postrarán,

A causa de YHVH, que es fiel,

El Santo de Israel, que te escogió.

Restauración de Sión

8

    Así dice YHVH: En tiempo aceptable 

te respondí,

En el día de salvación te ayudé;

Te guardaré y te daré por pacto al 

pueblo,

Para que le restaures la tierra

Y repartas las heredades asoladas;

9

    Para que digas a los cautivos: ¡Salid!,

Y a los que están en tinieblas: ¡Venid 

a la luz!

Aun por los caminos° podrán pastar,

Y en todas las dunas tendrán 

pastizales.

10

    No tendrán hambre ni sed,

Ni los herirá el calor abrasador ni el 

sol,

Porque los conduce el que los 

compadece,

Y los guía a manantiales de agua.

11

    Convertiré todas mis montañas en 

camino,

Y mis calzadas serán niveladas.

12

    ¡Mirad!, éstos vendrán de un país 

remoto,

¡Mirad!, otros del norte y del mar,°

Y otros de la tierra de Sinim.°

13

    ¡Cantad, cielos, alabanzas!

¡Alégrate, oh tierra!

¡Prorrumpid en aclamaciones, oh 

montañas!

49.6 

→Hch.13.47.  49.9 Algunas versiones: llanuras arenosas.  49.12 Ndesde occidente.  49.12 Prob. se refiere al antiguo 

Syene, actualmente Assuán


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Isaías 49:14

746

Porque YHVH ha consolado a su 

pueblo,

Y se ha compadecido de sus afligidos.

14

    Decía Sión: Me ha abandonado 

YHVH;

Adonay se ha olvidado de mí.

15

    ¿Se olvidará una madre de lo que dio 

a luz?

¿Dejará de amar al hijo de sus 

entrañas?

Pues aunque éstas lleguen a olvidar,

Yo nunca me olvidaré de ti.

16

    En mis palmas te he esculpido;°

Tus muros están siempre delante de 

mí;

17

    Los que te construyen van más a 

prisa que los que te destruyen,

Los que te arrasaban se alejan de ti.

18

    Alza tus ojos en torno, y mira:

Todos ellos se reúnen para venir a ti.

¡Vivo Yo, dice YHVH,

A todos los llevarás como vestido 

precioso,

Con ellos te adornarás como novia!

19

    Porque tu tierra devastada,

Arruinada y desierta,

Resultará estrecha para tus 

moradores,

Mientras que tus destructores 

estarán lejos de ti.

20

    Los hijos que dabas por perdidos 

te dirán de nuevo: Mi lugar es 

estrecho,

Hazme sitio para habitar.

21

    Y te preguntarás: ¿Quién me parió a 

éstos?

Yo, que estaba sin hijos y estéril, 

¿quién me los ha criado?,

Yo, que me había quedado sola, ¿de 

dónde me vienen éstos?

22

    Así dice Adonay YHVH:

He aquí, con mi mano hago seña a 

las naciones,

Alzo mi estandarte a los pueblos, 

para que traigan a tus hijos en 

brazos,

Para que tus hijas sean llevadas al 

hombro.

23

    Sus reyes serán tus ayos, sus 

princesas, tus nodrizas;

Rostro en tierra te darán homenaje, 

lamerán el polvo de tus pies,

Y sabrás que Yo soy YHVH,

Y que los que esperan en mí

No serán avergonzados.

24

    ¿Le será arrebatado el botín al 

guerrero?

¿Se librará al cautivo del tirano?

25

    Esto dice YHVH: ¡Sí!, el cautivo será 

librado del guerrero,

Y el botín será arrebatado del tirano.

Yo mismo defenderé tu causa,

Yo mismo salvaré a tus hijos.

26

    Haré a tus opresores comerse su 

propia carne,

Y como de vino, embriagarse en su 

propia sangre,

Y toda carne sabrá que Yo soy YHVH 

tu Salvador,

Y que tu Redentor es el Fuerte de 

Jacob.

Humillación del Santo de YHVH

50

Así dice YHVH:

¿Dónde está la carta de divorcio 

con que repudié a vuestra madre?

¿O, a cuál de mis acreedores os he 

vendido?

He aquí, por vuestras iniquidades 

fuisteis vendidos,

Por vuestras transgresiones fue 

repudiada vuestra madre.

2

    ¿Y por qué cuando Yo vengo no hay 

nadie,

Y cuando llamó nadie responde?

¿Se ha acortado mi mano para 

redimir?

¿No tengo ya fuerza para salvar?

He aquí, a mi reprensión se seca el 

mar,

Convierto los ríos en desierto,

Sus peces mueren de sed,

Y hieden por la falta de agua.

3

    Yo visto los cielos de luto, los cubro 

de sayal.

4

    Adonay YHVH me dio lengua de 

sabios,°

Para saber sustentar con palabras al 

cansado.

Cada mañana me despierta,

49.16 Es notable la relación entre la memoria y las palmas de las manos, cuyas líneas están allí desde antes del nacimiento. 

50.4 Es decir, palabras elocuentes.


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Isaías 51:9

747

Cada mañana despierta mi oído, para 

que escuche como discípulo.

5

    Adonay YHVH me abrió el oído,

Y no fui rebelde, ni me volví atrás.

6

    Ofrecí mis espaldas a los que me 

azotaban,

Y mis mejillas a los que me 

arrancaban la barba;

No aparté mi rostro de injurias y 

escupitajos.

7

    Pero Adonay YHVH me ayudará, por 

tanto, no estoy abochornado;

Por eso he puesto mi rostro como 

un pedernal,

Y sé que no seré avergonzado.

8

    Cercano está el que me justifica,

¿quién contenderá conmigo?

¡Comparezcamos juntos!

¿Quién es mi demandante?°

¡Que se acerque a mí!

9

    Sí, Adonay YHVH me ayudará.

¿Quién me condenará?

Ve ahí que todos ellos se gastan 

como vestidura,

La polilla los comerá.

10

    ¿Quién entre vosotros teme a YHVH 

y escucha por voz de su siervo?

Aunque ande en tinieblas y carezca 

de luz,

Confíe en el nombre de YHVH, y 

apóyese en su Dios.

11

    Pero vosotros, que atizáis el fuego y 

encendéis las teas:

¡Andad al calor de vuestro propio 

fuego,

De las teas que habéis encendido!

De mi mano os vendrá esto:

¡Acabaréis por yacer en el lugar de 

tormento!

El consuelo de Sión

51

¡Escuchadme, los que vais tras la 

justicia,

Los que buscáis a YHVH!

Mirad a la roca de donde fuisteis 

tallados,

La cantera de donde fuisteis 

extraídos.

2

    Mirad a Abraham, vuestro padre,

Y a Sara, que os dio a luz;

Que estando solo lo llamé,

Lo bendije° y lo multipliqué.

3

    Ciertamente YHVH consolará a 

Sión,

Consolará todos sus lugares 

desolados;

Convertirá su desierto en un edén,

Su yermo en paraíso de YHVH;

Allí habrá gozo y alegría,

Acciones de gracias y voz de melodía.

4

    ¡Estadme atentos, pueblo mío,

Prestadme oídos, nación mía!,

Pues de mí sale la Ley,

Y estableceré mi justicia para luz de 

los pueblos.

5

    De súbito haré llegar mi victoria;

Mi salvación ha salido ya,

Y mi brazo juzgará a los pueblos;

Las costas lejanas esperarán en mí,

Y confiarán en mi brazo.

6

    ¡Alzad vuestros ojos a los cielos,

Y contemplad la tierra, acá abajo!,

Porque los cielos se desvanecerán 

como el humo,

La tierra se envejecerá como un 

vestido,

Y los que la habitan morirán de 

igual manera;

Pero mi salvación durará 

eternamente,

Y mi justicia nunca será abolida.

7

    ¡Escuchadme, los que conocéis mi 

justicia,

Pueblo en cuyo corazón está mi Ley!

No temáis la afrenta de los hombres,

Ni os acobardéis por sus vituperios,

8

    Porque como a un vestido los 

comerá la polilla,

Y como a lana los devorará el 

gusano;

Pero mi justicia durará eternamente,

Y mi salvación por los siglos de los 

siglos.

9

    ¡Despierta, despierta, vístete de 

fuerza, oh brazo de YHVH!

¡Despiértate, como en los días de 

antaño,

Como en las generaciones antiguas!

¿No eres Tú el mismo que tajaste a 

Rahab,°

Y el que traspasó al monstruo 

marino?°

50.8 Lit. señor de juicio.  51.2 Qumram: hice fructificar.  51.9 Esto es, Egipto.  51.9 Esto es, Satanás 

→Sal.74.13-14. 


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Isaías 51:10

748

10

    ¿No eres Tú el que secó el mar, y las 

aguas del gran abismo?

¿El que convirtió en camino las 

honduras del mar, para que 

pasaran los redimidos?

11

    Así volverán los redimidos° de 

YHVH

Y entrarán a Sión con gritos de 

júbilo,

Coronada su cabeza de eterna 

alegría;

Alcanzarán gozo y alegría,

Y huirán la tristeza y la aflicción.

12

    Yo, Yo soy quien os consuela,

¿Quién eres tú para que temas al 

mortal;

A hombres, que son como la hierba,

13

    Y te hayas olvidado de YHVH, tu 

Hacedor,

Que extendió los cielos y cimentó la 

tierra,

Y tiembles continuamente, todos los 

días,

Ante la furia del opresor cuando se 

apresta a destruir?

¿Dónde ha quedado la furia del 

opresor?

14

    A toda prisa se soltará el agobiado,°

No morirá en la cárcel ni le faltará 

su pan.

15

    Porque Yo soy YHVH tu Dios,

Que agito el mar y hago bramar sus 

olas,

Y mi nombre es YHVH Sebaot.

16

    Yo extendí los cielos y cimenté la 

tierra,

Y he puesto mis palabras en tu boca,

Y te he cubierto con la sombra de mi 

mano,

Para que digas a Sión: Tú eres mi 

siervo.

17

    ¡Despiértate, despiértate, ponte en 

pie, oh Jerusalem!

¡Tú, que has bebido de la mano de 

YHVH la copa de su ardiente ira,

Y apuraste hasta el fondo la copa del 

aturdimiento!

18

    Entre los hijos que dio a luz, no hay 

quien la guíe,

Entre los hijos que crió, no hay 

quien la lleve de la mano;

19

    Esos dos males te han sucedido,

¿Y quién se compadece de ti?

Desolación y quebranto, hambre y 

espada.

¿Por medio de quién te consolaré?°

20

    Tus hijos han desfallecido;

Yacen en las encrucijadas° como 

antílope en la red,

Llenos de la ira de YHVH, de la 

reprensión de tu Dios.

21

    Por tanto, oye esto, oh afligida,

Embriagada también, y no de vino.

22

    Así dice YHVH tu Soberano, y tu 

Dios,

Que defiende la causa de su pueblo:

He aquí, Yo quito de tu mano la copa 

del aturdimiento;

No volverás a beber de la copa de mi 

ira;

23

    La pondré en mano de tus verdugos, 

los que te decían:

¡Póstrate, para que pasemos!°

Y tú ponías tu espalda como suelo,

Como calzada para los transeúntes.

Dios librará a Sión

52

¡Despiértate! ¡Despiértate!

¡Vístete de poder, oh Sión!

¡Vístete tus ropas de hermosura,

Oh Jerusalem, santa ciudad!

Porque no volverá a entrar en ti el 

incircunciso ni el impuro.

2

    ¡Sacúdete el polvo, ponte en pie!

¡Entronízate,° oh Jerusalem!

¡Desata las ataduras de tu cerviz,

Oh cautiva hija de Sión!

3

    Porque así dice YHVH: De balde 

fuisteis vendidos;

Sin dinero seréis rescatados.

4

    Pues así dice Adonay YHVH:

Al principio mi pueblo bajó a Egipto,

Para morar allí como forastero;

Al final Asiria lo oprimió.

5

    Y ahora, ¿qué hago Yo aquí, dice 

YHVH,

Cuando mi pueblo es llevado sin 

causa?

51.11 Nliberados. Qumram: los dispersos.  51.14 Lit. encorvado. Es decir, el prisionero agobiado.  51.19 El verbo está en 1ª 

persona. La traducción en 3ª persona (consolará) diluye el propósito teológico del pasaje. 

51.20 Nen las esquinas de todas las 

calles

51.23 Costumbre oriental en la cual los reyes pisaban a sus prisioneros en señal de humillación.  52.2 Lit. siéntate


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Isaías 53:7

749

Sus dominadores lanzan alaridos, 

dice YHVH,

Y todo el día, sin cesar, ultrajan mi 

Nombre.

6

    Pero mi pueblo reconocerá mi 

Nombre;

En aquel día reconocerán que Yo soy 

el que dice: ¡Heme aquí!

7

    ¡Cuán hermosos son sobre los 

montes los pies del que trae 

alegres nuevas,

Del que anuncia la paz,

Del que trae la buena nueva,

Del que anuncia la salvación,

Del que dice a Sión: Tu Dios reina!

8

    ¡Voz de tus atalayas! A coro alzan la 

voz y dan gritos de júbilo,

Porque ven cara a cara a YHVH que 

vuelve a Sión.°

9

    Prorrumpid en júbilo, cantad a coro, 

¡oh ruinas de Jerusalem!

Porque YHVH ha consolado a su 

pueblo,

Ha redimido a Jerusalem.

10

    YHVH descubrió su santo brazo a 

vista de todas las naciones,

Y todos los confines de la tierra 

verán la salvación de nuestro 

Dios.

11

    ¡Apartaos, apartaos, salid de allí, y 

no toquéis cosa inmunda!

¡Salid de en medio de ella,

Purificaos los que lleváis los 

utensilios de YHVH!

12

    No saldréis apresurados ni os iréis 

huyendo,

Porque delante de vosotros 

marchará YHVH,

Y en la retaguardia el Dios de Israel.

Sufrimientos del Siervo de YHVH

13

    He aquí, mi Siervo hará actuar 

sabiamente,

Será afamado,° exaltado, y se elevará 

muy alto.

14

    De la manera que muchos quedaron 

espantados° a causa de ti,°

Así será desfigurada su apariencia,

Más que la de cualquier hombre,

Su aspecto, más que el de los hijos 

del hombre.

15

    Así asombrará° a muchas naciones,

Y ante Él los reyes cerrarán la boca,

Porque verán lo que nunca había 

sido referido,

Y contemplarán lo insólito.

53

¿Quién ha creído nuestro 

anuncio?

¿Sobre quién se ha manifestado el 

brazo° de YHVH?

2

    Subirá cual renuevo delante de Él,

Pero como raíz de tierra seca, no 

habrá en Él parecer ni hermosura;

Lo veremos, pero sin atractivo para 

que lo deseemos.

3

    Despreciado y desechado entre los 

hombres,

Varón de dolores, experimentado en 

quebranto,

Escondimos de Él el rostro, fue 

menospreciado, y lo tuvimos por 

nada.

4

    Él mismo° cargó° con nuestras 

enfermedades y llevó° nuestros 

dolores;

Y nosotros lo consideramos como 

herido, azotado y humillado por 

’Elohim.

5

    Pero Él fue traspasado por nuestras 

transgresiones,

Molido por nuestros pecados.

El precio° de nuestra paz cayó sobre 

Él,

Y por su herida fuimos sanados.

6

    Todos nosotros nos descarriamos 

como ovejas,

Cada cual se apartó por su camino,

Pero YHVH cargó en Él el pecado de 

todos nosotros.°

7

    Siendo oprimido (aunque fue Él 

quien se humilló a sí mismo),

No abrió su boca;

Como cordero fue llevado al 

matadero,

52.8 

→40.3-5.  52.13 Es decir, será afamado por ello →Lc.4.14,37; 5.15; 24.18-19.  52.14 También quedarse atónito o per-

plejo

52.14 Prob. inferencia al Pueblo Escogido.  52.15 Prob. sentido de esparcir, hacer brotar sangre.  53.1 Antropomorfismo 

que indica Omnipotencia para dar a entender el costo de la Redención: Para hacer el Universo Dios sólo necesitó la punta de 

sus dedos 

→40.12; Sal.8.3; para la salvación del hombre, la potencia de su brazo →Sal.20.6.  53.4 El pronombre personal es 

enfático 

→Sal.32.5; 1 P.2.24.  53.4 →Sal.32.5; Jn.1.29 y 1 Jn.3.5.  53.4 Ar. Sabal = llevar una carga. Similar a nasa´ = levantar 

una carga

53.5 Lit. castigo.  53.6 

→2 Co.5.21.


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Isaías 53:8

750

Y como la oveja enmudece ante sus 

trasquiladores,

Así no abrió su boca;

8

    Con violencia, mediante juicio, fue 

quitado,°

Y de su generación, ¿quién consideró 

que fue cortado de la tierra de 

los vivientes y llagado° por la 

transgresión de mi pueblo?

9

    Y dispusieron su sepultura con los 

impíos,

Pero con el rico fue su tumba.

Y aunque nunca hizo maldad ni 

hubo engaño en su boca,

10

    Plugo a YHVH quebrantarlo y 

someterlo a padecimiento.

Cuando se haya puesto su vida en 

sacrificio expiatorio,° verá a su 

descendencia,

Vivirá por días sin fin, y la voluntad 

de YHVH triunfará en su mano.

11

    Gracias a la aflicción de su alma, 

verá la luz° y quedará satisfecho.

Por su conocimiento, mi Siervo, el 

Justo, justificará a muchos,

Y cargará con los pecados de ellos.

12

    Por tanto, Yo le daré parte con los 

grandes,

Y con los fuertes repartirá despojos,

Por cuanto derramó su vida hasta la 

muerte,

Y fue contado entre los pecadores,

Habiendo cargado el pecado de 

multitudes y orado por los 

transgresores.

El amor de Dios por Israel

54

¡Canta, oh estéril, tú que no dabas 

   a luz!

¡Rompe en alabanzas y da voces de 

júbilo,

Tú, que nunca estuviste de parto!

Porque más son los hijos de la 

desolada,

Que los hijos de la casada, dice 

YHVH.

2

    ¡Ensancha el lugar de tu tienda,

Extiéndanse las cortinas° 

de tu habitación!

¡No te detengas, alarga tus cuerdas y 

fortifica tus estacas!

3

    Porque te extenderás hacia la 

derecha y hacia la izquierda,

Y tu descendencia desposeerá las 

naciones,

Y volverán a poblar ciudades 

desoladas.

4

    ¡No temas, porque no serás 

avergonzada!

¡No te sonrojes, porque no serás 

insultada!

Porque olvidarás la afrenta de tu 

juventud,

Y del oprobio de tu viudez no te 

acordarás.

5

    Porque marido° tuyo es tu Hacedor;

YHVH Sebaot es su nombre,

Y tu Redentor es el Santo de Israel,

Que será llamado Dios de toda la 

tierra.

6

    Como a mujer abandonada y abatida 

te vuelve a llamar YHVH,

Y como a esposa de juventud que

Ha sido repudiada, dice tu Dios.

7

    Por un breve momento te abandoné,

Pero te volveré a recoger con 

grandes misericordias.

8

    En un arrebato de ira, por un breve 

momento, escondí mi rostro de 

ti,

Pero con gran compasión tendré 

misericordia de ti eternamente, 

dice YHVH, tu Redentor.

9

    Porque esto me será como las aguas 

de Noé:

Juré que las aguas de Noé nunca 

más pasarían sobre la tierra.

Asimismo he jurado que no 

me enojaré contra ti ni te 

reprocharé.

10

    Aunque los montes se muevan y 

tiemblen los collados,

Mi misericordia no se alejará de ti,

Ni será anulado mi pacto de paz,

Dice YHVH, que tiene compasión 

de ti.

53.8 quitado. Es decir, matado 

→Lc.23.18.  53.8 llagado. Heb. nega‘. →Lv.13.3, 9, 20, 22, 25, 27, 31, 42, 47, 49, 59; 14.3, 32, 

34, 54. Es decir, hecho leproso

53.10 Los sacrificios humanos están expresamente prohibidos; esta es la única vez que se cita 

un sacrificio humano como medio de expiación de pecados. 

53.11 luz. Se sigue el registro de Qumram.  54.2 LXX: tus lonas

54.5 Nseñor.


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Isaías 55:12

751

11

    ¡Pobrecita, zarandeada por la 

tormenta y sin consuelo!

He aquí, Yo asentaré tus piedras 

sobre turquesas,

Y echaré tus cimientos sobre zafiros.

12

    Haré tus capiteles de rubíes,

Tus puertas de carbunclos,

Y toda tu cerca de piedras preciosas.

13

    Y todos tus hijos serán enseñados 

por YHVH,

Y la paz de tus hijos se multiplicará.

14

    Serás establecida en la justicia;

Estarás alejada de la opresión,

Porque no tendrás de qué temer;

Y del terror, porque no se acercará 

a ti.

15

    Si alguno conspira contra ti, lo hará 

sin mí;

El que conspire contra ti, caerá 

delante de ti.

16

    Yo he creado al herrero, que aviva 

las ascuas,

Y forja armas° para su obra;

Pero también he creado al 

destructor para que los destruya.

17

    Ningún arma forjada contra ti 

prosperará,

Y condenarás a toda lengua que se 

levante en juicio contra ti.

Esta es la herencia de los siervos de 

YHVH,

Y su victoria de parte mía, dice 

YHVH.

Gratuidad de la salvación

55

¡Todos los sedientos, venid a las 

aguas!

Y los que no tienen dinero: ¡Venid, 

comprad y comed!

¡Sí, venid, comprad sin dinero vino 

y leche, sin costo alguno!

2

    ¿Por qué gastáis dinero en lo que no 

es pan,

Y vuestro esfuerzo en lo que no 

sacia?

¡Oídme atentamente° y comed lo 

bueno,

Y deléitense vuestras almas con 

manjares!

3

    ¡Inclinad vuestro oído y venid a mí!

¡Escuchad, y vuestra alma vivirá!

Y Yo haré con vosotros un pacto 

eterno,

Las misericordias fieles prometidas 

a David.

4

    He aquí, lo he puesto por testigo a 

los pueblos,

Por caudillo y soberano de las 

naciones.

5

    He aquí, llamarás a gente que no 

conociste,

Y gente que no te conocía correrá 

a ti,

Por causa de YHVH tu Dios,

Y del Santo de Israel, que te cubrió 

de gloria.

6

    ¡Buscad a YHVH mientras puede ser 

hallado!

¡Invocadlo, mientras está cerca!

7

    ¡Deje el malo su camino,

Y el inicuo sus pensamientos,

Y conviértase a YHVH, que se 

apiadará de él;

A nuestro Dios, que es grande en 

perdonar!

8

    Porque mis pensamientos no son 

vuestros pensamientos,

Ni vuestros caminos mis caminos, 

dice YHVH.

9

    Porque como los cielos son más 

altos que la tierra,

Así mis caminos son más altos que 

vuestros caminos,

Y mis pensamientos más que 

vuestros pensamientos.

10

    Como la lluvia y la nieve desciende 

de los cielos,

Y no vuelve allá, sino que riega la 

tierra,

Y la hace germinar y producir,

Y da semilla al que siembra, y pan al 

que come,

11

    Así será mi Palabra que sale de mi 

boca:

No volverá a mí vacía,

Sino que hará lo que Yo quiero,

Y cumplirá aquello para lo cual la 

envié.

12

    Con alegría saldréis y en paz seréis 

conducidos;

Los montes y los collados 

prorrumpirán en cánticos de 

54.16 Lit. herramienta.  55.2 Lit. Escuchad escuchar. Heb. que indica énfasis.


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Isaías 55:13

752

júbilo delante de vosotros,

Y todos los árboles del campo 

batirán palmas.

13

    En lugar de zarzas crecerán 

cipreses, y en lugar de la ortiga el 

arrayán,

Y será a YHVH como memorial,

Como señal eterna, que nunca será 

quitada.

Instrucciones morales

56

Así dice YHVH: Guardad el 

derecho y practicad la justicia,

Porque mi salvación está próxima,

Y mi justicia pronta a ser revelada.

2

    ¡Cuán bienaventurado es el hombre 

que hace esto!

El hijo de Adam que se aferra a ello,

Que guarda el shabbat, para no 

profanarlo;

Que guarda su mano de toda obra 

mala.

3

    Y el hijo de tierra extraña que se ha 

unido a YHVH, no hable diciendo:

¡De seguro YHVH me excluirá de su 

pueblo!

Ni diga el eunuco: ¡Árbol seco soy!

4

    Porque así dice YHVH:

A los eunucos que guardan mis 

shabbatot,

Que escogen lo que me agrada,

Y son fieles a mi pacto;

5

    Les daré cabida en mi Casa,

Y dentro de mis muros

Un nombre mejor que el de hijos e 

hijas:

Memorial perpetuo que no será 

cortado.

6

    Y los extranjeros que se unen a 

YHVH para servirlo,

Para amar el nombre de YHVH y ser 

sus servidores;

Que guardan el shabbat sin 

profanarlo y son fieles a mi 

pacto,

7

    Haré que sean conducidos a mi 

Santo Monte,

Y se alegren en mi Casa de oración.

Sus holocaustos y sus sacrificios 

serán aceptos sobre mi altar,

Porque mi Casa será llamada Casa de 

oración para todos los pueblos.

8

    Palabra de Adonay YHVH, el que 

reúne muy juntos a los dispersos 

de Israel:

Aún reuniré muy juntos a otros con 

los ya juntados.

9

    ¡Venid a devorar, bestias del campo!

¡Vosotras todas, oh bestias de la 

montaña!

10

    Sus atalayas están ciegos, no se dan 

cuenta de nada;

Todos ellos perros mudos, incapaces 

de ladrar,

Videntes tumbados, amantes del 

sueño,

11

    Perros voraces que no conocen la 

hartura,

¡Y ellos mismos son los pastores!

Y no saben discernir:

Siguen en pos de su propio camino,

Cada uno tras su propio provecho.

12

    ¡Venid, dicen,° voy por vino;

Saciémonos de licor embriagante,

Que mañana, como hoy, habrá 

provisión más abundante.

La idolatría de Israel

57

Perece el justo, y nadie repara en 

ello;

Mueren los piadosos, y nadie 

comprende

Que delante de la aflicción es 

quitado el justo,

2

    Para que entre en la paz,

Y descanse en su lecho el que andaba 

en rectitud.

3

    Acercaos vosotros, oh hijos de la 

hechicera,

Estirpe de la que adultera y se 

prostituye.°

4

    ¿De quién os burláis, abriendo la 

boca y soltando la lengua?

¿No sois vosotros, hijos ilegítimos y 

prole bastarda,

5

    Que ardéis de lujuria debajo de cada 

árbol frondoso,°

Y degolláis niños en las torrenteras, 

y en los huecos de las peñas?

56.12 .dicen.  57.3 El TM registra verbos. LXX registra sustantivos (adúltera y prostituta).  57.5 Esto es, práctica de cultos 

idolátricos


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Isaías 58:2

753

6

    Las piedras lisas del torrente serán 

tu herencia, ellas serán tu suerte,

Porque a ellas has derramado 

libaciones y ofrecido sacrificios.

¿Y me aplacaré con tales cosas?

7

    Sobre un monte alto y elevado 

colocaste tu lecho,

Allí subías a ofrecer tus sacrificios;

8

    En el dintel de la puerta colocabas 

tu memorial;°

Ante otro, y no ante mí, te 

desnudabas,

Subías al lecho y hacías sitio,

Pactabas con tus amantes,

Con los que te gustaba acostarte,

Contemplando su falo.°

9

    Ante Moloc° te presentabas con 

ungüentos,

Y prodigabas tus perfumes;

Despachabas lejos a tus emisarios,

Y hacías que descendieran al Seol.°

10

    En el largo camino te cansaste,

Pero no dijiste: Desistiré;

Sino que hallaste en ello el 

avivamiento de tu fuerza,

Y no te desalentaste.

11

    Pero, ¿a causa de quién te 

intimidaste?

¿De quién tuviste temor para que 

negaras tu fe,

Y no te acordaras de mí,

Ni reflexionaras en tu corazón?

¿No es acaso que por largo tiempo 

Yo callaba y disimulaba,

Y por eso no me temías?

12

    Pero ahora Yo denuncio tu 

pretendida° justicia

Y tus obras, que no te aprovecharán.

13

    Cuando clames, ¡que te libren tus 

ídolos!

Pero a todos ellos los barrerá el 

viento,

Un soplo los arrebatará;

Pero el que confía en mí,

Heredará la tierra, y poseerá mi 

Santo Monte.

14

    Y se dirá: ¡Allanad, allanad, la 

calzada!

¡Quitad los tropiezos del camino de 

mi pueblo!

15

    Porque así dice el Alto y Excelso,

Morador eterno, cuyo nombre es 

Santo:

Yo habito en la altura sagrada,

Pero estoy con los de espíritu 

humilde y quebrantado,

Para reanimar al de espíritu 

humilde y vivificar el corazón 

quebrantado.

16

    No contenderé para siempre,

Ni para siempre estaré airado,

Porque delante de mí sucumbiría 

el espíritu° y las almas que he 

creado.

17

    Por la iniquidad de su codicia me 

irrité por un momento,

Lo herí, y me oculté indignado;

Pero él siguió andando 

perversamente en el camino de 

su corazón.

18

    He visto sus caminos, pero lo sanaré,

Le daré reposo y gran consuelo;

Y a los que hacen duelo por él,

19

    Les haré brotar fruto de labios:

¡Paz, paz para el que está lejos y para 

el que está cerca! dice YHVH,

Y lo sanaré.

20

    Los impíos son como el mar 

tempestuoso,

Que no puede aquietarse:

Sus aguas remueven el cieno y el 

lodo,

21

    Y no hay paz para los malvados, dice 

mi Dios.

El verdadero ayuno

58

¡Clama a voz en cuello, no te 

detengas,

Alza tu voz como una trompeta!

¡Denuncia a mi pueblo su rebelión,

A la casa de Jacob sus pecados!

2

    Que me buscan de día en día,

Y muestran deseos de conocer mis 

caminos,

Como un pueblo que practicara la 

justicia,

57.8 Esto es, tu emblema (de prostituta).  57.8 Expresión de excepcional crudeza, que muestra hasta qué punto Dios aborrece 

la idolatría 

→1 Co.10.19-22.  57.9 Nombre de un dios cananeo.  57.9 Prob. se refiere a la indignidad del rey Acaz cuando pidió 

ayuda a Tiglat-Pileser, y le mandó a decir: yo soy tu siervo 

→2 R.16.7ss.  57.12 .pretendida.  57.16 Algunas versiones añaden 

de ellos


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Isaías 58:3

754

Y que no abandonara la Ley de su 

Dios.

Me piden las ordenanzas de justicia,

Se complacen en la cercanía de 

’Elohim.

3

    Decís:° ¿Para qué ayunar, si no haces 

caso?

¿Afligir nuestra alma, si no te 

enteras?

Pero he aquí, el día de ayuno buscáis 

vuestro interés,

Y apremiáis todos vuestros trabajos.

4

    He aquí, para contiendas y debates 

ayunáis,

Para herir con puño inicuamente.

No ayunéis como ahora,

Si queréis que vuestra voz sea oída 

en lo alto.

5

    ¿Es tal el ayuno que Yo escogí,

Que de día aflija el hombre su alma,

Que mueva la cabeza como un 

junco,

Y se acueste sobre saco y ceniza?

¿Llamaréis a eso ayuno,

Día agradable a YHVH?

6

    ¿No es más bien el ayuno que Yo 

escogí,°

Desatar las ligaduras de maldad,

Soltar las cargas de opresión,

Y dejar ir libres a los quebrantados,

Y que rompáis todo yugo?

7

    ¿No es que partas tu pan con el 

hambriento,

Y a los pobres errantes albergues en 

casa;

Que cuando veas al desnudo, lo 

cubras,

Y no te escondas de tu hermano?°

8

    Entonces nacerá tu luz como el alba,

Y tu salvación se dejará ver pronto,

Tu justicia irá delante de ti,

Y la gloria de YHVH será tu 

retaguardia.

9

    Entonces invocarás, y YHVH 

responderá;

Suplicarás, y Él dirá: ¡Heme aquí!

Si quitas en medio de ti la opresión,

El dedo amenazador y las palabras 

arrogantes;

10

    Si de tu alma° sacas para el 

hambriento,

Y sacias al alma afligida,

En las tinieblas nacerá tu luz,

Y tu oscuridad será como el 

mediodía.

11

    YHVH te pastoreará siempre,

Y en las sequías saciará tu alma y 

dará vigor a tus huesos.

Serás un huerto bien regado;

Un manantial cuyas aguas nunca 

faltan,

12

    Los tuyos reedificarán las ruinas 

antiguas,

Volverás a levantar los cimientos de 

muchas generaciones,

Y serás llamado reparador de 

brechas,

Restaurador de senderos° para 

descansar.

La delicia del Shabbat

13

    Si detienes tus pies en el shabbat,

Para no hacer lo que te plazca en mi 

día santo,

Si llamas al shabbat tu delicia,

Santo, glorioso de YHVH, y lo honras,

No yendo en tus propios caminos,

Ni buscando tus propios placeres,

Ni hablando de tus propios asuntos,

14

    Entonces YHVH será tu delicia;

Te haré subir sobre las alturas de la 

tierra,

Y te alimentaré con la herencia de 

tu padre Jacob,

Porque lo habló la boca de YHVH.

Confesiones

59

He aquí que no se ha acortado la 

   mano de YHVH de modo que no 

   puede salvar,

Ni su oído se ha endurecido de modo 

que no puede oír.

2

    Son vuestras transgresiones las que 

se interponen entre vosotros y 

vuestro Dios;

Son vuestros pecados los que os 

ocultan su rostro, e impiden que 

os oiga;

58.3 .Decís.  58.6 Según el registro bíblico, éste parece ser el único ayuno escogido por Dios (vv. 6 y 7).  58.7 Es decir, pariente, 

consanguíneo o connacional

58.10 Es decir, de tu amor, de tu simpatía, de tus bienes…  58.12 Figura de conducta, norma, 

costumbre.


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Isaías 59:19

755

3

    Porque vuestras manos están 

contaminadas de sangre,

Y vuestros dedos de iniquidad;

Vuestros labios dicen mentiras,

Y vuestras lenguas murmuran 

perversidades.

4

    Nadie pleitea con justicia,

Nadie juzga con rectitud;

Se apoyan en la mentira, afirman la 

falsedad,

Conciben engaños y dan a luz la 

maldad.

5

    Incuban huevos de áspid,

Y tejen la tela de la araña:

El que come de sus huevos muere,

Y si alguno de éstos se rompe, salen 

víboras.

6

    Sus telarañas no sirven para vestirse,

Son tejidos que no pueden cubrir.

Sus obras son obras de iniquidad,

Sus manos ejecutan la violencia.

7

    Sus pies corren al mal,

Se apresuran a derramar la sangre 

inocente;

Sus pensamientos son pensamientos 

de iniquidad,

Desolación y ruinas hay en sus 

senderos.

8

    No conocieron el camino de la paz,

Ni hay justicia en sus pasos.

Se abren veredas tortuosas;

Cualquiera que ande en ellas, no 

conocerá la paz.

9

    Por eso el derecho se aleja de 

nosotros,

Y la justicia no nos alcanza:

Esperamos la luz, y he aquí tinieblas;

Claridad, y andamos en oscuridad.

10

    Vamos palpando la pared como 

ciegos,

Sí, andamos a tientas como gente 

que no tiene ojos;

En pleno día, tropezamos como al 

anochecer,

En pleno vigor, estamos como los 

muertos.

11

    Gruñimos todos igual que osos,

Y gemimos lastimosamente como 

palomas.

Esperamos la justicia, pero no la 

hay;

La salvación, pero está lejos de 

nosotros.

12

    Porque nuestras rebeliones se han 

multiplicado delante de ti,

Y nuestros pecados testifican contra 

nosotros;

Porque nuestras rebeliones están 

presentes en nosotros.

Y en cuanto a nuestras iniquidades, 

las conocemos:

13

    Hemos transgredido° y negamos a 

YHVH;

Volvimos la espalda a nuestro Dios,

Concibiendo opresión y rebelión,

Y urdiendo desde el corazón 

palabras de mentira.

14

    Por tanto, se ha hecho que el juicio 

recto se retire,

Y la justicia se mantenga a lo lejos,

Porque la verdad tropezó en la calle,°

Y la rectitud no pudo entrar.°

15

    Más aún, la lealtad no se puede 

hallar,

Pues el que trata de apartarse del 

mal, a sí mismo se hace presa.

YHVH contempló con indignación 

que ya no existía la justicia.

16

    Vio que no había nadie,

Se asombró de que no hubo quien se 

interpusiera.°

Por lo que su propio brazo le dio la 

victoria,

Y su misma justicia lo sostuvo:

17

    Se vistió con la coraza de justicia,

Y con yelmo de salvación en su 

cabeza;

Se vistió con vestiduras de venganza,

Y se cubrió de celo como de un 

manto.

18

    Conforme a las acciones, 

conformemente recompensará:

Ira a sus enemigos,

Represalia a sus adversarios;

A tierras lejanas su retribución.

19

    Desde el poniente temerán el 

nombre de YHVH,

59.13 Esto es, la Ley.  59.14 Prob. la calle más ancha de la ciudad, que llegando a la puerta, se transformaba en una amplia 

plaza, donde se celebraban los juicios del pueblo 

→Neh.8.1.  59.14 De acuerdo al comentario anterior, entonces se podría 

entender: …y la rectitud no pudo entrar (actuar) en la plaza (el tribunal)

59.16 Es decir, quien intercediera


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Isaías 59:20

756

Y su gloria desde el levante;

Porque vendrá cual torrente 

encajonado,

Impulsado por el soplo de YHVH;

20

    Pero a Sión vendrá como Redentor 

para alejar la iniquidad de Jacob, 

dice YHVH.

21

    En cuanto a mí, dice YHVH,

Este es mi pacto con ellos:

Mi Espíritu que está sobre ti,

Y mis palabras que puse en tu boca,

No faltarán jamás de tu boca,

Ni de la boca de tu descendencia,

Ni de la boca de la descendencia de 

tu descendencia, dice YHVH,

Desde ahora y para siempre.

La gloria de Sión

60

¡Levántate y resplandece, que llega 

tu luz!

¡La gloria de YHVH amanece sobre 

ti!

2

    He aquí, las tinieblas cubren la 

tierra;

Densa oscuridad a los pueblos,

Pero YHVH se levanta sobre ti,

Y en ti será vista su gloria;

3

    Los gentiles acudirán a tu luz,

Y los reyes a tu naciente resplandor.

4

    ¡Alza tus ojos en torno y mira!

Todos ellos se reúnen y vienen a ti,

Tus hijos vendrán de lejos,

Y tus hijas serán llevadas en brazos.

5

    Tu lo verás, radiante de alegría,

Y tu corazón se estremecerá y se 

regocijará,

Cuando vuelquen sobre ti el 

comercio del mar,°

Y te traigan la riqueza de las 

naciones.

6

    Te cubrirán caravanas de camellos,

Dromedarios° de Madián y de Efa;

Todos vienen de Sabá,°

Trayendo oro e incienso,

Y proclamando las alabanzas de 

YHVH.

7

    Serán reunidos para ti todos los 

rebaños de Cedar;

Los carneros de Nebaiot° estarán a 

tu servicio;

Serán ofrenda agradable sobre mi 

altar,

Y glorificaré la Casa de mi majestad.

8

    ¿Quiénes son éstos que vuelan como 

nubes,

Y como palomas a su palomar?

9

    Ciertamente, en mí esperarán las 

costas;

Las naves de Tarsis vendrán a la 

cabeza,

Trayendo tus hijos de lejos,

Y con ellos su plata y su oro,

A causa del nombre de YHVH tu 

Dios,

Del Santo de Israel, que te ha 

glorificado.

10

    Extranjeros reedificarán tus muros,

Y sus reyes te servirán.

Aunque en mi ira te castigué,

En mi buena voluntad tendré de ti 

misericordia.

11

    Tus puertas estarán siempre 

abiertas,

No serán cerradas ni de día ni de 

noche,

Para que te traigan la riqueza de las 

naciones,

Con sus reyes llevados en procesión.

12

    Las naciones o reinos que no se te 

sometan, perecerán;

¡Sí!, aquellas naciones serán 

arrasadas.

13

    Vendrá a ti el orgullo del Líbano,

Con el ciprés, el abeto y el pino,

Para hermosear el lugar de mi 

Santuario.

¡Yo haré glorioso el estrado de mis 

pies!

14

    Los hijos de tus opresores irán 

encorvados a ti,

Y los que te ultrajaban se postrarán 

a tus pies,

Y te llamarán Ciudad de YHVH,

Sión del Santo de Israel.

15

    Aunque fuiste abandonada y 

aborrecida,

Sin nadie que transitara por ti,

Yo haré que seas gloria perpetua,

La delicia de todas las edades.

16

    Mamarás la leche de las naciones,

60.5 Es decir, las riquezas del comercio marítimo.  60.6 Ncamellos jóvenes.  60.6 Madián, Efa y Sabá, todos pueblos árabes. 

60.7 Prob. se refiere a los nabateos, pueblo de origen árabe situado al SE del Mar Muerto. 


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Isaías 61:10

757

Mamarás los pechos de los reyes,

Y sabrás que Yo, YHVH, soy tu 

Salvador,

Tu Redentor, el Fuerte de Jacob.

17

    En lugar de bronce, te traeré oro,

En lugar de hierro, te traeré plata,

En lugar de madera, bronce,

Y en lugar de piedras, hierro.

Te daré la paz por magistrado,

Y la justicia por gobernante.

18

    No se oirá más en tu tierra: 

¡Violencia!,

Ni dentro de tus fronteras: ¡Ruina! 

¡Destrucción!

Tus muros se llamarán Salvación,

Y tus puertas Alabanza.

19

    El sol no te servirá más como luz de 

día,

Ni te alumbrará la claridad de la luna;

Será YHVH tu luz perpetua;

El Dios tuyo será tu esplendor.

20

    Tu sol no se pondrá jamás, ni 

menguará tu luna,

Porque YHVH te será por luz 

perpetua,

Y los días de tu luto habrán 

terminado.

21

    Y tu pueblo, todos ellos justos,

Heredarán para siempre la tierra;

Renuevos de mi plantío, obra de mi 

mano,

Para manifestar mi gloria.

22

    El más pequeño crecerá hasta mil,

Y el menor será pueblo numeroso.

Yo, YHVH, me apresuraré a hacer 

esto a su tiempo.

Las buenas nuevas

61

El Espíritu de Adonay YHVH está 

   sobre mí,

porque YHVH me ha ungido.

Me ha enviado a predicar buenas 

nuevas a los abatidos,

A vendar los corazones desgarrados,

A proclamar libertad a los cautivos

Y a los presos apertura de la cárcel;

2

    A promulgar el año de gracia° de 

YHVH,

Y el día de la venganza de nuestro 

Dios;

A consolar a todos los que lloran,

3

    A comunicar la alegría° a los que 

lloran en Sión,

Dándoles hermosura en lugar de 

ceniza,

Y óleo de regocijo en lugar de lamentos,

Y el manto de alabanza° en lugar de 

pesadumbre,

Para que sean llamados árboles de 

justicia,

Plantados por YHVH mismo, para 

que Él sea glorificado.

4

    Reconstruirán las ruinas antiguas,

Levantarán los viejos escombros;

Restaurarán las ciudades destruidas,

Los escombros de muchas 

generaciones.

5

    Se presentarán extranjeros a 

pastorear vuestros rebaños,

Y forasteros serán vuestros 

labradores y viñadores.

6

    Pero en cuanto a vosotros, seréis 

llamados Sacerdotes de YHVH;

Dirán de vosotros: Ministros de 

nuestro Dios.

Comeréis la opulencia de las naciones,

Y entraréis en posesión de su gloria.

7

    En lugar de vuestra vergüenza 

tendréis doble honra,°

Y en vez de humillación gritarán de 

júbilo por su herencia.

Por tanto poseerán el doble en su 

tierra,

Y tendrán alegría perpetua.

8

    Porque Yo, YHVH, amo la justicia,

Aborrezco la rapiña para el 

holocausto;

Pero a aquellos les daré su salario 

fielmente,

Y haré con ellos un pacto perpetuo.

9

    Su descendencia será célebre entre 

las naciones,

Y sus vástagos entre los pueblos.

Los que vean reconocerán que son el 

linaje que bendijo YHVH.

10

    Con sumo gozo me regocijaré en 

YHVH;

Mi alma se alegrará en mi Dios,

Porque me ha vestido con ropas de 

salvación,

61.2 Algunos identifican este año de gracia con el año sabático (o año de reposo), en el que se devolvía la libertad a los esclavos 

y los bienes a quienes los habían tenido que hipotecar. 

61.3 .la alegría.  61.3 

→Zac.12.10.  61.7 .honra.


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Isaías 61:11

758

Me ha cubierto con el manto de la 

justicia,

Como el novio y el sacerdote se 

visten espléndidamente,

Y como la novia se engalana con sus 

joyas.°

11

    Porque como la tierra produce su 

renuevo,

Y como el huerto hace brotar su 

simiente,

Así Adonay YHVH hará brotar la 

justicia,

Y su fama en presencia de todas las 

naciones.

Restauración de Israel

62

Por amor de Sión no guardaré 

silencio,

Por amor de Jerusalem no 

descansaré,

Hasta que rompa la aurora de su 

justicia,

Y arda la antorcha de su salvación.

2

    Entonces las naciones verán tu 

justicia,

Y todos los reyes, tu gloria.

Y te será dado un nombre nuevo,

Que la boca de YHVH pronunciará.

3

    Serás corona fúlgida en la mano de 

YHVH,

Y diadema real en la palma de tu 

Dios.

4

    Nunca más serás llamada la 

Desamparada,

Ni tu tierra, la Desolada,

Sino que serás llamada Hefzi-bá,° y 

tu país, Beula,°

Porque el amor de YHVH estará 

contigo

Y tu tierra tendrá marido,

5

    Pues como el joven se desposa con 

su virgen,

Así tu Arquitecto se desposará 

contigo,

Y como el novio se goza sobre la 

novia,

Así tu Dios se regocijará en ti.

6

    ¡Oh Jerusalem, sobre tus muros he 

emplazado centinelas!

Nunca se descuidarán, ni de día ni 

de noche.

Los que invocáis a YHVH no os deis 

descanso;

7

    No le deis descanso hasta que la 

establezca,

Hasta que haga de Jerusalem la 

admiración de la tierra.

8

    YHVH lo ha jurado con su diestra y 

su brazo poderoso:

Ya no entregaré tu trigo por comida 

a tus enemigos,

Ni los extranjeros se beberán más el 

vino por el cual tú trabajaste.

9

    Los que lo cosechan lo comerán,

Y alabarán a YHVH,

Los que lo vendimian lo beberán en 

los atrios de mi Santuario.

10

    ¡Pasad, pasad por las puertas!

¡Despejad el camino al pueblo!

¡Allanad, allanad la calzada, y 

limpiadla de piedras!

¡Alzad pendón a los pueblos!

11

    YHVH envía un pregón hasta el 

confín de la tierra:

Decid a la hija de Sión:

¡He aquí tu Salvador viene!

¡Mirad, el premio de su victoria lo 

acompaña,

Y su recompensa lo precede!

12

    Entonces los llamarán Pueblo 

Santo,

Redimidos de YHVH,

Y a ti te llamarán la Deseada, Ciudad 

no desamparada.

El día de la venganza

63

¿Quién es éste que viene de Edom, 

de Bosra, con ropas enrojecidas?

¿Quién es ése, magnífico en sus 

vestiduras,

Que marcha en la grandeza de su 

poder?

Yo, el que sentencio con justicia, 

poderoso para salvar.

2

    ¿Por qué están rojas tus vestiduras

Y la túnica, como el que ha pisado 

en el lagar?

3

    Yo solo he pisado el lagar,

Y de los pueblos nadie había 

conmigo.

Los aplasté con mi ira,

Y los pisoteé con mi furor,

61.10 Es decir, su ajuar.  62.4 Esto es, mi deleite está en ella.  62.4 Esto es, desposada.


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Isaías 64:2

759

Su sangre° salpicó mis vestiduras,

Y manché todas mis ropas.

4

    Porque el día de la venganza está en 

mi corazón,

Y el año de mis redimidos ha 

llegado.

5

    Miré, y no había quien ayudara,

Y me maravillé de que no hubiera 

quien sustentara,

Pero me sostuvo mi ira, y mi brazo 

me dio la victoria.

6

    Pisoteé pueblos en mi ira,

Los embriagué con mi indignación, 

y derramé su sangre° en la tierra.

Bondad de Dios

7

    Yo haré recordar la gran 

misericordia de YHVH,

Y las alabanzas de YHVH,

Según todos los beneficios que 

YHVH hizo por nosotros,

Y su gran bondad para con la casa de 

Israel,

Que Él les ha hecho conforme a su 

amor entrañable,

Y conforme a la multitud de sus 

misericordias.

8

    Pues dijo: ¡Ciertamente ellos son mi 

pueblo,

Hijos que no se portarán falsamente!

Y así, Él se convirtió en el Salvador 

de ellos,

9

    Y fue afligido con todas sus 

aflicciones.

El Ángel de su presencia los salvó,

En su amor y en su ternura, Él 

mismo los redimió,

Y cargó con ellos, y los llevó todos 

los días, desde la antigüedad.

10

    Pero ellos se rebelaron y 

contristaron su Espíritu Santo,

Por lo que se tornó en su enemigo y 

guerreó contra ellos.

11

    Entonces se acordaron de los días 

antiguos,

De Moisés y su pueblo:

¿Dónde está el que los sacó del mar 

con los pastores° de su rebaño?

¿Dónde está el que puso en medio de 

ellos su Santo Espíritu,

12

    El que estuvo a la diestra de Moisés 

guiándolo con su brazo glorioso,

El que dividió el mar ante ellos, y se 

ganó renombre eterno,

13

    El que los condujo por el fondo del 

mar,

Como se conduce° el caballo por la 

estepa sin tropezar?

14

    Así como desciende el ganado a la 

cañada,

El Espíritu de YHVH los hizo 

descansar;

Así pastoreaste a tu pueblo para 

hacerte un Nombre glorioso.

Clamor del profeta

15

    ¡Mira desde los cielos, y contempla 

desde tu santa y gloriosa morada!

¿Dónde está ahora tu celo y tus 

obras poderosas?

¿Se han estrechado la conmoción de 

tus entrañas y tus compasiones 

hacia mí?

16

    ¡No la reprimas, porque Tú eres 

nuestro padre!

Aunque Abraham no nos conozca e 

Israel nada sepa de nosotros,

Tú, oh YHVH, eres nuestro Padre;

¡Redentor nuestro desde la 

eternidad, es tu Nombre!

17

    ¿Por qué, oh YHVH, permites que 

nos desviemos de tus caminos,

Y endureces nuestro corazón a tu 

temor?

¡Vuélvete por amor de tus siervos, 

las tribus de tu heredad!

18

    Por un momento nuestros enemigos 

poseyeron tu pueblo santo,

Y pisotearon tu Santuario.

19

    Hemos venido a ser como aquellos a 

quienes nunca gobernaste;

Como aquellos sobre los cuales 

nunca fue invocado tu Nombre.

64

¡Oh, si rasgaras los cielos y 

descendieras,

Para que las montañas fueran 

derretidas ante tu presencia,

2

    Como fuego abrasador de 

fundiciones,

63.3 Heb. nishám = fluido vital. Aparece solo aquí y en 63.6.  63.6 Heb. nishám = fluido vital.  63.11 LXX y Sir. registran pas-

tor

63.13 .se conduce.


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Isaías 64:3

760

Como fuego que hace hervir las 

aguas!

Tu Nombre sería notorio a tus 

enemigos,

Y ante ti temblarían las naciones.

3

    Descendiste,

Hiciste portentos que no 

esperábamos,

Ante tu presencia se derritieron las 

montañas.

4

    Jamás oído oyó ni ojo vio un Dios 

fuera de ti,

Que hiciera tanto por el que espera 

en Él:

5

    Sales al encuentro

Del que con gozo practica la justicia;

Del que tiene presentes tus caminos.

He aquí, cuando pecamos, te 

indignaste;

En los pecados hemos estado largo 

tiempo,

¿Y podremos ser salvos?

6

    Todos nosotros somos como cosa 

impura,

Y nuestra justicia como trapo de 

menstruo.

Todos nosotros nos marchitamos 

como hojas,

Y la mano de nuestras iniquidades 

nos arrastra como el viento.

7

    No hay quien invoque tu Nombre,

Ni se afane para asirse de ti,

Pues ocultaste tu rostro de nosotros,

Y nos entregaste en poder de nuestra 

culpa.

8

    Sin embargo, oh YHVH, Tú eres 

nuestro Padre;

Nosotros la arcilla y Tú nuestro 

Alfarero,

Todos nosotros, obra de tus manos.

9

    ¡No te excedas, en la ira, oh YHVH,

Ni te acuerdes para siempre de la 

iniquidad!

¡Te lo rogamos,

Pues todos nosotros somos pueblo 

tuyo!

10

    Tus santas ciudades son un desierto;

Sión es un desierto,

Jerusalem una desolación.

11

    Nuestra santa y gloriosa Casa,

Donde te alabaron nuestros padres,

Ha sido pasto del fuego;

Nuestras cosas más amadas

Se han convertido en ruinas.

12

    ¡Oh YHVH!, ¿quedarás insensible 

ante todo esto?;

¿Te callarás acaso, y nos afligirás sin 

medida?

Un pueblo rebelde

65

Me dejé buscar por los que no 

preguntaban por mí;

Me dejé hallar por los que no me 

buscaban.

Dije a gente que no invocaba mi 

Nombre:

¡Heme aquí, heme aquí!

2

    Todo el día extendí mis manos 

hacia un pueblo rebelde, 

que anda por camino no 

bueno, en pos de sus propios 

pensamientos.

3

    Pueblo que en mi propia cara me 

provoca a ira continuamente,

Que sacrifica en huertos y quema 

incienso sobre ladrillos;°

4

    Que se sientan en los sepulcros, y 

hacen noche en las bóvedas;°

Que comen carne de cerdo, y en 

sus ollas hay caldo de cosas 

abominables;

5

    Que dicen: ¡Retírate!

¡No te acerques, que estoy 

consagrado!

Éstos hacen humear mi ira como 

fuego que arde todo el día.

6

    Lo tengo escrito ante mí;

No callaré hasta dar retribución,

No descansaré hasta retribuir en su 

mismo seno

7

    Vuestras iniquidades y las de 

vuestros padres,

Todas juntas, dice YHVH.

Porque ofrecieron incienso en los 

lugares altos,

Y en los collados blasfemaban contra 

mí.

Sí, echaré en su mismo seno la 

retribución de sus obras pasadas.

8

    Así dice YHVH:

65.3 Es decir, sobre altares de ladrillo 

→Ex.30.1-10; 20.24-25.  65.4 Npernoctan en los antros. Sepulcro escavado en la roca 

donde se practicaba la adivinación. 


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Isaías 65:23

761

Como al hallar un racimo jugoso se 

dice:

¡No dejes que se pierda, que es una 

bendición!°

Así haré Yo a causa de mis siervos: 

no lo echaré a perder todo.

9

    Sacaré linaje de Jacob y de Judá, 

quien herede mis montañas;

Mis escogidos la heredarán

Y mis siervos habitarán allí.

10

    El Sarón° será el redil de las ovejas,

Y el valle de Acor° pastizal de la 

vacada,

Para beneficio de mi pueblo que me 

buscó.

11

    Pero vosotros, los que abandonáis a 

YHVH,

Y os olvidáis de mi Santo Monte;

Los que preparáis una mesa para 

Fortuna,°

Y lleváis la copa para el Destino,°

12

    Yo os destino a la espada, y todos os 

encorvaréis para el degüello:

Porque llamé y no respondisteis; 

hablé y no escuchasteis,

Hicisteis lo no grato ante mis 

ojos, escogisteis lo que no me 

complacía.

13

    Por eso, así dice Adonay YHVH:

He aquí, mis siervos comerán, y 

vosotros pasaréis hambre;

He aquí, mis siervos beberán, y 

vosotros estaréis sedientos;

He aquí, mis siervos estarán alegres, 

pero vosotros avergonzados;

14

    He aquí, mis siervos cantarán por el 

júbilo del corazón,

Pero vosotros clamaréis por el dolor 

del corazón,

Y os lamentaréis con el espíritu 

destrozado.

15

    Vuestro nombre será dejado para 

cuando

Mis escogidos maldigan, diciendo:

¡Que Adonay YHVH te mate igual 

que a ellos!,°

Y Él llamará a sus siervos por otro 

nombre.

16

    Porque quien sea bendecido en la 

tierra,

Será bendecido por el Dios de la 

verdad;

Y el que jure en la tierra

Jurará por el Dios de la verdad.

Sí, las angustias de antaño habrán 

sido olvidadas;

Ocultas quedarán en verdad a mis 

ojos.

Nuevos cielos y nueva tierra

17

    Porque he aquí, Yo creo nuevos 

cielos

Y nueva tierra,

Y de lo primero no habrá memoria,

Ni vendrán más al pensamiento.

18

    Mas os gozaréis y os alegraréis para 

siempre

En las cosas que Yo habré creado.

¡He aquí, transformo a Jerusalem en 

alegría,

Y a su pueblo en gozo!

19

    Me alegraré con Jerusalem y me 

regocijaré con mi pueblo,

Y ya no se oirán en ella voz de 

lamento y llantos.

20

    No habrá más allí niños malogrados,

Ni anciano que no cumpla sus días,

Sino que el niño morirá de cien 

años,

Y el que no los alcance se tendrá por 

maldito.

21

    Edificarán casas y morarán en ellas;

Plantarán viñas y comerán sus 

frutos,

22

    No edificarán para que otro habite,

Ni plantarán para que otro coma,

Porque los años de mi pueblo serán 

los años de un árbol,

Y mis escogidos disfrutarán 

plenamente la obra de sus 

manos.

23

    No trabajarán en vano,

Ni parirán hijos para súbita ruina,

Porque son la simiente bendita de 

YHVH,

Y su descendencia con ellos.

65.8 Es decir, que promete buen vino.  65.10 Lit. la Sarón. Llanura que va por la costa, desde Jafa hasta el Carmelo.  65.10 Valle 

situado al SE de Jericó. Simboliza la imagen de la esperanza y la gracia divinas. 

65.11 Este nombre identifica al dios fenicio de 

la suerte, al que se rendían grandes convites sagrados. 

65.11 Lit. Meni, deidad a la que se atribuía el control de la suerte del 

hombre. 

65.15 .igual que a ellos.


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Isaías 65:24

762

24

    Y acontecerá que antes que clamen,

Yo responderé;

Cuando todavía estén hablando,

Yo ya habré oído.

25

    El lobo y el cordero serán 

apacentados juntos,

El león comerá paja como el buey,

Y el polvo será el alimento de la 

serpiente.

No harán daño ni destruirán en todo 

mi Santo Monte, dice YHVH.

Las bendiciones del reino

66

Así dice YHVH:

Los cielos son mi trono, y la tierra 

estrado de mis pies:

¿Dónde está la casa que me habréis 

de edificar,

Y dónde el lugar de mi reposo?

2

    Mi mano hizo todas estas cosas,

Y así todas ellas llegaron a existir, 

dice YHVH.

Pero Yo miraré al pobre y humilde 

de espíritu,

Y que tiembla ante mi palabra.

3

    El que inmola un buey,

Es como si matara a un hombre;

El que sacrifica un cordero,

Es como si degollara a un perro;

El que trae ofrenda vegetal,

Es como si ofreciera sangre de 

cerdo;

El que invoca y ofrece incienso,

Es como si bendijera a un ídolo.

Todos ellos escogieron su camino,

Y su alma se deleita en sus 

abominaciones;

4

    Pues Yo también escogeré sus 

castigos,

Y les enviaré lo que más temen; 

porque llamé, y nadie 

respondió;

Hablé, y no escucharon; hicieron lo 

malo ante mis ojos,

Y escogieron lo que no me agrada.

5

    Oíd la palabra de YHVH, los que 

tembláis ante su palabra:

Dicen vuestros hermanos que os 

aborrecen,

Que os rechazan por causa de mi 

Nombre:

¡Muestre ahora su gloria YHVH, y 

veamos vuestro gozo!

Pero ellos serán avergonzados.

6

    ¡Escuchad! Hay un tumulto en la 

ciudad.

¡Escuchad! Viene del templo:

¡Escuchad! YHVH da el pago a sus 

enemigos.

7

    ¡Antes que estuviera de parto, dio a 

luz un hijo!

¡Antes que le vinieran dolores, dio a 

luz un varón!

8

    ¿Quién ha oído cosa semejante?

¿Quién ha visto tales cosas?

¿Se dará a luz a un país en un solo 

día?

¿Nacerá una nación de una sola vez?

Pues apenas sintió los dolores,

Sión parió sus hijos.

9

    Yo, que abro la matriz, ¿no haré 

parir?, dice YHVH.

Yo, que hago engendrar, ¿la voy a 

cerrar?, dice tu Dios.

10

    ¡Alegraos con Jerusalem, gozaos con 

ella todos los que la amáis!

¡Rebosad de júbilo con ella, los que 

por ella llevasteis luto!

11

    Porque mamaréis sus pechos y os 

saciareis de sus consolaciones,

Y succionaréis gozosos las ubres de 

su gloria.

12

    Porque así dice YHVH:

Yo extiendo sobre ella paz como un 

río,

Y como un torrente en crecida la 

gloria de las naciones.

Mamaréis, seréis llevados en brazos,

Y sobre las rodillas os acariciarán;

13

    Como a uno que consuela su madre,

Así Yo os consolaré; en Jerusalem 

seréis consolados;

14

    Y al verlo, vuestro corazón se 

regocijará,

Y vuestros huesos reverdecerán 

como la hierba tierna;

La mano de YHVH se manifestará a 

sus siervos,

Y su ira sobre sus enemigos.

15

    Porque he aquí, YHVH viene en el 

fuego,

Y como el torbellino con sus carros, 

para convertir su ira en llamas,

Y su voz de reprensión en fuego.

16

    Pues mediante el fuego YHVH hará 

justicia,

Y mediante su espada respecto a 

todo mortal,


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Isaías 66:24

763

Y serán muchos las víctimas de 

YHVH.

17

    Los que se consagran y purifican 

para entrar a los huertos,

Tras uno que ocupa el centro,° 

los que comen carne de cerdo, 

reptiles y ratones,

A una serán consumidos, dice 

YHVH,

18

    Porque Yo conozco sus obras y sus 

pensamientos.

En cuanto a mí, llegará el tiempo de con-

gregar  a  todas  las  naciones  y  lenguas,  y 

vendrán y contemplarán mi gloria.

19

 Y haré una señal entre ellas, y envia-

ré  a  los  que  huyeron  de  ellas  a  Tarsis, 

a  Etiopía,°  a  Libia,°  a  Mesec,  a  Rosh,  a 

Tu-bal°  y  a  Javán,°  a  las  costas  lejanas 

que no han oído mi fama ni han visto mi 

gloria, y ellos anunciarán mi gloria entre 

las naciones.

20

 Y  como  los  hijos  de  Israel  traen  su 

ofrenda en utensilios puros a la Casa de 

YHVH, así de todas las naciones traerán a 

66.17  Esto  es,  el  sacerdote  del  culto  idolátrico.  66.19  Etiopía.  Situada  en  la  costa  mediterránea.  Prob.  la  antigua  Somalia 

→Jer.46.9.  66.19 Libia. Situada en el N de África, en la actual Libia, pero hay quienes la relacionan con Lidia, en Asia Menor. 

66.19 Tubal. Prob. situado al S del Mar Negro.  66.19 Javán. Se identifica con los jonios, que junto a los medos 

→Gn.10.2, 

conforman actualmente el pueblo griego. 

todos vuestros hermanos, en caballos, en 

carros y en literas, en mulos y dromeda-

rios hasta mi Santo Monte en Jerusalem, 

como ofrenda a YHVH, dice YHVH,

21

 y entre ellos escogeré sacerdotes y le-

vitas, dice YHVH.

22

 Porque así como los nuevos cielos y la 

nueva tierra que voy a hacer

Permanecerán delante de mí, dice 

YHVH;

Así permanecerán vuestro linaje y 

vuestro nombre.

23

    Y sucederá de novilunio en 

novilunio,

Y de shabbat en shabbat,

Que toda criatura vendrá para 

postrarse delante de mí, dice 

YHVH.

24

    Y saldrán, y mirarán los cadáveres 

de los hombres que se rebelaron 

contra mí:

Su gusano no morirá, ni su fuego 

se extinguirá, y será el horror de 

todos los mortales.


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1

Palabras  de  Jeremías  ben°  Hilcías, 

uno  de  los  sacerdotes  que  habitaban 

en Anatot, en tierra de Benjamín,

2

 el cual recibió palabra de YHVH en los 

días de Josías ben Amón, rey de Judá, en 

el año decimotercero de su reinado,

3

 y también en los días de Joacim ben 

Josías,  rey  de  Judá,  hasta  el  fin  del 

undécimo  año  de  Sedequías,  hijo°  de 

Josías,  rey  de  Judá,  es  decir,  hasta  la 

deportación  de  Jerusalem  en  el  mes 

quinto.°

4

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

5

 Antes que te formara en el vientre te 

conocí,  y  antes  que  salieras  de  la  ma-

triz te consagré, te di por profeta a las 

naciones.

6

 Entonces  dije:  ¡Ah,  Adonay  YHVH!  He 

aquí, no sé hablar, porque soy joven.

7

 Pero  me  dijo  YHVH:  No  digas:  Soy  jo-

ven.  Adondequiera  que  te  envíe,  irás,  y 

todo lo que te mande, dirás.

8

 No temas delante de ellos, porque Yo es-

toy contigo para librarte, dice YHVH.

9

 Luego YHVH extendió su mano, y tocó 

mi boca, y me dijo YHVH: He aquí, pongo 

mis palabras en tu boca.

10

 Mira, en este día te pongo sobre nacio-

nes y sobre reinos, para arrancar y para 

destruir, para desolar y para derribar, para 

edificar y para plantar.

11

 Y vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:  ¿Qué  ves,  Jeremías?  Y  dije:  Veo  una 

vara de almendro.°

12

 Me dijo YHVH: Bien has visto, porque 

Yo  vigilo°  sobre  mi  palabra  para  que  se 

cumpla.

13

 Y vino a mí palabra de YHVH por se-

gunda vez, diciendo: ¿Qué ves? Y dije: Veo 

un caldero hirviendo que se vuelca desde 

el norte.°

14

 Entonces me dijo YHVH: Del norte se 

derramará  la  desgracia  sobre  todos  los 

habitantes de la tierra.

15

 Porque he aquí Yo convoco a todas las 

tribus de los reinos del norte, dice YHVH; 

y vendrán y pondrán cada uno su trono a 

la  entrada  de  las  puertas  de  Jerusalem,° 

así contra todos sus muros en derredor, 

como contra todas las ciudades de Judá.

16

 Y  pronunciaré  mis  sentencias  contra 

ellos a causa de toda su maldad, porque 

me  abandonaron,  quemaron  incienso  a 

dioses  extraños  y  se  postraron  ante  las 

obras de sus propias manos.

17

 Así que tú ciñe tus lomos y ponte en 

pie, y háblales todo lo que Yo te mande. 

No tiembles ante ellos, no sea que Yo te 

haga temblar ante ellos.

18

 Porque  he  aquí,  Yo  mismo  te  pongo 

hoy  como  ciudad  fortificada,  como  co-

lumna de hierro y como muro de bronce 

contra toda la tierra, contra los reyes de 

Llamamiento del profeta

1.1 Heb. ben = hijo. Véase nota siguiente.  1.3 En el hebreo, el término hijo no alude sólo al descendiente directo, sino que puede 

ser usado para referirse a parientes más lejanos. Por ello, el vocablo ben = hijo se translitera en caso de descendencia inme-

diata, y se traduce en pasajes como éste. La expresión hijo de Josías, debe ser entendida como descendiente directo de Josías

1.3  Se  refiere  al  mes  quinto  del  undécimo  año  del  rey  Sedequías  (véase  2  R.25.2  y  8).  1.11  Heb.  shaqued  =  vigilante

1.12  Heb.  shoked  =  vigilo.  Juego  de  palabras  entre  almendro  y  vigilar,  que  provienen  de  la  misma  raíz.  En  hebreo,  el  al-

mendro  tiene  el  nombre  de  vigilante,  porque  siendo  el  primero  en  florecer,  vigila  (anuncia)  la  llegada  de  la  prima-

vera. 

1.13  Lit.  y  su  superficie  desde  el  camino  del  norte.  Posiblemente,  la  expresión  su  superficie  alude  al  contenido  del 

caldero,  que  se  derrama  desde  el  norte  hacia  el  sur.  El  contexto  siguiente  da  la  correcta  interpretación  de  esta  oración. 

1.15 La expresión poner su trono en alude a la conquista de dicho lugar. 


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Jeremías 2:15

765

Judá, contra sus príncipes, contra sus sa-

cerdotes, y contra el pueblo de la tierra.°

19

 Y harán guerra contra ti, pero no pre-

valecerán contra ti, porque Yo estoy con-

tigo para librarte, dice YHVH.

Apostasía de Israel

2

Y vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Anda y clama a oídos de Jerusalem, 

y dile:

Así dice YHVH:

A favor tuyo me acuerdo de la 

ternura de tu juventud,

Del amor de tus desposorios,

De tu andar en pos de mí en el 

desierto,

En tierra no sembrada.

3

    Israel era santidad a YHVH,

Primicias de su cosecha,

Quien osaba comer de ella lo pagaba,

La calamidad venía sobre ellos:

Oráculo de YHVH.

4

    ¡Oíd la palabra de YHVH, oh casa de 

Jacob

Y todas las familias de la casa de 

Israel!

5

    Así dice YHVH:

¿Qué injusticia hallaron en mí 

vuestros padres para alejarse de 

mí?

Siguieron tras la vanidad y se 

quedaron vacíos,

6

    En vez de preguntar: ¿Dónde está 

YHVH,

Que nos hizo subir de la tierra de 

Egipto y nos condujo por el 

desierto,

Por tierra desierta y despoblada,

Tierra sedienta y sombría,

Tierra por la cual nadie había pasado,

Y en la cual nadie había habitado?

7

    Y os introduje a una tierra fértil,°

Para que comierais sus frutos y 

delicias,

Pero entrasteis y contaminasteis mi 

tierra

Y convertisteis mi heredad en 

abominación.

8

    Los sacerdotes no preguntaban: 

¿Dónde está YHVH?

Los doctores de la Ley° no me 

conocían,

Los pastores° se rebelaban contra mí,

Y los profetas profetizaban en 

nombre de Baal,

Siguiendo a dioses que de nada 

sirven.

9

    Por eso vuelvo a contender contra 

vosotros,

Y contra los hijos de vuestros hijos, 

dice YHVH.

10

    Pasad a las costas de Quitim° y 

mirad;

Enviad a Cedar° y observad 

atentamente,

Y ved si ha sucedido algo semejante 

a esto:

11

    ¿Acaso alguna nación ha cambiado 

sus dioses? (aunque ellos no son 

dioses).

¡Pues mi pueblo cambió mi° gloria 

por lo que no sirve!

12

    ¡Espantaos, cielos, por ello; 

horrorizaos° y quedad perplejos! 

dice YHVH.

13

    Porque dos males ha hecho mi 

pueblo:

Me abandonaron a mí, fuente de 

agua viva,

Y cavaron para sí cisternas,

Cisternas rotas que no retienen el 

agua.

14

    ¿Es Israel siervo?¿Acaso es esclavo?

¿Por qué, entonces, ha llegado a ser 

presa?

15

    Los leoncillos rugieron contra él, 

dieron sus bramidos,

Y convirtieron su tierra en una 

desolación;

1.18 Es decir, Israel.  2.7 También se puede decir en la tierra del Carmelo (aunque el término Carmelo también se usa en hebreo 

como nombre común, para aludir a un jardín o a una tierra fértil). 

2.8 Lit. los que agarran la ley. El verbo agarrar se usa en 

contextos como éste para denotar la acción de coger algo con el propósito de usarlo, y, por extensión, para referirse a las per-

sonas hábiles en el uso de determinados objetos (por ejemplo, en el uso de la espada o, como en este caso, en el uso de la ley). 

2.8 Esto es, gobernantes.  2.10 Prob. se refiere a Chipre, aunque este nombre también llegaría a usarse de forma más amplia 

para aludir a las costas del Mediterráneo. 

2.10 Tribu de nómadas que generalmente habitaban al este de Transjordania (aunque 

en algunas épocas se extendían por el sur de Palestina, hasta llegar a la frontera de Egipto). 

2.11 9ª enmienda de los Soferim 

→ § 6  § 15.  2.12 Lit. erizaos (se entiende, a causa del horror).


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Jeremías 2:16

766

Sus ciudades están quemadas y sin 

habitantes.

16

    Hasta los hijos de Menfis y de Tafnes 

te han rapado la coronilla.

17

    ¿No te ha sucedido todo esto por 

haber abandonado a YHVH tu 

Dios cuando Él te guiaba por el 

camino?°

18

    Y ahora, ¿qué buscas rumbo a Egipto?

¿Beber agua del Nilo?°

¿Qué buscas rumbo Asiria?

¿Beber agua del Éufrates?

19

    ¡Repréndate tu maldad!

¡Condénente tus apostasías!

Considera y reconoce cuán malo y 

amargo

Es haber abandonado a YHVH tu 

Dios,

Y no tener temor de mí,

Dice Adonay YHVH Sebaot.

20

    Desde antiguo has quebrado el yugo 

y roto tus ataduras,

Diciendo: ¡No quiero servir!

Y sobre todo collado alto, y debajo 

todo árbol frondoso° te postras° y 

te prostituyes.°

21

    Yo te planté como vid escogida,

Toda ella de cepas genuinas;

¿Cómo, pues, te me has vuelto 

sarmiento degenerado de vid 

bastarda?

22

    Aunque te laves con lejía y uses 

mucho jabón para ti,

La mancha de tu pecado está aún 

delante de mí,

Dice Adonay YHVH.

23

    ¿Cómo te atreves a decir:

No me he contaminado ni he ido 

tras los baales?

Considera tu andar° en el valle,°

Y reconoce lo que has hecho,

¡Oh dromedaria desbocada!

Que corre de un lado a otro;°

24

    ¡Oh asna montesa habituada al 

desierto!

Que en su ardor° olfatea el viento;

¿Quién podrá reprimir su celo?

Los que la buscan no necesitan 

cansarse:

La encontrarán siempre encelada.

25

    Guarda tu pie de andar descalzo,

Y tu garganta de la sed;

Pero dijiste: ¡No hay remedio, no;

A extranjeros° he amado, y tras ellos 

he de ir!

26

    Como se avergüenza el ladrón 

cuando es sorprendido,

Así será avergonzada la casa° de 

Israel;

Sus reyes y sus príncipes,

Sus sacerdotes y sus profetas,

27

    Que dicen al leño: ¡Tú eres mi padre!

Y a la piedra: ¡Tú me has dado a luz!

Pues me han dado la espalda, y no 

la cara,

Pero en el tiempo de su desgracia 

me dicen:

¡Levántate y sálvanos!

28

    Pero, ¿dónde están los dioses que te 

hiciste?

¡Levántense y sálvente ellos en el 

tiempo de tu calamidad!

Pues como el número de tus 

ciudades, oh Judá,

Así ha sido el número de tus dioses.

29

    ¿Por qué contendéis conmigo,

Si todos os habéis rebelado contra 

mí?, dice YHVH.

2.17 Esto es, el camino en que anduvieron los israelitas después del éxodo.  2.18 Lit. Sihor. Prob. uno de los cauces orientales 

del Nilo (aunque en este v. se usa en referencia del principal río de Egipto). 

2.20 Esto es, árboles considerados sagrados, a 

cuya sombra se realizaban ritos idólatras. Generalmente estos árboles se encontraban en los lugares altos y estaban dedicados 

a alguna divinidad cananea (Baal o Asera, por ejemplo). 

2.20 En este contexto, prob. se refiere al acto de realizar movimientos 

obscenos o relacionados con la actividad sexual. 

2.20 El verbo fornicar, que generalmente alude a la actividad sexual ilícita, 

también se usa en pasajes como éste para referirse a dos tipos de relaciones prohibidas por Dios: 1)las relaciones políticas con 

naciones paganas (generalmente con el propósito de afirmar la seguridad nacional) 

→Ez.16.26, 28; y 2)las relaciones religio-

sas con otras divinidades, como en este pasaje (en un caso así, este verbo puede aludir también a ciertas prácticas sexuales 

propias de algunas religiones antiguas, como la prostitución sagrada). 

2.23 andar. Lit. tu camino. Forma figurada, que alude a 

la conducta, obras o carácter de una persona. 

2.23 valle. Prob. se refiere al valle de Ben-hinom, situado al sur de Jerusalem; 

tristemente famoso por ser el lugar donde los israelitas cometieron las peores abominaciones contra el Señor (allí se practicó, 

entre otros cultos idolátricos, la adoración al dios Moloc, que incluía sacrificios humanos. 

→7.31 ó 2 Cr.28.3). En todo caso, la 

determinación del sustantivo indica la referencia a un sitio concreto, bien conocido por los oyentes. 

2.23 Es decir, que corre sin 

dirección, impulsada por el celo

2.24 Lit. en el deseo de su alma. En expresiones como ésta, el término alma se usa sólo de 

forma idiomática. 

2.25 Aquí puede referirse tanto a divinidades de los pueblos circundantes como a naciones en las que Judá 

se apoyaba políticamente. 

2.26 LXX y Siríaca: los hijos


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Jeremías 3:10

767

30

    En vano he azotado a vuestros hijos:

Ellos no han recibido corrección.

Vuestra espada ha devorado a 

vuestros profetas,

Como un león destructor.

31

    ¡Oh generación, atended la palabra 

de YHVH!

¿He sido Yo un desierto para Israel?

¿O acaso una tierra de densas 

tinieblas?

¿Por qué dice mi pueblo:

Somos libres,° nunca más 

volveremos a ti?

32

    ¿Olvida acaso la doncella° su 

ornamento,

O la novia su ajuar?

Pues mi pueblo me ha olvidado un 

sinnúmero de días.

33

    ¡Qué bien sabes tu camino para 

buscar amores!

Por eso, aun a las malvadas has 

enseñado tus caminos.

34

    Hasta en los bordes de tu vestido 

hay sangre de almas de pobres 

inocentes,

A quienes no sorprendiste 

irrumpiendo.°

Y a pesar de todo, dices:

35

    Inocente soy, su ira se ha apartado 

de mí.

He aquí Yo entro en juicio contigo,

Porque dijiste: No he pecado.

36

    ¡Cuán frívola eres para cambiar de 

rumbo!

También serás avergonzada por 

Egipto,

Como fuiste avergonzada por Asiria.

37

    También de allí saldrás con las 

manos en la cabeza,

Porque YHVH ha desechado la base 

de tu confianza,

Y con ellos no prosperarás.

3

Suele decirse: Si un hombre repudia a 

su mujer, y ella se va de él y llega a ser 

de otro hombre,

¿Volverá él de nuevo a ella?

¿No quedará esa tierra del todo 

mancillada?

Y tú, que has fornicado con muchos 

amantes,

¿Volverás a mí?, dice YHVH.

2

    Alza tus ojos a los cerros desolados 

y mira:

¿Dónde no has sido gozada?°

Como un beduino° en el desierto,

Te sientas en los caminos, a su 

disposición,

Y tus infames fornicaciones° han 

mancillado la tierra.

3

    Los aguaceros eran retenidos,

Las lluvias tardías° no venían,

Y tú, ramera descarada,

Te negabas a avergonzarte.

4

    Ahora mismo me dices:

Tú eres mi Padre, mi amigo de 

juventud;

5

    Pensando:

No guardará rencor para siempre,

No estará indignado hasta el fin;

Pero sigues haciendo cuantas 

maldades están a tu alcance.

Exhortación al arrepentimiento

6

 En los días del rey Josías me dijo YHVH: 

¿Has visto lo que hace la apóstata Israel? 

Ella  anda  sobre  todo  monte  alto  y  bajo 

todo árbol frondoso, y allí fornica.

7

 Después de haber hecho todo esto, me 

dije, se volverá a mí, ¡pero no se volvió! Y 

Judá, su pérfida hermana,

8

 vio que Yo había despedido a la apósta-

ta Israel por sus adulterios y que le había 

dado carta de divorcio; y aun así, no tuvo 

temor Judá, su pérfida hermana, sino que 

también ella fue y se prostituyó.

9

 Y sucedió que a causa de que su forni-

cación le era liviana, se prostituyó con la 

piedra y con el leño, y profanó la tierra.

10

 Y ni con todo esto su pérfida hermana 

Judá se volvió a mí con corazón sincero, 

sino fingidamente, dice YHVH.

2.31  Lit.  vagamos.  Prob.  se  refiere  al  animal  que,  librado  del  yugo,  anda  de  un  lado  a  otro.  LXX:  no  seremos  gobernados

2.32 El término hebreo btulah designa a una joven casadera; aunque algunos léxicos proponen la palabra virgen para traducirlo 

(aún cuando en algunos contextos tal traducción puede ser acertada), hay que tener en cuenta que btulah no tiene un significado 

tan específico como el término castellano virgen (que sólo puede referirse a una persona que no ha tenido relaciones sexua-

les). 

2.34 Lit. en la irrupción. Se refiere al acto de forzar una puerta o de allanar una morada. 

→Ex.22.1.  3.2 Lit. violada. Los 

masoretas, que consideraban obsceno este verbo, corrigieron el texto para que se leyera dónde no te has acostado (se entiende, 

para tener relaciones sexuales). 

3.2 LXX: como un cuervo.  3.2 

→2.20.  3.3 Las que caen entre Marzo y Abril.


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Jeremías 3:11

768

11

 Y  me  dijo  YHVH:  La  apóstata  Israel 

se ha mostrado más justa° que la pérfida 

Judá.

12

    Ve y proclama estas palabras hacia el 

norte, y di:

¡Vuélvete, oh apóstata Israel!, dice 

YHVH.

No haré caer mi ira sobre vosotros,

Porque soy misericordioso, dice 

YHVH.

No estaré enojado para siempre.

13

    Sólo reconoce tu iniquidad,

Porque contra YHVH tu Dios te has 

rebelado,

Prodigaste tus caminos° a extraños° 

debajo de todo árbol frondoso,

Y no habéis escuchado mi voz, dice 

YHVH.

14

 Volveos,  oh  hijos  apóstatas,  dice 

YHVH, porque Yo soy vuestro dueño, y os 

tomaré, uno de cada ciudad y dos de cada 

familia, y os traeré a Sión;

15

 y os daré pastores conforme a mi co-

razón, que os pastoreen con ciencia y en-

tendimiento.

16

 Y sucederá que cuando os hayáis mul-

tiplicado e incrementado en la tierra en 

aquellos días, dice YHVH, no hablarán ya 

del Arca del Pacto de YHVH, ni les vendrá 

al  pensamiento,  ni  se  acordarán  más  de 

ella, ni la visitarán, ni se hará otra.

17

 En aquel tiempo Jerusalem será llama-

da Trono de YHVH, y serán reunidas a ella 

todas  las  naciones,  al  nombre  de  YHVH 

en  Jerusalem;  y  no  andarán  más  tras  la 

dureza de su malvado corazón.

18

 En aquellos días la casa de Judá anda-

rá con la casa de Israel, y juntas vendrán 

desde la tierra del norte a la tierra que di 

en posesión a vuestros padres.

19

    Pero Yo me decía:

¿Cómo podré poneros por hijos y 

daros la tierra deseable,

La más hermosa heredad de las 

naciones?

Entonces me dije: Me llamarás 

Padre mío,

Y no te apartarás de mí.

20

    Pero como una mujer que traiciona 

a su amante,

Así me habéis sido infieles, oh casa 

de Israel, dice YHVH.

21

    ¡Escuchad! Sobre los altos montes 

se oye el llanto suplicante de los 

hijos de Israel,

Que han torcido su camino,

Olvidados de YHVH, su Dios.

22

    ¡Volveos, oh hijos apóstatas,

Y sanaré vuestras apostasías!

¡Henos aquí! Hemos venido a ti,

Porque Tú, oh YHVH, eres nuestro 

Dios.

23

    Cierto, para engaño nos han sido los 

collados,

Y el tumulto de los montes.°

Ciertamente en YHVH nuestro Dios 

está la salvación de Israel.

24

    Aquella cosa vergonzosa° devoró el 

fruto del esfuerzo° de nuestros 

padres desde nuestra juventud:

Sus ovejas y sus vacas, sus hijos y 

sus hijas.

25

    Acostémonos, pues, en nuestra 

vergüenza,

Y aceptemos que nuestra afrenta nos 

cubra;

Porque nosotros y nuestros padres

Hemos pecado contra YHVH nuestro 

Dios,

Y desde nuestra juventud, y hasta 

este día,

No hemos obedecido la voz de YHVH 

nuestro Dios.

4

Oráculo  de  YHVH:  Cuando  quieras 

volver,° oh Israel, vuélvete a mí.

Si apartas de mí tus ídolos detestables,

Ya no vagarás de una parte a otra.°

2

    Entonces jurarás por la vida de 

YHVH,

En verdad, en derecho y en justicia,

Y las naciones se congratularán con 

Él,

Y en Él se gloriarán.°

3

    Porque así dice YHVH a los varones 

de Judá y a Jerusalem:

3.11 Lit. ha justificado más su alma.  3.13 Es decir, correr tras dioses extraños. O: has repartido tus favores (o accionesentre 

los extranjeros

3.13 Esto es, dioses adorados en Israel por influencia de los cananeos.  3.23 Se refiere al bullicio causado por 

las fiestas idolátricas en los lugares altos. 

→3.2, 6.  3.24 Heb. boshet. Alusión despectiva a Baal.  3.24 Esto es, ganancias o 

propiedades que una persona logra a través de su esfuerzo

4.1 Es decir, cuando quieras volver del cautiverio.  4.1 Es decir, ir en 

pos de dioses ajenos. 

4.2 Prob. referencia a las promesas mesiánicas hechas a los patriarcas. 

→Gn.12.3; 22.18; 26.4; 28.14. 


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Jeremías 4:20

769

Arad para vosotros en tierra virgen y 

no sembréis entre espinos.

4

    Circuncidaos ante YHVH, oh 

varones de Judá y habitantes de 

Jerusalem,

Y quitad el prepucio de vuestro 

corazón,

No sea que mi ira salga como fuego,

Y se encienda, y no haya quien la 

apague,

A causa de la maldad de vuestras 

acciones.

Anuncio de invasión

5

    Anunciadlo en Judá, proclamadlo en 

Jerusalem, y decid:

¡Resonad el shofar° en la tierra!

Gritad con todas las fuerzas y decid:

¡Congregaos para marchar a la 

ciudad fuerte!

6

    Alzad estandarte hacia Sión,

Buscad refugio aprisa, no os paréis;

Porque Yo traigo del norte la 

desgracia, una gran calamidad:

7

    De la espesura sube el león,°

El destructor de naciones está en 

marcha,

Partió de su lugar para convertir tu 

tierra en desolación;

Tus ciudades quedarán en ruinas, sin 

habitantes.

8

    Por eso, ceñíos de saco,° lamentaos 

y gemid;

Porque el ardor de la ira de YHVH

No se ha apartado de nosotros.

9

    Y sucederá en aquel día, dice YHVH,

Que desfallecerá el corazón del rey y 

el corazón de los príncipes,

Y los sacerdotes estarán atónitos y 

los profetas, consternados.

10

 (Dije yo entonces: ¡Ah, Adonay YHVH!, 

ciertamente permitiste° que este pueblo 

y  Jerusalem  fuera  engañado,  cuando  les 

decían:  ¡Tendréis  paz!,  pues  tenemos  la 

espada al cuello.)

11

 En aquel tiempo se dirá a este pueblo 

y a Jerusalem:

Un viento abrasador viene de las 

alturas del desierto a la hija de 

mi pueblo,

No para aventar ni para limpiar;

12

    Y un viento más fuerte todavía 

vendrá de mi parte,

Y Yo mismo daré ahora sentencia 

contra ella.

13

    Mirad: sube como las nubes,

Sus carros, como la tormenta;

Sus caballos son más ligeros que las 

águilas.

¡Ay de nosotros, porque estamos 

perdidos!°

14

    ¡Oh Jerusalem!, lava la maldad de tu 

corazón para que seas salva.

¿Hasta cuándo se aposentarán tus 

malos pensamientos dentro de ti?

15

    Porque una voz trae la noticia desde 

Dan,

Y anuncia la calamidad desde la 

serranía de Efraín.

16

    Anunciad a las naciones:

Ved, anunciad a Jerusalem:

¡Vienen sitiadores de tierras lejanas,

Y hacen resonar su voz contra las 

ciudades de Judá!

17

    Como guardas de campo la rodean,

Porque se ha rebelado contra mí, 

dice YHVH.

18

    Tus caminos y tus hechos te han 

procurado estas cosas,

Y éste es el fruto° de tu maldad;

Ciertamente es amargo,

Ciertamente alcanza hasta tu 

corazón.

19

    ¡Mis entrañas, mis entrañas!

Me duelen las fibras de mi corazón,

Mi corazón se agita dentro de mí,

No puede estarse quieto,

Por cuanto oíste, alma mía,

El sonido del shofar°

Y el clamor° de la guerra.

20

    Se anuncia golpe sobre golpe,

Porque toda la tierra está devastada;

Súbitamente son saqueadas mis 

tiendas,

4.5 Instrumento de viento hecho de un cuerno de carnero.  4.7 Esto es, Nabucodonosor.  4.8 Vestidura o tela áspera, general-

mente de color oscuro y hecha de pelo de cabra o de camello. La usaban aquellos que estaban de duelo o que querían expresar 

contrición, para lo cual se ceñían dicha tela sobre el cuerpo (dejando, generalmente, un hueco a la altura del pecho, para poder 

golpeárselo), o bien se sentaban o dormían sobre la misma. 

→4.3; 2 S.3.31; 2 R.6.30.  4.10 Es decir, que fuera engañado por los 

falsos profetas que le prometían paz

4.13 Lit. somos devastados.  4.18 .fruto.  4.19 

→4.5.  4.19 Esto es, gritos producidos 

durante la batalla.


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Jeremías 4:21

770

En un momento mis cortinas.°

21

    ¿Hasta cuándo tendré que ver la 

bandera y oír sonido del shofar?°

22

    Ciertamente mi pueblo es necio;

No me han conocido;

Hijos insensatos son,

No son entendidos;

Expertos para hacer el mal,

Pero nada saben de hacer el bien.

23

    Miré la tierra, y he aquí estaba 

desordenada y vacía,°

Y los cielos, y no había luz en ellos.

24

    Miré los montes, y he aquí 

temblaban,

Y todos los collados se estremecían.

25

    Miré, y no había hombre;

Y todas las aves del cielo° habían 

huido.

26

    Miré, y he aquí la tierra fértil era un 

desierto,

Y todas sus ciudades destruidas ante 

la presencia de YHVH,

Y ante el ardor de su ira.

27

    Porque así dice YHVH:

Toda esta tierra será asolada,

Pero no la destruiré del todo.°

28

    Por eso se enlutará la tierra y se 

oscurecerán° los cielos arriba;

Pues he hablado, lo he pensado,

Y no cambiaré de parecer ni 

desistiré de ello.

29

    Al estruendo de jinetes y de arqueros 

cada ciudad se pone en fuga,

Entran en la espesura y suben a los 

peñascos.

Todas las ciudades están 

abandonadas,

No queda en ellas morador alguno.

30

    Y una vez° desolada, ¿qué harás tú?

Aunque te vistas de escarlata,

Aunque te engalanes con adornos 

de oro,

Aunque te pintes los ojos con 

antimonio,°

En vano querrás embellecerte:

Tus amantes te desprecian; buscan 

tu vida.°

31

    Oigo gritos como de parturienta,

Sollozos como de primeriza:

Es el grito angustiado de la hija de 

Sión que está agonizando,°

Que extiende sus brazos, y dice: ¡Ay 

de mí!

¡Mi alma desmaya a causa de los 

asesinos!

Impiedad de Judá

5

 Recorred las calles de Jerusalem,

Y mirad, e informaos, y buscad por 

sus plazas,

Si podéis hallar un hombre,

Si hay uno solo que haga justicia,

Que busque la verdad,

Y Yo la perdonaré.

2

    Pues aun cuando digan:

¡Vive YHVH!, sin embargo juran 

falsamente.

3

    ¡Oh YHVH!, ¿acaso tus ojos no 

buscan° la verdad?

Los castigaste, pero no se dolieron,°

Los consumiste, pero se negaron a 

recibir corrección.

Endurecieron sus rostros más que 

la roca,

Rehúsan volverse a ti.

4

    Entonces yo dije: Ciertamente éstos 

son pobres,

Han enloquecido, porque no 

conocen el camino de YHVH,

El juicio° de su Dios.

5

    Iré a los grandes y hablaré con ellos,

Porque ellos conocen el camino de 

YHVH,

El juicio de su Dios.

Pero todos ellos habían quebrado el 

yugo,

Habían roto las coyundas.

6

    Por tanto el león del bosque los 

mata,

El lobo del desierto los destruye;

El leopardo acecha en torno a sus 

ciudades,

Cualquiera que salga de ellas será 

despedazado,

Porque sus transgresiones son 

muchas,

4.20 Es decir, mi tabernáculo o morada.  4.21 

→4.5.  4.23 →Gn.1.2.  4.25 Lit. de los cielos.  4.27 Lit. pero no haré una des-

trucción completa

4.28 Aquí, el verbo oscurecerse debe ser entendido como un sinónimo de hacer duelo, estar de luto 

→8.21. 

4.30 .una vez.  4.30 Lit. aunque rasgues tus ojos con antimonio.  4.30 Lit. alma.  4.31 Lit. respira con dificultad.  5.3 .buscan.  5.3 

Lit. no se retorcieron

5.4 Heb. mishpat = juicio. Refiere de forma general a las ordenanzas o leyes promulgadas por Dios.


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Jeremías 5:25

771

Y son agravadas sus reincidencias.

7

    ¿Cómo podré perdonarte esto?

Tus hijos me han abandonado,

Y juran por lo que no es Dios.

Los sacié, y cometen adulterio 

acudiendo en tropel a casa de la 

ramera.

8

    Son caballos lascivos° bien 

alimentados,°

Cada cual relincha tras la mujer de 

su prójimo.

9

    ¿No he de visitar por estas cosas? 

dice YHVH,

¿Y de una nación semejante no ha de 

vengarse mi alma?

10

    ¡Escalad sus muros y destruid!, pero 

no la destruyáis del todo.°

¡Arrancad sus sarmientos,

Porque no son de YHVH!

11

    Porque muy traidoramente se ha 

portado conmigo la casa de Israel 

y la casa de Judá, dice YHVH.

12

    Renegaron de YHVH diciendo: 

¡No hay tal!,° no vendrá sobre 

nosotros la calamidad;

Ni tampoco veremos espada ni 

hambre;

13

    Los profetas no son más que viento,°

Y no hay oráculo con ellos,

¡Que así se les haga a ellos!

14

    Por eso, así dice YHVH ’Elohim 

Sebaot:

Por cuanto han dicho tal cosa,

Haré que mi palabra sea fuego en tu 

boca que consumirá a ese pueblo 

como leña.

15

    He aquí Yo traigo contra vosotros, 

oh casa de Israel, una nación 

lejana, dice YHVH.

Nación perenne, nación antigua es,

Nación cuya lengua no conoces, ni 

entenderás lo que diga.

16

    Su aljaba es un sepulcro abierto,

Todos ellos implacables.

17

    Devorarán tu mies y tu pan;

Devorarán a tus hijos y a tus hijas;

Devorarán tus rebaños y vacadas;

Devorarán tus viñas y tus higueras,

Y destruirán a espada tus ciudades 

fortificadas,

En las cuales has puesto tu 

confianza.

18

    Pero ni aun en aquellos días, dice 

YHVH,

Haré en vosotros un exterminio 

completo.°

19

    Y sucederá, cuando preguntareis:

¿Por qué causa trae YHVH nuestro 

Dios estas cosas sobre nosotros?

Que les responderás:

Así como me habéis abandonado,

Y habéis servido a dioses extraños en 

vuestra tierra,

Así serviréis a los extraños en una 

tierra que no es vuestra.

20

    Declarad esto en la casa de Jacob,

Y proclamadlo en Judá, diciendo:

21

    ¡Oíd ahora esto, pueblo insensato y 

sin corazón,

Que tiene ojos y no ve,

Que tiene oídos y no oye!

22

    ¿No me temeréis a mí?, dice YHVH;

¿No temblaréis ante mi presencia,

Yo, que pongo la arena como límite 

al mar,

Estatuto perpetuo que no puede 

traspasar?

Aunque se agiten sus olas,

No pueden prevalecer,

Aunque rujan sus olas, no lo 

traspasan.

23

    Pero este pueblo tiene un corazón 

obstinado y rebelde;

Han apostatado y se han ido.

24

    Y no dicen en su corazón:

Temamos ya a YHVH nuestro Dios,

Aquel que nos daba las lluvias,

Las tempranas° y las tardías,° en su 

tiempo,

Reservando para nosotros las 

semanas establecidas para la 

siega.°

25

    Vuestras iniquidades han alejado 

estas cosas,

Y vuestros pecados han apartado de 

vosotros el bien.

5.8 lascivos. Prob. traducción de un término que sólo aparece en este v., cuyo significado se infiere del contexto, y de otras lenguas 

semíticas. 

5.8 Véase nota anterior.  5.10 Es una orden para los babilonios.  5.12 Esto es, no la negación de la existencia de Dios, 

sino del Dios que predican los profetas del Señor, el cual anuncia castigos y calamidades contra su pueblo rebelde. En tiempos de 

Jeremías era muy común la actividad de los falsos profetas. 

5.13 Lit. han llegado a ser viento.  5.18 Lit. no haré con vosotros una 

destrucción total

5.24 Entre Octubre y Noviembre.  5.24 Entre Marzo y Abril.  5.24 Lit. semanas de estatutos de siega.


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Jeremías 5:26

772

26

    Porque en medio de mi pueblo se 

hallan impíos;

Acechan como acechan los 

pajareros,°

Ponen trampas, atrapan hombres.

27

    Como una jaula llena de pájaros,

Sus casas están llenas de engaño.

Por eso se han engrandecido y 

enriquecido,

28

    Se han puesto gordos y lustrosos,

Y han traspasado los límites del mal:

No defienden la causa,

La causa del huérfano,

Para que prospere,

Ni mantienen el derecho del pobre.

29

    ¿Y no he de visitar Yo por estas 

cosas?, dice YHVH,

¿De una nación semejante no ha de 

vengarse mi alma?

30

    Cosa espantosa y horrible se hace en 

la tierra:

31

    Los profetas profetizan mentira y 

los sacerdotes gobiernan bajo su 

dirección,°

Y mi pueblo así lo quiere.

Pero, ¿qué haréis al final de ello?

Visión del asedio

6

  ¡Huid de Jerusalem,

Oh hijos de Benjamín!

¡Soplad el shofar en Tecoa;

Alzad señal sobre Bet-haquerem,

Porque una calamidad,

Una gran destrucción se asoma del 

norte!

2

    ¡A la hermosa y deleitable,

He reducido al silencio, a la hija de 

Sión!

3

    Hacia ella acuden pastores con sus 

rebaños;

Junto a ella plantan sus tiendas en 

derredor,

Cada uno apacienta en su lugar.

4

    ¡Proclamad guerra santa° contra 

ella!

¡Levantaos, y ataquemos al 

mediodía!

¡Ay de nosotros, porque el día 

declina,

Porque se extienden las sombras de 

la tarde!

5

    Levantaos, pues, ataquemos 

de noche y destruyamos su 

ciudadela.

6

    Porque así dice YHVH Sebaot:

¡Cortad árboles,

Levantad terraplenes contra 

Jerusalem!

¡Ésta es la ciudad que debe ser 

visitada;°

Toda ella está llena de opresión!

7

    Como manantial que brotan sus 

aguas,

Así ella brota su maldad:

Violencia y rapiña se oyen en ella.

Delante de mí continuamente están 

sus enfermedades y sus heridas.

8

    ¡Corrígete, oh Jerusalem,

No sea que mi alma se aparte de ti,

No sea que te haga una asolación en 

tierra no habitada!

9

    Así dice YHVH Sebaot:

Rebuscarán completamente el resto 

de Israel cual rebuscos de una 

vid:

¡Vuelve otra vez tu mano a los 

sarmientos,

Como quien recoge las uvas!

10

    ¿A quiénes tendré que hablar y 

testificar para que escuchen?

He aquí que sus oídos son 

incircuncisos,

Y no pueden escuchar:°

He aquí que la palabra de YHVH 

ha venido a ser un oprobio para 

ellos;

No tienen deleite en ella.

11

    Por tanto, estoy lleno de la ira de 

YHVH,

Cansado estoy de refrenarme.

Derrámala sobre los niños en la 

calle,

Y asimismo sobre la reunión° de los 

mancebos,

Porque hasta el marido y la mujer 

serán aprisionados,

El anciano y aquél que está lleno de 

días.

5.26 Lit. acechan conforme el agacharse de cazadores.  5.31 Lit. en las manos de ellos. Es decir, bajo la dirección de los antes 

profetas mencionados. 

6.4 Lit. santificad guerra. Preparación de los ejércitos para la guerra mediante ciertos rituales religio-

sos. 

6.6 Heb. ha-peqad. Aquí, visitar = castigar.  6.10 Lit. prestar atención.  6.11 Se refiere a un grupo de amigos íntimos. 


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Jeremías 6:29

773

12

    Y sus casas serán entregadas a otros,

Juntamente con sus campos y sus 

mujeres,

Porque extenderé mi mano contra 

los habitantes de esta tierra, dice 

YHVH.

13

    Pues desde el más pequeño hasta el 

más grande,

Todos ellos codician ganancias 

deshonestas;

Y desde el profeta hasta el sacerdote,

Todos ellos practican el engaño,

14

    Y livianamente curan la llaga de mi 

pueblo,

Diciendo: ¡Paz! ¡Paz!, cuando no hay 

paz.

15

    ¿Acaso se avergüenzan cuando 

cometen abominaciones?

¡No!, ciertamente de nada se 

avergüenzan,

Ni aun saben ruborizarse.

Por tanto caerán entre los que caen,

Al tiempo en que Yo los visite,

Serán derribados, dice YHVH.

16

    Así dice YHVH:

Deteneos en medio de los caminos, 

y mirad;

Y preguntad por los senderos 

antiguos,

Y dónde está el camino bueno, y 

andad por él,

Y hallad descanso para vuestras 

almas.

Pero ellos dijeron: ¡No andaremos 

en él!

17

    Puse también sobre vosotros° 

atalayas, que os decían:°

¡Oíd el sonido del shofar!

Pero ellos dijeron: ¡No oiremos!

18

    Por tanto, ¡oíd, naciones,

Entended, oh congregación de 

pueblos,

Lo que Yo haré entre ellos!

19

    ¡Oye, oh tierra!

He aquí traigo el mal sobre este 

pueblo,

El fruto de sus pensamientos,

Porque no escucharon mis palabras,

Y desecharon mi Ley.

20

    ¿Para qué viene a mí este incienso 

de Sabá,

O la caña aromada de países lejanos?

Vuestros holocaustos no me son 

aceptos,

Y vuestros sacrificios no me 

agradan.

21

    Por tanto, así dice YHVH:

He aquí Yo pongo tropiezos delante 

de este pueblo,

Y en ellos tropezarán juntos padres 

e hijos;

El vecino también y el amigo, y 

perecerán.

22

    Así dice YHVH:

He aquí viene un pueblo de la tierra 

del norte;

Sí, una nación grande es despertada 

de los confines de la tierra;

23

    Empuñan el arco y la jabalina;

Son crueles; no tienen misericordia.

Su voz brama como el mar,

Vienen montados sobre caballos,

Como un solo hombre de guerra,

Dispuestos contra ti, ¡oh hija de 

Sión!

24

    ¡Oímos su fama y se debilitan 

nuestras manos!

¡La angustia se apodera de nosotros,

Y dolores, como de la que da a luz!

25

    No salgáis al campo, ni andéis por el 

camino,

Pues allí está la espada del enemigo,

Y hay terrores por doquier.

26

    ¡Cíñete con saco° y revuélcate en la 

ceniza,

Oh hija de mi pueblo!

Haz duelo como por un hijo único,

Lamento de gran amargura,

Porque viene súbitamente el 

destructor sobre nosotros.

27

    Te he puesto entre mi pueblo como 

vigía y quilatador:°

Conoce, pues, y examina el camino 

de ellos.

28

    Todos son rebeldes obstinados,

Y propalan calumnias;

Todos son bronce y hierro de mala 

calidad.

29

    Resopla el fuelle,

El fuego consume el plomo,

6.17 Otros mss. registran sobre ellos.  6.17 .que os decían.  6.26 

→4.8.  6.27 Esto es, experto en fundición, que separa los 

metales preciosos de la escoria. 


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Jeremías 6:30

774

Pero en vano refina el refinador,

Pues la escoria no se desprende.

30

    Plata reprobada serán llamados,

Porque YHVH los ha desechado.

Obediencia antes que sacrificios

7

Oráculo  que  tuvo  Jeremías  de  parte 

YHVH, que decía:

2

 Ponte en la puerta de la Casa de YHVH, 

y  proclama  allí  esta  palabra.  Di:  ¡Oíd  el 

oráculo de YHVH, todos los habitantes de 

Judá  que  entráis  por  estas  puertas  para 

postrarse ante YHVH!

3

 Así  dice  YHVH  Sebaot,  Dios  de  Israel: 

¡Enmendad  vuestros  caminos  y  vuestras 

obras y os dejaré habitar en este lugar!

4

 No confiéis en palabras engañosas, que 

dicen:  ¡Casa  de  YHVH,  Casa  de  YHVH, 

Casa de YHVH es ésta!

5

 Porque si enmendáis perfectamente vues­

tros caminos y vuestras obras, si en verdad 

administráis justicia entre el hombre y su 

prójimo,

6

 y no oprimís al extranjero, al huérfano 

y a la viuda, ni derramáis sangre inocente 

en este lugar, ni andáis tras otros dioses 

para vuestro propio perjuicio,

7

 entonces os dejaré habitar en este lugar, 

en la tierra que di a vuestros padres desde 

siempre y para siempre.

8

 He aquí que os confiáis en palabras en­

gañosas que no aprovechan.

9

 Robando,  asesinando  y  adulterando,  y 

jurando en falso, y quemando incienso a 

Baal, y andando tras otros dioses que no 

habíais conocido,

10

 ¿vendréis y os pondréis ante mí en esta 

Casa, sobre la cual es invocado mi Nom­

bre,  y  diréis:  Somos  libres  (para  seguir 

haciendo tales abominaciones)?

11

 ¿Acaso  esta  Casa,  sobre  la  cual  es 

invocado  mi  Nombre,  es  una  cueva  de 

ladrones  ante  vuestros  ojos?°  He  aquí 

que  Yo,  sí,  Yo  mismo  lo  he  visto,  dice 

YHVH.

12

 Ahora pues, id a mi lugar que estaba 

en Silo, donde hice morar mi Nombre al 

principio,° y ved lo que hice con él por la 

maldad de mi pueblo Israel.

13

 Ahora pues, por haber cometido tales 

acciones,  dice  YHVH,  y  por  cuanto  os 

hablé madrugando y sin cesar, y no qui­

sisteis  escuchar,  y  os  llamé,  y  no  habéis 

respondido,

14

 haré  con  esta  Casa,  sobre  la  cual  es 

invocado mi Nombre (en la que vosotros 

estáis confiados), y con el lugar que os di 

a vosotros y a vuestros padres, lo mismo 

que hice con Silo,

15

 y os echaré de mi presencia, así como 

eché a todos vuestros hermanos, a toda la 

descendencia de Efraín.

16

 Y tú, no intercedas por este pueblo, ni 

levantes  clamor  por  ellos  ni  oración,  ni 

me ruegues, porque no te oiré.

17

 ¿Acaso  no  ves  lo  que  están  haciendo 

en las ciudades de Judá y en las calles de 

Jerusalem?

18

 Los hijos recogen leña, los padres en­

cienden fuego, y las mujeres preparan la 

masa  para  hacer  tortas  en  honor  de  la 

reina de los cielos, y para provocarme a 

ira derraman libaciones a dioses extran­

jeros.

19

 ¿A mí me provocan a ira? dice YHVH, 

¿Acaso  no  actúan  para  su  propia  ver­

güenza?

20

 Por  eso,  así  dice  Adonay  YHVH:  He 

aquí mi ira y mi ardiente indignación son 

derramados sobre este lugar, sobre hom­

bres y bestias, sobre los árboles del campo 

y sobre los frutos de la tierra. Se encende­

rá y no se apagará.

La rebelión de Judá

21

 Así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel: 

¡Juntad  vuestros  holocaustos  a  vuestros 

sacrificios, y comed la carne!

22

 Porque nada dije a vuestros padres, ni 

nada les mandé en el día en que los saqué 

de la tierra de Egipto respecto a holocaus­

tos y sacrificios.

23

 Sino que les mandé, diciendo: Escuchad 

mi voz y Yo seré vuestro Dios y vosotros se­

réis mi pueblo;° andad en todo el camino 

que os he ordenado para que os vaya bien.°

24

 Pero  no  escucharon  ni  inclinaron  su 

oído,  sino  que  caminaron  en  la  dureza 

7.11 Esto es, cualquier clase de personas violentas.  7.12 En Silo fue erigido el Tabernáculo de Reunión después de la conquista 

de Canaán 

→Jos.18, y allí estuvo hasta tiempos del sacerdote Elí →1 S.1.3.  7.23 Lit. y Yo llegaré a ser Dios para vosotros, y 

vosotros llegaréis a ser pueblo para mí

7.23 

→Ex.6.6,7; 19.5, 6. 


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Jeremías 8:9

775

de su malvado corazón, según su propio 

consejo, y fueron hacia atrás y no hacia 

delante.

25

 Desde el día en que vuestros padres sa-

lieron de la tierra de Egipto hasta hoy, os 

he enviado a todos mis siervos los profe-

tas, madrugando cada día sin cesar os los 

he enviado.

26

 Pero no me escucharon ni inclinaron 

su oído, sino que endurecieron su cerviz 

y fueron peores que sus padres.

27

 Tú pues, les dirás todas estas palabras, 

pero  no  te  escucharán;  y  los  llamarás, 

pero no te responderán.

28

 Entonces les dirás: ¡Ésta es la nación 

que no escucha la voz de YHVH su Dios, 

ni  admite  corrección!  Ya  pereció  la  ver-

dad, y ha sido desterrada de su boca.

29

 ¡Corta  tus  guedejas  y  échalas  de  ti,  y 

levanta  endechas  sobre  las  alturas!  por-

que YHVH ha desechado y repudiado a la 

generación objeto de su ira.

30

 Por cuanto los hijos de Judá han he-

cho  lo  malo  ante  mis  ojos,  dice  YHVH, 

han  puesto  sus  ídolos  detestables  en  la 

Casa sobre la cual es invocado mi Nom-

bre, para profanarla,

31

 y  han  edificado  los  lugares  altos  de 

Tófet,°  que  están  en  el  valle  de  Ben-Hi-

nom,° para quemar a sus hijos y a sus hi-

jas en el fuego, cosa que Yo no les mandé, 

ni ha subido a mi corazón.°

32

 Por  tanto,  he  aquí  vienen  días,  dice 

YHVH, en que no será llamado más Tófet 

ni  Valle  de  Ben-Hinom,  sino  Valle  de  la 

Matanza, porque sepultarán en Tófet has-

ta no haber lugar.

33

 Y  los  cadáveres  de  este  pueblo  servi-

rán  de  pasto  a  las  aves  de  los  cielos  y  a 

las bestias de la tierra, y no habrá quien 

las espante.

34

 Y en las ciudades de Judá y en las calles 

de Jerusalem, haré cesar la voz de gozo y 

la voz de alegría, la voz del novio y la voz 

de  la  novia,  porque  esta  tierra  vendrá  a 

ser una desolación.

8

En aquel tiempo, dice YHVH, sacarán 

de sus sepulcros los huesos de los re-

yes de Judá, los huesos de sus príncipes, 

los  huesos  de  los  sacerdotes,  los  huesos 

de los profetas y los huesos de los mora-

dores de Jerusalem,

2

 y los esparcirán ante el sol, ante la luna 

y ante todo el ejército de los cielos, a quie-

nes aman y rinden culto, a quienes siguen 

y consultan, y ante quienes se postran. No 

serán  recogidos  ni  sepultados;  quedarán 

como estiércol sobre la faz de la tierra.

3

 Y el remanente que quede de toda esta 

perversa familia, preferirá la muerte antes 

que la vida, en todos los lugares a donde 

Yo habré arrojado a los que queden, dice 

YHVH Sebaot.

4

 Y les dirás: Así dice YHVH:

El que cae, ¿no se levanta?

El que se desvía, ¿no se devuelve?

5

    ¿Por qué apostata este pueblo?

¿Es Jerusalem apóstata perpetua?

Se aferran al engaño, rehúsan volver.

6

    He estado atento y he escuchado:

No hablan rectamente,

No hay quien se arrepienta de su 

maldad, y diga: ¿Qué he hecho?

Cada cual se vuelve a su carrera,

Como corcel desbordado en la 

batalla.

7

    Aun la cigüeña en los cielos conoce 

sus tiempos;°

La tórtola, la golondrina y la 

grulla guardan la época de su 

migración,

Pero mi pueblo no conoce la justicia 

de YHVH.

8

    ¿Cómo podéis decir: Somos 

sabios; la Ley de YHVH está con 

nosotros?

Cuando la pluma engañosa del escriba 

la ha convertido en mentira.°

9

    Los sabios están avergonzados,

Turbados y atrapados:

Rechazaron con desprecio la palabra 

de YHVH,

7.31 Lugar donde los niños eran ofrecidos a Moloc a través del fuego.  7.31 El valle de Ben-Hinom estaba situado al S de 

Jerusalem, y llegó a ser conocido como el lugar donde los habitantes de Judá cometieron las peores abominaciones contra el 

Señor. Allí hubo un lugar alto conocido como Tófet, donde los israelitas llegaron a sacrificar a sus propios hijos al dios Moloc 

→2 R.16.3. El rey Josías destruyó este lugar y lo convirtió en un crematorio →2 R.23.10, basurero que, más adelante, sería 

conocido  como  Gehena 

→Mt.5.22.  7.31 Es decir, ni me vino al pensamiento.  8.7 Esto es, el tiempo de sus migraciones

8.8 Esto es, los sacerdotes y falsos profetas que enseñan al pueblo prácticas contrarias a la Ley. La alusión a la pluma engañosa 

de los escribas prob. refiere la práctica de registrar interpretaciones con el propósito de darles autoridad bíblica.


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Jeremías 8:10

776

¿Qué sabiduría, pues, podrá haber en 

ellos?

10

    Por tanto daré a otros sus mujeres,

Y sus campos a los conquistadores,

Porque desde el pequeño hasta el 

grande,

Todos ellos son dados a ganancias 

deshonestas,

Desde el profeta hasta el sacerdote,

Todos ellos practican el engaño.

11

    Pretenden curar con ligereza el 

quebrantamiento de mi pueblo,

Diciendo: ¡Paz! ¡Paz! cuando no hay 

paz.

12

    ¿Se avergüenzan cuando cometen 

abominaciones?

Ni se avergüenzan ni conocen el 

sonrojo.

Pues caerán con los demás caídos,

Tropezarán el día de su visitación, 

dice YHVH.

13

    ¡De cierto acabaré con ellos!, dice 

YHVH.

No habrá racimos en la vid, ni higos 

en la higuera;

Hasta las hojas se habrán 

marchitado,

Y lo que les di pasará de ellos.°

14

    ¿Qué hacemos aquí sentados?

Reunámonos y entremos en las 

plazas fuertes y perezcamos allí,

Porque YHVH nuestro Dios nos deja 

morir,

Nos ha dado a beber agua 

envenenada,

Porque hemos pecado contra YHVH.

15

    Esperábamos la paz, y no hubo bien 

alguno;

Tiempo de sanidad, y he aquí el 

terror.

16

    Desde Dan se oye el resoplar de los 

caballos;

Al estruendo del relincho de sus 

fuertes corceles° se estremece la 

tierra.

Llegan° y devoran la tierra con sus 

habitantes,

La ciudad con sus vecinos.

17

    Yo envío contra vosotros serpientes 

venenosas,

Contra las que no valdrá el 

encantamiento,

Y os morderán mortalmente, dice 

YHVH.

Participación en la aflicción

18

    Aunque tenga consuelo en la 

aflicción,°

Mi corazón desfallece dentro de mí,

19

    Al oír el lamento de la hija de mi 

pueblo desde una tierra lejana:

¿No está YHVH en Sión?

¿No está en ella su Rey?

¿Por qué me habéis provocado con 

imágenes esculpidas,

Con vanidades extrañas?

20

    Pasó la siega, se acabó el verano,

Y nosotros no hemos sido salvados.

21

    Por la llaga de la hija de mi pueblo 

estoy quebrantado,

Me visto de luto,° atenazado de 

espanto.

22

    ¿No hay bálsamo en Galaad?

¿No hay médicos allí?

¿Por qué, entonces, no se cierran las 

heridas de la hija de mi pueblo?

9

 ¡Quién me diera que mi cabeza fuera 

  agua,

Y mis ojos manantiales de lágrimas,

Para llorar día y noche

Por los muertos de la hija de mi 

pueblo!

2

    ¡Quién me diera en el desierto un 

albergue de caminantes,

Para abandonar a mi pueblo,

Para alejarme de ellos!

Porque todos ellos son adúlteros,

Congregación de traidores.

3

    Tensan su lengua como arco suyo,

Lanzan mentiras,

Y la verdad no prevalece en la tierra,

Porque proceden de mal en mal,

Y a mí no me conocen, dice YHVH.

4

    ¡Cuídese cada uno de su prójimo!

No tenga confianza en ningún 

hermano,

8.13 Esto es, quien los arrolle, o quien conquiste su tierra.  8.16 .corceles.  8.16 Esto es, los enemigos.  8.18 Lit. mi fuente 

de gozo en mí, tristeza

8.21 Lit. me he oscurecido. En contextos como éste, este verbo se usa de forma figurada para aludir 

a personas que hacen duelo, las cuales, por su aspecto (descuidado) y por las ropas que usan (generalmente de color negro), 

parecen haberse oscurecido.


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Jeremías 9:23

777

Porque todo hermano suplanta,

Y todo prójimo anda calumniando.

5

    Cada uno engaña a su compañero, y 

no habla verdad;

Han adiestrado su lengua a la 

mentira,

Y se pervierten hasta el cansancio.

6

    Tu morada° está en medio del 

engaño,

Y a causa del engaño, se niegan a 

conocerme, dice YHVH.

7

    Por tanto, así dice YHVH Sebaot:

He aquí que Yo los acrisolo y los 

pruebo,

¿Qué más podría Yo hacer por la hija 

de mi pueblo?

8

    Su lengua es cual saeta mortífera 

que habla engaño.

Con su boca hablan paz con su 

prójimo,

Pero dentro de sí colocan su 

emboscada.

9

    ¿Y no he de visitar por estas cosas? 

dice YHVH;

De semejante nación, ¿no se vengará 

mi alma?

10

    Por los montes alzaré mi lloro y mi 

lamento,

Y una endecha por los pastos del 

desierto,

Porque están quemados y no hay 

quien pase,

Ni se oye el bramido de ganado;

Desde las aves de los cielos hasta las 

bestias,

Todo ha huido, todo se ha ido.

11

    Reduciré Jerusalem a montones de 

escombros,

La convertiré en cubil de chacales,

Y a las ciudades de Judá en 

desolación sin habitante.

Anuncio de la dispersión

12

    ¿Quién es el hombre sabio que 

entienda esto?

¿Y a quien ha hablado la boca de 

YHVH,

Para que lo declare?

¿Por qué ha perecido la tierra,

Ha sido abrasada como el desierto, y 

no hay quien pueda pasar?

13

 Y YHVH mismo ha dicho: Por cuanto 

han abandonado mi Ley, que puse delante 

de ellos, y no han escuchado mi voz, ni 

han andado conforme a ella,

14

 sino que han andado tras la dureza de 

su corazón y tras los baales que les ense-

ñaron sus padres.

15

 Por tanto, así dice YHVH Sebaot, Dios 

de Israel: He aquí, Yo daré a comer a este 

pueblo ajenjo, y les daré a beber aguas ve-

nenosas.

16

 Y los esparciré entre naciones que ni 

ellos ni sus padres conocieron, y enviaré 

tras ellos la espada hasta exterminarlos.

17

 Así dice YHVH Sebaot:

Poned atención y llamad a las 

plañideras para que vengan;

Enviad por las que son diestras para 

que vengan;

18

    Que se apresuren a levantar el llanto 

sobre nosotros;

Para que nuestros ojos se deshagan 

en lágrimas,

Y nuestros párpados destilen agua.

19

    Porque de Sión fue oída voz de 

endecha:

¡Cómo hemos sido destruidos!

¡Cómo hemos sido avergonzados!

Hemos tenido que abandonar la 

tierra,

Y nuestras moradas han sido 

destruidas.

20

    ¡Oíd pues, oh mujeres, el oráculo de 

YHVH,

Y reciba vuestro oído la palabra de 

su boca!

Enseñad endechas a vuestras hijas,

Y cada cual a su compañera la 

lamentación.

21

    Porque la Muerte ha subido por 

nuestras ventanas,

Ha entrado en nuestros palacios,

Ha arrebatado al niño en la calle,

Y a los muchachos en las plazas.

22

    Di: Así dice YHVH:

Los cadáveres caerán como estiércol 

sobre la faz del campo,

Como gavilla detrás del segador,

Y no habrá quien los recoja.

23

    Así dice YHVH:

No se alabe el sabio en su sabiduría,

9.6 Esto es, de Jeremías.


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Jeremías 9:24

778

Ni se alabe el valiente en su valentía,

Ni se alabe el rico en sus riquezas.

24

    Sino alábese en esto el que se haya 

de alabar:

En entenderme y conocerme,

Que Yo soy YHVH,

Que hago misericordia,

Juicio y justicia en la tierra,

Porque estas cosas quiero, dice 

YHVH.

25

    He aquí que vienen días, dice YHVH,

En que castigaré a todo circunciso 

con todo incircunciso:°

26

    A Egipto, a Judá y a Edom,

A los hijos de Amón y a Moab,

Y a todos los que se rapan las sienes,°

Y a los habitantes del desierto;

Porque todas las naciones son 

incircuncisas,

Y toda la casa de Israel, incircuncisa 

de corazón.

Los dioses de las naciones

10

¡Oíd la palabra que os dice YHVH, 

oh casa de Israel!

2

 Así dice YHVH:

No aprendáis el camino de las 

naciones,

Ni os turbéis por las señales de los 

cielos,

Aunque los gentiles se turben por 

ellas.

3

    Porque las costumbres de los 

pueblos son vanidad:

Pues se corta un árbol del bosque,

La mano de artífice lo labra con 

herramienta,

4

    Lo adorna con plata y oro,

Lo sujetan con clavos y martillos 

para que no se tambalee.

5

    Son° como poste en un pepinar:°

No hablan,

Y ciertamente tienen que ser 

cargados,

Porque no pueden andar.

No tengáis temor de ellos,

Porque ni pueden hacer mal,

Ni para hacer bien tienen poder.

6

    ¡Oh YHVH, no hay nadie como Tú!

¡Grande eres, y grande es tu Nombre 

en poder!

7

    ¿Quién no quisiera temerte,

Oh Rey de las naciones?

Solo a ti te corresponde,°

Porque entre todos los sabios de las 

naciones,

Y entre toda su dignidad real,

Ninguno hay comparable a ti.

8

    A una se hacen necios e insensatos,°

Porque doctrina vana es el leño.

9

    Se trae plata laminada de Tarsis y 

oro de Ufaz;

Se labra por el artífice,

Se labra por mano del fundidor,

De azul y de púrpura° es su vestido:

Todo ello hechura de hábil artesano.°

10

    Pero YHVH es el Dios verdadero;

¡Él es el Dios viviente y el Rey 

eterno!

Por su ira se estremece la tierra,

Y las naciones no pueden soportar 

su indignación.

11

    Les diréis así:

Los dioses que no hicieron los cielos 

ni la tierra

Perecerán de sobre la tierra y de 

debajo de los cielos.°

12

    Él es el que hizo la tierra con su 

poder,

El que estableció el mundo con su 

sabiduría,

Y extendió los cielos con su 

inteligencia.

13

    Cuando eleva su voz, hay un 

tumulto de aguas en los cielos,

Y eleva los vapores° de los extremos 

de la tierra.

Hace los relámpagos para la lluvia,

Y saca de sus tesoros el viento.

14

    Necio el hombre que no sabe esto.

9.25 Lit. a todo circuncidado con prepucio.  9.26 Lit. los que se cortan las puntas. Es decir, las puntas del cabello y de la 

barba. Costumbre propia de algunas tribus del desierto de Arabia (costumbre que Dios había prohibido practicar a su pueblo) 

→Lv.19.27.  10.5 Esto es, los ídolos.  10.5 Prob. poste usado como espantapájaros.  10.7 Es decir, el ser temido →32.40. 

10.8 Esto es, los idólatras.  10.9 Gama desde el rojo brillante hasta el violeta intenso.  10.9 .artesano.  10.11 Es notable des-

tacar que, entre todas las profecías de Jeremías, esta precisamente no está escrita en hebreo sino en arameo, por cuanto es 

un mensaje dirigido a los gentiles y a sus dioses por el único Dios, el Dios de Israel. Asimismo las porciones del libro de Daniel 

dirigidas a los gentiles están en arameo, mientras que las concernientes a Israel están en hebreo. 

10.13 Esto es, los vapores 

que forman las nubes


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Jeremías 11:10

779

Cada fundidor será avergonzado en 

su misma escultura,

Porque sus imágenes de fundición 

son mentira,

Y no hay hálito en ellas.

15

    Obras vanas y ridículas,°

Que perecerán en el tiempo de su 

visitación.

16

    La porción de Jacob no es parecida 

a ellas,

Porque Él es el Hacedor de todas las 

cosas,

E Israel es la tribu de su heredad.

¡YHVH Sebaot es su nombre!

Asolamiento de Judá

17

    ¡Recoge de tu tierra tu bagaje,

Oh tú que habitas dentro del asedio!

18

    Porque así dice YHVH:

He aquí esta vez arrojaré con una 

honda a los habitantes del país,

Y los afligiré, para que lo sientan.

19

    ¡Ay de mí, a causa de mi quebranto!

¡Mi herida es incurable!

Pero dije: ¡Ciertamente ésta es mi 

aflicción, y debo soportarla!

20

    Mi tienda ha sido destruida,

Y todas mis cuerdas están rotas:

Mis hijos me han abandonado y no 

existen.

Ya no hay quien plante mi tienda,

Ni quien alce mis cortinas.

21

    Ciertamente los pastores han sido 

necios,

No han buscado a YHVH,

Por eso no prosperaron,

Y todo su rebaño anda disperso.

22

    ¡Óyese un rumor!

¡He aquí un gran tumulto viene de 

la tierra del norte,

Para tornar las ciudades de Judá en 

asolación y en cubil de chacales!

23

    Oh YHVH, yo sé que no es del 

hombre su camino,

Que no es del hombre que camina el 

dirigir sus propios pasos.

24

    Corrígeme, oh YHVH, con medida,

No en tu ira, no sea que me 

aniquiles.

25

    Derrama tu ira sobre los pueblos 

que no te conocen,

Sobre las naciones que no invocan 

tu Nombre,

Porque han devorado a Jacob,

Sí, lo han devorado y consumido,

Y han asolado su morada.

El pacto violado

11

Palabra  que  recibió  Jeremías  de 

parte de YHVH, diciendo:

2

 Oíd las palabras de este pacto, y hablad 

a los hombres de Judá y a los habitantes 

de Jerusalem.

3

 Y decidles: Así dice YHVH Dios de Israel: 

Maldito el varón que no escuche° las pala-

bras de este pacto,

4

 el cual mandé a vuestros padres el día 

que los saqué de la tierra de Egipto, del 

horno de hierro, diciendo: Oíd mi voz y 

poned por obra° todo lo que os mande, y 

seréis mi pueblo, y Yo seré vuestro Dios,

5

 y cumpliré el juramento que hice a vues-

tros padres, de darles una tierra que mana 

leche y miel, como sucede hoy.° Entonces 

respondí y dije: Amén, YHVH.

6

 Y me dijo YHVH: Proclama todas estas 

palabras en las ciudades de Judá y en las 

calles de Jerusalem, diciendo: Oíd las pa-

labras de este pacto y ponedlas por obra;

7

 porque  advertí  solemnemente  a  vues-

tros  padres  en  el  día  que  los  hice  subir 

de la tierra de Egipto hasta el día de hoy; 

madrugando y sin cesar les he advertido, 

diciendo: ¡Oíd mi voz!

8

 Pero ellos no escucharon ni inclinaron 

su oído, sino que cada cual anduvo en la 

dureza  de  su  malvado  corazón.  Por  eso 

traigo  sobre  ellos  todas  las  palabras  de 

este pacto, el cual mandé que cumplieran 

y no lo han cumplido.

9

 YHVH  me  dijo:  Judíos  y  habitantes  de 

Jerusalem se han conjurado

10

 para volver a las iniquidades de sus an-

tepasados, quienes no quisieron escuchar 

mis  palabras,  y  siguen  en  pos  de  dioses 

extranjeros para servirlos. La casa de Is-

rael y la casa de Judá han quebrantado el 

pacto que Yo hice con sus padres.

10.15 Lit. obra de burlas.  11.3 Es decir, que no obedezca.  11.4 Lit. y ponedlos por obra.  11.5 Es decir, como veis que sucede 

hoy. Esta expresión se usa en contextos proféticos (especialmente en Dt. y Jer.), para señalar que lo prometido se había cum-

plido. 


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Jeremías 11:11

780

11

 Por tanto así dice YHVH: He aquí Yo 

traigo un mal sobre ellos del cual no po-

drán escapar; clamarán a mí, pero no los 

escucharé.

12

 Entonces los pueblos de Judá y los ha-

bitantes de Jerusalem irán a clamar a los 

dioses a quienes quemaban incienso, pero 

ellos no los podrán salvar en el tiempo de 

su calamidad.

13

 Oh Judá, tus dioses son según el nú-

mero de tus ciudades; y según el número 

de tus calles, oh Jerusalem, habéis erigido 

altares de lo vergonzoso:° los altares para 

quemar incienso a Baal.

14

 Tú, pues, no intercedas por este pue-

blo, ni levantes por ellos clamor ni ora-

ción;  porque  Yo  no  escucharé  cuando 

clamen a mí a causa de su calamidad.

15

    ¿Qué busca mi amado° en mi Casa, 

después de haber tramado tantas 

intrigas?

¿Podrá la grosura° y la carne inmolada 

apartar de ti la adversidad,

Para que lo celebres con gritos 

estrepitosos?

16

    YHVH te ha llamado olivo verde de 

excelente fruto,

Pero al son de un recio estrépito, 

hizo prender fuego en él,

Y sus ramas quedaron arruinadas.

17

 YHVH Sebaot, que te plantó, ha decre-

tado una calamidad contra ti, a causa de la 

maldad que para sí mismos hicieron los de 

la casa de Israel y de la casa de Judá, provo-

cándome al ofrecer sacrificios a Baal.

Complot contra Jeremías

18

 °YHVH  me  lo  hizo  saber,  y  lo  com-

prendí: entonces me hiciste ver sus ma-

quinaciones;

19

 Yo,  como  cordero  manso  llevado  al 

matadero, no sabía que tramaban maqui-

naciones  contra  mí,  diciendo:  Cortemos 

el  árbol  con  su  fruto;°  arranquémoslo 

de la tierra de los vivientes, para que su 

nombre no se pronuncie más.

20

 °¡Oh YHVH Sebaot! Tú que juzgas con 

justicia y escudriñas los riñones° y el co-

razón:

Vea yo tu venganza sobre ellos,

Porque ante ti expongo mi causa,

21

 Por tanto, así dice YHVH acerca de los 

hombres de Anatot, que procuran tu alma, 

diciendo: No profetices en nombre de YHVH, 

no sea que mueras por nuestra mano.

22

 Por  tanto,  así  dice  YHVH  Sebaot:  He 

aquí que Yo visitaré esto sobre ellos: los 

muchachos morirán a espada, y sus hijos 

y sus hijas morirán de hambre,

23

 y no quedará remanente de ellos, por-

que  traeré  el  mal  sobre  los  hombres  de 

Anatot el año de su visitación.°

Diálogo

12

Muy justo eres, oh YHVH,

Para que yo dispute contigo;

Pero alegaré una causa ante ti:

¿Por qué prosperan los malvados,

Y los traidores viven en paz?

2

    Los plantas, y echan raíces;

Crecen y dan fruto;

Cercano estás de sus bocas,

Pero lejos de sus riñones.

3

    °Y Tú, oh YHVH, me examinas y me 

conoces,

Tú me has visto y has probado mi 

corazón para contigo.

¡Arrebátalos como a ovejas al 

matadero;

Conságralos para el día del degüello!

4

    ¿Hasta cuándo estará de luto la 

tierra,

Y se marchitará la hierba del campo?

Por la maldad de los que la habitan 

escasean el ganado y las aves,

Y dicen: Él no ve nuestras andanzas.

5

    Si ya estás cansado corriendo con la 

infantería,

¿Cómo podrás competir con la 

caballería?

Si sólo en tierra segura te sientes 

tranquilo,

11.13 Heb. boshet. Alusión despectiva a Baal.  11.15 Esto es, Judá, el pueblo de Dios.  11.15 El TM registra los muchos, expresión 

incomprensible en este contexto. En base al testimonio de la versión Latina Antigua, hemos vertido grosura (en hebreo, este tér-

mino es similar a los muchos). LXX registra los votos

11.18 Se sugiere leer a continuación 12.6 

→§ 163.  11.19 Lit. con su pan

Algunos proponen corregir esta singular expresión y leer destruyamos el árbol en su lozanía

11.20 Se sugiere leer a continuación 

12.3 

→§ 163.  11.20 En el hebreo bíblico, y especialmente en porciones poéticas del AP, el término riñones (siempre usado en 

plural) alude a la parte más profunda la conciencia del ser humano 

→Lm.3.13 o Job 19.27.  11.23 Esto es, en el tiempo de su 

castigo

12.3 Se sugiere leer a continuación de 11.20 

→§ 163.  12.6 Se sugiere leer a continuación de 11.18 →§ 163. 


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Jeremías 13:12

781

¿Qué harás en la maleza del Jordán?

6

     °tus propios hermanos y la casa 

de tu padre, aun ellos te son 

desleales, aun ellos te calumnian 

a la espalda; no te fíes, aunque te 

digan buenas palabras.

7

    He abandonado mi Casa,

He desamparado mi heredad,

He entregado en manos enemigas al 

amor de mi alma,

8

    Porque mi heredad, rugiendo como 

león feroz, se volvió contra mí;

Por eso la he aborrecido.

9

    ¿Es mi heredad para mí como un ave 

de muchos colores,

Para que las otras aves de rapiña 

estén contra ella en derredor?

¡Id, juntad todas las fieras del 

campo y traedlas para que 

la devoren!

10

    Entre tantos pastores destruyeron 

mi viña,

Han hollado mi porción,

Han convertido mi heredad deseada 

en un desierto desolado.

11

    Sí, la han convertido en una 

desolación,

Y desolada, llora sobre mí.

Todo el país está desolado,

Ya nadie reflexiona en su corazón.

12

    Los asoladores han venido,

Se ven sobre todas las alturas del 

desierto,

Porque la espada de YHVH devora,

Desde el uno hasta el otro extremo 

de la tierra,

Y no hay paz para ninguna carne.

13

    Sembraron trigo y han segado 

espinos;

Se han cansado con trabajos,

Pero no han sacado provecho.

¡Sed avergonzados en vuestras 

cosechas a causa del ardor de la 

ira de YHVH!

14

 Así dice YHVH a todos mis malos ve-

cinos, que se apropian de la herencia que 

Yo  hice  heredar  a  mi  pueblo  Israel:  He 

aquí  los  arrancaré  de  sobre  su  tierra,  y 

arrancaré a la casa de Judá de en medio 

de ellos.

15

 Pero después que los haya arrancado, 

volveré a tener compasión de ellos, y los 

haré volver cada uno a su heredad y cada 

cual a su tierra.

16

 Y  sucederá  que  si  en  verdad  quieren 

aprender los caminos de mi pueblo para 

poder invocar mi Nombre, diciendo: Vive 

YHVH (así como enseñaron a mi pueblo a 

jurar por Baal), que ellos serán estableci-

dos en medio de mi pueblo.

17

 Pero si no quieren escuchar, arrancaré 

a tal nación, sacando de raíz y destruyen-

do, dice YHVH.

El cinto podrido

13

Así me dijo YHVH: Ve y cómprate 

un cinto de lino y cíñelo a tus lo-

mos, pero que no lo toque el agua.

2

 Compré pues el cinto, conforme a la pa-

labra de YHVH, y lo ceñí a mis lomos.

3

 Y vino a mí la palabra de YHVH por se-

gunda vez, diciendo:

4

 Toma  el  cinto  que  has  comprado,  que 

está en tus lomos, y levántate, ve al Éu-

frates y escóndelo allá en una hendidura 

de la peña.

5

 Fui, pues, y lo escondí junto al Éufrates, 

como YHVH me había mandado.

6

 Y al cabo de muchos días me dijo YHVH: 

Levántate, ve al Éufrates y toma el cinto 

que te mandé esconder allí.

7

 Fui  pues  al  Éufrates,  y  cavé  y  tomé  el 

cinturón del lugar donde lo había escon-

dido, y he aquí el cinturón se había podri-

do y ya no servía para nada.

8

 Entonces tuve revelación de YHVH, que 

decía:

9

 Así  dice  YHVH:  Así  reduciré  a  podre-

dumbre la soberbia de Judá y la gran so-

berbia de Jerusalem.

10

 Este pueblo malo, que despectivamen-

te  rehúsa  oír  mis  palabras,  que  anda  en 

la dureza de su corazón, yendo tras otros 

dioses  para  servirlos  y  postrarse  ante 

ellos, vendrá a ser como este cinto, que ya 

no sirve para nada.

11

 Porque como el cinto se junta a los lo-

mos de un hombre, así hice juntarse con-

migo a toda la casa de Israel y a toda la 

casa de Judá, dice YHVH, para que fueran 

mi  pueblo,  mi  renombre,  mi  alabanza  y 

mi  gloria.  Pero  ellos  no  quisieron  escu-

char.

Los odres

12

 Así que les dirás esta palabra: Así dice 

YHVH,  Dios  de  Israel:  Todo  odre  se  lle-

nará de vino. Y ellos te dirán: ¿Acaso no 


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Jeremías 13:13

782

sabemos muy bien que todo odre se llena 

de vino?

13

 Entonces les dirás: Así dice YHVH: He 

aquí Yo lleno de embriaguez a todos los 

habitantes  de  esta  tierra,  a  los  reyes  de 

la  casa  que  se  sientan  sobre  el  trono  de 

David, a los sacerdotes, a los profetas y a 

todos los habitantes de Jerusalem.

14

 Y haré que choquen unos contra otros, 

padres  e  hijos  juntamente,  dice  YHVH. 

No  perdonaré  ni  tendré  piedad,  ni  me 

compadeceré para no destruirlos.

Cautiverio de Judá

15

    ¡Oíd y prestad atención!

No seáis altivos, porque YHVH ha 

hablado.

16

    Dad gloria a YHVH vuestro Dios,

Antes que haga venir tinieblas,

Antes que vuestros pies tropiecen 

por los montes tenebrosos,

Y la luz que esperáis la convierta en 

lóbregas tinieblas,

17

    Pero si no escucháis, por vuestra 

soberbia mi alma llorará en secreto,

Y llorando amargamente mis ojos se 

desharán en lágrimas,

Porque el rebaño de YHVH habrá 

sido hecho cautivo.

18

    Di al rey y a la soberana: ¡Sentaos 

humillados!

Porque la corona de vuestra gloria 

ha caído de vuestras cabezas.

19

    Las ciudades del Mediodía han sido 

cerradas, y no hay quien las abra;

Todo Judá marcha al destierro,

Sin faltar uno son llevados en 

cautiverio.

20

    ¡Alza tus ojos° y mira quién viene 

del norte!

¿Dónde está la grey que te fue dada; 

el rebaño de tu gloria?

21

    ¿Qué dirás cuando ponga como jefes 

sobre ti a antiguos compañeros 

que tú misma enseñaste?°

¿No sentirás dolores como de 

parturienta?

22

    Y cuando digas en tu corazón:

¿Por qué me suceden estas cosas?

Por la magnitud de tu iniquidad 

han sido descubiertas tus faldas y 

violentados tus calcañares.

23

    ¿Cambiará el etíope su piel,

O sus manchas el leopardo?

Así también vosotros, ¿podréis hacer 

lo bueno,

Estando habituados a hacer lo malo?

24

    Por tanto, Yo los esparciré como la 

hojarasca que pasa con el viento 

del desierto.

25

    Ésta es tu suerte,

La porción señalada por mí mismo, 

dice YHVH,

Porque te has olvidado de mí y has 

confiado en la mentira.

26

    Por tanto Yo también descubriré tus 

faldas,

Y las alzaré sobre tu rostro,

Para que sean vistas tus vergüenzas,

27

    Tus adulterios, tus lujuriantes 

relinchos, y la maldad de tu 

fornicación.

Sobre los collados y en el campo he 

visto todas tus abominaciones.

¡Ay de ti, Jerusalem, que no te 

purificas!, ¿hasta cuándo será?°

La sequía

14

Palabra de YHVH que recibió Jere-

mías con motivo de la sequía:

2

    ¡Judá está cubierto de luto,

Sus portales° languidecen,

Se inclinan consternados hacia el 

suelo,

Y sube el clamor de Jerusalem!

3

    Los nobles envían a sus criados° por 

agua,

Van a las cisternas, pero no 

encuentran agua,

Y vuelven con los cántaros vacíos,

Avergonzados y confusos, cubren sus 

cabezas,

4

    A causa del suelo resquebrajado,°

Porque no hay lluvia en la tierra,

Los labradores están avergonzados,

Cubren sus cabezas.

5

    Hasta la cierva pare y abandona su 

cría en el campo,

13.20 Esto es, Jerusalem.  13.21 Prob. se refiere a Ezequías 

→2 R.20.12-19.  13.27 Esto es, de prácticas detestables, aunque 

se usa también como forma despectiva a los ídolos. N¡tus adulterios, tus relinchos, la maldad de tu fornicación! // Sobre los 

collados y en el campo he visto tus ídolos detestables

14.2 Esto es, sus ciudades.  14.3 Lit. sus insignificantes.  14.4 Nde-

bilitado


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Jeremías 14:22

783

Porque no hay hierba.

6

    Los asnos monteses se paran en las 

dunas,

Venteando el aire como chacales,

Con ojos apagados porque no hay 

hierba.

7

    ¡Aunque nuestras iniquidades 

testifican contra nosotros,

Obra, oh YHVH, por amor de tu 

Nombre!

¡Ciertamente nuestras apostasías se 

han multiplicado,

Y hemos pecado contra ti!

8

    ¡Oh Tú, Esperanza de Israel,

Salvador en tiempo de angustia!

¿Por qué eres como extranjero en el 

país,

Como caminante que se desvía para 

pernoctar?

9

    ¿Por qué te muestras como un 

hombre aturdido,

Como héroe incapaz de vencer?

Pero Tú, oh YHVH, estás en medio 

de nosotros,

Y sobre nosotros es invocado tu 

Nombre;

¡No nos desampares!

10

 YHVH responde así a este pueblo: Sí, 

gustan de vagabundear,° sus pies no se re-

frenan. Por lo tanto YHVH no se compla-

ce en ellos: Ahora recuerda su iniquidad y 

castiga sus pecados.

11

 Y  me  dijo  YHVH:  No  intercedas  por 

este pueblo.

12

 Cuando ayunen, no escucharé su cla-

mor,  y  cuando  ofrezcan  holocaustos  y 

ofrendas de cereal, no los aceptaré, sino 

que con espada, hambre y pestilencia los 

consumiré.

13

 Entonces  dije:  ¡Oh,  Adonay  YHVH! 

Mira que los profetas les dicen: No veréis 

espada  ni  tendréis  hambre,  sino  que  en 

este lugar os daré paz duradera.

14

 Entonces  YHVH  me  respondió:  Fal-

samente  profetizan  los  profetas  en  mi 

Nombre. No los he enviado, ni les he dado 

orden, ni les he hablado. Os profetizan vi-

siones mendaces, presagios vanos y enga-

ños de su mismo corazón.

15

 Por tanto, así dice YHVH a los profetas 

que profetizan en mi Nombre sin que Yo 

los  haya  enviado:  Ellos  dicen:  Ni  espada 

ni hambre habrá en esta tierra. Pues a es-

pada y de hambre serán consumidos los 

tales profetas,

16

 y el pueblo a quien ellos profetizan ya-

cerá  por  las  calles  de  Jerusalem  a  causa 

del hambre y la espada, y no habrá quien 

los sepulte, ni a ellos ni a sus mujeres ni 

a sus hijos ni a sus hijas, pues sobre ellos 

derramaré sus maldades.

17

 Diles esta palabra:

¡Desháganse mis ojos 

en lágrimas,

Día y noche, y no cesen;

Porque la virgen hija de mi pueblo 

está quebrantada con gran 

quebranto,

Por un golpe dolorosísimo!

18

    Si salgo al campo,

¡He aquí, los muertos a cuchillo!

Si entro en la ciudad,

¡He aquí, los famélicos!

Y tanto el profeta como el sacerdote 

vagan aturdidos por el país.

19

    ¿Has desechado del todo a Judá?

¿Tiene tu alma aborrecida a Sión?

¿Por qué nos has herido 

sin remedio?

Esperábamos paz, pero no hay 

bienestar;

Tiempo de sanidad, y he aquí el 

terror.

20

    Reconocemos, oh YHVH, nuestra 

maldad,

Y las iniquidades de nuestros 

padres,

Porque contra ti hemos pecado.

21

    ¡Por amor de tu Nombre, no 

deseches

Ni deshonres el trono de tu gloria!

¡Acuérdate, no anules tu pacto con 

nosotros!

22

    Entre las vanidades° de 

los gentiles,

¿Hay quien haga llover?

¿O pueden los cielos mismos dar 

aguaceros?

¿Acaso, oh YHVH, no eres Tú el Dios 

nuestro?

Esperaremos, pues, en ti,

Porque Tú haces todas estas cosas.

14.10 Es decir, deambular en pos de la idolatría.  14.22 Forma despectiva para referirse a los dioses de las naciones paganas. 


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Jeremías 15:1

784

Ira implacable

15

YHVH me respondió: Aunque estu-

vieran delante Moisés y Samuel° no 

me conmovería por este pueblo. ¡Échalos, 

que salgan de mi presencia!

2

 Y si te preguntan: ¿A dónde saldremos? 

les dirás: Así dice YHVH:

¡El destinado a muerte, a muerte,

El destinado a espada, a espada,

El destinado a hambre, a hambre,

El destinado a cautiverio, a 

cautiverio!

3

 Señalaré  sobre  ellos  cuatro  linajes  de 

azotes,° dice YHVH: La espada para ma-

tar, los perros para despedazar,° y las aves 

del cielo y las bestias de la tierra para de-

vorar y destruir.

4

 Los haré escarmiento de todos los rei-

nos de la tierra, a causa de Manasés ben 

Ezequías,  rey  de  Judá,  por  todo  lo  que 

hizo en Jerusalem.

5

    Oh Jerusalem, ¿quién tendrá piedad 

de ti?

¿Quién te compadecerá?

¿Quién se desviará para preguntar 

acerca de ti?

6

    Tú me rechazaste, te volviste atrás, 

dice YHVH;

Y Yo extendí mi brazo para aniquilarte.

Estoy harto de compadecerme.

7

    Los aventaré con el aventador hasta 

las puertas de esta tierra,°

Y los privaré de hijos.

Destruiré a mi pueblo,

Porque no se han vuelto de sus 

caminos.

8

    Sus viudas me serán más que la 

arena del mar;

Traeré contra madres e hijos al 

devastador,

Que devastará en pleno día,

Y súbitamente haré caer sobre ellos 

la angustia y el espanto.

9

    La que dio a luz siete desfallecerá y 

exhalará el alma:

Su sol se pondrá siendo aún de día,

Será avergonzada y confundida.

Y el resto lo entregaré a la espada 

enemiga, dice YHVH.

10

    ¡Ay de mí, madre mía,

Que me concebiste varón de contienda,

Varón de discordia para toda esta 

tierra!

Ni he prestado ni me han prestado,

Pero cada uno de ellos me maldice.

11

    ¡Sea así, oh YHVH,

Si no te he rogado por su bien,

Si no he intercedido en favor de mi 

enemigo,

En tiempo de aflicción y en época de 

angustia!

12

    ¿Quién podrá romper el hierro,

El hierro del norte, y el bronce?

13

    Entregaré tus bienes y tus tesoros al 

saqueo,

Y no por precio, sino por todos tus 

pecados en todo tu territorio,

14

    Y haré que pasen° con tus enemigos,

A una tierra que tú no conoces,

Pues mi ira se ha encendido en un 

fuego que arderá contra vosotros.

Diálogo

15

    ¡Oh YHVH, Tú lo sabes todo!

Acuérdate de mí, y visítame,

Y hazme justicia de mis perseguidores;

No me arrebates a causa de tu gran 

paciencia,°

Sabes que por ti soporto afrentas.

16

    Fueron halladas tus palabras, y yo 

las comí;

Y tu Palabra° fue para mí el gozo y 

la alegría de mi corazón,

Porque tu Nombre es invocado 

sobre mí,

¡Oh YHVH, ’Elohim Sebaot!

17

    No me senté a disfrutar con los que 

se divertían,

Forzado por tu mano me he sentado 

solitario,

Porque me llenaste de indignación.

18

    ¿Por qué es perpetuo mi dolor,

Y mi herida, incurable, rehúsa ser 

sanada?

15.1 Moisés y Samuel fueron los más grandes intercesores en la historia de Israel 

→Ex.32.11-14; 1 S.7.7-9, por lo que su 

mención aquí no es casual. LXX registra Moisés y Aarón

15.3 .azotes.  15.3 Esto es, los cuerpos de los muertos.  15.7 Esta 

expresión puede ser entendida como una alusión a las ciudades de Judá 

→14.2 nota, o como una referencia a los límites del 

reino 

→Nah.3.13.  15.14 Es decir, a los cautivos de Jerusalem.  15.15 Es decir, si retrasas la sentencia de mis perseguidores, 

éstos acabaran por matarme

15.16 Esta repetición (palabras-Palabra de Dios) hace notar el contraste entre las numerosas 

palabras que Dios dirige al hombre, y la Palabra de Dios como un todo 

→Jn.17.8, 14, 17.


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Jeremías 16:18

785

¿Serás para mí como algo ilusorio,°

Como aguas que no son estables?

19

    Entonces me respondió YHVH:

Si te vuelves, Yo te restauraré,

Para que puedas estar en pie delante 

de mi presencia;

Si apartas lo precioso de lo vil,

Serás mi boca.

¡Conviértanse ellos a ti,

Y no te conviertas tú a ellos!°

20

    Y te pondré frente a este pueblo por 

muro de bronce inexpugnable;

Pelearán contra ti, pero no te 

vencerán,

Porque Yo estoy contigo para 

librarte y salvarte, dice YHVH.

21

    Te libraré de mano de los perversos,

Te rescataré del puño del opresor.

La ruina de Israel

16

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 No tomes para ti mujer, ni tengas hijos 

ni hijas en este lugar.

3

 Porque así dice YHVH acerca de los hi-

jos e hijas nacidos en este lugar, y acerca 

de las madres que los dieron a luz, y de 

los  padres  que  los  engendraron  en  esta 

tierra:

4

 Morirán de muerte cruel. No serán llo-

rados ni sepultados: serán como estiércol 

sobre el campo. Serán consumidos por la 

espada y el hambre, y sus cadáveres serán 

pasto de las aves de los cielos y de las bes-

tias de la tierra.

5

 Así  dice  YHVH:  No  entres  en  casa  del 

luto, ni vayas a llorar, ni te lamentes por 

ellos, porque retiro de este pueblo mi paz, 

mi  misericordia  y  mi  compasión,  dice 

YHVH.

6

 En esta tierra morirán grandes y peque-

ños, y no serán sepultados ni llorados, ni 

por ellos se harán incisiones ni se raparán 

el pelo,°

7

 ni partirán pan para consolar al que está 

de luto, ni le darán la copa del consuelo 

por su padre o por su madre.°

8

 Y  tampoco  entres  en  la  casa  del  ban-

quete para sentarte a comer y beber con 

ellos.

9

 Porque así dice YHVH Sebaot, Dios de 

Israel: He aquí Yo haré cesar en este lu-

gar, en vuestros días y ante vosotros, toda 

voz de gozo y toda voz de alegría, la voz 

del novio y la voz de la novia.

10

 Y  acontecerá  que  cuando  anuncies  a 

este pueblo todas estas cosas, te pregun-

tarán: ¿Por qué pronuncia YHVH contra 

nosotros todo este gran mal? ¿qué delitos 

o pecados hemos cometido° contra YHVH 

nuestro Dios?

11

 Les dirás: Porque vuestros padres me 

abandonaron,  dice  YHVH,  y  fueron  tras 

otros  dioses  y  se  postraron,  y  los  sirvie-

ron, y me abandonaron a mí, y no guar-

daron mi Ley.

12

 Y  vosotros  habéis  obrado  peor  que 

vuestros  padres:  cada  cual  sigue  tras  la 

maldad de su obstinado corazón, sin es-

cucharme a mí.°

13

 Os arrojaré pues de esta tierra, a una 

tierra que ni vosotros ni vuestros padres 

conocisteis,  y  allá  serviréis  a  dioses  ex-

tranjeros día y noche, porque no os mos-

traré clemencia.

14

 Pero, he aquí vienen días, dice YHVH, 

en que no se dirá más: ¡Vive YHVH, que 

sacó  a  los  hijos  de  Israel  de  la  tierra  de 

Egipto!

15

 sino: ¡Vive YHVH, que sacó a los hijos 

de Israel de la tierra del norte y de todas 

las  tierras  adonde  los  había  arrojado!, 

porque los haré volver a su tierra, la cual 

di a sus padres.

16

 He aquí enviaré a muchos pescadores 

que  los  pesquen,  dice  YHVH,  y  después 

enviaré muchos cazadores que los cacen 

por los montes y collados y por las hendi-

duras de las peñas.

17

 Mis  ojos  están  sobre  todos  sus  cami-

nos,  no  se  me  ocultan;°  ni  su  iniquidad 

está encubierta delante de mis ojos.

18

 Pero primero Yo pagaré al doble su ini-

quidad y su pecado, porque contaminaron 

15.18 Prob. un arroyo que se seca en tiempo de sequía 

→Job 6.15-17.  15.19 Nellos se volverán a ti, y tú no te volverás 

a ellos

16.6 Incisiones en el cuerpo y rapado de pelo o barba eran formas de expresar duelo, propias de pueblos paganos, 

prohibidas por Dios 

→Lv.19.27, 28 o Dt.14.1.  16.7 Se refiere a la costumbre de enviar comidas y bebidas con el propósito 

de consolar a los que están de luto 

→2 S.3.35 o Ez.24.17.  16.10 Lit. nuestro pecado que hemos pecado.  16.12 Lit. para no 

escucharme. Recurso literario por el que el resultado de una acción es presentado como si este fuera el propósito. Este recurso 

es muy común entre los escritos proféticos. 

16.17 LXX omite no se me ocultan.


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Jeremías 16:19

786

mi tierra con la carroña de sus ídolos de-

testables. En verdad han llenado mi here-

dad con sus cosas abominables.

19

    ¡Oh YHVH, fuerza mía y fortaleza mía,

Mi refugio en tiempo de angustia!

A ti vendrán las naciones desde los 

extremos de la tierra, diciendo:

Nuestros padres no heredaron más 

que mentira, vanidad y cosas en 

que no hay provecho.

20

    ¿Acaso el hombre se fabrica dioses?

¡Pues esos no son dioses!

21

    Por tanto, he aquí esta vez les 

mostraré,

Les mostraré mi poder y mi 

fortaleza,

Y sabrán que mi nombre es YHVH.

El pecado de Judá

17

El pecado de Judá está escrito con 

cincel de hierro;

Con punta de diamante está grabado 

en la tabla de su corazón,

Y en los cuernos de sus altares.

2

    Para memoria de sus hijos son 

sus altares y sus aseras° junto a 

árboles frondosos,°

Sobre los altos collados.

3

    Sobre mi° monte del campo

Entregaré al saqueo tus riquezas y 

tesoros,

Por el pecado de tus lugares altos en 

todo tu territorio.

4

    Tú misma serás privada de la 

herencia que te di,

Y en una tierra que no conoces, te 

haré esclavo de tus enemigos;

Porque habéis encendido en mi ira 

un fuego que arderá perpetuamente.

5

    Así dice YHVH:

¡Maldito quien confía en el hombre 

y se apoya en un brazo de carne 

apartando su corazón de YHVH!

6

    Será como retama en el desierto,

Y no verá cuando viene el bien,

Sino que habitará lugares secos en el 

desierto,

En tierra salitrosa° y deshabitada.

7

    Bendito aquel que confía en YHVH,

Y cuya confianza está en YHVH.

8

    Será como árbol plantado junto a las 

aguas,

Que extiende sus raíces junto a las 

corrientes, y no teme cuando 

viene el calor,

Pues su follaje estará frondoso,

Y en el año de sequía no se preocupará,

Ni dejará de dar su fruto.

9

    Engañoso es el corazón más que 

todas las cosas,

Incurable,° ¿quién lo conocerá?

10

    Yo, YHVH, Yo escudriño el corazón y 

sondeo los riñones,°

Para dar a cada uno conforme a su 

camino,

Conforme al fruto de sus obras.

11

    El que amontona riquezas injustas 

es como la perdiz que incuba lo 

que no puso:

En la mitad de sus días las 

abandonará,

Y ante su postrimería será un necio.

12

    Trono glorioso, excelso desde el 

principio,

Es el lugar de nuestro Santuario.

13

    ¡Oh YHVH, esperanza de Israel!,

Los que te abandonan serán 

avergonzados,

Los que te abandonan serán 

inscritos en el polvo,

Porque abandonaron a YHVH, 

fuente de agua viva.

14

    ¡Sáname, oh YHVH, y seré sano;

Sálvame, y seré salvo,

Porque Tú eres mi alabanza!

15

    He aquí, ellos me dicen:

¿Dónde está la palabra de YHVH?

¡Que se cumpla ahora!

16

    Pero yo no he hecho más que ser un 

pastor en pos de ti.

17.2 El término asera puede ser el nombre propio de una divinidad cananea cuyo culto se introdujo en Israel pese a los manda-

mientos de Dios (véase, por ejemplo, Ex.34.13 y Dt.7.5), pero también puede aludir a los objetos o símbolos relacionados con 

esta divinidad (tales como imágenes de madera o árboles considerados sagrados). 

17.2 Lit. junto a árbol frondoso. Algunos 

manuscritos hebreos dicen junto a todo árbol frondoso, mientras que el Targum y las versiones Siríaca y Arábica dicen bajo 

todo árbol frondoso 

→2.20 nota.  17.3 Esto es, el monte Sión en Jerusalem o, en un sentido más limitado, el monte en que 

estaba ubicada la Casa de Dios. 

17.6 Símbolo de esterilidad o improductividad.  17.9 Heb. anash = estar enfermo, debilitado. El 

participio (usado como adjetivo) expresa algo incurable (no perverso) o tan gravemente enfermo, que no tiene remedio 

→15.18. 

En Miq.1.9 el sentido queda más claro gracias al contexto. 

17.10 

→11.20 nota.


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Jeremías 18:12

787

No he deseado este día de calamidad,

Tú lo sabes: lo que ha salido de mis 

labios está presente ante ti.

17

    No me seas causa de terror,

Tú eres mi refugio en el día del mal.

18

    Avergüéncense quienes me 

persiguen,

Pero no sea yo avergonzado,

Sientan terror ellos y no yo;

Trae sobre ellos el día malo,

Y destrúyelos con doble destrucción.

Observancia del Shabbat

19

 Así me dice YHVH: Ve y ponte de pie en 

la puerta de los hijos de este pueblo, por 

la cual entran y salen los reyes de Judá: en 

todas las puertas de Jerusalem,

20

 y  diles:  Oíd  el  oráculo  de  YHVH,  oh 

reyes de Judá, y Judá todo, con todos los 

habitantes de Jerusalem que entráis por 

estas puertas:

21

 Así dice YHVH: Guardaos muy bien de 

llevar cargas en el día de reposo, y de me-

terlas por las puertas de Jerusalem.

22

 Tampoco saquéis cargas de vuestras 

casas  en  el  día  del  shabbat  ni  hagáis 

trabajo  alguno,  sino  santificad  el  día 

del shabbat, como lo ordené a vuestros 

padres

23

 (aunque ellos no escucharon, ni incli-

naron su oído, sino que endurecieron su 

cerviz para no escuchar ni recibir correc-

ción).

24

 Pues  si  de  verdad  me  escucháis,  dice 

YHVH, y no introducís carga por las puer-

tas de esta ciudad en el día del shabbat, 

sino que santificáis este día del shabbat, 

no haciendo en él trabajo alguno,

25

 entrarán por las puertas de esta ciudad 

en carros y en caballos los reyes y prínci-

pes que se sientan en el trono de David; 

ellos y sus príncipes, los varones de Judá y 

los habitantes de Jerusalem. Y esta ciudad 

será habitada para siempre.

26

 Y vendrán de las ciudades de Judá, de 

los alrededores de Jerusalem, de la tierra 

de  Benjamín,  de  la  Sefelá,°  de  la  región 

montañosa  y  del  Néguev,°  trayendo  ho-

locaustos,  víctimas,  ofrenda  de  cereal  e 

incienso, y trayendo ofrendas de gratitud 

a la Casa de YHVH.

27

 Pero si no me escucháis en lo de santi-

ficar el día del shabbat, y de no transportar 

carga y meterla por las puertas de Jerusa-

lem en el día del shabbat, Yo prenderé un 

fuego a sus puertas que devorará los pala-

cios de Jerusalem, y no se apagará.

El alfarero

18

Revelación  que  tuvo  Jeremías  de 

parte de YHVH, que decía:

2

 Levántate y baja a la casa del alfarero, y 

allí te haré oír mis palabras.

3

 Bajé,  pues,  a  la  casa  del  alfarero,  y  he 

aquí  que  éste  estaba  haciendo  una  obra 

sobre las dos piedras.°

4

 Y la vasija de barro que estaba haciendo 

se echó a perder en la mano del alfarero, 

así que volvió a hacer de ella otra vasija, 

según le pareció mejor hacerla.°

5

 Entonces  vino  a  mí  palabra  de  YHVH, 

diciendo:

6

 ¿No  podré  Yo  hacer  con  vosotros,  oh 

casa  de  Israel,  como  hace  este  alfarero? 

dice YHVH. He aquí, como es el barro en 

mano del alfarero, así sois vosotros en mi 

mano, oh casa de Israel.

7

 Si en un momento hablo contra una na-

ción o reino para desarraigarlo, destruirlo 

y arruinarlo;

8

 y esa nación contra la que he hablado se 

convierte  de  su  maldad,  Yo  desistiré  del 

mal que había pensado hacerle;

9

 y si en otro momento hablo a una na-

ción o reino para edificarlo y plantarlo,

10

 pero hace lo malo ante mis ojos y no 

oye mi voz, entonces Yo también desistiré 

del bien que había prometido hacerle.

11

 Ahora  pues,  habla  a  los  hombres  de 

Judá  y  a  los  habitantes  de  Jerusalem,  y 

diles: Así dice YHVH: He aquí, Yo doy for-

ma° a un mal contra vosotros, y tramo un 

diseño contra vosotros. Volveos pues cada 

uno de su mal camino, y mejorad vues-

tros caminos y vuestras obras.

12

 Pero  ellos  responderán:  Es  inútil, 

porque  seguiremos  andando  en  pos  de 

nuestros  propios  designios,  y  cada  cual 

17.26 Sefelá. Planicie costera de Israel.  17.26 Esto es, el desierto.  18.3 Prob. torno del alfarero.  18.4 Lit. según fue agradable 

a los ojos del alfarero hacer

18.11 Juego de palabras que refiere la acción de Dios: el profeta usa el participio del verbo formar

que es el mismo participio que ha usado antes 

→vv. 2-6, como sustantivo, para aludir al alfarero que da forma al barro. 


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Jeremías 18:13

788

seguirá tras la obstinación de su malvado 

corazón.

13

 Por tanto, así dice YHVH:

Preguntad ahora entre las naciones:

¿Quién ha oído cosa semejante?

¡Algo horripilante ha hecho la 

virgen de Israel!

14

    ¿Desaparecerá acaso la nieve del 

Líbano,

De los peñascos de las montañas?

¿Se agotarán las frescas aguas que 

fluyen de tierras lejanas?

15

    Pues mi pueblo me ha olvidado,

Y ofrece sus sacrificios a dioses 

vanos,

Los hacen tropezar° en sus caminos,

Los caminos antiguos,

Para que anden por sendas,

Por senderos no allanados,

16

    Hasta que su tierra se convierta en 

desolación y burla perpetua:

Todo el que pase por ella se 

asombrará y meneará la cabeza.

17

    Como con viento solano los 

esparciré delante del enemigo,

Y en el día de la derrota les daré la 

espalda y no la cara.

Oración de Jeremías

18

 Entonces ellos dijeron: ¡Venid, trame-

mos  nosotros  un  plan  contra  Jeremías! 

Ciertamente no nos faltará la instrucción 

del sacerdote, ni el consejo del sabio, ni la 

palabra del profeta. ¡Venid, traspasémoslo 

con la lengua,° y no prestemos atención a 

ninguna de sus palabras!

19

    ¡Préstame atención Tú, oh YHVH,

Y escucha la voz de los que 

contienden contra mí!

20

    ¿Es que se pagan bienes con males?

Porque han cavado una fosa para mi 

alma.

Recuerda cómo intercedía por ellos 

ante ti,

Para apartar de ellos tu ira.

21

    Ahora entrega sus hijos al hambre,

Y arrójalos al poder de la espada;

Queden sus mujeres viudas y sin 

hijos,

Mueran de peste sus varones,

Y sus jóvenes sean heridos a espada.

22

    Óigase clamor en sus casas,

Cuando de repente traigas contra 

ellos salteadores;°

Porque cavaron una fosa para 

atraparme,

Y a mis pies han escondido lazos.

23

    Pero Tú, oh YHVH, conoces sus 

designios homicidas contra mí:

No perdones su iniquidad,

Ni borres de tu vista sus pecados,

Y sean derribados delante de ti.

Trata con ellos en el tiempo de tu ira.

La vasija rota

19

Así  dijo  YHVH:  Ve  y  compra  una 

vasija de barro de alfarero, y lleva 

contigo  de  los  ancianos  del  pueblo  y  de 

los ancianos de los sacerdotes,

2

 y sal al valle de Ben-Hinom, que está a 

la entrada de la puerta del alfarero, y pro-

clama allí las palabras que Yo te diré.

3

 Di:  ¡Oh  reyes  de  Judá,  y  vosotros,  ha-

bitantes  de  Jerusalem,  oíd  el  oráculo  de 

YHVH! Así dice YHVH Sebaot, Dios de Is-

rael: He aquí Yo traigo un mal sobre este 

lugar, tal así, que a todo el que lo oiga le 

retiñirán los oídos.

4

 Porque me han abandonado y han ena-

jenado este lugar, quemando allí incienso 

a otros dioses que ellos no conocieron, ni 

sus padres, ni los reyes de Judá, y han lle-

nado este lugar de sangre de inocentes.

5

 Y han edificado los lugares altos a Baal,° 

para quemar con fuego a sus propios hi-

jos como holocaustos a Baal; cosa que Yo 

no ordené ni dije, ni me pasó por el pen-

samiento.

6

 Por  tanto  he  aquí  vienen  días,  dice 

YHVH, en que no se le llamará más a este 

lugar  Tófet,°  ni  Valle  de  Ben-Hinom,° 

sino Valle de la Matanza.

7

 Y haré nulo el consejo de Judá y de Je-

rusalem  en  este  lugar,  y  los  haré  caer  a 

espada ante sus enemigos, y en mano de 

quienes buscan su vida, y daré sus cadáve-

res como pasto a las aves del cielo y a las 

bestias de la tierra.

18.15  Puede  tratarse,  o  bien  de  los  dioses  extraños,  o  de  los  gobernantes,  sacerdotes  o  falsos  profetas  que  desviaban  al 

pueblo. 

18.18  Esto  es,  ataquémoslo  con  calumnias 

→9.2,4,7.  18.22 Este término suele aludir a grupos armados que in-

cursionaban para saquear y obtener botín. 

19.5 Esto es, los lugares altos del valle de Ben-Hinom 

→7.31.  19.6 →7.31 nota.  

19.6 

→7.31 nota.


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Jeremías 20:10

789

8

 Convertiré  esta  ciudad  en  objeto  de 

asombro y de silbido: todo el que pase por 

ella se asombrará y silbará a causa de to-

das sus plagas.

9

 Haré que se coman la carne de sus pro-

pios hijos y la carne de sus propias hijas, y 

cada uno comerá la carne de su compañe-

ro, en el asedio y la aflicción con que los 

afligirán sus enemigos y los que buscan 

su vida.

10

 Luego quebrarás la vasija ante los ojos 

de los hombres que vayan contigo,

11

 y les dirás: Así dice YHVH Sebaot: De 

este modo quebraré a este pueblo y a esta 

ciudad, como se quiebra una vasija de al-

farero, que no puede recomponerse más; 

y enterrarán en Tófet° hasta no haber lu-

gar.

12

 Así haré con este lugar, dice YHVH, y 

con sus habitantes, hasta que esta ciudad 

sea como Tófet.°

13

 También  las  casas  de  Jerusalem  y  las 

casas de los reyes de Judá, que están con-

taminadas, serán como este lugar de Tó-

fet:  todas  las  casas  sobre  cuyos  terrados 

queman incienso a todo el ejército de los 

cielos y vierten libaciones a otros dioses.

14

 Y  volvió  Jeremías  de  Tófet,  a  donde 

lo  había  enviado  YHVH  a  profetizar,  y 

se  puso  de  pie  en  el  atrio  de  la  Casa  de 

YHVH, y dijo a todo el pueblo:

15

 Así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel: 

He aquí Yo traigo sobre esta ciudad y so-

bre todas sus aldeas todos los males que 

he  hablado  contra  ella,  por  cuanto  han 

endurecido  su  cerviz  para  no  escuchar 

mis palabras.

Pasur

20

Pasur ben Imer, sacerdote que pre-

sidía como príncipe en la Casa de 

YHVH,  oyó  a  Jeremías  profetizar  estas 

cosas.

2

 Y Pasur hizo azotar al profeta Jeremías 

y lo puso en el cepo que estaba en la puer-

ta alta de Benjamín,° la cual conducía a la 

Casa de YHVH.

3

 A la mañana siguiente, Pasur sacó a Je-

remías del cepo; y Jeremías le dijo: YHVH 

no te llama con el nombre de Pasur, sino 

Magor-missabib.°

4

 Porque  así  dice  YHVH:  He  aquí  Yo  te 

constituyo en terror° para ti y todos tus 

amigos,  y  caerán  por  la  espada  de  sus 

enemigos, y tus ojos lo verán: Entregaré 

a todo Judá en mano del rey de Babilonia, 

quien  los  llevará  cautivos  a  Babilonia  y 

los matará con la espada.

5

 Entregaré  asimismo  todas  las  riquezas 

de esta ciudad, todos sus productos y bie-

nes, y pondré en mano de sus enemigos 

todos los tesoros de los reyes de Judá, y 

los saquearán y los llevarán a Babilonia.

6

 Y tú, Pasur, y todos los que habitan en 

tu casa iréis al cautiverio, y tú entrarás en 

Babilonia,  y  allí  morirás,  y  allí  serás  se-

pultado, tú y todos tus amigos, a quienes 

profetizaste mentiras.

Lamento

7

    Me sedujiste YHVH, y me dejé 

seducir.

Fuiste más fuerte que yo, 

prevaleciste.

Todo el día soy objeto de escarnio,

Todos se burlan de mí,

8

    Porque siempre que hablo,

Que grito, que proclamo:

¡Violencia y destrucción!,

La palabra de YHVH se me vuelve 

objeto de burla y oprobio todo 

el día.

9

    Y si digo:

No me acordaré más de Él,

Ni hablaré más en su Nombre,

Siento en mi corazón un fuego 

abrasador,

Encerrado en mis huesos,

Que me esfuerzo en contener, pero 

no puedo.

10

    Oí a muchos susurrando:

¡Magor-missabib!°

¡Denunciadlo, denunciémoslo!

Aun mis hombres de confianza 

esperan que claudique;

Dicen: Quizá sea engañado;

Entonces prevaleceremos contra él y 

tomaremos nuestra venganza.

19.11 

→7.31 nota.  19.12 Esto es, horno. Juego de palabras (v.11 y 13).  20.2 No se confunda con la puerta de Jerusalem del 

mismo nombre 

→37.13; 38.7.  20.3 Esto es, terror por todas partes.  20.4 Heb. magor.  20.10 Reminiscencia burlona hacia 

Jeremías 

→20.3. 


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Jeremías 20:11

790

11

    Pero YHVH está conmigo como 

poderoso gigante.

Mis perseguidores tropezarán y no 

prevalecerán contra mí.

Sentirán la confusión de su fracaso,

Su vergüenza eterna, que jamás será 

olvidada.

12

    ¡Oh YHVH Sebaot, que pruebas al 

justo, escudriñando los riñones y 

el corazón!

Haz que vea tu venganza en ellos,

Porque a ti he expuesto mi causa.

13

    Cantad a YHVH, alabad a YHVH,

Que libró el alma del pobre

De mano del malvado.

14

    ¡Maldito el día en que nací!

¡No sea bendecido el día en que mi 

madre me dio a luz!

15

    Maldito el hombre que dio nuevas a 

mi padre, diciendo:

¡Te ha nacido un hijo varón!,

Causándole gran alegría:

16

    Sea tal hombre como las ciudades

que destruyó YHVH sin apiadarse,

Y oiga clamores por la mañana y 

gritos de alarma° al mediodía,

17

    Porque no me hizo morir en el seno 

materno,

Para que mi madre fuera mi sepulcro,

Y su seno una eterna preñez.

18

    ¿Para qué salí del vientre para ver 

aflicción y dolor,

Y acabar mis días en vergüenza?

Destrucción del reino

21

Revelación  que  tuvo  Jeremías  de 

parte de YHVH, cuando el rey Sede-

quías le envió a Pasur ben Malquías° y al 

sacerdote Sofonías ben Maasías, diciendo:

2

 Te  ruego  que  consultes  a  YHVH  de 

nuestra parte, porque Nabucodonosor rey 

de Babilonia hace guerra contra nosotros: 

quizá YHVH haga con nosotros conforme 

a todas sus maravillas para que aquél se 

retire de nosotros.

3

 A lo cual Jeremías les respondió: Así di-

réis a Sedequías:

4

 Así dice YHVH Dios de Israel: He aquí, Yo 

hago volver atrás las armas de guerra que 

están en vuestras manos, con que peleáis 

contra  el  rey  de  Babilonia  y  los  caldeos, 

los cuales os asedian por fuera del muro. A 

ellos los reuniré en medio de esta ciudad,

5

 y Yo mismo pelearé contra vosotros con 

mano extendida y con brazo fuerte, lleno 

de  ira,  con  ardiente  indignación  y  con 

grande enojo.

6

 Y heriré a los habitantes de esta ciudad, 

tanto al hombre como la bestia, que mo-

rirán de gran pestilencia.

7

 Después de esto, dice YHVH, entregaré 

a Sedequías rey de Judá, y a sus siervos, 

y al pueblo (a los que en esta ciudad ha-

yan quedado de la peste, de la espada y del 

hambre), en mano de Nabucodonosor, rey 

de Babilonia, en mano de los demás ene-

migos, y en mano de los que buscan sus 

vidas; y él los herirá a filo de espada; no 

tendrá piedad de ellos, ni perdonará, ni se 

compadecerá.

8

 Y a este pueblo le dirás: Así dice YHVH: 

He aquí Yo pongo delante de vosotros el ca-

mino de la vida y el camino de la muerte.

9

 El que permanezca en esta ciudad mo-

rirá a espada, de hambre y de peste; pero 

quien  salga  y  se  entregue  a  los  caldeos 

que  os  asedian,  vivirá,  y  tendrá  su  vida 

por botín.

10

 Porque  he  puesto  mi  rostro  contra 

esta ciudad para mal y no para bien, dice 

YHVH: será entregada en mano del rey de 

Babilonia, el cual la quemará con fuego°.

11

 En cuanto a la casa del rey de Judá, oíd 

el oráculo de YHVH:

12

    ¡Oh casa de David!, así dice YHVH:

Id presto a administrar justicia,

Librad al despojado de mano del 

opresor;

No sea que mi indignación salga 

como un fuego,

Y arda de modo que no haya quien la 

apague,

A causa de la maldad de vuestros 

hechos.

13

    ¡Heme aquí contra ti, oh moradora 

del valle,

Y de la roca de la llanura!,° dice 

YHVH.

20.16 .alarma. Esto es, son de trompetas o gritos de guerra producidos durante la batalla.  21.1 No se confunda con Pasur 

ben Imer 

→20.1.  21.10 Lit. que la quemará con el fuego.  21.13 La posición de Jerusalem, rodeada de colinas →Sal.125.2, y 

ubicada al mismo tiempo en una elevación entre varios valles, le da una protección especial, y explica la alusión como moradora 

del valle y roca de la llanura (esta última prob. se refiere al monte Sión).


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Jeremías 22:19

791

Vosotros que decís:

¿Quién bajará contra nosotros, 

y quién entrará en nuestras 

moradas?

14

    Os castigaré° como merecen 

vuestras obras, dice YHVH,

Y a su bosque prenderé un fuego que 

devorará todo su alrededor.

Contra los reyes de Judá

22

Así  me  dijo  YHVH:  Baja  a  la  casa 

del rey de Judá y habla allí esta pa-

labra,

2

 y di: Oye el oráculo de YHVH, oh rey de 

Judá, que te sientas sobre el trono de Da-

vid, tú, y tus siervos y tu pueblo que entra 

por estas puertas.

3

 Así  dice  YHVH:  Haced  lo  recto  y  lo 

justo, y librad al despojado de mano del 

opresor. No maltratéis ni hagáis violen-

cia al extranjero, al huérfano ni a la viu-

da, ni derraméis sangre inocente en este 

lugar.

4

 Porque si de verdad obedecéis esta pa-

labra, entonces entrarán por las puertas 

de esta casa reyes que se sienten sobre el 

trono de David, que monten en carros y 

caballos, ellos, sus siervos y su pueblo.

5

 Pero si no escucháis estas palabras, por 

mí mismo he jurado, dice YHVH, que esta 

casa quedará desolada.

6

 Porque así dice YHVH acerca de la casa 

del rey de Judá: Eres para mí como el bos-

que° de Galaad,°

Como la cumbre del Líbano,

Pero ciertamente te convertiré en 

un desierto,

En ciudad deshabitada,

7

    Y consagraré° contra ti destructores,

Cada uno con sus armas,

Que talarán tus cedros más selectos 

y los echarán al fuego.

8

 Entonces  pasarán  muchas  naciones 

junto a esta ciudad, y cada cual dirá a su 

compañero: ¿Por qué ha obrado así YHVH 

con esta gran ciudad?

9

 Y  dirán:  Porque  abandonaron  el  pacto 

de YHVH su Dios, y se postraron ante dio-

ses extraños y los sirvieron.

10

    No lloréis al muerto, ni os lamentéis 

por él;

Llorad con amargura por el que 

parte,°

Porque no volverá a ver jamás su 

tierra natal.

11

 Porque  así  dice  YHVH  acerca  de  Sa-

lum° ben Josías, rey de Judá, el cual reinó 

en lugar de su padre Josías, el cual ha sa-

lido de este lugar:

No volverá más aquí,

12

    En el lugar adonde lo han llevado 

cautivo,

Allí morirá, y no verá más 

esta tierra.

13

    ¡Ay del que edifica su casa con 

injusticia,

Y sus aposentos altos sin equidad,

Que exige el servicio de su prójimo 

de balde,

Y no le da la paga de su trabajo!

14

    Que dice: Me edificaré una casa 

espaciosa con amplios salones,

Le abriré ventanas,

Le pondré artesonados de cedro,

La pintaré de bermellón.

15

    ¿Piensas que eres rey porque 

compites en obras de cedro?

Si tu padre comió y bebió y le fue 

bien,

Es porque practicó la justicia y el 

derecho.

16

    Hizo justicia a pobres e indigentes, 

por eso le fue bien.

¿No fue eso conocerme a mí?, dice 

YHVH.

17

    Pero tus ojos y tu corazón no están 

más que para tu egoísmo,

Para derramar la sangre inocente,

Para la opresión y para la violencia.

18

    Por tanto, así dice YHVH acerca de 

Joacim ben Josías, rey de Judá:

No lo llorarán, diciendo:

¡Ay hermano mío!, ¡ay hermana!

Ni lo plañirán: ¡Ay señor!, ¡Ay 

majestad!

19

    Lo enterrarán como un asno:

Lo arrastrarán y lo tirarán fuera de 

las puertas de Jerusalem.

21.14 Lit. Yo visitaré sobre vosotros.  22.6 .bosque.  22.6 Famoso por sus bosques, productor de madera para la construc-

ción. 

22.7 Lit. santificaré. Alusión a la práctica de prepararse para la guerra santa 

→6.4 nota.  22.10 Prob. Josías, el último gran 

rey de Judá 

→2 Cr.35.24, 25; 2 Cr.36.1-4.  22.11 Esto es, Joacaz →1 Cr.3.15; 2 Cr.36.1.


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Jeremías 22:20

792

20

    Sube al Líbano y clama,

Eleva tu voz en Basán;

Clama desde el Abarim,°

Porque todos tus amantes han sido 

destruidos.

21

    En tu gran prosperidad te hablé,

Pero dijiste: No escucharé.

Éste ha sido tu camino desde tu 

juventud:

Nunca escuchaste mi voz.

22

    El viento pastoreará a todos tus 

pastores,

Y tus amantes irán al cautiverio.

Ciertamente serás avergonzada y 

confundida

Por todas tus maldades.

23

    Oh moradora del Líbano,

Que haces tu nido en los cedros,

¡Cuán lastimosa serás cuando te 

acometan las angustias,

Los dolores como de parturienta!

24

 ¡Vivo Yo!, dice YHVH, que aunque Co-

nías° ben Joacim, rey de Judá, fuera ani-

llo de sellar en mi diestra, aun de allí te 

arrancaría.

25

 Te entregaré en mano de los que bus-

can tu vida, en mano de aquellos que tú 

temes:  en  mano  de  Nabucodonosor,  rey 

de Babilonia, y en mano de los caldeos.

26

 Y te arrojaré a ti y a tu madre, la que 

te dio a luz, a un país extraño, donde no 

nacisteis, y allí moriréis;

27

 y  no  volverán  a  la  tierra  que  ansían 

volver.

28

    Ese Conías, ¿es una vasija rota, 

despreciable, un trasto inútil?

¿Por qué lo expulsan con su 

estirpe, y lo echan a una tierra 

desconocida?

29

    ¡Tierra, tierra, tierra!,°

Oye el oráculo de YHVH;

30

 Así dice YHVH:

Inscribid° a este hombre como sin 

hijos,

Como varón malogrado° en la vida,

Porque ninguno de su descendencia 

llegará a sentarse en el trono de 

David para reinar en Judá.

Los malos pastores

23

¡Ay de los pastores que destruyen y 

dispersan las ovejas de mi pastizal!, 

dice YHVH.

2

 Por eso, así dice YHVH, Dios de Israel, 

acerca de los pastores que pastorean a mi 

pueblo:  Vosotros  habéis  dispersado  mis 

ovejas, las habéis ahuyentado y no las ha-

béis atendido. He aquí Yo os castigo por la 

maldad de vuestras acciones, dice YHVH.

3

 Yo reuniré el remanente de mis ovejas 

de todas las tierras adonde las he arroja-

do, y las haré volver a sus moradas; y cre-

cerán y se multiplicarán.

4

 Y  pondré  sobre  ellas  pastores  que  las 

pastoreen, y no temerán más, ni se turba-

rán, y niguna faltará, dice YHVH.

5

    He aquí, vienen días, dice YHVH,

En que levantaré a David un renuevo 

justo;

Y reinará y obrará prudentemente,

Y hará juicio y justicia en la tierra.

6

    En sus días será salvo Judá,

E Israel habitará confiado,

Y se apellidará con este nombre:

YHVH Sidkenu.°

7

 Mirad  que  llegan  días,  dice  YHVH,  en 

que no dirán más: ¡Vive YHVH que hizo 

subir a los hijos de Israel de la tierra de 

Egipto!

8

 sino: ¡Vive YHVH que hizo subir y tra-

jo la descendencia de la casa de Israel de 

la tierra del Norte, y de todas las tierras 

adonde los había arrojado! Y habitarán en 

su tierra.

9

 A los profetas:

Mi corazón está quebrantado dentro 

de mí,

Y todos mis huesos se estremecen.

He venido a ser como un ebrio,

Como un hombre vencido por el vino,

A causa de YHVH,

Y a causa de sus santas palabras.

10

    La tierra está llena de adulterios,

A causa de falsos° juramentos la 

tierra está de luto:

Los pastos del desierto se han 

secado,

22.20  Región  montañosa  al  E  del  Jordán  y  al  NO  de  Moab;  seguramente,  el  monte  Nebo  estaba  localizado  en  este  lugar 

→Nm.27.12 y 33.47.  22.24 Contracción del nombre Jeconías (Joaquín →2 R.24.8; también Jer.24.1; 27.20; 28.4 y 29.2). 

22.29 Heb. erets = tierra. A no ser que el contexto indique lo contrario, debe considerarse como una referencia al territorio de 

Israel. 

22.30 Esto es, en los registros genealógicos de los reyes de Judá.  22.30 Esto es, que no puede engendrar.  23.6 Esto 

es, Justicia nuestra 

→33.16.  23.10 .falsos.


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Jeremías 23:29

793

Porque la carrera° de ellos es mala,

Y su poder un abuso.

11

    Profetas y sacerdotes, ambos son 

impíos.

En mi propia Casa encuentro sus 

maldades, dice YHVH.

12

    Por tanto su camino se volverá 

resbaladizo,

Serán empujados a las tinieblas y 

caerán en ellas,

Porque traeré el mal sobre ellos 

en el año de su visitación, dice 

YHVH.

13

    Entre los profetas de Samaria he 

visto esta locura:

Profetizan por Baal extraviando a 

Israel, mi pueblo.

14

    Entre los profetas de Jerusalem he 

visto algo horrible:

Adúlteros y mentirosos que apoyan a 

los malvados,

Para que nadie se convierta de su 

maldad.

Todos ellos se me han hecho como 

Sodoma,

Y sus habitantes como Gomorra.

15

    Por tanto, así dice YHVH Sebaot 

acerca de estos profetas:

He aquí Yo les doy a comer ajenjo,

Y les doy a beber aguas de hiel;

Porque de los profetas de Jerusalem 

ha salido la impiedad hacia toda 

la tierra.

16

    Así dice YHVH Sebaot:

No escuchéis a los profetas que os 

profetizan:

Os llenan de vanas esperanzas,

Visión sacada de su propio corazón,

No de la boca de YHVH.

17

    Dicen de continuo a quienes me 

desprecian:

YHVH ha dicho: ¡Tendréis paz!

Y a todo el que anda en la dureza de 

su corazón,

Le dicen: ¡Ningún mal vendrá sobre 

vosotros!

18

    Pero, ¿cuál de ellos ha estado en el 

consejo de YHVH

Para percibir y oír su palabra?,

¿Quién de ellos ha oído su palabra y 

la ha escuchado?

19

    He aquí una tempestad de YHVH ha 

salido con furia.

Sí, una tempestad se arremolina,

Se precipita sobre la cabeza de los 

impíos.

20

    No se apartará la ira de YHVH hasta 

que haya ejecutado,

Y realizado el propósito de su 

corazón.

En el final de los días° entenderéis 

perfectamente:

21

    Yo no envié a esos profetas,

Pero ellos corrían;

No les hablé, pero ellos profetizaban.

22

    De haber estado en mi consejo,

Habrían hecho oír mis palabras a mi 

pueblo,

Y los habrían apartado de su mal 

camino,

Y de la maldad de sus acciones.

23

    ¿Soy Yo Dios sólo de cerca y no Dios 

de lejos?, dice YHVH.

24

    Porque uno se esconda en su 

escondrijo,

¿No lo veré Yo?, dice YHVH.

¿No lleno Yo los cielos y la tierra?, 

dice YHVH.

25

 He oído lo que dicen los tales profetas 

que  profetizan  mentiras  en  mi  Nombre, 

diciendo: ¡He tenido un sueño, he tenido 

un sueño!

26

 ¿Hasta cuándo habrá esto en el corazón 

de  los  profetas  que  profetizan  mentira, 

que profetizan el engaño de su corazón?

27

 Con  los  sueños  que  cuentan  unos  a 

otros, piensan lograr que mi pueblo olvi-

de mi Nombre, así como sus padres olvi-

daron mi Nombre a causa de Baal.

28

 El profeta que tenga un sueño, cuente 

ese sueño, y el que reciba mi palabra, diga 

mi palabra con fidelidad.

¿Qué tiene que ver la paja con el 

trigo? dice YHVH.

29

    ¿No es mi palabra como fuego, dice 

YHVH,

Y como un martillo que rompe la 

piedra en pedazos?

23.10 Esto es, curso de vida de una persona.  23.20 El final de los días, puede referirse al final de un periodo histórico contem-

plado por el profeta, o al futuro inaugurado por el Mesías. En contextos como éste es posible que aluda al final del periodo de 

castigo anunciado por Dios.


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Jeremías 23:30

794

30

 Por tanto, he aquí Yo estoy contra los 

profetas, dice YHVH, que hurtan mis pa-

labras, cada cual a su prójimo.

31

 He  aquí  Yo  estoy  contra  los  profetas, 

dice YHVH, que sueltan sus lenguas y di-

cen: Él dice.

32

 He  aquí  Yo  estoy  contra  los  que  pro-

fetizan  sueños  falsos,  dice  YHVH,  y  los 

cuentan, y extravían a mi pueblo con sus 

mentiras y su jactancia, porque Yo no los 

he enviado ni les he dado orden, y ningún 

provecho  han  traído  a  este  pueblo,  dice 

YHVH.

33

 Y  cuando  este  pueblo,  o  el  profeta,  o 

el sacerdote te pregunte, diciendo: ¿Cuál 

es  la  carga°  de  YHVH?,  les  responderás: 

Vosotros sois la carga,° y Yo os desecharé, 

dice YHVH.

34

 Si un sacerdote o uno del pueblo dice: 

¡Carga de YHVH! lo castigaré a él y a su 

casa.

35

 Cada cual a su prójimo y a su hermano 

dirá así: ¿Qué responde YHVH? ¿Qué dice 

YHVH?

36

 No mencionéis más: Carga de YHVH, 

pues  cada  uno  cargará  con  sus  propias 

palabras, ya que habéis pervertido las pa-

labras del Dios viviente, de YHVH Sebaot, 

nuestro Dios.

37

 Así  dirás  al  profeta:  ¿Qué  responde 

YHVH? ¿Qué dice YHVH?

38

 Pero  si  persistís  en  decir  ¡Carga  de 

YHVH!,  entonces,  así  dice  YHVH:  Por  lo 

mismo  que  decís  esta  palabra,  ¡Carga  de 

YHVH!, aun cuando Yo he enviado a deci-

ros: No digáis: ¡Carga de YHVH!, entonces,

39

 por haberlo dicho, Yo os olvidaré por 

completo  y  os  arrojaré  de  mi  presencia, 

juntamente con la ciudad que di a voso-

tros y a vuestros padres;

40

 y traeré sobre vosotros afrenta perpe-

tua  y  humillación  eterna,  que  no  serán 

olvidadas.

La señal de los higos

24

YHVH me mostró dos cestas de hi-

gos  puestas  delante  de  la  Casa  de 

YHVH,  después  que  Nabucodonosor  rey 

de  Babilonia  hubo  deportado  a  Jeconías 

ben Joacim, rey de Judá, y a los príncipes 

de Judá con los artesanos y los herreros, 

desde Jerusalem, y los hubo llevado a Ba-

bilonia.

2

 Una cesta tenía higos muy buenos, como 

brevas, y la otra cesta tenía higos tan ma-

los, que de malos no se podían comer.

3

 Y YHVH me dijo: ¿Qué ves, Jeremías? Y 

respondí: Higos, higos buenos, muy bue-

nos, y otros malos, muy malos, que de tan 

malos no pueden comerse.

4

 Y vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

5

 Así dice YHVH, Dios de Israel: Como a es-

tos higos buenos, así consideraré para bien 

a los exiliados de Judá, a quienes envié des-

de este lugar a la tierra de los caldeos.

6

 Pues  pondré  mis  ojos  sobre  ellos  para 

bien, y los haré volver a esta tierra, y los 

edificaré y no los derribaré, y los plantaré 

y no los arrancaré.

7

 Les  daré  un  corazón  para  que  me  co-

nozcan, y sepan que Yo soy YHVH, y ellos 

serán mi pueblo y Yo seré su Dios, porque 

se volverán a mí de todo corazón.

8

 Pero como los higos malos, que de tan 

malos no pueden comerse, así son aque-

llos de quienes dice YHVH: Así entregaré 

a  Sedequías  rey  de  Judá,  y  a  sus  prínci-

pes y al resto de Jerusalem, los que hayan 

quedado en esta tierra, y los que habitan 

en la tierra de Egipto:

9

 Los convertiré en espanto, en mal para 

todos los reinos de la tierra, oprobio y mal 

ejemplo, insulto y maldición, en todos los 

lugares adonde los arrojaré.

10

 Y  enviaré  contra  ellos  la  espada,  el 

hambre  y  la  pestilencia,  hasta  que  sean 

exterminados de la tierra que les di a ellos 

y a sus padres.

Los setenta años

25

Palabra que recibió Jeremías acer-

ca de todo el pueblo de Judá en el 

año cuarto de Joacim ben Josías, rey de 

Judá, año primero de Nabucodonosor, rey 

de Babilonia,

2

 la cual habló el profeta Jeremías a todo 

el pueblo de Judá y a todos los habitantes 

de Jerusalem, diciendo:

23.33 Esto es, la profecía. Véase nota siguiente.  23.33 Aquí y en los vv. siguientes, el profeta hace un juego de palabras con el 

término hebreo masa’, que tiene dos significados muy diferentes. Por una parte puede aludir a cualquier tipo de carga (sea un 

objeto pesado, un impuesto, o algo similar); por otra, puede referirse a una profecía u oráculo pronunciado contra alguien. Se 

traduce lit. para remarcar el juego de palabras.


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Jeremías 25:26

795

3

 Desde  el  año  decimotercero  de  Josías 

ben Amón, rey de Judá, hasta hoy, duran-

te estos veintitrés años ha venido a mí la 

palabra de YHVH, y os he hablado madru-

gando y sin cesar, y no habéis escuchado.

4

 YHVH  os  envió  a  todos  sus  siervos  los 

profetas,  madrugando  y  sin  cesar,  y  no 

quisisteis escuchar ni prestar oído,

5

 cuando decían: Conviértase cada uno de 

su mal camino y de la perversidad de sus 

obras, y moraréis en la tierra que YHVH 

os dio a vosotros y a vuestros padres des-

de siempre y para siempre.

6

 No  vayáis  en  pos  de  otros  dioses  para 

servirlos  ni  postraros  ante  ellos,  ni  me 

provoquéis a ira con la obra de vuestras 

manos, y no os causaré mal.

7

 No  me  escuchasteis,  dice  YHVH,  y  me 

habéis  provocado  a  ira  con  la  obra  de 

vuestras manos para vuestro propio mal.

8

 Por  tanto,  así  dice  YHVH  Sebaot:  Por 

cuanto no habéis escuchado mis palabras,

9

 Yo  mandaré  por  los  pueblos  del  norte 

y  por  Nabucodonosor,  rey  de  Babilonia, 

siervo mío, dice YHVH, y los traeré contra 

esta tierra, contra sus habitantes y contra 

todas  estas  naciones  de  alrededor,  y  los 

consagraré al exterminio, y los convertiré 

en objeto de espanto, burla, y desolación 

perpetua.

10

 Haré desaparecer de entre ellos el gri-

to de gozo y el grito de alegría, el canto 

del novio y el canto de la novia, el rumor 

de  las  piedras  de  moler,°  y  la  luz  de  la 

lámpara.

11

 Y toda esta tierra se convertirá en de-

solación y ruinas, y estas gentes servirán 

al rey de Babilonia durante setenta años.

12

 Pasados los setenta años, dice YHVH, 

pediré cuentas al rey de Babilonia, y a su 

nación, la tierra de los caldeos, de todas 

sus iniquidades, y la convertiré en deso-

lación perpetua.

13

 Atraeré sobre esa tierra todas las pala-

bras que predije contra ella: cuanto está 

escrito en este rollo, profetizado por Jere-

mías contra todas estas naciones.

14

 Porque  ellas,  sí,  ellas  mismas  serán 

reducidas  a  servidumbre  por  grandes 

naciones  y  reyes  poderosos.  Así  les  re-

compensaré  conforme  a  sus  hechos  y 

conforme a la obra de sus manos.

Contra las naciones

15

 Porque así me dice YHVH, el Dios de 

Israel:  Toma  de  mi  mano  esta  copa  del 

vino  de  mi  ardiente  indignación,  y  haz 

que beban de ella todas las naciones con-

tra las que Yo te envío.

16

 Beberán,  y  se  tambalearán,°  y  enlo-

quecerán a causa de la espada que enviaré 

entre ellas.

17

 Tomé,  pues,  la  copa  de  la  mano  de 

YHVH, e hice que bebieran de ella todas 

las  naciones  a  las  que  YHVH  me  había 

enviado:

18

 Jerusalem y las ciudades de Judá, sus 

reyes y sus príncipes, para convertirlos en 

desolación, en horror, en burla y en mal-

dición, como son hasta hoy.°

19

 Faraón, rey de Egipto, sus siervos, sus 

príncipes, todo su pueblo,

20

 y toda la gente que está entre ellos;° to-

dos los reyes de la tierra de Uz, y todos los 

reyes de la tierra de los filisteos: Ascalón, 

Gaza, Ecrón y el remanente de Asdod.

21

 Edom, y Moab, y los hijos de Amón;

22

 todos los reyes de Tiro, todos los reyes 

de Sidón y los reyes de las costas° que es-

tán más allá del mar;

23

 Dedán, Tema, y Buz y todos los que se 

rapan las sienes;°

24

 todos  los  reyes  de  Arabia  y  todos  los 

reyes de la gente mezclada° que habita en 

el desierto;

25

 todos los reyes de Zimri, todos los re-

yes de Elam y los reyes de Media;

26

 todos  los  reyes  del  norte,  próximos  y 

lejanos, uno tras otro, y todos los reinos 

del  mundo  que  están  sobre  la  faz  de  la 

25.10 Esto es, el molinillo. Instrumento para moler grano. Su ruido característico reflejaba, de alguna manera, la vida cotidiana, 

por lo que la desaparición de este sonido apunta al cese de la vida apacible familiar. 

25.16 Esto es, el movimiento vacilante del 

ebrio. 

25.18 Lit. como hoy. Es decir, algo que el profeta está hablando (sea una promesa de Dios hecha en el pasado 

→11.5, 

o como aquí, el anuncio de acontecimientos futuros) se está cumpliendo en ese mismo tiempo. 

25.20 Lit. a toda la mezcla de 

gente. Es decir, un grupo heterogéneo de personas que se unen a un pueblo o nación para habitar como extranjeros entre sus 

habitantes. Es prob. que aquí se refiera a pueblos vasallos de Egipto o mercenarios extranjeros que servían a Faraón. 

25.22 

O  islas.  Colonias  fundadas  por  fenicios  en  la  costa  e  islas  mediterráneas  o  simplemente  naciones  lejanas

25.23 

→9.26 

nota. 

25.24 Lit. de la mezcla de gente 

→25.20 nota. Prob. conjunto de razas y tribus nómadas del desierto de Arabia. 


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Jeremías 25:27

796

tierra;  y  el  rey  de  Sheshak°  beberá  des-

pués de ellos.

27

 Les dirás, pues: Así dice YHVH Sebaot, 

Dios  de  Israel:  Bebed,  embriagaos  y  vo-

mitad; caed y no os levantéis más ante la 

espada que Yo envío entre vosotros.

28

 Y si rehúsan tomar la copa de tu mano 

para beber, les dirás: Así dice YHVH Se-

baot: La beberéis sin remedio,

29

 pues he aquí que si comienzo a desen-

cadenar el mal en la ciudad sobre la cual 

es  invocado  mi  Nombre,  ¿quedaréis  vo-

sotros  impunes?  No  quedaréis  impunes, 

pues  Yo  convoco  la  espada  contra  todos 

los habitantes de la tierra, dice YHVH Se-

baot.

30

 Por tanto, profetízales todas estas pa-

labras, diles:

YHVH ruge desde lo alto,

Desde la morada de su santidad 

hace resonar su voz;

Ruge con fuerza sobre su morada;

Entona la copla de los que pisan el 

lagar,

Contra todos los habitantes del 

mundo,

31

    Y su eco resuena hasta los confines 

de la tierra,

Porque YHVH entabla pleito con los 

gentiles;

Viene a juzgar a todos los hombres,

Y a hacer ejecutar a los culpables, 

dice YHVH.

32

    Así dice YHVH Sebaot:

Mira, la calamidad pasa de nación en 

nación:

Un gran huracán se levanta de la 

parte más remota de la tierra.

33

    Los muertos por YHVH yacerán de 

uno a otro extremo de la tierra.

No serán llorados, ni recogidos,

Ni enterrados, sino que serán como 

estiércol sobre la faz de la tierra.

34

    ¡Gemid, pastores, y clamad!

¡Revolcaos en la ceniza,° mayorales 

del rebaño!

Los días del degüello y de vuestra 

dispersión están cumplidos;

Caeréis como un vaso precioso,

35

    Y no habrá refugio para los pastores° 

ni escape para los mayorales del 

rebaño.

36

    ¡Voz del clamor de los pastores y 

del gemido de los mayorales del 

rebaño!,

Porque YHVH ha destruido sus 

pastos,

37

    Los pastizales han sido reducidos al 

silencio,

A causa del ardor de la ira de YHVH.

38

    Ha abandonado cual león joven su 

guarida,

Porque el país se ha convertido en 

horror,

Por la fiereza de la espada opresora,

Y a causa de su ardiente ira.

Amenazas

26

Al comienzo del reinado de Joacim 

ben Josías, rey de Judá, vino pala-

bra de parte de YHVH, diciendo:

2

 Así dice YHVH: Ponte en el atrio de la 

Casa de YHVH, y habla a todas las ciuda-

des de Judá que vienen a postrarse en la 

Casa de YHVH, todas las palabras que Yo 

te he mandado hablarles, sin omitir una 

sola.

3

 Quizá oigan, y cada uno se convierta de 

su perverso camino, y Yo desista del mal 

que había pensado hacerles por la maldad 

de sus obras.

4

 Les dirás: Así dice YHVH: Si no me es-

cucháis, para andar según mi Ley que he 

puesto ante vosotros,

5

 obedeciendo las palabras de mis siervos 

los profetas que vengo enviando a voso-

tros  desde  muy  temprano  e  incesante-

mente, sin que las hayáis escuchado,

6

 reduciré esta Casa como Silo, y esta ciu-

dad  será  objeto  de  maldición  para  todas 

las naciones de la tierra.

7

 Y los sacerdotes, los profetas y todo el 

pueblo oyeron a Jeremías hablar estas pa-

labras en la Casa de YHVH.

25.26 Esto es, Babilonia. El nombre Sheshak proviene de un recurso llamado atbás, y que consiste en formar un nombre a 

partir de otro, sustituyendo las letras del sustantivo original por otras según la siguiente correspondencia. la primera letra del 

alfabeto se cambia por la última; la segunda, por la penúltima; y así sucesivamente. De esta manera, en el caso del sustantivo 

babel (Babilonia), las letras b, b, l se cambian por las letras sh, sh, k, de donde resulta Sheshak

25.34 .en la ceniza 

→6.26. 

25.35 Lit. perecerá el refugio de los pastores.


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Jeremías 27:5

797

8

 Y  cuando  Jeremías  terminó  de  decir 

todo lo que YHVH le había mandado decir 

a todo el pueblo, los sacerdotes, los profe-

tas y el pueblo entero le echaron mano, y 

exclamaron: ¡Morirás sin remedio!

9

 ¿Por qué has profetizado en nombre de 

YHVH, diciendo: Esta Casa será como Silo, 

y esta ciudad quedará desolada, sin nin-

gún habitante? Y todo el pueblo se juntó 

contra Jeremías en la Casa de YHVH.

10

 Cuando  los  príncipes  de  Judá  oyeron 

estas cosas, subieron desde el palacio real 

a  la  Casa  de  YHVH,  y  se  sentaron  en  la 

entrada  del  nuevo  pórtico  de  la  Casa  de 

YHVH.

11

 Entonces los sacerdotes y los profetas 

hablaron a los príncipes y a todo el pue-

blo,  diciendo:  ¡Este  hombre  es  digno  de 

muerte,  porque  ha  profetizado  contra 

esta ciudad, como habéis oído con vues-

tros propios oídos!

12

 Entonces  Jeremías  habló  a  todos  los 

príncipes  y  a  todo  el  pueblo,  diciendo: 

YHVH me ha enviado a profetizar contra 

esta  Casa  y  contra  esta  ciudad  todas  las 

palabras que habéis oído.

13

 Ahora pues, enmendad vuestros cami-

nos y vuestras obras, y escuchad la voz de 

YHVH vuestro Dios, para que YHVH de-

sista  de  haceros  el  mal  que  ha  predicho 

contra vosotros.

14

 En  cuanto  a  mí,  heme  aquí  en  vues-

tras manos; haced de mí lo que os parezca 

bueno y recto.°

15

 Pero  sabed  bien  que  si  vosotros  me 

matáis, ciertamente echaréis sangre ino-

cente sobre vosotros, y sobre esta ciudad y 

sus moradores, porque en verdad, YHVH 

me ha enviado a vosotros para proferir a 

vuestros oídos todas estas palabras.

16

 Entonces los príncipes y todo el pue-

blo dijeron a los sacerdotes y a los profe-

tas: Este hombre no merece sentencia de 

muerte, pues nos ha hablado en el nom-

bre de YHVH nuestro Dios.

17

 Y algunos de los ancianos del país se 

levantaron y hablaron a toda la asamblea 

del pueblo, diciendo:

18

 Miqueas  de  Moreset  profetizó  en  los 

días  de  Ezequías  rey  de  Judá,  y  habló  a 

todo el pueblo de Judá, diciendo: Así dice 

YHVH Sebaot: Sión será arada como un 

campo, y Jerusalem se convertirá en un 

montón de ruinas, y el monte de la Casa 

en un cerro boscoso.

19

 ¿Acaso  Ezequías,  rey  de  Judá  y  todo 

Judá  intentaron  matarlo?  ¿No  temió  el 

rey  a  YHVH,  y  lo  aplacó  de  tal  manera, 

que YHVH desistió del mal que había de-

cretado contra ellos? Y nosotros, ¿causa-

remos un mal tan grande contra nosotros 

mismos?

20

 Hubo  también  un  hombre  que  profe-

tizaba en el nombre de YHVH: Urías ben 

Semaías,  de  Quiriat-jearim,  y  profetizó 

contra esta ciudad y contra esta tierra con-

forme a todas las palabras de Jeremías.

21

 Y cuando el rey Joacim y todos sus po-

derosos y todos los príncipes oyeron sus 

palabras,  el  rey  procuró  matarlo,  pero 

cuando  Urías  se  enteró,  tuvo  temor  y 

huyó a Egipto.

22

 Entonces el rey Joacim envió hombres 

a Egipto: a Elnatán ben Acbor, y ciertos 

hombres que fueron con él a Egipto;

23

 y allí capturaron a Urías, lo sacaron de 

Egipto  y  lo  llevaron  ante  el  rey  Joacim, 

quien lo mató a espada y echó su cadáver 

en los sepulcros de los hijos del pueblo.

24

 Entonces  Ahicam  ben  Safán,  se  hizo 

cargo de Jeremías, a fin de que no lo en-

tregaran para que fuera ejecutado a ma-

nos del pueblo.

La señal de los yugos

27

Al comienzo del reinado de Joacim,° 

hijo de Josías, rey de Judá, Jeremías 

recibió palabra de YHVH, diciendo:

2

 Así  me  dice  YHVH:  Hazte  coyundas  y 

yugos, y ponlos sobre tu misma cerviz,

3

 y  envíalos  al  rey  de  Edom,  al  rey  de 

Moab, al rey de los hijos de Amón, al rey 

de Tiro y al rey de Sidón, a través° de los 

mensajeros que vienen a Jerusalem a ver 

a Sedequías, rey de Judá.

4

 Y les darás un encargo para sus señores, 

diciendo: Así dice YHVH Sebaot, Dios de 

Israel: Decid a vuestros señores:

5

 Yo hice la tierra, el hombre y las bestias 

que están sobre la faz de la tierra con mi 

26.14 Lit. conforme a lo bueno y a lo recto a vuestros ojos.  27.1 El TM prob. está alterado aquí. Se refiere a Sedequías 

→v.3. 

27.3 Lit. por mano


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Jeremías 27:6

798

gran poder y con mi brazo extendido, y a 

quien me parece conveniente la doy.

6

 Y  ahora  Yo  he  entregado  todas  estas 

tierras  en  mano  de  Nabucodonosor,  rey 

de Babilonia, siervo mío, e incluso le he 

entregado las bestias del campo para que 

le sirvan.

7

 Todas las naciones le servirán pues a él, 

a  su  hijo  y  al  hijo  de  su  hijo,  hasta  que 

llegue el tiempo de su propia tierra tam-

bién, y sea sometida por grandes naciones 

y poderosos reyes.

8

 Y la nación o el reino que no sirva a Na-

bucodonosor, rey de Babilonia, y que no 

someta su cerviz al yugo del rey de Babi-

lonia, la castigaré con espada, con ham-

bre  y  con  pestilencia,  dice  YHVH,  hasta 

que haya destruido a tal nación por mano 

de él.

9

 Vosotros, pues, no escuchéis a vuestros 

profetas, ni a vuestros adivinos, ni a vues-

tros soñadores, ni a vuestros agoreros, ni 

a vuestros hechiceros, que os hablan di-

ciendo: ¡No serviréis al rey de Babilonia!

10

 Porque  os  profetizan  mentira  para 

haceros  remover  lejos  de  vuestra  tierra, 

y  para  que  Yo  os  eche  fuera,  y  para  que 

perezcáis.

11

 Pero  la  nación  que  someta  su  cerviz 

bajo el yugo del rey de Babilonia y le sir-

va, Yo haré que permanezca en su propia 

tierra, dice YHVH, y la labrará y habitará 

en ella.

12

 Y hablé a Sedequías, rey de Judá, con-

forme  a  todas  estas  palabras,  diciendo: 

¡Someted  vuestras  cervices  bajo  el  yugo 

del rey de Babilonia, servidle a él y a su 

pueblo, y vivid!

13

 ¿Por  qué  tú  y  tu  pueblo  habréis  de 

morir por la espada, el hambre y la pes-

tilencia, según dice YHVH respecto a la 

nación que no quiera servir al rey de Ba-

bilonia?

14

 No escuchéis las palabras de los profe-

tas que os hablan, diciendo: ¡No serviréis 

al rey de Babilonia!, porque os profetizan 

mentira.

15

 No  los  he  enviado  Yo,  dice  YHVH,  y 

ellos  profetizan  en  mi  Nombre  enga-

ñosamente para que Yo os eche fuera, y 

vosotros y los profetas que os profetizan 

perezcáis.

16

 A  los  sacerdotes  y  al  pueblo  les  he 

hablado diciendo: Así dice YHVH: No es-

cuchéis las palabras de vuestros profetas 

que os profetizan diciendo: ¡Muy pronto 

recobraremos de Babilonia los utensilios 

de la Casa de YHVH!, porque os profeti-

zan mentira;

17

 no los escuchéis. Seguid sometidos al 

rey de Babilonia y viviréis, y esta ciudad 

no quedará desolada.

18

 Si  en  verdad  son  profetas,  y  si  la  pa-

labra de YHVH está con ellos, intercedan 

ahora ante YHVH Sebaot para que no se 

lleven a Babilonia el resto de los utensi-

lios de la Casa de YHVH, y del palacio del 

rey de Judá en Jerusalem.

19

 Porque  así  dice  YHVH  Sebaot  acerca 

de las columnas, del mar, de las basas y 

del resto de los utensilios que quedan en 

esta ciudad,

20

 que Nabucodonosor, rey de Babilonia, 

no tomó cuando llevó cautivo de Jerusa-

lem  a  Babilonia  a  Jeconías  ben  Joacim, 

rey de Judá, y a todos los nobles de Judá 

y Jerusalem.

21

 Sí, porque así dice YHVH Sebaot, Dios 

de Israel, acerca de los utensilios que que-

dan en la Casa de YHVH y en el palacio del 

rey de Judá en Jerusalem:

22

 Serán  llevados  a  Babilonia,  y  allí  es-

tarán hasta el día en que me acuerde de 

ellos,  dice  YHVH.  Entonces  los  traeré  y 

los restauraré a este lugar.

El falso profeta

28

En aquel mismo año, en el prin-

cipio  del  reinado  de  Sedequías, 

rey  de  Judá,  en  el  año  cuarto,  en  el 

mes quinto, sucedió que el profeta Ha-

nanías  ben  Azur,  que  era  de  Gabaón, 

me habló en la Casa de YHVH delante 

de  los  sacerdotes  y  de  todo  el  pueblo, 

diciendo:

2

 Así habla YHVH Sebaot, Dios de Israel, 

y  dice:  ¡Rompo  el  yugo  del  rey  de  Babi-

lonia!

3

 Antes  de  dos  años  haré  volver  a  este 

lugar  todos  los  utensilios  de  la  Casa  de 

YHVH, que Nabucodonosor, rey de Babi-

lonia, tomó de este lugar para llevarlos a 

Babilonia.

4

 Y haré volver a este lugar a Jeconías ben 

Joacim, rey de Judá, y a todos los exilia-

dos de Judá que han ido a Babilonia, dice 

YHVH, porque romperé el yugo del rey de 

Babilonia.


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Jeremías 29:12

799

5

 Entonces el profeta Jeremías respondió 

al  profeta  Hananías  en  presencia  de  los 

sacerdotes y del pueblo que estaba en la 

Casa de YHVH.

6

 Dijo pues el profeta Jeremías: ¡Amén, así 

lo haga YHVH! ¡Cumpla YHVH tu profe-

cía haciendo que los utensilios de la Casa 

de YHVH y todos los cautivos vuelvan de 

Babilonia a este lugar!

7

 Sin  embargo,  oye  ahora  esta  palabra 

que yo hablo a tus oídos y a oídos de todo 

el pueblo:

8

 Los profetas que han hablado desde an-

tiguo  antes  de  mí  y  de  ti,  profetizaron° 

contra  muchos  países  y  contra  grandes 

reinos, sobre guerras, calamidades y pes-

tilencias.

9

 Respecto  al  profeta  que  profetiza  paz, 

cuando  se  cumpla  la  palabra  de  tal  pro-

feta,  será  reconocido  como  uno  que  en 

verdad ha enviado YHVH.

10

 Entonces el profeta Hananías quitó el 

yugo de la cerviz del profeta Jeremías, y 

lo rompió.

11

 Y  habló  Hananías  en  presencia  de 

todo el pueblo, diciendo: Así dice YHVH: 

Así dentro de dos años romperé el yugo 

de Nabucodonosor rey de Babilonia, que 

llevan al cuello tantas naciones, antes de 

dos años. Y el profeta Jeremías se fue por 

su camino.

12

 Después  que  el  profeta  Hananías 

rompió  el  yugo  de  la  cerviz  del  profeta 

Jeremías, la palabra de YHVH llegó a Je-

remías, diciendo:

13

 Ve y habla a Hananías, y dile: Así dice 

YHVH: ¡Yugos de madera has roto, pero 

has hecho en lugar de ellos yugos de hie-

rro!

14

 Porque así dice YHVH Sebaot, Dios de 

Israel: Yo he puesto un yugo de hierro so-

bre la cerviz de todas estas naciones, para 

que sirvan a Nabucodonosor rey de Babi-

lonia, y ellas le habrán de servir, incluso 

las bestias del campo le he dado.

15

 Entonces  el  profeta  Jeremías  dijo  al 

profeta  Hananías:  ¡Oye  ahora,  oh  Hana-

nías! YHVH no te ha enviado, y tú has he-

cho que este pueblo confíe en la mentira.

16

 Por tanto, así dice YHVH: He aquí Yo 

te  quito  de  sobre  la  faz  de  la  tierra.  En 

este  año  morirás,  porque  has  proferido 

rebelión contra YHVH.

17

 Y en el mes séptimo de aquel mismo 

año, el profeta Hananías murió.

A los cautivos

29

Texto de la carta que el profeta Je-

remías  envió  desde  Jerusalem  al 

resto de los ancianos y a los sacerdotes y 

profetas y al pueblo, deportados de Jeru-

salem a Babilonia por Nabucodonosor.

2

 (Fue después que hubieron salido de Je-

rusalem el rey Jeconías, la reina madre, 

los eunucos, y los príncipes de Judá, con 

los artesanos y herreros de Jerusalem).

3

 La envió° por medio de Elasa ben Safán y 

de Gemarías ben Hilcías (a quienes Sede-

quías rey de Judá envió a Babilonia, a Na-

bucodonosor rey de Babilonia), diciendo:

4

 Así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel, a 

todos los cautivos que Yo hice deportar de 

Jerusalem a Babilonia:

5

 Edificad  casas  y  habitadlas,  plantad 

huertos y comed sus frutos.

6

 Tomad mujeres y engendrad hijos e hi-

jas,  tomad  mujeres  para  vuestros  hijos, 

y dad vuestras hijas a maridos, para que 

críen hijos e hijas; multiplicaos allá, y no 

os dejéis disminuir.

7

 Procurad la paz de la ciudad a la cual os 

hice transportar, y rogad por ella a YHVH, 

porque en la paz de ella tendréis vosotros 

paz.

8

 Así  dice  YHVH  Sebaot,  Dios  de  Israel: 

No os engañen vuestros profetas y adivi-

nos que viven entre vosotros, ni atendáis 

a los sueños que vosotros mismos soñáis.

9

 Porque os profetizan engañosamente en 

mi Nombre, y Yo no los he enviado, dice 

YHVH.

10

 Porque así dice YHVH: Cuando se ha-

yan cumplido setenta años para con Ba-

bilonia, Yo os visitaré, y despertaré sobre 

vosotros mi buena palabra, para haceros 

volver a este lugar.

11

 Porque Yo conozco mis designios so-

bre  vosotros,  dice  YHVH:  designios  de 

bienestar y no de desgracia, de daros un 

porvenir y una esperanza.

12

 Entonces  me  invocaréis,  y  vendréis  y 

oraréis a mí, y Yo os escucharé.

28.8 Es decir, acertadamente.  29.3 Esto es, la carta


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Jeremías 29:13

800

13

 Me  buscaréis  y  me  hallaréis,  porque 

me buscaréis con todo vuestro corazón.

14

 Sí, Yo seré hallado por vosotros, dice 

YHVH, y haré volver vuestra cautividad, y 

os reuniré de todas las naciones y de to-

dos los lugares adonde os había arrojado, 

dice YHVH; y os haré volver al lugar de 

donde hice que os llevaran en cautividad.

15

 Si vosotros habéis dicho: YHVH nos ha 

levantado profetas en Babilonia,

16

 °Así dice YHVH acerca del rey que está 

sentado sobre el trono de David, y de todo 

el  pueblo  que  mora  en  esta  ciudad:  de 

vuestros  hermanos  que  no  salieron  con 

vosotros en cautiverio.

17

 Así dice YHVH Sebaot: He aquí Yo en-

vío contra ellos la espada, el hambre y la 

peste, y los pondré como los higos malos, 

que de tan malos no se pueden comer.

18

 Los perseguiré con la espada, el ham-

bre y la peste, y los convertiré en objeto 

de horror para todos los reinos de la tie-

rra, en maldición, espanto, burla y afrenta 

entre todas las naciones donde los habré 

arrojado;

19

 por  cuanto  no  oyeron  mis  palabras, 

dice YHVH, que les envié por mis siervos 

los profetas, madrugando y sin cesar, pero 

no quisisteis escuchar, dice YHVH.

20

 ¡Escuchad  pues  la  palabra  de  YHVH, 

vosotros  todos  los  expatriados  que  eché 

de Jerusalem a Babilonia!

21

 °así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel, 

acerca de Acab ben Colaías y de Sedequías 

ben Maasías, que os profetizan mentiras 

en mi Nombre: He aquí Yo los entrego en 

mano  de  Nabucodonosor,  rey  de  Babilo-

nia, quien los matará ante vuestros ojos,

22

 y dará origen a una maldición que se 

correrá entre los cautivos de Judá que es-

tán  en  Babilonia,  que  dirá:  ¡YHVH  haga 

contigo  como  con  Acab  y  Sedequías,  a 

quienes el rey de Babilonia asó al fuego!

23

 Porque  hicieron  infamia  en  Israel, 

adulteraron con la mujer del prójimo, y 

dijeron palabras falsas en mi Nombre, sin 

que Yo los mandara. Lo sé y lo atestiguo, 

dice YHVH.

24

 Y a Semaías de Nehelam hablarás, di-

ciendo:

25

 Así habla YHVH Sebaot, Dios de Israel, 

diciendo: Porque has enviado cartas en tu 

propio nombre a todo el pueblo que está en 

Jerusalem, y al sacerdote Sofonías ben Ma-

asías, y a todos los sacerdotes, diciendo:

26

 YHVH te ha nombrado sucesor del sa-

cerdote  Joiada,  como  responsable  de  la 

Casa  de  YHVH,  para  que  todo  el  que  se 

desmande y se haga pasar por profeta, lo 

lleves al calabozo y lo pongas en el cepo.

27

 ¿Por qué pues, no has reprendido aho-

ra a Jeremías de Anatot, que se hace pasar 

por profeta?

28

 Pues  nos  ha  enviado  una  carta  a  Ba-

bilonia  diciendo:  El  cautiverio  será  lar-

go. Construíos casas, y morad en ellas, y 

plantad huertos y comed sus frutos.

29

 Pero el sacerdote Sofonías había leído 

esta carta a oídos del profeta Jeremías,

30

 y la palabra de YHVH llegó a Jeremías, 

diciendo:

31

 Envía a decir a todos los cautivos: Así dice 

YHVH acerca de Semaías de Nehelam: Se-

maías os ha profetizado sin Yo haberlo en-

viado, induciéndoos a una falsa confianza.

32

 Por tanto, así dice YHVH: Yo castigaré 

a Semaías de Nehelam y a su descenden-

cia: No tendrá varón que more en medio 

de este pueblo, ni verá el bien que Yo haré 

a mi pueblo, dice YHVH; porque ha profe-

rido palabras de rebelión contra YHVH.

Promesa del regreso

30

Palabra de YHVH que recibió Jere-

mías, diciendo:

2

    Así habla YHVH Dios de Israel, 

diciendo:

Escríbete en un rollo todas las 

palabras que te he hablado.

3

    Porque he aquí que vienen días,

dice YHVH,

En que haré volver a los cautivos de 

mi pueblo Israel y Judá,

dice YHVH,

Y los traeré a la tierra que di a sus 

padres, y la disfrutarán.

4

    Éstas son las palabras que habló 

YHVH acerca de Israel y Judá:

5

    Así dice YHVH:

¡Gritos de terror hemos oído,

29.16: Se sugiere leer la porción 16-20 después del v.32 

→§163.  29.21: Se sugiere leer la porción 21-32 después del v.15 

→§163.


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Jeremías 31:1

801

De espanto y no de paz!

6

    Inquirid y averiguad: ¿Da a luz el 

varón?

¿Por qué pues, veo a todo varón 

como parturienta:

Las manos a las caderas; los rostros 

lívidos y demudados?

7

    ¡Ay, cuán grande es aquel día!

No hay otro semejante a él:

Tiempo de angustia para Jacob.

Pero de él será librado.

8

    Aquel día, dice YHVH Sebaot,

Yo quebraré el yugo de su cerviz,

Y romperé sus coyundas,

Y los extranjeros no volverán a 

someterlo en servidumbre,

9

    Sino que servirán a YHVH su Dios y 

a David su rey,

A quien Yo levantaré para ellos.

10

    Tú pues, siervo mío Jacob,

No temas, dice YHVH,

Ni te atemorices, Israel;

Porque he aquí Yo te salvo del país 

remoto,

Y a tu descendencia de la tierra de 

cautividad;

Jacob volverá, descansará y vivirá 

tranquilo,

Y no habrá quien lo espante.

11

    Porque Yo estoy contigo para 

salvarte, dice YHVH,

Destruiré a todas las naciones en 

donde te he dispersado,

Pero a ti no te destruiré,

Te corregiré con mesura,

Pero de ninguna manera te dejaré 

impune.

12

    Así dice YHVH: Tu llaga es 

incurable,

Y dolorosa es tu herida;

13

    No hay quien defienda tu causa para 

vendar tu herida,

Ni hay para ti medicamentos 

eficaces.

14

    Tus amantes te olvidaron y ya no te 

buscan,

Pues te he herido como hiere un 

enemigo,

Con azote de adversario cruel, por 

la magnitud de tu maldad, y la 

multitud de tus pecados.

15

    ¿Por qué clamas con motivo de tu 

herida?

Incurable es tu dolor;

Por la grandeza de tu iniquidad y 

por tus muchos pecados te he 

hecho esto.

16

    Pero todos los que te devoran,

Serán devorados,

Y todos tus cautivadores irán al 

cautiverio,

Y todos los que te despojan serán 

despojados,

Y todos los que te saquean serán 

saqueados.

17

    Y Yo haré curar tus llagas,

Y sanaré tus heridas, dice YHVH,

Porque te llamaron la repudiada, 

diciendo:

¡Ésta es Sión, de la quien nadie cuida!

18

    Así dice YHVH:

He aquí Yo hago volver los cautivos 

de las tiendas de Jacob,

Y de sus tiendas tendré 

misericordia,

Y la ciudad será edificada sobre sus 

ruinas,

Y el palacio será asentado en su 

emplazamiento habitual.

19

    Y de ella saldrán cánticos de alabanza,

Y voces de gente jubilosa.

Los haré crecer y no menguar,

Los honraré, y no serán 

menospreciados.

20

    Sus hijos serán como antes,

Y su congregación se mantendrá 

delante de mi presencia,

Y Yo castigaré a todos sus opresores.

21

    De ella saldrá su príncipe,

De ella saldrá su caudillo,

Y Yo lo acercaré hasta mí,

¿Quién, si no, osaría acercarse a mí? 

dice YHVH.

22

    Entonces me seréis por pueblo,

Y Yo seré vuestro Dios.

23

    Mirad: el torbellino de YHVH sale 

con furor,

Torbellino arrebatador que cae en la 

cabeza de los impíos.

24

    No se calmará el ardor de la ira de 

YHVH,

Hasta que haya hecho y cumplido 

los propósitos de su corazón.

En el fin de los días entenderéis 

esto.

31

En  aquel  tiempo,  dice  YHVH,  Yo 

seré  Dios  de  todas  las  tribus  de 

Israel,


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Jeremías 31:2

802

Y ellas serán mi pueblo.

2

    Así dice YHVH:

El pueblo escapado de la espada

Halló gracia en el desierto,

Israel va en busca de reposo.

3

    YHVH se me apareció desde lejos:

Con amor eterno te he amado;

Por tanto, te prolongué mi 

misericordia.

4

    Otra vez te edificaré, y quedarás 

edificada,

¡Oh virgen de Israel!

Otra vez adornarás tus panderos,

Y saldrás en alegres danzas.

5

    Otra vez plantarás viñas

En los montes de Samaria,

Y los que plantan las cosecharán.

6

    Será tiempo en que los atalayas en el 

monte de Efraín griten:

¡En pie, subamos a Sión,

A YHVH nuestro Dios!

7

    Así dice YHVH: ¡Gritad jubilosos por 

Jacob!

¡Gritad con alegría ante la cabeza de 

naciones!

Haced oír, alabad, y decid:

¡YHVH ha salvado a su pueblo, el 

remanente de Israel!

8

    Mirad: Yo los hago volver de la tierra 

del norte,

Y los reuniré de los confines de la 

tierra,

Y con ellos a los ciegos y cojos,

A la mujer encinta junto con la que 

dio a luz:

En una gran asamblea volverán acá.

9

    Si marcharon llorando,

Los haré volver entre consuelos,

Y los haré andar junto a torrentes de 

aguas,

Por una vía llana y sin tropiezo,

Porque Yo soy a Israel por Padre,

Y Efraín es mi primogénito.

10

    Oh naciones, oíd la palabra de YHVH,

Y hacedlo saber en las costas lejanas:

El que esparció a Israel lo reunirá y 

lo guardará,

Como el pastor a su rebaño.

11

    Porque YHVH ha rescatado a Jacob,

Y lo ha redimido de uno más fuerte 

que él.

12

    Y vendrán con aclamaciones a la 

altura de Sión,

Afluirán hacia los bienes de YHVH:

Al trigo, al vino, y al aceite,

A las crías del rebaño y a la vacada;

Y su alma será como huerto bien 

regado,

Y nunca más tendrán dolor.

13

    Entonces la doncella gozará 

danzando,

Juntamente con los jóvenes y con 

los ancianos,

Porque cambiaré su duelo en 

alegría,

Los consolaré y los alegraré después 

de su dolor.

14

    Saciaré el alma de los sacerdotes 

con grosura,

Y mi pueblo será saciado con mi 

benevolencia, dice YHVH.

15

    Así dice YHVH:

Voz fue oída en Ramá:

Lamentaciones y amargo llanto;

Es Raquel que lamenta por sus hijos,

Y se niega a ser consolada porque 

sus hijos perecieron.

16

    Así dice YHVH:

Reprime del llanto tu voz,

Y de las lágrimas tus ojos,

Porque tu trabajo será 

recompensado, dice YHVH,

Y volverán de la tierra del enemigo.

17

    Hay esperanza de un porvenir, dice 

YHVH:

Los hijos volverán a su propia tierra.

18

    Oí atentamente el lamento de 

Efraín:

Me azotaste,

Fui castigado como novillo 

indómito;

Conviérteme, y seré convertido,

Porque Tú eres YHVH mi Dios.

19

    Si me aparté, después me arrepentí:

Reconocí mi falta y herí mi muslo;

Me avergoncé y aún quedé confuso,

Porque llevaba la afrenta de mi 

juventud.

20

    ¿No es Efraín un hijo precioso para 

mí?

¿No es un niño en quien me deleito?

Porque aun cuando lo reprendo,

Me acuerdo de él con ternura,

Mis entrañas se conmueven y cedo a 

la compasión, dice YHVH.

21

    Coloca señales, ponte majanos altos;


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Jeremías 32:3

803

Dirige tu atención a la calzada,

El camino por donde fuiste;

¡Retorna, oh virgen de Israel,

Retorna a éstas tus ciudades!

22

    Oh hija descarriada, ¿hasta cuándo 

andarás errante?

Pues YHVH va a crear algo nuevo en 

la tierra:

La mujer cortejará al varón.

23

 Así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel: 

Cuando  Yo  haga  volver  sus  cautivos,  se 

volverá a decir en Judá y en sus poblados: 

¡YHVH te bendiga, oh Morada de justicia, 

oh Monte de santidad!

24

 En  Judá  y  en  sus  poblados  habitarán 

juntos los labradores y los que apacientan 

rebaños.

25

 Saciaré al alma cansada, y satisfaceré a 

toda alma entristecida.

26

 (Desperté y miré, y había sido dulce mi 

sueño).

El nuevo pacto con Israel

27

 He  aquí  vienen  días,  dice  YHVH,  en 

que  sembraré  la  casa  de  Israel  y  la  casa 

de Judá con simiente de hombres y con 

simiente de bestias.

28

 Y sucederá que, de la manera que Yo 

velaba  sobre  ellos  para  arrancar,  disper-

sar, derribar, destruir y afligir, así velaré 

sobre  ellos  para  edificar  y  para  plantar, 

dice YHVH.

29

 En aquellos días no dirán más: Los pa-

dres comieron las uvas agrias y los dien-

tes de los hijos tienen la dentera,

30

 sino que cada cual morirá por su propia 

maldad. Los dientes de todo hombre que 

coma las uvas agrias, tendrán la dentera.

31

 He aquí que vienen días, dice YHVH, 

en los cuales haré nuevo pacto con la casa 

de Israel y con la casa de Judá.

32

 No  como  el  pacto  que  hice  con  sus 

padres el día que tomé su mano para sa-

carlos  de  la  tierra  de  Egipto,  pues  ellos 

invalidaron  mi  pacto,  aunque  fui  Yo  un 

marido para ellos, dice YHVH.

33

 Pero éste es el pacto que haré con la 

casa  de  Israel  después  de  aquellos  días, 

dice YHVH: Daré mi Ley en su mente y la 

escribiré en su corazón, Y Yo seré a ellos 

por Dios, y ellos me serán por pueblo.

34

 Y no enseñará más cada cual a su pró-

jimo, y cada cual a su hermano, diciendo: 

¡Conoce  a  YHVH!,  porque  todos  me  co-

nocerán,  desde  el  más  pequeño  de  ellos 

hasta el más grande, dice YHVH. Porque 

perdonaré  su  maldad,  y  no  me  acordaré 

más de sus pecados.

35

 Así dice YHVH,

Que estableció el sol para alumbrar 

el día,

Y las leyes de la luna y de las 

estrellas para alumbrar de noche;

Que aterroriza el mar,

Y se ponen en consternación sus 

olas:

¡YHVH Sebaot es su nombre!

36

    Si estas leyes se apartaran de delante 

de mí, dice YHVH,

Entonces también faltará la 

descendencia de Israel,

Para no ser nación delante de mí 

eternamente.

37

    Así dice YHVH:

Si los cielos pudieran ser medidos 

arriba,

O se exploraran los cimientos de la 

tierra abajo,

Entonces también Yo desecharía la 

descendencia de Israel por todo 

lo que hicieron, dice YHVH.

38

 He  aquí  vienen  días,  dice  YHVH,  en 

que  será  edificada  la  ciudad  de  YHVH, 

desde la torre de Hananeel hasta la puer-

ta del Ángulo.

39

 El cordel saldrá derecho hasta el colla-

do de Gareb, y doblará hasta Goa.

40

 Y todo el valle de los cadáveres y de las 

cenizas, y todas las llanuras hasta el arro-

yo de Cedrón, hasta la esquina del portal 

de los Caballos, hacia el oriente, estarán 

consagrados a YHVH. Nunca más será de-

vastada ni destruida.

La heredad

32

Oráculo  de  YHVH  que  recibió  Je-

remías en el año décimo de Sede-

quías  rey  de  Judá,  año  decimoctavo  de 

Nabucodonosor.

2

 En  aquel  tiempo  el  ejército  del  rey  de 

Babilonia  tenía  sitiada  a  Jerusalem,  y  el 

profeta Jeremías estaba preso en el atrio 

de la guardia de la casa del rey de Judá.

3

 Sedequías, rey de Judá, lo había encar-

celado,  acusándolo:  Tú  has  profetizado 

diciendo:  Así  dice  YHVH:  Yo  entregaré 


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Jeremías 32:4

804

esta ciudad en mano del rey de Babilonia 

para que la conquiste.

4

 Sedequías, rey de Judá, no escapará de 

la mano de los caldeos, sino que será en-

tregado sin falta en mano del rey de Ba-

bilonia, que le hablará cara a cara, y sus 

ojos verán sus ojos.

5

 Y hará llevar a Sedequías a Babilonia y allá 

estará hasta que Yo lo visite. Si combatís a 

los caldeos, no os irá bien, dice YHVH.

6

 Dijo pues Jeremías: La palabra de YHVH 

vino a mí diciendo:

7

 Mira,  Hanameel,  hijo  de  tu  tío  Salum, 

viene  para  decirte:  Cómprame  mi  here-

dad que está en Anatot, porque tú tienes 

el derecho de redención para comprarla.

8

 Y conforme a la palabra de YHVH, Ha-

nameel, hijo de mi tío, vino a mí al atrio 

de  la  guardia,  y  me  dijo:  Te  ruego  que 

compres mi heredad, que está en Anatot 

en tierra de Benjamín, porque el derecho 

de heredad es tuyo, y a ti corresponde el 

rescate: cómprala para ti. Y yo comprendí 

que era palabra de YHVH.

9

 Compré pues de Hanameel, hijo de mi 

tío, la heredad que estaba en Anatot, y le 

pesé el dinero: diecisiete siclos de plata.

10

 Y  escribí  el  contrato,  lo  sellé,  lo  hice 

certificar con testigos, y le pesé el dinero 

en balanza.

11

 Tomé luego el contrato de venta, tanto 

el sellado según el derecho y costumbre, 

como la copia abierta.

12

 Y di la escritura de propiedad a Baruc 

ben  Nerías,  hijo  de  Maasías,  delante  de 

Hanameel, el hijo de mi tío, y delante de 

los testigos que habían suscrito la escri-

tura  de  propiedad,  delante  de  todos  los 

judíos que estaban sentados en el patio de 

la cárcel.

13

 Y  encargué  a  Baruc  delante  de  ellos, 

diciendo:

14

 Así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel: 

Toma  estas  escrituras,  esta  escritura  de 

propiedad  sellada,  y  esta  otra  escritura 

abierta, y ponlas en una vasija de barro, 

para que se conserven muchos días.

15

 Porque así dice YHVH Sebaot, Dios de 

Israel: Aún se han de comprar casas, he-

redades y viñas en esta tierra.

16

 Y  después  que  di  la  escritura  de  pro-

piedad a Baruc ben Nerías, oré a YHVH, 

diciendo:

17

 ¡Oh Adonay YHVH! he aquí Tú hiciste 

los cielos y la tierra con tu gran poder y 

con tu brazo extendido, y no hay cosa al-

guna que sea demasiado difícil para ti.

18

 Tú tratas con misericordia a millares, 

y castigas la maldad de los padres en sus 

hijos después de ellos. ’Elohim grande y 

poderoso, YHVH Sebaot es su nombre.

19

 Grande en consejo y poderoso en obras, 

cuyos ojos están abiertos sobre todos los 

caminos de los hijos de Adam, para dar a 

cada  uno  según  sus  caminos  y  según  el 

fruto de sus obras.

20

 Tú hiciste señales y portentos en Egip-

to, notorios° hasta hoy, en Israel y entre 

todos los hombres; y te has hecho renom-

bre, como hoy se ve.°

21

 Pues  sacaste  a  tu  pueblo  Israel  de  la 

tierra de Egipto con señales y portentos, 

con mano fuerte y brazo extendido, y con 

terribles hazañas,

22

 y les diste esta tierra, la cual juraste a 

sus padres que les darías: tierra que fluye 

leche y miel.

23

 Y ellos entraron y la disfrutaron; pero 

no oyeron tu voz, ni anduvieron en tu Ley. 

Nada han hecho de cuanto les mandaste 

hacer;  por  tanto,  has  hecho  venir  sobre 

ellos todo este mal.

24

 He aquí las torres de asedio llegan ya a 

la ciudad para conquistarla, y la ciudad está 

siendo entregada en mano de los caldeos, 

que combaten contra ella con la espada, el 

hambre y la pestilencia. Lo que anunciaste 

se ha comprobado, y Tú lo estás viendo.

25

 ¿Y  Tú,  oh  Adonay  YHVH,  me  dices: 

Cómprate la heredad con dinero ante tes-

tigos; mientras la ciudad cae en manos de 

los caldeos?

26

 Entonces Jeremías tuvo revelación de 

YHVH que decía:

27

 Yo soy YHVH, Dios de toda carne. ¿Ha-

brá algo difícil para mí?

28

 Por tanto, así dice YHVH: He aquí en-

trego esta ciudad en mano de los caldeos 

y en mano de Nabucodonosor rey de Ba-

bilonia, y la tomará.

32.20 .notorios.  32.20 .se ve.


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Jeremías 33:8

805

29

 Y  los  caldeos  que  atacan  esta  ciudad, 

vendrán y le prenderán fuego y la quema-

rán, así como las casas en cuyas azoteas 

ofrecían  incienso  a  Baal  y  derramaban 

libaciones a dioses ajenos, para provocar-

me a ira.

30

 Porque los hijos de Israel y los hijos de 

Judá no han hecho sino lo malo ante mis 

ojos desde su juventud. Ciertamente los 

hijos de Israel no han hecho más que pro-

vocarme a ira con la obra de sus manos, 

dice YHVH.

31

 Pues  desde  el  día  que  edificaron  esta 

ciudad hasta hoy, ha sido para mí causa 

de ira y furor, al extremo de tenerla que 

quitar de mi presencia,

32

 por  toda  la  maldad  que  cometían  is-

raelitas  y  judíos,  irritándome  todos  con 

sus reyes y príncipes, con sus sacerdotes 

y profetas, los judíos y los moradores de 

Jerusalem.

33

 Y me dieron la espalda y no la cara, y 

aunque  les  enseñaba  madrugando  y  sin 

cesar, no escucharon ni escarmentaron.

34

 Antes emplazaron sus abominaciones 

en la Casa en la cual es invocado mi Nom-

bre, y la profanaron.

35

 Edificaron  lugares  altos  a  Baal,  en  el 

valle de Ben-Hinom, y allí hicieron pasar 

por el fuego a sus hijos e hijas en honor 

de Moloc. Cosa que Yo no les mandé, ni 

me  cruzó  al  pensamiento  que  pudieran 

haber hecho tal abominación para hacer 

pecar a Judá.

36

 Pues ahora, así dice YHVH, Dios de Is-

rael, a esta ciudad que decís que va a caer 

en  mano  del  rey  de  Babilonia  a  espada, 

hambre y pestilencia:

37

 Yo  los  reuniré  de  todas  las  tierras  a 

las cuales los eché en mi ira, en mi eno-

jo y en mi gran indignación, y los haré 

volver  a  este  lugar,  y  los  haré  habitar 

seguros;

38

 y  ellos  serán  mi  pueblo,  y  Yo  seré  su 

Dios,

39

 y  les  daré  un  solo  corazón  y  un  solo 

camino,  para  que  me  teman  todos  los 

días, en bien suyo y de sus hijos después 

de ellos.

40

 Haré  con  ellos  un  pacto  eterno:  no 

cesaré de seguirlos para hacerles bien, y 

pondré mi temor en su corazón para que 

no se aparten de mí.

41

 Y me complaceré en ellos haciéndoles 

bien,  y  los  plantaré  firmemente  en  esta 

tierra, con todo mi corazón y con toda mi 

alma.

42

 Así dice YHVH: De la manera que traje 

sobre este pueblo todo este gran mal, así 

traeré sobre ellos todo el bien que he pro-

metido acerca de ellos.

43

 Y se comprarán campos en esta tierra 

que decís que está desierta, sin hombres 

ni  bestias,  y  entregada  en  manos  de  los 

caldeos.

44

 Se  comprarán  campos  por  dinero,  y 

se harán escritura y se sellarán ante tes-

tigos, en tierra de Benjamín y en los con-

tornos de Jerusalem, y en las ciudades de 

Judá,  en  las  ciudades  de  la  Serranía,  en 

las ciudades de la Sefelá y en las ciudades 

del Néguev, porque Yo haré regresar sus 

cautivos, dice YHVH.

Restauración

33

Vino palabra de YHVH a Jeremías 

la segunda vez, estando él aún pre-

so en el atrio de la guardia, diciendo:

2

 Así dice YHVH, que hizo la tierra, YHVH, 

que la formó para afirmarla. YHVH es su 

nombre:

3

 Clama a mí, y Yo te responderé, y te en-

señaré cosas grandes y ocultas que tú no 

conoces.

4

 Porque así dice YHVH Dios de Israel 

a  las  casas  de  esta  ciudad,  y  a  las  ca-

sas de los reyes de Judá, las cuales fue-

ron derribadas para construir defensas 

contra  las  torres  de  asalto  y  contra  la 

espada:

5

 Ahora  vienen  a  pelear  contra  ella  los 

caldeos, llenándolas de cadáveres huma-

nos, porque Yo la herí con mi furor y mi 

ira, y por cuya maldad oculté mi rostro de 

esta ciudad:

6

 Yo mismo traeré sanidad y medicina; y 

los sanaré, y les revelaré la abundancia de 

paz y de fidelidad.

7

 Haré  volver  los  cautivos  de  Judá  y  los 

cautivos de Israel, y los restableceré como 

al principio.

8

 Y los limpiaré de toda su iniquidad, con 

la  cual  pecaron  contra  mí,  y  perdonaré 

todos sus pecados con los cuales pecaron 

contra  mí,  y  con  los  cuales  transgredie-

ron mis mandamientos.


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Jeremías 33:9

806

9

 Y  esta  ciudad°  me  será  un  nombre  de 

regocijo, de alabanza y de gloria delante 

de todas las naciones de la tierra, las cua-

les oirán de todo el bien que Yo le haré, y 

temerán  y  temblarán  a  causa  de  todo  el 

bien y de toda la prosperidad que le voy 

a conceder.

10

 Así dice YHVH: Todavía ha de oírse en 

este  lugar,  que  decís  que  está  desolado, 

sin hombres ni bestias, en las ciudades de 

Judá y en las calles de Jerusalem, que es-

tán asoladas, sin hombres, sin habitantes 

y sin bestias,

11

 sí,  ha  de  oírse  aún  voz  de  regocijo  y 

de alegría, voz de desposado y voz de des-

posada,  voz  de  los  que  digan:  ¡Alabad  a 

YHVH  Sebaot,  porque  YHVH  es  bueno, 

porque para siempre es su misericordia! Y 

voz de los que traigan ofrendas de acción 

de gracias a la Casa de YHVH. Porque vol-

veré a traer los cautivos de la tierra como 

al principio, dice YHVH.

12

 Así dice YHVH Sebaot: Todavía ha de 

haber en este lugar, que está desierto, sin 

hombres ni bestias, y en todas sus ciuda-

des, aún ha de haber majadas de pastores 

que hagan recostar sus rebaños.

13

 En las ciudades de la Serranía, en las 

ciudades de la Sefelá, en las ciudades del 

Néguev, en la tierra de Benjamín, en los 

alrededores de Jerusalem y en las ciuda-

des de Judá, otra vez pasarán rebaños bajo 

la mano de quien los cuente, dice YHVH.

14

 He  aquí  vienen  días,  dice  YHVH,  en 

que Yo confirmaré la buena palabra que 

he hablado a la casa de Israel y a la casa 

de Judá.

15

 En aquellos días y en ese tiempo haré 

brotar a David un Renuevo de justicia, el 

cual ejecutará juicio y justicia en la tierra.

16

 En aquellos días Judá será salvo, y Je-

rusalem habitará segura, y será llamada: 

YHVH Sidkenu.°

17

 Porque así dice YHVH: No faltará a Da-

vid varón que se siente sobre el trono de 

la casa de Israel.

18

 Ni a los sacerdotes ni a los levitas fal-

tará  varón  que  ofrezca  delante  de  mí  el 

holocausto  y  encienda  la  ofrenda,  y  que 

haga sacrificio todos los días.

19

 Otra vez la palabra de YHVH llegó a Je-

remías, diciendo:

20

 Así dice YHVH: Si pudierais anular mi 

pacto con el día y mi pacto con la noche, 

de manera que no haya ni día ni noche a 

su tiempo,

21

 entonces  también  podrá  anularse  mi 

pacto con mi siervo David, para que deje 

de tener hijo que reine sobre su trono, y 

mi pacto con los levitas y sacerdotes, mis 

ministros.

22

 Como no puede ser contado el ejército 

de los cielos, ni se puede medir la arena del 

mar, así multiplicaré la descendencia de mi 

siervo David y los levitas que me sirven.

23

 Otra vez llegó la palabra de YHVH a Je-

remías, diciendo:

24

 ¿No oyes lo que dice este pueblo: Las 

dos familias que YHVH había escogido las 

ha  desechado?  Así  desprecian  a  mi  pue-

blo, y no lo tienen por nación.

25

 Así dice YHVH: Como es cierto que he 

creado el día y la noche, y he establecido 

los cielos y la tierra,

26

 también es cierto que no desecharé el 

linaje de Jacob y de David mi siervo, de-

jando de tomar de su descendencia quien 

sea señor sobre el linaje de Abraham, de 

Isaac y de Jacob. Porque cambio su suerte 

y les tengo compasión.

Contra Sedequías

34

Oráculo de YHVH que recibió Jere-

mías  cuando  Nabucodonosor,  rey 

de Babilonia, y todo su ejército y todos los 

reyes de la tierra bajo su dominio y todos 

sus ejércitos peleaban contra Jerusalem y 

contra sus ciudades:

2

 Así dice YHVH Dios de Israel: Ve y habla 

a Sedequías rey de Judá, y dile: Así dice 

YHVH: Yo he entregado esta ciudad al rey 

de Babilonia para que le prenda fuego.

3

 Tú no escaparás de su mano, sino que 

serás apresado, y caerás en su mano. Tus 

ojos verán los ojos del rey de Babilonia, 

y  te  hablará  cara  a  cara,  y  en  Babilonia 

entrarás.

4

 Con todo eso, oh Sedequías, rey de Judá, 

oye el oráculo de YHVH. Así dice YHVH 

respecto a ti: No morirás a espada.

33.9 .esta ciudad.  33.16 Esto es, Justicia nuestra 

→§ 4.


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Jeremías 35:5

807

5

 En paz morirás, y así como quemaron 

especias por tus padres, los reyes que fue-

ron antes de ti, las quemarán por ti, y te 

endecharán y dirán: ¡Ay, señor! Lo he di-

cho Yo, dice YHVH.

6

 El  profeta  Jeremías  dijo  esto  a  Sede-

quías, rey de Judá, en Jerusalem,

7

 cuando el ejército del rey de Babilonia 

peleaba contra Jerusalem y contra el res-

to de las ciudades de Judá: Laquis y Azeca, 

las dos ciudades fortificadas de Judá que 

aún subsistían.

8

 Oráculo de YHVH que recibió Jeremías, 

después que Sedequías pactó con el pue-

blo en Jerusalem para promulgar una re-

misión,

9

 dejando ir libre cada uno a su siervo he-

breo y a su sierva hebrea, para que ningu-

no usara más a los judíos, sus hermanos, 

como siervos.

10

 Cuando los príncipes y los del pueblo 

oyeron que en el pacto se había conveni-

do dejar libre cada uno a su siervo y a su 

sierva, y que ninguno los usara más como 

siervos, obedecieron y los dejaron ir.

11

 Pero  después  se  arrepintieron,  e  hi-

cieron  regresar  a  los  siervos  y  siervas 

que  habían  dejado  libres,  y  otra  vez  los 

redujeron a servidumbre como siervos y 

siervas.

12

 La palabra de YHVH vino a Jeremías, 

diciendo:

13

 Así  dice  YHVH  Dios  de  Israel:  El  día 

que los saqué de Egipto, de casa de ser-

vidumbre, Yo hice un pacto con vuestros 

padres diciendo:

14

 Al cabo de siete años cada uno de voso-

tros dejará ir a su hermano hebreo que le 

haya sido vendido: seis años lo servirá, y 

lo dejará ir libre. Pero vuestros padres no 

me oyeron ni inclinaron su oído.

15

 Y  hoy  vosotros  os  habíais  converti-

do y hecho lo recto ante mis ojos, cada 

uno  anunciando  libertad  a  su  prójimo, 

y concertasteis un pacto en mi presen-

cia, en la Casa en la cual es invocado mi 

Nombre.

16

 Pero os habéis vuelto y profanado mi 

Nombre, haciendo regresar cada uno a su 

siervo y cada uno a su sierva, a quienes 

habíais  dejado  ir  libres  a  su  voluntad,  y 

los  habéis  reducido  a  servidumbre  para 

que otra vez os sean siervos y siervas.

17

 Por tanto, así dice YHVH: Vosotros no 

me  obedecisteis  promulgando  cada  uno 

la libertad para su prójimo y su paisano; 

pues mirad: Yo promulgo la libertad a la 

espada, a la pestilencia y al hambre; y os 

pondré por afrenta ante todos los reinos 

de la tierra, dice YHVH.

18

 Y entregaré a los hombres que traspa-

saron  mi  pacto,  que  no  cumplieron  con 

las palabras del pacto que celebraron en 

mi presencia, cuando cortaron en dos el 

becerro  y  pasaron  por  en  medio  de  las 

partes:

19

 a los príncipes de Judá y a los prínci-

pes de Jerusalem, y a los eunucos y a los 

sacerdotes y a todo el pueblo de la tierra, 

los cuales pasaron entre las partes del be-

cerro.

20

 Sí,  a  éstos  los  entregaré  en  mano  de 

sus enemigos, y en mano de los que bus-

can  su  vida.  Sus  cuerpos  muertos  serán 

comida de las aves de los cielos y de las 

bestias de la tierra.

21

 Y a Sedequías rey de Judá y a sus prín-

cipes los entregaré en mano de sus ene-

migos, y en mano de los que buscan su 

vida, y en mano del ejército del rey de Ba-

bilonia, que acaba de retirarse.

22

 Yo  lo  he  ordenado,  dice  YHVH,  y  los 

haré volver a esta ciudad, para que peleen 

contra ella y la conquisten, y le prendan 

fuego.  Y  haré  que  las  ciudades  de  Judá 

queden desoladas y sin habitantes.

Los recabitas

35

Palabra de YHVH que recibió Jere-

mías en días de Joacim ben Josías, 

rey de Judá, diciendo:

2

 Ve  a  casa  de  los  recabitas  y  habla  con 

ellos, tráelos a la Casa de YHVH, a uno de 

los aposentos, y dales a beber vino.

3

 Tomé  entonces  a  Jaazanías  ben  Jere-

mías,  hijo  de  Habasinías,  con  sus  her-

manos y sus hijos y toda la familia de los 

recabitas,

4

 y los llevé a la Casa de YHVH, al aposento 

de los hijos de Hanán ben Igdalías, varón 

de Dios, el cual estaba junto al aposento 

de los príncipes, sobre el aposento de Ma-

asías ben Salum, guarda de la puerta.

5

 Y puse delante de los hijos de la familia 

de los recabitas unos tazones y unas co-

pas llenas de vino, y les dije: ¡Bebed vino!


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Jeremías 35:6

808

6

 Pero ellos dijeron: No beberemos vino; 

porque Jonadab ben Recab nuestro padre 

nos ordenó diciendo: No beberéis vino ja-

más, ni vosotros ni vuestros hijos.

7

 Tampoco  edificaréis  casas,  ni  sembra-

réis sementeras, ni plantaréis viñas, ni las 

retendréis, sino que moraréis en tiendas 

todos vuestros días, para que viváis mu-

chos días sobre la faz de la tierra donde 

vosotros habitáis.

8

 Y  nosotros  hemos  obedecido  la  voz  de 

nuestro padre Jonadab ben Recab en to-

das las cosas que nos mandó, de no beber 

vino en todos nuestros días, ni nosotros, 

ni nuestras mujeres, ni nuestros hijos ni 

nuestras hijas;

9

 y de no edificar casas para nuestra mo-

rada, y de no tener viñas, ni heredades, ni 

sementeras.

10

 Moramos pues en tiendas, y hemos obe-

decido y hecho conforme a todas las cosas 

que nos mandó Jonadab nuestro padre.

11

 Pero  cuando  Nabucodonosor  rey  de 

Babilonia subió a la tierra, dijimos: Venid, 

ocultémonos en Jerusalem del ejército de 

los caldeos y del ejército de los de Siria. Y 

nos quedamos en Jerusalem.

12

 Entonces vino palabra de YHVH a Je-

remías, diciendo:

13

 Así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel: 

Ve y di a los varones de Judá, y a los mo-

radores de Jerusalem: ¿No aprenderéis a 

obedecer mis palabras? dice YHVH.

14

 La palabra de Jonadab ben Recab con 

que ordenó a sus hijos no beber vino ha 

sido  cumplida,  y  no  lo  beben  hasta  hoy 

por  obedecer  el  mandamiento  de  su  pa-

dre. Sin embargo, Yo os he hablado a vo-

sotros madrugando y sin cesar, y no me 

habéis escuchado.

15

 Os he enviado a mis siervos los profe-

tas, madrugando y sin cesar, para deciros: 

Volveos  ahora  cada  uno  de  vuestro  mal 

camino, y enmendad vuestras obras, y no 

vayáis  en  pos  de  dioses  ajenos  para  ser-

virles, y habitaréis en la tierra que os di 

a  vosotros  y  a  vuestros  padres.  Pero  no 

habéis  inclinado  vuestros  oídos,  ni  me 

habéis obedecido.

16

 Por  cuanto  los  hijos  de  Jonadab  ben 

Recab tuvieron por firme el mandamien-

to que les dio su padre, en tanto que este 

pueblo no me obedece a mí,

17

 por  tanto,  así  dice  YHVH,  ’Elohim 

Sebaot, Dios de Israel: He aquí Yo traigo 

sobre Judá y sobre los moradores de Je-

rusalem todo el mal que he pronunciado 

contra  ellos,  por  cuanto  les  hablé  y  no 

oyeron, los llamé, y no respondieron.

18

 Y dijo Jeremías a la familia de los reca-

bitas: Así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel: 

Por  cuanto  obedecisteis  al  mandamiento 

de  Jonadab  vuestro  padre,  y  guardasteis 

todos sus mandamientos, e hicisteis con-

forme a todas las cosas que os mandó,

19

 así dice YHVH Sebaot, Dios de Israel: 

No le faltará a Jonadab ben Recab un va-

rón que esté ante mi presencia todos los 

días.

Quema del rollo

36

En el cuarto año de Joacim ben Jo-

sías, rey de Judá, Jeremías recibió 

esta palabra de YHVH, diciendo:

2

 Toma  el  rollo  y  escribe  en  él  todas  las 

palabras que te he hablado contra Israel y 

contra Judá, y contra todas las naciones, 

desde el día que comencé a hablarte, des-

de los días de Josías hasta hoy.

3

 Quizá  la  casa  de  Judá  escuche  todo  el 

mal  que  me  propongo  causarles,  y  cada 

cual pueda arrepentirse de su mal cami-

no, y Yo pueda perdonarles sus iniquida-

des y sus pecados.

4

 Entonces  Jeremías  llamó  a  Baruc  ben 

Nerías,  y  Baruc  escribió  en  el  rollo,  de 

boca de Jeremías, todas las palabras que 

YHVH le había hablado.

5

 Después  Jeremías  mandó  a  Baruc,  di-

ciendo:  A  mí  se  me  ha  prohibido  entrar 

en la Casa de YHVH.

6

 Entra pues tú, y en día de ayuno lee en 

el rollo que escribiste de mi boca las pa-

labras de YHVH a oídos del pueblo, en la 

Casa de YHVH. También las leerás a oídos 

de  todos  los  de  Judá  que  vienen  de  sus 

ciudades.

7

 Quizá su oración llegue ante la presen-

cia de YHVH, y cada cual se vuelva de su 

mal camino, porque grande es la ira y la 

indignación que YHVH siente contra este 

pueblo.

8

 Y  Baruc  ben  Nerías  hizo  conforme  a 

todo lo que le mandó el profeta Jeremías, 

leyendo en el rollo las palabras de YHVH 

en la Casa de YHVH.


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Jeremías 36:32

809

9

 Y en el año quinto de Joacim ben Josías, 

rey de Judá, en el mes noveno, aconteció 

que se proclamó un ayuno en la presencia 

de YHVH para todo el pueblo de Jerusa-

lem y para todos los del pueblo que llega-

ban de las ciudades de Judá a Jerusalem.

10

 Y Baruc leyó a oídos del pueblo las pa-

labras del rollo de Jeremías en la Casa de 

YHVH,  en  el  aposento  de  Gemarías  ben 

Safán, el escriba, en el atrio superior, a la 

entrada de la puerta nueva de la Casa de 

YHVH.

11

 Y  cuando  Micaías  ben  Gemarías,  hijo 

de Safán, oyó todas las palabras de YHVH, 

leídas del rollo,

12

 descendió a la casa del rey, al aposento 

del secretario, y he aquí todos los prínci-

pes estaban allí sentados, esto es: Elisama 

secretario,  Delaía  ben  Semaías,  Elnatán 

ben  Acbor,  Gemarías  ben  Safán,  Sede-

quías ben Ananías, y todos los príncipes.

13

 Y Micaías les contó todas las palabras 

que  había  oído  cuando  Baruc  leyó  en  el 

rollo a oídos del pueblo.

14

 Entonces los príncipes enviaron a Je-

hudí ben Netanías, hijo de Selemías, hijo 

de Cusi, para que dijera a Baruc: Toma el 

rollo en el que leíste a oídos del pueblo, y 

ven. Y Baruc ben Nerías tomó el rollo en 

su mano y fue a ellos.

15

 Y le dijeron: Siéntate ahora, y léelo en 

nuestros oídos. Y Baruc se lo leyó.

16

 Y  sucedió  que  cuando  hubieron  oído 

todas aquellas palabras, se miraron unos 

a  otros  azorados,  y  dijeron  a  Baruc:  De 

seguro  le  referiremos  al  rey  todas  estas 

palabras.

17

 Y le preguntaron a Baruc: Dinos aho-

ra: ¿Cómo escribiste de su boca todas es-

tas palabras?

18

 Y Baruc les dijo: Él me dictaba de su 

boca  todas  estas  palabras,  y  yo  escribía 

con tinta en el rollo.

19

 Entonces  los  príncipes  dijeron  a  Ba-

ruc: Ve y escóndete, tú y Jeremías, y que 

nadie sepa dónde estáis.

20

 Luego ellos entraron al atrio, a donde 

estaba el rey, y habiendo depositado el ro-

llo en el aposento de Elisama el secretario, 

refirieron todo el asunto a oídos del rey.

21

 Entonces el rey envió a Jehudí a traer 

el rollo, el cual lo tomó del aposento de 

Elisama el secretario, y Jehudí lo leyó a 

oídos del rey y de todos los príncipes que 

estaban junto al rey.

22

 Y el rey estaba sentado en las habita-

ciones de invierno (era el mes noveno), y 

había un brasero ardiendo delante de él.

23

 Y sucedió que cuando Jehudí hubo leí-

do tres o cuatro columnas, el rey lo rasgó 

con  una  navaja  de  escriba,  y  lo  echó  al 

fuego que había en el brasero, hasta que 

todo el rollo se consumió en el fuego que 

había en el brasero.

24

 Así  no  tuvieron  temor,  y  ni  el  rey  ni 

ninguno  de  sus  siervos  que  habían  oído 

aquellas palabras rasgaron sus vestidos.

25

 Y aunque Elnatán y Delaía y Gemarías 

rogaron al rey que no quemara aquel ro-

llo, no los quiso oír.

26

 Y el rey envió a Jerameel ben Hame-

lec, a Seraías ben Azriel y a Selemías ben 

Abdeel, para que apresaran a Baruc el es-

criba y al profeta Jeremías, pero YHVH los 

escondió.

27

 Después que el rey hubo quemado el 

rollo con las palabras que Baruc había es-

crito de boca de Jeremías, tuvo Jeremías 

revelación de YHVH, diciendo:

28

 Toma otro rollo y escribe en él todas las 

palabras anteriores que estaban en el pri-

mer rollo que quemó Joacim rey de Judá.

29

 En cuanto a Joacim rey de Judá, dirás: 

Así  dice  YHVH:  Tú  quemaste  este  rollo, 

diciendo: ¿Por qué escribiste en él, dicien-

do: De cierto vendrá el rey de Babilonia y 

destruirá esta tierra y hará desaparecer de 

ella hombres y bestias?

30

 Por  tanto,  así  dice  YHVH  acerca  de 

Joacim  rey  de  Judá:  No  tendrá  quien  se 

siente  sobre  el  trono  de  David;  y  su  ca-

dáver será echado al calor del día y a la 

escarcha de la noche.

31

 Y  visitaré  su  iniquidad  sobre  él  y  so-

bre su linaje, y sobre sus siervos; y traeré 

sobre ellos y sobre los moradores de Je-

rusalem y sobre los varones de Judá, todo 

el mal que les he anunciado y que ellos 

rehusaron escuchar.

32

 Entonces Jeremías tomó otro rollo y lo 

dio a Baruc ben Nerías el escriba, el cual 

escribió en él de boca de Jeremías todas 

las  palabras  del  rollo  que  Joacim  rey  de 

Judá había quemado en el fuego, siendo 

además añadidas sobre ellas muchas otras 

palabras semejantes.


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Jeremías 37:1

810

En la cárcel

37

En  lugar  de  Conías  ben  Joacim, 

reinó  como  rey  Sedequías,  hijo° 

de Josías, al cual Nabucodonosor, rey de 

Babilonia, constituyó por rey en la tierra 

de Judá.

2

 Pero ni él ni sus siervos, ni el pueblo de la 

tierra escucharon las palabras que YHVH 

habló por medio del profeta Jeremías.

3

 El rey Sedequías envió a Jucal ben Se-

lemías y a Sofonías ben Maasías, el sacer-

dote, para que dijeran al profeta Jeremías: 

Te ruego que ores por nosotros a YHVH 

nuestro Dios.

4

 En ese entonces Jeremías entraba y sa-

lía  en  medio  del  pueblo,  porque  todavía 

no lo habían puesto en la cárcel.

5

 Entre tanto, el ejército de Faraón había 

salido  de  Egipto,  y  al  llegar  la  noticia  a 

oídos de los caldeos que tenían sitiada a 

Jerusalem, se retiraron de Jerusalem.

6

 Entonces llegó palabra de YHVH al pro-

feta Jeremías, diciendo:

7

 Así dice YHVH Dios de Israel: Diréis así 

al rey de Judá, que os envió a mí para que 

me  consultarais:  He  aquí  el  ejército  de 

Faraón que había salido en vuestro soco-

rro, se ha vuelto a su tierra en Egipto.

8

 Y  los  caldeos  volverán  y  atacarán  esta 

ciudad, y la tomarán y le prenderán fuego.

9

 Así dice YHVH: No os engañéis a voso-

tros mismos, diciendo: ¡Seguramente los 

caldeos se apartarán de nosotros!, porque 

no se apartarán.

10

 Porque aun cuando hirierais a todo el 

ejército de los caldeos que luchan contra 

vosotros,  y  de  ellos  quedaran  solamente 

hombres heridos, cada uno se levantaría 

de  su  tienda  y  quemarían  a  fuego  esta 

ciudad.

11

 Cuando el ejército caldeo se retiró de 

Jerusalem a causa del ejército de Faraón,

12

 Jeremías  intentó  salir  de  Jerusalem 

hacia el territorio de Benjamín, para re-

partirse una herencia con los suyos.

13

 Pero cuando llegó a la puerta de Ben-

jamín, estaba allí un capitán llamado Irías 

ben  Selemías,  hijo  de  Hananías,  el  cual 

apresó al profeta Jeremías, diciendo: ¡Te 

pasas a los caldeos!

14

 Jeremías  respondió:  ¡Falso,  no  me 

paso a los caldeos! Pero él no lo quiso es-

cuchar, y prendiendo a Jeremías, lo llevó 

ante los príncipes.

15

 Y los príncipes se airaron contra Jere-

mías, y lo azotaron y lo pusieron en pri-

sión en la casa del escriba Jonatán, pues 

la habían convertido en cárcel.

16

 Y Jeremías fue puesto en el calabozo de la 

mazmorra, y allí permaneció muchos días.

17

 El  rey  Sedequías  lo  mandó  buscar,  y 

una vez en su casa, le preguntó secreta-

mente: ¿Hay palabra de YHVH? Jeremías 

respondió: Hay; y añadió: Serás entregado 

en mano del rey de Babilonia.

18

 Jeremías dijo además al rey Sedequías: 

¿En qué pequé contra ti o contra tus sier-

vos,  o  contra  este  pueblo,  para  que  me 

pusieras en la cárcel?

19

 ¿Dónde están vuestros profetas que os 

profetizaban diciendo: El rey de Babilonia 

no vendrá contra vosotros, ni contra esta 

tierra?

20

 Y  ahora,  oh  rey,  señor  mío,  te  ruego 

me escuches. Acoge mi súplica y no me 

hagas  volver  a  casa  del  escriba  Jonatán, 

no sea que muera allí.

21

 Entonces  el  rey  Sedequías  ordenó  que 

custodiaran a Jeremías en el atrio de la guar-

dia real, y que le dieran una hogaza de pan 

al día, de la calle de los Panaderos, mientras 

hubiera pan en la ciudad. Y así se quedó Je-

remías en el atrio de la guardia real.

En la cisterna

38

Pero Sefatías ben Matán, Gedalías 

ben  Pasur,  Jucal  ben  Selemías  y 

Pasur ben Malquías, oyeron las palabras 

que  Jeremías  hablaba  a  todo  el  pueblo, 

diciendo:

2

 Así dice YHVH: El que se quede en esta 

ciudad  morirá  a  espada,  o  de  hambre,  o 

de  pestilencia;  pero  el  que  se  pase  a  los 

caldeos vivirá, pues su vida le será por bo-

tín, y vivirá.

3

 Así dice YHVH: Ciertamente esta ciudad 

será entregada en manos del ejército del 

rey de Babilonia, y la tomará.

4

 Entonces dijeron los príncipes al rey: ¡Te 

rogamos que este hombre sea ejecutado!, 

37.1 Esto es, nieto


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Jeremías 38:27

811

porque debilita las manos de los hombres 

de guerra que han quedado en esta ciu-

dad,  y  las  manos  de  todo  el  pueblo,  ha-

blándoles  tales  palabras,  pues  no  busca 

este  hombre  la  paz  de  este  pueblo,  sino 

su mal.

5

 Y el rey Sedequías respondió: Mirad, él 

está en vuestras manos; nada puede hacer 

el rey contra vosotros.

6

 Entonces  prendieron  a  Jeremías  y  lo 

hicieron echar en la cisterna de Malquías 

ben  Hamelec,  que  estaba  en  el  atrio  de 

la  guardia.  Metieron  allí  a  Jeremías  con 

sogas; pero en la cisterna no había agua, 

sino  lodo,  y  Jeremías  se  hundió  en  el 

lodo.

7

 Pero  un  etíope  llamado  Ebed-melec, 

eunuco del palacio real, supo que habían 

puesto a Jeremías en la cisterna; y estando 

sentado el rey en la puerta de Benjamín,

8

 Ebed-melec salió del palacio real y ha-

bló al rey, diciendo:

9

 Oh rey, señor mío, mal actuaron estos 

varones en todo lo que han hecho con el 

profeta  Jeremías,  al  cual  hicieron  echar 

en la cisterna, donde morirá de hambre, 

pues no hay más pan en la ciudad.

10

 Entonces el rey ordenó a Ebed-melec 

el etíope, diciendo: Toma treinta hombres 

contigo, y haz sacar al profeta Jeremías de 

la cisterna antes que muera.

11

 Y  tomando  Ebed-melec  consigo  a  los 

hombres, entró a la casa del rey debajo de 

la  tesorería,  y  de  allí  tomó  trapos  viejos 

y  ropas  raídas  y  andrajosas,  y  junto  con 

unas sogas, los echó a Jeremías en la cis-

terna.

12

 Y  Ebed-melec,  el  etíope,  dijo  a  Jere-

mías: Ponte ahora esos trapos viejos y ro-

pas raídas y andrajosas bajo los sobacos, 

debajo  de  las  sogas;  y  Jeremías  lo  hizo 

así.

13

 De  este  modo  sacaron  a  Jeremías 

con  sogas,  y  lo  subieron  de  la  cisterna. 

Y Jeremías permaneció en el atrio de la 

guardia.

La consulta

14

 Después el rey Sedequías hizo traer al 

profeta Jeremías ante su presencia, en la 

tercera entrada de la Casa de YHVH. Y el 

rey dijo a Jeremías: Te haré una pregunta. 

No me encubras cosa alguna.

15

 Y  Jeremías  dijo  a  Sedequías:  Si  te  lo 

declaro, ¿acaso no me matarás? y si te doy 

consejo, no me escucharás.

16

 Pero  el  rey  Sedequías  juró  en  secre-

to  a  Jeremías,  diciendo:  Vive  YHVH  que 

nos hizo esta alma, que no te mataré, ni 

te entregaré en mano de los varones que 

buscan tu vida.

17

 Entonces  dijo  Jeremías  a  Sedequías: 

Así  dice  YHVH  ’Elohim  Sebaot,  Dios  de 

Israel:  Si  te  entregas  en  seguida  a  los 

príncipes del rey de Babilonia, tu alma vi-

virá, y esta ciudad no será puesta a fuego, 

y vivirás, tú y tu casa.

18

 Pero si no te entregas a los príncipes 

del  rey  de  Babilonia,  esta  ciudad  será 

entregada  en  mano  de  los  caldeos,  y  le 

prenderán fuego, y tú no escaparás de sus 

manos.

19

 El rey Sedequías dijo a Jeremías: Ten-

go temor de los judíos que desertaron a 

los caldeos, no sea que me entreguen en 

sus manos y me escarnezcan.

20

 Pero Jeremías le respondió: No te en-

tregarán. Oye ahora la voz de YHVH en lo 

que te digo, y te irá bien y vivirás.

21

 Pero si no quieres entregarte, ésta es la 

palabra que me ha mostrado YHVH:

22

 He aquí que todas las mujeres que han 

quedado en casa del rey de Judá serán sa-

cadas a los príncipes del rey de Babilonia; 

y ellas mismas dirán: Te dejaste dominar 

por  tus  hombres  de  confianza,  y  ahora 

que  estás  hundido  en  el  fango,  se  han 

echado atrás.

23

 Sacarán pues a todas tus mujeres y a 

tus hijos a los caldeos, y tú no escaparás 

de  sus  manos,  sino  que  serás  apresado 

por  mano  del  rey  de  Babilonia,  y  harás 

que esta ciudad sea quemada a fuego.

24

 Entonces  Sedequías  dijo  a  Jeremías: 

Que  nadie  sepa  estas  palabras,  y  tú  no 

morirás.

25

 Y si los príncipes oyen que yo he ha-

blado  contigo,  y  vienen  a  ti  y  te  dicen: 

Decláranos ahora lo que le dijiste al rey, 

sin ocultarnos nada, y no te mataremos, y 

asimismo qué te respondió el rey,

26

 tú les dirás: Supliqué al rey que no me 

hiciera volver a casa de Jonatán para mo-

rir allá.

27

 En  efecto,  vinieron  luego  todos  los 

príncipes a Jeremías, y le preguntaron, y 


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Jeremías 38:28

812

él les respondió conforme a todo lo que 

el rey le había mandado. Con esto se ale-

jaron de él, de modo que el asunto no se 

conoció.

28

 Y Jeremías permaneció en el atrio de 

la guardia hasta el día que Jerusalem fue 

tomada.  Y  estaba  allí  cuando  Jerusalem 

fue conquistada.

Caída de Jerusalem

39

En  el  año  noveno  de  Sedequías 

rey  de  Judá,  en  el  mes  décimo, 

Nabucodonosor  rey  de  Babilonia  llegó 

con todo su ejército contra Jerusalem y 

la sitió.

2

 Y en el año undécimo de Sedequías, en 

el  mes  cuarto,  el  día  nueve  del  mes,  se 

abrió brecha en el muro de la ciudad.

3

 Y  por  ella  pasaron  todos  los  príncipes 

del  rey  de  Babilonia  y  se  sentaron  en  la 

puerta de en medio. Eran Nergal-sarezer, 

Samgar-nebo,  Sarsequim,  el  Rabsaris, 

Nergal-sarezer, el Rabmag y todos los de-

más príncipes del rey de Babilonia.

4

 Y  viéndolos  Sedequías  rey  de  Judá  y 

todos los hombres de guerra, huyeron y 

abandonaron  la  ciudad  de  noche,  por  el 

camino del huerto del rey, por la puerta 

entre los dos muros, y el rey salió por el 

camino del Arabá.

5

 Pero el ejército de los caldeos los persi-

guió, y alcanzaron a Sedequías en los lla-

nos de Jericó, y habiéndolo prendido, lo 

llevaron donde estaba Nabucodonosor rey 

de Babilonia, a Ribla en tierra de Hamat, 

y allí lo sentenció.

6

 Y el rey de Babilonia degolló a los hijos 

de Sedequías en presencia de éste en Ri-

bla.  El  rey  de  Babilonia  mandó  degollar 

también a todos los nobles de Judá,

7

 y arrancó los ojos del rey Sedequías, y lo 

aprisionó con grillos de bronce para lle-

varlo a Babilonia.

8

 Y los caldeos quemaron a fuego la casa 

del rey y las casas del pueblo, y derribaron 

los muros de Jerusalem.

9

 Al resto del pueblo que había quedado 

en la ciudad y a los que se habían pasado a 

ellos, Nabuzaradán, capitán de la guardia, 

los hizo llevar cautivos a Babilonia, junto 

con el remanente del pueblo.

10

 Pero Nabuzaradán, capitán de la guar-

dia, hizo que los más pobres del pueblo, 

los  que  no  tenían  nada,  permanecieran 

en tierra de Judá, y les dio viñedos y he-

redades.

Provisión para el profeta

11

 En cuanto a Jeremías, Nabucodonosor 

había  ordenado  a  Nabuzaradán,  capitán 

de la guardia, diciéndole:

12

 Tómalo y vela por él, y no le hagas daño 

alguno, sino trátalo como él te diga.

13

 Entonces  Nabuzaradán,  capitán  de  la 

guardia, y Nabusazbán, el Rabsaris, Ner-

gal-sarezer, el Rabmag y todos los prínci-

pes del rey de Babilonia,

14

 enviaron a sacar a Jeremías del atrio de 

la guardia, y lo entregaron a Gedalías ben 

Ahicam, hijo de Safán, para que lo llevara 

a su casa. Y habitó en medio del pueblo.

15

 Y estando preso en el atrio de la guar-

dia,  la  palabra  de  YHVH  había  llegado  a 

Jeremías, diciendo:

16

 Ve y habla a Ebed-melec, el etíope, di-

ciendo: Así dice YHVH Sebaot, Dios de Is-

rael: He aquí Yo traigo mis palabras sobre 

esta ciudad para mal y no para bien, y se 

cumplirán en aquel día en presencia tuya.

17

 Pero  en  aquel  día  Yo  te  libraré,  dice 

YHVH, y no serás entregado en manos de 

aquellos a quienes tú temes.

18

 Ciertamente Yo te libraré, y no caerás 

a espada, sino que tu vida te será por bo-

tín, porque tuviste confianza en mí, dice 

YHVH.

El remanente

40

Palabra  de  YHVH  que  recibió  Je-

remías,  después  que  Nabuzara-

dán, capitán de la guardia, lo envió desde 

Ramá,  cuando  lo  encontró  encadenado 

entre todos los cautivos de Jerusalem y de 

Judá que iban deportados a Babilonia.

2

 Y el capitán de la guardia apartó a Jere-

mías y le dijo: YHVH tu Dios habló este 

mal contra este lugar,

3

 y YHVH lo ha traído y hecho según lo 

había  dicho,  porque  pecasteis  contra 

YHVH, y no oísteis su voz, por eso os ha 

venido esto a vosotros.

4

 Y ahora, he aquí hoy te libro de las cade-

nas que están en tus manos. Si te parece 

bien venir conmigo a Babilonia, ven, y yo 

velaré por ti, y si no te parece bien venir 

conmigo a Babilonia, déjalo. Mira, toda la 


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Jeremías 41:8

813

tierra está delante de ti. Ve a donde mejor 

te parezca ir.

5

 Como aún no se volvía, le dijo: Regresa 

a  Gedalías  ben  Ahicam,  hijo  de  Safán,  al 

cual  el  rey  de  Babilonia  ha  puesto  sobre 

todas las ciudades de Judá, y vive con él en 

medio del pueblo; o ve a donde te parezca 

mejor ir. Y el capitán de la guardia le dio 

provisiones y un presente, y lo despidió.

6

 Jeremías  fue  entonces  a  Gedalías  ben 

Ahicam, a Mizpa, y habitó con él en medio 

del pueblo que había quedado en el país.

7

 Los  capitanes  del  ejército  que  estaban 

por  el  campo  con  sus  hombres,  oyeron 

que el rey de Babilonia había hecho gober-

nador de la tierra a Gedalías ben Ahicam, 

y que le había encomendado a hombres, 

mujeres y niños, de los más pobres de la 

tierra, que no habían sido transportados 

a Babilonia.

8

 Entonces  fueron  a  visitar  a  Gedalías 

en Mizpa: Ismael ben Netanías, Johanán 

y  Jonatán,  hijos  de  Carea,  Seraías  ben 

Tanhumet, los hijos de Efai netofatita, y 

Jezanías,  hijo  de  un  maacateo,  con  sus 

hombres.

9

 Y  Gedalías  ben  Ahicam,  hijo  de  Safán, 

les juró a ellos y a sus hombres, diciendo: 

No tengáis temor de servir a los caldeos. 

Habitad  en  la  tierra,  obedeced  al  rey  de 

Babilonia, y os irá bien.

10

 He aquí yo tengo que habitar en Mizpa, 

a disposición de los caldeos que vendrán 

a inspeccionarnos. Tomad el vino, los fru-

tos  de  verano  y  el  aceite,  y  ponedlos  en 

vuestros  almacenes,  y  quedaos  en  vues-

tras ciudades que os toque ocupar.

11

 También  los  otros  judíos  que  habita-

ban en Moab, y entre los hijos de Amón, y 

en Edom, y los que habitaban en todas las 

tierras, cuando oyeron decir que el rey de 

Babilonia había dejado a algunos en Judá, 

y que había puesto sobre ellos a Gedalías 

ben Ahicam ben Safán,

12

 todos  estos  judíos  regresaron  de  todos 

los lugares adonde habían sido echados, y 

vinieron a tierra de Judá, a Gedalías, en Miz-

pa, y recogieron vino y abundantes frutos.

Conspiración contra Gedalías

13

 Johanán ben Carea y todos los capita-

nes que estaban en el campo, vinieron a 

Gedalías en Mizpa,

14

 y le dijeron: ¿No sabes que Baalis, rey 

de los hijos de Amón, ha enviado a Ismael 

ben Netanías para matarte? Pero Gedalías 

ben Ahicam no les creyó.

15

 Entonces Johanán ben Carea habló se-

cretamente a Gedalías en Mizpa, dicien-

do:  Yo  iré  ahora  y  mataré  a  Ismael  ben 

Netanías, y nadie lo sabrá. ¿Por qué te ha 

de matar, para que todos los judíos que se 

han reunido a ti se dispersen, y perezca el 

resto de Judá?

16

 Pero Gedalías ben Ahicam dijo a Joha-

nán ben Carea: No hagas esto, porque es 

falso lo que tú dices de Ismael.

41

Pero en el mes séptimo, aconteció 

que  Ismael  ben  Netanías,  hijo  de 

Elisama, de la descendencia real, y algu-

nos príncipes del rey y diez hombres con 

él,  llegaron  a  Gedalías  ben  Ahicam  en 

Miz pa; y allí en Mizpa compartieron jun-

tos el pan.

2

 Pero  Ismael  ben  Netanías  y  los  diez 

hombres  que  estaban  con  él,  puestos 

en pie, hirieron a espada a Gedalías ben 

Ahicam  ben  Safán,  matando  así  a  aquél 

a quien el rey de Babilonia había puesto 

para gobernar la tierra.

3

 Ismael también mató a todos los judíos 

que estaban con Gedalías en Mizpa, junto 

con todos los soldados caldeos que esta-

ban allí.

4

 Un día después de haber asesinado a Ge-

dalías, cuando nadie lo sabía aún,

5

 sucedió  que  vinieron  ciertos  hombres 

de  Siquem,  de  Silo  y  de  Samaria,  unos 

ochenta hombres, con sus barbas raídas, 

sus vestidos rasgados y sus carnes sajadas, 

que  traían  consigo  ofrendas  e  incienso 

para presentarlos a la Casa de YHVH.

6

 E  Ismael  ben  Netanías  les  salió  al  en-

cuentro  desde  Mizpa,  llorando  mientras 

caminaba,  hasta  que  los  alcanzó,  y  les 

dijo: ¡Venid a Gedalías ben Ahicam!

7

 Pero al llegar ellos dentro de la ciudad, 

Ismael ben Netanías los degolló, y apoya-

do por sus hombres, los echó dentro de 

una cisterna.

8

 Entre  aquéllos  fueron  hallados  diez 

hombres  que  dijeron  a  Ismael:  No  nos 

mates,  porque  tenemos  en  el  campo  te-

soros de trigos y cebadas y aceites y miel. 

Y  los  dejó,  y  no  los  asesinó  como  a  sus 

hermanos.


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Jeremías 41:9

814

9

 La cisterna donde Ismael echó todos los 

cadáveres de los hombres que había ase-

sinado junto con Gedalías, era la misma 

que había hecho el rey Asa a causa de Ba-

asa, rey de Israel. Ismael ben Netanías la 

llenó de cadáveres.

10

 Después  Ismael  llevó  cautivo  a  todo 

el resto del pueblo que estaba en Mizpa, 

a las hijas del rey y todos los del pueblo 

que habían quedado en Mizpa, y que Na-

buzaradán,  capitán  de  la  guardia,  había 

encomendado a Gedalías ben Ahicam. Los 

llevó pues cautivos Ismael ben Netanías, 

y partió con ánimo de pasarse a los hijos 

de Amón.

11

 Pero como Johanán ben Carea y todos 

los  príncipes  de  la  gente  de  guerra  que 

estaban  con  él,  tuvieron  noticia  de  todo 

el  mal  que  había  hecho  Ismael  ben  Ne-

tanías,

12

 tomaron a todos los hombres y fueron 

a  pelear  contra  Ismael  ben  Netanías,  a 

quien hallaron junto al gran estanque de 

Gabaón.

13

 Y aconteció que en cuanto los del pue-

blo  que  estaban  con  Ismael  divisaron  a 

Johanán ben Carea junto con los capita-

nes de la gente de guerra, se alegraron.

14

 Y todo el pueblo que Ismael había lle-

vado cautivo desde Mizpa se volvió y re-

gresó con Johanán ben Carea.

15

 Pero  Ismael  ben  Netanías  escapó  de-

lante de Johanán con ocho hombres y se 

fue a los hijos de Amón.

16

 Y  Johanán  ben  Carea  y  todos  sus  ca-

pitanes  con  él,  recogieron  al  resto  del 

pueblo  que  Ismael  ben  Netanías  había 

apresado en Mizpa después de asesinar a 

Gedalías ben Ahicam; esto es, hombres de 

guerra, mujeres, niños y eunucos, libera-

dos por Johanán en Gabaón.

17

 Y partieron y habitaron en Gerut-qui-

mam, que está cerca de Bet-léhem, para 

luego entrar en Egipto,

18

 porque temían a los caldeos, por cuan-

to  Ismael  ben  Netanías  había  asesinado 

a Gedalías ben Ahicam, a quien el rey de 

Babilonia había puesto como gobernador 

de la tierra.

Consulta al profeta

42

Todos los capitanes de la gente de 

guerra, junto a Johanán ben Carea, 

Jezanías ben Osaías, y todo el pueblo, des-

de el menor hasta el mayor, se acercaron

2

 y  dijeron  al  profeta  Jeremías:  Acepta 

ahora nuestro ruego delante de ti, y ora 

por  nosotros  a  YHVH  tu  Dios  por  todo 

este  remanente,  porque  de  muchos  que 

éramos, hemos quedado pocos, así como 

nos están viendo tus ojos,

3

 para  que  YHVH  tu  Dios  nos  enseñe  el 

camino  por  donde  debemos  andar,  y  lo 

que hemos de hacer.

4

 El  profeta  Jeremías  les  respondió:  He 

oído.  Mirad,  voy  a  orar  a  YHVH  vuestro 

Dios,  como  habéis  dicho,  y  todo  lo  que 

YHVH os respondiere, os enseñaré. No os 

reservaré palabra.

5

 Ellos dijeron a Jeremías: ¡Sea YHVH entre 

nosotros por testigo fiel y verdadero! Jura-

mos obrar conforme a todo aquello para lo 

cual YHVH tu Dios te envíe a nosotros.

6

 Sea  bueno,  sea  malo,  obedeceremos 

la voz de YHVH nuestro Dios, al cual te 

enviamos, para que nos vaya bien cuan-

do obedezcamos la voz de YHVH nuestro 

Dios.

7

 Al cabo de diez días Jeremías tuvo pala-

bra de YHVH.

8

 Y llamó a Johanán ben Carea y a todos 

los capitanes de la gente de guerra que es-

taban con él, y a todo el pueblo, desde el 

menor hasta el mayor,

9

 y les dijo: Así dice YHVH Dios de Israel, 

al cual me enviasteis para presentar vues-

tros ruegos delante de Él:

10

 Si permanecéis quietos en esta tierra, 

Yo os edificaré, y no os destruiré. Os plan-

taré, y no os arrancaré, porque me pesa 

todo el mal que os he hecho.

11

 No  temáis  de  la  presencia  del  rey  de 

Babilonia,  del  cual  tenéis  temor.  No  te-

máis de su presencia, dice YHVH, porque 

Yo estoy con vosotros para salvaros y li-

braros de su mano.

12

 Yo tendré de vosotros misericordia, y 

él  tendrá  misericordia  de  vosotros,  y  os 

hará regresar a vuestra tierra.

13

 Pero si decís: No habitaremos en esta 

tierra; desobedeciendo así la voz de YHVH 

vuestro Dios,

14

 diciendo: No, sino que entraremos en 

la  tierra  de  Egipto,  donde  no  veremos 

guerra, ni oiremos sonido de trompeta, ni 

padeceremos hambre, y allá moraremos.


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Jeremías 44:2

815

15

 Entonces  escuchad  la  palabra  de 

YHVH,  oh  remanente  de  Judá:  Así  dice 

YHVH  Sebaot,  Dios  de  Israel:  Si  volvéis 

vuestros rostros para entrar en Egipto, y 

entráis para peregrinar allá,

16

 sucederá que la espada que teméis, allí 

os alcanzará, en la tierra de Egipto, y el 

hambre de que tenéis temor, os persegui-

rá duramente en Egipto, y allí moriréis.

17

 Todos los hombres que vuelvan sus ros-

tros para entrar en Egipto para peregrinar 

allí, morirán a espada, de hambre y de pes-

tilencia. Ninguno de ellos quedará vivo, ni 

escapará del mal que Yo traeré sobre ellos.

18

 Porque  así  dice  YHVH  Sebaot,  Dios 

de Israel: Como mi ira y mi indignación 

se  derramó  sobre  los  moradores  de  Je-

rusalem,  así  se  derramará  mi  ira  sobre 

vosotros si vais a Egipto. Y seréis objeto 

de  execración  y  espanto,  de  maldición  y 

afrenta, y no veréis más este lugar.

19

 Oh remanente de Judá: YHVH ha ha-

blado sobre vosotros: ¡No entréis en Egip-

to! Sabed ciertamente que en este día os 

lo he advertido.

20

 ¿Por qué os engañáis a vosotros mis-

mos?  Porque  vosotros  me  enviasteis  a 

YHVH  vuestro  Dios,  diciendo:  Ora  por 

nosotros a YHVH nuestro Dios, y haznos 

saber todas las cosas que YHVH nuestro 

Dios diga, y lo haremos.

21

 Y os lo he declarado hoy, y no habéis 

obedecido la voz de YHVH vuestro Dios, 

ni todas las cosas por las cuales me envió 

a vosotros.

22

 Ahora pues, sabed por cierto que a es-

pada, de hambre y de pestilencia moriréis 

en el lugar donde deseasteis entrar para 

habitar allí.

Hacia Egipto

43

Cuando  Jeremías  terminó  de  co-

municar a todo el pueblo todas las 

palabras de YHVH, el Dios de ellos, es de-

cir, todas las palabras que YHVH el Dios 

de ellos les había enviado,

2

 Azarías ben Osaías y Johanán ben Carea, 

y todos los varones arrogantes respondie-

ron a Jeremías: ¡Mentira dices! No te ha 

enviado  YHVH  nuestro  Dios  para  decir: 

No vayáis a Egipto para peregrinar allí,

3

 sino que Baruc ben Nerías te incita con-

tra nosotros, para entregarnos en manos 

de los caldeos, para matarnos o llevarnos 

cautivos a Babilonia.

4

 Así, Johanán ben Carea y todos los ca-

pitanes de la gente de guerra junto con el 

pueblo,  no  obedecieron  la  voz  de  YHVH 

para quedarse en tierra de Judá,

5

 sino que Johanán ben Carea y todos los 

capitanes de la gente de guerra, reunieron 

al remanente de Judá que había vuelto de 

todas  las  naciones  de  la  dispersión  para 

habitar en Judá:

6

 Hombres y mujeres, niños y princesas, y 

cuantos Nabuzaradán, capitán de la guar-

dia,  había  encomendado  a  Gedalías  ben 

Ahicam, hijo de Safán; y también al pro-

feta Jeremías y a Baruc ben Nerías,

7

 y entraron en tierra de Egipto, no obe-

deciendo  la  voz  de  YHVH,  y  llegaron  a 

Tafnes.

8

 Entonces la palabra de YHVH llegó a Je-

remías en Tafnes, diciendo:

9

 Toma en tu mano piedras grandes, y en-

tiérralas  con  argamasa  en  el  pavimento 

que está a la puerta de la casa de Faraón, 

en Tafnes, a vista de los hombres de Judá,

10

 y  diles:  Así  dice  YHVH  Sebaot,  Dios 

de  Israel:  Yo  mandaré  a  buscar  a  Nabu-

codonosor rey de Babilonia, mi siervo, y 

colocaré su trono sobre estas piedras que 

he escondido, y él extenderá su pabellón 

sobre ellas.

11

 Vendrá y asolará la tierra de Egipto: ¡El 

destinado a muerte, a muerte, el destina-

do a cautiverio, a cautiverio, el destinado 

a la espada, a la espada!

12

 Prenderá  fuego  a  los  templos  de  los 

dioses de Egipto y los quemará, y a ellos 

los llevará cautivos; y así como el pastor 

se  sacude  la  capa,  limpiará  la  tierra  de 

Egipto, y saldrá de allí en paz.

13

 Quebrará también las estatuas de Bet-

semes,  que  están  en  tierra  de  Egipto,  y 

quemará a fuego los templos de los dioses 

de Egipto.

En Egipto

44

Oráculo que tuvo Jeremías acerca 

de todos los judíos que moraban en 

la tierra de Egipto, que vivían en Migdol, 

en Tafnes, en Menfis y en tierra de Patros, 

que decía:

2

 Así  dice  YHVH  Sebaot,  Dios  de  Israel: 

Vosotros habéis visto todo el mal que traje 


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Jeremías 44:3

816

sobre Jerusalem y sobre todas las ciuda-

des  de  Judá,  pues  he  aquí  que  el  día  de 

hoy son una desolación y nadie vive allí,

3

 por causa de la maldad con que se em-

peñaron en provocarme, yendo a quemar 

incienso,  honrando  a  dioses  ajenos  que 

no habían conocido ni ellos, ni vosotros, 

ni vuestros padres.

4

 Yo os envié a todos mis siervos los pro-

fetas, madrugando y sin cesar, para deci-

ros: ¡Oh, no hagáis esta cosa abominable 

que Yo aborrezco!

5

 Pero no escucharon ni inclinaron el oído 

para convertirse de su maldad, dejando de 

quemar incienso a dioses extraños.

6

 Por lo que se derramó mi ira y mi in-

dignación,  la  cual  ardió  en  las  ciudades 

de Judá y  en las calles de Jerusalem,  de 

modo que han venido a ser un desierto y 

una desolación, como hoy se ve.

7

 Y  ahora,  dice  YHVH  Sebaot,  Dios  de 

Israel:  ¿Por  qué  hacéis  vosotros  un  mal 

tan grande contra vuestras propias almas, 

para  cortar  de  los  vuestros  a  hombres  y 

mujeres, jóvenes y niños de pecho de en 

medio  de  Judá,  sin  que  os  quede  rema-

nente alguno;

8

 provocándome a ira con la obra de vues-

tras  manos,  quemando  incienso  a  otros 

dioses aquí° en la tierra de Egipto, adonde 

habéis entrado a peregrinar, de suerte que 

os acabéis, y lleguéis a ser maldición y opro-

bio ante todas las naciones de la tierra?

9

 ¿Acaso habéis olvidado las maldades de 

vuestros  padres,  las  maldades  de  los  re-

yes de Judá, las maldades de sus mujeres, 

vuestras propias maldades y las maldades 

de vuestras mujeres, que cometieron en 

la tierra de Judá, y por las calles de Jeru-

salem?

10

 Hasta el día de hoy no se han humilla-

do,  ni  han  tenido  temor,  ni  han  andado 

en mi Ley ni en mis estatutos, los cuales 

puse delante de vosotros y de vuestros pa-

dres.

11

 Por tanto, así dice YHVH Sebaot, Dios 

de  Israel:  He  aquí  Yo  pongo  mi  rostro 

contra vosotros para mal, y para destruc-

ción de todo Judá.

12

 Tomaré el resto de Judá, los que vol-

vieron sus rostros para entrar en Egipto 

a peregrinar allí, y en tierra de Egipto se-

rán todos consumidos. Caerán a espada, y 

serán consumidos de hambre. A espada y 

de hambre morirán desde el menor hasta 

el mayor, y serán objeto de execración, de 

espanto, de maldición y de oprobio.

13

 Y  así  como  castigué  a  Jerusalem  con 

espada, con hambre y pestilencia, castiga-

ré a los que moran en tierra de Egipto.

14

 Y del resto de los de Judá que entra-

ron  en  la  tierra  de  Egipto  para  peregri-

nar allí, no habrá quien escape, ni quien 

quede vivo para volver a la tierra de Judá, 

adonde ardientemente desean volver para 

habitar allí, salvo uno que otro fugitivo.

15

 Entonces, todos los que sabían que sus 

mujeres habían ofrecido incienso a dioses 

ajenos, una gran concurrencia de muje-

res  allí  presentes,  y  todo  el  pueblo  que 

moraba  en  Patros,  en  tierra  de  Egipto, 

respondieron a Jeremías diciendo:

16

 En cuanto a la palabra que nos has di-

cho en nombre de YHVH, no te obedece-

remos.

17

 Al  contrario,  cumpliremos  resuelta-

mente  toda  promesa  salida  de  nuestra 

boca, respecto a quemar incienso en ho-

nor de la reina de los cielos, y derramar 

libaciones a ella, como hemos hecho no-

sotros y nuestros padres, nuestros reyes 

y  nuestros  príncipes  en  las  ciudades  de 

Judá y en las plazas de Jerusalem, con lo 

cual  tuvimos  abundancia  de  pan,  y  éra-

mos felices, y no veíamos mal alguno.

18

 Pero  desde  que  dejamos  de  quemar 

incienso a la reina de los cielos y de de-

rramar libaciones a ella, todo nos falta, y 

hemos  sido  consumidos  por  la  espada  y 

por el hambre.

19

 Y  añadieron  las  mujeres:°  Cuando 

nosotras incensamos y derramamos liba-

ciones a la reina del cielo, ¿acaso le tribu-

tamos culto con tortas y libaciones sin el 

consentimiento de nuestros maridos?

20

 Jeremías  habló  entonces  a  todo  el 

pueblo, a los hombres y a las mujeres y 

a todo el pueblo que le había respondido 

esto, diciendo:

21

 ¿Acaso  ha  pasado  desapercibido  ante 

YHVH, y no está en su memoria el incien-

so ofrecido por vosotros y vuestros padres, 

44.8 .aquí.  44.19 .añadieron las mujeres


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Jeremías 46:7

817

por vuestros reyes y vuestros príncipes y 

por el pueblo de la tierra en las ciudades 

de Judá, y en las calles de Jerusalem?

22

 Por  eso,  ante  la  maldad  de  vuestras 

obras, de las abominaciones que habíais 

hecho,  YHVH  no  lo  pudo  sufrir  más,  y 

vuestra tierra fue puesta en asolamiento, 

en espanto y en maldición, hasta quedar 

sin morador, como está hoy;

23

 por lo mismo que ofrecisteis incienso y 

pecasteis contra YHVH, y no obedecisteis 

la voz de YHVH, ni anduvisteis en su Ley 

ni en sus estatutos ni en sus testimonios; 

por eso ha venido sobre vosotros este mal, 

como hasta hoy.

24

 Y  Jeremías  dijo  a  todo  el  pueblo  y  a 

todas las mujeres: Todos los de Judá que 

estáis en tierra de Egipto, oíd la palabra 

de YHVH:

25

 Así habla YHVH Sebaot, Dios de Israel, 

diciendo: Vosotros y vuestras mujeres no 

sólo  hablasteis  con  vuestras  bocas,  sino 

que  con  vuestras  manos  lo  ejecutasteis, 

diciendo: Sin falta cumpliremos nuestros 

votos que hemos hecho de quemar incien-

so a la reina de los cielos y de derramar 

libaciones a ella. Pues, ¡ratificad vuestros 

votos y cumplid vuestras promesas!

26

 Pero,  judíos  todos  que  habitáis  en 

Egipto, oíd el oráculo de YHVH: He aquí, 

juro  por  mi  gran  Nombre,  dice  YHVH, 

que  mi  Nombre  no  será  pronunciado 

más por la boca de ningún judío en toda 

la tierra de Egipto, diciendo: ¡Vive Ado-

nay YHVH!

27

 He aquí Yo vigilo sobre ellos para mal y 

no para bien; y todos los hombres de Judá 

que están en tierra de Egipto serán con-

sumidos  por  la  espada  y  por  el  hambre, 

hasta que perezcan del todo.

28

 Y los que escapen de la espada volve-

rán  de  la  tierra  de  Egipto  a  la  tierra  de 

Judá, pocos en número. Entonces todo el 

remanente de Judá que entró en Egipto 

para peregrinar allá, sabrá cuál es la pa-

labra que quedará establecida: si la mía, 

o la suya.

29

 Y esto tendréis por señal, dice YHVH, 

de  que  Yo  os  castigo  en  este  lugar,  para 

que sepáis que mis palabras ciertamente 

permanecerán para mal sobre vosotros.

30

 Así  dice  YHVH:  He  aquí  Yo  entrego 

a Faraón Hofra, rey de Egipto, en mano 

de  sus  enemigos  y  en  mano  de  los  que 

buscan su vida, así como entregué a Se-

dequías rey de Judá en mano de Nabuco-

donosor rey de Babilonia, su enemigo que 

buscaba su vida.

Baruc

45

Palabra que habló el profeta Jere-

mías  a  Baruc  ben  Nerías,  cuando 

éste  había  escrito  en  el  rollo  aquellas 

palabras  de  boca  de  Jeremías,  en  el  año 

cuarto de Joacim ben Josías, rey de Judá, 

diciendo:

2

 Así dice YHVH, el Dios de Israel, a ti, oh 

Baruc:

3

 Tú dijiste: ¡Ay de mí, porque YHVH ha 

añadido tristeza a mi dolor! ¡Estoy cansa-

do de gemir, y no hallo descanso!

4

 Así  le  dirás:  Dice  YHVH:  He  aquí,  Yo 

destruyo a los que edifiqué y arranco a los 

que planté, y eso en toda esta tierra.

5

 ¿Y tú buscas para ti grandezas? ¡No las 

busques!  porque  he  aquí,  Yo  traigo  mal 

sobre toda carne, dice YHVH. Pero tu vida 

te será dada por botín en todos los lugares 

adonde tú vayas.

Sobre Egipto

46

Revelación de YHVH al profeta Je-

remías sobre las naciones.

2

 Acerca de Egipto. Contra el ejército de 

faraón  Necao,  rey  de  Egipto,  que  llegó 

hasta Carquemis, junto al Éufrates, y fue 

derrotado por Nabucodonosor, rey de Ba-

bilonia, el año cuarto de Joacim ben Jo-

sías, rey de Judá:

3

    Preparad escudo y pavés,

Y avanzad a la batalla;

4

    Uncid los caballos y montad, 

vosotros jinetes;

Presentaos con vuestros yelmos,

Bruñid las lanzas y vestíos la 

corazas.

5

    Pero, ¿qué es lo que veo?

Están aterrorizados;

Sus valientes se baten en retirada 

derrotados,

Y huyen sin mirar atrás cercados de 

pavor, dice YHVH.

6

    ¡Que no salve la agilidad ni libre la 

valentía!

¡Al norte, junto al Éufrates, 

tropiezan y caen!

7

    ¿Quién es ése que crece como 

el Nilo,


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Jeremías 46:8

818

Y encrespa sus aguas como ríos,

8

    Que dice: Creceré, inundaré la 

tierra,

Destruiré ciudades y a sus 

moradores?

Es Egipto, que crece como el Nilo,

Y sus aguas se encrespan como ríos.

9

    ¡Avanzad, caballos, carros, corred 

locamente,

Pónganse en marcha los hombres 

valientes!

Etíopes y libios que embrazan el 

escudo,

Lidios que entesan el arco.

10

    Ese día es para Adonay YHVH 

Sebaot,

Su día de retribución,

Para vengarse de sus enemigos.

La espada devora, se embriaga de 

sangre, y se sacia:

Adonay YHVH Sebaot tiene un gran 

sacrificio junto al Éufrates,

En la tierra del norte.

11

    ¡Sube a Galaad por bálsamo,

Oh virgen hija de Egipto!

En vano multiplicas los remedios,

Pues no hay sanidad para ti.

12

    Las naciones ya tienen noticia de tu 

oprobio,

Tus alaridos llenan la tierra;

El valiente tropezó con el valiente,

Y juntos cayeron los dos.

13

 Oráculo que habló YHVH al profeta Je-

remías sobre la venida de Nabucodonosor 

rey de Babilonia, para asolar la tierra de 

Egipto:

14

    ¡Decidlo en Egipto,

Proclamadlo en Migdol!

¡Hacedlo saber en Menfis y en 

Tafnes!

Decid: ¡Ponte en pie y estate alerta,

Que la espada ya devora en derredor!

15

    ¿Por qué está postrado Apis?°

Tu toro no pudo quedarse en pie 

porque YHVH lo empujó,

16

    E hizo tropezar a muchos:

Cada cual caía sobre su compañero,

Hasta que dijeron: ¡Levantémonos 

y huyamos de la espada 

destructora!

¡Volvamos a nuestro pueblo y a 

nuestra tierra natal!

17

    Y allí apodaron al rey de Egipto:

¡Faraón, rugido inoportuno!°

18

    ¡Vivo Yo! Oráculo del Rey,

Cuyo nombre es YHVH Sebaot:

Como el Tabor es real entre los 

montes,

Y el Carmelo se levanta frente al mar,

Así vendrá él.°

19

    ¡Prepárate enseres de cautiverio oh 

moradora hija de Egipto!

Menfis será una desolación,

Será arrasada hasta no quedar 

morador.

20

    Novilla hermosa es Egipto,

Pero del norte ciertamente viene un 

tábano sobre ella.

21

    También sus mercenarios eran 

novillos cebados,

Pero ahora dan la espalda y huyen 

juntos sin parar;

No resisten en sus puestos,

Pues les llega el día de su calamidad,

El día de su visitación.

22

    Oídla, silbando cual serpiente,

Porque los enemigos avanzan;

La invaden como leñadores con 

hachas,

23

    Talan sus bosques, dice YHVH.

Por muchos e incontables que sean,

Aunque sean más numerosos que la 

langosta,

24

    La hija de Egipto es avergonzada,°

Y entregada en manos del pueblo del 

norte.

25

    Dice YHVH Sebaot, Dios de Israel:

He aquí Yo castigo a Amón, dios de 

Tebas,

A Egipto, con sus ídolos y sus 

príncipes,

Y a Faraón, y a quienes confían 

en él.

26

    Los entregaré en mano de quienes 

buscan su vida,

Y en mano de Nabucodonosor, rey 

de Babilonia,

Y en mano de sus siervos.

Después será habitada como antaño, 

dice YHVH.

46.15 Lit. poderoso. Esto es, dios egipcio en forma de toro.  46.17 Lit. sobrepasado por el tiempo señalado.  46.18 Esto es, 

Nabucodonosor

46.24 Es decir, derrotada


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Jeremías 48:11

819

27

    Pero tú, Jacob siervo mío, no temas,

¡No desmayes, oh Israel!

Yo te traeré de lejos sano y salvo,

Y a tu descendencia de la cautividad.

Jacob volverá y estará tranquilo,

Y será prosperado, y no habrá quien 

lo espante.

28

    No temas tú, siervo mío Jacob, dice 

YHVH,

Porque Yo estoy contigo.

Exterminaré a todas las naciones 

adonde te he expulsado,

Pero a ti no te exterminaré, sino que 

te corregiré con justicia,

Y de ninguna manera te dejaré sin 

castigo.

Sobre Filistea

47

Revelación de YHVH al profeta Je-

remías acerca de los filisteos (antes 

que Faraón destruyera Gaza).

2

 Así dice YHVH:

He aquí, aguas que se alzan del norte,

Ya son un torrente inundador,

Que inunda la tierra y su plenitud,

Las ciudades y los que en ellas 

habitan:

Claman los hombres,

Se lamenta todo morador de la 

tierra.

3

    Por el galopar de sus caballos,

Por el alboroto de sus carros,

Por el estruendo de sus ruedas,

Los padres, ya sin fuerzas,

Ni siquiera miran por sus hijos.

4

    Porque el día asolador le llega a 

Filistea,

Y en Tiro y en Sidón se ha cortado

hasta el último de sus defensas.

YHVH destruye a los filisteos y al 

resto de la costa de Caftor;

5

    Gaza está rapada,

Ascalón, reducida al silencio.

¡Ay!, remanente de gigantes:

¿Hasta cuándo os sajaréis?

6

    ¡Ay, espada de YHVH!

¿Hasta cuándo no descansarás?

¡Vuélvete a la vaina, descansa y 

estate quieta!

7

    ¿Cómo podrá estarse quieta,

Cuando YHVH la ha mandado,

Cuando la ha destinado contra 

Ascalón y la costa del mar?

La sentencia contra Moab

48

Acerca de Moab.

Así dice YHVH Sebaot, Dios de 

Israel:

¡Ay de Nebo, arrasada;

De Quiriataim, avergonzada y 

conquistada!

La altiva fortaleza ha sido derrotada 

y deshecha.

2

    Moab no se alabará ya más,

En Hesbón tramaban contra ella:

¡Vamos a destruirla como nación!

¡Oh Madmena, reducida hasta el 

silencio,

Con la espada en pos de ti!

3

    ¡Voz de clamor desde Horonaim:

Asolamiento y gran destrucción!

4

    ¡Moab ha sido destruida!

Sus pequeños prorrumpen en gritos,

5

    Por la cuesta de Luhit suben con 

llanto incesante,

Y por la bajada de Horonaim los 

enemigos oyen el clamor de 

quebranto.

6

    ¡Huid y salvad vuestra vida!

Y sed como el asno montés en el 

desierto.

7

    Por confiarte de tus bienes y tesoros,

Tú también serás conquistada,

Quemos será llevado en cautiverio,

Con sus sacerdotes y sus príncipes 

juntamente.

8

    Y el que destruye vendrá a cada 

pueblo,

Y ninguno escapará;

Se arruinará el valle,

Y será destruida también la llanura,

Como YHVH lo ha dicho.

9

    ¡Dad alas a Moab, para que escape 

volando!

Sus ciudades quedan desiertas,

No hay en ellas morador.°

10

    ¡Maldito el que haga la obra de 

YHVH indolentemente!

¡Maldito el que retraiga su espada de 

derramar sangre!

11

    Desde su juventud Moab fue 

negligente,

48.9 Texto probable.


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Jeremías 48:12

820

Sobre su sedimento° ha estado 

reposado,

Nunca fue trasegado de vasija en 

vasija,

Nunca estuvo en cautiverio,

Así conservó su gusto y no alteró su 

aroma.

12

    Por tanto, he aquí vienen días, dice 

YHVH,

En que Yo le enviaré tinajeros que lo 

trasieguen,

Y vaciarán sus vasijas, y romperán 

sus odres.

13

    Entonces Moab se avergonzará de 

Quemos,

Como la casa de Israel se avergonzó 

de Bet-’El, en quien confiaba.

14

    ¿Cómo decís: Somos valientes,

Hombres robustos para la batalla?

15

    Moab está asolado,

Sus ciudades han subido en humo,°

Sus jóvenes más escogidos 

descendieron al degolladero,

Dice el Rey, cuyo nombre es YHVH 

Sebaot.

16

    La calamidad de Moab está pronta,

Su mal se apresura en gran manera.

17

    Compadeceos de él todos los que lo 

rodeáis,

Y todos los que conocéis su nombre, 

decid:

¡Cómo fue quebrado el cetro fuerte,

El bastón de majestad!

18

    Desciende de tu gloria,

Y siéntate sedienta,

Oh hija que habitas en Dibón,

Porque sube contra ti el destructor 

de Moab,

Para destruir tus fortalezas.

19

    Párate en el camino, y observa,

Oh habitante de Aroer,

Pregunta al que huye y a la que 

escapa:

¿Qué ha acontecido?

20

    ¡Moab fue derrotado y ha 

desfallecido!

¡Lamentad y llorad, y anunciad en el 

Arnón

Que Moab está arrasado!

21

    Que la sentencia contra la llanura 

ha sido ejecutada:

Contra Holón, Jahaza y Mefaat,

22

    Contra Dibón, Nebo y Bet-diblataim,

23

    Contra Quiriataim, Bet-gamul y 

Bet-meón,

24

    Contra Queriot y contra Bosra,

Contra todas las ciudades de tierra 

de Moab,

Las de lejos y las de cerca.

25

    Han arrancado el cuerno a Moab,

Y su brazo está quebrantado, dice 

YHVH.

26

    Embriagadlo;° quiso engrandecerse 

contra YHVH:

¡Revuélquese Moab en su propio 

vómito, y también él conviértase 

en objeto de burla!

27

    ¿No ha sido Israel objeto de burla 

para ti?

¿Acaso ha sido sorprendido con 

ladrones,

Que cuantas veces hablas de él, 

mueves despectivo la cabeza?

28

    ¡Dejad las ciudades y habitad en 

peñascos,

Oh moradores de Moab!

Sed como la paloma que anida al 

borde del precipicio.

29

    Hemos tenido noticia de la soberbia 

de Moab,

De su soberbia desmedida,

De su arrogancia,

De su orgullo e insolencia,

Y altivez de corazón.

30

    Yo conozco sus jactancias, dice 

YHVH,

Pero vano es aquello en que se jacta,

Vano es lo que hacen.

31

    Por eso me lamento por Moab,

Sobre Moab entero clamo,

Y gimo por los hombres de Kir-hares.

32

    Lloraré por ti más que por Jazer,

Oh viña de Sibma.

Tus sarmientos pasaron sobre el 

mar,

Llegando hasta las aguas de Jazer.

Sobre tu cosecha y tu vendimia ha 

caído el desolador,

33

    Y cesaron la alegría y el regocijo en 

las vegas de la tierra de Moab.

Acabé con el vino de tus lagares,

Nadie los pisará con alborozo,

48.11 Esto es, los sedimentos del vino.  48.15 .humo.  48.26 Esto es, de su propia sangre.


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Jeremías 49:6

821

Porque el alborozo no será más 

alborozo.

34

 Desde  donde  clama  Hesbón  hasta 

Eleale, y hasta Jahaza dieron su voz; des-

de Zoar hasta Horonaim, cual novilla de 

tres  años,  porque  las  aguas  de  Nimrim 

también serán asoladas.

35

 También haré que cesen en Moab, dice 

YHVH,  el  que  ofrece  holocaustos  en  los 

altos, y el que ofrece incienso a sus dio-

ses.

36

 Por  eso  mi  corazón  gime  con  voz  de 

flauta por Moab, mi corazón gime con voz 

de  flauta  por  los  hombres  de  Kir-hares, 

porque la abundancia adquirida se ha es-

fumado.

37

 Toda cabeza está rapada, y toda barba 

raída. Sobre toda mano hay sajaduras, y 

sobre todo lomo cilicio.

38

 Sobre todos los terrados de Moab, y en 

sus plazas hay lamentación por todas par-

tes, porque he roto a Moab como a vasija 

a la que nadie valora, dice YHVH.

39

 ¡Lamentad!  ¡Cómo  está  quebrantado! 

¡Cómo dio Moab la espalda avergonzada! 

Así será Moab motivo de burla y desalien-

to para todos sus vecinos,

40

 Porque así dice YHVH:

He aquí, como águila se abalanza,°

Sus alas extendidas contra Moab:

41

    Son tomadas las ciudades,

Y las fortalezas, conquistadas;

Aquel día el corazón de los valientes 

de Moab

Será como el corazón de una 

parturienta.

42

    Moab será destruida hasta dejar de 

ser pueblo,

Porque se engrandeció contra 

YHVH.

43

    Terror, foso, y trampa están sobre ti,

Oh morador de Moab, dice YHVH.

44

    El que huya del terror caerá al foso,

Y el que salga del foso caerá en la 

trampa,

Porque hago que le llegue a Moab,

El año de su visitación,° dice YHVH.

45

    A la sombra de Hesbón los fugitivos 

están sin fuerzas,

Un fuego ha salido de Hesbón,

Y una llama de en medio de Sehón,

Que devora el extremo de Moab,

Y la coronilla de los hijos revoltosos.

46

    ¡Ay de ti, Moab!

¡Pereció el pueblo de Quemos!

Tus hijos marchan en cautiverio,

Y tus hijas parten para el destierro.

47

    En lo postrero de los tiempos haré 

volver a los cautivos de Moab, 

dice YHVH.

Hasta aquí la sentencia de Moab.

Acerca de Amón

49

Sobre los hijos de Amón.

Así dice YHVH:

¿No tiene hijos Israel?

¿No tiene heredero?

¿Por qué entonces Milcom toma 

posesión de Gad,

Y su pueblo se establece en sus 

ciudades?

2

    Por tanto, vienen días, dice YHVH,

En que haré resonar alarma de 

guerra contra Rabá de los hijos 

de Amón.

Será convertida en montón de ruinas,

Y sus ciudades serán puestas a fuego.

Entonces Israel desposeerá

A quien lo desposeyó, dice YHVH.

3

    ¡Grita de dolor, oh Hesbón,

Porque Hai está siendo destruida!

¡Llorad, hijas de Rabá, vestíos de 

cilicio!

Lamentaos y corred de un lado a 

otro entre los vallados,

Porque Milcom irá en cautiverio,

Con sus sacerdotes y príncipes 

juntamente.

4

    ¿Por qué te glorías de tus valles,

De tu valle de abundancia,

Oh hija apóstata?

Tú que confiaste en sus tesoros,

Y decías: ¿Quién vendrá contra mí?

5

    Mira, Yo envío un terror sobre ti,

Dice Adonay YHVH Sebaot,

Que te rodeará por todas partes,

Y seréis expulsados, cada cual 

delante de sí mismo,

Y no habrá quien recoja a los 

fugitivos.

6

    Después cambiaré la suerte de 

Amón, dice YHVH.

48.40 Esto es, el enemigo.  48.44 Es decir, de rendir cuentas; de su castigo


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Jeremías 49:7

822

Contra Idumea

7

    Acerca de Idumea.

Así dice YHVH Sebaot:

¿Ya no hay más sabiduría en Temán?

¿Ya no hay más consejo en sus 

maestros?

¿Ya se ha corrompido su sabiduría?

8

    Huid, volveos atrás, cavad refugios,

Oh moradores de Dedán;

Porque a Esaú le envío su desastre 

en el tiempo de su visitación.

9

    Si te invadieran vendimiadores,

¿No habrían dejado rebuscos?

Si vinieran ladrones nocturnos,

¿No te saquearían con mesura?

10

    Pero soy Yo el que desnudo a Esaú,

Y descubro sus escondrijos,

Y no podrá esconderse.

Su descendencia será destruida,

Con sus hermanos y vecinos, y 

dejará de ser.

11

    Deja a tus huérfanos, que Yo los 

criaré,

Deja que tus viudas confíen en mí.

12

 Porque así dice YHVH: He aquí, los que 

no estaban condenados a beber el cáliz, lo 

han tenido que beber, ¿y serás tú el que 

ha de irse sin castigo? No serás absuelto, 

sino que lo tendrás que beber inexorable-

mente.

13

 Por cuanto he jurado por mí mismo, 

dice  YHVH,  que  Bosra  será  un  asola-

miento,  un  oprobio,  una  soledad  y  una 

maldición, y todas sus ciudades serán de-

solaciones perpetuas.

14

    Un mensaje he oído de YHVH,

Un embajador es enviado a las 

naciones:

¡Juntaos y venid contra ella,

Y subid a la batalla!

15

    He aquí, te hago pequeña entre las 

naciones,

Y despreciada entre los hombres.

16

    El terror que inspirabas y la soberbia 

de tu corazón te ha engañado.

¡Oh tú que habitas en las hendiduras 

de la peña!

Aunque hagas tu nido como el 

águila,

De allí te haré bajar, dice YHVH.

17

 Idumea  se  convertirá  en  desolación: 

todo el que pase por ella silbará de asom-

bro al ver sus heridas.

18

 Será como la catástrofe de Sodoma y 

de Gomorra y sus ciudades vecinas, dice 

YHVH, así nadie morará allí ni la habitará 

hijo de hombre.

19

 Como un león que sube de la espesura 

del Jordán a pastizales de perenne verdor, 

así los espantaré de repente, y me adueña-

ré de los escogidos. Porque, ¿quién es se-

mejante a mí? ¿Quién me desafía? ¿Quién 

es aquel pastor que me podrá resistir?

20

 Por  tanto,  oíd  el  designio  de  YHVH 

contra Edom, y sus planes contra los mo-

radores de Temán:

¿No arrastrarán a los más pequeños 

de su rebaño?

¿No destruirán sus moradas con 

ellos?

21

    Al estruendo de la caída tiembla la 

tierra;

Clamor cuyo eco se oye en el Mar 

Rojo.

22

    He aquí él se remonta y vuela,

Se abalanza como el águila,

Y extiende sus alas contra Bosra,

Y en aquel día el corazón de los 

valientes de Edom

Será como el corazón de una mujer 

en angustias de parto.

Sobre Damasco

23

    Acerca de Damasco.

Se confundieron Hamat y Arfad,

Porque malas noticias han oído.

Se derriten en aguas de desmayo,

No pueden sosegarse.

24

    Damasco se debilita,

Y se apresta para huir,

El temblor se ha apoderado de ella.

Dominada por la angustia y los 

dolores,

Como de mujer parturienta.

25

    ¡Ay! ¡Como está abandonada la 

ciudad famosa,

La villa de mi regocijo!

26

    Sus jóvenes caen en las plazas aquel 

día,

Y todos los hombres de guerra han 

sido reducidos a silencio, dice 

YHVH Sebaot.

27

    Haré encender un fuego en el muro 

de Damasco,

Que devorará los palacios de 

Ben-adad.


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Jeremías 50:9

823

Acerca de Cedar y Hazor

28

    Contra Cedar y los reinos de Hazor, 

(a los que derrotó Nabucodonosor 

rey de Babilonia).

Así dice YHVH: Levantaos,

Subid contra Cedar,

Destruid a las tribus de oriente.

29

    ¡Tomen sus tiendas y rebaños,

Sus pabellones, su bagaje y sus 

camellos!

Clamen contra ellos:

¡Terror por todas partes!

30

    ¡Huid, andad errantes en lejanos 

países,

Habitad en refugios,

Oh moradores de Hazor! dice YHVH,

Porque Nabucodonosor, rey de 

Babilonia,

Tiene planes y designios contra 

vosotros.

31

    ¡En pie! Marchad contra un pueblo 

confiado,

Que habita tranquilo, sin puertas 

ni cerrojos y vive solitario, dice 

YHVH.

32

    Sus camellos serán por botín,

Y la multitud de sus ganados por 

despojo,

Y los esparciré por todos los vientos,

Arrojados hasta el último rincón,

Y de todos lados les traeré su ruina, 

dice YHVH.

33

    Hazor será cubil de chacales,

Una desolación perpetua;

Nadie habitará más allí,

Ni morará hombre alguno.

Sobre Elam

34

 Palabra de YHVH que recibió el profeta 

Jeremías acerca de Elam, al principio del 

reinado de Sedequías rey de Judá, dicien-

do:

35

    Así dice YHVH Sebaot:

¡He aquí Yo quiebro el arco de Elam,

El centro de su fortaleza!

36

    Traeré sobre Elam los cuatro vientos

De los cuatro confines de los cielos,

Y los aventaré a todos estos vientos,

Y no habrá nación a donde no 

lleguen los fugitivos de Elam.

37

    Haré que Elam desfallezca ante sus 

enemigos,

Y ante quienes buscan sus vidas.

Traeré el mal sobre ellos,

Y el ardor de mi ira, dice YHVH.

Y enviaré la espada tras ellos hasta 

consumirlos.

38

    Colocaré mi trono en Elam,

Y allí destruiré al rey y a los 

príncipes, dice YHVH.

39

    Pero en los últimos días, dice YHVH,

Haré regresar a los cautivos de Elam.

Sobre Babilonia

50

El oráculo que habló YHVH acerca 

de Babilonia y la tierra de los cal-

deos, por medio del profeta Jeremías:

2

    ¡Anunciadlo entre las naciones, 

pregonadlo!

¡Alzad el estandarte, publicadlo, y no 

lo encubráis!

Decid: ¡Babilonia ha sido 

conquistada!

¡Bel ha sido avergonzado,

Merodac está consternado!

Sus imágenes han quedado 

confundidas,

Y sus ídolos, desconcertados.

3

 Porque desde el Norte se abalanzó con-

tra ella una nación que convertirá su tie-

rra  en  una  desolación,  de  modo  que  no 

habrá quien habite en ella, porque hom-

bres y bestias huirán en desbandada.

4

 En aquellos días y en aquella hora, dice 

YHVH, vendrán juntos israelitas y judíos, 

llorando y buscando a YHVH su Dios.

5

 Y  vueltos  sus  rostros  hacia  acá,  pre-

guntarán por el camino a Sión, y dirán: 

¡Venid,  unámonos  a  YHVH  en  un  pacto 

eterno e irrevocable!

6

 Mi pueblo era como un rebaño perdido, 

que sus pastores descarriaron y abando-

naron en los montes, y han estado vagan-

do de collado en collado, olvidándose de 

su aprisco.

7

 Cuantos  los  hallaban,  los  devoraban. 

Sus  enemigos  decían:  No  hacemos  mal, 

porque han pecado contra YHVH, morada 

de justicia; sí, contra YHVH, esperanza de 

sus padres.

8

    ¡Huid de Babilonia y del territorio 

caldeo!

¡Salid como machos cabríos delante 

del rebaño!

9

    Yo movilizo contra Babilonia en el 

norte,


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Jeremías 50:10

824

Una alianza de poderosas naciones,

Que formarán contra ella y la 

conquistarán;

Sus flechas son las de diestros 

valientes,

No vuelven de vacío.

10

    La Caldea será saqueda,

Y sus saqueadores se hartarán, dice 

YHVH,

11

    Por cuanto, oh saqueadores de mi 

heredad,

Os alegrasteis y os gozasteis.

Ahora retozáis como novilla en el 

prado,

Y relincháis como poderosos 

corceles,°

12

    Pero vuestra madre° quedará 

avergonzada,

Será abochornada la que os dio a 

luz.

¡Hela ahí, convertida en última de 

las naciones,

En un desierto, en una estepa 

solitaria!

13

    Por la ira de YHVH quedará 

deshabitada,

Hecha una total desolación.

Cuantos pasen junto a Babilonia, 

silbarán de asombro por sus 

calamidades.

14

    ¡Alistaos en derredor contra 

Babilonia!

Cuantos entesáis el arco: 

¡Asaeteadla!

¡No escatiméis flechas!,

Porque ha pecado contra YHVH.

15

    ¡Lanzad el alarido en torno a ella!

Ella tiende sus manos:° Sus 

baluartes han caído,

Sus muros están derribados.

Tomad venganza sobre ella, porque 

es la venganza de YHVH.

Como ella ha hecho, hacedle a ella.

16

    ¡Cortad de Babilonia al sembrador

y al que empuña la hoz en la siega!

¡Huyen de la espada destructora,

Cada uno a su gente y a su tierra 

natal!

17

    Rebaño descarriado es Israel,

Acosado por leones:

Primero lo devoró el rey de Asiria,

Luego lo deshuesó Nabucodonosor 

rey de Babilonia.

18

 Por tanto, así dice YHVH Sebaot, Dios 

de Israel: He aquí Yo castigo al rey de Ba-

bilonia y a su tierra, como castigué al rey 

de Asiria.

19

 Y haré que Israel vuelva a su pastizal, 

y pacerá en el Carmelo y en Basán, para 

que sacie su alma en la serranía de Efraín 

y en Galaad.

20

 En aquellos días y en aquella hora, dice 

YHVH, se buscará la culpa de Israel, y no 

se hallará, y el pecado de Judá, y no se en-

contrará,  porque  Yo  habré  perdonado  al 

remanente que me haya reservado.

21

    ¡Avanzad contra la tierra de 

Merataim°

Y contra los habitantes de Pecod!°

¡Aniquila y destruye a filo de espada,

Y haz cuanto te ordene!, dice YHVH.

22

    ¡Estruendo de batalla en la tierra, y 

gran destrucción!

23

    ¡Cómo ha sido arrancado y quebrado 

el mazo del mundo!

¡Ay, Babilonia!, convertida en 

espanto de las naciones.

24

    ¡Ay, Babilonia!, te tendí una trampa,

Y sin darte cuenta has caído en ella.

Te han sorprendido y apresado,

Porque desafiaste a YHVH.

25

    YHVH ha abierto su arsenal y ha 

sacado las armas de su ira:

Adonay YHVH Sebaot tiene una 

tarea en tierra de los caldeos.

26

    ¡Arremeted contra ella desde los 

confines!

¡Abrid sus graneros!

¡Haced de ella montones, y 

destruidla totalmente!

¡Que no le queden ni reliquias!

27

    ¡Pasad a cuchillo a todos sus 

novillos°

Y desciendan ellos al matadero!

¡Ay de ellos! Pues ha llegado su día,

El tiempo de su visitación.

28

    ¡Oíd la voz de los que huyen y 

escapan de la tierra de Babilonia

50.11 .corceles.  50.12 Esto es, Babilonia.  50.15 Es decir, tiende sus manos pidiendo clemencia.  50.21 Esto es, la doble 

rebelión

50.21 Esto es, país de castigo.  50.27 Es decir, los guerreros.


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Jeremías 51:2

825

Para anunciar en Sión la retribución 

de YHVH nuestro Dios:

La venganza de su Casa!°

29

    ¡Convocad contra Babilonia a los 

arqueros,

A todos los que entesan arco,

Acampad en torno a ella

Y que no tenga escape!

Pagadle según su propia obra.

Como ella ha hecho, hacedle a ella,

Porque se ensoberbeció contra 

YHVH,

Contra el Santo de Israel.

30

    Por eso en aquel día sus jóvenes 

caerán en sus plazas,

Y todos sus hombres de guerra serán 

reducidos a silencio, dice YHVH.

31

    He aquí Yo estoy contra ti, oh 

Soberbia,°

Dice Adonay YHVH Sebaot.

Ha llegado tu día,

La hora de tu visitación:

32

    La Soberbia se tambaleará y caerá,

Y nadie la levantará,

Y encenderé un fuego tal en sus 

ciudades,

Que devorará todo en torno a ella.

33

    Así dice YHVH Sebaot: Israelitas y 

judíos sufren juntos la opresión:

Todos los que los tomaron cautivos 

los tienen fuertemente sujetados,

Y se niegan a dejarlos ir.

34

    Pero su Redentor es el Fuerte: 

YHVH Sebaot es su nombre.

Él defenderá eficazmente la causa 

de ellos,

A fin de sosegar la tierra y turbar a 

los moradores de Babilonia.

35

    ¡Espada! contra los caldeos, dice 

YHVH,

Contra los moradores de Babilonia,

Contra sus príncipes y sus sabios.

36

    ¡Espada! contra sus adivinos,

Y sean desconcertados.

¡Espada! contra sus valientes,

Y sean aterrorizados.

37

    ¡Espada! contra sus corceles y sus 

carros,

Y contra la turba entre ellos,

Y sean como mujeres.

¡Espada! contra sus tesoros,

Y sean saqueados.

38

    ¡Espada! contra sus ríos,

Y sean secados.

Pues es una tierra de ídolos que 

delira por sus espantajos.

39

 Por eso habitarán allí las fieras con los 

chacales,  y  morarán  en  ella  los  avestru-

ces, y nunca más será poblada ni avecin-

dada por generaciones y generaciones.

40

 Como  en  la  destrucción  que  ’Elohim 

causó  a  Sodoma  y  Gomorra  y  sus  ciu-

dades  vecinas,  donde  no  habita  nadie  ni 

mora hombre alguno, dice YHVH.

41

 Mirad:  un  ejército  viene  del  Norte,  y 

una nación grande y muchos reyes se le-

vantan de los confines de la tierra:

42

 Empuñan arco y jabalina; son crueles 

e implacables; su voz es como la del mar 

rugiente, y cabalgan contra ti, oh hija de 

Babilonia, en formación de guerra.

43

 Al  oír  su  fama  el  rey  de  Babilonia  se 

acobarda. La angustia lo atenaza, y siente 

dolores como de parturienta.

44

 Como un león que sube de la espesura 

del Jordán a pastizales de perenne verdor, 

así los espantaré de repente y me adueña-

ré de los escogidos, pues ¿quién es seme-

jante a mí?, ¿quién me desafía?, ¿quién es 

el pastor que puede resistirme?

45

 Por  tanto,  oíd  el  designio  que  YHVH 

tiene resuelto contra Babilonia, y los pla-

nes  que  ha  planeado  contra  los  caldeos: 

Ciertamente los arrastrarán fuera como a 

ovejas  endebles;  ciertamente  su  pastizal 

será devastado juntamente con ellos.

46

 Ante el grito de la conquista de Babilo-

nia se estremece la tierra, y un clamor se 

oye entre las naciones.

Contra Babilonia

51

Así dice YHVH: He aquí Yo levanto 

contra Babilonia y contra los mo-

radores de Leb-Qamay°

Un viento destructor.

2

    Enviaré contra Babilonia 

aventadores que la aventarán y 

vaciarán su territorio;

En el día de su calamidad estarán 

contra ella en derredor.

50.28 Es decir, la venganza de Dios hacia quienes destruyeron su Casa.  50.31 Esto es, Babilonia.  51.1 Esto es, mis adversarios 

(los caldeos). 


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Jeremías 51:3

826

3

    Que no se vaya el arquero ni el que 

viste la coraza se retire.

No perdonéis a sus jóvenes 

guerreros,°

Exterminad a todas sus huestes,

4

    Caigan heridos en tierra caldea,

Y sean alanceados en sus calles;

5

    Porque Israel y Judá no están viudas 

de su Dios,

De YHVH Sebaot,

Aunque su tierra esté llena de 

pecados

Contra el Santo de Israel.

6

    Huid de en medio de Babilonia,

Y cada cual salve su vida,

No perezcáis a causa de su maldad,

Porque es tiempo de venganza de 

YHVH:

Va a darle la retribución debida.

7

    Babilonia fue una copa de oro en 

mano de YHVH,

Que embriagaba a toda la tierra;

De su vino bebieron las naciones:

Por lo cual están enloquecidas.

8

    ¡Cayó de repente Babilonia y se hizo 

pedazos!

¡Gemid por ella, tomad bálsamo para 

su herida,

Por si acaso pueda sanar!

9

    Hemos querido sanar a Babilonia,

Pero no ha sanado;

Abandonadla, y vámonos cada uno a 

nuestra tierra,

Porque su castigo ha llegado hasta 

los cielos,

Se ha alzado hasta las nubes.

10

    YHVH acercó nuestra victoria:

¡Venid, anunciemos en Sión las 

proezas de YHVH nuestro Dios!

11

    ¡Afilad las saetas y embrazad el 

escudo!

YHVH incita el espíritu de los reyes 

de Media,

Cuyo plan es destruir a Babilonia,

Porque es la retribución de YHVH:

La venganza de su Casa derruida.

12

    ¡Alzad estandarte contra los muros 

de Babilonia!

¡Reforzad la guardia, poned 

centinelas,

Y disponed celadas!

Porque YHVH no sólo propone,

Sino que ejecuta lo que ha hablado 

contra los moradores de 

Babilonia.

13

    ¡Oh tú que vives sobre muchas 

aguas,

Y abundas en tus riquezas!

Tu fin ha llegado, tu trama fue 

cortada.

14

    YHVH Sebaot ha jurado por sí 

mismo:

Aunque tu muchedumbre sea más 

que la langosta,

Sobre ti alzarán el grito de victoria.°

15

    Él hizo la tierra con su poder,

Afirmó el mundo con maestría,

Y extendió los cielos con 

inteligencia.

16

    A su trueno° retumban las aguas en 

los cielos,

Hace subir las nubes desde el 

horizonte,

Desata con relámpagos la lluvia,

Y saca de sus tesoros el viento.

17

    El hombre que no entiende esto,

Con su conocimiento se embrutece.

Todo orfebre se avergonzará de su 

ídolo

Porque sus ídolos de fundición son 

un engaño,

Y no hay hálito en ellos;

18

    Vanidad son, obra digna de burla;

En el tiempo de su visitación, ellos 

perecerán.

19

    No es así la porción de Jacob,

Porque Él es el Creador de todas las 

cosas,

También de la tribu° de su 

propiedad,

Y su nombre es YHVH Sebaot.

20

    Tú° fuiste mi mazo y mis armas de 

guerra:

Por medio de ti he hecho pedazos 

las naciones,

Por medio de ti aniquilé reinos,

21

    Por medio de ti destrocé caballos y 

jinetes,

Por medio de ti destrocé el carro de 

guerra y al que lo monta,

51.3 .guerreros.  51.14 .victoria.  51.16 Lit. voz.  51.19 Prob. se refiere a Israel como cetro de su herencia.  51.20 Esto es, 

Babilonia.


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Jeremías 51:41

827

22

    Por medio de ti quebranté hombres 

y mujeres,

Por medio de ti quebranté al 

anciano y al niño,

Por medio de ti quebranté al joven y 

a la doncella;

23

    Por medio de ti quebranté al pastor 

y al rebaño,

Por medio de ti quebranté al 

labrador y su yunta,

Por medio de ti quebranté 

gobernadores y sátrapas.

24

 Pero ahora pagaré a Babilonia y a to-

dos los caldeos todo el mal que hicieron a 

Sión en vuestra presencia, dice YHVH.

25

    He aquí Yo estoy contra ti,

Oh volcán destructor, dice YHVH,

Que destruyó la tierra entera.

Extenderé contra ti mi brazo,

Y te haré rodar por las peñas,

Y haré que seas un volcán 

extinguido;

26

    No tomarán de ti piedra angular,

Ni piedra para cimientos;

Porque serás una desolación 

perpetua, dice YHVH.

27

    ¡Alzad estandarte en la tierra!

¡Tocad trompeta entre las naciones, 

convocando a la guerra santa!

¡Convocad contra ella los reinos de 

Ararat, de Mini y de Askenaz!

¡Designad contra ella un capitán!

¡Avancen los corceles cual langostas 

erizadas!

28

    Consagrad contra ella a las naciones,

A los reyes de Media, con sus 

capitanes y todos sus príncipes, y 

todo el territorio de su dominio.

29

    Temblará la tierra, y se afligirá,

Porque todos los planes de YHVH 

contra Babilonia han sido 

confirmados,

Para convertir la tierra de Babilonia 

en un desierto despoblado.

30

    Los valientes de Babilonia dejan de 

luchar,

Se agachan en sus fortalezas,

Su poder ha fracasado,

Se han vuelto como mujeres;

Sus casas están quemadas, rotos sus 

cerrojos.

31

    Un correo releva a otro,

Un mensajero releva a otro,

Para anunciar al rey de Babilonia 

que su ciudad ha sido del todo 

conquistada:

32

    Los vados fueron tomados,

Los baluartes han sido incendiados,

Y los guerreros están consternados.

33

    Así dice YHVH Sebaot, Dios de 

Israel:

La hija de Babilonia era un granero 

en tiempo de trilla,

De aquí a poco le vendrá el tiempo 

de la siega.

34

    Me ha devorado, me ha aplastado

Nabucodonosor rey de Babilonia;

Me ha puesto cual vasija vacía,

Me ha tragado como un dragón,

Ha llenado su vientre de mis 

mejores bocados,

Y me ha echado fuera.

35

    ¡Que mi carne pisoteada caiga sobre 

Babilonia!,

Dirá la población de Sión.

¡Que mi sangre derramada° caiga 

sobre los caldeos!

Dirá Jerusalem.

36

    Y así responde YHVH:

He aquí Yo defenderé tu causa

Y vengaré tus agravios: secaré su 

mar,

Haré que se sequen sus manantiales,

37

    Y Babilonia se convertirá en un 

montón de ruinas,

Cubil de chacales, sin morador; 

objeto de espanto y burla.

38

    Todos a una rugirán como leones,

Gruñirán como cachorros de león.

39

    Haré que sus banquetes acaben en 

fiebre.

Haré que se embriaguen para que 

celebren una orgía,

Y duerman un sueño eterno sin 

despertar, dice YHVH.

40

    Los haré bajar como ovejas para el 

degüello,

Como carneros y machos cabríos.

41

    ¡Ay Babilonia conquistada,

El orgullo del mundo capturado!

¡Ay Babilonia convertida en el 

espanto de las naciones!

51.35 .derramada


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Jeremías 51:42

828

42

    El mar ha subido hasta Babilonia,

Y la inundó con el tumulto de su 

oleaje.

43

    Sus ciudades quedaron asoladas,

Como tierra seca y desierta,

Tierra en donde nadie vive,

En donde no pasa ningún mortal.

44

    Castigaré a Bel en Babilonia,

Y sacaré el bocado de su boca,

Y las naciones no vendrán más a él,

Sí, hasta el muro de Babilonia se 

desplomará.

45

    ¡Salid de en medio de ella, pueblo 

mío!°

¡Ponte a salvo de la ardiente ira de 

YHVH!

46

 No desmaye vuestro corazón, ni temáis 

a causa del rumor que se oirá en la tierra. 

Un  año  vendrá  un  rumor,  y  el  otro  año 

otro rumor, y habrá violencia en la tierra, 

dominador contra dominador.

47

 Porque vienen días en que Yo destruiré 

los  ídolos  de  Babilonia,  y  toda  su  tierra 

será  humillada,  y  los  caídos  yacerán  en 

medio de ella.

48

 Entonces los cielos y la tierra y todo lo 

que hay en ellos gritarán de alegría sobre 

Babilonia, cuando venga sobre ella desde 

el norte el destructor, dice YHVH.

49

 También Babilonia caerá por las vícti-

mas de Israel, como por Babilonia caye-

ron víctimas de toda la tierra.

50

 Los que habéis escapado de la espada, 

¡id  y  no  os  detengáis!  ¡Invocad  a  YHVH 

desde  lejos,  y  Jerusalem  ocupe  vuestros 

pensamientos!

51

 Estamos avergonzados, hemos oído el 

reproche.  La  confusión  cubre  nuestros 

rostros, porque los extranjeros han entra-

do en el Santuario de la Casa de YHVH.

52

 Por  tanto,  he  aquí  vienen  días,  dice 

YHVH, en que Yo destruiré sus ídolos, y los 

traspasados gemirán por toda su tierra.

53

 Aunque  Babilonia  suba  hasta  los  cie-

los,  y  se  fortifique  en  las  alturas,  de  mi 

parte  le  vendrán  quienes  la  despojarán, 

dice YHVH.

54

 ¡Clamor y gritos desde Babilonia, gran 

destrucción en tierra de los caldeos!

55

 Porque YHVH está asolando a Babilo-

nia, y quitará de ella su gran jactancia, por 

mucho que rujan sus olas como muchas 

aguas, al estruendo de la voz de ellos.

56

 Por cuanto el asolador ha venido con-

tra  ella,  contra  Babilonia.  Sus  valientes 

han sido apresados y sus arcos destroza-

dos, porque YHVH es un Dios de retribu-

ciones, que da la paga inexorablemente.

57

 Y  haré  que  sus  príncipes  y  sus  gober-

nantes, sus sabios, sus magistrados y sus 

poderosos  se  embriaguen  y  duerman  un 

sueño eterno, del cual no despertarán, dice 

el Rey, cuyo nombre es YHVH Sebaot.

58

 Así dice YHVH Sebaot:

Los anchos muros de Babilonia 

serán totalmente derribados,

Y sus altos portones serán quemados 

a fuego.

En vano trabajaron los pueblos;

Las naciones se esforzaron sólo para 

el fuego.

59

 Palabra  del  profeta  Jeremías  que  en-

vió a Seraías ben Nerías, hijo de Maasías, 

cuando iba con Sedequías rey de Judá a 

Babilonia, en el cuarto año de su reino, y 

Seraías dirigía la marcha.

60

 Jeremías  pues,  escribió  en  un  rollo 

todo el mal que había de venir sobre Ba-

bilonia, todas las palabras citadas acerca 

de Babilonia.

61

 Y dijo Jeremías a Seraías: Cuando lle-

gues a Babilonia, y veas y leas todas estas 

cosas,

62

 dirás:  ¡Oh  YHVH!  Tú  has  hablado 

contra  este  lugar  para  destruirlo,  hasta 

no  quedar  en  él  morador,  ni  hombre  ni 

bestia, sino que sea una desolación para 

siempre.

63

 Y cuando acabes de leer este rollo, le 

atarás una piedra, y lo arrojarás en medio 

del Éufrates,

64

 diciendo:  ¡Así  se  hundirá  Babilonia  y 

no se levantará, por las desgracias que Yo 

envío contra ella para que sean abatidos! 

Aquí terminan las palabras de Jeremías.

Caída de Jerusalem

52

Era Sedequías de veintiún años de 

edad  cuando  comenzó  a  reinar,  y 

reinó once años en Jerusalem. Su madre 

se llamaba Hamutal, hija de Jeremías, de 

Libna.

51.45 

→Ap.18.4. 


background image

Jeremías 52:25

829

2

 E hizo lo malo ante los ojos de YHVH, 

conforme  a  todo  lo  que  había  hecho 

Joacim,

3

 porque a causa de la ira de YHVH suce-

dió eso en Jerusalem y Judá, hasta que los 

echó de su presencia. Pero Sedequías se 

rebeló contra el rey de Babilonia,

4

 y  en  el  noveno  año  de  su  reinado,  en 

el  mes  décimo,  a  los  diez  días  del  mes, 

Nabucodonosor  rey  de  Babilonia,  vino 

con todo su ejército contra Jerusalem, y 

acampó contra ella y levantaron torres de 

asedio en derredor.

5

 La  ciudad  estuvo  sitiada  hasta  el  año 

undécimo del rey Sedequías.

6

 En el mes cuarto, a los nueve días del 

mes,  el  hambre  era  aguda  en  la  ciudad, 

hasta no haber pan para la población.

7

 Entonces,  mientras  los  caldeos  rodea-

ban la ciudad, se abrió brecha en la ciu-

dad, y los soldados huyeron de noche por 

la puerta entre las dos murallas, junto a 

los jardines reales, y partieron rumbo al 

Arabá.

8

 Pero el ejército caldeo persiguió al rey, 

y alcanzaron a Sedequías en los llanos de 

Jericó, mientras todo su ejército, disperso 

ya, lo abandonaba.

9

 Prendieron pues al rey, y se lo llevaron 

al rey de Babilonia, que estaba en Ribla, 

en  tierra  de  Hamat,  donde  pronunció 

sentencia contra él.

10

 El rey de Babilonia degolló a los hijos 

de Sedequías ante sus propios ojos, y tam-

bién en Ribla degolló a todos los príncipes 

de Judá.

11

 El rey de Babilonia le arrancó los ojos 

a Sedequías, y lo engrilló, y lo hizo llevar 

a Babilonia, y lo metió en la cárcel hasta 

el día en que murió.

La cautividad

12

 Y en el mes quinto, a los diez días del 

mes  (año  decimonoveno  del  reinado  de 

Nabucodonosor,  rey  de  Babilonia),  llegó 

a  Jerusalem  Nabuzaradán,  capitán  de  la 

guardia, que servía en la presencia del rey 

de Babilonia.

13

 Y  quemó  la  Casa  de  YHVH,  y  la  casa 

real, y todas las casas de Jerusalem. Y des-

truyó con fuego todo edificio grande.

14

 Y el ejército caldeo, a las órdenes del 

capitán de la guardia, destruyó todos los 

muros en derredor de Jerusalem.

15

 Y Nabuzaradán, capitán de la guardia, 

se llevó en cautividad una parte de la gen-

te humilde del pueblo y el remanente de 

la población que había quedado en la ciu-

dad, junto con los desertores que se ha-

bían pasado al rey de Babilonia y el resto 

de los artesanos.

16

 Pero a otra parte de entre los más po-

bres  del  pueblo,  los  dejó  Nabuzaradán, 

capitán  de  la  guardia,  como  viñadores  y 

labradores asalariados.

17

 Y los caldeos rompieron en pedazos 

las columnas de bronce que estaban en 

la Casa de YHVH, y las basas, y el mar de 

bronce que estaba en la Casa de YHVH, 

y  se  llevaron  todo  el  bronce  a  Babilo-

nia.

18

 Se  llevaron  también  los  calderos,  las 

palas, las despabiladeras, los tazones, las 

cucharas, y todos los utensilios de bronce 

con que se ministraba.

19

 El capitán de la guardia tomó también 

los incensarios, los tazones, las copas, las 

ollas,  los  candeleros,  las  escudillas  y  las 

tazas: lo que era de oro en oro, y lo que 

era de plata en plata.

20

 En cuanto a las dos columnas, el mar 

único  y  los  doce  bueyes  de  bronce  que 

sostenían  el  pedestal,  que  el  rey  Salo-

món había hecho para la Casa de YHVH, 

el  peso  del  bronce  de  todo  esto  era  in-

calculable.

21

 En  cuanto  a  las  columnas,  la  altura 

de  cada  una  era  de  dieciocho  codos,  su 

circunferencia  medía  un  cordel  de  doce 

codos  y  su  espesor  era  de  cuatro  dedos, 

pues eran huecas.

22

 Sobre cada columna coronábala un ca-

pitel de bronce, y la altura del capitel era 

de cinco codos, con una obra de malla y 

granadas en su derredor, todo de bronce. 

De  iguales  dimensiones  era  la  segunda 

columna, con sus granadas.

23

 Había noventa y seis granadas en cada 

hilera. Todas ellas eran cien sobre la ma-

lla alrededor del capitel.

24

 El  capitán  de  la  guardia  capturó  des-

pués  a  Seraías,  el  sumo  sacerdote,  y  a 

Sofonías, el segundo sacerdote, junto con 

los tres guardianes del atrio.

25

 Y de los de la ciudad tomó a cierto eu-

nuco que estaba a cargo de los hombres 

de guerra, y a siete hombres del servicio 

personal del rey, que fueron hallados en 


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Jeremías 52:26

830

la ciudad, y al escriba principal de la mi-

licia, que hacía la recluta de la gente del 

país, y a sesenta hombres del pueblo que 

se hallaron dentro de la ciudad.

26

 Los  capturó  pues  Nabuzaradán,  capi-

tán de la guardia, y los llevó ante el rey de 

Babilonia en Ribla.

27

 Y  el  rey  de  Babilonia  los  hirió  y  los 

mató  en  Ribla,  en  tierra  de  Hamat.  Así 

Judá  fue  llevado  en  cautividad,  fuera  de 

su tierra.

28

 Éste es el pueblo que Nabucodonosor 

llevó  cautivo:  En  el  año  séptimo,  a  tres 

mil veintitrés hombres de Judá,

29

 en  el  año  decimoctavo  de  Nabucodo-

nosor, ochocientas treinta y dos personas 

de Jerusalem;

30

 el año vigésimo tercero de Nabucodo-

nosor,  Nabuzaradán,  capitán  de  la  guar-

dia, llevó cautivas a setecientas cuarenta 

y cinco personas de los hombres de Judá. 

Todas las personas en total fueron cuatro 

mil seiscientas.

Libertad de Joaquín

31

 En el año trigésimo séptimo del cau-

tiverio de Joaquín, rey de Judá, en el mes 

duodécimo,  a  veinticinco  días  del  mes, 

sucedió  que  Evil-merodac,  rey  de  Babi-

lonia,  en  el  año  primero  de  su  reinado, 

indultó a Joaquín, rey de Judá, y lo sacó 

de la cárcel.

32

 Y le habló amigablemente, e hizo po-

ner su sitial por encima del de los otros 

reyes que estaban con él en Babilonia.

33

 Le hizo mudar también los vestidos de 

prisionero,  y  comió  siempre  en  la  mesa 

del rey todos los días de su vida.

34

 Y continuamente se le daba una ración 

de  parte  del  rey  de  Babilonia,  cada  día, 

durante todos los días de su vida, hasta el 

día de su muerte.


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Tristezas de Sión

a

1

  ¡Cómo ha quedado solitaria la ciudad 

   populosa!

¡Cómo se convirtió en viuda la 

grande de las naciones!

¡La princesa de provincias se ha 

tornado tributaria!

b

2

    Amargamente llora en la noche y 

sus lágrimas cubren sus mejillas;

No tiene a nadie que la consuele 

entre todos sus amantes,

Todos sus amigos le fueron infieles y 

ahora son sus adversarios.

g

3

    Judá ha marchado al cautiverio° con 

gran aflicción y dura servidumbre,

Entre los gentiles habita sin hallar 

reposo;

Entre las angustias sus perseguidores 

le han dado alcance.

d

4

    Las calzadas de Sión están de luto, 

nadie asiste a las solemnidades,

Todas sus puertas están desoladas, 

sus sacerdotes gimen,

Sus doncellas están afligidas, y ella 

misma está sumida en amargura.

h

5

    Sus adversarios han llegado a serle 

cabeza° y sus enemigos están 

felices,

Porque YHVH la ha afligido por la 

multitud de sus pecados.

Sus niños marcharon cautivos 

delante del opresor.

w

6

    Todo el esplendor de la hija de Sión 

se ha desvanecido.

Sus príncipes han llegado a ser 

como ciervos que no hallan 

pasto,

Ya sin fuerzas han marchado° 

delante del opresor.

z

7

    En los días de su aflicción y angustia 

Jerusalem se acuerda de todos los 

tesoros que tenía desde tiempos 

antiguos,

Hoy que su pueblo cae por mano del 

adversario, nadie la ayuda.

Los enemigos la ven y se burlan de 

su final.°

j

8

    Jerusalem ha pecado gravemente;° 

se ha tornado inmunda.

Al ver su desnudez, quienes la 

honraban la desprecian,

Y ella misma se avergüenza y vuelve 

sus espaldas.°

f

9

    Su inmundicia está en sus faldas, no 

ha tenido en cuenta° su final,

Fue humillada hasta el asombro, no 

tiene consolador.

1.3 Prob. se refiere a Egipto 

→Jer.42.9-18.  1.5 Es decir, amos.  1.6 Lit. caminaron.  1.7 final. Lit. cesación.  1.8 Gravemente 

pecó. Lit. Pecando pecó

1.8 se vuelve de espaldas. Como hace toda mujer avergonzada.  1.9 no tuvo en cuenta. Lit. no se 

acordó de


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Lamentaciones 1:10

832

¡Mira, oh YHVH, mi aflicción, porque 

el enemigo se ha engrandecido!

y

10

    El adversario ha echado mano a 

todos sus tesoros,

Ella ha visto cómo los gentiles 

entraban en el Santuario,

Aunque Tú diste orden que no 

entraran en tu congregación.

k

11

    Todo su pueblo entre gemidos, anda 

pidiendo pan,

Cambian sus tesoros por comida, 

para recobrar la fuerza.°

¡Mira, oh YHVH, y contempla cómo 

estoy envilecida!

l

12

    Vosotros, que pasáis de largo, 

¿no os importa esto?

Contemplad y ved si hay dolor como 

el mío,

Como el que me ha sobrevenido,

Con el que YHVH me ha afligido en 

el día de su ira.°

m

13

    De los cielos lanzó un fuego que ha 

penetrado en mis huesos.°

Una red tendió a mis pies, me hizo 

caer hacia atrás,

Me ha dejado desolada, 

apesadumbrada cada día.

n

14

    El yugo está atado con mis 

transgresiones que, entrelazadas 

por su mano, gravitan sobre mi 

cerviz y hacen tambalear mi fuerza:

Adonay me ha entregado a una 

mano contra la cual° no puedo 

levantarme.

s

15

    Adonay desechó dentro de mí a 

todos mis hombres fuertes;

Convocó una asamblea solemne 

contra mí y quebrantó a mis 

jóvenes:

¡Adonay ha hollado en el lagar a la 

virgen hija de Judá!

[

16

    Por estas cosas yo lloro, y mis ojos 

se deshacen en aguas,

Porque está lejos de mí el 

Consolador, el que consuela mi 

alma;

Mis hijos están desconsolados 

porque el enemigo ha 

prevalecido.

p

17

    Sión extiende sus manos pero no 

hay quien la consuele.

YHVH ha dispuesto contra Jacob, 

que sus vecinos sean sus 

adversarios;

Jerusalem se ha convertido entre 

ellos en algo inmundo.

x

18

    Justo es YHVH, porque yo me rebelé 

contra su Palabra.°

Oíd ahora, pueblos todos, 

contemplad mi dolor:

Mis doncellas y mis jóvenes han 

marchado en cautiverio.

q

19

    He llamado a mis amantes, pero 

ellos me defraudaron.

Mis sacerdotes y mis ancianos 

perecieron en la ciudad,

Mientras buscaban alimento para 

sus almas hambrientas.

r

20

    Mira, oh YHVH, que estoy 

angustiado, mis entrañas se 

conmueven,

Mi corazón se revuelve dentro de mí,

Pues he sido rebelde en gran 

manera.°

1.11 Lit. el alma.  1.12 de su ira. Lit. de su nariz.  1.13 que penetró en mis huesos. Eso dice el texto en la versión LXX, aunque 

penetró se suple. El texto masorético actual dice y la dominó (a la ciudad). Si las dos primeras líneas del v. se entienden en 

sentido estrictamente literal, significaría (así lo entiende el Midrash) que Dios mismo le había prendido fuego al templo, a fin 

de que los gentiles no se jactaran de haberlo destruido. 

1.14 .contra la cual.  1.18 palabra. Lit. boca.  1.20 Lit. rebelándome 

me rebelé


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Lamentaciones 2:10

833

Por fuera la espada privó de hijos, por 

dentro se enseñoreó la muerte.

v

21

    Oyeron que yo° gemía y no hay 

quien me consuele.

Todos mis enemigos han oído mi 

mal, se regocijan que Tú° lo 

hiciste.

¡Haz que venga el día anunciado y 

sean ellos como yo!

t

22

    Lleguen a tu presencia sus 

maldades

Y trátalos a ellos como me 

trataste a mí por todas mis 

transgresiones,

Se multiplican mis lamentos y mi 

corazón desfallece.

Jucio de Dios sobre Sión

a

2

  ¡Cómo nubló Adonay en su ira a la 

   capital de Sión!

¡Cómo arrojó del cielo a la tierra el 

esplendor de Israel!

El día de su ira no se acordó del 

estrado de sus pies.

b

2

    Adonay destruyó sin compasión 

todas las moradas de Jacob.

Derribó en su indignación las 

fortalezas de la hija de Judá,

Al rey y a sus príncipes echó por 

tierra deshonrados.

g

3

    En el ardor de su ira cortó todo el 

poderío° de Israel,

Al llegar el enemigo retiró su 

diestra,

Encendió en Jacob un llameante 

fuego,

Que ha devorado todo en 

derredor.

d

4

    Entesó el arco como un enemigo, 

aplicó su diestra,

Y enemistado, ha destruido a todos 

los jóvenes en flor;

En las tiendas de Sión ha 

derramado su indignación como 

un fuego.

h

5

    Adonay llegó a ser como enemigo: 

Se ha tragado a Israel.

Devoró su ciudadela, destruyó su 

plaza fuerte,

Y ha multiplicado el lamento y el 

luto en la hija de Judá.

w

6

    Como un huerto, violentó su 

Tabernáculo: destruyó su lugar de 

reunión.

YHVH ha hecho olvidar en Sión las 

fiestas solemnes y el shabbat,

Y en el ardor de su ira rechazó al rey 

y al sacerdote.

z

7

    Adonay ha repudiado su altar, ha 

abandonado su Santuario:

Entregó los muros de la ciudadela 

en manos del enemigo,

Que como en día de fiesta solemne 

grita en la Casa de YHVH.

j

8

    YHVH se propuso destruir los muros 

de la capital de Sión:

Ha extendido su cordel, su mano no 

se retrajo de destruir;

Puso en duelo el muro y antemuro y 

a una desfallecieron.

f

9

    Ha hundido en el fango sus portales, 

ha roto y quebrado sus cerrojos.

Su rey y sus príncipes están 

esparcidos entre los gentiles, no 

existe ley°

Y sus profetas no hallan más visión 

de parte de YHVH.

y

10

    Sentados en tierra, guardan silencio 

los ancianos de Sión,

1.21 yo está enfatizado en el original.  1.21  es enfático.  2.3 Lit. el cuerno.  2.9 heb. toráh = ley, como enseñanza


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Lamentaciones 2:11

834

Ceñidos de cilicio, echan polvo sobre 

sus cabezas.

Humillan hasta el suelo su cabeza 

las doncellas de Jerusalem.

k

11

    Mis ojos se consumen en lágrimas, 

mis entrañas de amargura,

Y mi hiel se derrama por tierra 

por la ruina de la capital de mi 

pueblo:

Muchachos y niños de pecho 

desfallecen en las calles de la 

ciudad.

l

12

    Preguntan a sus madres: ¿Dónde 

hay pan° y vino?

Mientras yacen como heridos en las 

calles de la ciudad,

Mientras exhalan el alma en el 

regazo materno.

m

13

    ¿Quién se te iguala, quién se 

te asemeja, oh ciudad de 

Jerusalem?

¿A quién te compararé para 

consolarte, oh virgen hija de 

Sión?

Tu quebranto es inmenso como el 

mar, ¿quién te podrá sanar?

n

14

    Tus videntes te ofrecieron visiones 

falsas y engañosas,

No descubrieron tu iniquidad para 

impedir° tu cautiverio,

Antes, te anunciaron oráculos° 

vanos y seductores.

s

15

    Todos los que van por el camino 

baten palmas contra ti,

Silban burlones, y menean la cabeza 

contra la hija de Jerusalem:

¿Es ésta la ciudad perfecta en 

hermosura, la alegría de toda la 

tierra?

[

16

    Todos tus enemigos han abierto la 

boca contra ti:

Silbaron y rechinaron los dientes 

diciendo: ¡La hemos arrasado!

¡Éste es el día que esperábamos!

¡Lo hemos conseguido y lo estamos 

viendo!

p

17

    °YHVH ha realizado su propósito,

Ha cumplido su palabra ordenada 

desde antiguo:°

Derribó sin compasión,

Exaltó el cuerno° de tu adversario, 

y a costa tuya alegró 

al enemigo.

x

18

    Su corazón clama a Adonay: ¡Oh 

muralla de la hija de Sión!

Deja que tus lágrimas corran como 

un río día y noche;

No te des reposo, no descansen las 

niñas de tus ojos.

q

19

    Levántate, da gritos en la noche 

cuando empiezan las vigilias.

Derrama como agua tu corazón en 

presencia de Adonay

Alza hacia Él tus manos° por la vida 

de tus pequeños,

Desfallecidos de hambre en las 

esquinas° de todas las calles.

r

20

    ¡Oh YHVH!, considera y ve a quién 

has tratado así:

¿Cuándo las mujeres se han comido 

a sus hijos, a sus niños mecidos 

aun en brazos?

¿Cuándo se han asesinado 

sacerdotes y profetas dentro del 

Santuario de Adonay?

v

21

    Muchachos y ancianos yacen en el 

suelo por las calles,

2.12 Lit. trigo.  2.14 impedir. Lit. hacer volver.  2.14 oráculos. Lit. cargas.  2.17 En los vv. 16-17 las letras del alfabeto están 

invertidas, colocando la letra Pe delante del Ayin

2.17 tiempos. Lit. días.  2.17 Esto es, el poderío.  2.19 tus manos. Lit. tus 

palmas (de las manos). 

2.19 las entradas. Lit. la cabeza


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Lamentaciones 3:20

835

Mis jóvenes y mis doncellas han 

caído pasados a cuchillo,

Hiciste que murieran en el día de 

tu ira,

Hiciste matanza sin contemplación.

t

22

    Como en día de asamblea solemne, 

convocaste a mis terrores en 

derredor,

Y en el día de la ira de YHVH 

no hubo quien escapara o 

sobreviviera.

A los que con desvelo cuidó 

y crió, los ha exterminado 

mi enemigo.

Lamento del afligido

a

3

  ¡Yo soy el hombre!, él° ha visto 

   aflicción bajo la vara de su ira.

a

2

    Me ha guiado y conducido en 

tinieblas y no en luz;

a

3

    Sólo contra mí, vez tras vez, vuelve 

su mano todo el día.

b

4

    Consumió mi carne y mi piel, ha 

quebrantado mis huesos;

b

5

    Levantó contra mí un cerco de 

congojas y amarguras;°

b

6

    Me confinó en tinieblas, como los 

muertos de hace largo tiempo.

g

7

    Me ha cercado sin salida, me ha 

cargado de cadenas;°

g

8

    Y si clamo y pido auxilio, cierra el 

paso a mi oración;

g

9

    Con piedras de cantera bloqueó mi 

camino y torció mis sendas.

d

10

   Él° es para mí como oso al acecho, 

como león agazapado.

d

11

   Trastorna mis caminos, me destroza 

y me deja desolado.

d

12

   Ha entesado su arco, y me ha puesto 

por blanco de sus saetas.

h

13

   Ha clavado en mis riñones° los 

astiles° de su aljaba.

h

14

   He venido a ser el escarnio de los 

pueblos,

El objeto de su burla día tras día.

h

15

    Me hartó de amargura, me saturó de 

ajenjo.

w

16

   Quebrantó mis dientes con 

cascajo y me hace revolcar 

en la ceniza;

w

17

   Mi alma está lejos de la paz, he 

olvidado la felicidad,°

w

18

   Y dije: ¡Pereció mi esplendor y mi 

confianza en YHVH!

z

19

   ¡Acuérdate de mi aflicción y mi 

miseria, del ajenjo y de la hiel!

z

20

   Lo tendré siempre en memoria, y tu 

alma guardará luto por mí.°

3.1 El súbito cambio (1ª a 3ª Pers.) muestra al profeta hablando en representación de su pueblo.  3.5 Lit. hiel. Lo mismo en 

el v. 19. 

3.7 mi cadena. Lit. mi bronce.  3.10 Él está enfático en el original.  3.13 Esto es, la parte más profunda de su ser

3.13 Es decir, las flechas.  3.17 Lit. el bien.  3.20 18ª enmienda de los Soferim 

→ § 6; § 24. 


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Lamentaciones 3:21

836

z

21

   Esto recapacito en mi corazón, que 

me da nueva esperanza:

j

22

   La misericordia de YHVH nunca 

termina,

Sus compasiones nunca se acaban,

j

23

    Nuevas son cada mañana.

¡Cuán grande es tu fidelidad!

j

24

    ¡YHVH es mi porción!, dice mi alma, 

por tanto esperaré en Él.

f

25

   Bueno es YHVH a los que lo esperan, 

al alma que lo busca.

f

26

   Bueno es esperar, y aguardar en 

silencio la salvación de YHVH.

f

27

   Bueno le es llevar al hombre el yugo 

desde su juventud.

y

28

   Que se siente a solas y guarde silencio 

porque Él se lo ha impuesto.

y

29

   Que ponga° su boca en el polvo por 

si quizás haya esperanza.

y

30

   Que dé la mejilla al que lo hiere y 

que se harte de afrentas.

k

31

   Porque Adonay no desechará para 

siempre.

k

32

   Aunque contriste, Él tendrá 

misericordia conforme a la 

multitud de sus piedades.

k

33

   Porque no se complace° castigando 

ni afligiendo a los hijos del 

hombre.

l

34

   Aplastar bajo los pies a todos los 

cautivos de la tierra,

l

35

   Privar del derecho al hombre en 

presencia de ‘Elyón,

l

36

   Pervertir la causa del varón:° ¿No lo 

ve Adonay?

m

37

   ¿Quién dijo algo y ocurrió, sin que 

Adonay lo dispusiera?

m

38

   ¿No procede de la boca de ‘Elyón 

tanto las desgracias como lo 

bueno?

m

39

   ¿Por qué se queja el viviente?°

¡Sufra el valiente si cometió pecado!

n

40

   ¡Examinemos y escudriñemos 

nuestros caminos, y volvamos a 

YHVH!

n

41

   Alcemos nuestro corazón hacia 

nuestras manos°

Y nuestras manos° hacia Dios en los 

cielos, diciendo:°

n

42

    Nosotros° hemos transgredido y 

hemos sido rebeldes,

Pero Tú° no has perdonado.

s

43

    Te cubriste con ira, nos perseguiste 

e hiciste morir sin compasión.

3.29 Lit. .  3.33 Lit. de su corazón.  3.36 Lit. hacer torcer a un hombre en su causa.  3.39 Lit. un hombre vivo. Como diciendo: 

Bastante motivo tiene para dar gracias de que está vivo

3.41 La metáfora presenta el corazón alzado en las manos, para que 

con esas mismas manos sea elevado a Dios. El Talmud tiene una frase que dice: La oración de un hombre no es oída, a menos 

que  ponga  el  alma  en  sus  manos

3.41  .y  nuestras  manos.  3.41  .diciendo.  3.42  Nosotros  está  enfático  en  el  original. 

3.42  está también enfático en el original, con lo que se aprecia mejor el contraste.


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Lamentaciones 4:1

837

s

44

   Te cubriste con nubes para que no 

llegara a ti la oración.

s

45

   Nos has puesto como heces y basura 

en medio de las naciones.

p

46

   Todos nuestros enemigos ensanchan 

su boca contra nosotros.°

p

47

   El espanto y la fosa están encima de 

nosotros,

La desolación y el quebranto.

p

48

    Mis ojos derraman ríos de agua por 

la transgresión de la hija de mi 

pueblo.

[

49

   Mis ojos manan sin cesar, sin tregua 

alguna,

[

50

   Hasta que YHVH mire y vea desde 

los cielos.

[

51

   Mis ojos conmueven mi alma, por 

todas las hijas de mi ciudad.

x

52

   Como a un pájaro me han dado 

caza, los que sin causa son mis 

enemigos.

x

53

   Silenciaron mi vida en la cisterna, y 

echaron la piedra sobre mí.

x

54

   Las aguas cubrieron mi cabeza, y 

dije: ¡Muerto soy!°

q

55

   De lo profundo del sepulcro, oh 

YHVH, invoqué tu Nombre,

q

56

   Y oíste mi voz: ¡No cierres tu oído al 

clamor de mis suspiros!

q

57

    El día que te invoqué, te acercaste y 

dijiste: ¡No temas!

r

58

    Defendiste, Adonay, la causa de mi 

alma, y redimiste mi vida.

r

59

    Tú has visto mi opresión:° ¡Oh 

YHVH, hazme justicia!

r

60

    Tú has visto toda su venganza, todos 

sus planes contra mí.

v

61

    Tú has oído, oh YHVH, todas sus 

afrentas, todos sus planes contra mí,

v

62

    Los labios de mis agresores y sus 

murmuraciones están contra mí 

todo el día.

v

63

    Observa su sentarse y levantarse: 

Soy objeto de su burla.

t

64

    Pero Tú, oh YHVH, les darás su 

recompensa conforme a la obra 

de sus manos.

t

65

    Les darás dureza de corazón, tu 

maldición para ellos.

t

66

    ¡Oh YHVH, persíguelos en tu ira, y 

destrúyelos debajo de tus cielos!

Sufrimientos a causa del sitio

a

4

 ¡Cómo se ha ennegrecido el oro! 

   ¡Cómo° se ha alterado el oro fino!

3.46 Igual que en el cap. 2, el autor sagrado cambió el orden del alfabeto, poniendo el Pe delante del Ayin.  3.54 Lit. ¡Quitado 

soy! 

3.59 Lit. mi maldad. Es decir, la maldad que se comete contra mí.  4.1 .Cómo


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Lamentaciones 4:2

838

¡Por todas las encrucijadas están 

tiradas las piedras del Santuario!

b

2

    Los preciados hijos de Sión, una vez 

comparables al oro fino,

Son menospreciados como tiestos de 

barro, obra de alfarero.

g

3

    Hasta los chacales ofrecen la teta 

para amamantar sus crías,

Pero la hija de mi pueblo se ha 

vuelto cruel como el avestruz° 

del desierto.

d

4

    De pura sed, la lengua del lactante 

se pegó a su paladar,

Los niños piden pan, y no hay quien 

lo reparta.

h

5

    Los que comían manjares delicados 

vagan desolados por la calle;

Los que fueron criados en púrpura, 

abrazan estercoleros.

w

6

    La maldad de la hija de mi pueblo° es 

mayor que el pecado de Sodoma,

Arrasada en un instante sin acción 

de mano humana.

z

7

    Sus nazareos eran más puros que la 

nieve, más blancos que la leche,

Sonrosados de cuerpo° cual corales, 

su aspecto° como el del zafiro;

j

8

    Hoy sus rostros son más negros que 

el hollín,

Y en las calles no se los reconoce;

Su piel se ha pegado a sus huesos, 

está seca como un leño.

f

9

    Más dichosas fueron las víctimas de la 

espada que las víctimas del hambre;

Éstas se consumen lentamente, por 

falta de los frutos del campo.

y

10

    Manos de mujeres compasivas 

cocinaron a sus propios hijos:

Les sirvieron de comida en la 

gran calamidad de la hija de mi 

pueblo.

k

11

    YHVH agotó su indignación, ha 

derramado el ardor de su ira,

Y encendido un fuego en Sión, que 

devora sus cimientos.

l

12

    No creían los reyes de la tierra ni los 

habitantes del mundo,

Que adversarios y enemigos 

entrarían por las puertas de 

Jerusalem.

m

13

    Es por los pecados de sus profetas,

Por las iniquidades de sus 

sacerdotes,

Los cuales derramaban en medio de 

ella la sangre de los justos.

n

14

    Deambulan como ciegos por las 

calles, contaminados 

con sangre,

De modo que nadie puede tocar sus 

vestidos.

s

15

    ¡Apartaos, soy inmundo!, gritaban.

¡Apartaos, no me toquéis!

Así huyeron y fueron dispersados,

Pero aun entre los gentiles se dijo:

¡No moren más aquí!

[

16

    El rostro de YHVH los ha dispersado, 

ya no se ocupa de ellos:

No hay respeto para el sacerdote,° 

no hay compasión para los 

ancianos.

4.3 

→Job 39.13-16.  4.6 la hija de mi pueblo. Esto es, Jerusalem.  4.7 Lit. de hueso.  4.7 Heb. guizrat = su forma, o corte

Significado incierto. 

4.16 Lit. No alzaron los rostros de los sacerdotes


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Lamentaciones 5:15

839

p

17

    °Nuestros ojos están desfallecidos 

por buscar socorro vano.°

En nuestro velar velamos por un 

pueblo que no pudo salvarnos.

x

18

    Acechan nuestros pasos para que no 

entremos en nuestras plazas.

Nuestro fin está cercano, nuestros 

días están cumplidos,

Ha llegado nuestro fin.

q

19

    Nuestros perseguidores han sido 

más raudos que las águilas del 

cielo;

Nos dieron caza sobre los montes;

Nos tendieron emboscadas en el 

desierto.

r

20

    El aliento de nuestra vida,° el 

ungido de YHVH, fue atrapado en 

sus fosos,

De quien habíamos dicho: A su 

sombra viviremos entre los 

gentiles.

v

21

    ¡Alégrate y regocíjate, oh hija de 

Edom, tú que habitas en tierra 

de Uz!

También a ti te llegará el cáliz,

También serás embriagada,

También te exhibirás desnuda.

t

22

    ¡Oh hija de Sión, el castigo de tu 

maldad se ha cumplido!

No serás llevada más en cautiverio.

Pero, oh hija de Edom, se visita ya 

tu iniquidad,

Se pone en descubierto tu pecado.

Plegaria de Jeremías por el pueblo

5

  ¡Acuérdate, oh YHVH, de lo que nos 

   ha sobrevenido,

Y mira, contempla nuestro oprobio!

2

    La heredad nuestra ha pasado a 

nuestros enemigos,

Y nuestras casas a los de tierra 

extraña;

3

    Hemos venido a ser huérfanos, 

somos sin padre,

Y nuestras madres son como viudas.

4

    Nuestra agua la bebemos por dinero,

Conseguimos nuestra leña por 

precio;

5

    Somos empujados con un yugo 

sobre nuestra cerviz,

Estamos cansados, pero para 

nosotros no hay descanso.

6

    Hemos tenido que pactar° con 

egipcios y con asirios,

Para saciarnos de pan.

7

    Nuestros padres pecaron, ellos no 

existen,

Pero nosotros tenemos que cargar 

con sus iniquidades;

8

    Unos esclavos nos señorean,

Y no hay quien pueda librarnos de 

su mano;

9

    Arriesgamos nuestras vidas° por el 

pan,

Ante la espada que amenaza al 

descampado.°

10

    Nuestra piel arde como un horno, a 

causa de los ardores del hambre.

11

    Han violado a las mujeres en Sión,

Y a las doncellas en los pueblos de 

Judá.

12

    Los príncipes han sido colgados de 

las manos,°

Y los ancianos no fueron respetados.

13

    Los muchachos cargan la piedra del 

molino,

Y los niños se tambalean bajo el peso 

de la leña.°

14

    Los ancianos ya no se sientan a la 

puerta,°

Los jóvenes no cantan,

15

    Ha cesado la alegría de nuestro 

corazón,

Nuestra danza se ha convertido en 

duelo,

4.17 De nuevo aquí el autor sagrado altera el orden colocando el Pe delante del Ayin.  4.17 Lit. por nuestra ayuda de vanidad.  

4.20 Lit. de nuestras narices.  5.6 Lit. Hemos dado la mano.  5.9 nuestras vidas. Lit. de nuestras almas.  5.9 Es decir, los peligros 

de salteadores del desierto

5.12 Esto es, en el madero.  5.13 Lit. bajo la leña.  5.14 Esto es, lugar donde se efectuaban los 

juicios


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Lamentaciones 5:16

840

16

    Y la corona ha caído de nuestra 

cabeza.

¡Ay de nosotros, por haber pecado!

17

    Por eso nuestro corazón está enfermo,

Por eso se nublan nuestros ojos,

18

    Porque el monte de Sión está 

desolado,

Y las zorras se pasean por él.

19

    Sin embargo Tú, oh YHVH, eres Rey 

para siempre;

Tu trono permanece de generación 

en generación.

20

    ¿Te olvidarás para siempre de 

nosotros?

¿Nos abandonarás por tanto 

tiempo?°

21

    Oh YHVH, haz que volvamos a ti, y 

volveremos;

Renueva nuestros días, para 

que sean como en tiempos 

antiguos,

22

    O, ¿nos has desechado del todo° y 

estarás siempre airado contra 

nosotros?°

5.20 Lit. por largura de días.  5.22 Lit. desechándonos nos hayas desechado.  5.22 Por cuanto el libro concluye con una frase ne-

gativa, los escribas judíos repiten en caracteres más pequeños el v. 21 (así también al final de Isaías, Malaquías y Eclesiastés). 


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1

El año treinta,° el cuarto mes, a cinco 

días  del  mes,  aconteció  que  estando 

yo en medio de los cautivos, junto al río 

Quebar, los cielos fueron abiertos y vi vi-

siones de Dios.

2

 A los cinco días del mes, el año quinto 

de la deportación del rey Joaquín,

3

 el sacerdote Ezequiel ben Buzi tuvo re-

velación expresa de YHVH en la tierra de 

los caldeos, junto al río Quebar. Allí estu-

vo sobre mí la mano de YHVH,

4

 y miré, y he aquí un torbellino venía del 

norte: una gran nube con un fuego que se 

recogía dentro de sí mismo y un resplan-

dor en torno a ella. En su centro, en me-

dio del fuego, había una refulgencia como 

de metal incandescente.

5

 De su centro emergía una semejanza de 

cuatro seres vivientes, y su apariencia era 

como la semejanza de hombres.

6

 Cada uno tenía cuatro caras, y cada uno 

de ellos tenía cuatro alas.

7

 Sus piernas eran rectas, y sus pies como 

pezuñas  de  novillo,  y  centelleaban  a  la 

manera  de  la  refulgencia  del  bronce  in-

candescente.

8

 Por  debajo  de  sus  alas  tenían  brazos 

humanos a los cuatro lados, y los cuatro 

tenían sus caras y sus alas.

9

 Las alas se tocaban la una con la otra. 

No  se  volvían  al  caminar,  sino  que  cada 

uno caminaba según la orientación de su 

rostro.

10

 El  aspecto  de  sus  rostros  era  como 

rostro de hombre, pero los cuatro tenían 

también°  cara  de  león,  a  la  derecha;  los 

cuatro tenían cara de buey, a la izquierda; 

y los cuatro tenían también cara de águi-

la. Así eran sus caras.

11

 Sus  alas  estaban  desplegadas  hacia 

arriba. Cada uno tenía dos alas que se to-

caban° y otras dos que cubrían sus cuer-

pos.

12

 Cada uno caminaba según la orienta-

ción  de  su  rostro.  Iban  adondequiera  el 

espíritu los movía, y al caminar no se vol-

vían.

13

 En cuanto a la semejanza de los seres 

vivientes, su apariencia era de ascuas de 

fuego,  encendidas  como  antorchas,  que 

andaban de un lado a otro entre los seres 

vivientes, y había un gran resplandor por 

el fuego, del cual salían relámpagos.

14

 Y los seres vivientes corrían y volvían° 

como si fueran destellos de relámpagos.

15

 Mientras  contemplaba  a  los  seres  vi-

vientes, vi una rueda en el suelo junto y 

al frente de cada uno de los cuatro seres 

vivientes.

16

 El  aspecto  de  las  ruedas  era  como  el 

brillo  del  crisólito;  las  cuatro  tenían  la 

misma apariencia, y su hechura era como 

si una rueda estuviera encajada en medio 

de la otra,

17

 para  poder  rodar  en  las  cuatro  direc-

ciones  sin  tener  que  girar  cuando  roda-

ban.

18

 Sus  circunferencias  eran  de  gran  al-

tura,  e  infundían  pavor,  pues  las  cuatro 

tenían sus circunferencias llenas de ojos 

alrededor.

19

 Cuando  los  seres  vivientes  andaban, 

las ruedas andaban con ellos; cuando los 

La visión de la gloria

1.1 Esto es (prob.), de la vida del profeta 

→Nm.4.2-3,30.  1.10 .también.  1.11 Esto es, se tocaban las del uno con el otro

1.14 Lit. correr y volver


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Ezequiel 1:20

842

seres vivientes se alzaban sobre la tierra, 

las ruedas se alzaban.

20

 Iban adondequiera el espíritu los mo-

vía, y hacia donde los llevaba el espíritu, 

las ruedas se alzaban junto con ellos, por-

que las ruedas llevaban el espíritu de los 

seres vivientes.

21

 Cuando ellos andaban, andaban ellas, y 

cuando ellos se detenían, se detenían ellas; y 

cuando se alzaban de la tierra, las ruedas se 

alzaban junto con ellos, porque las ruedas 

llevaban el espíritu de los seres vivientes.

22

 Sobre las cabezas de los seres vivien-

tes había la semejanza de un firmamento 

como  de  hielo,  extremadamente  fuerte, 

extendido por encima, sobre sus cabezas.

23

 Debajo  del  firmamento,  sus  alas  ex-

pandidas  se  tocaban  entre  sí.  Cada  uno 

tenía dos alas que cubrían su cuerpo por 

ambos lados.

24

 Cuando avanzaban, oía el ruido de sus 

alas  como  el  estruendo  de  aguas  cauda-

losas, como la voz de Shadday, ruido tu-

multuoso como el fragor de un ejército. 

Al detenerse, sus alas se plegaban.

25

 Y cuando se oía una voz en el firma-

mento encima de sus cabezas, se detenían 

y sus alas se plegaban.

26

 Y sobre el firmamento que estaba enci-

ma de sus cabezas había como la aparien-

cia de una piedra de zafiro, a semejanza 

de un trono; y sobre la semejanza del tro-

no, una semejanza como la apariencia de 

un hombre por encima de él.

27

 Entonces  vi  como  una  refulgencia  de 

bronce acrisolado, y una apariencia de fue-

go  lo  enmarcaba  de  lo  que  parecía  ser  la 

apariencia de sus lomos hacia arriba; y de lo 

que parecía ser la apariencia de sus lomos 

hacia abajo, vi como una apariencia de fue-

go que tenía un resplandor todo en torno,

28

 a semejanza del arco que suele apare-

cer en la nube en día de lluvia, así era la 

apariencia  de  la  refulgencia  alrededor  de 

él.° Tal fue la visión de la apariencia de la 

gloria de YHVH. Cuando la vi, caí rostro en 

tierra; entonces oí una voz que hablaba.

Vocación del profeta

2

Y me dijo: Hijo de hombre, ponte so-

bre tus pies, y hablaré contigo.

2

 Y después que me habló, el espíritu en-

tró en mí y me afirmó sobre mis pies. Y 

escuché al que me hablaba,

3

 que me decía: Hijo de hombre, Yo te en-

vío  a  los  hijos  de  Israel,  a  esos  paganos 

rebeldes que se rebelaron contra mí. Tan-

to ellos como sus padres se han rebelado 

contra mí hasta este mismo día.

4

 A hijos de rostro duro y obstinado cora-

zón te envío, y les dirás: Así dice Adonay 

YHVH,

5

 te escuchen o no te escuchen, pues son 

casa rebelde, y tienen que reconocer que 

un profeta ha estado en medio de ellos.

6

 Y tú, hijo de hombre, no temas, no te-

mas a ellos ni sus palabras, aunque te ha-

llas entre cardos y espinas, y moras con 

escorpiones, no tengas temor de sus pala-

bras ni te espantes ante ellos, porque son 

casa rebelde.

7

 Les  hablarás  pues  mis  palabras,  escu-

chen  o  dejen  de  escuchar,  porque  son 

muy rebeldes.

8

 Pero tú, hijo de hombre, escucha lo que Yo 

te hablo. No seas rebelde como la casa rebel-

de. ¡Abre tu boca y come lo que te doy!

9

 Y miré, y he aquí una mano que se ex-

tendía hacia mí, y en ella había un rollo 

escrito.

10

 Y lo extendió ante mí, y estaba escrito 

por dentro y por fuera, y lo escrito en él 

eran endechas, lamentaciones y ayes.

Ministerio

3

Me dijo: Hijo de hombre, come lo que 

tienes ahí; cómete ese rollo, y ve y ha-

bla a la casa de Israel.

2

 Abrí pues mi boca, y me hizo comer ese 

rollo,

3

 y me dijo: Hijo de hombre, alimenta tu 

vientre y llena tus entrañas de este rollo 

que Yo te doy. Y lo comí, y fue en mi boca 

dulce como la miel.

4

 Luego me dijo: Hijo de hombre, ve y en-

tra a la casa de Israel, y háblales con mis 

palabras.

5

 Porque no eres enviado a un pueblo de 

habla profunda ni de lengua difícil, sino a 

la casa de Israel.

6

 No a muchos pueblos de habla profun-

da ni de lengua difícil, cuyas palabras no 

1.28 .de él


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Ezequiel 4:5

843

entiendas, que de seguro, si te enviara a 

ellos, te escucharían.

7

 Pero la casa de Israel no te querrá oír, 

porque no quiere escucharme a mí, pues 

toda la casa de Israel es de dura cerviz y 

obstinado corazón.

8

 He aquí Yo endurezco tu rostro contra 

los rostros de ellos, y endurezco tu frente 

contra sus frentes.

9

 He hecho tu frente como diamante, más 

fuerte que el pedernal. No los temas ni te 

acobardes ante ellos, porque son casa re-

belde.

10

 Me dijo además: Hijo de hombre, reci-

be en tu corazón todas las palabras que te 

digo, y escúchalas con tus oídos.

11

 Acércate a los cautivos, a los hijos de 

tu  pueblo,  y  háblales  diciendo,  así  dice 

Adonay YHVH, te escuchen o no te escu-

chen.

12

 Y en seguida el espíritu me alzó, y oí 

detrás  de  mí  el  sonido  de  un  estruendo 

tumultuoso, cuando la gloria de YHVH se 

elevó del sitio.

13

 (El revuelo de las alas de los seres vi-

vientes rozando una con otra, junto con 

el fragor de las ruedas delante de ellos era 

el sonido de gran estruendo).

14

 Me alzó pues el espíritu, y me llevó, y 

yo iba con amargura, en la indignación de 

mi espíritu, pues la mano de YHVH pesa-

ba gravemente sobre mí.

15

 Y vine a los cautivos en Tel-Abib, que 

vivían a orillas del río Quebar, y me sen-

té  donde  estaban  sentados,  y  allí,  entre 

ellos,  permanecí  perplejo  durante  siete 

días.

El atalaya de Israel

16

 Al cabo de los siete días aconteció que 

la palabra de YHVH vino a mí, diciendo:

17

 Hijo  de  hombre,  Yo  te  he  puesto  por 

atalaya a la casa de Israel, y cuando oigas 

una palabra de mi  boca,  la  darás  a ellos 

como advertencia de parte mía.

18

 Cuando  Yo  diga  al  impío:  De  cierto 

morirás; y tú no se lo anticipes ni lo amo-

nestes, para que el impío se aperciba de 

su mal camino a fin de que viva, el impío 

morirá por su maldad, pero Yo demanda-

ré su sangre de tu mano.

19

 Pero si tú amonestas al impío, y él no 

se convierte de su impiedad y de su mal 

camino, él morirá por su maldad, pero tú

habrás librado tu alma.

20

 Si algún justo se aparta de su justicia y 

hace maldad, pondré un tropiezo delante 

de él y morirá, porque tú no lo amones-

taste.  Por  su  pecado  morirá,  y  las  obras 

de  justicia  que  hizo  no  serán  recorda-

das, pero Yo demandaré su sangre de tu 

mano.

21

 Pero si amonestas al justo para que no 

peque, y él no peca, de cierto vivirá por-

que fue amonestado, y tú habrás librado 

tu alma.

22

 Y  allí  se  apoyó  sobre  mí  la  mano  de 

YHVH, y me dijo: Levántate, sal a la lla-

nura, y allí hablaré contigo.

23

 Me levanté pues, salí a la llanura, y allí 

estaba la gloria de YHVH, como la gloria 

que había visto junto al río Quebar, y caí 

sobre mi rostro.

24

 Entonces entró el espíritu en mí y me 

levantó  en  pie,  y  habló  conmigo,  y  me 

dijo: Ve y enciérrate en tu casa.

25

 Pues  en  cuanto  a  ti,  hijo  de  hombre, 

he aquí te pondrán sogas y te atarán con 

ellas, para que no salgas a ellos.

26

 Y Yo haré que la lengua se pegue a tu 

paladar, y quedarás mudo, y no serás para 

ellos  como  un  varón  que  reprende,  por-

que son casa rebelde.

27

 Pero  cuando  Yo  te  haya  hablado,  en-

tonces abriré tu boca para que les digas: 

Así dice Adonay YHVH. El que quiera, que 

te escuche y el que no, que lo deje, porque 

son casa rebelde.

Acciones simbólicas

4

Y tú, hijo de hombre, tómate una ta-

blilla, póntela delante, y graba en ella 

la ciudad de Jerusalem.

2

 Y pon contra ella sitio, y edifica contra 

ella torres de asedio, levanta terraplenes 

contra ella, pon tropas contra ella, y arie-

tes a su alrededor.

3

 Tómate también una sartén de hierro y 

ponla como vallado de hierro entre ti y la 

ciudad; dirige contra ella tu rostro: que-

dará sitiada y le apretarás el cerco. Es una 

señal para la casa de Israel.

4

 Y acuéstate tú mismo del lado izquier-

do, y Yo echaré encima tuyo la maldad de 

la casa de Israel, y los días que estés así 

acostado cargarás con su iniquidad.

5

 Yo te señalo en días los años de su ini-

quidad:  trescientos  noventa  días,  para 


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Ezequiel 4:6

844

que  cargues  con  la  iniquidad  de  la  casa 

de Israel.

6

 Cumplidos  éstos,  te  acostarás  del  lado 

derecho  y  cargarás  con  la  iniquidad  de 

la casa de Judá cuarenta días: un día por 

cada año te señalo.

7

 Y dirigirás tu rostro hacia el asedio de 

Jerusalem,  y  con  tu  brazo  descubierto 

profetizarás contra ella.

8

 Mira, te amarro con sogas para que no 

te vuelvas de lado, hasta que hayas cum-

plido los días de tu apretura.

9

 Recógete  pues  trigo  y  cebada,  habas  y 

lentejas, maíz y avena, y échalo todo en 

una vasija y con ellos hazte de comer. Eso 

comerás  trescientos  noventa  días,  todos 

los días que estés echado de ese lado.

10

 Comerás tu alimento por peso: una ra-

ción diaria de veinte siclos; a una hora fija 

la comerás.

11

 Beberás el agua medida: la sexta parte 

de  una  cantarilla;  a  una  hora  fija  la  be-

berás.

12

 Comerás  también  una  hogaza  de  ce-

bada, que cocerás delante de ellos sobre 

excremento humano.

13

 Y dijo YHVH: Así comerán los hijos de 

Israel su pan inmundo entre las naciones 

a donde Yo los disperse.

14

 Y dije: ¡Ay, Adonay YHVH! he aquí que 

mi  alma  no  ha  sido  contaminada;  desde 

mi  juventud  hasta  ahora  no  he  comido 

cosa  mortecina  ni  despedazada  por  las 

fieras, ni ha entrado en mi boca carne de 

desecho.

15

 Me respondió: He aquí te concedo que 

prepares tu pan, no sobre excremento hu-

mano sino sobre boñigas.

16

 Y  me  dijo:  Hijo  de  hombre,  he  aquí 

rompo  el  báculo  del  pan  en  Jerusalem: 

comerán el pan por peso y con angustia; 

beberán el agua por medida y con espan-

to,

17

 para que al faltarles el pan y el agua, 

se miren unos a otros con espanto, y se 

consuman por su culpa.

Los tres tercios

5

Y tú, oh hijo de hombre, tómate una 

cuchilla  afilada,  agarra  una  nava-

ja  barbera  y  pásatela  por  la  cabeza  y  la 

barba. Después agarra una balanza y haz 

porciones.

2

 Un tercio lo quemarás a fuego en medio 

de la ciudad cuando termine el asedio, un 

tercio lo sacudirás con la espada en tor-

no a la ciudad, y un tercio lo esparcirás 

al viento, porque desenvainaré la espada 

tras ellos.

3

 De allí recogerás unos cuantos cabellos, 

y los atarás en el orillo de tu manto.

4

 Y tomarás otra vez de ellos, y los echa-

rás en medio del fuego, y en el fuego los 

quemarás. De allí saldrá un fuego que en-

volverá toda la casa de Israel.

5

 Así dice Adonay YHVH: ¡Ésta es Jerusa-

lem! La puse en el centro de los pueblos, 

rodeada de naciones,

6

 pero  se  rebeló  contra  mis  leyes  y  mis 

mandatos  pecando  más  que  otros  pue-

blos;  contra  mis  estatutos,  más  que  las 

naciones vecinas, porque rechazaron mis 

mandatos y no siguieron mis leyes.

7

 Por eso, así dice Adonay YHVH: Porque 

fuisteis más rebeldes que los pueblos ve-

cinos, y no seguisteis mis leyes ni cum-

plisteis mis mandatos, ni obrasteis como 

es costumbre de las naciones vecinas.

8

 Por eso dice Adonay YHVH: ¡Heme aquí 

a mí también en contra tuya! Te juzgaré a 

vista de las naciones,

9

 y  a  causa  de  todas  tus  abominaciones, 

haré contigo lo que nunca hice, ni volve-

ré a hacer cosa semejante.

10

 Porque  en  medio  de  ti,  los  padres  se 

comerán a sus hijos y los hijos se come-

rán  a  sus  padres.  Haré  actos  de  justicia 

contra ti, y esparciré tu remanente a to-

dos los vientos.

11

 Por eso, ¡vivo Yo! dice Adonay YHVH, 

que  por  haber  profanado  mi  Santuario 

con  tus  ídolos  y  tus  abominaciones,  Yo 

también te quebrantaré. Mi ojo no perdo-

nará ni tendré de ti misericordia.

12

 Un tercio de los tuyos morirá de peste, 

el hambre los consumirá dentro de ti; un 

tercio caerá a espada alrededor tuyo, y un 

tercio esparciré a todos los vientos, y los 

perseguiré con la espada desnuda.

13

 Así se desahogará mi ira sobre ellos y 

saciaré mi indignación, y quedaré satisfe-

cho.° Y cuando haya agotado mi ira sobre 

5.13 Lit. consolado


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Ezequiel 7:5

845

ellos,  sabrán  que  Yo,  YHVH,  hablé  con 

pasión.

14

 Te convertiré en soledad y en oprobio 

de las naciones que te rodean, a vista de 

todo transeúnte.

15

 Llegarás  a  ser  escarnio  y  afrenta,  es-

carmiento y espanto para los pueblos ve-

cinos, cuando Yo ejecute en ti juicios con 

ira e indignación y castigos despiadados, 

Yo, YHVH, lo he dicho.

16

 Cuando Yo dispare contra ellos las fatí-

dicas saetas de la hambruna, que traigan 

el exterminio (las cuales dispararé hasta 

aniquilaros), aumentaré el hambre sobre 

vosotros y os quebraré el báculo del pan.

17

 Enviaré  contra  vosotros  el  hambre  y 

las bestias feroces, que te dejarán sin hi-

jos. Pasarán sobre ti la peste y la matanza, 

y enviaré contra ti la espada. Yo, YHVH, 

he hablado.

Contra los montes de Israel

6

Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

2

 Hijo  de  hombre,  pon  tu  rostro  ha-

cia los montes de Israel, profetiza contra 

ellos, y di:

3

 ¡Montes de Israel, oíd palabra de Adonay 

YHVH! Así dice Adonay YHVH a los mon-

tes y collados, a los arroyos y a los valles: 

He aquí, Yo mismo envío la espada sobre 

vosotros,  para  destruir  vuestros  lugares 

altos.

4

 Vuestros altares serán asolados y vues-

tras imágenes del sol serán quebradas, y 

haré que vuestros muertos caigan delante 

de vuestros ídolos.

5

 Arrojaré los cadáveres de los hijos de Is-

rael delante de sus ídolos, y esparciré vues-

tros huesos en torno a vuestros altares.

6

 Dondequiera  que  habitéis,  las  ciuda-

des  serán  asoladas,  y  los  lugares  altos 

quedarán  desolados,  hasta  que  queden 

arruinados y arrasados vuestros altares, y 

vuestros ídolos rotos y destruidos, y vues-

tras imágenes del sol arrancadas y vues-

tras obras extirpadas,

7

 y los cadáveres yacerán entre vosotros, y 

sabréis que Yo soy YHVH.

8

 Pero dejaré un remanente que escape de 

la espada a otras naciones; y cuando seáis 

esparcidos por sus territorios,

9

 los  que  de  vosotros  escapen,  se  acor-

darán  de  mí  entre  las  naciones  en  las 

cuales estarán cautivos, cuando Yo haya 

quebrantado  su  corazón  infiel  que  se 

apartó  de  mí,  y  haya  humillado°  sus 

ojos que fornicaron en pos de sus ídolos. 

Ellos se detestarán a sí mismos a causa 

de las maldades cometidas, por todas sus 

abominaciones.

10

 Y sabrán que Yo soy YHVH: no en vano 

he dicho que les haría este mal.

Desolación sobre la tierra

11

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Bate  palmas 

y  patea,  y  di:  ¡Ay,  por  las  graves  abomi-

naciones de la casa de Israel! Porque con 

espada, hambre y pestilencia caerán.

12

 El que esté lejos morirá de peste, el que 

esté cerca caerá a espada, y el que quede 

vivo  morirá  de  hambre.  Así  desahogaré 

mi indignación en ellos.

13

 Y  sabréis  que  Yo  soy  YHVH,  cuando 

sus muertos a espada queden tendidos en 

medio de sus ídolos, en derredor de sus 

altares, y sobre cada collado elevado y en 

todas las cumbres de los montes, y debajo 

de  todo  árbol  frondoso  y  debajo  de  toda 

encina  espesa,  lugares  donde  ofrecieron 

olores gratos a todos sus ídolos.

14

 Y  extenderé  mi  mano  contra  ellos,  y 

dondequiera  que  habiten,  pondré  la  tie-

rra más asolada y devastada que el desier-

to  hacia  Diblat,  y  conocerán  que  Yo  soy 

YHVH.

Llega el día

7

Vino a mí palabra de YHVH diciendo:

2

 Tú, hijo de hombre, di: Así dice Ado-

nay YHVH a la tierra de Israel: ¡El fin lle-

ga! ¡El fin llega a los cuatro extremos de 

la tierra!

3

 Ahora el fin viene sobre ti: Lanzaré mi 

ira contra ti, te juzgaré según tus cami-

nos, y traeré sobre ti todas tus abomina-

ciones.

4

 Mi ojo no te perdonará ni tendré mise-

ricordia: traeré tus caminos sobre ti, y te 

quedarás  con  tus  abominaciones,  y  sa-

bréis que Yo soy YHVH.

5

 Así dice Adonay YHVH: Se avecina des-

gracia tras desgracia:

6.9 .humillado


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Ezequiel 7:6

846

6

 ¡El  fin  llega,  llega  el  fin!  Se  despierta 

contra ti: ¡He aquí, llega!

7

 Te llega el turno, oh habitante del país; 

llega  el  tiempo,  cercano  está  el  día:  Día 

de tumulto y no de grito de alegría sobre 

los montes.

8

 Muy  en  breve  derramaré  mi  indigna-

ción sobre ti, desahogaré mi ira en ti, te 

juzgaré según tus caminos, y pagarás tus 

abominaciones.

9

 Mi  ojo  no  perdonará,  ni  tendré  mi-

sericordia:  te  recompensaré  según  tus 

caminos, y te quedarás con tus abomina-

ciones, y sabréis que Yo, YHVH, soy el que 

castiga.

10

 ¡Ahí  está  el  día;  te  está  llegando!  ¡Ha 

salido tu turno! Florece la injusticia, ma-

dura la soberbia;

11

 la  violencia  triunfa  hasta  convertirse 

en  cetro  del  malvado.  Pero  no  quedará 

nada de ellos, ni de su multitud, ni de su 

hacienda, ni habrá quien se lamente por 

ellos.

12

 ¡Llega el día, el día se avecina! El que 

compra  no  se  alegre,  y  el  que  venda  no 

esté  triste,  porque  la  ira  gravita  sobre 

toda la multitud.

13

 El  vendedor  no  recobrará  lo  vendido 

ni el comprador retendrá lo comprado,° 

porque  la  ira  gravita  sobre  toda  la  mul-

titud,  y  no  se  revocará,  y  a  causa  de  su 

propia  iniquidad,  nadie  podrá  preservar 

su vida.

14

 Tocarán la trompeta, todo estará presto, 

pero no habrá quien vaya al combate, por-

que la ira gravita sobre toda la multitud.

15

 ¡Por  fuera  la  espada,  por  dentro  la 

peste y el hambre! El que está en el des-

campado  morirá  a  espada,  y  al  que  está 

en la ciudad lo devorará la hambruna y la 

pestilencia.

16

 Los que escapen huyendo a las mon-

tañas,  estarán  como  las  palomas  de  los 

valles:  todos  zureando,  cada  uno  por  su 

iniquidad.

17

 Todos  los  brazos  desfallecerán,  todas 

las rodillas flaquearán.

18

 Se ceñirán de sayal, se cubrirán de es-

panto.  Todo  rostro  estará  consternado  y 

toda cabeza rapada.

19

 Tirarán la plata por las calles, tendrán 

el  oro  por  basura.  Ni  su  oro  ni  su  plata 

podrán  salvarlos  en  el  día  de  la  ira  de 

YHVH, porque eso ha sido su tropiezo y 

su pecado. No les quitarán el hambre ni 

les llenarán el vientre.

20

 Ensoberbecidos  por  la  belleza  de  sus 

joyas,  fabricaron  con  ellas  las  imágenes 

de  sus  ídolos  abominables,  pero  Yo  los 

convertiré en inmundicia,

21

 y lo entregaré como botín en mano de 

extranjeros,  como  presa  para  los  impíos 

de la tierra, los cuales lo profanarán.

22

 Y  apartaré  de  ellos  mi  rostro,  y  será 

violado  mi  Lugar  Secreto;  entrarán  los 

invasores y lo profanarán.

23

 Prepara grilletes: el país está lleno de 

crímenes sangrientos y la ciudad repleta 

de violencia.

24

 Por tanto, Yo traeré a los pueblos más 

feroces, para que se adueñen de sus casas, 

pondré fin al orgullo de los poderosos, y 

serán profanados sus santuarios.

25

 Cuando  llegue  el  pánico,  buscarán  la 

paz, pero no la habrá.

26

 Vendrá  calamidad  sobre  calamidad,  y 

alarma  tras  alarma;°  pedirán  visiones  al 

profeta, pero la Ley estará lejos del sacer-

dote, y el consejo de los ancianos.

27

 El  rey  se  vestirá  de  desolación°  y  los 

príncipes de espanto, y temblarán las ma-

nos  del  pueblo  de  la  tierra.°  Los  trataré 

conforme a sus caminos, los juzgaré con-

forme a su justicia, y sabrán que Yo soy 

YHVH.

La casa profanada

8

El año sexto, el día cinco del mes sex-

to, estando yo sentado en mi casa, y los 

ancianos de Judá sentados frente a mí, la 

mano de Adonay YHVH bajó allí sobre mí.

2

 Y  miré,  y  he  aquí  una  semejanza  de 

hombre°  como  la  apariencia  de  fuego: 

Desde  la  apariencia  de  sus  lomos  para 

abajo  era  fuego,  y  desde  sus  lomos  para 

arriba, como la apariencia de un resplan-

dor,  como  la  refulgencia  del  bronce  in-

candescente.

3

 Y extendió como la forma de una mano, 

y  tomándome  por  una  guedeja  de  mi 

7.13 Esto es, en el jubileo 

→Lv.25.13.  7.26 Lit. oír sobre oír.  7.27 Es decir, con las vestiduras rasgadas en señal de luto

7.27 Esto es, el pueblo de Israel.  8.2 .hombre


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Ezequiel 9:6

847

cabeza, el espíritu me alzó entre la tierra 

y los cielos, y en visiones de Dios me llevó 

a Jerusalem, a la entrada de la puerta in-

terior, que mira hacia el norte, donde es-

taba el asiento de la imagen de los celos, 

la que provoca a celos.

4

 Y he aquí la gloria del Dios de Israel es-

taba allí, conforme a la visión que yo ha-

bía visto en la llanura.

5

 Y me dijo: Hijo de hombre, alza ahora 

tus  ojos  hacia  el  norte.  Y  alcé  mis  ojos 

hacia el norte, y he aquí que al norte de 

la  puerta  del  altar,  en  la  entrada,  estaba 

aquella imagen de los celos.

6

 Me dijo entonces: Hijo de hombre, ¿has 

visto lo que ellos hacen? Grandes son las 

abominaciones que la casa de Israel hace 

aquí para alejarme de mi Santuario. Pero 

aún verás abominaciones mayores.

7

 Y me llevó a la entrada del atrio, y miré, 

y he aquí un agujero en la pared.

8

 Entonces me dijo: Hijo de hombre, ho-

rada ahora el muro. Y cuando horadé el 

muro, he aquí una puerta.

9

 Me  dijo  luego:  Entra,  y  contempla  las 

perversas abominaciones que éstos hacen 

aquí.

10

 Entré, pues, y observé, y he aquí toda 

forma de reptiles y bestias abominables, y 

todos los ídolos de la casa de Israel, pinta-

dos en todas las paredes en derredor.

11

 Y delante de ellos estaban de pie setenta 

varones de los ancianos de Israel, con Jaa-

zanías ben Safán, en medio de ellos, cada 

uno con su incensario en la mano, y una 

espesa nube de incienso iba subiendo.

12

 Y me dijo: Hijo de hombre, ¿has visto 

lo que los ancianos de la casa de Israel es-

tán haciendo en la oscuridad, cada uno en 

sus cámaras plagadas de imágenes? Por-

que  dicen:  ¡YHVH  no  nos  ve!  ¡YHVH  ha 

abandonado la tierra!

13

 Me dijo después: Vuélvete, y verás abo-

minaciones aún mayores que ellos hacen.

14

 Y me llevó junto a la puerta septentrio-

nal de la Casa de YHVH, y vi allí mujeres 

sentadas plañendo a Tamuz.

15

 Y me dijo: ¿Has visto hijo de hombre? 

¡Pues aún verás mayores abominaciones 

que éstas!

16

 Y me llevó al atrio interior de la Casa 

de  YHVH,  y  he  aquí,  que  a  la  entrada 

del  templo  de  YHVH,  entre  el  pórtico  y 

el  altar,  había  unos  veinticinco  varones 

vueltos  de  espaldas  al  templo  de  YHVH, 

con sus rostros hacia el oriente, los cua-

les estaban postrándose hacia el oriente, 

adorando al sol.

17

 Y me dijo: ¿Has visto hijo de hombre? 

¿Le parece poco a la casa de Judá come-

ter las abominaciones que cometen aquí? 

Porque después de llenar el país de violen-

cia, se vuelven para irritarme más y más, 

¡y hasta ponen la rama ante mis narices!°

18

 Pues Yo también procederé con ira ar-

diente. Mi ojo no se compadecerá, ni ten-

dré misericordia. Clamarán con gran voz 

a mis oídos, pero no los escucharé.

La mortandad en Jerusalem

9

Después  lo  oí  llamar  con  recia  voz, 

diciendo: ¡Acérquense los verdugos de 

la ciudad empuñando cada uno su arma 

mortal!

2

 Y  aparecieron  seis  varones  por  el  ca-

mino  de  la  puerta  de  arriba,  la  que  da 

al  norte,  empuñando  cada  uno  su  arma 

destructora.  Y  en  medio  de  ellos  había 

un varón vestido de lino blanco, con un 

tintero de escriba ceñido° a sus lomos. Y 

entraron y se mantuvieron de pie junto al 

altar de bronce.

3

 Entonces la gloria del Dios de Israel se 

elevó de encima de los querubines,° sobre 

los  cuales  había  estado,  en  dirección  al 

umbral de la Casa, y llamó al varón vesti-

do de lino blanco, que tenía el tintero de 

escriba ceñido a sus lomos,

4

 y  le  dijo  YHVH:  ¡Pasa  en  medio  de  la 

ciudad, en medio de Jerusalem, y señala 

con una cruz° las frentes de los hombres 

que gimen y se angustian a causa de todas 

las abominaciones que se hacen en medio 

de ella!

5

 Luego, oyéndolo yo, dijo a los otros: ¡Pa-

sad por la ciudad tras él y matad! ¡Vuestro 

ojo no perdone ni tengáis misericordia!

6

 ¡Al  anciano,  al  joven  y  a  la  doncella,  a 

los niños y a las mujeres, matadlos has-

ta exterminarlos! Pero no os acerquéis a 

8.17 10ª enmienda de los Soferim 

→ § 6  § 16.  9.2 .ceñido.  9.3 Lit. querubín.  9.4 Lit. tau. Última letra del alfabeto hebreo con 

forma de cruz. Aparece por única vez en el texto hebreo. 


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Ezequiel 9:7

848

ninguno en quien esté la señal. ¡Comen-

zad por mi Santuario! Comenzaron, pues, 

desde  los  varones  ancianos  que  estaban 

delante de la Casa.

7

 Y Él les dijo: ¡Profanad la Casa y llenad 

los atrios de cadáveres! ¡Salid ya! Y salie-

ron y mataron en la ciudad.

8

 Y aconteció, mientras ellos iban matan-

do (yo quedé solo), que me postré sobre 

mi rostro, y clamé diciendo: ¡Ah, Adonay 

YHVH!  ¿Destruirás  a  todo  el  remanente 

de Israel, derramando tu ardiente indig-

nación sobre Jerusalem?

9

 Y  me  dijo:  La  iniquidad  de  la  casa  de 

Israel y de Judá es sobremanera grande, 

pues el país está lleno de asesinatos, y la 

ciudad  atestada  de  perversidad,  pues  di-

jeron: ¡YHVH ha abandonado la tierra! Y: 

¡YHVH no lo ve!

10

 Así  también  haré  Yo:  Mi  ojo  no  per-

donará, ni tendré misericordia, sino que 

haré recaer sus caminos sobre sus propias 

cabezas.

11

 Y  he  aquí,  el  varón  vestido  de  lino 

blanco,  que  llevaba  el  tintero  ceñido  a 

sus lomos, dio cuenta diciendo: He hecho 

conforme a todo lo que me mandaste.

Asciende la gloria divina

10

Entonces miré, y he aquí, encima 

del firmamento que había sobre la 

cabeza de los querubines, aparecía como 

una piedra de zafiro, que tenía la seme-

janza de un trono.

2

 Y Él habló al varón vestido de lino blan-

co, y le dijo: Entra en medio de las rue-

das, por debajo de los querubines, y llena 

tus manos de ascuas de fuego de entre los 

querubines, y espárcelos sobre la ciudad. 

Y él entró delante de mi vista.

3

 Al entrar este varón, los querubines es-

taban de pie a la derecha de la Casa, y la 

nube llenaba el atrio interior.

4

 Entonces  la  gloria  de  YHVH  se  elevó 

desde donde estaba el querubín y se de-

tuvo en el umbral de la puerta; y la Casa 

fue llena de la nube y el atrio fue lleno del 

resplandor de la gloria de YHVH.

5

 Y el rumor de las alas de los querubines 

se oía hasta el atrio exterior, como la voz 

de ’El-Shadday° cuando habla.

6

 Y cuando mandó al varón vestido de lino 

blanco, diciendo: Toma fuego de adentro 

de las ruedas, de en medio de los querubi-

nes, él entró y se quedó en pie junto a una 

de las ruedas.

7

 Entonces  un  querubín  extendió  su 

mano por entre los querubines, hacia el 

fuego que había en medio de ellos, y to-

mando de este, lo puso en las manos del 

que estaba vestido de lino blanco, el cual 

lo tomó y salió.

8

 Y apareció en los querubines, por deba-

jo de sus alas, como la apariencia de una 

mano humana.

9

 Y  miré,  y  he  aquí  cuatro  ruedas  junto 

a los querubines, una rueda junto a cada 

querubín, y la apariencia de las ruedas era 

como el resplandor del crisólito.

10

 En cuanto a su apariencia, las cuatro 

tenían  una  misma  semejanza,  pero  su 

hechura era como si una rueda estuviera 

encajada dentro de la otra

11

 para  poder  rodar  en  las  cuatro  direc-

ciones sin tener que girar al rodar, pues 

ya de antemano estaban orientadas en la 

dirección en que debían rodar, y al avan-

zar no se volvían.

12

 Y todo su cuerpo y espaldas, sus manos 

y sus alas, y también las ruedas (las cuatro 

ruedas), estaban llenos de ojos en derredor.

13

 Y  oí  que  las  ruedas  eran  llamadas 

Galgal.°

14

 Ahora  bien,  cada  uno°  tenía  cuatro 

caras: La primera era rostro de querubín, 

la segunda, rostro de hombre, la tercera, 

cara de león, y la cuarta, cara de águila.

15

 Y los querubines ascendieron. Éste es 

el ser viviente que yo había visto junto al 

río Quebar.

16

 Y cuando los querubines se desplaza-

ban, las ruedas andaban junto con ellos, 

y al alzar los querubines sus alas para re-

montarse sobre la tierra, las ruedas no se 

apartaban de junto a ellos.

17

 Cuando  aquéllos  se  detenían,  éstas 

también se detenían, y cuando ascendían, 

también subían con ellas, porque llevaban 

el espíritu de los seres vivientes.

18

 Entonces la gloria de YHVH se retiró 

de sobre el umbral de la Casa, y quedó so-

bre los querubines.

10.5 

→ § 5.  10.13 Esto es, torbellino.  10.14 Esto es, de los seres vivientes


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Ezequiel 11:23

849

19

 Cuando los querubines partieron, des-

plegaron sus alas y ante mis propios ojos 

se  remontaron  de  la  tierra  junto  con  las 

ruedas, y se detuvieron a la entrada de la 

puerta oriental de la Casa de YHVH, y la 

gloria del Dios de Israel estaba sobre ellos.

20

 Éstos eran los mismos seres vivientes 

que había visto debajo del Dios de Israel 

junto al río Quebar, y yo sabía que eran 

querubines.

21

 Cada  uno  tenía  cuatro  caras  y  cada 

uno cuatro alas, y había como la aparien-

cia de las manos de un hombre debajo de 

sus alas.

22

 La semejanza de sus rostros era la de 

los rostros que yo había visto junto al río 

Quebar: su misma apariencia y esencia; y 

cada uno avanzaba de frente.

El remanente

11

Me arrebató el espíritu, y en volan-

das  me  llevó  a  la  puerta  oriental 

de  la  Casa  de  YHVH  (la  que  mira  hacia 

el levante); y allí, junto a la puerta, había 

veinticinco varones, entre los que distin-

guí a Jaazanías ben Azur, y a Pelatías ben 

Benaía, príncipes del pueblo.

2

 Y me dijo: Hijo de hombre, éstos son los 

que maquinan perversidades y dan malos 

consejos en esta ciudad,

3

 pues andan diciendo: No es tiempo aho-

ra de edificar casas. ¡Ésta es la olla y no-

sotros la carne!

4

 Profetiza entonces contra ellos, hijo de 

hombre.

5

 Y el Espíritu de YHVH vino sobre mí, y 

me dijo: Habla: Así dice YHVH: Oh casa de 

Israel, habláis así, pero Yo sé las cosas que 

surgen en vuestra mente.

6

 Habéis multiplicado vuestros asesinatos 

en esta ciudad, y habéis llenado sus calles 

de cadáveres.

7

 Por  tanto,  así  dice  Adonay  YHVH:  Las 

víctimas que habéis dejado en medio de 

ella serán la carne, y ella será la olla,° de 

en medio de la cual os hará sacar.

8

 Teméis la espada; pues la espada atraeré 

sobre vosotros, dice Adonay YHVH.

9

 Os haré sacar de en medio de ella y os 

entregaré en manos de extranjeros, y en 

vosotros haré justicia.

10

 Caeréis por la espada. Os juzgaré sobre 

el territorio de Israel, y sabréis que Yo soy 

YHVH.

11

 Aunque esta ciudad no sea vuestra olla, 

vosotros seréis la carne en medio de ella. 

Yo os juzgaré sobre el territorio de Israel,

12

 y sabréis que Yo soy YHVH, porque no 

anduvisteis  en  mis  estatutos  ni  obedecis-

teis  mis  decretos,  sino  que  imitasteis  las 

costumbres de las naciones que os rodean.

13

 Y  aconteció  que  mientras  yo  profeti-

zaba,  murió  aquel  Pelatías  ben  Benaía. 

Entonces  me  postré  rostro  a  tierra  y 

clamando  a  gran  voz,  dije:  ¡Ay,  Adonay 

YHVH!  ¿Destruirás  totalmente  al  rema-

nente de Israel?

14

 Y vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

15

 Hijo  de  hombre:  Los  moradores  de 

Jerusalem dicen de tus hermanos, de tus 

compañeros de exilio, y de la casa de Is-

rael toda entera: ¡Se alejaron de YHVH, y 

a nosotros nos toca poseer esa tierra!

16

 Por tanto, di: Así dice Adonay YHVH: 

Aunque Yo los arrojé lejos entre las nacio-

nes, y aunque los dispersé entre los pue-

blos,  con  todo,  les  seré  por  un  pequeño 

Santuario en las tierras adonde lleguen.

17

 Di, por tanto: Así dice Adonay YHVH: 

Yo os recogeré de los pueblos, y os con-

gregaré de las naciones en las cuales estáis 

esparcidos, y os daré la tierra de Israel.

18

 Y volverán allá, y quitarán de ella todas 

sus idolatrías y todas sus abominaciones.

19

 Y les daré un corazón, y les infundiré 

un espíritu nuevo, y quitaré el corazón de 

piedra de en medio de su carne, y les daré 

un corazón de carne,

20

 para que anden en mis ordenanzas, y 

guarden mis decretos y los cumplan, y me 

sean por pueblo, y Yo les sea por Dios.

21

 Pero respecto a aquellos cuyo corazón 

anda tras el deseo de sus idolatrías y de 

sus abominaciones, Yo traigo su camino 

sobre  sus  propias  cabezas,  dice  Adonay 

YHVH.

22

 Y los querubines alzaron sus alas, y las 

ruedas en pos de ellos, y la gloria del Dios 

de Israel estaba sobre ellos.

23

 Y la gloria de YHVH se elevó de en me-

dio de la ciudad, y se posó sobre el monte 

que está al oriente de la ciudad.

11.7 

→Miq.3.1-3. 


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Ezequiel 11:24

850

24

 Y a mí me alzó el espíritu y me volvió 

a  llevar  en  visión  del  Espíritu  de  Dios  a 

la tierra de los caldeos, a los cautivos. Así 

ascendió de mí la visión que había visto.

25

 Y hablé a los cautivos todas las cosas 

que YHVH me había mostrado.

Al destierro

12

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Hijo de hombre, tú habitas en medio de 

una  casa  rebelde,  los  cuales  tienen  ojos 

para ver y no ven; y tienen oídos para oír 

y no oyen, porque son casa rebelde.

3

 Por  tanto  tú,  hijo  de  hombre,  empaca 

unos  enseres  de  cautivo,  y  vete  como  si 

fueras al exilio, de día, a vista de ellos; y te 

moverás de tu lugar a otro lugar a vista de 

ellos, por si tal vez atienden, aunque son 

casa rebelde.

4

 Y te harás con tus enseres de día ante 

ellos,  y  andarás  por  la  tarde  delante  de 

ellos, como cuando los hombres salen al 

exilio.

5

 Horada la pared ante su vista, y sal por 

ella llevando tus enseres.

6

 Delante de sus ojos los llevarás sobre tus 

hombros,  y  los  llevarás  en  la  oscuridad, 

cubriéndote el rostro para que no veas el 

suelo, porque te he puesto por señal para 

la casa de Israel.

7

 Y yo hice así como me fue ordenado: salí 

de día llevando mis enseres, como si par-

tiera al exilio, y a la tarde horadé la pared 

con mi propia mano, y de noche llevé con-

migo mis enseres en la oscuridad, cargán-

dolos sobre los hombros a vista de ellos.

8

 Y  por  la  mañana  vino  a  mí  palabra  de 

YHVH, diciendo:

9

 Hijo de hombre, ¿no te ha preguntado 

la casa de Israel, la casa rebelde, qué es lo 

que hacías?

10

 Diles: Así dice Adonay YHVH: Esta pro-

fecía se refiere al príncipe de Jerusalem y 

a toda la casa de Israel que está en medio 

de ella.

11

 Diles:  Yo  soy  vuestra  señal:  como  yo 

hice, así se hará con vosotros: partiréis al 

destierro, en cautividad.

12

 Y  al  príncipe  que  está  entre  ellos  se 

le  cargará  el  petate  de  peregrino  a  la 

espalda y saldrá en la oscuridad. Horadará 

el muro para sacar sus enseres por allí, y 

cubrirá su rostro para no ver el suelo con 

sus ojos.

13

 Y Yo extenderé mi red sobre él, y será 

atrapado en mi trampa, y haré que sea lle-

vado a Babilonia, a tierra de caldeos, y allá 

morirá, aunque no la verá.°

14

 Y  esparciré  su  escolta  y  todo  su  ejér-

cito a todos los vientos, y desenvainaré la 

espada tras ellos.

15

 Y sabrán que Yo soy YHVH, cuando los 

disperse entre las naciones y los desparra-

me por la tierra.

16

 Pero haré que unos pocos de ellos esca-

pen de la espada, del hambre y de la peste, 

para que cuenten todas sus abominacio-

nes en medio de las naciones adonde van, 

y sabrán que Yo soy YHVH.

17

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

18

 Hijo de hombre, come tu pan con es-

tremecimiento, y bebe tu agua con tem-

blor y angustia.

19

 Y  di  al  pueblo  de  la  tierra:  Así  dice 

Adonay YHVH acerca de los moradores de 

Jerusalem y acerca de la tierra de Israel: 

comerán su pan con angustia, y con es-

panto beberán su agua; porque su tierra 

será despojada de su plenitud por la mal-

dad de todos los que moran en ella.

20

 Las  ciudades  habitadas  quedarán  de-

siertas  y  la  tierra  será  asolada,  y  sabréis 

que Yo soy YHVH.

Estribillos

21

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

22

 Hijo de hombre, ¿qué refrán es éste que 

tenéis en la tierra de Israel, que dice: Pasa 

día tras día, y la visión no se cumple?

23

 Por tanto diles: Así dice Adonay YHVH: 

Haré cesar ese refrán, y no será más proferi-

do en Israel, sino que les dirás: Se aproxima 

el día y el cumplimiento de toda visión.

24

 Porque ya no habrá visiones vanas ni 

adivinación de lisonjeros en medio de la 

casa de Israel.

25

 Porque Yo, YHVH, hablaré; y la palabra 

que Yo hable se cumplirá. No se tardará 

más,  sino  que  en  vuestros  días,  oh  casa 

rebelde, hablaré una cosa y la cumpliré, 

dice Adonay YHVH.

12.13 

→2 R.25.7; Jer.39.7; 52.11. 


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Ezequiel 13:21

851

26

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

27

 Hijo de hombre, he aquí que los de la 

casa  de  Israel  dicen:  La  visión  que  éste 

contempla  es  para  muchos  días;  para 

tiempos lejanos profetiza éste.

28

 Diles,  por  tanto:  Así  dice  Adonay 

YHVH: No se tardará más ninguna pala-

bra mía, sino que la palabra que Yo hable, 

se cumplirá, dice Adonay YHVH.

Los falsos profetas

13

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Hijo  de  hombre,  profetiza  contra  los 

profetas  de  Israel  que  profetizan,  y  di  a 

los que profetizan de su propio corazón: 

Oíd palabra de YHVH.

3

 Así dice Adonay YHVH: ¡Ay de los profe-

tas insensatos, que se inventan profecías; 

cosas  que  nunca  vieron,  siguiendo  su 

propia inspiración!

4

 ¡Oh  Israel!,  tus  profetas  son  como  zo-

rras entre ruinas.

5

 No acudieron a la brecha ni edificaron 

muro  en  torno  a  la  casa  de  Israel,  para 

que  resistiera  en  la  batalla  en  el  día  de 

YHVH.

6

 Visionarios falsos, adivinos embusteros, 

que  dicen:  ¡Dice  YHVH!  cuando  YHVH 

no los ha enviado, ¡y aún así esperan que 

confirme su palabra!

7

 ¿No habéis visto visión falsa, y no habláis 

adivinación  mentirosa,  pues  que  decís: 

¡dice YHVH! cuando Yo no he dicho nada?

8

 Por  tanto,  así  dice  Adonay  YHVH:  Por 

haber  dicho  mentiras,  y  haber  visto  en-

gaño, por eso aquí estoy contra vosotros, 

dice Adonay YHVH.

9

 Mi  mano  está  contra  los  profetas  que 

tienen  visiones  vanas  y  adivinan  menti-

ra. No estarán en la congregación de mi 

pueblo, ni serán inscritos en el libro de la 

casa de Israel, ni entrarán a la tierra de Is-

rael, y sabréis que Yo soy Adonay YHVH.

10

 Sí,  por  cuanto  han  hecho  errar  a  mi 

pueblo,  diciendo:  ¡Paz!,  cuando  no  hay 

paz; de manera que éste° edifica el muro, 

y otros° lo revocan con lodo suelto.

11

 Di  a  los  revocadores  que  el  lodo 

suelto  se  caerá;  que  vendrá  una  lluvia 

torrencial,  y  vosotras,°  oh  piedras  de 

granizo, caeréis, y un viento tempestuo-

so lo rajará.

12

 Y cuando el muro haya caído, ¿no os 

dirán:  ¿Dónde  está  la  embarradura  con 

que lo revocasteis?

13

 Por eso, así dice Adonay YHVH: Haré 

que lo rompa un viento huracanado con 

mi ira, y lluvia torrencial vendrá con mi 

furor, y grandes pedriscos, en mi ardor de 

destrucción.

14

 Así derribaré el muro que revocasteis 

con lodo suelto: lo echaré a tierra y caerá 

y quedarán al desnudo sus cimientos; se 

desplomará y pereceréis debajo, y sabréis 

que Yo soy YHVH.

15

 Así desahogaré mi ira en el muro y en 

los que lo revocaron con lodo suelto; y os 

diré: ¡Ya no existe el muro, ni los que lo 

revocaron!

16

 Es decir, los profetas de Israel que pro-

fetizan acerca de Jerusalem, y ven visión 

de  paz  para  ella,  no  habiendo  paz,  dice 

Adonay YHVH.

Contra las hechiceras

17

 Hijo de hombre, pon tu mismo rostro 

contra las hijas de tu pueblo, que profe-

tizan  de  su  propio  corazón,  y  profetiza 

contra ellas,

18

 y di: Así dice Adonay YHVH: ¡Ay de las 

que cosen cintas mágicas para toda mu-

ñeca,° y hacen capuchas mágicas de todo 

tamaño,  a  fin  de  entrampar  las  almas! 

¿Cazaréis  las  almas  de  mi  pueblo,  para 

preservar vuestra propia vida?

19

 ¿Me profanaréis ante mi pueblo por un 

puñado de cebada y un mendrugo de pan, 

destinando  a  la  muerte  al  que  no  tenía 

que morir, y a la vida al que no tenía que 

vivir; engañando así a mi pueblo, que va 

tras vuestras mentiras?

20

 Por tanto, así dice Adonay YHVH: Aquí 

estoy Yo contra vuestras cintas mágicas, 

con que cazáis las almas al vuelo. Se las 

arrancaré  de  las  muñecas,  y  soltaré  las 

almas  que  vosotras  cazáis  volando,  para 

que vuelen como aves.

21

 Romperé vuestras capuchas mágicas, y 

libraré a mi pueblo de vuestra mano, y no 

13.10 Esto es, el pueblo.  13.10 Esto es, los profetas.  13.11 Nótese el cambio del profeta al dirigirse súbitamente hacia los 

elementos. 

13.18 Esto es, la muñeca de la mano


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Ezequiel 13:22

852

estarán más como presa en vuestra mano, 

y sabréis que Yo soy YHVH.

22

 Porque con mentiras entristecisteis el 

corazón del justo, al cual Yo no entriste-

cí, porque fortalecisteis al impío, y lo ani-

masteis en su mal camino.

23

 Por tanto, no veréis más visiones vanas, 

ni practicaréis más adivinación; libraré a 

mi pueblo de vuestra mano, y sabréis que 

Yo soy YHVH.

Los ancianos de Israel

14

Se me presentaron algunos de los 

ancianos  de  Israel,  y  se  sentaron 

frente a mí.

2

 Y vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

3

 Hijo  de  hombre,  estos  hombres  han 

erigido sus ídolos en su corazón, y ponen 

el tropiezo de su iniquidad delante de sí 

mismos. ¿Permitiré en manera alguna ser 

consultado por ellos?

4

 Háblales,  por  tanto,  y  diles:  Así  dice 

Adonay  YHVH:  Cualquier  hombre  de  la 

casa de Israel que haya erigido ídolos en 

su corazón, y puesto el tropiezo de su ini-

quidad  delante  de  sí  mismo,  y  venga  al 

profeta, Yo, YHVH, le responderé confor-

me a la multitud de sus ídolos,

5

 a  fin  de  prender  a  la  casa  de  Israel  en 

su mismo corazón,° ya que todos ellos se 

han separado de mí a causa de sus ídolos.

6

 Por tanto, di a la casa de Israel: Así dice 

Adonay  YHVH:  ¡Volveos,  y  convertíos  de 

vuestros ídolos, y apartad el rostro de to-

das vuestras abominaciones!

7

 Porque cualquiera de la casa de Israel, y 

de los extranjeros que habitan en Israel, 

que se haya apartado de andar en pos de 

mí, y haya erigido ídolos en su corazón, y 

puesto delante de su rostro el tropiezo de 

su iniquidad, y venga al profeta a pregun-

tar por mí, Yo, YHVH, le responderé por 

mí mismo.

8

 Y pondré mi rostro contra tal hombre, 

y  haré  de  él  señal  y  proverbio  para  que 

sirva  de  escarmiento,  y  lo  cortaré  de  en 

medio de mi pueblo, y sabréis que Yo soy 

YHVH.

9

 Y  si  el  profeta  se  deja  seducir  y  habla 

cualquier  cosa,  será  porque°  Yo,  YHVH, 

hice  engañar  al  tal  profeta;  y  extenderé 

mi mano contra él, y lo destruiré de en 

medio de mi pueblo Israel.

10

 Y  sobrellevarán  su  iniquidad.  La  ini-

quidad del profeta será como la iniquidad 

del que consulta,

11

 para que la casa de Israel no se aparte 

más de mí, ni se contaminen más con sus 

transgresiones,  y  me  sean  por  pueblo,  y 

Yo les sea por Dios, dice Adonay YHVH.

Jerusalem no será librada

12

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

13

 Hijo de hombre, cuando una tierra pe-

que contra mí rebelándose pérfidamente, 

y  Yo  extienda  mi  mano  sobre  ella,  y  le 

quebrante el sustento del pan, y envíe en 

ella hambre, y corte de ella a hombres y 

bestias,

14

 si  en  ella  hubiera  estos  tres  varones: 

Noé, Dan’el° y Job, ellos, por su justicia, 

librarían  únicamente  sus  propias  almas, 

dice Adonay YHVH.

15

 Y si suelto bestias feroces por la tierra, 

y la asolan, y llega a quedar desolada de 

modo  que  no  haya  quien  pueda  pasar  a 

causa de las fieras,

16

 y estos tres varones estuvieran en me-

dio de ella, ¡vivo Yo! dice Adonay YHVH, 

no podrían librar ni a sus hijos ni a sus 

hijas;  sólo  ellos  serían  librados,  pero  la 

tierra quedaría desolada.

17

 O si Yo traigo la espada sobre aquella 

tierra, y digo: ¡Espada, pasa por la tierra!, 

y de ella hago cortar a hombres y bestias,

18

 y estos tres varones estuvieran en me-

dio de ella, ¡vivo Yo! dice Adonay YHVH, 

no podrían librar ni a sus hijos ni a sus 

hijas; sólo ellos serían librados.

19

 O si envío peste sobre esa tierra, y de-

rramo  mi  ira  sobre  ella  en  sangre,  para 

cortar de ella hombres y bestias,

20

 y  estuvieran  en  medio  de  ella  Noé, 

Dan’el° y Job ¡vivo Yo! dice Adonay YHVH, 

no podrían librar ni a su hijo ni a su hija; 

sólo ellos, por su justicia, podrían librar 

sus propias almas.

21

 Por lo cual así dice Adonay YHVH: ¿Cuán-

to más cuando Yo envíe contra Jerusalem 

mis  cuatro  juicios  terribles:  la  espada,  el 

14.5 Es decir, en el error de su mismo corazón.  14.9 .será porque.  14.14, 20 Dan’el. Personaje épico, distinto del profeta 

bíblico Daniel.


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Ezequiel 16:15

853

hambre, las bestias feroces y la peste, para 

cortar de ella a hombres y bestias?

22

 Pero  será  dejado  un  remanente  de 

hijos e hijas que salgan y vengan a voso-

tros; y entonces, al ver su conducta y sus 

malas° obras, entenderéis aliviados la ca-

lamidad que mandé sobre Jerusalem, de 

todo lo que mandé sobre ella.

23

 Sí  que  os  aliviarán.  Cuando  veáis  su 

conducta y sus malas obras, entenderéis 

que no sin razón hice lo que hice en ella, 

dice Adonay YHVH.

Parábola de la vid

15

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Hijo de hombre:

¿Qué es el leño de la vid más que 

cualquier otro leño de los árboles 

del bosque?

3

    ¿Sacan de él madera para cualquier 

labor?

¿Sacan acaso estacas para colgar 

vasijas?

4

    Si lo echan a la lumbre para cebarla,

Y el fuego le devora las puntas,

Y el centro queda chamuscado,

¿Servirá para algo?

5

    Si cuando estaba entero no servía 

para obra alguna,

¡Cuánto menos ahora, devorado por 

el fuego y chamuscado!

¿Servirá para algo?

6

    Por tanto, así dice Adonay YHVH:

Como el leño de la vid entre los 

árboles del bosque,

Que eché a la lumbre para cebarla,

Así echaré a los moradores de 

Jerusalem.

7

    Pondré mi rostro contra ellos:

¿Escaparon del fuego?,

¡Pues el fuego los consumirá!,

Y sabréis que Yo soy YHVH,

Cuando ponga mi rostro contra ellos.

8

    Convertiré su tierra en asolamiento,

Por cuanto cometieron infidelidad,

dice Adonay YHVH.

Prostitución de Jerusalem

16

Vino  a  mí  palabra  de  YHVH,  di-

ciendo:

2

 Hijo de hombre, denuncia a Jerusalem 

sus abominaciones, diciendo:

3

 Así dice Adonay YHVH: Jerusalem, eres 

cananea de origen y nacimiento; tu padre 

era amorreo y tu madre una hetea.

4

 En  cuanto  a  tu  nacimiento,  en  el  día 

que naciste, no fue cortado tu ombligo, ni 

fuiste lavada con agua, para purificarte, ni 

frotada con sal, ni envuelta en pañales.

5

 Nadie se apiadó de ti para hacerte esos 

menesteres, ni tuvo de ti compasión; sino 

que, asqueados de ti, te arrojaron a cam-

po abierto el día que naciste.

6

 Pero Yo pasé cerca de ti, y te vi, revol-

cándote en tu propia sangre, y mientras 

yacías  en  tu  sangre,  te  dije:  ¡Vive!  Sí, 

cuando  estabas  en  tus  sangres,  te  dije: 

¡Vive!

7

 Como planta del campo te hice y crecis-

te y te hiciste grande, y llegaste a ser muy 

hermosa. Tus pechos se habían formado, 

y tu pelo había crecido, pero estabas des-

nuda y descubierta.

8

 Otra vez pasé cerca de ti y te miré, y he 

aquí que tu tiempo era tiempo de amores, 

y  extendí  mi  manto  sobre  ti,  y  cubrí  tu 

desnudez,  y  te  di  juramento,  y  entré  en 

pacto  contigo,  dice  Adonay  YHVH,  y  vi-

niste a ser mía.

9

 Entonces te lavé con agua, te limpié la 

sangre de encima y te ungí con aceite.

10

 Luego  te  vestí  de  obra  recamada,  te 

calcé de becerro marino, te ceñí de lino 

fino y te cubrí de seda.

11

 También  te  engalané  con  adornos,  y 

puse brazaletes en tu brazo y gargantilla 

en tu cuello.

12

 Te puse un pendiente en tu nariz, zar-

cillos  en  tus  orejas,  y  una  diadema  her-

mosa sobre tu cabeza.

13

 Así fuiste adornada con oro y plata, tu 

vestido era de lino fino, de seda y de obra 

recamada; comiste flor de harina con miel 

y aceite; fuiste muy hermosa, y prosperas-

te hasta llegar a dignidad real.

14

 Tu renombre salió entre las naciones 

a causa de tu hermosura, la cual era per-

fecta, a causa de mis adornos que Yo puse 

sobre ti, dice Adonay YHVH.

15

 Pero  pusiste  tu  confianza  en  tu  her-

mosura,  y  te  prostituiste  a  causa  de  tu 

14.22 .malas


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Ezequiel 16:16

854

renombre, y derramaste tus fornicaciones 

a cualquiera que pasaba: del tal eras.

16

 Y tomaste de tus vestidos, y te hiciste 

lugares altos de diversos colores, y forni-

caste sobre ellos. ¡Cosa semejante nunca 

había sucedido, ni nunca más sucederá!

17

 Tomaste asimismo tus hermosas alha-

jas de oro y de plata, que Yo te había dado, 

y te hiciste estatuas de varones y fornicas-

te con ellas.

18

 Tomaste tus vestidos recamados y las 

cubriste  con  ellos,  y  pusiste  mi  aceite  y 

mi incienso delante de ellas.

19

 También mi pan, que Yo te había dado, 

la flor de harina, el aceite y la miel, con 

que Yo te alimentaba, los pusiste delante 

de ellas como olor grato. Sí, esto sucedió, 

dice Adonay YHVH.

20

 Además de esto, tomaste tus hijos y tus 

hijas que me habías dado a luz, y los sa-

crificaste ante ellas para que fueran con-

sumidos.  ¿Acaso  tus  fornicaciones  eran 

poca cosa,

21

 para  que  degollaras  a  mis  hijos  y  los 

ofrecieras a aquellas estatuas como ofren-

da que el fuego consumía?

22

 Y en todas tus abominaciones y tus for-

nicaciones no te has acordado de los días 

de tu juventud, cuando estabas desnuda y 

descubierta,  cuando  estabas  envuelta  en 

tu sangre.

23

 Y sucedió que después de todas tus mal-

dades ¡ay, ay de ti! dice Adonay YHVH,

24

 que te edificaste lugares altos, y te hi-

ciste un altar en cada plaza.

25

 Erigías  tus  lugares  altos  en  cada  en-

crucijada, y así envileciste tu hermosura, 

abriéndote de piernas al primero que pa-

saba, prostituyéndote continuamente.

26

 Fornicaste  con  los  egipcios,  tus  veci-

nos  de  gruesas  carnes,°  y  multiplicaste 

tus fornicaciones para irritarme.

27

 Por tanto, he aquí que Yo extendí con-

tra ti mi mano, y disminuí tu dote, y te 

entregué a la voluntad de quienes te abo-

rrecen, las hijas de los filisteos, las cuales 

se avergüenzan de tu lascivia.

28

 También,  por  ser  insaciable,  hiciste 

el papel de prostituta con los asirios. Sí, 

fornicaste con ellos, pero ni aun así te sa-

ciaste.

29

 Multiplicaste  tus  fornicaciones  desde 

la tierra de Canaán hasta Caldea, pero ni 

aun así te saciaste.

30

 ¡Oh  cuán  inconstante  es  tu  corazón, 

dice  Adonay  YHVH,  habiendo  hecho  to-

das estas cosas, fechorías de una ramera 

disoluta,

31

 edificando tu burdel en cada encruci-

jada de camino, y haciendo tus altares en 

cada plaza! Ni siquiera has sido igual a la 

ramera, pues no cobrabas la paga de pros-

titución.°

32

 ¡Ah, mujer adúltera, que en vez de su 

marido admite a los extraños!

33

 A  toda  ramera  se  le  paga  un  precio, 

pero  tú  pagabas  tu  precio  a  todos  tus 

amantes, y les dabas regalos, para que de 

todos lados vinieran a pecar contigo.

34

 Y  en  tus  fornicaciones,  ha  sucedido 

contigo lo contrario de las demás muje-

res: porque ninguno te solicitó para for-

nicar,  pero  tú,  diste  la  paga  en  lugar  de 

recibirla. ¡En esto has sido diferente!

35

 Por  tanto,  oh  prostituta,  oye  palabra 

de YHVH:

36

 Así dice Adonay YHVH: Por haber sido 

derramada  tu  inmundicia  y  descubierta 

tu  desnudez,  por  tus  fornicaciones  con 

tus amantes, y por todos los ídolos de tus 

abominaciones,  por  cuanto  les  ofreciste 

la sangre de tus propios hijos,

37

 he aquí voy a reunir a todos tus aman-

tes con quienes te has gozado, tanto a los 

que  amabas  como  a  los  que  aborrecías. 

Los reuniré contra ti desde todas partes 

y descubriré tu desnudez ante ellos, para 

que observen todas tus vergüenzas.

38

 Te  aplicaré  la  pena  de  las  adúlteras  y 

de las homicidas, y descargaré sobre ti la 

sangre de la ira y de los celos.

39

 Te entregaré en manos de ellos, y des-

truirán  tus  lugares  altos;  derribarán  tus 

altares,  y  te  despojarán  de  tus  ropas,  se 

llevarán tus hermosas alhajas, y te deja-

rán desnuda y descubierta.

40

 Traerán  contra  ti  una  muchedumbre 

de gente, y te apedrearán, y te descuarti-

zarán a cuchilladas.

41

 °Quemarán  tus  casas  a  fuego,  y  eje-

cutarán  en  ti  la  sentencia  a  vista  de 

muchas  mujeres.  Haré  que  ceses  en  la 

16.26 Se refiere al miembro viril.  16.31 .de prostitución.  16.41 Se sugiere leer a continuación el v.43 

→§163.


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Ezequiel 17:2

855

prostitución, y tampoco volverás a dar sa-

lario de ramera.

42

 °Saciaré mi ira sobre ti; entonces mis 

celos se apartarán de ti, y me aplacaré, y 

no me indignaré más.

43

 °Por cuanto no te acordaste de los días 

de tu juventud, y me provocaste a ira con 

todas estas cosas, por eso, he aquí Yo tam-

bién traeré tu conducta° sobre tu cabeza, 

dice  Adonay  YHVH,  porque  ni  siquiera 

has meditado acerca de toda tu lujuria.

Las dos hermanas

44

 He aquí, todo refranero te aplicará a ti 

el  refrán  que  dice:  ¡Cual  la  madre,  tal  la 

hija!

45

 Hija  eres  de  tu  madre,  que  aborreció 

a su marido y a sus hijos, y hermana eres 

de tus hermanas, que aborrecieron a sus 

maridos y a sus hijos: vuestra madre fue 

hetea, y vuestro padre amorreo.

46

 Tu  hermana  mayor  es  Samaria  con 

sus villas, que mora a tu izquierda, y tu 

hermana menor que mora a tu diestra es 

Sodoma y sus villas.

47

 No sólo seguiste sus caminos e imitas-

te sus abominaciones, sino que te pareció 

poco y las aventajaste en malos caminos.

48

 ¡Vivo  Yo!,  dice  Adonay  YHVH,  que  tu 

hermana Sodoma y sus hijas no han he-

cho lo que hiciste tú y tus hijas.

49

 Mira,  este  fue  el  delito  de  tu  hermana 

Sodoma:  soberbia,  hartura  de  pan,  y  gran 

ociosidad tuvieron ella y sus hijas, pero no 

extendió la mano al pobre y al menesteroso.

50

 Se  ensoberbecieron  delante  de  mí,  y 

cometieron abominaciones, por lo que las 

quité de en medio en cuanto lo vi.

51

 Pero Samaria no cometió ni la mitad 

de tus pecados, sino que tú multiplicaste 

tus  abominaciones  más  que  ellas,  y  así, 

con  todas  las  abominaciones  que  come-

tiste, has hecho parecer° justas a tus her-

manas.

52

 Pues  carga,  tú  también,  con  tu  ver-

güenza, porque con tus pecados, lograste 

que el juicio fuera favorable a tus herma-

nas, porque te envileciste más que ellas, 

¡y  ellas  resultaron  más  justas  que  tú! 

Avergüénzate  pues  tú  también,  y  carga 

con tu afrenta, porque has hecho que tus 

hermanas parezcan justas.

Restauración

53

 Pero Yo cambiaré su suerte, la suerte 

de Sodoma y de sus hijas, la suerte de Sa-

maria y de sus hijas, y junto con ellas, tu 

propia suerte,

54

 para que cargues con tu afrenta, y te 

avergüences de todo lo que has hecho, y 

les sirvas a ellas de consuelo.

55

 Y  tus  hermanas,  Sodoma  con  sus  hi-

jas y Samaria con sus hijas, volverán a su 

estado antiguo, y también tú y tus hijas 

volveréis al primer estado.

56

 ¿No era tu hermana Sodoma digna de 

mención en tu boca, en el tiempo de tu 

gran soberbia,

57

 antes que tu maldad fuera descubierta? 

Así también, ahora llevas tú la afrenta de las 

hijas de Siria y de todas las hijas de los filis-

teos, las cuales te desprecian por doquier.

58

 Sufre  tú  el  castigo  de  tu  lujuria  y  de 

tus abominaciones, dice YHVH.

59

 Pero  aún  más  dice  Adonay  YHVH: 

¿Haré contigo como tú hiciste conmigo, 

que menospreciaste el juramento para in-

validar el pacto?

60

 Antes bien, Yo tendré memoria de mi 

pacto  que  concerté  contigo  en  los  días 

de tu juventud, y estableceré contigo un 

pacto sempiterno.

61

 Entonces tú te acordarás de tu camino 

y  te  avergonzarás,  cuando  recibas  a  tus 

hermanas, las mayores que tú y las me-

nores que tú, a quienes Yo te las daré por 

hijas, pero no por causa de tu pacto,

62

 sino del pacto que Yo estableceré con-

tigo, y sabrás que Yo soy YHVH,

63

 para que te acuerdes y te sonrojes, y no 

vuelvas más a abrir tu boca de vergüenza, 

cuando Yo te haya perdonado todo lo que 

hiciste, dice Adonay YHVH.

Las dos águilas

17

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Hijo de hombre, propón un enigma 

y narra una parábola a la casa de 

Israel, diciendo:

16.42 Se sugiere leer este v. después del v.43 

→§163.  16.43 Se sugiere leer a continuación del v.41 →§163.  16.43 Lit. 

camino

16.51 .parecer.


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Ezequiel 17:3

856

3

    Así dice Adonay YHVH:

Una gran águila, de grandes alas,

Largas plumas remeras, espeso 

plumaje,

Y muchos colores, voló al Líbano;

Tomó el cogollo del cedro,

4

    Arrancó el mejor de sus renuevos,

Y lo llevó a una tierra de mercaderes,

Plantándolo en una ciudad de 

comerciantes.

5

    Luego tomó de la semilla de esa 

tierra,

La echó en terreno sembradío,

Y como se planta un sauce la plantó 

junto a aguas abundantes,

6

    Para que germinara y se hiciera 

una vid de mucho ramaje, 

achaparrada,

Para que sus sarmientos se 

orientaran hacia el águila,

Y sus raíces estuvieran debajo de 

ella.

Así se convirtió en una vid,

Y arrojó sarmientos y echó mugrones.

7

    Pero vino otra gran águila,

Con grandes alas y espeso plumaje,

Y entonces nuestra vid,

Sesgó sus raíces hacia ella,

Y extendió sus sarmientos hacia ella

Por los surcos de su plantío,

Y deseó ser regada por ella,

8

    Aunque estaba plantada en buen 

terreno,

Y junto a aguas abundantes,

Y así echar ramas y dar frutos,

Y hacerse una vid espléndida.

9

    Diles: Así dice Adonay YHVH: ¿Lo 

logrará?

¿O arrancará° sus raíces,

Para que se malogre su fruto,

Y se marchiten sus renuevos?

Pues no hará falta gran poder ni 

mucha gente para desceparla.

10

    Mirad, ya está plantada, ¿lo logrará?

O, ¿se secará cuando la azote el 

solano?

¿Se agostará en los surcos donde 

germinó?°

11

    Vino a mí palabra de YHVH, 

diciendo:

12

    Di ahora a la casa rebelde:

¿No sabéis qué significa esto?

Diles: El rey de Babilonia vino a 

Jerusalem,

Y apresando a su rey y a sus 

príncipes,

Los llevó consigo a Babilonia.

13

    Tomando a uno del linaje real,

Hizo con él un pacto, y lo 

juramentó,

Y se llevó a los poderosos de la 

tierra,

14

    A fin de que el reino fuera abatido,

Y no se ensoberbeciera,

Y observara fielmente el pacto.

15

    Pero se rebeló contra él,

Y envió embajadores a Egipto,

Pidiendo caballos y mucha gente.

¿Lo logrará?

¿Se salvará quien ha hecho tales 

cosas?

El que violó el pacto, ¿escapará?

16

    ¡Vivo Yo! dice Adonay YHVH, que en 

el territorio del rey que lo hizo 

rey,

Cuyo juramento menospreció, y 

cuyo pacto con él rompió,

En medio de Babilonia morirá.

17

    Faraón no lo salvará en la guerra ni 

con gran ejército ni con mucha 

tropa,

Cuando levanten murallas de asedio 

y construyan torres para matar a 

tanta gente.

18

    Ha despreciado el juramento y 

violado el pacto.

Dio la mano, y después hizo esto. No 

se librará.

19

    Por tanto, así dice Adonay YHVH:

¡Vivo Yo, que mi juramento que 

despreció,

Y mi pacto que quebrantó,

Los revertiré sobre su cabeza!

20

    Extenderé sobre él mi red,

Y será prendido en mi lazo,

Y lo haré venir a Babilonia,

Y allí entraré en juicio con él por su 

infidelidad contra mí.

21

    Los escogidos de todas sus tropas,

Serán pasados a cuchillo,

17.9 Esto es, el águila primera.  17.10 Bajo el enigma de las dos águilas, los vv. 2-10 dan una profecía referente al rey de 

Babilonia viniendo a Jerusalem y llevándose en cautividad a los judíos.


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Ezequiel 18:21

857

Y los que queden serán esparcidos a 

todos los vientos,

Y sabréis que Yo, YHVH, he hablado.

22

    Así dice Adonay YHVH:

Yo también tomaré del cogollo de 

aquel cedro,

Y le sacaré un renuevo tierno,

Y Yo mismo lo plantaré sobre un 

monte alto y prominente.

23

    En el excelso monte de Israel lo 

plantaré,

Y alzará ramas, y dará fruto,

Y se hará un magnífico cedro,

Y debajo de él habitarán todas las 

aves, de todas las especies

Morarán a la sombra de sus ramas.

24

    Y todos los árboles del campo sabrán 

que Yo, YHVH,

Humillo el árbol elevado,

Y exalto el árbol humilde,

Seco el árbol verde,

Y hago reverdecer el árbol seco.

Yo, YHVH, lo predije y lo he cumplido.

El alma que pecare morirá

18

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 ¿Por  qué  andáis  repitiendo  ese  refrán 

de la tierra de Israel: Los padres comie-

ron las uvas agrias, y los hijos sufren la 

dentera?

3

 ¡Vivo Yo! dice Adonay YHVH, que nun-

ca más tendréis que repetir ese refrán en 

Israel.

4

 Sabedlo: todas las almas son mías. Como 

el alma del padre, así el alma del hijo es 

mía. El alma que pecare, ésa morirá.

5

 El hombre que es justo, que observa el 

derecho y la justicia;

6

 que no come en los montes,° ni levanta 

sus ojos a los ídolos de la casa de Israel, 

ni profana la mujer de su prójimo, ni se 

llega a la mujer menstruosa,

7

 que  no  explota  a  nadie,  y  al  deudor  le 

devuelve la prenda empeñada, y no come-

te robo, y da de su pan al hambriento, y 

cubre con su vestido al desnudo,

8

 que no presta con usura ni cobra inte-

reses, que retrae su mano de la iniquidad, 

y  juzga  imparcialmente  entre  hombre  y 

hombre,

9

 y camina en mis ordenanzas, y guarda 

mis  decretos  cumpliéndolos  fielmente, 

ése es justo, ése ciertamente vivirá, dice 

Adonay YHVH.

10

 Pero  si  engendra  un  hijo  criminal  y 

homicida, o que haga alguna de estas co-

sas,

11

 y que no haga las otras, sino que coma 

sobre los montes, o profane la mujer de 

su prójimo,

12

 que  oprima  al  pobre  y  menesteroso, 

cometa  robos,  no  devuelva  la  prenda,  o 

levante sus ojos a los ídolos cometiendo 

abominación,

13

 preste a interés y tome usura; ¿vivirá 

éste? No vivirá. Todas estas abominacio-

nes hizo, y de cierto morirá, y su sangre 

recaerá sobre él.

14

 Pero  si  éste  engendra  un  hijo,  que  a 

pesar de haber visto todos los pecados de 

su padre, viéndolos no los imita,

15

 y no come sobre los montes, ni levanta 

sus ojos a los ídolos de la casa de Israel, y 

a la mujer de su prójimo no profana,

16

 ni oprime a nadie, que la prenda no re-

tiene  ni  comete  robos;  que  comparte  su 

pan con el hambriento, y viste al desnudo;

17

 que aparta su mano de la iniquidad, e 

interés y usura no recibe; que guarda mis 

decretos  y  anda  en  mis  ordenanzas,  ése 

no morirá por la maldad de su padre; de 

cierto vivirá.

18

 En cuanto a su padre, por cuanto hizo 

agravio, despojó violentamente al herma-

no, e hizo en medio de su pueblo lo que 

no es bueno, he aquí que él morirá por su 

iniquidad.

19

 Y  si  decís:  ¿Por  qué  el  hijo  no  habrá 

de  llevar  el  pecado  de  su  padre?  Porque 

el hijo hizo según el derecho y la justicia, 

guardó todos mis estatutos y los cumplió, 

y ciertamente vivirá.

20

 El alma que pecare, ésa morirá. El hijo 

no llevará el pecado del padre, ni el padre 

llevará el pecado del hijo. La justicia del 

justo será sobre él, y la impiedad del im-

pío recaerá sobre él.

21

 Pero si el impío se aparta de todos sus 

pecados que hizo, y guarda todos mis es-

tatutos y hace según el derecho y la justi-

cia, ciertamente vivirá. No morirá.

18.6 Esto es, alimentos sacrificados a los demonios 

→1 Co.10.18-22. 


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Ezequiel 18:22

858

22

 Ninguna  de  las  transgresiones  come-

tidas  serán  recordadas  contra  él.  En  su 

justicia que hizo vivirá.

23

 ¿Quiero Yo la muerte del impío? dice 

Adonay YHVH. ¿No vivirá, si se aparta de 

sus caminos?

24

 Pero, si el justo se aparta de su justicia, 

y comete iniquidad, y hace conforme a to-

das las abominaciones que hace el impío, 

¿ha de vivir? Ninguna de las justicias que 

hizo le serán tenidas en cuenta. Por su re-

belión con que prevaricó, y por el pecado 

que cometió, por ello morirá.

25

 Y  si  decís:  ¡No  es  recto  el  camino  de 

Adonay! Oíd ahora, oh casa de Israel: ¿Es 

mi  camino  el  que  no  es  recto?  ¿No  son 

vuestros caminos los que son torcidos?

26

 Porque  por  apartarse  el  justo  de  su 

justicia y hacer iniquidad, muere por ello. 

Por su iniquidad que hizo morirá.

27

 Pero, apartándose el impío de su im-

piedad que hizo, y haciendo según el de-

recho y la justicia, hace que su alma viva.

28

 Reflexionó  y  se  apartó  de  todas  sus 

transgresiones  cometidas.  Ciertamente 

vivirá. No morirá.

29

 Y  si  aún  la  casa  de  Israel  dice:  No  es 

recto el camino de Adonay. Oh casa de Is-

rael, ¿no son rectos mis caminos? Cierta-

mente vuestros caminos son los torcidos.

30

 Por tanto, oh casa de Israel, Yo os juz-

garé a cada uno según sus caminos, dice 

Adonay YHVH. ¡Convertíos, y apartaos de 

todas vuestras transgresiones para que la 

iniquidad no os sea causa de ruina!

31

 ¡Echad  de  vosotros  todas  vuestras 

transgresiones con que habéis pecado, y 

haceos  un  corazón  nuevo  y  un  espíritu 

renovado! ¿Por qué habréis de morir, oh 

casa de Israel?

32

 Porque Yo no quiero la muerte del que 

muere,  dice  Adonay  YHVH.  Por  tanto, 

¡convertíos y viviréis!

Los príncipes de Israel

19

Y tú, entona un canto fúnebre por 

los príncipes de Israel. Diles:

2

    ¡Qué leona tu madre en medio de 

leones!

Tumbada entre los leoncillos 

amamantaba sus cachorros.

3

    Crió uno de sus cachorros que se 

hizo leoncillo,

Aprendió a desgarrar la presa,

Devoró hombres.

4

    Reclutaron gente contra él,

Lo atraparon en la fosa,

Y con grillos lo llevaron a la tierra de 

Egipto.

5

    Cuando tras mucha espera,

Ella vio desvanecida su esperanza,

Tomó otro de sus cachorros,

Y lo puso por leoncillo.

6

    Merodeaba entre los leones,

Y vino a ser león joven,

Aprendió él también a desgarrar la 

presa,

Y devorar hombres.

7

    Hizo estragos en palacios y arrasaba 

ciudades;

Quedó desolada la tierra y cuanto 

había en ella,

A causa del estruendo de sus rugidos.

8

    Arremetieron contra él las gentes,

Que se reunieron de todos lados,

Tendieron sus redes sobre él,

Y cayó atrapado en la fosa.

9

    En una jaula y con grilletes lo 

llevaron al rey de Babilonia y lo 

enjaularon,

Para que su rugido no fuera más 

oído en los montes de Israel.

La vid descepada

10

    Tu madre era como una vid, a tu 

semejanza,

Plantada junto a las aguas;

Era fecunda y llena de ramas a causa 

de las muchas aguas.

11

    Ella tuvo varas fuertes para cetros 

de soberanos,

Y elevóse su estatura entre las 

nubes;

Y era vista desde lejos por su 

altura y por la multitud de sus 

sarmientos.

12

    Pero fue arrancada con furia,

Y por tierra ha sido echada;

El solano secó su fruto;

Sus fuertes ramas fueron quebradas,

Se secaron, y las consumió el fuego.

13

    ¡Y ahora está plantada en el desierto,

En tierra calcinada y sedienta!

14

    Un vástago de sus mismas ramas 

produjo el fuego que consumió 

su fruto,


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Ezequiel 20:25

859

Y no queda en ella vara fuerte para 

cetros de soberanos.

Es una endecha, y de endecha 

servirá.

Las prevaricaciones de Israel

20

En el año séptimo, en el mes quin-

to, a los diez días del mes, aconte-

ció que algunos de los ancianos de Israel 

vinieron a consultar a YHVH, y se senta-

ron delante de mí.

2

 Y la palabra de YHVH vino a mí, diciendo:

3

 Hijo  de  hombre,  habla  a  los  ancianos 

de Israel, y diles: Así dice Adonay YHVH: 

¿Conque  venís  a  consultarme?  ¡Vivo  Yo, 

que no me dejaré consultar por vosotros! 

dice Adonay YHVH.

4

 ¡Júzgalos tú, hijo de hombre! ¡Júzgalos tú! 

Denuncia las abominaciones de sus padres,

5

 y diles: Así dice Adonay YHVH: El día que 

escogí a Israel y alcé mi mano al linaje de 

la casa de Jacob, cuando me manifesté a 

ellos en Egipto, les dije con mi mano en 

alto: Yo soy YHVH vuestro Dios.

6

 Aquel día les juré con la mano en alto 

sacarlos de Egipto y llevarlos a una tierra 

que Yo mismo les había escogido, que flu-

ye leche y miel, la más hermosa de todas 

las tierras,

7

 y les dije: Cada uno de vosotros arroje 

los  fetiches  que  os  encandilan,  y  no  os 

contaminéis con los ídolos de Egipto. Yo, 

YHVH vuestro Dios.

8

 Pero se rebelaron contra mí, y no qui-

sieron oír, y ninguno desechó los fetiches 

que lo encandilaban, ni se deshizo de los 

ídolos de Egipto. Entonces dije que derra-

maría mi ira sobre ellos, para desahogar 

mi indignación con ellos en medio de la 

tierra de Egipto.

9

 Pero  actué  por  respeto  a  mi  Nombre, 

para  que  no  fuera  profanado  a  vista  de 

los pueblos con los que vivían, ante cuyos 

ojos me había dado a conocer a ellos, sa-

cándolos de Egipto.

10

 Los saqué, pues, de Egipto, y los llevé 

al desierto.

11

 Les di mis estatutos y les hice conocer 

mis preceptos, los cuales dan vida al hom-

bre que los cumple.

12

 Les di también mis shabbatot como se-

ñal recíproca, para que se supiera que Yo, 

YHVH, soy el que los santifica.

13

 Pero la casa de Israel se rebeló contra 

mí  en  el  desierto.  No  anduvieron  según 

mis estatutos; desecharon mis preceptos, 

que dan vida al hombre que los cumple, 

y profanaron gravemente mis shabbatot. 

Entonces dije que derramaría sobre ellos 

mi ira en el desierto hasta exterminarlos.

14

 Pero actué por respeto a mi Nombre, 

para  que  no  se  profanara  a  vista  de  los 

pueblos ante cuyos ojos los había sacado.

15

 Pero les alcé mi mano en el desierto, ju-

rando que no los traería a la tierra que les 

había dado, que fluye leche y miel, la cual 

es la más hermosa de todas las tierras.

16

 Porque  desecharon  mis  decretos,  no 

anduvieron  en  mis  estatutos,  y  profana-

ron mis shabbatot, pues su corazón anda-

ba en pos de sus ídolos.

17

 Con todo, mi ojo los perdonó, pues no 

los aniquilé ni acabé con ellos en el de-

sierto.

18

 Sino que en el desierto dije a sus hi-

jos: No andéis en los estatutos de vuestros 

padres, ni guardéis sus costumbres, ni os 

contaminéis con sus ídolos.

19

 Yo soy YHVH vuestro Dios. Andad en 

mis  estatutos,  guardad  mis  preceptos,  y 

ponedlos por obra.

20

 Santificad  mis  shabbatot,  para  que 

sean señal recíproca, para que se sepa que 

Yo soy YHVH vuestro Dios.

21

 Pero  también  los  hijos  se  rebelaron 

contra  mí.  No  anduvieron  en  mis  esta-

tutos,  ni  guardaron  ni  cumplieron  mis 

decretos,  que  dan  vida  al  hombre  que 

los cumple, y profanaron mis shabbatot. 

Entonces  dije  que  derramaría  mi  indig-

nación sobre ellos, para desahogar mi ira 

en ellos en el desierto.

22

 Pero  retraje  mi  mano  a  causa  de  mi 

Nombre,  para  que  no  fuera  profanado  a 

vista de las naciones ante cuyos ojos los 

había sacado.

23

 Y les alcé mi mano en el desierto, ju-

rando que los esparciría entre las nacio-

nes, y que los dispersaría por las tierras,

24

 porque no pusieron por obra mis de-

cretos,  sino  que  desecharon  mis  estatu-

tos y profanaron mis shabbatot, pues sus 

ojos  se  les  fueron  tras  los  ídolos  de  sus 

padres.

25

 ¿Les  di  acaso  estatutos  no  buenos,  y 

preceptos que no les darían la vida?


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Ezequiel 20:26

860

26

 ¿Los contaminé en sus ofrendas cuan-

do  hacían  pasar  por  el  fuego  a  sus  pri-

mogénitos? ¿Los horroricé para hacerles 

saber que Yo soy YHVH?

27

 Por tanto, hijo de hombre, habla a la 

casa  de  Israel,  y  diles:  Así  dice  Adonay 

YHVH:  Vuestros  padres  además  me  des-

honraron cometiendo esta traición:

28

 Cuando  los  introduje  en  la  tierra 

que  con  la  mano  en  alto  había  jurado 

darles, miraron todo collado alto y todo 

árbol  frondoso,  y  allí  sacrificaron  sus 

víctimas, y allí presentaron su irritante 

ofrenda, y allí quemaron también su in-

cienso aplacador, y allí derramaron sus 

libaciones.

29

 Y les pregunté: ¿Qué hay en ese lugar 

alto que frecuentáis? Y su nombre fue lla-

mado el Alto hasta hoy.

30

 Di pues a la casa de Israel: Así dice Ado-

nay YHVH: Vosotros os contamináis igual 

que vuestros padres, y seguís fornicando 

con sus fetiches detestables.

31

 Y presentáis vuestras ofrendas hacien-

do pasar a vuestros hijos por el fuego, y 

hasta  hoy  os  seguís  contaminando  con 

todos vuestros ídolos, ¿y he de ser Yo con-

sultado  por  vosotros,  oh  casa  de  Israel? 

¡Vivo Yo, dice Adonay YHVH, que no me 

dejaré consultar!

32

 Pero  tampoco  se  realizarán  los  pla-

nes  que  estáis  pensando,  cuando  decís: 

Seamos  como  otras  naciones,  como  las 

demás familias de la tierra, que sirven al 

palo y a la piedra.

Juicio futuro sobre Israel

33

 ¡Vivo Yo!, dice Adonay YHVH, que con 

mano poderosa, brazo extendido e ira in-

contenible, reinaré sobre vosotros.

34

 Porque con mano poderosa, brazo ex-

tendido  e  ira  incontenible,  os  sacaré  de 

entre los pueblos y os reuniré de entre las 

naciones en las que estáis esparcidos,

35

 y os llevaré al desierto de los pueblos, 

para allí litigar con vosotros cara a cara.

36

 Como litigué con vuestros padres en el 

desierto de Egipto, así litigaré con voso-

tros, dice Adonay YHVH.

37

 Os  haré  pasar  bajo  el  cayado,  y  uno 

a uno os haré entrar en los vínculos del 

pacto.

38

 Y apartaré de entre vosotros a los re-

beldes, a quienes se rebelaron contra mí, 

y los sacaré de la tierra de su peregrina-

ción,  pero  no  entrarán  a  la  tierra  de  Is-

rael, y sabréis que Yo soy YHVH.

39

 A vosotros, casa de Israel, esto os dice 

Adonay YHVH: Si a mí no me escucháis, 

¡vaya cada uno tras sus ídolos y sírvalos!, 

pero no profanéis más mi santo Nombre 

con vuestras ofrendas y con vuestros ído-

los.

40

 Porque en mi santo monte, en el mon-

te  excelso  de  Israel,  dice  Adonay  YHVH, 

allí en la tierra, me servirá la casa de Is-

rael  toda  entera.  Allí  os  aceptaré,  y  allí 

demandaré  vuestras  ofrendas  alzadas,  y 

las  primicias  de  vuestros  dones,  y  todas 

vuestras cosas consagradas.

41

 Y cuando os haya sacado de entre los 

pueblos y congregado de entre las nacio-

nes en que estáis esparcidos, os aceptaré 

como  aroma  que  aplaca,  y  mi  santidad 

será reflejada en vosotros ante los ojos de 

las naciones.

42

 Y sabréis que Yo soy YHVH, cuando os 

haya traído a la tierra de Israel; tierra por 

la cual alcé mi mano jurando que la daría 

a vuestros padres.

43

 Y allí os acordaréis de vuestros cami-

nos,  y  de  todos  vuestros  hechos  en  que 

os contaminasteis, y os aborreceréis a vo-

sotros mismos a causa de todos vuestros 

pecados que cometisteis.

44

 Y sabréis que Yo soy YHVH, cuando os 

trate  como  exige  mi  Nombre,  no  según 

vuestros malos caminos ni vuestras obras 

perversas, oh casa de Israel, dice Adonay 

YHVH.

45

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

46

 Hijo  de  hombre,  pon  tu  rostro  hacia 

Teman, derrama tu palabra hacia el me-

diodía, profetiza contra el bosque del Né-

guev,

47

 y di al bosque del Néguev: ¡Oye la pa-

labra de YHVH! Así dice Adonay YHVH: 

He  aquí  Yo  enciendo  un  fuego  en  ti,  el 

cual consumirá todos tus árboles verdes 

y tus árboles secos. La llama del incen-

dio no se apagará, y serán quemados en 

ella todos los rostros, desde el sur hasta 

el norte.

48

 Y todo mortal verá que Yo, YHVH, lo 

encendí. No se apagará.

49

 Entonces dije: ¡Ah, Señor YHVH! ellos 

dicen  de  mí:  ¿No  profiere  éste  sino  pa-

rábolas?


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Ezequiel 21:24

861

El gemido de la espada

21

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Hijo de hombre, pon tu rostro hacia Je-

rusalem, y deja caer tu palabra contra los 

Santuarios, y profetiza contra la tierra de 

Israel,

3

 y di a la tierra de Israel: Así dice YHVH: 

He aquí Yo estoy contra ti; sacaré mi es-

pada de su vaina, y cortaré de ti a inocen-

tes y a culpables.

4

 Mi espada saldrá de su vaina contra toda 

carne, del sur al norte, y cortaré de ti al 

inocente y al culpable.

5

 Y  toda  carne  sabrá  que  Yo,  YHVH,  he 

sacado  mi  espada  de  su  vaina,  y  que  no 

volverá más a ella.

6

 Y  tú,  hijo  de  hombre,  gime  con  que-

branto de riñones, gime amargamente a 

vista de ellos;

7

 y cuando te pregunten: ¿Por qué gimes? 

dirás: A causa de una noticia, porque vie-

ne,  y  hará  que  todo  corazón  desfallezca 

y toda mano se debilite. Todo espíritu se 

angustiará y toda rodilla se aflojará como 

el agua. He aquí viene, y será cumplido, 

dice Adonay YHVH.

Cántico de la espada

8

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

9

    Hijo de hombre, profetiza, y di: Así 

dice Adonay YHVH; di:

¡Espada, espada afilada y bruñida!°

10

    Para degollar ha sido afilada, para 

centellar ha sido bruñida.

¿Nos regocijaremos?

Al cetro de mi hijo lo desprecia° 

como a cualquier vara…°

11

    La dio a bruñir para tenerla a mano:

¡Afilada y bruñida está la espada para 

ponerla en mano del degollador!

12

    ¡Clama y lamenta, hijo de hombre, 

porque es sobre mi pueblo,

Es sobre todos los príncipes de Israel.

Ellos son entregados a la espada 

juntamente con mi pueblo.

¡Golpea pues tu muslo!°

13

    Ciertamente la prueba está hecha,

¿Y qué? Si aún despecia° al cetro, no 

subsistirá, dice Adonay YHVH.

14

    Hijo de hombre, profetiza y bate 

palmas:

¡Duplíquese y triplíquese el furor° 

de la espada homicida!

¡Espada para los que serán degollados!

¡Espada de gran mortandad que los 

tiene acorralados!

15

    Para que desfallezca el corazón y se 

multipliquen las víctimas,

En todas sus puertas he colocado el 

estrago de la espada.

¡Ay!, dispuesta está para centellear,

Afilada, para que degüelle.

16

    ¡Oh, adonde quiera te vuelvas,

Da estocadas a diestra y tajos a 

siniestra!

17

    Yo también batiré mis palmas,

Y desahogaré mi ira.

Yo, YHVH, he hablado.

Las dos rutas

18

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

19

 Tú,  hijo  de  hombre,  traza  dos  rutas 

para  la  espada  del  rey  de  Babilonia.  Las 

dos saldrán del mismo país. Pon una se-

ñal para el arranque de cada ruta, que in-

dique a la espada la ciudad adonde va.

20

 Señala la ruta para que la espada venga 

a Rabá de los hijos de Amón, y otra a Judá, 

contra Jerusalem, la fortificada.

21

 Por cuanto el rey de Babilonia ha he-

cho alto en una encrucijada, al principio 

de los dos caminos, y allí usa la adivina-

ción:  sacude  las  flechas,  consulta  a  sus 

ídolos, observa el hígado;

22

 ya tiene la suerte en su diestra: ¡A Jeru-

salem! ¡Al ataque; a vocear para el degüe-

llo  y  a  gritar  para  la  guerra;  a  emplazar 

arietes  contra  las  puertas;  a  levantar  te-

rraplenes y hacer torres de asalto!

23

 Pero  a  ellos°  les  pareció  falsa  la  adi-

vinación,  porque  les  habían  jurado  ser 

vasallos; pero él los acusará, y serán atra-

pados.

24

 Por tanto, así dice Adonay YHVH: Por-

que  os  denuncian  vuestras  culpas,  y  se 

21.9 Se refiere a Babilonia la espada afilada de YHVH, levantada para castigo de Israel.  21.10 Prob. se trate de la espada

21.10 Pasaje de difícil traducción por causa del texto original.  21.12 Gesto de temor en los hombres, así como el golpearse el 

pecho lo era en las mujeres. 

21.13 Prob. esto sea  la espada 

→v.10. El texto es oscuro.  21.14 .furor.  21.23 Esto es, para 

los moradores de Jerusalem


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Ezequiel 21:25

862

descubren vuestras rebeliones, y en todos 

vuestros hechos se hacen patentes vues-

tros pecados, y porque estáis procesados, 

seréis entregados en su mano.

25

 Y tú, ¡oh profano e impío príncipe de 

Israel!,  cuyo  día  ha  llegado,  la  hora  del 

castigo final,

26

 así  dice  Adonay  YHVH:  ¡Quítese  la 

mitra  y  depóngase  la  corona!  ¡No  sea 

más así! ¡Exáltese lo bajo y humíllese lo 

alto!

27

 ¡A  ruina,  a  ruina,  todo  lo  reduzco  a 

ruina!  Y  no  existirá  más  hasta  que  ven-

ga aquél a quien corresponde el juicio, a 

quien lo entregaré.

28

 Y tú, hijo de hombre, profetiza y di:

Así dice Adonay YHVH contra los 

hijos de Amón y contra sus 

ultrajes. Diles:

¡Espada, espada!

¡Desenvainada estás para la matanza,

Bruñida, para centellear en el 

degüello!

29

    De ti, en visiones falsas, adivinan 

mentiras.

¡Aplíquente al cuello de los inicuos 

sentenciados a muerte,

Cuyo día ha llegado en el tiempo del 

castigo final!°

30

    ¿La volveré a su vaina?

En el mismo lugar donde fuiste 

forjada,

En tu tierra natal, allí te juzgaré.

31

    Derramaré mi ira sobre ti,

Y soplaré contra ti con el fuego de 

mi indignación, y te entregaré en 

mano de hombres temerarios,

Artesanos de la destrucción.

32

    Serás pasto del fuego,

Y tu sangre empapará tu propia 

tierra,

Y no habrá más memoria de ti, 

porque Yo, YHVH, he hablado.

Los pecados de Israel

22

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Y tú, hijo de hombre, ¿no querrás juz-

gar tú, juzgar tú mismo a la ciudad san-

guinaria?  ¡Denuncia  entonces  todas  sus 

abominaciones!

3

 Dile, pues: Así dice Adonay YHVH: ¡Oh 

ciudad que marcha a su fin derramando 

sangre dentro de sí, y que se ha contami-

nado fabricándose ídolos!

4

 Por la sangre que derramaste has peca-

do, y con los ídolos que te has hecho te 

has contaminado; has precipitado tu hora, 

y se avecina el fin de tu existencia. Por eso 

te convierto en escarnio de los pueblos y 

en burla de todas las naciones.

5

 Las que están cerca y las que están lejos 

se burlarán de ti, famosa por tu impureza, 

y llena de confusión.

6

 Mira, los príncipes de Israel, cada uno 

en  su  poder,  derraman  en  ti  sangre  a 

porfía.

7

 En ti despojan al padre y a la madre, en 

ti atropellan al extranjero, en ti explotan 

al huérfano y a la viuda.

8

 Menosprecias mis Santuarios y profanas 

mis shabbatot.

9

 En ti hay hombres que calumnian para 

derramar sangre, en ti van a comer a los 

lugares altos, y en ti se cometen perver-

sidades.

10

 En ti se descubre la desnudez del pa-

dre,° y en ti hay quien violenta a la mujer 

durante su menstruo.

11

 En ti cada uno cometió abominación 

con la mujer de su prójimo, y cada uno 

mancilló a su nuera, y cada uno violó a su 

hermana, hija de su padre.

12

 En  ti  se  admite  el  soborno  para  de-

rramar sangre. Prestas a usura, te lucras 

con ganancias mal habidas, defraudas con 

violencia a tu prójimo, y a mí me tienes 

olvidado, dice Adonay YHVH.

13

 Pero mira, Yo bato palmas por el lucro 

injusto que haces, y por la sangre derra-

mada dentro de ti.

14

 ¿Estará firme tu corazón o serán fuer-

tes tus manos en el día de pasar cuenta? 

Yo, YHVH, he hablado, y lo haré.

15

 Te dispersaré entre los pueblos y te es-

parciré entre las naciones, y haré que tu 

inmundicia fenezca.

16

 Por ti misma serás degradada a vista de 

las naciones, y sabrás que Yo soy YHVH.

17

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

18

 Hijo  de  hombre,  la  casa  de  Israel  se 

me  ha  convertido  en  escoria.  En  medio 

21.29 Lit. de la consumación de la maldad.  22.10 Esto es, tener relaciones sexuales con la madrastra


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Ezequiel 23:10

863

del  crisol  todos  ellos  se  han  convertido 

en bronce, estaño, hierro y plomo: ¡plata 

falseada!

19

 Por tanto, así dice Adonay YHVH: Por 

cuanto todos os habéis convertido en es-

coria, por tanto, he aquí que Yo os reuni-

ré en medio de Jerusalem.

20

 Y como reúnen la plata y el bronce, y 

el hierro y el plomo y el estaño en medio 

del  horno,  y  soplan  fuego  sobre  él  para 

fundirlos, así os reuniré en mi ira y en mi 

indignación, y soplaré,° y os fundiré.

21

 Sí, os juntaré y soplaré sobre vosotros 

con el fuego de mi ira, y seréis derretidos 

en medio de él.

22

 Como la plata se funde en el crisol, así 

seréis fundidos en medio de él, y sabréis 

que Yo, YHVH, he derramado mi ira sobre 

vosotros.

23

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

24

 Hijo de hombre, di a ella: Eres tierra 

no limpiada ni llovida en el día de mi fu-

ror.

25

 Hay  conjura  de  sus  profetas  dentro 

de ella, como león rugiente que arrebata 

presa.  Devoraron  almas,  arrebataron  ri-

quezas y cosas preciosas, y multiplicaron 

dentro de ella el número de sus viudas.

26

 Sus  sacerdotes  hacen  violencia  a  mi 

Ley  y  contaminaron  mis  cosas  santas. 

No  hicieron  diferencia  entre  lo  santo  y 

lo profano, y no enseñaron la diferencia 

entre lo puro y lo impuro, ocultando sus 

ojos de mis shabbatot, y así Yo llegué a ser 

profanado en medio de ellos.

27

 Sus  príncipes  en  medio  de  ella  son 

como lobos que arrebatan la presa, derra-

mando sangre y destruyendo almas, a fin 

de obtener ganancias deshonestas.

28

 Sus profetas revocaban con lodo suel-

to, profetizándoles vanidad y adivinándo-

les mentira. Les decían: Así dice Adonay 

YHVH, cuando YHVH no había hablado.

29

 El pueblo de la tierra° ha oprimido, ha 

robado, ha hecho violencia al pobre y al 

necesitado y ha extorsionado al extranje-

ro.

30

 Busqué entre ellos un hombre que le-

vantara un vallado y que se pusiera en la 

brecha delante de mí, a favor de la tierra, 

para que Yo no la destruyera, pero no lo 

hallé.

31

 Por tanto, derramé sobre ellos mi ira. 

Los he consumido con el ardor de mi ira. 

He  hecho  recaer  sus  caminos  sobre  su 

propia cabeza, dice Adonay YHVH.

Parábola de las hermanas

23

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Hijo de hombre, hubo dos mujeres, 

hijas de la misma madre,

3

    Y se prostituyeron en Egipto:

En su juventud fornicaron.

Allí se dejaron apretujar los pechos,

Allí acariciaron sus pezones 

virginales.

4

    Ahola° se llamaba la mayor y

Aholiba° era su hermana.

Después llegaron a ser mías, y 

dieron a luz hijos e hijas.

Por lo que hace a sus nombres:

Samaria es Ahola y Jerusalem 

Aholiba.

5

    Ahola, siendo mía, se prostituyó 

enamorándose de sus amantes, 

los asirios,

6

    Guerreros vestidos de púrpura, 

gobernadores y sátrapas,

Mancebos codiciables todos ellos, 

jinetes que montaban corceles.

7

    A ellos les brindó sus prostituciones,

Los más escogidos hijos de Asiria,

Mancillándose con todos los ídolos 

de quienes se había enamorado.

8

    Pero no dejó de fornicar con los 

egipcios,

Que en su juventud se habían 

acostado con ella

Acariciando sus pezones virginales y 

vertiendo en ella su lujuria.

9

    Por lo cual la entregué en mano de 

sus amantes,

En mano de los hijos de Asiria, de 

quienes se había enamorado.

10

    Ellos desnudaron sus vergüenzas,

Le arrebataron sus hijos e hijas,

Y a ella la mataron a espada,

22.20 Aunque el TM registra dejar, se sigue la opinión de Bullinger en el sentido de que, en el trasvase a caracteres arameos, 

una de las letras del texto original sufrió un cambio involuntario que cambió soplar por dejar, rompiendo así el paralelismo y 

obligándose a incluir una falsa elipsis (allí). 

22.29 Esto es, Israel.  23.4 Esto es, su propio tabernáculo.  23.4 Esto es, mi taber-

náculo en ella


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Ezequiel 23:11

864

Y fue famosa entre las mujeres,

Por la sentencia en ella ejecutada.

11

    Aholiba, su hermana, que lo vio, 

enloqueció de lujuria más que 

ella,

Y fornicó más que su hermana.

12

    Se enamoró de los hijos de Asiria, 

gobernadores y sátrapas,

Guerreros vestidos espléndidamente,

Jinetes que montaban a caballo,

Todos ellos mancebos codiciables.

13

    Y observé cómo se contaminaba:

Las dos iban por el mismo camino.

14

    Y aumentó sus fornicaciones:

Vio grabados de varones en las 

paredes,

Imágenes de caldeos pintadas en 

bermellón,

15

    Ceñidos los lomos con talabartes y 

tiaras de colores en sus cabezas,

Todos con aspecto de capitanes,

Retrato fiel de los babilonios, 

naturales de Caldea.

16

    Se enamoró de ellos a primera vista,

Y les envió mensajeros a Caldea.

17

    Se llegaron a ella los babilonios en 

su lecho de amores,

La contaminaron con sus 

fornicaciones,

Pero una vez amancillada,

Su alma se desaficionó de ellos.

18

    Así hizo patentes sus fornicaciones y 

descubrió su desnudez,

Por lo cual Yo también me 

desaficioné de ella,

Como ya mi alma se había 

desaficionado de su hermana.

19

    Pero ella multiplicó sus 

fornicaciones,

Trajo en memoria los días de su 

juventud,

En los cuales había fornicado en 

Egipto.

20

    Ardió en deseo por sus amantes,

Que tienen falo de burros y eyaculan 

como caballos.°

21

    Así repetiste la execrable lascivia de 

tu juventud,

Cuando los egipcios acariciaban tus 

pezones,

Y apretujaban tus pechos de doncella.

22

 Por  tanto,  Aholiba,  así  dice  Adonay 

YHVH: He aquí que Yo excito a tus aman-

tes contra ti, de los que te desaficionaste, 

y los traigo contra ti de todas partes:

23

 Los  de  Babilonia  y  todos  los  caldeos, 

los  de  Pecod,  Soa  y  Coa,  y  todos  los  de 

Asiria con ellos. Jóvenes codiciables, go-

bernadores y sátrapas, nobles, y varones 

de  renombre,  montando  en  corceles  to-

dos ellos.

24

 Vendrán  contra  ti  con  ejércitos  y  ca-

rros, y multitud de pueblos. Se pondrán 

en formación contra ti con escudos y pa-

veses y yelmos, y Yo les encargaré que te 

juzguen conforme a sus costumbres.

25

 Pondré mi celo contra ti, y procederán 

contigo con furor, y te sacarán la nariz y 

las orejas, y tu posteridad caerá a cuchi-

llo. Te arrebatarán a tus hijos y a tus hi-

jas, y tu remanente será consumido por 

el fuego.

26

 Te despojarán de tus vestidos y te qui-

tarán todos los adornos de tu hermosura.

27

 Así haré que cese tu lujuria y tus pros-

tituciones traídas de Egipto, de modo que 

no alces más tus ojos a ellos ni te acuer-

des más de Egipto.

28

 Porque  así  dice  Adonay  YHVH:  He 

aquí,  te  entrego  en  mano  de  los  que  tú 

aborreces,  en  mano  de  quienes  está  de-

saficionada tu alma,

29

 los cuales te tratarán con odio, y te qui-

tarán todo el fruto de tu labor, y te dejarán 

desnuda  y  sin  nada,  y  quedará  al  descu-

bierto la inmundicia de tus fornicaciones, 

y de tu lujuria, y de tu prostitución.

30

 Estas  cosas  se  harán  contigo  porque 

fornicaste en pos de las naciones, y por-

que te contaminaste con sus ídolos.

31

 Porque anduviste en el camino de tu 

hermana, Yo, pues, pondré su cáliz en tu 

mano.

32

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Beberás  el 

hondo y ancho cáliz de tu hermana. Las 

naciones  se  burlarán  de  ti  y  te  escarne-

cerán.

33

 De la embriaguez del dolor estarás lle-

na. ¡Cáliz de asombro y desolación es el 

cáliz de tu hermana Samaria!

34

 Sí,  tú  lo  apurarás  hasta  el  fondo,  y 

lamerás  las  heces,  y  te  despedazarás  tus 

23.20 La excepcional crudeza del pasaje muestra hasta qué extremo Dios aborrece la idolatría. 


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Ezequiel 24:10

865

pechos, porque Yo he hablado, dice Ado-

nay YHVH.

35

 Por  ende,  así  dice  Adonay  YHVH:  Ya 

que te has olvidado de mí y me has dado 

la espalda, ¡carga tú misma con tu lascivia 

y tus fornicaciones!

36

 Y me dijo YHVH: Hijo de hombre, ¿no 

has de juzgar tú a Ahola y a Aholiba? En-

tonces declárales sus abominaciones.

37

 Porque  han  adulterado,  y  hay  sangre 

en  sus  manos,  y  han  fornicado  con  sus 

ídolos, y aun a sus hijos que me parieron, 

los  quemaron  haciéndolos  pasar  por  el 

fuego.

38

 Y  me  hicieron  también  esto:  en  ese 

mismo día contaminaron mi Santuario y 

profanaron mis shabbatot,

39

 porque  después  de  haber  degollado  a 

sus hijos ante sus ídolos, en aquel mismo 

día entraron en mi Santuario para profa-

narlo. ¡Eso es lo que hicieron en mi Casa!

40

 También mandaste recado a hombres 

que venían de lejos, les mandabas mensa-

jero y venían en seguida. Por amor a ellos 

te lavabas, pintabas tus ojos y te ataviabas 

con adornos.

41

 Te  recostabas  en  un  diván  ostentoso, 

ante el cual había una mesa preparada, y 

sobre ella colocabas mi incienso y mi óleo.

42

 Se  oía  allí  el  rumor  de  una  multitud 

que  se  solazaba  con  ella.  Eran  muchos 

varones,  ebrios  traídos  del  desierto,  que 

ponían brazaletes en sus brazos y hermo-

sas coronas en las cabezas de ambas.

43

 Dije  de  la  consumida  en  adulterios: 

Ahora  ella  prosigue  entregándose  a  sus 

prostituciones.°

44

 Porque  la  vienen  a  buscar  como  quien 

busca a la prostituta. Así vienen a buscar a 

estas depravadas mujeres Ahola y a Aholiba.

45

 Pero los justos las juzgarán por la ley 

de las adúlteras y por la ley de las que de-

rraman  sangre,  porque  son  adúlteras,  y 

en sus manos hay sangre.

46

 Por  lo  que,  así  dice  Adonay  YHVH: 

¡Convóquense turbas contra ellas, y sean 

entregadas al espanto y al pillaje!

47

 Las turbas las lapidarán con piedras y 

las tajarán con sus espadas. Matarán a sus 

hijos y a sus hijas, y consumirán sus casas 

con fuego.

48

 Así haré cesar tan execrable lascivia de 

esta tierra, y todas las mujeres escarmen-

tarán, de modo que no harán conforme a 

vuestra execrable lascivia.

49

 Y  recompensarán  vuestra  execrable 

lascivia sobre vosotras, y cargaréis con los 

pecados  de  vuestras  idolatrías,  y  sabréis 

que Yo soy Adonay YHVH.

Parábola de la olla

24

En el año noveno, en el mes déci-

mo, a los diez días del mes, vino a 

mí palabra de YHVH diciendo:

2

 Hijo de hombre, escribe la fecha de este 

día, pues en este mismo día el rey de Ba-

bilonia se lanza contra Jerusalem.

3

 Profiere pues una parábola a la casa re-

belde, y diles: Así dice Adonay YHVH:

¡Pon la olla, sí, ponla, y también 

echa agua en ella!

4

    Echa en ella los trozos que le 

pertenecen:

Trozos selectos, la pierna y la 

espaldilla,

Llénala de huesos escogidos.

5

    Toma lo mejor del rebaño,

Apila debajo la leña° y haz que 

hierva bien,

Cocina sus huesos dentro de ella.

6

    Pues así dice Adonay YHVH:

¡Ay de la ciudad sanguinaria, de la olla 

cuya inmundicia está adentro,

Cuyo verdín no sale de ella!

Saca pues trozo a trozo,

Y no eches suerte sobre ella.

7

    Porque su sangre está dentro de ella,

Vertida sobre la roca desnuda,

Y no la derramó sobre la tierra para 

que la cubriera el polvo.

8

    Para indignarme, para vengarme,

Yo también he puesto en roca 

desnuda la sangre que derramó,

Y no será cubierta.

9

    Por tanto, así dice Adonay YHVH:

¡Ay de la ciudad sanguinaria!

¡Yo mismo aumentaré el montón de 

leña!

10

    ¡Amontónese la leña, inflámese el 

fuego,

Cuézase la carne y espésese el caldo,

Hasta que los huesos estén calcinados!

23.43 Pasaje de difícil traducción.  24.5 TM: huesos.


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Ezequiel 24:11

866

11

    ¡Quédese vacía sobre las ascuas, para 

que el cobre se recaliente

Y se ponga al rojo vivo

Y su roña se derrita

Y su verdín se consuma!

12

 Pero vano es el esfuerzo, pues ni con el 

fuego suelta de sí su mucho verdín.

13

 En tu inmundicia hay infamia, porque 

intenté  limpiarte,  pero  no  quisiste  ser 

limpia de tu inmundicia. ¡Pues no serás 

limpia, hasta que Yo haya desahogado en 

ti mi indignación!

14

 Yo,  YHVH,  he  hablado.  Ello  ocurrirá 

y  Yo  lo  cumpliré.  No  retrocederé  ni  me 

compadeceré  ni  desistiré.  Te  juzgarán 

conforme a tus caminos y conforme a tus 

obras, dice Adonay YHVH.

Muerte de la esposa 

de Ezequiel

15

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

16

 Hijo de hombre, he aquí Yo te quito de 

golpe el deleite de tus ojos. No endeches, 

ni llores, ni corran tus lágrimas.

17

 Reprime el suspirar, no hagas luto de 

mortuorios,  átate  el  turbante  y  ponte  el 

calzado en tus pies, y no te cubras el la-

bio° ni comas pan de duelo.°

18

 Hablé pues al pueblo por la mañana, y 

a la tarde murió mi mujer, y a la mañana 

hice como me fue mandado.

19

 Y  el  pueblo  me  decía:  ¿No  nos  dirás 

qué  significan  para  nosotros  estas  cosas 

que haces?

20

 Y  les  contesté:  La  palabra  de  YHVH 

vino a mí, diciendo:

21

 Di a la casa de Israel: Así dice Adonay 

YHVH: He aquí, profanaré mi Santuario, 

gloria de vuestro poder, deseo de vuestros 

ojos, y anhelo de vuestra alma; y vuestros 

hijos y vuestras hijas que dejasteis caerán 

a cuchillo.

22

 Entonces  haréis  lo  que  yo  he  hecho: 

no os cubriréis vuestro labio, ni comeréis 

pan de duelo,

23

 vuestros  turbantes  estarán  en  vues-

tras cabezas y vuestro calzado en vues-

tros  pies.  No  endecharéis  ni  lloraréis, 

sino  que  desfalleceréis  en  vuestras  ini-

quidades, y gemiréis mirándoos unos a 

otros.

El profeta mudo

24

 Ezequiel os será por señal. Conforme 

a todo lo que él hizo, así haréis vosotros. 

Cuando esto ocurra, entonces sabréis que 

Yo soy Adonay YHVH.

25

 Y tú, hijo de hombre, no estarás en el 

día que les arrebate su fortaleza, el gozo de 

su gloria, el deleite de sus ojos y el anhelo 

de sus almas, y también a sus hijos e hijas.

26

 En  aquel  día  un  fugitivo  llegará  a  ti 

para  comunicar  la  noticia  a  tus  propios 

oídos.

27

 En aquel día se abrirá tu boca para ha-

blar  con  el  fugitivo,  y  hablarás  y  no  es-

tarás  más  mudo  y  les  serás  por  señal,  y 

sabrán que Yo soy YHVH.

Contra Amón

25

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Hijo de hombre, pon tu rostro hacia los 

hijos de Amón y profetiza contra ellos.

3

 Y dirás a los hijos de Amón: Oíd palabra 

de Adonay YHVH. Así dice Adonay YHVH: 

Por  cuanto  cuando  mi  Santuario  estaba 

siendo profanado y la tierra de Israel era 

asolada  y  la  casa  de  Judá  era  llevada  en 

cautiverio, dijiste: ¡Qué bueno!

4

 Yo te entrego en posesión a los hijos del 

oriente, quienes asentarán sus campamen-

tos y pondrán sus moradas en ti, y come-

rán tus sementeras y beberán tu leche.

5

 Y haré de Rabá un establo de camellos, y 

a los hijos de Amón por majada de ovejas, 

y sabréis que Yo soy YHVH.

6

 Porque  así  dice  Adonay  YHVH:  Por  el 

palmoteo  de  tus  manos  y  el  bailoteo  de 

tus pies, y por tu regocijo desdeñoso con-

tra la tierra de Israel,

7

 Yo extenderé mi mano contra ti y te daré 

como despojo a las naciones; te haré cor-

tar de entre los pueblos, extirpar de entre 

las naciones y exterminar de la tierra, y 

sabrás que Yo soy YHVH.

Contra Moab

8

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Por  cuanto 

Moab y Seír dijeron: ¡La casa de Judá es 

como todos los demás pueblos!

9

 Por  tanto,  Yo  abro  el  flanco  de  Moab 

desde  sus  ciudades  fronterizas  hasta  las 

24.17 Señal de duelo o amargura 

→Miq.3.7.  24.17 .duelo.


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Ezequiel 26:14

867

tierras  deseables  de  Bet-jesimot,  Baal-

meón y Quiriataim.

10

 Y junto con los hijos de Amón se las 

daré por posesión a los hijos del oriente, a 

fin de que los hijos de Amón no vuelvan a 

ser recordados entre las naciones,

11

 y Yo juzgaré sobre Moab, y sabrán que 

Yo soy YHVH.

Contra Edom

12

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Por  lo  que 

hizo  Edom,  vengándose  cruelmente  de 

la casa de Judá y ofendiéndoles en gran 

manera,

13

 así dice Adonay YHVH: Yo extenderé mi 

mano sobre Edom, y cortaré de ella hom-

bres  y  bestias,  y  la  asolaré  desde  Teman 

hasta Dedán, donde caerán a cuchillo.

14

 Y descargaré mi venganza sobre Edom 

por  medio  de  mi  pueblo  Israel,  y  harán 

en Edom según mi ira y conforme a mi 

indignación,  y  conocerán  mi  venganza, 

dice Adonay YHVH.

Contra Filistea

15

 Así dice Adonay YHVH: Por cuanto los 

filisteos actuaron vengativamente, y ani-

quilaron  con  saña  a  causa  de  la  antigua 

hostilidad,

16

 así dice YHVH: He aquí Yo extiendo mi 

mano contra los filisteos, y cortaré a los 

cereteos, y destruiré el resto que queda en 

la costa del mar.

17

 Y ejecutaré en ellos una gran venganza, 

con airadas reprensiones, y sabrán que Yo 

soy  YHVH,  cuando  tome  mi  venganza  en 

ellos.

Juicio sobre Tiro

26

En el año undécimo, en el día pri-

mero del mes, aconteció que vino a 

mí palabra de YHVH, diciendo:

2

    Hijo de hombre, por cuanto Tiro ha 

dicho de Jerusalem:

¡Bravo! ¡Rota está la puerta de los 

pueblos!

¡Ha caído en mi poder! ¡En ella me 

cebaré!

3

    Así dice Adonay YHVH:

¡Heme aquí contra ti, oh Tiro!

Como el mar levanta sus olas,

Así Yo levanto contra ti a pueblos 

numerosos.

4

    Destruirán las murallas de Tiro,

Derribarán sus baluartes, barreré de 

ella hasta su polvo,

Y la dejaré como una peña lisa.

5

    Será tendedero de redes en medio 

del mar,

Porque Yo he hablado, dice Adonay 

YHVH.

Será botín de las naciones,

6

    Sus poblados del campo, pasados a 

cuchillo,

Y sabrán que Yo soy YHVH.

7

 Porque,  dice  Adonay  YHVH,  he  aquí 

traigo del norte contra Tiro a Nabucodo-

nosor rey de Babilonia, rey de reyes, con 

caballos, carros y jinetes, y un ejército de 

numerosas tropas.

8

    Matará a espada a tus hijas en el 

campo,

Armará contra ti torres de asedio,

Levantará contra ti baluartes, y 

afirmará su escudo contra ti.

9

    Batirá tus murallas con arietes, 

y con hachas destruirá tus 

torres.

10

    Te envolverá la polvareda de sus 

escuadrones de caballería,

Y tus muros temblarán por el 

estruendo de su caballería y el 

rodar de los carros,

Cuando entre por tus puertas 

como se entra en ciudad 

desportillada.

11

    Con los cascos de sus caballos 

hollará todas tus calles,

Y a tu pueblo matará a filo de 

cuchillo,

Y tus fuertes columnas caerán a 

tierra.

12

    Robarán tus riquezas y saquearán 

tus mercaderías,

Arruinarán tus muros,

Destruirán tus casas más preciosas,

Y pondrán tus piedras, tu madera 

y hasta tu polvo en medio de las 

aguas.

13

    Haré cesar el estrépito de tus 

canciones,

Y no se oirá más el son de tus 

cítaras.

14

    Te pondré como una peña lisa y 

serás tendedero de redes,

Y nunca más serás edificada,

Porque Yo YHVH he hablado, dice 

Adonay YHVH.


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Ezequiel 26:15

868

15

 Así dice Adonay YHVH a Tiro: ¿No se 

estremecerán  las  islas  ante  el  estruendo 

de tu caída, con el lamento de tus alan-

ceados y el degüello de tus víctimas den-

tro de ti?

16

  Bajarán de sus tronos todos los prín-

cipes marinos, se despojarán sus mantos, 

y se quitarán sus ropas bordadas; se vesti-

rán de espanto y, sentados en el suelo, se 

estremecerán consternados, horrorizados 

a causa de ti.

17

    Levantarán endechas sobre ti, y 

dirán de ti:

¡Cómo sucumbió la ciudad tan 

alabada!

Poblada por gente de los mares.

Poderosa en el mar, ella junto con 

sus moradores,

Impusieron su terror a cuantos la 

rodeaban.

18

    Ahora, las islas tiemblan ante el día 

de tu caída,

Las costas marinas se aterrarán al 

ver tu fin.

19

 Porque  así  dice  Adonay  YHVH:  Yo  te 

convertiré  en  ciudad  asolada.  Como  las 

ciudades que ya no se habitan, haré que el 

océano suba sobre ti, y las muchas aguas 

te cubrirán.

20

 Y te hundiré con los que descienden 

al  sepulcro,  a  gentes  de  tiempos  remo-

tos, y te pondré en las profundidades de 

la tierra, entre las ruinas de la antigüe-

dad, con los que descienden al sepulcro, 

para que nunca más seas poblada, pero 

Yo  pondré  gloria  en  la  tierra  de  los  vi-

vientes.

21

 Te convertiré en espanto, y dejarás de 

ser. Serás buscada, pero nunca más serás 

hallada, dice Adonay YHVH.

Lamento sobre Tiro

27

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Tú, hijo de hombre, levanta 

endechas sobre Tiro.

3

    Di:

¡Oh Tiro!, princesa de los 

puertos,

Mercado de muchos pueblos 

costeros:

Así dice Adonay YHVH:

Tiro, tú te has dicho:

Yo soy perfecta en hermosura.

4

    Tus predios eran el corazón del 

mar;

Tus armadores completaron tu 

belleza,

5

    Con cipreses de Senir armaron tu 

maderaje,

Escogieron un cedro del Líbano y 

alzaron el mástil en ti;

6

    Con robles de Basán hicieron tus 

remos,

Tu cubierta, con madera de boj de 

las costas de Quitim,

Incrustadas con marfil;

7

    Tu velamen, de lino recamado de 

Egipto,

Para que te sirviera de estandarte;

De azul y púrpura de las costas de 

Elisa era tu pabellón.

8

    Los moradores de Sidón y de Arvad 

fueron tus remeros;

Tus expertos, oh Tiro, estaban en ti, 

y eran tus timoneles.

9

    Los ancianos de Gebal y sus más 

hábiles obreros calafateaban tus 

junturas.

Todos los navíos del mar y sus 

marinos traficaban contigo.

10

    Persas, los de Lud y los de Fut 

servían en tu ejército

Como guerreros tuyos,

Escudos y yelmos en ti se 

suspendían

Y te engalanaban con ellos.

11

 Los  hombres  de  Arvad  y  Jelec  guar-

necían  tus  muros  en  derredor,  y  los  de 

Gamadim estaban en tus baluartes, y col-

gaban sus escudos alrededor de tus mu-

ros perfeccionando tu hermosura.

12

 Por la opulencia de todas tus riquezas, 

traficaba Tarsis contigo, traficaba en tus 

mercados plata, hierro, estaño y plomo.

13

 Javán, Tubal y Mesec traficaban conti-

go; en esclavos y objetos de bronce trafi-

caban en tus mercados.

14

 Los de la casa de Togarmá cambiaban 

tus  mercaderías  por  caballos  de  tiro,  de 

silla, y mulos.

15

 Los hijos de Dedán traficaban contigo, y 

muchas islas se hallaban bajo la dependen-

cia de tu comercio, y te traían como tributo 

colmillos de marfil y maderas de ébano.

16

 Por  la  abundancia  de  tus  productos, 

Edom  venía  a  tus  mercados  y  traficaba 

contigo  con  perlas  y  con  púrpura,  con 


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Ezequiel 28:2

869

vestidos bordados y linos finos, con cora-

les y rubíes.

17

 También Judá y la tierra de Israel trafi-

caban contigo, dándote por tus mercade-

rías el trigo de Minit y de Panag, y la miel, 

el aceite y la resina.

18

 A causa de tus muchos productos, Da-

masco traficaba contigo, por la opulencia 

de toda riqueza, negociaba con el vino de 

Helbón y la más blanca lana.

19

 Dan  y  el  errante  Javán  venían  a  tus 

ferias,  para  traficar  en  tu  mercado  con 

hierro  labrado,  mirra  destilada  y  caña 

aromática.

20

 Dedán  comerciaba  contigo  en  paños 

preciosos para las carrozas.

21

 Aun Arabia y todos los príncipes de Ce-

dar se hallaban bajo la dependencia de tu 

comercio, traficando en corderos, carne-

ros y machos cabríos.

22

 Los  mercaderes  de  Sabá  y  de  Raama 

traficaban contigo; venían a tus mercados 

con el más apreciado bálsamo, y toda cla-

se  de  piedras  preciosas  y  oro  daban  por 

tus mercaderías.

23

 Harán,  Cane,  Edén,  y  los  mercaderes 

de Sabá, de Asiria y de Quilmad, contra-

taban contigo.

24

 Traficaban contigo en tejidos finos, en 

mantos de azul y bordados, y en cajas de 

ropas preciosas, liados con cuerdas y bien 

asegurados; en todo esto traficaban con-

tigo.

25

 Las naves de Tarsis eran en tu mercado 

como  largas  caravanas,  y  así  extremaste 

tus riquezas y opulencia en medio de los 

mares.

26

    Tus remeros te conducían entre las 

vastas aguas,

Hasta que, en medio de los mares, te 

desmanteló el solano,

27

    Con tus riquezas, bienes y 

mercaderías,

Con tus remeros, timoneles y 

calafates,

Con todos los mercaderes de tu 

tráfico.

Y todos los hombres de guerra,

Y toda aquella gente en medio de ti,

Cayó en medio de los mares en el día 

de tu destrucción.

28

    Al grito estrepitoso de tus marineros

Las costas° temblaron,

29

    Y todos los que empuñan el remo,

Y marineros, y timoneles del mar 

todos

Saltaron de sus naves para quedarse 

en tierra.

30

    Se escucharán sus voces,

Llorando amargamente por ti,

Polvo se echarán en sus cabezas,

Y se revolcarán en ceniza;

31

    Se raerán los cabellos por ti,

Se ceñirán de cilicio, y con 

amargura de alma

Endecharán endechas amargas 

por ti,

32

    En su lamento entonarán cantos 

fúnebres por ti,

Y se lamentarán por ti, diciendo:

¿Quién como Tiro, fortificada en 

medio del mar?

33

    Cuando desembarcaban tus 

mercaderías

Saciabas a pueblos numerosos,

Y con tus muchas riquezas y 

mercaderías,

Enriquecías a los reyes de la tierra.

34

    Ahora, quebrantada por el mar,

En la profundidad de las aguas,

Con tus productos y toda tu 

tripulación caídos en medio de ti,

35

    Todos los moradores de las costas 

están atónitos a causa de ti,

Sus reyes tiemblan de espanto,

Sus rostros están abatidos,

36

    Y entre los pueblos, los mercaderes 

silban de asombro.°

Espanto serás,

y para siempre dejarás de ser.

Contra el príncipe de Tiro

28

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Hijo de hombre, di al príncipe de 

Tiro:

Así dice Adonay YHVH:

Por cuanto se enalteció tu corazón, 

y dijiste: Yo soy Dios,

Y en el trono de Dios estoy sentado 

en medio de los mares.

Pero tú eres hombre y no Dios,

27.28 Nolas.  27.36 .asombro


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Ezequiel 28:3

870

Aunque has puesto tu corazón como 

el corazón de Dios.

3

    ¡He aquí eres más entendido que 

Daniel, y ningún misterio te es 

oculto!

4

    Con tu habilidad e inteligencia 

has adquirido riquezas,

Acumulaste oro y plata en tus 

tesorerías.

5

    Con tu gran conocimiento 

multiplicaste tus riquezas con tus 

contrataciones,

Y a causa de tus riquezas se 

enalteció tu corazón.

6

    Por tanto, así dice Adonay YHVH:

Por cuanto pusiste tu corazón como 

el corazón de Dios,

7

    He aquí, Yo traigo contra ti 

extranjeros,

Los terribles de las naciones,

Que desenvainarán sus espadas 

contra la hermosura de tu 

inteligencia,

Y mancharán tu esplendor.

8

    Al sepulcro te harán descender,

Y morirás con la muerte de los 

traspasados en medio de los mares.

9

    ¿Porfiarás en decir: Yo soy Dios, en 

presencia de quien te mata?

Porque en presencia del que te 

traspasa, tú eres hombre y no 

Dios.

10

    Morirás de muerte de incircuncisos° 

por mano de extranjeros,

Porque Yo he hablado, dice Adonay 

YHVH.

Contra el rey de Tiro

11

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

12

    Hijo de hombre, entona endechas 

sobre el rey de Tiro, y dile:

Así dice Adonay YHVH:

¡Tú eras el sello de la perfección,

Lleno de sabiduría y acabado de 

hermosura!

13

    En Edén, en el huerto de Dios 

estuviste.

De toda piedra preciosa era tu 

vestidura:

De cornerina, topacio, jaspe y 

crisólito,

De berilo y ónice; zafiro y carbunclo,

De esmeralda y de oro.

Los primores de tus panderos y 

flautas estuvieron preparados 

para ti en el día de tu creación.

14

    Tú, querubín ungido, protector,

Yo te constituí para esto.

En el santo monte de Dios estuviste;

En medio de las piedras de fuego te 

paseabas.

15

    Perfecto eras en todos tus caminos 

desde el día que fuiste creado,

Hasta que se halló en ti maldad.

16

    A causa de la multitud de tus 

contrataciones

Fuiste lleno de iniquidades, y 

pecaste.

Por tanto Yo te degrado del monte 

de Dios,

Y te destruyo, oh querubín 

protector,

De en medio de las piedras del 

fuego.

17

    A causa de tu hermosura se 

enalteció tu corazón;

A causa de tu esplendor corrompiste 

tu sabiduría.

Yo te arrojo por tierra, y delante de 

los reyes

Te pondré por espectáculo.

18

    Con la multitud de tus maldades 

y con la iniquidad de tus 

contrataciones

Profanaste tus santuarios.

He aquí Yo hago brotar en medio de 

ti un fuego para que te consuma,

Y te reduzco a ceniza sobre la 

tierra a ojos de todos los que te 

observan.

19

    Todos los que te conocieron entre 

los pueblos se asombrarán de ti:

Espanto serás,

y para siempre dejarás de ser.

Contra Sidón

20

    Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

21

    Hijo de hombre, pon tu rostro hacia 

Sidón, y profetiza contra ella,

22

    Y dirás: Así dice Adonay YHVH:

Oh Sidón, he aquí Yo estoy contra ti, 

y en medio de ti seré glorificado,

28.10 Es decir, morirás de la forma horrible en que mueren los ajenos al pueblo de Dios


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Ezequiel 29:18

871

Y sabrán que Yo soy YHVH,

Cuando en ella ejecute juicios, y en 

ella me santifique.

23

    Enviaré contra ella la peste y la 

sangre por sus calles,

Las víctimas caerán en medio de ella 

a causa de la espada hostil que la 

rodea,

Y sabrán que Yo soy YHVH.

24

 Y  la  casa  de  Israel  nunca  más  ten-

drá zarzal lacerante ni espino que ator-

mente,  en  medio  de  cuantos  la  rodean 

y la menosprecian, y sabrán que Yo soy 

YHVH.

25

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Cuando  Yo 

haya  recogido  a  la  casa  de  Israel  de  los 

pueblos entre los cuales está esparcida, y 

me haya santificado en ellos a vista de las 

naciones, entonces habitarán en su tierra, 

que di a mi siervo Jacob.

26

 Y  habitarán  confiadamente  en  ella, 

y  edificarán  casas,  y  plantarán  viñas.  Sí, 

habitarán confiadamente cuando Yo haya 

ejecutado  los  juicios  contra  todos  aque-

llos que los despojan en sus alrededores, y 

sabrán que Yo, YHVH, soy su Dios.

Contra Egipto

29

En el año décimo, en el mes déci-

mo, a los doce días del mes, vino a 

mí palabra de YHVH, diciendo:

2

 Hijo  de  hombre,  pon  tu  rostro  contra 

Faraón rey de Egipto, y profetiza contra 

él y contra todo Egipto.

3

    Habla y di: Así dice Adonay YHVH:

He aquí Yo estoy contra ti,

Faraón rey de Egipto,

Gran monstruo recostado en medio 

de sus cauces,

El cual dice: mío es el Nilo,

Pues yo lo hice para mí.

4

    Yo, pues, pondré garfios en tus 

quijadas,

Y haré que los peces de tus ríos se 

peguen a tus escamas,

Y te sacaré de en medio de tus ríos,

Y todos los peces de tus ríos saldrán 

pegados a tus escamas.

5

    Y te arrojaré al desierto a ti y a todos 

los peces de tus ríos.

Caerás sobre campo abierto;

No serás recogido ni enterrado,

Y te daré por alimento a las fieras de 

la tierra,

Y por presa a las aves de los cielos.

6

    Y todos los moradores de Egipto 

sabrán que Yo soy YHVH,

Por cuanto tú fuiste un báculo de 

caña para la casa de Israel:

7

    Cuando su mano te empuñaba,

Te rompiste y les horadaste la mano,

Y cuando se apoyaban en ti,

Te quebraste, y los hiciste 

tambalear.

8

 Por  tanto,  así  dice  Adonay  YHVH:  He 

aquí que Yo traigo contra ti la espada, y 

cortaré de ti hombres y bestias.

9

 Y la tierra de Egipto será asolada y de-

sierta,  y  sabrán  que  Yo  soy  YHVH,  por 

cuanto dijo: ¡mío es el Nilo, y yo lo hice!

10

 Por tanto, he aquí Yo estoy contra ti y 

contra tus ríos, y convertiré la tierra de 

Egipto en ruinas, en un desierto desola-

do, desde Migdol hasta Sevene, y hasta los 

confines de Etiopía.

11

 No  pasará  por  ella  pie  de  hombre,  ni 

pie de bestia pasará por ella, ni será habi-

tada por cuarenta años.

12

 Y haré que la tierra de Egipto sea una 

desolación en medio de las tierras deso-

ladas,  y  sus  ciudades  entre  las  ciudades 

destruidas estarán desoladas por cuarenta 

años, y esparciré a Egipto entre las nacio-

nes, y lo dispersaré por las tierras.

13

 Pero Adonay YHVH dice así: Al fin de 

los  cuarenta  años  recogeré  a  Egipto  de 

entre  los  pueblos  en  los  cuales  fueron 

dispersados,

14

 y haré tornar el cautiverio de Egipto y 

los haré volver a la tierra de Patros, tierra de 

su origen, y allí serán un reino modesto.

15

 Será más modesto que otros reinos, y 

nunca  más  se  alzará  sobre  las  naciones, 

porque  Yo  los  disminuiré  para  que  no 

vuelvan a tener dominio sobre las nacio-

nes.

16

 Y la casa de Israel no depositará más la 

confianza en ellos, ni recaerá en el pecado 

de  haber  ido  tras  ellos,  y  sabrán  que  Yo 

soy Adonay YHVH.

La paga de Nabucodonosor

17

 En el año vigésimo séptimo, en el mes 

primero,  el  día  primero  del  mes,  vino  a 

mí palabra de YHVH, diciendo:

18

 Hijo de hombre, Nabucodonosor rey de 

Babilonia hizo que su ejército prestara un 

arduo servicio contra Tiro. Causó calvez a 


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Ezequiel 29:19

872

toda cabeza y toda espalda fue despedaza-

da. Sin embargo, no tuvo remuneración 

en Tiro ni tampoco su ejército, por el ser-

vicio que prestó contra ella.

19

 Por tanto, así dice Adonay YHVH: He 

aquí Yo doy la tierra de Egipto a Nabuco-

donosor rey de Babilonia, quien se lleva-

rá sus riquezas y tomará sus despojos, y 

arrebatará el botín, y eso será la paga para 

su ejército.

20

 Por  su  trabajo  con  que  sirvió  contra 

ella le he dado la tierra de Egipto, porque 

trabajaron para mí, dice Adonay YHVH.

21

 En aquel día haré retoñar un cuerno 

para la casa de Israel, y a ti te haré abrir 

la boca en medio de ellos, y sabrán que Yo 

soy YHVH.

El día de Egipto

30

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Hijo de hombre, profetiza, y di: Así 

dice Adonay YHVH:

¡Aullad! ¡Ay de aquel día!

3

    Porque cercano está el día,

Sí, cercano está el día de YHVH:

Día de nubarrones, el tiempo de las 

naciones será.

4

    Y vendrá la espada sobre Egipto, y 

habrá angustia en Etiopía

Cuando caigan acuchillados en 

Egipto.

Y tomen sus riquezas,

Y sean destruidos sus cimientos.

5

    Etiopía, Fut, Lud, toda Arabia y 

Libia,

Y los hijos de las tierras aliadas, 

caerán con ellos a filo de espada.

6

    Así dice YHVH:

También caerán los que apoyan a 

Egipto,

Y se irá abajo la altivez de su poderío.

Desde Migdol hasta Sevene caerán a 

filo de espada,

Dice Adonay YHVH.

7

 Y serán asolados entre las tierras que es-

tán asoladas, y sus ciudades estarán entre 

las ciudades que quedaron desiertas.

8

 Y sabrán que Yo soy YHVH cuando pren-

da fuego a Egipto, y todos sus ayudadores 

sean destruidos.

9

 En aquel tiempo saldrán de delante de 

mí mensajeros en naves, para espantar a 

la confiada Etiopía, y la angustia vendrá 

sobre ellos como en el día de Egipto, por-

que he aquí viene.

10

    Así dice Adonay YHVH:

Destruiré las riquezas de Egipto por 

mano de Nabucodonosor rey de 

Babilonia.

11

    Él, y su pueblo con él,

Los terribles de las naciones,

Serán traídos para destruir la tierra,

Desenvainarán sus espadas contra 

Egipto,

Y llenarán la tierra de cadáveres.

12

    Y haré que los ríos se sequen,

Y entregaré la tierra en manos de 

malvados.

Y haré que la tierra y cuanto hay en 

ella,

Sea desolada por mano de 

extranjeros.

Yo YHVH he hablado.

13

    Así dice Adonay YHVH:

Destruiré también los ídolos,

Destruiré las imágenes de Menfis,

Y no habrá más príncipe en la tierra 

de Egipto,

Y pondré temor en la tierra de 

Egipto.

14

    Asolaré a Patros,

Prenderé fuego a Zoán,

Y haré juicios en Tebas.

15

    Derramaré mi ira sobre Sin, 

fortaleza de Egipto,

Y exterminaré a la multitud de 

Tebas.

16

 Prenderé  fuego  a  Egipto;  Sin  tendrá 

gran convulsión, Tebas será destrozada, y 

Menfis tendrá una angustia continua.

17

 Los jóvenes de Avén y de Pibeset cae-

rán a filo de espada, y las mujeres irán en 

cautiverio.

18

    El día será oscurecido en Tafnes, 

cuando Yo quebrante el cetro° de 

Egipto,

Y acabe en ella la soberbia de su 

poderío.

Tinieblas la cubrirán,

Y los moradores de sus aldeas irán 

en cautiverio.

30.18 TM: yugo


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Ezequiel 31:14

873

19

    Así ejecutaré juicios en Egipto,

Y sabrán que Yo soy YHVH.

20

 En el año undécimo, en el mes prime-

ro, a los siete días del mes, aconteció que 

la palabra de YHVH vino a mí, diciendo:

21

 Hijo de hombre, he quebrado el brazo 

de Faraón rey de Egipto: no lo han venda-

do aplicando medicinas, ni ha sido fajado 

ni entablillado para que se suelde la frac-

tura, y pueda empuñar la espada.

22

 Por  tanto,  así  dice  Adonay  YHVH: 

Heme aquí contra Faraón rey de Egipto: 

quebraré sus brazos, tanto el fuerte como 

el fracturado, y haré que la espada caiga 

de su mano.

23

 Y esparciré a los egipcios entre las na-

ciones, y los dispersaré por las tierras.

24

 Y fortaleceré los brazos del rey de Ba-

bilonia, y pondré mi espada en su mano, 

y quebraré los brazos de Faraón, y gemi-

rá ante él con los gemidos de un hombre 

mortalmente herido.

25

 Sí, fortaleceré los brazos del rey de Ba-

bilonia, y caerán los brazos de Faraón, y 

sabrán que Yo soy YHVH, cuando ponga 

mi  espada  en  la  mano  del  rey  de  Babi-

lonia, y él la extienda contra la tierra de 

Egipto.

26

 Y esparciré a los egipcios entre las na-

ciones, y los dispersaré por las tierras, y 

sabrán que Yo soy YHVH.

Alegoría del cedro

31

En el año undécimo, en el mes ter-

cero, el día primero del mes, acon-

teció  que  vino  a  mí  palabra  de  YHVH, 

diciendo:

2

    Hijo de hombre, di a Faraón rey de 

Egipto y a su pueblo:

¿A quién te asemejas en tu 

grandeza?

3

    He aquí el cedro del Líbano,°

De hermosas ramas, frondoso 

ramaje y elevada altura,

Cuya copa se destaca entre las 

nubes.

4

    Las aguas lo hicieron crecer,

Lo enalteció el abismo enviando 

corrientes en torno de él,

E hizo pasar sus corrientes a todos 

los árboles del campo.

5

    Por tanto, se encumbró su altura 

sobre todos los árboles del campo,

Se multiplicaron sus ramas, y se 

extendió su ramaje

Por la copiosa agua que lo hacía 

crecer.

6

    En sus ramas hacían nido todas las 

aves de los cielos,

Y debajo de su fronda parían todas 

las bestias del campo,

Y a su sombra habitaban todas las 

grandes naciones.

7

    Se hizo hermoso en su grandeza por 

la extensión de su ramaje,

Porque tenía su raíz junto a muchas 

aguas.

8

    Los cedros del huerto de Dios no lo 

sobrepasaban,

Ni competían con su ramaje los 

cipreses,

Ni los castaños igualaban su copa,

Y ningún árbol en el huerto de Dios 

era semejante a él en hermosura.

9

    Lo hice hermoso, tupido de ramas,

Lo envidiaban los árboles del Edén 

en el huerto de Dios.

10

 Por tanto, así dice Adonay YHVH: Por 

haber exaltado su estatura, y haber ergui-

do su cúspide hasta las nubes, y haberse 

ensoberbecido en su altura,

11

 lo entregaré a merced del príncipe de 

las naciones, para que lo trate según su 

maldad. Lo he desechado,

12

 y  los  extranjeros,  los  más  crueles  de 

los pueblos, lo talaron y lo tiraron, y sus 

ramas  fueron  cayendo  por  los  montes  y 

por todos los valles, su copa se fue desga-

jando por todos los barrancos de la tierra, 

y todos los pueblos de la tierra se retira-

ron de su sombra, y lo desecharon.

13

    Sobre su tronco caído se posan todas 

las aves del cielo,

Y entre sus ramas se echan todas las 

bestias del campo,

14

 para  que  ninguno  de  los  árboles  que 

crece  junto  a  las  aguas  se  exalte  en  su 

altura, ni eleve su copa entre las nubes, 

ni  confíe  en  sí  mismo  por  su  estatura, 

ninguno  de  los  que  son  regados  con  las 

aguas: porque todos están destinados a la 

muerte, a lo profundo de la tierra, entre 

31.3 Nel asirio en el Líbano


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Ezequiel 31:15

874

los  hijos  de  los  hombres  que  bajan  a  la 

fosa.

15

 Así dice Adonay YHVH: El día que des-

cendió al Seol, vestí de luto el abismo, de-

tuve sus ríos, y las grandes aguas fueron 

detenidas. Por él enluté el Líbano, y todos 

los árboles del campo desmayaron a causa 

de él.

16

 Al estruendo de su caída hice temblar a 

las naciones, cuando lo hice descender al 

Seol con todos los que bajan a la sepultu-

ra. Entonces todos los árboles escogidos 

del Edén y los mejores del Líbano, todos 

los  que  beben  aguas,  fueron  consolados 

en lo profundo de la tierra.

17

 Ellos  también  descenderán  con  él  al 

Seol,  con  los  muertos  a  espada,  los  que 

habían sido su apoyo, los que habitaron a 

su sombra en medio de las naciones.

18

 ¿A quién te has comparado así en glo-

ria y grandeza entre los árboles del Edén? 

Pero serás derribado con los árboles del 

Edén  a  la  tierra  de  abajo.  Yacerás  entre 

los incircuncisos, con los muertos a espa-

da. Éste es Faraón y todo su pueblo, dice 

Adonay YHVH.

Lamento por el rey de Egipto

32

En  el  año  duodécimo,  en  el  mes 

duodécimo, el día primero del mes, 

aconteció que la palabra de YHVH vino a 

mí, diciendo:

2

    Hijo de hombre, levanta endechas 

sobre Faraón rey de Egipto, y dile:

Parecías el león de las naciones, pero 

eres un cocodrilo del Nilo.

Chapoteas en las corrientes, 

enturbias las aguas con tus patas,

Y enlodas las corrientes de los ríos.

3

    Así dice Adonay YHVH:

He aquí tiendo mi red sobre ti en 

compañía de muchas naciones;

Te levantarán en mi red,

4

    Y te arrojaré sobre la tierra,

Te echaré sobre la faz del campo,

Y haré que se posen sobre ti todas 

las aves de presa de los cielos,

Y de ti saciaré a las fieras de la tierra.

5

    Expondré tus carnes sobre los 

montes,

Y llenaré los valles de tu carroña.

6

    Regaré con tu sangre la tierra donde 

nadas,

Hasta los montes, y los cauces de los 

torrentes se llenarán de ti.

7

    Y cuando te haya extinguido,

Cubriré los cielos y enlutaré sus 

estrellas,

Cubriré el sol con nublado,

Y la luna no hará resplandecer su luz.

8

    Haré que por ti se oscurezcan los 

astros brillantes del firmamento,

Y pondré tinieblas sobre tu tierra, 

dice Adonay YHVH.

9

 Haré  entristecer  los  corazones  de  mu-

chos  pueblos  cuando  lleve  tus  despojos 

entre  las  naciones,  y  se  sepa°  en  tierras 

que tú no conociste.

10

 Sí, al blandir ante ellos mi espada haré 

que se espanten de ti muchos pueblos, y 

que sus reyes se horroricen de ti, y tem-

blarán sobresaltados por su propia vida en 

el día de tu abatimiento.

11

    Porque así dice Adonay YHVH: ¡La 

espada del rey de Babilonia viene 

sobre ti!

12

    Haré que tu multitud caiga por las 

espadas de los poderosos,

De las más terribles naciones,

Y destruirán la soberbia de Egipto,

Y su multitud será deshecha.

13

    Destruiré también todas sus bestias 

de sobre las muchas aguas.

No las agitará más pie de hombre,

Ni pezuña de bestia las enturbiará.

14

    Entonces haré aclarar sus aguas,

Y sus ríos correrán como aceite,

Dice Adonay YHVH.

15

    Cuando haga asolar la tierra de 

Egipto,

Y el país quede despojado de todo lo 

que tiene,

Cuando mate a todos los que en él 

habitan,

Sabrán que Yo soy YHVH.

16

 Ésta es la endecha con que la lamenta-

rán. Las hijas de las naciones endecharán 

a Egipto, y toda su multitud se lamentará, 

dice Adonay YHVH.

17

 En  el  año  duodécimo,  a  los  quince 

días del mes, aconteció que la palabra de 

YHVH vino a mí diciendo:

32.9 .y se sepa


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Ezequiel 33:7

875

18

    Hijo de hombre, endecha por la 

multitud de Egipto,

Y despéñalo junto con las hijas 

de las naciones poderosas a lo 

profundo de la tierra,

Con los que bajan a la sepultura.

19

    ¿A quién superas ahora en 

hermosura?

¡Desciende y yace con 

incircuncisos!

20

    ¡Caerán en medio de los pasados a 

cuchillo!

¡Al cuchillo él es entregado!

¡Sacadlo afuera, a él y a todas sus 

multitudes!

21

 De en medio del Seol los más fuertes 

de los poderosos, con sus aliados, habla-

rán de él: ¡Ya han bajado y yacen con los 

incircuncisos pasados a cuchillo!

22

 He ahí Asiria con toda su multitud, y 

en derredor suyo están sus sepulcros, to-

dos ellos caídos, pasados a cuchillo.

23

 Sus  sepulcros  fueron  puestos  en  lo 

más profundo de la fosa, y su gente está 

por los alrededores de su sepulcro; todos 

ellos caídos, pasados a cuchillo, los cua-

les sembraron el terror en la tierra de los 

vivientes.

24

 He  ahí  Elam,  con  toda  su  multitud 

alrededor de su sepulcro, todos ellos caí-

dos, pasados a cuchillo, que descendieron 

incircuncisos  a  lo  más  profundo  de  la 

tierra, porque sembraron su terror en la 

tierra de los vivientes, pero ahora llevan 

su  confusión  con  los  que  descienden  al 

sepulcro.

25

 Le han tendido un lecho en medio de 

los degollados con toda la multitud. Sus 

sepulcros  están  en  derredor,  todos  de 

incircuncisos,  pasados  a  cuchillo,  por  el 

terror que habían causado en la tierra de 

los vivientes, pero ahora llevan su confu-

sión con los que descienden al sepulcro. 

Son puestos en medio de los traspasados.

26

 He ahí Mesec y Tubal y toda su multi-

tud, con sus sepulcros en derredor, todos 

ellos  incircuncisos,  pasados  a  cuchillo, 

porque sembraron su terror en la tierra 

de los vivientes.

27

 Y los que son inferiores a los incircun-

cisos  no  yacerán  con  los  poderosos  que 

bajaron al Seol con sus armas de guerra, 

cuyas espadas están puestas debajo de sus 

cabezas, y cuyas iniquidades están sobre 

sus  huesos,  por  cuanto  el  terror  de  los 

poderosos  estaba  en  la  tierra  de  los  vi-

vientes.

28

 Tú  pues  serás  quebrantado  entre  los 

incircuncisos,  y  yacerás  con  los  pasados 

a cuchillo.

29

 Allí está Edom, sus reyes y todos sus 

príncipes, que, no obstante todo su poder, 

yacen con los pasados a cuchillo. Yacerán 

con los incircuncisos, y con ellos los que 

descienden al sepulcro.

30

 Allí están todos los príncipes del norte 

y todos los sidonios, que bajaron con los 

degollados,  avergonzados  de  todo  el  te-

rror que causaron por su poderío, y yacen 

incircuncisos, con los pasados a cuchillo, 

y tienen que soportar su oprobio con los 

que descienden al sepulcro.

31

 Faraón  los  verá  y  se  consolará  de  la 

pérdida de sus tropas. Faraón y todos los 

de  su  ejército,  pasados  a  cuchillo,  dice 

Adonay YHVH.

32

 Aunque Yo haya permitido su terror en 

la tierra de los vivientes, se le hará yacer 

en medio de los incircuncisos, con los pa-

sados a cuchillo, dice Adonay YHVH.

El atalaya de Israel

33

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Hijo de hombre, habla a los hijos de tu 

pueblo, y diles: Cuando Yo traiga la espa-

da sobre la tierra, si el pueblo de la tierra 

escoge  a  un  hombre  de  entre  ellos  y  lo 

pone por atalaya,

3

 y él, divisando la espada que avanza so-

bre la tierra, da la alarma al pueblo a to-

que de trompeta,

4

 cualquiera  que  al  oír  el  toque  de  la 

trompeta no se aperciba, será responsable 

de su propia sangre cuando la espada lle-

gue y lo traspase.

5

 El sonido de la trompeta oyó, pero no se 

apercibió: su sangre recaerá sobre él mis-

mo, en tanto que si se hubiera apercibido 

habría librado su vida.

6

 Pero  si  el  atalaya  divisa  la  espada  que 

avanza y no toca la trompeta, y el pueblo 

no se apercibe, y llega la espada y traspasa 

a  alguno  de  ellos,  éste  será  tomado  por 

causa  de  su  pecado,  pero  Yo  demandaré 

su sangre de mano del atalaya.

7

 Asimismo  es  contigo,  hijo  de  hombre. 

Yo  te  he  puesto  por  atalaya  a  la  casa  de 


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Ezequiel 33:8

876

Israel, y oirás la palabra de mi boca, y los 

amonestarás de mi parte.

8

 Cuando  Yo  diga  al  impío:  ¡Impío,  de 

cierto morirás! y tú no le adviertes de ello 

para que se aparte de su mal camino, el 

impío morirá por su pecado, pero Yo de-

mandaré su sangre de tu mano.

9

 Pero si tú adviertes al impío para que se 

aparte de su mal camino, y él no se aparta 

de su mal camino, él morirá por su peca-

do, pero tú habrás librado tu alma.

10

 Por  consiguiente,  hijo  de  hombre,  di 

a  la  casa  de  Israel:  Vosotros  habláis  di-

ciendo:  Nuestras  rebeliones  y  nuestros 

pecados están sobre nosotros, y en ellos 

estamos desfalleciendo. ¿Cómo, pues, vi-

viremos?

11

 Diles: ¡Vivo Yo! dice Adonay YHVH, que 

no me complazco en la muerte del impío, 

sino en que el impío se vuelva de su ca-

mino y viva. ¡Volveos, volveos de vuestros 

malos  caminos!  ¿Por  qué  queréis  morir, 

oh casa de Israel?

12

 Y tú, oh hijo de hombre, di a los hijos 

de tu pueblo: La justicia del justo no lo 

librará el día que se rebele, y la impiedad 

del impío no le será estorbo el día que se 

vuelva de su impiedad, y el justo no podrá 

vivir por su justicia el día que peque.

13

 Cuando Yo diga al justo: Ciertamente 

vivirás; y él confiado en su justicia llegue 

a hacer iniquidad, ninguna de sus justi-

cias  serán  recordadas,  sino  que  morirá 

por su iniquidad que hizo.

14

 Y cuando Yo diga al impío: De cierto 

morirás; si él se convierte de su pecado, y 

hace según el derecho y la justicia;

15

 si el impío restituye la prenda, devuel-

ve lo robado, y camina en los estatutos de 

la vida no haciendo iniquidad, ciertamen-

te vivirá, no morirá.

16

 Ninguno de los pecados que había co-

metido se le recordará. Hizo según el de-

recho y la justicia: ciertamente vivirá.

17

 Entonces dirán los hijos de tu pueblo: 

¡No es recto el proceder de Adonay! Pero 

el que no es recto es el camino de ellos.

18

 Si  el  justo  se  aparta  de  su  justicia,  y 

hace iniquidad, morirá por ello;

19

 y si el impío se aparta de su impiedad, 

y actúa según el derecho y la justicia, vi-

virá por ello.

20

 Sin  embargo  decís:  No  es  recto  el 

proceder de Adonay. ¡Oh casa de Israel, 

Yo os juzgaré a cada uno conforme a sus 

caminos!

El profeta recupera el habla

21

 En el año duodécimo de nuestro cau-

tiverio, en el mes décimo, a los cinco días 

del mes, aconteció que vino a mí uno que 

había escapado de Jerusalem, el cual de-

cía: ¡La ciudad ha sido conquistada!

22

 Esa tarde, antes de llegar el fugitivo, la 

mano de YHVH había estado sobre mí y 

había abierto mi boca antes que él llegara 

a la mañana siguiente, y, abierta mi boca, 

ya no estuve más callado.

En Jerusalem

23

 Y vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

24

 Hijo  de  hombre,  los  que  habitan  en-

tre  aquellas  ruinas  en  la  tierra  de  Israel 

andan diciendo: Si Abraham, que era uno 

solo, llegó a poseer la tierra, ¡cuánto más 

nosotros, que somos muchos, habremos 

de poseer la tierra!

25

 Por tanto, diles: Así dice Adonay YHVH: 

Coméis con la sangre, alzáis vuestros ojos 

a  vuestros  ídolos,  derramáis  sangre,  ¿y 

vosotros poseeréis la tierra?

26

 Confiáis  en  vuestra  espada,  cometéis 

abominación, cada uno de vosotros man-

cilla a la mujer de su prójimo, ¿y vosotros 

poseeréis la tierra?

27

 Les dirás así: Esto dice Adonay YHVH: 

Vivo Yo, que los que están en aquellas rui-

nas  de  seguro  caerán  a  espada,  y  al  que 

está en campo abierto lo entregaré a las 

fieras para que lo devoren, y los que están 

en las fortalezas y en las cuevas morirán 

de peste.

28

 Convertiré  la  tierra  en  desierto  y  en 

desolación,  y  cesará  la  soberbia  de  su 

poderío,  y  los  montes  de  Israel  serán 

asolados hasta que no haya quien pueda 

pasar.

29

 Entonces  sabrán  que  Yo  soy  YHVH, 

cuando convierta la tierra en desolación y 

desierto, por todas las abominaciones que 

han cometido.

30

 En cuanto a ti, hijo de hombre, los hi-

jos  de  tu  pueblo  se  burlan  de  ti  junto  a 

las paredes y a las puertas de las casas, y 

se dicen unos a otros, cada cual a su her-

mano: ¡Ea, veamos qué palabra nos envía 

YHVH!


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Ezequiel 34:22

877

31

 Y vienen a ti en tropel, y se sientan de-

lante de ti como pueblo mío, y escuchan 

tus palabras, pero no las cumplen, porque 

con sus bocas hacen halagos, pero sus co-

razones andan en pos de su avaricia.

32

 Mira,  para  ellos  eres  un  coplero  de 

amores,  de  bonita  voz  y  buen  tañedor: 

oyen tus palabras, pero no las cumplen.

33

 Pero  cuando  venga  aquello,  y  cierta-

mente viene, sabrán que un profeta estu-

vo entre ellos.

Los pastores de Israel

34

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Hijo  de  hombre,  profetiza  contra  los 

pastores  de  Israel.  Profetiza,  y  di  a  esos 

pastores:  Así  dice  Adonay  YHVH:  ¡Ay  de 

los pastores de Israel que se apacientan a 

sí mismos! ¿No deben acaso los pastores 

apacentar ovejas?

3

 Coméis la grosura y os vestís de la lana, 

degolláis lo cebado, pero no apacentáis el 

rebaño.

4

 No fortalecisteis las débiles, ni curasteis 

la enferma, ni vendasteis la perniquebra-

da, ni volvisteis al redil la descarriada, ni 

buscasteis la perdida, sino que os enseño-

reasteis de ellas con dureza y rigor.

5

 Y ellas andan errantes por falta de pas-

tor, son presa de todas las fieras del cam-

po y se han dispersado.

6

 Mis ovejas andan errantes por todos los 

montes,  y  sobre  todo  collado  alto.  Mis 

ovejas  fueron  esparcidas  por  toda  la  faz 

de la tierra, y no hubo quien las buscara 

ni quien preguntara por ellas.

7

 Oíd  por  tanto,  oh  pastores,  palabra  de 

YHVH:

8

 ¡Vivo  Yo!  dice  Adonay  YHVH,  que  por 

cuanto  mi  rebaño  se  ha  convertido  en 

objeto de presa, y mis ovejas han venido 

a ser pasto de todas las fieras del campo 

por falta de pastor, pues mis pastores no 

han  cuidado  de  mi  rebaño,  sino  que  los 

pastores se apacientan a sí mismos, y no 

apacientan mis ovejas,

9

 oíd, oh pastores, la palabra de YHVH.

10

 Así dice Adonay YHVH: He aquí Yo es-

toy contra los pastores, y demandaré mis 

ovejas  de  su  mano,  y  haré  que  dejen  de 

apacentarlas, y los pastores no se apacen-

tarán  más  a  sí  mismos,  pues  Yo  libraré 

mis ovejas de sus bocas para que no les 

sean más por comida.

11

 Porque así dice Adonay YHVH: He aquí 

Yo mismo buscaré a mis ovejas y las re-

conoceré.

12

 Como el pastor reconoce su rebaño el 

día  que  está  en  medio  de  sus  ovejas  es-

parcidas, así reconoceré mis ovejas y las 

libraré de todos los lugares en que fueron 

esparcidas en día nublado y de oscuridad.

13

 Las sacaré de entre los pueblos, las re-

uniré de las naciones y las traeré a su pro-

pia tierra, y las apacentaré en los montes 

de  Israel,  por  las  riberas,  y  en  todos  los 

lugares habitados del país.

14

 Las  apacentaré  en  buenos  pastizales, 

y en los altos montes de Israel estará su 

aprisco. Allí dormirán en buen redil, y se-

rán apacentadas en pastizales suculentos 

sobre los montes de Israel.

15

 Yo apacentaré mi rebaño, y Yo lo haré 

sestear, dice Adonay YHVH.

16

 Yo  buscaré  la  perdida,  y  haré  volver  a 

la descarriada, vendaré la perniquebrada y 

fortaleceré la débil, pero apartaré la gorda 

y la fuerte: las apacentaré en justicia.

17

 En  cuanto  a  ti,  rebaño  mío,  así  dice 

Adonay  YHVH:  He  aquí  Yo  juzgo  entre 

oveja  y  oveja,  entre  carneros  y  machos 

cabríos.

18

 ¿Es poca cosa para vosotros° el habe-

ros  alimentado  con  buenos  pastos,  para 

que también pisoteéis el resto de vuestros 

pastos? ¿Y que habiendo bebido las aguas 

claras, enturbiéis con vuestras pezuñas el 

residuo?

19

 ¿Y tienen mis ovejas que comer lo pi-

sado, y beber lo enturbiado con vuestras 

pezuñas?

20

 Por tanto, así dice Adonay YHVH: He 

aquí Yo mismo juzgaré entre la oveja gor-

da y la oveja flaca.

21

 Porque con el flanco y la espalda em-

pujáis, y con vuestros cuernos acometéis 

a todas las débiles, hasta que las disper-

sáis° fuera.

22

 Por tanto Yo salvaré a mis ovejas, y no 

serán más una presa, y juzgaré entre ove-

ja y oveja.

34.18 Esto es, los machos cabrios.  34.21 Lit. habéis dispersado.


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Ezequiel 34:23

878

23

 Y levantaré sobre ellas un pastor, y él 

las  apacentará:  a  mi  siervo  David,  él  las 

apacentará y será su pastor.

24

 Y  Yo,  YHVH,  les  seré  por  Dios,  y  mi 

siervo David por príncipe entre ellas. Yo, 

YHVH, he hablado.

25

 Estableceré con ellas un pacto de paz, 

y haré que no haya más bestias malas en 

la tierra, y habitarán seguras en el desier-

to, y dormirán en los bosques.

26

 Y  haré  que  ellas  y  los  alrededores  de 

mi  collado  sean  una  bendición,  y  haré 

descender la lluvia en su tiempo, y serán 

lluvias de bendición.

27

 El  árbol  del  campo  dará  su  fruto,  y 

la tierra dará su fruto, y estarán seguras 

en su tierra, y sabrán que Yo soy YHVH, 

cuando rompa las coyundas de su yugo, y 

las haya librado de mano de aquellos que 

se servían de ellas.

28

 No volverán a ser despojo de las nacio-

nes, ni las fieras de la tierra las devorarán, 

sino  que  habitarán  con  seguridad,  y  no 

habrá quien las espante.

29

 Y Yo levantaré para ellas un plantío de 

renombre, y no serán ya más consumidas 

de hambre en la tierra, ni llevarán más la 

afrenta de las naciones.

30

 Y sabrán que Yo, YHVH su Dios, estoy 

con ellos, y que ellos, la casa de Israel, son 

mi pueblo, dice Adonay YHVH.

31

 Y  vosotras  ovejas  mías,  ovejas  de  mi 

rebaño,  hombres  sois,  y  Yo  soy  vuestro 

Dios, dice Adonay YHVH.

Contra el monte de Seír

35

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

    Hijo de hombre, pon tu rostro hacia 

el monte de Seír,

Y profetiza contra él,

3

    Y dile: Así dice Adonay YHVH:

¡Oh monte Seír, Yo estoy contra ti!

Extenderé mi mano contra ti,

Y te convertiré en un desierto 

desolado;

4

    Convertiré en escombros tus 

ciudades,

Y quedarás desolado,

Y sabrás que Yo soy YHVH.

5

 Porque,  movido  por  un  viejo  rencor, 

entregaste  a  los  hijos  de  Israel  al  poder 

de la espada en tiempo de su aflicción, en 

tiempo extremadamente adverso.

6

 Por tanto, ¡vivo Yo! dice Adonay YHVH: 

Te destinaré para la sangre, y la sangre te 

perseguirá: Por cuanto no aborreciste la 

sangre, la sangre te perseguirá.

7

 Convertiré  la  serranía  de  Seír  en  una 

completa  desolación,  y  cortaré  de  él  al 

que vaya y al que venga.

8

 Llenaré sus montes con sus cadáveres, 

en tus collados, en tus valles y en todas 

tus  cañadas  caerán  los  pasados  a  cuchi-

llo.

9

    Te convertiré en desolación 

perpetua,

Tus ciudades nunca más serán 

restauradas,

Y sabréis que Yo soy YHVH.

10

 Por  cuanto  dijiste:  Esas  dos  nacio-

nes y estas dos tierras serán mías, y las 

poseeremos, aunque YHVH haya estado 

allí.

11

 Por tanto, ¡vivo Yo! dice Adonay YHVH, 

que haré contigo conforme a tu ira y con-

forme  a  tu  envidia,  con  que  has  obrado 

contra ellos en tus odios, y me haré cono-

cer a ellos cuando te juzgue.

12

 Y  conocerás  que  Yo,  YHVH,  he  escu-

chado todas tus blasfemias que proferiste 

contra los montes de Israel, diciendo: ¡Es-

tán destruidos! ¡Nos han sido entregados 

para que los devoremos!

13

 Y  os  engrandecisteis  contra  mí  con 

vuestra boca, y multiplicasteis contra mí 

vuestras palabras. Yo lo oí.

14

 Así dice Adonay YHVH: Mientras toda 

la tierra se regocija, Yo haré de ti una de-

solación.

15

 Como te alegraste de la casa de Israel 

porque fue asolada, así haré Yo contigo. 

Tú  serás  desolada,  oh  serranía  de  Seír, 

junto con todo el territorio de Idumea, y 

sabrán que Yo soy YHVH.

Restauración de Israel

36

Y  tú,  hijo  de  hombre,  profetiza  a 

los  montes  de  Israel,  y  di:  ¡Oíd  la 

palabra de YHVH, oh montes de Israel!

2

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Por  cuanto 

vuestro  enemigo  ha  dicho:  ¡Bien!  ¡Las 

alturas eternas también han venido a ser 

posesión nuestra!

3

 Por tanto, profetiza y di: Así dice Ado-

nay  YHVH:  Por  cuanto  os  asolaron  y  os 

tragaron  por  todas  partes  para  que  fue-

rais heredad de otras naciones, y se os ha 


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Ezequiel 36:25

879

hecho caer en boca de deslenguados, y los 

pueblos os han difamado.

4

 Por eso, oh montes de Israel, oíd palabra 

de Adonay YHVH: Así dice Adonay YHVH 

a los montes y a los collados, a los arroyos 

y a los valles, a las ruinas y asolamientos, 

y a las ciudades abandonadas que fueron 

dejadas para el despojo y el escarnio de las 

otras naciones en derredor.

5

 Así dice Adonay YHVH: En el fuego de 

mi  celo  ciertamente  he  hablado  contra 

las demás naciones, y contra todo Edom, 

quien, con toda la alegría de su corazón y 

el desprecio de alma, se apropió de mi tie-

rra para que sus expatriados fueran presa 

suya.

6

 Por tanto, profetiza sobre la tierra de Is-

rael, y di a los montes y a los collados, y a 

los arroyos y a los valles: Así dice Adonay 

YHVH:  He  aquí,  en  mi  celo  y  en  mi  in-

dignación he hablado, por cuanto habéis 

llevado el oprobio de las naciones.

7

 Por lo cual así dice Adonay YHVH: Yo he 

alzado mi mano, he jurado que las nacio-

nes que están a vuestro alrededor llevarán 

su afrenta.

8

 Pero  vosotros,  ¡oh  montes  de  Israel! 

Brotad vuestros pimpollos y llevad vues-

tro  fruto  para  mi  pueblo  Israel,  porque 

cercanos están para volver.

9

 Pues  he  aquí  Yo  estoy  por  vosotros,  y 

vuelvo mi rostro hacia vosotros, y seréis 

labrados y sembrados.

10

 Y  sobre  vosotros  haré  multiplicar 

hombres, a la casa de Israel toda entera, y 

las ciudades serán habitadas, y las ruinas 

serán reedificadas.

11

 Multiplicaré  sobre  vosotros  hombres 

y bestias, los cuales aumentarán y serán 

fecundos,  y  os  haré  morar  como  solíais 

antiguamente, y os haré mayor bien que 

en  vuestros  principios,  y  sabréis  que  Yo 

soy YHVH.

12

 Y sobre vosotros haré andar hombres: 

a mi pueblo Israel, los cuales tomarán po-

sesión de ti, y les serás por heredad, y no 

volverás más a privarles de sus hijos.

13

 Así dice Adonay YHVH: Por cuanto te 

dicen:  Eres  tierra°  devoradora  de  hom-

bres, y has sido a tu nación privadora de 

sus hijos.

14

 Por tanto, no devorarás más hombres 

y nunca más matarás a los hijos de tu na-

ción, dice Adonay YHVH.

15

 Y nunca más dejaré oír contra ti la in-

juria de las naciones, ni llevarás más el vi-

tuperio de los pueblos, pues no destruirás 

más a los hijos de tu nación, dice Adonay 

YHVH.

16

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

17

 Hijo de hombre, cuando la casa de Is-

rael  moraba  en  su  tierra,  la  profanaban 

con sus caminos y con sus malas obras. 

Sus caminos ante mí eran como inmun-

dicia de menstruo.

18

 Por lo cual derramé mi ira sobre ellos 

por la sangre que vertieron sobre la tie-

rra, y porque la habían profanado con sus 

ídolos.

19

 Y los esparcí entre las naciones, y fue-

ron dispersados por los países. Los juzgué 

conforme a sus caminos y conforme a sus 

obras.

20

 Y cuando llegaron a las naciones adon-

de fueron, profanaron mi santo Nombre, 

de manera que se decía de ellos: Estos son 

el pueblo de YHVH, que han tenido que 

salir de su tierra.

21

 Pero Yo me compadecí a causa de mi 

santo Nombre, el cual profanaron los de 

la casa de Israel entre las naciones adonde 

fueron.

22

 Por  tanto,  di  a  la  casa  de  Israel:  Así 

dice Adonay YHVH: No por vosotros hago 

esto, oh casa de Israel, sino por causa de 

mi santo Nombre, el cual vosotros profa-

nasteis entre las naciones adonde habéis 

llegado.

23

 Y Yo santificaré mi gran Nombre, que 

fue profanado entre las naciones adonde 

fuisteis,  el  cual  vosotros  profanasteis  en 

medio de ellas. Y las naciones sabrán que 

Yo soy YHVH, dice Adonay YHVH, cuando 

sea santificado en vosotros delante de sus 

ojos.

24

 Por cuanto Yo os tomaré de entre las 

naciones, y os recogeré de todos los paí-

ses, y os traeré a vuestra propia tierra.

25

 Y rociaré agua limpia sobre vosotros, 

y seréis limpios de todas vuestras inmun-

dicias,  y  os  limpiaré  de  todos  vuestros 

ídolos.

36.13 .tierra


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Ezequiel 36:26

880

26

 Os  daré  un  corazón  nuevo,  y  pondré 

un  espíritu  nuevo  dentro  de  vosotros,  y 

quitaré  de  vuestra  carne  el  corazón  de 

piedra, y os daré un corazón de carne.

27

 Y pondré dentro de vosotros mi Espí-

ritu, y haré que andéis en mis estatutos, y 

guardéis mis preceptos, y los pongáis por 

obra.

28

 Habitaréis en la tierra que di a vuestros 

padres, y vosotros me seréis por pueblo, y 

Yo seré a vosotros por Dios.

29

 Y  os  guardaré  de  todas  vuestras  in-

mundicias, y llamaré al trigo, y lo multi-

plicaré, y haré que no haya hambre sobre 

vosotros.

30

 Y multiplicaré el fruto de los árboles, 

y el fruto de los campos, para que nunca 

más recibáis el oprobio del hambre entre 

las naciones.

31

 Entonces  recordaréis  vuestros  malos 

caminos, y vuestras obras que no fueron 

buenas,  y  os  avergonzaréis  de  vosotros 

mismos  por  vuestras  iniquidades  y  por 

vuestras abominaciones.

32

 No  por  vosotros  hago  esto,  dice  Ado-

nay  YHVH.  Sabedlo  bien:  avergonzaos  y 

cubríos de confusión por vuestras iniqui-

dades, oh casa de Israel.

33

 Así dice Adonay YHVH: El día que os 

limpie de todas vuestras iniquidades, haré 

que las ciudades vuelvan a ser habitadas y 

las ruinas sean reedificadas.

34

 Y la tierra que había estado desolada, 

será labrada, después de haber estado bal-

día a ojos de todos los que pasaban.

35

 Y dirán: ¡La tierra desolada ha venido 

a ser como huerto del Edén, y estas ciu-

dades arruinadas y desoladas y destruidas, 

están fortificadas y habitadas!

36

 Y las naciones que queden en vuestros 

alrededores sabrán que Yo, YHVH, reedi-

fiqué lo que estaba derribado y planté lo 

que estaba desolado. Yo, YHVH, he habla-

do, y lo haré.

37

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Aún  permiti-

ré que la casa de Israel me busque para 

hacerles  esto:  multiplicaré  los  hombres 

como se multiplican los rebaños.

38

 Como las ovejas consagradas, como las 

ovejas de Jerusalem en sus solemnidades, 

así las ciudades desiertas estarán llenas de 

rebaños de hombres, y sabrán que Yo soy 

YHVH.

El valle de los huesos secos

37

La mano de YHVH vino sobre mí, 

y me llevó YHVH en espíritu° y me 

puso en medio de un valle que estaba lle-

no de huesos.

2

 Y me hizo pasar cerca de ellos por todo 

en derredor, y he aquí que eran numero-

sísimos en el gran valle, y por cierto secos 

en gran manera.

3

 Y  me  preguntó:  Hijo  de  hombre,  ¿po-

drán vivir estos huesos? Y respondí: ¡Oh 

Adonay YHVH! Sólo Tú lo sabes.

4

 Me dijo entonces: Profetiza sobre estos 

huesos, y diles: ¡Huesos secos, oíd palabra 

de YHVH!

5

 Así  dice  Adonay  YHVH  a  estos  huesos: 

He aquí, Yo hago entrar espíritu en voso-

tros, y viviréis.

6

 Y  pondré  tendones  sobre  vosotros,  y 

haré subir sobre vosotros carne, y os cu-

briré de piel, y pondré en vosotros espíri-

tu, y viviréis; y sabréis que Yo soy YHVH.

7

 Profeticé pues como me fue mandado, 

y mientras profetizaba hubo un ruido, y 

luego, he aquí un estremecimiento, y los 

huesos se juntaron hueso con hueso.

8

 Y mirando yo, he aquí tendones y carne 

crecieron sobre ellos, y los cubrió la piel por 

encima, pero no había espíritu en ellos.

9

 Entonces me dijo: ¡Profetiza al espíritu! 

Profetiza, oh hijo de hombre, y di al espí-

ritu: Así dice Adonay YHVH: ¡Ven de los 

cuatro vientos, oh espíritu, y sopla sobre 

estos muertos para que vivan!

10

 Y profeticé como me había sido man-

dado, y el espíritu entró en ellos, y vivie-

ron,  y  se  pusieron  sobre  sus  pies:  una 

multitud grande en extremo.

11

 Me dijo luego: Hijo de hombre, todos 

estos huesos son la casa de Israel. He aquí 

que  dicen:  Nuestros  huesos  están  secos; 

nuestra esperanza se ha desvanecido; es-

tamos del todo perdidos.

12

 Por  tanto,  profetiza,  y  diles:  Así  dice 

Adonay YHVH: ¡Oh pueblo mío! ¡He aquí 

Yo abro vuestros sepulcros y os hago su-

bir de vuestras sepulturas, y os traeré a la 

tierra de Israel!

37.1 Ny el Espíritu de YHVH me llevó


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Ezequiel 38:9

881

13

 Y cuando abra vuestros sepulcros y os 

saque  de  vuestras  sepulturas,  oh  pueblo 

mío, sabréis que Yo soy YHVH.

14

 Y  pondré  mi  Espíritu  en  vosotros,  y 

viviréis, y os pondré en vuestra propia tie-

rra, y sabréis que Yo, YHVH, he hablado y 

lo he cumplido, dice YHVH.

Las dos varas

15

 Vino a mí palabra de YHVH, diciendo:

16

 Hijo de hombre, toma ahora un palo y 

escribe en él: Para Judá, y para los hijos 

de Israel, sus compañeros. Toma después 

otro palo, y escribe en él: Para José, palo 

de Efraín, y para toda la casa de Israel, sus 

compañeros.°

17

 Júntalos luego uno con otro como un 

solo palo, para que se unan en tu mano.

18

 Y cuando los hijos de tu pueblo te pre-

gunten diciendo: ¿No nos dirás qué quie-

res significar con eso?,

19

 diles: Así dice Adonay YHVH: He aquí, 

Yo  tomo  el  palo  de  José  que  está  en  la 

mano de Efraín y las tribus de Israel sus 

compañeros,  y  los  pondré  junto  con  el 

palo de Judá, y haré de ellos un solo palo, 

y serán uno en mi mano.

20

 Y los palos sobre los que escribas esta-

rán en tu mano, delante de sus ojos,

21

 y  les  dirás:  Así  dice  Adonay  YHVH: 

He aquí, Yo tomo a los hijos de Israel de 

entre  las  naciones  adonde  fueron,  y  los 

reco geré de todas partes, y los traeré a su 

propia tierra.

22

 Y haré de ellos una nación en la tierra, 

en los montes de Israel, y un rey será a 

todos ellos por rey, y nunca más serán dos 

naciones,  ni  nunca  más  serán  divididos 

en dos reinos,

23

 ni  se  contaminarán  más  a  sí  mismos 

con sus ídolos, con sus abominaciones y 

con todas sus rebeliones. Y los salvaré de 

todas sus rebeliones con las cuales peca-

ron y los limpiaré, y me serán por pueblo, 

y Yo a ellos por Dios.

24

 Mi siervo David será rey sobre ellos, y 

todos ellos tendrán un solo pastor, y an-

darán en mis preceptos, y guardarán mis 

estatutos, y los pondrán por obra.

25

 Habitarán  en  la  tierra  que  di  a  mi 

siervo  Jacob,  donde  habitaron  vuestros 

padres. En ella habitarán ellos, sus hijos 

y los hijos de sus hijos para siempre, y mi 

siervo  David  será  príncipe  de  ellos  para 

siempre.

26

 Y haré un pacto de paz con ellos. Será 

un pacto perpetuo con ellos, y los estable-

ceré y los multiplicaré, y pondré mi San-

tuario entre ellos para siempre.

27

 Mi  Tabernáculo  estará  en  medio  de 

ellos, y seré a ellos por Dios, y ellos me 

serán por pueblo.

28

 Y las naciones sabrán que Yo, YHVH, 

soy  el  que  santifico  a  Israel,  cuando  mi 

Santuario  esté  en  medio  de  ellos  para 

siempre.

Gog y Magog

38

Vino a mí palabra de YHVH, dicien-

do:

2

 Hijo de hombre, pon tu rostro hacia Gog 

en tierra de Magog, príncipe soberano de 

Mesec y Tubal, y profetiza contra él,

3

 y  di:  Así  dice  Adonay  YHVH:  ¡Oh  Gog, 

príncipe  soberano  de  Mesec  y  Tubal,  he 

aquí Yo estoy contra ti!

4

 Te haré volver, y pondré garfios en tus 

quijadas,  y  te  sacaré  fuera  con  todo  tu 

ejército,°  caballos  y  jinetes,  todos  ellos 

con  ropas  vistosas,  gran  multitud  con 

paveses  y  escudos,  todos  ellos  portando 

espadas.

5

 Persia, Cus y Fut estarán con ellos, to-

dos con escudos y yelmos.

6

 Gomer,  y  todas  sus  hordas,  la  casa  de 

Togarmá,  de  los  confines  del  norte,  con 

todas sus hordas: tropas innumerables te 

siguen.

7

 Tú y toda tu multitud reunida contigo: 

¡Prepárate y apercíbete, y sé tú su caudi-

llo!

8

 De aquí a muchos días recibirás una or-

den.  En  los  años  postreros  vendrás  a  la 

tierra rescatada de la espada, contra una 

gente reunida de entre muchos países en 

los  montes  de  Israel,  que  fueron  yermo 

perenne, pero fue sacada de las naciones 

y habitan todos confiados.

9

 Pero tú te levantarás como una tempes-

tad,  avanzarás  como  un  nublado  hasta 

cubrir todo el país. Tú, con todas tus hor-

das y muchos pueblos contigo.

37.16 Los dos palos simbolizan los cetros de ambos reinos.  38.4 Lit. poder


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Ezequiel 38:10

882

10

 Así  dice  Adonay  YHVH:  En  aquel  día 

subirán  cosas°  a  tu  corazón,  y  tramarás 

un designio perverso,

11

 y  dirás:  Subiré  contra  una  tierra  in-

defensa, iré contra gentes tranquilas que 

habitan confiadas todas ellas, que habitan 

en  ciudades  sin  murallas,  sin  puertas  y 

sin cerrojos.

12

 Esto  será  para  arrebatar  despojos  y 

alzarte con el botín, para poner tu mano 

sobre ruinas repobladas, y contra el pue-

blo ya recogido de entre las naciones, que 

reposeyó  ganados  y  posesiones,  y  habita 

en el ombligo° de la tierra.

13

 Sabá y Dedán, y los mercaderes de Tar-

sis  y  todos  sus  príncipes,  te  dirán:  ¿Has 

venido a arrebatar despojos? ¿Has reclu-

tado tu milicia para alzarte con el botín, 

para robar plata y oro, para tomar gana-

dos y posesiones, para arrebatar grandes 

despojos?

14

 Por tanto, hijo de hombre, profetiza, y 

di a Gog: Así dice Adonay YHVH: En aquel 

tiempo,  cuando  mi  pueblo  Israel  habite 

con seguridad, ¿no lo sabrás tú?

15

 Entonces  vendrás  de  tu  lugar,  de  las 

regiones del norte, tú y muchos pueblos 

contigo, todos ellos a caballo, gran multi-

tud y poderoso ejército,

16

 y subirás contra mi pueblo Israel como 

un nublado que cubre la tierra. Ello ocu-

rrirá en los días postreros, y Yo te traeré 

sobre mi tierra, para que las naciones me 

conozcan cuando Yo, oh Gog, sea santifi-

cado en medio de ti delante de sus ojos.

17

 Así  dice  Adonay  YHVH:  ¿No  eres  tú 

aquél de quien hablé en tiempos antiguos 

por mis siervos los profetas de Israel, los 

cuales ya entonces profetizaron que Yo te 

habría de traer sobre ellos?

18

 En  aquel  tiempo,  cuando  Gog  venga 

contra  la  tierra  de  Israel,  dice  Adonay 

YHVH, acontecerá que mi ira se levantará 

con mi aliento.

19

 Porque en mi celo y en el fuego de mi 

ira, he predicho que de seguro en aquel 

tiempo habrá un gran sacudimiento en la 

tierra de Israel,

20

 de  manera  que  los  peces  del  mar,  las 

aves de los cielos, las bestias del campo y 

todo lo que repta sobre la tierra, y todos 

los hombres que están sobre la faz de la 

tierra, temblarán ante mi presencia, y los 

montes  se  desmoronarán,  y  los  vallados 

caerán, y todo muro será abatido.

21

 Y Yo llamaré a la espada contra él en 

todos mis montes, dice Adonay YHVH. La 

espada  de  cada  cual  será  contra  su  her-

mano.

22

 Y Yo litigaré contra él con peste y con 

sangre, y haré llover sobre él, y sobre sus 

hordas, y sobre los muchos pueblos que 

están con él, un aguacero impetuoso, un 

gran granizo, y fuego y azufre.

23

 Así me engrandeceré y me santificaré, 

y seré conocido ante los ojos de muchas 

naciones, y sabrán que Yo soy YHVH.

39

Tú pues, hijo de hombre, profetiza 

contra  Gog,  y  di:  Así  dice  Adonay 

YHVH:  ¡Heme  aquí  contra  ti,  oh  Gog, 

príncipe soberano de Mesec y Tubal!

2

 Te rodearé y te conduciré y te haré subir 

de las partes lejanas del norte, y te traeré 

sobre los montes de Israel,

3

 y derribaré tu arco de tu mano izquier-

da,  y  haré  que  tus  saetas  caigan  de  tu 

diestra.

4

 Tú y todas tus hordas, y los pueblos que 

están contigo caerán sobre los montes de 

Israel. Te daré por presa a las aves de rapi-

ña de toda especie y a las fieras del campo 

para que te devoren.

5

 Sobre  la  faz  del  campo  caerás,  porque 

Yo he hablado, dice Adonay YHVH.

6

 Y enviaré fuego sobre Magog, y sobre los 

que moran con seguridad en las costas, y 

sabrán que Yo soy YHVH.

7

 Y  haré  conocer  mi  santo  Nombre  en 

medio  de  mi  pueblo  Israel,  y  no  dejaré 

profanar más mi santo Nombre, y sabrán 

las naciones que Yo, YHVH, el Santo, es-

toy en medio de Israel.

8

 ¡He aquí viene, y se cumplirá, dice Ado-

nay YHVH! ¡Éste es el día del cual he ha-

blado!

9

 Entonces los moradores de las ciudades 

de  Israel  saldrán,  y  encenderán  y  que-

marán  armas,  escudos,  paveses,  arcos 

y saetas, dardos de mano y lanzas, y los 

quemarán en el fuego durante siete años.

10

 No traerán leña del campo, ni cortarán 

de los bosques, sino quemarán las armas 

38.10 Es decir, pensamientos.  38.12 Antropomorfismo que indica lugar donde se sujeta el cordón unbilical que une tierra y cielo.


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Ezequiel 40:4

883

en el fuego. Así despojarán a sus despoja-

dores, y saquearán a los que les robaron, 

dice Adonay YHVH.

11

 En aquel día Yo daré a Gog lugar para 

sepultura allí en Israel: el valle de los que 

pasan al oriente del mar, el cual obstruirá 

el paso a los transeúntes, pues allí ente-

rrarán  a  Gog  y  a  toda  su  multitud,  y  lo 

llamarán el valle de Hamón-gog.

12

 Y la casa de Israel los estará enterran-

do  durante  siete  meses,  para  limpiar  la 

tierra.

13

 Sí, todo el pueblo de la tierra los en-

terrará, y tendrá fama por ello, en el día 

en  que  Yo  sea  glorificado,  dice  Adonay 

YHVH.

14

 Y apartarán hombres a jornal que va-

yan  por  el  país  con  los  que  viajen,  para 

enterrar a los que queden sobre la faz de 

la tierra, a fin de limpiarla, y al cabo de 

siete meses harán el reconocimiento.

15

 Y cuando los que pasen por la tierra, 

vean algún hueso de hombre, harán una 

señal  junto  a  él,  hasta  que  los  sepultu-

reros  lo  hayan  sepultado  en  el  valle  de 

Hamón-gog.

16

 Y también el nombre de la ciudad será 

Hamona,° y así purificarán la tierra.

17

 Y tú, hijo de hombre, así dice Adonay 

YHVH: Di a las aves de toda especie, y a 

todas las fieras del campo: ¡Juntaos y ve-

nid! ¡Reuníos de todas partes a mi festín 

que preparo para todas vosotras! ¡Un gran 

sacrificio sobre los montes de Israel para 

que comáis carne y bebáis sangre!

18

 Comeréis carne de poderosos y beberéis 

la sangre de los príncipes de la tierra: car-

neros, corderos, machos cabríos, bueyes y 

toros, todos ellos engordados en Basán.

19

 Comeréis grosura hasta hartaros, y be-

beréis hasta embriagaros sangre de las víc-

timas que he sacrificado para vosotros.

20

 Os hartaréis en mi mesa con caballos 

y jinetes, con capitanes poderosos y con 

todos sus guerreros, dice Adonay YHVH.

21

 Y pondré mi gloria entre las naciones, 

y todas las naciones verán mi juicio que 

habré ejecutado, y la mano mía que pon-

go sobre ellas.

22

 Y de aquel día en adelante la casa de 

Israel sabrá que Yo soy YHVH su Dios.

23

 Y las naciones sabrán que la casa de Israel 

fue llevada cautiva por su pecado, por cuan-

to se rebelaron contra mí, y Yo les oculté 

mi rostro, y los entregué en manos de sus 

enemigos, y todos ellos cayeron a espada.

24

 Conforme a su inmundicia y conforme 

a sus rebeliones que hice con ellos, y les 

oculté mi rostro.

25

 Por  tanto,  así  dice  Adonay  YHVH: 

Ahora haré volver la cautividad de Jacob 

y tendré misericordia de toda la casa de 

Israel, y me mostraré celoso por mi santo 

Nombre.

26

 Y ellos sentirán vergüenza de toda su 

rebelión con que prevaricaron contra mí, 

cuando habiten en su tierra con seguri-

dad, y no haya quien los espante,

27

 cuando  los  haya  sacado  de  entre  los 

pueblos, y reunido de la tierra de sus ene-

migos, y sea santificado en ellos ante los 

ojos de muchas naciones.

28

 Y  sabrán  que  Yo  soy  YHVH  su  Dios, 

cuando después de haberlos llevado al cau-

tiverio entre las naciones, los reúna sobre 

su tierra sin dejarme a ninguno de ellos.

29

 Y  no  volveré  a  ocultarles  mi  rostro, 

porque  habré  derramado  de  mi  Espíri-

tu  sobre  la  casa  de  Israel,  dice  Adonay 

YHVH.

La nueva casa

40

En el año vigésimo quinto de nues-

tro cautiverio, al principio del año, 

a los diez días del mes; catorce años des-

pués que la ciudad había sido conquista-

da, en aquel mismo día, vino sobre mí la 

mano de YHVH, y me llevó allá.

2

 Él me llevó en visiones divinas a la tierra 

de Israel, y me puso sobre un monte muy 

alto, sobre el cual había como el armazón 

de una ciudad, hacia la parte del sur.

3

 Me llevó allí, y he aquí un varón cuyo 

aspecto era el del bronce, con un cordel 

de lino y una caña de medir en la mano, 

estaba de pie junto a la puerta.

4

 Y aquel varón me habló diciendo: Hijo 

de hombre, mira con tus ojos, y oye con 

tus oídos, y pon tu corazón sobre todo lo 

que te mostraré, pues has sido traído aquí 

para que yo te lo muestre y para que de-

clares a la casa de Israel todo lo que ves.

39.16 Esto es, multitud


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Ezequiel 40:5

884

5

 He aquí un muro alrededor por fuera de 

la Casa, y en la mano del varón había una 

caña de medir de seis codos antiguos;° y 

midió el espesor del muro: una caña, y su 

altura: una caña.

6

 Después  fue  a  la  puerta  que  mira  al 

oriente, y subió por sus gradas, y midió el 

umbral de la puerta: una caña de ancho, y 

el segundo umbral: una caña de ancho.

7

 Cada aposento tenía una caña de largo 

por una caña de ancho, y el espacio en-

tre los aposentos era de cinco codos, y los 

umbrales de la puerta junto al pórtico de 

la puerta anterior eran de una caña.

8

 Midió  también  el  pórtico  de  la  puerta 

que daba a la Casa, y medía una caña.

9

 Luego  midió  la  entrada  del  portal,  de 

ocho codos, y sus postes de dos codos. Y 

la puerta del portal estaba por el lado de 

adentro.

10

 El  edificio  de la  puerta oriental tenía 

tres aposentos a cada lado, los tres de una 

misma medida, y los portales a cada lado 

eran también de una medida.

11

 Luego midió el ancho de la entrada de 

la puerta, y medía diez codos, y la longi-

tud del portal: trece codos.

12

 Por delante de los aposentos había un 

espacio de un codo de un lado y un codo 

del otro. Cada aposento tenía seis codos 

por un lado y seis codos por el otro.

13

 Y midió el edificio de la puerta desde 

el techo de un aposento hasta el techo del 

otro, y allí había un ancho de veinticinco 

codos; y la entrada de un aposento estaba 

frente al otro.

14

 Midió  los  pilares:  sesenta  codos,  lle-

gando hasta los pilares del atrio que esta-

ba alrededor del portal.

15

 Y  desde  la  fachada  de  la  puerta  de  la 

entrada hasta la fachada del pórtico de la 

puerta interior, había cincuenta codos.

16

 Había  ventanas  anchas  por  dentro  y 

angostas  por  fuera,  que  daban  hacia  los 

aposentos  en  el  interior  y  alrededor  de 

la puerta. Igualmente, su vestíbulo tenía 

ventanas  alrededor  y  hacia  el  interior,  y 

en cada pilar había palmas esculpidas.

17

 Luego  me  condujo  al  atrio  exterior, 

y  he  aquí  había  aposentos,  y  un  atrio 

enlosado  todo  en  derredor.  Treinta  apo-

sentos daban a aquel atrio.

18

 El enlosado a los lados de las puertas, 

en proporción a la longitud de los porta-

les, era el enlosado más bajo.

19

 Luego midió el ancho desde el frente 

de la puerta de abajo hasta el frente del 

atrio interior, por fuera, resultando cien 

codos hacia el oriente y hacia el norte.

20

 Y  de  la  puerta  del  atrio  exterior  que 

miraba hacia el norte, midió su longitud 

y su anchura.

21

 Sus aposentos eran tres de un lado, y 

tres del otro, y sus pilares y sus arcadas 

medían en proporción a la primera puer-

ta: cincuenta codos de largo y veinticinco 

codos de ancho.

22

 Sus ventanas, las arcadas y sus palmas 

medían conforme a la medida de la puerta 

que miraba al oriente. Se subía a ella por 

siete gradas, delante de las cuales estaba 

la columnata.

23

 El atrio interior tenía una puerta fren-

te a la puerta del norte así como también 

a la del oriente. Y midió de puerta a puer-

ta: cien codos.

24

 Después me condujo hacia el sur, y he 

aquí una puerta hacia el sur, y midió sus 

portales  y  sus  arcadas  conforme  a  estas 

medidas:

25

 La puerta y sus arcadas tenían venta-

nas alrededor, como las otras ventanas. El 

largo era de cincuenta codos y el ancho 

de veinticinco codos.

26

 Sus gradas eran de siete peldaños, con 

sus arcadas delante de ellas, y tenía pal-

mas esculpidas sobre sus pilares a uno y 

otro lado.

27

 Había también una puerta que daba 

al atrio interior hacia el sur, y midió de 

puerta  a  puerta  hacia  el  sur:  cien  co-

dos.

28

 Luego me condujo al atrio interior por 

la puerta del sur, y midió la puerta del sur 

conforme a estas medidas:

29

 Sus aposentos y sus pilares y sus arca-

das  eran  conforme  a  esas  medidas:  Cin-

cuenta codos de largo, y veinticinco codos 

de ancho; y había ventanas y arcadas todo 

en derredor.

40.5 .antiguo. Lit. codo mayor, de a codo y palmo. El codo mayor medía 0,518 m, de manera que esta caña medía poco más 

de tres metros. 


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Ezequiel 41:5

885

30

 Las arcadas en derredor eran de vein-

ticinco  codos  de  largo  y  cinco  codos  de 

ancho.

31

 Sus  arcadas  estaban  orientadas  hacia 

el atrio exterior, las palmas esculpidas es-

taban sobre sus pilares, y sus gradas eran 

de ocho peldaños.

32

 Me condujo al atrio interior que daba 

al oriente, y midió la puerta conforme a 

estas medidas:

33

 Sus cámaras, sus pilares y sus arcadas 

eran conforme a estas medidas: Cincuen-

ta codos de largo, y veinticinco codos de 

ancho, y tenía sus ventanas y sus arcadas 

en derredor.

34

 Sus  arcadas  estaban  orientadas  hacia 

el atrio exterior, las palmas esculpidas es-

taban sobre sus pilares a uno y otro lado, 

y sus gradas eran de ocho peldaños.

35

 Me condujo luego a la puerta del nor-

te, y midió conforme a estas medidas:

36

 Sus aposentos, los pilares, sus arcadas 

y ventanas alrededor: Cincuenta codos de 

largo, y veinticinco codos de ancho.

37

 Sus pilares daban al atrio exterior, y las 

palmas esculpidas estaban sobre los pila-

res a uno y otro lado, y sus gradas eran de 

ocho peldaños.

38

 Y junto a los pilares y a las puertas ha-

bía una cámara con sus entradas, donde 

se habían de lavar los holocaustos.

39

 Y en el pórtico de esa puerta había dos 

mesas de un lado y dos mesas del otro, para 

degollar sobre ellas el holocausto, la vícti-

ma por el pecado y la víctima por la culpa.

40

 Por el lado de afuera, según se sube a 

la entrada de la puerta del norte, se halla-

ban dos mesas, y del otro lado del pórtico 

de la puerta, había otras dos mesas.

41

 Había cuatro mesas de este lado, y cua-

tro mesas al otro lado, junto a la puerta: 

ocho  mesas,  sobre  las  cuales  se  habrían 

de degollar las víctimas.

42

 Las  cuatro  mesas  para  el  holocausto 

eran de piedra labrada, de un codo y me-

dio de largo y un codo y medio de ancho y 

un codo de altura. Sobre éstas se habrían 

de poner los utensilios con que se dego-

llaría el holocausto y el sacrificio.

43

 Y los ganchos dobles, de un palmo me-

nor, estaban fijos por dentro en derredor, 

y sobre las mesas se colocaba la carne de 

las víctimas.

44

 Y por fuera de la puerta interior, en el 

atrio  interior,  había  aposentos  para  los 

cantores, que estaban al lado de la puerta 

del norte, los cuales miraban al sur; pero 

había uno que estaba al lado de la puerta 

del oriente, con frente al norte.

45

 Y me dijo: Este aposento que mira ha-

cia el sur es para los sacerdotes que hacen 

la guardia de la Casa,

46

 pero  el  aposento  que  mira  hacia  el 

norte  es  para  los  sacerdotes  que  deben 

custodiar el altar. Estos son los hijos de 

Sadoc,  los  cuales  han  sido  llamados  de 

entre  los  hijos  de  Leví  para  ministrar 

ante YHVH.

47

 Y midió el atrio: cien codos de largo, y 

cien codos de ancho, cuadrado; y el altar 

estaba delante de la Casa.

48

 Luego  me  condujo  al  pórtico  de  la 

Casa, y midió cada pilar del pórtico: cinco 

codos de un lado y cinco codos de otro, y 

el ancho de la puerta era de tres codos de 

un lado, y tres codos de otro.

49

 La  longitud  del  pórtico  era  de  veinte 

codos, y el ancho de once codos, al cual 

se subía por gradas. Y junto a los pilares 

había  dos°  columnas,  una  de  un  lado  y 

otra de otro.

41

Me  introdujo  luego  en  el  Santua-

rio, y midió los pilares: seis codos 

de un lado y seis codos de otro, que era el 

ancho del Tabernáculo.

2

 El ancho de la entrada: diez codos, y los 

costados  de  la  entrada:  cinco  codos  por 

un lado, y cinco codos por el otro. Y midió 

su longitud: cuarenta codos, y el ancho: 

veinte codos.

3

 Luego pasó al interior, y midió cada pi-

lar de la entrada: dos codos, y la entrada: 

seis codos,° y el ancho de la entrada: siete 

codos.

4

 Midió  también  su  longitud:  veinte  co-

dos, y el ancho: veinte codos, delante del 

Santuario.  Entonces  me  dijo:  Éste  es  el 

lugar santísimo.

5

 Después midió el muro de la Casa: seis 

codos,  y  lo  ancho  de  cada  aposento  la-

teral: cuatro codos, en torno de la Casa, 

todo en derredor.

40.49 .dos.  41.3 Esto es, de alto


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Ezequiel 41:6

886

6

 Los aposentos laterales estaban uno so-

bre otro: treinta en cada uno de los tres 

pisos, y en el muro de la Casa en derredor 

había cornisas, para que en ellas se apoya-

ran las vigas de los aposentos, sin entrar 

en el muro.

7

 Cuanto más subían, los aposentos late-

rales eran más anchos, porque la escale-

ra de caracol de la Casa subía más y más 

arriba por dentro de la Casa; por tanto, el 

ancho de la Casa aumentaba hacia arriba. 

Desde el piso inferior se podía subir hasta 

el más alto, pasando por el del medio.

8

 También  observé  que  la  Casa  tenía  un 

basamento  elevado  alrededor.  Los  ci-

mientos de los aposentos laterales (hasta 

la juntura de los pisos) eran de una caña 

entera de seis codos antiguos.

9

 El  espesor  del  muro  exterior  de  los 

aposentos laterales era de cinco codos, y 

entre  los  aposentos  laterales  de  la  Casa, 

había un espacio de igual medida.

10

 Entre los aposentos había un ancho de 

veinte  codos°  por  todos  lados  alrededor 

de la Casa.

11

 Los  aposentos  tenían  dos  entradas  al 

espacio libre, situadas una al norte y otra 

al sur. El ancho del espacio que quedaba 

era de cinco codos en derredor.

12

 El edificio que estaba enfrente del atrio, 

al lado del poniente, tenía setenta codos de 

ancho, y el muro del edificio, todo alrede-

dor, tenía un espesor de cinco codos, y su 

longitud era de noventa codos.

13

 Luego midió la Casa: cien codos de lar-

go, y  el  espacio  abierto y  el edificio con 

sus muros: cien codos de largo.

14

 También midió el ancho del frente de 

la Casa y del espacio abierto que daba al 

oriente: cien codos.

15

 Después midió la longitud del edificio 

del lado del atrio que había detrás, con sus 

galerías a uno y otro lado: cien codos, con 

la nave interior y los pórticos del atrio.

16

 Y los umbrales, las ventanas estrechas 

y  los  aposentos  en  derredor,  en  sus  tres 

niveles,  estaban  revestidos  de  madera 

desde el suelo hasta las ventanas (las ven-

tanas estaban cubiertas)

17

 por encima de la entrada, hasta el inte-

rior y aun el exterior de la Casa. El muro, 

todo en derredor, por dentro y por fuera, 

según sus medidas,

18

 estaba  labrado  con  querubines  y  pal-

mas. Había una palma entre querubín y 

querubín, y cada querubín tenía dos ros-

tros:

19

 rostro  de  hombre  hacia  la  palma  de 

un lado, y cara de león hacia la palma del 

otro  lado.  Así  estaba  hecho  por  toda  la 

Casa en derredor.

20

 Desde el suelo hasta la parte superior 

de la puerta, había querubines y palmas 

representados en el muro.

21

 En cuanto al Santuario, tenía un jam-

baje  cuadrangular,  y  delante  del  lugar 

santísimo se veía

22

 el  altar  de  madera,  de  tres  codos  de 

altura por dos de longitud. También sus 

ángulos,  su  base  y  sus  paredes  eran  de 

madera.  Y  me  dijo:  Ésta  es  la  mesa  que 

está delante de YHVH.

23

 El Santuario tenía una puerta de dos 

batientes, y el lugar santísimo

24

 poseía  igualmente  una  puerta  de  ba-

tientes dobles, y las puertas tenían dos ba-

tientes giratorias: dos batientes para una 

puerta y dos batientes para la otra.

25

 Y había en ellos querubines y palmas, 

esculpidos  como  los  del  muro;  y  había 

gruesas  vigas  de  madera  sobre  el  frente 

del pórtico exterior.

26

 Y  había  ventanas  estrechas,  y  palmas 

de uno y otro lado a los costados del pór-

tico, tanto en los aposentos laterales de la 

Casa como en los umbrales.

42

Me  llevó  luego  al  atrio  exterior, 

rumbo al norte, y me introdujo en 

el  aposento  que  estaba  frente  al  atrio  y 

enfrente del edificio, al norte.

2

 Por  delante  de  la  puerta  del  norte  su 

longitud era de cien codos, y el ancho de 

cincuenta codos.

3

 Frente al atrio interior (de veinte codos) 

y al enlosado que tenía el atrio exterior, 

había una galería que daba frente a la otra 

galería, en los tres niveles.

4

 Por delante de las cámaras había un co-

rredor de diez codos de ancho hacia aden-

tro, y sus puertas daban al norte.

5

 Los aposentos más altos eran más estre-

chos, porque las galerías les quitaban más 

41.10 Esto es, un pasillo de veinte codos de ancho


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Ezequiel 43:9

887

espacio que las de abajo y las de en medio 

del edificio,

6

 porque  estaban  en  tres  pisos,  y  no  te-

nían columnas como las columnas de los 

atrios; eran por tanto más estrechas que 

las inferiores y las intermedias.

7

 El  muro  exterior,  paralelamente  a  los 

aposentos  en  dirección  al  atrio  externo 

(frente a los aposentos), tenía cincuenta 

codos de largo,

8

 porque la longitud de los aposentos que 

daban  al  atrio  exterior  era  de  cincuenta 

codos, en tanto que los que daban a la fa-

chada del Santuario eran de cien codos.

9

 Por debajo de estos aposentos estaba la 

entrada  al  lado  oriental,  para  entrar  en 

ellos desde el atrio exterior.

10

 Contra  el  muro  del  atrio,  hacia  el 

oriente,  enfrente  del  atrio  y  delante  del 

edificio, había también aposentos,

11

 con un pasadizo delante de ellos. Se ase-

mejaban a los aposentos que miraban al nor-

te. Tanto su longitud como su ancho eran lo 

mismo, y todas sus salidas, conforme a sus 

puertas y conforme a sus entradas.

12

 Así también eran las puertas de los apo-

sentos que miraban al sur, con una puerta 

al término del pasadizo directamente en-

frente del muro de la parte oriental, para 

quien entraba en los aposentos.

13

 Luego  me  dijo:  Los  aposentos  del 

norte y los del sur, que están delante del 

atrio, son los aposentos santos, donde los 

sacerdotes que se acercan a YHVH comen 

las santas ofrendas. Allí pondrán las cosas 

más sagradas: la ofrenda vegetal, el sacri-

ficio  por  el  pecado  y  el  sacrificio  por  la 

culpa, porque el lugar es santo.

14

 Cuando los sacerdotes entren, no sal-

drán del lugar santo al atrio exterior, sino 

que  allí  dejarán  sus  vestiduras  con  que 

ministran, porque son santas. Y para salir 

se vestirán otras vestiduras, con las que se 

acercarán al pueblo.

15

 Y cuando terminó de medir el interior 

de la Casa, me llevó por el camino de la 

puerta  que  mira  al  oriente,  y  lo  midió 

todo en torno.

16

 Midió  el  costado oriental con  la caña 

de  medir:  quinientas  cañas,  medidas  en 

derredor con la caña de medir.

17

 Luego midió el costado septentrional: 

quinientas  cañas,  medidas  en  derredor 

con la caña de medir.

18

 Después midió el costado meridional: 

quinientas cañas, medidas con la caña de 

medir.

19

 Se volvió hacia la parte del poniente y 

midió  quinientas  cañas,  medidas  con  la 

caña de medir.

20

 Midió por los cuatro vientos, y el muro 

que lo rodeaba era de quinientas cañas de 

longitud  por  quinientas  de  ancho,  sepa-

rando el lugar sagrado del profano.

Vuelve la gloria

43

Después me condujo a la puerta, a 

la puerta que mira hacia el orien-

te,

2

 y he aquí la gloria del Dios de Israel que 

venía del oriente, y su voz era como el so-

nido de muchas aguas, y la tierra resplan-

decía a causa de su gloria.

3

 Y el aspecto de la visión que vi era como 

aquella visión que vi cuando vine° a des-

truir la ciudad, y las visiones eran como la 

visión que vi junto al río Quebar; enton-

ces me postré sobre mi rostro.

4

 Y la gloria de YHVH entró en la Casa por 

la vía de la puerta que mira al oriente.

5

 Y  el  espíritu  me  llevó  en  volandas  al 

atrio interior; y he aquí la gloria de YHVH 

llenaba la Casa.

6

 Entonces oí a uno que me hablaba des-

de la Casa (y el varón se mantenía en pie 

junto a mí),

7

 que me decía: Hijo de hombre, éste es el 

lugar de mi trono, el lugar donde posaré 

las plantas de mis pies, donde moraré en 

medio de los hijos de Israel para siempre, 

y  la  casa  de  Israel  no  profanará  más  mi 

santo Nombre, ni ellos ni sus reyes, con 

sus idolatrías, ni con los cadáveres de sus 

reyes en sus lugares altos,

8

 poniendo su umbral junto a mi umbral, 

y su contrafuerte junto a mi contrafuerte, 

mediando sólo un muro entre mí y ellos, 

han contaminado mi santo Nombre con 

las abominaciones que cometieron, por lo 

que los consumí en mi ira.

9

 Ahora pues, alejen ellos de mí sus ido-

latrías, y los cadáveres de sus reyes, bien 

43.3 Es decir, cuando vine a profetizar la destrucción de la ciudad


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Ezequiel 43:10

888

lejos  de  mí,  y  Yo  habitaré  en  medio  de 

ellos para siempre.

10

 Tú,  oh  hijo  de  hombre,  muestra  esta 

Casa a la casa de Israel, para que se aver-

güencen de sus iniquidades, y midan con 

exactitud el diseño.

11

 Y  si  se  avergüenzan  de  todo  lo  que 

han  hecho,  hazles  entender  la  forma  de 

la Casa: su diseño, sus salidas y sus entra-

das, todas sus formas, todas sus descrip-

ciones, todas sus configuraciones, y todas 

sus leyes. Descríbela delante de sus ojos, 

para que guarden toda su forma y todos 

sus reglamentos, y las pongan por obra.

12

 Ésta es la ley de la Casa: Sobre la cum-

bre  del  monte,  todo  el  límite  en  torno 

suyo, será santísimo. He aquí que esa es 

la ley de la Casa.

13

 Y éstas son las medidas del altar en co-

dos (el codo de a codo y palmo menor). La 

base, de un codo, y de un codo el ancho, y 

su remate por su borde en derredor, de un 

palmo. Éste será el zócalo del altar.

14

 Y  desde  la  base,  sobre  el  suelo,  hasta 

el  descanso  de  abajo  habrá  dos  codos,  y 

la anchura de un codo, y desde la cornisa 

menor hasta la cornisa mayor, cuatro co-

dos, y el ancho de un codo.

15

 El altar, de cuatro codos de alto, y en-

cima del altar habrá cuatro cuernos.

16

 El altar tendrá doce codos de largo por 

doce de ancho, cuadrado por sus cuatro 

costados.

17

 El descanso tendrá catorce codos de lar-

go por catorce de ancho en sus cuatro cos-

tados, y el borde en derredor será de medio 

codo de espesor; la base será de un codo, y 

sus gradas mirarán hacia el oriente.

18

 Y  me  dijo:  Hijo  de  hombre,  así  dice 

Adonay YHVH: Éstas son las ordenanzas 

del altar en el día en que sea hecho, para 

ofrecer sobre él holocaustos, y para espar-

cir sobre él la sangre.

19

 A los sacerdotes levitas que son del li-

naje de Sadoc y que están cerca de mí para 

ministrar  ante  mí,  dice  Adonay  YHVH, 

les  darás  un  becerro  de  la  vacada  como 

ofrenda por el pecado.

20

 Y tomarás de su sangre, y la pondrás 

en  los  cuatro  cuernos  del  altar,  y  en  las 

cuatro esquinas del descanso, y sobre el 

borde en derredor. Así lo purificarás y ha-

rás expiación por él.

21

 Tomarás luego el becerro de la expia-

ción, y lo quemarás conforme a la ley de 

la Casa, fuera del Santuario.

22

 Al  segundo  día  ofrecerás  un  macho 

cabrío  sin  defecto  como  ofrenda  por  el 

pecado, y purificarán el altar como lo pu-

rificaron con el becerro.

23

 Cuando hayas terminado de purificarlo, 

ofrecerás un becerro de la vacada sin de-

fecto, y un carnero del rebaño sin defecto.

24

 Los ofrecerás delante de YHVH, y los 

sacerdotes  echarán  sal  sobre  ellos,  y  los 

ofrecerán en holocausto a YHVH.

25

 Por siete días ofrecerás un macho ca-

brío cada día como ofrenda por el pecado, 

un becerro de la vacada, y un carnero del 

rebaño, sin tacha.

26

 Por  siete  días  harán  expiación  por  el 

altar, y lo purificarán. Así lo consagrarán.

27

 Acabados estos días, del octavo día en 

adelante,  los  sacerdotes  ofrecerán  sobre 

el  altar  vuestros  holocaustos  y  vuestras 

ofrendas de paz, y me seréis aceptos, dice 

Adonay YHVH.

44

Luego  me  hizo  volver  hacia  la 

puerta  exterior  del  Santuario  que 

miraba al oriente. Estaba cerrada.

2

 Y  me  dijo  YHVH:  Esta  puerta  estará 

cerrada. No se abrirá, ni hombre alguno 

entrará por ella, porque YHVH, el Dios de 

Israel ha entrado por ella. Por tanto per-

manecerá cerrada.

3

 En cuanto al príncipe, por ser el prínci-

pe, se sentará allí para comer pan° delan-

te de YHVH. Entrará por el pórtico de la 

puerta, y por ese mismo camino saldrá.

4

 Y  me  condujo  por  la  puerta  del  norte 

delante  de  la  Casa,  y  miré,  y  he  aquí  la 

gloria de YHVH había llenado la Casa de 

YHVH, y me postré sobre mi rostro.

5

 Y me dijo YHVH: Hijo de hombre, consi-

dera bien, mira con tus ojos y oye con tus 

oídos todo lo que Yo hablo contigo sobre 

todas las ordenanzas de la Casa de YHVH, 

y todas sus leyes; considera bien la entrada 

de la Casa, y cada salida del Santuario.

6

 Y dirás a los rebeldes de Israel: Así dice 

Adonay YHVH: ¡Oh casa de Israel! ¡Basta 

ya de todas vuestras abominaciones,

44.3 Esto es, el pan consagrado .

→Lv.8.31.


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Ezequiel 44:30

889

7

 que cometisteis trayendo extranjeros, in-

circuncisos de corazón e incircuncisos de 

carne,  para  que  estén  en  mi  Santuario  y 

profanen mi Casa cuando ofrecéis mi pan, 

la grosura y la sangre, invalidando mi pac-

to con todas vuestras abominaciones!

8

 Pues no habéis guardado lo establecido 

acerca de mis cosas santas, sino que ha-

béis puesto extranjeros como guardas de 

las ordenanzas en mi Santuario.

9

 Así dice Adonay YHVH: Ningún extran-

jero, incircunciso de corazón e incircun-

ciso  de  carne  entrará  en  mi  Santuario, 

ningún  extranjero  que  more  entre  los 

hijos de Israel.

10

 En  cuanto  a  los  levitas  que  se  apar-

taron de mí cuando Israel se alejó de mí 

yéndose  en  pos  de  sus  ídolos,  cargarán 

con su iniquidad,

11

 pero  servirán  en  mi  Santuario  como 

porteros a las puertas de la Casa, minis-

trando  en  ella,  y  sacrificarán  los  holo-

caustos  y  las  víctimas  para  el  pueblo,  y 

estarán delante de él para servirle,

12

 por cuanto lo sirvieron delante de sus 

ídolos,  y  fueron  a  la  casa  de  Israel  por 

tropezadero  de  maldad.  Por  eso  alcé  mi 

mano contra ellos jurando que cargarán 

con su iniquidad, dice Adonay YHVH.

13

 No  se  acercarán  a  mí  para  serme  sa-

cerdotes,  ni  se  acercarán  a  ninguna  de 

mis  cosas  santas  o  santísimas,  sino  que 

cargarán con su vergüenza y con las abo-

minaciones que cometieron.

14

 Pero los establezco como guardas en-

cargados  de  la  custodia  de  la  Casa,  para 

todo el servicio de ella, y para todo lo que 

en ella haya de hacerse.

15

 Pero  los  sacerdotes  levitas  hijos  de 

Sadoc,  que  guardaron  el  ordenamiento 

del  Santuario  cuando  los  hijos  de  Israel 

se apartaron de mí, ellos son los que se 

aproximarán a mí para servirme y estarán 

delante de mí para ofrecerme la grosura y 

la sangre, dice Adonay YHVH.

16

 Ellos  entrarán  en  mi  Santuario,  y  se 

acercarán  a  mi  mesa  para  servirme,  y 

guardarán mis ordenanzas.

17

 Cuando entren por las puertas del atrio 

interior, se vestirán vestiduras de lino; no 

llevarán sobre ellos cosas de lana cuando 

ministren en las puertas del atrio interior 

y dentro de la Casa.

18

 Llevarán  turbantes  de  lino  sobre  sus 

cabezas y calzoncillos de lino sobre sus lo-

mos. No se ceñirán cosa alguna que provo-

que sudor.°

19

 Y  cuando  salgan  al  atrio  exterior,  al 

atrio  de  afuera  donde  está  el  pueblo,  se 

quitarán las vestiduras con que ministra-

ron y las depositarán en los aposentos del 

Santuario, y se vestirán de otros vestidos, 

para no santificar al pueblo con sus ves-

tiduras.

20

 No se raparán sus cabezas, ni se deja-

rán las guedejas largas, sino que tan sólo 

recortarán sus cabellos.

21

 Ninguno de los sacerdotes beberá vino 

cuando  haya  de  entrar  en  el  atrio  inte-

rior.

22

 No tomarán por mujer a viuda ni a re-

pudiada, sino que tomarán para sí vírge-

nes del linaje de la casa de Israel, o viuda 

que sea viuda de sacerdote.

23

 Y enseñarán a mi pueblo la diferencia 

entre lo santo y lo profano, y les enseña-

rán a discernir entre lo impuro y lo puro.

24

 En los casos de pleito ellos estarán para 

juzgar, juzgando conforme a mis precep-

tos, y guardarán mis leyes y mis decretos 

en todas mis solemnidades, y santificarán 

mis shabbatot.

25

 No se acercarán a ningún cadáver para no 

contaminarse, pero por padre o madre, hijo 

o hija, hermano, o hermana que no haya te-

nido marido, sí podrán contaminarse.

26

 Y después de su purificación, le conta-

rán siete días.

27

 Y el día que entre al Santuario, al atrio 

interior,  para  ministrar  en  el  Santua-

rio,  ofrecerá  su  expiación,  dice  Adonay 

YHVH.

28

 Y ellos tendrán su heredad: Yo soy su 

heredad;  pero  no  les  daréis  posesión  en 

Israel. Yo soy su posesión.

29

 Comerán la ofrenda vegetal y la ofrenda 

expiatoria y la ofrenda por la culpa, y toda 

cosa consagrada en Israel será de ellos.

30

 También las primicias de todos los pri-

meros  frutos  de  todo,  y  toda  ofrenda  de 

todo lo que se presente de todas vuestras 

ofrendas, será de los sacerdotes. Asimismo 

44.18 Lit. no se ceñirán con sudor


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Ezequiel 44:31

890

daréis al sacerdote las primicias de todas 

vuestras  ofrendas  alzadas,  para  que  en 

vuestras casas repose la bendición.

31

 Los sacerdotes no podrán comer nin-

guna cosa mortecina ni desgarrada, así de 

aves como de animales.

Distribución de la tierra

45

Cuando repartáis por suertes la tie-

rra en heredad, presentaréis como 

ofrenda alzada a YHVH una porción santa 

de la tierra, de una longitud de veinticin-

co mil por veinte mil de ancho: será sa-

grado en todo su territorio en derredor.

2

 De ella será para el Santuario un cuadro 

de quinientos por quinientos, y cincuenta 

codos en derredor para sus ejidos.

3

 Y  de  esta  medida  medirás  en  longitud 

veinticinco mil, y en ancho diez mil, en 

lo cual estará el Santuario y el lugar san-

tísimo.

4

 Lo  consagrado  de  esta  tierra  será  para 

los  sacerdotes,  ministros  del  Santuario, 

que  se  acercan  para  ministrar  a  YHVH, 

y servirá de lugar para sus casas, y como 

recinto sagrado para el Santuario.

5

 Asimismo, habrá veinticinco mil de lon-

gitud y diez mil de anchura para los levi-

tas ministros de la Casa, como posesión 

para sí, con veinte aposentos.

6

 Para  propiedad  de  la  ciudad  señalaréis 

cinco mil de anchura y veinticinco mil de 

longitud, delante de lo que se apartó para 

el Santuario, y será para toda la casa de 

Israel.

7

 La parte del príncipe estará a uno y otro 

lado de lo que se apartó para el Santuario 

y de la posesión de la ciudad, a lo largo 

de  lo  que  se  apartó  para  el  Santuario,  y 

frente a la posesión de la ciudad. Su lon-

gitud corresponderá a una de las porcio-

nes, desde su extremo occidental hasta el 

extremo oriental, y desde el límite occi-

dental hasta el límite oriental.

8

 Esta  tierra  tendrá  por  posesión  en  Is-

rael, y nunca más mis príncipes oprimi-

rán a mi pueblo. Y darán la tierra a la casa 

de Israel conforme a sus tribus.

9

 Así  dice  Adonay  YHVH:  ¡Basta  ya,  oh 

príncipes de Israel! ¡Dejad la violencia y 

la rapiña; haced juicio y justicia, y quitad 

vuestras  imposiciones  de  encima  de  mi 

pueblo!, dice Adonay YHVH.

10

 Tendréis  balanzas  justas,  efa  justo  y 

bato justo.

11

 El  efa  y  el  bato  serán  de  una  misma 

medida, para que el bato contenga la déci-

ma parte del homer, y la décima parte del 

homer  el  efa.  La  medida  de  ambos  será 

según el homer.

12

 Y el siclo será de veinte geras. Veinte 

siclos, veinticinco siclos, y quince siclos,° 

os serán una mina.

13

 Ésta será la ofrenda que ofreceréis: la 

sexta parte de un efa por cada homer del 

trigo, y la sexta parte de un efa por cada 

homer de la cebada.

14

 La  ordenanza  para  el  aceite  será  que 

ofreceréis un bato de aceite, que es la déci-

ma parte de un coro. Diez batos harán un 

homer, porque diez batos son un homer.

15

 Y  del  rebaño  entre  las  doscientas,  de 

las engordadas de Israel, una cordera para 

el sacrificio, y para el holocausto, y para 

las  ofrendas  de  paz,  para  expiación  por 

ellos, dice Adonay YHVH.

16

 Todo el pueblo de la tierra estará obli-

gado  a  dar  esta  ofrenda  para  el  príncipe 

de Israel.

17

 Pero al príncipe corresponderá proveer 

el holocausto y el sacrificio y la libación 

en las solemnidades, en las lunas nuevas, 

en los shabbatot y en todas las solemni-

dades de la casa de Israel. Él dispondrá la 

expiación, la ofrenda, el holocausto, y las 

ofrendas de paz, para hacer expiación por 

la casa de Israel.

18

 Así dice Adonay YHVH: El mes prime-

ro, el día primero del mes, tomarás de la 

vacada un becerro sin defecto, y purifica-

rás el Santuario.

19

 El sacerdote tomará de la sangre de la 

víctima expiatoria, y untará los postes de 

la puerta de la Casa, y los cuatro ángulos 

del descanso del altar, y los postes de las 

puertas del atrio interior.

20

 Así harás el séptimo día del mes para 

los que pecaron por error y por engaño, y 

harás expiación por la Casa.

21

 El mes primero, a los catorce días del 

mes,  tendréis  la  Pascua,  solemnidad  de 

siete días: se comerá pan sin levadura.

45.12 Es decir, sesenta siclos


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Ezequiel 46:19

891

22

 Aquel día el príncipe sacrificará por sí 

mismo y por todo el pueblo de la tierra, 

un becerro por el pecado.

23

 Y  durante  los  siete  días  de  la  solem-

nidad ofrecerá el holocausto ante YHVH: 

siete becerros y siete carneros sin defecto, 

cada día de los siete días, y por el pecado 

un macho cabrío cada día.

24

 Y con cada becerro ofrecerá ofrenda de 

un efa, y con cada carnero un efa, y por 

cada efa un hin de aceite.

25

 En  el  mes  séptimo,  a  los  quince  días 

del mes, en la solemnidad, hará como en 

estos siete días en cuanto a la expiación, 

y en cuanto al holocausto, y en cuanto al 

presente y en cuanto al aceite.

Del shabbat y otras ordenanzas

46

Así  dice  Adonay  YHVH:  La  puerta 

del atrio interior que mira al orien-

te estará cerrada los seis días de trabajo, 

pero será abierta en el día del shabbat y 

también el día de la luna nueva.

2

 Y el príncipe entrará por el camino del 

portal de la puerta exterior, y estará en pie 

junto al umbral de la puerta mientras los 

sacerdotes  ofrezcan  su  holocausto  y  sus 

ofrendas de paz, y se postrará junto a la 

entrada de la puerta. Después saldrá, pero 

la puerta no se cerrará hasta el atardecer.

3

 Asimismo, el pueblo de la tierra se postra-

rá a la entrada de la puerta delante de YHVH 

en los shabbatot y en las lunas nuevas.

4

 El holocausto que el príncipe ofrecerá a 

YHVH en el shabbat será de seis corderos 

sin defecto, y un carnero sin tacha.

5

 La ofrenda vegetal será de un efa de flor 

de harina para el carnero, y con cada cor-

dero una ofrenda conforme a sus posibili-

dades, y un hin de aceite con el efa.

6

 Pero el día del novilunio será un bece-

rro sin tacha de la vacada, seis corderos, y 

un carnero. Deberán ser sin defecto.

7

 Proveerá  como  ofrenda  vegetal  un  efa 

de flor de harina por becerro, y un efa por 

carnero, pero para los corderos, ofrenda-

rá conforme a sus posibilidades, y un hin 

de aceite por efa.

8

 Y cuando el príncipe entre, entrará por 

el camino del portal de la puerta, y por el 

mismo camino saldrá.

9

 Pero  cuando  el  pueblo  de  la  tierra  en-

tre ante la presencia de YHVH en las so-

lemnidades, el que entre por la puerta del 

norte saldrá por la puerta del sur, y el que 

entre por la puerta del sur saldrá por la 

puerta del norte. No volverá por la puerta 

por donde entró, sino que saldrá por la de 

enfrente de ella.

10

 Y, cuando ellos entren, el príncipe en-

trará  en  medio  de  ellos,  y  cuando  ellos 

salgan, él saldrá.

11

 Y en las solemnidades y en las asam-

bleas prescritas la ofrenda será de un efa 

por becerro, y un efa por carnero, y por 

los corderos como pueda dar, y un hin de 

aceite por efa.

12

 Y cuando el príncipe haga libremente 

holocausto u ofrendas de paz a YHVH, le 

abrirá°  la  puerta  que  mira  al  oriente,  y 

hará su holocausto y sus ofrendas de paz, 

como  hace  en  el  shabbat.  Luego  saldrá, 

y  se  cerrará  la  puerta  después  que  haya 

salido.

13

 Y ofrecerás en sacrificio a YHVH cada 

día en holocausto un cordero añal sin de-

fecto. Cada mañana lo sacrificarás.

14

 Y con él, cada mañana como ofrenda 

vegetal, ofrecerás la sexta parte de un efa 

de flor de harina, y la tercera parte de un 

hin de aceite para mezclar con la flor de 

harina.  Es  ofrenda  vegetal  para  YHVH 

continuamente, por estatuto perpetuo.

15

 Así presentarán el cordero y la ofrenda 

vegetal y el aceite cada mañana en holo-

causto continuo.

16

 Así  dice  Adonay  YHVH:  Si  el  príncipe 

diera parte de su heredad a cualquiera de 

sus hijos, es su herencia; a sus hijos perte-

necerá, pues es su posesión por herencia.

17

 Pero si de su heredad da parte a alguno 

de sus  siervos, será de  éste  hasta  el  año 

del jubileo, y luego retornará al príncipe, 

porque la herencia pertenece a los hijos.

18

 El príncipe no podrá tomar nada de la 

herencia del pueblo, para no defraudarlos 

de  su  posesión.  De  sus  propias  posesio-

nes dará herencia a sus hijos, a fin de que 

ninguno de mi pueblo sea privado de su 

posesión.

19

 Me condujo después por la entrada que 

estaba  hacia  la  puerta,  a  los  aposentos 

46.12 En el TM: 3ª pers, masc. sing. 


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Ezequiel 46:20

892

santos de los sacerdotes, que miraban al 

norte, y he aquí un recinto detrás de ellos 

hacia el occidente.

20

 Y me dijo: Éste es el recinto donde los 

sacerdotes cocerán la ofrenda por el peca-

do y la ofrenda por la expiación, y donde 

tostarán la ofrenda vegetal, para que no la 

saquen al atrio exterior, y santifiquen así 

al pueblo.

21

 Luego me condujo al atrio exterior, y 

me hizo pasar por las cuatro esquinas del 

atrio, y he aquí en cada esquina había un 

atrio pequeño.

22

 Y en las cuatro esquinas del atrio ha-

bía  pequeños  atrios,  de  cuarenta  codos 

de largo por treinta de ancho. Los cuatro 

eran de la misma medida.

23

 Y  había  una  pared  alrededor  de  ellos 

(alrededor de los cuatro), con fogones por 

debajo de las paredes en derredor.

24

 Entonces me dijo: Éstos son los fogo-

nes donde los servidores de la Casa coce-

rán los sacrificios del pueblo.

El manantial de la casa

47

Me  condujo  nuevamente  a  la  en-

trada  de  la  Casa,  y  he  aquí  aguas 

que salían de debajo del umbral de la Casa 

hacia el oriente, porque la fachada de la 

Casa miraba al oriente, y las aguas venían 

desde abajo, del lado derecho de la Casa, 

al sur del altar.

2

 Luego  me  sacó  afuera,  por  el  camino 

de la puerta del norte, y me hizo dar una 

vuelta  por  el  camino  de  afuera,  hacia  el 

exterior, por el camino que daba al orien-

te, y he aquí las aguas salían por el lado 

sur.

3

 Cuando  el  varón  salió  hacia  el  oriente 

con el cordel en su mano, midió mil co-

dos, y me hizo pasar por las aguas, hasta 

los tobillos.

4

 Otra vez midió mil codos, y me hizo pa-

sar por las aguas, hasta las rodillas. Midió 

luego otros mil, y me hizo pasar por las 

aguas, hasta los lomos.

5

 Midió otros mil, y ya era un río por el 

que no podía pasar, porque las aguas ha-

bían crecido de manera que el río no se 

podía pasar sino a nado.

6

 Y me dijo: ¿Has visto, hijo de hombre? 

Después me llevó, y me hizo volver a la 

ribera del río.

7

 Y cuando fui traído de regreso, he aquí 

que en la ribera del río, a uno y otro lado, 

había muchísimos árboles.

8

 Entonces  me  dijo:  Estas  aguas  fluyen 

hacia la región del oriente, y descenderán 

al  Arabá,  y  cuando  entren  en  el  mar,  el 

mar de las aguas pútridas, las aguas reci-

birán sanidad.

9

 Y  todo  ser  viviente  que  nade  por  don-

dequiera que entren estos dos ríos, vivi-

rá, y habrá una gran multitud de peces, 

porque  esas  aguas  han  entrado  allí  para 

que todas las cosas sean sanadas y vivan 

dondequiera que llegue el río.

10

 Y sucederá que a los pescadores que es-

tén junto al río, desde En-gadi hasta En-

eglaim, les será lugar para extender redes; 

y los peces serán de muchas clases, tan nu-

merosos como los peces del Mar Grande.

11

 Pero  sus  pantanos  y  sus  lagunas  no 

se sanearán, sino que quedarán para sa-

linas.

12

 Y  en  las  orillas  del  río,  a  uno  y  otro 

lado,  crecerá  toda  clase  de  árboles  fru-

tales,  cuyas  hojas  no  se  marchitarán  y 

cuyos frutos no caerán. Brindarán frutos 

nuevos todos los meses, porque las aguas 

que  los  riegan  salen  del  Santuario,  y  su 

fruto será para alimento, y sus hojas para 

medicina.

13

 Así dice Adonay YHVH: Éstos son los 

límites en que repartiréis la tierra por he-

redad entre las doce tribus de Israel. José 

recibirá dos porciones.

14

 Y la heredaréis así los unos como los 

otros,  respecto  de  la  cual  alcé  mi  mano 

jurando  que  la  había  de  dar  a  vuestros 

padres.  Por  tanto,  ésta  será  la  tierra  de 

vuestra heredad.

15

 Y éste será el límite de la tierra hacia 

el lado del norte: desde el Mar Grande, ca-

mino de Hetlón viniendo a Zedad,

16

 Hamat, Berota, Sibraim, que está en-

tre  el  límite  de  Damasco  y  el  límite  de 

Hamat, y Hazar-haticón, que es el límite 

de Haurán.

17

 De  manera  que  el  lindero  será  desde 

el mar hasta Hazar-enán en el límite de 

Damasco,  teniendo  al  norte  el  límite  de 

Hamat. Este será el lado del norte.

18

 Y mediréis el límite oriental desde en-

tre Haurán y Damasco, y entre Galaad y la 

tierra de Israel, junto al Jordán, desde el 


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Ezequiel 48:19

893

lindero septentrional hasta el mar orien-

tal. Este será el lado oriental.

19

 Del lado meridional, hacia el sur, desde 

Tamar  hasta  las  aguas  de  Meribá-Cades, 

hasta el torrente° y el Mar Grande: éste será 

el lado meridional del límite por el sur.

20

 Y  el  límite  occidental  será  el  Mar 

Grande,  desde  el  lindero  meriodional 

hasta  frente  a  Hamat.  Éste  será  el  lado 

occidental.

Repartición de la tierra prometida

21

 Así dividiréis esta tierra entre vosotros 

según las tribus de Israel.

22

 Y echaréis sobre ella suertes por here-

dad entre vosotros, y entre los extranjeros 

que moran en medio de vosotros y hayan 

tenido hijos entre vosotros; ellos os serán 

como naturales entre los hijos de Israel: 

echarán suertes con vosotros para tener 

heredad entre las tribus de Israel.

23

 Y sucederá que en cualquier tribu don-

de habite el extranjero, allí mismo le da-

réis su heredad, dice Adonay YHVH.

48

Éstos son los nombres de las tribus: 

Desde el extremo norte por la vía 

de Hetlón viniendo a Hamat, Hazar-enán, 

en los confines de Damasco, al norte, ha-

cia Hamat, tendrá Dan una parte, desde el 

lado oriental hasta el occidental.

2

 Junto a la frontera de Dan, desde el lado 

oriental hasta el lado del mar, tendrá Aser 

una parte.

3

 Junto  al  límite  de  Aser,  desde  el  lado 

oriental  hasta  el  lado  del  mar,  Neftalí, 

otra.

4

 Junto al límite de Neftalí, desde el lado 

oriental  hasta  el  lado  del  mar,  Manasés, 

otra.

5

 Junto  al  límite  de  Manasés,  desde  el 

lado oriental hasta el lado del mar, Efraín, 

otra.

6

 Junto al límite de Efraín, desde el lado 

oriental  hasta  el  lado  del  mar,  Rubén, 

otra.

7

 Junto al límite de Rubén, desde el lado 

oriental hasta el lado del mar, Judá, otra.

8

 Junto  al  límite  de  Judá,  desde  el  lado 

oriental  hasta  el  lado  del  mar,  estará  la 

porción  que  reservaréis  de  veinticinco 

mil cañas de anchura, y de longitud como 

cualquiera de las otras partes, esto es, des-

de el lado oriental hasta el lado del mar, y 

el Santuario estará en medio de ella.

9

 La porción que reservaréis para YHVH 

tendrá veinticinco mil cañas de longitud, 

y diez mil de ancho.

10

 La porción santa que pertenecerá a los 

sacerdotes será de veinticinco mil cañas al 

norte, y de diez mil de anchura al occiden-

te, y de diez mil de ancho al oriente, y de 

veinticinco mil de longitud al sur; y el San-

tuario de YHVH estará en medio de ella.

11

 Los sacerdotes santificados de los hijos 

de Sadoc que me guardaron fidelidad, que 

no erraron cuando erraron los hijos de Is-

rael, como erraron los levitas,

12

 ellos tendrán como parte santísima la 

porción de la tierra reservada, junto al lí-

mite de la de los levitas.

13

 Y la de los levitas, al lado de los límites 

de la de los sacerdotes, será de veinticinco 

mil  cañas  de  longitud,  y  de  diez  mil  de 

anchura; toda la longitud de veinticinco 

mil, y la anchura de diez mil.

14

 No  venderán  nada  de  ello,  ni  lo  per-

mutarán, ni traspasarán las primicias de 

la  tierra;  porque  es  cosa  consagrada  a 

YHVH.

15

 Y las cinco mil cañas de anchura que 

quedan de las veinticinco mil, serán pro-

fanas,  para  la  ciudad,  para  habitación  y 

para ejido; y la ciudad estará en medio.

16

 Éstas  serán  sus  medidas:  al  lado  del 

norte cuatro mil quinientas cañas, al lado 

del sur cuatro mil quinientas, al lado del 

oriente  cuatro  mil  quinientas,  y  al  lado 

del occidente cuatro mil quinientas.

17

 Y el ejido de la ciudad será al norte de 

doscientas cincuenta cañas, al sur de dos-

cientas cincuenta, al oriente de doscien-

tas cincuenta, y de doscientas cincuenta 

al occidente.

18

 Y lo que quede de longitud delante de 

la porción santa, diez mil cañas al oriente 

y  diez  mil  al  occidente,  que  será  lo  que 

quedará de la porción santa, será para que 

siembren los que sirven a la ciudad.

19

 Y los que sirvan a la ciudad serán de 

todas la tribus de Israel.

47.19 Esto es, Egipto


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Ezequiel 48:20

894

20

 Toda la porción reservada de veinticinco 

mil cañas por veinticinco mil en cuadro, 

reservaréis como porción para el Santua-

rio, y para la posesión de la ciudad.

21

 Del príncipe será lo que quedare a uno 

y otro lado de la porción santa y de la po-

sesión de la ciudad, esto es, delante de las 

veinticinco mil cañas de la porción hasta 

el límite oriental, y al occidente delante 

de las veinticinco mil hasta el límite oc-

cidental, delante de las partes dichas será 

del príncipe; porción santa será, y el San-

tuario de la casa estará en medio de ella.

22

 De  este  modo,  la  parte  del  príncipe 

será la comprendida desde la porción de 

los levitas y la porción de la ciudad, entre 

el límite de Judá y el límite de Benjamín.

23

 En cuanto a las demás tribus, desde el 

lado oriental hasta el lado del mar, Benja-

mín tendrá una porción.

24

 Junto al límite de Benjamín, desde el 

lado  oriental  hasta  el  lado  del  mar,  Si-

meón, otra.

25

 Junto  al  límite  de  Simeón,  desde  el 

lado oriental hasta el lado del mar, Isacar, 

otra.

26

 Junto al límite de Isacar, desde el lado 

oriental  hasta  el  lado  del  mar,  Zabulón, 

otra.

27

 Junto al límite de Zabulón, desde el lado 

oriental hasta el lado del mar, Gad, otra.

28

 Junto  al  límite  de  Gad,  al  lado  meri-

dional, al sur, será el límite desde Tamar 

hasta  las  aguas  de  las  rencillas,  y  desde 

Cades y el arroyo hasta el Mar Grande.

29

 Ésta  es  la  tierra  que  repartiréis  por 

suertes en heredad a las tribus de Israel, 

y  éstas  son  sus  porciones,  dice  Adonay 

YHVH.

30

 Y éstas son las salidas de la ciudad: al 

lado del norte, cuatro mil quinientas ca-

ñas por medida.

31

 Y las puertas de la ciudad serán según 

los  nombres  de  las  tribus  de  Israel:  tres 

puertas al norte: la puerta de Rubén, una; 

la puerta de Judá, otra; la puerta de Leví, 

otra.

32

 Al lado oriental cuatro mil quinientas 

cañas,  y  tres  puertas:  la  puerta  de  José, 

una; la puerta de Benjamín, otra; la puer-

ta de Dan, otra.

33

 Al lado del sur, cuatro mil quinientas 

cañas por medida, y tres puertas: la puer-

ta  de  Simeón,  una;  la  puerta  de  Isacar, 

otra; la puerta de Zabulón, otra.

34

 Y  al  lado  occidental  cuatro  mil  qui-

nientas cañas, y sus tres puertas: la puer-

ta de Gad, una; la puerta de Aser, otra; la 

puerta de Neftalí, otra.

35

 En derredor tendrá dieciocho mil ca-

ñas.  Y  desde  aquel  día,  el  nombre  de  la 

ciudad será YHVH-Sama.°

48.35 

→ § 4. 


background image

1

En  el  año  tercero  del  reinado  de 

Joacim, rey de Judá, llegó a Jerusalem 

Nabucodonosor, rey de Babilonia, y la si-

tió.

2

 Y Adonay entregó en su mano a Joacim 

rey de Judá, y parte de los utensilios de 

la  Casa  de  Dios,  y  los  llevó  a  tierra  de 

Sinar, al templo de su dios, y colocó los 

utensilios en el tesoro del templo de su 

dios.

3

 El rey ordenó a Aspenaz, jefe de los eu-

nucos,  seleccionar  algunos  israelitas  del 

linaje real y de la nobleza,

4

 jóvenes  perfectamente  sanos,  de  buen 

parecer, bien formados en sabiduría, cul-

tos e inteligentes, y aptos para servir en el 

palacio real, y ordenó que se les enseñara 

la lengua y literatura de los caldeos.

5

 El rey les asignó su ración diaria de la 

mesa  real,  y  del  vino  que  él  bebía,  para 

alimentarlos durante tres años, al cabo de 

los cuales pasarían a servir al rey.

6

 Entre  ellos  había  unos  judíos:  Daniel, 

Ananías, Misael y Azarías;

7

 a  los  cuales  el  jefe  de  los  eunucos  les 

cambió los nombres, llamando a Daniel, 

Beltsasar;  a  Ananías,  Sadrac;  a  Misael, 

Mesac, y a Azarías, Abed-nego.

8

 Daniel decidió en su corazón no conta-

minarse con la comida del rey ni con el 

vino que bebía, por lo que pidió al prín-

cipe de los eunucos que lo dispensara de 

esa contaminación.

9

 Y Dios había concedido a Daniel hallar 

gracia y afecto de parte del jefe de los eu-

nucos.

10

 Y el jefe de los eunucos dijo a Daniel: 

Temo a mi señor el rey, que ha asigna-

do  vuestra  comida  y  bebida.  Si  él  llega 

a  ver  vuestros  rostros  demacrados,  en 

comparación con los jóvenes que son de 

vuestra edad, peligraría mi cabeza ante 

el rey.

11

 Entonces  Daniel  dijo  al  mayordomo, 

que  el  jefe  de  los  eunucos  había  puesto 

para cuidarlo a él, a Ananías, a Misael y 

a Azarías:

12

 Te ruego que hagas la prueba con tus 

siervos durante diez días: que nos den le-

gumbres para comer y agua para beber,

13

 y  luego  sea  comparado  nuestro  sem-

blante con los rostros de los jóvenes que 

comen de la comida del rey, y haz después 

con tus siervos según hayas visto.

14

 Y él convino con ellos, e hizo la prueba 

durante diez días.

15

 Al final de los diez días, sus semblantes 

tenían mejor parecer y estaban más salu-

dables que todos los jóvenes que comían 

de los delicados manjares del rey.

16

 Por lo cual el mayordomo se llevaba la 

porción de la comida de ellos y el vino que 

habían de beber, y les daba legumbres.

17

 Dios  concedió  a  estos  cuatro  jóvenes 

conocimiento e inteligencia en todas las 

letras  y  ciencias,  y  Daniel  sabía  además 

interpretar visiones y sueños.

18

 Al cabo del tiempo que el rey había fi-

jado para prepararlos, el jefe de los eunu-

cos los llevó delante de Nabucodonosor.

19

 Cuando el rey habló con ellos, no fue 

hallado  entre  todos  ellos  ninguno  como 

Daniel,  Ananías,  Misael  y  Azarías;  y  así, 

permanecieron en presencia del rey.

20

 Y sobre todo asunto de sabiduría e in-

teligencia  que  el  rey  les  consultaba,  los 

halló  diez  veces  mejores  que  todos  los 

magos y astrólogos que había en todo su 

reino.

En Babilonia


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Daniel 1:21

896

21

 Y Daniel continuó° hasta el año prime-

ro del rey Ciro.

El sueño de Nabucodonosor

2

En el año segundo de su reinado, Na-

bucodonosor tuvo un sueño, y su es-

píritu se perturbó de manera tal, que no 

pudo seguir durmiendo.

2

 Hizo  llamar  el  rey  a  los  magos,  astró-

logos,  hechiceros  y  caldeos,°  para  que 

interpretaran  el  sueño  del  rey.  Vinieron 

pues y se presentaron ante el rey,

3

 y el rey les dijo: He tenido un sueño, y 

mi espíritu se desespera por entender ese 

sueño.

4

 Entonces  los  caldeos  respondieron  al 

rey en lengua aramea: ¡Vive por siempre, 

oh rey! Di a tus siervos cuál fue ese sueño, 

y te haremos saber la interpretación.

5

 Respondiendo el rey, dijo a los caldeos: 

El asunto se me olvidó, pero si no me ha-

céis  saber  el  sueño  y  su  interpretación, 

seréis  hechos  pedazos  y  vuestras  casas 

serán convertidas en muladares.

6

 Sin  embargo,  si  me  declaráis  el  sueño 

y  su  interpretación,  recibiréis  regalos, 

recompensas y grandes honores de parte 

mía. Sólo declaradme el sueño y su inter-

pretación.

7

 Respondieron  por  segunda  vez,  y  dije-

ron: Refiera el rey el sueño a sus siervos, 

y le mostraremos la interpretación.

8

 Respondió el rey y dijo: En verdad veo 

que ponéis dilaciones, porque sabéis que 

es un asunto que tengo ya decidido.

9

 Si  no  me  mostráis  el  sueño,  una  mis-

ma será vuestra sentencia, pues os habéis 

confabulado para mentirme con palabras 

falsas mientras pasa el tiempo. ¡Declarad-

me de una vez el sueño, y sabré que po-

dréis interpretármelo!

10

 Los  caldeos  respondieron  ante  el  rey 

y  dijeron:  No  hay  hombre  sobre  la  tie-

rra que pueda declarar lo que pide el rey. 

Ningún  rey,  por  poderoso  que  fuera,  ha 

pedido cosa semejante a mago, astrólogo 

o caldeo alguno.

11

 Porque el asunto que el rey demanda 

es  cosa  ardua,  y  no  hay  quien  lo  pueda 

declarar al rey, salvo los dioses, cuya mo-

rada no está con la carne.

12

 Por esto el rey, airado y con gran eno-

jo, ordenó que todos los sabios de Babilo-

nia fueran exterminados.

13

 Y se publicó el edicto de que los sabios 

fueran  llevados  a  la  muerte,  y  también 

buscaron  a  Daniel  y  a  sus  compañeros 

para ejecutarlos.

14

 Entonces Daniel habló sabia y pruden-

temente  a  Arioc,  capitán  de  la  guardia 

real, encargado de exterminar a los sabios 

de Babilonia.

15

 Le preguntó pues a Arioc, capitán del 

rey: ¿A qué se debe tan perentorio edic-

to del rey? Entonces Arioc hizo saber el 

asunto a Daniel.

16

 Entonces  Daniel  entró  y  pidió  al  rey 

que le diera tiempo para mostrar la inter-

pretación al rey.

17

 Y  fue  Daniel  a  su  casa,  y  comunicó 

todo el asunto a sus compañeros Ananías, 

Misael y Azarías,

18

 instándoles a implorar la gran miseri-

cordia  del  Dios  de  los  cielos  respecto  al 

misterio, a fin de que Daniel y sus com-

pañeros no perecieran junto con los otros 

sabios de Babilonia.

19

 Entonces,  en  una  visión  nocturna,  el 

misterio le fue revelado a Daniel, por lo 

cual Daniel bendijo al Dios de los cielos.

20

  Daniel pues habló y dijo:

Bendito sea el nombre de ’Eloha

Por los siglos de los siglos,

Suya es la sabiduría y el poder.

21

    Él muda los tiempos y las edades.

Él quita los reyes y establece los 

reyes.

Él da la sabiduría a los sabios,

Y ciencia a los inteligentes,

22

    Revela los secretos más profundos,

Conoce lo que ocultan las tinieblas,

Y la luz habita con Él.

23

    ¡A ti, oh Dios de mis padres,

Te alabo y te doy gracias,

Pues me diste sabiduría y fortaleza,

Y me revelaste lo que te pedimos:

¡Nos diste a conocer el asunto del 

rey!

24

 Después de esto fue Daniel a Arioc, al 

cual el rey había puesto para matar a los 

sabios de Babilonia, y le dijo así: No mates 

a los sabios de Babilonia. Llévame ante la 

1.21 Esto es, en la casa real.  2.2 Esto es, especialistas en lo oculto


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Daniel 2:46

897

presencia del rey, y yo le mostraré la in-

terpretación del sueño.

25

 Arioc llevó prontamente a Daniel ante 

el rey, y le dijo así: He hallado un varón de 

los deportados de Judá que dará la inter-

pretación al rey.

26

 El rey preguntó a Daniel, al cual llama-

ban Beltsasar: ¿Podrás tú acaso hacerme 

saber el sueño que vi, con su interpreta-

ción?

27

 Daniel  respondió  delante  del  rey,  y 

dijo: El misterio que el rey demanda, ni 

sabios,  ni  astrólogos,  ni  magos  ni  adivi-

nos lo pueden revelar al rey.

28

 Pero ’Elah existe en los cielos, el cual 

revela los misterios, el cual hace conocer 

al rey Nabucodonosor lo que ha de acon-

tecer  en  los  postreros  días.  He  aquí  tu 

sueño, y las visiones que has tenido en tu 

cama:

29

 Estando  tú,  oh  rey,  en  tu  cama,  te 

vinieron pensamientos por saber lo que 

había de ser en lo por venir; y el que re-

vela los misterios te mostró lo que ha de 

ser.

30

 Y a mí me ha sido revelado el misterio, 

no porque en mí haya más sabiduría que 

en cualquier otro viviente, sino para que 

se dé a conocer la interpretación al rey, y 

para  que  entiendas  los  pensamientos  de 

tu corazón.

31

 Tú,  oh  rey,  mirabas,  y  ¡he  aquí  una 

imagen  colosal!  Esta  estatua,  que  era 

gigantesca, y cuya gloria era muy subli-

me, estaba en pie ante ti, y su aspecto era 

asombroso.

32

 La  cabeza  de  esta  imagen  era  de  oro 

fino; su pecho y sus brazos, de plata; su 

vientre y sus muslos, de bronce;

33

 sus piernas, de hierro; sus pies, en par-

te de hierro y en parte de barro cocido.

34

 Estabas mirando, hasta que fue corta-

da una piedra (no con mano humana), y 

golpeó a la imagen en sus pies de hierro y 

barro cocido y los desmenuzó.

35

 Entonces fueron desmenuzados junta-

mente el hierro, el barro cocido, el bron-

ce, la plata y el oro, y fueron como tamo 

de las eras del verano, que el viento arre-

bata  sin  que  de  ellos  quede  rastro  algu-

no. Pero la piedra que golpeó a la imagen 

vino a ser un gran monte que llenó toda 

la tierra.

36

 Éste es el sueño, y ahora diremos° al 

rey su interpretación:

37

 Tú, oh rey, eres el más poderoso rey, a 

quien el Dios de los cielos ha dado el rei-

no y el poder, la fortaleza y la majestad.

38

 Y  dondequiera  habitan  los  hombres, 

las bestias del campo y las aves de los cie-

los, Él los ha entregado en tu mano, y te 

ha dado el dominio sobre todo: ¡Tú eres 

esa cabeza de oro!

39

 Después de ti, se levantará otro reino 

inferior al tuyo; y luego un tercer reino 

de bronce, el cual dominará sobre toda la 

tierra.

40

 El  cuarto  reino  será  fuerte  como  el 

hierro,  y  como  el  hierro  desmenuza  y 

rompe todas las cosas, así desmenuzará y 

quebrantará todo.

41

 Y lo que viste de los pies y los dedos, 

en parte de barro cocido de alfarero y en 

parte de hierro, representan un reino di-

vidido, pero habrá en él algo de la solidez 

del hierro, según viste el hierro mezclado 

con el barro cocido.

42

 Y por ser los dedos de los pies en parte 

de hierro y en parte de barro cocido, el rei-

no será en parte fuerte y en parte débil.

43

 Según viste el hierro mezclado con el 

barro, se mezclarán por medio de alian-

zas  humanas,  pero  no  se  unirán  el  uno 

con el otro, como el hierro no se mezcla 

con el barro.

44

 Y  en  los  días  de  estos  reyes,  el  Dios 

de los cielos establecerá un reino que no 

será jamás destruido, ni el reino será de-

jado a otro pueblo, sino que desmenuzará 

y consumirá a todos estos reinos, pero él 

permanecerá para siempre,

45

 tal como viste que del monte fue cor-

tada una piedra (no con mano humana), 

la cual desmenuzó el hierro, el bronce, el 

barro, la plata y el oro. El gran Dios ha 

mostrado al rey lo que ha de acontecer en 

lo por venir; y el sueño es verdadero, y fiel 

su interpretación.

46

 Entonces  el  rey  Nabucodonosor  se 

postró sobre su rostro y se humilló ante 

Daniel, y mandó que le ofrecieran presen-

tes e incienso.

2.36 Nótese el plural. 


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Daniel 2:47

898

47

 Y  habló  el  rey  a  Daniel,  y  dijo:  ¡Cier-

tamente  vuestro  Dios  es  el  Dios  de  los 

dioses  y  Señor  de  los  reyes,  y  revelador 

de  misterios,  pues  pudiste  revelar  este 

misterio!

48

 Entonces el rey hizo engrandecer a Da-

niel, y le dio grandes honores y muchos 

presentes, y lo constituyó gobernador de 

toda la provincia de Babilonia, y príncipe 

sobre todos los sabios de Babilonia.

49

 Daniel entonces solicitó del rey, y ob-

tuvo que pusiera sobre los negocios de la 

provincia de Babilonia a Sadrac, Mesac y 

Abed-nego; pero Daniel permaneció en la 

corte del rey.

La soberbia de Nabucodonosor

3

El rey Nabucodonosor hizo una esta-

tua de oro de sesenta codos de altura 

y seis codos de ancho, y la hizo levantar 

en la llanura de Dura, en la provincia de 

Babilonia.

2

 Y el rey Nabucodonosor hizo que se re-

unieran  los  sátrapas,  prefectos  y  gober-

nadores,  jueces,  tesoreros,  consejeros, 

magistrados,  y  todos  los  altos  funciona-

rios de las provincias, para que vinieran 

a la consagración de la estatua que el rey 

Nabucodonosor había hecho levantar.

3

 Con  lo  cual  fueron  reunidos  los  sátra-

pas, prefectos y gobernadores, los jueces, 

tesoreros, consejeros, magistrados, y to-

dos los altos funcionarios de las provin-

cias, a la consagración de la estatua que el 

rey Nabucodonosor había hecho levantar, 

y se presentaron ante la estatua que el rey 

Nabucodonosor había hecho levantar.

4

 Entonces el heraldo pregonó a gran voz: 

Pueblos, naciones y lenguas:

5

 ¡Se ordena que al oír el son de la corneta 

y del silbato, del tamboril, del arpa y del 

salterio, de la zampoña y de todo instru-

mento de música, os postréis y adoréis la 

estatua  de  oro  que  ha  hecho  levantar  el 

rey Nabucodonosor!

6

 ¡El que no se postre en adoración, en la 

misma  hora  será  arrojado  dentro  de  un 

horno de fuego abrasador!

7

 Por lo cual, al momento en que los di-

versos pueblos oyeron el son de la corneta 

y del silbato, del tamboril, del arpa y del 

salterio, de la zampoña y de todo instru-

mento de música, los pueblos de toda na-

ción y lengua se postraron y adoraron la 

estatua de oro que el rey Nabucodonosor 

había hecho levantar.

8

 Con  tal  motivo,  se  acercaron  en  aquel 

momento algunos varones caldeos y acu-

saron maliciosamente a los judíos.

9

 Tomando la palabra, dijeron al rey Na-

bucodonosor: ¡Oh rey, vive para siempre!

10

 Tú, oh rey, has decretado que todo hom-

bre que oiga el son de la corneta y del silba-

to, del tamboril, del arpa y del salterio, de la 

zampoña y de todo instrumento de música, 

se postre y adore la estatua de oro,

11

 y el que no se postre en adoración, sea 

arrojado dentro del horno de fuego abra-

sador.

12

 Pero  hay  ciertos  varones  judíos,  a 

quienes encomendaste la administración 

de la provincia de Babilonia: Sadrac, Me-

sac y Abed-nego; estos hombres, oh rey, 

no te guardan ninguna consideración, ni 

adoran a tus dioses, ni han adorado la es-

tatua de oro que hiciste erigir.

13

 Entonces  Nabucodonosor,  con  cólera 

y  furor,  mandó  traer  a  Sadrac,  Mesac  y 

Abed-nego, los cuales fueron llevados de 

inmediato ante el rey.

14

 Nabucodonosor tomó la palabra y les 

dijo: Sadrac, Mesac y Abed-nego: ¿Es ver-

dad  que  vosotros  no  rendís  culto  a  mis 

dioses, ni adoráis la estatua de oro que yo 

hice levantar?

15

 Ahora pues, si al oír el son de la cor-

neta y del silbato, del tamboril, del arpa 

y  del  salterio,  de  la  zampoña  y  de  todo 

instrumento de música, estáis dispuestos 

a postraros en adoración ante la estatua 

que he hecho, os irá bien;° pero si no la 

adoráis, en la misma hora seréis echados 

en medio del horno de fuego abrasador, ¿y 

qué dios os podrá librar de mis manos?

16

 Entonces  Sadrac,  Mesac  y  Abed-nego 

respondieron  al  rey  Nabucodonosor,  di-

ciendo: No tenemos por qué responderte 

sobre este asunto.

17

 ¡He aquí, nuestro Dios a quien servi-

mos, existe! Él tiene poder, oh rey, para 

3.15  os  irá  bien.  Al  no  percibir  la  elipsis,  muchas  versiones  insertan  interrogación,  pero  debe  leerse  con  el  condicional. 

→Lc.13.9. 


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Daniel 4:9

899

librarnos del horno de fuego abrasador y 

librarnos de tus manos,

18

 y aunque no lo haga, oh rey, entiende 

que tampoco daremos culto a tus dioses, 

ni nos postraremos ante la estatua que hi-

ciste levantar.

19

 Nabucodonosor entonces, lleno de fu-

ria contra Sadrac, Mesac y Abed-nego, y 

con el rostro desencajado ordenó que el 

horno fuera calentado siete veces más de 

lo acostumbrado.

20

 Y  mandó  a  algunos  de  los  hombres 

más fornidos de su ejército que ataran a 

Sadrac, Mesac y Abed-nego, y los arroja-

ran al horno en llamas.

21

 Así estos varones fueron atados con sus 

zaragüelles, sus túnicas, sus turbantes y 

sus vestidos, y fueron echados dentro del 

horno de fuego abrasador.

22

 Y por cuanto la orden del rey era apre-

miante, y el horno estaba demasiado ca-

liente, las llamas abrasaron a los hombres 

que  habían  arrojado  a  Sadrac,  Mesac  y 

Abed-nego;

23

 mientras los tres varones, Sadrac, Me-

sac y Abed-nego, caían atados dentro del 

horno de fuego en llamas.

24

 Entonces el rey Nabucodonosor, estu-

pefacto, se levantó de repente, y preguntó 

a  los  de  su  consejo:  ¿No  fueron  tres  los 

varones  que  cayeron  atados  dentro  del 

fuego? Ellos respondieron al rey: Es ver-

dad, oh rey.

25

 Pero él repondió: ¡Mirad! Estoy viendo 

a cuatro varones sueltos que se pasean en 

medio del fuego sin sufrir ningún daño, 

y el aspecto del cuarto es semejante a un 

hijo de los dioses.°

26

 Y Nabucodonosor se acercó a la puerta 

del horno de fuego en llamas, y dijo: ¡Sa-

drac, Mesac y Abed-nego, siervos de ’Elaha 

‘Il·laya,° salid y venid! Y Sadrac, Mesac y 

Abed-nego salieron del medio del fuego.

27

 Y los sátrapas, prefectos, gobernadores 

y consejeros del rey, reunidos allí, vieron 

cómo el fuego no había tenido poder al-

guno contra aquellos varones. Ni siquiera 

sus  cabellos  estaban  chamuscados;  sus 

ropas estaban intactas y no tenían olor a 

quemado.

28

 Entonces  Nabucodonosor  dijo:  ¡Ben-

dito  sea  el  Dios  de  Sadrac,  Mesac  y 

Abed-nego, que envió su ángel, y libró a 

sus siervos que confiaron en Él no cum-

pliendo el edicto del rey, y entregaron sus 

cuerpos antes que servir y adorar a otro 

dios que no fuera su Dios!

29

 Decreto pues, que todo pueblo, nación 

o lengua que profiera blasfemia contra el 

Dios  de  Sadrac,  Mesac  y  Abed-nego,  sea 

descuartizado,  y  su  casa  convertida  en 

muladar, por cuanto no hay dios que pue-

da librar como Éste.

30

 Y el rey engrandeció a Sadrac, Mesac y 

Abed-nego en la provincia de Babilonia.

La proclama real

4

El rey Nabucodonosor a todos los pue-

blos, naciones y lenguas que moran en 

toda la tierra: ¡Paz os sea multiplicada!

2

 Conviene  que  yo  publique  las  señales 

y  prodigios  que  ’Elaha  ‘Il·laya  ha  hecho 

conmigo.

3

 ¡Cuán grandes son sus señales, y cuán 

potentes sus maravillas! ¡Su reino es un 

reino sempiterno, y su señorío de genera-

ción en generación!

El gran árbol

4

 Yo Nabucodonosor estaba tranquilo en 

mi casa y floreciente en mi palacio.

5

 Vi un sueño que me espantó, y tendido 

en cama, me turbaron las imaginaciones 

y visiones de mi cabeza.

6

 Por esto mandé que vinieran ante mí to-

dos los sabios de Babilonia, para que me 

mostraran la interpretación del sueño.

7

 Vinieron, pues, magos, astrólogos, cal-

deos y adivinos, y referí el sueño delante 

de ellos, pero no me pudieron mostrar su 

interpretación,

8

 hasta  que  se  presentó  ante  mí  Daniel, 

cuyo nombre es Beltsasar, como el nom-

bre de mi dios, y en quien mora el espíritu 

del Dios santo. Y referí mi sueño delante 

de él, diciendo:

9

 Beltsasar, príncipe de los magos, ya que 

he entendido que el espíritu del Dios san-

to está en ti, y que ningún misterio se te 

esconde,  he  aquí  las  visiones  del  sueño 

3.25 arm. bar ’elahin = hijo de dioses.  3.26 arm. Dios Altísimo. Indudablemente, la visión del rey tuvo un efecto relevante en el 

conocimiento del nombre del Dios de Israel.


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Daniel 4:10

900

que he tenido; declárame ahora su inter-

pretación.

10

 Éstas fueron las visiones de mi cabeza 

hallándome en mi lecho: Miré, y he aquí 

en medio de la tierra un árbol cuya altura 

era enorme.

11

 El árbol crecía y se hacía fuerte, y su 

copa llegaba hasta los cielos, y su exten-

sión a todos los confines de la tierra.

12

 Su follaje era hermoso y su fruto abun-

dante, y había en él alimento para todos. 

Debajo  de  él  hallaban  abrigo  las  bestias 

del campo, y en sus ramas hacían morada 

las aves de los cielos, y de él se alimentaba 

toda carne.

13

 Yo miraba en las visiones de mi cabeza 

mientras estaba en mi lecho, cuando he 

aquí un guardián santo descendía de los 

cielos,

14

 y clamando a gran voz, dijo así: ¡Cor-

tad el árbol y quitadle sus ramas, sacudid 

su follaje y derramad su fruto, y váyanse 

las  bestias  que  están  debajo  de  él,  y  las 

aves de sus ramas!

15

 Pero dejad el tronco con sus raíces en 

la tierra, ligado° con ligaduras de hierro 

y bronce entre la hierba del campo, y con 

el rocío de los cielos sea bañado, y con las 

bestias comparta la hierba de la tierra.

16

 Sea cambiada su mente de hombre,° y 

désele instinto de bestia, y pasen sobre él 

siete tiempos.

17

 La sentencia es por decreto de los guar-

dianes, y la decisión por la palabra de los 

Santos, para que los vivientes reconozcan 

que  Il·laya  domina  sobre  el  reino  de  los 

hombres, que lo da a quien le place y pone 

sobre él al más humilde de los hombres.

18

 Yo, el rey Nabucodonosor, vi este sue-

ño. Tú, pues, Beltsasar, dirás su interpre-

tación, porque ninguno de los sabios de 

mi reino han podido darme su interpreta-

ción, pero tú sí puedes, porque en ti mora 

el espíritu de los dioses santos.

Interpretación

19

 Pero  Daniel  (cuyo  nombre  es  Beltsa-

sar), quedó atónito casi una hora, turba-

do por sus pensamientos. Entonces el rey 

habló y dijo: Oh Beltsasar, no te turben ni 

el sueño ni su interpretación. Respondió 

Beltsasar, y dijo: Señor mío, sea este sue-

ño para tus enemigos, y su interpretación 

para los que te aborrecen.

20

 El árbol que has visto, que crecía y se ha-

cía fuerte, y cuya copa llegaba a los cielos, y 

se extendía a todos los confines de la tierra,

21

 cuyo  follaje  era  hermoso  y  su  fruto 

abundante,  en  que  había  alimento  para 

todos, debajo del cual moraban las bestias 

del campo, y en cuyas ramas anidaban las 

aves de los cielos,

22

 eres tú mismo, oh rey, que creciste y 

te hiciste fuerte, pues tu grandeza creció 

hasta llegar hasta los cielos, y tu dominio 

hasta los confines de la tierra.

23

 Y  en  cuanto  a  lo  que  vio  el  rey,  un 

guardián santo que descendía de los cie-

los y decía: Cortad el árbol y destruidlo, 

dejad en la tierra el tronco con sus raíces, 

ligado  con  ligaduras  de  hierro  y  bronce 

entre la hierba del campo y con el rocío 

de los cielos sea bañado, y con las bestias 

del campo sea su porción, hasta que pa-

sen siete tiempos sobre él,

24

 ésta  es  la  interpretación,  oh  rey,  y  la 

sentencia de Il·laya, que ha venido sobre 

mi señor el rey:

25

 Te echarán de entre los hombres, y con 

las bestias del campo será tu morada, y con 

hierba del campo te apacentarán como a 

los bueyes, y con el rocío de los cielos se-

rás bañado; y pasarán siete tiempos sobre 

ti, hasta que reconozcas que ’Elyón tiene 

dominio en el reino de los hombres, y que 

lo da a quien Él quiere.

26

 Y en cuanto a la orden de dejar el tron-

co  del  árbol  con  sus  raíces  en  la  tierra, 

significa  que  tu  reino  te  quedará  firme, 

después que hayas reconocido que los cie-

los son los que gobiernan.

27

 Por tanto, oh rey, acepta mi consejo: re-

dime tus pecados con justicia, y borra tus 

iniquidades mostrando misericordias para 

con los oprimidos, por si tal vez pueda ha-

ber una prolongación de tu tranquilidad.

Cumplimiento

28

 Todo esto le sobrevino al rey Nabuco-

donosor.

29

 Al cabo de doce meses, paseando en el 

palacio real de Babilonia,

4.15 .ligado.  4.16 Lit. corazón de hombre… corazón de bestia. 


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Daniel 5:12

901

30

 el  rey  habló  diciendo:  ¿No  es  ésta  la 

gran Babilonia que yo edifiqué para mo-

rada  real  con  la  grandeza  de  mi  poder, 

para gloria de mi majestad?

31

 Aún estaban estas palabras en la boca 

del rey, cuando una voz cayó de los cielos: 

Oh rey Nabucodonosor, a ti se te habla. El 

reino te es quitado.

32

 Serás apartado de entre los hombres, 

y  tu  habitación  será  con  las  bestias  del 

campo.  Te  apacentarán  como  a  los  bue-

yes,  y  siete  tiempos  pasarán  sobre  ti, 

hasta que reconozcas que Il·laya tiene el 

dominio en el reino de los hombres, y lo 

da a quien Él quiere.

33

 Y en la misma hora se cumplió la pa-

labra sobre Nabucodonosor, y fue aparta-

do de entre los hombres, y comía hierba 

como los bueyes, y su cuerpo se humede-

cía con el rocío de los cielos, hasta que su 

pelo creció como plumas de águila, y sus 

uñas como las de las aves.

34

 Pero al fin del tiempo, yo Nabucodono-

sor alcé mis ojos a los cielos, y mi razón me 

fue devuelta. Entonces bendije a ’Elyón, y 

alabé y glorifiqué al que vive para siempre, 

cuyo dominio es dominio sempiterno, y su 

reino por todas las edades.

35

 Y todos los moradores de la tierra son 

considerados como nada, y Él hace según 

su voluntad en el ejército de los cielos y 

en  los  habitantes  de  la  tierra,  y  no  hay 

quien detenga su mano, ni quien le diga: 

¿qué haces?

36

 En  aquel  mismo  tiempo  me  fue  de-

vuelta  mi  razón  y  la  majestad  de  mi 

reino, y mi dignidad y mi grandeza vol-

vieron a mí, y mis consejeros y mis gran-

des  me  buscaron,  y  fui  restablecido  en 

mi reino, y me fue añadida una preemi-

nente grandeza.

37

 Ahora yo, Nabucodonosor, alabo y en-

grandezco y glorifico al Rey de los cielos, 

porque todas sus obras son verdaderas y 

justos  sus  caminos,  y  Él  puede  abatir  a 

aquellos que andan con soberbia.

Belsasar

5

El rey Belsasar hizo un gran banquete 

para mil de sus príncipes, y bebió vino 

en presencia de los mil.

2

 Recalentado con el vino, Belsasar man-

dó  traer  los  vasos  de  oro  y  de  plata  que 

Nabucodonosor  su  padre°  había  sacado 

del Santuario de Jerusalem, para que be-

bieran en ellos el rey y sus grandes, sus 

mujeres y sus concubinas.

3

 Entonces  fueron  traídos  los  vasos  de 

oro  que  habían  sacado  del  Santuario  de 

la Casa de Dios que hubo en Jerusalem, y 

brindaron con ellos el rey y sus príncipes, 

sus mujeres y sus concubinas.

4

 Y apurando el vino, alababan a los dioses 

de oro y de plata, de bronce y de hierro, de 

piedra y madera,

5

 cuando  de  repente  aparecieron  los  de-

dos  de  una  mano  humana,  que  escribía 

delante  del  candelero  sobre  lo  encalado 

del  muro  del  palacio  real,  y  el  rey  veía 

cómo escribían los dedos.

6

 Entonces el rey palideció, y la mente se 

le turbó, y se debilitaron sus lomos, y sus 

rodillas daban una contra otra.

7

 A gritos el rey mandó que vinieran los 

magos, astrólogos y adivinos, y dijo el rey 

a los sabios de Babilonia: El que lea esta 

escritura y me muestre su interpretación, 

será  vestido  de  púrpura,  y  llevará  en  su 

cuello  un  collar  de  oro,  y  será  el  tercer 

señor del reino.

8

 Entonces fueron introducidos todos los 

sabios  del  rey,  pero  no  pudieron  leer  la 

escritura ni mostrar al rey su interpreta-

ción.

9

 Entonces el rey Belsasar se turbó sobre-

manera, y palideció, y sus príncipes esta-

ban perplejos.

10

 Pero la reina, motivada por las palabras 

del rey y de sus príncipes, entró a la sala 

del banquete, y dijo: ¡Vive para siempre, 

oh rey! No te turben tus pensamientos, ni 

palidezca tu rostro.

11

 En tu reino hay un hombre en el cual 

mora el espíritu de los dioses santos, y en 

los días de tu padre, luz e inteligencia y 

sabiduría, como la sabiduría de los dioses 

fueron  halladas  en  él,  y  el  rey  Nabuco-

donosor,  tu  padre,  oh  rey,  lo  constituyó 

príncipe de los magos, astrólogos, caldeos 

y adivinos,

12

 por  cuanto  en  él  había  un  espíritu 

superior, y ciencia y entendimiento para 

5.2 Nabucodonosor es presentado como padre de Belsasar aun cuando en realidad era su abuelo. 


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Daniel 5:13

902

interpretar  sueños,  descifrar  enigmas  y 

resolver dudas, esto es, en Daniel, al cual 

el rey puso por nombre Beltsasar. Ahora 

pues, llámese a Daniel, y él te mostrará la 

interpretación.

13

 Entonces Daniel fue conducido ante el 

rey. Y dijo el rey a Daniel: ¿Eres tú aquel 

Daniel  de  los  hijos  de  la  cautividad  de 

Judá, que mi padre trajo de Judea?

14

 Yo he oído de ti que el espíritu de los 

dioses santos está en ti, y que luz, enten-

dimiento  y  sabiduría  preeminente  han 

sido hallados en ti.

15

 Y ahora han sido traídos delante de mí 

los  sabios  y  astrólogos  para  que  leyeran 

esta escritura y me dieran su interpreta-

ción;  pero  no  han  podido  mostrarme  la 

interpretación del asunto.

16

 De ti, sin embargo, he oído que puedes 

dar interpretaciones y resolver enigmas. 

Ahora bien, si puedes leer esta escritura 

y darme su interpretación, serás vestido 

de púrpura con un collar de oro alrededor 

de  tu  cuello,  y  serás  el  tercer  señor  del 

reino.

17

 Entonces  Daniel  respondió  y  dijo  de-

lante del rey: ¡Quédense tus dones para ti 

mismo, y da tus premios a otro! Sin em-

bargo, yo leeré el escrito al rey, y le haré 

conocer la interpretación.

18

 Oh  rey:  ’Elaha  ‘Il·laya  dio  a  tu  padre 

Nabucodonosor el reino y la grandeza, la 

gloria y la majestad.

19

 Y por la grandeza que le dio, todos los 

pueblos, naciones y lenguas temblaban y 

temían ante él. A quien quería mataba y a 

quien quería concedía vida; a quien que-

ría engrandecía y a quien quería, abatía.

20

 Pero cuando su corazón se ensoberbe-

ció y su espíritu se endureció en su orgu-

llo, fue depuesto del trono de su reino, y 

despojado de su gloria.

21

 Y fue apartado de entre los hijos de los 

hombres, y su mente se hizo semejante a 

la de las bestias, y con los asnos monteses 

fue su morada. Hierba le hicieron comer 

como a buey, y su cuerpo fue bañado con 

el rocío de los cielos, hasta que reconoció 

que ’Elaha ‘Il·laya tiene dominio sobre el 

reino de los hombres, y que pone sobre él 

al que le place.

22

 Y tú, su hijo Belsasar, no has humilla-

do tu corazón, sabiendo todo esto.

23

 Antes bien, te has ensoberbecido con-

tra el Señor de los cielos, e hiciste traer 

delante de ti los vasos de su Casa, y tú y 

tus grandes, tus mujeres y tus concubinas 

estáis bebiendo en ellos, y además de esto, 

diste alabanza a dioses de plata y oro, de 

bronce,  de  hierro,  de  piedra  y  madera, 

que ni ven, ni oyen, ni saben, pero al Dios 

en cuya mano está tu aliento, y cuyos son 

todos tus caminos, nunca honraste.

24

 Por lo que de su presencia fue enviada 

la mano que trazó esta escritura.

25

 Esta es, pues, la escritura que fue tra-

zada: Mene, Mene, Tekel, Uparsin.

26

 Y esta es la interpretación del asunto: 

Mene: Contó Dios tu reino, y le ha puesto 

fin.

27

 Tekel:  Pesado  has  sido  en  balanza,  y 

fuiste hallado falto de peso.

28

 Peres: Tu imperio ha sido roto, y dado 

a los Medos y a los Persas.

29

 Entonces dio orden Belsasar, y vistie-

ron a Daniel de púrpura, con un collar de 

oro alrededor de su cuello, y proclamaron 

que él era el tercer señor del reino.

30

 En aquella misma noche, Belsasar rey 

de los caldeos fue muerto.

31

 Y Darío, el medo, tomó el reino, siendo 

de sesenta y dos años de edad.

Darío

6

Pareció bien a Darío constituir sobre 

el  reino  ciento  veinte  sátrapas,  para 

gobernar en todo el reino,

2

 y  al  frente  de  ellos  tres  gobernadores 

(uno de ellos era Daniel), a quienes estos 

sátrapas dieran cuenta, para que el rey no 

padeciera daño alguno.

3

 Pero  este  Daniel  era  superior  a  los  sá-

trapas  y  gobernadores,  porque  había  en 

él un espíritu superior, y el rey pensaba 

ponerlo sobre todo el reino.

4

 Por lo cual los gobernadores y sátrapas 

buscaban ocasión para acusar a Daniel en 

lo  relacionado  al  reino,  pero  no  podían 

hallar ningún pretexto o corrupción, por-

que él era fiel. Ningún vicio o falta pudie-

ron hallar en él.

5

 Entonces aquellos hombres se dijeron: 

No hallaremos contra este Daniel ningún 

pretexto para acusarle, si no lo hallamos 

contra  él  en  relación  con  la  ley  de  su 

Dios.


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Daniel 6:27

903

6

 Por lo que estos gobernadores y sátra-

pas se reunieron ante el rey, y le dijeron 

así: ¡Rey Darío, vive para siempre!

7

 Todos  los  gobernadores  del  reino,  ma-

gistrados, sátrapas, príncipes y capitanes 

han  acordado  por  consejo  que  promul-

gues  un  edicto  real  y  lo  confirmes,  que 

cualquiera  que  en  el  espacio  de  treinta 

días demande petición de cualquier dios 

u hombre fuera de ti, oh rey, sea echado 

en el foso de los leones.

8

 Ahora, oh rey, confirma el edicto y fír-

malo para que no sea modificado, confor-

me a la ley de Media y de Persia, que es 

irrevocable.

9

 Firmó, pues, el rey Darío el edicto y la 

prohibición.

10

 Cuando Daniel supo que el edicto había 

sido firmado, entró en su casa, y abiertas 

las ventanas de su cámara alta que daban 

hacia Jerusalem, se arrodillaba tres veces 

al día, y oraba y daba gracias delante de su 

Dios, como antes acostumbraba hacerlo.

11

 Al punto aquellos hombres se reunie-

ron atropelladamente, y hallaron a Daniel 

haciendo petición y rogando en presencia 

de su Dios.

12

 Fueron luego ante el rey y le hablaron 

acerca del edicto real: ¿No has confirmado 

un edicto que cualquiera que en el espacio 

de treinta días pida a cualquier dios u hom-

bre fuera de ti, oh rey, sea echado en el foso 

de los leones? Respondió el rey diciendo: 

Verdad es, conforme a la ley de Media y de 

Persia, la cual no puede ser abrogada.

13

 Entonces  ellos  contestaron  al  rey,  di-

ciendo:  aquel  Daniel,  que  es  de  los  hijos 

de los judíos cautivos, no te respeta a ti, 

oh rey, ni acata el edicto que confirmaste, 

sino que hace su petición tres veces al día.

14

 Cuando el rey oyó el asunto, le pesó en 

gran manera, y resolvió librar a Daniel, y 

hasta la puesta del sol se esforzó por li-

brarlo.

15

 Pero  aquellos  hombres  se  reunieron 

alborotados en torno al rey, y le dijeron: 

¡Sabe, oh rey, que es ley de Media y de Per-

sia que ningún edicto u ordenanza que el 

rey confirme puede ser abrogado!

Fidelidad

16

 Entonces  el  rey  dio  orden,  y  traje-

ron  a  Daniel  y  lo  echaron  en  el  foso  de 

los leones. Pero el rey dijo a Daniel: ¡Tu 

Dios, a quien sirves continuamente, Él te 

libre!

17

 Y fue traída una piedra y puesta sobre 

la puerta del foso, la cual el rey selló con 

su  propio  anillo  y  con  el  anillo  de  sus 

príncipes, para que el acuerdo acerca de 

Daniel no fuera alterado.

18

 Y se retiró el rey a su palacio y pasó la 

noche en ayuno, sin hacer venir concubi-

nas a su presencia, y el sueño huyó de él.

19

 Al amanecer, se levantó el rey y al rayar 

el alba fue apresuradamente al foso de los 

leones.

20

 Y  acercándose  al  foso  gritó  con  voz 

afligida a Daniel, y le dijo: ¡Daniel, siervo 

del Dios viviente! ¿Ha podido librarte de 

los leones ese Dios a quien sirves conti-

nuamente?

21

 Entonces Daniel respondió al rey: ¡Oh 

rey, vive para siempre!

22

 Mi Dios ha enviado a su ángel, el cual 

cerró  la  boca  de  los  leones  para  que  no 

me hicieran daño, porque ante Él fui ha-

llado inocente, como también lo fui ante 

ti, oh rey, pues no te he causado perjuicio 

alguno.

23

 Entonces el rey se alegró en gran ma-

nera, y ordenó que sacaran a Daniel del 

foso. Y Daniel fue sacado del foso, y no se 

halló ninguna lesión en él, porque había 

confiado en su Dios.

24

 Luego el rey dio orden, y fueron traí-

dos aquellos hombres que habían acusado 

a Daniel, y fueron echados en el foso de 

los leones ellos, sus hijos y sus mujeres, 

y aún no habían llegado al fondo del foso, 

cuando los leones se apoderaron de ellos 

y los descuartizaron.

Decreto de Dario

25

 Y  el  rey  Darío  proclamó  a  todos  los 

pueblos, naciones y lenguas de la tierra: 

Paz os sea multiplicada.

26

 De parte mía es puesta esta ordenanza: 

Que en todo el dominio de mi reino todos 

teman  y  tiemblen  ante  la  presencia  del 

Dios  de  Daniel;  porque  Él  es  el  Dios  vi-

viente, y permanece por todos los siglos, 

y su reino no será jamás destruido, y su 

dominio perdurará eternamente.

27

 Él salva y Él libra, y hace también se-

ñales  y  maravillas  en  los  cielos  y  en  la 


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Daniel 6:28

904

tierra, y Él ha librado a Daniel del poder 

de los leones.

28

 Y este Daniel prosperó durante el rei-

nado  de  Darío  y  durante  el  reinado  de 

Ciro el persa.

Las cuatro bestias

7

En el año primero de Belsasar rey de 

Babilonia tuvo Daniel un sueño y vi-

siones de su cabeza mientras estaba en su 

lecho. En seguida escribió el sueño donde 

refería la suma del asunto.

2

 Habló Daniel, y dijo: Miraba yo en mi vi-

sión nocturna, y he aquí los cuatro vien-

tos de los cielos se desataron sobre el Mar 

Grande,°

3

 y  cuatro  grandes  bestias,  diferentes  la 

una de la otra, subieron del mar.

4

 La  primera  era  como  león,  pero  tenía 

alas  de  águila.  Yo  estaba  mirando  hasta 

que sus alas fueron arrancadas, y ella fue 

alzada de la tierra, y puesta sobre sus pies, 

a manera de hombre, y le fue dado cora-

zón de hombre.

5

 La segunda bestia, he aquí era semejan-

te a un oso, y se alzaba de un costado más 

que del otro, teniendo tres costillas entre 

los dientes de su boca, y le fue dicho: ¡Le-

vántate y devora carne en abundancia!

6

 Después de eso seguí observando, y he 

aquí otra bestia, semejante a un leopardo, 

que tenía cuatro alas de ave en sus espal-

das. Esta bestia tenía además cuatro cabe-

zas, y le fue dado dominio.

7

 Después de eso vi más visiones noctur-

nas, y he aquí la cuarta bestia, espantosa y 

terrible y fuerte en gran manera, teniendo 

grandes dientes de hierro, con los cuales 

devoraba  y  descuartizaba,  y  lo  sobrante 

lo aplastaba con sus patas. Era muy dife-

rente de todas las bestias que había visto 

antes, y tenía diez cuernos.

8

 Estaba observando los cuernos, y he aquí 

otro  cuerno  pequeño  salía  entre  ellos, 

ante el cual tres de los primeros cuernos 

fueron arrancados de raíz. Y he aquí, este 

cuerno tenía ojos como de hombre, y una 

boca que hablaba grandes cosas.

9

 Estuve mirando hasta que fueron pues-

tos tronos, y se sentó un Anciano de días, 

cuyo vestido era blanco como la nieve, y 

cuyos cabellos eran como lana purísima. 

Su  trono  era  de  llamas  de  fuego,  y  éste 

tenía ruedas de fuego abrasador.

10

 Un río de fuego corría y salía de delan-

te de Él. Millares de millares lo servían, y 

millones de millones estaban de pie ante 

su presencia. Entonces el Juez se sentó, y 

los libros fueron abiertos.

11

 Yo miraba entonces a causa del soni-

do  de  las  grandes  palabras  que  hablaba 

el cuerno: miraba hasta que la bestia fue 

muerta, y su cuerpo destruido y entrega-

do al fuego devorador.

12

 En cuanto a las otras bestias, su domi-

nio les fue quitado, pero sus vidas fueron 

prolongadas por un tiempo determinado.

13

 Proseguí mirando en las visiones noc-

turnas,  y  he  aquí  con  las  nubes  de  los 

cielos venía uno como hijo de hombre, y 

llegó hasta el Anciano de días, y lo hicie-

ron acercarse ante Él.

14

 Y le fue concedido señorío, gloria y un 

reino, para que todos los pueblos, nacio-

nes y lenguas lo sirvieran. Su dominio es 

dominio  eterno,  que  nunca  pasará,  y  su 

reino uno que no será jamás destruido.

15

 En cuanto a mí, Daniel, se me turbó el 

espíritu dentro de mi cuerpo, y las visio-

nes de mi cabeza me asombraron.

16

 Me acerqué a uno de los que estaban 

de pie, y le pregunté la verdad acerca de 

todo esto. Me habló, y me hizo conocer la 

interpretación de las cosas:

17

 Estas cuatro grandes bestias son cua-

tro reyes que se levantarán en la tierra.

18

 Después  recibirán  el  reino  los  santos 

de ‘Elyonin, y poseerán el reino por toda 

la  eternidad,  eternamente  y  para  siem-

pre.

19

 Entonces quise saber la verdad acerca 

de la cuarta bestia, que era tan diferente 

de todas las otras, espantosa en gran ma-

nera, que tenía dientes de hierro y uñas 

de bronce, que devoraba y descuartizaba, 

y lo sobrante lo aplastaba con sus patas.

20

 Asimismo  acerca  de  los  diez  cuernos 

que tenía en su cabeza, y del otro cuerno 

que le había salido, ante el cual habían caí-

do tres. Ese cuerno tenía ojos y una boca 

que hablaba grandes cosas, y su aspecto era 

más imponente que el de sus compañeros.

7.2 Esto es, el Mar Mediterráneo. 


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Daniel 8:17

905

21

 Y observé que este cuerno hacía gue-

rra contra los santos, y los vencía,

22

 hasta que vino el Anciano de días, y se 

dio el juicio a los santos de ’Elyonin, y lle-

gó el tiempo en que los santos poseyeron 

el reino.

23

 Dijo así: La cuarta bestia será un cuar-

to reino en la tierra, el cual será diferente 

de todos los otros reinos, y devorará, tri-

llará y despedazará toda la tierra.

24

 En  cuanto  a  los  diez  cuernos:  de  ese 

reino se levantarán diez reyes, y tras ellos 

se levantará otro, el cual será diferente de 

los primeros, y a tres reyes derribará.

25

 Hablará palabras contra ‘Il·laya, y que-

brantará a los santos de ‘Elyonin. Inten-

tará cambiar los tiempos y la Ley, y serán 

entregados  en  su  poder  por  un  tiempo, 

dos tiempos y medio tiempo.

26

 Pero el Juez se sentará, y se le quita-

rá  su  dominio  para  que  sea  destruido  y 

arruinado hasta el fin.

27

 Y el reino y el dominio y la majestad de 

los reinos por debajo de todos los cielos, 

será dado al pueblo de los santos de ‘Elyo-

nin, cuyo reino es un reino eterno, y todos 

los dominios le servirán y le obedecerán.

28

 Aquí  tuvieron  fin  sus  palabras.  En 

cuanto  a  mí,  Daniel,  mis  pensamientos 

me turbaron mucho y palideció mi rostro, 

pero guardé el asunto en mi corazón.

El carnero y el macho cabrío

8

En el año tercero del reinado del rey 

Belsasar, yo, Daniel, tuve una visión, 

después de la que ya había tenido.

2

 Contemplaba  en  la  visión  que  me  en-

contraba  en  la  ciudadela  de  Susa,  en  la 

provincia de Elam, y en la visión yo estaba 

junto al río Ulai.

3

 Alcé la vista, y he aquí un carnero en pie 

frente al río; tenía dos cuernos, y aunque 

los cuernos eran altos, uno era más alto 

que  el  otro,  y  el  más  alto  había  crecido 

después que el otro.

4

 Vi que el carnero hería con los cuernos 

al poniente, al norte y al sur, y que nin-

guna bestia podía estar en pie delante de 

él,  ni  había  quien  escapara  de  su  poder, 

y hacía conforme a su voluntad y se en-

grandecía.

5

 Mientras  yo  consideraba  esto,  he  aquí 

un macho cabrío venía del poniente sobre 

la faz de toda la tierra, sin tocar el suelo, y 

aquel macho cabrío tenía un cuerno no-

table entre sus ojos.

6

 Y se acercó hasta el carnero de dos cuer-

nos, que yo había visto en la ribera del río, 

y lo embistió con toda la furia de su poder.

7

 Y lo vi llegar junto al carnero encendido 

en cólera, e hirió al carnero y rompió sus 

dos  cuernos,  y  el  carnero  no  tuvo  fuer-

zas para pararse delante de él. Lo derribó, 

pues,  en  tierra,  y  lo  pisoteó,  y  no  hubo 

quien librara al carnero de su poder.

8

 Aquel macho cabrío se engrandeció sobre-

manera, pero estando en su mayor poder, 

aquel gran cuerno fue quebrado, y en su lu-

gar salieron otros cuatro cuernos notables 

hacia los cuatro vientos de los cielos.

9

 Y de uno de ellos salió un cuerno peque-

ño, que creció mucho hacia el sur, y hacia 

oriente, y hacia la tierra gloriosa.

10

 Y  se  engrandeció  hasta  el  ejército  de 

los cielos, y parte del ejército y de las es-

trellas echó por tierra y las pisoteó.

11

 Se llegó a engrandecer hasta contra el 

Príncipe de la milicia celestial. Por él fue 

quitado el continuo sacrificio, y el lugar 

de su Santuario fue echado por tierra.

12

 Y  a  causa  de  la  prevaricación  le  fue 

entregada  la  milicia  celestial  junto  con 

el continuo sacrificio, y echó por tierra la 

verdad, e hizo cuanto quiso, y prosperó.

13

 Entonces  oí  hablar  a  cierto  santo,  y 

otro santo preguntó a aquel que hablaba: 

¿Hasta cuándo° durará la visión del con-

tinuo sacrificio, y la prevaricación asola-

dora entregando el santuario y el ejército 

para ser pisoteados?

14

 Y  él  dijo:  Hasta  dos  mil  trescientas 

tardes y mañanas, luego el santuario será 

purificado.

15

 Y  aconteció  que  mientras  yo  Daniel 

consideraba  la  visión  y  procuraba  com-

prenderla, he aquí se puso delante de mí 

uno con apariencia de hombre.

16

 Y  oí  una  voz  de  hombre  entre  las  ri-

beras del Ulai, que clamó y dijo: ¡Gabriel, 

haz que éste entienda la visión!

17

 Por lo cual se acercó adonde yo esta-

ba, y cuando vino quedé petrificado, y me 

8.13 

→§43.


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Daniel 8:18

906

postré  sobre  mi  rostro.  Pero  él  me  dijo: 

Entiende,  hijo  de  hombre,  porque  la  vi-

sión es para el tiempo del fin.

18

 Mientras  él  hablaba  conmigo,  caí  en 

un profundo adormecimiento con mi ros-

tro en tierra, pero él me tocó y me hizo 

ponerme en pie.

19

 Y me dijo: He aquí te enseñaré lo que 

ocurrirá en el tiempo último de la indigna-

ción, porque eso es para el tiempo del fin.

20

 En  cuanto  al  carnero  que  viste,  que 

tenía dos cuernos, éstos son los reyes de 

Media y de Persia.

21

 El macho cabrío es el rey de Grecia, y el 

gran cuerno entre sus ojos es el primer rey.

22

 Y  en  cuanto  al  cuerno  que  fue  que-

brado,  y  sucedieron  cuatro  en  su  lugar, 

significa que de esa nación se levantarán 

cuatro reinos, aunque no con la fuerza de 

él.

23

 Y  al  fin  del  reinado  de  éstos,  cuando 

los  transgresores  hayan  completado  su 

transgresión, se levantará un rey altivo de 

rostro y entendido en enigmas.

24

 Y su poder será enorme, pero no por su 

propia fuerza, y causará grandes ruinas y 

prosperará,  y  actuará  arbitrariamente,  y 

destruirá a los fuertes y al pueblo de los 

santos.

25

 Con  su  sagacidad  hará  prosperar  el 

engaño en su mano, y se ensoberbecerá 

en  su  corazón,  y  en  tiempo  de  seguri-

dad  destruirá  a  muchos,  y  se  levantará 

contra el Príncipe de los príncipes, pero 

será quebrantado, aunque no por mano 

humana.

26

 La visión de las tardes y mañanas que 

se ha referido es verdadera, pero tú debes 

guardar la visión, porque pertenece a mu-

chos días por venir.

27

 Y yo, Daniel, quedé quebrantado y es-

tuve enfermo algunos días. Luego me le-

vanté y atendí los negocios del rey, pero 

estaba  espantado  a  causa  de  la  visión,  y 

no la entendía.

Las setenta semanas

9

En  el  año  primero  de  Darío,  hijo  de 

Asuero, del linaje de los medos, que fue 

hecho rey sobre el reino de los caldeos,

2

 en  ese  primer  año  de  su  reinado,  yo, 

Daniel,  entendí  de  los  libros  que,  según 

la palabra de YHVH dada al profeta Jere-

mías, el número de los años que habría de 

durar  la  desolación  de  Jerusalem  serían 

setenta años.

3

 Entonces volví mi rostro hacia Adonay 

Ha-’Elohim, buscándole en oración y rue-

go, en ayuno, cilicio y ceniza.

4

 Y oré a YHVH mi Dios e hice confesión 

diciendo: ¡Oh Adonay! Dios grande, digno 

de ser temido, que guardas el pacto y la 

misericordia con los que te aman y guar-

dan tus mandamientos:

5

 Hemos pecado, hemos cometido iniqui-

dad,  hemos  hecho  impíamente,  hemos 

sido  rebeldes,  y  nos  hemos  apartado  de 

tus mandamientos y de tus ordenanzas.

6

 No hemos obedecido a tus siervos los pro-

fetas, que en tu Nombre hablaron a nues-

tros reyes y a nuestros príncipes, a nuestros 

padres y a todo el pueblo de la tierra.

7

 ¡Oh Adonay, tuya es la justicia, y nues-

tra la confusión de rostro, como en el día 

de hoy lleva todo judío, los moradores de 

Jerusalem, y todo Israel, los de cerca y los 

de  lejos,  en  todas  las  tierras  adonde  los 

has echado a causa de su rebelión con que 

se rebelaron contra ti!

8

 ¡Oh  YHVH,  nuestra  es  la  confusión  de 

rostro,  de  nuestros  reyes,  de  nuestros 

príncipes  y  de  nuestros  padres,  porque 

contra ti pecamos!

9

 De YHVH nuestro Dios es el tener mi-

sericordia y el perdonar, aunque nosotros 

nos hemos rebelado contra Él,

10

 y no obedecimos la voz de YHVH nues-

tro Dios, para andar en sus leyes que Él 

puso  delante  de  nosotros  por  medio  de 

sus siervos los profetas.

11

 Todo Israel ha traspasado tu Ley, apar-

tándose para no obedecer tu voz, por eso 

nos han caído las maldiciones consigna-

das  con  juramento  en  la  Ley  de  Moisés, 

siervo de Ha-’Elohim, porque contra Dios 

hemos pecado.

12

 Y Él ha cumplido la palabra que ha-

bló  contra  nosotros  y  contra  nuestros 

príncipes que nos gobernaron, trayendo 

sobre  nosotros  tan  grande  mal,  porque 

nunca  fue  hecho  debajo  de  los  cielos 

nada semejante a lo que se hizo contra 

Jerusalem.

13

 Como  está  escrito  en  la  Ley  de  Moi-

sés, todo este mal nos ha sobrevenido, y 

sin embargo no hemos aplacado a YHVH 

nuestro Dios convirtiéndonos de nuestras 

iniquidades y reconociendo tu verdad.


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Daniel 10:6

907

14

 Por tanto, YHVH veló sobre el mal y lo 

trajo sobre nosotros, porque YHVH nues-

tro Dios es justo en todas sus obras que 

hace, pero no hemos escuchado su voz.

15

 Y ahora, Adonay, Dios nuestro, que sa-

caste  a  tu  pueblo  de  la  tierra  de  Egipto 

con mano poderosa y te hiciste renombre 

hasta el día de hoy: ¡Hemos pecado y ac-

tuado impíamente!

16

 ¡Te  ruego,  oh  Adonay,  aparta  tu  ira  e 

indignación  de  sobre  tu  ciudad  Jerusa-

lem, tu Monte Santo, conforme a toda tu 

justicia, porque a causa de nuestros peca-

dos y por la maldad de nuestros padres, 

Jerusalem y tu pueblo han venido a ser el 

oprobio de todos cuantos nos rodean!

17

 Ahora pues, Dios nuestro, oye la oración 

de tu siervo y sus ruegos, y haz que tu ros-

tro resplandezca sobre tu Santuario asola-

do, por amor de ti mismo, ¡oh Adonay!

18

 ¡Oh Dios mío!, inclina tu oído y escu-

cha; abre tus ojos y mira nuestras desola-

ciones y la ciudad sobre la que se invoca 

tu Nombre, porque no elevamos nuestros 

ruegos ante ti confiados en nuestras justi-

cias, sino en tus muchas misericordias.

19

 ¡Oh Adonay, oye! ¡Oh Adonay, perdona! 

¡Oh Adonay, presta oído y hazlo! ¡Oh Dios 

mío, por amor de ti mismo, no te tardes!, 

porque tu Nombre es invocado sobre tu 

ciudad y sobre tu pueblo.

Explicación de la visión

20

 Aún estaba hablando y orando, y con-

fesando mi pecado y el pecado de mi pue-

blo Israel, y derramaba mi ruego delante 

de YHVH mi Dios por el monte santo de 

mi Dios,

21

 y  mientras  hablaba  en  oración,  aquel 

varón a quien había visto en la visión al 

principio, Gabriel, vino a mí volando con 

presteza° como a la hora del sacrificio de 

la tarde.

22

 Y me hizo entender, y habló conmigo, 

diciendo: Oh Daniel, ahora he salido para 

darte sabiduría y entendimiento.

23

 Al principio de tus ruegos fue dada la or-

den, y yo he venido para enseñártela, por-

que tú eres varón muy amado. Presta pues 

atención a la palabra y entiende la visión:

24

 Setenta  semanas  están  determinadas 

sobre  tu  pueblo  y  sobre  tu  santa  ciudad, 

para terminar la transgresión y poner fin 

al pecado, y expiar la iniquidad, para traer 

la justicia perdurable, y sellar la visión y la 

profecía, y ungir al Santo de los santos.

25

 Sabe,  pues,  y  entiende,  que  desde  la 

salida de la orden para restaurar y reedifi-

car a Jerusalem hasta el Mesías Príncipe, 

habrá  siete  semanas  y  sesenta  y  dos  se-

manas. Se volverá a edificar la plaza y el 

muro en tiempos angustiosos.

26

 Después de las sesenta y dos semanas 

se quitará la vida al Mesías, mas no por sí. 

Y el pueblo de un príncipe que ha de venir 

destruirá la ciudad y el Santuario, pero su 

fin será como una inundación, y hasta el 

fin de la guerra han sido decretados aso-

lamientos.

27

 Y por otra semana confirmará el pacto 

con muchos. A la mitad de la semana hará 

cesar el sacrificio y la ofrenda. Después, 

con la muchedumbre de las abominacio-

nes, vendrá el desolador, hasta que venga 

la consumación, y lo que está determina-

do se derrame sobre el desolador.

El Hijo del Hombre

10

En el año tercero de Ciro rey de Per-

sia fue revelada palabra a Daniel, lla-

mado  Beltsasar.  Palabra  verdadera  acerca 

de  un  gran  conflicto.  Y  él  comprendió  la 

palabra y tuvo inteligencia en la visión.

2

 En aquellos días, yo, Daniel, estuve afli-

giéndome por espacio de tres semanas.

3

 No  comí  manjar  delicado,  ni  carne  ni 

vino entraron en mi boca, ni me ungí con 

ungüento,  hasta  que  fueron  cumplidas 

tres semanas enteras.

4

 El día veinticuatro del mes primero es-

taba yo a la orilla del gran río Hidekel,°

5

 y alzando mis ojos miré, y he aquí un 

varón vestido de lino blanco, ceñidos sus 

lomos de oro de Ufaz.

6

 Su cuerpo era como un crisólito, su ros-

tro como un relámpago, y sus ojos como 

antorchas  de  fuego.  Sus  brazos  y  pies 

tenían  la  refulgencia  del  bronce  incan-

descente, y el sonido de sus palabras era 

como el estruendo de una multitud.

9.21 Lit. con fatiga. Figura de dicción que expresa algo así como con tanta rapidez que se fatigaba.  10.4 Esto es, Tigris. Ver 

Gn.2.2. 


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Daniel 10:7

908

7

 Y sólo yo, Daniel, vi aquella visión, y no 

la  vieron  los  hombres  que  estaban  con-

migo, pero un gran temor se apoderó de 

ellos y huyeron para esconderse.

8

 Quedé, pues, yo solo, y vi esta gran vi-

sión, y no quedó fuerza en mí, antes mi 

fuerza  se  cambió  en  abatimiento,  y  no 

tuve vigor alguno.

9

 Pero oí el sonido de sus palabras; y al oír 

el  sonido  de  sus  palabras,  caí  de  bruces 

desfallecido, con mi rostro en tierra.

10

 Pero he aquí una mano me tocó, e hizo 

que  me  enderezara  sobre  mis  rodillas  y 

las palmas de mis manos.

11

 Y me dijo: Daniel, varón muy amado, 

está atento a las palabras que te hablaré, y 

ponte en pie, porque a ti he sido enviado 

ahora. Y cuando me hubo dicho esa pala-

bra, me puse en pie temblando.

12

 Me dijo: Daniel, no temas, porque des-

de el primer día que dispusiste tu corazón 

a entender y a humillarte en la presencia 

de tu Dios, fueron oídas tus palabras, y a 

causa de tus palabras he venido.

13

 El príncipe del reino de Persia se me 

opuso durante veintiún días, pero he aquí 

Miguel, uno de los principales príncipes, 

vino para ayudarme, y quedé allí con los 

reyes de Persia.

14

 He venido para hacerte saber lo que ha 

de venir a tu pueblo en los postreros días, 

aunque  queda  otra  visión  para  aquellos 

días.°

15

 Mientras  me  decía  estas  palabras,  yo 

estaba con mi vista en tierra, enmudeci-

do.

16

 Pero he aquí, algo como una semejan-

za de hijo de hombre tocó mis labios. En-

tonces abrí mi boca y hablé, y dije al que 

estaba delante de mí: Señor mío, con la 

visión me han sobrevenido dolores, y no 

me quedan fuerzas.

17

 ¿Cómo,  pues,  podrá  el  siervo  de  mi 

señor  hablar  con  mi  señor?  Porque  al 

instante  me  faltó  la  fuerza,  y  no  me  ha 

quedado aliento.

18

 Entonces, aquel que tenía semejanza de 

hombre me tocó otra vez, y me fortaleció,

19

 y  me  dijo:  Muy  amado,  no  temas.  La 

paz  sea  contigo.  ¡Esfuérzate  y  aliénta-

te!  Y  no  bien  hubo  hablado,  recobré  las 

fuerzas,  y  dije:  ¡Hable  mi  Señor,  porque 

me has fortalecido!

20

 Él me dijo: ¿Sabes para qué he venido 

a ti? Ahora tengo que volver para luchar 

contra el príncipe de Persia, y al terminar 

con él, vendrá el príncipe de Grecia.

21

 Pero te declararé lo que está escrito en 

el rollo de la verdad. Nadie me ayuda con-

tra ellos, sino Miguel vuestro príncipe.

Cronología

11

Yo, por mi parte, en el año prime-

ro de Darío el medo, me puse a su 

lado para apoyarlo y fortalecerlo.

2

 Y ahora te anunciaré la verdad: He aquí 

que se levantarán todavía tres reyes en Per-

sia, y el cuarto se hará de grandes riquezas 

más que todos ellos, y cuando se haya he-

cho fuerte por medio de sus riquezas, agi-

tará a todos contra el reino de Grecia.

3

 Se levantará luego un rey poderoso, que 

gobernará  con  gran  dominio  y  hará  su 

voluntad.

4

 Pero  apenas  establecido,  su  reino  será 

quebrantado  y  repartido  a  los  cuatro 

vientos de los cielos, pero no a sus des-

cendientes, ni con el poder con que él go-

bernó, porque su reino será arrancado, y 

pasará a otros fuera de aquéllos.

5

 Y el rey del sur será fuerte, pero uno de 

sus príncipes se hará más fuerte que él y 

ejercerá un dominio mayor que el suyo.

6

 Al  cabo  de  algunos  años  pactarán  una 

alianza, y la hija del rey del sur vendrá al 

rey del norte para hacer la paz, pero no 

retendrá la fuerza de su brazo ni su lina-

je subsistirá, ni podrá mantenerse en pie, 

sino que ella será entregada junto con los 

que la trajeron y el que la engendró y la 

sostuvo en aquellos tiempos.

7

 Pero un renuevo de sus raíces se levanta-

rá en su lugar, el cual vendrá con un ejérci-

to y entrará en la fortaleza del rey del norte 

y hará en ellos a su arbitrio, y dominará.

8

 Y también a los dioses de ellos, sus imá-

genes fundidas y sus objetos preciosos de 

plata y de oro, llevará cautivos a Egipto, 

y por años él se mantendrá contra el rey 

del norte.

9

 Así  pues  entrará  en  su  dominio  el  rey 

del sur, y volverá a su tierra.

10.14 Ver Jn.21.21-23; Ap.1.1-2. 


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Daniel 11:33

909

10

 Pero los hijos de aquél se airarán, y re-

unirán una multitud de grandes ejércitos, 

y vendrá° a viva fuerza e invadirá, y pasará 

adelante. Luego volverá y llevará la gue-

rra hasta su fortaleza.

11

 Por lo cual se enfurecerá el rey del sur, 

y saldrá y peleará contra el rey del norte, 

y pondrá en campaña una gran multitud, 

y toda aquella multitud será entregada en 

su mano.

12

 Y la multitud será llevada, con lo cual 

se elevará su corazón, y derribará a mu-

chos millares, pero no prevalecerá.

13

 Porque el rey del norte volverá a poner 

en campaña una multitud mayor que la 

primera, y al cabo de algunos años vendrá 

a viva fuerza con gran ejército y con mu-

chas riquezas.

14

 En  aquellos  tiempos  muchos  se  le-

vantarán contra el rey del sur; y hombres 

violentos de tu pueblo se levantarán para 

cumplir la visión, pero fracasarán.

15

 Y vendrá el rey del norte, y levantará 

baluartes, y tomará la ciudad fortificada, y 

las fuerzas del sur no podrán sostenerse, 

ni sus tropas escogidas, porque no habrá 

fuerzas para resistir.

16

 Y el que vendrá contra él hará su vo-

luntad, y no habrá quien se le pueda en-

frentar,  y  estará  en  la  tierra  gloriosa,  la 

cual será consumida bajo su poder.

17

 Luego dirigirá su mira para apoderar-

se de todo su reino, y hará convenios con 

él, y le dará su hija por mujer para des-

truirlo, pero ello no tendrá éxito, ni ella 

permanecerá de su parte.

18

 Entonces volverá su rostro a las costas 

marítimas, y se apoderará de muchas, pero 

un  príncipe  hará  cesar  su  afrenta,  y  aun 

hará volver su afrenta sobre él mismo.

19

 Por lo cual dirigirá su mira hacia las 

fortalezas de su propia tierra, pero trope-

zará y caerá, y no será más hallado.

20

 En  su  lugar  se  levantará  otro  que 

aplicará grandes tributos a la tierra más 

hermosa  del  reino,  pero  en  pocos  días 

será quebrantado, sin actos de furia, ni 

en batalla.

21

 Y le sucederá en su lugar un plebeyo, 

sobre el cual no se habrá conferido la ma-

jestad  del  reino,  pero  vendrá  en  tiempo 

de seguridad, y se apoderará del reino por 

medio de intrigas.

22

 Las  fuerzas  enemigas  serán  barridas 

como torrente delante de él, y serán del 

todo destruidas, junto con el príncipe de 

su pacto.

23

 Porque  después  de  confederarse  con 

él, actuará engañosamente, y subirá y sal-

drá vencedor con poca gente.

24

 Estando la provincia en paz y en abun-

dancia, entrará y hará lo que no hicieron 

sus  padres,  ni  los  padres  de  sus  padres: 

repartirá  entre  ellos  despojos,  botín,  y 

riquezas, y contra las fortalezas tramará 

sus designios, pero esto por un tiempo.

25

 Y empleará su poderío y su coraje contra 

el rey del sur con un gran ejército. También 

el rey del sur se empeñará en la guerra con 

grande y poderoso ejército, pero no preva-

lecerá, porque le harán traición.

26

 Aun  los  que  coman  de  sus  manjares 

delicados  lo  quebrantarán,  y  su  ejército 

será destruido y caerán muchos muertos 

a cuchillo.

27

 El corazón de estos dos reyes será para 

hacerse daño, y en una misma mesa ha-

blarán  mentira,  pero  no  prosperarán, 

porque  todavía  el  fin  es  para  un  tiempo 

determinado.

28

 Volverá pues a su tierra con grandes ri-

quezas, y su corazón será contra el pacto 

santo, y hará su voluntad, y volverá a su 

tierra.

29

 Al tiempo señalado volverá y se dirigi-

rá contra el sur, pero la postrera venida 

no será como la primera.

30

 Porque vendrán contra él las naves de 

Quitim, y él será intimidado, y volverá, y 

se indignará contra el pacto santo, y hará 

según su voluntad, y volverá y se entende-

rá con los que abandonen el santo pacto.

31

 Y se levantarán de su parte tropas que 

profanarán  el  Santuario,  la  fortaleza,  y 

quitarán el continuo sacrificio, y pondrán 

allí la abominación desoladora.

32

 Y a aquellos impíos violadores del pac-

to los inducirá en la apostasía por medio 

de halagos, pero el pueblo que conoce a 

su Dios se esforzará y actuará.

33

 Y los sabios del pueblo harán que mu-

chos  comprendan,  aunque  por  algunos 

11.10 Esto es, uno de ellos. 


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Daniel 11:34

910

días  caerán  a  causa  de  la  espada,  de  las 

llamas, del cautiverio y del saqueo.

34

 Pero en su caída serán ayudados con un 

socorro  pequeño,  por  lo  cual  muchos  se 

juntarán a ellos con pretextos engañosos.

35

 Por eso algunos de los sabios tropeza-

rán,  para  que  sean  acrisolados  y  purifi-

cados y emblanquecidos hasta el tiempo 

del  fin,  porque  aún  falta  para  el  tiempo 

determinado.

36

 Aquel rey pues hará su voluntad, y se 

ensoberbecerá,  y  se  engrandecerá  sobre 

todo dios, y contra el Dios de los dioses 

proferirá cosas espantosas, y prosperará, 

hasta que sea consumada la ira, porque lo 

decretado se cumplirá.

37

 Del  Dios  de  sus  padres  no  hará  caso, 

ni del deseo de las mujeres, ni respetará a 

dios alguno, porque se engrandecerá a sí 

mismo por sobre todas las cosas.

38

 Honrará en cambio al dios de las forta-

lezas; a un dios que sus padres no cono-

cieron lo honrará con oro, plata, piedras 

preciosas y ornamentos de gran precio.

39

 Con la unión pues del dios extraño, ac-

tuará contra las fortalezas más inexpug-

nables, y colmará de honores a los que lo 

reconozcan. Les dará dominio sobre mu-

chos, y como recompensa les repartirá la 

tierra.

40

 Pero  al  tiempo  del  fin,  el  rey  del  sur 

arremeterá contra él, y el rey del norte se 

levantará contra él como una tempestad, 

con carros y gente de a caballo y muchas 

naves, y entrará en los países y pasará so-

bre ellos como un torrente.

41

 Entrará a la tierra gloriosa, y muchas 

provincias serán derribadas, pero Edom y 

Moab, y la mayoría de los hijos de Amón 

escaparán de su mano.

42

 Extenderá  su  mano  también  contra 

otras tierras, el país de Egipto no escapará,

43

 sino que se apoderará de los tesoros de 

oro y plata y de todas las cosas preciosas 

de Egipto, y los Libios y los Etíopes lo se-

guirán.

44

 Pero noticias del oriente y del norte lo 

turbarán, y saldrá con gran furia para aso-

lar y para destruir enteramente a muchos.

45

 Y plantará los pabellones de su palacio 

entre los mares, junto al monte glorioso 

y santo, pero llegará a su fin, y no tendrá 

quien lo ayude.

El tiempo del fin

12

En  aquel  tiempo  se  levantará  Mi-

guel, el gran príncipe que está de 

parte  de  los  hijos  de  tu  pueblo,  y  será 

tiempo de angustia, cual nunca fue desde 

que hubo gente hasta entonces. Pero en 

aquel tiempo será libertado tu pueblo, to-

dos los que se hallen escritos en el rollo.

2

 Y una multitud de los que duermen en 

el  polvo  de  la  tierra  serán  despertados, 

unos  para  vida  eterna,  y  otros  para  ver-

güenza y confusión eterna.

3

 Entonces  los  entendidos  resplandece-

rán como el resplandor del firmamento, y 

los que enseñan la justicia a la multitud, 

como las estrellas a perpetua eternidad.

4

 Pero tú, Daniel, cierra las palabras y se-

lla el rollo hasta el tiempo del fin. Muchos 

correrán  de  aquí  para  allá,  y  la  ciencia 

será aumentada.

5

 Entonces yo, Daniel, observé, y he aquí 

otros dos que estaban en pie, el uno a este 

lado del río, y el otro al otro lado del río.

6

 Y dijo uno al varón vestido de lino, que 

estaba  sobre  las  aguas  del  río:  ¿Cuándo 

será el fin de estas maravillas?

7

 Y yo oí al varón vestido de lino, que esta-

ba parado sobre las aguas del río, cuando 

alzando su diestra y su siniestra hacia los 

cielos, juró por Aquel que vive eternamen-

te, que sería por un tiempo, y tiempos, y 

la mitad de un tiempo; y cuando finalice 

el quebrantamiento de la fuerza del pueblo 

santo, todas estas cosas serán cumplidas.

8

 Y yo oí, pero no entendí; y dije: Señor 

mío, ¿cuál será el fin de estas cosas?

9

 Él  respondió:  Anda,  Daniel,  pues  estas 

palabras están cerradas y selladas hasta el 

tiempo del fin.

10

 Muchos serán limpios y emblanqueci-

dos y purificados, pero los impíos segui-

rán  procediendo  impíamente  y  ninguno 

de los impíos entenderá, pero los enten-

didos comprenderán.

11

 Y  desde  el  tiempo  que  sea  quitado  el 

continuo sacrificio para poner la abomi-

nación desoladora, habrá mil doscientos 

noventa días.

12

 Bienaventurado el que espere, y llegue 

a mil trescientos treinta y cinco días.

13

 Y tú irás hasta el fin, y reposarás, y te 

levantarás  para  recibir  tu  heredad  al  fin 

de los días.


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1

Revelación  de  YHVH  que  tuvo  Oseas 

ben°  Beeri,  en  los  días  de  Uzías,  Jo-

tam,  Acaz  y  Ezequías,  reyes  de  Judá,  y 

en los días de Jeroboam ben Joás, rey de 

Israel.

2

 Cuando  YHVH  comenzó  a  hablar  por 

Oseas,° dijo YHVH a Oseas: Ve, tómate a 

una mujer prostituta° y engendra hijos de 

prostitución,° porque la tierra se prosti-

tuye totalmente, apartándose de YHVH.°

3

 Fue pues y tomó a Gomer,° hija de Di-

blaim,° quien concibió y le dio a luz un 

hijo.

4

 YHVH le dijo: Ponle por nombre Jezre-

el,° porque muy pronto visitaré° la casa 

de  Jehú  por  la  sangre  derramada  en 

Jezreel, y haré cesar el reino de la casa 

de Israel.

5

 Y sucederá que en aquel día quebraré el 

arco de Israel en el valle de Jezreel.

6

 De nuevo concibió, y dio a luz una hija. 

Le  dijo:  Ponle  por  nombre  Lo-ruhama,° 

porque no seguiré compadeciéndome de 

la casa de Israel para perdonarlos.°

7

 Pero me compadeceré de la casa de Judá 

y los salvaré por YHVH, su Dios. No los 

salvaré con arco, ni con espada, ni con ba-

talla, ni con caballos, ni con jinetes.°

8

 Cuando destetó a Lo-ruhama, concibió 

y dio a luz un hijo.

9

 Le  dijo:  Ponle  por  nombre  Lo-ammi,° 

porque vosotros no sois mi pueblo ni Yo 

seré para vosotros YO SOY.°

10

 °Con todo, el número de los hijos de 

Israel será como la arena del mar, que no 

se puede medir ni contar.° Y sucederá que 

donde se les haya dicho: Vosotros no sois 

mi pueblo; se les dirá: Hijos del Dios vi-

viente.

11

 Y los hijos de Judá y los hijos de Israel 

serán reunidos en uno, y designarán un 

único caudillo, y resurgirán de la tierra, 

porque es el día grande de Jezreel.°

Adulterio espiritual

2

  ¡Llamad pues a vuestros hermanos 

   Ammi,° y a vuestras hermanas 

   Ruhama!°

2

    ¡Contended con vuestra madre, 

contended,

Que ella no es mi mujer ni Yo soy su 

marido,

Para que se quite de su cara sus 

fornicaciones,

Y sus adulterios° de entre sus 

pechos!

3

    No sea que la despoje

Castigo y Restauración de Israel

1.1 Esto es, hijo de.  1.2 Lit. el principio de lo que YHVH habló por Oseas.  1.2 Lit. de fornicaciones. Prob.: mujer que ejercía 

el llamado oficio de prostituta sagrada. Se presenta como símbolo de relaciones ilícitas del pueblo de Dios, tanto políticas 

→Ez.16.26, 28, como religiosas →Ex.34.15, 16.  1.2 Conforme al contexto, estos hijos de prostitución vendrían a ser el fruto 

de la relación del profeta con Gomer. Prob. su denominación obedece al oficio de su madre. 

1.2 Lit. fornicará de YHVH 

→4.12 

nota. 

1.3 Gomer = finalización, extremo. Prob. refiere su grado de depravación.  1.3 Diblaim = tortas de higos. Prob. alude a 

una inclinación a prácticas idolátricas 

→3.1.  1.4 Jezreel = Dios esparcirá (o sembrará). Nombre profético que contiene un 

anuncio de castigo 

→Ap.16.16, y al mismo tiempo una promesa de restauración. Su significado es tanto para el cautiverio como 

para la futura obra restauradora 

→2.23.  1.4 visitaré. Es decir, castigaré →2 R. 9–10.  1.6 Lo-ruhama = no amada.  1.6 para 

perdonarlos. LXX: sino que me opondré a ellos

1.7 Prob. alusión a la liberación milagrosa de Jerusalem de mano de Senaque-

rib 

→2 R.18-19.  1.9 Lo-ammi = no-pueblo-mío.  1.9 Nni Yo seré vuestro. Pero, ante la inexistencia del tiempo presente del 

verbo, es preferible considerar aquí una referencia al nombre personal de Dios 

→Ex.3.14; § 3.  1.10 TM: El c. 2 comienza aquí. 

1.10 Lit. que no es medida ni contada.  1.11 Prob. es profecía y no historia.  2.1 Ammi = pueblo mío.  2.1 Ruhama = amada

2.2 adulterios. Esto es, figura de la adoración idolátrica.


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Oseas 2:4

912

Y la deje totalmente desnuda°

Y la ponga como el día que nació,

Y la deje como el desierto,

Y la reduzca a tierra árida,

Y la haga morir de sed,

4

    Y no me compadezca de sus hijos, 

porque son hijos bastardos.

5

    Sí, su madre se ha prostituido; la 

que los dio a luz se deshonró,

Pues se dijo: Iré en pos de mis 

amantes,

Los cuales me dan mi pan y mi agua,

Mi lana y mi lino, mi aceite y mi 

vino.

6

    ¡He aquí Yo cerco tu camino con 

zarzales!°

Cercaré con muro° su muro para 

que no encuentre sus senderos.

7

    Perseguirá a sus amantes y no los 

alcanzará,

Los buscará y no los encontrará;°

Y dirá: ¡Volveré con mi primer marido,

Porque entonces me iba mejor que 

ahora!

8

    Ella no entendía que era Yo quien le 

daba

El grano, el mosto° y el aceite,°

Quien le multiplicaba la plata y el 

oro, que usan para Baal.

9

    Por eso le quitaré otra vez mi grano 

a su tiempo y mi mosto° a su 

sazón,

Recuperaré mi lana y mi lino con 

que cubría° su desnudez.

10

    Descubriré su infamia ante sus 

amantes,

Y no habrá quien la libre de mi 

mano.

11

    Pondré fin a todo su alborozo:°

A sus fiestas, sus novilunios y sus 

shabbatot,

Y a todas sus solemnidades.

12

    Arrasaré su vid y su higuera, de los 

que decía: Son mi paga,°

Me la dieron mis amantes.

Las convertiré en matorrales, y las 

comerán las bestias del campo.

13

    La castigaré por los días dedicados a 

los Baales,°

A los cuales les quemaba incienso,

Y adornándose con aretes° y 

gargantillas,°

Iba en pos de sus amantes, y se 

olvidaba de mí, dice YHVH.

14

    Por tanto Yo la atraeré y la 

conduciré al desierto,

Y le hablaré a su corazón,

15

    Allí le daré sus viñas y el valle de 

Acor° como puerta de esperanza;

Allí me responderá como en su 

juventud,

Como cuando salió de Egipto.

16

    Y sucederá en aquel día, dice YHVH,

Tú me llamarás ’Ishí,° y ya no me 

llamarás Ba’alí,°

17

    Pues quitaré de su boca los nombres 

de los Baales,°

Y sus nombres no serán más 

invocados.

18

    Pactaré a favor de ellos un pacto con 

las bestias salvajes,

Con las aves de los cielos y con los 

reptiles de la tierra;

Romperé el arco, la espada y las 

batallas de la tierra,

Y haré que reposen seguros.

19

    Te desposaré conmigo para siempre,

Te desposaré conmigo en justicia y 

derecho,

En benignidad y gran misericordia.

20

    Te desposaré conmigo en fidelidad, y 

tú conocerás a YHVH.°

2.3 Lit. la desnude desnuda.  2.6 Lit. cerco con setos tu camino con las espinas.  2.6 muro. Prob. alusión a los muros de asedio 

que realizaban en la antigüedad. 

2.7 Lit. los buscará para no encontrar.  2.8 mosto. Esto es, vino nuevo.  2.8 Prob. se refiere 

al aceite fresco, no tratado por el hombre. 

2.9 

→2.8 nota.  2.9 Lit. y quitaré mi lana y mi lino para cubrir.  2.11 Esto es, un 

regocijo  extraordinario

2.12  Se  refiere  al  salario  de  una  prostituta.  2.13  Lit.  así  visitaré  sobre  ella  los  días  de  los  baales

2.13 Ornamento que se ponía en la nariz.  2.13 gargantilla. Heb. vehelyatah. Vocablo de significado incierto. Aparece una vez 

en la Biblia. 

2.15 Acor = desgracia 

→Jos.7. Símbolo de restauración después del castigo.  2.16 ’Isí = esposo mío.  2.16 Ba’alí 

= señor mío. El reino del norte usaba el término Baal no sólo para referirse a las divinidades cananeas, sino también para oca-

sionalmente aludir al Dios de Israel. La palabra baal significa amo, señor o dueño, por lo que es prob. que en un primer período 

haya sido usada en Israel como un sinónimo del término Adón o Adonay 

→2 S.5.20. Sin embargo, a medida que el culto a los 

baales se fue extendiendo entre los israelitas, la palabra baal llegó a ser el nombre de divinidades cananeas, y su uso para aludir 

a Dios fue considerado como un sincretismo. 

2.17 Aunque Baal es el nombre propio de una divinidad cananea, el texto bíblico 

a menudo habla de los baales porque en la religión de los cananeos había gran cantidad de dioses cuyos nombres empezaban 

con Baal (Baal-berit = señor del pacto

→Jue.8.33 o Baal-zebub = señor de las moscas →2 R.1.2).  2.20 VUL registra: que Yo 

soy YHVH


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Oseas 4:8

913

21

    Aquel día responderé.° 

Oráculo de YHVH:

Yo responderé a los cielos, y ellos 

responderán a la tierra,

22

    Y la tierra responderá al trigo, al 

vino° y al aceite,°

Y ellos responderán a Jezreel.

23

    Y la sembraré° en la tierra para mí 

mismo,

Y me compadeceré de Lo-ruhama,

Y diré a Lo-ammi: Pueblo mío.

Y él responderá: ¡Tú eres mi Dios!

El amor imperecedero

3

  Me dijo YHVH: Ve otra vez, ama a 

   una mujer amada por su 

   marido,° y aún así, adúltera,

Tal como YHVH ama a los hijos de 

Israel,

Aunque siguen a dioses ajenos,

Y aman las tortas de uvas pasas.°

2

    Me la compré por quince siclos° de 

plata

Y un homer° y un letek° de cebada,°

3

    Y le dije: Muchos días me 

aguardarás;

No fornicarás ni estarás con hombre 

alguno, ni yo estaré contigo.°

4

    Porque muchos días estarán los 

hijos de Israel

Sin rey y sin caudillo, sin sacrificio y 

sin pilar,°

Sin efod y sin terafim.°

5

    Después volverán los hijos de Israel 

y buscarán a YHVH su Dios y a 

David su rey;

Y acudirán temblorosos° a YHVH, 

y a su misericordia al fin de los 

días.

Contra los sacerdotes

4

¡Oíd el oráculo de YHVH, oh hijos de 

Israel!

Porque YHVH tiene una contienda 

con los habitantes del país,

Por cuanto no hay fidelidad ni 

misericordia,

Ni conocimiento de Dios en la tierra.

2

    Se propagan° el perjurio y la mentira,

El asesinato y el robo,

El adulterio y el libertinaje,

Y un charco de sangre toca al otro.°

3

    Por eso tendrá luto la tierra,

Y todos los que la habitan 

desfallecerán,

Juntamente con las bestias del 

campo° y las aves de los cielos,°

Y hasta los peces del mar perecerán.

4

    Pero, nadie acuse ni reprenda a otro,

Porque, oh sacerdote, es contigo mi 

querella.

5

    Por tanto, tropezarás en pleno día,

Y junto con el profeta tropezarás en 

la noche.

6

    Perecerá tu patria,°

Porque mi pueblo perece por falta de 

conocimiento.

Por cuanto desechaste el 

conocimiento,

Yo te desecharé de mi sacerdocio.°

Por cuanto olvidaste la Ley de tu Dios,

También Yo me olvidaré de tus hijos,

7

    Que mientras más aumentan, más 

pecan contra mí;°

Cambiaron mi° gloria en vergüenza:

8

    Se ceban con la ofrenda° del pecado 

de mi pueblo,

Y a la iniquidad de éste elevan su 

anhelo.°

2.21 LXX y Siríaca omiten responderé.  2.22 

→2.8 nota.  2.22 →2.8 nota.  2.23 Promesa de restauración →1.4 nota.  3.1 O 

amada de un amante. LXX: que ama a otro

3.1 Comidas preparadas con propósitos idolátricos para ofrecerlas a las divinidades 

paganas 

→Jer.7.18 y 44.19.  3.2 .siclos.  3.2 Medida equivalente a diez efas →Ez.45.11.  3.2 Medida de capacidad de áridos. 

Término que sólo aparece aquí, por lo que su significado exacto es difícil de determinar. 

3.2 LXX registra un homer de cebada 

y un cántaro de vino

3.3 Lit. y también (o tampocoyo a ti.  3.4 Se trata de piedras o pilares considerados sagrados y gene-

ralmente relacionados con el culto pagano 

→Ex.23.24; Lv.26.1; 1R.14.23.  3.4 terafim. Esto es, ídolos familiares →Gn.31.19, 

30 y 32, y Jue.18.17 y 24, usados como medio de adivinación en Israel 

→2 R.23.24, como ya se hacía en los pueblos paganos 

→Ez.21.21.  3.5 Esto es, sentimiento muy fuerte, que en algunos casos puede llegar al temblor físico que produce el terror. 

4.2 Se propagan. Lit. se abren brechas. En otros contextos indica un crecimiento explosivo. En esos casos la idea es que los 

hechos han roto sus propios límites. LXX añade sobre la tierra

4.2 Lit. la sangre toca a la sangre. Manera figurada que expresa 

el incremento de la violencia. En ocasiones, la sangre es símbolo de actos homicidas, y la expresión indica la reiteración de tales 

actos. 

4.3 LXX añade los reptiles de la tierra.  4.3 Lit. con las fieras salvajes y con las aves del cielo.  4.6 patria. Lit. madre

4.6 Lit. te desecharé de ser sacerdote para mí.  4.7 Lit. conforme a su multiplicarse, así pecan contra mí.  4.7 11ª enmienda de 

los Soferim 

→ § 6 - § 17.  4.8 .la ofrenda. Ver nota siguiente.  4.8 Lit. elevan su alma. Según la ley de los sacrificios →Lv.7.1-8, 

los sacerdotes podían comer de las ofrendas por el pecado. La denuncia aquí es que los sacerdotes hacían que el pueblo pecara 

más a fin de obtener mayor número de sacrificios. 


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Oseas 4:9

914

9

    Pero la suerte del sacerdote será 

como la del pueblo,

Visitaré° sobre él sus caminos, y le 

daré el pago de sus malos hechos.

10

    Comerán y no se saciarán,

Fornicarán° y no se multiplicarán,

Porque abandonaron a YHVH,°

11

    Para atender a la fornicación, al vino 

y al mosto,

Que dominan el corazón.°

12°

  Mi pueblo consulta al leño, y el palo 

le responde,

Porque un espíritu de fornicación° 

lo ha extraviado,

E idolátricamente se han apartado 

de su Dios.°

13

    Sobre la cumbre de los montes 

ofrecen sacrificios,

Y sobre las colinas queman incienso,

Debajo de las encinas, de los álamos 

y de los robles,

Porque su sombra es buena.

Por eso vuestras hijas fornicarán,

Y vuestras nueras adulterarán,

14

    Y Yo no visitaré° a vuestras hijas 

cuando forniquen,

Ni a vuestras nueras cuando adulteren,

Porque ellos mismos° van con las 

rameras,

Y con las prostitutas del templo° 

ofrecen sacrificios,

Y el pueblo, incauto, va a la ruina.

15

    ¡Oh Israel!, madre prostituta eres, 

¡que no lo pague Judá!

No entréis en Gilgal° ni subáis a 

Bet-avén,°

Ni juréis diciendo: ¡Vive YHVH!

16

    Si Israel embiste como novilla 

cerrera,

¿Lo pastoreará YHVH como cordero 

en el campo?

17

    Efraín está apegado a los ídolos. 

¡Déjalo!

18

    Su embriaguez se ha tornado en 

rebelión,°

Se siguen entregando a la prostitución,

Y sus príncipes° mucho aman lo que 

avergüenza,

19

    El viento los envolvió en sus alas,

Y serán avergonzados a causa de sus 

sacrificios.°

La sentencia

5

  ¡Oíd esto, sacerdotes! ¡Atended, oh 

   casa de Israel!

¡Prestad oído, oh casa real!

A vosotros afecta esta sentencia,

Porque fuisteis lazo° en Mizpa,

Red tendida° en el Tabor,

  Y fosa cavada en Sitim.°

Yo los castigaré a todos.°

3

    Sé quién es Efraín, e Israel no se me 

oculta:°

Tú Efraín, incitaste a la fornicación,

E Israel se ha contaminado.

4

    Sus obras no los dejan volver a su 

Dios,

Porque un espíritu de fornicación 

está en medio de ellos,

Y desconocen° a YHVH.

5

    La soberbia° de Israel testifica 

contra él mismo,

4.9 Es decir, lo castigaré.  4.10 La prostitución religiosa era una práctica común en la religión cananea, que procuraba la fertili-

dad de la tierra, de los animales y de las personas. Consistía en las relaciones sexuales con prostitutas (o prostitutos) sagradas 

en los templos de Baal. Esta práctica se introdujo en el pueblo de Israel. 

4.10 NPorque dejaron de atender a YHVH. Ver nota 

siguiente. 

4.11 La traducción propuesta considera la distribución del texto en versos y la dificultad que entraña la oración final 

del v. 10. 

4.11 corazón. Es decir, que quitan el juicio.  4.12 LXX: Fornicación, vino y mosto quitan el juicio de mi pueblo, consulta 

a su madero… NEl mosto quita el juicio de mi pueblo, consulta a su madero (vv. 11-12). 

4.12 Lit. de fornicaciones.  4.12 Lit. 

han fornicado de debajo de su Dios. Es decir, al adorar a dioses ajenos han dejado de someterse a su Dios 

→1.2.  4.14 Es 

decir, castigaré

4.14 ellos mismos. Esto es, los hijos.  4.14 Designación de mujeres (y hombres) que, según sus costumbres 

paganas, realizaban ritos sexuales con el fin de garantizar la fertilidad de la tierra, de los animales y de las personas 

→2 R.23.7. 

4.15 LXX: Israel, no seas ignorante, y Judá, no vayáis a Gilgal.  4.15 Bet-avén = casa de iniquidad. Esto es, Bet-’El = Casa de 

Dios, lugar donde Jeroboam había puesto uno de los dos becerros de oro para que el pueblo de Israel no fuera a Jerusalem 

a adorar. 

4.18 Lit. su bebida se ha vuelto rebelde.  4.18 príncipes. Lit. sus escudos. Forma figurada de referirse a quienes 

gobiernan en Israel. 

4.19 LXX, Siríaca y VUL: a causa de sus altares.  5.1 Esto es, trampa para pájaros.  5.1 Las expresiones 

lazo y red tendida son figuras referidas a los líderes religiosos y políticos, que hacían pecar al pueblo al llevarlo a prácticas 

idolátricas condenadas por Dios. 

5.2 

→1.4 nota.  5.2 NLos descarriados han ahondado en la matanza. NHan ahondado la 

fosa de Sitim 

→9.10 y Nm.25.  5.2 LXX: pero Yo os corregiré.  5.3 Lit. Israel no me es oculto.  5.4 Es decir, se dan por desen-

tendidos de su relación con Dios. 

5.5 Este término denota grandeza, majestad, exaltación, y expresa connotaciones positivas 

como negativas. Usado de forma positiva puede aludir a Dios (que es el orgullo o la majestad de Israel), mientras que usado 

de forma negativa alude a la soberbia, la peor manifestación del orgullo (en castellano, orgullo también puede tener un sentido 

positivo o negativo). 


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Oseas 6:11

915

Israel y Efraín han tropezado en su 

pecado,

Y Judá tropezará con ellos.

6

    Irán en busca de YHVH

Con sus rebaños y sus vacadas,

Pero no lo podrán hallar,

Porque Él se apartó de ellos.

7

    Han sido infieles° a YHVH, y le 

parieron hijos extraños.

Ahora los devorará la luna nueva° 

juntamente con sus heredades.

8

    ¡Haced resonar el shofar° en Gabaa, 

y la trompeta en Ramá!

¡Tocad la alarma° en Bet-avén!°

¡Alerta, oh Benjamín!°

9

    Efraín será asolado en el día del castigo:

En las tribus de Israel doy a conocer 

lo que es cierto.

10

    Los príncipes de Judá son como los 

que desplazan linderos,°

Derramaré mi ira sobre ellos como 

el agua.

11

    Efraín está oprimido, violados sus 

derechos,°

Porque quiso andar tras mandatos.°

12

    Yo seré pues como polilla a Efraín,

Y como carcoma° a la casa de Judá.

13

    Cuando Efraín vio su enfermedad, y 

Judá miró su llaga,

Efraín fue para Asiria, y acudió° al 

rey adversario.°

Pero él no podrá sanaros, ni la llaga 

se irá de vosotros.

14

    Porque Yo seré como un león para 

Efraín,

Y como un leoncillo para la casa de 

Judá.

¡Yo, Yo mismo hago presa y me voy,

Y me la llevo, y no hay quien me la 

quite!

15

    Me volveré de ellos a mi lugar, hasta 

que reconozcan su pecado y 

busquen mi rostro,

Y me busquen en su angustia con 

empeño:

Una conversión auténtica

6

  ¡Venid, volvamos a YHVH! Porque

 Él desgarró, pero nos sanará;

Él hirió, pero nos vendará la herida.

2

    Nos dará vida después de dos días:

Al tercer día nos resucitará, y 

viviremos delante de Él.

3

    ¡Conozcámoslo pues!

¡Sigamos adelante para conocer° a 

YHVH!

Su salida es tan cierta como la aurora,

Y Él vendrá a nosotros como la lluvia,

Como la lluvia tardía° que riega la 

tierra.

4

    ¿Qué haré contigo, Efraín?

¿Qué haré contigo, Judá?

Vuestra fidelidad es como nube 

mañanera;

Como el rocío temprano, que 

desaparece.

5

    Por eso los he hecho morir con las 

palabras de mi boca:

Los he trozado por medio de los 

profetas,

Y mi sentencia saldrá como la luz.°

6

    Porque fidelidad quiero, y no 

sacrificios,

Conocimiento de Dios, y no 

holocaustos.

7

    Ellos, como Adam,° quebrantaron 

mi pacto,

Allí° me fueron infieles.°

8

    Galaad es una villa de malhechores,

Llena de huellas de sangre.

9

    Como salteadores al acecho de un 

hombre,

Así bandas de sacerdotes asesinan 

por el camino a Siquem,

Cometiendo execrable maldad.

10

    En la casa de Israel he visto cosas 

horrendas:

Allí se prostituye Efraín,°

Allí se contamina Israel,

11

    Y también tú, Judá, tienes preparada 

la siega,°

5.7 Esto es, infidelidad matrimonial.  5.7 LXX: el tizón.  5.8 shofar. Instrumento de viento hecho de un cuerno de carnero.  5.8 

Es decir, tocar la corneta cuerno con el que la tropa se lanzaba al combate, o a las distintas señales durante una batalla. 

5.8 

→4.15 nota.  5.8 LXX: Benjamín está lleno de estupor.  5.10 →Dt.19.14; 27.17.  5.11 LXX: Efraín ha prevalecido sobre 

su adversario, ha pisado el juicio

5.11 Es decir, tras mandatos humanos. LXX: tras vanidades.  5.12 Lit. como putrefacción

Esto es, efectos devastadores de plagas de insectos o gusanos. 

5.13 Prob. Judá es el sujeto de este verbo.  5.13 Esto es, uno 

que contiende, en alusión al rey de Asiria. 

6.3 Lit. vayamos tras el conocer.  6.3 Entre Marzo y Abril.  6.5 Lit. y tus juicios, una 

luz saldrá

6.7 Adam. Aquí es nombre propio.  6.7 Allí. Prob. Bet-’El.  6.7 

→5.7 nota.  6.10 Lit. allí hay fornicación para Efraín

6.11 En este contexto, castigo 

→Joel 3.13. 


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Oseas 7:1

916

Cuando Yo restaure de la cautividad 

a mi pueblo.

La respuesta divina

7

  Cuando Yo quería sanar a Israel, se 

   descubrió la iniquidad de Efraín

Y las maldades° de Samaria.

Porque obran con engaño:

El ladrón se mete por dentro, y la 

pandilla despoja por afuera.

2

    Y no reflexionan en su corazón 

que Yo tengo presente todas sus 

perversidades.

Sus propias acciones los han copado,

Y están delante de mí.

3

    Alegran al rey con sus maldades, y a 

los príncipes con sus mentiras.

4

    Todos ellos son adúlteros, son como 

horno encendido,

Que el panadero sólo deja de atizar° 

desde el amasado hasta la 

fermentación.

5

    En el día° de nuestro rey, al calor del 

vino,

Los príncipes lo contaminaron,°

Y él extendió su mano a los 

escarnecedores,

6

    Porque como a un horno acercaron 

su corazón a la intriga:

Toda la noche dormita su ira,°

Por la mañana arde como llama de 

fuego;

7

    Todos arden como un horno, 

devoran a sus gobernantes,

Todos sus reyes van cayendo, pero 

entre ellos no hay quien clame 

a mí.

8

    Efraín se ha mezclado con los pueblos,

Efraín ha venido a ser una torta no 

volteada.°

9

    Le socavan su fuerza° los extraños, 

pero él no se da cuenta;

El cabello cano° se esparce en él, 

pero él no se da cuenta.

10

    La propia soberbia de Israel testifica 

en contra suya,

Pero ellos no se vuelven a YHVH su 

Dios,

A pesar de todo, no lo buscan.

11

    Efraín es una paloma ingenua y 

atolondrada,°

Claman a Egipto, acuden a Asiria;

12

    En cuanto vayan, Yo echaré mi red 

sobre ellos,

Y como a pájaros los haré caer;

Los atraparé en cuanto escuche la 

bandada.°

13

    ¡Ay de ellos, porque andan lejos de mí!

¡Destrucción sobre ellos, porque se 

rebelaron contra mí!

¿He de redimirlos cuando ellos me 

calumnian?

14

    Aun cuando gimen en sus lechos, no 

claman a mí de corazón;

Se apartan de mí y se reúnen para el 

trigo y para el vino.°

15

    Aunque Yo adiestré° y fortalecí sus 

brazos,

Ellos piensan mal contra mí.

16

    Se vuelven, pero no a ’Elyón,

Son como arco que yerra,°

Sus príncipes pues caerán a espada, 

por la ira de su propia lengua;

Esto será su escarnio en la tierra de 

Egipto.

Razones para el castigo

8

  ¡Emboca el shofar!°

¡Un águila viene contra la familia° 

de YHVH,

Porque violaron mi pacto y 

transgredieron mi Ley!

2

    A mí clamarán:

¡Dios mío, nosotros, Israel, te 

conocemos!°

3

    Pero Israel ha desechado lo que es 

bueno,

Y el enemigo lo perseguirá.

4

    Se nombraron reyes sin 

intervención mía;

Se nombraron príncipes sin mi 

aprobación.°

7.1 LXX, VUL: la maldad.  7.4 Esto es, el fuego.  7.5 Prob. alusión al ascenso al trono.  7.5 Es decir, contaminaron su corazón 

con insidias. LXX, Sir. VUL: empezaron a calentarse con el vino

7.6 Según el texto consonántico.  7.8 Es decir, quemada por 

un lado y cruda por el otro. 

7.9 Es decir, la idolatría lo ha debilitado 

→Pr.5.1-23.  7.9 Esto es, la lepra →Lv.13.1-3. Es decir, 

el pecado

7.11 Esto es, alguien que se deja seducir fácilmente 

→2.14.  7.12 Nlos castigaré conforme a lo anunciado en sus 

asambleas

7.14 Prob. banquetes licenciosos en honor de Ceres y Baco. LXX: se hacen incisiones a causa del grano y el mosto 

→1 R.18.28.  7.15 Lit. discipliné.  7.16 Nmal tensado, engañoso.  8.1 Lit. ¡Cuerno a tu paladar!  8.1 Lit. casa.  8.2 Lit. Dios mío, 

te hemos conocido Israel

8.4 

→Dt.17.14-15. 


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Oseas 9:7

917

Con su plata y con su oro, 

se hicieron ídolos para 

destrucción.°

5

    Él rechaza tu becerro ¡oh Samaria!°

Mi ira se ha encendido contra ellos.

¿Serán por siempre incapaces de 

alcanzar pureza?

6

    Pues el tal° ciertamente procede de 

Israel:°

El artífice lo hizo, luego no es Dios.

¡Se hace astillas el becerro de 

Samaria!

7

    Sembraron viento y cosecharán 

tempestades,

La mies no se logrará, ni la espiga 

producirá harina,°

Y si acaso la produce, la engullirán 

los extraños.

8

    Israel será engullido, vendrá a ser un 

trasto inútil entre las naciones.°

9

    Porque han marchado a Asiria, y 

Efraín, como asno solitario,

Se ha alquilado amadores;

10

    Pero así hayan alquilado a las 

naciones,

Desde ahora los atrapo,° y 

menguarán,

Por la carga° de un rey poderoso.°

11

    Efraín multiplicó los altares para 

pecar,

Sólo para pecar le han servido los 

altares.°

12

    Aunque les di las grandezas de mi 

Ley,

Las recibieron como las de un 

extraño.

13

    Aunque inmolen víctimas en mi 

honor,

Y coman la carne, YHVH no las 

aceptará.

Tiene presente su iniquidad y 

castigará sus pecados.

Tendrán que volver a Egipto.°

14

    Porque Israel ha olvidado a su 

Hacedor, y edificó palacios,

Judá multiplicó ciudades 

fortificadas;

Pero Yo prenderé un fuego a sus 

ciudades que consumirá sus 

palacios.

El castigo inminente

9

  Oh Israel, no te alegres ni te

 regocijes como los gentiles,

Porque te prostituiste abandonando 

a tu Dios,

Y vendiste tus amores en todas las 

eras del trigo,

2

    La era y el lagar no los alimentarán,°

Y el mosto engañará y les fallará.°

3

    No habitarán en la tierra de YHVH,

Efraín se volverá a Egipto, y en 

Asiria comerán manjar impuro.

4

    No ofrecerán a YHVH libaciones de 

vino,

Ni sus holocaustos le serán aceptos;

Serán para ellos como pan de duelo, 

todos los que coman quedarán 

impuros.°

Su pan les quitará el hambre,°

Pero no entrará en la Casa de 

YHVH.°

5

    ¿Qué haréis en el día de la solemnidad,

En el día de la fiesta de YHVH?

6

    Si escapan a causa de la calamidad,

Egipto los recogerá,

Menfis los sepultará.

La codicia de su plata la heredará la 

ortiga,

Y en sus tiendas crecerán espinos.

7

    Llegan los días del castigo, llegan los 

días de la retribución.

Que lo sepa Israel:

A causa de la magnitud de tu pecado,

A causa de tu gran hostilidad,° el 

profeta ha enloquecido,

8.4 Recurso retórico donde el resultado de una acción se presenta como si este fuera el propósito.  8.5 Nótese el paralelis-

mo entre el v. 3 y este v. 

8.6 el tal. Esto es, el becerro.  8.6 LXX: ¿hasta cuando serán incapaces de purificarse en Israel? 

8.7 Nel tallo no tendrá brote, no producirá harina.  8.8 Lit. como un objeto sin valor en él.  8.10 Lit. los reuniré.  8.10 Nserán 

afligidos un poco por la carga

8.10 Prob. alusión al rey asirio.  8.11 Npara él han llegado a ser altares para pecar.  8.13 

LXX añade: y entre los asirios comerán cosas impuras

9.2 LXX: no los conocerán.  9.2 Esto es, la estimación de la vendimia 

→Hab.3.17.  9.4 pan de duelo. Esto es, el pan preparado donde hay un difunto, hacía impuro a todo aquel que comía de él 

→Nm.19.11-22.  9.4 Lit. su pan será para sus almas.  9.4 Esto es, que su alimento no podrá ser santificado en el templo, por 

lo que será considerado inmundo 

→Lv.23.10-14.  9.7 El texto no aclara quién hace la afirmación, ni a quién se refieren estas 

palabras. Si el que habla es Dios, entonces los términos tienen que referirse a los falsos profetas que anunciaban tiempos de 

prosperidad para esta nación pecaminosa. Si es el profeta quien habla, entonces está reflejando la actitud de los israelitas hacia 

los voceros de Dios, que por anunciar el castigo divino en tiempos de paz son así considerados. 


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Oseas 9:8

918

El hombre inspirado desvaría,

8

    Y el vidente de Efraín profetiza sin 

contar con su Dios;

Es trampa de furtivo en sus caminos,

Y subversión en la Casa de su Dios.

9

    Se han corrompido grandemente, 

como en los días de Gabaa;°

Pero Él tiene presente su culpa, y 

castigará su pecado.

10

    Como uvas en el desierto hallé a 

Israel,

Como breva° en la higuera encontré 

a vuestros° padres.

Pero ellos fueron a Baal-peor y se 

consagraron a la Vergüenza,°

Y se hicieron tan abominables como 

aquello que amaron.

11

    Cual ave volará la gloria de Efraín:

No habrá parto, ni embarazo, ni 

concepción,

12

    Y si sus hijos llegaran a grandes, 

los quitaré de en medio de los 

hombres.

¡Ay de ellos también, cuando Yo me 

aparte de ellos!

13

    Según he podido observar,

Efraín es otra Tiro plantada en la 

pradera,°

Pero Efraín entregará sus hijos al 

verdugo.

14

    ¡Dales, oh YHVH! ¿qué les darás?

Dales matrices que aborten,

Y pechos enjutos.

15

    Toda su maldad empezó en Gilgal,°

Allí, pues, comencé a aborrecerlos,

Por la maldad de sus hechos los 

arrojé de mi Casa,

No volverán más a ser amados por mí,

Todos sus príncipes son apóstatas.

16

    Herido está Efraín, su raíz está seca 

y no da fruto,

Aunque den a luz, haré morir el 

amor de sus entrañas.

17

    Mi Dios los desechará, porque ellos 

no lo escucharon,

Y andarán errantes entre las naciones.

10

Vid frondosa es Israel, pero el 

fruto lo lleva para sí mismo:

Conforme a la abundancia de su 

fruto, multiplica los altares;

Cuanto más bella es su tierra, más 

embellecen sus estatuas.°

2

    Ha dividido su corazón, y será 

hallado culpable.

Desnucará° sus altares, arrasará sus 

estelas.

3

    Sí, ya pueden decir: No tenemos rey,

No respetamos a YHVH,

El rey, ¿qué puede hacernos?

4

    Hablan vanidades, hacen alianzas y 

juran en falso,

Por eso los pleitos florecen como 

cicuta en los surcos del campo.

5

    Los habitantes de Samaria temen 

por el becerro de Bet-avén,

El pueblo y sus sacerdotes° se 

enlutan por su dios,°

Se revuelcan, porque su gloria es 

llevada en cautiverio,

6

    Es llevado a Asiria como tributo al 

gran rey;

La vergüenza se adueña de Efraín,

Israel se avergüenza de su plan,

7

    Samaria será destruida, y su rey, 

espuma encima de las aguas.

8

    Los lugares altos de Avén° (pecado 

de Israel), serán destruidos,

Y sobre sus altares crecerán los 

espinos y los abrojos.

Entonces dirán a los montes: 

¡Cubridnos!

Y a los collados: ¡Caed sobre nosotros!

9

    Del tiempo de Gabaa arranca el 

pecado de Israel.

Allí se enfrentaron a mí.

¿No los sorprenderá en Gabaa la 

guerra?°

10

    Contra los malvados he venido para 

castigarlos,°

Los pueblos se reunirán contra ellos

Cuando Yo los aprisione por su 

doble culpa.°

9.9 

→Jue.19.11ss.  9.10 Esto es, señal de primera estación.  9.10 LXX: sus.  9.10 →Nm.25.  9.13 LXX: Efraín dio a sus hi-

jos  como  presa

9.15 Prob. 

→1 S.8.7, 8; 11.14,15 →1 S.13.7-14 →1 S.15.1-23.  10.1 Esto es, pilares de culto idolátrico

10.2 Esto es, forma figurada para referirse a la destrucción de ídolos.  10.5 Heb. kemarim = sacerdote. En el AP se usa úni-

camente  para  referirse  a  los  sacerdotes  que  oficiaban  en  cultos  idolátricos. 

10.5  Es  decir,  a  causa  del  becerro  de  la  ciu-

dad de Bet-’El

10.8 Avén = iniquidad. Algunos mss. insertan la palabra bet para que se lea: los lugares altos de Bet-avén

10.9 

→Jue.19-20. N¿acaso no les alcanzará en Gabaa la batalla contra los malvados?  10.10 Lit. en mi deseo y los castigaré

10.10 Es decir, cuando Yo los castigue por sus dos pecados


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Oseas 12:1

919

11

    Efraín es una novilla domesticada a 

la que le gusta trillar,

Y Yo eché el yugo sobre su hermosa 

cerviz.

A Efraín lo haré uncir, y a Judá tirar 

del arado,

Y Jacob desmenuzará los terrones.

12

    ¡Sembrad para vosotros en justicia,

Segad conforme a la misericordia,° 

arad para vosotros tierra virgen,

Pues es tiempo de buscar a YHVH, 

hasta que Él venga

Y haga llover la justicia sobre 

vosotros!

13

    Arasteis maldad, cosecharéis 

iniquidad,

Y comeréis el fruto de la mentira.

Por haber confiado en tu poder,° y 

en la multitud de tus valientes.

14

    Se alzará un clamor° de guerra 

contra tu pueblo,

Y serán destruidas todas tus 

fortalezas,

Como Salmán destruyó a Bet-Arbel 

en el día de la batalla:

La madre fue despedazada con sus 

hijos.

15

    Así se hará con vosotros, Bet-’El, a 

causa de vuestra gran maldad.°

Al alba perecerá irremisiblemente el 

rey de Israel.

El amor de Dios por Israel

11

Cuando Israel era un niño, Yo lo 

amé,

Y de Egipto llamé a mi hijo.°

2

    Cuanto más los llamaba, tanto más 

se alejaban de ellos.°

Ofrecían sacrificios a los baales, y 

quemaban incienso a los ídolos.

3

    Pero fui Yo el que enseñó a andar a 

Efraín tomándolo por sus brazos,

Pero no reconocieron que Yo era el 

que los sanaba.

4

    Los atraje con cuerdas humanas,° 

con vínculos de amor.

Fui para ellos como quien alza el 

yugo de sobre su quijada,°

Alimentándolos con ternura.

5

    No tenía que volver a la tierra de 

Egipto,

Pero ahora el asirio será su rey, 

porque no quisieron convertirse.

6

    La espada gravitará en sus ciudades,

Y el fuego consumirá las barras de 

sus puertas,

Porque siguieron sus propios 

consejos.

7

    Mi pueblo vacila en volver a mí, 

aunque lo llaman desde lo Alto,

Todos juntos no pueden levantarlo.°

8

    Pero, ¿cómo podré abandonarte, oh 

Efraín?

¿Cómo podré entregarte, oh Israel?

¿Te dejaré acaso como Adma?

¿Te trataré como a Zeboim?°

Me da un vuelco el corazón, se me 

conmueven las entrañas.

9

    No ejecutaré el ardor de mi ira, no 

me volveré para destruir a Efraín,

Por cuanto Yo soy ’El, y no hombre;

El Santo en medio de ti, no vendré 

con furor.

10

    Irán en pos de YHVH, quien rugirá 

como león,

Sí, Él rugirá, y sus hijos vendrán 

temblando desde occidente,°

11

    Desde Egipto vendrán temblando 

como pájaros,

Desde Asiria como palomas,

Y haré que habiten en sus casas, dice 

YHVH.

12

    Efraín me tiene rodeado de 

mentiras,

La casa de Israel de falsedades,

Y Judá aún divaga para con Dios,

Para con el Santísimo° y el Fiel.

Promesa

12

Efraín se apacienta de viento, y sin 

cesar persigue al solano,

Multiplica la mentira y la violencia,

Han pactado un pacto con Asiria,

Y llevan el aceite a Egipto.

10.12  LXX:  recoged  fruto  de  vida.  10.13  LXX:  en  tus  pecados.  10.14  Esto  es,  el  estruendo  producido  durante  una  batalla. 

10.15 Lit. a causa de la maldad de vuestra maldad.  11.1 

→Mt.2.14-21.  11.2 Es decir, de los profetas que Dios les enviaba

11.4 Es decir, de forma humana, amable, cariñosa.  11.4 Es decir, como los que alzan a un niño contra sus mejillas (para be-

sarlo o abrazarlo). LXX: como un hombre que golpea (a otro) en la mejilla

11.7 Es decir, el llamado conjunto de los profetas 

no logra que el pueblo se vuelva a Dios

11.8 Adma y Zeboim fueron dos de las cinco ciudades de la Pentápolis 

→Gn.14.2, 8; 

Dt.29.23. 

11.10 Lit. desde el mar.  11.12 Lit. Santos. Plural mayestático que alude la pluralidad unitaria de la Deidad 

→ § 2. 


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Oseas 12:2

920

2

    YHVH tiene pleito con Judá,

Visitará a Jacob conforme a sus 

caminos,

Le pagará conforme a sus obras.

3

    En el vientre tomó por el calcañar a 

su hermano,

Y en su vigor luchó con Dios.°

4

    Luchó con el ángel y prevaleció; 

lloró, y alcanzó misericordia.

En Bet-’El lo encontró, y allí habló 

con nosotros.

5

    ¡Sí, YHVH es ’Elohey Sebaot!°

¡YHVH es su nombre!

6

    Tú, pues, conviértete a tu Dios,

Practica la misericordia y la justicia, 

y espera siempre a tu Dios.

7

    Balanza engañosa tiene Canaán° en 

su mano,

Es amigo de oprimir.

8

    Dijo Efraín: Ciertamente me he 

enriquecido,

He hallado riquezas para mí.

Pero sus esfuerzos no le alcanzarán

Para borrar el pecado que cometió.°

9

    Sin embargo, desde la tierra de 

Egipto

Yo soy YHVH tu Dios,

Aún te haré habitar en tiendas como 

en los días de las solemnidades.°

10

    Porque he hablado a los profetas, he 

multiplicado las visiones,

Y mediante los profetas propondré 

parábolas.

11

    ¿Es Galaad iniquidad? Sólo son 

vanidad.

En Gilgal sacrificaban bueyes,

Pero sus altares serán montones de 

escombros

Sobre los surcos del campo.

12

    Huyó Jacob a la tierra de Aram,

Israel sirvió por una mujer,

Y por una mujer guardó rebaños.°

13

    Mediante un profeta YHVH hizo 

subir a Israel de Egipto,

Y mediante un profeta lo guardó.°

14

    Efraín lo ha provocado 

amargamente,

Por tanto, dejará sobre él la culpa de 

sangre,

Y hará volver sobre él su oprobio.

Síntesis

13

Cuando Efraín hablaba, cundía el 

temor, y fue exaltado en Israel,

Pero por Baal cayó en pecado, y 

murió.

2

    Y ahora pecan más y más:

Se hacen imágenes fundidas;

Con su plata se hacen ídolos, 

conforme a su destreza,

Obra de artesano todo ello:

Se dirigen a ellos, les sacrifican 

hombres y besan becerros.

3

    Por eso serán como nube mañanera,

Como el rocío, que pronto desaparece;

Como tamo arrastrado por el viento,

Como humo por la chimenea.

4

    Sin embargo, desde la tierra de 

Egipto Yo soy YHVH tu Dios:°

No tendrás otros dioses aparte de mí,

Ni otro Salvador, sino a mí.

5

    Yo te conocí° en el desierto,

En tierra de gran sequía.

6

    Pero en sus pastizales se saciaron,

Y una vez repletos, se engrosó su 

corazón,

Y se olvidaron de mí.

7

    Seré pues para ellos como un león,

Los acecharé como leopardo junto al 

camino.

8

    Los asaltaré como osa de crías 

robadas,

Y desgarraré la envoltura de sus 

corazones,

Los devoraré como una leona,

Y las fieras del campo los 

despedazarán.

9

    Tu rebelión contra mí, tu Ayudador, 

oh Israel, es tu destrucción.

10

    ¿Dónde estará entonces tu rey,

Para salvarte en todas tus ciudades?

¿Qué de tus jueces, a quien 

demandaste: Dame un rey, y 

príncipes?

12.3 

→Gn.25.21-26; 32.23-33.  12.5 → § 2 - § 4.  12.7 Personificación del Israel apóstata.  12.8 Ntodas mis ganancias no en-

contrarán para mí ninguna iniquidad que sea pecado

12.9 Posible alusión a la solemnidad de los Tabernáculos.  12.12 .ovejas

Alusión a la estancia de Jacob en Harán 

→Gn.27.46–28.2; 29.15-30.  12.13 Esto es, Moisés.  13.4 LXX añade: que establece el 

cielo y crea la tierra, y cuyas manos han formado a todas las huestes del cielo, aunque no te las he mostrado, no sea que vayas 

tras ellas, y te hice subir

13.5 LXX y Siríaca: Yo te pastoreé.


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Oseas 14:9

921

11

    Airado te di un rey,

Y por mi indignación te lo quitaré.

12

    Atada está la maldad de Efraín,

Su pecado, bien guardado.

13

    Le vendrán dolores de parturienta;

Él no es hijo prudente;

No se colocó a tiempo a la hora del 

nacimiento.

14

    ¿Los libraré del poder del Seol?

¿Los redimiré de la Muerte?°

¿Dónde está, oh Muerte, tu plaga?

¿Dónde, Seol, tu destrucción?

La compasión se ha ocultado de mis 

ojos.

15

    Aunque él sea el más fecundo entre 

sus hermanos,

Vendrá el solano,° como soplo de 

YHVH que sube del desierto,

Y su manantial se secará, y se 

agotará su fuente.

Él saqueará el tesoro de todos sus 

objetos preciosos.°

16

    Por haberse rebelado contra 

su Dios,

Samaria cargará con su culpa,

Y caerán por la espada,

Sus niños de pecho serán estrellados,

Y sus mujeres encintas rajadas.

Restauración

14

¡Oh Israel, vuélvete a YHVH tu 

Dios,

Pues has caído por tu iniquidad!

2

    ¡Procuraos palabras y volveos a 

YHVH!

Decidle: ¡Quita toda iniquidad y 

acéptanos con benevolencia!,

Y te ofreceremos los sacrificios de 

nuestros labios.°

3

    Asiria no nos salvará;

Ya no montaremos a caballo,

Ni diremos más a la hechura de 

nuestras manos:

¡Dioses nuestros sois!°

Porque sólo en ti halla misericordia 

el huérfano.

4

    Sanaré sus apostasías y los amaré 

por pura gracia,

Porque mi ira ya se ha apartado de 

él.

5

    Seré para Israel como el rocío,

Florecerá como el lirio,

Y arraigará sus raíces como el 

Líbano.

6

    Se extenderán sus ramas,

Su esplendor será como el del olivo,

Y exhalará su perfume como el 

Líbano.

7

    Volverán los que habitan a su 

sombra,

Harán crecer el trigo y florecerán 

como la vid,

Y su fama será como la del vino del 

Líbano.

8

    Efraín dirá:° ¿Qué tengo yo que ver 

aún con los ídolos?

Yo lo oiré y velaré por él;

Dirás:° Soy como el ciprés, siempre 

verde;

Porque de mí procederá tu fruto.

9

    ¿Quién es el sabio que comprende 

estas cosas?

¿Y el inteligente para que las 

conozca?

Porque los caminos de YHVH son 

rectos,

Y los justos caminan por ellos,

Pero los transgresores tropezarán 

en ellos.

13.14 Aunque ninguna de estas dos frases indica pregunta, el contexto exige la forma interrogativa.  13.15 solano. Esto es, 

viento del oriente, figura del reino de Asiria. 

13.15 LXX: él secará su tierra y todos sus objetos preciosos.  14.2 Es decir, la ala-

banza, en lugar de animales destinados al sacrificio 

→He.13.15.  14.3 Alusión a tres tipos de adulterio: la alianza con naciones 

paganas, la confianza en el ejército y la práctica de la idolatría. 

14.8 .dirá.  14.8 .dirás


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1

Revelación  de  YHVH  que  tuvo  Joel 

ben Petuel:

2

    ¡Oíd esto, oh ancianos!

¡Dad oído, moradores todos del país!

¿Aconteció esto en vuestros días, o 

en los días de vuestros padres?

3

    De esto contaréis a vuestros hijos, y 

vuestros hijos a sus hijos,

Y sus hijos a la otra generación:

4

    Lo que dejó° la langosta lo comió el 

saltón,

Lo que dejó el saltón lo comió el 

saltamontes,

Y lo que dejó el saltamontes lo 

comió el cigarrón.°

5

    ¡Despertad, borrachos, y llorad!

¡Gemid, bebedores todos,

Porque el licor os es quitado de la 

boca!

6

    Porque un pueblo fuerte e 

innumerable invade mi tierra,

Tiene colmillos de león y quijadas de 

leona.

7

    Ha convertido mi vid en desolación, 

ha desgajado° mi higuera,

La ha descortezado y derribado, y ha 

dejado blancos sus sarmientos.°

8

    ¡Laméntate cual doncella° ceñida de 

saco°

Por el marido de su juventud!

9

    En la Casa de YHVH se ha quitado la 

ofrenda y la libación,

Los sacerdotes hacen duelo,

Los ministros de YHVH.

10

    El campo está asolado,

La tierra está de luto,

Porque el trigo ha sido devastado;

El mosto° se secó, y el aceite° se ha 

agotado.

11

    ¡Avergonzaos labradores;

Gemid viñadores,

Por el trigo y la cebada,

Porque la mies del campo se ha 

perdido!

12

    La vid está seca, la higuera marchita,

Lo mismo el granado, la palmera y 

el manzano;

Todos los árboles del campo están 

secos,

Y hasta el gozo de los hombres se ha 

agotado.

13

    ¡Vestíos de luto, sacerdotes!

¡Gemid, ministros del altar!

¡Pernoctad en saco,° ministros de mi 

Dios!°

Desolación de la tierra

1.4 Lit. el resto de.  1.4 Es difícil determinar el sentido exacto de los cuatro nombres de insectos que aparecen aquí. Prob. se 

trata de los nombres de cuatro tipos o especies de langosta, pero en otros contextos de la Escritura se usan algunos de estos 

términos aisladamente para aludir a la langosta en general. Otra posibilidad es ver una referencia a las distintas fases bioló-

gicas por las que pasa este insecto, aunque estos mismos términos se usan en un orden distinto 

→2.25. Otra interpretación 

posible consiste en ver tres de estos cuatro nombres (langosta, saltamontes y cigarrón) como alusiones a distintos funciones de 

este insecto como roedor, lamedor y devorador. Pero ninguna de estas tres interpretaciones es definitiva. 

1.7 Nen ramaje seco

1.7 Al acabar con el follaje de los árboles, la plaga de langostas deja blancas sus ramas.  1.8 El término hebreo btulah designa a una 

joven en edad de casarse. Aunque algunos léxicos traducen la palabra como virgen (y aunque en algunos contextos tal traducción 

puede ser totalmente acertada), hay que tener en cuenta que btulah no tiene un significado tan específico como el término caste-

llano virgen (que sólo se refiere a la persona que no ha tenido relaciones sexuales). 

1.8 saco. Vestidura o tela áspera, generalmente 

de color oscuro y hecha de pelo de cabra o de camello. La usaban aquellos que estaban de duelo o que querían expresar contrición, 

para lo cual se ceñían dicha tela sobre el cuerpo (dejando, generalmente un hueco a la altura del pecho, para poder golpeárselo), o 

bien se sentaban o dormían sobre la tela. 

→2 S.3.31; 2 R.6.30; Est.4.3.  1.10 Se refiere específicamente al vino nuevo.  1.10 Prob. 

se refiere al aceite fresco, no procesado, que proviene del fruto del olivo. 

1.13 

→1.8 nota saco.  1.13 LXX: de Dios


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Joel 2:11

923

Porque la ofrenda y la libación

Se ha quitado de la Casa de vuestro 

Dios.

14

    ¡Proclamad un ayuno santo!

¡Convocad a solemne asamblea!

¡Reunid a los ancianos, y a todos los 

moradores de esta tierra,

En la Casa de YHVH° vuestro Dios, y 

clamad a YHVH!

15

    ¡Ay de ese día!

Porque cercano está el día de YHVH,

Llegará como azote aparejado por 

’El-Shadday.°

16

    ¿No es arrebatado el alimento ante 

nuestra vista?,

¿No han sido quitados la alegría y el 

júbilo de la Casa de nuestro Dios?

17

    Se pudrió lo que se esparce,°

Los alfolíes están devastados,

Los graneros, destruidos,

Porque el grano se ha secado.

18

    ¡Cómo muge el ganado!

Está inquieta la vacada, no tiene 

pastos, y las ovejas lo pagan.°

19

    A ti clamo, oh YHVH,

Porque el fuego devoró los pastizales,°

Y la llama ha abrasado todos los 

árboles del campo.

20

    También las bestias del campo 

braman a ti,

Porque los cauces de agua se han 

secado,

Y el fuego devoró los pastizales del 

campo.°

El día de YHVH

2

  ¡Soplad el shofar° en Sión!

¡Suene la alarma° en mi santo 

monte!

¡Tiemblen todos los moradores de 

esta tierra!

Porque ya está cerca el día de 

YHVH.

2

    Día de tinieblas y lobreguez,

Día de nublado y de densa oscuridad.

Como negrura que se extiende sobre 

los montes,

Es un pueblo grande y poderoso,

Nunca hubo nada igual,

Ni lo habrá° en muchas 

generaciones.°

3

    Un fuego devora delante de él, y tras 

él la llama abrasa.

Delante de él la tierra es un vergel,

Detrás, una estepa desolada; nada 

escapa.

4

    Su aspecto es aspecto de corceles, de 

jinetes que galopan.

5

    Su estrépito, de carros que rebotan 

por la serranía,

Con el crepitar de llamas de fuego 

que devoran la hojarasca,

Como pueblo fuerte dispuesto para 

la batalla.

6

    Ante su presencia los pueblos 

tiemblan,°

Y todo rostro palidece.°

7

    Corren como poderosos,

Escalan el muro como hombres de 

guerra,

Cada cual marcha por sus filas sin 

perder el rumbo;

8

    No se estorban unos a otros,

Cada cual marcha por su camino,

Irrumpen a través de toda arma,° y 

no se desbandan.°

9

    Asaltan la ciudad, escalan el muro, 

suben a las casas,

Y cual ladrones, penetran por las 

ventanas,

10

    Delante de ellos tiembla la tierra y 

se estremecen los cielos,

El sol y la luna se oscurecen,

Y las estrellas retiran su resplandor.

11

    YHVH deja oír su voz ante su 

ejército,

Su campamento es muy grande,

Poderoso el que ejecuta su palabra.

1.14  LXX  omite  Señor  (término  que  usa  en  lugar  del  nombre  personal  YHVH).  1.15  Aquí  el  profeta  hace  un  jue-

go  de  palabras  entre  shod  =  destrucción  y  Shadday  =  Todopoderoso

1.17  Prob.  se  refiera  al  grano.  Tres  de  las  cua-

tro palabras que forman esta frase en hebreo son Hápax legómena (palabras que sólo aparecen una vez en toda la Biblia). 

1.18 LXX: han sido asolados.  1.19 Lit. pastos del desierto.  1.20 Véase nota anterior.  2.1 Se trata de un instrumento de viento 

hecho a partir de un cuerno de carnero. 

2.1 El verbo hebreo denota dar un grito o dar un toque de trompeta o de cuerno. Ge-

neralmente define un grito de guerra con que un ejército se lanzaba a la batalla, o al sonido con que se avisaba al pueblo de un 

posible peligro, o del inicio de una marcha. 

2.2 Lit. ni después de él volverá a haber.  2.2 Lit. hasta los años de generación y 

generación

2.6 Lit. retorcerse. Indica un sentimiento de dolor o ansiedad muy fuerte.  2.6 Traducción posible de una expresión 

que sólo aparece en dos v. en todo el AP 

→Nah.2.11, y cuyo sentido no es totalmente claro.  2.8 Esto es, todo tipo de armas 

arrojadizas, como flechas, jabalinas o lanzas, u otros objetos que se puedan usar como proyectiles. 

2.8 Lit. no romperán


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Joel 2:12

924

¡Grande y terrible es el día de YHVH!

¿Quién lo podrá soportar?

Arrepentimiento

12

    Pero ahora, dice YHVH:

¡Volveos a mí de todo corazón,

Con ayuno, lloro y lamento!

13

    ¡Rasgad vuestro corazón,

Y no vuestros vestidos!

¡Volveos a YHVH vuestro Dios,

Que es clemente y compasivo,

Lento para la ira y grande en 

misericordia,

Y se conduele de la desgracia!

14

    Quizá desista y se vuelva, y a su paso 

deje bendición,

Y oblación y libación para YHVH 

vuestro Dios.

15

    ¡Soplad el shofar en Sión, proclamad 

ayuno!

¡Convocad asamblea,

16

    Congregad al pueblo,

Santificad la asamblea, reunid a los 

ancianos,

Reunid a los niños y a los que maman!

¡Salga el novio de su alcoba, y la 

novia de su tálamo!

17

    ¡Lloren los sacerdotes entre el atrio 

y el altar!,

Y digan los ministros de YHVH:

Oh YHVH, perdona a tu pueblo,

No entregues tu heredad al oprobio,

A la burla entre los gentiles;

¿Por qué se ha de decir entre los 

pueblos: ¿Dónde está su Dios?

18

    Entonces YHVH, lleno de celo por 

su tierra,

Tuvo misericordia de su pueblo,

19

    Y respondió YHVH a su pueblo 

diciendo:

He aquí Yo os envío trigo, vino y 

aceite,°

Y os saciaréis de ello,

Y ya no haré de vosotros el oprobio 

de las naciones.

20

    Alejaré de vosotros al del norte,°

Lo dispersaré por tierra seca y 

desolada,°

Su vanguardia° hacia el mar del 

saliente,°

Y hacia el mar de poniente° su 

retaguardia;°

Se esparcirá su hedor, y se extenderá 

su pestilencia,

Porque habrá hecho grandes cosas.°

21

    ¡Regocíjate y alégrate, oh tierra, y 

no temas,

Porque YHVH ha hecho proezas!

22

    No temáis, animales del campo,

Porque los pastos del desierto 

germinarán,

Porque el árbol llevará su fruto,

Y la vid y la higuera darán su riqueza!°

23

    ¡Alegraos, oh hijos de Sión,

Y regocijaos en YHVH vuestro Dios!

Que os da la lluvia temprana° en su 

tiempo,

Y la lluvia tardía° como antaño,° 

y derrama para vosotros el 

aguacero.

24

    Las eras se llenarán de trigo,

Rebosarán los lagares de vino y 

aceite.°

25

    Os restituiré los años que devoró el 

saltón,

El saltamontes, el cigarrón y la 

langosta,°

Mi gran ejército que envié contra 

vosotros.

26

    Comeréis en abundancia y os 

saciaréis,

Y alabaréis el nombre de YHVH 

vuestro Dios,

Que hizo prodigios por vosotros,

Y mi pueblo nunca más será 

avergonzado.

27

    Sabréis que Yo estoy en medio de 

Israel,

Y que Yo soy YHVH vuestro Dios,

Y que no hay ningún otro,

Y mi pueblo nunca más será 

avergonzado.

28

°  Y después de esto derramaré mi 

Espíritu sobre toda carne,

Y vuestros hijos y vuestras hijas 

profetizarán,

2.19 

→1.10 nota.  2.20 norte. Es decir, al ejército invasor.  2.20 LXX añade y hundiré.  2.20 vanguardia Lit. su rostro.  2.20 

Esto es, el Mar Muerto

2.20 Esto es, el Mar Mediterráneo.  2.20 Lit. su fin.  2.20 Es difícil determinar el sujeto de esta oración. 

2.22 Lit. su fuerza.  2.23 Heb. moreh = lluvia temprana. LXX: comida.  2.23 Que cae entre Marzo y Abril.  2.23 LXX, Sir. y VUL: 

como al principio

2.24 

→1.10 nota.  2.25 →1.4 nota.  2.28 En el TM este es el principio del c.3. El c.4 comienza en 3.1. 


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Joel 3:15

925

Vuestros ancianos soñarán sueños,

Y vuestros jóvenes verán visiones.

29

    También sobre los siervos y las siervas

Derramaré mi Espíritu en aquellos 

días.

30

    Y haré prodigios en los cielos y en la 

tierra,

Sangre y fuego, y columnas de humo.

31

    El sol se convertirá en tinieblas y la 

luna en sangre,

Antes que llegue el día de YHVH, 

grande y terrible.

32

    Entonces, todo el que invoque el 

nombre de YHVH, escapará,°

Porque en el monte Sión y en 

Jerusalem quedará un remanente,

Conforme ha dicho YHVH,

Y entre los supervivientes estarán 

los que YHVH llamó.°

Juicio y restauración

3

  Mirad: En aquellos días y en aquel 

   tiempo,

Cuando Yo restaure la cautividad de 

Judá y de Jerusalem,

2

    Reuniré a todas las naciones,

Y las conduciré al valle de Josafat,°

Y allí contenderé con ellas a favor de 

mi pueblo,

De mi heredad,

Porque dispersaron a Israel entre las 

naciones,

Se repartieron mi tierra,

3

    Y sobre mi pueblo echaron suerte,

Cambiaron muchachos por rameras,

Y vendieron muchachas por vino, y 

lo bebieron.

4

    ¿Qué tenéis contra mí, 

Tiro y Sidón, y Filistea toda?

¿Queréis vengaros de mí?

Pues si de mí os tratáis de vengar,°

Bien pronto haré que vuestra 

venganza

Se vuelva sobre vuestra cabeza,

5

    Porque habéis tomado mi plata 

y mi oro;

Mis cosas preciosas y hermosas°

Y las habéis metido en vuestros 

templos;°

6

    Vendisteis los hijos de Judá y de 

Jerusalem

A los hijos de los jonios° para 

alejarlos de su territorio.

7

    Pero Yo los sacaré del lugar donde 

los vendisteis,

Y haré recaer la paga sobre vuestra 

cabeza;

8

    Venderé vuestros hijos e hijas a los 

judíos,

Y ellos los venderán a los remotos 

pueblos de los sabeos,°

Pues así lo habló YHVH.

El valle de la Decisión

9

    ¡Pregonadlo a las naciones!

¡Declarad la guerra santa,°

Despertad a los valientes!

Todos los hombres de guerra:

¡Acérquense y suban!

10

    De los arados forjad espadas,°

Y de vuestras hoces haced lanzas.

Diga el débil: ¡Fuerte soy!

11

    ¡Apresuraos y venid,

Naciones todas de alrededor, reuníos 

allí!

¡Oh YHVH, haz que bajen tus 

valientes!°

12

    ¡Alértense las naciones y vengan al 

valle de Josafat,°

Porque allí me sentaré para juzgar a 

todas las naciones en derredor!

13

    ¡Mano a la hoz, que la mies° está 

madura!

¡Venid y pisad, que el lagar está lleno,

Y rebosan las tinajas, porque su 

maldad es mucha!

14

    ¡Multitudes y multitudes en el valle 

del Juicio!

¡Cercano está el día de YHVH en el 

valle de la Decisión!°

15

    El sol y la luna se oscurecerán,

Y las estrellas no darán su resplandor.

2.32 LXX: será salvo.  2.32 Ny en Jerusalem, los supervivientes que YHVH llame.  3.2 Esto es, YHVH ha juzgado. Valle situado 

cerca de Jerusalem, donde se efectuará el juicio de las naciones. 

→v.12.  3.4 Lit. recompensáis. Los términos recompensa y 

recompensáis tienen una connotación negativa, por lo que deben entenderse como sinónimos de venganza y vengaréis respec-

tivamente. 

3.5 Lit. mis mejores objetos deseables.  3.5 Npalacios.  3.6 Esto es, a los griegos en general.  3.8 Pueblo al SO de 

Arabia. 

3.9 Prob. alusión a la práctica de ofrecer sacrificios antes de iniciar una guerra.  3.10 Esto es, instrumento cortante de 

hierro

3.11 LXX: Que el tímido se convierta en un guerrero.  3.12 

→3.2 nota.  3.13 Lit. cosecha.  3.14 Éste es otro nombre con 

el que se alude al valle de Josafat. El término decisión puede aludir al veredicto estricto e inapelable de un juicio. 


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Joel 3:16

926

16

    YHVH rugirá desde Sión,

Dará su voz desde Jerusalem, y 

temblarán los cielos y la tierra.

Pero YHVH es la esperanza de su 

pueblo,

La fortaleza de los hijos de Israel.

17

    Entonces conoceréis que Yo soy 

YHVH vuestro Dios,

Que habito en Sión, mi santo monte.

Jerusalem será santa, y los extraños 

no pasarán más por ella.

El reino

18

    En aquel día sucederá que los 

montes destilarán vino dulce,

Los collados manarán leche,

Las cañadas de Judá desbordarán de 

agua,

Y de la Casa de YHVH brotará un 

manantial

Que regará el valle° de Sitim.°

19

    Egipto será convertido en 

desolación,

Y Edom será vuelto un desierto 

asolado,

Por la violencia hecha a los hijos de 

Judá,

Porque derramaron sangre inocente 

en su tierra.

20

    Pero Judá será habitada para 

siempre,

Y Jerusalem por todas las 

generaciones.°

21

    Limpiaré la sangre de los que no 

había limpiado,°

Y YHVH habitará en Sión.

3.18 Esto es, valle por el que pasa un torrente.  3.18 Nvalle de las acacias.  3.20 Lit. por generación y generación.  3.21 Lit. 

limpiaré su sangre (que) no he limpiado


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1

Palabras de Amós, uno de los pastores 

de Tecoa. Visión que tuvo sobre Israel 

en los días de Uzías, rey de Judá, y en los 

días de Jeroboam ben Joás, rey de Israel, 

dos años antes del terremoto.°

2

 Dijo:°

¡YHVH ruge desde Sión, y desde 

Jerusalem alza su voz!

Los pastizales de los pastores harán 

duelo,

Y la cumbre del Carmelo se secará.

3

    Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de Damasco, 

y por la cuarta, no lo revocaré:°

Porque aplastaron con trillos de 

hierro a Galaad,

4

    Enviaré un fuego sobre la casa de 

Hazael

Que devorará los palacios de Ben-

Hadad.

5

    Quebraré las barras° de Damasco,

Destruiré a los habitantes de Bicat-

avén°

Y al que empuña el cetro de Bet-Edén;

Y el pueblo de Aram irá desterrado a 

Kir, dice YHVH.

6

    Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de Gaza, y 

por la cuarta, no lo revocaré:

Porque se llevaron en cautividad a 

muchedumbres enteras°

Para entregarlas a Edom,

7

    Enviaré un fuego al muro de Gaza, 

que devorará sus palacios.

8

   Destruiré a los habitantes de Asdod,

Y al que empuña el cetro de Escalón;

Volveré mi mano contra Ecrón,

Y el resto de los filisteos perecerá, 

dice Adonay° YHVH.

9

    Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de Tiro, y 

por la cuarta, no lo revocaré:

Porque entregaron multitudes a 

Edom°

Y no recordaron el pacto° fraternal,

10

    Enviaré un fuego sobre los muros 

de Tiro,

Que devorará sus palacios.

11

    Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de Edom, y 

por la cuarta, no lo revocaré:

Porque persiguió con espada a su 

hermano, y no tuvo compasión,°

Porque su ira desgarra 

continuamente°

Y retiene su saña para siempre,

12

    Enviaré un fuego sobre Temán, que 

devorará los palacios de Bosra.

13

    Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de los hijos 

de Amón,

Y por la cuarta, no lo revocaré:

Que para ensanchar su territorio 

rajaron por el medio a las 

mujeres preñadas de Galaad;

Juicio a las naciones vecinas

1.1 Prob. 

→Zac.14.5.  1.2 Generalmente, en las porciones poéticas, es más importante la división del texto en líneas rítmicas 

que en versículos. En algunos casos reflejamos esta disposición siguiendo el mss. de Leningrado. 

1.3 Esto es, no revocaré 

mi decisión

1.5 Esto es, grandes barras que trancaban las puertas de la ciudad.  1.5 Heb. valle de Iniquidad. Nombre de una 

ciudad hoy desconocida. Prob. forma despectiva para referirse a Damasco u otra de las ciudades arameas más importantes. 

1.6 Lit. llevaron cautiva una cautividad completa.  1.8 LXX omite Adonay.  1.9 NAram.  1.9 pacto. Esto es, las alianzas estable-

cidas entre Israel y Tiro desde tiempos de Salomón. 

→1 R.5.12; 1 R.16.31.  1.11 Lit. y destruyó su compasión.  1.11 VUL y Sir: 

y mantuvo su ira para siempre.


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Amós 1:14

928

14

    Encenderé pues un fuego a los 

muros de Rabá,

Que devorará sus palacios,

Entre el alarido° del día de batalla,

Entre la tempestad del día 

huracanado,°

15

    Y el rey marchará a su destierro,

Y con él todos sus príncipes, dice 

YHVH.

Pecados de Moab, Judá e Israel

2

Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de Moab, y 

por la cuarta, no lo revocaré:

Porque quemó los huesos del rey de 

Edom hasta calcinarlos,

2

    Enviaré un fuego sobre Moab, que 

devorará los palacios de Queriot,

Y en el tumulto Moab morirá,

Entre alaridos de guerra y el resonar 

del shofar,°

3

    Y cortaré de en medio de él al juez,

Y con él mataré a todos sus 

príncipes, dice YHVH.

4

  Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de Judá, y 

por la cuarta, no lo revocaré:

Porque menospreciaron la Ley 

de YHVH y no guardaron sus 

estatutos,

Y los han extraviado sus mentiras,

Tras las cuales anduvieron sus 

padres,

5

    Enviaré un fuego sobre Judá, 

que devorará los palacios de 

Jerusalem.

6

 Así dice YHVH:

Por tres transgresiones de Israel, y 

por la cuarta, no lo revocaré:

Porque venden al justo por plata,

Y al necesitado por un par de 

sandalias.

7

    Codician hasta el polvo de la tierra 

que está sobre la cabeza del 

pobre,

Tuercen la senda de los humildes,

Y un hombre y su padre se llegan a 

la misma joven,

A fin de profanar mi santo Nombre;

8

    Y sobre ropas empeñadas° se echan 

junto a cualquier altar,

Y en la casa de su dios° beben el vino 

de los multados.°

9

    Yo, que destruí ante ellos al amorreo,

Cuya altura era como la de los 

cedros,

Y cuya fortaleza como la del roble,

Y aún así destruí su fruto por arriba 

y sus raíces por debajo;

10

    Yo, que os hice subir de la tierra de 

Egipto,

Y os conduje en el desierto durante 

cuarenta años,

Para que poseyerais la tierra del 

amorreo.

11

    Y a vuestros hijos los elevé por 

profetas,

Y a vuestros jóvenes por nazareos.

¿No es así, hijos de Israel?, dice 

YHVH.

12

    Pero vosotros emborrachasteis a los 

nazareos,

Y prohibisteis profetizar a los 

profetas.

13

    He aquí, vosotros me habéis 

presionado,

Como una carreta cargada de 

gavillas.

14

    No habrá pues escape para el ágil,

Ni el fuerte podrá valerse de su 

fuerza,°

Ni el valiente podrá librar su vida;

15°

  El que empuña el arco no resistirá,

Y el ligero de pies no logrará 

escaparse,

Ni el jinete salvará su vida.

16

    El más esforzado de corazón entre 

los valientes,

Huirá desnudo en aquel día, dice 

YHVH.

Gloria y tragedia de Israel

3

  Oh hijos° de Israel, escuchad la 

   palabra que YHVH habla contra 

   vosotros,

Contra toda la familia que saqué de 

la tierra de Egipto:

2

    A vosotros solamente he conocido° 

1.14 Esto es, gritos de guerra o a gritos (o toques de trompetade alarma.  1.14 Esto es, tormenta de viento.  2.2 Corneta 

construida de un cuerno de carnero. 

2.8 

→Dt.24.12-13.  2.8 →8.14. Heb. ‘elohim → § 1 - § 2.  2.8 Es decir, adquirido con 

dinero proveniente de multas 

→Ex.21.22; Dt.22.19.  2.14 Lit. perecerá el escape del ligeroni el fuerte fortalecerá su poder

2.15 

→1.2 nota.  3.1 LXX: casa.  3.2 Esto es, escoger o seleccionar a alguien


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Amós 4:5

929

de todas las familias de la tierra.

Por eso os pediré cuentas de todas 

vuestras iniquidades.°

3

    ¿Andarán dos juntos sin estar de 

acuerdo?°

4

    ¿Rugirá el león en la espesura sin 

que haya presa?

¿Rugirá el leoncillo en su guarida 

sin haber apresado?

5

    ¿Caerá el pájaro al suelo° si no hay 

trampa?

¿Saltará la trampa del suelo sin 

haber atrapado?°

6

    ¿Se soplará el shofar° en la ciudad 

sin que se alborote el pueblo?

¿Sucederá alguna desgracia en la 

ciudad

Sin que YHVH la haya enviado?

7

    Así, Adonay YHVH no hará nada sin 

revelar su plan a sus siervos los 

profetas.

8

    Si el león ruge, ¿quién no temerá?

Si Adonay YHVH habla,

¿Quién no profetizará?

9

    Proclamad por los palacios de 

Asdod,°

Decid en los palacios de Egipto:

Reuníos en los montes° de Samaria, 

ved el tumulto en medio de ella,

Las opresiones en su interior.

10

    No saben hacer lo recto, dice YHVH,

Atesoran en sus palacios frutos de 

rapiña y de saqueo.

11

    Por eso, así dice Adonay° YHVH:

Un enemigo vendrá y rodeará la 

tierra,°

Derribará tu fuerza y saqueará tus 

palacios.

12

    Así dice YHVH:

Como el pastor rescata de las fauces 

del león

Un par de patas o la punta de una 

oreja,

Así serán rescatados los hijos de 

Israel que habitan en Samaria:

Cual esquinero de un reclinatorio,

Cual astilla de la pata de una cama.°

13

    Oíd y testificad ante la casa de Jacob,

Dice Adonay YHVH, ’Elohey Sebaot:

14

    Cuando pida cuenta de sus delitos a 

Israel,°

Le pediré cuenta de los altares de 

Bet-’El,

Los cuernos del altar serán 

arrancados y caerán a tierra.

15

    Destruiré la casa de invierno y la 

casa de verano,

Perecerán los palacios de marfil,

Y las grandes casas desaparecerán, 

dice YHVH.

Dureza de Israel

4

  Oíd esta palabras, oh vacas de Basán, 

   que estáis en el monte de Samaria;

Que oprimís a los débiles, que 

quebrantáis a los pobres,

Que dicen a sus señores:° ¡Traed de 

beber!

2

    Adonay YHVH ha jurado por su 

santidad:

He aquí vendrán días sobre vosotras° 

en que se os llevará con garfios,

Con anzuelos de pesca a vuestro 

remanente;°

3

    Y saldréis, cada una por la brecha° 

que tenga delante,

Y seréis echadas al estiércol,° dice 

YHVH.

4

    ¡Id a Bet-’El a prevaricar!

Aumentad en Gilgal vuestras 

transgresiones,

Llevando por la mañana vuestros 

sacrificios,

Y cada tres días vuestros diezmos.°

5

    Quemad° pan leudado en acciones 

de gracia.

Pregonad y proclamad las ofrendas 

voluntarias,

Pues que así lo deseáis, oh hijos de 

Israel.

3.2 Lit. visitaré sobre vosotros todas vuestras iniquidades.  3.3 Heb. ya’ad = fijar, designar.  3.5 Lit. en el lazo de tierra. LXX: 

caerá un ave en tierra

3.5 Lit. y apresar no apresará.  3.6 En señal de alarma o de peligro 

→2.2 nota.  3.9 LXX: entre los asirios.  

3.9 LXX y Sir: en el monte.  3.11 Sir. omite Adonay.  3.11 Lit. un enemigo y alrededor de la tierra.  3.12 NComo el pastor rescata 

de la boca del león dos patas o un pedazo de oreja, así serán rescatados los hijos de Israel que se sientan en Samaria, en la 

esquina de una cama y en el damasco de un sofá. Pero esta traducción no refleja el recurso retórico Como rescata…, así serán 

rescatados…; correspondiéndose prótasis y apódosis así: un par de patas = esquinero del reclinatoriola punta de una oreja = 

la astilla de la pata de una cama

3.14 Lit. el día de mi visitar las transgresiones de Israel sobre él.  4.1 Lit. las que dicen a los 

señores de ellos

4.2 Lit. vosotros.  4.2 Esto es, posteridad o remanente.  4.3 LXX: seréis llevadas desnudas.  4.3 Nconducidas 

al Hermón

4.4 Esto es, al tercer año 

→Dt.14.28.  4.5 Esto es, ofrecer algo mediante el fuego


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Amós 4:6

930

Dice Adonay YHVH.

6

    Aunque os dejé con los dientes 

limpios° en todas vuestras 

ciudades,

Y faltos de pan en todas vuestras 

aldeas,

No os volvisteis a mí, dice YHVH.

7

    Os retuve la lluvia tres meses antes 

de la siega,

E hice llover en un pueblo sí y en 

otro no,

Y en una parcela llovía, y otra sin 

lluvia se secaba,

8

    Y de dos o tres pueblos iban a 

otro para beber agua, y no se 

saciaban,

Pero no os volvisteis a mí, dice 

YHVH.

9

    Os herí con tizón y con añublo,

Y la langosta devoró vuestros 

huertos y vuestras viñas,

Y vuestras higueras y vuestros 

olivares,

Pero no os volvisteis a mí, dice 

YHVH.

10

    Os envié la peste que envié sobre los 

egipcios,°

Maté a espada a vuestros jóvenes 

junto con lo mejor de vuestra 

caballería,°

E hice que el hedor de vuestro 

campamento

Subiera a vuestras propias narices,°

Pero no os volvisteis a mí, dice 

YHVH.

11

    Os destruí como ’Elohim destruyó a 

Sodoma y a Gomorra,

Y fuisteis como un tizón salvado del 

fuego,

Pero no os volvisteis a mí, dice 

YHVH.

12

    Por tanto, oh Israel, así voy a hacer 

contigo,

Y porque voy a hacer esto contigo,

¡Disponte a encararte con tu Dios, 

oh Israel!

13

    El que formó los montes° y creó el 

viento,

El que descubre al hombre sus 

pensamientos,

El que hace salir la aurora de las 

tinieblas,°

Y pisa sobre las alturas de la tierra,

Se llama YHVH ’Elohey Sebaot.

Llamado al arrepentimiento

5

Escuchad la palabra que entono por vo-

sotros cual endecha por la casa de Israel:

2

    Cayó para no levantarse la virgen° 

de Israel.

Yace tendida sobre su suelo, y no hay 

quien pueda levantarla.

3

    Así dice Adonay° YHVH a la casa de 

Israel:

La ciudad que salía con mil, quedará 

con cien,

Y la que salía con cien, quedará con 

diez.

4

    Así dice YHVH a la casa de Israel:

¡Buscadme y viviréis!

    No busquéis en Bet-’El,

No entréis a Gilgal,

Ni paséis a Beerseba,

Que Gilgal será llevada cautiva, y 

Bet-’El reducida a la nada.°

6

    Buscad a YHVH y viviréis,

No sea que acometa a la casa 

de José,

Y la devore como un fuego,

Y no haya nadie en Bet-’El° para 

apagarlo.

7

    Ay de los que convierten el juicio en 

ajenjo,

Y echan por tierra la justicia,

8

°    Que creó° las Pléyades y Orión,

Que cambia en mañana las tinieblas, 

y oscurece el día como noche,

Que llama a las aguas del mar, y las 

derrama sobre la faz de la tierra.

YHVH° es su nombre,

9

    Que hace que la destrucción brille 

sobre el poderoso,

4.6 Es decir, falta de alimentos.  4.10 Lit. a la manera de Egipto.  4.10 Lit. la cautividad de vuestros caballos.  4.10 LXX: en mi 

ira incendié vuestros campamentos

4.13 LXX: el trueno.  4.13 Lit. el que hace amanecer oscuridad.  5.2 Heb. btulah. Designa 

a una joven en edad de casarse. Aunque algunos léxicos proponen la palabra virgen para traducirlo, (en algunos contextos tal 

traducción puede ser totalmente acertada), hay que tener en cuenta que btulah no tiene un significado tan específico como el 

término castellano virgen, que sólo puede referirse a una persona que no ha tenido relaciones sexuales 

→Joel 1.8.  5.3 LXX 

omite Señor

5.5 

→1.2 nota.  5.5 nada. Heb. avén. Era común entre los profetas aludir al santuario de Bet-’El = Casa de Dios 

con el nombre despectivo de Bet-avén = casa de iniquidad o casa de vanidad

5.6 LXX: en la casa de Israel.  5.8 Se sugiere leer 

los vv.8–9 luego del 17 

→.§163  5.8 Lit. el que hace.  5.8 LXX: Dios Todopoderoso.


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Amós 6:2

931

Y que la ruina sobrevenga en la 

plaza fuerte.°

10

    °Que en la puerta° aborrecen al que 

amonesta,

Y detestan al que habla rectamente.

11

    Ahora pues, por haber violentado al 

indigente,

Exigiéndole el tributo° del trigo,

Aunque edifiquéis casas de piedra 

labrada,

No habitaréis en ellas,

Aunque plantéis viñas escogidas° no 

beberéis su vino.

12

    Yo conozco bien vuestras muchas 

transgresiones

E innumerables pecados:

Oprimís al justo, recibís soborno,

Y atropelláis° a los pobres en la 

puerta.°

13

    (Mientras que el prudente calla ante 

todo eso,

Pues son tiempos peligrosos).

14

    Buscad el bien y no el mal, y viviréis,

Y YHVH ’Elohey Sebaot sea con 

vosotros así como decís.

15

    Aborreced el mal y amad el bien,

Y afirmad la justicia en la puerta,

Quizá YHVH ’Elohey Sebaot,

Tenga compasión del remanente de 

José.°

16

    Así dice Adonay YHVH, ’Elohey Sebaot:

En todas las plazas habrá llanto,

Y en todas las calles dirán: ¡Ay! ¡Ay!

Y llamarán al labrador a duelo,

Y a lamentación a los que sepan 

endechas.

17

    En todas las viñas° habrá llanto,

Cuando pase entre vosotros, dice 

YHVH,

18

    ¡Ay de los que desean el día de YHVH!

¿Para qué deseáis este día de YHVH?

Será de tinieblas, y no de luz.

19

    Como cuando uno huye de delante 

del león, y se topa con el oso;

O al entrar en su casa, apoya la 

mano en la pared,

Y lo muerde una víbora.

20

    ¿Acaso no es el día de YHVH 

tinieblas y no luz?

¿Oscuridad en la que no hay 

resplandor?

21

    ¡Desprecio y rechazo vuestras fiestas!

¡Vuestras solemnidades no me 

aplacan!

22

    Por muchos holocaustos y ofrendas 

que me acerquéis,

No los aceptaré ni miraré vuestros 

sacrificios pacíficos de víctimas 

cebadas.

23

    Retirad de mi presencia la bulla de 

los cánticos,

No quiero escuchar la melodía de 

tus arpas.

24

    Más bien, fluya como las aguas el 

derecho,

Y la justicia como arroyo perenne.

25

    ¿Acaso me ofrecisteis sacrificios y 

ofrendas en el desierto°

Durante cuarenta años, oh casa de 

Israel?

26

    Antes bien, llevasteis a Sicut, 

vuestro rey,

Y a Quiún, la estrella de vuestros 

dioses que hicisteis para vosotros.°

27

    Os deportaré pues más allá de 

Damasco, dice YHVH,

Cuyo nombre es ’Elohey Sebaot.°

Destrucción de Israel

6

  ¡Ay de los que viven tranquilos en 

   Sión,

Y de los que confían en el monte de 

Samaria,

Hombres prominentes de la primera 

de las naciones,

A quienes acude la casa de Israel!

2

    Pasad a Calne, y observad, y desde 

allí id a la gran Hamat,

Y bajad luego a Gat de los filisteos.

¿Sois mejores° que estos reinos?°

¿Acaso su territorio era mayor que 

vuestro territorio?°

5.9 O, prob. el que hace que brille un nuevo día, también hará que la destrucción llegue a quienes se creen fuertes.  5.10 Se refiere 

a la puerta de la ciudad, lugar donde reyes, ancianos y jueces se sentaban oficialmente para ejercer sus funciones 

→Dt.21.19; 

Jos.20.4; 2 S.19.8; Pr.31.23. 

5.11 Lit. alzamiento.  5.11 Lit. viñas de deseo.  5.12 Lit. torcéis.  5.12 Esto es, el tribunal 

→5.10 

nota. 

5.15 Es decir, de las diez tribus del norte.  5.17 LXX: en todos los caminos.  5.25 LXX omite en el desierto.  5.26 Pasaje de 

difícil traducción por razones semánticas y sintácticas. 

5.27 Esto es, Dios de los Ejércitos 

→ § 2 - § 4.  6.2 El TM no registra el 

verbo acompañante de este adjetivo, lo que impide identificar al sujeto. 

6.2 Prob. los reinos de Judá e Israel.  6.2 N¿Sois mejores 

que estos reinos, o es vuestro territorio mayor que su territorio?


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Amós 6:3

932

3

    ¿Alejáis el día de la calamidad° y 

acercáis una silla de violencia?°

4

    Que os acostáis en lechos de marfil,

Y os reclináis en vuestros 

reclinatorios

Para comer corderos del rebaño y 

becerros del establo.

5

    Que entonáis° al son del salterio, y 

como David,

Creáis para vosotros instrumentos 

musicales.

6

    Que bebéis vino en copones y os 

ungís con los mejores ungüentos,

Sin apiadaros de la ruina de José.°

7

    Por eso ahora partiréis al cautiverio, 

a la cabeza de los cautivos

Y cesará la orgía de los que se reclinan.°

8

°  Adonay YHVH ha jurado por sí 

mismo,

YHVH ’Elohey Sebaot, ha dicho:°

Aborrezco el orgullo° de Jacob, y 

detesto sus palacios.

Entregaré la ciudad y cuanto hay en 

ella.°

9

    Y si quedan diez hombres en una 

casa, ellos también morirán;

10

    Y cuando el pariente° y el 

incinerador° vengan a sacar los 

huesos de la casa,

Dirán al que está en el interior de la 

casa: ¿Queda alguno° más?

Y contestará: No hay más…°

Pero el otro lo interrumpirá: ¡Shsss!,

Que no es tiempo de pronunciar el 

nombre de YHVH.

11

°  He aquí YHVH ha ordenado reducir 

a escombros las mansiones,

Y a cascotes las casuchas.

12

    ¿Galoparán los caballos por encima 

de los peñascos,

O se arará con bueyes sobre ellos?°

Pues así hacéis vosotros,

Los que volvéis el derecho en veneno,°

Y el fruto de la justicia en ajenjo,

13

    Los que os enorgullecéis por Lo-

debar, y decís:

¿No conquistamos Qarnayim con 

nuestra propia fuerza?°

14

    Pues he aquí, ¡oh casa de Israel!,

Yo levanto contra vosotros una 

nación,

Dice YHVH ’Elohey Sebaot,

Que os oprimirá desde el Paso de 

Hamat hasta el torrente del Arabá.

Langosta, fuego y plomada

7

Adonay  YHVH  me  mostró  así:  He 

aquí Él iba criando langostas cuando 

comenzaba a brotar el heno tardío. Y he 

aquí era el heno tardío que viene después 

de la siega del rey.

2

 Y  aconteció  que  cuando  acababan  de 

comer la hierba de la tierra, yo dije: ¡Oh 

Adonay YHVH, perdona, te ruego! ¿Cómo 

podrá resistir Jacob, siendo tan pequeño?

3

 Desistió  YHVH  de  esto:  No  será,  dijo 

YHVH.

4

 Adonay YHVH me mostró así: He aquí 

Adonay YHVH llamaba° a juicio mediante 

el fuego, y había consumido el gran abis-

mo, e iba a devorar la tierra.

5

 Entonces  dije  yo:  ¡Oh  Adonay  YHVH, 

cesa  ya,  te  ruego!  ¿Cómo  podrá  resistir 

Jacob, siendo tan pequeño?

6

 Desistió  YHVH  de  esto:  Tampoco  esto 

será, dijo Adonay YHVH.

7

 Me  mostró  así:  He  aquí  Adonay  estaba 

de pie sobre un muro hecho a plomo,° y 

en su mano tenía una plomada.

8

 Y  me  dijo  YHVH:  ¿Qué  es  lo  que  ves, 

Amós? Y respondí: Una plomada. Enton-

ces me dijo Adonay:° He aquí Yo aplico la 

plomada en medio de mi pueblo Israel; ya 

no lo pasaré más por alto.

9

 Los lugares altos de Isaac serán asolados, 

los santuarios de Israel serán demolidos, 

6.3  Es  decir,  que  consideran  lejano  el  día  malo.  6.3  Nun  trono  de  violencia.  6.5  Otros  significados:  cantar,  improvi-

sar, tartamudear

6.6 

→5.15 nota.  6.7 Es decir, de los que se reclinan a comer en banquetes.  6.8 LXX omite línea com-

pleta. 

6.8 Aquí  no  se  refiere  a  la soberbia  del  pueblo  de  Israel,  sino  a  lo  que  una  vez  había  sido  el privilegio  del  Servicio 

del Santuario. 

6.8 Se sugiere leer el v.11 despés de este 

→ § 163.  6.10 pariente. Lit. tío., pero puede referirse a otros pa-

rientes cercanos. 

6.10 La incineración de cadáveres no era común en la antigua cultura hebrea, por lo que la mención de 

un  hombre  especializado  en  incinerar  restos  mortales  debe  entenderse  como  una  consecuencia  más  del  terrible  castigo 

de  Dios  (la  mortalidad  habría  de  ser  tan  grande  que  se  tendría  que  recurrir  a  la  incineración  para  deshacerse  de  los  ca-

dáveres). 

6.10 Es decir, algún otro cadáver.  6.10 más… Obviamente la frase concluía con la mención del Nombre sagra-

do. 

6.11 Se sugiere leer a continuación el v.8 

→ § 163.  6.12 Lit. o se arará con bueyes.  6.12 Es decir, en una planta amarga 

y venenosa 

→Os.10.4.  6.13 Es decir, se sienten satisfechos por dos victorias ridículas.  7.4 Esto es, llama a Israel a juicio

7.7 Lit. un muro de plomada.  7.8 Muchos mss. heb. añaden YHVH


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Amós 8:14

933

y  me  levantaré  con  la  espada  contra  la 

casa de Jeroboam.

10

 Entonces  Amasías,  sacerdote  de  Bet-

’El, envió a decir a Jeroboam rey de Israel: 

¡Amós conspira contra ti en medio de la 

casa de Israel: la tierra no puede soportar 

sus palabras!

11

 Porque Amós ha dicho: Jeroboam mo-

rirá  a  espada,  e  Israel  será  irremisible-

mente deportado lejos de su tierra.

12

 Y dijo Amasías a Amós: Vidente, vete, 

huye  a  la  tierra  de  Judá,  y  come  allí  tu 

pan° y allí profetiza,

13

 pero  no  vuelvas  más  a  profetizar  en 

Bet-’El,  porque  es  santuario  del  rey  y 

templo del reino.

14

 Pero  Amós  respondió  a  Amasías  di-

ciendo: No soy profeta ni hijo de profeta, 

sino boyero y cultivador de sicómoros,

15

 pero  YHVH  me  arrancó  de  detrás  del 

rebaño,  y  YHVH  me  dijo:  Ve,  profetiza 

contra mi pueblo Israel.

16

 Ahora pues, oye esta palabra de YHVH:

Tú dices: No profetices contra Israel,

Ni vaticines contra la casa de Isaac.

17

    Por eso, así dice YHVH:

Tu mujer se venderá en la ciudad 

como prostituta, y tus hijos e 

hijas caerán a espada,

Tu tierra será repartida a cordel,° y 

tú morirás en tierra inmunda;

E Israel será irremisiblemente 

deportado lejos de su tierra.

La fruta de verano

8

Adonay YHVH me mostró así: He aquí 

un cesto de fruta madura.

2

 Y dijo: ¿Qué ves, Amós? Y respondí: Un 

cesto de fruta madura. Entonces me dijo 

YHVH: Maduro° está mi pueblo Israel; ya 

no lo toleraré más.

3

 En aquel día, dice Adonay YHVH, los can-

tos del palacio se convertirán en aullidos. 

Muchos serán los cadáveres que en silen-

cio serán echados en cualquier parte.

4

 Oíd  esto  vosotros,  los  que  pisoteáis  al 

menesteroso  y  destruís°  a  los  pobres  de 

la tierra,

5

 mientras decís: ¿Cuándo pasará la luna 

nueva° para vender el grano, o el shabbat, 

para  abrir  el  granero,°  para  reducir  el 

peso y aumentar el precio, para engañar 

con balanza falsa, y vender hasta el dese-

cho del trigo,

6

 para comprar esclavos por dinero, e in-

digentes por un par de sandalias?

7

 Por causa de la soberbia de Jacob, YHVH 

ha jurado:

¡No me olvidaré jamás de todas sus 

obras!

8

    ¿No temblará la tierra por esto, y 

harán luto todos sus moradores?

Sí, toda ella subirá como el Nilo y se 

agitará,

Pero como el río de Egipto, se 

hundirá de nuevo.°

9

    En aquel día, dice Adonay YHVH,° 

haré que el sol se ponga al 

mediodía,

Y oscureceré la tierra en pleno día;

10

    Convertiré vuestras solemnidades en 

duelo,

Y todos vuestros cánticos en lamentos;

Haré vestir cilicio sobre todo lomo,

Y que toda cabeza se rape,°

Les daré un duelo como por el 

unigénito,

Al término de un amargo día.

11

    He aquí vienen días, dice Adonay 

YHVH,°

En los cuales enviaré hambre sobre 

la tierra,

No hambre de pan, ni sed de agua,

Sino de oír las palabras de YHVH.°

12

    E irán errantes de mar a mar, y 

desde el norte hasta el oriente,

Vagarán buscando la palabra de 

YHVH, pero no la hallarán.

13

    En aquel día desfallecerán de sed 

las doncellas° hermosas y los 

mancebos,

14

    Quienes juran por el pecado° de 

Samaria,

Y dicen: ¡Viva tu dios, oh Dan!

Y: ¡Viva el camino de Beerseba!

Caerán, y nunca más se levantarán.

7.12 Es decir, gana tu sustento allí.  7.17 Es decir, será repartida entre muchos.  8.2 Lit. fin. Juego fonético entre fruta de 

verano = qaits, y fin = qets

8.4 Npara destruir.  8.5 Esto es, primer día del mes. Prob. se celebraba como un día de reposo 

→Nm.28.11 y 2 R.4.23.  8.5 Lit. para abrir el trigo.  8.8 Lit. y será bebida.  8.9 LXX y Siríaca omiten YHVH.  8.10 Prob. práctica 

de rapar parte de la cabeza en señal de duelo. 

8.11 LXX, Siríaca y VUL: dice el Señor.  8.11 LXX, Siríaca y VUL: la palabra de 

YHVH

8.13 Heb. btulah 

→5.2 nota.  8.14 Heb. ashmat. Prob. alusión despectiva a la diosa Asima. →2 R.17.30. 


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Amós 9:1

934

Ruina y restauración de Israel

9

Vi  a  Adonay  de  pie  junto  al  altar,  y 

dijo:

Golpea los capiteles para que se 

estremezcan los pilares;

Hazlos pedazos sobre la cabeza de 

todos,

Y Yo haré que mueran los que 

queden de ellos,

Para que nadie logre escapar.

2

    Aunque caven hasta el mismo Seol,° 

allí los alcanzará mi mano,

Y aunque suban hasta los cielos, de 

allí los haré descender.

3

    Aunque se escondan en la cima del 

Carmelo,

Allí los buscaré y de allí los tomaré,

Y aunque se oculten de mi vista en 

el fondo del mar,

Allí° les mandaré una serpiente que 

los morderá.

4

    Aunque vayan en cautiverio ante sus 

enemigos,

Allí° mandaré a la espada que los 

matará.

Tendré fijos mis ojos sobre ellos para 

el mal y no para el bien.

5

    Porque Adonay YHVH Sebaot, es 

Aquel que toca la tierra, y ésta se 

derrite,

Y todos los que la habitan lloran a 

los muertos,

Y toda ella se levanta como el Nilo,

Y como el río de Egipto, se hunde 

nuevamente.

6

    Él es el que edificó en los cielos sus 

gradas,°

Y estableció su arco sobre la tierra;

El que llama a las aguas del mar, 

y las derrama sobre la faz de la 

tierra.

¡YHVH° es su nombre!

Oh hijos de Israel,

7

    ¿No sois para mí como hijos de 

etíopes?, dice YHVH.

¿No hice Yo subir a Israel de la tierra 

de Egipto,

De Caftor a los filisteos, y de Kir a 

los arameos?

8

    He aquí, los ojos de Adonay YHVH 

están sobre el reino pecador,

Y lo destruiré de sobre la faz de la 

tierra,

Pero no destruiré del todo la casa de 

Jacob, dice YHVH.

9

    Porque he aquí Yo daré orden,

Y la casa de Israel será zarandeada 

entre todas las naciones,

Como se zarandea el trigo en la 

criba,

Sin que caiga un grano° en tierra.

10

    Por la espada morirán todos los 

pecadores de mi pueblo,

Los que dicen: ¡El mal no nos 

alcanzará ni caerá sobre 

nosotros!

El reino

11

    En aquel día levantaré el 

tabernáculo de David, ya caído,

Y cerraré sus brechas y reconstruiré 

sus ruinas,

Y lo edificaré como en los días de 

antaño;

12

    Para que posean el remanente de 

Edom

Y a todas las naciones sobre las 

cuales es invocado mi Nombre,

Dice YHVH, que hace esto.

13

    He aquí vienen días, dice YHVH,

En que el que ara alcanzará al 

segador,

Y el que pisa las uvas al que lleva la 

semilla;

Los montes destilarán mosto, y 

todos los collados se derretirán.°

14

    Y haré volver del cautiverio a mi 

pueblo Israel,

Y reedificarán las ciudades asoladas 

y las habitarán,

Y plantarán viñas y beberán su vino,

Y harán huertos y comerán su fruto.

15

    Los plantaré en su tierra,

Y nunca más serán arrancados de la 

tierra que les di.

Oráculo de YHVH, el Dios tuyo.

9.2 Esto es, para refugiarse.  9.3 Lit. de allí.  9.4 

→nota anterior.  9.6 Los masoretas proponen leer sus escalones. En ambos 

casos se puede tratar de una alusión al trono de Dios, situado sobre una serie de escalones 

→2 Cr.9.18, donde se usa el mismo 

término en la descripción del trono de Salomón. 

9.6 LXX añade: Dios Todopoderoso, Sir. añade: de las huestes.  9.9 Lit. guijarro, 

pedrusco

9.13 Esto es, se derretirán en leche (por la abundancia). 


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1

     Así dice Adonay YHVH a Edom:

Hemos° oído un mensaje de parte 

de YHVH,

Un mensajero ha sido enviado a las 

naciones:

¡Levantaos! ¡A combatir contra él!°

2

    He aquí, te empequeñezco entre las 

naciones,

Serás despreciado en gran manera.

3

    La soberbia de tu corazón te sedujo,

Porque habitas en rocas° 

escarpadas.°

En la altura de tu morada, piensas:

¿Quién me derribará por tierra?

4

    Aunque te eleves como el águila,°

Y entre las estrellas pongas tu nido,

De allí te derribaré, dice YHVH.

5

    Si vinieran contra ti saqueadores o 

ladrones nocturnos,

¿No te robarían mesuradamente?°

Si vinieran a ti vendimiadores,

¿No dejarían rebuscos?°

6

    ¡Ay de Esaú destruido!

Ha sido requisado hasta lo último,

Sus más escondidos tesoros han sido 

saqueados.

7

    Tus aliados te han empujado a la 

frontera,

Tus confidentes te han defraudado y 

prevalecieron contra ti.

Los que comen tu pan tenderán una 

trampa contra ti.

¡No hay discernimiento en él!

8

    ¿Acaso en aquel día, dice YHVH,

No he de destruir de Edom la 

sabiduría,

Y del monte de Esaú la inteligencia?

9

    Se acobardarán tus valientes, oh 

Temán,

Y se extinguirán los varones del 

monte de Esaú.

A causa de la enconada violencia°

10

    Contra tu hermano Jacob,

Te cubrirá la vergüenza y serás para 

siempre destruido.

Pecado de Edom

11

    Aquel día te pusiste del bando 

contrario,

El día en que los extranjeros 

capturaron su ejército,°

Y los de tierra extraña entraban por 

sus puertas,

Y echaban suertes sobre Jerusalem,

Tú eras uno de ellos.

12

    No recrees tu vista en el día de tu 

hermano,

En el día de su calamidad;

Ni te alegres a costa de los hijos de 

Judá

En el día de su destrucción,

Ni te jactes° en el día de su angustia,

13

    Ni entres en la puerta° de mi pueblo

En el día de su infortunio,

Ni disfrutes de su desgracia en el día 

Humillación de Edom

1 LXX: Cap.  1 Esto es, Edom.  3 rocas. Heb. sela. Prob. alusión a la capital de Edom, cuyo nombre era Sela (más conocida por 

Petra, su traducción al griego). 

3 Este término sólo aparece tres veces en todo el AP, y designa de forma general un lugar donde 

uno se puede esconder. 

4 Este término hebreo alude tanto al águila como al buitre.  5 Lit. ¿no robarían su suficiencia?  5 Se 

refiere al fruto que queda en los campos después de alzada la cosecha (especialmente al fruto de las viñas). Con esta imagen 

el profeta ilustra la destrucción total de Edom. 

9 LXX, Sir. y VUL unen esta parte al v. 10. Desde el punto de vista sintáctico es 

acertado, pues tanto esta parte como la primera del v. siguiente empiezan con preposición seguida de sustantivo. 

11 Lit. su 

fuerza. Alude tanto al ejército de una nación como a su riqueza. 

12 Lit. no hagas grande tu boca.  13 puerta. Es decir, en la 

entrada principal.


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Abdías 

936

de su infortunio,

Ni eches mano° a sus bienes en el 

día de su infortunio,°

14

    Ni aguardes en las encrucijadas para 

asesinar a sus fugitivos,

Ni entregues a sus supervivientes en 

el día de la angustia.

Edom en el día de YHVH

15

    Porque cercano está el día de YHVH

Para todas las naciones.

Conforme hiciste, así se te hará:

Tus hechos caerán sobre tu propia 

cabeza.

16

    Como bebisteis en mi Santo Monte,

Así todas las naciones beberán por 

turno;

¡Sí, beberán y apurarán!

Y serán como si nunca hubieran sido.

17

    Pero en el monte de Sión quedará 

un remanente,

Y será lugar santo,

Y la casa de Jacob recobrará sus 

posesiones.°

18

    La casa de Jacob será fuego,

La casa de José será llama,

Y la casa de Esaú será hojarasca que 

arderá hasta consumirse,

Y no quedará nadie de la casa de 

Esaú,

Porque YHVH lo ha dicho.

19

 Los  del  Néguev°  poseerán  la  región 

montañosa de Esaú, y los de la Sefelá° la 

tierra de los filisteos, y poseerán el terri-

torio° de Efraín y el campo de Samaria, y 

los de Benjamín poseerán Galaad.

20

 Y  los  exiliados  de  este  ejército  de  los 

hijos de Israel, que están entre los cana-

neos hasta Sarepta,° y los exiliados de Je-

rusalem, que están en Sefarad,° poseerán 

las ciudades del Neguev.°

21

 Y  subirán  victoriosos  al  monte°  de 

Sión para juzgar al monte de Esaú, y el 

reino será de YHVH.

13 El TM registra ni eche (ella).  13 LXX: en el día de su destrucción.  17 LXX: poseerá a los que lo poseyeron.  19 O del sur. Se 

refiere al territorio al sur de Judá. 

19 La Sefelá es la planicie costera de Israel bañada por el Mar Mediterráneo.  19 LXX: el mon-

te

20 Así en el TM. Ny los exiliados de este ejército de los hijos de Israel (poseerán) lo que es de los cananeos hasta Sarepta

20 Región de ubicación desconocida que ha sido identificada con uno de los siguientes lugares (todos ellos igualmente incier-

tos): Sparda, en Asia menor (quizá la misma ciudad que más tarde sería conocida como Sardis); Shaparda, al SO de Media; y 

Saparda, al NE de Nínive. 

20 

→v. 19 nota.  21 LXX: del monte

14


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1

La palabra de YHVH llegó a Jonás° ben 

Amitay, diciendo:

2

 Levántate y vete a Nínive,° la gran me-

trópoli, y proclama en ella que su maldad 

ha llegado hasta mí.

3

 Pero  Jonás  se  levantó  para  huir  de  la 

presencia de YHVH a Tarsis.° Y bajando a 

Jope,° halló una nave que partía a Tarsis. 

Pagó el precio y se embarcó para navegar 

con ellos a Tarsis, lejos de la presencia de 

YHVH.

4

 Pero YHVH mandó un viento impetuo-

so sobre el mar, y se alzó una gran tem-

pestad en el mar, de manera que la nave 

estaba a punto de romperse.

5

 Temieron los marineros, y cada cual cla-

maba a su dios, y echaron la carga al mar 

para aligerar la nave. Entre tanto, Jonás 

había bajado al fondo de la nave, y habién-

dose acostado, dormía profundamente.

6

 Y el patrón de la nave° se le acercó y le 

dijo:  ¿Qué  haces  dormido?  ¡Levántate  y 

clama  a  tu  Dios!  Quizás  Ha-’Elohim°  se 

fije en nosotros, y no perezcamos.

7

 Luego  cada  uno  dijo  a  su  compañero: 

¡Venid,  echemos  suertes  para  saber  por 

culpa  de  quién  nos  ha  sobrevenido  este 

mal! Y echaron suertes, y la suerte cayó 

sobre Jonás.

8

 Entonces  le  dijeron:  ¡Decláranos  ahora 

por  qué  nos  ha  sobrevenido  esta  calami-

dad! ¿De qué te ocupas? ¿de dónde vienes? 

¿cuál es tu país? ¿de qué pueblo procedes?

9

 Y  él  respondió:  Soy  hebreo  y  temo  a 

YHVH, Dios de los cielos, que hizo el mar 

y la tierra.

10

 Aquellos  hombres  entonces  tuvieron 

gran  temor,  y  le  preguntaron:  ¿Por  qué 

has  hecho  esto?  Porque  los  hombres  se 

enteraron  de  que  estaba  huyendo  de  la 

presencia  de  YHVH,  pues  él  se  lo  había 

declarado.

11

 Y le preguntaron: ¿Qué haremos conti-

go para que se nos calme el mar? Porque el 

mar se tornaba cada vez más tempestuoso.

12

 Y él respondió: Alzadme en vilo y arro-

jadme al mar, y se os calmará, pues yo sé 

que por mi causa os ha sobrevenido esta 

gran tempestad.

13

 Sin  embargo,  los  hombres  remaron 

duramente para tratar de hacer volver el 

barco a tierra, pero no pudieron, porque 

el mar se embravecía más y más.

14

 Entonces clamaron a YHVH, y dijeron: 

¡Oh YHVH, te rogamos, no nos hagas pe-

recer por la vida de este hombre, ni nos 

imputes  sangre  inocente,  porque  tú,  oh 

YHVH, has hecho del modo que te agra-

da!

15

 Y alzando en vilo a Jonás, lo arrojaron 

al mar, y el mar calmó su furia.

16

 Y aquellos hombres temieron a YHVH 

con gran temor, y ofrecieron sacrificio a 

YHVH, e hicieron votos.

17

 Y preparó YHVH un gran pez que tra-

gara a Jonás. Y estuvo Jonás en el vientre 

del pez tres días y tres noches.

Oración de Jonás

2

Entonces  oró  Jonás  a  YHVH  su  Dios 

desde el vientre del pez,

2

  y dijo:

En mi angustia invoqué a YHVH,

El profeta rebelde

1.1 Heb. Yonah = paloma.  1.2 Capital de Asiria, destruida por los medos en 612 a.C.  1.3 Esto es, la costa atlántica Ibérica. 

1.3  Heb.  Yafó.  Término  exacto  para  quien  desde  el  interior  de  Palestina  se  dirige  al  mar.  1.6  Lit.  jefe  de  los  marineros

1.6 

→ § 2. 


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Jonás 2:3

938

Y Él me respondió;

Del vientre del Seol pedí socorro,

Y Tú escuchaste mi voz.

3

    Me arrojaste a lo profundo,

En medio de los mares, y me rodeó 

la corriente:

Todas tus ondas y tus olas pasaron 

sobre mí.

4

    Me dije: Desechado soy de tu 

presencia,

¿Cómo podré volver a contemplar tu 

santa Casa?

5

    Las aguas me rodearon hasta el 

alma;

Me rodeó el abismo.

Las algas se enredaron en mi cabeza.

6

    Descendí a los cimientos de los 

montes,

Y cuando la tierra echaba sus 

cerrojos

Para siempre sobre mí,

Tú, oh YHVH, Dios mío,

Sacaste de la fosa mi vida,

7

    Cuando mi alma desfallecía en mí,

Me acordé de YHVH,

Y mi oración llegó hasta ti en tu 

santa Casa.

8

    Los que siguen la vanidad de 

sus ídolos se alejan de su 

misericordia;

9

    Pero yo te ofreceré sacrificio de 

alabanza,

Y cumpliré lo que prometí.

¡La salvación es de YHVH!

10

    Entonces YHVH dio orden al pez,

Y éste vomitó a Jonás en tierra.

Arrepentimiento de Nínive

3

La palabra de YHVH llegó por segunda 

vez a Jonás, diciendo:

2

 Levántate y vete a Nínive, la gran me-

trópoli, y proclama en ella el mensaje que 

Yo te daré.

3

 Jonás,  pues,  se  levantó  y  fue  a  Nínive, 

conforme a la palabra de YHVH. Y era Ní-

nive una ciudad grande ante ’Elohim,° de 

tres días de recorrido.

4

 Y Jonás comenzó a adentrarse en la ciu-

dad, y durante el primer día de recorrido 

proclamaba diciendo: De aquí a cuarenta 

días Nínive será destruida.

5

 Y  los  hombres  de  Nínive  creyeron  a 

’Elohim,  y  proclamaron  ayuno  y  se  cu-

brieron de cilicio, desde el mayor hasta el 

menor de ellos.

6

 Cuando la noticia llegó hasta el rey de 

Nínive, éste se levantó de su trono, se des-

pojó de su manto, se cubrió de cilicio y se 

sentó sobre ceniza.

7

 E  hizo  proclamar  y  anunciar  en  Níni-

ve, por mandato del rey y de sus grandes: 

¡Que hombres y animales, bueyes y ove-

jas, no coman cosa alguna! ¡Que no se les 

dé alimento, ni beban agua!

8

 ¡Cúbranse de cilicio tanto hombres como 

animales! ¡Clamen a ’Elohim fuertemente, 

y arrepiéntase cada uno de su mal camino 

y de la rapiña que hay en sus manos!

9

 ¿Quién sabe si desistirá ’Elohim y cam-

biará de parecer, y se apartará del furor de 

su ira, y no pereceremos?

10

 Y  vio  ’Elohim  lo  que  hacían,  cómo 

se  volvían  de  su  mal  camino,  y  desistió 

’Elohim del mal que había dicho que les 

haría, y no lo hizo.

La calabacera

4

Pero esto desagradó a Jonás y lo enojó 

en gran manera.

2

 Y oró a YHVH diciendo: ¡Oh YHVH! ¿No 

era esto lo que decía yo estando aún en mi 

tierra? Por eso huí a Tarsis, porque sabía 

que  Tú  eres  clemente  y  misericordioso, 

lento para la ira y grande en misericordia, 

que desistes de dar castigo.

3

 Ahora  pues,  oh  YHVH,  te  ruego  que 

me quites la vida, porque mejor me es la 

muerte que la vida.

4

 Y  YHVH  le  respondió:  ¿Haces  bien  en 

enojarte tanto?

5

 Y salió Jonás de la ciudad y se sentó al 

oriente de ella. Allí se hizo una enramada 

y se sentó a su sombra hasta ver qué su-

cedería en la ciudad.

6

 Y YHVH ’Elohim preparó una calabace-

ra para que creciera sobre la cabeza de Jo-

nás y le hiciera sombra y lo librara de su 

malestar. Y Jonás se alegró grandemente 

por la calabacera.

7

 Pero  al  amanecer  del  día  siguiente 

’Elohim preparó un gusano, el cual hirió 

la calabacera, y se secó.

3.3 Es decir, una ciudad muy grande ante los ojos de Dios


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Jonás 4:11

939

8

 Y aconteció que al salir el sol, ’Elohim 

envió  un  sofocante  viento  oriental,  y  el 

sol hirió la cabeza de Jonás, de modo que 

se desmayaba y deseaba morir, y dijo: ¡Más 

me vale morir que vivir!

9

 ’Elohim  respondió  a  Jonás:  ¿Tanto  te 

irritas por lo de la calabacera? Él respon-

dió: ¡Tengo razón para irritarme hasta la 

muerte!

10

 Le dijo YHVH: Te apiadaste de la cala-

bacera, por la cual no trabajaste ni la hi-

ciste crecer, que en una noche nació y en 

una noche pereció.

11

 ¿Y no tendré Yo piedad de Nínive, esta 

gran metrópoli, donde hay más de ciento 

veinte mil personas que no saben distin-

guir entre su mano derecha y su izquier-

da, además de muchos animales?


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1

Revelación de YHVH que tuvo Miqueas 

morastita,° en días de Jotam, de Acaz 

y de Ezequías, reyes de Judá,° la cual vi-

sión concernía a Samaria y a Jerusalem.

Contra la casa de Israel

2

    ¡Escuchad, pueblos todos!

Atiende, oh tierra, y cuanto hay en ti,

Sea Adonay YHVH testigo contra 

vosotros,

Sí, Adonay desde su santo templo.

3

    Mirad: YHVH sale de su lugar,

Desciende y holla las alturas de la 

tierra.

4

    Debajo de Él los montes se 

derretirán como cera junto al 

fuego,

Los valles se resquebrajarán 

como agua precipitada por la 

torrentera.

5

    Todo por la transgresión de Jacob, 

todo por los pecados de Israel.

¿Cuál es la rebelión de Jacob?

No puede ser sino Samaria.

¿Y cuáles son los altos de Judá?

No puede ser sino Jerusalem.

6

    Pues Yo haré de Samaria una ruina, 

un campo para plantar viñas;

Haré rodar sus piedras por el valle 

y dejaré al descubierto sus 

cimientos.

7

    Todos sus ídolos serán desmenuzados, 

y sus ofrendas quemadas.

Arrasaré todas sus imágenes: 

las obtuvo como precio de 

prostitución,

Y en precio de prostitución se 

convertirán.

8

    Por esto me lamentaré y gemiré, y 

andaré descalzo y desnudo,

Daré gritos lastimeros como los 

chacales y quejidos como el 

avestruz,

9

    Porque su llaga° es incurable, y ésta 

alcanzará también a Judá,

Se propagará hasta la puerta de mi 

pueblo,

En medio de Jerusalem.

10

    No lo anunciéis en Gat, no lloréis ni 

os lamentéis.

¡Revuélcate en el polvo en Bet-afrá!

11

    ¡Sal,° oh moradora de Safir, en 

vergüenza y desnudez!

Los moradores de Saanán no se 

atreven a salir.

Bet-esel está de duelo, y te quitó su 

apoyo.

12

    ¿Cómo espera el bien la que habita 

en Marot,

Si de parte de YHVH ha bajado el 

mal hasta la puerta 

de Jerusalem?

13

    ¡Uncid los carros a raudos corceles, 

oh moradores de Laquis!

Allí comenzó el pecado de Sión,

Allí se hallaron las rebeliones de 

Israel.

14

    Restituid por tanto la dote a 

Moreset-Gat,

Pues Bet-Aczib ha defraudado a los 

reyes de Israel.

15

    Oh moradora de Maresa, Yo traeré 

un heredero,

La visión

1.1 Habitante de Moreset-Gat. Aldea al SO de Jerusalem.  1.1 El espacio de los tres reinados va desde el 740 al 698 a.C. 

1.9 Esto es, la llaga de la lepra (símbolo del pecado de Samaria

→Os.7.9.  1.11 Esto es, al cautiverio.


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Miqueas 3:3

941

Y la nobleza de Israel se refugiará en 

Adulam.°

16

    ¡Rápate y haz calvez en tu cabeza 

por tus hijos muy amados!

Ensancha tu calvez como la del 

buitre,

Porque su destino es el destierro 

dejándote a ti detrás.

Riquezas y opresión

2

  ¡Ay de quienes planean maldades y 

   traman iniquidad en sus camas!

Que al clarear la mañana las 

ejecutan con el poder que tienen 

en su mano.

2

    Codician campos, y los arrebatan, 

codician casas, y se apropian de 

ellas.

Oprimen al varón y a su familia, al 

hombre,

Y a lo suyo por derecho ancestral.

3

    Por tanto, así dice YHVH:

Ahora me toca a mí planear contra 

esta estirpe un mal

Del cual no podréis apartar el cuello,

Ni podréis seguir caminando 

erguidos,

Tal tiempo de calamidad será.

4

    Aquel día entonarán refrán sobre 

vosotros,

Amargos lamentos que dirán:

¡Cómo fuimos despojados!

¡Cómo me la ha quitado!

Él ha trocado la porción de mi 

pueblo:

Al infiel ha repartido nuestros 

campos.

5

    Así, ya no tendrás quien eche la 

cuerda por suerte de posesión° en 

la congregación de YHVH.

6

    ¡No profeticéis!, dicen;

No profeticéis así, que la afrenta no 

nos alcanzará.

7

    ¿Está maldita la casa de Jacob?

¿Se ha acortado la paciencia de 

YHVH?

¿Son éstas sus obras?

Sin embargo, ¿no hacen bien mis 

palabras al que anda rectamente?

8

    Antaño, mi pueblo se alzaba contra 

el enemigo,

Hoy arrancáis el manto y el vestido 

al que transita confiado,

Al que no viene en son de guerra.

9

    Echáis a las mujeres de mi pueblo 

fuera del calor de sus hogares,

Y quitáis para siempre a sus hijitos 

la gloria del legado° que les di.

10

    ¡En pie, marchaos!

Éste no es sitio de reposo para 

vosotros,

Porque está contaminado,

Y con dolorosa destrucción tiene 

que ser destruido.

11

    Si viniera un tal profeta,

Soltando vanidades y engaños, 

diciendo:

Os anuncio que tendréis vino y 

licores.

¡Ése tal sí sería profeta para este 

pueblo!

12

    ¡Yo te reuniré sin falta, oh Jacob, 

todo entero!

¡Ciertamente congregaré al 

remanente de Israel!

Los reuniré como ovejas en el 

aprisco,

Como rebaño en medio del pastizal,

Y harán el estruendo de una 

multitud.

13

    El destructor sube ante ellos,

Irrumpen, pasan, y salen por la 

puerta.

Su rey marcha al frente de ellos, 

pero a la cabeza está YHVH.

La ruina de Israel

3

  Y digo: Oíd ahora oh príncipes 

   de Jacob y caudillos de la casa 

   de Israel:

¿No es de vosotros saber lo que es 

justo?

2

    Vosotros, que aborrecéis el bien y 

amáis el mal,

Que les arrancáis hasta la piel y la 

carne de sus huesos;

3

    Que coméis la carne de mi pueblo,

Y desolláis su piel, y rompéis sus 

huesos,

Que lo cortáis como carne para la 

olla,

Como carne para el caldero.

1.15 

→1 S.22.1.  2.5 Es decir, quien reparta heredades →Sal.16.6.  2.9 .legado.


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Miqueas 3:4

942

4

    Pues cuando clamen a YHVH,

Él no responderá,

Esconderá su rostro en ese tiempo,

Por vuestros hechos perversos.

5

    Así dice YHVH a los profetas que 

extravían a mi pueblo,

Que cuando tienen algo que morder, 

anuncian paz,

Pero declaran una guerra santa a 

quien no les llena la boca:

6

    Una noche sin visión llega para 

vosotros,

Y tendréis tinieblas sin oráculo.

El sol se pondrá para el profeta, y el 

día será oscuro sobre ellos.

7

    Los videntes serán avergonzados, los 

adivinos confundidos,

Y todos ellos tendrán que cerrar la 

boca,

Porque no habrá respuesta de 

’Elohim.

8

    Pero yo estoy dotado de poder, de 

justicia y de valor,

Por el Espíritu de YHVH,

Para denunciar a Jacob su rebelión, 

y a Israel su pecado.

9

    Escuchadme príncipes de Jacob, 

caudillos de la casa de Israel:

Vosotros que aborrecéis la justicia, 

y pervertís toda forma de 

equidad,

10

    Que edificáis a Sión con derramada 

sangre,

Y a Jerusalem con iniquidad.

11

    Sus magistrados juzgan por 

soborno,

Sus sacerdotes adoctrinan por la 

paga,

Sus profetas adivinan por dinero,

Y con todo, se apoyan en YHVH 

diciendo:

¿Acaso no está YHVH en medio de 

nosotros?

¡No nos sobrevendrá pues ningún 

mal!

12

    Pues por vuestra culpa Sión será 

arada como un campo,

Jerusalem se convertirá en un 

montón de ruinas,

Y el Monte de la Casa en un cerro de 

maleza.

El reino del Mesías

4

  Pero en los postreros tiempos, el 

   Monte de la Casa de YHVH

Será establecido como cabeza de los 

montes,

Y exaltado sobre todos los collados, 

y a él correrán los pueblos,

2

    Y muchas naciones irán allí y dirán:

Venid, subamos al Monte de YHVH, 

a la Casa del Dios de Jacob;

Él nos enseñará sus caminos, y 

nosotros andaremos en sus 

sendas.

Porque de Sión saldrá la Ley, y de 

Jerusalem la palabra de YHVH.

3

    Y Él juzgará entre muchos pueblos, 

y decidirá sobre naciones 

poderosas,

Hasta las más distantes.

Forjarán sus espadas en arados y sus 

lanzas en podaderas.

No alzará espada nación contra 

nación,

Ni se adiestrarán más para la guerra.

4

    Sino que cada uno se sentará debajo 

de su vid y debajo de su higuera,

Y nadie los amedrentará,

Porque la boca de YHVH Sebaot lo 

ha dicho.

5

    Los pueblos caminan invocando a 

sus dioses,

Nosotros caminamos en el nombre 

de YHVH,

Nuestro Dios por siempre jamás.

6

    En aquel día, dice YHVH, recogeré a 

la que cojea,

Volveré a traer a la descarriada y a la 

que había afligido;

7

    De la que cojea haré un remanente,

Y de la descarriada una nación 

poderosa,

Y YHVH reinará sobre ellos en el 

monte Sión

Desde entonces y para siempre.

8

    Y tú, Migdal-eder,° colina de la hija 

de Sión, a ti llegará,

Sí, a ti llegará el dominio anterior,

El reino de la ciudad de Jerusalem.

9

    Y ahora, ¿por qué clamas así?

¿No hay rey en ti?

¿Pereció tu consejero?

4.8 Esto es, torre del rebaño


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Miqueas 5:15

943

¿Te sorprendió el dolor como a 

parturienta?

10

    Retuércete pues como parturienta, y 

expulsa, oh hija de Sión,

Porque ahora saldrás de la ciudad y 

habitarás en descampado,

Y llegarás a Babilonia y allí serás 

librada,

Allí te redimirá YHVH de la mano de 

tus enemigos.

11

    Pero ahora se reúnen contra ti 

muchas naciones, y dicen:

¡Sea profanada!

¡Vean nuestros ojos la ruina de 

Sión!

12

    Pero no conocen los pensamientos 

de YHVH,

Ni comprenden sus designios:

Que los junta como gavillas en la era.

13

    ¡Levántate y trilla, oh hija de Sión!,

Porque haré tus cuernos como el 

hierro,

Y tus cascos como el bronce,

Para que desmenuces a muchos 

pueblos,

Y consagres a YHVH sus despojos,

Y sus riquezas al Señor de toda la 

tierra.

El Rey de paz

5

  ¡Rodéate ahora de muros hija de 

   guerreros!

Nos han sitiado;

Con vara herirán en la mejilla al 

Juez de Israel.

2

    Pero tú, Bet-léhem Efrata, pequeña 

para estar entre las familias de 

Judá,

De ti me saldrá el que será Caudillo 

en Israel,

Cuyo origen es desde el principio, 

desde los días de la eternidad.

3

    Pero los entregará sólo hasta el 

tiempo en que dé a luz la que ha 

de dar a luz,

Entonces el resto de sus hermanos 

retornará con los hijos de Israel.

4

    Estará firme y apacentará con el 

poder de YHVH,

Con la grandeza del nombre de 

YHVH su Dios,

Y habitarán seguros,

Porque entonces será engrandecido 

hasta los fines de la tierra,

5

    Y Él será nuestra paz.

Si Asiria se atreviera a invadir 

nuestra tierra,

Si tratara de pisotear nuestros 

palacios,

La enfrentaremos siete pastores y 

ocho capitanes,

6

    Los cuales devastarán a cuchillo la 

tierra de Asiria,

Y la tierra de Nimrod dentro de sus 

mismas puertas.

Así nos librará del asirio cuando 

venga contra nuestra tierra,

Cuando llegue a pisar los confines de 

nuestro territorio.

7

    El remanente de Jacob será en 

medio de muchos pueblos como 

el rocío de YHVH,

Como la lluvia sobre la hierba, que 

no aguarda a nadie,

Ni pone su esperanza en los hijos del 

hombre.

8

    El remanente de Jacob estará entre 

las naciones,

En medio de muchos pueblos,

Como el león entre las bestias del 

campo,

Como el cachorro de león en medio 

de un rebaño de ovejas,

Que al pasar arrebata y pisotea sin 

que nadie escape.

9

    ¡Alza tu mano contra tus 

adversarios,

Y todos tus enemigos serán 

destruidos!

10

    Aquel día, dice YHVH,

Haré cortar tu caballería dentro 

de ti,

Y haré destruir tus carros.

11

    Haré cortar las ciudades de tu 

tierra,

Y derribaré todas tus fortalezas.

12

    Haré cortar de tu mano las 

hechicerías,

Y no tendrás más adivinos.

13

    Haré cortar tus ídolos y tus piedras 

rituales en medio de ti,

Y nunca más te inclinarás ante la 

obra de tus manos.

14

    Arrancaré de en medio de ti tus 

Aseras,

Y destruiré tus ciudades.

15

    Con ira e indignación ejecutaré 

venganza


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Miqueas 6:1

944

Contra las naciones que no 

obedecieron.

Recordatorio

6

   Oíd lo que YHVH está diciendo: 

¡Levántate, llama a juicio a los 

montes,

Y que los collados oigan tu voz!

2

    Oh montes y fuertes cimientos de la 

tierra,

Oíd el pleito de YHVH,

Porque YHVH tiene pleito con su 

pueblo,

Y contenderá con Israel:

3

    ¿Qué te he hecho, pueblo mío?

¿En qué te he agobiado?

¡Testifica contra mí!

4

    Porque Yo te saqué de la tierra de 

Egipto,

Te redimí de la casa de esclavitud,

Enviando delante de ti a Moisés, a 

Aarón y a Miriam.

5

    Recuerda, pueblo mío, lo que 

tramaba Balac, rey de Moab,

Y qué le respondió Balaam hijo de 

Beor.

Desde Sitim hasta Gilgal recuerda,°

Para que puedas reconocer los 

hechos misericordiosos de 

YHVH.

Exigencias

6

    ¿Con qué me presentaré a YHVH y 

me postraré ante ’El-’Elyón?°

¿Me presentaré con holocaustos, con 

terneros añales?

7

    ¿Aceptará YHVH millares de 

carneros

O miríadas de arroyos de aceite?

¿Daré mi primogénito por mi 

rebelión,

El fruto de mis entrañas por el 

pecado de mi alma?

8

    Oh hombre, Él te ha dicho lo que es 

bueno,

Lo que YHVH pide de ti:

Solamente hacer justicia,

Amar la misericordia,

Y andarte con tiento° con tu Dios.

9

    ¡Oh tribu, oye!

La voz de YHVH clama a la ciudad:

Él salvará a los que temen su 

Nombre,

A quienes aún ha de congregar.

10

    ¿Aún hay tesoros injustos en casa 

del impío,

Con sus medidas exiguas e 

indignantes?

11

    ¿Podré ser puro con balanza inicua y 

con bolsa de pesas fraudulentas?

12

    Los ricos están atestados de 

violencia,

Y sus habitantes hablan mentiras,

Tienen en la boca una lengua 

engañosa.

13

    Pues Yo también te hiero con una 

gran herida,

Y te hago asolar por causa de tus 

pecados.

14

    Comerás y no te saciarás,

Y el abatimiento estará en medio 

de ti.

Recogerás, pero no lo conservarás;

Y lo que logres conservar Yo lo 

entregaré a la espada.

15

    Sembrarás, pero no cosecharás;

Prensarás olivas, pero no te ungirás 

con el aceite;

Y uvas, pero no beberás del vino.

16

    Porque se observan los decretos de 

Omri,

Y toda práctica de la casa de Acab;

Y vosotros seguís en pos de sus 

consejos,

Para que Yo haga de ti un asombro,

Y de tus habitantes un motivo de 

burla,

Y tengáis que soportar la afrenta de 

mi pueblo.

Días finales

7

  ¡Ay de mí! Porque soy como el 

   último de los frutos de verano,

Como el rebusco después de la 

vendimia,

Cuando ya no queda racimo que 

comer,

Ni las brevas que desea mi alma.

2

    Desapareció el piadoso de la tierra,

Y no hay más hombres rectos.

Todos acechan para derramar 

sangre;

6.5 .recuerda.  6.6 Esto es, Dios Altísimo.  6.8 

→§166.


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Miqueas 7:20

945

Cada cual caza a su prójimo con una 

red.

3

    Sus manos están adiestradas para el 

mal:

El príncipe demanda retribución,°

El juez juzga por retribución,

El poderoso abriga malos deseos en 

su alma;

Y entre ellos entretejen sus 

proyectos.

4

    El mejor de ellos es como la zarza,

El más recto, peor que un seto de 

espinos.

Pero viene el día de pasar cuenta,

El que anunciaron tus atalayas.

¡Entonces será su turbación!

5

    No confiéis en compañeros, ni os 

fiéis del amigo más íntimo;

De la que duerme a tu lado cuídate, 

no abras las puertas de tu boca,

6

    Porque el hijo desprecia al padre,

La hija se levanta contra la madre,

La nuera contra la suegra,

Y los enemigos del hombre son los 

de su propia casa.

Fidelidad

7

    Pero yo miraré a YHVH, esperaré en 

el Dios de mi salvación.

¡Mi Dios me escuchará!

8

    ¡Oh enemigo mío!

No te regocijes sobre mí,

Aunque caiga, me levantaré,

Aunque esté sentado en las tinieblas, 

YHVH será mi luz.

9

    Soportaré la ira de YHVH, porque he 

pecado contra Él,

Hasta que juzgue mi causa y 

defienda mi derecho.

Él me sacará a la luz, y yo veré su 

justicia.

10

    Mi enemiga al verlo se cubrirá de 

vergüenza,

La que me decía: ¿Dónde está YHVH 

tu Dios?

Mis ojos pronto la han de mirar,

Siendo pisoteada como el lodo de las 

calles.

11

    Llegará el día de reconstruir tus 

muros,

El día de extender tus límites,

12

    El día en que vendrán a ti desde 

Asiria hasta Egipto

Y desde el Nilo hasta el Éufrates,

De mar a mar y de monte a monte,

13

    Porque la tierra estará desolada para 

los que vivan en ella,

Por el fruto de sus obras.

Restauración

14

    Apacienta a tu pueblo con tu cayado,

Al rebaño de tu posesión, que habita 

solitario,

En medio del bosque del Carmelo.

Apacentarán sus rebaños en Basán y 

en Galaad,

Como en los tiempos antiguos.

15

    Como en los días que saliste de 

Egipto,

Yo les mostraré maravillas.

16

    Que las naciones verán,

Y quedarán turbadas a causa de su 

poder,

Se taparán la boca con la mano, se 

taparán los oídos,

17

    Lamerán el polvo como la serpiente,

Como las culebras y las sabandijas,

Saldrán temblando de sus baluartes,

Y vendrán con temor y reverencia 

ante ti, oh YHVH Dios nuestro.

18

    ¿Qué Dios hay como Tú, que carga° 

con el pecado,

Y pasa por alto° la transgresión del 

remanente de su heredad?

No retuvo para siempre su 

indignación,

Porque se complace en la 

compasión.

19

    Y volverá a compadecerse,

Y sepultará nuestras iniquidades,

Y echará en lo profundo del mar 

todos nuestros pecados.

20

    Concederás a Jacob la fidelidad, y a 

Abraham tu misericordia,

Tal como juraste a nuestros padres 

desde los días de la antigüedad.

7.3 .retribución.  7.18 carga. Heb. nasa 

→Sal.32.5 → § 31.  7.18 pasa por alto →Ex.12.23. 


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1

Carga° de Nínive. Rollo de la visión de 

Nahúm elcosita.

Santidad divina

a

2

    YHVH es Dios celoso y justiciero,

YHVH se indigna y toma venganza,

YHVH toma venganza de sus 

enemigos,

La reserva para sus adversarios.

3

    YHVH es lento para la ira, grande en 

paciencia,

Pero no tendrá por inocente al 

culpable.

b

YHVH camina en el torbellino y en 

la tormenta,

Y las nubes son el polvo de sus 

pasos.

g

4

    Reprende al mar, y lo hace secar,

Evapora todos los ríos,

d

El Basán y el Carmelo aridecen,

La flor del Líbano se marchita,

h

5

    Ante Él tiemblan las montañas,

Los collados se derriten,

w

Ante su presencia se pone de pie la 

tierra,

El mundo y todos los que en él 

habitan.

z

6

    Delante de su indignación

¿Quién podrá estar en pie?

¿Quién podrá resistir el ardor de su 

ira?

j

Su enojo se vierte como el fuego,

Y ante Él se desmenuzan las peñas.

f

7

    YHVH es bueno,

Es fortaleza en día de aflicción,

y

Y conoce a los que confían en Él.

8

    Pero con un cataclismo inundador 

hará desaparecer su° lugar,

k

Y perseguirá a sus enemigos hasta 

las mismas tinieblas.

9

    ¿Qué es lo que os imagináis de 

YHVH?

Él arrasará; y ciertamente,

No tomará venganza dos veces de su 

enemigo.

10

    Aunque sean como espinos 

enmarañados

Empapados en su embriaguez,

Serán consumidos como paja seca.

11

    De en medio de ti° ha salido un 

consejero de Belial,

Que maquina el mal contra YHVH.

12

    Pero así dice YHVH:

Aunque estén robustos y sean 

muchos,

Con todo serán cortados, y él° pasará.

1.1 Esto es, la profecía conminatoria.  1.8 Esto es, Nínive.  1.11 Esto es, Nínive.  1.12 Esto es, Nínive.


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Nahúm 3:3

947

Aunque te he afligido, no te afligiré 

más,°

13

    Sino que ahora te sacaré de encima 

su yugo

Y romperé tus coyundas.

14

    Pero acerca de ti,° mandará YHVH

Que no quede memoria de tu 

nombre.

Destruiré los ídolos e imágenes 

fundidas

En el templo de tus dioses,

Y lo convertiré en tu sepultura, 

porque eres vil.

Evangelio: Lucha y peligros

15

    ¡Mirad sobre los montes los pies del 

que trae buenas nuevas,

Del que anuncia la paz!

¡Guarda tus solemnidades, oh Judá, 

y cumple tus votos,

Porque el inicuo no volverá a 

atravesarte,

Pues ha sido totalmente destruido!

2

  ¡El destructor ha subido contra ti!°

Guarda la fortaleza,

Vigila el camino, ciñe tus lomos, y 

reúne todas tus fuerzas,

2

    Porque YHVH restaurará la gloria de 

Jacob,

Y la gloria de Israel,

Porque devastadores los han 

devastado,

Y han destruido los vástagos de su 

vid.

3

    El escudo de sus valientes está rojo,

Sus guerreros visten de púrpura,

Sus carros son fuego de acero,

En el día de su formación se hacen 

temblar los cipreses.°

4

    Jinetes vertiginosos y carros 

enloquecidos,

Se lanzan por las calles y las 

plazas,

Como antorchas encendidas,

Como relámpagos que zigzaguean.

5

    Se da aviso a sus valientes, y ellos se 

apresuran en su marcha,

Se apresuran en dirección al muro,

Se asegura la barrera,

6

    Se abren las esclusas de los ríos, y el 

palacio se derrumba.

7

    Está decretado: Será sacada y 

deportada.

Sus criadas zurean como las 

palomas y se golpean el pecho.

8

    Nínive es un estanque cuyas aguas 

se escapan.

Gritan: ¡Deteneos! ¡Deteneos!

Pero nadie vuelve atrás.

9

    ¡Saquead la plata y el oro!

Hay riquezas sin fin,

Toda clase de objetos preciosos.

10

    ¡Desolación, devastación y 

destrucción!

Desfallece el corazón y se aflojan las 

rodillas,

Los lomos se estremecen y todo 

rostro palidece.

11

    ¿Dónde está la guarida del león y el 

cubil de los leoncillos,

Donde se metían sin temer el león, 

la leona y los cachorros?

12

    El león hacía presas suficientes para 

sus cachorros

Y despedazaba para sus leonas,

Su cueva se llenaba de víctimas,

Su guarida de rapiña.

13

    ¡He aquí que Yo estoy contra ti!

Oráculo de YHVH Sebaot.

Encenderé y reduciré a humo tus 

carros,

Y a tus leoncillos los devorará la 

espada,

Cortaré de la tierra tus presas,

Y no volverá a oírse jamás la voz de 

tus pregoneros.

Contra Nínive

3

  ¡Ay de la ciudad sanguinaria 

   y traidora,

Repleta de rapiñas, insaciable de 

despojos!

2

    Ya se oye el chasquido de los 

látigos,

El estrépito de ruedas impetuosas,

Del galope de caballos,

Del rebote de los carros y de la 

caballería que carga;

3

    Del resplandor de la espada y el 

relampagueo de la lanza.

Infinidad de heridos,

Multitud de muertos,

1.12 Esto es, Israel.  1.14 Esto es, Nínive.  2.1 Esto es, Nínive.  2.3 Es decir, las lanzas (de madera de ciprés).


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Nahúm 3:4

948

Muchedumbre de víctimas en cuyos 

cadáveres se tropieza.

4

    Por las muchas fornicaciones de la 

ramera,

Tan atractiva como experta en 

hechizos,

Que con sus fornicaciones esclaviza 

pueblos,

Y a las parentelas de la tierra con sus 

hechicerías,

5

    ¡Heme aquí contra ti!, dice YHVH 

Sebaot,

Y te alzaré la falda por encima de tu 

rostro,

Y mostraré tu desnudez a las 

naciones y a los reinos tu 

vergüenza.

6

    Te arrojaré basura encima, te haré 

vil,

Y te expondré a la pública vergüenza.

7

    Los que te vean huirán de ti, 

diciendo:

¡Nínive ha sido destruida!

¿Quién se compadecerá de ella?

¿Dónde hallar quien la consuele?

8

    ¿Eres tú mejor que Tebas,°

La que se sentaba entre los ríos, 

rodeada de muchas aguas,

Cuyo baluarte era el Nilo,

Cuyo muro se elevaba desde el río?

9

    Etiopía y Egipto eran su poderío 

ilimitado,

Fut y Libia sus defensores.

10

    Pero también ella marchó en 

cautiverio y fue llevada al 

destierro,

También sus pequeños fueron 

estrellados en las encrucijadas,

Y sobre sus nobles echaron suertes,

Y sus poderosos fueron 

encadenados.

11

    Así también tú te embriagarás y 

andarás oculta,

También tú buscarás refugio lejos 

del enemigo.

12

    Tus plazas fuertes serán como 

higueras cargadas de brevas 

maduras:

Al sacudirlas caen en la boca que las 

come.

13

    Observa tus tropas en medio de ti:

Son como mujeres frente al 

enemigo;

Las puertas de tu territorio abiertas 

de par en par,

Y el fuego ha consumido los 

cerrojos.°

14

    Provéete agua para el asedio,

Fortifica tus defensas,

Métete en el lodo y pisa la arcilla,

Mantén firme el molde del ladrillo.

15

    Que en ese momento el fuego te 

devorará,

Como devora la langosta la espada te 

devorará.

Aunque te multipliques como el 

langostón,

Aunque te multipliques como la 

langosta,

16

    La langosta muda la piel, y vuela;

Aunque tus mercaderes sean más 

que las estrellas de los cielos,

17

    Y tus príncipes como langostas, y 

tus capitanes como langostones

Posados en las tapias en día frío,

Al brillar el sol volarán sin dejar 

huella.

18

    ¡Oh rey de Asiria, tus pastores se 

han dormido!

Tus capitanes están tumbados,

Tu tropa está dispersa por los 

montes,

Y no hay quien la reúna.

19

    No hay cura para tu quebranto,

Tu llaga es incurable;

Todos los que oigan el rumor acerca 

de ti,

Batirán palmas sobre ti,

Pues ¿sobre quién no ha pasado de 

continuo tu maldad?

3.8 Lit. No-Amón.  3.13 Lit. las barras


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1

Carga  que  tuvo  en  visión  el  profeta 

Habacuc.

Diálogo de protesta

2

 ¿Hasta cuándo, oh YHVH, clamaré por 

auxilio? Pero no, Tú no oirás. Gritaré ante 

ti: ¡Violencia! Pero no, Tú no salvarás.

3

 ¿Por qué me haces ver la iniquidad, y 

me  constriñes  a  mirar  la  opresión?  La 

violencia  y  la  destrucción  me  confron-

tan;  surgen  contiendas  y  se  levantan 

pleitos.

4

 Por  eso  la  Ley  ha  perdido  su  poder  y 

el  derecho  no  sale  vencedor,  porque  los 

impíos han cercado al justo, y la justicia 

resulta pervertida.

5

 Mirad  a  las  naciones,  contemplad  y 

asombraos, porque Yo haré una obra en 

vuestros días, que aun cuando se os cuen-

te, no la creeríais.

6

 He  aquí  levanto  a  los  caldeos,  pueblo 

cruel e impetuoso que marcha por la an-

chura de la tierra conquistando poblacio-

nes ajenas.

7

 Terribles  y  temibles,  de  ellos  mismos 

procede su juicio y majestad.

8

 Sus  caballos  son  más  veloces  que  leo-

pardos  y  más  feroces  que  lobos  noctur-

nos.°  Su  caballería  se  despliega,  y  sus 

jinetes  vienen  de  lejos,  vuelan  como  el 

águila cuando se precipita sobre la presa.

9

 Todos ellos vienen en son de violencia. 

Sus rostros están fijos hacia el viento del 

oriente, y recogen cautivos como arena.

10

 Se burlan de los reyes, y los príncipes 

son motivo de su mofa: se ríen de todas 

las plazas fuertes, pues levantan terraple-

nes y las conquistan.

11

 Pero luego mudará su espíritu y se en-

furecerá, y pecará, por cuanto ha hecho 

de su poder su dios.

12

 ¡Oh  YHVH,  Dios  mío  y  Santo  mío! 

¿Acaso no eres Tú desde el principio? ¡Oh 

YHVH, Tú no mueres!° Tú has señalado 

este castigo para juicio, y Tú, oh Roca, los 

has establecido como reprensión.

13

 Muy  limpio  eres  de  ojos  para  ver  el 

mal, y no puedes contemplar impasible el 

agravio. ¿Por qué miras a esos pérfidos y 

guardas silencio cuando el malvado des-

truye al que es más justo que él?

14

 ¿Por qué tratas a los hombres como a 

los peces del mar, como reptiles que no 

tienen amo?

15

 A todos ellos los saca con anzuelo, los 

atrapa en su red y los junta con su barre-

dera, por lo cual se alegra y se regocija.

16

 Por eso sacrifican a su red y ofrendan a 

su barredera, porque por ellas su porción 

es abundante y suculenta su comida.

17

 ¿Seguirá  vaciando  sin  cesar  su  red? 

¿Seguirá aniquilando sin piedad a las na-

ciones?

Resolución de la sabiduría

2

Sobre mi atalaya me pondré, me plan-

taré en mi muro, y estaré oteando para 

ver lo que Él me dice, y qué responde a mi 

querella.

2

 Y  YHVH  me  respondió  y  dijo:  Escribe 

la visión y escúlpela en tablillas, para que 

cualquiera la pueda leer con rapidez.

3

 Porque es aún visión para el tiempo se-

ñalado: ella hablará al fin y no será frus-

trada.  Aunque  tarde,  aguárdala,  porque 

sin duda vendrá, y no se retrasará.

1.8 Lit. lobos de la noche.  1.12 12ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 - § 18.


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Habacuc 2:4

950

4

 He  aquí,  aquel  cuya  alma  no  es  recta 

está  envanecido,  pero  el  justo  por  su  fe 

vivirá.

5

 El hombre arrogante, traicionado por el 

vino, no se queda en casa; ensancha como 

el Seol su alma, y es como la Muerte, que 

nunca  se  sacia.  Aunque  despoje  a  todos 

los pueblos y se adueñe de todas las na-

ciones,

6

 todos ellos entonarán contra él coplas 

y  refranes  sarcásticos,  diciendo:  ¡Ay  del 

que  acapara  lo  que  no  es  suyo!  ¿Hasta 

cuándo  había  de  acumular  prenda  tras 

prenda?

7

 ¿No se alzarán de pronto los que te han 

de saquear? ¿No se despertarán los que te 

han de oprimir con violencia para que le 

seas objeto de rapiña?

8

 Por cuanto has despojado a muchas na-

ciones, las demás naciones te despojarán 

a ti, por la derramada sangre humana y 

por la violencia hecha a la tierra, a la ciu-

dad, y a cuantos moran en ella.

9

 ¡Ay del que mete en su casa ganancias 

injustas, y pone en alto su nido para esca-

par de la calamidad!

10

 Has  tomado  consejo  vergonzoso  para 

tu  casa,  aniquilando  a  muchos  pueblos, 

has pecado contra ti mismo.

11

 Por  eso  la  piedra  clamará  desde  el 

muro,  y  la  viga  del  enmaderado  le  res-

ponderá.

12

 ¡Ay  del  que  edifica  la  ciudad  sobre  la 

sangre,  y  establece  una  ciudad  sobre  la 

iniquidad!

13

 ¿No procede de YHVH Sebaot que los 

pueblos trabajen para el fuego y las nacio-

nes se fatiguen en vano?

14

 Porque la tierra estará llena del cono-

cimiento de la gloria de YHVH, como las 

aguas cubren el mar.

15

 ¡Ay del que emborracha a su prójimo, 

y lo embriaga con un cáliz venenoso para 

recrearse en su desnudez!

16

 Te has llenado de deshonra más que de 

honra. ¡Bebe tú también, y deja al descu-

bierto tu prepucio! El cáliz de la diestra 

de YHVH se volverá contra ti, y una pútri-

da ignominia cubrirá tu gloria.

17

 Porque  la  violencia  hecha  al  Líbano, 

la matanza de las bestias aterrorizadas, la 

derramada sangre humana y la violencia 

hecha a la tierra, a la ciudad, y a cuantos 

moran en ella, te cubrirán.

18

° ¿De qué le sirve al ídolo que lo talle el 

artífice, si es una imagen, un maestro de 

mentiras? ¿De qué sirve al artífice confiar 

en su obra, haciendo ídolos mudos?

19

° ¡Ay  del  que  dice  al  leño:  Despierta,  y 

a  la  piedra  muda:  Levántate!  ¿Acaso  ésta 

puede enseñar? He aquí está recubierto de 

oro y plata, pero no hay espíritu en él.°

20

 Pero  YHVH  está  en  su  santo  templo: 

¡Guarde silencio ante Él toda la tierra!

Salmo de sumisión

3

Oración  del  profeta  Habacuc.  Sobre 

shigayón.°

2

    ¡Oh YHVH, he oído tu palabra, y 

estoy atemorizado!

En medio de los tiempos, oh, YHVH,

Revive tu obra,

En medio de los tiempos hazla 

conocer,

Y en medio de la ira,

¡Acuérdate de tener misericordia!

3

    Dios viene desde Temán,

El Santo, de los montes de Parán.

Selah

Su esplendor eclipsa los cielos y la 

tierra se llena de sus alabanzas.

4

    Su resplandor es como el sol,

Sus manos producen rayos de luz, 

allí se oculta su poder.

5

    Delante de Él marcha la Peste,

La Fiebre Ardiente sigue sus pisadas.

6

    Se detiene y mide la tierra,

Lanza una mirada,

Y hace estremecer a las naciones.

Las montañas antiguas se 

desmoronan,

Se hunden los montes de antaño,

Pero sus sendas son sendas eternas.

7

    Veo las tiendas de Cusán en aflicción,

Se estremecen las cortinas° de la 

tierra de Madián.

8

    Oh YHVH, ¿ardes en ira contra los 

ríos?

2.18 Se sugiere la lectura del v.18 después del v.19.  2.19 Se sugiere la lectura del v.19 antes del v.18.  2.19 Esto es, el ídolo 

→v.18  3.1 Heb. shigayón. Tono o instrumento musical utilizado para acompañar salmos →Sal.7.1. Prob. también se refiere a 

pecados por ignorancia 

→Lv.4.2; 5.15.  3.7 Es decir, las tiendas.


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Habacuc 3:19

951

¿Es contra los ríos tu indignación o 

contra el mar el desborde de tu 

enojo,

Para que cabalgues en tus caballos y 

en tu carro victorioso?

9

    Desnudas y alertas tu arco,

Jurados son los castigos de tu 

promesa.

Selah

Surcas la tierra con ríos,

10

    Te ven las montañas, y tiemblan;

El turbión de aguas se desencadena,

El abismo deja oír su voz, y eleva en 

alto sus manos.

11

    El sol y la luna se detienen en su cenit,

A la luz de tus saetas, que parten,

A la claridad del fulgor de tu lanza.

12

    Con ira has pisoteado la tierra,

Con furor trillaste las naciones.

13

    Has salido en socorro de tu pueblo, 

para salvar a tu ungido.

Destrozas el techo de la casa del impío

Y desnudas su cimiento hasta la 

roca.

Selah

14

    Con sus propios dardos traspasas al 

caudillo,

Y sus tropas se dispersan en 

torbellino,

Cuando triunfantes iban a devorar 

una víctima a escondidas.

15

    Hollaste con tus caballos el mar,

Y la mole de las grandes aguas 

hierve.

16

    Lo escuché, y se conmovieron mis 

entrañas,

Y mis labios palpitaron al oírlo.

La podredumbre entró en mis 

huesos,

Y dentro de mí mismo me 

estremezco, porque debo esperar 

quieto el día de la adversidad,

Cuando el pueblo que nos ha de 

invadir suba con sus tropas.

17

    Aunque la higuera no florezca,

Ni en las vides haya fruto,

Aunque engañe el producto del 

olivo°

Y los campos no produzcan 

alimento,

Aunque se acaben las ovejas del redil

Y no haya vacas en los establos,

18

    Con todo, yo me alegraré en YHVH

Y me gozaré en el Dios de mi 

salvación.

19

    ¡Adonay YHVH es mi fortaleza!

Él me da pies como de ciervas y me 

hace andar en las alturas.

Al  director  del  coro,  con  mis  instrumentos  de 
cuerda.

3.17 Es decir, lo que se estimaba de la cosecha 

→Os.9.2. 


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1

Palabra  de  YHVH  que  llegó  a  Sofo-

nías  ben  Cusi,  hijo  de  Gedalías,  hijo 

de Amarías, hijo de Ezequías, en días de 

Josías ben Amón, rey de Judá.°

Destrucción

2

    Destruiré completamente todas las 

cosas

De sobre la faz de la tierra, dice 

YHVH.

3

    Destruiré los hombres y las bestias, 

destruiré las aves de los cielos y 

los peces del mar,

Los motivos de tropiezo° y los que 

hacen tropezar,°

Y haré que el hombre sea 

cortado de la faz de la tierra, 

dice YHVH.

4

 Y  particularmente  extenderé  mi  mano 

contra Judá y contra todos los habitantes 

de Jerusalem, y haré cortar de este lugar 

lo que queda de Baal, y el nombre de los 

Chemarim° con los sacerdotes,°

5

    Y a quienes se postran sobre los 

terrados

Ante el ejército de los cielos,°

Y a los que se postran y juran por 

YHVH

Al tiempo que juran por Moloc,°

6

    Y a quienes se apartan de en pos de 

YHVH,

Y a los que no buscan a YHVH ni lo 

consultan.

7

 ¡Silencio en presencia de Adonay YHVH! 

El  día  de  YHVH  está  cercano.  YHVH  ha 

preparado un sacrificio, y ha escogido° a 

sus invitados.

8

 El día del sacrificio de YHVH castigaré a 

los príncipes y a los hijos del rey,° y a to-

dos los que visten atuendos extranjeros.

9

 Aquel  día  castigaré  también  a  cuantos 

saltan el umbral,° y llenan de engaños y 

violencias la casa de sus señores.°

10

 Aquel día, dice YHVH, se escuchará un 

clamor  desde  la  Puerta  del  Pescado,  un 

gemir desde el Barrio Nuevo, y un gran 

lamento desde las colinas.

11

 ¡Gemid,  oh  habitantes  de  Mactes,° 

porque todo el pueblo de mercaderes está 

arruinado! Todos los que iban cargados de 

plata fueron cortados.

12

 En aquel tiempo escudriñaré a Jerusa-

lem con linternas, y castigaré a los aletar-

gados  sobre  las  heces  de  su  vino,°  a  los 

que dicen en su corazón: YHVH no hará 

ni bien ni mal.

13

 Por  tanto  sus  riquezas  serán  saquea-

das y sus casas asoladas. Edificarán casas, 

pero  no  las  habitarán,  plantarán  viñas, 

pero no beberán su vino.

Terror de la teofanía

14

    ¡Se acerca el día grande de YHVH!

Se acerca con gran apresuramiento;

Amarga es la voz del día de YHVH:

1.1 Esto es, 640-605 a.C.  1.3 Esto es, los ídolos 

→Ez.14.3.  1.3 Lit. inicuos, malvados.  1.4 → § 45.  1.4 Esto es, los sacerdotes 

de Baal

1.5 Npara adorar al escuadrón de los astros.  1.5 O Milkom, considerado el dios de los amonitas, cuyo lugar de culto 

en el valle del Cedrón fue destruido por Josías 

→2 R.23.13.  1.7 O consagrado.  1.8 LXX: sobre la familia (o casadel rey

1.9 

→1  S.5.5.  1.9  El TM  registra  plural,  pero  algunas  versiones  lo  traducen  en  singular  refiriéndose  a  la  Casa  de  Dios. 

1.11 Hondonada rodeada de montañas.  1.12 Heb. los que se sientan sobre sus heces. Metáfora tomada de la fabricación del 

vino, el cual, ya fermentado, debe ser vertido en otro recipiente para separarlo de sedimentos llamados heces 

→Jer.48.11. 

El banquete de YHVH


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Sofonías 3:2

953

Clamará allí hasta el valiente.

15

    Día de ira es aquel día,

Día de tribulación y angustia,

Día de destrucción y desolación,

Día de tiniebla y oscuridad,

Día de bruma y entenebrecimiento,

16

    Día de trompeta y de alarma

Sobre la plaza fuerte y las altas torres.

17

 Yo haré que los hombres se angustien 

y  deambulen  como  ciegos,  por  cuanto 

pecaron contra YHVH, su sangre será de-

rramada como polvo y sus entrañas como 

excremento.

18

 Ni su plata ni su oro podrá librarlos en 

el día de la ira de YHVH, cuando el fuego 

de su celo consuma toda la tierra, porque 

de  cierto  exterminará  repentinamente  a 

todos los habitantes de la tierra.

Exhortación perentoria

2

  ¡Reuníos en asamblea,

Oh nación no deseada!°

2

    Antes que entre en vigencia el 

decreto del día que arrebatará el 

tamo;°

Antes que venga sobre vosotros el 

ardor de la ira de YHVH;

Antes que venga sobre vosotros el 

día de la ira de YHVH.

3

    ¡Buscad a YHVH,

Humildes todos de la tierra!

Los que cumplís sus preceptos,

Buscad la justicia y buscad la 

humildad;

Quizá seáis escondidos en el día de 

la ira de YHVH.

Contra las naciones vecinas

4

 Gaza será desamparada, Ascalón asola-

da; Asdod será desterrada al mediodía, y 

Ecrón será desarraigada.

5

 ¡Ay de los moradores de la costa, del pue-

blo de los cereteos!° La palabra de YHVH 

está contra vosotros, oh Canaán, tierra de 

filisteos. Haré que seas arrasada hasta que 

no quede morador alguno.

6

 Entonces la costa marítima se converti-

rá en pastizales, con cabañas de pastores 

y apriscos para ovejas.

7

 Y la costa° será para el remanente de la 

casa de Judá. Allí apacentarán, y al atarde-

cer se recogerán en las casas de Ascalón, 

pues YHVH su Dios los visitará y los hará 

volver de su cautiverio.

Contra moabitas y amonitas

8

 He oído el insulto de Moab y las injurias 

con  que  los  hijos  de  Amón  afrentaron  a 

mi pueblo, y cómo se han engrandecido 

invadiendo sus confines.

9

 Por  tanto,  vivo  Yo,  dice  YHVH  Sebaot 

Dios  de  Israel:  Ciertamente  Moab  será 

como Sodoma, y los hijos de Amón como 

Gomorra: Campo de ortigas, salina y de-

solación  perpetua.  El  remanente  de  mi 

pueblo los saqueará y el resto de mi na-

ción los heredará.

10

 Esa  será  la  paga  de  su  soberbia,  por-

que afrentaron con altanería al pueblo de 

YHVH Sebaot.

11

 YHVH se les mostrará terrible, cuando 

deje macilentos a todos los dioses de la tie-

rra. Y todas las costas° de los gentiles, cada 

uno desde su lugar, se inclinarán ante Él.

12

 También  vosotros,  oh  cusitas,°  seréis 

muertos con mi espada.

13

 Asimismo extenderá su mano contra el 

norte y destruirá a Asiria, y hará de Nínive 

una desolación, árida como un desierto.

14

 Y se echarán en medio de ella las mana-

das y todas las bestias del campo.° Se cobi-

jarán en sus dinteles la lechuza y el erizo,° 

y  su  voz  resonará  en  las  ventanas.  Habrá 

desolación°  en  los  umbrales,  pues  su  en-

maderado de cedro quedará al descubierto.

15

 Esta es la ciudad alegre que vivía des-

preocupada;  que  decía  en  su  corazón: 

Nadie más que yo. ¡Cómo se ha tornado 

en horror, en madriguera de fieras! Cual-

quiera  que  pase  junto  a  ella  silbará  me-

neando la mano.

Juicio de Jerusalem

3

¡Ay  de  la  ciudad  opresora,  rebelde  y 

contaminada!

2

 No  escucha  la  voz  ni  recibe  el  conse-

jo, no confía en YHVH ni se acerca a su 

Dios.

2.1 Es decir, sin pudorincapaz de tener vergüenza.  2.2 Vul: antes que os volváis cual flor de un día.  2.5 Esto es, los habitantes 

de Creta

2.7 LXX añade del mar.  2.11 Esto es, los países lejanos.  2.12 Esto es, el pueblo etíope.  2.14 Animales de los pueblos 

vecinos. 

2.14 erizo 

→Is.34.11.  2.14 LXX: el cuervo


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Sofonías 3:3

954

3

 Sus  príncipes  en  medio  de  ella  son 

leones rugientes; sus jueces, lobos noc-

turnos,° que no dejan hueso para la ma-

ñana.

4

 Sus  profetas  son  insolentes,  hombres 

desleales; sus sacerdotes han profanado 

el santuario y han violentado la Ley.

5

 YHVH, que es justo en medio de ella, 

no  cometerá  injusticia.  Cada  mañana 

saca a luz su justicia, nunca falta; pero 

el malvado no conoce la vergüenza.

6

 Yo hice destruir naciones, sus torreo-

nes  están  derribados;  he  dejado  desier-

tas  sus  calles  hasta  no  quedar  quien 

pase;  sus  ciudades  están  desoladas,  sin 

persona ni morador.

7

 Me  dije:  De  seguro  me  temerás  y 

aceptarás  corrección.  Y  no  será  des-

truida  su  morada°  a  pesar  de  todo  lo 

que he decretado sobre ella. Pero ellos 

madrugaron para pervertir más sus ac-

ciones.

8

 Por  tanto,  dice  YHVH,  esperadme  a 

mí  hasta  el  día  en  que  Yo  madrugue 

para  juzgaros,°  pues  mi  decisión  es 

reunir  las  naciones  y  congregar  los 

reinos,  para  derramar  sobre  ellos  mi 

furor,  todo  el  ardor  de  mi  ira,  porque 

con  el  fuego  de  mi  celo  será  devorada 

toda la tierra.

Restauración

9

 Para  ese  entonces  purificaré  los  labios 

de los pueblos, para que todos invoquen 

el nombre de YHVH, y le sirvan de común 

acuerdo.°

10

 Desde más allá de los ríos de Etiopía, 

los que me veneran, la hija de mis disper-

sos,° traerán ofrendas para mí.

11

 En aquel día no serás avergonzada por 

todas  tus  acciones  con  que  te  rebelaste 

contra mí, porque entonces Yo habré qui-

tado de en medio de ti a los que se gozan 

en tu soberbia, y no volverás a ensoberbe-

certe en mi santo monte.

12

 Entonces dejaré en medio de ti un pue-

blo humilde y pobre, el cual se refugiará° 

en el nombre de YHVH.

13

 El  remanente  de  Israel  no  cometerá 

iniquidad, ni hablará mentira, ni se halla-

rá en su boca lengua engañosa, pues ellos 

se apacentarán y reposarán, sin que haya 

quien los aterrorice.

Regocijo

14

    ¡Canta, oh capital de Sión!

¡Da voces de júbilo, oh Israel!

¡Alégrate y regocíjate de todo 

corazón,

Oh ciudad de Jerusalem!

15

    YHVH ha apartado tus juicios,°

Ha echado fuera tu enemigo.

YHVH, el Rey de Israel está en 

medio de ti.

¡Nunca más temerás el mal!

16

    En aquel día se dirá a Jerusalem:

¡No temas, oh Sión,

Ni se debiliten tus manos!

17

    ¡YHVH tu Dios está en medio de ti!

¡Es héroe que salva!

Se gozará en ti con alegría y te 

renovará° su amor,

Y se regocijará contigo con cánticos 

de alabanza.°

18

 Reuniré a los que lloran apartados de 

ti,  porque  han  sido  privados  de  las  fies-

tas solemnes, y te libraré del oprobio que 

pesa sobre ti.

19

 He  aquí,  en  aquel  tiempo  convertiré 

en  oprobio  a  todos  tus  opresores.  Pero 

salvaré  a  la  que  cojea  y  recogeré  la  que 

fue expulsada, y los pondré como objeto 

de alabanza y renombre en todas las na-

ciones donde fueron avergonzados.

20

 En ese tiempo os traeré y en esa oca-

sión os recogeré, y haré que seáis motivo 

de  alabanza  y  renombre  entre  todos  los 

pueblos de la tierra, cuando Yo haga vol-

ver vuestro cautiverio ante vuestros mis-

mos ojos, dice YHVH.

3.3 LXX: lobos de Arabia.  3.7 LXX añade de sus ojos.  3.8 LXX y Sir: como testimonio.  3.9 Lit. con un solo hombro.  3.10 Lit. la 

hija de mis esparcidos

3.12 En sentido figurado que confiará en.  3.15 Ncastigos. Otras versiones: jueces.  3.17 Otras versio-

nes: callará su amor

3.17 LXX añade: como en días de fiesta


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1

El año segundo del reinado de Darío, 

en  el  mes  sexto,°  el  primer  día  del 

mes, llegó la palabra de YHVH a Zoroba-

bel° ben Salatiel, gobernador de Judá, y a 

Josué° ben Josadac, sumo sacerdote, por 

medio del profeta Hageo, diciendo:

2

 Así ha hablado YHVH Sebaot,° diciendo: 

Este  pueblo  dice:  Aún  no  es  tiempo,°  el 

tiempo de reedificar la Casa de YHVH.

3

 Entonces  llegó  palabra  de  YHVH  por 

medio del profeta Hageo, para decir:

4

 ¿Acaso  es  tiempo  de  que  vosotros,  espe-

cialmente vosotros, habitéis en casas arte-

sonadas, mientras esta Casa está en ruinas?

5

 Pues ahora, así dice YHVH Sebaot: Con-

siderad vuestros caminos:°

6

 Sembráis  mucho  y  recogéis  poco;  co-

méis  y  no  os  saciáis;  bebéis,  pero  no  a 

plenitud; os arropáis, pero no entráis en 

calor;  y  el  asalariado  echa  su  jornal  en 

saco roto.

7

 Así  dice  YHVH  Sebaot:  Meditad  sobre 

vuestros caminos.

8

 Subid a los montes y traed maderos,° y 

reedificad la Casa, y Yo lo aceptaré, y en 

ella mostraré mi gloria, dice YHVH.

9

 Emprendéis mucho, y resulta poco; me-

téis en la casa, pero Yo lo aviento.° ¿Por 

qué? Dice YHVH Sebaot: Porque mi Casa 

está en ruinas, mientras cada uno de vo-

sotros se ocupa de su propia casa.

10

 Por eso, por causa de vosotros, los cie-

los  han  retenido  la  lluvia,  y  la  tierra  su 

cosecha.

11

 Y he llamado a la sequía sobre la tie-

rra, y sobre los montes, y sobre el trigo, y 

sobre el mosto, y sobre el aceite, y sobre 

todo lo que produce la tierra, y sobre el 

hombre, y sobre el ganado, y sobre todo 

trabajo de las manos.°

12

 Y Zorobabel ben Salatiel, y Josué ben 

Josadac, sumo sacerdote, y todo el resto 

del pueblo, obedecieron la voz de YHVH 

su Dios mediante las palabras del profeta 

Hageo, tal como YHVH, Dios de ellos, le 

había  mandado.  Y  el  pueblo  tuvo  temor 

delante de YHVH.

13

 Entonces Hageo, enviado de YHVH, ha-

bló  por  mandato  de  YHVH  al pueblo,  di-

ciendo: Yo estoy con vosotros, dice YHVH.

14

 Y YHVH excitó el espíritu de Zoroba-

bel  ben  Salatiel,  gobernador  de  Judá,  y 

el espíritu del sumo sacerdote Josué ben 

Josadac, y el espíritu del resto del pueblo. 

Y ellos acudieron y emprendieron la obra 

de la Casa de YHVH Sebaot, su Dios,

15

 el día veinticuatro del mes sexto, en el 

año segundo del rey Darío.

El nuevo templo

2

El veintiuno del mes séptimo,° la pa-

labra  de  YHVH  llegó  por  medio  del 

profeta Hageo, diciendo:

2

 Habla  ahora  a  Zorobabel  ben  Salatiel, 

gobernador de Judá, y a Josué ben Josa-

dac, sumo sacerdote, y al resto del pueblo, 

diciendo:

3

 ¿Quién queda entre vosotros que haya 

visto esta Casa en su primer esplendor? 

Exhortación

1.1 Corresponde a Elul (Agosto) del 520 a.C.  1.1 Líder del post-exilio, nieto de Joaquín. 

→Esd.2.2.  1.1 Líder religioso del 

post-exilio  babilónico. 

1.2  Esto  es,  de  los  ejércitos  o  de  las  huestes.  1.2  Se  refiere  al  momento  propicio  para  hacer  algo. 

1.5 Lit. aplicad vuestro corazón.  1.8 

→Esd.2.64 ss.  1.9 O Yo lo soplo, Yo lo tiro, Yo lo arrojo.  1.11 La descripción de las cala-

midades que le habían sobrevenido a Israel cobra especial énfasis por medio de los nueve y insertos en este versículo. En la 

simbología bíblica, nueve es número de finalidad y juicio

2.1 Esto es el mes de Tishri (Septiembre-Octubre). 


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Hageo 2:4

956

Y  ¿cómo  la  veis  ahora?  ¿No  son  ella  y 

la  nada  una  misma  cosa  ante  vuestros 

ojos?

4

 Ahora  pues,  esfuérzate  Zorobabel,  dice 

YHVH; y esfuérzate también tú, Josué ben 

Josadac,  sumo  sacerdote,  y  esfuércese 

todo el pueblo de esta tierra, dice YHVH, 

y  actuad,  porque  Yo  estoy  con  vosotros, 

dice YHVH Sebaot.

5

 Según  el  pacto  que  hice  con  vosotros 

cuando  salisteis  de  Egipto,  mi  Espíritu 

estará en medio de vosotros. No temáis.

6

 Porque  así  dice  YHVH  Sebaot:  Dentro 

de poco Yo estremeceré los cielos y la tie-

rra, el mar y la parte seca.

7

 Estremeceré a todas las naciones, y ven-

drá el Deseado° de todas las naciones, y 

llenaré  de  gloria  esta  Casa,  dice  YHVH 

Sebaot.

8

 Mía  es  la  plata  y  mío  es  el  oro,  dice 

YHVH Sebaot.

9

 La gloria postrera de esta Casa será ma-

yor que la primera, y en este lugar daré 

paz, dice YHVH Sebaot.

Recordatorio

10

 En  el  día  veinticuatro  del  noveno 

mes,° en el segundo año de Darío, llegó 

palabra  de  YHVH  por  medio  del  profeta 

Hageo, diciendo:

11

 Así dice YHVH Sebaot: Pregunta ahora 

a los sacerdotes de la Ley, diciendo:

12

 He aquí, si alguno toca la carne con-

sagrada con la orla de su vestidura, y con 

ella roza algún pan o vianda o vino o acei-

te,  o  cualquier  alimento,  ¿quedan  santi-

ficados? Y respondieron los sacerdotes y 

dijeron: No.

13

 Hageo añadió: Y si cualquiera de estas 

cosas roza un cadáver, ¿quedará inmun-

da? Y respondieron los sacerdotes y dije-

ron: Quedará inmunda.

14

 Entonces Hageo replicó y dijo: Así es 

este pueblo y esta nación que está delante 

de mí, dice YHVH. Toda obra de sus manos 

y todo lo que ofrecen allí es inmundo.

15

 Ahora bien, considerad desde aquel día 

atrás,  desde  antes  que  se  pusiera  piedra 

sobre piedra en la Casa de YHVH,

16

 Durante aquel tiempo, cuando alguien 

llegaba a un montón de veinte efas y había 

sólo diez, o cuando iba al lagar para sacar 

cincuenta cubos y había sólo veinte.

17

 Os herí con viento abrasador, añublo y 

granizo en toda obra de vuestras manos, 

pero ninguno de vosotros se volvió a mí, 

dice YHVH.

18

 Considerad pues desde este día en ade-

lante,  desde  el  día  veinticuatro  del  mes 

noveno, a partir del día en que se echaron 

los cimientos de la Casa de YHVH, consi-

deradlo:

19

 ¿Hay acaso todavía cosecha en el gra-

nero? Ni tampoco la vid ni la higuera, ni 

el granado ni el olivo han producido; pero 

desde este día os daré bendición.

Contra los gentiles

20

 El veinticuatro del mismo mes YHVH 

dirigió por segunda vez palabra a Hageo, 

diciendo:

21

 Habla  a  Zorobabel,  gobernador  de 

Judá, diciendo: Yo haré temblar los cielos 

y la tierra.

22

 Trastornaré  el  trono  de  los  reinos  y 

haré que sea destruida la potencia de los 

reinos  de  las  naciones.  Volcaré  carros  y 

aurigas, y caerán caballos y jinetes, cada 

uno por la espada de su propio hermano.

23

 En  aquel  día,  dice  YHVH  Sebaot,  te 

tomaré,  oh  Zorobabel  ben  Salatiel,  sier-

vo mío, dice YHVH, y te pondré como un 

anillo de sellar, porque a ti te he escogido, 

dice YHVH Sebaot.

2.7 Lit. deseo.  2.10 Esto es el mes de kislev (Noviembre-Diciembre). 


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1

En el octavo mes del año segundo de 

Darío,° llegó palabra de YHVH al pro-

feta Zacarías ben Berequías, hijo de Iddo, 

diciendo:

2

 YHVH estuvo indignado con gran indig-

nación contra vuestros padres.

3

 Ahora diles: Así dice YHVH Sebaot: Vol-

veos a mí, dice YHVH Sebaot, y Yo me vol-

veré a vosotros, dice YHVH Sebaot.

4

 No seáis como vuestros padres, a quie-

nes  clamaron  los  primeros  profetas,  di-

ciendo:  Así  dice  YHVH  Sebaot:  Volveos 

ahora  de  vuestros  malos  caminos  y  de 

vuestras  malas  obras.  Pero  no  escucha-

ron, ni me atendieron, dice YHVH.

5

 Vuestros padres, ¿dónde están?, y vues-

tros profetas, ¿viven para siempre?

6

 Pero mis palabras y mis preceptos que 

ordené por medio de mis siervos los pro-

fetas,  ¿no  alcanzaron  a  vuestros  padres? 

Entonces  se  convirtieron  diciendo:  Tal 

como YHVH Sebaot se propuso hacer con 

nosotros  a  causa  de  nuestros  caminos  y 

de nuestras obras, así ha hecho con no-

sotros.

Restauración de Sión

7

 En el día veinticuatro del mes undéci-

mo,° que es el mes de Sebat, en el año se-

gundo de Darío, la palabra de YHVH llegó 

al profeta Zacarías ben Berequías, hijo de 

Iddo, así:

8

 Vi de noche, y he aquí un varón cabal-

gaba sobre un caballo bermejo, el cual es-

taba entre los mirtos de la hondonada, y 

detrás de él había caballos bermejos, ala-

zanos y blancos.

9

 Entonces dije: Señor mío, ¿qué son és-

tos? Y el ángel que hablaba conmigo me 

contestó: Yo te mostraré qué son éstos.

10

 Y  el  varón  que  permanecía  entre  los 

mirtos  respondió,  y  dijo:  Estos  son  los 

que ha enviado YHVH para que recorran 

la tierra.

11

 Ellos  informaron  al  ángel  de  YHVH, 

que estaba entre los mirtos, diciendo: He-

mos recorrido la tierra, y he aquí, toda la 

tierra está tranquila y reposada.

12

 Entonces  el  ángel  de  YHVH  tomó  la 

palabra, y dijo: ¡Oh YHVH Sebaot!, ¿hasta 

cuándo no te compadecerás de Jerusalem 

y de las ciudades de Judá, contra las cua-

les has estado airado estos setenta años?

13

 Y YHVH respondió al ángel que habla-

ba conmigo palabras buenas, palabras de 

consolación.

14

 Entonces me dijo el ángel que habla-

ba conmigo: Proclama diciendo: Así dice 

YHVH  Sebaot:  Con  gran  celo  he  estado 

celoso por Jerusalem y por Sión.

15

 Pero con gran ira estoy airado contra 

las naciones confiadas en sí mismas, que 

aprovechan  mi  breve  indignación°  para 

agravar la calamidad.°

16

 Por tanto, así dice YHVH: Me he vuel-

to a Jerusalem con gran misericordia. En 

ella  será  edificada  mi  Casa,  dice  YHVH 

Sebaot, y el cordel será tendido sobre Je-

rusalem.

17

 Sigue  proclamando:  Así  dice  YHVH 

Sebaot:  De  nuevo  rebosarán  de  bienes 

mis ciudades, y YHVH volverá a consolar 

Exhortación 

Primeras visiones

1.1 Esto es, Octubre-Noviembre del 520 a.C.  1.7 Corresponde a los meses de Enero-Febrero.  1.15 Es decir, contra mi pueblo

1.15 Esto es, de Israel.


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Zacarías 1:18

958

a Sión, y otra vez Jerusalem será su ele-

gida.°

Los cuatro cuernos

18

 Después alcé mis ojos, miré, y he aquí 

cuatro cuernos.

19

 Y dije al ángel que hablaba conmigo: 

¿Qué  son  éstos?  Y  me  respondió:  Éstos 

son  los  cuernos  que  han  dispersado  a 

Judá, Israel y Jerusalem.

20

 YHVH me mostró cuatro artesanos,

21

 y dije yo: ¿Qué vienen a hacer éstos? Y 

me  respondió:  Aquéllos  son  los  cuernos 

que dispersaron tanto a Judá, que nadie 

levantaba  su  cabeza;  pero  éstos  han  ve-

nido  para  aterrorizarlos,  para  derribar 

los  cuernos  de  las  naciones  que  alzaron 

su  cuerno  contra  la  tierra  de  Judá  para 

arruinarla.

Tercera visión

2

Después  alcé  mis  ojos  y  miré,  y  he 

aquí un varón con un cordel de medir 

en su mano.

2

 Y le pregunté: ¿A dónde vas? Y me res-

pondió: A medir Jerusalem, para compro-

bar su anchura y su longitud.

3

 Entonces  el  ángel  que  hablaba  conmi-

go se adelantó, pero otro ángel le salió al 

encuentro,

4

 diciéndole: Corre, habla a aquel joven, 

y dile: Por la multitud de personas y de 

ganado que habrá en ella, Jerusalem será 

una ciudad abierta.°

5

 Yo mismo le seré por muro de fuego al-

rededor, y mi gloria estará dentro de ella, 

dice YHVH.

6

 ¡Ea, ea! Huid de la tierra del Norte,° dice 

YHVH; porque os he esparcido como los 

cuatro vientos° de los cielos, dice YHVH.

7

 ¡Escapa, oh Sión, tú que habitas con la 

hija de Babilonia!

8

 Porque así dice YHVH Sebaot: Para glo-

ria suya me enviará Él a las naciones que 

os despojaron, porque el que os toca, toca 

la niña de mi° ojo.

9

 Por tanto, mirad: Yo agito mi mano con-

tra ellos, y se convertirán en despojo para 

los que fueron sus esclavos. Entonces sa-

bréis que YHVH Sebaot me ha enviado.

10

 ¡Canta  alabanzas  y  alégrate,  hija  de 

Sión, porque Yo vengo a morar en medio 

de ti!, dice YHVH.

11

 Aquel  día  se  unirán  a  YHVH  muchas 

naciones,  y  me  serán  por  pueblo,  y  ha-

bitaré°  en  medio  de  ti,  y  conocerás  que 

YHVH Sebaot me ha enviado a ti.

12

 Y YHVH poseerá a Judá como su here-

dad en la tierra santa, y nuevamente Jeru-

salem será su elegida.

13

 ¡Calle  toda  carne  ante  YHVH,  porque 

Él se ha despertado en su santa morada!

Cuarta visión

3

Después me mostró al sumo sacerdo-

te Josué, colocado delante del ángel de 

YHVH, y Satanás estaba a su mano dere-

cha para acusarlo.

2

 Pero dijo YHVH a Satanás: ¡YHVH te re-

prenda, Satanás! YHVH, que ha escogido 

a Jerusalem, te reprenda. ¿No es éste un 

tizón arrebatado del fuego?

3

 Y  Josué  estaba  vestido  con  vestiduras 

inmundas mientras se hallaba en pie ante 

el ángel.

4

 Éste mandó a los que estaban ante Él, di-

ciendo: ¡Quitadle las vestiduras inmundas! 

Y a él le dijo: Mira, he quitado de ti el peca-

do, y te he hecho vestir ropas de gala.

5

 Y  añadió:  ¡Poned  una  mitra  limpia  en 

su cabeza! Y pusieron una mitra sobre su 

cabeza, y lo vistieron con ropas. Y el ángel 

de YHVH estaba en pie.

6

 Después el ángel de YHVH amonestó a 

Josué, diciendo:

7

 Así dice YHVH Sebaot: Si andas por mis 

caminos  y  si  guardas  mi  mandato,  tam-

bién tú juzgarás mi Casa, y también guar-

darás mis atrios, y te daré entrada entre 

éstos que están presentes.

8

 Escucha  ahora  Josué,  sumo  sacerdo-

te,  tú  y  tus  compañeros  que  se  sientan 

delante  de  ti:  Son  varones  simbólicos,° 

porque he aquí Yo traigo a mi Siervo, el 

Renuevo.

9

 He  aquí  pongo  una  piedra  delante  de 

Josué: Es una Piedra Única en la cual hay 

siete  ojos;  y  Yo  mismo  esculpiré  su  ins-

cripción: Q

uitaré

 

el

 

pecado

 

de

 

la

 

tierra

 

en

 

un

 

día

. Oráculo de YHVH Sebaot.

1.17 El TM finaliza aquí el c.1  2.4 Es decir, sin muros.  2.6 Esto es, Babilonia.  2.6 Lit. como a cuatro.  2.8 13ª enmienda de los 

Soferim 

→ § 6 - § 19.  2.11 El verbo heb. aporta el matiz de anidar, reposar.  3.8 Es decir, símbolos proféticos


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Zacarías 5:11

959

10

 En aquel día, dice YHVH Sebaot, cada 

uno de vosotros convidará a su compañe-

ro, sentados debajo de su parra y debajo 

de su higuera.°

Quinta visión

4

Y  el  ángel  que  hablaba  conmigo  se 

volvió y me despertó, como cuando un 

hombre es despertado de su sueño.

2

 Y me dijo: ¿Qué ves? Respondí: He aquí, 

veo un candelabro de oro macizo, con su 

tazón° encima,° y sus siete lámparas so-

bre él, con siete canales° para cada una de 

las lámparas que tiene encima.

3

 Y junto a él dos olivos, uno a la derecha 

del tazón, y otro a su izquierda.

4

 Proseguí  y  dije  al  ángel  que  hablaba 

conmigo: ¿Qué es esto, señor mío?

5

 Y el ángel que hablaba conmigo respon-

dió y me dijo: ¿No sabes qué es esto? Dije: 

No, señor mío.

6

° Así  que  respondió  y  me  explicó:  Esto 

es la palabra de YHVH para Zorobabel: No 

con  ejército,  ni  con  fuerza,  sino  con  mi 

Espíritu, dice YHVH Sebaot.

7

 ¿Quién  eres  tú,  oh  gran  monte?  ¡Ante 

Zorobabel  serás  aplanado!  Él  sacará  la 

piedra  principal°  con  aclamaciones  de: 

¡Gracia, gracia a ella!

8

 Otra  vez  vino  a  mí  palabra  de  YHVH, 

diciendo:

9

 Las  manos  de  Zorobabel  han  puesto 

los cimientos de esta Casa, y sus manos 

la  concluirán.  Entonces  conocerás  que 

YHVH Sebaot me envió a vosotros.

10

 Porque ¿quién es el que desprecia el día 

de modestos comienzos?° ¡Se alegrarán y 

verán la plomada° en mano de Zorobabel! 

Aquéllas siete son los ojos de YHVH que 

recorren toda la tierra.

11

 Y  le  dije:  ¿Qué  simbolizan  estos  dos 

olivos,  a  la  derecha  y  a  la  izquierda  del 

candelabro?

12

 E insistí: ¿Qué simbolizan las dos ra-

mas de olivo que están al lado de los dos 

canales de oro, que vierten de sí un acei-

te dorado?

13

 Y  me  contestó  diciendo:  ¿Acaso  no 

sabes qué simbolizan estas cosas? Y dije: 

No, señor mío.

14

 Respondió: Estos son los dos ungidos° 

que están delante del Señor de toda la tie-

rra.

Sexta y séptima visión

5

Volví a alzar la vista, y al mirar, vi un 

rollo que volaba.

2

 Y  me  preguntó:  ¿Qué  ves?  Respondí: 

Veo un rollo que vuela, de veinte codos de 

largo y diez codos de ancho.

3

 Me dijo entonces: Esta es la maldición 

que sale por toda la faz de la tierra. Por-

que,  según  lo  escrito  en  un  lado,  todo 

aquel  que  hurta  será  excluido,  y  según 

lo escrito en el otro lado, todo aquel que 

jura falsamente será excluido.

4

 Yo  la  hago  salir,  dice  YHVH  Sebaot,  y 

entrará en la casa del ladrón, y en la casa 

del que jura en falso mi Nombre, y per-

manecerá en medio de su casa hasta que 

su maderaje y sus piedras se consuman.

El efa

5

 Y salió el ángel que hablaba conmigo, y 

me dijo: Alza ahora tus ojos, y mira qué 

es lo que sale.

6

 Y dije: ¿Qué es? Y respondió: Es un efa° 

que sale. Dijo además: Es el ojo° de ellos 

en toda la tierra.

7

 Y he aquí una tapa de plomo fue levan-

tada, y había una mujer sentada en medio 

del efa.

8

 Y dijo: Esta es la Maldad; y la arrojó den-

tro del efa, y echó la tapa de plomo sobre 

su abertura.

9

 Luego alcé mis ojos, y miré, y he aquí dos 

mujeres, y había viento en sus alas, porque 

tenían alas como alas de cigüeña, y alzaron 

el efa entre la tierra y los cielos.

10

 Y dije al ángel que hablaba conmigo: 

¿A dónde llevan el efa?

11

 Y me respondió: A edificarle templo en 

tierra de Sinar,° para que cuando esté lis-

to, sea colocado allí, en su lugar.

3.10 La vid y la higuera: Aquí, símbolo de prosperidad y paz de Israel.  4.2 Cuenco utilizado para el aceite que alimentaba el 

candelabro (Heb. menorah). 

4.2 Otras acepciones de la palabra son cabeza, inicio, cúspide.  4.2 Caños o bocas por donde se 

distribuye  el  aceite. 

4.6 Ver  secuencia  de  lectura  sugerida 

→ §163  4.7 Npiedra clave.  4.14 Heb. benê-hayyishar = hijos 

del óleo (nuevamente aparecido)

4.10 Ndía de las pequeñeces.  4.10 Lit. piedra.  5.6 Medida de capacidad para áridos: VUL 

lo interpreta como un recipiente grande. NUna medida que sale

5.6 Esto es, la iniquidad de ellos.  5.11 Esto es, Babilonia 

→Is.11.11. 


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Zacarías 6:1

960

Octava visión

6

Volví a alzar mis ojos y miré, y he aquí 

cuatro carros que salían de entre dos 

montes,  y  los  montes  eran  montes  de 

bronce.

2

 En el primer carro los caballos eran berme-

jos, en el segundo carro, caballos negros,

3

 en el tercer carro, caballos blancos, y en 

el cuarto carro eran caballos overos gri-

sáceos.

4

 Y  dije  al  ángel  que  hablaba  conmigo: 

Señor mío, ¿qué es esto?

5

 Y el ángel me respondió diciendo: Estos 

son los cuatro vientos de los cielos, que 

salen después de presentarse delante del 

Señor de toda la tierra.

6

 El  de  los  caballos  negros  sale  hacia  la 

tierra del Norte, y el de los blancos sale 

tras ellos, y el de los overos sale hacia la 

tierra del Sur.

7

 Y  los  overos  que  salían  estaban  impa-

cientes por recorrer la tierra. Y dijo: ¡Id, 

recorred la tierra! Y en efecto, ellos reco-

rrieron la tierra de un lado a otro.

8

 Luego  me  llamó  y  me  habló  diciendo: 

He  aquí,  los  que  van  hacia  la  tierra  del 

Norte han hecho reposar mi Espíritu° en 

la tierra del Norte.

Coronación de Josué

9

 Otra vez tuve revelación de YHVH, que 

decía:

10

 Toma ofrenda° de los del cautiverio: de 

Heldai, de Tobías y de Jedaías, que regre-

saron  de  Babilonia,  y  el  mismo  día  ve  y 

entra en casa de Josías ben Sofonías.

11

 Y toma la plata y el oro y haz una gran 

corona,° y la pondrás en la cabeza de Jo-

sué ben Josadac, el sumo sacerdote.

12

 Y hablarás de él, diciendo: Así ha ha-

blado YHVH Sebaot, diciendo: He aquí el 

varón  cuyo  nombre  es  el  Renuevo,  bro-

tará  de  sus  raíces  y  edificará  la  Casa  de 

YHVH.

13

 Sí, edificará la Casa de YHVH, y tendrá 

la gloria, y se sentará y reinará sobre su 

trono, siendo Sacerdote sobre su trono; y 

habrá consejo de paz entre ambos.°

14

 Y la gran corona le será por memorial 

a Helem, Tobías, Jedaías y Hen ben Sofo-

nías en la Casa de YHVH.

15

 Y los que están lejos vendrán y edifi-

carán la Casa de YHVH, y conoceréis que 

YHVH Sebaot me ha enviado a vosotros. 

Así  será,  si  diligentemente  obedecéis  la 

voz de YHVH vuestro Dios.

Acerca del ayuno

7

En el año cuarto del rey Darío, en el 

día  cuatro  del  mes  noveno,  Kislev,° 

aconteció  que  la  palabra  de  YHVH  llegó 

a Zacarías.

2

 Es de saber que el pueblo de Bet-’El ha-

bía enviado a Sarezer,° y al portavoz real° 

y a su gente a implorar el favor de YHVH,

3

 y a hablar a los sacerdotes que estaban 

en la Casa de YHVH Sebaot, y a los pro-

fetas, diciendo: ¿Debo seguir llorando en 

el mes quinto, separándome como lo hice 

tantos años?

4

 Entonces  llegó  a  mí  palabra  de  YHVH 

Sebaot, diciendo:

5

 Habla a todo el pueblo de esta tierra y a 

los  sacerdotes,  diciendo:  Cuando  ayuna-

bais y guardabais duelo en el mes quinto y 

en el séptimo, durante estos setenta años, 

¿ayunabais por mí? ¿Lo hacíais por mí?°

6

 Y cuando coméis y bebéis, ¿no sois vo-

sotros los que coméis y bebéis?

7

 ¿No son estas las palabras que proclamó 

YHVH por medio° de los primeros profe-

tas,  cuando  todavía  estaban  habitadas  y 

tranquilas  Jerusalem,  los  pueblos  veci-

nos, el Néguev y la Sefelá?°

8

 Otra vez fue hecha revelación de YHVH 

a Zacarías, que decía:

9

 Así dice YHVH Sebaot: Administrad jus-

ticia según la verdad, ejerced compasión 

y misericordia cada uno con su prójimo.

10

 No oprimáis a la viuda ni al huérfano, 

ni  al  extranjero  ni  al  pobre,  ni  meditéis 

en vuestro corazón el mal contra vuestro 

hermano.

11

 Pero no quisieron escuchar, antes vol-

vieron la espalda, y taparon sus oídos para 

no oír;

6.8 LXX: mi furor contra.  6.10 .ofrenda.  6.11 Lit. coronas.  6.13 Es decir, entre ambos oficios o ministerios.  7.1 Esto es, 

Noviembre-Diciembre  del  518  a.C. 

7.2  NCuando  fue  enviado  a  la  Casa  de  Dios,  Saraser,  con  Regem  Melec  y  sus  hom-

bres, a implorar el favor de YHVH

7.2 portavoz real. Heb. regem-melec (pero también puede usarse como nombre propio). 

7.5 N¿ayuné Yo también?  7.7 Lit. por mano de.  7.7 Nombres propios que indican el sur y la llanura.


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Zacarías 8:23

961

12

 y  pusieron  su  corazón  como  el  dia-

mante para no escuchar la enseñanza ni 

las  palabras  que  YHVH  Sebaot  enviaba 

por su Espíritu por medio de los antiguos 

profetas. Por tanto, una gran indignación 

sobrevino de parte de YHVH Sebaot.

13

 Conforme Él llamaba, así no escucha-

ban; entonces ellos llamaron, y Yo no es-

cuché, dice YHVH Sebaot,

14

 sino que los dispersé con un torbellino 

por todas las naciones que no conocían. Y 

esta tierra fue desolada tras ellos, sin que 

nadie la transitara, pues convirtieron una 

tierra deliciosa en desolación.

Restauración de Jerusalem

8

De  nuevo  fue  hecha  revelación  de 

YHVH Sebaot, que decía:

2

 Así dice YHVH Sebaot: ¡He celado a Sión 

apasionadamente! ¡Siento por ella un celo 

arrebatador!

3

 Así dice YHVH: Restauraré a Sión, y ha-

bitaré en medio de Jerusalem. Jerusalem 

será llamada Ciudad de Verdad, y el mon-

te de YHVH Sebaot, Monte de Santidad.

4

 Así dice YHVH Sebaot: Seguirán sentán-

dose ancianos y ancianas en las plazas de 

Jerusalem, y cada uno estará con su bas-

tón en la mano por sus muchos días.

5

 Y las calles de la ciudad estarán llenas de 

niños y niñas, que jugarán en sus plazas.

6

 Así dice YHVH Sebaot: Aunque en aque-

llos días parezca cosa imposible a ojos del 

remanente de este pueblo, ¿parecerá tam-

bién imposible ante mis ojos? dice YHVH 

Sebaot.

7

 Así dice YHVH Sebaot: He aquí Yo salva-

ré a mi pueblo de la tierra del Oriente, y 

de la tierra donde se pone el sol,

8

 y los conduciré para que habiten dentro 

de Jerusalem, y me serán por pueblo, y Yo 

les seré por Dios, en verdad y en justicia.

9

 Así  dice  YHVH  Sebaot:  Esfuércense 

vuestras manos, los que en estos días oís 

estas  palabras  de  boca  de  los  profetas, 

desde el día en que fueron puestos los ci-

mientos a la Casa de YHVH Sebaot para 

reedificarla.

10

 Porque  antes  de  aquellos  días  no  ha-

bía  paga  para  el  hombre,  ni  había  paga 

para  la  bestia,  y  no  había  seguridad  de 

movimiento  a  causa  de  las  rivalidades, 

pues Yo enfrentaba a unos contra otros.

11

 Pero ahora no trataré al remanente de 

este pueblo como en los días pasados, dice 

YHVH Sebaot.

12

 Porque habrá una simiente de paz:° La 

vid  dará  su  fruto  y  la  tierra  su  cosecha, 

y los cielos darán su rocío, y haré que el 

remanente del pueblo posea todo esto.

13

 Y así como fuisteis maldición entre las 

naciones, oh casa de Judá y casa de Israel, 

así os salvaré para que seáis de bendición. 

¡No temáis y esforzad vuestras manos!°

14

 Porque  así  dice  YHVH  Sebaot:  Tal 

como  determiné  haceros  daño  cuando 

vuestros padres me provocaron a ira, dice 

YHVH Sebaot, y no cambié de parecer,

15

 así me he propuesto en estos días vol-

ver a hacer bien a Jerusalem y a la casa de 

Judá. ¡No temáis!

16

 Estas  son  las  cosas  que  debéis  hacer: 

Hablad verdad cada cual con su prójimo. 

Juzgad en vuestras puertas según la ver-

dad y lo conducente a la paz.

17

 Ninguno de vosotros piense mal en su 

corazón contra su prójimo, y no améis el 

juramento falso, porque todas estas cosas 

son las que aborrezco, dice YHVH.

18

 Y  llegó  la  palabra  de  YHVH  Sebaot, 

para que dijera:

19

 Así dice YHVH Sebaot: Los ayunos del 

mes cuarto, del quinto, del séptimo y del 

décimo, se convertirán en regocijo y ale-

gría, y en solemnidades gratas para la casa 

de Judá. Amad pues la verdad y la paz.

20

 Así  dice  YHVH  Sebaot:  Aún  vendrán 

pueblos  y  habitantes  de  muchas  ciuda-

des,

21

 y  los  habitantes  de  una  irán  a  otra, 

diciendo:  ¡Vamos,  vayamos  a  aplacar  a 

YHVH  y  a  buscar  a  YHVH  Sebaot!  ¡Yo 

también iré!

22

 Y vendrán muchos pueblos y naciones 

poderosas a visitar a YHVH Sebaot en Je-

rusalem, y a aplacar a YHVH.

23

 Así dice YHVH Sebaot: En aquellos días 

acontecerá que diez hombres de todas las 

lenguas  de  las  naciones  asirán  fuerte-

mente por la orla° a un judío, diciendo: 

¡Dejadnos ir con vosotros, porque hemos 

comprendido que Dios está con vosotros!

8.12 LXX: revelaré la paz.  8.13 Es decir, cobrad ánimo, sed valientes.  8.23 Es decir, por la orilla del manto


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Zacarías 9:1

962

Contra las naciones

9

  La carga° de YHVH está en la tierra 

   de Hadrac,

Y llega a Damasco para descansar:

De YHVH son las ciudades de 

Aram,°

Así como todas las tribus de Israel.

2

    También la vecina Hamat, y Tiro y 

Sidón, las muy sabias:

3

    Tiro se edificó una fortaleza, 

amontonó plata como polvo,

Oro como lodo callejero;

4

    Pero Adonay la desposeerá, arrojará 

al mar sus riquezas,

Y ella será pasto del fuego.

5

    Lo verá Ascalón y temblará,

Gaza estará angustiada,

También Ecrón, pues su esperanza 

fue avergonzada.

De Gaza perecerá el rey, Ascalón no 

será más habitada,

6

    Y los bastardos° se asentarán en 

Asdod.

Así destruiré la soberbia de los 

filisteos.

7

    Les arrancará de la boca sus 

libaciones° de sangre,

Y sus abominaciones de entre los 

dientes,

Pero un resto de ellos será de 

nuestro Dios,

Y vendrá a ser como un caudillo° en 

Judá,

Y Ecrón será como el jebuseo.

8

    Acamparé° como guarnición en 

torno a mi Casa,

Contra el que va y contra el que 

viene,

Y el tirano no volverá a pasar sobre 

ellos,

Porque ahora Yo vigilo con mis ojos.

El Mesías

9

    ¡Alégrate mucho, capital de Sión!

¡Da voces de júbilo, ciudad de 

Jerusalem!

Mira a tu Rey llegando, justo y 

victorioso,°

Humilde, montado en un asno, en 

una cría de asna.°

10

    Haré cortar° el carro de en medio de 

Efraín,

Y la cabalgadura dentro de 

Jerusalem,

El arco de guerra será quebrado,

Porque Él hablará paz a las 

naciones;

Su imperio será de mar a mar

Y desde el río hasta los confines de 

la tierra.

11

    También en cuanto a ti, en virtud de 

la sangre de tu pacto,

Haré soltar a tus cautivos de la 

cisterna sin agua.

12

    ¡Oh cautivos esperanzados, volved a 

la plaza fuerte!

Hoy te envío un segundo° 

mensajero.

13

    Tensaré a Judá como un arco, y lo 

cargaré con Efraín,

Y haré de ti, oh Sión, una espada de 

valiente,

Incitaré a tus hijos contra los de 

Grecia,

14

    YHVH será visto capitaneándolos, y 

sus saetas saliendo como rayos.

YHVH Adonay hará sonar el shofar,°

Y avanzará entre los huracanes del 

Sur.

15

    YHVH Sebaot será escudo sobre ellos,

Devorarán y aplastarán a los 

honderos,°

Beberán y alborotarán° como por 

causa del vino,

Y se llenarán como los tazones° o 

como los salientes del altar.°

16

    En aquel día YHVH su Dios los 

salvará,

Como a rebaño de su pueblo,

Y serán como piedras de una 

diadema,

Resplandeciendo sobre su tierra.

17

    ¡Cuán grande será su felicidad y 

cuán grande su hermosura!

El trigo multiplicará a los jóvenes y 

el mosto a las doncellas.

9.1 Esto es, profecía conminatoria.  9.1 Na YHVH deben mirar los ojos del hombre.  9.6 Es decir, un mestizaje.  9.7 .libacio-

nes

9.7 Esto es, una tribu.  9.8 acamparé. Equivale a apostar tropas.  9.9 victorioso. Expresa también la idea de Salvador

9.9 Lit. asnas.  9.10 LXX: destruiré, aniquilaré.  9.12 El primero (prob.) en Is.40.3-5.  9.14 Cuerno de carnero utilizado a modo 

de trompeta. 

9.15 Lit. las piedras de las hondas.  9.15 LXX: y beberán su sangre como si fuera vino.  9.15 Es decir, vaso de 

libación

9.15 LXX: copa del altar.


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Zacarías 11:6

963

Restauración de Judá y Efraín

10

¡Implorad de YHVH lluvias 

tempranas y tardías!°

YHVH, que envía los relámpagos y 

los aguaceros,

Dará el pan al hombre y la hierba al 

campo.

2

    En cambio los terafines° prometen 

en vano,

Los adivinos ven vanidades,

Anuncian sueños vanos, y 

vanamente consuelan.

Por eso vagan errantes° como 

ovejas,

Humillados, porque no tienen pastor.

3

    Mi ira se ha encendido contra los 

pastores,

Tomaré cuentas a los machos 

cabríos,°

YHVH Sebaot visitará° a su rebaño, 

la casa de Judá,

Y hará de ella su corcel real en el 

combate.

4

    De ella saldrá la piedra angular,

De ella saldrá la estaca,°

De ella saldrá el arco guerrero,

Y de ella saldrá todo caudillo.

5

    Serán como valientes que pisan el 

lodo callejero en la batalla,

Combatirán, porque YHVH estará 

con ellos.

Y los jinetes serán derrotados.

6

    Haré aguerrida a la casa de Judá,

Daré la victoria a la casa de José,

Los haré regresar, pues les tengo 

compasión,

Y serán como si no los hubiera 

rechazado,

Por cuanto Yo soy YHVH su Dios, y 

los escucharé.

7

    Efraín será como un valiente,

Su corazón se alegrará como por el 

vino.

Sus hijos lo verán° y se alegrarán, se 

sentirán gozosos en YHVH.

8

    Silbaré para reunirlos, porque los 

habré redimido,

Y se multiplicarán como antes.

9

    Aunque esparcidos entre las 

naciones,

En lejanos países se acordarán 

de mí,

Criarán allí a sus hijos, pero 

regresarán.

10

    Los haré volver de la tierra de 

Egipto, los reuniré en Asiria,

Y los traeré a la tierra de Galaad y al 

Líbano,

Pero el sitio no les bastará.

11

    Entonces atravesarán un mar de 

angustia,°

Golpeará el mar agitado,

Harán secar hasta el fondo del Nilo,°

Hará que la soberbia de Asiria sea 

abatida.

Y arrancará el cetro de Egipto,

12

    Con la fuerza de YHVH avanzarán 

en su Nombre.

Oráculo de YHVH.

Alegoría

11

¡Abre tus puertas, oh Líbano,

Y consuma el fuego tus cedros!

2

    ¡Llora,° oh ciprés, que el cedro ha 

caído,

Y los majestuosos han sido talados!

¡Lamentaos, oh robles de Basán, 

porque el denso bosque ha caído!

3

    Oíd: gimen los pastores,

Porque su magnificencia° quedó 

arruinada.

Oíd: rugen los leoncillos,

Porque la gloria° del Jordán quedó 

asolada.

Los dos cayados

4

 Así  dice  YHVH  mi  Dios:  Apacienta  las 

ovejas° de la matanza,

5

 a las cuales sus compradores degüellan 

sin sentirse culpables, y el que las vende 

piensa: ¡Bendito sea YHVH; me estoy en-

riqueciendo!, y ni sus propios pastores se 

compadecen de ellas.

6

 Por  tanto  Yo  tampoco  me  compadece-

ré más de los habitantes de la tierra, dice 

YHVH.  He  aquí  Yo  entrego  al  hombre,° 

10.1 O lluvia primaveral.  10.2 Esto es, los ídolos.  10.2 Esto es, los hijos de Israel.  10.3 Esto es, los dirigentes del pueblo 

de  Israel

10.3  Es  decir,  se  acordará,  se  interesará.  10.4  Esto  es,  el  sostén  o  patriarca.  10.7 También  significa  compren-

der, conocer, experimentar

10.11 NY la tribulación pasará por el mar.  10.11 También río o corriente.  11.2 O ulula, aúlla

11.3 Esto es, sus pastizales.  11.3 Esto es, la espesura.  11.4 Significa también rebaño, ganado menor.  11.6 Heb. Adam. Aquí 

puede tomarse como símbolo de la humanidad. Npersonas o gentes


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Zacarías 11:7

964

cada  cual  en  mano  de  su  prójimo°  y  en 

mano de su rey. Ellos asolarán esta tierra, 

y Yo no los libraré de sus manos.

7

 Apacenté pues a las ovejas de la matan-

za,  especialmente  a  las  más  pobres°  del 

rebaño.  Y  tomé  para  mí  dos  cayados:  a 

uno llamé Gracia,° y al otro llamé Víncu-

lo,° y seguí engordando el rebaño.

8

 Pero  hice  cortar  a  tres  pastores  en  un 

mes, porque yo me hastié de ellos como 

ellos se habían hastiado de mí.

9

 Les  dije:  No  pastorearé  más  con  voso-

tros.  Si  alguna  muere,  que  se  muera;  si 

alguna se pierde, que se pierda, y las que 

queden, ¡que se coman unas a otras!

10

 Y tomé mi cayado Gracia y lo quebré, 

en señal de que anulaba mi pacto con to-

das las tribus.

11

 Aquel día fue anulado; y los tratantes 

de las ovejas que me vigilaban, conocie-

ron que era palabra de YHVH.

12

 Y les dije: Si os parece bien,° dadme mi 

salario, y si no, dejadlo. Y pesaron por mi 

paga treinta piezas de plata.°

13

 Y me dijo YHVH: ¡Échalo al tesoro!° 

¡Valioso precio con que me han precia-

do!  Y  tomé  las  treinta  piezas  de  plata, 

y  las  eché  en  el  tesoro  de  la  Casa  de 

YHVH.

14

 Luego quebré mi otro cayado, Vínculo, 

para que se rompiera la unión entre Judá 

e Israel.

15

 Y me dijo YHVH: Procúrate los aperos 

de un pastor inútil,

16

 porque, he aquí, Yo levanto en la tie-

rra a un pastor que no se ocupará de las 

perdidas,  ni  buscará  a  la  descarriada,  ni 

curará a la perniquebrada, ni mantendrá 

a la que está en pie,° sino que se comerá 

la carne de la robusta y le arrancará las 

pezuñas.

17

°    ¡Ay del pastor inútil, que abandona 

el rebaño!

¡Caiga un puñal contra su diestra y 

contra su ojo derecho!

¡Séquese su brazo por completo,

Y apáguese para siempre su ojo 

derecho!

El día del Señor

12

Carga  de  YHVH  sobre  Israel.  Así 

dice YHVH, quien extendió los cie-

los, echó los cimientos de la tierra, y for-

mó el espíritu del hombre en su interior:

2

 He  aquí  Yo  convierto  a  Jerusalem  en 

copa embriagadora para todas las nacio-

nes en derredor, pero cuando haya asedio 

contra Jerusalem, también lo habrá con-

tra Judá.

3

 Aquel  día  Yo  pondré  a  Jerusalem  por 

piedra pesada° a todos los pueblos. Todos 

los que intenten cargarla serán despeda-

zados, aunque se junten contra ella todas 

las naciones de la tierra.

4

 Aquel día, dice YHVH, heriré a todo ca-

ballo con pánico y a todo jinete con locu-

ra. Pero abriré mis ojos sobre la casa de 

Judá, mientras hiero con ceguera a todo 

caballo de los gentiles.

5

 Entonces los caudillos de Judá dirán en 

su  corazón:  Nuestra°  fuerza  son  los  ha-

bitantes  de  Jerusalem,  gracias  a  YHVH 

Sebaot, su Dios.

6

 Aquel día pondré a los caudillos de Judá 

como brasero encendido° entre la leña y 

como  antorcha  de  fuego  entre  las  gavi-

llas, pues devorarán a diestra y a siniestra 

a todos los pueblos vecinos; y Jerusalem 

será otra vez habitada en su mismo asien-

to: en Jerusalem.

7

 Pero  YHVH  salvará  primeramente  las 

tiendas de Judá, para que la altivez de la 

casa de David y de los habitantes de Jeru-

salem no se exalte sobre Judá.

8

 Aquel día YHVH será escudo al habitan-

te de Jerusalem; aquel día el más débil de 

entre ellos será como David, y la casa de 

David será como ’Elohim: como el ángel 

de YHVH delante de ellos.

9

 Aquel día me dispondré a destruir a to-

das las naciones que vengan contra Jeru-

salem.

10

 Y derramaré sobre la casa de David y 

sobre  los  habitantes  de  Jerusalem  espí-

ritu  de  gracia  y  de  oración,  y  me  mira-

rán a mí, a quien traspasaron, y llorarán 

como se llora por causa del unigénito, y 

11.6 Nsu compañero o su pastor.  11.7 LXX: los negociantes o tratantes.  11.7 También favor, agrado, hermosura.  11.7 Tam-

bién Atadura, Concordia

11.12 Lit. Si es bueno ante vuestros ojos.  11.12 plata. Precio de un esclavo.  11.13 Ntesorero. Es 

decir, para el orfebre del templo

11.16 Nni mantendrá a la sana; ni alimentará a las fuertes.  11.17 Se sugiere leer a continua-

ción 13.7-9 

→§163  12.3 Npiedra que se levanta.  12.5 Lit. Mi fuerza.  12.6 Lit. recipiente de fuego.


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Zacarías 14:5

965

se  afligirán  por  Él  como  quien  se  aflige 

por el primogénito.

11

 Aquel día habrá gran llanto en Jerusa-

lem, como el llanto de Hadad-rimón° en 

el valle de Meguido.

12

 Y la tierra se lamentará, cada familia° 

aparte:

La familia de la casa de David por 

separado,

Y sus mujeres aparte;

La familia de la casa de Natán por 

separado,

Y sus mujeres aparte;

13

    La familia de la casa de Leví por 

separado,

Y sus mujeres aparte;

La familia de Simei por separado,

Y sus mujeres aparte.

14

    Todas las familias restantes,

Familia por familia, por separado, y 

sus mujeres aparte.

El Pastor herido

13

Aquel  día  habrá  un  manantial 

abierto para la casa de David y para 

los habitantes de Jerusalem, para la puri-

ficación y las aspersiones.°

2

 Aquel  día,  dice  YHVH  Sebaot,  haré 

cortar  de  esta  tierra  los  nombres  de  los 

ídolos, y no serán invocados más, y haré 

desaparecer de esta tierra a sus profetas y 

al espíritu que los contamina.

3

 Y sucederá que si alguno vuelve a profe-

tizar, los mismos padres que lo engendra-

ron le dirán: ¡No vivirás, porque hablaste 

falsedad en nombre de YHVH! Y su mis-

mo padre y su misma madre lo traspasa-

rán cuando profetice.

4

 Aquel día esos profetas se avergonzarán 

de sus visiones y profecías, y nunca más 

se vestirán de mantos vellosos para enga-

ñar.

5

 Dirá: No soy profeta, sino labrador de la 

tierra, pues he estado en el campo desde 

mi juventud.°

6

 Y le preguntarán: ¿Y qué heridas son és-

tas  en  tus  manos?  Y  él  responderá:  Con 

ellas  fui  herido  en  casa  de  los  que  me 

aman.

7

    °¡Oh espada, levántate contra mi 

pastor,

Y contra el hombre compañero mío!, 

dice YHVH Sebaot.

¡Hiere al pastor, y sean dispersadas 

las ovejas,

Y volveré mi mano contra los 

pequeñitos!

8

    Y acontecerá en toda la tierra, dice 

YHVH,

Que las dos terceras partes serán 

cortadas de ella y se perderán,

Pero la tercera quedará en ella.

9

    Y a esa tercera parte la haré pasar 

por el fuego,

Y los refinaré como se refina la plata,

Y los probaré como se prueba el oro.

Invocará mi Nombre, y Yo le 

responderé,

Y diré: Es mi pueblo,

Y él dirá: YHVH es mi Dios.

Tiempo del fin

14

He  aquí,  el  día  de  YHVH  viene,  y 

en medio de ti serán repartidos tus 

despojos.

2

 Porque  Yo  reuniré  a  todas  las  nacio-

nes  para  combatir  contra  Jerusalem;  y 

la  ciudad  será  conquistada,  y  las  casas 

serán  saqueadas  y  violadas  las  mujeres, 

y la mitad del pueblo irá en cautiverio, 

pero el resto del pueblo no será cortado 

de la ciudad.

3

 Después YHVH saldrá y combatirá con-

tra aquellas naciones, como cuando com-

bate en el día de la batalla.

4

 Aquel  día  sus  pies  se  posarán  sobre  el 

monte de los Olivos, que está frente a Je-

rusalem, al oriente, y el monte de los Oli-

vos será partido por el medio, quedando 

un gran valle del levante al poniente: la 

mitad del monte se apartará hacia el nor-

te, y la otra mitad hacia el sur.

5

 Y el valle de Hinom quedará bloqueado, 

porque el valle entre los dos montes lle-

gará hasta Azal, y vosotros huiréis como 

cuando el terremoto en tiempos de Uzías, 

rey de Judá, y vendrá YHVH mi Dios con 

todos sus santos.°

12.11 

→2 Cr.35.23-25.  12.12 Es decir, linaje, descendientes.  13.1 Es decir, para lavar el pecado y la inmundicia.  13.5 El TM 

no es muy claro aquí. Nfui entregado a un hombre desde mi juventud. Nun labrador me asoló desde mi mocedad

13.7 La 

porción 13.7-9 deben leerse después de 11.17. 

14.5 LXX: con Él


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Zacarías 14:6

966

6

 Y  acontecerá  que  en  ese  día  no  habrá 

luz, clara ni oscura.°

7

 Será  un  día,  el  cual  es  conocido  por 

YHVH, que no será ni día ni noche, sino 

que al anochecer seguirá habiendo luz.

8

 Aquel día acontecerá también que de Je-

rusalem saldrán aguas vivas: la mitad de 

ellas hacia el mar Oriental° y la otra mi-

tad hacia el mar Occidental,° en verano y 

en invierno.

9

 Y  YHVH  será  Rey  sobre  toda  la  tierra. 

En  aquel  día  YHVH  será  uno,  y  uno  su 

Nombre.

10

 Todo  el  país  se  allanará,  desde  Geba 

hasta  Rimón  Néguev.  Jerusalem  será 

enaltecida y habitada en su lugar, desde la 

Puerta de Benjamín hasta la Puerta An-

tigua  y  la  Puerta  del  Ángulo,  y  desde  la 

Torre de Hananeel hasta el Lagar del Rey.

11

 Y habitarán en ella, y nunca más será 

anatema; sino que Jerusalem será habita-

da confiadamente.

12

 Y esta será la plaga con que YHVH he-

rirá a todos los pueblos que combatieron 

contra Jerusalem: la carne de ellos se co-

rromperá cuando aún estén con vida, y se 

consumirán en las cuencas sus ojos y la 

lengua se les deshará en su boca.

13

 Y en aquel día cundirá entre ellos un 

pánico tal de parte YHVH, que cuando al-

guno agarre la mano de su camarada, el 

otro volverá su mano contra él.

14

 Judá también peleará en Jerusalem, y 

serán  reunidas  las  riquezas  de  todas  las 

naciones vecinas: oro y plata, e innume-

rables vestidos.

15

 Los caballos, mulos, camellos, asnos y 

todas las bestias que haya en los campa-

mentos sufrirán el mismo castigo.

16

 Y sucederá que todos los que sobrevi-

van de las naciones que vinieron contra 

Jerusalem, subirán de año en año a pos-

trarse ante el Rey, ante YHVH Sebaot, y a 

celebrar la solemnidad de los Tabernácu-

los.

17

 Y acontecerá que los de las familias de 

la tierra que no suban a Jerusalem para 

postrarse  ante  el  Rey  YHVH  Sebaot,  no 

vendrá lluvia sobre ellos.

18

 Y si la familia de Egipto no sube y no 

se presenta, tampoco la habrá sobre ellos; 

vendrá  la  plaga  con  que  YHVH  herirá  a 

las  naciones  que  no  suban  a  celebrar  la 

solemnidad de los Tabernáculos.

19

 Tal será el castigo° de Egipto y el cas-

tigo de todas las naciones que no suban a 

celebrar la solemnidad de los Tabernácu-

los.

20

 En  aquel  día,  aun  las  campanillas  de 

los  caballos  llevarán  grabado:  S

antidad

 

a

 

YHVH, y las ollas en la Casa de YHVH se-

rán como los tazones delante del Altar.

21

 Toda olla en Jerusalem y en Judá es-

tará consagrada a YHVH Sebaot, y todos 

los  que  sacrifiquen,  acudirán,  las  to-

marán y cocinarán en ellas. Y aquel día 

no habrá más mercaderes en la Casa de 

YHVH Sebaot.

14.6 Nno habrá luz, sino frío y helada.  14.8 Esto es, el Mar Muerto.  14.8 Esto es, el Mar Mediterráneo.  14.19 Lit. pecado


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1

Carga° del oráculo de YHVH para Is-

rael, por mano de Malaquías.°

2

 Os  he  amado,  dice  YHVH.  Pero  voso-

tros decís: ¿En qué nos has amado? Dice 

YHVH:  ¿No  es  Esaú  hermano  de  Jacob? 

Pero a Jacob amé

3

 y a Esaú aborrecí. Sus montes destiné a 

la desolación y su herencia a los chacales 

del desierto.

4

 Aunque Edom diga: Hemos sido arrui-

nados,  pero  volveremos  a  edificar  las 

ruinas, así dice YHVH Sebaot:° Ellos edi-

ficarán, pero Yo destruiré, y se los llamará 

Tierra Perversa, Pueblo de la Ira Perenne 

de YHVH.

5

 Y vuestros mismos ojos lo verán, y di-

réis:  ¡Grande  es  YHVH  más  allá  de  los 

confines de Israel!

6

 El hijo honra al padre, y el siervo a su 

señor. Si, pues, Yo soy Padre, ¿dónde está 

mi honra? Y si soy Señor, ¿dónde está el 

temor que se me debe? dice YHVH Sebaot 

a vosotros, oh sacerdotes que despreciáis 

mi Nombre. Y decís: ¿En qué hemos des-

preciado tu Nombre?

7

 En que ofrecéis sobre mi altar comida 

mancillada.  Y  diréis:  ¿En  qué  la  hemos 

mancillado?  Considerando  la  mesa  de 

YHVH despreciable;

8

 pues  cuando  ofrecéis  lo  ciego°  para  el 

sacrificio, ¿no está mal? Y cuando ofrecéis 

lo cojo o lo enfermo, ¿no está mal? ¡Pre-

séntalo a tu príncipe! ¿Acaso se compla-

cerá  en  ti  o  le  serás  acepto?  dice  YHVH 

Sebaot.

9

 ¡Ahora pues, implorad el favor de ’El,° 

para  que  tenga  compasión  de  nosotros! 

Pues  si  de  vuestra  mano  procede  todo 

esto,  ¿cómo  lo  habréis  de  aplacar?,  dice 

YHVH Sebaot.

10

 ¡Oh si hubiera entre vosotros quien os 

cerrara las puertas para que no encendie-

rais en vano mi altar! ¡No tengo compla-

cencia en vosotros, dice YHVH Sebaot, ni 

aceptaré ofrenda de vuestras manos!

11

 Desde el levante del sol hasta su ocaso, 

mi Nombre es grande entre las naciones, 

y en todo lugar se ofrecerá a mi Nombre 

sacrificio  de  incienso  y  ofrenda  limpia, 

porque  mi  Nombre  es  grande  entre  las 

naciones, dice YHVH Sebaot.

12

 Pero vosotros lo profanáis cuando de-

cís: La mesa de YHVH es impura, y su fru-

to, su alimento, no vale la pena,

13

 y  exclamáis:  ¡Cuán  tedioso  es  esto!°  y 

me°  tratáis  desdeñosamente,  dice  YHVH 

Sebaot.  Me  traéis  lo  robado,  lo  cojo  y  lo 

enfermo para presentar la ofrenda, ¿y la he 

de aceptar de vuestra mano? dice YHVH.

14

 ¡Maldito el fraudulento, que teniendo 

macho robusto en su rebaño sacrifica con 

juramento a YHVH lo dañado! Porque Yo 

soy el gran Rey, dice YHVH Sebaot, y mi 

Nombre es temible entre las naciones.

Contra los sacerdotes

2

Ahora, pues, oh sacerdotes, para voso-

tros es este mandamiento.

2

 Si no escucháis, ni hacéis caso de ello 

para dar gloria a mi Nombre, dice YHVH 

Sebaot,  haré  recaer  la  maldición  sobre 

El Dios de Israel

1.1  También  significa  profecía.  1.1  Significa  mi  ángel,  mi  mensajero.  1.4  Esto  es,  de  los  ejércitos  o  de  las  huestes

1.8 Se refiere al animal que ha de ser sacrificado.  1.9 Contracción de ’Elohim 

→ § 2.  1.13 Es decir, el servicio del sacerdocio

1.13 14ª enmienda de los Soferim 

→ § 6 § 20.


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Malaquías 2:3

968

vosotros,  y  maldeciré  vuestras  bendicio-

nes.  Sí,  las  maldeciré  porque  no  hacéis 

caso de mi mandato.

3

 He aquí que arrancaré la simiente° para 

vuestro  mal,  y  esparciré  estiércol  sobre 

vuestros  rostros,  el  estiércol  de  las  víc-

timas de vuestras solemnidades, y seréis 

arrastrados con él.

4

 Y  sabréis  que  Yo  os  envié  este  manda-

miento, para que mi pacto pueda ser con 

Leví, dice YHVH Sebaot.

5

 Mi pacto con él era vida y paz. Se lo di 

por su temor con que me temió, y porque 

guardaba reverencia ante mi Nombre.

6

 La Ley de verdad estaba en su boca, y no 

había injusticia en sus labios. En paz y en 

rectitud anduvo conmigo, e hizo volver a 

muchos de su iniquidad.

7

 Pues  los  labios  del  sacerdote,  deben 

guardar la sabiduría, porque la Ley° se ha 

de buscar de su boca, pues él es mensaje-

ro de YHVH Sebaot.

8

 Pero vosotros os habéis apartado del ca-

mino, servido de tropiezo a muchos en la 

Ley, y habéis corrompido el pacto de Leví, 

dice YHVH Sebaot.

9

 Por  tanto,  Yo  también  os  haré  despre-

ciables  y  viles  ante  todo  el  pueblo,  por 

cuanto vosotros no habéis guardado mis 

caminos,  y  hacéis  acepción  de  personas 

en cuanto a la Ley.

10

 ¿No tenemos todos un mismo Padre? 

¿No nos ha creado un mismo Dios?° ¿Por 

qué,  pues,  nos  portamos  deslealmente 

uno contra otro,° profanando el pacto de 

nuestros ancestros?

11

 Judá ha sido infiel,° y se ha cometido 

abominación  en  Israel  y  en  Jerusalem, 

porque Judá ha profanado el Santuario de 

YHVH, que Él ama, y se ha casado con la 

hija de un dios extraño.

12

 ¡Excluya YHVH de las tiendas de Jacob, 

de los que presentan ofrenda ante YHVH 

Sebaot, a quien tal hace, tanto al maestro 

como al discípulo!

13

 Y  además  hacéis  esto:  cubrís  el  altar 

de  YHVH  con  lágrimas,  llantos  y  gemi-

dos, porque Él no se vuelve ya más hacia 

vuestra ofrenda, ni la acepta con agrado 

de vuestra mano.

14

 Y,  con  todo,  preguntáis:  ¿Por  qué? 

Porque  YHVH  ha  sido  testigo  entre  ti  y 

la mujer de tu juventud, a la que has sido 

infiel, siendo ella tu compañera y mujer 

de tu pacto.

15

 ¿No  es  Uno  el  que  hizo  la  carne  y  el 

espíritu en ella? ¿Y qué demanda ese Uno? 

¡Un linaje consagrado a ’Elohim! Guardad 

pues vuestro espíritu, y no seáis desleales 

con la mujer de vuestra juventud.°

16

 Porque el que aborrece y repudia, dice 

YHVH  Dios  de  Israel,  cubre  su  vestidura 

con violencia, dice YHVH Sebaot. Guardad 

pues vuestro espíritu, y no seáis infieles.

El día del juicio

17

 Habéis hastiado a YHVH con vuestras 

palabras. Y decís: ¿En qué lo hemos has-

tiado? En que decís: Todo el que hace mal 

agrada a YHVH, y de los tales Él se agrada, 

y: ¿Dónde está el Dios justo?

3

He  aquí,  Yo  envío  mi  mensajero,  el 

cual  preparará  el  camino  delante  de 

mí. Y vendrá súbitamente a su Casa el Se-

ñor a quien vosotros buscáis; el ángel° del 

pacto, a quien vosotros deseáis: He aquí 

viene, dice YHVH Sebaot.

2

 ¿Y quién soportará el día de su venida? 

¿Y quién permanecerá cuando Él se ma-

nifieste? Porque Él es fuego de fundidor, 

y lejía de lavadores.

3

 Y  se  sentará  para  refinar  y  purificar  la 

plata, y purificará a los hijos de Leví, y los 

acrisolará como el oro y la plata, para que 

puedan presentar a YHVH holocaustos de 

justicia.

4

 Entonces  serán  gratas  a  YHVH  las 

ofrendas  de  Judá  y  de  Jerusalem,  como 

en los días primeros y como en los años 

antiguos.

5

 Vendré a vosotros para celebrar juicio, y 

seré testigo exacto contra los hechiceros y 

los adúlteros, contra quienes juran en fal-

so, contra quienes defraudan el salario del 

jornalero, de la viuda y del huérfano, y con-

tra los que hacen tropezar al extranjero, no 

teniendo temor de mí, dice YHVH Sebaot.

6

 Porque Yo, YHVH, no cambio. Por eso 

vosotros,  oh  hijos  de  Jacob,  no  habéis 

sido consumidos.

2.3 Nos reprobaré la semilla. Puede referirse tanto a los cultivos como a los descendientes de los sacerdotes.  2.7 Heb. Torah 

se traduce también por instrucción

2.10 Lit. cada uno a su hermano.  2.11 Nha traicionado.  2.15 Texto de difícil interpretación 

y con diversas traducciones. 

3.1 

→Jn.2.13-17.


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Malaquías 4:6

969

7

 Desde los días de vuestros padres os ha-

béis  apartado  de  mis  estatutos,  y  no  los 

habéis guardado. ¡Volveos a mí, y Yo me 

volveré  a  vosotros!,  dice  YHVH  Sebaot. 

Pero vosotros decís: ¿En qué nos hemos 

de volver?

8

 ¿Robará el hombre a ’Elohim? ¡Pues vo-

sotros me habéis robado! Pero decís: ¿En 

qué te hemos robado? ¡En los diezmos y 

en las ofrendas!°

9

 ¡Me  habéis  maldecido  con  maldición,° 

porque  vosotros,  la  nación  toda,  me  es-

táis robando!

10

 ¡Traed todos los diezmos al alfolí y haya 

alimento° en mi Casa! Y probadme luego 

en esto, dice YHVH Sebaot, si no os abro las 

ventanas de los cielos y derramo sobre vo-

sotros bendición hasta que sobreabunde.

11

 Os alejaré al devorador,° y no os des-

truirá el fruto de la tierra ni os hará esté-

ril la vid en el campo, dice YHVH Sebaot.

12

 Y todas las naciones os llamarán bien-

aventurados, porque seréis una tierra de-

leitosa, dice YHVH Sebaot.

13

 ¡Duras han sido vuestras palabras con-

tra  mí!  dice  YHVH.  Sin  embargo,  decís: 

¿Qué hemos hablado contra ti?

14

 Habéis dicho: Vano es servir a ’Elohim. 

¿Qué provecho tiene el guardar su man-

damiento, y que andemos afligidos delan-

te de YHVH Sebaot?

15

 Por  eso  ahora  nosotros  felicitamos  a 

los soberbios, y decimos que los hacedo-

res de maldad prosperan,° y que los que 

provocan° a ’Elohim quedan impunes.

16

 Pero  los  que  temían  a  YHVH  habla-

ron el uno al otro,° y YHVH escuchó con 

atención y atendió. Y fue escrito un libro 

de memoria° delante de Él, a favor de los 

que temen a YHVH, y de los que honran 

su Nombre.

17

 En el día que Yo preparo, dice YHVH 

Sebaot, serán para mí un especial tesoro, 

y los perdonaré como un hombre perdona 

al hijo que lo sirve.

18

 Entonces os convertiréis, y distingui-

réis entre el justo y el perverso, entre el 

que sirve a ’Elohim y el que no lo sirve.°

El Heraldo

4

Ciertamente  viene  el  día,  ardiente 

como  un  horno,  donde  todos  los  so-

berbios  y  todos  los  que  hacen  maldad 

serán estopa. Aquel día vendrá y los abra-

sará, y no quedará de ellos rama ni raíz, 

dice YHVH Sebaot.

2

 Mas  para  vosotros,  los  que  teméis  mi 

Nombre, nacerá el Sol de Justicia, trayen-

do salvación en sus alas, y saldréis y salta-

réis como becerros salidos del establo.

3

 Y hollaréis a los malos, que serán como 

el polvo bajo las plantas de vuestros pies, 

en el día que Yo preparo, dice YHVH Se-

baot.

4

 Acordaos de la Ley de Moisés mi siervo, 

que le prescribí en Horeb para todo Israel, 

con sus ordenanzas y preceptos.

5

 He aquí, Yo os envío al profeta Elías an-

tes que venga el día de YHVH, grande y 

terrible.

6

 Él hará volver el corazón de los padres 

a los hijos, y el corazón de los hijos a los 

padres, no sea que Yo venga y tenga que 

consagrar la tierra al exterminio.°

3.8 Heb. terumah. Contribución para los sacerdotes.  3.9 Enmienda de los Soferim 

→ § 6  § 28.  3.10 Lit. presa.  3.11 Puede 

referirse a la langosta. 

3.15 Lit. elevados, construidos, fortalecidos.  3.15 También tentaron.  3.16 Lit. un hombre a su compañe-

ro

3.16 Prob. tradición persa en que se escriben unas crónicas o anales.  3.18 El TM sigue formando parte del c. tercero hasta 

concluir en 3.24. 

4.6 Nhiera la tierra con mayor destrucción